prayer
ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः श्री श्री रामकृष्ण लीला प्रसंग स्वामी शारदानंद जी महाराज द्वारा लिपिबद्ध भाग दो साधक और साधना फर्स्ट चैप्टर उसमें हम कहां तक पहुंचे पहुंचे थे। शरद महाराज प्रश्नोत्तरी के माध्यम से यह जो कुछ बेसिक फंडामेंटल कांसेप्ट्स है रामकृष्ण विवेकानंद साहित्य के ठाकुर के जीवन के साथ में जुड़े हुए वो क्लेरिफाई कर रहे हैं। तो उसमें एक प्रश्न था कि यदि आप यह
आध्यात्मिक सिद्धांत (theory) का प्रमाण है -- ऋषियों के जीवन में आया हुआ practical सात्त्विक परिवर्तन
कहते हैं कि सर्वभूत में ईश्वर दर्शन करना ही यदि जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य है और वही सर्वोच्च सत्य है तो हमको यह विभिन्न चीजें क्यों दिखाई देती है? मैं अलग हूं। आप अलग है। यह पेड़ पौधे अलग है। यह बिल्डिंग अलग है। यह माइक अलग, यह वस्त्र अलग। यह अलग-अलग क्यों दिखाई देता है? तो महाराज कहते हैं हम भ्रम में पड़े हैं। तो प्रश्न होता है कि यह जो पृथ्वी के 700 करोड़ लोग हैं वह जो देख रहे हैं वह गलत और यह जो लाख दो लाख अल्पसंख्यक ऋषि है सिद्ध है जिन्होंने ब्रह्म ज्ञान प्राप्त किया है या तो फिर ब्रह्म ज्ञान में स्थित हुए हैं। प्राप्त करना क्या जो बाहर है उसको प्राप्त करना है। जो भीतर में ही है उसको तो सिर्फ रियलाइज ही करना है। तो जिन्होंने ब्रह्म ज्ञान साक्षात्कार किया है उनको सिर्फ जो दिखता है अल्पसंख्यक वही सही और यह ज्यादातर 99% लोग गलत ऐसा आप कैसे कह सकते हैं? तो उसके उत्तर में शरद महाराज ने कहा कि मेजॉरिटी लोग जो देखते हैं वही सही और जो माइनॉरिटी जो देखते हैं वह गलत। इस तरह से यह आपका पॉलिटिक्स में इस तरह से चल सकता है। आध्यात्मिक जीवन में इस तरह से नहीं चलता। आध्यात्मिक जीवन में देखा जाता है कि किसका लाइफ ट्रांसफॉर्म हुआ है। जिसका लाइफ ट्रांसफॉर्म हुआ है वो जो कहता है वो सच। क्योंकि अल्टीमेटली देखिए इवन साइंस में भी आप देख लीजिए। आज हमको कोई एक साइंटिस्ट आकर के यह सॉलिड स्टेट फिजिक्स या तो यह इलेक्ट्रॉनिक्स या तो यह क्वांटम डायनेमिक्स यह सब समझाने का प्रयास करेगा तो हमारे सर में कुछ भी उतरेगा नहीं क्योंकि बड़े ही कॉम्प्लिकेटेड फिजिक्स और मैथमेटिक्स के यह सब कांसेप्ट है। किंतु फिर भी हम लोग मान लेते हैं कि हां वे लोग जो कहते हैं वो सही है। यदि एक साइंटिस्ट कहता है कि एटम का स्ट्रक्चर इस तरह का है। बीच में न्यूक्लियस है और उसके आसपास में ये नेगेटिव चार्ज पार्टिकल का एक प्रोबेबिलिटी क्लाउड है। तो यदि मैं ये कहता है फिजिक्स फिजिसिस्ट तो हम यह बात स्वीकार कर लेते हैं। फिजिसिस्ट यदि यह कहता है कि एंटेंगलमेंट होता है सब एटॉमिक पार्टिकल्स में तो हम स्वीकार कर लेते हैं। फिजिसिस्ट यदि यह कहता है कि यह जो टाइम है इवन स्पेस है वह रिलेटिव है। यदि आप हाई स्पीड से ट्रैवल करेंगे तो टाइम स्लो होगा। स्पेस भी हो सकता है। ग्रेविटी जो है अर्थात कि यह जो स्पेशल कर्वेचर वो कॉन्ट्रैक्ट होते हैं। तो हम यह सब स्वीकार कर लेते हैं। क्यों? क्योंकि अल्टीमेटली तो मेरे पास में आइंस्टाइन ने जो कहा या तो फिर बाद में जिस तरह से क्वांटम डायनेमिक्स डेवलप हुआ यह टेस्ट करने के लिए मेरे पास में तो कोई उपाय नहीं है। मैं किस तरह से इसको स्वीकार करूंगा कि इसी सब साइंस के आधारित आज का मॉडर्न इलेक्ट्रिकल इलेक्ट्रॉनिक्स इंडस्ट्री बना हुआ है। कि आप जो कुछ भी देखते हैं अह जीवन में यह जो सब एसेंशियल कमोडिटीज या तो फिर एसेंशियल आइटम्स है यह रेफ्रिजरेटर है, एयर कंडीशन है, मोबाइल फोन है, लैपटॉप है, कंप्यूटरटर्स है, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस है, यह सब सॉफ्टवेयर है, यह इंटरनेट है, अंडर सी केबल्स है, यह सेटेलाइट है। ना कि यह फिर यह वॉरफेयर मॉडर्न वॉरफेयर के जितने भी आप उपकरण देख लें इंटरकॉन्टिनेंटल बैलेस्टिक मिसाइल ना कि यह फिर यह जो कुछ भी है आज के युग में एटम बम है यह सब कुछ उसका ही प्रैक्टिकल एप्लीकेशन है। अभी मुझे अपनी नजर के सामने एटम बम का विस्फोट हुआ दिखेगा। तो फिर मैं स्वीकार कर लूंगा कि भाई ये e = mc² एनर्जी = मास * द स्क्वायर ऑफ स्पीड ऑफ लाइट। यह इक्वेशन सही होना ही चाहिए। अदरवाइज तो इस इक्वेशन के आधार पे यह एटम बम किस तरह से बना। वो गलत होगा तो यह डिवाइस भी काम नहीं करेगा। यानी कि हम लोग साइंटिस्ट को क्वेश्चन नहीं करते हैं क्योंकि साइंस का प्रैक्टिकल एप्लीकेशन हमारी नजर के सामने हमको सतत दिखता है। आज ये मॉडर्न वर्ल्ड जो है यह हम मॉडर्न साइंस के बिना मॉडर्न वर्ल्ड संभव ही नहीं। भारत में देखिए आफ्टर इंडिपेंडेंस ये कंटिन्यूअस ये फेमिन है या फिर ये पॉवर्टी ये अन्न का अभाव चलता ही रहा। चलता ही रहा। तो कहां अमेरिका से वह फिर यह धान मंगवाना पड़ता है। फिर उनके सामने नीचा दिखना पड़ता है। लोग हमको भिखारी करके कहते हैं कि इंटरनेशनल लेवल पर भीख मांगता है इंडिया। किंतु उसके बाद में जब यह ग्रीन रेवोल्यूशन आया ये हायर ये हाइब्रिड जो फूड ग्रेंस है उसको हमने यूज करना शुरू किया। तब से हमारी फसल जो है वह इतनी बढ़ गई कि इंडिया टुडे इज नेट एक्सपोर्टर इन द वर्ल्ड। और आजादी के बाद में आफ्टर इंडिपेंडेंस अपनी पपुलेशन वो 33 करोड़ न की इतनी थी। 