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Sri Ramakrishna Lila Prasanga ·

साधक भाव : अवतरणिका || श्रीरामकृष्ण लीलाप्रसंग : स्वामी सारदानन्द रचित || 21 Feb 2025

Prayer

ओम स्प यच धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपे अवतार वरिष्ठ राम कृष्णाय ते नमः श्री राम कृष्ण लीला प्रसंग स्वामी शारदानंद जी महाराज द्वारा लिखित खंड दूसरा साधक भाव उसकी अवतरण का उसके बारे में हम चर्चा कर रहे हैं हमने देखा कि शारदानंद जी महाराज सबसे पहले तो हमारे सामने एक प्रपोजिशन खड़ा करते हैं कि जो अवतार या तो फिर जो आचार्य गण है उनका साधक भाव या तो फिर उन्होंने जो स्ट्रगल करके जिस तरह से आशा निराशा भय विस्मय आनंद व्याकुलता के तरंग में पढ कभी उल्लास और कभी निराश होक उन्होंने साधना की और इस साधना के दौरान उनका जो गंतव्य लक्ष्य है उनका जो अल्टीमेट एम है ईश्वर प्राप्ति या आत्मा साक्षात्कार उसके ऊपर में स्थिर दृष्टि रखी आखिर में अपना लक्ष्य प्राप्त किया और फिर परिपूर्ण होकर के उन्होंने समाज में अपना नया मैसेज फैलाने की शुरुआत की तो वह साधक भाव या तो फिर उनकी की हुई साधना का कोई विषद रूप से डिटेल डिस्क्रिप्शन नहीं मिलता है और क्यों नहीं मिलता है इसके बारे में महाराज जी एक के बाद एक आर्गुमेंट कर रहे हैं कल हमने देखा कि बहुत सारे भक्त तो यहां तक मानते हैं कि अवतार महापुरुषों का यह जो निद्रा या तो फिर थकान या तो फिर शारीरिक व्याधि या तो फिर देह त्याग आहार साधन भजन जैसी मानसिक चेष्टा यह सब उनके लिए एक ढोंग है क्योंकि वह दिखाना चाहते हैं हमको कि वह भी हमारे जैसे मनुष्य है हम जैसे मनुष्य होंगे इस तरह से दिखेंगे बाहर से तभी तो हो सकता है कि हम उनके द्वारा प्रेरित होकर के साधन भजन करें तो वह अपना दिव्यत्वाची इन दिस ह्यूमन फॉर्म तो इस तरह से कुछ लोग सोचते थे आखिर में हमने यह भी देखा कि शारदानंद जी महाराज कहते हैं कि जब ठाकुर को कैंसर हो गया था उस समय कुछ भक्त खास करके गिरीश घोष या तो फिर रामचंद्र दत्त उनका एक ऐसा मानना था कि ठाकुर ने यह कैंसर का एक तरह का ढोंग किया है एक तरह का नाटक कर रहे हैं क्यों क्योंकि इसकी वजह से उनका कलकत्ता में आगमन होगा भक्तों के साथ में मुलाकात होगी भक्तों को वह स्नेह के प्रेम के एक बंधन में बांध पाएंगे और फिर अपना संघ की जो भित्ति स्थापन है उसका फ फाउंडेशन है वह कर पाएंगे तो यह संघ का फाउंडेशन डालने के लिए उन्होंने यह सब नाटक किया है इस तरह से किसी किसी का मानना था अभी शारदानंद जी महाराज और एक पॉइंट हमारे सामने रखते हैं कहते हैं कि यदि भक्त यह सोचता है कि उसके जो इष्ट है वह अपूर्ण थे साधन भजन करके पूर्ण हुए हैं यदि इस तरह से सोचेगा तो क्या उसकी भक्ति है उसमें क्या कोई कमी हो जाएगी भक्ति क्या वोह यह सोचे यह सोचना शुरू कर देगा कि अच्छा ठीक है चलो जिस तरह से न्यूटन आइंस्टाइन है उनकी जो विद्वत्ता है या तो फिर जो इतने जो कुछ-कुछ ग्रेट पॉलिटिकल लीडर्स है उनकी तरह से उनका एक जो एक एक्यूमेंट है लोगों के साथ में काम करने का या तो फिर सज्जन महापुरुष तो हमको जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में मिल जाते हैं मैं खुद याद रख करता हूं मेरे कुछ टीचर्स थे इस तरह से तो क्या मेरे जो टीचर्स थे या तो फिर यह जो बड़े लोग हैं उन्हीं की तरह यह मेरे इष्ट है इस तरह से जदी मैं सोचूंगा तो क्या मेरी भक्ति की हानि होगी तो इस बात के बारे में नया पॉइंट शरद महाराज कह रहे हैं इस तरह से सोच कर के भक्त की भक्ति को हानि होती है भक्त की अपने इष्ट के ऊपर में भक्ति कम हो जाती है यही कोथा जुक्ति जुक्तो न है यह बात युक्ति संगत नहीं है यह बात रेशनल नहीं है लॉजिकल नहीं है क्यों आगे लिखते हैं निज दुर्बलता जन्नई भक्तो रूप सिद्धांत उपनीत होन अपनी दुर्बलता की अपनी दुर्बलता की वजह ही भक्त इस तरह के सिद्धांत पर आता है कि यदि मैं सोचूंगा कि मेरे इष्ट को अपूर्णता से पूर्णता की ओर जैसे हम कहते हैं ना तमसो मा ज्योति गमय वह अंधेरे में थे उजाले में जाने के लिए उनको यह यात्रा करनी पड़ी साधना रूपी तो यह ठीक नहीं है यदि मैं ऐसा सोचूंगा मेरी भक्ति को हानि होगी तो यह मेरी खुद की दुर्बलता ही है मेरी मेंटल वीकनेस ही है विपरीत सिद्धांत कोरिले तहर भक्ति हानि होई बलियाई बोध होई तिनी नरो सुलभ चेष्टा और उद्देश दी अवतार पुरुष से आरोप करी ते चाहे ना इस तरह से अवतार पुरुष के ऊपर में नर सुलभ चेष्टा और उद्देश्य का आरोपण हम इसलिए नहीं करते हैं क्योंकि इससे भक्त की भक्ति को हानि होगी जो भी अवतार गण के यह है बायोग्राफर वो बायोग्राफर जो थे जिस समय उन्होंने अवतारों की लीला का वर्णन किया था उन्होंने यह सोचा होगा कि जद मैं उनकी अपूर्णता का वर्णन करूंगा या तो फिर साधना करके सिद्धि प्राप्ति का वर्णन करूंगा तो हमारे जो भक्त है उनकी श्रद्धा इनके ऊपर कम हो जाएगी हालांकि इस तरह से कोई बायोग्राफर क्यों सोचेगा पता नहीं क्योंकि देखिए कि बुद्धिज्म में तो भगवान बुद्ध की जो साधना की स्ट्रगल है वही जैसे कि सेंटर पीस है साधना करके उनको आखिर में मुक्ति मिली थी निर्वाण प्राप्त हुआ था उनको यह स्ट्रगल ही जैसे कि भगवान बुद्ध के जीवन का एक आदर्श है सर्वोच्च आदर्श के रूप में माना जाता है एक हाईलाइट है उनके जीवन का और उसी से प्रेरित होकर के बहुत सारे लोग भगवान बुद्ध के पास में आए हैं आश्चर्य की मने यह भी एक देखने की बात है कि भारत में से बुद्धिज्म चला गया भारत में बुद्धिज्म टिक नहीं पाया यदि हम ऐसा मान लेते ये पैराडॉक्स कैसा है देखिए कि यदि हम ऐसा मान ले कि भक्ति मूवमेंट थी उसके द्वारा यदि बुद्धिज्म को भारत में से देश निकाल किया जाता तो वह तो फिर भी हम समझ सकते हैं बुद्धिज्म संपूर्ण रूप से पुरुषार्थ के ऊपर में खड़ा है जबकि भक्ति मूवमेंट जो है संपूर्ण रूप से शरणागति के ऊपर में महाभा के ऊपर में खड़ी है तो अभी आप सोचेंगे कि यह दोनों तो बिल्कुल ही आपस विरोधी भाव है या तो चाहे यह भक्ति भाव टिकेगा शरणागति टिकेगी या तो फिर बचेगा यह अपना पुरुषार्थ दो में से एक बचेगा जदिया होता है तो किंतु देखिए कि बुद्धिज्म भारत में से हटाया गया या तो फिर बुद्धिज्म को भारत में पराजय मिली शंकराचार्य के द्वारा और शंकराचार्य का जो अद्वैत वेदांत है वह भी तो संपूर्ण रूप से त्याग के ऊपर में ही खड़ा है तो जो कि एक ही कैटेगरी की जो दो विभिन्न साधन पद्धति है उस इन दोनों में जैसे कि वाद विवाद हुआ और एक कैटेगरी ने दूसरी कैटेगरी को पराजित किया यह पैराडॉक्सिकल है किंतु यही तो भारतीय धर्म की या तो हिंदू धर्म की महानता है कि सभी तरह की स्कूल्स को यहां पे आमंत्रण है सभी तरह की जो यह साधन पद्धति है वह यहां पर टिक सकती है बशर्ते मैंने एक शर्त है कि वह साधन पद्धति अपनी-अपनी कैटेगरी में सर्वोच्च लेवल पर होनी चाहिए यह किस तरह से हो गया पता है कि जैसे कि क्रिकेट मैच में देखिए पहले तो ग्रुप बनाए जाते हैं ग्रुप ए ग्रुप बी जैसे वर्ल्ड कप होता है तो ए ग्रुप में जो तीन चार जो टीम होगी पहले तो वो वो उन लोगों का आपस में मैच होगा फिर उसमें से जो टीम का विजय होगा वह सेमीफाइनल में जाएगी अभी सेमीफाइनल दो-तीन तरह की होती है तो एक सेमीफाइनल में दो टीम है दूसरी सेमीफाइनल में दूसरी दो टीम है तीसरी सेमीफाइनल में दूसरी दो टीम है फिर जिस सेमीफाइनल में जिस टीम का विजय हुआ उस दोनों टीम का आखिर में फाइनल में मैच होगा तो यहां पे आपको किंतु फाइनल में जाने के लिए पहले तो सेमीफाइनल जीतना होगा यहां पे भी जैसे कि देखिए कि यह पुरुषार्थ वाली कैटेगरी जो थी पुरुष थ वाली जो सेमीफाइनल हुई उसमें अद्वैत वेदांत का विजय हुआ बुद्धिज्म का पराजय हुआ बुद्धिज्म को भारत में से जाना पड़ा अभी यहां पर सेमीफाइनल तक एक सेमीफाइनल में यह अद्वैत वेदांत की जीत हुई है दूसरी सेमीफाइनल में यह भक्ति स्कूल की जीत हुई है अब इन दोनों में फाइनल होगा तो कैसे होगा वह तो अपने हृदय में साधक के हृदय में यह फाइनल होने वाली है किंतु सेमीफाइनल का जहां तक प्रश्न है वह अपने-अपने कैटेगरी में उन्होंने विजय प्राप्त करके वह अपने फील्ड में सर्वोच्च लेवल पर आके टिके हैं यह एक मेरा पर्सनल एनालिसिस है तो यहां पर भी देखिए कि जो बायोग्राफर है उन्होंने यह बुद्धिज्म का जो सेंट्रल प्रीमाइज है एटलीस्ट भारत में उसको स्वीकार नहीं किया है बुद्धिज्म में यदि यह कहा जाता है कि भगवान बुद्ध यदि गौतम बुद्ध यदि संघर्ष करके स्ट्रगल करके निर्वाण प्राप्त कर सकते हैं तो आप लोग क्यों नहीं कर सकते इस विचारधारा का ऊपर ऊपर से लगता है कि भारत में पराजय हुआ है तो अभी यहां पर किंतु यही विचारधारा को रामकृष्ण संघ में भगवान श्री रामकृष्ण देव और स्वामी विवेकानंद इन दोनों ने इस विचारधारा को तो किंतु अपना लिया है क्योंकि देखिए कि अद्वैत वेदांत के साथ में इस विचारधारा बड़ी ही मतलब एक गहराई से यह मिक्स हुई है अद्वैत वेदांत का सेंट्रल विचार ही यही है कि त्याग के द्वारा त्यागे न के अमृत मानस ह त्याग के द्वारा मनुष्य अमृत प्राप्त होता है त्याग के माध्यम से ही अद्वैत वेदांत की सर्वोच्च सिद्धि निर्विकल्प समाधि में हम लोग स्थित हो पाते हैं तो यह सेंट्रल प्रीमा इसस है पुरुषार्थ या तो फिर त्याग वो अद्वैत वेदांश में से लिया गया है तो इसीलिए हालांकि यह प्रश्न फिर से एक खड़ा हो सकता है कि शंकराचार्य के जीवन में तो फिर यदि शंकराचार्य जिस तरह से उन्होंने अद्वैत वेदांत त्याग और पुरुषार्थ के माध्यम से उन्होंने अद्व यह जो वेदांतिका की स्थापना की अद्व दिक स्कूल की तो शंकराचार्य के जीवन की साधन पद्धति क्यों नहीं उनका साधक भाव जो है वो क्यों नहीं लिपिबद्ध किया गया वो भी एक आश्चर्य की बात है जैसे कल ही हमने देखा कि शरद महाराज कहते हैं कि शंकर दिग्विजय ग्रंथ देखेंगे तो ऐसा लगेगा कि उन्होंने जैसे हमको पता है कि शंकराचार्य का जीवन पहले 16 साल में उन्होंने सभी व्याख्या एं समाप्त कर दी थी और बाकी के 16 साल में उन्होंने इसी के ऊपर में प्रचार किया था अपने जितने भी ओपो ंट्स थे उनके साथ में वाद विवाद करके आर्गुमेंट करके उनको को हराया था अद्वैत वेदांत स्कूल का प्रचार किया था तो यदि आप यह पुरुषार्थ के ऊपर में इतना भार दे रहे हैं तो क्या शंकराचार्य के जीवन में वह स्ट्रगल नहीं आई होगी कि उनका मन किसी प्रलोभन में नहीं पड़ा होगा क्या उन्होंने मेहनत करके प्रलोभन से अपने मन को वापस नहीं खींचा होगा क्या उन्होंने यह साधना करने के लिए स्ट्रगल नहीं की होगी एक के बाद एक किस तरह की साधन पद्धतियां उन्होंने अपनाई थी यह सब डिस्क्रिप्शन फिर शंकराचार्य के जीवन में क्यों नहीं है यह एक बड़ी आश्चर्य की बात है किंतु जो भी है यहां पर हम लोगों ने बुद्धिज्म का जो सेंट्रल प्रीमाइज है कि हमारे इष्ट की साधन भजन पद्धतियां उन्होंने जिस तरह से स्ट्रगल की वह स्ट्रगल पढ़ कर के हमको और ज्यादा आनंद मिलना चाहिए वोह जो बुद्धिज्म का सूत्र है

