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Sri Ramakrishna Lila Prasanga ·

साधक भाव : Ch. 1 साधक और साधना || श्रीरामकृष्ण लीलाप्रसंग : स्वामी सारदानन्द रचित || 6 Aug 2025

prayer

ओम स्थापकाय धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः श्री श्री रामकृष्ण लीला प्रसंग इस सप्ताह से प्रारंभ करेंगे। इसका जो अवतरणी का है साधक भाव का हमने ऑलरेडी देख लिया है। अभी प्रथम अध्याय प्रारंभ होता है साधक और साधना। इसमें भी हमने प्रथम दो पॉइंट जो थे कि साधना संबंध साधना के बारे में आम आदमियों के मन में जो भ्रांत धारणा जो होती है उसका एक हमने ऑलरेडी डिस्कशन डिस्कशन कर लिया है और उसके बाद में दूसरा पॉइंट जो था कि साधना का चरम फल क्या है तो वह है सर्वभूत में ईश्वर दर्शन या तो फिर ब्रह्म दर्शन तो इसके बारे में हमने डिस्कशन प्रारंभ किया पहले तो कुछ पॉइंट हमारे सामने रखने के बाद में शरद महाराज स्वामी शारदानंद जी महाराज कथा लीला प्रसंग के लेखक वो प्रश्नोत्तर के माध्यम से हमको यह समझाना चाहते हैं कि ये आध्यात्मिक जीवन जो है

आध्यात्मिक साधना क्या है, साधना के बारे में भ्रांत धारणाएं, और उनका समाधान

पहले तो यह साधक और साधना ये चैप्टर का प्रयोजन क्या है? यह चैप्टर क्यों लिखा गया है? वैसे तो यह लीला प्रसंग है श्री रामकृष्ण देव की यह लीला का वर्णन किंतु यहां पे शरद महाराज कहते हैं कि ठाकुर की लीला का वर्णन खास करके यह साधक भाव जो पार्ट है सेकंड पार्ट इसमें ठाकुर की साधनाओं का विवरण पढ़ने का प्रारंभ करने से पहले साधना क्या है एस सच व्हाट इज स्पिरिचुअल प्रैक्टिस और तो उसके बारे में कुछ ना कुछ हमको को इंफॉर्मेशन होना चाहिए। तो अभी यह शरद महाराज का जैसा है कि जे हमारी यह उत्तर पक्ष पूर्व पक्ष इस तरह की जो पद्धति है शंकराचार्य के समय से चली आ रही है और उससे भी पहले कि यह डायलेक्टिक्स यदि कोई भी सब्जेक्ट समझाना है तो एक आपका आपके सामने प्रथम तो उसका मुख्य बिंदु क्या है वह आपके सामने प्रस्तुत किया जाएगा। फिर उसका विरोध में सामने वाला क्या कहता है वह आपके सामने रखा जाएगा। फिर विरोध क्या है? उसका एक उत्तर दिया जाएगा। तो यह प्रश्नोत्तरी के माध्यम से या तो एक डिबेट के माध्यम से आपके सामने यह सब कुछ रखा जाता है। तो यह प्रश्नोत्तरी भी एक मेथड है कि किस तरह से गुरु शिष्य संवाद होता है उसके माध्यम से आप कुछ सीख सकते हैं। और यह जो डायलेक्टिक्स जो है अह डिबेट यह डिबेट के माध्यम से आर्गुममेंटेशन के माध्यम से भी जब दो पक्ष अपना-अपना पॉइंट रजू करते हैं तो वो प्रति सामने वाले को पॉइंट को काटने के लिए अपना जो पॉइंट रखते हैं फिर उसका पॉइंट काटने के लिए सामने वाला जो पॉइंट रखेगा उससे भी मैटर जो है जो सब्जेक्ट मैटर जो कि वैसे तो काफी कॉम्प्लेक्स है किंतु इस तरह से पॉइंट काउंटर पॉइंट के माध्यम से हमारे सामने सहजता पूर्वक उसको रखा जाता है। तो यह दोनों मेथड है प्रश्नोत्तरी भी और यह डायलेक्टिक्स यानी कि यह उत्तर पक्ष पूर्व पक्ष यह दोनों मेथड इस चैप्टर में शरद महाराज ने यूज की है। आप लीला कथामृत भी देखेंगे। तो कथामृत में भी देखिए कि सब तरह की मेथड्स जो है हमारे सामने रखी गई है। जैसे कि यह पहले तो है कि गुरु का प्रवचन। तो एक प्रवचन यानी कि ठाकुर सीधा-सीधी हमको कह देंगे कि कौन-कौन से मुख्य बिंदु है आध्यात्मिक जीवन के। तो, यह तो एक हो गया। दूसरा एक मेथड हो गया कि यह जो कठिन आध्यात्मिक विषय है, कोई कांसेप्ट है कि यह एक कांसेप्ट को समझाना है तो उसके लिए उपमा के माध्यम से उस कांसेप्ट को हमारे सामने रखा जाता है। तो इस तरह की यह कांसेप्ट उपमा यानी कि ये एनालॉजी या सिमाइल जिसको कि इंग्लिश में कहते हैं। कांसेप्ट एंड एनालॉजी। कांसेप्ट एंड एनालॉजी। इस तरह से ठाकुर हमको यह समझाते हैं। उसके बाद में प्रश्नोत्तरी भी है। कथामृत में आप देखेंगे कि मास्टर महाशय है या कोई ब्राह्म भक्त है या ऐसा कोई है जो कि ठाकुर को प्रश्न करते हैं कि क्या गृहस्थ जीवन में भी आध्यात्मिकता हम ला सकते हैं कि नहीं? गृहस्थ जीवन में भी क्या ईश्वर प्राप्ति हो सकती है कि नहीं? तो ठाकुर उसका उत्तर देते हैं। तो वह प्रश्नोत्तरी भी है और डिबेट भी है। ठाकुर कभी-कभी इन दोनों को लगा देते हैं। यह नरेंद्र को और यह गिरीश घोष को उसके दोनों के बीच में यह ध्वंध युद्ध छेड़ देंगे। या तो फिर यह मास्टर महाशय है और नरेंद्र है। इन दोनों के बीच में यह डिबेट लगा देंगे। या तो फिर यह गोपाल की मां है अोरमणि देवी और नरन यानी कि जिनका कि वाइडली कंट्रास्टिंग व्यू पॉइंट होता है इन कंट्रास्टिंग व्यू पॉइंट को ठाकुर सामने सामने ले आते हैं। इससे क्या होगा कि हम सबको सीखने का मौका मिलेगा। तो यह जो जितने भी यह मेथड्स ऑफ लर्निंग है, मेथड्स ऑफ टीचिंग है, यहां पर भी यह साधक और साधना चैप्टर में शरद महाराज यूज करते हैं। पहले तो उत्तर पक्ष पूर्व पक्ष के माध्यम से समझा दिया कि क्यों यदि शरद महाराज कहते हैं कि ठाकुर की साधना का विवरण प्रारंभ करने से पहले भारतीय हिंदू शास्त्र में सनातन धर्म में साधना क्या है? उसकी एक रूपरेखा प्राप्त कर दी जाए तो फिर उसके विरोध में विरोध पक्ष क्या कहता है कि ऑलरेडी जो हम हिंदू हैं ऑलरेडी हजारों सालों से यह सब पुस्तकें पढ़ते ही आ रहे हैं। इसमें नया क्या है जो कि आप बिना मतलब का इस किताब में नया क्या डालने वाले हैं। साधक या साधना के बारे में बिना ठाकुर की जीवनी का विवरण है। जिसके लिए ग्रंथ की रचना की गई है तो ठाकुर की जीवनी ही प्रारंभ कर दीजिए। अननेसेसरी आप फिर से जो 10,000 साल 20,000 साल की साधनाओं का विवरण जिसके बारे में इनफ किताबें रचित हो गई है। इनफ ग्रंथ उसके वो हो गए हैं। उसका फिर से आउटलाइन देने की क्या जरूरत है? तो फिर शरद महाराज उसके उत्तर में कहते हैं कि हां यह बात सही है कि भारत में साधना के बारे में हिंदू सनातन धर्म में आध्यात्मिक जिसको कहेंगे उपासना उपासना के बारे में बहुत कुछ विवरण है। जितने भी योग है कर्म योग, ज्ञान योग, भक्ति योग, राज योग इन सब के बारे में विषद रूप से अत्यंत विस्तृत रूप से वर्णन अवश्य है। किंतु आधुनिक मनुष्य के मन में साधना को लेकर के कुछ-कुछ सीरियस मिसकसेप्शन प्रवेश कर गए हैं। आजकल मिसकसेप्शन क्या है? जैसे देखिए