30 करोड़ न की इतनी आज 1140 करोड़ की पपुलेशन है। इसके बावजूद नियरली फोर टाइम्स नियरली फाइव टाइम्स 4.5 टाइम्स अपनी पपुलेशन विद इन 70-80 इयर्स बढ़ गई है। इसके बावजूद हम लोग यह फूड ग्रेन एक्सपोर्ट करते हैं। तो यह रेवोल्यूशन यह ग्रीन रेवोल्यूशन ये ग्रीन रेवोल्यूशन कहां से आया? तो यह मॉडर्न जेनेटिक्स साइंस समझ करके ही तो यह रेवोल्यूशन आया। यह विद इन अ वेरी शॉर्ट पीरियड ऑफ टाइम आज जितने भी देश हैं वे सभी देश यह एक के बाद एक ये इंडस्ट्रियलाइजेशन फिर डिजिटल डिजिटाइजेशन इस तरह मैन्युफैक्चरिंग यह सब स्टेप्स चढ़ते हैं। भारत में एग्रीकल्चर एग एग्रोनॉमिकल इकोनमी से सीधा हमने डिजिटल इकोनमी में जंप लगाया है। ये जिस तरह से मैन्युफैक्चरिंग और इंडस्ट्रियलाइजेशन चाइना इवन कोरिया, जापान, यूरोप में हुआ वो स्टेप ही जैसे कि हमने मिस कर दिया है। तो आज 100 $200 बिलियन डॉलर का इंडिया का सॉफ्टवेयर एक्सपोर्ट है तो यह सब कैसे संभव हुआ? यदि ये सॉफ्टवेयर इंडस्ट्री के पीछे में जो डिजिटल साइंस और डिजिटल साइंस के पीछे में सॉलिड स्टेट फिजिक्स ये माइक्रोपर ये क्वांटम डायनेमिक्स यह सब साइंस फंडामेंटल साइंस यदि सही नहीं होते यदि वो रियल नहीं होते तो इतना बड़ा इंडस्ट्री इंडिया ने डेवलप कैसे किया यानी कि फल हमारी नजर के सामने देखता है और फल के आधार पर हम मान लेते हैं कि जिस वृक्ष वृक्ष पे यह इतना मीठा सुंदर फल प्रकट हुआ है। उस वृक्ष की जड़े वो काफी गहराई तक गई हुई है। यदि उसकी जड़े ही ना होती तो वृक्ष जो है वह सड़ जाता। वृक्ष यदि सड़ जाता तो उसमें इतने सुंदर इतने स्वादिष्ट मीठे फल लगते ही नहीं। यानी कि मुझे जब नजर के सामने यह सब प्रैक्टिकल एप्लीकेशन दिखती है तो इसके पीछे के साइंस को मैं सही मान लेता हूं क्योंकि वो साइंस सही है या गलत है ये टेस्ट करने का मेरे पास में और कोई उपाय नहीं है। मैं कोई मैथमेटिशियन फिजिसिस्ट तो हूं नहीं कि फंडामेंटल थ्योरीज को लॉजिकल कंक्लूजन क्या है? उसका लॉजिकल स्टेप बाय स्टेप समझ करके मैं उसको समझूं। तो यहां पर भी आध्यात्मिक जीवन में ऐसा ही है कि अल्पसंख्यक ऋषि गण जो मानते हैं वह सही आप कैसे स्वीकार करेंगे? तो आप उनका जीवन देखिए। उनके जीवन में और एक आम आदमी के जीवन में आपको फंडामेंटल डिफरेंस दिखाई देगा। ऋषियों के जीवन में शरणागति है। आत्मश्रद्धा है। काम कांचन के प्रति निर्म्मोह है वे लोग। उनको उन्होंने त्याग किया है। उनके हृदय में मैत्री, करुणा, मुदिता, उपेक्षा जैसे चित्त प्रसाद प्रकट हुए हैं। तो यह सब कुछ हम जब देखेंगे वेदांत में जिस तरह से कहते हैं इहा मूत्र फल भोग विराग यह अमूत्र फल भोग विराग। इस जन्म में पर जन्म में परलोक में जो भी आप कहे सब तरह के फलों का जो भोग है जो मेरी लालसाएं हैं उसका मैंने त्याग किया है। नित्यानित्य वस्तु विवेक क्या नित्य है क्या अनित्य है यह मुझे विवेक हुआ है। क्षमाधि षटक संपत्ति अर्थात कि शम दम श्रद्धा उपरति ततीक्षा और एक जो भी है तो यह जो समाधि षटक संपत्ति है वो उनके जीवन में प्रकट हुई है और मुमुक्षुत्व तो यह जब सद्गुण राशि हम किसी में देखते हैं और फिर हम उनको सामान्य लोगों के साथ में कंपेयर करते हैं तो हम क्या देखते हैं उनके जीवन में उनका मन काम कांचन की ओर दौड़ता है अष्टपाश लज्जा घृणा भय यह इस सब तरह के जो अष्टपाश है उनसे बंधा हुआ है। उनके मन में हिंसा द्वेष इस तरह के गुण भरे हुए हैं। छोटी-छोटी चीजों में या तो वह डिप्रेस हो जाते हैं या तो क्रोधित हो जाते हैं। तो हम जब उन दोनों के जीवन में यह डिफरेंस देखेंगे तो हमका हमारा मन जो है ऑटोमेटिक जो सिद्ध है ऋषि है जो संत है जो महापुरुष है उनके कथन जो है उसके प्रति हमारा आकर्षण ऑलरेडी बढ़ना शुरू हो जाएगा। तो इस तरह से शरद महाराज आर्गुममेंट करते हैं। जब जीवन को परिवर्तित हुआ आप देखें तब आप मानिए कि वह जो लोग कह रहे हैं वह सत्य है। तो यह तो एक पूरा हमने देखा कल जो पूरा एक दो-तीन दिन से जो हमारा चल रहा
वेदांत कहता है कि यह जगत भ्रम है — पर भ्रम हम सबको एक ही तरह का कैसे दिखाई देता है?