इहासने शुष्यतु मे शरीरं त्वगस्थिमांसं प्रलयं च यातु ।

कि इहा सने शिष्य तुम शरी रम त्व गस्ती मासम प्रलय च याति तो मैं इस आसन पर सवार होऊंगा और जब तक लब्ध वाम बोधी बहु बहु जन्म दुर्लभाम बहुत बहुत जन्म से भी प्राप्त नहीं होता ऐसा जो दुर्लभ बध स्वरूप है निर्वाण है जब तक वह निर्वाण प्राप्त नहीं होगा तब तक मैं इस आसन से नहीं खड़ा होऊंगा भले ही चाहे मेरी हड्डियां मेरे मांस गल जाए मैं मर जाऊं इस आसन पर बैठ कर के तो राह नगर मठ में जब गुरु भाई तपस्या करते थे तब उन्होंने यह श्लोक अपने दीवाल पर लिख दिया था तो वही स्ट्रगल बुद्ध की स्ट्रगल जब हम देखेंगे तो हमको तो और भीतर से उत्साह मिलना चाहिए यदि वही कहानी है और ठाकुर कहते थे कि दो ऋषि मुनि एक पेड़ के नीचे में बैठ कर के तपस्या कर रहे हैं देखा कि नारद वैकुंठ में जा रहे हैं तो मैसेज पहुंचाया भगवान के पास में कि उनको पूछ के आइए कि हमको मुक्ति का मिलेगी जब नारद मुनि वापस आए कहा कि इस पेड़ के ऊपर में जितने पत्ते हैं उतने जन्म के बाद में मुक्ति मिलेगी तो एक वैसे बड़ा निराश हो गया किंतु दूसरा उठ खड़ा होकर के नाचने लगा कि कहा कि चलो एटलीस्ट इतने जन्म के बाद में मुक्ति तो मिलेगी यानी मुक्ति मिलेगी भले ही चाहे हमको हार्ड वर्क करना पड़े यदि हम सर के ऊपर में हाथ रख के बैठ जाएंगे कि अरे इतना जन्म और लगेगा मुक्ति क कब मिलेगी इसके बाद में मिलेगी तो तो फिर तो हम जैसे कि जो चेष्टा करनी है जो तपस्या करनी है तपस्या ही छोड़ देंगे तो यहां पे यह बुद्धिज्म है या तो फिर यह अद्वैत वेदांत है या तो फिर यह जो पुरुषार्थ मार्ग है भारत में है हमेशा से था हमेशा से रहेगा वही है कि इस पुरुषार्थ मार्ग को सिखाने वाले जो आचार्य गण है उनके खुद के जीवन में उन्होंने क्या पुरुषार्थ किया इसके बारे में बहुत ज्यादा डिटेल नहीं मिलती है और यदि इस इनके बायोग्राफर ने यह सोचा होगा कि अरे शंकराचार्य के जीवन में यदि मैं इस तरह से लिखूंगा कि शंकराचार्य भी स्ट्रगल किए थे कभी-कभी उन्होंने साधन भजन करने के लिए तो हो सकता है कि अद्वैत वेदांत का प्रचार ना हो तो उन्होंने यदि ऐसा सोचा होता तो ये तो बिल्कुल गलत सोचा है देखिए कि यह भक्ति मार्ग इवन अद्वैत वेदांत में किस तरह से प्रवेश कर गया है मैं विवेक चूड़ामणि पढ़ रहा था ट्रेनिंग सेंटर में हमको पढ़ाया जाता है तो विवेक चूड़ामणि ग्रंथ आप खोल कर के देखना शुरू करेंगे पढ़ना शुरू करेंगे देखेंगे कि सबसे पहले ही गुरु की स्तुति है और गुरु की स्तुति इस तरह से की गई है जैसे कि किसी देवता की स्तुति कर रहे हैं अपने गुरु को जैसे कि देवता की कैटेगरी में बिठा दिया है गुरु को संपूर्ण रूप से आपको आज्ञा पालन करना है वह जो कहते हैं सब कुछ आपको स्वीकार कर लेना है जैसे वह ठाकुर कहते हैं ना कि जदी वो अर गुरु सड़ी बाड़ी जाए तब वो अर गुरु नित्यानंद राय अर्थात कि मेरे गुरु यदि शराब की दुकान के पर में भी जाते हैं शराब पीने के लिए फिर भी मेरे गुरु है नित्यानंद राय तो फिर यदि अपने गुरु को यदि आप इष्ट की भगवान की कैटेगरी में देवता की कैटेगरी में रखते हैं तो बेटर है मैं देवता को ही देवता की कैटेगरी पर रखूं वरना तो यह करता धजा संप्रदाय की तरह कि यह जो एक मनुष्य को गुरु बना कर के मनुष्य की पूजा करना आप इस तरह से करेंगे तो नेचुरली है कि मनुष्य के सर के ऊपर में घमंड सवार हो ही जाएगा फिर वह किसी ना किसी तरह से उल्टा पुल्टा कुछ ना कुछ काम करना शुरू कर देगा तो किसी मनुष्य को हम झुठ मुठ का क्यों गुरु बनाए देवता की पदवी पर क्यों स्थापित करें क्यों नहीं देवता की ही पूजा करें यह डॉक्टर सरकार जब वो काशीपुर में जाते थे और ठाकुर की यह लोग इतनी श्रद्धा करते थे तब यह डॉक्टर सरकार खुद कहते थे कि अरे आप लोग यह सीधा सरल आदमी है झूठ मुठ का आप लोगों ने इसका सर बिगाड़ दिया है क्यों तो ठाकुर खुद कहते हैं कि गुरु करता बाबा यह तीन जदी कोई मुझे कहते हैं तो मुझे ऐसा लगता है मेरे शरीर में कोई कांटे चुभ हो रहा हो तो ठाकुर खुद यदि कहते हैं कि मुझे गुरु की या तो फिर बाबा की या तो इष्ट की कैटेगरी में मत रखो तो आप लोग इनको इष्ट मान कर के क्यों पूजते हैं उस समय यह गिरीश कहता है कि जिनको हमने इष्ट मान लिया है और गु की गु बोध होए अर्थात कि उसकी विष्ठा है क्या जो उसकी विष्ठा जो इष्ट की जो विष्ठा है क्या हमको विष्ठा के रूप में लगेगी नहीं लगेगी तो खैर वे तो गिरीश का मानना था किंतु हालांकि देखिए कि डॉक्टर सरकार वगैरह जितने भी लोग थे ठाकुर के जीवन का यह ट्रांजीशन नहीं समझ पाए थे हमने देखा था कि आनंद पर्व में ठाकुर अपने स्वरूप को छुपाते तो है कुछ-कुछ लोगों को कुछ-कुछ हिंट देते हैं किंतु जनरली अपना स्वरूप छुपा के रखते हैं तो वही ठाकुर ने आत्मप्रकाश पर्व में अर्थात कि जब से कैंसर प्रारंभ हुआ तब से लेकर के उनकी महासमाधि तक का जो एक साल का डेढ़ साल का सवा साल का जो पीरियड था 1885 की गर्मी की ऋतु में ग्रीष्म ऋतु से प्रारंभ हुआ उनका कैंसर 18864 हुई तो नियर 13 14 मंथ का यह जो पीरियड है इस पीरियड में ठाकुर ने खुलेआम यह डिक्लेयर करना शुरू कर दिया था कि उनके भीतर में कौन है हालांकि खुलेआम का मतलब यही है कि उनके जो घनिष्ठ डिसाइल थे उन्हीं के सामने और वह जो काली पूजा की प्रसिद्ध घटना है कि ठाकुर ने सब पूजा का उपकरण तैयार करके रखा वो फिर वहां पर बैठे हैं कुछ बोल नहीं रहे हैं भक्त लोग सोच रहे हैं कि पूजा का उपकरण तो तो है किंतु मां काली की प्रतिमा नहीं है नाही तो मां काली का पूजा कौन करेगा वह पुजारी निश्चित नहीं है किंतु सब लोग चुपचाप बैठे हैं सोचा कि जब ठाकुर की इच्छा होगी तब बोलेंगे कि मूर्ति का जुगाड़ कहां से करना है या तो कौन पूजा करेगा किंतु एकाएक गिरीश के मन में यह बात उठी कि नहीं ठाकुर ही तो माहाकाली है तो जैसे ही उसने स्तव स्तुति करते-करते यह जो पुष्प ठाकुर के चरणों में अर्पित किए वैसे ही ठाकुर समाधि में च ले गए और फिर सभी लोग एकदम जैसे कि भाव की एक तरंग पूरे कमरे में फैल गई सभी लोग स्तुति करते-करते ठाकुर को पुष्पांजलि अर्पित कर रहे हैं उनकी पूजा कर रहे हैं तो यह देखिए य हिंदू धर्म जो है कितना कॉम्प्लिकेटेड है बुद्धिज्म को समझना आसान है क्योंकि पुरुषार्थ जो भगवान बुद्ध के जीवन से हमको दिखाई देता है उनकी खुद की बायोग्राफी में जो दिखाई देता है वोह पूरा उनके हिस्ट्री में पूरा उनके डिसाइल्स में उनकी फिलोसोफी में उनकी साधन पद्धति में वही पुरुषार्थ की वर्णना है हां आप कह सकते हैं कि बुद्धिज्म के जो डिजनरेट फॉर्म्स है विकृत बुद्धिज्म है उसमें फिर यह तंत्र भी घुस गया है उसमें यह तारा देवी वगैरह बहुत सारी देवियां भी घुस गई है जिस तरह से य तिबेट में या तो फिर कुछ-कुछ साउथ ईस्ट एशियन कंट्री में यह बुद्धिज्म का जो एक तरह का विकृत स्वरूप दिखता है सब जगह पर नहीं सब थल पे नहीं किंतु कुछ-कुछ जगह पे कुछ-कुछ जगह पार्टिकुलर लोकेशन पे तो वो आप कह सकते हैं कि वो तो एक डिजनरेट स्वरूप है किंतु बुद्धिज्म जिस तरह से ओरिजनली कांसेप्शन आइज किया गया था वो पूरा पुरुषार्थ पे ही खड़ा है ऑन द अदर हैंड क्रिश्चियनिटी जिस तरह से कांसेप्चुअल इज की गई थी कि जीसस इज द सन ऑफ द गॉड जीसस की शरणागति ही आपको फिर यह मुक्ति का मार्ग या तो पाथ टुवर्ड्स साल्वेशन पाथ टू हेवनस इट विल ओपन जस्ट यो सरेंडर टू जीसस तो यह जीसस के जीवन से लेकर के जीसस क्रिश्चियनिटी की थियोलॉजी क्रिश्चियनिटी की प्रैक्टिस क्रिश्चियनिटी का प्रचार प्रसार पूरा हिस्ट्री वही सरेंडर के ऊपर में फेथ होप एंड चैरिटी एंड दिस शरणागति उसी के ऊपर में आधारित है तो यह जो पार्टिकुलर स्ट्रीम है जो कि भक्ति पे बनी हुई है या तो पुरुषार्थ पे बनी हुई है वो स्ट्रीम्स देम सेल्व आर वेरी क्लियर किंतु हिंदुइज्म में देखिए हिंदू धर्म में देखिए कहीं भक्ति की बातें चल रही है तो उसमें महाभा आ जाता है कहते हैं कि त्याग करने के बाद में आपके मन में भाव प्रकट होता है इस भाव से आपको भगवान की आराधना करनी है या तो वह शांत भाव हो दास भाव हो मातृ भाव हो संतान भाव हो सख्य भाव हो ना कि मधुर भाव हो कि फिर यह सभी भावों का समन्वय महाभा हो जितने भी भाव है वह सब आपका एक ही साथ में त्याग के ऊपर में ही खड़े हैं तो आप कहेंगे कि यदि त्याग ही करना था तो फिर मुझे शरणागति करने की क्या जरूरत है और यहां पर शंकराचार्य का जीवन जैसे कि देखा विवेक चूड़ामण जैसे कि देखा बना है पूरा त्याग के ऊपर में पुरुषार्थ के ऊपर में साधना के ऊपर में स्व चेष्टा के ऊपर में किंतु आखिर