prayer
स्वामी जी जब हिमालय में थे तो उन्होंने इस तरह के काफी महात्माओं को देखा था। देखा कि एक महात्मा है। एक हिमालय की ही बात है। वो जो पहाड़ी लोग रहते हैं ना उस तरह का एक पहाड़ी लोगों का एक गांव था। इस गांव के भीतर में से ये महात्मा पूरे दिगंबर होकर के चल रहे हैं रास्ते पे और चित्र लंबे-लंबे बाल बड़े हुए हैं और विचित्र उनकी हरकतें हैं। तो ये कहते हैं ना परमहंस कैसा होता है? तो बालकवत होता है, जड़वत होता है, पिशाचवत होता है तो उसी का ये जो महात्मा का है इसी तरह का आचरण। तो इनको देखकर के गांव के लड़के उनके पीछे में पड़े हैं और जोर-जोर से उनको पत्थर से मार रहे हैं और यह महात्मा का जो चेहरा है खून से पूरा रंग गया है। चेहरे के ऊपर में खून की धाराएं बह रही है। तो स्वामी जी ने जैसे ही देखा इमीडिएटली जाकर के उनको उन्होंने महात्मा को बचाया। फिर उनको जहां पर वो निवास था उनका स्वामी विवेकानंद अपने गुरु भाइयों के साथ में जहां पर रहते थे। उस निवास में इन महात्मा को लेकर आए। फिर बड़े ही जतन पूर्वक उनके जो घाव है उनको साफ किया। चेहरे के ऊपर में यह जो रुधिर की धारा बह रही थी उसको क्लीन किया। तो स्वामी जी उनको इस तरह से जतन कर रहे हैं और मीन वाइल ये महात्मा कहते हैं कि अरे देखो मैं बच्चों के साथ में किस तरह का आनंद कर रहा था। हम लोग ये पत्थर फेंकने की गेम खेल रहे थे। पत्थर फेंकने की रमत रम रहे थे। तो स्वामी जी कहते हैं कि देखिए कि काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह इस सब से कहां उध्व इनका मन चला गया है कि [गला साफ़ करने की आवाज़] जो लड़के जो माने पागल लड़के उनको पत्थर मारते थे उन्हीं के बारे में ऐसा कहते हैं कि मैं तो उनके साथ में कितना आनंद से खेल रहा था। तो कि कोई एक गुरु है उसकी ये स्त्री डिसाइपल है और उसको लेकर के वो सब दुनिया भर का भ्रष्टाचार करता है और अपने संप्रदाय का नाम दिया है कर्ता भजा तो ये गिरीश घोष वगैरह जो कि एक तीक्षण दृष्टि और उनकी ये जो सोसाइटी है सोसाइटी की ये जो दूषण है उसको जागृत करने की एक जो ह्यूमरस एक जो मेथड होती है नाटक के माध्यम से ये दूषणों को उजागर करने की वो उनके भीतर में थी आजकल का जिसको इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिज्म कहते हैं जहां पर कोभांड हो रहा है भ्रष्टाचार हो रहा है तो ये इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट उसको एक्सपोज करते हैं तो उस समय इस तरह का तो कुछ नहीं था किंतु गिरीश घोष का था कि ऐसे लोगों के ऊपर में नाटक बनाएगा। ठाकुर का भी था वो कमर कुकुर में जो इस तरह के भ्रष्टाचारी लोग थे दूसरों को पटा करके अपनी एक महत्ता स्थापित करने का प्रयास करते थे। तो ठाकुर छोटा गदाधर एकदम फटाक करके पकड़ लेता था और फिर सबके सामने इतना मर्सलेसली उसकी मजाक उड़ाएगा। उसकी ऐसा कटाक्ष करेगा उसके ऊपर में कि ये जो भ्रष्टाचारी आदमी है उसके पास में एक ही उपाय है कि बालक गदाधर के शरणागत हो जाने का। जब वो शरणागत होगा तब बालक गदाधर फिर शरणागत जो होते हैं जो शरण में जो आए हैं उनको अभय प्रदान करते हैं तो फिर वो बच जाएगा। तो यहां पे भी यह गिरीश घोष का था कि नाटक बना के इनको एक्सपोज करें। तो वो ठाकुर को कहता है कि मेरी इच्छा है कर्ता भजा के ऊपर में एक नाटक बनाने की। तो ठाकुर ने साथ-साथ में ही कहा नहीं देखिए कि वो भी एक साधन पथ है। जो सिंसियरली जिस साधना का आप प्रचलन करते हैं जिस साधना का प्रैक्टिस करते हैं यदि सिंसियर है तो प्रत्येक पद आपको वही एक अद्वय ब्रह्म वस्तु तक ही ले जाएगा। ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिणे अवतार वर्षाय रामकृष्णायते नमः श्री रामकृष्ण लीला प्रसंग भाग दो साधक भाव इसमें प्रथम अध्याय है साधक और साधना इसका हम पाठ कर रहे हैं। आज थोड़ा सा पढ़ते हैं कि शरद महाराज क्या कहते हैं। कल हमने एक रिवीजन देख लिया कि अभी तक जो पाठ हुआ है उसमें हमने क्या-क्या किया है। अभी आज से थोड़ा सा आगे पढ़ते हैं।
जगत के विषय में हमारी धारणाएँ और अनुभूतियाँ दीर्घकालीन संचित आदतों का परिणाम हैं
यहां पे शरद महाराज हमको साधना क्या है? उसका एक विवरण देते हैं। साधना का अर्थ क्या है? तो क्या कहते हैं महाराज? एक बुझा जते छे जे जगत संबंधे आमादग धारणा और अनुभवादी बहुल संचितो अभ्यास फले वर्तमान आकार धारण करिया छे अभी यह समझ में आता है कि जगत के बारे में हमारी जो धारणा है और हमारे जो अनुभव है वह बहुत लंबे समय के अभ्यास के परिणाम से उसने वर्तमान आकार धारण किया है। कॉम्प्लिकेटेड किंतु मीनिंग बड़ा सहज है। इसके पहले वाले पॉइंट में हमने देखा था कि जब ऋषि मुनि कहते हैं कि जगत में ब्राह्मण के अलावा और कुछ नहीं है तो फिर हमको इतना वैविध्य क्यों दिखता है? पशु पंखी पेड़पधे जंगल सरोवर नदी फूल फल यह जो वैविध्य है मनुष्यों के भीतर में भी इतना वैविध्य है जो ठाकुर कहते हैं ना लोग क्या सब एक समान है तो ठाकुर उदाहरण देकर कहते हैं कि वह जो एक तरह का मिठाई आता है मिठाई के भीतर में अलग-अलग तरह का फीलिंग रहता है। किसी में जो मेवा का फीलिंग रहता है तो वह मिठाई बड़ा स्वादिष्ट लगता है। किसी किसी में दाल का फीलिंग रहता है तो फिर उसका टेस्ट भी इतना अच्छा नहीं लगता। तो ठाकुर कहते हैं मिठाई है बाहर से एक ही जैसी दिखती है किंतु भीतर में जो फीलिंग है जो जो इसमें डाला हुआ है मसाला उसके अनुसार मिठाई की कीमत होती है तो मनुष्य वैसे तो बाहर से एक जैसे दिखते हैं किंतु किसी की सात्विक प्रकृति है किसी की राजसिक प्रकृति है किसी की सात किसी की तामसिक प्रकृति है तो इतना वैविध्य है ठाकुर ऐसा उल्टा कहते हैं किंतु देखिए कि यदि वेदांत को आप अनुसरण करें तो इवन ठाकुर स्वयं कहते हैं कि यह जो विभिन्न प्रकृति वाले जो मनुष्य है उनके हृदय में भी तो वही ईश्वरीय ज्योति ही झलमल करके प्रगटित हो रही है। तो यह जितना भी वैविध्य दिखता है पीछे में एक ही ईश्वर है या तो एक ही आध्या शक्ति है या तो एक ही ब्राह्मण है डिपेंडिंग ऑन योर बिलीफ। तो यहां पर फिर महाराज कहते फिर शरद महाराज ऐसा कहने के बाद में एक पॉइंट रेज करते हैं। कहते हैं कि इतना वैविध्य जो हमको दिख रहा है इसका इसका कारण क्या है? हमको ब्रह्म क्यों नहीं दिखता? जनरली मैं यदि यह माइक है तो मैं तो माइक के रूप में ही देखूंगा ना। इसको मैं कोई मेंढक के रूप में तो नहीं देखने वाला। यह यहां पे मेरी खिड़की के बाहर में कुछ पेड़ है। तो पेड़ को तो मैं पेड़ के रूप में ही देखने वाला हूं। उनको तो मैं यहां पे समुंदर यहां पास में है। बहुत सारे वो जो शिप्स जो है जहाज जो है वह चलते हैं। तो इसको पेड़ को मैं पेड़ के रूप में ही देखूंगा। कोई दरियाई समुंदर में तैरने वाले जहाज के रूप में तो नहीं देखूंगा। तो पेड़ मुझे पेड़ की तरह दिखता है। यह माइक मुझे माइक ही दिखती है। तो ब्राह्मण मुझे ब्राह्मण क्यों नहीं दिखता है? मुझे इसकी ऊपर में यह माया का आवरण कहो कि जो कुछ भी कहो ऐसा क्यों दिखता है? तो उसका एक उत्तर है