मङ्गलाचरण
ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिणे अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः श्री श्री रामकृष्ण लीला प्रसंग ठाकुर की जीवनी स्वामी शारदानंद जी महाराज द्वारा लिपिबद्ध उसका द्वितीय भाग साधक भाव उसका प्रथम अध्याय साधक और साधना यह हम देख रहे थे। इसका थोड़ा सा एक आउटलाइन इस अध्याय का देख लेते हैं। शरद महाराज क्या कहते हैं
अनेक रूपों में प्रकट एक ही दिव्य सत्य
कि साधना का जो चरम फल है वो है सर्वभूत में ईश्वर दर्शन। अ बहुत बार एक तरह से हम देखते हैं कि हम लोग ईश्वर को या तो स्वर्ग में देखने का प्रयास करते हैं या तो फिर अपने हृदय में देखने का प्रयास करते हैं। दोनों एक एक्सट्रीम ऑोजिट है। किंतु बहुत बार हम लोग यह भूल जाते हैं कि हमारी चारों ओर ये जो जितने भी मनुष्य हैं पेड़ पौधे पशु-पंखी आकाश बादल समुंदर ये जो कुछ भी बना है सब तो ब्राह्मण ही है। एक नाम रूप रूपी एक मुखौटा मात्र है। तो फिर सर्वभूत में सर्व अवस्था में सभी व्यक्ति के भीतर में ईश्वर का या तो ब्रह्म का साक्षात्कार करना दर्शन करना अनुभूति करना यह आध्यात्मिक जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य है। इसके बाद में किंतु फिर महाराज जी कहते हैं कि यह देखिए कि किसने कहा कि यह जीवन का लक्ष्य है? किसने कहा कि यह सब संभव है? तो फिर इसके सामने शरद महाराज ऋषि मुनियों के जो अनुभव है वह हमारे सामने रखते हैं। कहते हैं कि इस तरह से सर्वभूत में ईश्वर दर्शन ब्रह्म साक्षात्कार प्राप्त करके उन्होंने जगत के जितने भी दुख है आध्यात्मिक आधि भौतिक आधिदैविक सब तरह के दुखों से मुक्ति प्राप्त की है और भय शून्य होकर के चीर शांति के अधिकारी हुए हैं। निश्चित मृत्यु मानव जीवन में यह जितने भी हमारी चेष्टाएं हैं जितने भी कार्यकलाप है उन सबके भीतर में उन्होंने एक महत उद्देश्य आविष्कृत किया है और सहिष्णुता संतोष करुणा दीनता वगैरह सद्गुण राजी उनके हृदय में आकर के विकसित हुई है। स्थापित हुई है। उदार भाव से संपन्न हुए हैं। तो ऋषि मुनियों का जो अनुभव है, अनुभव के आधार पर ही तो उन्होंने हमारे शास्त्रों की रचना की है। तो उसके सामने फिर प्रश्न होगा कि उनको तो भ्रम भी तो हो सकता है। आपने किसने कहा? जैसे नरेंद्र ठाकुर को कहता था कि महाशय आपके जो दर्शन वगैरह है आपके मन की कल्पना मात्र है। फिर जब ठाकुर को इन लोगों ने गिरीश घोष वगैरह ने अवतार बोलकर के कहना शुरू कर दिया तो डॉक्टर सरकार कहते हैं इतना अच्छा खासा एक भोला भाला आदमी है इनोसेंट एट ठाकुर कहां यह अवतार बोलकर के इनका प्रचार करते हो जिनजिन लोगों को हमने भगवान बनाया है वे लोग महा दुष्ट ही निकले हैं आखिर में लोगों का शोषण ही किया है तो उनकी दृष्टि से डॉक्टर सरकार सही भी है। यह नेपोलियन है वगैरह-वगैरह चंगेज़ खान है, सीज़र है, एलेग्जेंडर था। यह जो हिस्ट्री के जितने भी राजनेता जो कि अपने को भगवान बोल के स्थापित करने का प्रयास किया वह महाशैतान निकले भी थे। किंतु सामने यह भगवान राम, भगवान कृष्ण, चैतन्य महाप्रभु, भगवान बुद्ध, जीसस क्राइस्ट यह भी तो एक परंपरा है। जहां पे कि एक आध्यात्मिकता में सर्वोच्च सिद्धि प्राप्त करके मनुष्य अपने मनुष्यत्व के परे जाकर के देवत्व में स्थापित होता है। उनको भगवान बोलकर के स्वीकार करना उनकी आराधना पूजा करना उनको प्रार्थना करना अपने इष्ट के रूप में उनको स्वीकार करना इसमें कुछ भी गलत नहीं है। हमारे आध्यात्मिक जीवन के लिए एक बहुत बड़ा सहाय है। तो यह एक हुआ। उसके बाद में फिर महाराज कहते हैं कि यदि आप यह कहते हैं कि यह जगत भ्रम मात्र है। माने वैसे तो है ब्रह्मन पर किंतु ब्राह्मण के ऊपर में एक भ्रम सा हमको दिखाई देता है। यह है नीचे तो है रज्जु ही रस्सी ही है। किंतु रस्सी को अंधेरे में देखने की वजह से हमको सर्प दिखाई देता है। और इस सर्प को देखकर के हमारे हृदय की धड़कन भय के मारे बढ़ जाती है। हमारा हृदय धकधक करने लगता है। तो यह भ्रम जो है कैसे प्रकट हुआ? तो फिर शरद महाराज इसका उत्तर देते हैं। एक असीम अनंत समष्टि मन में जगत रूपी कल्पना का उदय हुआ है। हम लोग इस व्यष्टि मन हमारा जो यह व्यष्टि मन है यह विराट मन का अंश है। विराट मन का एक अंग है। इसलिए हमको इस तरह की कल्पना दिखाई देती है। मांडूक्य उपनिषद में आप देखेंगे कि किस तरह से स्वप्न जागृत और सुशुप्ति और इसके परे है तुर्य तो हम जिस तरह से स्वप्न देखते हैं स्वप्न में पूरा एक जगत हम कल्पना करते हैं जागृत अवस्था भी स्वप्न की तरह ही है। किंतु एक डिफरेंस जो है जागृत स्वप्न अवस्था में आपका स्वप्न डिफरेंट होगा। मेरा स्वप्न डिफरेंट होगा। हो सकता है मैंने जो स्वप्न देखा इसमें मैं भारत का वड़ा प्रधान हूं या राष्ट्रपति हूं। आपने जो स्वप्न देखा उसमें आप भारत के राष्ट्रपति हैं। अभी हम लोग यदि आप यह कहेंगे कि ये जगत सिर्फ कल्पना मात्र है, भ्रम मात्र है, स्वप्न मात्र है तो आपके स्वप्न में आप राष्ट्रपति हैं। मेरे स्वप्न में मैं राष्ट्रपति हूं। किंतु आंख खोल के देखते हैं तो एक ही राष्ट्रपति है। इसका कारण क्या है? एक्चुअली यह स्वप्न जो है जागृत अवस्था का स्वप्न एक विराट मन के भीतर में यह स्वप्न दिख रहा है और हम सभी लोग इस स्वप्न के अंग मात्र हैं। इसलिए आंख खोल करके भी देखेंगे और मुझे भी वही राष्ट्रपति दिखेगा भारत का जो कि आपको दिखता है। यह भारत के 130 करोड़ लोग जो भी है लेटेस्ट पॉपुलेशन फिगर अभी तो सेंसस आ रहा है तो जितने भी हैं हम लोग हम सबको एक ही राष्ट्रपति दिखेगा भारत विश्व के जो 700 750 करोड़ जो जनसंख्या है उन सबको यदि कोई भी एक सर्च करके देखेगा इंटरनेट पे ना न्यूज़ पेपर में कि भारत का राष्ट्रपति कौन है तो उन सबको एक ही दिखाई देगा क्यों क्यों? क्योंकि क्या है कि हम सभी लोग एक ही स्वप्न के जो कि इस विराट मन के भीतर में प्रवा प्रवाहित हो रहा है उद्भूत हो रहा है उसके पार्ट एंड पार्सल मात्र है और फिर इस स्वप्न को हम लोग किस तरह से काटे
त्याग और वैराग्य: आध्यात्मिक उन्नति की आधारशिला