में देखिए कि वहां पर गुरु की इस तरह से स्तुति करते हैं जैसे कि वो नारायण की स्तुति कर रहे हैं भगवान गणेश की स्तुति कर रहे हैं तो ये जो इंटर मिंगलिंग जो है हिंदू धर्म में जैसे कि ये लोग जैसे कि ये लोग क्या है ना कि धरा छो यार बायर है बांगला दे जेमन बोले कि हम अपनी बुद्धि से अपनी वाणी से इनको पकड़ नहीं पाएंगे कभी भी यदि यह पुरुषार्थ के रास्ते में जा रहे हैं तो कहां ना कहां से वह भक्ति ले ही आएंगे और भक्ति के रास्ते प जा रहे हैं तो कहां से कहां वो पुरुषार्थ ला ही देंगे तो ये जो इंटरमलिल्योलर मशीन नहीं है कि इस तरह का प्रोग्राम किया तो इसी तरह के प्रोग्राम प यह मशीन चलेगा इस कंप्यूटर में आपने यदि विंडोज ऑपरेटिंग सिस्टम इंस्टॉल की है तो उस कंप्यूटर में विज ही चलेगा दूसरे कंप्यूटर में apple's चलता है कभी यह मेट मे ओ चलता है कब क्या होगा कुछ ठिकाना नहीं है तो यह जो ह्यूमन नेचर की रिफ्लेक्टेड इन अवर फिलोसोफी रिलीजियस फिलोसोफी एंड रिलीजियस पाथ ऑफ साधना धार्मिक दर्शन और धार्मिक साधना में मनुष्य जीवन की मनुष्य के मन की यह जो विडंबना एं हैं विचित्र काएं हैं यह अद्भुत अद्भुत हमारे मन की यह जो सब तरंगे हैं जैसे कि हमारी फिलोसोफी में और साधन पद्धति में यही तरंगे जैसे कि हमको दृश्य मान होती है तो यहां पर इसलिए देखिए कि शंकराचार्य भले ही चाहे पुरुषार्थ के हिमायती हो या तो फिर अद्वैत वेदांत भले ही चाहे पुरुषार्थ के ऊपर में बना हो शंकराचार्य के खुद के जीवन में क्या पुरुषार्थ किया उसका विवरण नहीं मिलता है तो अभी जैसे कि यह महाराज जी यहां पे एक के बाद एक आर्गुमेंट दे रहे हैं क्या उनके बायोग्राफर ने ऐसे अभी ऐसा नहीं है कि उन्होंने पुरुषार्थ नहीं किया है वही है कि उनके बायोग्राफर की कुछ-कुछ चॉइस थी कि ना हम इसको प्रोजेक्ट करेंगे इसको नहीं करेंगे इसको प्रॉमिनेंस देंगे इसको दबा देंगे यह सब बायोग्राफर की चॉइस थी उनके डिसाइल्स की चॉइस थी उसकी वजह से यह सब हुआ है तो क्या उनके डिसाइल ने या तो उनके बायोग्राफर ने यह सोच लिया कि उनके जो फॉलोअर्स है वो फॉलोअर्स जद यह देखेंगे कि शंकराचार्य मेहनत कर रहे थे पुरुषार्थ कर रहे थे बोलकर के अद्वैत वेदांत प उनकी जो आस्था कम हो जाएगी या तो फिर जैसे कि चैतन्य महाप्रभु है उनके जीवन में यदि हम साधना का बहुत डिटेल वर्णन यदि पढ़ ले तो क्या हो सकता है कि जो भक्त भक्त है जो चैतन्य महाप्रभु के वह उनसे दूर हो जाए ऐसा हो सकता है क्या बोलकर के साधना का वर्णन नहीं किया तो यहां पर महाराज कहते हैं कि यह बात जो है वह कोई ठीक नहीं लग रही है युक्ति युक्त नहीं है रेशनल नहीं है अत एव तहा दिगर विरुद्ध आमा देर बली बार किछुई नाई इसलिए उनके विरुद्ध में हमको बोलने के लिए कुछ नहीं है अत एव तबे एक कथा ठीक ज भक्ति अपर तो अवस्था तेही भक्तो रूप दुर्बलता परिलक्षित तो होए यदि भक्त का मन वीक है भक्त की जो चेष्टा है या तो उसका कमिटमेंट है कमिटमेंट जद अभी जैसे देखिए कि कमिटमेंट के बारे में यदि हम किसी एक आश्रम में किसी एक मंदिर में जाते हैं नया-नया जाना शुरू हुआ है अभी तो हमको उनके बारे में ज्यादा कुछ पता नहीं है एकाएक हमने कुछ विपरीत हमारी नजर के सामने आ गया तो हम वैसे ही हमारा उनके साथ में कोई कमिटमेंट नहीं है कोई रिलेशन नहीं है कोई ऐसा नाता नहीं है और पहले से ही यह सब कुछ विपरीत दृष्टि विपरीत चीजें हमारे सामने आई तो फिर क्या हम लोग वो छोड़ ही देंगे अरे जाओ यह सब क्या यहां पे जाना यदि मुझे अच्छा कोई आश्रम ही चाहिए साधु महाराज ही चाहिए तो मैं दूसरी जगह जाऊंगा ऐसा जो नॉन कमिटेड लोग होते हैं वे लोग मूवमेंट को आसानी से छोड़ देते हैं मेरा खुद का अनुभव मैंने एक बार बताया था कि मैं जो पहले आश्रम में जो गया था वह लिमडी का आश्रम था उस समय 2001 में अर्थक्वेक हुआ था तो अर्थक्वेक होने के बाद में रिलीफ चल रहा था मैंने सोचा मैं भी रिलीफ करने के लिए जाऊं तो हमारे जो एक मैं किसी को पहचानता था उन्होंने कहा जाओ लीमड़ी में लीमड़ी आश्रम में मैं गया तो वहां पे देखा अभी क्या है कि मैंने जैन साधुओं को हमेशा से देखा था वह भी दिगंबर जैन साधु ना ही कपड़े पहनते हैं ना ही कोई गाड़ी बाड़ी में बैठेंगे खाना पीना बहुत ही सीधा सरल तो इतनी उनको कठोरता करते हुए मैंने जैन साधु को देखा था और यहां पर जैसे ही मैंने आश्रम में प्रवेश किया देखा कि बड़ी वो जो वो जो टाटा की एक बड़ी गाड़ी है इस तरह से कोई इंटेलेक्चुअल लेखाजोखा करके कोई नहीं अपने इस तरह से कमिटमेंट करता है कि अरे यह लोग बड़ा अच्छा बड़ी अच्छी गाड़ी में घूमते हैं तो यह लोग अच्छे साधु नहीं है मैं यहां पर नहीं आऊंगा इस तरह से कोई नहीं सोचता है ये यदि कमिटमेंट होना है ना तो अपने हृदय में कुछ ना कुछ प्रश्न होने चाहिए कुछ ना कुछ संदेह संशय या तो समस्या होनी चाहिए जिसका कि समाधान वहां पर जाकर के मिलता है और जैसे ही समाधान मिला तो उसके बाद में यह छोटी मोटी जितने भी इरिटेंट्स है जितना भी हमको यह लगता है कि अरे ये लोग ऐसा कर रहे हैं वो लोग ऐसा कर रहे हैं वो सब चला जाएगा डज नॉट मैटर इस जगत में कुछ भी परफेक्ट नहीं है परफेक्शन की आशा माया के जगत में रखेंगे तो हमको कहीं पे शांति नहीं मिलेगी कहीं पे हमको यह सेटिस्फेक्शन नहीं मिलेगा एक जगह से दूसरी जगह दूसरी जगह से तीसरी जगह जाते जाएंगे जैसे ठाकुर ने कहा कि यहां पे पानी पाने के लिए यहां पे कुआं खोदने की शुरुआत की अभी कुआं खोदने की शुरुआत की थोड़ा सा खोदा पानी नहीं मिला तो दूसरी जगह जाके कुआ खोदा वहां पे नहीं मिला तो तीसरी जगह चले गए तो वो फिर हम पूरा जीवन कुआ ही खोदते रहेंगे पानी कभी मिलेगा ही नहीं तो वो ऐसी अवस्था किंतु उसी लोगों की होती है जिनका कोई कोई जननली भीतर में से मुमुक्षु नहीं होता है कोई जेन्युइन प्रश्न नहीं होते हैं या तो कोई जेन्युइन समस्या नहीं होती है उन लोगों के लिए जैसे स्वामी जी अमेरिका गए थे तो स्वामी जी ने कहा कि जिस तरह से यह वहां पे फैशन है हाई सोसाइटी में कि उनके घर में एक जापानीज वाज होना चाहिए वो एक कल्चर का लक्षण है मने से साइन ऑफ प्रोस्पेरिटी तो जिस तरह से एक जापानीज वाज है वैसे ही हम लोग थोड़ा धर्म कर लेते हैं क्योंकि धर्म इज आल्सो ए फैशन चर्च में जाना संडे को मास अटेंड करना इट्स सॉर्ट ऑफ अ फैशन अच्छे-अच्छे कपड़े पेन करके फिर वहां प जाकर के एक सोशल मीटिंग करना सोशलाइजेशन करना अपना बिजनेस बढ़ाना वगैरह वगैरह जैसे कि राजा महाराज के पिताजी उनको कोई कोर्ट मुकदमा में फंस गए थे कोर्ट केस में तो देखा कि ठाकुर के पास में यह जो अधर से सेन वगैरह जो डेप्युटी मैजिस्ट्रेट वगैरह आते हैं तो वहां पर जाकर के उन लोगों की सलाह ली जाए तो ऐसा कोई सांसारिक एक पॉइंट ऑफ व्यू लेके आएंगे सोशलाइजेशन करने आएंगे एक फैशन के रूप में आएंगे तो उन लोगों को तो वैसे ही कहीं पे सेटिस्फैक्ट्रिली इस तरह से कमिटेड होकर के आने वाले हैं उन लोगों की संख्या कम ही होने वाली है किंतु जब हम लोभ में पड़ कर के कहेंगे कि नहीं मुझे समाज के जितने भी लोग हैं सबको यहां पे आना है सबको यहां पे ले आना है तब मैं क्या करूंगा कि हमारी जो हिस्ट्री है उसको डॉक्टर करना शुरू कर दूंगा उसके ऊपर मैं सर्जरी करना शुरू कर दूंगा मैं यहां पे देखता हूं कि जेनुइन डिवोटा तो एक ही है किंतु मंदिर भरने के लिए 100 लोग चाहिए तो बाकी के जो 99 है उनको क्या अच्छा लगता है उसके अनुसार मैं अपने जो किताबें हैं उसके अनुसार में अपने इष्ट है उनको मैं प्रेजेंट करना शुरू कर दूंगा ये लोभ में पढ़ कर के कि ज्यादा से ज्यादा लोग आए भले ही चाहे उनका कोई डीपर कमिटमेंट ना हो भले ही चाहे उनका कोई इस तरह से कोई मुमुक्षु ना हो भले मुझे जगह बनाने जगह भरने के लिए डोनेशन प्राप्त करने के लिए इन्फ्लुएंस बढ़ाने के लिए भीड़ इकट्ठा करनी है और भीड़ इकट्ठा करने के लिए यदि मेरा इष्ट है या तो फिर मेरी ये साधन पद्धति है है या तो मेरे शास्त्र है उनको भी यदि इधर-उधर करना पड़े तो डज नॉट मैटर तो ऐसा करने वाले लोग मने दोनों तरह से य जब यहां पे महाराज कहते हैं कि जो दुर्बल हृदय वाले भक्त होते हैं वे लोग इस तरह से अनकमिटेड जो होते हैं जो एक फैशन के लिए आते हैं सोशलाइजेशन करने के लिए आते हैं वे लोग यदि इष्ट की अपूर्णता या तो इष्ट की साधन पद्ध साधना देख कर के भाग जाएंगे तो साथ-साथ में ही देखिए कि ऐसा भी हो सकता है कि जिन लोगों ने यह अवतार पुरुषों का जीवन लिपिबद्ध किया हो उनकी दुर्बलता उनकी एक तरह से वीकनेस है कि ज्यादा से ज्यादा लोगों को बुलाओ डज नॉट मैटर कि वो जेनुइन डिवोटा है जेनुइन साधक है जेनुइन मुमुक्षु तोव है जिसमें जेनुइन मुमुक्षु है जद नहीं भी है तो भी मंदिर भरने के लिए जगह भरने के लिए डोनेशन इकट्ठा करने के लिए इन्फ्लुएंस बढ़ाने के लिए ऐसे लोगों को कलेक्ट करो तो इस तरह के बायोग्राफर या तो फिर इस तरह के वो जो ये होते हैं मैनेजर होते हैं इस तरह की मूवमेंट के वे लोग इस तरह से शास्त्र को डॉक्टर करना शास्त्र के ऊपर में सर्जरी करना शुरू कर देंगे यानी यह दोनों तरह से है भक्त की भी दुर्बलता है और जो भक्तो को सिखाते हैं उनकी भी दुर्बलता है भक्ति प्रथमा बस्ता थई भक्तो भगवान के ऐश्वर्य बिरोही तो कोरिया चिंता कोरीते पारे ना भक्ति की प्रथम अवस्था में ही भक्त भगवान को ऐश्वर्य से अलग करके च चिंता नहीं कर सकता है भक्त सब समय यही सोचेगा कि मैं यदि इस इष्ट के पास में आता हूं तो मुझे इस इष्ट का एक चतुर्भुज स्वरूप देखना है अष्टभुज स्वरूप देखना है मैं चाहता हूं कि जब भी मेरी बीमारी हो जब भी मुझे यह समस्या हो तो फटाक करके आशीर्वाद दे करर के उसको दूर कर दे भक्त यह नहीं देखना चाहता कि दो हाथ वाले मेरे इष्ट है वो यहां पर खाट के ऊपर में बैठे हैं और यदि मैं अपनी समस्या का जाकर के वर्णन करूंगा तो व मुझे कह देंगे कि अच्छा एक काम करो सुबह शाम बैठ कर के साधन भजन करो यह मंत्र तुम्हारी जीप पर लिख देता हूं इस मंत्र का पाठ करना मां काली का प्रसाद ग्रहण करो माहाकाली को जाकर प्रणाम करो इस तरह से यदि कोई इष्ट कहेगा तो वो इष्ट है किस काम के तो वो शॉर्टकट प्राप्त करने के लिए भक्त हमेशा भगवान को ऐश्वर्य से महिमा मंडित देखना चाहता है ऐश्वर्य से भरा हुआ देखना चाहता है इसीलिए भक्ति की प्रथम अवस्था में भक्त चाहता है कि उसके इष्ट सब समय एक दिव्य शक्ति से भरपूर हो और इसका जो रिवर्स स्वरूप है जो कि हमने डिस्कस किया कि यह जो इस तरह के अवतार या तो इस तरह के इष्ट उनके जो प्रथम डिसाइल होते हैं उनके जो प्रिंसिपल डिसाइल होते हैं उनकी भी एक वीकनेस होती है कि इस तरह से अनकमिटेड लोगों को फैशन से आए हुए लोगों को कलेक्ट करने के लिए अपने इष्ट की इस तरह की बातों को फैलाए मने दुर्बलता दोनों तरह से है इस तरह के अनकमिटेड भक्तों की भी है भक्ति की प्रथम अवस्था में आए हुए भक्तों की भी है और यह जो अवतार या तो इष्ट या तो गुरु के जो प्राइमरी प्रिंसिपल डिसाइल है उनकी भी है उनके बायोग्राफर की भी है जैसे कि देखिए रामचंद्र दत्त रामचंद्र दत्त सब जगह पर जाकर के प्रचार करते थे कि नहीं जब श्री रामकृष्ण देव के पास में आ गए हैं उनका आशीर्वाद ग्रहण कर लिया है या तो फिर उनको इष्ट के रूप में स्वीकार कर लिया है तो फिर हमको साधन भजन करने की क्या जरूरत है चलो नगर कीर्तन करते हैं उनका नाम करते-करते यहां पर किंतु स्वामी जी है स्वामी जी कहते हैं कि नहीं भले ही चाहे हमको आशीर्वाद मिला हो भले ही चाहे हमको उनका स्पर्श प्राप्त हुआ हो यह पहली जनवरी को कल्पतरु दीन को क्या ठाकुर ने स्पर्श किया ये नरेण है राखल है राखल को अपनी को अपनी गोद में बिठाते थे ठाकुर जैसे कि मां अपने बच्चे को दूध पिला रही हो स्तनपान करा रही हो इस तरह से ठाकुर अपने राखल को अपनी गोद में बिठाते थे मां यशोदा और बाल गोपाल वाला इन दोनों के बीच में भाव था तो स्पर्श करके आशीर्वाद देना तो बहुत दूर की बात है इतना घनिष्ठ संबंध ठाकुर का यह त्यागी संतानों के साथ में था किंतु फिर भी ठाकुर ने भी उनको साधन भजन करने को कहा उन्होंने खुद ने साधन भजन किया और फिर उनके साथ में रामकृष्ण संघ में जितने भी लोग आते हैं भक्त हो न कि सन्यासी सबको साधन भजन करने के बारे में कहा जाता है आज यदि आप हमारे रिवी प्रेसिडेंट महाराज के पास में से दीक्षा लेंगे तो महाराज ऐसा नहीं कहेंगे कि हां ठाकुर का दर्शन कर लिया ठाकुर के आशीर्वाद मिल गए उसी से सब हो गया कहेंगे कि प्रतिदिन नियमित रूप से 108 हो सके तो 1008 जप करना ही होगा कथामृत पढ़ना ही होगा इनफैक्ट दीक्षा लेने से पहले ये कंडीशन है कि आपको इतनी इतनी किताबें पढ़नी होगी आपका इंटरव्यू लिया जाएगा सही में देखा जाएगा कि आपने किताब पढ़ी है कि नहीं है तो देखिए कि ये स्वामी जी दोनों तरह से कि प्रथम अवस्था वाले जो भक्त है क्यूरियोसिटी से आए हुए भक्त है अनकमिटेड भक्त है वो जिस तरह से भगवान में ऐश्वर्य देखना चाहते हैं तो साथ-साथ में ही यह भगवान के जो कुछ-कुछ प्रिंसिपल डिसाइल होते हैं वे लोग भी भक्तों को भीड़ इकट्ठा करने के लिए उनके मन को जो भाता है वह देना चाहते हैं भक्ति परिपक्व होयले ईश्वर प्रति अनुराग काले गभीर भाव धारण करी ले ओई रूप ऐश्वर्य चिंता भक्ति पथर अंतराय बोलिया बोध होईया थाके यदि भक्ति हमारी परिपक्व होती है प्रथम अवस्था में तो हमको ऐश्वर्य दिखता चाहिए भगवान के प्रति एक दिव्यता चाहिए भगवान के भीतर में किंतु जैसे ही हमारी भक्ति परिपक्व होती है साथ-साथ में ही यह दिव्यता या तो फिर यह डिवाइन पावर्स या तो फिर ये ऐश्वर्य यह ऐश्वर्य हमको भक्ति के पथ में अंतराय बोध होता है हमको ऐसा लगता है कि अरे भगवान के पास में इतनी शक्ति है यह दिव्य शक्ति एक हाथ में शंकर चक्र गदा पद्म यह सब जो लेकर के भगवान विष्णु खड़े हैं चार हाथ में या तो फिर यह मां दुर्गा के ये जो अष्ट हाथ है आठ हाथ है सभी एक हाथ में त्रिशूल ना कि एक हाथ में खड़ग यह सब लेकर के इस तरह का इष्ट हमको नहीं देखना है हमको तो वही एक कुटिया में मां शारदा देवी बैठी है अपने संतान के लिए एक कटोरी में दूध रख कर के और वह अपेक्षा कर रही है ये अरूपानंद जी या कोई भी मां के जो सेवक थे वह किसी कार्य के लिए दूसरे गांव या कहीं पर जाते थे तो आते-आते देरी हो जाता था तो उनके लिए खाना लेकर के दूध की कटोरी लेकर के मां अपनी कुटिया में बैठ कर के उनके लिए राह देखेगी और साथ में एक लाठी जैसा एक लकड़ी जैसा रखेगी जिससे कि बिल्ली यदि दूध पीने को आए तो वो लाठी पटक करके बिल्ली को भगा दे तो यह मां वो जो इस तरह का जो वर्णन है कि वहां पर छोटा सा दिया टम टम कर रहा है जयराम बाटी में मां की कुटिया में पास में ही मां बैठी है दूध की बाटी है अपने संतान के लिए और मां का मन कहां वह ब्रह्म राज्य में विचरण कर रहा है किंतु नजर है वह दूध की बाटी के ऊपर में कि बिल्ली आ करके उसमें मुंह ना मार दे तो यह मां हमको चाहिए किंतु यह मां हमको कब अच्छी लगेगी जबकि हमारी बुद्धि परिपक्व होगी जब हमारी भक्ति वह गहन होगी यदि भक्ति गहन नहीं हुई है बुद्धि परिपक्व नहीं हुई है तो वही मां दुर्गा जिसकी हम पूजा करते हैं दुर्गा पूजा के दौरान आठ हाथ है जया विजया सखी है गणेश कार्तिक बैठे हुए हैं इतने हजारों भक्त आकर के उनकी आराधना स्तुति कर रहे हैं इस तरह की मां दुर्गा हमको चाहिए यह जो स्वामी जी ने अमेरिका से पत्र लिखा था बाबूराम महाराज की मां मातंगिनी देवी आठुर में दुर्गा पूजा कर रही है तो सभी साधुओं को आमंत्रण दिया है तो स्वामी जी ने पत्र में लिखा बूढ़ो वय से बाबू रामेर मायर बुद्धिर हानी होए छ ने बूढ़ी अवस्था में ने वृद्ध अवस्था में बाबूराम की मां की बुद्धि को हानि हुई है बुद्धि भ्रष्ट हो गई है जंद दुर्गा छेड़े मा दुर्गा पूजा करछ जीवंत दुर्गा मां शारदा देवी को छोड़कर के माटी की प्रतिमा में दुर्गा पूजा कर र है क्यों कर रही है क्योंकि उनको देखना है आठ अष्ट भुजा वाली मां दुर्गा नहीं कि द्वि भुजा वाली हमारी मां शारदा या तो मां दुर्गा तो यह जो भक्ति का ऐश्वर्य है भगवान का ऐश्वर्य वह भक्त को शुरू शुरू में तो अच्छा लगता है किंतु जैसे-जैसे हम लोग पढ़ना शुरू करेंगे इस जगत में गहराई से प्रवेश करना शुरू करेंगे आज यदि मुझे कहा जाए कि मां शारदा के अष्ट भुजाएं है अष्ट बाहु है एक सिंहासन पर बैठी हुई है वह जो जया विजया की तरह गोलाप मां योगेन मां सब उनकी आराधना कर रहे हैं तो मैं कहूंगा मुझे इस तरह की मां दुर्गा मा शारदा को नहीं देखना मुझे तो वही मां शारदा को देखना है जो कि जयराम बाटी में रहती थी एक कुटिया में रहती थी मैं जब जाऊंगा तो व अधीर हो जाती थी कि मेरे बच्चे को मुझे खिलाना है और गांव में खाने को कुछ नहीं है यह सुबह को कोलकाता से जो लड़के जाते सुबह को चाह पीने की हैबिट है तो अभी मां शारदा क्या करेगी बेचारी वहां पर चाय नहीं वहां पर दूध नहीं मिलता तो चाय कैसे बनाएंगी सुबह-सुबह तो वह एक पात्र लेकर के एक लेकर के पात्र गांव-गांव में घर-घर भिक्षा करती घूमेगी कहेगी कि कोलकात्ता से मेरे बच्चे आए हैं सुबह को चाय पीनी है थोड़ा सा दूध दे दो तो कहीं से इतना दूध मिला कहीं से