Invocation
ओम स्थापक यच धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपने अवतार वरिष्ठा राम कृष्णाय ते नमः धार्मिक साहित्य उसका जब हम अभ्यास करेंगे तो सबसे पहले उसमें हमारे शास्त्र आएंगे शास्त्र हमको पता है हिंदू धर्म में उसको जो फाउंडेशन है शास्त्रों का उसको प्रस्थान त्रय कहते हैं वैसे तो संस्कृत साहित्य पाली साहित्य और सब रीजनल लैंग्वेजेस सबको मिलाकर के यदि हम देखें कि जिसको धार्मिक किताबें कहते हैं संत महापुरुषों द्वारा लिखित वह हजारों हजारों लाखों की संख्या में यह सब किताबें हैं और कभी आप इन सब का पाठ करेंगे भी तो कभी-कभी आपको इन हो सकता है कि डिफरेंट डिफरेंट किताबों में एक दूसरे से कुछ ना कुछ विरोधाभासी तत्व भी जानने को मिले कोई किताब इस तरह से कहेगी कोई शास्त्र इस तरह से कहेगा कोई अवतार इस तरह से कहेंगे वह सब एक कंट्रक्शन देखने को मिल सकता है क्योंकि यह सब शास्त्र हजारों हजारों साल की जो भारत देश की आध्यात्मिक यात्रा है इस आध्यात्मिक यात्रा में जो डिफरेंट डिफरेंट मुकाम आए हैं जिस समय देश काल पात्र की आवश्यकता को समझ कर के ज्यादातर शास्त्र लिखे गए हैं इसलिए शायद ऐसा हो सकता है आजकल आप देखेंगे कि मनुस्मृति के ऊपर में बहुत सारे लोगों का एक तरह से क्या कहेंगे कि विराग है उसमें कुछ-कुछ बातें ऐसी लिखी गई है जो कि आज के आधुनिक समय को व उपयोगी नहीं है या तो फिर आज के लिए रिलेवेंट नहीं है तो बहुत सारे लोग कहेंगे कि क्या मनुस्मृति यदि आधुनिक समय के लिए उपयोगी नहीं है या तो फिर रिलेवेंट नहीं है तो फिर मनुस्मृति के ऊपर में जो हिंदू धर्म बना है वह क्या हिंदू धर्म भी आज के समय के लिए उपयुक्त नहीं है यह प्रश्न हो सकता है तो किंतु देखिए शास्त्र के भीतर में ही इस प्रश्न का निराकरण है कि देश काल पात्र अनुयाई जो जो शास्त्रों की रचना की गई वोह वोह शास्त्र उस देश काल और पात्र तक ही सीमित होने चाहिए वो जो एक समय था अपना वैदिक युग तो वैदिक युग में यह पशुबली की प्रथा थी जिसको कि आज के आधुनिक युग में आवश्यकता नहीं है तो पशुबली के लिए किस तरह से देना चाहिए किस तरह से वह सब विधि विधान रिचुअल्स करने चाहिए वह सब वैदिक युग के लिए थे वह आज के युग के लिए नहीं है युग प्रयोजन के लिए युग उपयोगी शास्त्र युगा चार्य युगा वतार द्वारा प्रस्तुत होते हैं जो जिस युग में हम रह रहे हैं उस युग के अनुसार जिस शास्त्र लिखे गए हैं उस शास्त्रों का अभ्यास ही हम हमारे लिए रिलेवेंट है किंतु हिंदू धर्म साथ-साथ में यह भी कहता है कि तीन तरह के शास्त्र है जो कि इटरनल है जो कि देश काल पात्र के ऊपर में है देश काल पात्र के परे हैं वह चाहे इस तीन तरह के तीन प्रकार के शास्त्रों का आप वैदिक युग में अभ्यास कीजिए ना कि पौराणिक युग में अभ्यास कीजिए शंकराचार्य के युग में कीजिए बौद्धिक युग में कीजिए ना कि आधुनिक युग में कीजिए उस तीनों का रिलेवेंट एक ही तरह का बना रहेगा क्योंकि यह तीन तरह के शास्त्र सर्वोच्च शास्त्र माने जाते हैं और इन तीनों का नाम भी हमको पता है प्रस्थान त्रय कहते हैं त्रय मींस तीन और यह प्रस्थान त्रय क्या है श्रुति प्रस्थान स्मृति प्रस्थान और न्याय प्रस्थान श्रुति प्रस्थान अर्थात कि वेदों का वह भाग यदि हम वेद को कुछ विभागों में विभक्त कर दे तो संहिता पोर्शन आएगा आरण्यक पोर्शन आएगा और फिर उपनिषद पोर्शन आएगा तो यह उपनिषद पोर्शन जो है वेदों का उसको श्रुति प्रस्थान कहते हैं अर्थात कि ईश्वर के पास से या तो फिर आत्मज्ञान प्राप्त करके आत्म साक्षात्कार कर के जो साक्षात श्रवण की हुई वाणी है उसको जो लिपिबद्ध किया गया है उसको कहते हैं श्रुति प्रस्थान जो कि हमारे उपनिषद है उपनिषद वैसे 108 भी है 1008 भी आप कह सकते हैं किंतु शंकराचार्य ने जिन उपनिषदों पर टीका लिखी वह 10 या तो फिर 11 श्वेता स्वत के बारे में थोड़ा सा डाउट है तो इतने प्रधान उपनिषद है केन कठ प्रश्न ऐ तरी तै तरी मुंडक मांडूक्योपनिषद कहे जाते हैं इसके बाद में आता है स्मृति प्रस्थान स्मृति अर्थात की मेमोरी में से यानी कि थिंकिंग करके चिंतन स्मरण मनन करके जिसको कि लिखा गया हो स्मृति प्रस्थान है है और स्मृति प्रस्थान कौन सा है भारत में श्रीमद् भगवत गीता वैसे तो बहुत सारे पुराण है किंतु सभी पुराणों का सार इस स्मृति प्रस्थान में ले लिया गया है श्रीमद् भगवत गीता में और न्याय प्रस्थान क्या है ब्रह्मसूत्र अभी देखिए कि उपनिषद इतने सारे हैं फिर यह भगवत गीता भी है तो इतने सारे उपनिषद और भगवत गीता का जदी सिस्टमैटिक साइंटिफिक स्टडी करना है यदि एक ही टेक्स्ट के भीतर में जितने भी कंट्रा इक्स है कंपैरिजन है जो भी कुछ है आपको एक विथ इन वन सिस्टम ऑफ टेक्स्ट आपको एक करना है स्टडी करना है तो वह हमको न्याय ब्रह्म सूत्र में हम कर सकते हैं न्याय प्रस्थान में कर सकते हैं अच्छा अभी इसके बाद में यह तीन प्रस्थान त्रय के ऊपर में जिन उन्होने जो भी भाष्य लिखा वो उन लोगों ने अपनी एक स्कूल ऑफ थॉट स्टार्ट की है यदि हम भारतीय धार्मिक इतिहास को कुछ हिस्सों में बांट दे तो वैसे तो अपने पुराणों में कहा गया है कि कृत युग है या तो फिर सतयुग है फिर यह त्रेता युग है फिर द्वापर युग है फिर यह कलयुग है तो अभी किंतु यह चारों युग जो है अभी हम देखेंगे कि हमारी दृष्टि से तो हमको दो ही युग दिखते हैं एक वैदिक युग था जिसमें कि पहले तीन युग आ जाते थे सतयुग त्रेता युग और द्वापर युग यह तीनों हमको वैदिक युग में ही दिख जाते हैं और उसके बाद में सीधा कलयुग स्टार्ट हो जाता है तो यहां पर किंतु देखिए कि कलयुग में भी हम तीन विभाग एक्स्ट्रा कर सकते हैं हमारी दृष्टि से हम चार विभाग में शास्त्रों का इतिहास या तो फिर फिर भारतीय धर्म का हिंदू धर्म का इतिहास बांटेंगे सर्वप्रथम तो है हमारे सामने वैदिक युग जिसमें कि हमारी वैदिक परंपराओं का जन्म हुआ उसी वैदिक परंपराओं का वहन हुआ और उसी वैदिक परंपरा के आधार पर हमारा समाज गठित हुआ था हमारा समाज विकसित हुआ था और यही वैदिक परंपरा को जैसे कि उसके मिशनरी के रूप में जैसे हम स्वामी विवेकानंद को ठाकुर के मिशनरी के रूप में संदेशवाहक के रूप में पहचानते हैं तो यही वैदिक परंपरा के संदेशवाहक थे भगवान राम स्वयं जिन्होंने यही वैदिक परंपरा जो कि गंगा के किनारों पर जिसने जन्म लिया था हिमालय की ऊंचाइयों में जिसने जो जिसका जो विकसित हुई थी वही वेदिक परंपरा वह साउथ इंडिया यानी कि दक्षिण यह विंध्याचल पार करके के दक्षिण भारत में ले आए और यही दक्षिण भारत से यह साउथ ईस्ट एशियन कंट्रीज कहे जाते हैं सिंगापुर मलेशिया इंडोनेशिया बर्मा या तो फिर म्यानमार यह जितने भी साउथ ईस्ट एशियन कंट्रीज है फिलिपींस वगैरह वहां पर यह दक्षिण भारत से ही फिर वही वैदिक परंपराएं वैदिक संस्कृति का प्रचार हुआ था यदि वैदिक संस्कृति का प्रचार करने के लिए दो