आज के समय में धर्म और अध्यात्म के बारे में गलत धारणाएँ

मेरा किसी के साथ में वार्तालाप हो रहा था। किसी ने मुझे कहा कि आज का जो यंग जनरेशन है उनको धर्म में इंटरेस्ट नहीं है। तो उनको धर्म में लाने के लिए क्या किया जाए? तो मैंने उत्तर दिया कि देखिए हमारी ओर से तो यही प्रार्थना रहेगी कि वह जहां पर है वहीं खुश रहे। अननेसेसरी आपको धर्म या आध्यात्मिक जीवन में आने की कोई आवश्यकता नहीं। क्योंकि क्या होता है पता है? ज्यादातर लोग जो कि धर्म या अध्यात्म के रास्ते पर आते हैं, वह संसार के किसी ताप से दग्ध होकर के संसार में किसी संकट का सामना करके यहां पर आते हैं कि चलो यह सांसारिक संकट है। उसका कोई ना कोई सॉल्यूशन हमको भगवान के पास में से मिल जाएगा। ईश्वर की आराधना करेंगे तो संसार के ताप से जो हम दग्ध हो रहे हैं वहां पर हमको शीतल छाया प्राप्त होगी बोलकर के यहां पर आते हैं तो ऐसा कहना कि आप लोग धर्म में आए और इसके लिए प्रार्थना करना यह तो ऐसा हो गया कहना कि आपके संसार में कष्ट हो इसके लिए हम प्रार्थना करते हैं संसार में कष्ट होगा तभी आप यहां पर आएंगे एक फेमस घटना है गांधी जी को एक बार कहीं पे बुलाया गया। जैसे गांधी जी उस समय फेमस थे तो बड़े बहुत सारी संस्थाओं के जो कार्यक्रम होते थे उनको निमंत्रण मिलता था। तो एक संस्था में उनको कार्य सभापति का पद ग्रहण करने के लिए बुलाया गया। उस संस्था के जो यह थे वहां पर संस्थापक वगैरह वे लोग कह रहे हैं कि हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि हमारी संस्था फले फूल है। बहुत इसका विस्तार हो। बहुत लोग यहां पर आए। तो ऐसा सब बोल रहे थे। तो गांधी जी ने खड़े होकर कहा कि यह क्या पगों जैसी बातें कर रहे हो? यह संस्था है अनाथ आश्रम यानी कि अनाथ बच्चों और यह विधवाओं के लिए आप भगवान से यह प्रार्थना कर रहे हैं कि बहुत ज्यादा बच्चे अनाथ हो, बहुत सारी स्त्रियां विधवा हो जिससे कि आपकी संस्था फैले। इस तरह की प्रार्थना मत कीजिए। तो यहां पर भी ऐसा है लड़कों को या तो लोगों को धर्म की ओर लाने में प्रॉब्लम यही है कि हम जब ऐसी प्रार्थना करेंगे कि यह लोग धर्म की ओर आए तो इनडायरेक्टली हम ऐसा कह रहे हैं कि इनको संसार में कष्ट मिले तभी तो यह लोग यहां पर आएंगे। बहुत कम लोग होते हैं जो कि आध्यात्मिक क्यूरियोसिटी एक फिलॉसोफिकल जिज्ञासा वृत्ति या तो फिर यह एक ईश्वर के प्रति प्रेम या तो फिर भीतर में से जन कल्याण की इच्छा यह सब एक अंतः से प्रेरित होकर के यहां पर आने वालों की संख्या बहुत कम रहती है। तो ऐसे लोगों को अवश्य जिनके जीवन में क्रिटिकल टाइम पर एक इंटरवेंशन स्पिरिचुअल इंटरवेंशन होना चाहिए। तो वह जैसे ही हो गया तो उनके भविष्य की दिशा चेंज हो जाएगी और वह धर्म अध्यात्म स्पिरिचुअलिटी उपासना इसकी ओर ईश्वर के प्रति प्रेम आत्म जिज्ञासा इसकी ओर आगे बढ़ेंगे। किंतु और बहुत सारे लोगों के जीवन में होता है कि एस सच धर्म के प्रति कोई आकर्षण नहीं किंतु एक भय रहता है। दो चीजें होती है। या तो ऑलरेडी कष्ट आ चुका है। संकट आ चुका है संसार में और इसका समाधान खोजने के लिए भागवत कथा वगैरह में जाते हैं। या तो फिर भय रहता है दूसरों को देखकर के कि उसके जीवन में संकट है तो मेरे जीवन में भी आएगा। बेटर है कि पहले से ही मैं यह सब चीजों के लिए प्रिपरेशन कर दूं। तो जो भी है भय के माध्यम से अध्यात्म यह चीज जो है वह ठीक है। आप इस तरह से भी आइए डज नॉट मैटर। ठाकुर और स्वामी जी का उदाहरण हमारे सामने है। दोनों के पिताजी का बड़ी ही कम उम्र में मृत्यु हुआ और इसकी वजह से दोनों के युवा जीवन में जो एक संताप और शोक प्रकट हुआ उसने उनके आध्यात्मिक भविष्यत जीवन को गढ़ने में बहुत बड़ी सहाय की। तो इस बात से कोई यह नहीं कहता कि संसार में संकट आता है बोलकर के आप धर्म की ओर ना आइए। किंतु मेरा जो एक लिमिटेड पॉइंट था उस सज्जन को कहने का कि हमारी ओर से यही प्रार्थना रहेगी कि उनको अध्यात्म धर्म की ओर ना आना पड़े। संसार उनका इतना सुखरूप हो। किंतु यहां पर जो हमारा जो पॉइंट था

साधना के बारे में भ्रांत धारणाएं फैलने का कारण क्या है

शरद महाराज का कि आजकल धर्म और अध्यात्म के बारे में बहुत सारी भ्रांत धारणाएं फैल रही है। इसको दूर करने के लिए यह जो 10,000 साल 20,000 साल की भारतीय आध्यात्मिक यात्रा है, उसका एक आउटलाइन हमारे सामने प्रस्तुत कर रहे हैं। तो यह क्यों भ्रांत धारणा प्रवेश होती है? इतने हजारों हजारों सालों की यह जो हमारी आध्यात्मिक संपद है, आध्यात्मिक धार्मिक ग्रंथ है, यह इतने रचना होने के बाद में भी आज बहुत सारे लोगों के मन में एक भ्रम क्यों प्रकट होता है? कि धर्म क्या है? अध्यात्म क्या है? धर्म या अध्यात्म एक क्रिया विशेष है। क्रिया विशेष का अनुष्ठान करने से आपको कुछ फल प्राप्ति हो जाएगी। एक पर्टिकुलर जगह पर जाकर के आप इस तरह की विधि करेंगे तो आपको यह प्राप्त हो जाएगा। यह देवता उपदेवता है उनको शांत करने के लिए ग्रहों को शांत करने के लिए आप यह कुछ कीजिए तो फिर आपके संकट दूर हो जाएंगे। इस तरह की भ्रमित धारणाएं समाज में सब समय व्यापित क्यों रहती है? उसका रीजन है कि बहुत सारे लोग धर्म और अध्यात्म की ओर संकट जब होता है जीवन में तभी आते हैं और फिर आने के बाद में उनका यह लक्ष्य नहीं रहता कि ईश्वर के प्रति शुद्धा भक्ति या तो अनंत शाश्वत निर्मल