कि हमको कंडीशनिंग कर दिया गया है बचपन से ही या तो फिर हमने अपने को सेल्फ हिप्नोटाइज कर दिया है वैविध्य को पहचानने के लिए। क्योंकि क्या है देखिए यह सेल्फ हिप्नोटिज्म जो होता है इसके पीछे का मैकेनिज्म क्या है? तो हमारी यह जो काम अपनी यह जो रिलेशन जो है जगत के साथ में वह इसके पीछे में कारणभूत है। यह जो पहले तो है अविद्या अविद्या के बाद में प्रकट होता है अस्मिता अर्थात कि मेरा एक सेल्फ इमेज या तो फिर कहूंगा कि मेरी सेल्फ बिलीफ कि मैं कौन हूं? हु एम आई? यह जो हु एम आई जो है यही एक है कि मैं अपने को ठीक करता हूं कि हां मैं यह हूं यह मेरा आइडेंटिटी है। यह सब कुछ मेरा कर्म का प्रवाह संस्कार प्रवाह वगैरह है। यह अस्मिता के बारे में बाद में प्रकट होते हैं। राग और द्वेष अर्थात कि कुछ-कुछ चीजें मुझे बहुत पसंद है। जबकि कुछ चीजें मुझे बिल्कुल उसके ऊपर में घृणा है। यह राग और द्वेष के बाद में प्रकट होता है अभिनिवेश अर्थात कि जीवन जीने की एक तरह की आकांक्षा मृत्यु का भय जीजीविषा जिसको कहते हैं कोई भी मृत्यु नहीं पामना चाहता इवन यदि एक चींटी को भी आप मारने को जाएंगे तो वह अपना बचाव करेगी। एक निम्न से निम्नतर का पशु भी है। पेड़ भी है। आपने यदि थोड़ा सा स्टडी करके देखा होगा। मैं जब राजकोट में था तो हमारा एक टेरेस गार्डन था तो मैंने वहां पर कुछ-कुछ कपर्स लगाए थे। अभी कपर का नेचर क्या है? जहां पर सनलाइट है वहां पर जाने का। कपर अपने को छांव में रखना नहीं चाहता। क्यों? क्योंकि छांव में उसको सूर्य का प्रकाश नहीं मिलता और सूर्य का प्रकाश नहीं मिलेगा तो यह फोटोसिंथेसिस नहीं होगा। वह जो है कमजोर होकर के मर जाएगी कपर। तो ये जितनी भी कपर है मैं चाहे उनको जहां पे भी लगाऊं एक साइड था हमारा टेरेस का वहां पे शेड था और दूसरा टेरेस था वहां पे सनलाइट आता था तो यदि मैं शेड में भी यदि यह लगाता हूं कपर का वो जो पॉट जो होता है फ्लावर पॉट इसके भीतर में तो वह कपर थोड़े ही समय के बाद में वह बड़ा होकर के सीधा सनलाइट की ओर जाना शुरू करेगा। वह छांव में बिल्कुल रहना नहीं चाहेगा। क्यों? क्योंकि उसके भीतर में भी यह जीजीविषा है, जीने की आकांक्षा है, जीने की लालसा है। तो क्या है कि यह हमारा संसार के साथ में संबंध। इसी संबंध की वजह से ही यह चीज मेरी प्रिय है। इस चीज को मैं घृणा करता हूं। और प्रिय चीज पाने के लिए और जिसको मैं घृणा करता हूं इस तरह की चीज इस तरह के व्यक्ति या इस तरह की सिचुएशन से दूर होने के लिए हम अपना पूरा जीवन डाल देते हैं। अपने जीवन का यह जो एंबिशंस जो होती है, हमारे डिजायर्स जो होते हैं, उसी की वृद्धि उसी को पुष्टि करने के लिए हम अपना जीवन डालते हैं। किंतु देखिए कि यदि बचपन से ही स्टूडेंट्स जो होते हैं, छात्र जो होते हैं उनको आप अद्वैत वेदांत की शिक्षा दीजिए। कहिए कि यह जो संसार है पूरा वैविध्य से भरा यह माया का खेल मात्र है। ईश्वर की आध्या शक्ति की एक तरह की लीला मात्र है। यह हमारे मन को लुभाने के लिए है। ठाकुर कहते हैं मांजो लाल चुसी दिए भूलिए रे। अर्थात कि मां क्या करती है? अध्याशक्ति क्या करती है? हमको यह लॉलीपॉप लाल कलर की लॉलीपॉप रेड कलर लॉलीपॉप वह हमको दे देती है। वह चूसते रहते हैं। छोटे बच्चे को है ना ऐसा मुंह में वो डाल के चूसने की आदत होती है। लॉलीपॉप है ऐसा कैंडी वगैरह और फिर लाल कलर फिर छोटे बच्चों को और भी आकर्षक लगता है। तो यह लाल कलर की लॉलीपॉप जो है वो मार्केट में बच्चों में पॉपुलर होती है। तो इस तरह की एक लाल चुशी लाल कलर की लॉलीपॉप देकर के जगदंबा जो है हमको भुला के रखती है। वो ये लॉलीपॉप क्या है? तो जगत के प्रति अपना आकर्षण। यह जो ठाकुर कहते हैं ना कि जहां पे वह अन्न का गोदाम है। जहां पर बहुत सारा अन्न आपको खेत में से काट करके रखा गया है। धान रखा गया है। वहां पर क्या करते हैं? चूहे भीतर में जाकर के वह धान में मुंह डाले। उसके बचाने के लिए क्या करना है? जहां पे जो दरवाजा होता है, दरवाजे में जो खोई इसको कहते हैं बांग्ला में अर्थात कि यह जो धान को एक पॉपकर्न की तरह करके वह जो बनता है मुड़ी वगैरह जो कुछ भी है तो पॉपकर्न एक तरह का पॉप्ड राइस या ना कि पॉप्ड जो भी है वह गेहूं तो उसका एक मसाला बना करके गुड़ फूड डाल के उसको वहां पे दरवाजे के पास रख देते हैं। तो इससे क्या होता है? चूहा भीतर में जाकर के जहां पर अन्न का गोदाम है वहां मुंह डालने की वजह वह दरवाजे के पास में ही यह गुड़ वगैरह जो पड़ा है उसी को खाने में उसी के प्रलोभन में वह मत्त रहेगा। उसके सामने इतना बड़ा अन्न का जो ट्रेजर है उसको वह भूल जाएगा। तो हम लोग भी यह कामना वासना से घिरे हुए जगत में छोटी-छोटी चीजों को लेकर के इतना दौड़ते हैं। इतना दौड़ते हैं कि यह जो जगत कारण जो है जगत के परे जो जगत कारण है उसका अनुसंधान करना ही भूल जाते हैं। ठाकुर कहते हैं कि कोलकाता के रास्ते से जा रहा था। देखा सभी लोग निम्न दृष्टि अर्थात कि सभी की नजर जो है अपने पेट की ओर है। कोई कोई है माने इतने सारे कोलकाता वासियों में एक दो विरल व्यक्ति है जिसकी कि उर्ध्व दृष्टि है। तो देखिए कि यह बचपन से ही हमको यह निम्न दृष्टि करके ही चलना हम लोग सीख जाते हैं। ऐसा नहीं है कि कोई पर्टिकुलरली हमको ऐसा मिस एजुकेशन कर मिस एजुकेट करता है। प्रॉब्लम क्या है कि हम लोग तो दूसरों को देखकर के सीखते हैं। हो तो बचपन में ऐसे कोई रोल मॉडल हमको मिलते ही नहीं है जो कि हम जिनका कि उर्ध्व दृष्टि हो जिनकी कि ईश्वर के प्रति जिनका प्रेम इतना गहन हो कि संसार जैसे कि ऐसे लोगों के सामने फीका पड़ जाए उनका अपना मान सम्मान अपमान वगैरह चीजें जैसे कि इन लोगों के लिए किसी काम की नहीं है। बस जीवन अर्पित किया है। त्याग, तपस्या और शरणागति को। तो इस तरह के रोल मॉडल जो है सोसाइटी में आजकल देखने को ही नहीं मिलते हैं। बोलकर के हमारे सामने जो रोल मॉडल है वो ऐसे ही है कि हां चलो इसने हार्ड वर्क किया। अच्छा उसका एजुकेशन है। बड़ा सा डिग्री उसने पाया है। उसके बाद में उसने अच्छा करियर बनाया है। आप बाहर वालों को तो छोड़ ही दीजिए। हम साधु लोगों में भी हम मैं खुद आप दूसरे साधु की क्या बात करते हैं कोई नए साधु से पहचान होगी अभी संघ में क्या 2000 साधु है तो कहां मैं सबको तो पहचानने वाला नहीं हूं तो किसी और फिर क्या है नए-नए ब्रह्मचारी जॉइ करते रहते हैं तो कोई नया ब्रह्मचारी ज्वाइन करने को आया है तो मेरे से जूनियर यदि होगा ब्रह्मचारी तो वैसे जूनियर ही होते हैं कि मैं तो साधु हूं किंतु इवन मेरे से कोई जूनियर साधु भी होगा तो फिर मैं अह अभी क्या है कि सर क्विकली उसको असेसमेंट करना है ना उसको असेस करना है ना कि कौन से पानी में है कितना उसका दम है तो पहला ही क्वेश्चन मैं करूंगा कि क्या एजुकेशन क्या है तुम्हारा तो वो यदि कहेगा पोस्ट ग्रेजुएट करके आया हूं ना कि ऐसा कुछ तो मैं इंप्रेस हो जाऊंगा अच्छा वाह और कोई ऐसा कहेगा क्या मैं प्लेन ग्रेजुएट हूं या तो फिर इवन अंडर ग्रेजुएट हूं तो फिर हमको लगेगा अच्छा ठीक है ऐसे तो बहुत सारे साधु घूमते रहते हैं तो देखिए कि इवन हम में भी कि ऐसा फट करके हम लोग असेस करना चाहते हैं सामने वाले को कि सामने वाला कौन से पानी में है। उसकी क्या कैपेबिलिटी है? उसकी क्या क्षमताएं हैं? तो बेस्ड ऑन हिज एजुकेशन। तो यहां पर यदि एजुकेशन का इतनाेंस है तो बाहर के जगत में तो और भी ज्यादा है। पैसों काेंस और इससे भी ज्यादा है। तो क्या है कि यह सब कुछ देखकर के हमारा मन कंडीशंड हो जाता है। हम यह नहीं
