मङ्गलाचरण
ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिने अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः श्री श्री रामकृष्ण लीला प्रसंग इसका पाठ कर रहे थे स्वामी शारदानंद जी महाराज द्वारा लिपिबद्ध भाग दो साधक भाव। इसका प्रथम चैप्टर साधक और साधना। हमने देखा कि किस तरह से शारदानंद
भक्ति मार्ग द्वारा निर्विकल्प समाधि की प्राप्ति
जी शरद महाराज हमको वर्णन कर रहे हैं कि भक्ति मार्ग से निर्विकल्प समाधि या तो फिर भक्ति मार्ग से निर्गुण निराकार ब्रह्म को कैसे प्राप्त कर सकते हैं। यूजुअली भक्ति मार्ग है द्वैत या विशिष्ट अद्वैत की साधना जहां पे ब्रह्म का स्वरूप सगुण साकार बोलकर के निर्दिष्ट किया गया है। तो सगुण साकार ब्रह्म तक तो पहुंच जाएंगे। जिसको कि कहते हैं सविकल्प समाधि या तो फिर सज समाधि। वहां पे ईश्वर रह जाते हैं। यूजुअली निर्विकल्प समाधि का अर्थ है कि सब वृत्तियां मन की वो शेष हो जाए। मन संपूर्ण रूप से वो उसका मृत्यु हो जाए और ब्रह्म भाव ही मन के भीतर में रहे। तो वह संपूर्ण रूप से अपने को निशेष कर देने की जो प्रक्रिया है वह है निर्विकल्प समाधि तक की यात्रा। किंतु यह जो भक्ति मार्ग है वह कहां तक हमको ले आता है? दुनिया भर के विचार है हमारे मन में। वह सब विचारों को हटा के सिर्फ एक ईश्वर वृत्ति ईश्वर के ऊपर में मन केंद्रित किया है। ईश्वर आकारित वृत्ति एकमात्र रह जाती है। तो उस स्टेप तक हमको यह भाव या तो फिर भक्ति साधना लेकर के आती है। भाव साधना उस स्टेप तक हमको ले आती है। उसके बाद में फिर बस एक ही स्टेप बचा है। जैसे ठाकुर का कि मां काली की आराधना कर रहे हैं और मन के भीतर में जब भी ध्यान करते हैं तो मां काली के अलावा और कोई नहीं है। किंतु फिर अब जब निर्विकल्प समाधि प्राप्त करने की बारी आई। अब जब निर्गुण निराकार ब्रह्म साक्षात्कार करने की बारी आई तो जैसे ही आंख बंद करके अर्ध निमिलित चक्षु ऐसा करके जब ध्यान करने का प्रयास करते हैं तो देखते हैं कि निर्विकल्प समाधि की उच्च स्थिति में उठने से पहले या तो फिर उस ज्ञान प्राप्ति से पहले ब्रह्म साक्षात्कार से पहले मां काली का स्वरूप नजरों के सामने चल चला आता है। अब जितनी ही बार ध्यान करने का प्रयास करते हैं, जितनी भी बार ब्रह्म ज्ञान साक्षात्कार प्रयास करते हैं, जितनी बार निर्विकल्प समाधि में आरूढ़ होने का प्रयास करते हैं, उतनी ही बार यह साकार मूर्ति बीच में आ जाती है। तो फिर वही फेमस घटना कि तोतापुरी ने कहा कि यह कांच का टुकड़ा लेकर के उनकी यह जो भ्रू मध्य है आज्ञा चक्र उसके ऊपर में कांच का टुकड़ा इस तरह से एक करके प्रेस करके कहा अभी ये जो पेन का सेंसेशन हो रहा है जो दर्द जो हो रहा है उसके ऊपर में ध्यान करो तो देखो कि तुम्हारा मन इजीली एकाग्र हो जाएगा। जैसे ही तोतापुरी ने ऐसा कहा ठाकुर ने उसी भ्रू मध्य पर ध्यान करना प्रारंभ किया। मां काली की मूर्ति अब जब उनके सामने अवतरित हुई प्रकट हुई तो ठाकुर ने ज्ञान अस से ज्ञान खड़ग से मां के दो टुकड़े कर दिए और सीधा उनका मन हूह करे हूहू करता करता निर्विकल्प समाधि में जाकर के स्थित हो गया तो यह सविकल्प समाधि से निर्विकल्प समाधि तक जाया जा सकता है। भक्ति साधना करके ज्ञान साधना की सर्वोच्च भूमि जो है उसके ऊपर में आरूढ़ होया जा सकता है। यह भक्ति शास्त्र में भी भारतीय आरा जो साधक इतिहास है, भारतीय साधन परंपरा है, उसमें यह सब सर्वजन विदित है। किंतु फिर भी हमने यह भी देखा कि तोतापुरी किस तरह से ठाकुर जब ताली बजाते बजाते मां का नाम करते थे तो कभी-कभी नाराज भी हो जाते थे और कहते थे यह क्या रोटी ठोक रहे हो क्या? तो जिस तरह से वो नॉर्थ इंडिया में स्त्रियां रोटी बनाने के समय वो ऐसा ऐसा करके वो जो आटा है उसको यह फ्लैट करती है। फ्लैटन करती है आटे को। तो ऐसा करके ठाकुर जब ताली बजाते हैं तो तोतापुरी जी कहते हैं यह रोटी ठोक रहे हो क्या? तो देखिए कि भक्ति मार्ग से सहज रूप से आप सविकल्प समाधि तक पहुंच सकते हैं। सविकल्प समाधि अर्थात कि जिस ईश्वर की आप आराधना करते हैं उनका सिर्फ स्वरूप मात्र रह जाता है। हमारे मन के जितने भी कुसंस्कार हैं, हमारे मन की जितनी भी कामना वासनाएं हैं, भक्ति मार्ग से हम सब काट सकते हैं। क्योंकि यह पॉइंट लेने से पहले ही शरद महाराज ने स्पष्ट रूप से कहा है। भक्ति मार्ग और ज्ञान मार्ग यह जो मुख्यतः साधन पद्धतियां है भारतीय इतिहास में हिंदू सनातन परंपरा में उसमें आप देखेंगे कि दोनों का फाउंडेशन है वैराग्य। इंद्रियों के विषयों से मन को विमुख करना। यदि इंद्रियों के विषयों से मन को विमुख नहीं करेंगे तो देखिए कि आप चाहे साधना में जितना भी जोर लगाए ठाकुर की वो जो कहानी है तीनचार शराबी रात को एक नौका में बैठे और फिर जो इस तरह से वो नौका को चलाने वाला हलेसा बोलते हैं गुजराती में तो जो भी है वो लगा रहे हैं जोर लगा के नौका ऐसा सोच रहे हैं कि नौका में बैठकर के वे लोग जा तो रहे है किंतु जब सुबह हुआ तो देखा कि नौका जो है रस्सी से किनारे के साथ में बंधी हुई थी। अभी आप जितना भी जोर लगा के रोइंग करें देखेंगे कि नौका वहीं की वहीं पर खड़ी रहेगी। सुबह जब शराब का नशा उतरा उजाला हुआ तब उनको पता चला। उन्होंने यात्रा कहीं नहीं की है। वहां के वहां ही खड़े हैं। तो क्या है यह कामना वासनाएं विभिन्न रूप धारण करती है। हजार स्वरूप धारण करती है। कभी-कभी हमारे मन में ईर्ष्या प्रकट होगी। कभी-कभी हमारे मन में दूसरों के प्रति द्वेष भाव प्रकट होगा। इस इस दूसरों के प्रति हम कटाक्ष पूर्ण वचन का प्रयोग करेंगे। दूसरों का अपमान करने का प्रयास करेंगे। बहुत सारे साधक सोचते तो है कि मैं बड़ा पवित्र हो गया हूं। बड़ा मैं एक उच्च आध्यात्मिक अवस्था में पहुंच गया हूं। किंतु ईर्ष्या जो है इतनी स्ट्रांग होती है कि जैसे ही मौका मिला सीधा वो कटु वचन प्रयोग करना प्रारंभ करेंगे और सीधा-सीधी कटु वचन का प्रयोग करने से लगेगा कि नहीं यह मेरा बुरा दिखता है। लोग सोचेंगे कि मैं ईर्ष्या के मारे ऐसा कर रहा हूं। तो फिर यह लोग क्या करेंगे कि इनडायरेक्टली फिर इनकी निंदा करेंगे। कटाक्ष पूर्ण निंदा करेंगे। तो यह कटाक्ष पूर्ण निंदा है, ईर्ष्या है। इस तरह से हजार स्वरूप हमारी कामना वासनाएं धारण करती है। और जब तक इन कामना वासनाओं की जड़ तक हम ना काट दें तब तक ना ही सविकल्प समाधि होने वाली है ना ही निर्विकल्प समाधि प्राप्त होने वाली है।
गोपाल की माँ (अघोरमणी देवी) की कहानी