आत्मज्ञान उसको प्राप्त करें। उनका लक्ष्य यह रहता है कि कुछ ना कुछ करके कैसे भी कुछ करके हमारा जो संकट है हमारे सर के ऊपर जो मंडरा रहा है वह दूर हो जाए। संकट के बादल सर जाए। यह उद्देश्य लेकर के आते हैं। तो इस उद्देश्य वालों के लिए हमेशा यह उपासना का रास्ता कि इंद्रिय संयम है। त्याग तपस्या डिसिप्लिन अनुशासित एक जीवन है। मन शांत स्वच्छ निर्मल करना है। उपासना करनी है। निष्काम कर्म करना है। हृदय में करुणा प्रकट करनी है। लोगों के प्रति द्वेष भाव नहीं रखना है। सुबह शाम नियमित रूप से गुरु प्रदत्त पद्धति के माध्यम से उपासना करनी है। जप ध्यान करना है। पूजा पाठ करना है। स्वाध्याय करना है। सत्संग करना है। यह सब चीजें ना उनको लगता है कि अरे बाप रे यह सब करके चरित्र को पुनः गठन करने को जाएंगे तो पता नहीं कितने जन्म जन्मांतर चले जाए। इससे बेटर है कि कुछ ना कुछ शॉर्टकट आजमा करके आने आते हुए सामने प्रकट हुए संकट को दूर कर दे। और यह तो एक टेंपटेशन रहता है। दूसरा बड़ा उनको डर क्या रहता है पता है? जो भी कोई एक सीरियस टीचर के पास जाएगा ना अध्यात्म के उसके सामने जाकर यदि पूछेगा कि अच्छा आप लोग जो कहते हैं वो मैं करने को फिर भी तैयार हूं। चलिए कुछ ना कुछ जन्म जन्मांतर दे दिए मैंने स्वामी जी की वो कहानी है ना कि एक दिन स्वामी जी पता नहीं कौन से मूड में थे वरा नगर की ही वो घटना होगी शायद यानी कि स्वामी जी की प्रवरज्या के पहले की ही घटना है मोस्ट प्रोबेबबली तो एकाएक स्वामी जी ठाकुर पे नाराज हो गए और ठाकुर के बारे में इधर-उधर की बातें करने लगे कि इसी की वजह से मेरा यह जन्म बर्बाद हो गया। इस उन्हीं की वजह से मैंने घर छोड़ा। अभी मेरे सर के ऊपर में इतने मतलब घर का भी प्रॉब्लम है। पता है कि वह उनकी मां और भाइयों और बहनों को बिना घर के रहना पड़ा था। क्योंकि उनका जो ओरिजिनल घर था वह दूसरों ने उसको हड़प कर लिया था। तो फिर यह घर का भी एक प्रॉब्लम था। मामला मुकदमा चल रहा था। कोर्ट केस का। यहां पे भी मठ की आर्थिक अवस्था इतनी अच्छी नहीं थी। स्वामी जी बीच-बीच में बार-बार सीरियसली बीमार हो जाते थे। तो यह सब जो भी है अब स्वामी जी एकाएक इस तरह की कुछ बातें करने लगे तो गुरु भाइयों को बड़ा दुख हुआ कि जिस ठाकुर ने नरेंद्र को इतना बड़ा किया है जिस ठाकुर ने हमको इतनी आध्यात्मिक शांति बख्शी है इस इसी ठाकुर के बारे में नरेंद्र ऐसी बातें कर रहा है तो अभी नरेंद्र इमीडिएटली समझ गया स्वामी जी समझ गए कि गुरु भाइयों को दुख हुआ है वह इस तरह की बातें करते हैं तो इमीडिएटली उन्होंने बात को घुमा लिया क्या कहा भले ना ठीक है ना जन्म जन्म जन्मांतर की तो हमारी यात्रा है ना कोटि-कि जन्म आए हैं आएंगे जाएंगे इतना तो हमारे पास में इतने सारे जन्म है तो चलो एक जन्म उस पागल बामुन को दे दिया पागले पागला बामून को एक जन्म दे दिया कौन सी बड़ी बात है ऐसा करके स्वामी जी ने बात को घुमा लिया तो यहां पे भी यदि कोई पहले तो जो संकट से ग्रस्त होकर के आध्यात्मिकता की ओर आते हैं आध्यात्मिकता की ओर पहली तो दृष्टि यह रहेगी कि शॉर्टकट आजमा करके यदि कुछ मिल जाता है तो प्राप्त कर लें। फिर थोड़े से डीपर थिंकिंग वाले लोग होते हैं। वे लोग आकर के हमको पूछेंगे यदि कोई एक सीरियस टीचर होगा सिंसियर टीचर उसको जाकर के यदि यह लोग पूछेंगे कि अच्छा चलिए आप जो कहते हैं कि कुछ जन्म दे दिए। चलो दे दिए। कोटि-कोटि जन्म है। कुछ जन्म उपासना के लिए दे दिए। जो आप कह रहे हैं इंद्रिय संयम भी करेंगे। मन को संस्कारों को स्वच्छ निर्मल पवित्र भी करेंगे सब करेंगे। चलिए किंतु क्या इसके माध्यम से जो हमारा संकट है वह क्या दूर हो जाएगा? तो पता है कैसा डेंजरस उत्तर मिलता है कि यह सब करने से आपको ईश्वर के प्रति प्रेम प्राप्त होगा। वह संसार का संकट जो है वह तो वैसे का वैसा ही रहेगा। वो फिर ईश्वर की इच्छा है। सुदामा जैसे भगवान कृष्ण के पास आए। अभी उन्होंने जाकर के ना तो यह कहा कि मेरे घर में यह संकट है ना ही यह कहा कि आप मुझे सहाय कीजिए। बस मित्र के साथ में प्रेम से रहे। जब वापस आए तो भगवान कृष्ण की कृपा से उनको जितने भी संकट थे सब दूर हो गए। बड़ा सा महल था। बीवी बच्चे बड़े आराम से लग्जरी में रह रहे थे। सब कुछ मिल गया था। किंतु भगवान कृपा ना करते तो क्या होता? ऐसा भी हो सकता है। तो भगवान ठाकुर कहते हैं ना मां है इच्छामई। तो ये इच्छामई की इच्छा होगी तो संकट दूर हो भी जाएंगे। ना होगी तो मां कहेगी इसको और थोड़ा सा संकट में डालो और मेरे प्रति थोड़ी सी भक्ति जागृत हो। तो ऐसा कभी मत सोचिए कि उपासना करके आपके सांसारिक संकट दूर होंगे। तो यह लोग और भी बेचारे डर जाते हैं। एक तो है कि शॉर्टकट इस्तेमाल करना चाहते हैं। दूसरा है कि चलिए उपासना करके भी यदि संकट दूर हो जाए तो भी ऐसी एडवाइस मिलती है कि उपासना कीजिए। शुद्ध निर्मल प्रेम के लिए शरणागति के लिए उपासना कीजिए। इंद्रिय संयम के लिए उपासना कीजिए। ज्ञान भक्ति वैराग्य ईश्वर के पास में यही मांगना है। नहीं कि रोटी कपड़ा मकान तो बेचारा और भी डर जाता है कि इतना मेहनत किया फिर भी सामने कुछ नहीं मिल रहा है। तो ये सब मिलाकर के जो भ्रांत धारणाएं हैं उस भ्रांत धारणाओं को भंग करने के लिए कुछ आध्यात्मिक जीवन के बेसिक कुछ पॉइंट से शरद महाराज हमारे सामने रखते हैं। वह सब हमने देख लिया है। अभी हम सीधा