तरह के रूट जिसको कहते हैं उस बड़े उसके रिस्पांसिबल थे एक तो स्पाइस रूट था जो कि यह स्पाइस आइलैंड यानी कि साउथ ईस्ट एशियन आइलैंड कंट्रीज है छोटे-छोटे वहां से यह यूरोप भारत होकर के यूरोप तक जाता था स्पाइस ले जाने के लिए और दूसरा था सिल्क रूट जो कि यह चीन से प्रारंभ होकर के चीन मंगोलिया फिर यह अपना कश्मीर वहां से होते-होते यह सेंटल एशिया से होते यह अपने आज का जो मिडिल ईस्ट कहते हैं वहां से यूरोप तक जाता था तो यह दोनों रूट थे प्रथम स्पाइस रूट और सिल्क रूट जिसने कि ओरिजिनल वैदिक सभ्यता का प्रचार किया था पूरे विश्व में और खास करके ईस्ट एशिया में और इसके बाद में जब यह वैदिक सभ्यता का धीरे-धीरे करके अस्ताचल हुआ और बुद्धिज्म या तो फिर बौद्धिक सभ्यता का सूर्योदय हुआ तब कहीं जाकर के यही बौद्धिक संस्कृति बौद्धिक धर्म का प्रचार भी इसी रूट के द्वारा सब जगह पर हुआ था अभी हमको पता है कि वैदिक सभ्यता में कहा जाता है कि धीरे-धीरे करके करप्शन प्रवेश हुआ था अभी यह बौद्ध लोगों का मानना है कि किस तरह से पशुबली देने के पीछे में इतना हमारा समय नष्ट होने लगा कि जो प्योर स्पिरिचुअलिटी है उसमें हम ध्यान देना कम कर दिए यह जनरली धर्म का उद्भव और धर्म के अस्त ये किस तरह से होता है उदय और अस्त उदय होता है प्योर स्पिरिचुअलिटी से आप बाह्य जितने भी फॉर्म्स है रिचुअल्स है वो उसको कीजिए उसको कोई मना नहीं करता है किंतु आंतरिक अपने हृदय में जो परिवर्तन होना है अपने जो काम क्रोध मद लोभ मोह जिसको कि षड रिपु कहते हैं या तो फिर यह पंच क्लेश है अविद्या अस्मिता राग द्वेष अभिनिवेश उनका संपूर्ण रूप से आपको विनाश करना है जिसको कि यम नियम कहते हैं सत्य अहिंसा अस्ते अपरिग्रह ब्रह्मचर्य तप शोच संतोष स्वाध्याय ईश्वर प्रि दन इन 10 को अपने जीवन में उतारना है फिर उसके बाद में धीरे-धीरे करके ये अपनी जो बाह्य बहिर्गाची करना है मन को एकाग्र करना है ईश्वर के ऊपर में करें कि अपने हृदय में स्थित आत्मन के ऊपर में करें तो यह करके हमको ईश्वर प्राप्ति करनी है या तो फिर आत्म साक्षात्कार करना है यह हो गया धर्म का उदय या तो फिर धर्म का सूर्योदय जो महापुरुष जो संत जो अवतार सब सर्वप्रथम अपने जीवन में साधना करके धर्म को उस आध्यात्मिकता को जैसे कि एक नव जीवन प्रदान करता है फिर इसी संत महापुरुष अवतार पुरुष आचार्य उन्हीं के जो धीरे-धीरे करके एक जो वंशावली जो उनको उनकी जो टीचिंग्स को उनके आदेशों को उनकी शिक्षाओं को उनके द्वारा रचित साधन पद्धतियों को धीरे-धीरे करके युग युगांतर तक वहन करती जाती है किंतु एक समय आएगा कि यह जिस अवतार ने जिस संत ने जिस सिद्ध महापुरुष ने बाह्य रिचुअल्स के से भी ज्यादा अपने अंतर के शुद्धीकरण अंतर की एकाग्रता अंतर की निर्मलता उसके ऊपर में सबसे ज्यादा भार दिया था तो धीरे-धीरे करके वे जो उनके जो वंशज होते हैं उनके शिष्य होते हैं उनका मन बहिर्मुखी शुद्धि हुई है भीतर में संस्कार शुद्धि हुई है कि नहीं है भीतर में आंतरिक हम निर्मलता प्राप्त हुए हैं कि नहीं है मन एकाग्र है कि नहीं है वह सब जाने दीजिए किंतु बाहर के जितने भी रिचुअल्स है उसको बड़ा ही कठोर रूप से उसका पालन करना है और रिचुअल्स में कहीं पे कुछ भी गलती हो गई तो बस इस तरह से वे लोग आचरण करना शुरू करेंगे जैसे कि पूरा पहाड़ उनके सर पे टूट गया है इस तरह का हमको कहीं-कहीं पर दिखता भी होगा हमने पढ़ा भी होगा यह मूवीज वगैरह में हमने टीवी पर कहीं देखा भी होगा कि इतने सारे बाह्य आचार विचार पर भार देते हैं जिससे कि ऐसा होता है भीतर का सब कुछ खत्म हो गया हो अपने हिंदू धर्म में इस तरह की बाह्य आचार विचार यह नाथ और जात प्रथा कास्टि जम जिसको कहते हैं उसने इस तरह से भयावह वह स्वरूप धारण किया था कि जैसे कि पूरे हिंदू धर्म का प्राण उसने चूस लिया था खून चूस लिया था वैंपायर की तरह तो जो भी है अभी यह जो वैदिक धर्म के उदय और अस्त की जो हम बात करें तो वोह उदय किस तरह से हुआ अस्त किस तरह से हुआ इसके बारे में हमारा हिंदू धर्म इट सेल्फ बहुत ज्यादा कुछ नहीं बताता य हमको बौद्ध धर्म से जानने को मिलता है कि यह बलि प्रथाएं फिर यह बड़े-बड़े होम बड़े-बड़े यज्ञ यह बाह्य आचार्यों ने इस तरह से हमारी प्रजा का हमारे राजाओं का खून चूस लिया कि धर्म के भीतर में सार कुछ नहीं रहा बाहर से एक खोखला आकार मात्र रह गया तो फिर वही वह धर्म के नए तरह से भारत में धर्म को प्राण देने के लिए धर्म को नव जीवन देने के लिए भगवान बुद्ध का आगमन हुआ भगवान बुद्ध ने बाह्य आचार विचार प्रथाओं को इग्नोर करके अपने हृदय में फिर से वही धुनि प्रज्वलित की जो कि वेदिक ऋषि मुनियों ने की थी वैदिक अवतारों ने की थी भगवान राम भगवान कृष्ण ने की थी वही साधन भजन अनंत साधना की वह धुनि भगवान बुद्ध ने फिर से प्रज्वलित की उन्होंने फिर से निर्वाण प्राप्त किया और फिर यह बुद्धिज्म या तो बौद्ध धर्म का भारत में आगमन हुआ प्रारंभ हुआ विकास ने लगा और आखिर में वही बौद्ध धर्म के साथ में वही हुआ जो कि हिंदू धर्म वैदिक धर्म के साथ में वैदिक युग में जो हुआ था आखिर में बाह्य आचार विचार इतने बहुत ज्यादा मने बड़ा आकार धारण कर लिया कि जिसने कि बुद्धिज्म का प्राण हर लिया बुद्धिज्म की चेतना को खा गया बुद्धिज्म का जो सार था उसका जो स्पिरिट था उस स्पिरिट को यह बाह्य आचार विचार खा गए इसको कि हम यह स्वामी जी का प्रवचन है माय प्लान ऑफ कैंपेन इसमें स्वामी जी स्वयं कहते हैं हम लोग जो भारत का इतिहास पढ़ते हैं आजकल और हम यह सोचते हैं पिछले 1000 साल की गुलामी क्यों हुई क्योंकि यह विदेशी हत्यारे भारत में आकर के हत्या जोर जुल्म करने लगे हमारा शोषण करने लगे इसलिए किंतु इससे पहले भी एक स्वामी जी कहते हैं कि इससे पहले जो डिजास्टर जो होना था भारत के साथ में वह उससे पहले ही हो गया था यह विदेशी जुल्मी यह विदेशी आक्रमणकारी जब भारत में आए उस समय ऑलरेडी भारत भीतर से टूट गया था इसलिए बाह्य आक्रमणकारियों बड़े आसानी से हम पर राज कर पाए और भीतर से भारत टूटा क्यों जिस तरह से वैदिक सभ्यता का अंत आया था सूर्य सूर्योदय हुआ था सूर्यास्त हुआ था वैसे ही बुद्धिज्म का भी बौद्ध धर्म का भी सूर्यास्त हो चुका था यही सब एक के बाद एक रिचुअल्स में सबको जोर जबरदस्ती करके कहा गया कि आप सन्यास धारण कीजिए भिक्खू भिक्खू निया हो जाइए वरना कोई उपाय नहीं है किंतु फिर वस्त्र पहनने से तो गेरुआ कपड़े पहनने से तो नहीं होगा मस्तक मुंडन करने से ही तो नहीं होगा आप जब तक भीतर में परिवर्तन नहीं आएगा आप साधन भजन की ध्वनि प्रज्वलित नहीं करेंगे आप रात के बाद रात बैठ कर के जब ध्यान एकाग्रता ध्यान मेडिटेशन कंसंट्रेशन यह सब क्रियाएं नहीं करेंगे तब तक आपका धर्म किस काम का आपका बाहर के कपड़े पहनने किस काम के मठ में रहना किस काम का वह तो सिर्फ आपने बाहर से दिखावा