इतना मिला भिक्षा करके दूध लेकर आएगी सुबह को अर्ली मॉर्निंग उठक के इनके लिए चाय बनाएगी मुझे वो मां शारदा चाहिए नहीं कि वो वो दक्षिण श्वर काली मंदिर में बैठी हुई वो जो अपनी वो मां काली जिसकी आराधना ठाकुर किया करते थे और वह ठाकुर को भी देखिए आराधना जैसे मां काली की करते हैं किंतु उनके मन में जो मां काली के प्रति वह संतान भाव जो है वही संतान भाव उनके लिए सब कुछ है उनको यह नहीं चाहिए कि महाकाली उनके बाकी कष्ट दूर कर दे उनको महाकाली का दर्शन चाहिए आशीर्वाद के रूप में क्या चाहिए सिर्फ दर्शन चाहिए सिर्फ एक भालोबासा एक प्रेम का रिलेशन चाहिए नहीं कि ऐश्वर्य चाहिए नहीं कि किए जिस तरह से मथुर बाबू के पास में जमीन जायदाद गहना वगैरह है वह सब चाहिए वह सब कुछ नहीं चाहिए तो ईश्वर को हम एक हमारे प्रियतम के रूप में देखना चाहे ईश्वर के पास में से हम वही प्राप्त करें जो कि हमारे मन को सेटिस्फेक्शन देता है यह सब कब होता है जब हमारी बुद्धि परिपक्व होती है हम साधना में गहराई से प्रवेश करते हैं तो यहां पर महाराज जी ही लिखते हैं कि भक्ति परिपक्व होती है उस समय ईश्वर के प्रति अनुराग एक गंभीर भाव धारण करता है और उस समय यह ऐश्वर्य चिंता हमको ऐसा लगता ऐश्वर्य चिंता यानी कि डिवाइन पावर्स ये जो सुपरमैन वगैरह होते हैं उ सुपर पावर होता है तो भगवान के पास में ईश्वर के पास में ये डिवाइन पावर होते हैं तो ये जो ऐश्वर्य चिंता या तो डिवाइन पावर हमको भक्ति मार्ग में अंतराय या तो फिर किस तरह का स्टंबलिंग ब्लॉक ही हमको दिखते हैं एवं भक्तो खन उहा जितने दूरे परिहार करे और भक्त मेहनत करके ईश्वर को एक सीधे सरल अपने प्रियतम के रूप में देखना चाहेगा उनमें से यह ऐश्वर्य का भाव संपूर्ण रूप से दूर करना चाहेगा जैसे कि देखिए कि मां शारदा के साथ में ही कि वो यह तुर्या अंद जी ने कहा था कि मां का मन जो है कभी भी कंठ से नीचे नहीं आता यानी कि ये जो षड चक्र है तो षड चक्र में यह जो अपने जो कपाल के बीच में जो चक्र है वहां पर जाने से हमको समाधि में चले जाते हैं और यदि कंठ पे आता है तो यह समाधि भूमि और यह जो नॉर्मल वर्ल्ड है उसकी बॉर्डर लाइन प हम लोग रहते हैं किंतु मां का जो मन था जैसे कि वो कंठ से कभी नीचे नहीं आता यानी कि वो सामान्य धरती पर तो नहीं आता वो डिविली की बॉर्डर लाइन प रहती थी किंतु हम लोग मां के जीवन में यह समाधि वगैरह भी इतना देखना पसंद नहीं करते जैसे कि हमारे यहां पर बहुत सारे लोग कहते हैं साधु सीनियर साधु होंगे कि स्वामी जी की फिलोसोफी या तो स्वामी जी का यह जो एक प्रताप है वागम है इस सबसे आकर्षित होकर के संघ में आते हैं फिर ठाकुर की समाधि वगैरह का वर्णन पढ़ते हैं और आखिर में सब लोग मां के शरणागत होते हैं मां के पास में ना ही स्वामी जी की बुद्धिमत्ता है ना ही ठाकुर की तरह बार-बार वह समाधि में मग्न हो जाती नहीं ठाकुर की तरह मां काली से वार्तालाप करेगी उनको दिव्य दर्शन होगा कुछ नहीं मां के पास में जाएंगे तो बस वही है कि आओ बैठो खाओ और तुम के मना छो बाबा तो वही एक है तो हमारी जो पहले स्वामी जी फिर ठाकुर और फिर मां हम लोगों की ये जो स्पिरिचुअल ट्रेजे क्ट्री है देखिए कि एकदम स्पष्ट है कि इवन जो विद्या का ऐश्वर्य स्वामी जी के पास में है समाधि का ऐश्वर्य दर्शन और अनुभूति का ऐश्वर्य ठाकुर के पास में है उस उसको भी आखिर आखिर में हमको नहीं चाहिए मां जैसे कि कुछ भी नहीं है मां के पास में मातृ भाव के अलावा वही आखिर में हमारा अंतिम गंतव्य लक्ष्य है फाइनल डेस्टिनेशन है समग्र भक्ति शास्त्र ही कथा बारंबार बोलिया छन य समग्र भक्ति शास्त्र यही बात बार-बार कहे हैं देखा जाए श्री कृष्ण माता जशोदा गोपालेर दिव्य विभूति निचय नित्य परिचय पाइया हो तहा के निजो बोध लालन ताड़ना आदि कोरे चन देख देखने में आता है कि मां यशोदा यह जो बाल गोपाल है उनकी दिव्य जो सब शक्तियां है सब समय उनको यह अनुभूति होती रहती है दिखता है उनके मुंह में यह विश्व ब्रह्मांड देखती है किंतु दूसरी ही क्षण वो भूल जाती है कि अरे ये तीनों लोगों का स्वामी नारायण स्वरम स्वयं बच्चे का स्वरूप लेकर आए हैं यह भूल जाएगी और या तो फिर उनको स्नेह करेगी या तो फिर डांटे गी क्यों बाकी गोपियों का मक्खन चुरा के खा रहे हो क्यों जाकर के उनकी मटकी तोड़ दे रहे हो क्यों दूसरे को परेशान कर रहे हो क्यों इतना तूफान मस्ती कर रहे हो डांटे गी मारेगी उनको स्नेह करेगी किंतु साथ-साथ में ही जितनी भी बाहर इतनी दिव्य अनुभूति होगी उसको भूल जाने का प्रयास करेगी गोपी गण श्री कृष्ण के जगत कारण ईश्वर बोलिया जानिया हो तहा के कांतो भाव भिन्नो अन्नो भावे आरोप करते पारि दे छन्ना यह गोपी गण है श्री कृष्ण को जगत कारण ईश्वर पता है कि श्री कृष्ण जगत कारण ईश्वर है किंतु फिर भी कृष्ण के ऊपर में ये कांत भाव यानी कि प्रेम भाव छोड़ कर के और कोई भाव का आरोप नहीं कर रही है यह जो ठाकुर की कहानी है कि गोपी लोग जब मथुरा गई देखा कि पगड़ी पहने राजा की तरह कपड़े पहने कृष्ण सिंहासन के ऊपर में बैठे हैं तो फिर यह गोपियों ने कहा कि कहां हमारा यह जो पीतांबर वस्त्र धारी य मयूर यह जो पिछ है धारण किए हुए कृष्ण उनको देखने के लिए गोपाल कृष्ण को देखने के लिए हम आए हैं यह राजा कृष्ण को देखेंगे तो क्या हम लोग क्या द्वि चारिणी होंगे क्या हम लोग व्या भिचारी होंगे ऐसा जब उन्होंने कहा तब यह राजा साजे हुए कृष्ण ने वही गोपाल का स्वरूप धारण किया और तब कहीं जाकर के गोपियों ने उनका दर्शन किया तो इवन जो राजा का भी ऐश्वर्य है गोपियों को नहीं देखना है वही गोपाल बाल रूपी ऐश्वर्य गोपाल बाल रूपी कृष्ण को ही उनको देख ना है ए रूप अन्यत्र दृष्ट व्य और इसी तरह से बाकी सब जगह पर हमको देखने को मिलता है ये एक बहुत सुंदर पॉइंट है कि जब हम भक्ति के प्रारंभ में होंगे तभी हमको यह ईश्वर का अपने इष्ट का ऐश्वर्य देखना है तभी हमको यह देखना है कि उनको साधना करने की जरूरत नहीं है वह कभी अपूर्ण नहीं हो सकते हैं वह कभी इनकंप्लीट नहीं हो सकते हैं किंतु जैसे-जैसे भक्ति आगे बढ़ती जाएगी वैसे-वैसे ही जद ये भगवान का ऐश्वर्य दिखता भी है तो भी हम कहेंगे कि इस ऐश्वर्य को दूर हटा दो इस ऐश्वर्य को दूर कर दो यानी कि देखिए कि किस तरह से भक्ति मार्ग भी और यह पुरुषार्थ मार्ग एक ही जैसे कि गंतव्य लक्ष्य की ओर एक ही डायरेक्शन में हमको ले जाता है ही भक्ति मार्गी कोई ऐश्वर्य देखना चाहते हैं और जो पुरुषार्थ मार्गी है उन लोगों के लिए ऐश्वर्य का कोई अर्थ नहीं है मैं इस तरह के भगवान की पूजा कर रहा हूं जो अष्ट बाहु है जिनके पास में पूरे ब्रह्मांड की शक्ति है तो भी क्या है मेरे कर्म तो मुझे ही काटने हैं तपस्या करके उनका कोई वो ज्यादा से ज्यादा मुझे प्रेरणा दे सकते हैं कि हां तुम आओ यहां पे मैं तुम्हारा आखिर में तो तुम्हारा कल्याण होगा ही किंतु एज ऑफ टुडे जब मैं साधना कर रहा हूं तब तो मुझे ही जोर करके अपने मन को डिसिप्लिन करना है खाने पीने पहनने की ये विषयों के जितने भी भोग हैं इन सबसे मुझे ही तो अपना मन वापस खींचना है यदि पुरुषार्थ नहीं होगा तो सिद्धि भी प्राप्त नहीं होगी तो इस क्षेत्र में ऐश्वर्य वान इष्ट या तो भगवान की पूजा करने से मुझे कोई लाभ नहीं होने वाला है उसके पास में ऐश्वर्य है तो है मेरे कर्म तो मुझे ही काटने हैं आत्म दीपो भव जिस तरह से बुद्ध ने कहा था तो ये दोनों के लिए पुरुषार्थ मार्गी हों के लिए भी और भक्ति मार्गी हों के लिए भी शुरू शुरू में हो सकता है कि उनको ऐश्वर्य वान सुपर पावर डिवाइन पावर वाले इष्ट देखने को अच्छे लगे किंतु जैसे-जैसे वे लोग अपनी भक्ति में पुरुषार्थ में आगे बढ़ते जाते हैं ऐश्वर्य या तो फिर डिवाइन पावर उनकी दृष्टि के सामने कुछ नहीं होते हैं उनको वही सीधे सरल यदि पुरुषार्थ मार्ग है तो इस तरह के बुद्ध को मुझे देखना है जिन्होंने पुरुषार्थ करके सिद्धि प्राप्त की वो देख कर के मुझे एक इनकरेजमेंट मिलेगी मैं भक्ति मार्गी हूं तो इस तरह से भगवान कृष्ण को देखना है जिनके साथ में मेरा मातृ भाव है या तो फिर मधुर भाव है यह ऐश्वर्य महिमा से मंडित कृष्ण को मुझे उस क्षेत्र में भी नहीं देखना है यानी कि दोनों मार्ग में आखिर में तो हम इष्ट को डिवाइन पावर से डिसोसिएट करके एक या तो फिर प्रेरणा पुरुष के रूप में देखना चाहेंगे या तो फिर एक प्रेम के पात्र के रूप में देखना चाहेंगे इसके बाद में नया पॉइंट चालू होता है जो कि अभी हम नेक्स्ट क्लास में देखेंगे ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णर्पण मस्तु