तो यह कामना वासना काटना भक्ति मार्ग में सहज रहता है। क्योंकि यह हमारा जो ईगो है ना यह अभिमान जिसको कहते हैं। अभी हम जैसे गोपाल की मां की कहानी देख रहे हैं। यह जो शरद महाराज जिस तरह से पॉइंट डेवलप कर रहे हैं। उस थीम के लिए उदाहरण स्वरूप गोपाल की मां की कहानी अघोरमणि देवी की कहानी हम देख रहे हैं। अब ये अघोरमणि देवी कोई कम नहीं थी। वैसे तो वो बाल्य विधवा थी। कठोरता ऑर्थोडॉक्सी पूरा भरा हुआ था। किंतु अभिमान भी उनमें इतना भरा हुआ था कि कोई थोड़ा सा भी कुछ कह दे तो फट करके नाराज हो जाती थी। और यदि किसी का थोड़ा सा भी त्रुटि भी देखे तो फट करके मुंह पर बोल देना कि आपकी यह त्रुटि हो रही है। अब जैसे हमने कल बात की थी गोपाल का प्रथम दर्शन होने के बाद में बाल गोपाल का प्रथम दर्शन होने के बाद जब गोपाल की मां दक्षिणेश्वर आई प्रथम बार माने पहले तो अनेक दर्शन हो चुके हैं ठाकुर के किंतु वो जो बाल गोपाल को अपनी हाथ में लेकर के अपनी गोद में उठा के ठाकुर के पास जब प्रथम बार आई तो एक लेडी डिवोटी वहां पर उपस्थित स्थित थी और यह लेडी डिवोटी की नजरों से हमने यह पूरा प्रसंग देखा था कि किस तरह से गोपाल की मां भाव में विभोर हो चुकी थी और उनकी जो साड़ी है जो उनका आंचल है वह स्लिप होकर के जमीन पर गिर रहा था। कोई होश नहीं था। और जैसे ही गोपाल की मां का ठाकुर के कमरे में प्रवेश हुआ साथ-साथ ही ठाकुर समाधि में मग्न हो गए और गोपाल की मां की गोद में जाकर बैठे। तो यह लेडी डिवोटी कहती है कि पहले कभी भी ठाकुर को भाव में आकर के किसी स्त्री को स्पर्श करते नहीं देखा था। यही ठाकुर बहुत बाद में एक दिन जब गोपाल की मां आती है उनका दर्शन करने के लिए तो उनके सर्वांग अपना हाथ फिराते हैं। यूजुअली कोई भी स्त्री होगी वो तो संकुचित हो जाएगी और ठाकुर की वो जो सब स्टैंडर्ड है काम कांचन त्याग के तो यह घटना इस तरह का वर्णन सुनकर के हमको आश्चर्य तो होगा किंतु देखिए हमको पता ही है कि जब ठाकुर भाव अवस्था में आ जाते थे उनका मन यह दैहिक सब संबंधों से और दैहिक आकर्षणों वैसे ही तो उनके मन के भीतर में कोई कामिनी कांचन का बिंदु मात्र भी नहीं है। ऊपर से जब भाव अवस्था में होते हैं तो उनका मन कहां वो ब्रह्म राज्य में वह ईश्वर राज्य में विचरण करता है। तो एक दिन गोपाल की मां आई है। ठाकुर उनके सर्वांग शरीर पे हाथ फैराते फिराते कहते हैं कि देखो यह हरिमय शरीर है। इस शरीर के भीतर में इस माने गोपाल की मां को निर्दिष्ट करके कहते हैं कि यह हरिमय शरीर है। इस शरीर के भीतर में हरी के अलावा और कुछ नहीं है। तो यही देखिए कि यह सब घटनावली हमने एक लेडी डिवोटी की नजरों से देखी थी। अभी किंतु ऐसा है गोपाल की मां तो ठाकुर के पास में काफी दिनों से आ रही थी। प्रथम दर्शन किया था। तब वो कामारहाटी जो ठाकुरवाड़ी है उसकी जो मालकिन है। वो लेडी के साथ में आई थी। तो ठाकुर को उनको दोनों को देखकर के बहुत अच्छा लगा। और फिर ठाकुर ने यह कहा भी था कि देखो देखो यह उनका जो चेहरा और उनकी दृष्टि उनके चक्षु या उनके नयन किस तरह से भाव भक्ति प्रेम से भरे हुए हैं। उनके प्रेममय नेत्र है। प्रेममय चक्षु है। और नाक का जो तिलक है वह तक सुंदर है। ठाकुर जब प्रशंसा करते हैं तो इस तरह से प्रशंसा करते हैं। तो वो प्रथम दर्शन ठाकुर का हुआ था। उसके बाद में वो जो कामारहाटी जो बागानवाड़ी है ठाकुरवाड़ी तो उसकी जो मालकिन थी वो तो ठाकुर के पास में फिर आई कि नहीं आई कुछ ठीक नहीं। किंतु यह जो अघोरमणि देवी है जो कि वहां पर रहती थी वो नियमित रूप से ठाकुर के पास में आना शुरू कर दिया था। तो वह भी हमने देखा कि किस तरह से दूसरी बार ठाकुर के पास में आई तो एक पैसे का वह सूखना सूखा हुआ बासी संदेश लेकर के ठाकुर के पास में आई थी और ठाकुर ने बड़े ही प्रेम से संदेश को खाया था देखकर के ही जैसे ही ब्राह्मणी का कमरे के भीतर में आगमन हुआ गोपाल की मां का ठाकुर कहते हैं क्या लाई हो मेरे लिए खाने को दो मुझे तो वो बेचारी ये अघोरमणि देवी सोचती है अरे इस किस तरह के साधु के पास आई हूं। वो ईश्वरीय कथा तो छोड़ दीजिए। खाने की ही बातें करते रहते हैं। तो जो भी है वह सूखा संदेश जैसे ही संकुचित होकर के अश्रु भरे नेत्रों से ठाकुर के सामने रखा। क्योंकि क्या है कि ठाकुर के पास में तो लोग कितनी ही अच्छी-अच्छी चीजें लाकर के रखते थे। तो इस तरह की एक सामान्य चीज ठाकुर को देना कष्ट तो होगा ही। किंतु उस चीज को भी ठाकुर ने बड़े ही प्रेम से खाया और कहा कि देखो तुमको इस तरह से कुछ परचेस करने की जरूरत नहीं है। तुम अपने घर में नारियल के लड्डू बना के रखना। विभिन्न तरह की तरकारियां बनाना और जब आओ मेरे लिए ले आना। और जब भी वह फिर अगोरमणि देवी दक्षिणेश्वर जितनी भी बार आएगी ठाकुर पूछेंगे मेरे लिए खाने को क्या लाई हो? तो वो बेचारी सोचेगी किस तरह के साधु के पल्ले में पड़ी हूं। जब भी आती हूं बस खाने को ही चाहते हैं। तो इस तरह से आना हुआ ठाकुर के साथ में कितनी ही बार और फिर एकाएक वही फेमस घटना जो कि हमने कल डिस्कस किया था पूरा कि किस तरह से वह सुबह को 2:00 बजे 3:00 बजे उठकर के जप करने को बैठती थी। 8 9:00 बजे तक उनका जप चलता था। तो उस दिन जैसे ही जप समाप्त किया, जप ईश्वर को समर्पित करने का प्रारंभ किया, वैसे ही आंख खोल के देखा कि बगल में ठाकुर बैठे हुए हैं और हाथ वो वही लड्डू हस्त मुद्रा वो छोटा बाल गोपाल जो होता है हाथ में वह लड्डू चाहता है। तो इस तरह की जो मुद्रा है वो बाल गोपाल की मूर्ति की आपने देखी होगी। घुटनों के बल चलता है। बांग्ला ते बोले हामागुड़ी दी है। तो वह घुटनों के बल चलता है और फिर एक हाथ ऐसा ऊपर करके उसमें लड्डू रखा है। तो वो इसी मुद्रा में वैसे ठाकुर बैठे थे किंतु हाथ इस तरह का था। तो यह बेचारी अघोरमणि देवी इतनी आश्चर्यचकित हो गई। ठाकुर यहां पर पधारे किस तरह से तो जो भी है जैसे ही ठाकुर को स्पर्श करने का प्रयास किया वैसे ही ठाकुर की जगह बाल गोपाल प्रगटित हो गया और फिर उसने जो तूफान मचाना शुरू किया है वो तो बेचारा पता ही है हमको ये भगवान कृष्ण की बाल्य लीलाओं का वर्णन तो हमने सुना ही है। किस तरह से वह हंसी मजाक तरंग तूफान मचाते थे। तो देखिए वो कभी-कभी वो अघोरमणि देवी की गोद में उठेगा कभी उनकी जप की माला खींचेगा कभी चिल्लाएगा कभी खाने को मांगेगा कहेगा मां मुझे मक्खन दो खाने के लिए तो बेचारी अभी यह गरीब विधवा है क्या देगी उसको खाने के लिए तो वो सूखा हुआ संदेश वो जो नारियल का लड्डू ठाकुर के लिए बना के रखा था उसमें से बेचारे वो गोपाल को एक दो दिया फिर जैसे पागल िनी की तरह गोपाल को अपनी गोद में उठा के वह दक्षिणेश्वर दौड़ी आई। तो यह जो लेडी
भक्ति मार्ग से कामना-वासना काटना सहज है: गोपाल माँ का उदाहरण
डिवोटी की हम बात कर रहे हैं तो वह भी वहां पर उपस्थित थी और लेडी डिवोटी और एक दिन की बात करती है। क्या कहती है कि जब वह गोपाल की मां के साथ में अघोरमणि देवी के साथ में प्रथम बार उनकी मुलाकात हुई थी। तो यह जो आचार निष्ठा जो होती है ना एक जाति अभिमान जो होता है ठाकुर ने कहा ना अष्टपाश जाति कुल शील मान अभिमान लज्जा घृणा भय तो उसमें जो जाति अभिमान जो होता है कुल और शील का जो अभिमान होता है तो वो ब्राह्मणी के भीतर में अघोरमणि देवी के भीतर में थोड़ा सा तो था बोलकर कि यह लेडी डिवोटी है उससे थोड़ी घृणा करती थी क्यों क्यों घृणा करती थी? क्योंकि यह लेडी डिवोटी भी तो वैसे ब्राह्मण है और उसने अपनी लड़की का विवाह अपनी पुत्री का विवाह छोटी जात में करवाया है। अभी यह छोटी जात ऊंच जात यह सब हमको पता है। वह सब पुराने दिनों की बातें हैं। किंतु पुराने दिनों में यह सब बहुत चलता था और ब्राह्मण सर्वोच्च जात है। उससे एक स्टेप भी नीचे किसी के साथ में विवाह करवाया तो फिर यह ब्राह्मण परिवार जैसे कि सब तरह से सब जगह से वो उनके ऊपर में निंदा का प्रवाह बहना शुरू होगा। तो देखिए कि यह गोपाल की मां के भीतर में भी यह जाति का अभिमान, कुल का अभिमान, शील का अभिमान यह सब था। बोलकर के यह लेडी डिवोटी के प्रति थोड़ी सी घृणा थी। किंतु एक दिन ऐसा हुआ गोपाल की मां आई है। ठाकुर भाव में मत्त हो गए हैं। और पहले ठाकुर ने क्या किया पता है? यह जो लेडी डिवोटी जिसका कि वर्णन हमने सुना था वही लेडी डिवोटी की पीठ पर बैठे और फिर जाकर के यह गोपाल की मां की गोद में बैठे। तो फिर यह गोपाल की मां कहती है कि अरे मेरे गोपाल ने अर्थात ठाकुर को अघोरमणि देवी गोपाल करके ही पुकारती थी। तो मेरे गोपाल ने तुमको भावावस्था में स्पर्श किया। इसका अर्थ है कि देखो तुम्हारे भीतर में कितना सत्व है। तुम्हारे भीतर में कितनी सात्विक शक्ति भरी हुई है। कितनी पवित्रता है। तभी तो गोपाल तुमको स्पर्श कर पाया है। ऐसा बोलकर के वो इतना अनुनय विनय करने लगी अघोरमणि देवी इस लेडी डिवोटी के प्रति जैसे कि उसके प्रति घृणा रख करके इसकी निंदा करके कि उसने अपनी पुत्री का विवाह नीची जाति के साथ में करवाया है। वह जो अभिमान भरा था, अभिमान पूर्ण व्यवहार किया था। उसके लिए क्षमा मांगते हुए कितना अनुनय विनय कर रही है। तो यह देखकर के लेडी डिवोटी भी जो यह वर्णन कर रही है आश्चर्यचकित हो गई थी कि कितनी विनम्रता अघोरमणि देवी के भीतर में आ गई है। तो देखिए कि यह जो सविकल्प सम
