Skip to transcript
ClassesSaradakosh

Sri Ramakrishna Lila Prasanga ·

साधक भाव : Ch. 1 साधक और साधना || श्रीरामकृष्ण लीलाप्रसंग : स्वामी सारदानन्द रचित || 12 Feb 2026

मङ्गलाचरण

ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः श्री श्री रामकृष्ण लीला प्रसंग स्वामी शारदानंद जी महाराज द्वारा प्रणित भाग दो साधक भाव अध्याय एक साधक और साधना इसका आखिरी पॉइंट देख रहे थे कि किस तरह से इति इति मार्ग से अर्थात कि भक्ति मार्ग से निर्विकल्प समाधि प्राप्त कर सकते हैं। ऑलरेडी हमने देखा कि शरद महाराज

ईश्वर-प्राप्ति ही है साधक के जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य

कहते हैं कि भक्त जगत और जगत में स्थित सर्व वस्तु और व्यक्ति को ईश्वर के साथ में संबंध युक्त देखकर के अपना कर लेता। तो इसके भी कुछ उदाहरण हमने देखे थे और साथ में ही वह संबंध वह संबंध दर्शन करने के पथ में जो लोग अंतराय होकर के खड़े हैं उनको भक्त दूर परिहार करता है। अर्थात कि ईश्वर प्राप्ति के रास्ते में सर्वभूत में ईश्वर दर्शन के रास्ते में यदि कोई अंतराय प्रतीत होता है। यदि कोई बाधा प्रकट करता है तो भक्त उनको दूर कर देता है। अब जैसे कि कल ही हमने देखा था कि वह सब कि ईश्वर के लिए यदि कोई मां यह कहती है कि दक्षिणेश्वर मत जाओ। ठाकुर अपने एक भक्त को कहते हैं तो वह अविद्या रूपणी मां है। इस तरह की मां की बात ना भी सुने तो भी कोई दोष नहीं है। कल शाम को वो लड़का प्रश्न कर रहा था कि सर्व धर्मान परित्यज मामेकम शरणम व्रज जो भगवान कृष्ण कहते हैं। तो यहां पर वह कौन सा धर्म त्याग करने को कहते हैं। धर्म का अर्थ यूजुअली हम क्या करेंगे? सदाचार है, सत निष्ठा है, सतकर्म है, उपासना है। इन सबको तो जनरली हम धर्म के नाम पर पहचानते हैं। किंतु यहां पे जिस धर्म को त्याग करने को भगवान कृष्ण कह रहे हैं, वह सब धर्म है। जिस तरह से वेद में अपनी जो ट्रेडिशनल भारतीय संस्कृति में हमारे लिए जो रोल निश्चित किए गए हैं कि यह पति धर्म है। पति को इस तरह से आचरण करना है। यह पत्नी धर्म है। पत्नी को इस तरह से आचरण करना है। यह क्षत्रिय धर्म है। यह राज धर्म है। यह विद्यार्थी धर्म है। सभी के लिए कुछ ना कुछ धर्म ठीक किए गए हैं। कि विद्यार्थी को इसी तरह से आचरण करना है। समित पाणी वो जो अग्नि के काष्ट लेकर के गुरु के पास में जाएगा। गुरु के चरण में वंदन करेगा और दो हाथ जोड़कर के विद्याभ्यास करवाने की आज्ञा प्राप्त करेगा। विद्या प्राप्त करने की विनति करेगा। वह है विद्यार्थी का धर्म। जबकि गुरु का धर्म है जो ब्राह्मण है। यजन याजन अध्यापन यज्ञ भी करेगा, भिक्षा भी मांगेगा और अध्यापना भी करवाएगा, वेदों की शिक्षा भी देगा। तो यह सब धर्म है हमारे। किंतु यदि देखते हैं कि मुझे ईश्वर में संपूर्ण रूप से अभी शरणागति हो गई है तो फिर जो धर्म है मेरा विद्यार्थी यदि विद्याभ्यास त्याग करके ईश्वर के रास्ते पर जाए तो उसमें कोई दोष नहीं है। पत्नी जो है पति की सेवा छोड़कर के ईश्वर का नाम स्मरण करें तो उसमें भी कोई दोष नहीं है। जैसे कि मीराबाई और आप वृंदावन की गोपियों को देखिए। पति कहते हैं कि हमारी सेवा करो। गोपियां कहती है मीराबाई कहती है कि नहीं भगवान कृष्ण की सेवा ही हमारे लिए सर्वोच्च है। तो उन्होंने पत्नी धर्म का त्याग किया। यहां पर विद्यार्थी विद्यार्थी धर्म का त्याग करता है। विद्यार्थी धर्म का त्याग करने का सबसे बड़ा उदाहरण तो ठाकुर के खुद के जीवन में है। वो जो लाहा बाबू की पाठशाला में जाते थे। कहां वह विद्याभ्यास सीखेंगे ना कि नहीं वह पाठशाला से भाग करके वह माणिक राजा के अम्रकानन अर्थात कि केरी का बागान आम का बागान वहां पर चले जाते थे और पौराणिक नाटकों का अभिनय करते थे। तो ठाकुर खुद एक बड़े उदाहरण है कि वह विद्यार्थी धर्म का उन्होंने त्याग किया है। कनिष्ठ भ्राता का धर्म भी उन्होंने त्याग किया है। कनिष्ठ भ्राता है तो जष्ठ भ्राता की बात सुननी चाहिए। किंतु जब रामकुमार कहता है गदाधर को कि नहीं तुमको यह यह पूजा वगैरह सीख लो। विधि वगैरह सीख लो। लोगों के घर जाकर के यह सब करोगे तो दक्षिणा मिलेगी। तो ठाकुर स्पष्ट रूप से कहते हैं चाल कोला बांधा विद्याम शिको नाम जो विद्या सीख करके मुझे चावल और केला ही सिर्फ मिले दक्षिणा में इस तरह की विद्या मुझे नहीं सीखनी है। तो जिस तरह से विद्यार्थी धर्म का भंग किया। कनिष्ठ भ्राता का धर्म उन्होंने त्याग किया। विभीषण का भी वही उदाहरण भगवान राम की भक्ति की वजह से उन्होंने जष्ठ भ्राता रावण की बात अनसुनी कर दी थी। आज्ञा वहन नहीं की थी। तो देखिए कि ईश्वर प्राप्ति के रास्ते में यदि धर्म भी अपना अंतराय बनता है। माने कोई अविद्या रूपी कोई आ जाता है उसको तो छोड़ ही देना है। तो उसका तो त्याग ही कर देना है। किंतु साथ-साथ में ही धर्म का मुखौटा पहनकर के यदि कुछ अपने रास्ते में बाधा बने तो उसका भी त्याग करना है। यह बात हमने ऑलरेडी देखी। और इसके बाद में और एक बात शरद महाराज