शक्ति का बाह्य प्रदर्शन नहीं, आतंरिक अनुभूति ही मनुष्य की सही परख है
देखते कि ईश्वर के प्रति अनुराग कितना है। विषय की वासनाओं के प्रति उसका विराग कितना है। किंतु यह देखते हैं कि यह शक्ति कितनी है उसके भीतर में। शक्ति का मैनिफेस्टेशन कितना है उसके भीतर में यदि आपका एक बहुत बड़ा सोशल नेटवर्क है आप कोई समस्या ले किसी व्यक्ति के पास में जाएंगे समस्या को सॉल्व कर देगा तो फिर हमको लगता है कि हां यहां पर शक्ति का मैनिफेस्टेशन है किंतु देखिए कि स्पिरिचुअल युग में स्पिरिचुअल यह जो विश्व है स्पिरिचुअलिटी के भीतर में आपको शक्ति का मैनिफेस्टेशन नहीं देखना किंतु यह जो पोटेंशियल भीतर में जो है उसको कितना रियलाइज किया गया है इसको आप आपको देखना है। ऐसे कितने ही छुपे हुए संत महात्मा आपको मिल जाएंगे जो कि अपनी शक्ति को मैनिफेस्ट नहीं करना चाहते हैं कि अननेसेसरी एक भीड़ आकर के लग जाएगी। स्वामी जी जब हिमालय में थे तो उन्होंने इस तरह के काफी महात्माओं को देखा था। देखा कि एक महात्मा है। एक हिमालय की ही बात है। वह जो पहाड़ी लोग रहते हैं ना उस तरह का एक पहाड़ी लोगों का एक गांव था। इस गांव के भीतर में से यह महात्मा पूरे दिगंबर होकर के चल रहे हैं रास्ते पर और चित्र लंबे-लंबे बाल बढ़े हुए हैं और विचित्र उनकी हरकतें हैं। तो ये कहते हैं ना परमहंस कैसा होता है? तो बालकवत होता है, जड़वत होता है, पिशाचवत होता है। तो उसी का यह जो महात्मा का है इसी तरह का आचरण तो इनको देखकर के गांव के लड़के उनके पीछे में पड़े हैं और जोर-जोर से उनको पत्थर से मार रहे हैं और यह महात्मा का जो चेहरा है खून से पूरा रंग गया है। चेहरे के ऊपर में खून की धाराएं बह रही है। तो स्वामी जी ने जैसे ही देखा इमीडिएटली जाकर के उनको उन्होंने महात्मा को बचाया। फिर उनको जहां पर वो निवास था उनका स्वामी विवेकानंद अपने गुरु भाइयों के साथ में जहां पर रहते थे उस निवास में इन महात्मा को ले आए फिर बड़े ही जतन पूर्वक उनके जो घाव है उनको साफ किया चेहरे के ऊपर में यह जो रुधिर की धारा बह रही थी उसको क्लीन किया तो स्वामी जी उनको इस तरह से जतन कर रहे हैं और मीनवाइल यह महात्मा कहते हैं कि अरे देखो मैं बच्चों के साथ में किस तरह का आनंद कर रहा था। हम लोग यह पत्थर फेंकने की गेम खेल रहे थे। पत्थर फेंकने की रमत रम रहे थे। तो स्वामी जी कहते हैं कि देखिए कि काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह इस सब से कहां उर्ध्व इनका मन चला गया है कि जो लड़के जो माने पागल लड़के उनको पत्थर मारते थे। [नाक से की जाने वाली आवाज़] उन्हीं के बारे में ऐसा कहते हैं कि मैं तो उनके साथ में कितना आनंद से खेल रहा था। तो और इस तरह के और भी स्वामी जी कहते हैं कि वहां की गुफाओं में आप जाएंगे ना तो गुफाओं में कोई कोई महात्मा होते हैं। वो वहां पर लंबे टाइम से साधन भजन करते रहते हैं। किंतु वे लोग चाहते नहीं है कि यह गृहस्थ लोग वहां पर आ जाए। क्यों? गृहस्थ लोग आएंगे तो वही सब गृहस्थ लोगों की समस्या ले आएंगे कि यह मेरी पत्नी है। उसको पुत्र संतान नहीं हो रहा है। उसके लिए आप आशीर्वाद दे दीजिए। स्वामी जी के खुद के पास में वह लिमड़ी के राजा ने यही वरदान मांगा था कि मेरा पुत्र संतान नहीं है तो मेरे जाने के बाद में मेरा वंश निर्मूल हो जाएगा तो पुत्र संतान का आशीर्वाद दीजिए तो क्या है गृहस्थ लोगों की तो यही सब डिमांड रहती है कि यह दे दीजिए वो दे दीजिए बीमारी ठीक करवा दीजिए वगैरह-वगैरह तो इस तरह के जो सही सही महात्मा होते हैं वे लोग करते क्या हैं कि स्वामी जी जैसे बताते हैं कि उन्होंने ने अपनी गुफा के सामने मनुष्यों की हड्डी जो है मरे हुए मनुष्यों की हड्डी ऐसे बिखर करके रख दी है। इसको देखकर के आपको क्या लगेगा पता है गुफा के सामने जाने के समय ऐसा लगेगा कि यह महात्मा है जो वो नर भक्षी है कैनबॉल है और यह या तो फिर मर जो मृत देह है उसको खाते हैं या तो फिर यह जो जिंदा मनुष्य है उसको मार करके उसको खाते हैं। बोल करके आपको डर लग जाएगा और आप भाग जाएंगे वहां से। और एक्चुअली देखिए कि तंत्र साधना में यह सब विधि जो है कैनिबलिज्म है या नर मांस भक्षण है वह सब तो चलता था। उस समय में जो डीजनरेट प्रैक्टिससेस थी उसमें यह सब चलता था। तो यहां पे देखिए कि स्वामी जी कहते हैं कि जिन्होंने अपने पोटेंशियल को रियलाइज किया है। ऐसे लोग नहीं चाहते अपना पोटेंशियल दिखाना। किंतु इस तरह के किसी व्यक्ति से हमारी मुलाकात हो जाती है। उनका जो असली उनकी जो उनका जोेंस है या उनकी जो वैल्यू है उनकी महत्ता है वो यदि हमको समझ में आती है तो वह हमारे रोल मॉडल बन जाएंगे। अनफॉर्चूनेटली जो होता है समाज में हमारे रोल मॉडल कौन है? तो यह क्रिकेट स्टार है ना कि यह मूवी स्टार है ना कि यह पॉप स्टार है ना कि यह पॉलिटिकल स्टार है। यही लोग हमारे रोल मॉडल है जिनको कि एक चीज आती है शक्ति का प्रदर्शन। वो चाहे कोई भी क्षेत्र में हो और उनको देखकर के हम भी सोचते हैं कि शक्ति का प्रदर्शन करना ही जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य है। तो क्या है कि रोल मॉडल ही हमारे हो जाते हैं गलत। इस तरह के गलत रोल मॉडल को लेकर के हम अपना असत्य के फाउंडेशन पे जीवन बनाते हैं। बोल कर के बचपन से ही एक अनजुकेटेड
संस्कार का ज़ोर कितना गहरा है — श्रीरामकृष्ण काली मंदिर में अन्न ग्रहण नहीं करना चाहते
एक एक कंडीशनिंग हो जाता है कि जगत सत्य है। जगत की जो पॉपुलरिटी है वह सत्य है। जगत में जो नेम एंड फेम मिलता है वह सत्य है। जगत में हम कहां पर भी जाएंगे तो हमारे फैन आकर के हमको चारों ओर से गिर लेंगे और हमारी प्रशंसा पर प्रशंसा किए जाएंगे तो वह देखकर के हृदय को जो सुकून मिलता है वह सत्य है। यह सब जो है हम लोग मान लेते हैं और फिर जगत को सत्य मानकर के जगत में सफल होने के लिए पूरा प्रयास प्रारंभ करते हैं। इसलिए यहां पर शरद महाराज कहते हैं कि यह जो माया का आवरण जो है इसका यह बेसिक मैकेनिज्म है कि इस तरह से माया हमको फंसाती है और इसीलिए कहते हैं कि जगत के बारे में हमारी जो धारणा है और अनुभव है वे दोनों बहुत लंबे समय के अभ्यास के परिणाम से उन्होंने वर्तमान आकार हमारे सामने धारण किया है। हम लोगों के पास में मिलती हुई नेम और फेम में ही दौड़ते हैं। लोगों के भीतर में जगत के परे एक ब्राह्मण है। उसको तो संपूर्ण रूप से विस्मृत ही हो जाते हैं। देखिए मैं जब बिल्कुल पहली बार ठाकुर का जो आचरण है वह जब पहली बार कोलकाता आए