भक्ति मार्ग से कामना-वासना काटना सहज है: स्वामी विवेकानन्द का उदाहरण
भक्ति मार्ग से सविकल्प समाधि सविकल्प समाधि से निर्विकल्प समाधि रामकृष्ण भावधारा में रामकृष्ण साहित्य में एकदम स्पष्ट रूप से हमको दिखता है। यहां तक कि यह महादेव सम स्वामी विवेकानंद उनको भी निर्विकल्प समाधि प्राप्त करने से पहले मां काली को स्वीकार करना पड़ा था। उनके मन का यह जो उच्च आध्यात्मिक राज्य का जो गेटवे है वह जो एंट्रेंस है, एंट्री वे जो है वह तभी खुला था जब उन्होंने मां काली को स्वीकार किया था। वही फेमस घटना कि ठाकुर के पास में आते हैं स्वामी जी और ठाकुर को कहते हैं पिताजी का मृत्यु हो गया है। घर में खाने को कुछ है नहीं। महाशय आपको कुछ व्यवस्था कर देनी होगी। ठाकुर स्वामी जी को कहते हैं अरे तुम जाओ जाकर के मां काली के मंदिर में मां से प्रार्थना करो डायरेक्ट बात करो देखो क्या मां कहती है तो बेचारे स्वामी जी वही नरेंद्र उस समय का कॉलेज का लड़का जितनी भी बार मां काली के पास में जाता है उतनी ही बार रोटी कपड़ा मकान यह शब्द मुंह से आते ही नहीं है क्या मांग के आता है ज्ञान दो भक्ति दो वैराग्य दो और फिर ठाकुर के पास में आकर के हार जाता है। कहता है कि देखिए महाशय मैंने अपने परिवार के लिए यह जो भौतिक सामग्री मांगने का प्रयास तो किया किंतु मेरे मुंह से हर बार इस तरह से आध्यात्मिक संपद ही मैं मांग रहा हूं। मेरे मुंह से यही बात आती है। ठाकुर ने कहा तुम्हारे नसीब में है ना वह सांसारिक सुख लिखा नहीं है। किंतु साथ में ही ठाकुर ने कह तो दिया तुम्हारे परिवार को मोटा भात कापडेर अभाव होवे ना माने एक सामान्य खानेपीने की जो व्यवस्था है उसका अभाव नहीं होगा। तो वो और फिर उसके ठाकुर के पास में आकर के स्वामी जी ने वो मां काली का एक गीत गाया और फिर उसी एक डिवोटी वहां पर ठाकुर के कमरे में ठाकुर कितना म हर्षोतफुल्ल होकर के बार-बार उनको कि देखो नरेंद्र काली मैनेज है। नरन काली मैनेज है। नरेंद्र ने मां काली को स्वीकार किया है। नरेंद्र ने मां काली को माना है। ये बार-बार इनको कहते हैं। तो देखिए कि ये जो नरेंद्र काली मैंने छे अर्थात कि नरेंद्र ने मां काली को स्वीकार किया है। दैट वास नरेंद्र गेटवे टुवर्ड्स निर्विकल्प समाधि। तो
आत्मचिंतन (self reflection) से आत्मशुद्धि और शरणागति से आत्मशुद्धि
भक्ति मार्ग से पहले चित्त शुद्धि हो जाए। मन के भीतर में काम कांचन तो है ही है। वह तो एकदम गहराई से रूट देकर के पड़े हुए हैं। गहराई से उसकी जड़े विस्तृत है। अपने संस्कारों के भीतर में उसको तो काटना है। किंतु यह जो फिर जाति, कूल, शील, लज्जा, घृणा, भय, मान, अभिमान यह जो सब अष्टपाश है जो कि हम सामाजिक व्यवहार में हम जो उसका इस्तेमाल भी करते हैं ना, हमको पता ही नहीं चलता। कब किसी के प्रति ईर्ष्या के वशतः उसके प्रति कटाक्ष पूर्ण वचन या तो कटु वचन कह दे। कब किसी की पीछे पीछे से निंदा करें। यह सब हम लोगों के भीतर में इतना गहराई से पड़ा हुआ है। हम लोग इसको देखते भी नहीं है। इट इज लाइक ए पार्ट एंड पार्सल ऑफ आवर लाइफ। जिस तरह से सांस हम सांस लेते हैं। क्या हम कभी नोट करते हैं कि मैं सांस लेता हूं। वो नोट नहीं करते। वैसे ही किसी की निंदा करना इतना माने पार्ट एंड पार्सल ऑफ अपना लाइफ हो जाता है। हमको समझ में ही नहीं आता कि मैं उसकी निंदा कर रहा हूं। और निंदा करके उसके प्रति कटु वचन कह के कटाक्ष पूर्ण वचन कह के हम अपने ही पाशों को बढ़ा रहे हैं। यहां पर काम कांचन त्याग करने का प्रयास करेंगे। यहां पे यह अष्टपाश एक के बाद एक बंधते ही जाएंगे। तो यह जो पूरा मायाजाल पूर्ण जगत है इस जगत को काट करके ईश्वर की ओर धावित होना वो थोड़ा सा सहज है क्योंकि यह जो ज्ञान योग जो है ना यह जो निर्विकल्प समाधि तक की यात्रा जो कि स्मरण मनन निध्यासन के माध्यम से हमको प्राप्त करनी है। वहां पे क्या है ना अपने मन को बड़ा ही क्लोजली बड़ा ही गंभीरता पूर्वक एनालिसिस करना होता है। मन के भीतर में जहां पे भी ये छोटे-छोटे यह अंकट बंकट है वो देखने को मिलते हैं। उसको फोर्सफुली उसको भगाना है। फोर्सफुली उसका मर्डर कर देना है। उसकी हत्या कर देनी है। किंतु वो जो अ सर्टिलिटी जो होनी चाहिए, वो जो डेप्थ होनी चाहिए, सेल्फ रिफ्लेक्शन की, सेल्फ एनालिसिस की बहुत कम लोगों में होती है। और इसीलिए बड़ा साधक ज्ञान मार्ग की साधना करता है। किंतु मन के भीतर में यह सब कुछ कामिनी कांचन बोलता है मैंने उससे मन को उठा लिया है। किंतु यह अष्टपाश जो होते हैं, वह इतने प्रवेसिव होते हैं अपने डे टू डे लाइफ में। ये कामिनी कांचन के प्रति मन आकृष्ट होता है ना तो एकदम स्पष्ट रूप से समझ आ जाता है कि हां मेरे मन के भीतर में कुछ ना कुछ गड़बड़ हो रही है। मुझे भी समझ आ जाता है। दूसरों को भी समझ में आ जाता है। पैसों का कहीं पर भी गड़बड़ किया बिना पकड़ाए रह नहीं जाए। माने वह ऐसा होगा नहीं कि कोई ना कोई आपको एक दिन आकर के पकड़ेगा। किसी पर जो स्त्री का पुरुष के साथ में या पुरुष का स्त्री के साथ में अवैध संबंध है तो वह भी एक ना एक दिन लोगों की नजर में आ जाएगा। उसको आप ज्यादा दिन छुपा नहीं सकते हैं। किंतु यह जो अष्टपाश है, ईर्ष्या है, घृणा है, द्वेष है, लोगों के प्रति निंदा करना है, लोगों के प्रति कटाक्ष पूर्ण वचनों का प्रयोग करना है। वो इतना परवेजिव है अपने जीवन में। डे टू डे लाइफ में हमको समझ में ही नहीं आता कि हम यह हमारे व्यवहार में यह आ रहा है। जैसे हम कंप्लीटली ऑब्लीवियस होते हैं। सांस लेने के प्रति कंप्लीटली ऑब्लीवियस होते हैं। हमारे देह में यह जो सब बायोलॉजिकल फंक्शन चल रहे हैं। कंप्लीटली ऑटोमेटिक चलते हैं। हम हम लोग यूजुअली इसके प्रति ध्यान नहीं देते। तो वैसे ही दैनंदिन जीवन में दिन प्रतिदिन के जीवन में दिन प्रतिदिन की वाणी वर्तन विचार में घटनाओं में यह जो ईर्ष्या निंदा घृणा जाति कुल शील मान अभिमान यह जो सब प्रवेश जाता है हमको समझ में ही नहीं आता। वी आर कंप्लीटली ऑब्लीवियस टू दैट। तो देखिए कि यह संपूर्ण रूप से जब तक मन से ना निकल जाए, तब तक ज्ञान का रास्ता फॉलो करना बहुत ही मुश्किल है। भक्ति का रास्ता आसान है। आपको यह सब टेंशन लेने की जरूरत नहीं है कि हां मुझे अपने मन से काम कांचन को हटाना है या तो फिर अपने मन से लोगों के प्रति ईर्ष्या