था। इसके बाद में देखिए कि दूसरा प्रश्न क्या होता है। अच्छा किंतु आमादे शकले भ्रम एक प्रकार हो की रूपे अभी हमने यह तो स्वीकार कर लिया कि चलो ऋषि मुनि जो कहते हैं कि भ्रम का जब विच्छेद होगा भ्रम से हम जब मुक्ति प्राप्त करेंगे तो हमको एक अद्भय ब्रह्म वस्तु का साक्षात्कार होगा। यह तो फॉर वन मोमेंट हमने स्वीकार कर लिया। किंतु फिर और एक प्रश्न होता है कि यह भ्रम कहां से आया और सबको एक ही तरह का भ्रम क्यों हो रहा है? और यह प्रश्न लेजिटमेट भी है। यदि हम जैसे बहुत बार हम लोग यह अवस्था त्रय है। उसके साथ में उसके माध्यम से हम लोग आ ये इसको कंपेयर करने का प्रयास करते हैं। स्वप्न जागृत सुशुप्ति। तो जागृत अवस्था और स्वप्न अवस्था इन दोनों में हमको कैसे डिफरेंस दिखाई देता है? यदि एक एग्जांपल ही देना है तो हम कहेंगे कि ये जागृत अवस्था सही है। स्वप्न अवस्था गलत है। और इस एग्जांपल के माध्यम से हम यह कहेंगे कि सिमिलरली जागृत अवस्था भी गलत है या तो फिर मिथ्या है या तो भ्रम है और जो तुरीय अवस्था है वह सही है। यहां पे जागृत अवस्था का कंपैरिजन स्वप्न अवस्था के साथ में किया है और स्वप जागृत अवस्था ऑन वन हैंड दूसरा कि जागृत अवस्था का कंपैरिजन तुरी अवस्था के साथ में किया है तो यह एक हमको कहा जाता है कि किस जिस तरह से आप नींद से उठते हैं तो स्वप्न में जो कुछ हुआ है आपके साथ में वह आपको सत्य कुछ क्षण के लिए शायद प्रतीत होगा किंतु जैसे ही नींद से उठ जाएंगे स्वप्न भंग भंग हो गया और वास्तविकता आपकी नजर के सामने आ गई। वैसे ही यह जीवन रूपी स्वप्न है। जब यह भंग होगा, ब्रह्म साक्षात्कार होगा, ब्रह्म ज्ञान प्रकट होगा, तो यह पूरा जीवन आपको स्वप्न की तरह दिखाई देगा। ओके? चलो, हमने यह मान लिया। किंतु इसके बाद में एक बड़ा ही इंपॉर्टेंट प्रश्न होता है कि स्वप्न तो सभी लोगों को बिल्कुल अलग-अलग दिखते हैं। आपका स्वप्न है, मेरा स्वप्न है, तीसरे किसी का स्वप्न है, 700 करोड़ लोग यदि पृथ्वी पे हैं तो यह 700 करोड़ लोग डिफरेंट-डिफरेंट तरह के स्वप्न देखते हैं। इन सब सपनों में कहीं पे भी कोई किसी भी तरह का यह कोऑर्डिनेशन ये सेम तरह के रूल्स रेगुलेशन नहीं दिखते हैं। तो फिर आप स्वप्न के साथ में जागृत अवस्था की तुलना करें। जागृत अवस्था में हम सबको एक ही तरह की चीज दिखाई देती है। ऐसा नहीं होगा कि मेरी जागृत अवस्था में मैं प्राइम मिनिस्टर हूं या प्रेसिडेंट हूं भारत का और आप भी अपनी जागृत अवस्था में इसी भारत के प्राइम मिनिस्टर और प्रेसिडेंट है। जब हम स्वप्न में आप भी प्राइम मिनिस्टर हो सकते हैं। मैं भी प्राइम मिनिस्टर हो सकता हूं। यह 140 करोड़ भारतवासी सभी अपने-अपने स्वप्न में भारत के प्राइम मिनिस्टर हो सकते हैं। 140 करोड़ प्राइम मिनिस्टर भारत के हो सकते हैं। अपने-अपने स्वप्न में जागृत अवस्था में देखें तो भारत का सिर्फ एक ही प्राइम मिनिस्टर है और बाकी के 140 करोड़ -1 वे लोग प्राइम मिनिस्टर कभी नहीं हो सकते। तो यह तो एक बहुत बड़ा डिफरेंस हमको दिखता है। तो फिर आप जिस तरह से स्वप्न अवस्था को मिथ्या बोलकर के रिजेक्ट कर देंगे क्योंकि सभी की स्वप्न में दिखी हुई वास्तविकता एक दूसरे के साथ में क्लेश होती है। एक दूसरे के साथ में उसका कंट्राडिक्शन होता है। जबकि जागृत अवस्था में हम सभी की कलेक्टिव अनुभूति है वह एक ही जैसी है। आज यदि एक मूवी रिलीज हुआ और इस मूवी में जो कुछ भी चल रहा है ये 140 करोड़ भारतवासी एक ही तरह का मूवी देखेंगे। आज इंडिया का इंग्लैंड के साथ में ना ऑस्ट्रेलिया के साथ में क्रिकेट मैच हुआ और यदि इंडिया जीता तो हम सभी 140 करोड़ भारतवासियों को इंडिया ही जीतता हुआ दिखाई देगा। ऑस्ट्रेलिया जीतता हुआ नहीं दिखाई देगा। वास्तविकता जागृत अवस्था में एक ही है। किंतु हालांकि स्वप्न में हो सकता है कि 140 करोड़ भारतवासी है वे लोग तो शायद भारत को जीतता हुआ देखे किंतु ऑस्ट्रेलिया वाले जो है वो अपना स्वप्न में ऑस्ट्रेलिया को जीतता हुआ दिखे। तो ये तो दिस इज एंटायरली पॉसिबल कि अपने-अपने स्वप्न में कोई भी क्रिकेट टीम जीत सकती है। वास्तविकता में तो एक ही क्रिकेट टीम जीतेगी। तो यह एक बड़ा ही इंपॉर्टेंट क्वेश्चन या तो फिर एक ऑब्जेक्शन खड़ा होता है। जागृत अवस्था को आप स्वप्न के साथ में या भ्रांति के साथ में भ्रम के साथ में तुलना करते हैं तो यह भ्रम सबको एक जैसा