प्रश्न: ऐश्वर्य नहीं देखेंगे तो इष्ट पे शरणागति कहाँ से आएगी

देखिए मैं जिस तरह से एनालिसिस करता हूं दो तरह के डिवोटा होते हैं एक तो साधक और नॉन साधक अभी जैसे कि मास्टर महाशय को देखिए वह ठाकुर के पास में जब पहली बार गए थे प्रथम दर्शन में देखिए कि ठाकुर को वार्तालाप करते हुए देख कर के ही ठाकुर के प्रति इतने आकर्षित हो गए थे उस समय उन्होंने ना ही ठाकुर की समाधि देखी थी ना ही वह भजन इतना सुंदर गाते हैं वह देखा था वही वही है कि उनकी बातों से ही उनके हृदय को शांति मिल गई तो एक तो मुमुक्षु होते हैं जो कि एक तरह के सॉल्यूशन प्राप्त करने के बाद में फिर साधना करना शुरू कर देते हैं ठाकुर के कहे अनुसार दूसरे होते हैं कि जो कि आते हैं किसी अपेक्षा को लेकर के किंतु उनको चाहिए कि साधना नहीं करेंगे उनको शॉर्टकट मिल जाना चाहिए जो कि इजली हो सकता है इस ऐसा कुछ यदि हो जाए हमको शॉर्टकट मिल जाए तो फिर हम अपना जीवन बिता दे तो अभी क्या है ना कि जैसे हमारे संघ में ऐसे मैंने सीनियर साधुओं को कहते हुए सुना है दो तरह की मूवमेंट होती है एक तो मास मूवमेंट होती है एक क्लास मूवमेंट होती है मास मूवमेंट में क्या है ज्यादातर लोगों को कुछ भी साधना नहीं करनी उनको कुछ इजली कुछ मिल जाना चाहिए जबकि यह क्लास मूवमेंट होती है उसमें क्या है कि लोग साधना करने को तैयार होते हैं बशर्ते कि शुरू में एक कन्वीन आ जाए तो अभी क्या है कि ये शुरू में एंट्री पॉइंट जो है ना वो दैट देर कि इवन मास्टर महाशय को भी स्वामी ठाकुर से कुछ एक मतलब एक विद्या का ऐश्वर्य कहिए चलिए या स्वामी जी को देखिए कि स्वामी जी को एक जब पहली बार ठाकुर के पास में गए थे तो उन्होंने भी उनकी बातें सुनकर के जो प्रभावित हो गए थे केशव सेन भी जो है उनकी बातों को सुनकर के मने विद्या के ऐश्वर्य से प्रभावित हुए थे फिर यह समाधि ऐश्वर्य है फिर लोगों को स्पर्श करके चैतन्य करवा देना है वो तो उन्होंने बाद बाद में देखा था तो एक एंट्री पॉइंट ऐश्वर्य होना चाहिए और दूसरा है कि फिर उस ऐश्वर्य को प्राप्त करके जीवन में कुछ एक सॉल्यूशन लाकर के फिर बाद में साधना करनी है तो जो साधक होते हैं ना उन लोगों के लिए जो ऐश्वर्य होता है वह इस तरह से एक कहेंगे कि नॉन डिवाइन होता है जिसमें एक प्रेम का एक बहुत बड़ा फैक्टर होता है जबकि जो लोग हमेशा से शॉर्टकट ही देखना चाहते हैं उनको एक डिवाइन ऐश्वर्य देखना है अभी यह जो डिवाइन ऐश्वर्य नॉन डिवाइन ऐश्वर्य इन दोनों को वैसे तो डिस्क्रिमिनेट करना मुश्किल है किंतु कथामृत पढ़ेंगे देखिए कि जितना भी प्रथम दर्शन हुआ है ना इन सभी में आपको ऐसा नहीं दिखेगा कि ठाकुर का कोई ऐश्वर्य दिव्य ऐश्वर्य देख कर के लोग हुए हैं अभी जैसे ये तुर्या अंद जी ना कि किसकी ये बात है तुर्या अंद जी की भी है और ये आई थिंक विज्ञानानंद जी की भी दोनों में से एक की है कि जाकर देखा तो एक बहुत बड़ा थाला सजाया हुआ था थाला में बहुत सारे अन्न व्यंजन रखे हुए थे खाने के लिए तो उन्होंने सोचा कि अरे परमहंस य तो इस तरह से तपस्या का भान करते हैं यहां पे इतना सारा खाना खाते हैं किंतु जब ठाकुर खाने को बैठे तो उन्होंने लिखा कि ज चिड़िया थोड़ा-थोड़ा करके खाती है तो सभी चीजों में से थोड़ा-थोड़ा लेकर के खाते हैं तो ये थोड़ा-थोड़ा अर्थात क्या है कि दो तरह से एक तो मन को जमीन पर रखने के लिए दूसरा कि खाने के प्रति कोई अट्रैक्शन नहीं है बस उनको मिलता है तो वह है उसके सामने उसके लिए कोई पागल नहीं हो जाते हैं तो यह देख कर के उनको लगा कि हां उनमें तपस कितनी है त्याग कितना है सो दिस आर ऑल नॉन डिवाइन ऐश्वर्य त्याग का ऐश्वर्य दिखता है विद्या का ऐश्वर्य दिखता है भालो भाषा लाटू महाराज ठाकुर के पास में आते थे तो ठाकुर उनके साथ में इतना सहृदय पूर्वक बात करते थे लाटू महाराज जैसे कि बिल्कुल उनके गुलाम जैसे हो गए थे तो प्रेम का ऐश्वर्य इस तरह के ऐश्वर्य से व लोग प्रभावित होकर के फिर बाद में ये लोग साधना करना शुरू किए यानी कि इस तरह के जो लोग होते हैं नॉन डिवाइन ऐश्वर्य से प्रभावित होकर के बाद में जीवन में साधना करें वह चाहे त्यागी हो ना कि ये मास्टर महाशय जैसे या तो फिर यह बलराम बसु जैसे नाग महाशय जैसे गृहस्थ हो तो वो वो एक कैटेगरी है हमेशा बहुत ही अल्प लोग उस कैटेगरी में रहने वाले हैं मैक्सिमम लोग 90 पर लोगों को डिवाइन ऐश्वर्य चाहिए और साधना भजन करने की तो बात ही नहीं जैसे आपने कहा 50 किलो का सोने का मुगट धरा दिया और फिर मन में यह अपेक्षा रखी य बिजनेस डील हो रही है उसमें मैं सक्सेसफुल हो जाऊं तो उस तरह के लोग ज्यादातर होते हैं प्रश्न कहां पर आता है पता है बात यह नहीं है कि दो तरह के डिवोर्स होते हैं प्रश्न है कि यह जो मूवमेंट के ये जो लीडर्स होते हैं उनको किस तरह के डिवोटा को अट्र अट्रैक्ट करना है मैंने इस तरह का डिबेट यहां पर अपने संघ में सुना है कि हमको किस तरह के डिवटी चाहिए वो एक पार्टिकुलर सिलेक्टेड ग्रुप चाहिए जो कि बहुत ही कम रहेंगे या तो फिर एक मेजर एक विराट एक चाहिए कल्पतरु वारे ठाकुर ना कि दक्षिणेश्वर वाले ठाकुर आप बता दीजिए कौन से ठाकुर आपको चाहिए एक कल्पतरु वाले ठाकुर है एक आशीर्वाद मिल गया जीवन का सब हो गया वोह एक बहुत बड़ा एक चाहिए या तो फिर वह दक्षिणेश्वर में बैठे हुए ठाकुर जिनके पास जाकर के आप जाएंगे तो आपको साधन भजन करने को कहेंगे आपको कोई भी शॉर्टकट नहीं दिखाएंगे वह ठाकुर आपको चाहिए तो हमको किस तरह के डिवोर्स को अट्रैक्ट करना है दैट डिपेंड्स अपॉन दिस लीडर्स व वो जो चॉइस लेते हैं इट विल अफेक्ट एवरीथिंग इन द