या इस स्वप्न से किस तरह से हम परे जाएं तो इसका सॉल्यूशन है वैराग्य। देखिए दो तरह के साधन मार्ग है। एक तो है इति इति दूसरा है नेति नेति। इति इति भक्ति मार्ग है। आप ईश्वर को स्वीकार करते हैं। ईश्वर की इस सृष्टि को स्वीकार करते हैं। नेति नेति ज्ञान मार्ग है। ना ही यह सृष्टि सत्य है। ना ही यह जो ईश्वर वह भी आप कहेंगे कि माया की ही प्रोडक्ट है। इन सबके परे जो आत्मज्ञान है ब्रह्मण है वही मेरा सही स्वरूप है। तो एक नेति नेति करके आप जो अल्टीमेट रियलिटी है सर्वभूत में ब्रह्म साक्षात्कार वह करने को जाए ना कि इति इति पद से जाए। कोई भी पद से जाए। देखिए फंडामेंटल जो है वो है वैराग्य। वैराग्य के बारे में शरद महाराज क्या कहते हैं? जगत के बारे में उल्लेखित जगत संबंधे उल्लेखित स्वार्थ पर भोग सुख लक्ष्य साधारण धारणा के परिहार को ही साधारण धारणा के त्याग को ही शास्त्र वैराग्य कहते हैं। जगत के साथ में हमारा जो नाता है स्वार्थ का नाता है। मैं कुछ भी देखता हूं, पेड़ देखता हूं तो सोचता हूं कि पेड़ से मुझे क्या लाभ होगा? तो पेड़ में से जो फल है उसको तोड़ के मैं खाऊंगा। वह मेरा बेनिफिट है। उसकी जो लकड़ी है उसको काट करके मैं फर्नीचर बनाऊंगा। यह मेरा बेनिफिट है। उसकी छांव है, छांव के तले में विश्राम करूंगा। यह मेरा बेनिफिट है। अभी ऐसा कोई पदार्थ जिससे कि हमको कोई लाभ नहीं है तो फिर हम उसके प्रति द्वेष करना शुरू कर देंगे। अरे यह जो पदार्थ है इससे ना ही मुझे फल मिलते हैं ना ही उससे मुझे छांव मिलती है ना ही इससे मुझे फर्नीचर बनता है। तो इसका क्या करें इसके साथ में? तो इसके साथ में द्वेष करो। सांप है जैसे कि अभी सांप का विष वैसे तो मेडिसिनल पर्पस है उसके किंतु एक आम आदमी को बोलेंगे सांप का क्या बेनिफिट है वो बोलेगा सिर्फ भय ही देता है दसता है जहर ही देता है इस तरह के सांप को मार डालो जबकि यह आम का पेड़ है आम का पेड़ हमको बहुत आम देता है तो उसको बचा के रखो गाय है तो दूध देती है तो गाय को बचा के रखो सांप को मारो गाय को बचाओ क्यों जगत के साथ में राग द्वेष का रिलेशन है स्वार्थ का रिलेशन है जो चीज मुझे पसंद है जो मुझे बेनिफिट देती है उसके प्रति आकर्षण है जो मुझे बेनिफिट नहीं प्रदान करती लाभ नहीं प्रदान करती उसके प्रति द्वेष उसके प्रति दुश्मनावट प्रकट होती है हिंसा प्रकट होती है वायलेंस प्रकट होता है तो यह जो जगत के साथ में स्वार्थ का जो नाता है उसका त्याग करना यह है वैराग्य भले चाहे सांप हो ना कि चाहे गाय हो। यह आम का पेड़ हो ना कि फिर यह वह जो कांटे वाली जो झाड़ियां है वो हो। थोर जिसको कहते हैं। तो जो भी पेड़ हो, जो भी पशु हो, पक्षी हो, उसके साथ में ना ही राग है, ना ही द्वेष है। सब कुछ ईश्वर की ही सृष्टि है। हां, ऐसा नहीं है कि मैं गाय का दूध है, वह दुग्धपान नहीं करूंगा। ऐसा नहीं है कि सांप मारने को आया तो मैं अपनी रक्षा नहीं करूंगा। किंतु क्या है? जगत के प्रति इक्वनिटी रखनी है। जितना एक शांत भाव से मैं गाय को देखता हूं, उतना ही शांत भाव से मुझे सर्प को देखना है। इसलिए आप देखेंगे कि यह जो जगत के प्रति जो समभाव है बोल के भगवान बुद्ध के आसपास एक ऐसा शांति और आनंद का माहौल खड़ा होता था कि आप जितने भी पेंटिंग देखेंगे ना देखेंगे यहां पे एक गाय का बछड़ा बैठा है। एक हरिण बैठा है और सामने ही शेर है, बाघ है। इस तरह के हिंसक पशु बैठे हैं। और वैसे तो जनरली हिंसक पशु है। गाय का ये हरिण का शिकार करते हैं। किंतु भगवान बुद्ध की प्रेजेंस में उनकी जो इक्वनिटी है, निर्वाण से प्रकट हुई परम शांति है। उस फील्ड में आकर के वे लोग अपना भी भय और वायलेंस खो बैठते हैं। एक समान रूप से एक दूसरे के साथ में वह बिहेव करते हैं। तो,
सरल बनो, पर कपटी या मूर्ख नहीं: श्रीरामकृष्ण की माँ से सीख
यह जो वैराग्य है, इसका यह डेफिनेशन है। जगत में कोई भी पदार्थ हो, कोई भी व्यक्ति हो, उससे हमको बेनिफिट होता हो कि उससे हमको नुकसान होता हो। सबके साथ में समभाव से हमको बिहेव करना है। और इसका अर्थ यह नहीं कि मूर्ख हो जाना है। ठाकुर ने जैसे कहा भक्त हो भी बोका हो भी क्यों म भक्त होना है मूर्ख क्यों होना है? वो जो हाथी नारायण माने गुरु ने कह दिया है सर्वभूत में नारायण है तो वह चेला रास्ते से जा रहा है हाथी दौड़ के आ रहा है तो वह सोचा ये तो हाथी भी तो नारायण है तो रास्ते में खड़े रह के हाथी का स्तव करने लगा नारायण रूप समझ कर के तो हाथी ने अपनी सूंड से चेले को उठाया और पटका और फेंका फिर जब चेला होश में आया तो देखा उसको कोई आश्रम में ले आया है उसकी सेवा सुश्रुसा हो रही है सामने सामने गुरु खड़े हैं। गुरु ने पूछा अरे मूर्ख हाथी दौड़ा चला आ रहा था। तुम रास्ते में क्यों खड़े थे? भाग क्यों नहीं हुए खड़े? तो चेला पूछता है महाराज चेला कहता है कि गुरु जी आप ही ने तो कहा सर्वभूत में नारायण। तो गुरु ने कहा तो महावत नारायण को भी तो मानना है। महावत नारायण ने कहा कि दौड़ो भागो अपने जान की रक्षा करो। तो उस महावत नारायण की बात क्यों नहीं सुनी? तो क्या है जिसको कहते हैं विवेक। बहुत बार आध्यात्मिक जीवन में चलते-चलते हम लोग अपना विवेक खो बैठते हैं। ऐसा भी नहीं करना है। प्रैक्टिकल होना है। देखिए ये एक बहुत ही फाइन लाइन है। जो लोग आदर्शवादी होते हैं वही आध्यात्मिक जीवन में चल पाएंगे। मैंने ऐसे कितने सहज सरल साधकों को देखा है। साधु हो ना कि गृहस्थ बहुत ही सहज रूप से लोगों पर विश्वास कर देते हैं। उनके मन में यह बात ही नहीं आती कि मैं सामने पर विश्वास कर रहा हूं तो वह मेरे विश्वास का भंग कर सकता है। मेरे साथ में वह दगाबाजी कर सकता है। मेरा अहित कर सकता है। यह लोग सोचते ही नहीं है। सहज रूप से विश्वास कर लेते हैं। सहज रूप से अपने मन की बात बता देते हैं। सहज रूप से उनके साथ में मित्रता कर देते हैं। फिर कभी कोई उनके साथ में ऐसा धोखा करता है तो उनको कष्ट भी बहुत होता है। किंतु फिर भी वो विश्वास करना मन की सरलता को नहीं छोड़ते हैं। तो क्या है ठाकुर ने कहा लोके लोके हमार मां के हावड़ो बोलतो मने सब कथा लोके सामने ग बोले दी ठाकुर अपनी मां के बारे में चंद्रामणि देवी के बारे में कहते हैं कि उनकी मां सबके सामने जो मन की बात है वो कह देती थी अर्थात कि वो फैमिली में कुछ सीक्रेट होता है ना फैमिली की बातें बाहर वालों के सामने क्या करना किंतु ऐसा उनके मन में इतनी सरलता थी इतना इनोसेंस था इतनी नादानियत थी कि ऐसा इस बात को इसके सामने नहीं करना। यह बात को इसके सामने नहीं करना। जैसे पॉलिटिकल माइंडसेट होता है ना इसके साथ में एक तरह से डीएल करना है। दूसरों के साथ में दूसरी तरह से डीएल करना है। वो सब पॉलिटिकल कैलकुलेशन उनके मन में बिल्कुल नहीं थे। तो ठाकुर कहते हैं लोग मेरी मां को हावड़ो कहते थे। अभी हावड़ो का क्या अर्थ है पता नहीं। बेंगली वर्ड है किंतु मुझे लग रहा है कि कटाक्ष सूचक ही होगा। तो जो भी है ये जो और सहज सरल नहीं होने से देखिए कि इस तरह के ईश्वर भी तो उनकी गर्भ में जन्म ग्रहण नहीं करेंगे ना। मथुर बाबू ने यही चंद्रामणि देवी को कहा कि मां आपको जो चाहिए आप मांग लीजिए। तो अभी देखिए मथुर जैसा धनपति यदि हमको आकर कहेगा कि आपको क्या चाहिए मांग लीजिए। तो हम बोलेंगे अच्छा वो लेटेस्ट वो जो मॉडल का मोबाइल दे दो ये दे दो वो दे दो। हम तो पता नहीं कितनी चीजें मांग लेंगे। किंतु देखिए चंद्रामणि देवी बेचारी सोच रही है। सोच रही है। बोलती है कि कुछ मांगने को तो मन में ही नहीं आ रहा। बोलती है कि बेटा तुमने रहने को तो अच्छा एक घर दे ही दिया है। नौबत में वो रह रही थी। खाने-पीने का कोई ऐसा अभाव नहीं है यहां पे। तो फिर मैं मांगूं तो मांगूं क्या? तो फिर देखिए मथुरू फिर भी वो रिक्वेस्ट करता है कि नहीं नहीं मैं आपको कुछ देना चाहता हूं। आप सही में कुछ मांगिए। तो फिर बहुत सोच के चंद्रामणि देवी ने कहा अच्छा यह मेरा जो तंबाकू का पत्ता है वो खत्म हो गया है। थोड़े से तंबाकू के पत्ते ला के दे दो। तो फिर यह सुनकर के मथुर की आंखों में