श्रीरामकृष्ण की महावीर के प्रति अनुराग और ध्यान-तन्मयता

यहां पर लिखते हैं क्या कहते हैं इसके बाद में तदभिन्न इसके अलावा ईश्वर कोनो एक रूप प्रति अनुरागे ओ ध्याने तन्मय होवा एवं तारे प्रीति निमित्त सर्वकार अनुष्ठान कोरा भक्त आशु लोख होया था के ईश्वर के कोई एक रूप के प्रति अनुराग और ध्यान में तन्मय होकर करके अनुराग में और ध्यान में तन्मय होकर के और उन्हीं की प्रीति के निमित्त सर्व कार्य का अनुष्ठान करना भक्त का परम लक्ष्य हो पड़ता है। सर्वप्रथम तो ईश्वर का सर्वभूत में दर्शन करना है। एक दूसरा कि सर्वभूत में ईश्वर दर्शन करने के रास्ते में यदि कोई बाधा स्वरूप बनता है तो उनको दूर परिहार करना है। और तीसरा यही ईश्वर उनके कोई एक रूप के प्रति अनुगत होकर के अनुराग और ध्यान में तन्मय होकर के वही रूप के प्रति निमित्त सर्व कार्य का अनुष्ठान करना भक्त का परम लक्ष्य हो पड़ता है। देखिए यह ईश्वर का कोई एक रूप वो यदि वह रूप की आराधना करें या तो फिर उस रूप के भाव से अपने को तन्मय कर दे। ठाकुर का उदाहरण कि किस तरह से महावीर हनुमान की साधना उन्होंने की। दास्य भक्ति की महावीर हनुमान की दास्य भक्ति की साधना उन्होंने की। तो क्या कहते हैं इसके बारे में ठाकुर के ही कुछ वचन है कि जब वह दास्य भाव से महावीर हनुमान के भाव से अपने को भर के भगवान राम की उपासना करते थे तो जैसे कि श्री रामकृष्ण का देह मन सब कुछ जैसे कि महावीर हनुमान के भाव से उन्हीं की अंग भंगिमा से उन्हीं के जैसे शारीरिक लक्षणों से भरने लगा। देखिए यह किस हद तक तदाकार तादात्म हो जाता है। एक रूप हो जाता है। जब भक्त और भगवान एक रूप हो जाते हैं। तो जैसे वो इमिटेशन ऑफ क्राइस्ट यह जो किताब है स्वामी जी की बड़ी प्रिय है। मिडिल एजेस में जो क्रिश्चियन सेंट होते थे जो बहुत ही ज्यादा जीसस के भाव से भर जाएंगे तो उनके देह में स्टिग्माटा दिखाई देता था। स्टिग्माटा क्या है? जीसस को शूली पे क्रुसविद्ध किया गया। तो उनकी उनके हाथों में वो नेल्स मारे गए खिले मारे गए। वो क्रॉस के ऊपर में तो जब जो सेंट जो संत वहां के बहुत ही जीसस के भाव में उनके ऊपर में एक माने तदा एक रूप यदि हो जाएंगे तो होगा क्या? उनकी हाथों में भी इस तरह से घाव के निशान हो जाएंगे जैसे कि किसी ने उनके हाथ में खिले मार दिए हैं। तो उसको कहते थे स्टिग्माटा। स्टिगमाटा इज अ साइन कि कोई भी एक संत है संपूर्ण रूप से जीसस के भाव से ओतप्रोत हो गया है। यहां पर भी देखिए कि दास्य भक्ति की दास्य भाव की साधना करतेकरते ठाकुर इतने ओतप्रोत हो गए थे महावीर हनुमान के भाव से कि जैसे कि महावीर हनुमान के जो लक्षण थे सब उनके भीतर में प्रकट होना शुरू हो गए थे। ठाकुर अपने मुंह से उस अवस्था का वर्णन करते हैं। क्या कहते हैं? उस समय आहार विहार सब कुछ हनुमान की तरह करना पड़ता था। इच्छा करके करता था ऐसा नहीं अपने आप हो जाता था। पहने का कपड़ा जो है वह पूंछ की तरह बांध करके अपनी कमर पर लगा के रखता था। उछलउछल करके चलता था। फल मूल के अलावा और कुछ नहीं खाता था। और यही फल मूल उसमें भी उसका यह जो ऊपर का यह है स्किन है ऊपर का उसको काट करके या तो उसको चीर करके खाने की इच्छा नहीं होती थी। वैसे का वैसा ही खा लेता था। वृक्ष के ऊपर में बहुत समय अतिवाहित करता था और निरंतर रघुवीर रघुवीर बोलकर के गंभीर स्वर से चित्कार करता था। दोनों चक्षु दोनों नयन सर्वदा चंचल भाव धारण किए थे। जैसे कि महावीर का होता है। जैसे कि बंदरों का होता है। आंखें सब समय चंचल है। चंचल आंखों से ठाकुर की ही एक बात याद आई कि मंदिर में आप देखेंगे नॉर्थ इंडिया के बहुत सारे मंदिरों में बंदरों की उपस्थिति होती है। तो वैसे तो बहुत ही दौड़ा करते हैं, तोड़फाड़ करते हैं, धमाल करते हैं वगैरह-वगैरह। किंतु एकाएक आप कभी देखेंगे ना सब बंदर स्थिर होकर के बैठ गए हैं तो आपको लगेगा अच्छा चलो अभी दो मिनट के लिए तो स्थिर होकर बैठे हैं। हो सकता है कि कहीं वह महावीर का भाव प्रकट हुआ हो उनके भीतर में ना कि भगवान राम का दर्शन करते हो या तो फिर मेडिटेशन करते हो किसको पता तो ठाकुर कहते हैं ऐसा नहीं है। वह जो बंदर सब दो मिनट स्थिर होकर के बैठते हैं। इसके पीछे का सीक्रेट क्या है? वह यह प्लान करते हैं कि अभी इसके बाद में क्या तोड़फाड़ करना है? कहां उछल कूद करनी है? कहां वो मने तूफान खड़ा करना है तो यह सब प्लान करते हैं और जैसे ही प्लान ठीक हो गया तो जो दो घड़ी का मौन स्थिर होकर बैठे थे तो हुप करके कूदेंगे और फिर से यह सब तोड़फोड़ करना ये धमाल करना शुरू कर देंगे। सो ये देखिए तो बंदरों का स्वभाव ही है। चंचल होते हैं। तो यहां पे भी ठाकुर कहते हैं दोनों नयन हमेशा चंचल भाव धारण करके रहते थे। नयन इधर से उधर चंचल रूप से दौड़ते रहते थे। और आश्चर्य की बात

महावीर के प्रति अनुराग और ध्यान-तन्मयता से श्रीरामकृष्ण की पूँछ बढ़ने की कहानी - उत्क्रांतिवाद की चर्चा