है, द्वेष है उसको हटाना है। यह देखिए अोरमणि देवी यह स्त्री भक्त के प्रति उनका एक तरह से एक सुपीरियरिटी कॉम्प्लेक्स था। ये स्त्री भक्त को घृणा निम्न दृष्टि से देखती थी। घृणा की दृष्टि से देखती थी। किंतु जैसे ही इस तरह से बाल गोपाल के दर्शनों की परंपरा चली। ये सब कुछ जैसे कि हवा में विलीन हो गया। ये बालगोपाल क्या करेगा? कभी ठाकुर में प्रवेश कर जाएगा। फिर कभी ठाकुर में से बाहर आकर के फिर अघोरमणि देवी को अपनी मां को सब उपदेश देगा कि भक्तों के साथ में ठाकुर के साथ में किस तरह से व्यवहार करना है। कभी-कभी भक्तों के देह में प्रवेश कर जाएगा और फिर बाहर आकर के बताएगा किस तरह से भक्तों के साथ में व्यवहार करना है। भक्त भगवान एक यह ठाकुर नारायण स्वयं है। यह सब जो शिक्षा अघोरमणिक देवी को जो देनी थी सब गोपाल कर रहा है। तो क्या है कि एक जो एक सेल्फ रिफ्लेक्शन या सेल्फ एनालिसिस यह जो अपने मन को संपूर्ण रूप से अंतर्मुखी करके एक माइंडफुलनेस लाइफ लीड करना जो कि ज्ञान मार्ग का जो स्मरण मनन निधिसन जो कि ज्ञान मार्ग का ट्रेड मार्क है। ज्ञान मार्ग की मुख्य साधना है। अपने मन का एनालिसिस और मन के भीतर में से प्रतििक्षण जो नेगेटिव भावनाएं उत्पन्न हो रही है उसको काट के फेंक देना। क्षण क्षण प्रत्येक क्षण यह अपने मन के ऊपर में संपूर्ण कंट्रोल होना चाहिए। यह एक हो गया और यहां पे है भाव साधना। इस तरह से ईश्वर के साथ में प्रेम और स्नेह का रिश्ता बनाना कि ईश्वर स्वयं जागृत होकर के ईश्वर स्वयं देह धारण करके हमारी नजरों के सामने आए और हमको हाथ पकड़ कर के हमको बताए कि हमारे वर्तन में कहां पर खामी है। हमारे वर्तन में क्या इंप्रूवमेंट करने की जरूरत है। तो यह ऑर्थोडॉक्सी जैसे कि अब ये जो दर्शन परंपरा प्रारंभ हुई है आप देखिए कि किस तरह से यह अोरमणि देवी के जीवन में भी परिवर्तन आ जाता आता जाता है। पहले तो इवन ठाकुर और मां के प्रति इतना एक अपना एक ब्राह्मीणत्व का अभिमान था। ठाकुर को परोस रही है जो भात की हांडी में से एक जो एक चमचा जैसा होता है लकड़ी का जिसमें वो भात भर के पात्र में वो ये करना होता है सर्व करना होता है तो उस हाथे को ठाकुर ने स्पर्श कर दिया एक्सीडेंटली तो अभी ये हाथा जो था उसको तो गंगा में फेंका ही फेंका साथ में ही जिस हांडी में से वह भात सर्व कर रही थी उस भात को भी अघोरमणि देवी अभी खाएगी नहीं मां स्वयं जिस मिट्टी के चूल्हे में खाना पकाती है ठाकुर के लिए यदि उस मिट्टी के चूल्हे में से घुरमणी देवी को खाना बनाना है तो मां को तीन बार इस मिट्टी के चूल्हे के ऊपर में गोबर लिपन करना होगा और तीन बार गंगाजल छिटकना होगा तब कहीं जाकर के यह अोरमणि देवी का भात उसके ऊपर में भात की हांडी उसके ऊपर में बैठेगी तो एक एक और तो है जाति कुल और शील का अभिमान। दूसरा है दूसरों के प्रति एक घृणा की दृष्टि। इसने अपनी पुत्री का विवाह नीची जात के साथ में करवाया है। तीसरा कि एक अभिमान बहुत है मन के भीतर में। कोई कुछ भी कह देगा तो फटाक करके वह नाराज हो जाना। और चौथा है दूसरों की खामी या त्रुटि सीधा उनके मुंह पर जाकर के बोल देना। बिना किसी लाज लज्जा के माने चक्षु की एक लज्जा होती है। च माने चखु लज्जा नजरों की शर्म जिसको कहते हैं। यदि हम किसी की निंदा भी करते हैं तो फिर पीछेछे से करते हैं। मुंह पे निंदा करना हमको थोड़ा सा एंबरेसिंग लगता है। या तो फिर सामने वाला झगड़ा करेगा तो फिर सामने झगड़ने की अपनी कैपेसिटी नहीं होती। तो ज्यादातर 99% जो निंदाएं हैं वो पीछे से ही होती है। किंतु ये अघोरमणि देवी की इतनी तो इंटीग्रिटी थी कि जो भी निंदा करेगी सीधी मुंह पे कर देगी और किसी की भी खामी या त्रुटि छोटी-छोटी सी भी होगी फट करके जाकर के उनके मुंह पर बोल देगी। तो यह जो उनके स्वभाव की यह जो सब एंगुलरिटीज है तो जैसे ही बाल गोपाल का दर्शन प्रारंभ हुआ बाल गोपाल ने अघोरमणि देवी का अपनी मैया का हाथ पकड़ करके उन्होंने सब कुछ उनको सिखाया कि किस तरह से ठाकुर के देह में प्रवेश करके बाल गोपाल वापस आया। कहा ठाकुर स्वयं नारायण है। किस तरह से जिन भक्तों के प्रति इनकी घृणा थी उनके देह में प्रवेश करके बाहर आकर के बताया कि भक्त और भगवान एक है और किस तरह से यह जो स्त्री भक्त के प्रति इनकी घृणा थी वो घृणा जैसे कि टूट गई और इनके प्रति इतना अनुनय विनय इतनी जैसे कि विनम्रता इतनी माने विनती करके क्षमा प्रार्थना करती है कि अरे गोपाल ने स्वयं भावावस्था में तुमको को स्पर्श किया है। अभी यह गोपाल अर्थात कि ठाकुर ठाकुर को भी वह गोपाल करके पुकारती थी और ठाकुर ने उनको गोपाल की मां कह के पुकारना शुरू किया था। गोपाल मां बांग्ला तो गोपाल की मां करके पुकारना शुरू किया था। तो यह ठाकुर और यह बाल गोपाल दोनों किस तरह से अघोरमणि देवी के यह जो स्वभाव की एंगुलरिटीज है उसको धीरे-धीरे करके स्वच्छ निर्मल कर रहे हैं। तो ये एक इवोल्यूशन है भक्ति मार्ग से। यूजुअली ये जो अपने स्वभाव की एंगुलैरिटीज को ठीक करना इसको माइंडफुलनेस कहते हैं या तो सेल्फ रिफ्लेक्शन कहते हैं, सेल्फ एनालिसिस कहते हैं। स्मरण मनन निधि्यासन कहते हैं। वो ज्ञान मार्ग का होल मार्ग है। ट्रेड मार्ग है। और भक्ति मार्ग में इतना कोई टेंशन नहीं लिया जाता कि भीतर में क्या चल रहा है। जितना कि बाह्य जगत में ईश्वर के प्रति एक श्रद्धा आस्था, शरणागति, भाव का रिश्ता रखना। किंतु यह रास्ते से भी देखिए कि सविकल्प समाधि प्राप्त हो सकती है। यदि हम निष्ठा पूर्वक इस रास्ते को फॉलो करें और फिर वहां से यह निर्विकल्प समाधि है। जैसे कि ईश्वर स्वयं अपना हाथ पकड़ करके निर्विकल्प समाधि की ओर ले जाएंगे। तो यह हमने म शरद महाराज का जो बेसिक आर्गुमेंट है जो बेसिक फ्रेमवर्क है इस पॉइंट को एक्सप्लेन करने का कि किस तरह से भक्ति मार्ग से आप निर्विकल्प समाधि प्राप्त कर सकते हैं। तो अभी थोड़ा
ठाकुर और गोपाल माँ के सामने बाल गोपाल का बाल्यलीला-तरंगतूफ़ान
सा कहानी देख लेते हैं कि किस तरह से प्रथम दिन जहां पर हमारी कहानी छूटी थी कि वो गोपाल की मां दौड़ीदोई ठाकुर के पास में आई और ठाकुर के पास में बैठकर के बता रही है कि किस तरह से उनको दर्शन हुआ है और मीन वाइल यह जो बाल गोपाल है वह अपनी शरारतें यहां पर भी बंद नहीं करता इधरउधर ठाकुर के ही सामने दौड़ादौड़ी करता रहता है और ठाकुर भी उस समय जिस तरह से एक भाव अवस्था में आकर के वह अघोरमणि देवी की गोद में बैठे थे। वह हमने देखा कल। फिर ठाकुर खुद कहते हैं कि जैसे ही ठाकुर का भाव का उपशम हुआ और ठाकुर अपनी खाट पर जाकर बैठे अघोरमणि देवी आनंद के मारे पूरे कमरे में नृत्य करते-करते घूम रही है और कह रही है कि ब्रह्मा नाचे विष्णु नाचे। वो जो सब वो गीत है वह गाती गाती पूरे कमरे में नृत्य करती वो घूम रही है और ठाकुर खुद हंसते-हंसते वो लेडी डिवोटी को कहते हैं कि देखो देखो आनंद से भरपूर हो गई है। उसका मन अभी गोपाल लोक में चला गया है। और यह देखिए कि अभी तक यह जो बाल विधवा की आचार निष्ठा लोगों के प्रति फटाफट मुंह पे कुछ भी बोल देना और लोगों के प्रति घृणा का भाव रखना अभिमान का भाव रखना वो जैसे कि कहां अदृश्य हो गया। बस एक ही दर्शन मात्र से वो गोपाल की मां जैसे कि एक अन्य मनुष्य में परिवर्तित हो गई है। भीतर के जितने भी संस्कार है संपूर्ण रूप से वह मिट गए हैं। संपूर्ण रूप से स्वच्छ निर्मल हो