कर रहा है भीतर में खाली है तो धीरे-धीरे करके अनाचार दुराचार प्रवेश कर जाएगा जो कि बुद्धिस्ट जज में हुआ था तो यह बुद्धिज्म का भी वही हुआ आखिर में और भगवान बुद्ध ने निर्वाण प्राप्त किया वहां से प्रारंभ होकर के यह बड़े-बड़े मठ बने वहां पर यह भिक्खू भिक्खू रहते थे सब तरह का अनाचार चलता था तो वह बुद्धिज्म का अंत आया इसके बाद में जैसे ही बाह्य आक्रमण स्टार्ट हुए साथ में ही देखिए कि यह शंकराचार्य है रामानुजाचार्य है वगैरे वगैरह आचार्यों का प्रादुर्भाव हुआ और हिंदू धर्म का पुनः जागरण हुआ रेनेसा हुआ इन लोगों ने प्रस्थान त्रय को पुनः जीवित किया प्रस्थान त्रय के ऊपर में भाष्य लिखे और अपनी-अपनी एक ब्रांच स्टार्ट की हमको पता है आज यदि हम देखें कि वेदांत की स्कूल कितनी है या तो फिर य स्ट्रीम्स कितनी है तो हमको पता है एक तो द्वैत है एक विशिष्ट अद्वैत है और यह अद्वैत है यह तीन मुख्य है इसके बाद में और भी बहुत सारी है तीन में भी यदि साधन पद्धति के माध्यम से देखा जाए तो दो ही है एक तो अद्वैत वेदांत या तो फिर यह अजात वाद वाला यह ज्ञान मार्ग और यह द्वैत वेदांत या तो विशिष्ट अद्वैत वेदांत वाला भक्ति मार्ग तो यह ज्ञान मार्ग और यह भक्ति मार्ग यह दो क्लासिकल हिंदुइज्म आज जिसको कहते हैं या तो फिर यह मिडिल एजेस में यह दो ब्रांचे स्टार्ट हुई और इसके अलावा जो बुद्धिज्म जो था वह जो डिग्रेड होना शुरू हुआ था उसमें से और यह भारत में एक शक्ति प्रथा शक्ति साधना पहले से ही थी यह तंत्र साधना शक्ति साधना और फिर ये डिग्रेडेड बुद्धिज्म जो है उसके कुछ अंश मिलित होकर के वह एक स्ट्रीम चली आ रही थी यानी कि बुद्धिज्म के अंत के बाद में जिसको कि हम शंकराचार्य का युग कहते हैं उस समय हमको तीन मेजर स्ट्रीम्स दिखती है भारत में एक तो है शक्ति साधना दूसरा है ये ज्ञान मार्ग शंकराचार्य के अद्वैत वेदांत का और तीसरा है यह भक्ति मार्ग जिसको कि यह अपने नरसिंह मेहता है मीराबाई है चैतन्य महाप्रभु है और भी साउथ में भी बहुत सारे संत है जिनको कि अवतार भी कह सकते हैं बहुत सारे प्रकट हुए उस समय और तीन ब्रांचेस को उन्होंने जन्म देकर के या तो फिर जन्म देकर के कहना उचित नहीं है परिपट्स में फिर से प्रचार करना शुरू किया अभी देखिए कि यह जो युग था शंकराचार्य का और यह जो तीन ब्रांचेस का व भारत में वैसे तो चलते आ रहे थे किंतु जैसे होता है ना कि हमेशा से जो किसी भी धर्म के साथ में कि जब उसके जो फाउंडर होते हैं वह प्योर स्पिरिचुअलिटी से जो चालू करते हैं प्रारंभ करते हैं तो उसका अंत कहीं पे यह बाह्य आचार विचार पे आकर के अटक जाता है तो यह जो अपना क्लासिकल हिंदुइज्म है शंकराचार्य के द्वारा प्रारंभ किया हुआ शंकराचार्य के द्वारा रेनेसा हुआ उसके बाद में बाकी सब आचार्य आकर के मिले बाकी सब संत महात्मा आकर के मिले यह तीन ब्रांच को पूरे भारत में उसका स्प्रेड हुआ प्रचार हुआ किंतु यह जो नाथ और जात की जो प्रथा है उसने भी धीरे-धीरे करके यह अपनी स्पिरिचुअलिटी थी उसका खून चूसना प्रारंभ किया और भीतर से जैसे कि खोखला बना कर के रख दिया अभी संत महापुरुष जो होते तो हैं किंतु जब समाज इतना हैवी हो जाता है इस तरह के बाह्य रिचुअलिज्म से रिचुअलिस्टिक ऑब्जर्वेशन से तो फिर यह संत महापुरुष भी बेचारे कुछ नहीं कर पाते उसके बाद में अवतार का आगमन अवश्यंभावी है अवतार के आगमन का प्रयोजन है बिना अवतार के इस तरह का जो महा एक जो बोझा लेकर के अपना समाज बैठा था उसका कोई कुछ कर नहीं पाता तो फिर भगवान श्री रामकृष्ण देव का आगमन हुआ हमारे हिसाब से यह चतुर्थ युग भारत में प्रारंभ हुआ है आध्यात्मिक और वही फिर से वह साइकल स्टार्ट हुई है भगवान श्री राम कृष्ण ने पूर्ण सिद्धि प्राप्त की और फिर पूर्ण सिद्धि प्राप्त करके उन्होंने अपनी विचारधारा का स्वामी विवेकानंद के माध्यम से पूरे विश्व में प्रचार करना प्रारंभ किया अभी देखिए कि हम तो इस विचारधारा या तो यह चतुर्थ युग के बिल्कुल प्रारंभ में ही खड़े हैं जनरली आध्यात्मिक धार्मिक युग आप देखेंगे कि 1000 2000 हजार साल तो एटलीस्ट चलते हैं आराम से चलते हैं बुद्धिस्ट युग देखिए कि वह आज बुद्धिज्म को आई थिंक 2500 इयर्स ना कि इतना कुछ हुआ है तो यदि भारत का बुद्धिज्म भारत में जो उसका रास होना शुरू हुआ वह आज से ऑलमोस्ट 1000 साल पहले भारत में जब विदेशी आक्रमण प्रारंभ हुए उस समय के आसपास से या उससे पहले तो अर्थात कि बुद्धिज्म अपने फुल फॉर्म में ऑलमोस्ट 1500 इयर्स के आसपास चला था तो स्वामी जी ने भी एगजैक्टली यही टाइमलाइन अपने श्री रामकृष्ण देव के बारे में कही है उन्होंने कहा है कि ऑलमोस्ट 1500 साल तक यह मिशन चलेगा अपना तो अभी देखिए कि ठाकुर के जीवन में एक बात क्या है उनका यदि उनकी साधना उनकी विचार सरणी यह सबका स्टडी करेंगे तो हमको सबसे पहले क्या पता चलेगा कि भारत में यह जो तीन स्कूल थी तीन ब्रांचेस थी धर्म और आध्यात्मिकता की जो कि उस समय वर्तमान थी उन तीनों ब्रांच की साधना उन्होंने अपने जीवन में की है शंकराचार्य द्वारा प्रणीत ज्ञान योग की साधना की उनके गुरु तोतापुरी ने उनको वेदांत साधना करवाई यह जो शक्ति साधना की यह जो पूरी स्ट्रीम चली आ रही थी हजारों साल पुरानी उस शक्ति या तो फिर तंत्र साधना का अनुष्ठान भैरवी ब्राह्मणी ने करवाया और यह भक्ति स्कूल तो था ही भक्ति स्कूल में भी यह जटाधारी है या तो फिर यह मधुर भाव साधन है जिसका कि प्रचार चैतन्य देव ने किया था यह भक्ति साधना भी ठाकुर ने अपने जीवन में की है यानी कि ठाकुर के समय ठाकुर के पूर्व युग में जो तीन मेजर ब्रांचेस थी धर्म की इन तीनों की साधना ठाकुर ने अपने जीवन में की है अभी हम लोग राम कृष्ण युग में आते हैं और हम लोग श्री राम कृष्ण देव के फॉलोवर होने के नाते अभी जब हम यह कहेंगे कि मुझे शास्त्र का अभ्यास करना है तो मैंने जब ट्रेनिंग सेंटर में भी जाकर के देखा और अपने संघ में ज्यादातर जिस तरह से मैंने देखा है हम लोग शास्त्र बोलकर के वेदांतिका चार्य की जो भाष्य है उसी को हम अपना फाउंडेशन मानते हैं किंतु हमको यह भी पता है कि यह भक्ति स्कूल भी है भारत में शक्ति साधना भी है अभी इसके बारे में ऊपर ऊपर से वैसे हम पढ़ते तो हैं किंतु फिलोसॉफिकल स्टडी ज्यादा करते हैं भक्ति स्कूल को समझना है तो द्वैत वेदांत आप समझिए रामानुजाचार्य श्रीधर भाष्य यह सब टिकाए आप पढ़िए किंतु भक्ति स्कूल का ये जो डेवलपमेंट जिस तरह से हुआ है उसमें हम ज्यादा बहुत डिटेल में नहीं जाते और शक्ति साधना के बारे में तो ऊपर ऊपर से ही जान कर के यह सब चीजों को छोड़ देते हैं इसका कारण क्या है हालांकि ठाकुर ने तीनों की साधना बराबर की थी और तीनों का उपदेश भी वैसे तो उपदेश नहीं कहा जाएगा जनरली नहीं दिया है उन्होंने अधिकारी भेद से उन्होंने सभी को अलग-अलग तरह की साधनाएं करवाई थी तो हम लोग