साधना का चरम फल है सर्वभूत में ईश्वर दर्शन

प्रश्नोत्तरी के माध्यम से जो ठाक यहां पे जो शरद महाराज ने प्रश्नोत्तरी की है उसको हम पढ़ लेते हैं थोड़ा सा ऑलरेडी हमने एक प्रश्न पढ़कर के उसका काफी डिस्कशन हमने किया है। अभी दूसरा प्रश्न है यहां पर वो प्रश्न पढ़कर के उसके बारे में डिस्कशन प्रारंभ करेंगे। किंतु यह दूसरे प्रश्न से पढ़ने की वजह हम पहले प्रश्न से ही प्रारंभ करते हैं। जिससे क्या होगा? यह जो पूरा जो पॉइंट है मैं एक बार पढ़ ही लेता हूं पूरा पॉइंट जिससे कि क्या है हमारा रिवीजन भी हो जाएगा और फिर यह जो प्रश्न प्रारंभ होता है तो प्रश्न के बारे में डिटेल डिस्कशन भी कर लेंगे तो यह पॉइंट क्या है क्या कहते हैं शरद महाराज साधनार चरम फल सर्वभूते ब्रह्म दर्शन साधना का चरम फल क्या है सर्वभूत में ब्रह्म दर्शन ठाकुर बोलते सर्वभूते ब्रह्म दर्शन बा ईश्वर दर्शन शेष काले कथा ठाकुर कहते थे सर्वभूत में ब्रह्म दर्शन या ईश्वर दर्शन है अंतिम बात अर्थात कि साधना की चरम उन्नति प्राप्त होगी तब यह दर्शन या तो यह अनुभूति हमें प्राप्त होगी साधना चरम उन्नति ते उहा मानवे भाग्य उपस्थित होए साधना की चरम उन्नति पे ही वह मनुष्य के भाग्य में उपस्थित होती है हिंदू सर्वोच्च प्रामाण्य ग्रंथ शास्त्र वेदोपनिषद वही कथाई बोलिया था केन हिंदुओं के सर्वोच्च प्रामाण्य शास्त्र है वेद उपनिषद यही बात कहते हैं शास्त्र बोले जगत स्थूल सुखो चेतन अचेतन जहां किछु तुम देखते पते छो ईंट काठ माटी पार मानुष पशु गाछ पाला जीव जानोवर देव उपदेव शकल एक अद्वय ब्रह्म वस्तु शास्त्र कहते हैं जगत में स्थूल सूक्ष्म चेतन अचेतन जो कुछ तुम तुम देख पाते हो ईंट मिट्टी यह लकड़ी पत्थर मनुष्य पशु पेड़पधे जीव जानवर देव उपदेव यह सब एक ही अद्वय वस्तु है ब्रह्म वस्तु के ही तुम नाना रूपे नाना भावे देखते छो सुनते छो स्पर्श घण आवाद करते छो ब्रह्म वस्तु को ही तुम विभिन्न रूप से विभिन्न रूप में देख रहे हो सुन रहे हो स्पर्श कर रहे हो घणित कर रहे हो और आस्वाद कर रहे हो ग्रहण करना अर्थात कि नाक से उसकी सुगंध प्राप्त करना और आस्वाद करना अर्थात कि जीभा से उसको टेस्ट करना ताहा के लया तुम तो शकल प्रकार दैनंदिन व्यवहार आजीवन निष्पन्न होलेले ओ तुम ताहा बुझते ना पारिया भाभीते छो भिन्नभिन्न वस्तु ओ व्यक्ति सहित तुम ओ रूप करते छो इसी के साथ में तुम्हारा सब तरह का दन दीन व्यवहार रहे। इसको तुम आजीवन निष्पन्न कर रहे हो। किंतु फिर भी तुम समझ नहीं पा रहे हो कि भिन्नभिन्न वस्तु और व्यक्ति के साथ तुम यह सब करते हो। यह थोड़ा सा क्रिप्टोग्राफिकल लैंग्वेज किंतु अर्थ बड़ा स्पष्ट है कि जीवन भर हमारा यह जो सेंसरी इनपुट होता है वो चाहे स्पर्श के माध्यम से हो टेस्ट के माध्यम से हो स्मेल के माध्यम से हो कि साउंड के माध्यम से हो कि विजन के माध्यम से हो जो भी सेंसरी इनपुट है वह हमको दिखता तो है विभिन्न चीजों का। यह मेरी नजर के सामने माइक दिख रहा है। यह मेरी नजर के सामने यह मोबाइल दिख रहा है। यह मेरी नजर के सामने यह दीवाल दिख रही है। यह मेरी नजर के सामने मेरे वस्त्र दिख रहे हैं। किंतु ना ही यह माइक है। यह ब्राह्मण ही है। यह मोबाइल भी ब्राह्मण है। यह वस्त्र भी ब्राह्मण है। यह कमरा भी ब्राह्मण है। यह पृथ्वी भी ब्राह्मण है। पूरा जीवन जन्म जन्मांतर से हमारा सेंसरी इनपुट जो है हमसे झूठ बोल रहा है। यह सेंसरी इनपुट हमको भ्रम में डाल रहा है। भ्रमित कर रहा है। यह जो इसको प्रोसेस करने वाला जो ब्रेन जो है हमारा या तो ब्रेन में गड़बड़ है या तो सेंसरी इनपुट में गड़बड़ है। जहां पर भी आप दोष का टोपला डालना चाहे डाल सकते हैं। किंतु यदि सही सही में हमको आध्यात्मिक जीवन की चरम उन्नति प्राप्त होगी तो हम सही सही में इस माइक को माइक के रूप में नहीं ब्राह्मण के रूप में ही देखेंगे। इस चश्मे को चश्मे के रूप में नहीं ब्रह्मन के रूप में ही देखेंगे। इस वस्त्र को वस्त्र के रूप में नहीं ब्रह्मन के रूप में ही देखेंगे। हमारा इस जगत के प्रति पूरा जो एटीट्यूड है, जगत के प्रति जो व्यवहार है, संपूर्ण रूप से बदल जाएगा। मेरा दुश्मन हो कौन सकता है? दुश्मन भी तो मेरा ही आत्म स्वरूप है। मेरा विरोधी कौन हो सकता है? वो विरोधी भी तो मेरा आत्मस्वूप ही है। मेरा आत्मीय कौन हो सकता है? मैं यदि ऐसा कहूं कि यही एक मेरा भाई है और बाकी के जो पृथ्वी की जो 700 करोड़ की पपुलेशन है इसके साथ में मेरा कोई नाता नहीं। मेरा तो बस एक ही भाई या एक ही बहन है। यही एक मां पिताजी है। यही नाना नानी चाचा चाची है। यही मेरे संतान पुत्र पुत्रियां है। इसके अलावा मेरा आत्मीय और कोई नहीं है। तो यह भ्रम भी नष्ट हो जाएगा। खंडित हो जाएगा। पूरी पृथ्वी जितने भी वृद्ध है सब नाना नानी देखने लगेंगे। चाचा चाची दिखने लगेंगे। जितने भी बच्चे हैं अपने ही पुत्र पुत्रियां पोते पोतियां के रूप में देखने लगेंगे। हमारे समवयसी है। हमारे ही भाई-बन के रूप में वो दिखने लगेंगे। यह जो हमारा हृदय जो है हृदय विशाल से विशालतम होता जाएगा। पूरे विश्व ब्रह्मांड को अपने प्रेम में, स्नेह में, करुणा में और मित्रता में आवृत्त कर लेगा। यह पूरा जो ट्रांसफॉर्मेशन है यह है हमारा आध्यात्मिक जीवन। कथा गुली शूनिया आदर मने जे संदेहो परंपरा उदय होया थाके एवं ओ शकल निरसने शास्त्र जहां बोलिया थाके प्रश्नोत्तर छले ताहार मोटा मोटी भापटी पाठक के इखाने बोलीले उहा सहजे हृदयंगम हो बार संभावना अभी यह बात सुनकर के स्वाभाविक है कि हमारे मन में जो संदेह परंपरा का उदय होगा और उस संदेह परंपरा को शांत करने के लिए निरसन करने के लिए शास्त्र जो कहते हैं इस डिफिकल्ट कांसेप्ट्स को हम प्रश्नोत्तर के माध्यम से उसका जो भाव है वह सहज रूप से पाठक के सामने रखने के लिए हम प्रयास करेंगे। जिसकी वजह से यह भाव हमको हृदयंगम होगा। हमारे हृदय में आसानी से प्रवेश करेगा। भ्रमवा अज्ञान वशत सत्य प्रत्यक्ष हो ना अज्ञान अवस्था पिया अज्ञान कारण बुझा जाए ना अभी यह जो टॉपिक क्या है भ्रम या तो फिर अज्ञानता की वजह से सत्य प्रत्यक्ष नहीं होता अज्ञान अवस्था में रहकर के अज्ञान का कारण समझ में नहीं आता। यह ऐसा हो गया। यह जो है ना खास करके कि अज्ञान अवस्था में रहकर के अज्ञान का कारण समझ में नहीं आता। यह एक स्टेटमेंट जो है आज का जो पूरा साइकट्रिक जो प्रैक्टिस है उसका यह फंडामेंटल फाउंडेशन है। यह जितने भी साइकट्रिस्ट है उन सबकी इनकम का सोर्स यही एक स्टेटमेंट है। आप यदि किसी एक साइकेट्रिस्ट के पास में जाएंगे तो वह आपके साथ में क्या करेगा? आपको बिठा करके वह आपको बहुत सारे प्रश्न करेगा। आप यदि कहेंगे अभी कुछ ही समय पहले मेरा एक स्टूडेंट के साथ में वार्तालाप हो रहा था। तो ये स्टूडेंट ने मुझे एक प्रश्न किया कि यह जो फोबिया है या तो जो फियर है इसका सॉल्यूशन क्या हो सकता है? पता है लोगों को बहुत तरह के फोबिया होते हैं। अब किसी को चलती ट्रेन में बैठने का डर लगता है। किसी को हाइट का डर लगता है। किसी को बंद कमरे का डर लगता है। किसी को अंधेरे का डर लगता है। ये सब चीजें मैंने अपने जीवन में भी देखी है। मेरे एक रिलेटिव थे। वो कभी कार में नहीं बैठते थे। क्यों? गाड़ी चलती है तो पता नहीं उनको वोमिट जैसा होने लगता है कि सर चकराने लगता है। एक बार यह बंद जगह का जो फियर जो होता है ना तो अभी मैं एक आश्रम में था तो आश्रम में लिफ्ट था तो ग्राउंड फ्लोर से फर्स्ट फ्लोर सेकंड फ्लोर तक जाने के लिए। तो एक वृद्ध साधु उसमें ऊपर जा रहे थे तो लिफ्ट में तो एकाएक बीच में लाइट बंद हो गया। इलेक्ट्रिसिटी कट हो गया और