गए हैं। और यह गोपाल है बाल गोपाल। वो अभी भी शरारतें कर रहा है। कभी वह मां की गोद में उठता है। कभी वह ठाकुर के देह के भीतर में प्रवेश कर जाता है। कभी चारों ओर दौड़ते घूमता है। वो 10 महीने का बच्चा बेबी वो किस तरह से दौड़ता है। वो दो पैरों से पे तो उठ भी नहीं पाएगा। वो क्रोलिंग कहते हैं ना इंग्लिश में हामागोड़ी दी है घुटनों के बल तो ऐसे ही घुटनों के बल चारों ओर दौड़ादौड़ी करता है और फिर यह गोपाल की मां विनती करती है कि आय बेटा मेरे गोद में बैठ इस दुखिनी ब्राह्मणी की दुखिनी मां जो तुम्हारी है मेरी गोद में बैठ तो कभी-कभी उनकी गोद में आकर के बैठेगा ये बाल्य लीला तरंग तूफान शरद महाराज ये शब्द प्रयोग प्रयोग करते हैं। उस दिन बाल गोपाल की लीला का वर्णन करने के लिए बाल्य लीला तरंग तूफान। तो ये बाल्य लीला रूपी तरंग तूफान इसने ऐसा मचाया कि जैसे कि ठाकुर का कमरा भक्ति भाव से आनंद से भरपूर हो गया। जस्ट इमेजिन कि माने इस तरह की लीला जहां पर चलती होगी उस समय यदि हम उपस्थित होते तो क्या हमको अनुभूति होती? क्या एहसास होता? तो ये ये लेडी डिवोटी जो वहां पर उपस्थित थी वो कहती है कि आमी आडष्ट होएगी ये छिल प्रथम प्रथम आडष्ट होए जावा माने जड़ हो जाना स्टिफ हो जाना कभी-कभी एक इस तरह की एक घटना होती है कि जिस जिसका वर्णन करने के लिए न भूतो न भविष्यति ना ही जिसके हमने कभी देखा है ना ही जिसके बारे में अपने पास में व्यक्त करने के लिए कुछ शब्द है तो ऐसी कुछ घटना होती है तो मन कैसे एकदम सडनली यह हो जाता है कि किस किस तरह से उसको समझे, किस तरह से इसका वर्णन करें। मन किस तरह से उस तरह के भाव में विभोर हो जाता है। तो वही लेडी डिवोटी लिखती है प्रथमे तो आष्ट हो गए छिलो। प्रथम पहले पहले तो एकदम स्टिफ हो गई थी। क्या बोलूं क्या करूं समझ में नहीं आता था। किंतु फिर ये जो बाल्य लीला तरंग तूफान ये गोपाल मचा रहा है। तो वी कैन जस्ट इमेजिन कि किस तरह का भाव किस तरह का आनंद उस कमरे में वो बहता होगा। और फिर उस दिन के बाद से और शरद महाराज लिखते हैं कि यह देखिए यह जो बाल्य लीला तरंग तूफान है यह जो गोपाल बाल गोपाल ने मचाया है तो यह जो बाह्य जगत के जितने भी कठोर नियम कानून है ये क्रूर जगत के जो कि बाल विधवा के प्रति इस क्रूर जगत के जितनी भी कठोरताएं हैं और यह कठोरताएं अघोरमणि देवी ने इंटरनलाइज करके अपना जो एक स्वरूप बनाया है अपना अपना एक बिहेवियर, अपना एक पर्सनालिटी डेवलप किया है। वो कहां इस तूफान में टूट-फूट करके बह के चला गया। जैसे कि एक नई एक साधिका का एक नई मां यशोदा का जन्म हुआ। मां यशोदा देखिए बाद में आएगा। वो किस तरह से ठाकुर खुद कहते हैं। स्पष्ट रूप से नहीं कहते किंतु इनडायरेक्टली कहते हैं। तो इस दिन से ठाकुर अघोरमणि देवी को गोपाल की मां बोलकर के पुकारते थे और भक्त लोगों के भीतर में भी इस तरह से उनको गोपाल की मां का एक रूप से सभी लोग पहचानते थे। ठाकुर उनको कितना ही सब उनको स्नेह करें। उसी दिन की बात है। ठाकुर के कमरे में जो सब अच्छी-अच्छी चीजें थी, सब कुछ उन्होंने गोपाल की मां को लाकर के खिलाया। और गोपाल की मां खाते-खाते कहती भी है कि बेटा गोपाल तुम्हारी ये दुखीनी मां इसने इस जन्म को बड़ा कष्ट से काटा है। वो जो चरखे के ऊपर में सूता काट के उसने अपना जीवन बिताया है। चरखे के ऊपर में जनोई बना करके सूते से जनोई बना करके इसने अपना जन्म बिताया है। तो देखो मुझे इतना दुख कष्ट इस जन्म में मिला है। बोल के ही क्या तुम मुझे इतना स्नेह कर रहे हो? तो देखिए लाइफ तो दुख से भरा ही था। सर्वप्रथम सर्वप्रथम जब बाल गोपाल का दर्शन हुआ उस बाल गोपाल ने पहले ही कहा मां मुझे मक्खन दो खाने के लिए। भाई मक्खन तो है नहीं कमरे में तो वह जो सूखा नारियल का लड्डू वो बाल गोपाल को जब देती है अघोरमणि देवी साथ में ही क्या कहती है? मैंने तुमको यह खराब चीज खाने को दी है। बोलकर कि तुम इस तरह से मुझे खराब चीजें खाने को मत देना। तो क्या है कि पॉवर्टी लीव्स इट्स मार्क। हम लोग जो कि एक मिडिल क्लास फैमिली से आते हैं। कभी भूख का दुख देखा नहीं है। कभी ऐसा फाइनेंशियल कष्ट बहुत हद तक नहीं देखा है। बीच-बीच में आता होगा जाता होगा। एक सस्टेंड फाइनेंशियल क्राइसिस के भीतर में हम नहीं रहे। घर वगैरह एक स्टैंडर्ड होता है। फैमिली एक रहता है। हम लोग समझ नहीं पाते हैं कि पॉवर्टी का क्या एक ये है। किस हद तक हमारे ऊपर में छाप छोड़ के जाती है। तो यहां पे भी गोपाल की मां जब ठाकुर उनको अच्छा अच्छा खाना खिलाते हैं तो कहती है कि देखो मैंने यह जन्म बड़ा दुख कष्ट से निकाला है। बोलकर के क्या तुम आज मेरा इतना आदर यत्न कर रहे हो? तो यह उस दिन की घटना तो समाप्त हुई। म ठाकुर के कमरे में तो लीला समाप्त हुई। इसके बाद
गोपाल की माँ और बाल गोपाल की शरारतपूर्ण दिव्य मधुर लीला
में अघोरमणि देवी कामारहाटी जो उनका कमरा है ठाकुरवाड़ी में वापस आई। साथ में ही गोपाल आया और गोपाल की लीलाएं जो है उस दिन वह अभी भी रुक नहीं रही है। वह जैसे वह खाना बनाना है तो खाना बनाने के लिए क्या करना है? सर्वप्रथम तो वह जो सूखी लकड़ियां है उसको बिनना है। उसमें से वह चूल्हा जलाना है। चूल्हा जला के खाना बनाना है। तो बाल गोपाल भी सब जगह पे वो अघोरमणि देवी के साथ में घूम रहा है। लकड़ियां चुननी है। सिलेलेक्ट करनी है। तो जमीन के ऊपर में गिरी हुई तो वह भी पकड़ रहा है। वह मां के साथ में खाना बना रहा है। अघोरमणि देवी जब खाना बना रही है तो उनकी पीठ पर चढ़ जाता है और सब देखता है। जैसे एक 10 महीने का छोटा शिशु जो होता है और जब खाना खाने को देती है जब मां तो फिर वो धनिया भर के जो नाटक करता है ना छोटा बच्चा कि मुझे यह नहीं चाहिए वो चाहिए ये चाहिए वो चाहिए और फिर यह बेचारी अघुरमणि देवी वो नाराज भी हो जाती है डांटती भी है कि अरे जो है खा लो तुम जो मांग रहे हो दूध दही वगैरह मिठाई वगैरह मैं कहां से लाऊंगी तो जैसे कि वो मां और संतान की जो लीला जिस तरह तरह से सांसारिक जगत में होती है। वैसी ही किंतु यह दिव्य जगत की दिव्य लीला यह लीला जब चलती है भीतर का सब कुछ शांत निर्मल हो जाता है। उसके बाद में सविकल्प समाधि माने यह सविकल्प समाधि ही है। ऐसा हम मान सकते हैं। रात को सोने की बारी आई। अभी यह बेचारी अघोरमणि देवी इतनी गरीब है। सोने के लिए एक पिलो भी नहीं है। बालिश भी नहीं है। तो अभी यह बाल गोपाल है। उसको तो एक पिलो चाहिए सोने के लिए। वो तो सुख में वो तो राजभवन में बड़ा हुआ है। नंद जो थे उनके पिताजी वो तो बड़े धनी थे। म भले ही वो वृंदावन में रहते थे। किंतु धनी तो थे ही। बोले लाखों गाइयां थी उनकी। मां यशोदा इतना स्नेह करती थी। इतना माने लाड प्रेम में बाल गोपाल को बड़ा किया है। तो यहां पे भी अभी यह पिलो नहीं है सोने के लिए तो वह सोना भी नहीं चाहता। कंप्लेन करता है। तो फिर यह अघोरमणि देवी ने क्या किया? अपने हाथ के ऊपर में उसका सर रख के अपने पास में ले उसको सुलाया। कहा यह जो कामारहाटी ठाकुरवाड़ी की जो मालकिन है उसकी पुत्री उसका नाम भूतो। तो यह भूतो के पास में कल सुबह जाऊंगी। उसके पास में से बड़ा ही सुंदर नरम जो तकिया जो है पिलो जो है वह तुम्हारे लिए कल मैं लेके आऊंगी। अभी इसी तरह से सो जाओ। तो ऐसा करके वो बेचारे गोपाल को सुलाती है। तो देखिए कि ये पूरी सुंदर लीला जो है ये उस दिन ये पहले ही दिन की घटना है। अभी तो और भी दिनों की घटना बाकी है। किंतु पहले ही दिन इतनी सारी घटना हो चुकी है। और इसके बाद में अभी क्या है कि ठाकुर स्पष्ट