अश्रू आ गए। क्यों? मथुर तो धनपति है तो जमींदार है तो उसका पूरा बुद्धि ही है कि धन को ही वह सर्वश्रेष्ठ समझता है। सर्वस्व समझता है। इस तरह का आदमी ऐसे किसी के संपर्क में आए कि जिसके लिए धन का कोई मीनिंग ही नहीं है। तो फिर उसको इतना आश्चर्य होता है और फिर वह कहता है कि देखिए आपके जैसी मां नहीं होती तो फिर माने श्री रामकृष्ण जैसे अवतार पुरुष आपके जैसी मां की कोख से ही तो जन्म ग्रहण करेंगे और किसके और किसके गर्भ से जन्म ग्रहण करेंगे तो देखिए कि ये जो सहजता और सरलता ये एक क्या कहेंगे कि आध्यात्मिक जीवन का फाउंडेशन है। ये जो वैराग्य है वैराग्य अर्थात कि ना किंतु हमारा जो टॉपिक चल रहा था सबके साथ में समान रूप से व्यवहार करना है किंतु इसका अर्थ यह नहीं कि हमको मूर्ख हो जाना है। देखिए चंद्रामणि देवी है या ऐसे किसी को आप देखेंगे हम लोग यह नहीं कह सकते कि यह लोग मूर्ख है क्योंकि आध्यात्मिक जीवन में इन लोगों की पूरी प्रैक्टिकल सेंस थी। ठाकुर ने कहा है शारी चातुर माने वह चातुर वो चतुराई चतुराई है वही चतुराई सही चतुराई है जो कि हमको ईश्वर प्राप्ति करवा सके बाकी सब चतुराई कि कैसे भी करके गैंबलिंग करके ना लोगों को फसला फुसला करके वो शकुनी की तरह जुए में जीत करके मैं राज्य हड़प लूंगा तो इस तरह के राज्य का भोग आप कितने दिन करेंगे देखिए आखिर में तो कौरव कुल का नाश हो गया महाभारत के युद्ध में तो छल से प्राप्त किया राज्य वो कभी भी किसी को हजम नहीं होता तो ये है कि सबके सामने समान दृष्टि है किंतु साथ में ही एक विवेक विवेक भी है कि अगेन यह बहुत ही थिन लाइन है बहुत ही यह धारदार आप कहेंगे कि बहुत ही एक सूक्ष्म है यह डिसीजन मेकिंग म भक्त हो भी बोका हो भी कहो भक्त होना है। मूर्ख क्यों होना है? और दूसरी ही ओर यह चंद्रामणि देवी थोड़ा सा एक ओर जाएंगे तो बिल्कुल आप मूर्ख बन जाएंगे। थोड़ा सा दूसरी ओर जाएंगे बहुत ज्यादा व्यवहारिक होने को जाएंगे तो पूरा संसार में फिसल जाएंगे। तो दोनों के बीच में एकदम परफेक्ट रास्ता निकाल के चलना वह विवेक नहीं होने से नहीं होगा। तो देखिए कि यह वैराग्य का डेफिनेशन
भक्ति से ज्ञान की चरम अवस्था निर्विकल्प समाधि तक
हो गया। यह वैराग्य नेति नेति पथ हो कि इति इति पथ दोनों के लिए चाहिए। नेति नेति पथ में हमको क्या है कि नित्य कारण स्वरूप का अनुसंधान करना है। जिस तरह से मेरे भीतर में यह मन नहीं, बुद्धि नहीं, चित्त नहीं, अहंकार नहीं, यह संस्कार नहीं, यह पंच महाभूत नहीं, पंच प्राण नहीं, पंच ये जो तन्मात्रा नहीं, ये इस सबके पंच ज्ञानेंद्रिय, पंचकर्मेंद्रिय नहीं इन सबके परे जो मेरा स्वरूप है वही मेरा सही स्वरूप है। वो नेति नेति करके सब कुछ जब त्याग करेंगे और फिर आखिर में जो पदार्थ आकर के उपस्थित होगा वह है हमारा सही स्वरूप तो वह नेति नेति मार्ग हो गया और इति इति मार्ग में है कि भक्त जगत और जगत में सर्व वस्तु और व्यक्ति को ईश्वर के साथ में संबंध युक्त देख के अपना लेता है। बड़ा ही सुंदर डेफिनेशन है। जगत में जो कुछ भी देखता है यह भक्त जिस व्यक्ति को देखता है उन सबको वो ईश्वर के साथ में संबंध युक्त कर लेता है। ईश्वर ने ही सृष्टि की रचना की। सृष्टि के किसी के प्रति हम द्वेष करें ही क्यों? ईश्वर की ही तो रचना है। तो इस तरह से ईश्वर के साथ में संबंध युक्त देख के वह सबको अपना लेता है। उसकी करुणा है, कंपैशन है, दया है, एंपैथी है। उसके भीतर में पूरे जगत को आवृत कर लेता है। तो यह नेति नेति मार्ग और इति इति मार्ग और फिर शारदानंद जी महाराज इति इति मार्ग से निर्विकल्प समाधि लाभ का विवरण कर रहे थे कि किस तरह से अब जैसे-जैसे हमने ये देखा था कि नेति नेति मार्ग से निर्विकल्प समाधि तो मिल सकती है। क्यों? क्योंकि ज्ञान मार्ग में निर्गुण ब्रह्मन की कल्पना की गई है और भक्ति मार्ग में सगुण ब्रह्मन की कल्पना कल्पना की गई है। तो अभी ज्ञान मार्ग से आपको निर्गुण ब्रह्म मिले निर्विकल्प समाधि प्राप्त हो वो तो लॉजिकल है और भक्ति मार्ग से आपको सगुण ब्रह्म के साथ में सविकल्प समाधि प्राप्त हो वह एक लॉजिकल है। किंतु ये जो क्रॉस पोलिनेशन है भक्ति मार्ग का आश्रय लेकर के आप निर्गुण ब्रह्म निर्विकल्प समाधि कैसे प्राप्त करें उसका विवरण हमको शरद महाराज कर रहे थे और यह जो है श्री रामकृष्ण देव की साधना इसका यह हार्ट है। ठाकुर ने निर्विकल्प समाधि प्राप्त की है। निर्विकल्प समाधि और निर्विकल्प समाधि से बाद जगत में वापस आकर के सर्वभूत में सभी को वह अपने ही स्वरूप के रूप में देखना ब्राह्मण के ही रूप में देखना वो ठाकुर ने उपलब्ध तो किया है किंतु ठाकुर का जो मार्ग जो है वह निर्विकल्प समाधि तक जाने का मार्ग प्योर ज्ञान मार्ग नहीं है। यदि हमको ठाकुर की जीवनी ठाकुर की साधना के बारे में कुछ पता हो तो हमको यह पता है कि वैराग्य एक तो पक्का फाउंडेशन था ठाकुर के जीवन का। ठाकुर स्पष्ट रूप से कहते हैं कि काम कांचन त्याग किए बिना आध्यात्मिक जगत में ज्यादा कुछ होने वाला नहीं। तो यह तो वैराग्य की डेफिनेशन के समय ही शरद महाराज ने हमको स्पष्ट कहा कि यह नीति नेति का मार्ग हो कि इति इति का मार्ग हो। भक्ति पथ हो ना कि ज्ञान पथ हो आपको वैराग्य तो दोनों के फाउंडेशन के रूप में है। तो यह वैराग्य रूपी फाउंडेशन ठाकुर का था। इसके बाद में जब काली मंदिर में पूजक की पदवी उन्होंने ग्रहण की। उसके बाद में केनाराम भट्टाचार्य से शक्ति मंत्र लेकर के उन्होंने माने पूजक की पदवी ग्रहण करने से पहले तो शक्ति मंत्र लेना होता है। तभी तो आप मां काली की उपासना कर पाएंगे। किंतु यह उपासना के साथ में ही फिर उन्होंने हृदय के आवेश से हृदय के आवेग से मां काली को पुकारना शुरू किया और पुकारते गए पुकारते गए रोते गए माने भीतर में से ऐसा व्याकुलता और उन्मत्तता का एक झरना बहने लगा कि जैसे आखिर [गला साफ़ करने की आवाज़] में मां काली को ठाकुर को दर्शन देना ही पड़ा। अभी देखिए इंटरेस्टिंगली सो इंटरेस्टिंगली कि जब यह प्रथम दर्शन की विवरण प्रथम दर्शन का विवरण शरद महाराज करते हैं तो क्या लिखते हैं? मां काली का खड़ग हाथ में उठाकर के जैसे ही ठाकुर अपना गला काटने को गए साथ में ही मां काली ने दर्शन दिया और ज्योतिर्मय समुद्र के ज्योतिर्मय तरंगों के रूप में मां काली ने उनको दर्शन दिया। तरंगे दौड़ती हुई आकर के उनको घेर ली और ठाकुर साथ में ही बाह्य ज्ञान शून्य हो गए और समाधि में मग्न हो गए। अभी पाथ वो रो रहे हैं मां काली के दर्शन के लिए किंतु उनको जो अनुभूति होती है वो प्रकाशमय तरंग की होती है। वि इज सो सरप्राइजिंग। अ तो देखिए कि पहले से ही हमको दिख रहा है प्रथम वैसे तो ठाकुर के और भी सारे कई दर्शन थे किंतु माने यहां पे काली मंदिर के इस दर्शन के बारे में कि पूजा आराधना कर रहे हैं व्याकुल होकर पुकार रहे हैं मां काली को किंतु दर्शन हो रहा है प्रकाशमय तरंगों का और प्रकाशमय तरंगे आकर के उनको बहा करके ले जाती है। वह भाव शून्य म बाह्य ज्ञान शून्य हो जाते हैं। तो वह जो भक्ति की ही साधना कर रहे थे इसके बाद