वह लिफ्ट में फंस गए। तो फंस गए। अभी प्रॉब्लम था इनको कि यह बंद जगह का और यह अंधेरे का फोबिया था। इसी जगह में उनको एकाएक सांस अटक रही है। माने इस तरह से उनको यह अनुभूति होती थी। तो अब इम आप इमेजिन कर सकते हैं। वैसे तो वृद्ध साधु है। लिफ्ट में बंद छोटी सी जगह है। उसमें जा रहे हैं। लाइट चली गई। तो ऐसे जगह भी छोटी और फिर अंधेरा यानी कि कंप्लीट अंधेरा। तो एक क्षण को तो उनको जो अटैक आया ना कि सांस रुक जा रही है। मतलब मृत्यु की कतार पर आ गए हैं। ऐसा वो दरवाजा पटक-पटक करके चिल्ला रहे हैं। बचाओ बचाओ ऐसा करके एक क्षण के लिए तो उनको लगा कि बस मैं अभी यहां पर मर ही जाऊंगा। किंतु खैर कैसे भी करके ठाकुर ने थोड़ा सा उनको स्वस्थ किया। मोबाइल निकाल करके कॉल किया किसी को। भाई मैं लिफ्ट में फंस गया हूं। तो फिर सब लोग दौड़े-दौड़े आए। कैसे भी करके उनको बचा करके निकाला। वो जनरेटर चालू करके ना जो भी हो तो फिर वह बाहर आकर के ऐसा कह रहे थे कि एक क्षण के लिए तो मुझे ऐसा ही लगा कि मेरी सांस रुद्ध हो जाएगी और मैं वहीं पर मर जाऊंगा। मुझे खुद को एक हाइट का डर लगता है। मैं हमेशा कोई ऊंचाई वाली जगह पर जाने का अवॉइड करता हूं। तो यह सब फोबिया होते हैं हमारे जीवन में। तो इस फोबिया का क्या सॉल्यूशन है? कि एक स्टूडेंट ने मुझे यह प्रश्न किया। तो मैंने कहा देखिए कि यह मेडिकेशन है, साइकेट्रिक केयर है। इसके अलावा ऐसा तो कोई सॉल्यूशन नहीं है। वी हैव टू लर्न टू लिव विद इट। तो अभी क्या है पता है इस तरह का कोई प्रॉब्लम लेकर के जो कि फिजिकल प्रॉब्लम नहीं है जो कि मेंटल प्रॉब्लम है। साइकोसोमेटिक जिसको आजकल हम कहते हैं कि इस तरह का कोई सिचुएशन खड़ा हो जाए कि जिसका डर के मारे हमारे देह पे उसकी असर होने लगे। तो इस तरह के प्रॉब्लम लेकर के डॉक्टर के पास जाने से तो डॉक्टर क्या ज्यादा से ज्यादा दवाई देगा? बंद जगह का डर है, अंधेरे का डर है। इसकी कोई दवाई थोड़ी ना होती है। अभी आजकल हो भी सकती है। किंतु बेस्ट सॉल्यूशन है किसी साइकेट्रिस्ट के पास में जाकर ना जाना। फिर यह साइकेट्रिस्ट आपको 1000 क्वेश्चन करेगा। पूछेगा अच्छा आपके बचपन में इस तरह की घटना जो हुई पहली बार कब हुई? पहली बार आपको कैसे कब पता चला कि आपको बंद जगह का डर है। फिर यह सब रिलेशन बिठाना शुरू करेगा। क्या आपके जीवन में दूसरे कोई बड़े स्ट्रेस आ गए हैं कि इस स्ट्रेस को आपने सबकॉन्शियसली यह बंद जगह के साथ में एसोसिएट कर दिया है। किसी की लाइफ में डिवोर्स होता है। अभी डिवोर्स बड़ा ही ट्रोमेटिक एक ये है। इवेंट है। तो डिवोर्स के साथ में इस तरह से बंद जगह का डर बिठा दिया है आपने। सब सब सबकॉन्शियसली एसोसिएट कर दिया है क्या इस तरह से इतने सारे प्रश्न करेंगे और हमारा जो उत्तर आता जाएगा उस उत्तर का ही वो अनुसंधान करके हमारे मन में यह जो ग्रंथि बैठ गई है कॉम्प्लेक्स बैठ गया है उसको काटने का प्रयास करेगा। अभी हमारा देखिए इस पूरी चीज का देखिए साइकेट्रिस्ट ऐसा नहीं है कि वो हमारे बारे में नॉलेज और कहां से लाता है। हां उसको बेसिक थ्यरीज पता होती है कि साइकोलॉजी किस तरह से काम करती है। किंतु हमारे बारे में जो नॉलेज है वो तो हम ही को पूछ करके लाता है और हमारा प्रॉब्लम यह है कि जब तक कोई हमको प्रश्न करके हमारे मन में से यह सब बातें ना निकाले तब तक हम लोग अपना सेल्फ एनालिसिस नहीं कर सकते हैं। तो यह जो एक स्टेटमेंट है कि अज्ञान अवस्था में रहकर के अज्ञान का कारण समझ में नहीं आता। यह एक स्टेटमेंट ये साइकेट्रिस्ट की इनकम का एक सोर्स है। क्योंकि यदि हम सभी लोग अभी मेरे साथ में यह फोबिया है तो इसका सॉल्यूशन लाने के लिए यदि मैं सेल्फ एनालिसिस प्रारंभ कर दूं तो ना ही मुझे साइकेट्रिस्ट के पास में जाना है। ना ही यह साइकेट्रिस्ट की मेडिसिन लेना है। मैं अपना ही सेल्फ डायग्नोस करके सेल्फ एनालिसिस करके एनालिसिस करके और सेल्फ ट्रीटमेंट कर सकता हूं। किंतु मेरा जो अज्ञान जो ऐसा है ना यह अज्ञान चीज ही ऐसी है कि जो कि हमको अपने ओर देखने से रोक रही है। यह सेल्फ रिफ्लेक्शन यह सेल्फ रिफ्लेक्शन एक बहुत बड़ा पावर है जो कि हम लोग समझ नहीं पाते। हम लोगों की यह जो इंद्रियां बाहर की ओर जाने के लिए जो यह उनको प्रैक्टिस हुई है यह जो अभ्यस्त है बाहर की ओर दौड़ने के लिए इसका प्रॉब्लम यह होता है कि हम सीरियसली सेल्फ एनालिसिस सेल्फ रिफ्लेक्शन ऐसा कभी हम करते नहीं है। एक्चुअली यह जप ध्यान की जो मेथड है ना यह जितने भी सीरियस आप राजा महाराज हैं, महापुरुष महाराज है उन सबका यह जो ध्यान के बारे में इंस्ट्रक्शंस पढ़ेंगे ना तो आपको हमेशा कहेंगे जप और ध्यान समाप्त होने के बाद में कुछ समय आप अपने आसन पर ही बैठे रहिए और अपनी यह जो मानसिक अवस्था है उसका अवलोकन करते रहिए। रिफ्लेक्ट अपॉन योर ओन सेल्फ। एनालाइज योर ओन सेंटीमेंट्स इमोशंस। मैंने कल क्या किया? आज मेरा क्या प्लान है? इसके साथ में बात हो रहा था तो मैंने किस तरह से रिएक्ट किया? इस तरह का जो मुझे ड्यूटी दिया गया था तो मैंने किस तरह से इस ड्यूटी का निर्वाहन किया। क्या मुझे मंदिर में काम दिया गया है? तो मैं क्या इसको पनिशमेंट के रूप में ले रहा हूं कि मैं इस भाव में ले रहा हूं कि यह मेरे जीवन का बहुत बड़ा ओपोरर्चुनिटी है कि श्री रामकृष्ण देव की साक्षात सेवा करने का मौका मिला है। मैं किस एटीट्यूड से अपना काम कर रहा हूं? क्या माइंडसेट लेकर के मैं लोगों के साथ बिहेव कर रहा हूं? क्या मेरा होप और एस्पिरेशन है भविष्य के प्रति? क्या मैं निराशा में डूब गया हूं? पहले से ही मैं होपलेस हो गया हूं कि मेरा भविष्य अंधकारमय है या तो फिर एक उज्जवल भविष्य के लिए मेरे मन में आशा है। क्या है मेरा एटीट्यूड जीवन के प्रति? पॉजिटिव है कि नेगेटिव है? तो यह सब सेल्फ रिफ्लेक्शन करना है। इस सेल्फ रिफ्लेक्शन करने के बाद में हमको सेल्फ मॉडिफिकेशन करना है। यदि कल का ही पर्सनालिटी मेरा आज चलता रहा तो फिर ध्यान करने के बाद में, जप करने के बाद में, उपासना करने के बाद में मुझे कोई फल नहीं मिलेगा। जप ध्यान उपासना का अल्टीमेटली आशय तो वही है कि हम लोग उपासना कितना समय करते हैं। ट्रेडिशनल जिसको कहा जाता है पूजा पाठ है, सत्संग है या तो फिर स्वाध्याय है, जप है, ध्यान है, स्मरण मनन निध्यासन है, महावाक्य विचार है। यह सब हम कितना टाइम करते हैं? ज्यादा से ज्यादा एक या दो घंटा आजकल के जीवन का जो परिस्थिति है, दो घंटा यदि दिन में कर पाए तो बहुत बड़ी बात हो गई। तो यह 2 घंटा यदि उपासना करने के बाद में बाकी के जो 22 घंटे हैं वो 22 घंटे में उपासना का जो फल है वह सिप इन यदि नहीं होगा वो वहां पर परकोलेट नहीं होगा। बाकी के 22 घंटे को ट्रांसफॉर्म नहीं करेगा तो यह 2 घंटा एक घंटे की उपासना किस काम की रही मेरी तो इसके लिए हमेशा यह सेल्फ रिफ्लेक्शन और यह सेल्फ मॉडिफिकेशन सेल्फ इंप्रूवमेंट सेल्फ डेवलपमेंट जो भी शब्द आप यूज कर लीजिए किंतु यह सेल्फ इवोल्यूशन डेली डेली होना चाहिए। तो इसीलिए यहां पर महाराज जी कहते हैं कि अज्ञान अवस्था में रहकर के अज्ञान का कारण समझ में नहीं आता है। हमको किसी गुरु के पास में साइकेट्रिस्ट के पास में जाना होगा। वह हमारा साइको एनालिसिस करेंगे। हमारे जो फोबियाज है, कॉम्प्लेक्सेस है, ग्रंथि है, भ्रम है, वह हमारे सामने हमारे मन में से ही निकाल करके हमारे सामने प्रेजेंट करेंगे। कहेंगे कि देखिए आपके माइंड में यह यह सब अंकट बंकट कचरा पड़ा हुआ है। इसको आप क्लीन कीजिए तो आपका भविष्य का जीवन शांत, स्वस्थ, शुद्ध और खुशी हंसीखुशी से भरा हुआ जाएगा।