गोपाल की माँ ठाकुर के कल्याण के लिए जप-तप करती है
रूप से इंगित करते हैं कि अघोरमणि देवी ही मां यशोदा थी। एक दिन की बात है। यह घटना तो हो गई। अभी हमको तो पता है कि अघोरमणि देवी को जप करने का एक बड़ा ही निष्ठा पूर्वक जप किया करती थी। तो एक दिन दक्षिणेश्वर में जाकर के मां शारदा जहां पर रहती है वो नहबत में वरांडा में बैठकर के अघोरमणि देवी निष्ठा पूर्वक जप कर रही है। उस समय ठाकुर वहां से पसार हुए और उन्होंने देखा कि यह जो जप कर रही है तो फिर ठाकुर ने आकर के अघोरमणि देवी को कहा कि तुम इतना जप क्यों करती हो? तुम्हारे जप करने की क्या जरूरत है? तुमको तो इ- इतना सारा सब हो चुका है। क्या हो चुका है? तो दर्शन ठाकुर की वह जो क्रिप्टोग्राफिकल वह क्रिप्टोलॉजिकल वह जो क्रिप्टिक जो बात करने की स्टाइल थी तो तुम्हारा तो इतना सब हो चुका है। तुम अभी इतना जप क्यों करती हो? अर्थात कि इतने सारे दर्शन हो चुके हैं। अभी तुम क्यों इतना जप करती हो? तो अघोरमणि देवी कहती है कि क्या मेरा सब कुछ हो चुका है क्या? मैं जप ना करूं। तो ठाकुर ने कहा सब हो चुका है अर्थात कि तुम्हारे अंतर मन का सब कुछ निर्मल पवित्र हो चुका है। जप करने का उद्देश्य क्या है? मन की निर्मलता जिससे कि मन सविकल्प समाधि में आरूढ़ हो और फिर वहां से निर्विकल्प समाधि में जाए। यही तो सविकल्प समाधि कहो ना कि ईश्वर दर्शन जो कि भक्ति मार्ग की सर्वोच्च उपलब्धि है वह तो तुमको प्राप्त हो चुकी है। तुमको इतना जप करने की क्या जरूरत है? तो गोपाल की मां दूसरी बार पूछती है क्या सब हो चुका है? ठाकुर ने कहा हां सब हो चुका है। तो फिर गोपाल की मां तीसरी बार पूछती है कि क्या कहते हो? सब कुछ हो चुका है। देखिए बांग्ला में कह तीन त्रिसत्य करेनेवा अर्थात कि यदि कोई किसी के पास में से आपको कोई बात कंफर्म करवानी है तो तीन बार पूछना है। जैसे शारदा देवी को भी मां जब जगत जगत धात्री पूजा के समय यहां पे थी जय राम बाटी में तो मां ने ठीक किया मां की मां श्यामा सुंदरी देवी तो जगत धात्री पूजा करवाती थी तो तीन-चार साल ना कि ऐसा कुछ हुआ घर में जितने भी थे सभी के नाम से संकल्प ले लिया चुका है तो फिर अभी जब फिर से जगत पूजा करने की बात आई तो फिर मां ने कहा मां शारदा ने श्यामा सुंदरी देवी को अपनी मां को कहा कि अरे इतना बार-बार पूजा पूजा करके बहुत कष्ट होता है। बहुत मेहनत करनी पड़ती है। अभी पूजा करने की जरूरत नहीं है। तो ऐसा करके भाई मां शारदा जब सोने को गई तो जगत धात्री स्वयं स्वप्न में आकर के पूछती है। अच्छा मैं क्या जाऊं यहां से? तो फिर मां ने कहा हां हां। तो जगत धात्री तीन बार पूछती है। तीन सत्य करवा लेना चाहती है। यदि जाएगी तो वापस नहीं आएगी। तो मां शारदा समझ गई कि ये तीन सत्य करवा लेना चाहती है। फिर उन्होंने इमीडिएटली कहा, नहीं मां आप यहां पे ही रहिए। मैं हर साल आपकी पूजा करवाऊंगी। तो इसी तरह से यदि कुछ एक कंफर्म लेना है किसी से तो तीन सत्य करवा लेना है। तो यहां पर भी जब ठाकुर ने कहा तुम्हारा सब कुछ हो चुका है। तुमको जप करने की क्या जरूरत है? तो यह अघोरमणि देवी तीन सत्य करवा लेती है ठाकुर से। जब तीसरी बार पूछा कि क्या कहते हो? मेरा सब कुछ हो चुका है। तब ठाकुर कहते हैं कि हां देखो तुमको अपने लिए जप तप करने की जरूरत नहीं है। वह तो हो चुका है। तभी किंतु यदि तुम इसके लिए अपने शरीर की ओर इशारा करके कहते हैं कि यदि तुम इसके लिए यदि कुछ करना चाहती हो यह शरीर अच्छा रहे। इसके कल्याण के लिए जब करना चाहती हो तो फिर तुम कर सकती हो। तो गोपाल की मां कहती है कि अच्छा ठीक है। अब से लेकर के मैं जो कुछ भी करूंगी अर्थात तप जप जो कुछ भी है सब तुम्हारा तुम्हारा तुम्हारा तीन बार कहती है सब तुम्हार तुम्हार तुम्हारा सब तुम्हारा तुम्हारा तुम्हारा तो ये देखिए कि उस दिन के बाद में गोपाल की मां ने पहले तो यह उनकी जो जपमाला थी गंगा में फेंक दी किंतु फिर बाद में लगा कि दिन भर में बैठी-बैठी करूंगी भी क्या एक ब्राह्मण विधवा को ऐसा तो कोई बहुत ज्यादा काम होता नहीं है। तो फिर दूसरी एक माला परचेस करके उस पर जप करना शुरू किया। किंतु अभी से जो कुछ भी है सब ठाकुर के कल्याण के लिए। इसके बाद में भी अभी तो अघोरमणि देवी की काफी कहानियां है और किस तरह से शरद महाराज का यह जो थीम डेवलप होता है उसके साथ में हम मैच करके बात करेंगे। वह अभी हम नेक्स्ट क्लास में। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु
प्रश्न: गोपाल की माँ अपने लिए नहीं परन्तु ठाकुर के कल्याण के लिए जप-तप करती है. इसके बारे में थोड़ा सा और बताइये।
ना जो अपना जो थीम है सविकल्प से निर्विकल्प की ओर जाना है माने साकार सगुण ब्रह्म से निर्गुण ब्रह्म की ओर जाना है अभी क्या है ना निर्गुण ब्रह्म का जो पाथ है ना संपूर्ण रूप से अपने को जो बिला देना है अपने को संपूर्ण रूप से निशेष कर देना है। अहंकार संपूर्ण रूप से चले जाना चाहिए। वह अंडरस्टैंडिंग इज सो डिफिकल्ट। अब मैं अपने लिए जब करूं ही क्यों? मैं हूं कौन? आई एम नोबडी। राइट? तो जब भी करना है कोई भी साधन भजन भी करना है। अपना अहम कहीं पे भी नहीं आना चाहिए। संपूर्ण रूप से माने काम कांचन त्याग, अहंकार का त्याग दैट इज द फर्स्ट स्टेप इन द पाथ ऑफ ज्ञान। तो वो तो संभव ही नहीं है। वो जो एक अंडरस्टैंडिंग चाहिए ना कि मेरे भीतर में यह चल रहा है। तो अब अब जैसे डॉक्टर पहले क्या करते थे थोड़ा सा आप जाओ तो बुखार हुआ है तो एक जो स्टैंडर्ड गोली है वो सबको दे दो। अभी ऐसा नहीं प्रॉपर डायग्नोसिस करके प्रॉपर ट्रीटमेंट होनी चाहिए। तो एक तो डायग्नोसिस करने की क्षमता है। तो बहुत कम लोगों में होती है। तो भक्ति मार्ग में क्या है कि आप गो अहेड एस पर योर कैपेसिटी। मुझे मुक्ति चाहिए। अपने लिए जप किया। किंतु जब सिद्धि प्राप्त हो चुकी है, नाउ यू आर कैपेबल टू डू इट नॉट फॉर योरसेल्फ। बिकॉज़ सर्वम खलवम इदम ब्रह्मन। आप अपने तक लिमिटेड है ही नहीं। और ये ये विश्वूप दर्शन गोपाल की मां को होगा। ऑल ऑफ दिस माने इट्स सच अ परफेक्ट मैच हो जाता है कि ये विश्वूप दर्शन होता है। नरेंद्र के साथ में फाइट होती है। ये ये सब कुछ कि निर्विकल्प समाधि की ओर जाने का यह पूरा उनका यह रास्ता है। सो अपने लिए जप करना दैट इज यू आर स्टिल विद इन द पाथ ऑफ भक्ति। अपने लिए जप नहीं करना। ठाकुर को समर्पित कर देना। नाउ शी एंटर्स द पाथ ऑफ ज्ञान। ना वही ठाकुर की बात कि मां का दर्शन होना इससे सद्भाग्य की बात क्या है? किंतु निर्विकल्प समाधि के लिए मां को भी काटना पड़ेगा। है ना? दैट इज सच ए हायर स्टेट ऑफ स्पिरिचुअलिटी। आज मुझे यदि बाल गोपाल का दर्शन हो जाए तो मेरे तो 10 जन्म सार्थक हो जाएंगे। किंतु यदि आपको निर् ज्ञान मार्ग का जो रास्ता है दैट बिगिंस फ्रॉम देर। जैसे वो ब्रह्मानंद जी ने कहा कि समाधि के बाद में तो स्पिरिचुअल लाइफ प्रारंभ होती है। मा यही हो गया कि सविकल्प समाधि के बाद में आपको निर्विकल्प की ओर जाना है तो दैट इज इवन एंट्री वे इनू ज्ञान
प्रश्न: निर्विकल्प समाधी के बाद आध्यात्मिक जीवन का प्रारम्भ होना - जैसे स्वामी ब्रह्मानंद कहते है - इसका क्या अर्थ है वो हमारी समज से ही बहार है.