श्री राम कृष्ण देव के डिसाइल होकर के तीनों शास्त्रों का तीनों ब्रांच का स्टडी क्यों नहीं करते हैं उसका वो मैं सोच रहा था एक समय बाद में मुझे जो उत्तर मिला देखिए कि ठाकुर ने जो कोई भी साधना की है सिर्फ ठाकुर ही नहीं ठाकुर तुल्य जितने भी अवतार सिद्ध महापुरुष उन्होंने जहां पर भी जितनी भी साधनाएं की है उ सभी साधना हों का फाउंडेशन होता है त्याग या तो फिर ब्रह्मचर्य ब्रह्मचर्य के फाउंडेशन पर ही आप कोई भी आध्यात्मिक साधना कर सकते हैं जब तक ब्रह्मचर्य जीवन में नहीं होता त्याग जीवन में नहीं होता तब तक हम धर्म के रास्ते पर प्रथम डग भी नहीं लगाते हैं तो हालांकि ऐसा नहीं है कि प्रथम दिन ही आपको 100% ब्रह्मचर्य का पालन करना हो ब्रह्मचर्य पालन जीवन का एक अल्टीमेट मम है जो भी साधना हम करते हैं हमको वह ब्रह्मचर्य तक ले जानी चाहिए किंतु वोह एम स्पष्ट होना चाहिए वह जो ब्रह्मचर्य रूपी जो लक्ष्य है अपने जीवन का उस लक्ष्य को जिस दिन हम भूल गए दूसरे किसी ब्रांच में चले गए उसी दिन साधना नहीं करके धीरे-धीरे करके वही करप्शन हमारे हृदय में प्रवेश करेगा जिस करप्शन ने भारत को तीन बार हमारी आध्यात्मिक धरोहर को तोड़ दिया है तीन बार ऐसा हुआ है कि वैदिक युग का भी अस्ताचल हुआ बौद्धिक युग का भी हुआ और शंकराचार्य के युग का भी हुआ तो अभी अभी ऐसा तो क्या है कि ऐसा कुछ भी नहीं है जो करके आप काल की गति को रोक सकते हैं यह 1500 साल की यह जो साइकल है मुझे ऐसा लगता है कि यह जैसे कि हमेशा के लिए लिखी गई है हमारे नसीब में सोसाइटी के नसीब में 1500 साल के बाद कहीं ना कहीं से यह करप्शन आएगा ही आएगा नए अवतार को आना ही पड़ेगा सो खैर अभी 1500 साल के बाद क्या होगा पता नहीं किंतु अभी सोसाइटी के साथ जो कुछ होना है हो एज ए इंडिविजुअल साधक मुझे अपना काम कर लेना है इंडिविजुअल साधक मुझे अपना खुद का रास्ता बना लेना है ऐसा ना हो जाए कि मेरे खुद के जीवन में यह करप्शन आ गया और मेरी साधना पथभ्रष्ट हो गई और मैंने जो त्याग वगैरह किया था वह सब नष्ट हो गया हालांकि जैसे भगवान कृष्ण कहते हैं स्वल्प अयस्य धर्मस्य त्रय दे महतो भया थोड़ा सा अल्प मात्रा में किया हुआ धर्म भी वैसे तो हम को बहुत दूर तक ले जाता है किंतु फिर एक बार हमने प्रारंभ किया तो अपनी नाच समझ से या तो फिर नादानी से या तो फिर हमारे इग्नोर के कारण हम क्यों पथ भ्रष्ट हो जाए यदि पथ भ्रष्ट होना है तो एटलीस्ट अपनी दृष्टि क्लियर होनी चाहिए जिस समय में यह सब प्रारंभ करता हूं पथ भ्रष्ट होने का मुझे एकदम क्लियर पता होना चाहिए कि मैं जो कर रहा हूं वह गलत है फिर अपनी इंद्रियों पर हम कंट्रोल नहीं कर पाते हैं दैट इज अनदर थिंग किंतु अज्ञान के मारे उस रास्ते पर चले गए वह तो बहुत ही बुरा रहेगा तो बेटर है कि अपनी दृष्टि अपनी अंडरस्टैंडिंग एकदम क्लियर करके रखे कि शास्त्र है क्या और शास्त्र का अर्थ क्या है वह है साधन भजन के द्वारा ईश्वर प्राप्ति जैसे कि ठाकुर ठाकुर वैसे ठाकुर के पास में तीनों ब्रांचेस के यह आते थे सिद्ध महात्मा गुरु आचार्य किंतु ठाकुर उनके पास में बैठ कर के सबसे पहले साधन भजन की पद्धति सीख लिए थे और साधन भजन करके सिद्धि प्राप्त कर ली थी जैसे कि वो कहते हैं ना कि वो कोई आम आम के बागान में गया आम के पेड़ के नीचे खड़े रह कर के ये पेड़ की कितनी डालियां है कितने पत्ते हैं वो गिन रहा है कोई है कि आम के पेड़ में से आम तोड़ कर के आम खा कर के रुष्ट पुष्ट हो रहा है तो शास्त्र का भी ऐसा है शास्त्र में विचार बहुत सारे हैं तीनों ब्रांचेस में किंतु तीनों ब्रांचेस का यह जो सार तत्व है साधन पद्धति व जान के उसका प्रारंभ करके अपने जीवन को धन्य कर देना है तो यहां पर अभी यह जो प्रश्न था हमारे सामने कि अपने संघ में वेदांत रूपी शास्त्र को ही सर्व प्रधान्य क्यों दिया जाता है तो उसका उत्तर यह है कि वेदांत में बिल्कुल अनइक्विवोकली माने कि एकदम क्लियर कहा गया है कि त्याग ही साधना का फाउंडेशन है जबकि यह शक्ति साधना है या तो फिर यह भक्ति मार्ग है उसमें देखेंगे कि त्याग की महिमा गाई गई है किंतु भक्ति साधना में ईश्वर के प्रति निष्ठा उसके प्रति शरणागति वही सर्वोच्च आदर्श माना जाता है और शक्ति साधना में और भी बहुत सारी चीजें होती है भले ही चाहे आपको कहा गया हो कि अ विभिन्न तरह के आसनों में सिद्धि प्राप्त करनी है किंतु वह जिस तरह की यह साधन पद्धतियां है वह इतनी भयानक है कि साधक का मन थोड़ा सा भी विचलित हुआ तो रास्ते में गिर सकता है जो कि हम स्टडी करेंगे तो यहां पे बिकॉज की यह त्याग की महिमा स्पष्ट रूप से वेदांत शास्त्र में कही गई है इसके लिए रामकृष्ण संघ में हम लोग वेदांत शास्त्र के अभ्यास के ऊपर में सबसे ज्यादा भार देते हैं किंतु राम कृष्ण श्री राम कृष्ण देव के अनुयाई होने के नाते हमारे मन में यह आईडिया क्लियर होना चाहिए कि तीनों ब्रांच को ठाकुर ने समान प्राधान्य दिया था तीनों का समान रूप से अभ्यास भी किया था तो अभी यहां तक तो हम आए अभी हमारे सामने प्रश्न होगा कि हमको यदि शास्त्र अभ्यास प्रारंभ करना है तो हम कहां से करें कैसे करें क्योंकि देखेंगे तो ऑलरेडी प्रस्थान त्रय को तो हमने देखा प्रस्थान त्रय के ऊपर में शंकराचार्य के भाष्य को भी देखा किंतु साथ साथ में हमको यह भी पता है कि भक्ति शास्त्र एक विराट शास्त्र परंपरा है शक्ति साधना हों का अपना आगम निगम ये तंत्र वगैरह बहुत सारे तंत्र शास्त्र है तो फिर हम लोग कहां से प्रारंभ करें किस तरह से आगे बढ़े तो वह सब सोचने से पहले भी जो कि हम लोगों के लिए सबसे पहले फाउंडेशन क्लियर होना चाहिए वह फाउंडेशन है श्री राम कृष्ण विवेकानंद साहित्य अपना साहित्य का अभ्यास करके हमको साधन पद्धति किस तरह से इस्तेमाल करनी है साधना किस तरह से करनी है वह बड़ा ही क्लियर हो जाता है जिससे कि यह विभिन्न शास्त्रों का अभ्यास करके भविष्य में हमारे मन में किसी तरह का कंफ्यूजन ना खड़ा हो क्योंकि जो वो तीनों शास्त्र का युग जो है वह बीत गया है आज आज हम श्री राम कृष्ण युग में जी रहे हैं तो श्री राम कृष्ण देव को नहीं समझेंगे जब तक क्योंकि यह युग उपयोगी शास्त्र होते हैं तो वह तीनों शंकराचार्य के समय में रचित हुए थे ये तीनों ब्रांच को नवजीवन मिला था तीनों ब्रांच को रिफॉर्मूलेशन नहीं समझ कर के हम यदि उसका स्टडी करने का प्रारंभ करेंगे तो कहीं नाना कहीं पर हमारे मन में 10 तरह के कंफ्यूजन होने की संभावनाएं शक्यता एं खड़ी हो जाती है बेटर है कि हम अपने मन में अपनी साधना में रामकृष्ण विवेकानंद मां शारदा देवी का स्ट्रांग फाउंडेशन लगा दे हमारे लिए यह प्रस्थान त्रय है ठाकुर महा स्वामी जी तो हमारे प्रस्थान त्रय का एक स्ट्रांग फाउंडेशन लगा दे उसके बाद में एक थियोरेटिकल स्टडी के रूप में हम शास्त्रों का अभ्यास कर सकते हैं क्योंकि हमारे लिए जो