हमें सर्वभूत ब्रह्म दर्शन क्यों नहीं हो रहा है? कारण है भ्रम या अज्ञान

अभी प्रश्न है ओ आमादे प्रत्य ना केनो भ्रम में ही यह बात हमको प्रत्यक्ष क्यों नहीं हो रही है भ्रम में ही रहकर के भ्रम में है यह समझ में क्यों नहीं आ रहा है वो ठाकुर कहते हैं ना ठाकुर ने के स्वामी जी किसने कहा कि जिसके सर के ऊपर में भूत सवार हुआ है वह कभी यह स्वीकार नहीं करेगा कि मेरे सर के ऊपर में भूत सवार है वो ऐसा ही कहेगा कि मैं अच्छा ही हूं मैं ठीक ही हूं तो उत्तर तोमरा भ्रम पड़ो उत्तर क्या है? तुम लोग भ्रम में पड़े हो। जतो खण ना ओ भ्रम दूरीभूत होए ततो खण केमोन कोरिया ओ भ्रम धरी ते पारबे जब तक यह भ्रम दूरीभूत नहीं होता है। जब तक यह भ्रम चला नहीं जाता है तब तक कैसे करके यह भ्रम को समझ पाओगे धर पाओगे अर्थात कि समझ पाओगे कि मैं इस भ्रम में पड़ा हूं। यथार्थ वस्तु और अवस्थार सहित तुलना को हमरा बा भ्रम धरिया था कि यथार्थ वस्तु और अवस्था के साथ में तुलना करके ही हम बाहर का और भीतर का भ्रम समझ सकते हैं। इसका अर्थ क्या है? अर्थ बड़ा स्पष्ट है कि देखिए मैं एक साधक को देखता हूं। एक ज्ञानी संत को देखता हूं और समझता हूं कि इनका जो संसार के प्रति एटीट्यूड है, सबके प्रति करुणा है, सबके प्रति मित्रता है, सबके प्रति स्नेह है, सबके प्रति दया है। वह मैं एक देखता हूं। और फिर मैं यह देखता हूं कि मेरे भीतर में सब समय एक तरह का स्ट्रेस है। सब समय दूसरों के प्रति द्वेष की भावना है। सब समय दूसरों के प्रति ईर्ष्या जेलसी है। सब समय लोगों का शोषण करके मैं अपना पर्सनल कुछ बेनिफिट कैसे प्राप्त कर लूं। यह मेरा एक एटीट्यूड है। तो, जब तक मैं अपने आसपास में ऐसे ही लोगों को देखता रहूंगा, तब तक तो मैं यह समझ ही नहीं पाऊंगा कि मेरे साथ में फंडामेंटल कुछ प्रॉब्लम है। किंतु जैसे ही एक संत को देखा, संत का जीवन चरित्र, व्यवहार, उसका ये एटीट्यूड, उसका यह जो बिहेवियर मेरे से संपूर्ण रूप से भिन्न देखा। तब कहीं जाकर के तो मुझे समझ में आएगा कि वह मेरे से इतने अलग क्यों है? क्योंकि मैं जो हूं भ्रम में पड़ा हूं या तो फिर मैं कुछ गलत कर रहा हूं। मुझे अपने को इंप्रूव करने की जरूरत है। देखिए यह जीसस को क्रुसिफाई क्यों किया गया? यह जो सोक्रेटिस है उसको जहर क्यों दे दिया गया? क्योंकि समाज में ज्यादातर लोग या तो फिर कहेंगे कि जिन लोगों ने क्रुसिफाई किया या जहर दिया वे लोग इस तरह के तमस अज्ञान में आवृत्त थे। इस तरह के भोग विलास में डूबे हुए थे। इंद्रियों के सुख को चरितार्थ करने के लिए वह इतना वह लगे हुए थे। पूरी प्राण शक्ति दे रहे थे कि एक शुद्ध सात्विक महात्मा उनकी नजर के सामने आता है तो इंस्टिंक्टिवली डर जाते हैं। यह भी एक रिएक्शन है। कोई-कोई होगा कि ऐसा महात्मा सामने आने से उनके श्री चरण के सामने साष्टांग प्रणत हो जाएगा। और ऐसे भी लोग होंगे जिनको डर लग जाएगा कि यह जो महात्मा है उनकी वजह से उनका और मेरा कंट्रास्ट देखकर के लोगों को समझ में आ जाएगा कि मैं यह जो ऑथॉरिटी बनकर के बैठा हूं यह ऑथॉरिटी किसी काम की नहीं है। तो फिर मेरे मुझे करना क्या चाहिए? इस तरह के महात्मा को मार देना चाहिए। उनका मर्डर कर देना चाहिए। यह लोग चले जाएंगे तो संसार की जो गति है तमस की ओर जो हमेशा से चलती आ रही थी है और होने वाली है तो वैसे ही चलती रहेगी। ऐसे लोगों का इस तरह का थिंकिंग होता है। तो हमको इस तरह का नहीं होना है कि महात्मा को देखकर के पहले ही मन में हिंसा का ही विचार आए। महात्मा को यदि देखते हैं तो उनके प्रति श्रद्धा और विनम्रता ही हमारे मन में प्रकट होना चाहिए। तभी हमारे लिए कोई होप है। यह हिंदू धर्म में देखिए कि हम लोग कितने लकी हैं। किसी ने स्वामी जी जब अमेरिका थे तो किसी ने स्वामी जी को पूछा कहा कि देखिए बुद्ध का जीवन कौन सा बड़ा बुद्ध ने कौन सी बड़ी कोई बहादुरी दिखा दी है। वो तो वृद्ध अवस्था में उनका मृत्यु हुआ। उन्होंने भले ही चाहे आध्यात्मिक सिद्धि भले ही प्राप्त की हो। उनके देह को तो कोई कष्ट नहीं मिला। उनका तो वृद्धावस्था की वजह मृत्यु हुआ। तो हमारे जीसस की ग्रेटनेस देखिए कि क्रुसिफाई किया गया। फिर भी अपने चेहरों अपने वदन पे अपने होठों पर वही प्रार्थना है कि भगवान सबको क्षमा कर देना। उनको पता नहीं है कि वे लोग क्या कर रहे हैं। वे लोग अज्ञ है, अज्ञानी है। तो स्वामी जी कहते हैं कि देखो भाई वह हमारी हिंदू संस्कृति की महत्ता है। महानता है कि भगवान बुद्ध ने हमारे ही मंदिर, हमारे ही देवता, हमारे ही ब्राह्मण, हमारे ही पंडित, हमारी ही प्रथाएं, हमारे ही धर्म ग्रंथ, वेद उसका हमारे सामने क्रिटिसाइज किया, विरोध किया, निंदा की। इसके बावजूद हमने उनको वृद्धावस्था तक उनको जीवित रखा। वृद्धावस्था की वजह से मरे हैं। हमने उनको मर्डर नहीं कर दिया। तो यह तो हिंदू धर्म की महानता है। यह तो स्वीकार करो। ऐसा क्यों कहते हो कि भगवान बुद्ध की महानता नहीं है। क्योंकि उनका मर्डर नहीं हुआ और मर्डर होने के समय में उनके वदनों पर उन्हें मर्डर करने वालों के प्रति आशीर्वाद था। इस तरह का जो रॉन्ग कंक्लूजन है उल्टा अर्थ क्यों निकालते हो? तो हमारे लिए भी जो सही-सही हिंदू होगा वह सही महात्मा को देखकर के मर्डर करने का हिंसा करने का प्रयास नहीं करेगा। जैसे कि वह रोम में हुआ था। ग्रीस में ग्रीस में हुआ था। ये सोक्रेटिस को मारा था और यह गैलीली में हुआ था। जहां पर जीसस का मर्डर हुआ था। हमको उनके जैसा नहीं होना है। हमको वो ट्रेडिशनल हिंदू की तरह होना है। यदि यह किसी के भी हृदय में पवित्रता देखता है तो वह पवित्र हृदय वाला व्यक्ति आकर के यदि मेरी भी निंदा करता है। मेरे भी दोष और त्रुटि मेरी नजर के सामने उपस्थित करता है कि देखो तुम्हारे मन में यह सब दोष और त्रुटियां है तो फिर मुझे उनको स्वीकार करके अपने जीवन को पुनः गठन करना है। नहीं कि मुझे उनके प्रति हिंसा प्रगटित करनी है। तो ये यथार्थ वस्तु और अवस्था के साथ में तुलना करने से ही हम हमारे बाहर का और भीतर का भ्रम पकड़ सकते हैं। पूर्वोक्त भ्रम धरते होइले ओ आमाद तुम्हार ओ रूप ज्ञानेर प्रयोजन यदि यह इस तरह का भ्रम तुमको पकड़ना होगा तो यह सर्वभूत में ईश्वर दर्शन ही आध्यात्मिक जीवन की सर्वोच्च सिद्धि है। इस बात को तुमको समझना होगा। तुमको इस ज्ञान का प्रयोजन है। अच्छा दूसरा प्रश्न है ओई भ्रम हो बार कारण की इस भ्रम होने का कारण क्या है? एवं कब हो ते बा आमादे ए भ्रम आशिया उपस्थित हो कब से यह भ्रम आकर के हमारे मन में उपस्थित हुआ। अच्छा अभी यह जो है इस प्रश्न में आगे जाए कि यह भ्रम होने का कारण क्या है और कहां से यह भ्रम उपस्थित हुआ? पहले तो यह थोड़ा सा देख लेते हैं कि बाहर का और भीतर का जो भ्रम यह जो एक स्टेटमेंट शरद महाराज ने दिया है इसका अर्थ क्या है? देखिए कि यह भ्रम के बारे में या तो फिर अज्ञान के बारे में या तो फिर अविद्या के बारे में हमारे शास्त्र में बहुत कुछ लिखा गया है। बहुत सारा टेक्निकल डिस्कशन हमारे सामने उपस्थित है। किंतु मैं कुछ कहानियों के माध्यम से ही ठाकुर मां स्वामी जी की ही कहानियों के माध्यम से यह भ्रम क्या है? वह बताने का प्रयास करता हूं। किंतु यह कहानियां बहुत सारी है और आज टाइम ऑलमोस्ट समाप्त हो गया है। एक काम करते हैं। यह सब कहानियां है भ्रम के बारे में अविद्या अज्ञान के बारे में। उसका प्रारंभ अभी हम कल से करते हैं। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु।

वराहनगर मठ के प्रति पड़ोसियों का संदेह

मतवार बुद्धि का वही अर्थ हुआ कि मैं भ्रम में हूं और मैं भ्रम स्वीकार नहीं कर रहा हूं। मुझे ऐसा लगता है कि मैं ही सही हूं और बाकी सब गलत है। यह वो यहां पे वराह नगर मठ में ये जो सब लड़के लोग इकट्ठा होकर रहते थे तो ये जो आसपास के जो लोग थे ना मठ के आसपास जो पड़ोसी थे उन लोगों को बड़ा आश्चर्य होता था। यह लड़के हैं इतने शारीरिक रूप से इतने सशक्त हैं, मेंटली इतने कैपेबल है और इतना यह कष्ट करके रहते क्यों हैं? फिर दूसरा तो ये तो एक देखा कि ये लोग कष्ट स्वीकार करके यहां पर रहते हैं। अच्छे घर से आए हैं। अच्छे खानदान के हैं। और उस समय तो नाती जाति का काफी चलता था। तो यह ब्राह्मण का लड़का है, जमींदार का लड़का है, यह वकील का लड़का है। ऐसे लोग यहां पे आकर क्यों रहते हैं? यह तो एक प्रश्न होता है। दूसरा इतना हंसी-खुशी क्यों रहते हैं? यह एक दूसरा समझ में नहीं आता। तो इन लोगों का थ्यरी क्या था पता है कि वरह नगर मठ में ना उनको कहीं पर डटा हुआ यह सोना मोहर मिल गया होगा तो यह सोना मोहर निकाल कर के ये लोग बड़े आनंद से रह रहे हैं। तो इसको कहते हैं मतवार बुद्धि और समझ में ही नहीं आ रहा है कि आध्यात्मिक जीवन क्या है?

प्रश्न: क्या यह सच है कि आध्यात्मिक व्यक्ति को वास्तव में कोई भय या चिंता नहीं होती?