क्यों दिखाई देता है? स्वप्न की तरह सभी का भ्रम अलग-अलग क्यों नहीं? मैं क्यों पृथ्वी पर ही रहता हूं? मैं क्यों और दूसरा यह तो एक प्रश्न है। दूसरा एक होगा कि प्रतिदिन नए-नए स्वप्न दिखते हैं। जबकि यह वास्तविकता है। जागृत अवस्था अनफॉर्चूनेटली एक ही तरह की दिखती है। अब जैसे वो किसान था ठाकुर की कहानी में वैसे तो जागृत अवस्था में किसान था। स्वप्न अवस्था में राजा था और इतने सारे उसके राजकुमार थे। अभी हो सकता है कि दूसरे दिन उसने स्वप्न देखा तो दूसरे दिन शायद हो सकता है कि वह राजकुमार हो। तीसरे दिन यदि उसने स्वप्न देखा तो स्वप्न में शायद हो सकता है वो सेनापति हो। चौथे दिन स्वप्न देखा तो उसमें कोई धनी व्यक्ति हो। पांचव दिन स्वप्न देखा तो हो सकता है एस्ट्रोनॉट। आज का यदि मॉडर्न किसान है तो वो एस्ट्रोनॉट बनकर के चांद पे जा रहा है। यानी कि स्वप्न में तो वैविध्य है। दिन प्रतिदिन हमको नया कुछ एंटरटेनमेंट मिलता है। यानी कि इस तरह से कि जैसे हमको प्रतिदिन एक नया मूवी देखने को मिलता है। एक प्रतिदिन एक नया एंटरटेनमेंट। किंतु जागृत अवस्था में अनफॉर्चूनेटली हम जो कुछ कंडीशन में फंसे हुए हैं उस कंडीशन को दूर करना बड़ा ही मुश्किल है। यदि मेरे सामने आज ये परीक्षा का टेंशन है। मैं कल नींद से उठूंगा तो वही परीक्षा का टेंशन उस दिन भी रहेगा। ऐसा नहीं होगा कि एक दिन में प्राइम मिनिस्टर हो जाऊं। एक दिन में वो म्यूजिशियन हो जाऊं। एक दिन में फिल्म का एक्टर हो जाऊं। चौथे दिन में क्रिकेटर हो जाऊं। ऐसा नहीं होने वाला। जो मैं स्टूडेंट हूं स्टूडेंट अवस्था में ही मैं फंसा रहूंगा। परीक्षा का जो टेंशन सामने प्रतिदिन जो मुझे दिख रहा है, जब तक परीक्षा समाप्त नहीं होगी, तब तक यह टेंशन बना ही रहेगा और जैसे परीक्षा समाप्त होगी और दूसरा कोई टेंशन आकर बैठ जाएगा। तो यह एक लेजिटमेट प्रश्न है कि सबके स्वप्न यदि अलग-अलग है और स्वप्नों में जो विराट वैविध्य है जागृत अवस्था में सबकी अनुभूति एक ही तरह की है और यह एक ही अनुभूति को लेकर के हम पूरा जीवन बिताते हैं। तो कभी-कभी डॉक्टर कहते हैं ना अब बीमार हो गए हैं तो हवा फेर करके आओ। अर्थात कि और कोई जगह पे जाके आओ तो यहां का जो टेंशन है, यहां की जो आबोहवा है, क्लाइमेट है जो कि आपको बीमार कर रही है, दूसरी जगह पर जाने से आप क्योर हो जाएंगे तो अच्छा है। हम हवा करने को जाते हैं। किंतु अनफॉर्चूनेटली हवा करने को जाते हैं तो ज्यादा दिन रुक नहीं पाएंगे। वहां पे अपने घर में अपनी ऑफिस में जो ड्यूटी है वह तो हमको बुलाएंगे ही बुलाएंगी। तो फिर हमको वहां पर वापस आ ही जाना पड़ता है। यदि जागृत अवस्था भी भ्रम रहती तो मैं आज हवा फेर करने को जहां पर भी गया तो वहां पे ही मैं रह जाऊंगा। वो तीसरे दिन में शिमला गया तो वहां पर रह जाऊंगा। चौथे दिन में ऑस्ट्रे स्विट्जरलैंड गया तो वहां पर रह जाऊंगा। पांचव दिन में हरिद्वार गया तो फिर मैं वहीं पर रह जाऊंगा। ऐसा तो होता नहीं है। मुझे यह जो विशाखापटनम आश्रम है वहीं पर रहना है। वो स्वप्न में शायद हो सकता है कि एक दिन वृंदावन जाऊं, एक दिन काशी जाऊं, एक दिन हरिद्वार जाऊं, एक दिन यहां पे जाऊं, हिमालय में किंतु जागृत अवस्था में ऐसा तो होता नहीं। जागृत अवस्था में मुझे यहीं पे रहना है। सो दैट इज़ अ बिग क्वेश्चन कि आमा देर शकले भ्रम एक प्रकार होइलो की रूपे हम सभी का भ्रम एक ही तरह का हुआ किस तरह से आमी जेठा के पशु बोलिया बुझी तुम शेटा के पशु भिन्न मानुष बोलिया बुझो ना मैं जिसको पशु बोलकर के समझता हूं तुम भी उसको पशु के अलावा मनुष्य समझ के तो उसको उसके साथ में किसी तरह का व्यवहार नहीं करते ए रूप शकल विषय इसी तरह बाकी सब विषय के साथ में है एतु लोके ए रूपे शकल विषय एक काले एक ही प्रकार भूल होवा अल्पो आश्चर्य कथा न है इतने लोगों की इतने सब विषय में एक ही साथ में एक ही प्रकार की भूल होना कोई कम आश्चर्य की बात नहीं है। पांच जने एकटा विषय भूल धारणा कर ले ओ अपर पांच जने ओ विषय शत दृष्टि थाके पांच लोग यदि एक बात को भ्रम समझते हैं तो किंतु दूसरे पांच लोग उस चीज को ठीक ठीक सत्य दृष्टि से देख सकते हैं सर्वत्र ए रुपई तो देखा जाए सब जगह तो इसी तरह से देखने में आता है। पांच बच्चे यदि यह कहते हैं, पांच स्टूडेंट यदि यह कहते हैं कि परीक्षा की तैयारी करने की कोई आवश्यकता नहीं है। आओ हम अपने