साधन पद्धति है वह हमारे प्रस्थान त्रय में स्पष्ट रूप से वर्णित है वही करने की जरूरत है बाकी जो दूसरे दूसरे युग के शास्त्रों का अभ्यास करेंगे भी तो वह हमारी एक जिज्ञासा निवारण के लिए है आध्यात्मिक साधना में हमको बुट मिलेगा उसमें कोई प्रश्न नहीं है रामकृष्ण विवेकानंद साहित्य के कुछ-कुछ पॉइंट्स जो कि शास्त्र के अभ्यास से बड़े ही क्लियर हो जाएंगे उसमें कोई प्रश्न नहीं है श्री राम कृष्ण देव का जीवन और साधना के ऊपर में हमको नया प्रकाश मिलेगा कि किस तरह से ठाकुर ने मधुर भाव की साधना की तो उसके पीछे सेंचुरी ऑफ स्टडी प्रैक्टिस ये है उसके पीछे वैष्णव आचार्यों के वो जानकर के ठाकुर की मधुर भाव साधना है ठाकुर की शक्ति साधना है या तो फिर ठाकुर की वेदांत साधना है इस सबके ऊपर में एक नया प्रकाश हमको मिलेगा व्हिच इज इंटेलेक्चुअली वेरी सेटिस्फाइंग व्हिच इज हमारी क्यूरियोसिटी इतनी विशाल होनी चाहिए रामकृष्ण संघ का यह जो सबसे बड़ा एक कहेंगे कि प्लस पॉइंट है कि हम लोग बुद्धि को कभी मार नहीं देते हैं ऐसा कभी नहीं कहते कि बुद्धि सीमित होनी चाहिए देखिए स्वामी जी जब अमेरिका से वापस आए भारत में बेलम की स्थापना की वहां पर वह नए आए हुए साधुओं के लिए विभिन्न तरह के क्लासेस कंडक्ट करवा रहे थे उसमें निवेदिता जाकर की यह मॉडर्न जियोग्राफी है मॉडर्न साइंस है वगैरह सिखाती थी अभी प्रश्न होगा कि नए आए हुए साधुओं के लिए यह सब सीखने की क्या जरूरत है किंतु स्वामी जी ने खुद ने कहा था कि हमको भारत छोड़ कर के दूसरे देशों की यात्रा करनी चाहिए देखना चाहिए कि वे लोग किस तरह से विकसित हो रहे थे हो रहे हैं तो तो हमारा बौद्धिक विकास हमने कभी भी एक वन ट्रैक पर लाकर नहीं खड़ा किया हमारा बौद्धिक विकास हमने कभी भी यह कह के कुंठित नहीं कर दिया उसको हमने इस तरह से जैसे कि उसको तोड़ नहीं दिया कि आपको सिर्फ शास्त्र का ही पाठ करना है और कुछ नहीं करना है या तो फिर हमको सिर्फ कथामृत वगैरह का ही पाठ करना है और कुछ नहीं करना है जो कि और कहीं-कहीं पर होता है तो ये इंटेलेक्चुअल क्यूरियोसिटी मुमुक्षु तोव ये इंटेलेक्चुअल सेटिस्फेक्शन व्हिच इज इंटीग्रल पार्ट ऑफ रामकृष्ण विवेकानंद ट्रेडिशनल में रख कर के कि हमारी साधन पद्धति तो हमको रामकृष्ण विवेकानंद साहित्य से ही लेनी है हमको जो एक अपना एक जो मोरल कंपास होता है यानी कि क्या सही है क्या गलत है वह निर्णय तो हमको रामकृष्ण विवेकानंद के उपदेशों के माध्यम से ही लेना है इन के जीवन प्रसंगों के आधारित ही लेना है किंतु इनके उपदेश इनकी साधनाएं इनके जीवन प्रसंग पे और एक गहरा दृष्टिपात करने के लिए एक गहरा एनालिसिस करने के लिए शास्त्र हमको बहुत काम में आ सकते हैं यदि कहीं पर भी प्रश्न होगा कि ठाकुर ने इस तरह की बात क्यों कही है स्वामी जी ने इस तरह से क्या क्यों कहा इसका क्या हमको रेफरेंस है इसका इसका फरदर एक्सप्लेनेशन क्या है तो शास्त्र को पढ़ कर के मिल सकता है किंतु शास्त्र के स्टडी का जो फाउंडेशन है वह यही है कि वह रामकृष्ण विवेकानंद भावधारानी के लिए टू फर्द अंडरस्टैंड राम कृष्ण विवेकानंद लिटरेचर राम कृष्ण विवेकानंद साधन पद्धति नहीं कि शास्त्र को हमको ट्रेडिशनल रूप में अभ्यास करना है देखिए शास्त्र को ट्रेडिशनल रूप में अभ्यास करने का भी एक विधि है कि आप बचपन से ही संस्कृत सीखिए उसके बाद में जितने भी संहिता पोर्शन है उपनिषद पोर्शन है उसको मुख स्त कर दीजिए बचपन से ही इस तरह के आचार्यों के सानिध्य में रहिए जो लोग फिर ट्रेडिशनल पंडित है उस तरह के शास्त्र के और इस अब जिस तरह से चैटिंग करना है जिस तरह से आपको ब्राह्मण लाइफस्टाइल आपका होता है जिस तरह का आहार करना होता है अध्ययन अध्यापन और इस तरह से वह जो ब्राह्मण लोगों का जो होता है कि वह खुद पढ़ा सुना पढ़ाई लिखाई करेंगे दूसरों को सिखाएंगे और भिक्षा मांग के रहेंगे तो य यह जो ब्राह्मण लाइफस्टाइल है या तो फिर जिस तरह की लाइफस्टाइल वो पार्टिकुलर शास्त्र में कही गई है उसको फुल आप फॉलो करेंगे तो आप ट्रेडिशनल आप उस शास्त्र को सीख सकते हैं किंतु अभी हम सभी लोगों के साथ में एटलीस्ट मैं आप जो जिन लोगों को पहचानता हूं मैं खुद की बात करूं तो वो अभी मेरे से तो संभव कभी नहीं है मैं तो प्राय आई थिंक 181 साल की उम्र में यह सब सीखने का प्रथम प्रयास मैंने किया है 16 साल की उम्र में आई थिंक यह सब पहली बार मेरी आंखें खुली और यह सब पढ़ना शुरू किया बाय दैट टाइम जिस तरह से एक ब्राह्मण बालक को रहना चाहिए उपनयन विधि करके वह शास्त्र अभ्यास करना चाहिए संस्कृत सीखना चाहिए वह समय तो मेरे लिए समाप्त हो गया था आज मुझे संस्कृत आता है वैसे इतना बुरा भी नहीं है किंतु शास्त्रों का अभ्यास करने लायक संस्कृत तो मेरे पास में नहीं है मुझे तो जो भी सीखना है पढ़ना है ट्रांसलेशन के ऊपर में रिलाई करके ही चलना होगा तो मेरे लिए तो वह पूरा मामला वह हो गया है समाप्त जो भी अभी मैं स्टडी करता हूं वह ऊपर ऊपर से स्टडी होगा ट्रांसलेशन स्टडी करते हैं और ट्रांसलेशन में भी देखिए यहां ने से पहले यानी कि ठाकुर मा स्वामी जी को पढ़ने से पहले मैं वह कुछ-कुछ उपनिषदों गीता में एक बार पढ़ा था अभी यह जो वहां से जो पब्लिश होता है गोरखपुर से गीता प्रेस से तो वो गीता में पढ़ रहा था तो अच्छा लग रहा था कि वहां पर परमात्मा परमात्मा सब लिखा है परमात्मा यह वो वगैरह वगैरह किंतु मैं जब ठाकुर का खास करके स्वामी जी का अभ्यास स्टार्ट किया वेदांत क्या है समझ में आया संस्कृत पढ़ कर के और ऑलरेडी मुझे संस्कृत आता था किंतु क्या है कि संस्कृत का एक डर रहता है तो मैं ओरिजिनल श्लोक को इतना नहीं देखता था ट्रांसलेशन शिप पढ़ता रहता था किंतु जब मैं ट्रेनिंग सेंटर में जाकर के ओरिजिनल श्लोक प ध्यान देना शुरू किया तब मुझे पता चला कि ओरिजिनल श्लोक में जहां-जहां प भी आत्मा लिखा है उसका ट्रांसलेशन हिंदी में इन लोगों ने परमात्मा कर दिया है अभी यह दोनों कंप्लीट डिफरेंट कांसेप्ट है पहले यदि मुझे यह बात पता भी चलती कि आत्मा का परमात्मा किया है तो मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता अच्छा ठीक है जो होगा सो होगा आत्मा और परमात्मा में क्या डिफरेंस है ट्रेनिंग सेंटर में जाकर के वेदांत और यह सब पढ़कर पता चला कि अरे ये आत्मन यानी कि यह जो टर्मिनोलॉजी है इट बिलोंग टू ज्ञान स्कूल और यह परमात्मा है दैट बिलोंग टू भक्ति स्कूल आत्मा ज्ञान मार्ग में आत्मन कहते हैं परमात्मा को भक्ति मार्ग में कहते हैं अभी ऐसा नहीं है कि परमात्मा आपके ज्ञान मार्ग में नहीं है या तो फिर भक्ति मार्ग में आत्मा नहीं है किंतु यह शब्द ऐसे हैं कि आपको वही पहले स्ट्राइक होगा और यह जो वेदांत है आत्मन है वगैरह वगैरह मुझे सही बताऊं तो टीसी में ही सबसे पहले समझ में आना शुरू हुआ था उसके पहले जो ट्रेडिशनल