है। मेरुदंड का आखिरी भाग 1 इंच बढ़ गया था। देखिए किस हद तक ठाकुर ने अपने को महावीर के भाव में ढाल दिया है कि इवोल्यूशन इटसेल्फ इज एक्सलरेटेड यूजुअली जो हमको पता है जो लोग इवोल्यूशन स्टडी करते हैं हजारों हजारों हजारों नहीं लाखों लाखों सालों पे यह जो फिजिकल ट्रेट है वह चेंज होती है। यह जो एप था एप में से यह जो आज का मॉडर्न होमोसेपियंस इवॉल्व हुआ तो वह जर्नी कितने 50 लाख साल ना कि 1 करोड़ साल ना कि इतना लगा होगा इस जर्नी को इससे कम की यह जर्नी नहीं है। किंतु यहां पर देखिए जो 50 लाख 80 लाख 1 करोड़ साल की जर्नी इवोल्यूशन की माने विदिन अ फ्यू डेज रिवर्स हो गई और उनकी पूंछ बढ़ना शुरू हो गई। ये समथिंग रियली कहते हैं ना कि इवोल्यूशन का जो सिद्धांत है वो बेसिकली इट इज टॉक्सिटरी सिद्धांत। हम लोग अभी तक ऐसा ही सोचते हैं कि जैसे-जैसे अपने ब्रेन की साइज बढ़ती जाती है, वैसे-वैसे उसके भीतर की जो कॉन्शियसनेस है, वह ज्यादा सोफिस्टिकेटेड और एडवांस होती जाती है। यहां पर किंतु ठाकुर को पढ़कर के ऐसा लगता है कि अपनी कॉन्शियसनेस जो है वह प्रथम इवॉल्व होती है। और फिर इस एडवांस कॉन्शियसनेस को धारण करने के लिए ब्रेन साइज इनक्रीस होती है। और यह जो इंक्रीज ब्रेन साइज को सपोर्ट करने के लिए फिजिकल स्ट्रक्चर इवॉल्व होता है। तो यह जो हम लोग आज इवोल्यूशन को जिस तरह से समझते हैं कि पहले तो फिजिकल ट्रेड डेवलप होती है जिससे कि हम सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट जिसको कहते हैं जिस निशे में जिस कॉर्नर के भीतर में जिस इवोल्यूशनरी ढांचे के भीतर में अपने को रहना है उस ढांचे अब जैसे कि सवाना में रह रहे हैं। खुले मैदान है उसमें रह रहे हैं ना कि पेड़ के ऊपर में रह रहे हैं ना कि जंगल में रह रहे हैं। कहां पे हम रहते हैं? उसके अनुसार हमारी फिजिकल ट्रेड डेवलप होगी। यदि खुले मैदान में रहते हैं तो दो पैर पे दौड़ना वह ज्यादा फायदेमंद है। यदि घने जंगल में रहते हैं तो एक पेड़ की ब्रांच से दूसरे पेड़ की ब्रांच पे वो डाली पे जंप लगाना ज्यादा फायदेमंद है। यदि समुंदर में रहते हैं तो मछली की तरह पानी के भीतर में सांस लेने की कैपेसिटी वह ज्यादा बेनिफिशियल है। तो हम जिस एनवायरमेंट में जिस क्लाइमेट के भीतर में रहते हैं, हम जिस इकोसिस्टम का पार्ट है, उस इकोसिस्टम में हमारा देह, हमारा फिजिकल कैरेक्टरिस्टिक ढल जाता है। और फिर इस फिजिकल कैरेक्टरिस्टिक को सपोर्ट करने के लिए हमारी कॉन्शियसनेस इवॉल्व होती है। तो, यह एक एक्सेप्टेड थ्यरी है। किंतु ठाकुर को देखकर के ठाकुर को स्टडी करके पता चलता है कि नहीं जैसेजैसे स्पिरिचुअल अवेकनिंग है यह स्पिरिचुअल अवेयरनेस है। जैसे-जैसे बढ़ता जाता है वैसे-वैसे अपनी कॉन्शियसनेस है। व्हाट इज कॉन्शियसनेस? हमारा अंतःकरण किस चीज का बना है? मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार और यह फिर रिफ्लेक्टेड कॉन्शियसनेस है। रिफ्लेक्टेड आत्मन आत्मन का जो रिफ्लेक्शन है आत्मन या तो ब्रह्मन का रिफ्लेक्शन। तो यह पांच चीजें इकट्ठी होकर के अपना कॉन्शियसनेस या तो फिर अपना अंतःकरण बनता है। तो यह अंतःकरण जो है अपनी कॉन्शियसनेस है वो इवॉल्व होती जाती है। यह रिफ्लेक्शन जो है वह स्ट्रांगर एंड स्ट्रांगर होता जाता है। मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार इवॉल्व होते हैं। और फिर इस इवोल्यूशन के साथ में इस इवोल्यूशन को धारण करने के लिए ब्रेन कैपेसिटी इनक्रीस होती है। और यह इंक्रीज़्ड ब्रेन कैपेसिटी को सपोर्ट करने के लिए फिजिकल कैरेक्टरिस्टिक इवॉल्व होती है। और फिर इस फिजिकल कैरेक्टरिस्टिक को सपोर्ट करने के लिए हम लोग इको सिस्टम चेंज करते हैं। इसीलिए यह माइग्रेशन होता है। यह जो आप देखिए पंखियों का भी माइग्रेशन होता है। कभी-कभी यह बर्ड माइग्रेशन करके आप देखेंगे वहां पे मैं राज गुजरात में था तो लिमड़ी के पास में एक नल सरोवर है। तो वहां पे क्या है? यह माइग्रेटरी बर्ड्स आते हैं। जब क्लाइमेट सीजन चेंज होता है तो यह पंखी जो है वह एक जगह से दूसरी जगह माइग्रेट करते हैं कि जहां पे उनको बेटर विश्राम है, बेटर छाव है, बेटर प्रोटेक्शन है, बेटर फूड सोर्स है, वह मिल पाए। तो यह पशुपं भी माइग्रेट करते हैं। किंतु यह जो ह्यूमन माइग्रेशन है, इट इज एट द रूट ऑफ मॉडर्न ह्यूमन सिविलाइजेशन जिसको कि बहुत कम लोग स्टडी करते हैं। आजकल की जो फिलॉसोफी है हम लोगों के भीतर में एक नेशनलिज्म का एक जवाहर आया है। तो आजकल तो हम लोग कहते हैं आर्य तो भारत में ही प्रकट हुए। अभी देखिए जो लोग यह ह्यूमन इवोल्यूशन का स्टडी करते हैं उन लोगों को बड़ा स्पष्ट रूप से पता है कि यह ह्यूमन ट्राइब्स ये प्री हिस्टोरिक ह्यूमन ट्राइब्स वो यदि एप हो ना कि फिर यह एप में से ह्यूमन बनने के बीच के जितने भी स्टेजेस हो नियंडरथाल हो ना कि क्रोमगनन हो ना कि ह्यूमो इरेक्टस हो जितनी भी ये इंटरमीडियरी स्पीशीज है उस सब ने माइग्रेशन किया है माइग्रेटरी रूट करके आप सर्च करेंगे यह ह्यूमन जेनोम प्रोजेक्ट का बीच में चला था काफी लंबा चला था तो वहां पर हमने अपने रूट्स ट्रेस किए हैं। देखा है स्पष्ट रूप से दिखाई देता है कि किस तरह से यह माइग्रेटरी वेव्स आफ्टर वेव्स ऑफ माइग्रेशन चलते हैं। पहले तो यह ईस्ट अफ्रीका से प्रारंभ हुआ माइग्रेशन। फिर वहां से यह एशिया में आया सेंट्रल एशिया में। वहां से दो ब्रांच हो गए। दो-तीन ब्रांच हो गए। एक ब्रांच गया यूरोप की ओर, एक गया नॉर्थ एशिया की ओर, एक गया साउथ एशिया की ओर। साउथ एशिया वाला ब्रांच जो है वो ईरान क्रॉस करके इंडिया में आया। नॉर्थ एशिया वाला जो ब्रांच है वो एशिया को क्रॉस करके वो जो जहां पे अलास्का है, एशिया और नॉर्थ अमेरिका इकट्ठा होते हैं। वहां पे लैंड ब्रिज था। तो लैंड ब्रिज हो ना हो कैसे भी करके वह तो नैरो स्ट्रेट है तो तैर करके ना कि लैंड ब्रिज के थ्रू वो क्रॉस करके वो ब्रांच पूरा नॉर्थ अमेरिका से आखिर में साउथ अमेरिका तक गया तो देखिए यह जो माइग्र और फिर इसके भीतर में भी कितने सारे माइग्रेशन माइग्रेशन इन इंडिया आउट ऑफ इंडिया इन इंडिया आउट ऑफ इंडिया इतने कॉम्प्लेक्स पैटर्न्स है यह सब तो यह माइग्रेशन क्यों होता है क्योंकि यह जो इवॉल्व होती हुई फिजिकल ट्रेट है उसको उसके लिए उसके लायक एक इकोसिस्टम चाहिए। इस इकोसिस्टम को खोजने के लिए हम लोग माइग्रेट करते हैं। सिर्फ मनुष्य ही नहीं पशुपं भी माइग्रेट करते हैं। क्योंकि उनकी जो फिजिकल ट्रेट है उसको कौन सा क्लाइमेट सपोर्ट करेगा वे यह लोग खोजते हैं। हम लोगों का थ्यरी पूरा उल्टा है अभी का। हम लोग सोचते हैं कि क्लाइमेट के अनुसार इकोसिस्टम के अनुसार हमारी फिजिकल ट्रेट इवॉल्व होती है और इस फिजिकल ट्रेट को सपोर्ट करने के लिए हमारा ब्रेन का इवोल्यूशन होता है और ब्रेन का इवोल्यूशन को सपोर्ट करने के लिए कॉन्शियसनेस इवॉल्व होती है। अभी जैसे आप पानी में थे पानी में से जमीन पर आए तो जमीन पर आए तो अभी पानी में जिस तरह से खुराक आपको मिलता था जमीन पर आपको इस तरह से नहीं मिलेगा तो जमीन पर आए तो मछली में से हाथ [नाक से की जाने वाली आवाज़] पैर बने और इस तरह से पशु का डेवलपमेंट हुआ और जिस तरह से डायनासोर है रेप्टाइल जो भी स्पीशीज है वो मछली जब जमीन पर आती है तो उसमें से रेप्टाइल हुए हैं तो देखिए कि रेप्टाइल किस तरह से आहार ग्रहण करता है। शिकार कैसे करता है। उसको सपोर्ट करने के लिए उसकी इवोल्यूशन उसकी कॉन्शियसनेस इवॉल्व हुई है। यह पूरा मॉडर्न जो बायोलॉजी है, मॉडर्न इवोल्यूशन का कांसेप्ट है। पूरा रिवर्स में चलता है। इकोसिस्टम हमको एलोकेट कर देते हैं। इकोसिस्टम के अनुसार फिजिकल ट्रेट होता है। फिजिकल ट्रेट के अनुसार ब्रेन इवॉल्व होता है और इवॉल्व ब्रेन को सपोर्ट करने के लिए कॉन्शियसनेस इवॉल्व होती है। जबकि यहां ठाकुर को स्टडी करके भारतीय संस्कृति को स्टडी करके ऐसा प्रतीत होता है कि यह जो स्पिरिचुअल अवेकनिंग है यह कोई सिर्फ मनुष्य का ही यह इसके ऊपर में मोनोपोली नहीं है। पशुओं के भीतर में भी एक तरह का प्रोटोस्पिरचुअलिटी होना ही चाहिए। और वह जो प्रोटोस्पिरचुअलिटी जैसेजैसे इवॉल्व होता है वह किस स्वरूप का होगा कहना मुश्किल है। इसके ऊपर में ऐसा कोई रिसर्च हुआ नहीं है। बस पुराणों में से मीन अवतार है, वराह अवतार है। यह सब हमको सुनने में तो आता है। किंतु पशुओं के भीतर में किस तरह का प्रोटोस्पिरचुअलिटी होगा उसका कोई सीरियस स्टडी मैंने तो कभी नहीं पढ़ा। किंतु जो भी है होना तो चाहिए ही। इसी की वजह से इस प्रोटोस्पिरचुअलिटी की वजह से उन लोगों की कॉन्शियसनेस इवॉल्व होती है। इवॉल्वड कॉन्शियसनेस को धारण करने के लिए ब्रेन कैपेसिटी इनक्रीस होती है। ब्रेन कैपेसिटी को सपोर्ट करने के लिए फिजिकल कैरेक्टरिस्टिक इवॉल्व होती है। और फिर इस फिजिकल कैरेक्टरिस्टिक को सपोर्ट करने के लिए यह जो ऑर्गेनिज्म है पशु है ना कि मनुष्य है ना कि एप है वो इको सिस्टम सर्च करता है और इसीलिए होते हैं माइग्रेशन। माइग्रेशन जो है इट इज वन ऑफ द मोस्ट फंडामेंटल एक्टिविटी। वन ऑफ द मोस्ट फंडामेंटल फैक्टर विद इन दी स्टडी ऑफ इवोल्यूशन। तो देखिए यहां पर भी ठाकुर कहते हैं जब महावीर हनुमान के भाव से मैं भरपूर हो गया तब मेरी यह जो करोड़ रज्जू है उसका आखिरी हिस्सा 1 इंच बढ़ गया था। यानी कि देखिए कि कितना रैपिडली बॉडी जो है ये कॉन्शियसनेस को फॉलो करता है। कॉन्शियसनेस यदि ये महावीर हनुमान की हो गई तो साथ-साथ में ही महावीर हनुमान की यह जो फिजिकल ट्रेट है इमीडिएटली मैनिफेस्ट होना शुरू हो गई। महावीर हनुमान की तरह ही ठाकुर उछलउछल करके चलते थे। उन्हीं की तरह फल मूल आहार करते थे। उन्हीं की तरह उनके चक्षु जो है वह चंचल हो गए थे। बहुत सारा समय जो है पेड़ पर ही बिताते थे और यदि इससे संतुष्टि नहीं होती है तो उनके देह ने इस हद तक इस कॉन्शियसनेस को फॉलो कर रहा है उनका देह कि उनकी जो करोड़ रज्जू का आखिरी हिस्सा जैसे महावीर हनुमान की पूंछ होती थी उसी तरह 1 इंच बढ़ गया था। अभी देखिए शरद महाराज जो है वह शरद महाराज यह पूरा डिस्क्रिप्शन ठाकुर के श्री मुख से श्रवण कर रहा है। तो उन्होंने ठाकुर को पूछा कि अच्छा महाशय वो जो आपने कहा कि यह अभी भी आपकी जो आपकी करोड़ रज्जू का आखिरी भाग 1 इंच बढ़ गया था। तो क्या अभी भी ऐसा है क्या? तो साथ-साथ में ही ठाकुर ने कहा नहीं जब भी महावीर के भाव का उपशम हुआ उसके साथ-साथ में ही करोड़ रज्जु जो है वो 1 इंच जो बड़ी थी वह फिर से अपने नॉर्मल पोजीशन में अपने नॉर्मल शेप में आ गई। देखिए अगेन मैंने हाउ रेपिडली इवोल्यूशन वर्क्स कि जैसे ही महावीर का भाव इसके साथ में ठाकुर ओतप्रोत हो गए साथ में ही जैसे कि यह उनकी पूंछ की तरह बढ़ना शुरू हुआ और जैसे ही महावीर के भाव का उपश्रम हुआ यह बढ़ी हुई पूंछ की तरह जो था शेप वह शेप जो है फिर से नॉर्मल शेप में आ गया व्हिच इज़ नथिंग लेस देन मिरेकुलस यदि हम ट्रेडिशनल वे में इवोल्यूशन स्टडी करते हैं। किंतु यदि हिंदू संस्कृति के अनुसार हिंदू शास्त्रों के अनुसार यदि इवोल्यूशन को स्टडी करें तो मुझे नहीं लगता कि इन सब चीजों में कोई मिस्ट्री है। यह प्योर साइंस है। साइंस के अलावा और कुछ नहीं है।