मित्रों के साथ में खेलते हैं, खेलते हैं, घूमते हैं, आनंद करते हैं। तो उसके सामने पांच टीचर या पांच ये जो पेरेंट्स है वह सामने फटाक करके कह देंगे कि पहले परीक्षा की तैयारी बाद में घूमना फिरना, खेलना और हंसी मजाक करना। तो जिस लोगों को जो पांच लोगों को एक भ्रांत धारणा होती है तो दूसरे पांच लोग आपको मिल जाएंगे उसकी भ्रांत धारणा दूर करने के लिए। किंतु यह इतना बड़ा जगत इस जगत में जो कुछ भी हो रहा है सब कुछ हमको एक ही जैसा क्यों दिखता है? अभी आज न्यूज़ पेपर में एक न्यूज़ आया कि एक देश ने दूसरे देश के ऊपर में आक्रमण किया है। अभी 700 करोड़ की पृथ्वी के ऊपर में जो लोग इस न्यूज़ को पढ़ेंगे वो तो वही देखेंगे ना कि दे कंट्री वन एटक्स कंट्री टू उनको कभी ऐसा नहीं दिखेगा कि कंट्री थ्री एटक्स कंट्री फोर ऐसा कभी नहीं दिखेगा। उनको कंट्री वन एटक्स कंट्री टू ऐसा ही दिखेगा। पर फिर भले चाहे उनका फिर आईडियोलॉजिकल एफिलिएशन कुछ भी हो कि जिस कंट्री पे अटैक हुआ उसी की गलती थी या तो फिर जिस कंट्री ने अटैक किया उन्हीं की गलती थी वो गलती आप चाहे किसी की भी निकाले किंतु जो दो कंट्री युद्ध कर रहे हैं उन्हीं दो कंट्री का नाम हम सबको दिखाई देगा और तीसरी चौथी पांचवा छठा देश हमको कभी नहीं दिखाई देगा वो यदि दिखाई देता है तो वह फेक न्यूज़ है और फेक न्यूज़ करेक्ट करने वाले लोगों की कमी नहीं है इस जगह जगत में उपदेश देने वालों की तो जो न्यूज़पेपर में आता है पूरी पृथ्वी में एक ही तरह का दिखता है। भले ही चाहे आप अपना इंटरप्रिटेशन उस घटना का कुछ भी करें। फैक्ट इज अ फैक्ट। आज किसी को प्राइम मिनिस्टर बनाया गया इलेक्शन के एंड में तो फिर हम जो भारत के जो 140 करोड़ लोग हैं उसी एक व्यक्ति को ही प्राइम मिनिस्टर के रूप में देखेंगे। भले चाहे फिर आप 10 विरोध करें कि हां इसका जो इलेक्शन हुआ वो गलत है। इलेक्शन प्रोसेस गलत है। वोट गलत काउंट किए गए वगैरह-वगैरह। आप जो भी चाहे ऑब्जेक्शन उठाइए। प्राइम मिनिस्टर तो एक ही दिखेगा सबको। एक दूसरा ही आदमी प्राइम मिनिस्टर बनके बैठ गया है दिल्ली में और वो फॉरेन पॉलिसी चला रहा है। वो डोमेस्टिक पॉलिसी चला रहा है। इस तरह से कभी नहीं दिखेगा। और यदि मुझे दिखता है तो मेरा भ्रम संशोधन करने वाले भ्रम करेक्ट करने वाले लोगों की कमी नहीं है। तो यहां पे यह प्रश्न है कि सभी को एक ही तरह की जो एक वास्तविकता दिखती है तो आप यह कैसे कह सकते हैं कि यह ज्यादातर लोग जो एक वास्तविकता देखते हैं वो गलत और जो ऋषि कहते हैं वही सही हमको दिखता है कि वह प्राइम मिनिस्टर है। यह होम मिनिस्टर है। ये एक्टर है। ये सिंगर है। यह सोल्जर है। यह क्रिकेटर है। यह मेरा बॉस है। यह मेरा फैमिली है। और यह मैं हूं। मुझे तो यही दिखता है। बाकी सबको भी यही दिखता है। किंतु एक ऋषि आकर के कहेंगे कि वह भी ब्राह्मण है। यह भी ब्राह्मण है। तुम भी ब्राह्मण हो। मैं भी ब्राह्मण हूं। तो हम सबको जो दिखता है वह गलत। और वह जो ऋषि कहते हैं वह सही। ऐसा कैसे हो सकता है? एकने किंतु ओ नियम एक बार व्यतिक्रम होते छ यहां पर किंतु इस नियम का संपूर्ण रूप से विच्छेदन हो रहा है। व्यतिक्रम हो रहा है। नियम का भंग हो रहा है। मेरी नजर से तो यही एक प्राइम मिनिस्टर है। बाकी सबकी नजर से यही एक प्राइम मिनिस्टर है। हम सब लोग अलग है। वह प्राइम मिनिस्टर है। मैं कभी प्राइम मिनिस्टर नहीं होने वाला। मैं कभी ना ही होम मिनिस्टर होने वाला हूं। मैं ना ही कभी एक फेमस एंटरप्रेन्योर होने वाला हूं। ना ही मैं कभी एक फेमस आर्टिस्ट होने वाला हूं। तो ये डिफरेंस तो मुझे स्पष्ट दिखाई देता है। जबकि आप कहते हैं कि वही आर्टिस्ट, वही एंटरप्रेन्योर, वही यह पॉलिटिशियन, वही यह लोग और मैं और वो खुद हम सब एक ही है। एक ही सत्ता की विभिन्न किरण मात्र नाम रूप भेद मात्र है। भीतर में सत्ता तो एक ही है। इस नियम का व्रतिकम व्यतिक्रम जो है संसार में जो सबको दिख रहा है वह किस तरह से हो रहा है। ए जन तोमार कथा संभव पर बोलिया बोध हो ना इस सब आर्गुममेंट की वजह से आपकी बात है वह हमको संभव है इस तरह से बोध नहीं होता है कॉम्प्लिकेटेड लैंग्वेज महाराज की आपकी बात सच है ऐसा मुझे नहीं लग रहा है सिंपल लैंग्वेज में
एक अनंत, असीम सामष्टि-मन में जगतरूप कल्पना उदित हुई है