अंडरस्टैंडिंग होती है कि हां एक भगवान है आकाश में वही हमारा सब कुछ है वगैरह वगैरह तो ये गीता पढ़ कर के भी मुझे वही लगा था कि वह भी इस तरह की बातें कर रही है तो देखिए कि कभी-कभी इतने स्टैंडर्ड पब्लिकेशन भी किस तरह से इंटेंशनली या अनइंटेंशनली हमारे मन को भ्रमित करते हैं तो बेटर है कि संस्कृत ही पढ़ा जाए संस्कृत के आधार पर ही सब कुछ सीखा जाए किंतु खैर जैसे अपनी लिमिटेशन है कि संस्कृत आप इतना भी अच्छा नहीं है कि मैं प्योर संस्कृत के ऊपर में सब पढ़ पाऊं यदि मैं ट्रांसलेशन पढ़कर फिर ओरिजिनल श्लोक को देखूंगा तो मैं समझ जाऊंगा कि ट्रांस ट्रांसलेशन सही है कि गलत किंतु श्लोक पढ़ कर के आप जद कहेंगे ट्रांसलेशन करो तो वह शायद मेरे से नहीं होगा तो यह सब लिमिटेशन अपने पास में है दूसरा कि शास्त्रों की जो साधन पद्धति है वह उस युग की है इस युग की हमारे युग की नहीं है हमारे युग की साधन पद्धति दो जो कि एक तो भक्ति भक्ति योग राज योग और यह ज्ञान योग वो तो एक है जिसको कि हम प्योर स्पिरिचुअलिटी कहते हैं किंतु साथ में यह कर्म योग भी है शिव ज्ञाने जीव सेवा भी है और जब तक यह शिव ज्ञान जीव सेवा हम करेंगे नहीं अपने जीवन में तब तक हम लोग रामकृष्ण विवेकानंद साहित्य का जो एक यूनिकनेक्ट मणी लिखा गया है वैसे ही यह कथामृत और कंप्लीट वर्क्स लिखे गए हैं अलग क्या है इन सब में यह प्रश्न सीरियसली हो सकता है इसीलिए यदि हमको शास्त्र का अभ्यास ठीक से करना है तो सबसे पहले स्टेप होना चाहिए अपने शास्त्र अपने रामकृष्ण विवेकानंद साहित्य में वर्णित साधन प्रणाली का अनुष्ठान और अपने साहित्य में साधन प्रणाली कौन सी है एक तो जो कि हम एक्सटर्नल वर्ल्ड में जो अपनी साधना है शिव ज्ञान जीव सेवा और आंतर जगत में अपनी साधना है शरणागति त्याग और एकाग्रता भक्ति योग का एसेंस है शरणागति ज्ञान योग का एसेंस है त्याग और राजयोग का एसेंस है एकाग्रता तो एक र है शिव ज्ञान जीव सेवा दूसरी ओर है शरणागति एकाग्रता और त्याग यह चारों का अनुष्ठान करने के बाद में ही हम देखेंगे कि रामकृष्ण विवेकानंद साहित्य की यूनिकनेक्ट तो पहला स्टेप हो गया शास्त्रों का अभ्यास करने के लिए अपने अपने रामकृष्ण विवेकानंद साहित्य में वर्णित साधन पद्धतियों का अनुष्ठान उसका उसके बाद के दूसरा स्टेप है कि राम कृष्ण विवेकानंद साहित्य का गहराई से अभ्यास यह अभ्यास क्यों आवश्यक है अपनी चित्त शुद्धि के लिए क्योंकि हम साधन पद्धति साधन प्रणाली का अनुष्ठान तो करेंगे किंतु चित्त शुद्धि के लिए तो आशीर्वाद के अलावा और कुछ काम में नहीं लगने वाला है तो यह जो ठाकुर मां स्वामी जी डायरेक्ट डिसाइल के जीवन प्रसंग है एक के बाद एक हम जैसे-जैसे पढ़ते जाएंगे वैसे-वैसे ही जो निर्मल आनंद प्राप्त होगा वह निर्मल आनंद अपने हृदय को स्वच्छ करता जाएगा धोता जाएगा और अपना हृदय भी एक तरह से परिशुद्ध हो जाएगा तो यह परिशुद्ध हृदय हमको राम कृष्ण विवेकानंद साहित्य की गहराई में जाकर के करना है और यह जो चार साधन प्रणालियां है उस उसका अनुष्ठान करना है यह फर्स्ट और सेकंड स्टेप जब हो गया तब थर्ड स्टेप अपना होना चाहिए कि शास्त्र और रामकृष्ण विवेकानंद साहित्य के बीच की जो यह ब्रिज है जो लिंक है उसका अभ्यास करना यह लिंक क्या है जो कि अपने क्लासिकल शास्त्र को रामकृष्ण विवेकानंद साहित्य के साथ में कनेक्ट करता है वो लिंक है श्री राम कृष्ण लीला प्रसंग और श्री राम कृष्ण लीला प्रसंग का भी यह साधक भाव जो चैप्टर है या जो खंड है द्वितीय खंड वह है यह मिसिंग लिंक कि ठाकुर ने शास्त्रों का अभ्यास करके अभ्यास यानी कि किताब पढ़कर वैसे नहीं किंतु अपने गुरुओं के पास में से सीख करके उन्होंने किस तरह से साधना की और यह जो शरत महाराज है स्वामी शारदानंद जी महाराज उन्होंने इसका अर्थ घटन कैसे किया है अभी शारदानंद जी महाराज जो अर्थ घटन करते हैं एनालिसिस करते हैं हमको जो एक्सप्लेन करते हैं ठाकुर की साधना हों का महात्म्य वह वैसे उनकी खुद की बुद्धि से पूरा नहीं आया है बहुत कुछ तो ठाकुर खुद अपने डिसाइल्स को समझाते थे और बहुत सारा कुछ उन्होंने स्वामी जी के पास में ही सुना था तो यह शारदानंद जी द्वारा रचित लीला प्रसंग और लीला प्रसंग का भी यह साधक भाव चैप्टर खंड है वह खंड है एक मिसिंग लि ं रामकृष्ण विवेकानंद साहित्य और यह अपने शास्त्र के बीच में तो थर्ड स्टेप होना चाहिए यह साधक भाव खंड का अच्छे से अभ्यास और यह जब थर्ड स्टेप हो गया उसके बाद में फोर्थ स्टेप होना चाहिए कि जो तीन ब्रांचेस है हम लोग डिस्क्रिमिनेट नहीं करेंगे कि सिर्फ वेदांत में जाएंगे हम लोग तीनों तरह की ब्रांच का स्टडी करेंगे वेदांत भक्ति शस्त्र और शक्ति साधना तीनों का स्टडी करना है किंतु तीनों का स्टडी करने से पहले यह तीनों का सामंजस्य यह तीनों का अनुष्ठान तीनों का एसेंस श्री राम कृष्ण देव की साधना में किस तरह से प्रतिबिंबित होता है प्रतिफल होता है यह हमको एकदम क्लियर कर देना है तो थर्ड स्टेप हमारा है यह साधक भाव रूपी द्वितीय खंड श्री राम श्री श्री रामकृष्ण लीला प्रसंग पुस्तक का उसका अभ्यास और यह जब हो जाएगा उसके बाद में हम एक के बाद एक ब्रांचेस के फंडामेंटल शास्त्र को लेंगे अभी देखिए कि हम लोग अपनी जर्नी में कहां तक पहुंचे हैं साधना जो करनी है वह तो आपको अपने हिसाब से करनी है वह फर्स्ट स्टेप हम सबको अपने हिसाब से लेने हैं किंतु यह जो द्वितीय स्टेप है कि रामकृष्ण विवेकानंद साहित्य उपदेश प्रसंग इन तीनों इसका अभ्यास हम पिछले दो ढ साल से कर रहे हैं और बड़े डिटेल में कर रहे हैं तो मुझे लगता है कि वह फाउंडेशन अपना बड़ा क्लियर है और भविष्य में भी चलता ही रहेगा तो उसकी अभी चिंता हमको नहीं है अभी हम थर्ड स्टेज की ओर जाएंगे और वो है यह साधक भाव द्वितीय खंड का अभ्यास जब यह समाप्त हो जाएगा तब हम एक के बाद एक शास्त्रों के जो स्ट्रीम है स्कूल्स ये तीनों के जो फंडामेंटल शास्त्र है एक के बाद एक लेंगे तो अभी जिस तरह से हमारा क्लास का स्ट्रक्चर होने वाला है एक सप्ताह स्वामी जी एक सप्ताह ठाकुर ठाकुर का भी यह कथामृत और एक सप्ताह मां का जीवन और यह चतुर्थ सप्ताह है चतुर्थ सप्ताह में शास्त्र को जो हम स्टार्ट करेंगे उसका प्रारंभ करेंगे साधक भाव के अभ्यास से साधक भाव के एनालिसिस से जैसे ही यह साधक भाव हम पढ़ते जाएंगे वैसे ही पता चलता जाएगा कि यह तीनों जो ब्रांचेस है तीनों का एसेंस क्या है उस एसेंस को किस तरह से कार्यरत करना है उसको किस तरह से प्रैक्टिकल करना है ठाकुर ने किस तरह से उस एसेंस को लेकर के अपना अपनी साधन पद्धति को आगे बढ़ाया था वह एक बार समझ लेंगे तो तीनों तरह की ब्रांचेस का एक क्लियर आईडिया हमको हो जाएगा फिर उसके शास्त्र में हम जाएंगे और हम जिस तरह से शास्त्र अभ्यास करेंगे हम तो कोई ना ही ट्रेडिशनल पंडित है ना ही हम लोग कोई अ संस्कृत के स्कॉलर हैं तो हम जो स्टडी करेंगे नेचरली हमको ट्रांसलेशन के ऊपर में ही आधार रखना होगा किंतु अपना मन कभी भी भ्रमित ना हो इसके लिए हमको जो मोरल कंपास या तो फिर अपनी डायरेक्शन को क्लियर रखने के लिए पूरा रामकृष्ण विवेकानंद साहित्य अपनी साधना और ठाकुर की साधना यह जो पहले तीन स्टेजेस है वो तीनों स्टेजेस रेडी खड़ है कि हमको कहीं पर भी पथ भ्रष्ट ना होने दे किसी भी तरह का इंटेलेक्चुअल कंफ्यूजन अपने माइंड में ना खड़ा करने दे ना खड़ा होने दे तो इस प्रस्तावना के साथ में अभी कल से हम साधक भाव की आलोचना प्रारंभ करेंगे आज यहीं तक ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णा मस्तु जैसे वराह नगर मठर कथा वरा नगर नहीं आलम बाजार अ ठीक भूले गला खाने अर्थक्वेक होए से वरा नगर या कि आलम बाजार में हुआ था धरती कंप हुआ क्या सब लोग दौड़ कर के बाहर चले आए किंतु यह जो तुलसी महाराज है