महावीर के दास्य-भाव की साधना के समय श्रीरामकृष्ण को हुआ माँ सीता का दर्शन

उसके बाद में किंतु ठाकुर एक बड़ी ही इंपॉर्टेंट बात है। देखिए यह सब जो हमारा डिस्कशन है वह किस लिए हो रहा है? क्योंकि यहां पे ठाकुर के कहे अनुसार ही शरद महाराज हमको लीला प्रसंग में ऐसी बात कहते हैं कि ईश्वर के कोई भी एक रूप के प्रति इस हद तक अनुराग और ध्यान से तन्मय हो जाना है कि उस रूप की प्रीति के लिए ही सर्व अनुष्ठान सर्व कार्य अनुष्ठान करना भक्त का सर्वोच्च लक्ष्य हो पड़ता है। इस हद तक अनुराग और ध्यान से तन्मय हो जाना है। देखिए यह जो शरद महाराज की लैंग्वेज है कॉम्प्लिकेटेड है समझने में किंतु फिर भी हम यदि इस लैंग्वेज को समझने का प्रयास करें मैं जब ट्रांसलेशन वगैरह देखता था पब्लिकेशन में तो हमेशा मेरे सामने यह सब डायलेमा उपस्थित होते थे। यह सब प्रश्न खड़े होते थे कि यह जब ट्रांसलेशन कर रहे हैं तो ओरिजिनल लैंग्वेज तो काफी कॉम्प्लिकेटेड है। तो क्या उसको थोड़ा सहज करके ट्रांसलेशन करें? किंतु प्रॉब्लम क्या है? सहज करके ट्रांसलेशन करने में आप वाचक जो है रीडर जो है उसको सहज रूप से समझा तो पाएंगे किंतु यह जो भाव जो घनीभूत भाव जो ओरिजिनल लैंग्वेज में है वो भाव ट्रांसमिट नहीं होगा। इसलिए बहुत बार मैं ऐसा करता था कि दो तरह के ट्रांसलेशन होते थे। या तो दो तरह के ट्रांसलेशन नहीं करके मैं हमेशा ट्रांसलेशन एज इट इज ओरिजिनल की लैंग्वेज की जो कॉम्प्लेक्सिटी है ओरिजिनल का जो वो एक संस्कृत बेस वर्ड है एज इट इज रखता था। फिर इसके ऊपर में एक आर्टिकल लिखना है कि हां यह किताब में ऐसा लिखा है तो इसका यह अर्थ है। तो आर्टिकल बहुत सहज रूप से लिखा जाएगा। सहज सामान्य भाषा से लिखा जाएगा। तो वह एक सेपरेट कीजिए। व्याख्या ना कि टीका ना कि भाष्य उसके ऊपर में जो भी है वह सेपरेट रखिए। किंतु ओरिजिनल का भाव एज इट इज रखिए। तो यहां पर भी यह है कॉम्प्लिकेटेड सेंटेंस किंतु इसको समझना उसी भाषा में समझना यदि हम सीखते हैं तो यह जो शरद महाराज का यह जो गुरु भाइयों का वराह नगर मठ की उनकी तपस्या बाद में यह जो मां के साथ में उद्बोधन में जो रहे हैं शरद महाराज ठाकुर के साथ में दक्षिणेश्वर में जो समय बिताया वो जो उनका जो भाव है भाव समग्र वो इस भाषा से व्यक्त होता है। इसलिए भाषा को इसी तरह के रखनी है। किंतु उसकी व्याख्या जो है वह फिर सहज सरल रूप से करनी है। तो यहां पर देखिए कि इसी के अनुसार ठाकुर महावीर के भाव में जब थे तो उन्हीं की तरह देह की कैरेक्टरिस्टिक हो गई और साथ में ही एक अद्भुत दर्शन हुआ। ठाकुर कहते हैं अपने श्री मुख से वर्णन करते हैं। कहते हैं कि मैं पंचवटी में नीचे में बैठा था। पंचवटी तला में बैठा था। ऐसा नहीं था कि ध्यान कर रहा था कि जप कर रहा था। वैसे ही चुपचाप बैठा था। और खुली नजर थी। इस खुली नजर से एक अद्भुत दृश्य मुझे दिखाई दिया कि जैसे देखिए कि निरूपमा ज्योतिर्मई स्त्री मूर्ति आविर्भाव हुई है। निरूपमा ऐसी कि जिसकी कोई उपमा नहीं है। ज्योतिर्मई अर्थात कि प्रकाश से प्रज्वलित स्त्री मूर्ति उनके सा में सामने आविर्भूत हुई है। और वो जो पूरा एरिया जो था पंचवटी का उसको प्रकाशित कर दिया है। और वो जो मूर्ति ठाकुर यह भी कहते हैं साथ-साथ में कि ऐसा नहीं था कि मैं सिर्फ उस मूर्ति को ही देख रहा था। मैं पूरा जगत देख पा रहा था। जैसे हम यूजुअली खुली आंखों से देखते हैं। पंचवटी भी दिखाई दे रही है। यह उद्यान पथ भी दिखाई दे रहा है। वहां पर नजर करेंगे तो वह काली मंदिर के शिखर दिखाई देते हैं। यहां पर वह गंगा दिखाई देती है। वो गंगा का प्रवाह दिखाई देता है। सब दिखाई देता है। साथ ही यह स्त्री मूर्ति निरूपम निरूपमा ज्योतिर्मय स्त्री मूर्ति दिखाई देती है। यूजुअली यदि दर्शन होता है तो क्या है जगत अदृश्य हो जाता है और जिनका दर्शन करते हैं वही एक रहते हैं। वही जो फेमस कहानी ठाकुर की कि काली मंदिर के गर्भगह में मां काली के हाथ से खड़ग चुरा करके खड़ग खींच करके अपने गले में मारने का प्रयास किया। साथ में ही जो चारों ओर से प्रकाश की तरंगे आकर के उनके ऊपर में टूट पड़ी तो ठाकुर कहते हैं मैं बाह्य ज्ञान शून्य हो गया और अद्भुत दर्शन हुए थे उस समय मुझे तो उस समय वो दर्शन कैसा था कि बाह्य ज्ञान शून्य बाहर का जगत निर्लुप्त हो गया था बाहर का जगत अदृश्य हो गया था अंतर जगत प्रकटित हो गया था अंतर जगत अवेकन हो गया था और वह सिर्फ दर्शन ही दिखाई देता था। यहां पर ठाकुर कहते हैं कि ऐसा नहीं है कि बाहर का जगत अदृश्य हो गया। बाहर में जो कुछ है वह सब वैसे का वैसा ही है। किंतु साथ में ही यह स्त्री मूर्ति दिखाई दे रही है। आज की लैंग्वेज में इसको कहेंगे ऑगमेंटेड रियलिटी। बाहर का जगत अदृश्य हो जाना और एक अल्टरनेट जगत दिखना इसको कहते हैं वर्चुअल रियलिटी। और बाहर का जगत भी दिखता है और उसके ऊपर में इंपोज कोई डिजिटल स्ट्रक्चर दिखता है तो इसको कहते हैं ऑगमेंटेड रियलिटी। तो यह ठाकुर को यह ऑगमेंटेड रियलिटी की तरह मां सीता की मूर्ति दिखाई दी थी। और साथ में ही देखिए कि ठाकुर क्या कहते हैं। वह जो प्रेम मूर्ति तो है मानवीय क्योंकि देवी की तरह त्रिनयना नहीं है। किंतु प्रेम दुख करुणा और सहिष्णुता पूर्ण उस चेहरे की तरह अपूर्व ओजस्वी गंभीर भाव देवियों की मूर्ति में भी जनरली नहीं देखने को मिलता। प्रेम, दुख, करुणा और सहिष्णुता यह जो लक्षण है इतने गहराई से इस मूर्ति के स्त्री के चेहरे पर अंकित थे कि इतना गहन भाव देवियों की मूर्ति में भी देखने को नहीं मिलता। प्रसन्न दृष्टिपात से मोहित करके देवी मानवी धीरे-धीरे करके उत्तर की दिशा से दक्षिण की ओर मेरी ओर आगे बढ़ रही है। मैं स्तंभित होकर के सोच रहा हूं। कौन है यह? एक उसी समय एकाएक एक हनुमान कहां से आकर के हुप शब्द करके उनके चरण प्रांत में लूट पड़ा। उनके चरणों में जैसे कि शरणागत हो गया और साथ-साथ में ही ठाकुर कहते हैं मेरे मन के भीतर में से मेरा मन बोल उठा सीता जन्म दुखिनी सीता जनक राज नंदिनी सीता राममय जीविता सीता ठाकुर के खुद के हृदय से यह बात आ रही है। उस समय मां मां बोलकर के अधीर होकर के उनके चरणों में मैं शरणागत होने को जाता हूं। उसी समय मां सीता ने आकर के इस देह के भीतर में प्रविष्ट कर दिया। उस समय अभी देखिए यह ऑगमेंटेड रियलिटी वर्चुअल रियलिटी हो जा रही है। ठाकुर कहते हैं जब मां सीता ने इस देह