और उस समय काली मंदिर की स्थापना हुई थी और काली मंदिर की स्थापना के दिन स्नान यात्रा के दिन जो उत्सव वगैरह हुआ था भंडारा जो हुआ था बहुत सारे ब्राह्मण लोगों को दीक्षा वगैरह भिक्षा वगैरह मिली थी वगैरह-वगैरह तो वो विवरण पढ़ रहा था तो एक बात जो मुझे बहुत ही आश्चर्यजनक उस समय लगी लगी थी। एक तो देखिए कि रामकुमार का आचरण देखिए कि जब रानी रासमणि की यह इच्छा हुई कि वह अन्न भोग देना चाहती है मां काली को और समाज चाहे जो कुछ भी कहे आपके वह जो दो नंबर के धूर्त पंडित लोग जो है वह चाहे जो कुछ भी कहे कि निम्न वर्ण को देवी की मंदिर की स्थापना का अधिकार नहीं है और मंदिर की स्थापना कर दी तो नित्य पूजा का अधिकार नहीं है। नित्य पूजा कैसे भी करके करवा दी तो अन्न भोग का अधिकार नहीं है। यह जो सब नौटंकी चल रही थी उस समय के समाज में वहां पर एक रामकुमार थे कि एक उदार हृदय उनका एक विशाल इनकी बुद्धि थी। सुसंस्कृत बुद्धि थी। और इस सुसंस्कृत बुद्धि से उन्होंने रानी रासमणि को उपाय बताया कि यदि आप मंदिर की प्रतिष्ठा करने से पहले मंदिर को आप किसी ब्राह्मण को दान कर देते हैं और इस ब्राह्मण ही फिर इस मंदिर का जो मालिक कहा जाएगा और आप इस ब्राह्मण के ब्राह्मण मालिक है और रानी रासमणि है कर्मचारी जो जिसके हाथ में की मंदिर की व्यवस्था है। इस तरह का यदि आप अरेंजमेंट करते हैं तो फिर वहां पे नित्य पूजा है, अन्न भोग है वह सब करने में कोई दिक्कत नहीं है। तो रानी ने किया भी ऐसा कि उनके जो गुरु वंशीय जो थे ब्राह्मण उनको पूरा संपत्ति दान दे दिया और खुद उनकी अनुमति के अनुसार कर्मचारी की पदवी पर रही। व्यवस्था पूरी रासमणि के हाथ में किंतु लीगली यदि देखा जाए तो मालिकी है रानी रासमणि के गुरु जो वंश है वो ब्राह्मण की तो देखिए कि एक ओर है यह रामकुमार दूसरी ही ओर है ठाकुर गदाधर जो है उस समय बालक गदाधर वो कोलकाता से आया कामारपुकुर से आया है कोलकाता बड़े भाई के साथ में रहकर के झमापुकुर की टोल थी जो वहां पे रह के वो जो यजमान होते हैं। उनके घर में पूजा वगैरह करता है और फिर बड़े आनंद से दिन बिताता है और जगत संसार की कोई चिंता नहीं है। किंतु जिस दिन उसने देखा कि उनके बड़े भाई जो है वह वहां पर वो खाना खा रहे हैं। वहां पर पूजा कर रहे हैं। काली मंदिर में वहां पर नौकरी कर रहे हैं। तो फिर गदाधर के मन में यह सब संदेह प्रकट होना शुरू हो गया कि उनके खुद के जो पिताजी थे खुदराम वह तो अशुद्र याचित थे। अर्थात कि जो शूद्र है तथाकथित निम्न वर्ण के हैं उनके हाथ से भिक्षा ग्रहण नहीं करेंगे। तो रानी तो रासमणि तो थी कई वर्त जो कि उस समय के अनुसार निम्न वर्ण मानी जाती थी। तो उनकी नौकरी करना उनका अन्न ग्रहण करना यह सब उनके बड़े भाई क्यों करते हैं? यह सब बालक गदाधर के मन में था और फिर वह वहां पर जब जाता है काली मंदिर में बड़े भाई को मिलने के लिए तो वह कहते हैं कि तुम यहां पे भंडार गुरु है जाओ जहां पर जाकर के भोजन कर लो तो गदाधर कहता है कि नहीं इस तरह से तो ये लोग तो कई वर्ष है कईवर्त का अन्न मैं कैसे खाऊंगा तो फिर आखिर में बहुत समझाने पर भी जब बालक गदाधर नहीं माना तो रामकुमार ने क्या कहा अपने छोटे भाई भाई को कि अच्छा देखो गंगा के ऊपर में तो तुम्हारी भक्ति है। यह तो तुम मानते हो कि गंगा का जो किनारा है वह अति पवित्र है। तो तुम एक काम करो यहां पर भंडार ग्रह में से अन्न वगैरह जो है जो धान वगैरह जो है उसको भिक्षा लेकर के उसको भिक्षा के रूप में ग्रहण करो और गंगा के किनारे जाकर के अग्नि प्रज्वलित करके अपने हाथों से अन्न पकाओ तब खाना। तो अभी बालक गदाधर को यह लॉजिक थोड़ा सा ठीक लगा कि चलो गंगा का जो किनारा है वहां पर यदि अन्न पकाया जाता है भिक्षा का तो वह तो पवित्र ही होगा बोलकर के उसने उस तरह से उस दिन भिक्षा ग्रहण की थी बाद बात बाद बात बाद में ठाकुर अवश्य वहां पर रहना शुरू कर दिए थे वहां पर साधना की वगैरह सब कुछ किंतु शरद महाराज स्पष्ट रूप से लिखते हैं बीच-बीच में एकाएक ठाकुर के ऊपर में यह जो संस्कार है ब्राह्मण है। वो जागृत हो जाते और रोते-रोते मां काली को कहते कि मां मुझे और कितना दिन यह कवरत का अन्न खिलाओगी। तो देखिए जब मैं यह सब कुछ पहली पहली बार पढ़ता था। मुझे इतना आश्चर्य हुआ कहां रामकुमार ठाकुर के बड़े भाई का इतना उदार हृदय और कहां यह ठाकुर कि यही सब यह ब्राह्मी यह कवर यह सब ले बैठे हैं। इसके हाथ का अन्न खाना है। इसके हाथ का नहीं खाना है। यह सब यह जो नैरो माइंडेडनेस ठाकुर में क्यों है? यह प्रश्न मुझे उस समय हुआ था। किंतु देखिए कि पहली बात तो है कि जिन लोगों ने आध्यात्मिकता को भारत में जागृत रखा है यह हजार साल के विदेशी आक्रमणों के सामने उन लोगों की जो निष्ठा है निष्ठा को हमको सलाम करना होगा। निष्ठा को हमको प्रज़ करना होगा। क्यों? क्योंकि इस तरह का जो बाहर से भौतिकवाद का जो आक्रमण हुआ है इस्लामिक आक्रमण के समय में भी और बाद में ब्रिटिश राज में भी कि ज्यादातर भारतवासी यह बात संपूर्ण रूप से भूल गए हैं कि आध्यात्मिकता ही है भारत का प्राण। आत्मन ही है असली सत्ता। ब्रह्म ज्ञान ही है जीवन का एकमात्र उद्देश्य। ईश्वर के आशीर्वाद प्राप्त करना ही है हमारे जीवन का चरम लक्ष्य। यह सब भूल करके जब विदेशी आक्रमणकारियों ने जिस तरह से भौतिकवाद का एक भयानक टॉक्सिक प्रवाह भारत में बहाया था, बहाया है। अभी भी जो चल रहा है। यहां पर यह चंद मुट्ठी भर ब्राह्मण थे कि जिन्होंने यह वेद और उपनिषद का जो प्रिस्टाइन मैसेज है शुद्ध परिशुद्ध संदेश है ब्रह्म ज्ञान अहम ब्रह्मास्मि जीव ब्रह्म ऐक्य इस महावाक्य को उन्होंने जीवित रखा और जीवित रखने के लिए उन्होंने कितना कष्ट नहीं किया है। कितना जुल्म इन लोगों पर नहीं बिताया गया है। आज भी देखिए कि आधुनिक इंडिपेंडेंट इंडिया में यह जो ऑर्थोडॉक्स ब्राह्मण है, आए दिन हम इन लोगों की निंदा करते रहते हैं। किंतु यही ऑर्थोडॉक्स ब्राह्मण ही तो है कि जिन्होंने कहा कि जगत मिथ्या है और ब्रह्म सत्य है और इसके अनुसार जीने का उन्होंने प्रयास किया है। तो क्या है कि देखिए कि यह जो एक मिसकंडीशनिंग हमारे माइंड के भीतर में इतने हजारों सालों से बैठ गया है। खास करके यह गुलाम भारत की जो अवस्था है और आधुनिक भारत में भी देखिए यह सेकुलरिज्म का जो भूत घुसा हुआ है। हम लोग अपनी संस्कृति, अपना यह जो वारसा है, अपना यह जो हेरिटेज है, इन्हेरिटेंस जो है अपना ऋषि मुनियों का उसको छोड़कर के किस वो क्लार्क बनाने वाली एजुकेशन सिस्टम वो जो 1836 में जो डालने का प्रयास किया गया था ब्रिटिशरों के द्वारा। मुझे पता है कभी-कभी ऐसा लगता है कि जब तक भारतीय ब्रिटिश लोगों का गुलाम था। उस समय किंतु फिर भी यह ठाकुर मास्वामी जी और अन्य महापुरुष थे उस समय के उनका प्रभाव जागृत था किंतु और आफ्टर इंडिपेंडेंस खास करके यह 70 का जो डिकेड है दशक तब से लेकर के जो हम हम लोगों के खुद के भीतर में एक तरह का सेकुलरिज्म और एक तरह का स्केप्टिसिज्म ये दोनों [गला साफ़ करने की आवाज़] मिलकर