प्रश्न: आज सुबह दिल्ली में भूकंप आया था
निर्मलानंद जी उन्होंने क्या किया भीतर में गए सब लोग बाहर जा रहे हैं वो अगे गए भीतर में और वो जो ठाकुर का जो यह था फोटोग्राफ था फिर ठाकुर के अस्थि व्यवहार य जो भी था रखा हुआ सब लेकर के वह दौड़ कर के बाहर चले आए तो सबने कहा अरे मर जाते तो क्या होता मने मकान टूटता अपने सर पर तो किंतु जो भी है अपना प्राण की रक्षा बाद में है ठाकुर की चीजों की रक्षा पहले है तो मैंने इंटरेस्टिंग स्टोरी दो रीजन है पहले तो स्वामी जी के
प्रश्न: हमारे संघ में स्वामी विवेकानंद ही एकमात्र ऐसे व्यक्ति थे जो शास्त्रों के अध्ययन पर ध्यान देते थे। ठाकुर और मा हृदय परिवर्तन पर अधिक ध्यान देते थे।
समय में रामकृष्ण विवेकानंद साहित्य लप ही नहीं हुआ था तो फिर वो बोले तो क्या बोले कि आप क्या पढ़ेंगे वो तो वहां पर थे और जब मास्टर महाशय ने कथामृत के जो प्रथम प्रथम चैप्टर भेजे तो कितने खुश हो गए थे यदि वो आज की तरह कथामृत लीला प्रसंग होता तो वो निश्चय कहते कि सबसे पहले इसका स्टडी करो अभी अपने मुंह से अपनी प्रशंसा भी कैसे करें ऐसा तो नहीं कह सकते कि पहले मुझे स्टडी करो या तो फिर ये जो शिकागो के लेक्चर ऑलरेडी पेंपलेट के रूप में वो डिस्ट्रीब्यूटर हो गए थे किंतु वो तो अपने मुंह से तो नहीं कह सकते ना कि इसका स्टडी पैरामाउंट है सो दैट वाज वन थिंग एंड सेकंड की जैसे हमने कहा कि खास करके स्वामी जी ने उपनिषद के ऊपर में जो भर दिया इसका अर्थ यही है कि एक तो आत्म श्रद्धा तो थी ही दूसरा कि यह त्याग और ब्रह्मचर्य व्हिच इज द फाउंडेशन ऑफ आध्यात्मिक साधना यह जो स्वामी जी अमेरिका अभी ये खुद देखिए कि स्वामी जी गोपी भाव में आकर के कितने गीत गाते हैं आप कथामृत पढ़ के देखिए कि वह भरे पड़े हुए स्वामी जी के इस तरह के गीतों से किंतु वही स्वामी जी जब अमे अका से भारत लौटे वहां पर नीलांबर गार्डन में वह जो भजन कीर्तन चल रहा है तो स्वामी जी ने क्या कहा कि अभी यह हजार साल के लिए उसको दूर कर दो अभी यह शिव के भाव से अपने को भर दो यह मर्दानगी वाला भाव चाहिए क्यों क्योंकि य मधुर भाव की साधना करते करते ब्रह्मचर्य का पालन करना कितना कठिन है ठाकुर जैसे चैतन्य महाप्रभु जैसे लोगों के लिए ठीक है हम लोग आम आत्मी है यह सब करने को जाएंगे शक्ति साधना मधुर भाव साधना कहीं पैर फिसल जाएगा कहीं गिरेंगे पता ही नहीं चलेगा तो बेटर है कि उपनि है वेदांत है शंकराचार्य की जो स्ट्रीम है अद्वैत वेदांत उसमें डूब जाओ अपने मन को त्याग वैराग्य से भर दो बाकी सब बाद में सो यह उनका इंटेंशन यह था किंतु अभी बिकॉज कि हमने यह क्लियर कर दिया है कि हम शास्त्र का अभ्यास कर रहे हैं अपनी जिज्ञासा निवारण के लिए नहीं कि साधन पद्धति सीखने के लिए वो अपना डिस्टिंक्शन बड़ा क्लियर है तो जिज्ञासा निवारण ही करना है हम तीनों तरह के शास्त्र को देख लेंगे हमको फिर वो टेंशन नहीं है क्यों कि हमारे सामने यह मोरल कंपास या तो गाइडलाइन ठाकुर महा स्वामी जी ने एकदम क्लियर दिया हुआ है सो बेस्ड ऑन दैट हम लोग जिज्ञासा वृत्ति निवारण के लिए सभी को देखेंगे यह जो आपने कहा ना कि फैमिलियरिटी ब्रीड्स कंटेंट वो विजय कृष्ण गोस्वामी का वोह फेमस है ना वो ढाका बाका हिमालय सब जाके आया ठाकुर के पास में और ठाकुर को बोल रहा है मैं सोच रहा था कलकाता के पास में यदि ऐसे महापुरुष बैठे हैं तो वहां जाकर और कितने बड़े-बड़े मिलेंगे तो सब घूम के दे देख लिया कि यहीं पर जो सार है यहीं पर है तो अपना भी यह शास्त्र पढ़ के पूरा जोपरा वो जो ये है ना कि कार्तिकेय और गणेश की कहानी व दोनों को कहा गया कि वो जगत का परिक्रमा करके आइए तो हार मिलेगा मां ने कहा तो ये कार्तिकेय अपने मयूर पर सवार होकर के वो पूरे जगत का परिभ्रमण करके आए तो वो उनके भाई गणेश मां की गोद में बैठे हैं वो हार पहन के तो उन्होंने क्या किया तो मां की परिक्रमा कर ली थी तो राम कृष्ण विवेकानंद साहित्य पढ़ के ही सब मिल जाएगा किंतु यह जगत परिक्रमा करके हमको पता चलेगा कि ना वो श्योर हो जाते हैं कोई डाउट नहीं रहेगा और दूसरा जो आपने लिंकेज की बात की ना शरद महाराज से हम स्टार्ट इसीलिए करते हैं क्योंकि जैसे हमने कहा कि ही इज द लिंक कि बिटवीन राम कृष्ण विवेकानंद साहित्य एंड शास्त्र अभी जैसे यहा मूत्र फल भोग विराग है या तो फिर यह मुमुक्षु है जो कि यह सब कंडीशंस है अपने शास्त्रों की ठाकुर के जीवन में किस तरह से रिफ्लेक्ट होता है वहीं से तो उन्होंने प्रारंभ किया है वेदांत शास्त्र का यानी कि वो लिंकेज वहीं से स्टार्ट होगी और नो डाउट जैसे-जैसे हम आगे जाएंगे शास्त्रों में उपनिषद लेंगे गीता लेंगे नारद भक्ति सूत्र लेंगे व जैसे ही जाएंगे तो ठाकुर म स्वामी जी के प्रसंग को बेस पे ही एक्सप्लेन करेंगे क्योंकि और किसी तरह का एक्सप्लेनेशन मुझे आता नहीं है ट्रेडिशनल एक्सप्लेनेशन यदि आपको संस्कृत बेस करना है वो मुझे आता नहीं है मेरे लिए यही एक उपाय है उसको एक्सप्लेन करने का देखिए वो सबको एक बार सुन लेना है उसका एक आनंद है जैसे मैंने कहा था ना मैं वहां पर साधना सदन में गया था वो ट्रेडिशनल पंडित आप प्योर संस्कृत में शास्त्र सिखाएंगे वो सुनने का एक आनंद है प्रॉब्लम वही है कि अपना वो बुद्धि नहीं है अपना वो स्टेइंग पावर नहीं है कि उसको लेकर जीवन निकाले किंतु एक बार सुन लिया वो साधना सदन की चैनल पर जाके वो एक बार सुन लीजिए बड़ा मजा आएगा किंतु फिर वो डेली ब्रेड एंड बटर है वह तो अपना ठाकुर म स्वामी जी है व बीच-बीच में कैसा वो लग्न वगैरह होता है तो बाहर में जाकर खा लिया किंतु वो डेली तो अपना घर का दाल भात रोटी ही खाना
प्रश्न: स्वामी विवेकानंद कहते हैं कि सेवा कार्य ऑब्जेक्टिव से अधिक सब्जेक्टिव होता है। अब इस सब्जेक्टिव सफलता को कैसे मापा जाए? हम कैसे जानें कि हम सही दिशा में आगे बढ़ रहे हैं? चरित्र निर्माण का मेज़रमेंट क्या है ?