में किंतु जब तोतापुरी आए सिस्टमेटिकली ज्ञान योग की साधना की उस समय जब भी आंख बंद करते हैं तो उनके सामने मां काली का दर्शन होता है। यह कैसा क्रॉस वायरिंग हो गया है। जब मां काली के दर्शन की वह पुह मां काली को दर्शन देने के लिए पुकार रहे थे तब प्रकाश की तरंगे आन उपस्थित हुई थी और जब यह प्रकाश की तरंगों के लिए पुकार रहे हैं इस अर्थ में कि निर्विकल्प समाधि प्राप्त करने की चेष्टा कर रहे हैं तो उस समय मां काली ने आकर के दर्शन दे दिया। बार-बार मां काली आकर के उनकी नजर के सामने उपस्थित होती है। फिर ठाकुर थोड़े से हताश हो गए। तोतापुरी नाराज होकर बोलते हैं होगा क्यों नहीं? ठाकुर ने कहा नहीं लगता नहीं कि होगा तोतापुरी नाराज होकर बोलते हैं होगा क्यों नहीं फिर वो कांच का टुकड़ा वो वहां पे भ्रू मध्य वो ऐसा चुभा देते हैं और कहते हैं जो दर्द हो रहा है उसके ऊपर में अपने मन को एकाग्र करो और जैसे ही ठाकुर ने मन को एकाग्र किया साथ में ही जैसे मां काली की मूर्ति प्रकट हुई साथ में ही ठाकुर ने ज्ञान अस से मूर्ति को दो टुकड़ों में काट दिया और हू करके के उनका मन निर्विकल्प समाधि में स्थित हो गया। तो यह जो क्रॉस वायरिंग जो है ये [हंसी] ये ठाकुर के जीवन में देखेंगे कंटीन्यूअस हो रहा है। मां काली को पुकारेंगे तो यह निराकार दर्शन होगा और फिर यह यदि निराकार के लिए व्याकुल हो रहे हैं तो मां काली बीच में आ जाएगी। सो इति इति पथ में निर्विकल्प समाधि प्राप्त करना यह या तो फिर कहेंगे कि अह निर्विकल्प समाधि के रास्ते में मां काली का दर्शन हो आना। ये ये जो क्रॉस पोलिनेशन है, क्रॉस वायरिंग है, ये ठाकुर की साधना का एक यूनिक लक्षण है। वरना तो जब शंकराचार्य जैसे जितने भी सिद्ध महात्मा आप देखेंगे जो कि अद्वैत वेदांत की आराधना कर रहे हैं तो उसी टाइप का उनको अनुभूति होता है। कोई भगवान कृष्ण की आराधना कर रहा है। तो उसी टाइप की अनुभूति होती है। ठाकुर के जीवन में यह सभी तरह के भावों की समष्टि जैसे कि वहां पे थी। तो इस तरह से भक्ति के मार्ग पर निर्विकल्प समाधि और निर ज्ञान के मार्ग में मां काली का दर्शन यह सब ठाकुर के जीवन का अभिन्न अंग है। तो अभी यह भक्ति के मार्ग में निर्विकल्प समाधि कैसे प्राप्त हो उसका यह जो लॉजिक जो है शारदानंद जी हमको बता रहे थे उसमें किस तरह से उन्होंने लॉजिक लगाया है कि पहले तो रूप के ध्यान में तन्मय होकर के किस तरह से साधक जगत का अस्तित्व भूल जाता है और निर्विकल्प समाधि तक जाता है। माने सिंपल एक ही सेंटेंस में उन्होंने स्पष्ट बता दिया। पहले तो रूप के ध्यान में तन्मय हो जाना है। जिससे क्या होगा? हमारा जो बिखरा हुआ मन है चारों ओर से कलेक्ट होकर के ईश्वर के रूप की ओर आ केंद्रित होगा। आकर्षित हो जाएगा और फिर उस रूप को भी ज्ञान रूपी अस से काट देना है। तो मन निर्विकल्प समाधि में पहुंच जाएगा। दो स्टेज में यह कार्य करने हैं। पहले तो बिखरे हुए मन को रूप की कल्पना पे एकत्रित करना है। फिर जब रूप पे मन स्थित हो जाए तब रूप को काट के अरूप को प्राप्त करना है। सिंपल सा दो स्टेज का शरद महाराज का विवरण है। और फिर शरद महाराज यह भी कहते हैं कि कभी-कभी क्या होता है कि जब भक्त ईश्वर के कोई एक रूप की कल्पना करता है तो कभी हाथ दिखाई देगा, कभी सर दिखाई देगा, कभी श्री चरण दिखाई देंगे। तो इस तरह से किंतु जैसे-जैसे ध्यान में गंभीरता प्राप्त होगी वैसे वैसे ही वो रूप जो है ईश्वर का स्थित होता जाएगा। संपूर्ण दिखने लगेगा और फिर इतना ही नहीं यही रूप जो है वो जैसे कि जीवंत हो जाएगा। मूर्ति में पत्थर की मूर्ति की तरह बैठा नहीं रहेगा। हम आंख खोल के मंदिर में जैसे ठाकुर का दर्शन करते हैं ठाकुर वो मार्बल की इमेज में बैठे हुए हैं समाधि मुद्रा में तो वो बैठे ही है ना वो पुजारी महाराज पूजा करते हैं तो ऐसा थोड़ी ना ठाकुर खड़े होकर के कहीं वो बोलते हैं चलो मैं थोड़ा सा जाकर के गार्डन में एक चक्कर मार के आता हूं या तो यहां पे वाइजग में यहां पे सामने एक काली मंदिर है तो ठाकुर बोलते हैं चलो मैं वो मां काली का दर्शन करके आता हूं ऐसा तो होता नहीं है ठाकुर जैसे समाधि मुद्रा में बैठे हैं तो बैठे ही है तो क्या है कि नजर नजर खोलने से तो वह स्थिर पत्थर की मूर्ति के रूप में दिखते हैं। जड़ के रूप में किंतु मन में जब हम रूप की कल्पना दृढ़ हो जाए फिर यही ठाकुर जीवंत हो जाएंगे। हमारे साथ में वार्तालाप करेंगे। हमको उपदेश देंगे। हमको गाइड करेंगे। हमारे साथ में हंसी मजाक करेंगे। लीला करेंगे। माने इतना सब वो हमको आनंद से हमारे मन को भरपूर कर देंगे। तो यह हो गया स्टेप वन। और फिर जब ईश्वर जो है ईश्वर का रूप संपूर्ण रूप से वह जीवंत होकर के स्थित हो जाता है तो फिर आप जब इसको काटेंगे तो आप निर्विकल्प समाधि में स्थित हो जाएंगे। तो यह जो लॉजिक हम देख रहे थे उसके साथ में ही हमने रामलाल दादा की और गोपाल की मां की अघोरमणि देवी की कहानियां भी देखी थी। किस तरह से कल्पतरुद्दीन को ठाकुर ने जब रामलाल दादा को स्पर्श किया। रामलाल दादा स्वयं कहते हैं रामलाल दादा ठाकुर के भाई के पुत्र अर्थात कि उनके भतीजे उनकी सेवा करते थे। मां काली के मंदिर में पुजारी थे। तो यही रामलाल दादा कहते हैं कि पहले मुझे ईश्वर का हाथ ही दिखता था तो कभी सर दिखता था, कभी श्री चरण दिखते थे। किंतु ठाकुर ने जैसे स्पर्श किया संपूर्ण अवयव सहित ईश्वर की मूर्ति मेरी नजर के सामने जीवंत हो गई। तो यह एक उनका अनुभूति था। वह हमने देखा और फिर अघोर मणि देवी गोपाल की मां उसकी
भक्ति और त्याग की पराकाष्ठा: गोपाल की माँ को हुए बालगोपाल के दर्शन
कहानी भी हमने देखी कि किस तरह से ठाकुर के उन्होंने नाम तो सुन के रखा था फिर एक बार वो मां ठाकुर का दर्शन करने को आई बहुत ही अच्छा लगा जैसे कि उनका मन जो है ठाकुर के श्री चरणों में ही स्थित हो गया और फिर इसके बाद में अघोरमणि देवी बार-बार ठाकुर का दर्शन करने के लिए दक्षिणेश्वर आ रही है। अघोरमणि देवी जहां पे रहती थी उस जगह का नाम था कामारहाटी। कामारहाटी में भी दक्षिणेश्वर की तरह मैंने तो देखा नहीं किंतु जिस तरह से डिस्क्रिप्शन है कि वहां पे भी एक ठाकुर वाड़ी थी और वहां पे भी ईश्वर विग्रह की सेवा होती थी और वहां पे ही एक कॉर्नर में यह गोपाल की मां का घर था और फिर वहां से कामारहाटी से दक्षिणेश्वर वह आती थी। तो वह बार-बार ठाकुर का दर्शन करने के लिए कामारहाटी से दक्षिणेश्वर आती है। और फिर ठाकुर फिर बिल्कुल बच्चे की तरह बाल गोपाल की तरह वो कामारहाटीर बामनी ठाकुर कभी-कभी कहते थे कामारहाटी की ब्राह्मणी गोपाल की मां या तो फिर अघोरमणि देवी इस तरह से विभिन्न नामों से तो ये जो गोपाल की मां है वो ठाकुर के लिए वो ठाकुर ये जििद करेंगे कि मुझे यह खाना खाना है मुझे वह खाना खाना है और सब समय यह जो अघोरमणि देवी है इस तरह का खाना बनाकर करके ठाकुर के लिए ले जाती थी और कभी-कभी सोचती भी थी कि यह मैंने कहां एक अच्छे साधु के लिए साधु के दर्शन करने को जाऊंगी। कहां यह ईश्वरीय वार्तालाप सुनने को मिलेगा वो नहीं ठाकुर के पास जब भी आती हूं ठाकुर कहते हैं यह खिलाओ वो खिलाओ यह बना करके ले आना नेक्स्ट टाइम वो बना करके ले आना बस खा यही एक किस तरह के साधु है अब नेक्स्ट टाइम नहीं आऊंगी ऐसा सोचती तो थी किंतु जैसे ही कमरे से बाहर निकलती वैसे ही पीछे से ठाकुर ऐसा आकर्षण करते कि जैसे कि कितना मेहनत करके कष्ट करके ठाकुर से विदाई लेनी पड़ती थी। तो यह सब लीला ठाकुर के साथ में हो रही है। मीनवाइल उनका यह जो नियमित रूप से निष्ठा पूर्वक उनका जो एक विधवा ब्राह्मणी का जीवन था निष्ठा पूर्वक सुबह को दो-ती बजे उठकर के नियमित जप करने को बैठती। 