नहीं ठाकुर मां स्वामी जी का जीवन तो स्पष्ट है। ठाकुर छोटी-छोटी बातों में एशियस हो जाते थे। मां काली के पास में दौड़ के चले जाते थे। स्वामी जी का ही देखिए कि अमेरिका गए उनके ऊपर अटैक के बाद अटैक हो रहे हैं और वह लेटर लिख रहे हैं इंडिया में कि आप लोग यह कमेटी का मीटिंग करके एक रेज़ोल्यूशन पास करके मुझे यहां पे भेजिए तो क्या है कि मैं इन लोगों को दिखा सकूं कि आई एम ऑथेंटिक रिप्रेजेंटेटिव ऑफ हिंदूइज़्म। तो ये लोग कर नहीं रहे हैं। तो फिर स्वामी जी नाराज होकर के कैसी वो गाली देते हैं। वह चिट्ठी लिखते हैं वो आलास सिंघा को, मठ को। तो यह क्या है पता है कि अब जैसे कि गुजराती में कहते हैं ना कि सांप गया ना लिसोटाया साधु का गुस्सा है पानी के ऊपर में रेखा की तरह जल के ऊपर में रेखा की तरह एक सेकंड में वो मुच जाएगी वो बाकी के लोगों के मन में गुस्सा होता है तो पत्थर की लकीर माने वो रह गया तो उसके संस्कार भी रह जाएंगे तो उनकी ये जो ए्जायटी या तो फियर या नर्वसनेस या तो इवन एंगर या पानी के ऊपर ऊपर में लकीर की तरह है कि वह सामयिक परिस्थितियों की वजह से आता है किंतु साथ में ही चला जाता है। ना ही उससे लोगों को नुकसान होगा ना ही इनके मन के ऊपर में संस्कार छोड़ेगा। मां का ही फेमस कि वह पागली मामी मां को मारने के लिए आई तो मां ने श्राप दे दिया। अभी जैसे मैंने कहा था कि किसी एक बड़े ही किसी एक बड़े साधक ने यह बात कही है अह रिसेंटली कि यह जो पूरा इंसिडेंट है ना वही गलत है। ऐसा होना ही नहीं चाहिए। जिसको निर्विकल्प समाधि प्राप्त हुई जो जगदंबा स्वयं है वह श्राप कैसे दे सकती है? मैं कहता हूं कि वह श्राप दिया है। दैट इटसेल्फ इज अ मतलब यह उदाहरण है। म दिस इज एग्जांपल या तो कहेंगे दिस इज द रीज़न कि व्हाई शी इज़ जगदंबा। अदरवाइज तो यह पत्थर की मूर्ति होकर के रह जाती। ठाकुर स्वामी जी ने क्या कहा? बड़ा सुंदर बात कही है। गाय कभी झूठ नहीं बोलेगी। तो किंतु गाय गाय ही रहेगी। यह दीवाल कभी चोरी नहीं करेगी। तो दीवाल दीवाल ही रहेगी। आदमी झूठ भी बोलता है, चोरी भी करता है। किंतु साथ में ही आदमी ब्रह्म ज्ञानी भी हो सकता है। तो यह सब जो है दो अवस्थाएं हैं। जब ज्ञान प्राप्त होने से पहले यह गुस्सा है, अहंकार है। मन के ऊपर में गहरी छाप छोड़ता है। संस्कार बना देता है। और दूसरों को नुकसान करता है। ज्ञान प्राप्त होने के बाद में यह सब जैसे ठाकुर कहते हैं ना कि एक विद्या का अहम है, ज्ञान का अहम है। यह लेकर के रहना है। वो लोटा जो है वह सोने का हो गया है। अभी उसको आप सोने पे अभी ऐसा नहीं है कि पीतल का लोटा है तो वही गंदा होगा। सोने का नहीं होगा। किंतु पीतल के लोटे को आपको वह लगा करके घसना पड़ेगा। इमली लगा करके घसना पड़ेगा। उसको स्वच्छ करना है। और सोने के लोटे के ऊपर में धूल गिरती है तो आप पानी में डाल दीजिए। फट करके वो फिर से स्वच्छ हो जाएगा। ऐसा है। देखिए जो आर्टिकुलेशन की बात की ना यह बहुत अच्छी है। अब मैं अपना एग्जांपल बताता हूं। अभी मुझे वह वॉकिंग करने का एक तो हैबिट है। वह तो फिजिकली तो चाहिए भी फिटनेस के लिए। मैं क्या करता हूं? कभी मॉर्निंग वक के लिए जाता हूं। कभी इवनिंग वक के लिए तो अभी तो मुझे कितना नियरली 50 इयर्स होने को हुए। 30 सालों से यंग यंग जब होते हैं स्टडी करते हैं तो ये वकिंग फोकिंग का कांसेप्ट नहीं रहता है। थोड़े बड़े होते हैं तो ये सब चालू होता है सीरियसली। मैं मिनिमम 25 टू 30 इयर्स से वॉकिंग कर रहा हूं। डेली वन आवर समथिंग लाइक दैट। कल कल शाम को मैं वॉकिंग कर रहा था। यहां पे क्या है? समुंदर का किनारा है। तो म बड़ा ही खूबसूरत नजारा है। और समुंदर के सामने ही हमारा लाइब्रेरी है। तो लाइब्रेरी की टेरेस बड़ी लंबी है। सुंदर जगह है। तो वहां पर मैं वॉक करता हूं। तो इस एक और सनसेट दिखाई देता है। इवनिंग के टाइम पे एक और यहां पे यह समुंदर का किनारा समुंदर दिखाई देता है। वेरी ब्यूटीफुल एटमॉस्फियर। अभी क्या है? कल मैं वॉक कर रहा था। टहलते टहलते एकाएक पता है मेरे मन में क्या विचार आया कि इतने सालों से जो मैं वॉकिंग कर रहा हूं, टहल रहा हूं। इवनिंग मॉर्निंग के टाइम पे बहुत बार ऐसा होता है कि कोई एक विचार आकर के मन में बैठ जाता है और मन को भ्रष्ट कर देता है। वह घूमता ही रहेगा। घूमता ही रहेगा। कहां यह वॉकिंग का जो पीरियड है अकेले रहना, एक आत्मचिंतन करना, सेल्फ रिफ्लेक्शन करना कहां यह एक ब्यूटीफुल टाइम है जो कि मेरे भविष्य के सेल्फ इवोल्यूशन के लिए हेल्पफुल होगा। वो नहीं और यह विचार मेरे मन में बैठकर के ऐसा एक धमा युद्ध खड़ा करता है कि यह ए्जायटी बढ़ जाती है। ऐसा लगता है बीपी बढ़ जाएगा। बेटर है कि मैं रूम में जाकर कुछ पढ़ना लिखना शुरू कर दूं। रेदर देन कि यहां पर वॉकिंग करता रहूं। ऐसा होता था कभी-कभी। किंतु मैं कल वॉकिंग कर रहा था तो मैंने सडनली एक पाया कि इस तरह के जो विचार वकिंग करने के टाइम में आकर के एक भयानक एक ये खड़ा करते हैं मेरे माइंड में उसकी वजह आजकल जो होता है ना वॉकिंग कर रहा हूं तो बस मैं वही कि कभी बादल को देखता हूं। कभी यह पंखियों को उड़ता देखता हूं। कभी यह समुंदर की लहरों को देखता हूं। मेरा माइंड में और कुछ नहीं है। अदर देन कि मैं क्लास में क्या बोलना है या तो फिर यह कुछ फिलॉसोफिकल क्वेश्चन को लेकर के मैं सोच रहा हूं। इसके अलावा और कुछ उस समय नहीं आ रहा। तो मुझे लगा कि दिस इज वन इवोल्यूशन। यह एक मेरी एक प्राप्ति है। समथिंग वेरी कंक्रीट। अभी आत्मदर्शन, आत्म साक्षात्कार, ईश्वर दर्शन, ठाकुर प्राप्ति, ठाकुर लोक प्राप्ति वो कब होगा, कहां होगा पता नहीं। बट दिस इज वन कंक्रीट अचीवमेंट कि हम इस तरह का कुछ करते हैं कि जब हमारा माइंड फ्री है। अब ड्राइविंग करते हैं, स्नान करते हैं, खाना खाते हैं, वॉकिंग करते हैं। समथिंग लाइक दैट कि हमारा माइंड ब्लैंक है। शरीर काम कर रहा है। उस समय ना मेरा मन इस तरह के घिनौने विचारों से भर नहीं जाता। इस तरह के विचारों से नहीं भर जाता जो कि मेरी एंग्जायटी है। मेरा स्ट्रेस बढ़ा दे। वो मेरा मन वही करता है जो कि मैं चाहता हूं या तो फिर जनरली पीसफुल रहता है। सो दैट इटसेल्फ मुझे लगता है कि आर्टिकुलेशन यदि मैं आज मेरे यंगर टाइम मशीन लेकर के मैं यदि अपने यंगर जो एज है उसके साथ में यदि मैं बात करने का मौका मिले तो मैं उसको कहूंगा कि देखो कि दिस इज वन थिंग दैट यू आर वर्किंग हैज़ अचीव्ड इन अ 20-30 ईयर फ्यूचर जिसको आजकल ये लाइफस्टाइल डिसीज कहते हैं ना स्ट्रेस है एंग्जायटी है ये सब चीजों से आप अवश्य मुक्ति प्राप्त कर लेंगे शरणागति आ जाती है ना शरणागति आ जाती है ना मां इतनी बार-बार बीमार होती थी मां का हमने देखा दक्षिणेश्वर आती है तो गंगा का पानी गंगा का आबोहवा उसकी वजह से बीमार होती है वहां से बचने के लिए जय राम बाटी जाती है जय राम बाटी में संसार का कष्ट पिताजी का देहांत हो गया है मां इतना कष्ट करके वो खाना पका रही है बच्चों के लिए तो वहां पर पैसा नहीं है तो ना बेचारी मां जय राम भाटी में शांति से रह पाएगी ना दक्षिणेश्वर में रह पाएगी तो ऐसा कष्ट देखने के बावजूद मां क्या कहती है? मैं जब आंख बंद करके ईश्वर का चिंतन मनन करती थी उस समय ऐसा लगता था हृदय में जैसे कि आनंद का एक पूर्ण घट स्थापित हुआ है। तो यह आनंद का पूर्ण घट सोच के देखिए कि मां की जगह हम होते हैं। दक्षिणेश्वर के दिन कष्टदायक दिन पूरा एक छोटी सी वहां पर नौबत में रहना जयराम बाटी जाएगी खानेपीने का प्रॉब्लम माने मां के भाइयों को घर में रखने की बजाय उनकी श्यामा सुंदरी देवी को अपने भाई बच्चों को रिलेटिव्स के वहां पे भेज देना पड़ा था। कौन सी मां ये डिसीजन लेगी कि मेरा लड़का मेरे साथ में नहीं रहेगा और रिलेटिव्स के वहां पे रहेगा। क्यों? कि मैं अब अपने लड़के को खिला ही नहीं पा रही हूं। तो ऐसा डिसीजन जिस मां ने लिया होगा सोच के देखिए कि संसार की अवस्था क्या होगी। वहां पर भी किंतु मन में शांति है। यहां पर भी मन में शांति है।

प्रश्न: हमें किसी भी स्थिति में संतुष्ट रहना चाहिए, है ना?