के हिंदुओं के भीतर में जो भयानक तोलपाड़ मचाई है हिंदुओं के खुद के मन के भीतर में जो भयानक एक तरह का डिस्ट्रक्शन मचाया है कि हम लोग आज का जो युग है वो और ज्यादा खतरे में है। माने वो जो ब्रिटिश लोग एक्चुअली हम पर राज करते थे उस समय जितना खतरा नहीं था भारत की यह संस्कृति के विरोध में इतना खतरा मुझे लग रहा है। आज हम ही लोगों ने खड़ा किया है हमारे खुद के मन के भीतर में। तो इसलिए यहां पर कहते हैं महाराज कि यह जो हजार सालों की गुलामी है, यह अपना जो मिसकंडीशनिंग है, मिसअंडरस्टैंडिंग है, उसकी वजह से जगत को हम आज मटेरियलिज्म के रूप में ही देखते हैं। हम यही सोचते हैं कि मटेरियलिज्म ही है। जैसे कि सही बात बाकी स्पिरिचुअलिटी है। सब गलत। यह साधु बाबा जी लोग लोगों को ठगने के लिए दक्षिणा उठाने के लिए हमको लूटने के लिए यह सब भगवान की बातें करते हैं। आध्यात्मिकता की बातें करते हैं। तो इसलिए उन्होंने कहा है कि यह बहुत लंबे समय के धारणा और अनुभव के परिणाम से वर्तमान में परिस्थिति ने इस तरह का भयावह आकार धारण किया है। एवं तत संबंध यथार्थ
जगत को यथार्थ रूप में जानने के लिए नाम-रूप और देश-काल के पार जाना होगा
ज्ञाने उपनीित होइते होइले आमादग के एको नाम रूप देश काल मन बुद्धि प्रवृत्ति जगत अंतर्गत सकल विषयर अतीत पदार्थर सहितो परिचितो होइते होइबे और यह जो भयानक जो भ्रम हमारे सामने उत्पन्न हुआ है। खास करके आज के युग में सेक्युलरिज्म और स्केप्टिसिज्म यह दोनों है। एक तरह का अधार्मिकता और एक तरह का संदेश। तो यह दोनों ने मिलाकर के जो भ्रम खड़ा किया है उससे बचने के लिए हमको नाम, रूप, देश, काल, मन, बुद्धि वगैरह जगत के अंतर्गत जितने भी विषय है उसके अतीत जो पदार्थ है उसके साथ में परिचित होना होगा। आज का जो पूरा युग है यह नाम और रूप के पीछे में दौड़ने की कंपटीशन है। रेट रेस है। इस रेट रेस के अलावा और कुछ नहीं है। फैमिली गैदरिंग भी होता है। तो यही लोग सब बातें करेंगे कि आज मुझे इतना प्रमोशन मिला। कोई कहेगा कि मैं यहां पर जापान गया था यात्रा करने के लिए। हमारा कॉन्फ्रेंस था। कोई कहेगा कि मुझे मेरे बिजनेस में इतना प्रॉफिट हुआ है। कोई कहेगा कि आज मैंने बड़ी गाड़ी खरीदी है। तो यही सब बातें सभी लोग यह प्रूव करना चाहते हैं कि यह मटेरियलिस्टिक यह जो वर्ल्ड है, किसके पास में ज्यादा से ज्यादा यह धन संपत्ति है। कितना हम धन संपत्ति का यह एक प्रदर्शन कर सकते हैं। कितना हम धन संपत्ति के माध्यम से प्रकट हुई जो सोशल प्रेस्टीज है हमारे पास में प्रेस्टीज कितनी ज्यादा है कितने सेलिब्रिटीज और वीआईपी को हम पहचानते हैं कितना बड़ा हमारा सोशल नेटवर्क है कितना हमारा इन्फ्लुएंस है यदि बिजनेसमैन है तो हमारी प्रोडक्ट कितनी चलती है यह सब चीजें यह नाम रूप के पीछे में दौड़ना यही जैसे कि हमारा जगत बन गया है और नाम रूप है देश और काल के भीतर में। यानी कि जो कुछ भी मटेरियल चीजें आप देख रहे हैं स्पेस एंड टाइम के भीतर में तो ही है। और इस स्पेस टाइम के भीतर में बंधी हुई यह मटेरियल चीजों को प्राप्त करने के लिए हमको चाहिए मन और बुद्धि। यह माइंड एंड इंटेलेक्ट। तो यह नाम रूप नाम रूप जिस बॉक्स में बंधे हुए हैं देश काल और इस गिफ्ट बॉक्स गिफ्ट पैक के पीछे में दौड़ने के लिए जो हमको चाहिए वह है मन और बुद्धि। इसी को लेकर के हमारा जीवन है। तो यहां पर शरद महाराज कहते हैं नाम, रूप, देश, काल और मन और बुद्धि इन सबके परे इन सबके अतीत जो पदार्थ है उसके साथ में हमको परिचित होना होगा। तभी यह जो भ्रम है वह जगत हमारे मन में से कटेगा। देखिए कोई भी सोशल गैदरिंग है, किसी भी तरह का एक कम्युनिटी इवेंट है। हमेशा हम एक दूसरे को जज करते रहते हैं। हमेशा हम एक दूसरे को देखते हैं, सोचते हैं कि किसके पास में क्या ज्यादा है। तो अभी क्या है कि जो इस तरह की यह रेट रेस में जीत जाता है वह चाहे कॉर्पोरेट वर्ल्ड में हो चाहे यह एकेडमिक फील्ड में हो चाहे यह फैमिली लेवल पर हो चाहे यह मैरिज मार्केट है। जब मैरिज करने को जाते हैं तो पता चलता है कि अपनी वैल्यू क्या है? क्योंकि अपनी वैल्यू के अनुसार ही तो यह सामने दूल्हा है या दुल्हन हमको मिलने वाली है। तो उस समय देखेंगे कि बहुत सारे लोग डिप्रेस हो जाते हैं। मैं अभी कुछ ही समय पहले एक यंग लड़के के साथ में बात कर रहा था। तो उसकी उम्र तकरीबन 28 29 साल की है। तो मैंने उसको पूछा कि क्या कर रहे हो? तो बोला कि यह पोस्टल डिपार्टमेंट में जॉब है मेरा। तो मैंने कहा तो अच्छा है। तो गवर्नमेंट जॉब मिल गया और क्या? तू शादीवादी किया है कि नहीं किया? तो बोला अभी तक नहीं किया है। मैंने क्या क्या राह देख रहे हो? तो बोलता है कि सब कुछ तो पहले होना चाहिए ना। घर भी होना चाहिए। स्टेडी इनकम भी होनी चाहिए। तब तो कहीं जाकर के एक अच्छी लड़की मिलेगी। वरना तो फिर लड़की भी तो अच्छी नहीं मिलेगी। मैंने कहा बात तो सही है। क्योंकि सिर्फ जॉब होने से तो चलेगा नहीं। सब तरह की बातें आपको देखनी पड़ती है। तो देखिए कि वो अभी उम्र है 28 29 तो मैंने कहा कि देरी नहीं हो जा रही है क्या अभी अभी आजकल का मुझे इतना ख्याल नहीं किंतु एटलीस्ट मैं जब बाहर था तो मैं देखता था कि 24 25 26 साल है कि वो मैरिज की ऐज कही जाती है। तो बोलता है यह लड़का कहता है नहीं महाराज आजकल तो हम लोग थोड़ा सा देरी से ही शादी करते हैं। थोड़ा सा अपना वैल्यू बढ़ना चाहिए। बाद में ही तो फिर अच्छे से वह पात्र मिलेगा। तो देखिए कि आप शादी करने को जाएंगे तब असली में पता चलेगा कि अपनी वैल्यू क्या है क्योंकि और कोई रिलेटिव के सामने आप अपना बड़ा-बड़ा बातें करेंगे तो वे लोग मान करके हंस करके स्वीकार कर लेंगे किंतु जब पात्र खोजने को जाते हैं तो वो जो उनके जो मां-पिताजी है वो ठीक-ठीक जांच संभाल करते हैं कि बिटिया को यदि इसको दे रहे हैं लड़के को तो लड़के के भीतर में है क्या वो तो ठीक-ठीक देखना चाहिए। तो देखिए कि यह सब कुछ जो है इसी को लेकर के हमारा जीवन है। किंतु माह यहां पर शरद महाराज कहते
ब्रह्मज्ञान हो जाने पर संसार के सुख तुच्छ प्रतीत होने लगते हैं