5 से छ घंटा सुबह को जप करना। 5 से छ घंटा रात को जप करना। यह जो उनका जो नियम था वह तो चल ही रहा था। एक दिन सुबह को जैसे ही जप समाप्त करके वो जप समर्पण कर रही थी उस समय देखा बगल में ठाकुर बैठे हैं तो उन्होंने सोचा कि इस समय इतना अर्ली मॉर्निंग ठाकुर कहां से आ गए तो ठाकुर को जैसे उनको संदेह हुआ ठाकुर ही है ना कि फिर मेरे मन का भ्रम है जैसा ही ठाकुर को स्पर्श करने का प्रयास किया ठाकुर हो गए अदृश्य और उनकी जगह पे आए हैं छोटे से लड्डू गोपाल वो जैसे लड्डू गोपाल की वो छोटी मूर्ति होती है ना इस तरह से हाथ में यह लड्डू पकड़ करके वह बैठे रहते हैं तो वैसे ही वह छोटे से बाल गोपाल प्रकट हुए और फिर बाल गोपाल का तो है ना बाल्य लीला तरंग तूफान तो जो जिस तरह से शारदानंद जी महाराज वो लिखते हैं अह बाल्य लीला तरंग तूफान माने छोटा सा गोपाल है वो तो किस तरह का तूफान मचाएगा किस तरह की वो जो आनंद की जो लहर है आनंद की तरंग है वो उनके चारों ओर फैलना शुरू होगी यह जो भागवत में है, यह जो वृंदावन की यह जो लीलाएं हैं, उसमें तो हमने पढ़ा ही है कि किस तरह से गोपियों के घर जाकर के मक्खन चोरी करता है। और भी क्या-क्या उत्पात मचाता है। तो यहां पे भी यह बाल गोपाल प्रकट हो के सब तरह के तूफान, सब तरह की शरारती हरकतें करना शुरू कर दिया। यहां पर भैरवी आप जस्ट इमेजिन कीजिए कि इस तरह का जो छोटा सा बाल गोपाल जिसका मन आनंद और शरारत से भरा हो एकाएक प्रकट हो और एकाएक ये सब उसका यह जो प्रारंभ कर दे लीला तो हमारा मन किस तरह के दिव्य आनंद से भरपूर हो जाएगा तो वही हुआ बेचारी ये अघोरमणि देवी के साथ में आंखों में से अविरल अश्रुधारा मन जैसे कि इतना जीवन में कठोरता किया है। इतनी दरिद्रता के भीतर में वह रही है। वह सब कहां जीवन के कष्ट, सामाजिक कठोरता, सामाजिक निंदा का भय, यह दरिद्रता कहां पे सब विलीन हो गया और मन जैसे कि विमल आनंद से भरपूर हो गया। यही बाल गोपाल को अपनी गोद में उठा के अघोरमणि देवी बेचारी बावरी सी बनी हुई दक्षिणेश्वर आती है और उस समय दक्षिणेश्वर में और एक लेडी डिवोटी उपस्थित थी जिसने कि यह घटना का वर्णन किया है। वो कहती है कि मैंने गोपाल गोपाल करके हमको आवाज सुनाई दी कहीं से तो तो उसने कहा कि अरे यह तो आवाज तो पहचानी हुई है। यह तो अघोरमणि देवी की है। तो उसी मीनवाइल यह अघोरमणि देवी जैसे कमरे में प्रवेश करती है और कुछ ठिकाना नहीं है। जो आंचल है वह जमीन पर गिरा जा रहा है। बाल अस्त-व्यस्त आंखें जैसे कि कपाल में उठ गई है और भाव में मतवारी होकर के ठाकुर के पास में गोपाल गोपाल करके आती है। और ठाकुर भी एकाएक उनके भीतर में यह गोपाल भाव का आवेश होता है। भैरवी यह जो अघोरमणि देवी की गोद में बैठ जाते हैं। तो उस समय यह जो डिवोटी लेडी उपस्थित थी वह कहती है कि यह भाव में ठाकुर को ठाकुर ने स्त्री को स्पर्श किया। यह मैंने पहली बार देखा। वो कहती है हमने मैंने सुना था कि ये जो ठाकुर की गुरु भैरवी ब्राह्मणी थी। वह जब मां यशोदा के वात्सल्य भाव में उनका उनके भीतर में प्रकट होता था। तब ठाकुर बाल गोपाल की तरह उनकी गोद में विराजित होते थे। किंतु वह तो भैरवी ब्राह्मणी और इतने सालों पहले की बात अभी वर्तमान में भाव में ठाकुर ने किसी स्त्री को स्पर्श किया तो यह पहली बार मैंने देखा तो ठाकुर कुछ क्षण तो भाव में आकर के अघोरमणि देवी की गोद में बैठे। फिर भाव का उपशम होकर के वह जाकर के अपनी खाट पर बैठे। किंतु मीनवाइल अघोरमणि देवी के मन में तो भाव का यह जो तूफान तरंग चल रहा है तो ठाकुर के पूरे कमरे में ब्रह्मा नाचे विष्णु नाचे ऐसा आनंद से वो नृत्य करती करती घूम रही है माने जीवन भर जो कठोरता की है पुरुषों के सामने किस तरह से बिहेव करना है वो जो जितने भी नीति नियम थे सब कहां हवा हो गई ये जो आनंद के तूफान तरंग में और साथ में ही देख रही है ये जो बाल गोपाल है कभी इधर दौड़ता है कभी उधर घर दौड़ता है। कभी ये कहां पे ये दुष्टमी बेंग वर्ड है। दुष्टमी अर्थात कि शरारत। तो कभी यह शरारत करता है। कभी वो शरारत करता है। तो मां का जो हृदय जिस तरह से मां का हृदय तो एकदम बच्चे के सब शरारत देखकर के उतफुल्ल भी होगा और क्रोधित भी होगा कभी-कभी। जब भी उसकी शरारत बढ़ जाएगी तो। तो उसको डांटेगी भी साथ में लाड प्रेम भी करेगी। तो ये [गला साफ़ करने की आवाज़] पूरी दिव्य लीला ठाकुर की चारों ओर चल रही है। तो एक सुंदर एक देखिए कि अघुरमणि देवी की तपस्या करके किस तरह से उन्होंने ईश्वर प्राप्ति की है। और फिर जैसे हमने इसके बाद में भी काफी सब गुरमणी देवी की ही कहानियां देखी। त्याग और तपस्या में प्रतिष्ठित इस तरह से हो गई है कि जो मारवाड़ी लोगों की लाई हुई चीजें ये मिठाई है, मिरी है, ये जो ड्राई फ्रूट है जो कि ठाकुर नरेंद्र को छोड़ के और किसी को खाने को नहीं देते थे। ठाकुर कहते थे कि उसके भीतर में देखिए कि ज्ञान अग्नि प्रज्वलित है नरेंद्र के भीतर में। वो यह सब चीजें खाएगा तो सब हजम हो जाएगा क्योंकि उसके भीतर में ज्ञान का अग्नि है और और किसी को ठाकुर जो है यह मारवाड़ियों के द्वारा लाई हुई कामना की हुई संकल्प की हुई चीजें और किसी को नहीं खिलाते थे और एक दिन जब ठाकुर ने कहा कि ये मारवाड़ी लोग जो मिचरी लाए हैं तो अधोरमणि देवी को दीजिए तो कमरे में सन्नाटा छा गया कि ये ठाकुर क्या बोल रहे हैं नरेंद्र को छोड़कर के यह चीज उन्होंने और किसी को खाने के लिए नहीं दी। आज अखुरमणि देवी को दे रहे हैं। अद्भुत आश्चर्य देखिए रामकृष्ण संघ में कहां नरेंद्र ज्ञान की चरम सीमा पे बैठा हुआ है। महादेव स्वयं और कहां यह बेचारी दरिद्रा ब्राह्मणी नारी जिसको ना ही पढ़ाई लिखाई आती है। शास्त्र का कुछ पता नहीं है। हृदय की सरलता से ही आराधना करके बाल गोपाल का दर्शन किया है। इन दोनों को जैसे कि एक ही आसन में ठाकुर बिठा देते हैं और कोई नहीं है। जहां तक मुझे याद आता है रामकृष्ण साहित्य में मुझे याद नहीं आ रहा। सर्च करना पड़ेगा अपने एनसाइक्लोपीडिया में कि और किसी को ठाकुर ने यह जो मारवाड़ियों के द्वारा लाई हुई चीजें खिलाई हो। प्रसाद जो है ये लोग प्रसाद जब करते थे तो ठाकुर खुद खाते थे। भक्तों में भी बांटते थे। किंतु क्या है वो ईश्वर की पूजा करने के समय जो प्रसाद बनता है वो एक चीज है और एक जनरल जो एक देते हैं वो दूसरा चीज है तो जनरली जो दिया जाता है वो ठाकुर नारायण को छोड़कर किसी को नहीं देते थे और आज ये जो ब्राह्मणी को ये कमरहाटी की ब्राह्मणी को दी है तो यह हमने देखा कि वैराग्य की अग्नि यह जो ब्राह्मणी के हृदय में भी वह प्रज्वलित हो रही है और फिर इसके बाद में ठाकुर ने कहा कि देखो यह जो 2 महीने तक