उसके बाद में एक सेंटेंस है इस तरह का जो कि उसमें से कुछ टेक्निकल आर्गुमेंट करने का प्रयास करता है विराट माने जगत रूप कल्पना विद्यमान बोलियाई मानव साधारण एक रूप भ्रम होते छे विराट मन किंतु ओजन भ्रम आबद्ध नए अभी कहना क्या चाहते हैं विराट मन में जगत रूप कल्पना होती है बोलकर के ही मानव साधारण को एक तरह का भ्रम होता है विराट मन किंतु कोई जन्मो भ्रम में आबद्ध नहीं विराट मन परंतु इस तरह के भ्रम में बद्ध नहीं। यह उत्तर देने का प्रयास प्रारंभ हो गया। और एक बड़ा ही इंपॉर्टेंट कांसेप्ट यहां पे इंट्रोड्यूस करते हैं। वेदांत का क्या कहते हैं? विराट मन में जगत रूप कल्पना प्रकट होती है। तो इस विराट के ही विभिन्न किरणें हम है बोल के हमको यह जो कुछ भी दिख रहा है वह एक जैसा ही दिख रहा है। किंतु यह जो विराट मन जो है वह इस तरह के भ्रम में आबद्ध नहीं होता। यह कैसा कहने के जैसा है पता है? एक बहुत ही एक सांसारिक या तो जागतिक उदाहरण दूं। एक मां के चार बच्चे हैं। अभी बच्चे तो छोटे हैं। उनकी बुद्धि तो इतनी परिपक्व हुई नहीं है। मैच्योर हुई नहीं है। उन लोगों में इतनी अकल तो है नहीं। मां के ऊपर में संपूर्ण रूप से डिपेंड करके बैठे हैं। तो अब जैसे ठाकुर ही यह उदाहरण देते हैं। किंतु ठाकुर जिस अर्थ में देते हैं और मैं जिस अर्थ में दे रहा हूं वो थोड़ा सा डिफरेंट है। ठाकुर शरणागति का भाव दिखाते हैं। भक्ति के मार्ग में मैं उसको ज्ञान में कन्वर्ट कर दे रहा हूं। उदाहरण को। ठाकुर क्या कहते हैं? बच्चा जब मां पे संपूर्ण रूप से निर्भरशील होता है तो मां जो कहती है वह सब उसके लिए सत्य है। मां कहती है कि यह तुम्हारा बड़ा भाई है तो यह बच्चा ठीक-ठीक जानता है कि यह जो है लड़का मेरा बड़ा भाई ही है। मां कहती है कि वहां पर भूत रहता है। मत जाओ। वहां पर खतरा है। तो बच्चा ठीक जान के बैठा है कि वहां पर भूत है या खतरा है। वह वहां पर बिल्कुल नहीं जाएगा। क्या दिखाना चाहते हैं ठाकुर कि बच्चे के मां के ऊपर में बच्चे की शरणागति है। अभी इसी को ज्ञान में कन्वर्ट कर ले। यह विराट मन में जो कल्पना होती है यही कल्पना बाकी सबके मन में क्षुद्र मन में जो होती है वो एक ही कल्पना दिखाई देती है। किस तरह से? कि बच्चा ये चार बच्चे हैं। चारों बच्चों को मां एक चीज कहती है कि यह जो लड़का है तुम चारों का बड़ा भाई है। तो चारों बच्चे यह जानकर के ठीक बैठे हैं कि हां यह लड़का है मेरा बड़ा भाई है। ये चार बच्चे अपने से सोचते नहीं है। जो मां कहती है उसी को स्वीकार कर लेते हैं। यानी कि चारों बच्चों का जो जगत का जो अनुभव है वो एक ही है। क्यों? कि ओके वो अनुभव उनको मां के पास में से प्राप्त होता है। तो देखिए कि जब सभी बच्चे मां के ऊपर में डिपेंडेंट है और मां जो कहेगी उसको सच मान लेते हैं तो सभी बच्चों की वास्तविकता एक ही होगी। सभी बच्चों का घर भी एक होगा। सभी बच्चे कहेंगे कि यही मेरी मां है, यही मेरे पिताजी है। सभी बच्चे कहेंगे कि यही मेरा बड़ा भाई है। सभी बच्चे कहेंगे कि वहां पे भूत है, नहीं जाना है। ये शेयरर्ड एक्सपीरियंस ये जो प्रश्न जब हुआ ना कि हम सबको तो एक ही तरह का एक्सपीरियंस होता है। किंतु स्वप्न के साथ में कंपेयर करें तो स्वप्न तो सभी को भिन्न-भिन्न आते हैं। तो यह इसकी वजह से आप जो कहते हैं वह ठीक नहीं लग रहा है। किंतु देखिए यहां पे एक एक्सप्लेनेशन है। एक मां पे डिपेंडेंट जितने भी बच्चे हैं उन सबकी वास्तविकता एक ही होगी। उन सबके अनुभव एक ही होंगे। उनके बड़े भाई, उनका घर, उनका एड्रेस, उनका सरनेम जो भी है सब एक ही होगा। तो यहां पे भी इस उदाहरण के शरद महाराज कहते हैं कि विराट मन में जगत रूप कल्पना उदय होती है। बोलकर के ही मानव साधारण को एक ही तरह का भ्रम होता है। किंतु विराट मन जो है इसके लिए भ्रम में आबद्ध नहीं है। अभी यह जो है
भ्रम हम सबको एक ही तरह का कैसे दिखाई देता है? साधना कर के ऋषियों तो भ्रम के परे चले गए है