हैं यह नाम रूप देश काल यह आपका मैरिज मार्केट यह एंप्लॉयमेंट मार्केट यह आपका शेयर मार्केट ये सबको परे जाकर के यह जो अद्वय अद्वितीय जो दिव्य वस्तु है जो विषयों के सब तरह के विषयों के जो अतीत पदार्थ है उसके साथ में परिचित होना होगा और जब हम परिचित होंगे तब हमारा मन मन इस तरह की शांति, आनंद और उत्साह से भर जाएगा। इस तरह की शक्ति प्रकट होगी कि इसके सामने यह जो बाह्य संसार की जो शक्तियां है वो एकदम तुच्छ जान पड़ेगी। ठाकुर कहते हैं ना कि जब मेरा जब मेरी वो अवस्था होती वो अवस्था अर्थात कि ठाकुर के ऊपर में जब भाव सवार होता पंडित गुलो खड़कुटो बोत हो अर्थात कि देखिए कि ठाकुर तो वैसे तो बड़े ही विनम्र थे वैसे वो सामान्य लेवल पर जब रहेंगे किंतु प्रॉब्लम क्या है ना कि वह सामान्य लेवल पर ज्यादा तो रहते नहीं थे ना वो जैसे चैतन्य महाप्रभु का उदाहरण देकर के ठाकुर कहते हैं कि एक तो है कि बाह्य दशा फिर है अर्धबाह्य दशा और फिर है अंतरर्दशा। अर्थात कि जब बाह्य दशा होती है तो एक सामान्य लेवल पे रहते हैं। किंतु जब यह अर्धबाह्य दशा होती है तो जैसे कि ईश्वर का आवेश होता है और आवेश के मारे उदाम नृत्य कीर्तन करते हैं। और फिर होती है अंतर्दशा। अर्थात कि यह जगत को छोड़कर के कहां उनका मन उर्ध्वराज्य में विचरण करना शुरू करेगा और जगत की यह जितने भी ये फॉल्स है जगत में ये जितना एक बूढ़ी बंदरिया को आप मेकअप करके रखे हो है तो वो बूढ़ी बंदरिया ही वो सुंदरी स्त्री कभी नहीं होने वाली है तो उसका जो मेकअप के बाद में मेकअप के परे उसका जो स्वरूप है स्पष्ट रूप से दिखाई देता है तो यहां पर भी ठाकुर कहते हैं कि जब मेरी वह अवस्था स्था होती है तब पंडित गुलो खड़कुटो बोध होए अर्थात कि यह जो लोग अपने को तथाकथित पंडित कहलाते हैं तथाकथित विद्वान कहलाते हैं वह तुच्छ बोध होते हैं मुझे लगता है कि जैसे पंडित लोग बहुत वह हवा में उड़ते हैं किंतु नजर रहती है हमेशा कूड़े कचरे के ऊपर में जो कि जमीन पर पड़ा है। सोच के देखिए यहां पर हवा में कहां वो ऊपर में उड़ रहा है। सुंदर बादल है। खुला आसमान है। सूरज का प्रकाश है तो कहां उसका आनंद उठाएगा ना कि यह जो उसका नजर है हमेशा जमीन के ऊपर में कहां कूड़े में कहां डेड बॉडी पड़ा हुआ है किसी पशु का कहां पे यह जो झूठा खाना पड़ा है उसके ऊपर में नजर और जैसे ही ऐसा कुछ दिखा मरा हुआ चूहा तो इतना हवा में जो उड़ रहा था वहां सीधा डाइव लगाएगा आएगा जमीन पे मरे हुए चूहे को मुंह में डाल के फिर से हवा में उड़ना शुरू कर देगा तो देखिए कि यह संसार की वास्तविकता है। जब यह विषयों के अतीत जो वस्तु है उसका हम दर्शन करेंगे उसका जब हमको साक्षात्कार होगा तो यह जगत जो है यह हमको उसका यथार्थ स्वरूप दिखाई देगा। जगत में शक्ति है तो उसके परे भी इतनी भयानक शक्ति आध्यात्मिकता हमको देती है। आपको आपका बैंक बैलेंस आपको कॉन्फिडेंस देता है। इससे हजार गुना कॉन्फिडेंस आपको आत्म साक्षात्कार देगा। मैरिज मार्केट में आपकी यह वैल्यू है। उससे आपको इतना खुशी होती है। इससे करोड़ों गुनी खुशी आपको होगी। आध्यात्मिक मार्केट में अपनी क्या वैल्यू है? ईश्वर के सामने अपना क्या रिलेशन है? ईश्वर की दृष्टि में हमारी क्या वैल्यू है वह हमको इससे करोड़ गुना ज्यादा शांति और सुकून देगा।
ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति के लिए की गई चेष्टा को ही वेदप्रमुख शास्त्र ‘साधन’ कहते हैं
कोई परिचय पार चेष्टा के वेदों प्रमुख शास्त्रों साधन बोलिया निर्देश को छ यह सब विषय के अतीत जो अद्वय अद्वितीय पदार्थ है उसके साथ में परिचित होना है। इस परिचय को प्राप्त करने की चेष्टा को ही प्रयास को ही वेद प्रमुख शास्त्र साधन बोलकर के निर्देश किए हैं। यह जगत संसार के परे क्या वास्तविकता है उसको पहचानिए और उसको पहचानने के लिए आपको जो कुछ भी करना पड़े जो कोई भी रास्ता आप अपनाएं चाहे कर्म योग का हो ज्ञान योग का हो भक्ति योग का हो राज योग का हो हिंदू धर्म हो इस्लाम हो क्रिश्चियनिटी हो इवन कर्ता भजा हो जो कोई भी रास्ता आप अपनाइए इस रास्ते को साधन कहते हैं और यह कर्ता भजा माने कोई भी रास्ता हो फिर आप सिंसियरली उसको करते हैं तो वह साधना ही है। वह कर्ता भजा अर्थात कि जो गुरु होता है उसकी उपासना करनी। अभी यह तो बड़ा डेंजरस है ना कोलकाता में ठाकुर के समय यह सब बातें ज्यादा फैलती थी कि कोई एक गुरु है उसकी यह स्त्री डिसाइपल है और उसको लेकर के वह सब दुनिया भर का भ्रष्टाचार करता है और अपने संप्रदाय का नाम दिया है कर्ता भजा। तो यह गिरीश घोष वगैरह जो कि एक तीक्ष्ण दृष्टि और उनकी स यह जो सोसाइटी है सोसाइटी की यह जो दूषण है उसको जागृत करने की एक जो ह्यूमरस एक जो मेथड होती है नाटक के माध्यम से यह दूषणों को उजागर करने की वो उनके भीतर में थी आजकल का जिसको इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिज्म कहते हैं जहां पे कोभांड हो रहा है भ्रष्टाचार हो रहा है तो यह इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट उसको एक्सपोज करते हैं तो उस समय इस तरह का तो कुछ नहीं था किंतु गिरीश घोष का था कि ऐसे लोगों के ऊपर में नाटक बनाएगा। यह ठाकुर का भी था। वह कामार पुकुर में जो इस तरह के भ्रष्टाचारी लोग थे दूसरों को पटा करके अपनी एक महत्ता स्थापित करने का प्रयास करते थे। तो ठाकुर छोटा गदाधर एकदम फटाक करके पकड़ लेता था। और फिर सबके सामने इतना मर्सलेसली उसकी मजाक उड़ाएगा। उसकी ऐसा कटाक्ष करेगा उसके ऊपर में कि यह जो भ्रष्टाचारी आदमी है उसके पास में एक ही उपाय है कि बालक गदाधर के शरणागत हो जाने का। जब वह शरणागत होगा तब बालक गदाधर फिर शरणागत जो होते हैं जो शरण में जो आए हैं उनको भय अभय प्रदान करते हैं तो फिर वह बच जाएगा। तो यहां पे भी यह गिरीश घोष का था कि नाटक बना के इनको एक्सपोज करें। तो वह ठाकुर को कहता है कि मेरी इच्छा है कर्ता भजा के ऊपर में एक नाटक बनाने की। तो ठाकुर ने साथ-साथ में ही कहा नहीं देखिए कि वो भी एक साधन पथ है। जो सिंसियरली जिस साधना का आप प्रचलन करते हैं जिस साधना का आप प्रैक्टिस करते हैं यदि सिंसियर है तो प्रत्येक पथ आपको वही एक अद्वय ब्रह्म वस्तु तक ही ले जाएगा। तो इसलिए यहां पर शरद महाराज कहते हैं कि यह अद्वय ब्रह्म वस्तु मन बुद्धि चित्त अहंकार के परे जो अद्वय ब्रह्म वस्तु है उसको प्राप्त करने की जो चेष्टा है उसी को वेद प्रमुख अर्थात कि वेद के से प्रारंभ करके जितने भी जो हमारे प्रमुख शास्त्र है उसको साधन बोलकर के निर्देश किए हैं। एवं उई चेष्टा ज्ञातो बा
जो स्त्री या पुरुष ब्रह्मज्ञान प्राप्त करने का प्रयास करते हैं, वही भारत में ‘साधक’ कहलाते हैं
अज्ञातोष सारे जे स्त्री बा पुरुष विद्यमान ताई भारतते साधक नाम में अभीतोया था के और यह चेष्टा ज्ञात या अज्ञात सारे जिस स्त्री या पुरुष में विद्यमान है वही लोग भारत में साधक के नाम से अभिहित होते हैं या तो फिर साधक के नाम से पहचाने जाते हैं। जो लोग साधना करते हैं चाहे वो ज्ञात सारे हो ना कि अज्ञात सारे अर्थात कि हमको ज्यादातर लोगों को तो पता है कि साधना क्या है और हम कॉन्शियसली साधना करने का प्रयास करते हैं। यदि रामकृष्ण मिशन में डिवोटी है तो फिर प्रेसिडेंट महाराज से दीक्षा लेना परम पूजनीय प्रेसिडेंट महाराज या वाइस प्रेसिडेंट महाराज से फिर उनकी कही हुई साधन पद्धति के अनुसार प्रतिदिन 108 या 108 यथाशक्ति उसका जप करना फिर यह जो अपने जो गोस्पेल वगैरह जो किताबें हैं कथामृत है मां की जीवनी है उसका पाठ करना यदि हो सकता है तो यथाशक्ति नियमित रूप से मंदिर में जो आरती वगैरह होती है, उत्सव वगैरह होता है, उसमें पार्टिसिपेट करना और यदि और थोड़ी शक्ति है तो अपने आश्रम में जो कार्यकलाप चल रहे हैं, एक्टिविटीज चल रही है तो यहां पर आकर के वॉलंटियर का कार्य करना। तो यह तो हम लोग सोच समझ करके करते हैं। प्लान करके करते हैं। हम करना चाहते हैं कि