जब समाधि या ईश्वर-दर्शन 21 दिन तक निरंतर रहे—तो देह नहीं टिकती
कंटिन्यूस अगोरमणि देवी को दर्शन की परंपरा चालू रही। किंतु उसके बाद में उनके दर्शन काफी कम हो गए। तो फिर वह ठाकुर के पास में आई। कहा कि आपने मेरे दर्शन बंद क्यों करवा दिए? तो ठाकुर ने कहा देखो इस तरह से सर्व सदा सर्वक्षण दर्शन यदि चलते रहते हैं तो कली में शरीर रहेगा नहीं। कलयुग में अन्नगत प्राण शरीर की कैपेसिटी नहीं है कि कंटिन्यूस दर्शन का आनंद उपभोग करना 21 दिन में शरीर चला जाएगा। सूखे पत्ते की तरह झड़ पड़ेगा। तो यह जो ठाकुर कहते हैं तो साथ में हमको यह भी पता है कि निर्विकल्प समाधि में भी वही 21 दिन वाला ही ठाकुर कांसेप्ट है वो जो कांसेप्ट है कि 21 दिन यदि निर्विकल्प समाधि में रहे तो शरीर त्याग हो जाएगा। हमको यह पता है कि तोतापुरी के गमन के बाद तोतापुरी जी ने जब यह दक्षिणेश्वर से विदाई ली उसके बाद में ठाकुर कंटीन्यूअस छ महीना निर्विकल्प समाधि में रहे थे। किंतु कंटीन्यूअस नहीं रहे थे। एक साधु कहां से आया? उसके हाथ में एक छड़ी जैसा था। तो वो ठाकुर की सेवा करता था। ठाकुर निर्विकल्प समाधि है तो उनको मार मार करके उनको थोड़ा बहुत खुश करवाता था। और जैसे ही ठाकुर थोड़े से होश में आए साथ-साथ में ही ठाकुर के मुंह में अन्न जो है वह प्रवेश करवा देता था। जो थोड़ा सा अन्न ठाकुर के देह में जाए। तो जो थोड़ा बहुत बाह्य ज्ञान आए इसलिए जो 21 दिन वाला जो नियम है उसमें ब्रेक पड़े और फिर भले ही ठाकुर चलो इमीडिएटली निर्विकल्प समाधि में चले गए किंतु ये जो बीच-बीच में ब्रेक होता था बोलकर के ठाकुर का देह छ महीने तक निर्विकल्प समाधि का वो उसमें प्रवेश करते रहे उसमें स्थित रहे। यदि ये बीच-बीच में ब्रेक नहीं देता यह साधु तो ठाकुर 21 दिन में चल बसते हैं। तो ये जो निर्विकल्प समाधि के बारे में जो 21 दिन वाला जो रूल है वही रूल ठाकुर यहां पे दर्शन के बारे में कहते हैं कि ईश्वर के दर्शन सतत 21 दिन से ज्यादा चले तो देह नहीं टिकेगा। यानी कि देखिए ये जो जर्नी है जो माने किस तरह से ईश्वर के दर्शन दर्शन से निर्विकल्प समाधि तो ये सब एक के बाद एक सब साइन जो है वो मिल जा रही है और फिर जो अल्टीमेट जो साइन है ईश्वर दर्शन
जहाँ देखूँ, वहीं बालगोपाल: गोपाल की माँ का विश्वरूप-दर्शन
या तो फिर निर्विकल्प समाधि माने निराकार निर्गुण ब्रह्मण ये जो ज्ञान मार्ग है निर्विकल्प समाधि और सर्वभूत में ईश्वर दर्शन इसका जो अल्टीमेट साइन है वो क्या है सर्वभूत में ब्रह्म दर्शन वो है अल्टीमेट आध्यात्मिक जीवन का। भक्त जो है वह जगत और उसमें सर्व वस्तु और व्यक्ति को ईश्वर के साथ में संबंध युक्त देखता है। वही तो है ना अल्टीमेट आध्यात्मिक जीवन का। तो फिर देखिए कि गोलाप मां के जीवन में भी ऐसा ही हुआ। ठाकुर की महासमाधि के बाद में गोलाप गोपाल मां गोपाल की मां के जीवन में अशांति ही अशांति कुछ समय के लिए फैल गई। क्योंकि ठाकुर के ही भीतर में तो उन्होंने बाल गोपाल का दर्शन किया था। ठाकुर के श्री अंग में से ही तो बाल गोपाल प्रथम प्रकट हुआ था। तो फिर वह ठाकुर लीला संवरण करेंगे तो गोपाल की मां को तो उनके मन में जो अशांति तो बनेगी ही बनेगी। मां शारदा का भी तो सेम कि वृंदावन गई थी एक साल वो जो आठ महीने ना जितना भी है तीर्थ दर्शन किया था तब कहीं जाकर के ये विरह अग्नि जो है थोड़ी सी प्रशित हुई थी और फिर मां का बाद में यह कामार पुकुर में अति कष्ट के दिन प्रारंभ हुए थे तो अभी क्या है कि मां को तो ठाकुर ने दर्शन की परंपरा देकर के मां के हृदय को तो सध्यारा देकर रखा था किंतु फिर यह गोपाल की मां का क्या तो फिर यह गोपाल की मां बहुत दिनों तक कामारहाटी छोड़कर के कहीं नहीं जाती थी। अकेली-अकेली निर्जन में बैठी रहती थी। किंतु फिर जिस तरह से ठाकुर ने मां शारदा को दर्शन देने की परंपरा प्रारंभ की वैसे ही गोपाल की मां को भी दर्शन की परंपरा उन्होंने प्रारंभ की और इस तरह के दर्शन से गोपाल की मां के हृदय को भी बहुत शांति प्राप्त हुई। अभी किंतु जो अल्टीमेट है सर्वभूत में ब्रह्म साक्षात्कार सर्वभूत में ईश्वर दर्शन तो देखिए कि एक बार गंगा के सामने की साइड में महेश के माहेश बोलकर के एक जगह है वहां पर रथ यात्रा होती है तो रथ यात्रा देखने के लिए गोपाल की मां वहां पे गई। एकाएक उन्होंने देखा कि रथ है रथ के ऊपर में श्री श्री जगन्नाथ देव है। जो लोग रथ को खींच रहे थे वो यह जो अपार जन संघ है सबके भीतर में उन्होंने देखा कि उन्हीं का गोपाल विराजमान है। यह जो सर्वभूत में ईश्वर दर्शन या तो ब्रह्म दर्शन यह जो आध्यात्मिक जीवन की सर्वोच्च उपलब्धि है निर्विकल्प समाधि के बाद की जो उपलब्धि वो यहां पे गोपाल की मां को हुई है कि रथ के भीतर में भी गोपाल रथ के ऊपर में जगन्नाथ देव है उसमें भी गोपाल जो रथ खींच रहे हैं उनमें भी गोपाल ये जो विराट जन संघ है वह भी सबके भीतर में गोपाल भिन्नभिन्न रूप धारण किए मात्र यह नाम रूप रूपी मुखौटा मात्र पहना है। इस तरह से श्री भगवान के विश्व रूप दर्शन उन्होंने प्राप्त किए और फिर भाव में और प्रेम में उन्मत्त होकर के वो बाह्य ज्ञान हार गई। मुझे लग रहा है कि यही उनकी निर्विकल्प समाधि होगी। और फिर जब निर्विकल्प समाधि में से बाहर आई उस समय वो एक स्त्री भक्त थी। वो वहां पर उपस्थित थी। उन्होंने कहा कि उनको गोपाल मां ने कहा कि तो आर आते आमी छिलामना तब मैं अपने आपे में नहीं थी तब मैं नहीं थी नेचे हैश कुरुक्षेत्र को रे छिलाम नाच करके हंस करके कुरुक्षेत्र खड़ा किया था यानी वही जो ठाकुर के पास में जो पहली बार आई वो दर्शन प्राप्त करके बाल गोपाल को लेके तो कैसे ठाकुर के घर में वो हस्ती नाचती वह आनंद से घूम रही है। ब्रह्मा नाचे, विष्णु नाचे। तो वैसे ही यह जो जगन्नाथ का रथ, जगन्नाथ की मूर्ति, यह विराट जन समुदाय सब में यह बाल गोपाल का दर्शन करके उन्होंने वही उसी तरह का कुरुक्षेत्र फिर से वहां पर मचाया। नाच रही है, नृत्य कर रही है, हंस रही है। आध्यात्मिक आनंद से भरपूर हो रही है। तो यह है गोपाल की मां की कहानी। और हमारा जो यह है देखिए रामकृष्ण साहित्य में आप देखेंगे कि आध्यात्मिक उपलब्धि की आध्यात्मिकता की कोई कमी नहीं है। एक के बाद एक के बाद एक महापुरुष साधक उनकी परंपरा उनके दर्शनों की परंपरा कैसी अद्भुत है यहां पे। तो यह एक गोपाल की मां का प्रसंग आज समाप्त होता है। इसके बाद में फिर शरद महाराज क्या कहते हैं अभी कम कल हम आगे से देखेंगे। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु
एक भक्त: एक ओर ठाकुर कहते हैं—पहले ‘नेति-नेति’, फिर ‘इति-इति’ -- अर्थात निर्विकल्प समाधि के बाद सर्वभूत में ईश्वर-दर्शन। दूसरी ओर स्वामीजी पहले ही ‘शिव-ज्ञान से जीव-सेवा’ की बात करते हैं। क्या ये दोनों एक-दूसरे के विरोधाभासी हैं या एकसाथ संभव है?