इसको थोड़ा सा हम और टेक्निकली देखेंगे। पहले तो शरद महाराज का जो दूसरा जो एक्सप्लेनेशन है वह थोड़ा सा देख लेते हैं। इसके बाद में मैं कुछ स्क्रीन शेयर करके मैंने कुछ ग्राफिक्स बनाए हैं वेदांत सार पुस्तक में से वो हम थोड़ा बाद में देखते हैं। पहले तो शरद महाराज की एक्सप्लेनेशन को और ज्यादा डिटेल में पढ़ लेते हैं। क्या कहते हैं? अल्पसंख्यक ऋषि दग के जनसाधारण मध्य गणना ना कराते तुम नियम व्यतिक्रम देखीते पते छो यह जो अल्पसंख्यक ऋषि है उनको तुम जब जनसाधारण में नहीं गिनते हो इसीलिए तुमको इस तरह का नियम का भंग दिखाई देता है। यह बात भी एकदम सही है। देखिए जब हम यह कहते हैं कि मुझे एक ही प्राइम मिनिस्टर दिखता है। यह 140 करोड़ की जो पपुलेशन है भारत में सबको एक ही प्राइम मिनिस्टर दिखता है। किंतु इस 140 करोड़ की पपुलेशन में 1 लाख लोग ऐसे हैं दो लाख लोग ऐसे हैं कि जिनको दूसरा प्राइम मिनिस्टर दिखता है। तो नेचुरली प्रश्न तो वही होगा ना कि जो 140 करोड़ - 2 लाख यह जो दिखते हैं वही सही होगा और जो 2 लाख 1 लाख जो देखते हैं वह गलत होगा। तो पॉलिटिक्स में तो ऐसा ही होगा किंतु आध्यात्मिक जगत में जैसे हमने ऑलरेडी देखा कि ये 1 लाख ऋषि है उनका जीवन ट्रांसफॉर्म किस तरह से हुआ है वो देखिए और बाकी के जीवन को देखिए। ऋषि मुनियों का जो जीवन है वो देखकर के ही उनके ऊपर में हमारी श्रद्धा आएगी और वह जो कहते हैं वह सही दिखेगा। जबकि यह बाकी लोग जो है उनको हम शायद उनकी पोजीशन, उनकी वेल्थ, उनकी सीनियोरिटी इसके लिए शायद हम रिस्पेक्ट करेंगे। उनके प्रति शायद हम सह हृदयता रखेंगे, मैत्री रखेंगे, करुणा रखेंगे। किंतु हम लोग उनको कोई संत महापुरुष बोलकर के उनकी उनकी पूजा नहीं करेंगे। उनको यह रिस्पेक्ट इस तरह की श्रद्धा नहीं देंगे। तो यह तो एक बात है। जब आप कहते हैं कि 140 करोड़ लोगों को एक ही प्राइम मिनिस्टर दिखता है तो आपकी बात गलत है। तो यहां पर शरद महाराज कहते हैं आपके भीतर में 1 लाख लोग अलग वो तो वो भी तो है कि जिनको दूसरा ही प्राइम मिनिस्टर दिखता है। तो इतना तो आपको स्वीकार करना पड़ेगा कि सभी को एक तरह की रियलिटी नहीं दिखती। जनसाधारण के भीतर में ऋषि मुनि भी है उनको दूसरे तरह की रियलिटी दिखती है। तो यह आप जब यह स्वीकार नहीं करेंगे तभी तो आपको यह सब प्रश्न होगा। यह ऐसा हो गया कि आप कहते हैं कि स्वप्न सबको अलग-अलग दिखता है। तो जो चीज सबको एक ही तरह की दिखती है वह कैसे सही हो सकती है? कैसे स्वप्नवत हो सकती है? तो शरद महाराज कहते हैं हां मान लिया कि 140 करोड़ लोगों को एक ही स्वप्न दिखता है। 1 लाख लोग हैं उनको डिफरेंट तरह का स्वप्न दिखता है। तब तो आपको यह समझना ही पड़ेगा कि सबके स्वप्न सही एक ही नहीं है। अलग-अलग है। तो सेम जागृत अवस्था में भी 140 करोड़ लोग -1 लाख। इनको जो दिखता है और 1 लाख को जो दिखता है वो अलग-अलग जब है तो तो नियम का आपको भंग हो ही गया। इस अर्थ में कि सबको एक चीज क्यों दिखती है? यह नियम ऑलरेडी टूट गया है। तो महाराज कहते हैं कि यह ऋषि है। इनको आप जब जनसाधारण में नहीं गिनेंगे तभी यह प्रश्न होगा। और यहां पर देखिए बहुत बार आध्यात्मिक जीवन में होता है। जो लोग आध्यात्मिक होते हैं, घर त्याग करते हैं। हम लोग ना उनके बारे में कोई एक विचित्र धारणाएं बना देते हैं। हम लोग कहते हैं कि मैं एक आम आदमी हूं। मेरा जो थिंकिंग प्रोसेस है, मैंने बहुत सारे लोगों के साथ में सिमिलर पाया है। किंतु ये लोग जो घर त्याग करते हैं, साधु होते हैं, तपस्या करते हैं, सामने से कष्ट को वरण करते हैं। उन लोगों का माइंडसेट है ना डिफरेंट ही होना चाहिए। देखिए मैं मैं जब छोटा था और इवन बाद में भी मैंने देखा कि जैन परिवारों में बड़ी ही छोटी उम्र में लड़के लड़कियां साधु हो जाते हैं। तो जब वो साधु होते हैं तो मुनि मुनि जब बनते हैं तो उनके घर और कभी-कभी ना बड़े धनपति है। किसी के पिताजी है वह हीराई के व्यापारी करोड़ों की संपत्ति है। यदि वह लड़का अपने घर में रहता तो पता नहीं किस तरह के चरम सुख भोग उसके जीवन में प्राप्त होते। वह सब छोड़कर के वह मुनि बन गया है बड़ी छोटी उम्र में। फिर उसका यह यह होता है प्रोसेशन उसका निकालते हैं। लोग बड़ा ही सेलिब्रेट करते हैं। इतने बड़े घर का लड़का यह मुनि बन गया है। साधु बन गया है। फिर उसकी केश लोचन यह विधि होती है। और फिर वह किसी एक मोनेस्ट्री में जाकर के रहता है। दिगंबर साधु बनता है। निवस्त्र रहता है। सब तरह के कष्ट स्वीकार करता है। तो मेरे मन में प्रश्न आएगा कि यह लड़का जो है यह करोड़ों की संपत्ति ठुकरा करके जब साधु हुआ है वह भी दिगंबर साधु हुआ है। इतना प्रचंड कष्ट उसको जीवन भर करते रहना पड़ेगा। व्हीकल में नहीं बैठना है। वस्त्र नहीं पहनने हैं। सर्दी गर्मी, ठंडी जो बारिश जो कुछ भी है सब कुछ सहन करना है। अल्प आहार करना है। बीच-बीच में लंबे-लंबे उपवास