ना उसके बाद में दर्शन परंपरा प्रारंभ हो जाएगी दर्शन या तो फिर अनुभूतियों की परंपरा ठाकुर की जो अनुभूतियां है उन्होंने जो कुछ कुछ वर्णन किया है ठाकुर ने कहा ना काशीपुर में थे तो आखिरी आखिरी दिनों की बात ठाकुर ने कहा कि देखो मुझे दर्शन हुआ कि मैं कहां दूर जा रहा हूं समुंदर के उस पार। तो जैसा ठाकुर ने ऐसा कहा वो मां और लक्ष्मी दीदी दो वहां पे मां ने रोना शुरू कर दिया। समझ गई कि अभी ये देह ज्यादा टिकने वाला नहीं। किंतु ये अनुभूति का तो सिर्फ अभी कितने समय तक इस तरह की अनुभूतियां चली होगी। इस अनुभूति का क्या तात्पर्य होगा, वह सब तो अभी कुछ व्याख्या है ही नहीं। और अपने पास में ऐसी कोई फ्रेमवर्क भी नहीं है कि जिससे हम व्याख्या कर पाए। एक सामान्य रूप से कह सकते हैं ठाकुर ने कहा कि मैं एक ऐसे देश में गया था वहां पे सभी गोरे लोग हैं और सब वहां पर मेरी इतनी उपासना हो रही है। तो मां सोचती है कि गोरे लोगों का देश जेखाने शबाई शादाशादा सब लोग सफेद-सफेद है। ऐसा देश कैसा हो सकता है? हालांकि वो ब्रिटिश राज्य की राजधानी थी किंतु मां का वो थिंकिंग थोड़ा सा वो नौबत और जयराम भाटी तक ही था। तो फिर जब ये निवेदिता और ये जो सारा ओलीबुल जब मां के पास आए तब मां ने समझा कि अच्छा इन लोगों का देश सो म अभी देखिए ये तो हमारा इंटरप्रिटेशन है राइट अभी इस दर्शन का और क्या तात्पर्य होगा इस तरह की कितनी अब जैसे हृदय है हृदय ने ठाकुर को कहा मामा मुझे दर्शन करवा दो दर्शन करो एक दिन सही में दर्शन हो गया तो चिल्लाने लगा चलो रामकृष्ण हम चलते हैं आकाश पथ से गांवगांव शहर शहर घर जाकर के भगवान का नाम फैलाते चिल्लाना शुरू कर दिया तो ठाकुर कहते हैं अरे मेरे को इस तरह के 10 दर्शन दिन में होते मैं चिल्लाता नहीं तू एक दर्शन हो गया क्या चिल्ला रहा है अघोरमणि देवी को स्वयं पहली बार ठाकुर की जगह जब गोपाल प्रकट हुआ ऐसे चिल्लाना शुरू किया था कि जब और कोई होता तो मैंने आसपास थैंकफुली कोई नहीं था वरना तो भीड़ जमा हो जाती स्वामी जी स्वयं पहला दर्शन हुआ था तो चिल्ला उठे थे मेरे मां है मेरे बाबा है क्या कर रहे हो तुम मेरे साथ माने जो एकदम शुद्ध आधार होते हैं उनको एक दर्शन होता है तो क्या एक हो जाता है ठाकुर को तो ऐसे दर्शन की परंपरा कंटिन्यूस सो भाव राज्य के जो राजा ठाकुर को कहते हैं व्हाट वुड बी द मीनिंग ऑफ दैट माने एग्जिस्टेंस के भी कितने लेयर्स है ना हम लोग एक इस पृथ्वी के ऊपर में जो एक सामान्य एकिस्टेंस है अपना उसको लेकर के बैठे हैं किंतु यह जो सूर्य लोक नक्षत्र लोक चंद्र लोक ये जो सब शास्त्र में बातें आती है हम लोग उसको को डिस्कार्ड कर देते हैं। आजकल हमारा एक सेकुलर व्यू पॉइंट साइंटिफिक व्यू पॉइंट है। हमको लगता है ये सब क्या नाटक है। बट इट माइट बी देयर। किसको पता? ब्रह्मा का एक दिन तो हमारे एक करोड़ दिन वगैरह-वगैरह जो बातें हैं ब्रह्मा, विष्णु, महेश, भगवान, शिव तांडव नृत्य करते हैं तो सृष्टि का लय होता है वगैरह-वगैरह। तो उस लेवल पर जाकर के ये लोग सब दर्शन करते होंगे। राइट? हम लोग तो इसको डिस्कार्ड ही कर देते हैं। अपने पास में वो फ्रेमवर्क ही नहीं है। उसको सम जिस तरह से एक लॉजिकल फ्रेमवर्क हम डेवलप करते हैं। वेदांत फिर भी समझ में आता है। भाव साधना फिर भी समझ में आती है। दर्शन वगैरह फिर भी समझ में आता है। किंतु भगवान शिव तांडव नृत्य करेंगे। सृष्टि का लय होगा। व्हाट इज दैट? अपने पास में ऐसी कोई लॉजिकल फ्रेमवर्क ही नहीं है। ये सब पौराणिक कहानियां ही है हमारे लिए। भगवान नो उन्होंने देखा कि भगवान शिव स्वयं उनका हाथ पकड़ करके वो ले जाते हैं। सुवर्णमय वो अन्नपूर्णा का दर्शन हुआ। सो व्हाट इज द मीनिंग ऑफ दैट? अपने पास में कोई फ्रेमवर्क ही नहीं है। वो तो फ्रेमवर्क के बाहर की चीजें हैं। ये इति इति नेति नेति ये सब तो फिर भी समझ में आता है। अष्टपाश ये वो सब तो फिर भी समझ में आता है। अब जैसे देखिए हमारी जो जनरेशन है मैं अपनी खुद की बात करता हूं। मैं रामायण महाभारत देखता था टीवी सीरियल दैट वाज़ माय फर्स्ट इंट्रोडक्शन सीरियसली कहें तो हिंदूइज़्म ये एक सेकुलर बैकग्राउंड से आता है ना हम सबका वही है तो उस समय देखना बहुत अच्छा लगता था किंतु ये जो भगवान राम के पास में ये सब जादुई शक्तियां है ये ब्रह्मास्त्र है वगैरह तो हम देखते भी हैं एट द सेम टाइम हमको ऐसा लगता है बस पौराणिक कहानियां मात्र है इसके पीछे में कुछ नहीं है बट हु नोस के एग्जिस्टेंस के कितने लेयर हम लोग एक जो एक जो स्वप्न जागृत सुशुप्ति तुरीय अब जैसा कहते हैं तो अब तुरय है ऐसा मान करके छोड़ देते हैं बट जागृत लेवल पे इतनी कॉम्प्लेक्सिटी है इतना वैविध्य है इतनी रिचनेस है तो तुरिय लेवल पे क्या होगा हु नोस अपने पास में फ्रेमवर्क ही नहीं है अब जैसे वो कहते हैं एलियंस होंगे तो एलियन बायोलॉजी कैसा होगा हु नोस सिलिकॉन बेस्ड लाइफ होगा कार्बन बेस्ड लाइफ होगा वो कंप्लीटली अननोन टू अस स्पेककुलेशन के अलावा कुछ नहीं है
प्रश्न: ऐसा प्रतीत होता है की दर्शन होना आध्यात्मिक जगत की सर्वोच्च अनुभूति नहीं है. दर्शन होने पर भी काम-कांचन में फसने का खतरा तो बना ही रहता है.