मैं कहूंगा कि ये पैरेलल संभव है क्योंकि देखिए अब जैसे आप ट्रेडिशनल भक्ति की आराधना जिस तरह से है या ज्ञान मार्ग है वो ठाकुर जैसे कहते हैं ना दशमूल पाचन वो दशमूल पाचन वह आप बनाते बनाते वो रोगी यहां पर खत्म हो जाएगा फिर कलयुग में आपको फीवर मिक्सचर चाहिए डी गुप्त का तो स्वामी जी का पाथ जो है इट्स अ फीवर मिक्सचर किंतु देखिए बहुत सारे लोग ना ऐसे दोनों मेडिसिन ये एलोपैथी और अल्टरनेट मेडिसिन दोनों चलाते हैं [हंसी] यहां पे आप वो टेबलेट भी लीजिए फीवर मिक्सचर भी लीजिए यहां पे वैद को बोल के रखिए वो दश अमूल चला के रखो क्योंकि [हंसी]
एक भक्त: साधना के प्रारंभ में वैराग्य बहुत तीव्र होता है, लेकिन कुछ समय बाद वह मंद पड़ने लगता है और अपनी साधना पर ही संदेह होने लगता है। ऐसी अवस्था में क्या करें?
इसमें क्या है ना एक अनरियलिस्ट िस्टिक एक्सपेक्टेशन। अब जैसे देखिए आप आपको जॉब कब मिलता है? आपने बाल मंदिर से प्रारंभ किया पढ़ाई लिखाई करना। 12th स्टैंडर्ड तक 12 साल तो पढ़ाई किया। उसके बाद में तीन-चार साल का ग्रेजुएशन पोस्ट ग्रेजुएशन आपने किया। उसके बाद में आपने कितना स्ट्रगल किया। तब कहीं जाकर नौकरी मिला है और एक स्टडी इनकम प्रारंभ हुआ है। 15 16 साल मिनिमम चलता है। अभी हम लोगों के साथ में क्या है? हम लोग आध्यात्मिकता में एक इंस्टेंट कुछ म इंस्टेंट तो नहीं तो तीन-चार साल के बाद में कुछ एक्सपेक्टेशन करना शुरू कर देते हैं। बट दीज़ आर अनरियलिस्टिक टाइमलाइन। एक्चुअली द टाइमलाइन जन्म जन्मांतर की है। किंतु इतना यदि नहीं भी देखें 12-15 साल का एक स्टेडी साधना रखें तो मुझे लगता है कि सम रिजल्ट विल स्टार्ट कमिंग। बट किंतु ये स्टेडीनेस इज़ेंट। अब आप स्कूल में देखिए स्कूल में छुट्टी लगाना माने आपको समझ में ही आता है कि संडे का एक छुट्टी है बाकी उत्सव का छुट्टी होगा उसके अलावा छुट्टी लेने का प्रयास करें गए तो मां मारेगी क्यों स्कूल में नहीं जा रहा राइट सो वो जो एक कंपलसरी एजुकेशन हमने थ्रूउ आवर लाइफ लिया है 12 15 साल मिनिमम हमने लिया है एट द एंड ऑफ़ दैट वी आर एलिजिबल फॉर अ स्टेडी इनकम सो यहां पे भी वो एक बिना गैप के स्टेडी आपका एक साधन भजन रहे 12 15 साल मिनिमम एटलीस्ट वन आवर पर डे हमारा एजुकेशन पीरियड कितना है? पांच छ घंटा तो हमारा डेली का स्कूल और क्लासेस आजकल एक्स्ट्रा चलता है। तो मिलकर के मिनिमम 5 6 घंटा होता है। राइट? तो एटलीस्ट वन आवर यदि का हम टारगेट रखें तो डबल तो हमको टाइम स्पान करना पड़ेगा। राइट? सो 24 साल डेली वन आवर हम यदि बिना किसी गैप के दे छोटी-मोटी छुट्टियां इट्स ओके। ट्रैवल कर रहे हैं, बीमार है। दैट इज़ वन थिंग। बट एक स्टेडी हम दें देन ओनली वी कैन एक्सपेक्ट ना। हमारा एक रियलिस्टिक एक्सपेक्टेशन भी तो इतना होना चाहिए। इंटेंसिटी कम हो जाएगा। देखिए वो प्रॉब्लम है कि हमारा एज अभी चला गया है ना। आज अभी एडल्ट एजुकेशन के क्लासेस चलते हैं। उसमें से कोई पीएचडी नहीं निकलने वाला क्योंकि वो एज चला गया। अभी वह लिखना पढ़ना सीख ले तो बहुत हो गया। ना किंतु देखिए जन्म जन्मांतर की बात है ना। नेक्स्ट जन्म में हम और ज्यादा सुकृति ले आएंगे। तब हम बचपन से चालू करेंगे। देखिए सरफेस पे तो तरंग रहेगी ही। डीप में जब जाएंगे तो शांति हो जाएगा। अब मां का ही देखिए ना भगवती स्वयं ठाकुर के साथ में रहकर के जो भी उपलब्धि होना है हो गई है। इसके बाद में जब कामार पुकुर जाती है तो कष्ट के दिन प्रारंभ होता है। सो हमको लगेगा कि अरे इतना सब ठाकुर के साथ में उन्होंने जिया उपलब्धियां की साधना की। आखिर में यह परिस्थिति क्यों? क्योंकि उसके बाद में ना यह सब दगधबीज हो जाता है। आकार मात्र रह जाता है। उसका कोई फल कभी नहीं फलता है। सरफेस सरफेस पे सब दिखेगा। भीतर में वह शांति का प्रवाह अनंत रूप से बहता जाएगा।
एक भक्त: माँ का मन तो सांसारिक झंझावात से परे था न?
ना वो कभी-कभी वो ये हो जाती थी। म [हंसी] नाराज भी हो जाती थी। वो नर्वस भी हो जाती थी। ऑल ऑफ़ दिस स्टोरीज आर देयर। वो एक पता है ना वो बिकॉज़ के रेवोल्यूशनरी मूवमेंट चल रहा है। बंग भंग वगैरह हुआ है। तो जो भी जय राम भाटी जाएगा सब वो पुलिस वाले जाकर के उनका नाम पता लिख देगा। तो फिर वहां पर विभूति भूषण बोल के मां के एक बड़े वीर भक्त है। तो वहां के एक बड़े पुलिस के अधिकारी को ले गए। तो यह पुलिस ऑफिसर वो मां को पूछ रहा है। बड़े भक्तिपूर्ण मां को प्रणाम किया। पूछ रहा है कि मां ये पुलिस वाले आकर के ये जो नाम पता लिख जाते हैं इससे आपको डर लगता है क्या? आप डरिए मत। मैं हूं कोई आपको कोई चिंता की जरूरत नहीं है। तो वो जो मां के भक्त है वो बीच में बोलना शुरू कर अरे मां को डर किस बात का? मां को कुछ डर नहीं लगता। तो मां बोलती है ना बेटा डर लगता है।
एक भक्त: साधना करते एक दिन तो आएगा न की हमारा मानसिक कष्ट समाप्त हो जायेगा ?