करना है। व्रत रखना है। साधन भजन करना है। यह सब जब हम देखेंगे तो हमको लगेगा यह लड़के का मस्तिष्क जो है ना वह विकृत हो गया है। अदरवाइज वह इतना अच्छा घर छोड़कर के इस तरह से साधु क्यों होता? रामकृष्ण मिशन में फिर भी आप यदि साधु होते हैं तो मटेरियल जो आपकी नीड्स है उसको तो आप फुलफिल अच्छे से कर देते हैं। खाना भी अच्छा होता है। रहने के लिए घर भी अच्छा होता है। ठंडी गर्मी, सर्दी, बारिश जो कुछ भी है उसमें प्रोटेक्शन भी अच्छा होता है। हमारा रूटीन वैसे डिफिकल्ट है। किंतु यह जो जैन साधु है उनके जितना कष्ट तो हमको नहीं करना पड़ता। तो वह एक बात है। हमको हम जब इस तरह के लड़कों को या इवन लड़कियों को देखते हैं तो हमको लगता है कि यह जैन साधु मुनि साध्वी कैसे हो जाते हैं। हमको लगता है उनका मस्तिष्क विकृत हो गया है। ये इस तरह से जो करते हैं वे लोग कॉमन साइकोलॉजी नहीं डिफरेंट टाइप की साइकोलॉजी है। तो शरद महाराज कहते हैं देखिए सभी के मन में यह मुमुक्षुत्व की आशा होती ही है। जिस तरह से काम कांचन के प्रति अपना मन धावित होता है तो वैसे ही ईश्वर प्राप्ति के लिए निर्वाण के लिए आत्म साक्षात्कार के लिए भी हमारा मुमुक्षत्व भीतर में रहता ही है। बस वही है कि जिस तरह से अग्नि के ऊपर में राख पड़ गई हो तो यह आप होम यदि देखा होगा मंदिर में तो आपने देखा होगा होम के लिए जो अग्नि प्रज्वलित होती है उसमें राख लग जाती है। थोड़ी देर के बाद में आपको सतत वह राख को दूर करना है। तो इस तरह से करेंगे तो अग्नि सतत प्रज्वलित होती रहेगी। तो यहां पे भी यह मुमुक्षुत्व रूपी अग्नि जो है उसके ऊपर में यह सांसारिक वासनाओं की राख पड़ गई है। एशि से यह छुप गया है। यह एशिष्ट या राख को जैसे ही दूर करेंगे तो वैसे ही यह जो मुमुक्षुत्व रूपी अग्नि है फिर से वह जागृत हो जाएगा। तो उनका साइकोलॉजी और अपना साइकोलॉजी बहुत ज्यादा डिफरेंस नहीं है। वही है कि उनके भीतर में यह मुमुक्षुत्व जो है ये जो साधन चतुष्टय वेदांत की भाषा में कहते हैं उनमें जागृत हुए हैं और अपने में अभी भी यह सुशुप्त अवस्था में पड़े हैं। तो इसलिए महाराज कहते हैं कि जो ऋषि मुनि है, जो साधक है, जो मुमुक्षु है, जो संत है, जो लोग आध्यात्मिक जीवन में प्रगति करने का प्रयास कर रहे हैं, उनको जब हम जनसाधारण में नहीं गिनेंगे, तभी यह सब प्रश्न होगा कि जनसाधारण को तो एक ही तरह की अनुभूति होती है। तो फिर यह ऋषि मुनि जो कहते हैं वह गलत कैसे हो सकता है? नतुबा पूर्व
एक अनंत, असीम सामष्टि-मन में जगतरूप कल्पना उदित हुई है
प्रश्न ए विषय उत्तर देवा हो याचे वरना तो फिर पहले वाले प्रश्न में ही इसका उत्तर दे दिया गया है कि ऋषि मुनियों ने जो साक्षात्कार किया है वह उनके जीवन में ट्रांसफॉर्मेशन जो आया है बोल के हम स्वीकार करना पड़ेगा कि जो उनका जो थरी है या फिलॉसोफी है वह सही है तब जे जिज्ञासा करेते छो शकले एक प्रकार भ्रम हो की रूपे ताहार उत्तरे शास्त्र बोलेन किंतु आप लोग जो यह प्रश्न कर रहे हैं कि सबको एक प्रकार का भ्रम किस तरह से हुआ? उसके उत्तर में शास्त्र कहते हैं एक असीम अनंत समष्टि मने जगत रूप कल्पनार उदय होया छे एक असीम अनंत समष्टि मन में जगत रूप कल्पना का उदय हुआ है तोमार आार एवं जन साधारण व्यष्टि मन ओई विराट मने अंश ओ अंगीभूतो हुआ आमादग के ओई एकई प्रकार कल्पना अनुभव होते छे अनुभव करते हो छे तुम्हारा मेरा और सब जन साधारण का व्यष्टि मन उस विराट मन का अंश और अंगीभूत होने की वजह से हमको वह एक ही प्रकार की कल्पना अनुभव हो रही है। ए जनमरा प्रत्यके पशु टाके पशु भिन्न अन्न किशु बोलिया इच्छा मत देखते बा कल्पना करते पारी ना इसीलिए हम सभी पशु को पशु के अलावा और कुछ बोल के अपनी इच्छा के अनुसार कल्पना नहीं कर सकते हैं। कोई जन नहीं आ यथार्थ ज्ञान लाभ कोरिया आमादे मध्य एक जन सर्व प्रकार भ्रमर हस्त हो ते मुक्ति लाभ कर ले ओ अपर शले जैमन भ्रम पिया आ से रूपई थाके इसीलिए यथार्थ ज्ञान लाभ करके हम सब में जो एक व्यक्ति सब तरह के भ्रम से मुक्त होकर के मुक्ति लाभ करता भी है। इसके बावजूद बाकी सब जिस तरह के भ्रम में पतित है, उसी तरह से रहते हैं। यह कोर कांसेप्ट ऑफ वेदांत। इसके बारे में चर्चा थोड़ी लंबी हो जाएगी। तो इस चर्चा को अभी हम अपने नेक्स्ट क्लास में कल करते हैं। आज यही ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु ओम