है पहले तो कि किस तरह से मेजर नहीं करना है जैसे देखिए गल है ग के दो फाउंडर है वो सरग ब्रायन और दूसरे का में नाम भूल गया लेरी पेज यस तो अभी यह दो जो फाउंडर है वे लोग तो google2 पिचाई किंतु इन दोनों के पास में google2 पिचाई का नेट वर्थ होगा आपका 1 बिलियन न कि दो बिलियन इतना ही हालांकि काम बहुत करता है पैसा उसको एक दो बिलियन ही मिला है और वे लोग फाउंडर होकर के फिर निकल गए हैं और अभी बिलियंस ऑफ डॉलर 100 ना कि ऐसा कुछ बिलियन प दोनों लोग बैठे हुए हैं तो अभी आप आप क्या काम करते हैं उसका यह लोग जद मेजरमेंट करेंगे तो मेरा नेटवर्थ क्या है वह एक मेजरमेंट हो गया अब कितना ही सुंदर पिचाई की तरह लेबर करते जाइए किंतु लेबर आपका ज्यादा कन्वर्ट नहीं होता है नेटवर्थ में उन्होंने क्रिएटिव वर्क करके छोड़ दिया व्हिच इज उसका वैल्यू ज्यादा है किंतु वो रिफ्लेक्ट होता है आपके नेटवर्थ में रिफ्लेक्ट हो जाता है आप जद आपकी ये क्लेरिटी ना हो कि लेबर वर्क डे टू डे एग्जीक्यूटिव वर्क इंपॉर्टेंट है कि वो एक ओरिजिनल क्रिएटिविटी इंपोर्टेंट है ये शायद आपको ना पता चले लेकि तो आपकी नेटवर्थ से तो पता चलता है भाई यहां प इस तरह से ट्रांसलेट होता है तो वैसे ही यह हम जो बाहर के जीवन में जो कार्य कर रहे हैं अभी ऐसा नहीं है कि बाहर के जीवन के कार्य को इग्नोर करना है भीतर के जीवन के लिए यह कन्वर्ट होता है अपने चारित्र गठन में तो दोनों कितने क्लोजल लिंक है जब हम यह कहते हैं कि य वर्क इज मोर सब्जेक्टिव देन ऑब्जेक्टिव डंट मीन के वी इग्नोर ऑब्जेक्टिव ऑब्जेक्टिव करके तो सब्जेक्टिव मिलने वाला है आप कुछ नहीं किया वो दो फ की तरह ना ही क्रिएटिव वर्क किया ना ही एग्जीक्यूटिव वर्क किया तो कुछ नहीं मिलेगा आप ऐसा मत सोचिए कि बैठे-बैठे नेटवर्थ बढ़ेगा वो तो कुछ तो करना पड़ेगा व्हिच विल ट्रांसलेट इनटू नेटवर्क सो हियर आल्सो कि एक्सटर्नल वर्क शिव ज्ञान जीव सेवा इट विल ट्रांसलेट इनटू चरित्र बिल्डिंग ऑफ कैरेक्टर तो यह तो एक क्लेरिटी हुई दूसरा है कि अब ये जो जिसको हम कैरेक्टर बिल्डिंग कहते हैं वो भी क्या है अल्टीमेटली मैं अभी नेट वर्थ मेजर करना बड़ा इजी है कि इतने डॉलर है अपने पास में बट हाउ विल ला से के व्हाट इज द वैल्यूएशन ऑफ माय कैरेक्टर यदि यह देखना है 10 लोग मेरे सामने खड़े हैं मुझे एसएस करना है अभी राजा महाराज की तरह अत दृष्टि तो थे नहीं कि वोह जो वेजिटेबल कटिंग करते-करते वह जो आलू पड़ा था तो कितना सुंदर तरीके से आलू छिला गया है बोलकर के राजा महाराज ने कह दिया कि यह लड़के को आध्यात्मिक प्राप्ति होने वाली है वो लड़का था अपने शुद्ध जी महाराज जो कि वो डायरेक्ट डिसाइल के बाद में फर्स्ट प्रेसिडेंट हुए थे वो सो वो अंतर्दृष्टि तो अपने पास में है नहीं हाउ विल वी मेजर कि किसका क्या नेटवर्थ है मतलब वैल्यूएशन क्या है कैरेक्टर का दैट वैल्यूएशन इज त्याग त्याग इज द अंडरलाइन फाउंडेशन कि कितना मेरी विषय के तरफ दृष्टि जाती है और कितनी मेरी विषय से दूर जाती है ईश्वर की ओर कितनी जाती है वी डू नॉट नो व्हिच इज अगेन डिफिकल्ट टू मेजर किंतु विषय से मैं कितना विमुख होता हूं वो एक इजी मेजरमेंट है कि पहले मेरे इतने डिजायर्स थे अभी धीरे-धीरे करके यह डिजायर कम होना शुरू हुआ है बहुत अच्छे कपड़ पहनने हैं वो अभी मुझे नहीं अच्छा लगता 10 रेस्टोरेंट में जाएंगे वह भी अभी मुझे अच्छा नहीं लगता 10 मित्रों के साथ में बैठ के गप लगाते थे वो धीरे-धीरे करके कम हो गया एक मन अंतर्मुखी ये अभी यह खरीद करना है वो करना है वो वासना धीरे-धीरे कम हो रही है दैट इज द बेस्ट मेजरमेंट मने इजस्ट वे टू मेजर ए
प्रश्न: हम गृहस्थों को सबसे पहले क्या त्यागना चाहिए?
नहीं वि ऐसा नहीं सोच के कि मैं सर्वप्रथम क्या त्याग करूं त्याग को आपको ना ठाकुर पर छोड़ देना है कि ऑटोमेटिक भीतर से वह होता जाएगा त्याग को आप प्लान नहीं कर सकते जैसे कि ठाकुर ने कहा ना कि आप जैसे-जैसे सूरज की ओर जाएंगे वैसे-वैसे पृथ्वी से दूर होते जाएंगे जैसे आप उजाला बढ़ाएंगे वैसा ही अंधेरा कम होता जाएगा तो उजाला बढ़ाने पे यानी कि साधन भजन करने पर ज्यादा भार देना है फिर साधन भजन जैसे-जैसे करते जाएंगे वैसे-वैसे त्याग होता जाएगा और वह अपने आप होगा इवॉल्व होगा वो उसमें हमको प्लान करने की जरूरत नहीं रहेगी व्हिच इज अ बेटर वे ऑर्गेनिक जिसको कह ना आजकल वो पेड प्रमोशन और ऑर्गेनिक वो तो ऑर्गेनिक हो जाएगा ये