दैट गोज अवे आई मीन माने उसका आकार मात्र रह जाएगा। अब सामान्य बीज है उसको आप जमीन में डालिए उसमें वो अंकुरित होगा। अभी इसी बीज को आप ये उसमें गर्म पानी में डाल के फिर आप डालिए वो अंकुरित नहीं होगा। माने फ्राई यदि हो जाएगा तो फिर क्या है वह अंकुरित नहीं होगा। उसका बीज रहेगा। सो क्या है कि विदेह मुक्ति नहीं होने तक यह सब रहेगा। किंतु फिर आकार मात्र रहेगा। ठाकुर कहते हैं काम क्रोध का आकार मात्र रहता है। किंतु साधु का गुस्सा कैसा तो पानी पर खींची हुई लकीर की तरह अभी है अभी चला गया। अब देखिए आप यदि एक आइडियल सिचुएशन में अपने को रख देते हैं कि मैं बस अभी वनवास करूं स्वामी जी मैं देखिए ये लोग भी तो सपना देखते थे ना ठाकुर कहते हैं ना मैं लंबे बाल वालों विधवा हो के गांव में रहूंगी वो फिर एक गाय होगी गाय की खीर बना के दूध की भगवान को ऑफर करूंगी ये सब के उनके भी सपने होते हैं ना स्वामी जी कहते हैं मैं हिमालय में जाकर के एक बस चारों ओर माने हिम शिखर की प्रशांति है उसके बीच में एक छोटी सी कुटिया है। वहां पे मैं रहूंगा। किसी को आने नहीं दूंगा। पढ़ाई लिखाई करूंगा और मेडिटेशन करूंगा। और महादेव की तरह ध्यान में मग्न रहूंगा। बेचारे स्वामी जी के जीवन में मायावती में जो 15 20 दिन वो कभी-कभी रहे हैं तो रहे स्वामी जी खुद कह भव है। म भवघरे का क्या अर्थ कराएंगे? अभी आप [हंसी] घूमने में ही जिसका म जिसका जो पूरा लाइफ घूमने में ही चला गया है। [हंसी]
एक भक्त: दग्धबीज का अर्थ है कष्ट तो होगा पर संस्कार नहीं बनेंगे, ठीक?
माने वो जो एक्शन रिएक्शन की परंपरा टूट जाएगी। संसार चक्र टूट जाएगा। जन्म मृत्यु जरा व्याधि बस एक जो अभी इस जन्म में जो जरा और व्याधि और मृत्यु है वो रहा। फिर उसके बाद में फिर ये खत्म। कॉन्शियसनेस रहता है। कि मां को किसी ने पूछा था। मां को किसी ने पूछा कि मां आपको सब समय आपका स्वरूप याद रहता है। मां ने कहा यदि स्वरूप याद रहेगा तो यह सब काम कौन करेगा? तब किंतु यह एक बात है कि जब भी मैं इच्छा करके थोड़ा सा मन को एकाग्र करती हूं इमीडिएटली मेरा स्वरूप मुझे ख्याल में आ जाता है। हां माने उन लोग अभी यह सब चीजें जिस तरह से हमको टेंशन देती है उस अवस्था के बाद में यह सब हमको सहज लगने लगेगा। और ठाकुर के जैसे केसेस में अब जैसे ठाकुर कहते हैं ना बहादुरी काठ और यह म एक सामान्य जो लकड़ी है और एक बहादुरी ये जो लकड़ी की यह जो नौका बनाई है ऋषि मुनि भय तराश तो अर्थात ऋषि मुनि लोगों को भय लगता था कैसे भी करके अपनी नौका पार करवा दे भवसागर में जबकि यह जो नारद वगैरह जो है अपने से तो पार हो ही जाएंगे भवसागर साथ में कितनों को लेकर जाएंगे फिर उस लेवल पर तो हमारा हृदय जो है इस तरह से विस्तृत हो जाएगा कि भाई जिसको लेके साथ में चलना है। सबको इकट्ठा करो। अकेले अभी नहीं जाना।
एक भक्त: स्वामीजी ने एक पत्र में लिखा था की अभी मुझे मुक्ति की इच्छा भी रही नहीं
माने वो तो बाद की बात है। वो जो आबू रोड जंक्शन पे है वो फेमस कहानी है। प्रवरज्जा के अंत में ही अमेरिका जाने से पहले हरि महाराज राजा महाराज मिलने को आए। स्वामी जी कहते हैं कि ईश्वर ईश्वर प्राप्ति कितनी हुई पता नहीं किंतु हृदय तो बड़ा ही विशाल हो गया है।
एक भक्त: स्वामीजी लोगो के दुःख के भागीदार होना चाहते थे. उनको सुख में भागीदार नहीं होना था. ठीक?
सुख में भी देखिए ना वो कितनी सुंदर-सुंदर कहानियां है। आप कैलिफोर्निया वगैरह देखेंगे ये जो मिड सिस्टर्स के घर में स्वामी जी रहते हैं। इतने आनंद के दिन बातोंबातों में सब अब जैसे वहां पे एक ऐसा था कि आपको ये कुछ त्याग करना है। वो जो न्यू ईयर रेजोल्यूशन जैसा होता है ना ऐसा लेंट वगैरह एक त्यौहार होते हैं तो आपको कुछ प्रॉमिस करना है मैं यह त्याग करता हूं मैं वो त्याग करता हूं तो इस तरह से स्वामी जी कहते हैं कि यह जो गुवा गुआवावा जो है गुआवावा पता है ना वो अमृत तो वो पड़ा हुआ था तो स्वामी जी बोलते हैं मैं इसका त्याग करता हूं तो वो वो मिसेज हसब्रो समझ गए कि स्वामी जी को उसका अच्छा नहीं लगता है तो उन्होंने वो मेनू में से ही हटा दिया [हंसी] किंतु यहां पे देखिए देखिए कि ये लोग स्वामी जी को भी इतना अच्छे से समझते हैं कि इनस्पाइट ऑफ हिम बीइंग सच अ स्पिरिचुअल जयंट वे लोग इमीडिएटली समझ गए कि स्वामी जी का इंटेंशन क्या है? ही इज़ बीइंग फेसेसियस अर्थात कि वो कटाक्ष करके ये कह रहे हैं। मैंने [हंसी] इसलिए नहीं कि ही सीरियसली त्याग के स्पिरिट में कह रहे हैं। उनको यह अच्छा नहीं लगता इसलिए यह कह रहे हैं। वो मिज हसब भी कैसा पकड़ लिया स्वामी जी को? वो स्वामी जी के क्लास में हम बहुत ही डिटेल में जाएंगे। ग्रेट डिटेल में हम जाएंगे क्योंकि सही में आपने जो कहा ना कि स्वामी जी का यूनिकनेस स्वामी जी का कंट्रीब्यूशन बहुत कुछ है। माने इतना डिटेल है। इतना डिटेल है। माने लाइफ टाइम्स आर नॉट इनफ। मल्टीपल लाइफ टाइम्स आर नॉट इनफ। [नाक से की जाने वाली आवाज़] जितना हो सके हमारे से हम इतना डिटेल में जाएंगे। माने क्या है? टर्निंग पॉइंट है स्वामी जी के जीवन में। और फिर प्रत्येक टर्निंग पॉइंट ना क्योंकि स्वामी जी का लाइफ इज मोर रिलेटेड टू सिविलाइजेशनल डेवलपमेंट। अब मां को जब हम स्टडी करते हैं तो उनका जो कम्युनिटी फैमिली कॉन्टेक्स्ट जो है उसको हम बीच में लाते हैं। ठाकुर को यदि प्रॉपर्ली समझना चाहते हैं तो यह जो वेदांत भक्ति साधना वैराग्य दर्शन अनुभूति ये सब हमको लाना पड़ता है। इन दैट कॉन्टेक्स्ट स्वामी ठाकुर को समझना है। तो इन ऑर्डर टू अंडरस्टैंड स्वामी जी हमको यह सिविलाइजेशनल एक डीप अंडरस्टैंडिंग फ्रेमवर्क चाहिए। व्हेन दिस टू कंबाइन लाइफ ऑफ़ स्वामी विवेकानंद विथ अ सिविलाइजेशनल फ्रेमवर्क। आप देखेंगे इट्स अ यूनिक पर्सपेक्टिव। हां माने इवोल्यूशन मन इंडिया इज़ जस्ट अ स्मॉल आप कहेंगे कि बिगिनिंग एंड एंड इन दिस साइकिल ऑफ़ इवोल्यूशन। राइट? ह्यूमन स्पीशीज जो इवॉल्व हुई है आउट ऑफ दिस एप। अह सो दिस एंटायर साइकिल ऑफ़ इवोल्यूशन कम्स इनटू प्ले। क्योंकि ह्यूमैनिटी या तो ह्यूमन स्पीशी इज़ नॉट द एंड ना वी हैव टु ट्रांसेंड आवर प्रेजेंट लिमिटेशंस। सो हाउ सिविलाइज़ेशनल फ्रेमवर्क फिट्स हियर हाउ स्वामी जीसस आइडियाज फिट्स हियर इन कॉन्टेक्स्ट ऑफ इवोल्यूशन देखना है। मिलियंस ऑफ इयर्स का टाइम स्पान है जो कि कवर होता है आइडियाज में।