नृत्य गोपाल ठाकुर बार-बार कहते हैं साधु सावधान उसको परमहंस अवस्था कहते हैं। मास्टर महाशय लिखते हैं कथामृत में ठाकुर कहते हैं परमहंस अवस्था है। साथ में ही कहते हैं साधु सावधान। नहीं एंडलेस नहीं कहेंगे। देखिए निष्ठा होने से हम सविकल्प जो अह माने भक्ति मार्ग की चरम सीमा है वहां तक पहुंच जाएंगे। बट यह जो अह पंचक्लेश दगदबीज कब होंगे? जब निर्विकल्प समाधि होगी। यानी कि ज्ञान मार्ग इज नॉट ऑप्शनल। यदि आप कहते हैं कि भक्ति मार्ग की चरम सीमा पे पहुंच गए तो सब अचीव हो गया। डेंजर इज़ ऑलवेज देयर कि यू कैन फॉल फ्रॉम देयर। ये फॉल फ्रॉम ग्रेस हो सकता है वहां से। बट निर्विकल्प समाधि प्राप्त की। दैट मींस कि वो पंचक्लेश दगदबीज जो हो गए। अभी उसमें से कुछ निकलने वाला नहीं है। सो दैट इज़ नॉट एन ऑप्शनल। इफ यू ट्रूली आर डेडिकेटेड टू स्पिरिचुअलिटी। यू विल हैव टू एट वन पॉइंट ट्रांज़िशन फ्रॉम ज्ञान टू भक्ति टू ज्ञान। एंड वह फिर वह ऐसा कॉन्शियसली करने की जरूरत नहीं। अघोरमणि देवी ने कॉन्शियसली तो कुछ किया नहीं। वो तो ऑटोमेटिक एक गियर शिफ्ट होता है। वो जो ट्रेन जाती है तो वो पता है वो ट्रैक चेंज करता है। वो आदमी एक वहां पे खड़ा रहता है। फिर ऐसा करके वो ट्रैक चेंज करवाता है। अभी गाड़ी वाले को पता ही नहीं है कि क्या हो रहा है। उसको तो बस अपना चलाते जाना है। उसमें फॉरवर्ड ही एक रहता है ना। वैसे साइड बाइड वाला तो होता नहीं है ट्रेन के भीतर में
प्रश्न: काम-कांचन से मुक्त होने की ये फाइट है हमें ही करनी पड़ेगी न उसके लिए ऐश्वरिय सहाय मिलेगी?
ना एक एक लेवल पे तो हमको फाइट करना ही पड़ेगा ना अखुरमणि देवी ने जो तपस्या की है कठोरता की है म अद्भुत है ना दोपहर सुबह को अर्ली सुबह कहां रात को ही कहेंगे 2:00 बजे का टाइम रात को उठ जाना 2:00 बजे 2:00 बजे से 9:00 बजे तक जप करना वो बैठे रहने के लिए भी तो आपको जो विल पावर चाहिए है जप करना मन को एकाग्र करना तो दूर की बात है। इतना बैठे रहने के लिए आपको जो विल पावर चाहिए यह जो जप यज्ञ वगैरह होता है अपने बेलगांव का बड़ा फेमस है और भी सेंटर में होता है। वो देखेंगे वो सभी लोग कहेंगे आधा घंटा एक घंटा तो फिर भी ठीक है। आप बोलेंगे तीन-चार घंटा बैठो तो तो फिर तो मुश्किल है। किंतु फिर ऐसे डिवोटी भी है। फिर वो हैबचुएटेड हो जाते हैं। तीन-तीन घंटा चार-चार घंटा बैठना 5 घंटा बैठना वो हैबचुएट हो जाते हैं। किंतु शुरू में तो लगा होगा ना एक मेहनत माने शारदानंद जी यही कहना चाहते हैं अल्टीमेटली अह अथः योगानुशासनम के लेट अस स्टार्ट नाउ द डिसिप्लिन डिसिप्लिन ऑफ योगा तो डिसिप्लिन इज अ एंट्री वे ऑफ एनी स्पिरिचुअल लाइफ। तो आप सविकल्प मार्ग पे सगुण ईश्वर की आराधना करते-करते आप में डिसिप्लिन इस हद तक हो जाता है कि आपको वो ज्ञान मार्ग में ट्रांजिशन इजी हो जाएगा। हां अब जैसे आप देखिए ना काली पूजा होती है। पूरी रात पुजारी को एक ही आसन पर बैठकर पूजा करनी है। दुर्गा पूजा होती है कि कंटीन्यूसली तीन-चार दिन आपको घंटों घंटों के बाद घंटे बैठकर के पूजा करते रहना है। तो वो पुजारी की निष्ठा होने से यह सब पूजाओं का एक अलग ही आनंद होता है। शिवरात्रि की पूजा है। पूरी रात आपको पूजा करनी है। चार प्रहर की चार पूजा है। हां म डिसिप्लिन के बिना कैसे होगा? फिजिकल एंड मेंटल डिसिप्लिन के बिना आहार सभी चीजों में तो आपको संयम चाहिए ना। गड़बड़ खाना खा लिया तो बैठ भी नहीं पाएंगे।
प्रश्न: काम-कांचन से मुक्त होने की ये फाइट सही में मुश्किल है
ना किंतु देखिए एक बार जैसे भक्ति शास्त्र में कहते हैं ना आप एक कदम चलेंगे ना भगवान आपके लिए 99 कदम चल लेंगे। एक बार प्रारंभ तो कीजिए। माने यदि मैं ऐसा बोल करके बैठा रहूंगा कि अरे भाई तो कैसे होगा तो तो होने वाला नहीं है। एक बार प्रारंभ तो कर ले फिर तो ठाकुर के हाथ में है ना देखिए नहीं हुआ तो नहीं हुआ कोई स्पम अप्यस धर्मस त्रायते महतो भयात थोड़ा सा किया हुआ धर्म भी बड़े भय से बचा लेता है म व्यष्ट तो कुछ जाने वाला नहीं है
प्रश्न: ये बात सही है की हम एक कदम चलेंगे तो भगवान हमारे लिए सो कदम आगे आएंगे। किन्तु न हमें विश्वास ही नहीं होता इस पे.
ना किंतु देखिए भक्ति शास्त्र की म भक्ति शास्त्र कहानियों से भरा हुआ है स्टोरीज आफ्टर स्टोरीज कि भगवान की कृपा कितनी है प्रॉब्लम हमारा है। हमारा विश्वास नहीं होता है। ये जो डिसबिलीफ जो है ना सेकुलरिज्म ये इतना भीतर में जैसे मैंने कहा वो मैं बचपन में रामायण महाभारत टीवी सीरीज देखता था आनंद भी बहुत होता था। एट द सेम टाइम आई एम वेरी क्लियर कि ये जो न्यूज़पेपर में जो पढ़ते हैं ना टाइम्स ऑफ इंडिया में और इंडियन एक्सप्रेस में वही सब सही है। ये सब कहानियां ही है। ऐसा एक कंफर्म बैठा हुआ है। ये टाइम्स ऑफ इंडिया में तो नहीं आता हेडलाइन पे कि ये इसके ऐसा कुछ दैट इज अ रियल लाइफ दैट इज अ इमेजिनेशन लाइफ किंतु देखिए ये जो सेकुलरिज्म है उसका भी एक पर्पस है। अभी अखंडानंद जी की एक कहानी है। गांव में गए हैं तो कुछ पंडित लोग इकट्ठा हो गए हैं वाद-विवाद करने के लिए। बोला कि अच्छा महाशय बताइए तो लंका में किसका राज्य है? तो खंडानंद जी कहते हैं वहां तो ईस्ट इंडिया कंपनी का तो ऐसे नाराज हो गए। अरे लंका में तो विभीषण का राज्य है। क्या सब फालतू की बातें करते हो? बोल के ऐसा हल्ला मचाया अखंडानंद जी को बेचारे को दौड़ के भागना पड़ा। अभी जब हम ऐसा सब पढ़ते हैं तो फिर अपना सेकुलरिज्म और भी दृढ़ हो जाता है कि यह कहीं और दूसरे रास्ते पर ना ले जाए। विश्वास अंधविश्वास। अब नेचुरली ठाकुर ने कहा सी सो मेनी लेयर्स एक और हमको अंधविश्वास स्पष्ट दिखता है कि इस तरह का अंधविश्वास है कि लंका में विभीषण का राज्य है। दूसरी ओर स्वामी जी जब ठाकुर को कहते हैं अंधविश्वास नहीं होना चाहिए। ठाकुर ने कहा विश्वास में अंध क्या और देखने वाला क्या? विश्वास विश्वास है। आपको सही चीज पे विश्वास हो, गलत चीज पे विश्वास हो बट द फेथ यू हैव टू डेवलप। राइट? सो सी आई मीन सो मेनी लेयर्स नजरों से दिखा मां ने आकर दिखा दिया। बाल गोपाल ने सीधा स्पष्ट एक भक्त के देह में प्रवेश करके बाहर आकर दिखाया। भक्त भगवान एक दैट इज ज्ञान। किंतु वो उससे पहले नीची जाति के साथ में पुत्री का विवाह किया है तो गलत नहीं है। दैट यू हैव टू एक्सेप्ट इनस्पाइट ऑफ योर अपब्रिंगिंग। ऑर्थोडॉक्स अपब्रिंगिंग। ओम