के अपनी ओर इशारा करके इस देह में प्रवेश किया। तब जैसे कि आनंद और विस्मय से अभिभूत होकर के बाह्य ज्ञान खोकर के मैं पड़ गया। गिर गया वहां पे। देखिए दिस इज सो इंटरेस्टिंग कि जिस भाव में आप अपने को तन्मय कर लेते हैं जिस भाव के भीतर में आप ओतप्रोत हो जाते हैं तो उसी भाव की तरह आपका देह भी जैसे कि इवॉल्व होगा रैपिड इवोल्यूशन होगा इवोल्यूशन ऑन स्टेरॉइड आजकल जैसे कहते हैं तो इवोल्यूशन ऑन स्टेरॉइड और साथ में ही उस भाव के अनुसार दर्शन भी होंगे। देखिए दिस इज अनदर इंटरेस्टिंग एस्पेक्ट कि भगवान राम का दर्शन क्यों नहीं हुआ महावीर हनुमान के भाव में आकर के ठाकुर ने तो भगवान राम की ही आराधना की होगी। अह हमको तो पता है भगवान राम जो है उनके आराध्य कुल देवता है। वह रघुवीर उनके कामार पुकुर का जो घर था ठाकुर का खुद हीराम के रघुवीर जो है वो तो आराध्य देवता है। रघुवीर के लिए खिचड़ी बना के उनकी मां कभी-कभी भोग दिया करती थी। तो तो रघुवीर तो उनके कुल देवता है। अभी यदि महावीर के भाव की उपासना की महावीर के भाव से अपने को भर दिया तो तो भगवान राम का दर्शन होना चाहिए। वो नहीं होकर के मां सीता का दर्शन हुआ। भगवान राम का हुआ होगा। नो डाउट प्रश्न ही नहीं है। राम लल्ला का दर्शन वगैरह तो बहुत फेमस घटनाएं हैं। किंतु इस पार्टिकुलर टाइम पे इस पार्टिकुलर घटना का वर्णन करने के समय इस पर्टिकुलर भाव का जो कंक्लूजन है उसका यह जो अंतिम लक्ष्य है उस अंतिम लक्ष्य पर पहुंच के नहीं भगवान राम का दर्शन नहीं होकर के मां सीता का दर्शन हुआ। देखिए यह क्या बताता है महावीर हनुमान का भाव जो है भक्ति जो है मां सीता के प्रति ज्यादा था भगवान राम की वजह और यही बात देखिए हमको स्वामी जी के जीवन में दिखती है स्वामी जी कहते हैं कि को रामः राम कौन है मां सीता ही जैसे कि आध्यात्मिकता की जमाट बांधा मूर्ति है और स्वामी जी स्वयं कहते हैं कि भगवान श्री रामकृष्ण देव यदि आते हैं जाते हैं उससे उससे मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। किंतु यदि मां शारदा नाराज हो जाती है या तो उनके साथ में कोई अन्याय होता है तो हमारा सर्वस्व जैसे कि सर्वनाश हो जाएगा। सो यह जो महावीर का जो भाव था वही भाव स्वामी जी के भीतर में था। बीच में हम कभी-कभी डिस्कस भी करते थे कि स्वामी जी ने ठाकुर को तो इतनी परीक्षा करने के बाद स्वीकार किया। किंतु मां शारदा को बिना परीक्षा के स्वीकार कैसे कर लिया? मां की जब यह हम उनका जो जीवन चरित्र का अभ्यास करते थे उस समय यह प्रश्न हुआ था। तो सही में उसका कोई उत्तर नहीं है। मुझे भी मैंने भी ऐसा सोचा नहीं था कि क्यों स्वामी जी ने स्वीकार कर लिया। किंतु इस घटना को पढ़कर स्पष्ट हो जाता है। महा महावीर हनुमान के भाव की आराधना स्वामी जी ने स्वयं की है। वह जो काशीपुर की फेमस घटना है वो काशीपुर में वो महावीर के भाव से भरपूर होकर के स्वामी जी जय श्री राम जय श्री राम ऐसा नारा लगाते लगाते वो दक्षिणेश्वर की ओर जा रहे हैं। तो ठाकुर थोड़े टेंशन में आ गए। अरे वो कहां जा रहा है देखो तो फिर यह हुटको गोपाल ना कि ये निर्मलांद जी इन दोनों में से कोई उनके पीछे गया था और उनको पकड़ करके वापस ले आया था तो वह घटना हम सबको पता है महावीर हनुमान के प्रति स्वामी जी का कितना श्रद्धा भक्ति था वह भी पता है तो हो सकता है कि ठाकुर को जिस तरह से महावीर का भाव की आराधना करते-करते मां सीता का दर्शन हुआ इसी तरह का कोई दर्शन स्वामी जी को भी हुआ होगा। बोलकर के स्वामी जी माने संपूर्ण रूप से मां शारदा को स्वीकार कर लिए थे। ठाकुर को इतना परीक्षा किया था। ठाकुर को इतना प्रश्न करते थे। मृत्यु शैया पर ठाकुर को कहते हैं। अपने मन में सोचते हैं। अभी यदि बोल के बताएं कि मैं हूं अवतार तो मानू तो फिर भगवान रामकृष्ण को बोलना पड़ा। जय राम जय कृष्ण श्री राम कृष्ण। किंतु मां शारदा के प्रति स्वामी जी का कोई भी तरह का संदेह कभी नहीं हुआ। तो लगता है इसके पीछे का शायद यही सीक्रेट होगा। तो आखिर में किंतु ठाकुर एक बड़ी ही इंटरेस्टिंग बात करते हैं। क्या कहते हैं कि जन्म दुखिनी सीता का सर्वप्रथम दर्शन किया था। शायद इसीलिए हो सकता है कि उन्हीं की तरह मैं पूरा जन्म दुख भोग कर रहा हूं। ये ठाकुर कहते हैं वि इज वेरी इंटरेस्टिंग। क्यों ऐसा कहते हैं मुझे नहीं पता क्योंकि ठाकुर खुद तो वह तो गान गाते थे कि यह राम प्रसाद का गीत है ए संसार धोकार कुटी यह संसार जो है धोखे की कुटिया तो फिर सामने वो जो आजू गोसाई है वह कहता है संसार मजार कुटी आमी खाईदाई मजा लूटी यह संसार है मजे की कुटिया मैं खाता हूं पीता हूं और आनंद करता हूं तो ठाकुर खुद यह भाव का गीत गाते हैं। बहुत बार ठाकुर कहते हैं यह वो पिंजरे के बद्ध पंखी की तरह होने को क्यों जाऊंगा? ऐसा बोलकर के थूकते हैं टू अपने मन के ऊपर में यह इंप्रेशन दृढ़ करने के लिए कि यह दीन हीन भाव है। यह अपना भाव नहीं है। यह उल्लसित भक्ति ये हर्षोल्लास से भरी भक्ति आनंद से भरपूर भक्ति यह हमारा भाव है। तो यह ठाकुर तो कथामृत में बार-बार कहते हैं। इसके बावजूद यहां पे ऐसा क्यों कह दिया कि मां सीता का जन्म दुखिनी सीता का सर्वप्रथम दर्शन किया था। बोलकर के मैं आजीवन दुख भोग कर रहा हूं। अगेन यह इतना गहन प्रश्न है कि इसका उत्तर देना संभव नहीं। और अल्टीमेटली हम वही कहेंगे कि यह जो आध्यात्मिक जीवन में लेयर्स आफ्टर लेयर्स आफ्टर लेयर्स होते हैं। तो जितना हम गहराई में जाए उतना ही हमको रिचनेस जो है स्पिरिचुअल लाइफ का गहराई जो है डेप्थ जो है वो समझ में आता है। वरना ठाकुर मां ने कहा ना कि बूढ़ा हो ना कि छेले माने कोई बूढ़ा आदमी हो ना कि कोई युवक हो ना कोई बच्चा हो ठाकुर को कभी मैंने निरानंद नहीं देखा सबके साथ में हंस के बात करते हैं प्रसन्नता से भरपूर यही ठाकुर आखिर में ऐसा कहेंगे कि जन्म दुखिनी सीता का सर्वप्रथम दर्शन किया बोलकर के मुझे पूरा जीवन दुख भोग करना पड़ता है। इट्स वेरी सरप्राइजिंग। हो सकता है कि यह स्टडी करते-करते ऐसा कोई पैसेज मिल जाए। यह पजल जो है हम अनलॉक कर पाए। अच्छा इसके बाद का जो टॉपिक है वह काफी लंबा है और अभी हम नेक्स्ट क्लास में इसको ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु

प्रश्न: जब स्वामीजी कहते है " को राम:" तब सही में आनंद आता है. अभी तक तो यही सुनते आये है की राम ही सर्वस्व है.