साधना करना चाहते हैं। बोल करके करते हैं। किंतु अज्ञात सारे भी हम साधना करते हैं। देखिए मैं जब छोटा था तो मैं स्कूल में पढ़ता था। मैंने कोई-कोई मेरे जो मित्र थे देखता था कि परीक्षा में वे लोग चोरी करते हैं। वह हाथ के ऊपर में ना कि वह जूते के ऊपर में कहीं पे वो उत्तर लिख के आएंगे और डिफिकल्ट क्वेश्चन रहेगा तो वह चोरी करके लिख देंगे। मैंने सपने में भी नहीं सोचा कि मैं चोरी करूंगा। नहीं आता है तो नहीं आता है। फेल होंगे और क्या है? चोरी करने की क्या जरूरत है? तो उस समय तो मैं बच्चा ही था। ऐसा नहीं है कि कभी सोचा था भविष्य में साधु होना है। ना ही मेरे मां-पिताजी ने ऐसा कुछ मुझे कहा था कि बेटा तुम चोरी मत करना। वो वो जो संस्कार एक घर का रहता है पॉजिटिव संस्कार वही एक था। किंतु एक इंस्टिंक्टिवली मेरे भीतर में था कि चोरी तो नहीं ही करनी। देखिए कि बहुत सारे यह स्टूडेंट्स होते हैं जो छात्र होते हैं उनके जीवन में इस तरह के आदर्श होते हैं। अभी वे लोग इस आदर्श को आध्यात्मिकता के रूप में नहीं गिनते हैं। वे लोग वही गिनते हैं कि यह काम मुझे नहीं करना है। यह काम मुझे नहीं अच्छा लग रहा है। यह गलत है। इसको मैं नहीं करूंगा। तो क्या है कि यह अज्ञात सारे की हुई साधना है। मुझे पता ही नहीं है कि अस्तेय सत्य अहिंसा अस्तेय ब्रह्मचर्य है ना तप शोच संतोष स्वाध्याय ईश्वर प्रणिदान तो यह जो यम नियम है 10 पांच नियम पांच नियम उसमें जो अस्तेय है चोरी नहीं करना किसी का जो धन है जबरदस्ती उसको हड़प नहीं करना या तो फिर जो अपना अधिकार नहीं है इस तरह की कोई चीज प्राप्त करना उसको कहते हैं स्टेय अर्थात कि चोरी करना और वह नहीं करना उसको कहते कहते हैं अस्तेय चोरी नहीं करना। तो यह अस्तेय बोलकर के यम का एक भाग है। मुझे उस समय बिल्कुल नहीं पता था। किंतु मैं इंस्टिंक्टिवली उसको नहीं करता था। और ऐसे बहुत सारे लोग हैं। इंस्टिंक्टिवली वे लोग कुछ कुछ ये कार्य करते हैं जो कि आध्यात्मिक साधना के भीतर में है। किंतु यह लोग ऐसा मानते हैं कि मैं आध्यात्मिक नहीं हूं। वही एक जो मिस एजुकेशन मिसइफेशन जो हमारे मन में ये सेकुलरिज्म का जो कीड़ा है सेकुलरिज्म और स्केप्टिसिज्म दोनों ने मिलकर के हमारा जो दिमाग खा लिया है तो इसकी वजह से बहुत सारे लोग हैं जो कि अपने को आध्यात्मिक या धार्मिक नहीं गिनवाना चाहते किंतु उनके जीवन में एथिक्स और मोरालिटी जिसको कहते हैं वो भर-भर करके होती है और फिर इवन बाहर से जैसे मुझे तो ऐसा लगता है कि यदि यदि किसी के जीवन में एथिक्स और मोरालिटी है तो वह यदि धार्मिक नहीं है तो भी चलेगा कंपेयर टू दैट कि कोईकोई लोग होते हैं अपने को बड़ा धार्मिक होने का दिखावा तो करते हैं किंतु भीतर से पूरा करप्शन तो एथिक्स और मोरालिटी के नाम पे एक बहुत बड़ा शून्य घोड़ा डीम बांग्ला ते बोले घोड़े का अंडा घोड़े का अंडा होता नहीं है घोड़ा तो मैमल है उसका तो बच्चा जन्म लेता है तो घोड़े का अंडा अर्थात कि जो चीज है ही नहीं कभी इस तरह का अर्थात कि शून्य तो ये लोग बातें तो धर्म की बड़ी-बड़ी करते हैं किंतु नैतिकता के नाम पे बहुत बड़ा शून्य घोड़ा का अंडा है इनके जीवन में। तो इससे तो बेटर है वह आदमी जो कि भले ही चाहे अपने को स्केप्टिक कहलाए किंतु उसके भीतर में एथिक्स और मोरालिटी है। तो इसलिए यहां पर महाराज कहते हैं कि इस तरह की चेष्टा यानी कि ईश्वर प्राप्त करने की जो प्रयास प्रयत्न है, कार्यकलाप है, इसको आप ज्ञात या अज्ञात सारे करते हैं। और यह करने वाले जो स्त्री और पुरुष है उन्हीं को भारत में साधक के नाम की पदवी दी गई है। साधक के नाम से इनको अभिहित किया गया है। इसके बाद का जो टॉपिक है बड़ा ही इंटरेस्टिंग नेति नेति और इति इति यह दो साधन पथ है। इनके बीच में क्या कंपैरिजन है? क्या कंट्रास्ट है? वो शरद महाराज कहते हैं जिसको कि अभी हम कल देखेंगे आज यहीं तक। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु
प्रश्न: जब हम लगभग पंद्रह वर्ष के होते हैं, तब हम अच्छे करियर, ऐश्वर्यपूर्ण जीवन, अच्छी पत्नी और परिवार जैसे लक्ष्य तय करते हैं। फिर आगे चलकर ये लक्ष्य आध्यात्मिक लक्ष्यों में क्यों नहीं बदलते? हमारा आंतरिक evolution क्यों रुक जाता है?
किंतु मुझे ऐसा नहीं लगता कि अपना इवोल्यूशन रुक जाता है। अपना यह जो उम रोल मॉडल्स है ना वह फ़िक्स हो जाते हैं। यह एक प्रॉब्लम होता है। एक बचपन से ही हम जिस रोल मॉडल को देखते आ रहे हैं, उसमें हम फिर अब जैसे देखिए ना ऐसा नहीं है कि अपने भारत में साधु संत और मंदिर या आश्रम की कमी है। किंतु कॉलेज में जाने के समय या कॉलेज के पहले या बाद में किसके मन में आता है कि चलो एक बार जाकर देखते तो है कि यहां पे हो क्या रहा है। वो मैं मैं खुद मैं अपनी खुद की बात करता हूं। मैंने कभी मेरे मन में यह इस तरह का क्यूरियोसिटी नहीं हुआ कि मैं कोई साधु के साथ बात करूं। मुझे याद है कि पहली बार मैंने किसी साधु के साथ में कब बात किया होगा। बात ऐसा था कि मैं तो एक जैन साधु थे। वहां पे हमारे सिटी में आए हुए थे। तो किसी ने उनको एक साइंटिफिक कैलकुलेटर दिया था। तो अभी उनको देखना है कि यह साइंटिफिक कैलकुलेटर कैसे काम करता है। तो उन्होंने क्या किया कि उनके कोई डिवोटी होंगे उसको बोला कि कोई इस साइंटिफिक कैलकुलेटर चलाने वाले किसी लड़के को पकड़ के ले आओ। तो यह मेरा मित्र मुझे बोलता है कि वह है अपने जैन साधु तो उनके पास में ऐसा कैलकुलेटर है तो तुम आकर थोड़ा दिखाओगे उनको क्या करना है इसके साथ में। तो मैंने कहा ठीक है चलो दिखा के आते हैं। तो जा गया उनके साथ में 10-15 मिनट जो भी बात की मैं समझ गया कि उनको साइंटिफिक कैलकुलेट तो आप वो साइन वो कोसाइन वगैरह कैलकुलेट करने के लिए होता है ना ट्रिगोनोमेट्री डिफरेंशियल कैलकुलस ये महाराज को कुछ नहीं आता है। तो मैंने कहा महाराज ये साइंटिफिक कैलकुलेटर जिस पर्पस के लिए यूज़ होता है वो पर्पस आपका है ही नहीं। आपके लिए कैलकुलेटर किसी काम का नहीं है। आप इसको दे के किसी को और कुछ और कुछ ले लीजिए। उसका बेटर रहेगा आपके लिए अननेसेसरी आप यह सब झमेले में मत जाइए तो महाराज भी मान गए कि हां हां वो ठीक ही कहता है तो ऐसा वो 10-15 मिनट बाद हुआ फिर मैं निकल आया मुझे अभी भी याद है कि मैंने एक सेकंड के लिए भी मेरे मन में यह क्यूरियोसिटी नहीं हुआ कि मैं उनको पूछूं कि आप इस तरह से क्यों रहते हैं आपने क्यों घर छोड़ा और यह तो दिगंबर साधु थे तो दिगंबर रहना यानी कितनी बड़ी तपस्या है तो मैं एक सेकंड के लिए भी नहीं सोचा उस समय ऐसा बैठ गया था ना सब मेरे माइंड के भीतर में कि ये जितने साधु बाबा बाबा जी है। सब झूठे लपंगे हैं। तो ये भयानक एक सेकुलरिज्म अपने सोसाइटी में चलता है।
प्रश्न: एक बार हम सांसारिक प्रलोभन में फंस जाते है तो फिर इससे मुक्त होना असंभव लगता है. क्योकि हमारे आसपास सभी लोग तो इसी मायाजाल में बंधे है. पूरा सिस्टम हमें फंसाना चाहता है. जो माया से मुक्त हो भी जाते है, वे लोग अपने को छुपाके रखते है.