प्रश्न: डिवाइन और नॉन-डिवाइन ऐश्वर्य के बारे में और कुछ बताइए

फ्यूचर जैसे डिवाइन ऐश्वर्य में जैसे कि आप विष्णु की स्तुति पढ़ेंगे शिव स्तुति पढ़ेंगे कि अष्ट भुजाएं हैं इतने राक्षसों का वध किया है इतने लोगों का यह किया है जैसे हम मां शारदा की ये जो किताब के जो इंट्रोडक्शन पढ़ रहे थे तो उसी में हमने देखा ना गंभीरानंद जी महाराज लिखते हैं कि उस समय था कि जबकि ये राक्षसों का वध करना था अभी एक समय है कि संशय राक्षस अपने हृदय में जो संदेह बैठा हुआ है इसका वध करना है इसलिए मां इस बार बिना ऐश्वर्य के आई है तो उसी समय वो कह देते हैं ठाकुर ने खुद कहा कि राजा इस बार आए हैं किंतु छद्म रूप में यानी कि वह जो रात को वह राजा निकलता है ना नगर परिभ्रमण करता है क्योंकि क्या है कि वह राजा बनकर जब दरबार में बैठा है कोई उनको ठीक-ठीक फीडबैक नहीं देगा किंतु ये सामान्य आदमी का वेष धारण करके नगर में घूमेगा सब जितना भी ग्रीवेंस है जितना भी क्रिटिसिजम है सब सुनेगा तो ट राजा अच्छे से राज्य कर पाएगा तो ठाकुर कहते छद्म वेश में राजा आया है मां आई है बिना ऐश्वर्य के देखिए कि मैंने जब यह पहली पहली बार

प्रश्न: माँ यशोदा जिस तरह से बाल-कृष्ण का लालन-पालन करतीं थी और प्रेम करती थी उसमे और हमारी माँ हमारा लालन-पालन करती थी इन दोनों में फर्क क्या है? बाल-कृष्ण अवतार थे इस लिए माँ यशोदा का मातृ-प्रेम दिव्य था और उसका उदाहरण हम बाकि सब माँ को देते है. हम कहते है की सब माँ अपने बच्चे में दिव्य बाल-कृष्ण को देखे. यदि बाल-कृष्ण में दिव्यता नहीं देखनी तो फिर तो माँ यशोदा का मातृ-प्रेम सामान्य होकर रह जाएगा. उस प्रेम से सीखने को हम और किसी माँ को नहीं कहेंगे.

पढ़ना शुरू किया तब मुझे भी एक आश्चर्य हुआ था कि हमारे भी मित्र है हमारे भी पेरेंट्स है हमारी मां है या तो हमारे बच्चे हैं हमारे गुरु भी है किंतु इन्हीं लोगों के साथ में जो संबंध है सख्य भाव दास भाव मातृ भाव संतान भाव शांत भाव मधुर भाव यह जो भाव तो हमारे भी जीवन में है नहीं होने से तो जीवन चलेगा नहीं सबके साथ में अपने रिलेशन है तो इसी भाव को डिवाइन कैसे बना देना है दैट इज़ द सीक्रेट कि सामने कौन खड़ा है दैट डज नॉट मैटर कि उनके साथ में जो रिलेशन है वह किस तरह से दिव्य हो जाए अभी आप कहेंगे कि एक सामान्य भाव है एक मां का अपने बच्चे के प्रति और यशोदा का कृष्णा के प्रति डिफरेंस क्या है तो डिफरेंस है कंप्लीट सेल्फलेसनेस यह कंप्लीट एब्जॉर्ब यदि आप सेल्फलेसनेस और सेल्फिश का परसेंटेज निकालने को जाएंगे वह कहीं पर वह जो मीटर होता है मीटर 50 पर पर खड़ा होगा 50 पर से सेल्फिश है 50 पर सेल्फलेसनेस है और जद मां यशोदा का देखेंगे कि 100% सेल्फलेस है बिल्कुल भी सेल्फिश नहीं है तो अभी यह भी कहा जाना चाहिए कि बाकी जो मां होती है उनके भीतर में किस तरह की सेल्फिश हो किंतु फिर भी यह सेल्फिश के अलावा भी यदि कोई एक मेजरमेंट हो तो मुझे लगता है कि इंटेंसिटी कि जो लव की जो इंटेंसिटी है प्रेम की जो इंटेंसिटी है वो एक कि इस तरह का प्रेम कि जैसे कि वो पागली नहीं की तरह जैसे कि देखिए कि हमको यहां पर जीता जागता एक उदाहरण है अघोर मणि देवी गोपालेर मां ये गोपालेर मां बेचारी बड़ी दुखी नहीं थी ज्यादा पैसा नहीं था खाने को कुछ नहीं था किंतु फिर भी ये जो बाल गोपाल की सतत वो उनके नाम का जप किया करती थ थी और किंतु आखिर में जब ठाकुर के पास में आई बाल गोपाल का दर्शन हुआ तो इस तरह से लगा जैसे कि उसी बाल गोपाल के भीतर में उनका पूरा जीवन आ गया है अभी यह बाल गोपाल कोई दूसरे बच्चों से अलग नहीं है दिखने में ज्यादा सुंदर होगा किंतु ऐसा तो नहीं है कि वह सुपर पावर से कुछ मिरेकल करके अपनी मां के लिए बहुत ज्यादा खाना जुगाड़ कर दिया पहनने के लिए कपड़े अच्छे नहीं थे तो कपड़े जुगाड़ कर दिए छोटी सी कुटिया में रहती थी तो बहुत बड़ा मकान बना दिया ऐसा तो नहीं है किंतु उनके प्रति जो प्रेम की जो इंटेंसिटी थी वो इंटेंसिटी उनको जैसे कि खा गई वो जो दौड़ी दौड़ी वह बावरी बनी हुई जब दक्षिणेश्वर में आती है तो एक लेडी डिवटी वहां पर खड़ी थी वो पूरे दृश्य का वर्णन करती है कहती है कि किस तरह से वो पागली नहीं हो गई थी गोपाल गोपाल बोल कर के किस तरह से उनका मन एक ही चीज में ये हो गया था एकाग्रता होती है एक सामान्य बच्चा पढ़ाई करता है और एक सिद्ध पुरुष ध्यान करता है दोनों को एकाग्र होना है किंतु वो जो स्टूडेंट जो होता है जब वह एकाग्र एकाग्रता करता है अपने मन को अपने स्टडी में तो अपने माइंड का 10 पर ना कि 15 पर इस्तेमाल करता होगा जबकि यह सिद्ध पुरुष जब मेडिटेशन करता है तो ऑलमोस्ट 80 90 पर वो उसका माइंड उसमें एकाग्र होता है तो जो टोटलिटी जो है कमिटमेंट जो टोटलिटी ऑफ रिलेशनशिप है दैट इंटेंसिटी सो हाई जैसे यहां पे वो एग्जांपल काम नहीं करेगा जो ठाकुर ने कहा है कि एक मां अपने बच्चे को खाना खि दूध पिला रही है कि साथ में ही एक कस्टमर के साथ में बात कर रही है साथ में ही व जो यह होता है ना वो जो धान ये करने वाला क्रश करने वाला उसमें एक हाथ से धान डाल रही है थोड़ा सा भी उसका ध्यान भंग हुआ तो उसका हाथ या तो फिर हाथ उसका टूट जाएगा या तो कस्टमर उसको मूर्ख बना देगा तो ये 10 चीजों में जो ध्यान बटा हुआ है ऐसा नहीं स टोटली कंप्लीट अब्जॉर्ब्ड इन द ऑब्जेक्ट ऑफ देयर लव सो द इंटेंसिटी एंड सेल्फलेसनेस आई थिंक दिस इज व्हाट मेक्स अ रिलेशनशिप

प्रश्न: यानि इसमें कृष्ण से यशोदा की सिद्धि ज्यादा है

डिवाइन यस कृष्णा ने ऐसा तो नहीं है कि उनको भी बहुत बड़ा राजा रानी बना दिया है उनके दुश्मनों के ऊपर मैं विजय दिलवा दी है या ऐसा तो कृष्णा ने कुछ नहीं किया है ही सिंपली एन ऑब्जेक्ट ऑफ लव नाउ हाउ मच यू आर गोइंग टू लव हिम इट डिपेंड्स अपऑन यू ये देखिए इसके बारे में देर इज वन स्टोरी मां मां का यह जो राधू का लड़का जो था तो तो मां उसको बाल गोपाल की तरह देखती थी बाल गोपाल की तरह उसको सजाती थी उसकी तरह उसको प्रेम करती थी तो जब भी यह जो बाकी साधु लोग है इस बच्चे को देख कर के उनको बड़ी खुशी होती थी मां उनको ब बाल गोपाल की तरह प्रेम करती है वो बच्चे में जैसे बाल गोपाल ही दिखता है किंतु जब मां का मां की महासमाधि हुई और यह बच्चा धीरे-धीरे नेगलेक्ट होने लगा क्योंकि वैसे ही तो राधू पागल है वैसे ही तो अपने बच्चे पर ध्यान नहीं दे रही तो जिस महाराज ने ये स्मृति कथा लिखी है महाराज लिखते हैं कि धीरे-धीरे करके ना इस लड़के के भीतर में हमको लोभ के लक्षण दिखना शुरू हुए खाने के प्रति बहुत ज्यादा आकर्षण है विषयों के प्रति बहुत ज्यादा आकर्षण है तो हम लोग सभी सोचते थे कि जब मां उसको प्रेम करती थी तो उसको बाल गोपाल की तरह दिखता था किंतु अभी वो जैसे कि लोभी और कामुक जैसा हो गया है तो बात यह नहीं है कि बच्चे में अपने आप में कोई ऐश्वर्य था मां का प्रेम था कि जो उसको बाल गोपाल बनाता है यानी कि सिर्फ यह नहीं कि बाल गोपाल के भीतर में जो ऐश्वर्य था हम तो यहां तक जाकर कह सकते हैं कि मां यशोदा के प्रेम ने उनको सही सही बाल गोपाल बनाया जैसे स्वामी जी कहते है ना कि जापान में एक कहानी है कि गुड़िया को जद आप प्रेम करेंगे तो गुड़िया जीवित हो जाएगी तो वैसे ही भारत देश को इतना प्रेम कीजिए कि अंधेरे में डुबा हुआ भारत फिर से जागृत हो जाए यह बात बिल्कुल सही है इसलिए जैसे