वो जो रावण का वध करने के लिए भगवान राम ने तो आध्या शक्ति की ही तो आराधना की थी। किस लेवल पर स्वामी जी का अंडरस्टैंडिंग है और यह जो दूसरे धर्म है उस धर्मों से हिंदू धर्म इसीलिए तो डिफरेंट होता है ना। बुद्धिज्म में शक्ति नहीं है भगवान बुद्ध के साथ में। अह नहीं क्रिश्चियनिटी में है, नहीं इस्लाम में है। हिंदू धर्म एकदम यूनिक इस दृष्टि से। अवतार और शक्ति दोनों साथ। सो दिस इज आवर यूनिकनेस।

प्रश्न: महावीर के दास्य भाव की साधना से ठाकुर की पूंछ बढ़ना शुरू हो गई. यह सुनना तो अच्छा लगता है. परन्तु हम सामान्य साधको के लिए क्या इसका कोई प्रैक्टिकल इस्तेमाल है?

वो जो ठाकुर जब ध्यान करने को बैठते थे ना तो वह काली मंदिर में जाने के समय यह नाट मंदिर के ऊपर में भैरव की मूर्ति है तो ठाकुर उसको पॉइंट करके अपने मन को कहते थे इस तरह स्थिर होकर के ध्यान करना है और जब ध्यान करने को बैठते थे जितने भी जॉइंट थे वह खटखट करके लॉक हो जाते हैं ऐसा आवाज सुनाई देता था और जब तक जप समाप्त नहीं होता है तब तक वो पोजीशन छोड़कर खड़े होने का कोई उपाय नहीं था और उस समय उन्हीं के देख में से एक सन्यासी बाहर प्रकट होकर त्रिशूल लेकर बैठा रहता था। कहता था कि यदि जप छोड़कर खड़े हुए तो त्रिशूल से मार दूंगा। सो सी कि भैरव की तरह हो जाना। यहां पर वो महावीर हनुमान की तरह हो गए। वो भैरव की जैसे हो जाते हैं। सो हम लोग भी ठाकुर की ओर इशारा करके कह ही सकते हैं जप में बैठने के लिए कि ठाकुर के भाव से अपने को भर देना है। वही महावीर हनुमान के भाव से भर देना है कि जब तक जप समाप्त ना हो तब तक मैं खड़ा नहीं होऊंगा। और फिर यह जितना अपना बॉडी में थोड़ा 5 मिनट बैठा तो यहां पर पेन यहां पे यह वहां पे वो जो होता है आवर बॉडी शुड इवॉल्व इन सच अ वे कि अब घंटा दो घंटा आराम से बैठ पाए।

प्रश्न: महावीर के दास्य भाव की साधना करते-करते ठाकुर में ऐसा तन्मयता आई कि उनकी पूंछ तक बढ़ने लगी। हम अपने मन को किसी एक साधना में इस प्रकार कैसे झोंक दें कि वह उसी भाव में पूर्णतः डूब जाए? ठाकुर ने अन्य भावो को मन से कैसे निकाल दिया यह भी सोचने की बात है.

ना अंडरस्टुड माने हनुमान जी तो फिर भी हमारे हिंदू धर्म के भीतर की साधना है। इस्लाम और क्रिश्चियनिटी की साधना जब ठाकुर करते थे तो उन्होंने काली मंदिर में जाना बंद कर दिया था। इस्लाम साधना के समय ठाकुर ने कहा कि मुसलमानों की तरह खाना खाएंगे। तो मुसलमान कुक को बुलाकर के तो मथुर बाबू थोड़ा घबरा गया। वह बोलता है बाबा इस तरह का एक्सपेरिमेंट मत कीजिए। फिर एक मुसलमान कुक को बुलाया गया। एक ब्राह्मण कुक को बुलाया गया। फिर मुसलमान कुक जिस तरह से वह डायरेक्ट करता है, इस तरह से ब्राह्मण कुक ने खाना बनाया और ठाकुर ने खाया। सो टू दैट एक्सटेंट ठाकुर जाने को तैयार थे। काली मंदिर में जाना बंद कर दिया था। वो देवी देवताओं की फोटोग्राफ्स हटा दिए थे। माने विदिन हिंदू फोल्ड आप साधना चेंज करते फिर भी इट विल नॉट बी दैट बिग कॉन्फ्लिक्ट व्हिच विल बी दिस। माने वो तो बिल्कुल विदेशी भाव है। सो यू आर राइट के उस भाव से यदि अपने किंतु ठाकुर का था ना मन मुख एक करना जो सिंसियरिटी थी उनकी वो माने हृदय की जड़ तक प्रवेश वो जो कहते हैं ना कि वो जो इस तरह का शिव की जो शिवलिंग जिसकी जड़ पूरी एकदम वहां तक जाती है। काशी तक जाती है। तो है ना क्या नाम भूल गया मैं ठाकुर ही कहते हैं। स्वयंभू शिव है ना। जड़ काशी तक जाती है। तो ठाकुर की सिंसियरिटी है। उनकी जड़ सीधे हृदय के अंतरस्थल तक जाती थी। वो साधना की तो वही साधना संपूर्ण रूप से अपने को एंड दैट इज व्हाट दैट फ्लेक्सिबिलिटी ऑफ़ माइंड मींस। आज कंसंट्रेशन क्या है कि जितना भी डिस्ट्रैक्शन है सबको हटा के सिंगल पॉइंट पे कंसंट्रेट करना। दैट इज दैट कंसंट्रेशन। कंसंट्रेशन के लिए आपको विल पावर डेवलप करना ही पड़ेगा। सो ठाकुर की लेवल का यदि विल पावर डेवलप हो जाता है तो मन तो फिर यह गीली मिट्टी ही है ना। उसको फिर कुम्हार गीली मिट्टी से कुछ भी बना सकता है। तो आप मन के साथ में जो चाहे कर सकते हैं। मन बिकम्स कंप्लीटली फ्लेक्सिबल एंड योर विल पावर बिकम सुप्रीमली पावरफुल। सो दैट इज दैट सिचुएशन।

प्रश्न: महावीर के दास्य भाव की प्रचंड साधना ठाकुर ने की. हम साधको के लिए इससे क्या सीख मिलती है?

प्रैक्टिकल टिप में तो वही है कर्म ज्ञान भक्ति ध्यान वो जो अपना लोगो है [हंसी] देखिए अ सिंसियरिटी इज वेरीेंट ऑफकोर्स कि अल्टीमेटली देखिए विल पावर पे बात आ जाती है। मैं अपना उदाहरण बताऊं तो सुबह को मंगल आरती से आता हूं तो फिर कुछ ना कुछ पढ़ने की इच्छा बहुत होती है। किंतु फिर डिपेंड कर और मेरा इंटरेस्ट भी बहुत ज्यादा है। तो कहां कुछ अभी ये एआई में क्या हो रहा है? वहां पे क्या हो रहा है? तो आप जैसे ही मोबाइल हाथ में पकड़ेंगे वह सब चीजें तो स्टार्ट हो ही जाने वाली है। उस समय उसको छोड़ के स्टडी मतलब जप करना दैट इज इट रियली रिक्वायर्स विल पावर और मैंने अभी ऐसा कोई सॉल्यूशन नहीं पाया है। अभी मैं आज ही की बात बताता हूं। आज सुबह को आकर के मैंने आधा घंटा यही सब न्यूज़प ही देख उसके बाद में मैं जप करने को बैठा। सो कभी-कभी हो जाता है पूरा मैं न्यूज़ में ही निकाल देता हूं। कभी-कभी मैं उसको हाथी नहीं लगाता। मैंने देखा है विल पावर के अलावा आई डू नॉट नो। देखिए विल पावर वो है ना एक्यूमुलेट होता जाता। जैसे-जैसे एक्यूमुलेट होगा ना वैसे-वैसे उसका रियल स्ट्रेंथ पता चलना शुरू हो जाएगा। किंतु एट द एंड ऑफ द डे देयर इज नो शॉर्टकट एस फार एस आई नो। देखिए मैं नागपुर में था ना तो नागपुर में शायद यदि आप गए होंगे तो मक्स क्वार्टर रास्ते के इस साइड है और लाइब्रेरी रास्ते के सामने की साइड है तो मैं और वहां पे ना एक काली मंदिर है। रास्ते के ऊपर ही काली मंदिर है। तो मैं डेली दो बार लाइब्रेरी जाता था। तो रिटर्न आता हूं आश्रम में रास्ता क्रॉस करके तो रास्ते के कॉर्नर पे वो काली मंदिर है। छोटा सा काली मंदिर है। एक साथ में दो-तीन आदमी खड़े रहेंगे उतना ही वो उसका साइज है। और माने एकदम अपने भारत के वो गली-गली में इस तरह के जो मंदिर दिखते हैं उसी तरह का नथिंग रिमारकेबल अबाउट इट। एक घंटी रहता है। वह अगरबत्ती जलती है और वह पुजारी आकर के एक बार पूजा करके स्वच्छ करके फूल चंदन चंदन सजा के चला जाता है। फिर वो सीधा शाम को आएगा। इस टाइप का वो एक सिंपल मंदिर तो पता नहीं एक दिन मैं आश्रम में वापस आ रहा हूं। मैंने सोचा चलो मंदिर में जाकर प्रणाम करते हैं। तो दिस इज नॉट माय स्टाइल। यूजुअली मैं मंदिर में इस तरह जाता नहीं। तो फिर भी उस दिन गया घंटी लगाया वह जो होता है और फिर वह दो हाथ जोड़कर प्रणाम करके एकाएक भीतर में से आया कि मां काली को मैं प्रार्थना करूं कि देखिए अभी तो साधु जीवन का प्रारंभ ही किया है। शुद्धता पवित्रता मेंटेन करना अभी मेरे बस की कहां बात है। आप आशीर्वाद नहीं करेंगे। आप नहीं सहाय करेंगे तो नहीं होगा। ऐसा एकदम सरल हृदय से प्रार्थना की और फिर अपने कमरे में आ गया। तो अभी क्या है कि सम हाउ इस जो सिंपल एक प्रार्थना की ना मैंने बिल्कुल सरल हृदय से बिना कोई शब्दों की रमत के बिल्कुल हृदय के भीतर में से जो एक प्रार्थना आती है आई फेल्ट सम हाउ दैट पावर फिर मेरा प्रैक्टिस हो गया कि जब भी मैं वो रास्ता क्रॉस करता हूं लाइब्रेरी टू आश्रम मैं मंदिर में जाऊंगा दो हाथ जोड़कर के दो मिनट खड़ा रहूंगा और वही सरल शब्दों से सरल शब्दों में प्रार्थ प्रार्थना करूंगा कि कैसे भी करके पवित्रता की रक्षा करना साधु जीवन बचाना क्योंकि मैं तो जॉइ ही किया है और पता नहीं भविष्य में क्या लिखा है क्या होगा तो और बहुत सारे केसेस भी सुनते हैं कि ऐसा हो गया वैसा हो गया तो अपने बस की थोड़ी ना बात है यह सब कि हम अपने को मेंटेन कर पाएंगे सो एकदम सरल हृदय से दो साल में था ऑलमोस्ट एवरीडे मेरा वहां पर मंदिर में जाना हुआ था और एकदम सिंपल शब्दों में मैं प्रार्थना करता था तो सम हाउ इट हेल्प मी अ लॉट। माने देखिए वहां पर ठाकुर का मंदिर है। वहां पे अस्थि भी रखे हैं और वहां पे प्रतिदिन नियमित पूजा होती है। मैं खुद ठाकुर मंदिर में भंडारी में भंडार में काम करता था। सब कुछ इंस्पाइट ऑफ दैट। वो जो रास्ते के किनारे एक छोटा सा मंदिर है व्हिच इज नथिंग रिमारकेबल अबाउट इट। और एक सरल हृदय की प्रार्थना। आई स्टिल फील दैट दोज़ प्रेयर्स हैव हेल्प मी। सो क्या है ना कि सरल हृदय से ईश्वर को पुकारना। उनके ऊपर में यह भार दे देना कि अब मेरे बस की तो बात है नहीं। आप तराएंगे तो तैरेंगे वरना डूबेंगे।