देखिए संतुष्ट रहना चाहिए। ऐसा मुंह से बोलने से होगा नहीं। आपको साधना करके संतुष्टि प्राप्त करनी होगी। अदरवाइज मैं हजार लाख बोलता रहूं। अहम ब्रह्मास्म अहम ब्रह्मास्म में मैं ही रहने वाला हूं। उससे ज्यादा कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। यह इंद्रिय संयम है, उपासना है, तितक्षा है, स्वाध्याय है, जप ध्यान है, स्मरण मनन है। यह साधना करनी होगी। साधना करने के बाद में संतुष्टि प्राप्त होगी। मैं संतुष्टि हवा में से प्रकट नहीं कर सकता। साधना के माध्यम से ही वह मुझे प्राप्त होगी।

प्रश्न: माँ शारदा ने पगली मामी को श्राप दिया था। किसी ने कहा कि माँ श्राप नहीं दे सकती, यह घटना हमारी पुस्तक में सही ढंग से नहीं लिखी गई है। कृपया इसे समझाएँ।

देखिए हमारा डिस्कशन क्या हो रहा था कि आध्यात्मिक जीवन में कोई सिद्धि प्राप्त होगी तो हमारा बाह्य वर्ताव है। क्या संपूर्ण बदल जाएगा? वह शायद संपूर्ण रूप से ना भी बदले क्योंकि जगत में रह रहे हैं तो जगत का जो है सब उसके अनुसार कभी-कभी हम रिएक्ट कर भी लेते हैं किंतु मन के भीतर में इस तरह के कर्म कोई छाप नहीं छोड़ेंगे। अब जैसे मैं किसी के ऊपर नाराज हो गया। मैंने उसको गाली फाली दे दिया। अभी मेरे साथ में प्रॉब्लम यह होगा कि वो जो मैंने उसकी निंदा की है उसको डांटा है। उसके साथ में जो झगड़ा किया है। मेरे संस्कार की छाप मेरे मन पर छोड़ देंगे। जबकि यह सिद्ध महापुरुष होते हैं। आप कहेंगे क्या यह सिद्ध महापुरुष कभी किसी को डांटेगा नहीं। कभी गुस्सा नहीं होगा। नहीं ऐसा नहीं है। गुस्सा होगा। डांटेगा भी। किंतु यह संस्कार उनके मन पर कोई छाप नहीं छोड़ेंगे। इस अर्थ में यह मां का उदाहरण मैंने दिया था।

प्रश्न: क्या हमें जगदम्बा से से किसी भी चीज़ के लिए प्रार्थना करनी चाहिए की नहीं ?

हां बिल्कुल। किंतु प्रार्थना हमको क्या करनी है? दैट इज अ क्रिटिकल डिफरेंस। प्रार्थना तो करनी ही है। पर प्रार्थना क्या करनी है? स्वामी जी का फेमस उदाहरण गए थे रोटी कपड़ा मकान मांगने के लिए मांग के आ गए ज्ञान भक्ति वैराग्य सो प्रार्थना करनी है ज्ञान भक्ति वैराग्य के लिए नहीं कि रोटी कपड़ा मकान के लिए रोटी कपड़ा मकान उसकी इच्छा होगी तो दे देगी ये ठाकुर ने कहा ना कि मोटा भात का पपड़े और अभाव थकवेना अर्थात कि वही मां काली ने ठाकुर के मुंह से बुलवा दिया कि तुम्हारे परिवार जनों को यह सामान्य रहने पीने की अभाव नहीं होगी तो वो बोला अपनी इच्छा से बोला प्रेम से बोला कि स्वामी जी ने मांगा नहीं है स्वामी जी ने मांगा ज्ञान ज्ञान भक्ति वैराग्य तो वो खुश होकर के सामने एक्स्ट्रा वरदान दे दिया कि फाउ बोनस वो जो बाय वन गेट वन फ्री इस तरह से किंतु यहां पे भी सेम ना गुरु भाइयों ने जाकर के मां को नहीं कहा कि मां आप कुछ व्यवस्था कर दीजिए। मां ने अपने से करुणा से परवश होकर के कहा। सो मां की करुणा पर विश्वास रखना है किंतु मां से मांगना नहीं है। अभी जैसे ये हरिश्चंद्र भगवान की इच्छा हुई कि उसको दे कष्ट देखते हैं कहां तक उसकी धर्म की दौड़ जाती है। तो ऐसा कष्ट दिया। आखिर में श्मशान में खड़े हैं। पत्नी को दासी के रूप में बेच के आए हैं। वही पत्नी वह अपने बच्चे का शव लेकर हाजिर होती है। खुद वहां पर वह मुर्दा जला जलाने वाले का काम कर रहा है। पत्नी ने कहा कि आपके बच्चे का शव है उसको अग्निदाह दिलवाइए। वो कहते हैं जब तक पैसा नहीं देंगे तब तक नहीं होगा। तो यहां तक उसकी परीक्षा करवा दी। तो फिर भगवान भी कभी-कभी कर देंगे परीक्षा कि यह मुंह से तो बोलता है कि मुझे रोटी, कपड़ा, मकान नहीं चाहिए। ज्ञान, भक्ति, वैराग्य ही चाहिए। तो उसकी दौड़ कहां तक जाती है देखे तो ऐसा भी हो सकता है ऐसा

प्रश्न: हर किसी को एक ही तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है - स्वास्थ्य, करियर, परिवार, धन आदि, तो फिर इनके समाधान के लिए प्रार्थना क्यों न की जाए?

अब पूरी सभी प्रार्थना कर लीजिए ना कोई इसमें कोई गलत कुछ नहीं है ठाकुर का खुद का उदाहरण ठाकुर कहते हैं ना मास्टर महाशय को मैंने केशव के लिए डाब चीनी मांगा मान की मिन्नत की है सिद्धेश्वरी देवी के सामने डाब अर्थात कि नारी नारियल कोकोनट और चीनी मींस शुगर तो ये शुगर कोकोनट की म ये मिन्नत मानी है कि केशव ठीक हो जाए तो ठाकुर भी ऐसा नहीं कहते कि आप यह सब मिन्नत या प्रार्थना मत कीजिए। बात है कि सिंसियरिटी हमारी कहां पे है? क्या हम भगवान के पास में स्वास्थ्य के ही उद्देश्य के लिए जाते हैं कि भगवान के पास प्राइमरीली आए हैं आध्यात्मिकता के लिए। फिर बाकी सोच जो है तो भगवान से कहेंगे कि भाई आपको कि प्रभु आपको भजने में आपकी उपासना करने में यह सब बाधाएं हैं। आप दूर कर दीजिए। तो ऐसा सरल हृदय से मांगना कुछ गलत नहीं है। अभी नरेंद्र का इतना कष्ट था। ठाकुर लोगों को कहते घूमते थे कि नरेंद्र का घर में खाने पीने का कष्ट है। उसका नौकरी लगवा दीजिए। नरेंद्र नाराज हो जाता था। आप लोगों को ऐसा क्यों कहते हैं? तो ठाकुर बोलते भाई तुम्हारे लिए नहीं करूंगा तो किसके लिए करूंगा? केशव के स्वास्थ्य के लिए मिन्नत मानते हैं। उसका रीजन है। ना उसका रीजन है। नौकरी मिल गई तो फिर अध्यात्म मार्ग से भटक जाएगा। ठाकुर के माइंड में ये सब कैलकुलेशन बड़े क्लियर थे ना। [हंसी] सामयिक उपाय निकालना है। परमानेंट सॉल्यूशन नहीं लाना है नरेंद्र की नौकरी का। देखिए ठाकुर को पता ना हो कि नरेंद्र के पिताजी का मृत्यु होने वाला है। नरेंद्र को यह संकट होने वाला है। ऐसा संभव ही नहीं है ना। ठाकुर तो थे भविष्य दृष्ट। ठाकुर तो थे अंतर्यामी। उनको जो भविष्य जिस तरह से दिखता था सब उनकी नजर के सामने नक्शे की तरह स्पष्ट था और यदि ठाकुर चाहते तो उसको रोक भी सकते थे नारायण स्वयं है ईश्वर के अवतार है उनके लिए क्या असंभव है किंतु फिर भी जो विधि का जो विधान है उसमें उन्होंने कुछ होने नहीं दिया माने इधर-उधर नहीं करने दिया क्योंकि पता है कि नरेंद्र को कष्ट स्वीकार करना होगा तभी उसका जो हृदय है वह उसका जो लोगों की कष्ट के प्रति तभी उसका हृदय खुलेगा अदरवाइज नरन वाज़ एन इंटेलेक्चुअल वेस्टर्नाइज इंटेलेक्चुअल जो कि एक वेस्टर्न पंडितों को पढ़ता था और अपने एक जो एक रहता है ना कि एक क्या कहेंगे कि सेल्फ सेटिस्फाइड व्यक्ति था कि मेरा जो लाइफ है इट्स अ गुड इनफ राइट तो यह सब करके टू गो बिय्ड ये पिंजरा जो है संसार का तोड़ करके लोगों का कष्ट समझे एक वटवृक्ष बने विराट वट वृक्ष ठाकुर की भाषा में तो वो करने के लिए कष्ट में से तो गुजरना पड़ेगा यह जो स्टील को आप यदि कुछ करना है तो टपर तो करना पड़ेगा भट्ठी में डालकर ये जो जमीन में से जो निकालते हैं वह तो उसमें तो बहुत सारा कुछ मिला हुआ होता है तो उसको तो आप भट्ठी में डाल के उसको गलाना पड़ता है तभी वह प्यूरिफाई होता है तभी उसमें से आप कुछ तलवार बना सकते हैं बर्तन बना सकते हैं सो भ्ठे में डालकर के टपरिंग का जो प्रोसेस है उसमें से तो उसको गुजरना ही होगा हां वो ठाकुर ठाकुर को कैंसर हुआ तो मां तारकेश्वर गई थी हत्या देने के लिए तो वहां पर मंदिर में रात में वो मां पड़ी हुई है बिना खाए पिए तो एकाएक स्वप्न में एक आवाज सुनी जैसे कि बहुत सारी हांडियों को एक साथ में तोड़ देता है तो धड़ाम करके जो आवाज होती है वह सुनाई दी और फिर यह एक देवी वाणी सुनाई दी इस संसार में कौन किसका पति और कौन किसका क्या है तो जैसे मां के मन में इमीडिएटली वैराग्य प्रकट हुआ और मां वहां से वापस आ गई तो ठाकुर ने कहा क्या हुआ कुछ नहीं हुआ मुझे पता है कुछ होने वाला नहीं इस तरह की हत्या देने से क्योंकि लीला संवरण का समय आ चुका था। गुरु भाइयों को एकजुट करना था स्नेह के बंधन में। तो ओम