किंतु देखिए कि आधुनिक युग में आज अपने पास में इंटरनेट है। राइट? तो आप यदि थोड़ा सा भी आप में क्यूरियोसिटी होगा यू कैन फाइंड वेरी गुड टीचर्स ऑनलाइन। अभी सर्वप्रियनंद जी फेमस उदाहरण कि वन ऑफ द बेस्ट इन आवर ऑर्डर। तो यदि आप में थोड़ा सा भी क्यूरियोसिटी है यू कैन फाइंड योर सॉल्यूशन। वो भी एक आज के युग ने एक सुविधा कर दी है। अब जैसे मैं एक आपके पीतांबरानंद जी का उदाहरण दूं तो अभी बाद में तो वो अद्वैत आश्रम में आकर रहते थे। वरना तो बहुत लंबा टाइम वो वहीं पर वो उत्तरकाशी में ही कहीं पर रहे हैं। किंतु इनस्पाइट ऑफ दैट कि उनके पास में लैपटॉप था और लैपटॉप से वह ऑनलाइन क्लासेस लेते थे। सो दैट इज आज के युग में एक बेनिफिट है।
प्रश्न: इसलिए सत्संग का इतना प्राधान्य है. साथ में अन्य साधको को देख कर हमें भी भरोसा मिलता है. लगता है इसीलिए ठाकुर ने गुरुभाईओ को साथ में रहने को कहा होगा.
पूर्ण का उदाहरण जैसे कि पूर्ण का उदाहरण आपने जैसे ठीक ही कहा अब जो जो लोग साथ में रहते हैं उन्होंने तो एकदम ठीक कर दिया है एक दूसरों का जो माने उद्दीपनामई जो नरेंद्र की वाणी एक दूसरों का एग्जांपल कि अभी संसार में वापस नहीं जाना किंतु यह पूर्ण था तो वो उसकी मां ने उसकी शादी भी करवा दी वो बिछड़ भी गया माने वह कम्युनिटी का पार्ट नहीं हो पाया बोल के उसकी की शादी भी हो गई। घोर संसार में उसको डूबना भी पड़ा। सो दैट इज वन बेनिफिट ऑफ कम्युनिटी। यू आर परफेक्टली राइट। यह जो ठाकुर कहते हैं ना पंचांग है पंजीिका। तो उसको आप उसको स्क्वीज़ करेंगे ना ऐसा करके। अब पंचांग में लिखा हुआ है एस्ट्रोलॉजिकल बुक में कि आज इतना बारिश होगा। इस दिन को इतना बारिश होगा। किंतु इसको आप जितना ही स्क्वीज़ कीजिए ना सो पानी का एक बूंद भी नहीं गिरेगा। किंतु वह पंचांग पढ़कर के जो ज्योतिष होते हैं उन लोगों के पास में आप जाएंगे तो उनके साथ में बात करना आपको बड़ा अच्छा लगेगा। सो ऐसा धर्म किताब जो है वो रस से भरी हुई है। किंतु सिर्फ किताब का अपनाेंस नहीं है। जो किताब को पढ़ के जिसने आत्मसात किया है उसका आप सत्संग कीजिए और फिर उस उनके आसपास में जो कम्युनिटी बिल्ड अप होता है। यू बी अ पार्ट ऑफ दैट कम्युनिटी और फिर देखिए कि इस रस का आपको कितना आनंद आता है।
प्रश्न: दुसरो को सही आध्यात्मिक दिशा दिखने की हमारी ड्यूटी कितनी है?
देखिए ये जो मिशनरी रिलीजन होते हैं ना तो यूजुअली होता क्या है मिशनरी रिलीजन का ऐ कि हम कितने कन्वर्ट्स को बनाते हैं। राइट? तो ऐसा ही ये इस्लाम और क्रिश्चियनिटी इतना फैला है। बुद्धिज्म भी ऐसा ही फैला था। किंतु देखिए कि खास करके बुद्धिज्म ने जो गलती कर दिया था और जिसका परिणाम बाद के भारत को भुगतना पड़ा था। हर किसी को पकड़ करके ले आए थे और फिर उनके जो कुसंस्कार थे वह बुद्धिज्म में प्रवेश कर गए। बोलकर के पूरा बुद्धिज्म भीतर से करप्ट हो गया। अभी देखिए कि आज सेम चीज यह जो इस्लाम क्रिश्चियनिटी के साथ में हो रही है। न्यूज़ पेपर पढ़ने से स्पष्ट दिखता है। ऐसे कितने ही पगले हैं जो कि धर्म के नाम पर पागलपन कर रहे हैं और बोलकर के पूरे धर्म को उसकी वजह से सफर करना पड़ता है। अभी रामकृष्ण मिशन भी तो मिशनरी रिलीजन है। हमने वह अग्रेसिव हिंदूइज़्म का स्वामी जी का पैसेज तो स्पष्ट रूप से पढ़ा है। स्वामी जी ने कहा है कि अपनी खुद की मुक्ति और भक्ति की चिंता छोड़ दो। जगत के कल्याण के लिए अपने जीवन को लगाओ। किंतु यहां पे एक बात है कि रामकृष्ण मिशन इज नॉट ए मिशनरी रिलीजन इन द सेंस बुद्धिज्म, क्रिश्चियनिटी और इस्लाम। यहां पे ऐसा नहीं है कि कन्वर्जन एकमात्र उपाय है। यहां पे ड्यूल एम है। आत्मनो मोक्षार्थम जगत हिताय च। सिर्फ जगत हिताय च नहीं आत्मनो मोक्षार्थम और जगत हितायच। तो क्या है कि अपनी खुद की आध्यात्मिक साधना बनी रहे और फिर विदिन दैट पेरीमीटर हमसे जितना हो इतना करें। बहुत सारे लोग दूसरे धर्म में जैसा होता है कि मेरी खुद की आध्यात्मिक साधना भले ही विफल हो जाए भले ही चाहे मेरे में करप्शन प्रवेश कर जाए। मेरा सक्सेस इतना ही है कि मैंने पूरे गांव को कन्वर्ट करवा दिया। तो दैट इज नॉट आवर एम। हमको अपनी साधना जो है रेगुलर मेंटेन करनी है और फिर ऐसा करके हमारे जो कांटेक्ट में जितने लोग आते हैं उनको फिर हमको यह सब शेयर करते रहना है। जैसे मैंने पहले भी कहा था कि गुजरात राजकोट में यह अच्छा एक अपना ट्रेडिशन है कि जो राजकोट के हेड होते हैं वो किताबें तो बेचना है तो फिर उन्होंने यह उपाय लगाया है। जितने भी डिवोटी आते हैं कहते हैं कि आपके घर में प्रसंग है और तो प्रसंग में आप इतना खर्चा करते हैं उससे बेटर है आप किताब छपवाइए। हम आपका नाम उसके ऊपर में लिखेंगे कि सौजन्य ये फला फला जो भी है इनका नाम लिख के आपको हम हजार किताबें 2000 किताबें छपवाएंगे। उसको आप बांटिए गिफ्ट दीजिए आपके प्रसंग में। सो [हंसी] इसमें क्या होता है कि विदिन योर आध्यात्मिक साधना हमको जितना हो सके अवश्य करना है। [हंसी] और ठाकुर का उदाहरण है वो दीवार पर चढ़के देखते हैं वहां पर बहुत अच्छा मेला चल रहा है तो हां करके वहां पर जंप लगा देते हैं फिर वापस ही नहीं आते। [हंसी] अरे देखिए सर्वप्रियनंद जी का कहेंगे कि परफेक्ट बैलेंस है क्योंकि मैंने उनको ट्रेनिंग सेंटर में देखा था और ट्रेनिंग सेंटर हालांकि वह आचार्य थे किंतु वो एक ऐसी जगह है ना कि आपकी जितनी भी सुपरफिशियलिटी जो है ना उसको एक्सपोज करके रख देगी। बहुत ही हार्ड जगह है वो। तो वहां पर मैंने उनको एकदम बैलेंस मेंटेन करके लाइफ लीड करते देखा था। उस समय मुझे पहले एक ही सप्ताह में देखने के एक ही उस उस समय उनको कोई नहीं पहचानता था। वो बस टीसी के एक आचार्य है ऐसा ही। किंतु विद इन वन वीक मैं समझ गया कि उनका फ्यूचर जो है ना बहुत ही ब्राइट है। [हंसी] देखिए मैं कहूंगा सबको कहूंगा कि वो जो छोटी-छोटी पॉकेट बुक्स है ना अपने मिशन की शक्तिदाई विचार है। अभी जैसे मुझे तो गुजराती किताब के छोटी किताब का नाम पता है। बंगाल में तो मैंने सब बड़ी-बड़ी किताबें ही पढ़ी है। किंतु आप कोई भी बुक स्टोर में जाइए। वो पॉकेट बुक्स आपको मिल जाएगी। उसको आप 15, 20, 30, 40 अपने घर में रख दीजिए। जो भी उपयुक्त कैंडिडेट लगता है उसको गिफ्ट में दीजिए। दिस मच यू कैन डू। राम