प्रश्न: एक और ठाकुर ईश्वर प्राप्ति के लिए सर्वस्व त्याग करने की बात करते है, दूसरी और स्वामीजी कहते है each is great in his own place. तो हम गृहस्थ तो स्वामीजी को ही फॉलो कर सकते है. हम कैसे सब त्याग करे?

नहीं एक्चुअली दिस इज नॉट शरद महाराज ने कहा। शरद महाराज ने कहा ईश्वर प्राप्ति में जो बाधा बनता है उसका त्याग करना है। राइट? अभी उसके रिलेशन में मैंने गीता का यह श्लोक कहा था। कल शाम को क्लास था तो उसमें एक लड़के ने पूछा कि यह सर्वधर्मान परित्यज मामेकम शरणम व्रज इसका क्या अर्थ है? भगवान कृष्ण हमको धर्म त्याग करके उनको फॉलो करने को क्यों कहते हैं? उसके उत्तर में मैंने कहा था। अब जैसे क्षत्रिय धर्म है तो द्रोणाचार्य है, भीष्म पितामह है। नजर के सामने द्रोपदी का अपमान देखते हैं। किंतु उसका विरोध करने की बजाय बिकॉज़ कि यह धृतराष्ट्र का अन्न खाया है। यह जो उसका अन्न खाया है। बोलकर के उसका विरोध नहीं कर पाते हैं। तो भीष्म पितामह महाभारत में कहते हैं कि हाय रे कैसा यह क्षत्रिय धर्म है कि जो कि मुझे सत्य के रास्ते पर नहीं जाने देता। तो क्षत्रिय धर्म भी धर्म है। वि इज अ ग्रेट धर्म कि देश की रक्षा करनी है। राजा के आज्ञा वह होकर के रहना है। किंतु यही राजा जब अन्याय करता है तो उसके सामने बोलने की आपकी कैपेसिटी नहीं रहती। सो इस अर्थ में कि सत्य के रास्ते में ईश्वर के रास्ते में यदि अपना धर्म बाधा रूप बनता है तो उसका त्याग करना है। इसलिए ठाकुर ने यह पूरा कहा कल ही हमारा ये डिस्कशन हो रहा था। विभीषण ने अपने ज्यष्ठ भ्राता का उसकी बात नहीं मानी। बलि ने शुक्राचार्य की बात नहीं मानी वगैरह वगैरह। आखिर में ठाकुर कहते हैं किंतु ईश्वर के पात्र में बाधा रूप होने के अलावा जो कुछ भी यह लोग कहते हैं सब मानना है। स्पष्ट रूप से ठाकुर यह कंडीशन वहां पर रखते हैं। उनका अस्वीकार तभी करना है उनकी आज्ञा का जब एज लॉन्ग एज दे आर अंतराय बन के खड़े हैं धर्म के रास्ते पे। किंतु धर्म के रास्ते पर अंतराय होने के अलावा जो कुछ भी कहते हैं उसका स्वीकार करना है। सो ऐसा नहीं है कि सब धर्म छोड़ देने हैं। जहां तक हमारा ड्यूटी या ऑब्लिगेशन यहां पे धर्म का अर्थ ड्यूटी या ऑब्लिगेशन जब तक ईश्वर प्राप्ति के पाथ में बाधा स्वरूप बनता है तब उसका त्याग करना है। नॉट अदरवाइज अदरवाइज तो समाज में अराजकता फैल जाएगी। देखिए गीता पूरा इसी के ऊपर में बना है ना। अर्जुन का कंफ्यूजन कहां पे आया था कि ज्येष्ठ माने यह गुरुजन है। इनका वध नहीं करना है। ऑफ कोर्स नहीं करना है। धर्म तो यही कहेगा ना अपने गुरुजन का वध नहीं करना। सिंपल सी चीज है। हत्या नहीं करनी इन जनरल हत्या करना ही तो पाप है। इनस्पाइट ऑफ दैट भगवान कृष्ण कहते हैं कि नहीं तुम हत्या करो और सिर्फ हत्या ही नहीं अपने गुरुजनों की हत्या करो। सो व्हाई दिस कंफ्लिक्ट? अर्जुन के मन में कि ट्रेडिशनल धर्म है और जो कि वेदांतिक धर्म है। भगवान कृष्ण रिप्रेजेंट्स वेदांता इन इट्स प्योर अनडल्यूटेड फॉर्म। और यह जो अर्जुन के मन में जो कंफ्यूजन था वो ब्राह्मणी कांसेप्ट को लेकर के था। इसीलिए स्वामी जी हमेशा कहते हैं ना कि यह ब्राह्मण का ब्रेन और यह क्षत्रिय का हार्ट इन दोनों में जो स्प्लिट हुआ है दैट स्प्लिट है इंडिया को डूबा दिया। आप एक थ्यरिटिकल धर्म यह है। ओके वेरी गुड बट उसका प्रैक्टिकल एप्लीकेशन क्या है? से दैट यदि आप नहीं समझेंगे तो थ्योरिटिकल धर्म ने क्या किया आपके लिए? माने ब्राह्मी आपको क्या है? वेद आपको क्या कहेंगे? हत्या नहीं करनी है। सिंपल सी चीज है। और उसमें भी गुरुजनों की हत्या नहीं करनी है। सिंपल सी चीज है। यदि अपना अधिकार छीन लिया जाता है। वेदांत तो यही कहेगा कि अधिकार तो माया के जगत में उसको छोड़ो। आप अधिकार के लिए युद्ध करेंगे ही क्यों? वेदांत तो कहेगा कि यह तो काम कांचन अल्टीमेटली तो वही हुआ ना राज्य प्राप्त करना काम कांचन को प्राप्त करना हुआ। क्यों आप इसके पीछे दौड़ेंगे? त्याग करके सन्यास ग्रहण कर लो। दिस इज व्हाट ट्रेडिशनल वेदांत से। किंतु भगवान कृष्ण कहते हैं कि देखो एक सिविलाइजेशनल एस्पेक्ट भी है। अब धर्म के लिए यदि नहीं खड़े रहेंगे अर्जुन का जो होना है सो होगा। भविष्य का जो भारत है पूरा डूब जाएगा। क्योंकि यह कौरव जिस आईडियोलॉजी को रिप्रेजेंट करते हैं। दैट इज़ नॉट गुड फॉर इंडिया। पांडवों की जो आईडियोलॉजी है, दैट इज़ व्हाट कि भारत का भविष्य बनाएगी। तो, तुमको अपने लिए युद्ध नहीं करना है। भविष्य के आने वाले भारत के लिए युद्ध करना है। दैट प्रैक्टिकल सेंस जो कि भगवान कृष्ण की थी।

प्रश्न: अर्जुन भगवान कृष्ण की बात न सुनाता तब भी भगवान कैसे भी कर के युद्ध जितवा देते। किन्तु अर्जुन का जितना हम सब के लिए आवश्यक था.

देखिए यहां पर स्वामी जी खुद कहते हैं ना कि श्री रामकृष्ण चाहे तो मेरे जैसे लाखों विवेकानंद पैदा कर सकते हैं। किंतु उन्होंने ऐसा नहीं किया। यही विवेकानंद के माध्यम से ही करवाया। सो दैट वो भी तो एक फोकल पॉइंट है ना कि विवेकानंद कहो कि अर्जुन कहो उनका भी तो एक सत्ता है। तो उनको दूसरा क्या है? सी दे रिप्रेजेंट अस। आज स्वामी जी फेल हो जाते या अर्जुन फेल हो जाता। तो हम किस चीज को ले रहेंगे? किस चीज को ले अपने को भरोसा देंगे हम अब मन तो हमेशा यही चाहता है ना ठाकुर क्या कहते हैं कि युधिष्ठिर ने झूठ बोला तो उनका रथ जमीन पर आ गया तो ठाकुर कहते हैं युधिष्ठिर की क्षमा धैर्य धर्म वो सब नहीं देखकर के एक ही चीज पकड़ के बैठे हो कि झूठ बोला ये कौन सी बात हो गई अपना मन तो यही चालाकी करता है ना विवेकानंद फेल्ड म तुम अच्छा सा मौका मिल गया अच्छे रास्ते पे नहीं चलने का स्वामी जी जैसे स्वामी जी फेल हो गए तो मैं किसके खेत की मूली हूं। यह तो एक हो गया ना मन को बहाना मिल गया। सो दे रिप्रेजेंट अस इन अ वे अर्जुन [गला साफ़ करने की आवाज़] हो ना कि ये स्वामी विवेकानंद हो। उनका देखिए दोनों लेवल पे है। सिविलाइजेशनल लेवल पे भी हमको सक्सेस होना है। इंडिविजुअल लेवल पे भी सक्सेस होना है। इन दैट केस अर्जुन एंड विवेकानंद रिप्रेजेंट अस एस इंडिविजुअल्स।

प्रश्न: अर्जुन या स्वामीजी की भी एक destiny थी न. ठाकुर ने कहा था तुम्हारी हड्डिया तुम से काम करवाएगी

देखिए ऐसा नहीं सोच के हम लोग अपनी दृष्टि से क्यों नहीं सोचे दे आर अस इन अ वे राइट अभी हम लोगों के सामने हजार वीकनेस आ जाती है विल पावर की हमको यदि लगता है कि लेट अस क्विट व्हाट डस इट मैटर माने क्या फर्क पड़ता है एक लेवल पे तो आ गए हैं इससे आगे नहीं जाएंगे नहीं जा सकते हैं लेट अस स्टार्ट फ्रॉम द नेक्स्ट बर्थ ऐसा एक वीकनेस अपने खुद के मन में आ जाता है। प्लस क्या है पता है? एक उम्र के बाद में ना जनरल डिप्रेशन आकर के घेर लेता है। जीवन की जितनी भी फेलियर्स है, जितने भी रिग्रेट्स हैं सब समय नजर के सामने आते हैं। बिलो 40, + 40 या +50 वो एक रिग्रेट एक बहुत बड़ा पार्ट होता है लाइफ का। तो फिर सब समय ना हमारा मन कहता है हथियार डाल दो, हथियार डाल दो। इन दैट केस हम इनको जब देखते हैं रोल मॉडल्स दे हैव एक रोल मॉडल को तो हमारे सामने रखना होगा। भगवान राम या भगवान कृष्ण या भगवान रामकृष्ण ईजीली रोल मॉडल नहीं हो सकते। उनका कैटेगरी ही डिफरेंट था। मतलब एटलीस्ट अर्जुन है या तो इवन भगवान बुद्ध है या तो स्वामी विवेकानंद है। दे वी फील लाइक नियर टू देम। क्योंकि यह सब कन्फ्लिक्ट तो उनके भी मन में थे। तो इफ दे क्रॉस ओवर दोस कन्फ्लिक्ट। इफ दे ट्रांसेंडेड दोस कन्फ्लिक्ट। व्हाई कैन नॉट आई डू दैट?

प्रश्न: swamiji says god became man so that man can become god

[हंसी] देखिए ये जो बुद्धिज्म इतना अपीलिंग जो है ना वेस्टर्न लोगों के लिए वो इसीलिए तो भगवान बुद्ध को ऐसा हम लोग भगवान कहते हैं किंतु खुद तो क्लेम करते नहीं है। बुद्धिस्ट जो फिलॉसोफी है वह भी इस तरह का कोई बहुत बड़ा क्लेम नहीं करती। बात बाद बातबाद में कुछ घुस गया होगा। ओरिजिनली तो भगवान बुद्ध रिप्रेजेंट्स मैन काइंड अ मैन इन जनरल कि कॉमन मैन जिसको कहते हैं ना आर के लक्ष्मण का कॉमन मैन। सो ही रिप्रेजेंट्स दैट कॉमन मैन लाइक अस। तो इफ ही कैन अटेंड निर्वाण व्हाई कैन नॉट आई अटेंड। सो भगवान बुद्ध इज़ मच नियरर टू अस आवर हार्ट इन इन टर्म ऑफ़ अ रोल मॉडल। ठाकुर को हम कैसे रोल मॉडल बनाइए? बताइए। वह महावीर हनुमान की साधना करते से पूंछ बढ़ना शुरू हो गया। आपने साथ में कहां ऐसा होने

प्रश्न: ठाकुर का अनुकरण नहीं कर सकते किन्तु माँ और स्वामीजी का तो कर सकते है

देखिए मां का जो हृदय है मां का हृदय लेना कहानियों के बाद कहानियां है कि कितना प्रेम से मां सब पागलों को हैंडल करती थी। वह मजदूरन है। उसके साथ में जो कहानी है त्यागी संतानों के साथ में यह कोई असंभव चीज नहीं है। काम कांचन संपूर्ण रूप से त्याग करना यह असंभव सा लगता है। माने उदारता उसमें क्या असंभव है? अपना ईगो ही तो रास्ते में आता है ना। तो इतना तो और कुछ नहीं है। ईगो को तजो उदार हृदय हो जाओ। दिस इज अटेनेबल। हां देखिए अल्टीमेटली देखिए आपको आईआईटी में जाना है। जॉइंट एंट्रेंस एग्जामिनेशन आपको क्रैक करना है। इफ यू कैन नॉट क्रैक दैट उसके बाद में क्या है? फिर आईआईटी का भी ड्रीम है और यह भी नहीं कर पाते हैं। एंड दिस इज अ मोस्ट डाइल्यूटेड साधना ना। अदरवाइज आप ठाकुर की साधना कीजिए। जिस पेड़ के नीचे साधना करते हैं पेड़ के पत्ते झुलस जाते हैं। वो जब वह अपने मन को कहते हैं भैरव की तरह बैठना है वह लोक खटखट करके सब लोक हो जाता है। वो सब इस कंप्लीटली इंपॉसिबल फॉर अस। किंतु स्वामी जी और मां ये दो जो करके गए हैं। शिव ज्ञान जीव सेवा और एक माने सहृदयता उदारता। दिस इज स्टिल एटनेबल। पॉसिबिलिटी के भीतर में। बीच में आता है सिर्फ अपना ईगो और अपना स्वार्थ जिसको कि हम निकाल सकते हैं अपने मन में से एटलीस्ट मैनेज कर सकते हैं अगेन टू यूज़ दैट वर्ड मैनेज कर सकते हैं इट इज नॉट इंपॉसिबल एंड ठाकुर का खुद का स्टेटमेंट है अपने पास में कि देखिए कि मां की शक्ति जो है ठाकुर से ज्यादा वि इज सो सरप्राइजिंग कि हृदय की उदारता यह इतनी प्रचंड तपस्या भी ज्यादा पावरफुल है वि इज सो सरप्राइजिंग देखिए मां सीता ने क्या किया। वही वह रावण की कुटिया में थी। वह तो उनका लाइफ वहीं पर एक सीमित था। जब भगवान राम के साथ में थी तो उनकी आज्ञा वह कह रही थी। यही तो उनका लाइफ था। जबकि भगवान राम ने क्या से क्या नहीं किया। माने मिरेकल्स से और एडवेंचर से भरपूर लाइफ है। इसके बावजूद यदि ऐसा कहा जाए कि मां सीता का पावर उनसे ज्यादा था। देन हमारे पास में कुछ तो भरोसा है। चलो भगवान राम जैसे नहीं हो सकते। वि इज बिय्ड पॉसिबिलिटी कि वो किंतु मां सीता जैसे तो हो सकते हैं। मां शारदा जैसा थोड़ा तो हो सकते हैं। सहृदयता, उदारता, करुणा, मातृभाव यह सब चीजें असंभव नहीं है। दक्षिणेश्वर में मां जो भी आती थी सब सबको सब बांट देती थी। वो जो भी आता है भक्त आता है तो प्रसाद है, मिठाई है सब बांट देती है। ठाकुर जैसे ठाकुर त्यागेश्वर धोती जिनकी नहीं रहती थी। वो ठाकुर को कहना पड़ा अरे इतना खर्च करोगे तो कैसे चलेगा तो मां कोई उत्तर दिए बिना चली गई तो ठाकुर ने वो रामलाल को बुलाया चिल्ला करके अरे जाओ तुम्हारी चाची को ठंडा करो वो नाराज हो जाएगी तो यहां की शक्ति भक्ति सब भस्मीभूत हो जाएगी जाओ उनको ठंडा करो थोड़ा [हंसी] ओम