प्रश्न: हमें अपनी अलग-अलग मनोदशा के अनुसार अलग-अलग साधनाएँ करनी चाहिए। जैसे माँ अलग-अलग भक्तों को अलग-अलग आध्यात्मिक निर्देश दे रही हैं।

हमने ऑलरेडी डिस्कस किया कि हिंदू धर्म जो है वो मनुष्य जीवन की ये विचित्र होता है विस्मय अद्भुत काए कॉम्प्लेक्टेड रिफ्लेक्ट करता है बुद्धिज्म को फॉलो करेंगे तो आपको पुरुषार्थ पर ही निर्भर होना है फिर पुरुषार्थ के अलावा और कुछ चाहिए तो डिग्रेडेड बुद्धिज्म की ओर जाना पड़ेगा यदि शरणागति क्रिश्चियनिटी को फॉलो करेंगे या तो शरणागति ही सब सबसे मुख्य है उसमें फिर यदि आपका विल पावर बढ़ जाता है आप क्वेश्चन करना शुरू कर देते तो नहीं चलेगा दिस इज द नेचर ऑफ जीसस दिस इज द नेचर ऑफ होली ट्रिनिटी यू विल हैव टू एक्सेप्ट इट अदर वाइज यू विल बी कंसीडर्ड हेरेटिक यू बी बर्न अपऑन द स्टेक तो वो ना ही इंटेलेक्चुअल एडवेंचर वहां पर चलेगा तो हिंदुइज्म एक्चुअली परफेक्टली रिफ्लेक्ट्स अवर कॉम्प्लेक्टेड सुबह को मैं बड़ा एकदम फिट हूं एकदम फिजिकली और मेंटली फिट हूं तो चलो बैठ कर के जब ध्यान कर लेते हैं शामत होते होते पूरा मैं डि मतलब ये ये हो गया हूं मैंने हवा निकल गई है काम करते करते अभी आप जद बैठ कर के बोलेंगे किताब पढ़ने को तो नहीं होगा तो चलो मंदिर में जाकर के आरती सुन लेते हैं सो दैट बोथ पॉसिबिलिटीज डिफरेंट टाइम तो साधन पद्धति रिफ्लेक्ट दैट दूसरा है कि इवन विदन यदि आप प्योर पुरुषार्थ या तो फिर प्योर श्रद्धा को फॉलो करते हैं तो यह ठाकुर के जो दो डिसाइल है गिरीश घोष और स्वामी जी देखिए कि दोनों के जीवन में इक्वल तपस्या है गिरीश ने जब बकल मा दे दिया तो फिर आखिर में पता चला कि इससे बेटर था जब ध्यान कर लेते हैं ये बुरा फस गए छुटकारा कहीं पर भी नहीं है

प्रश्न: पुरुषार्थ और शरणागति दोनों होने चाहिए

ये जो स्वामी जी के पिताजी का मृत्यु हुआ ठाकुर के पास गए खाने पीने की व्यवस्था कर दो ठाकुर ने कहा जाओ मां के पास जाकर मांग लो तो जितनी भी बार गए क्या मांगा ज्ञान दो भक्ति दो वैराग्य दो इवन जद चलो कि रोटी कपड़ा मकान नहीं मांगा तो सिद्धि भी नहीं मांगी दैट इज द ग्रेटनेस ऑफ स्वामी जी चलो भाई बहुत मैं धार्मिक आध्यात्मिक हो गया हूं तो मां के पास में निर्विकल्प समाधि मांग लू तो वो भी नहीं मांगी कि ज्ञान भक्ति और वैराग्य ऐसा करके मैं निर्विकल्प समाधि अपने से प्राप्त करूंगा यह तो बहुत बड़ा प्रश्न

प्रश्न: विवेक और वैराग्य में फर्क क्या है?

है वैराग्य का अर्थ है कि त्याग कि मेरे पास में जो कुछ भी चीजें आती है विषय के भोग की उसको मैं त्याग करूं किंतु विवेक मुझे बताता है कि विषय क्या है और मने बहुत बार ऐसा होता है ना कि हम लोग समझ ही नहीं पाते कि मैं विषय भोग में डूबा जा रहा हूं तो उस समय विवेक हमको बता ता है कि बाहर से भले ही चाहिए साधन भजन जैसा दिखे किंतु यह एक्चुअली है विषय माने इंद्रियों के विषय तो उसका भी मुझे त्याग करना है बहुत बार ऐसा हो जाता है कि चलो कि पैसा शोहरत इज्जत सब की कामनाएं छोड़ कर के यहां पर आए तो यहां पर एक दूसरा एक प्रलोभन आक के लग गया कि मैं दूसरों से ज्यादा जप करता हूं मैंने एक एक डिवोटा था मुझे बार-बार पूछता है अच्छा महाराज आप सुबह को कितने बजे उठते हैं तो मैंने कहा कि 5:00 बजे मंगल आरती है उससे 510 मिनट पहले उठता हूं तो बोला अच्छा आप सिर्फ 5:00 बजे ही उठते हैं पौ को ही उठते हैं तो फिर मैं समझ गया कि वो क्या कहना चाहता है इसलिए मैंने सामने प्रश्न किया आप कितने बजे उठते हैं बोला मैं 4:00 बजे उठ जाता हूं मैंने दिखाना चाहता है वो मेरे से ज्यादा बड़ा मतलब वो बेटर है तो मैंने कहा अच्छा तो मैंने ज्यादा जल्दी उठोगे तो ज्यादा जब ध्यान करोगे ज्यादा जब ध्यान करोगे जल्दी से तुमको मैंने ठाकुर का दर्शन होगा मेरे से भी पहले हो जाएगा किंतु पता है ज्यादा पहले उठ कर के यदि आप दिखावा करते हैं कि मैं ज्यादा पहले उठता हूं तो पहले उठने का कोई अर्थ नहीं है तो वैराग्य है सुबह को उठना किंतु विवेक यह है कि यह दिखावा नहीं करना कि मैं इतना तपस्या कर रहा हूं ठीक ठीक इसीलिए विवेक चाहिए वैराग्य तो है चलो वैराग्य आ गया कि धर्म के रास्ते पर आ गए किंतु फिर यहां पर आकर के विवेक नहीं आया ना तो वही विषय के भोग यहां पर भी आ जाएंगे नहीं माइंडफुल जिसको

प्रश्न: विवेक और कॉन्शियसनेस एक ही है?

आप कहते हैं वो एक डिफरेंट कांसेप्ट है विवेक एक डिफरेंट कांसेप्ट

प्रश्न: जब हम ध्यान करते हैं तो हमें लगातार बाधाएँ आती हैं। हम गृहस्थों के लिए मन एकाग्र करना बहुत कठिन होता है।

है जैसे देखिए कि मैं सुबह को जल्दी उठ जाता हूं वह मेरा वैराग्य है किंतु फिर मैं दिखावा करता हूं तो मेरे पास में विवेक नहीं है वह जैसे एक हो गया वैसे ही मुझे यह पता है कि सुबह को जल्दी उठना है किंतु वह विवेक मेरे पास में है किंतु जल्दी उठने का वैराग्य मेरे पास में नहीं है तो वहां पे भी सेम प्रॉब्लम यानी कि विवेक वैराग्य दोनों साथ में चलना चाहिए सिर्फ विवेक है मुझे पता है कि यह यह करना है किंतु विल पावर नहीं है दृढ़ विल पावर नहीं है तो मैं उसको फॉलो अप नहीं कर पाऊंगा बहुत सारे लोग ऐसा वो जैसे वो दुर्योधन कहता है ना जाना म में धर्मम नच में प्रवृत्ति जानामि में अधर्मम नच में निवृत्ति धर्म क्या है पता है किंतु कर नहीं पाता हूं अधर्म क्या है पता है छोड़ नहीं पाता हूं क्यों क्योंकि मेरे इंद्रिय में सब कुछ मेरा उसमें यह हुआ है व अटैच हो गया है अटैचमेंट हो गया है तो दोनों चाहिए विवेक भी चाहिए और मने क्या सही है क्या गलत है वो डिस्क्रिमिनेशन भी चाहिए और साथ में वैराग्य रूपी विल पावर भी चाहिए तभी हम सक्सेसफुल

प्रश्न: हम गृहस्थों के लिए आध्यात्मिक जीवन में प्रगति करना बहुत कठिन है

होंगे किंतु देखिए कि आप लोग जो नियमित रूप से यह क्लास अटेंड करते हैं या तो फिर यदि नियमित रूप से कथामृत का पाठ भी करेंगे ना तो आपसे चल जाएगा आप यह अपेक्षा मत रखिए कि मैं बैठ कर के एक घंटा आधा घंटा जप करूं या तो फिर हमारी तरह कोई तपस्या मय जीवन बिताए यदि इस तरह की अपेक्षा नहीं करके इतना भी यदि करते हैं जैसे हमने देखा था ना कि प्रभु महाराज ने कहा कि 12 साल कथामृत का पाठ करने से मुक्ति अवश्यंभावी है तो कथामृत का पाठ या तो फिर यह सत्संग इतना भी यदि बैठ कर के सुने तो भी तो मैं कहता हूं कि इस जन्म के लिए बहुत हो गया है देखिए इसको कंसोलेशन नहीं कहते हैं

प्रश्न: ठाकुर हमें आश्रय दिए है इसी कंसोलेशन में हम रहते है

इसको वास्तविकता कहते हैं यदि मैं कहूंगा इस तरह से अपने मन को पटा करके मैं रहूं ऐसा मत सोचिए कहिए कि ये वास्तविकता है इस जीवन में इतना ही होगा दे एक अन एक जो होता है ना स्वामी जी ने कहा है इतना उच्च टारगेट मत रखो कि आप कभी फुलफिल ना कर पाए आपको निराशा ही होगी मेरी क्षमता के अनुसार टारगेट रखिए और इस जीवन में इतना होगा ऐसा एक स्वीकार कर लीजिए स्वीकृति इज बेटर वर्ड एक्सेप्टेंस नॉट की कंसोलेशन देखिए ये फ्रस्ट्रेशन भी अच्छा

प्रश्न: लेकिन कभी-कभी फ्रस्ट्रेशन आ जाता हैं। हम दूसरों को आगे बढ़ते देखते हैं तो उदास हो जाते हैं।

है कि हमको एक इंपे देता है एक धक्का देता है जद ये फ्रस्ट्रेशन नहीं होता कि मैं ठाकुर के शरणागत होने के बावजूद बहुत ज्यादा कुछ नहीं कर पा रहा हूं तो फिर क्या होगा ना मैं वैसे ही तमस में डूब जाऊंगा यदि एक स्पिरिचुअल फेशन रहता है ठाकुर का ही देखिए ना ठाकुर ने मां का खड़ग हाथ में लेकर के गले पर मारने को गए थे बोले कि यदि दर्शन नहीं दोगी तो अभी गला काट दूंगा क्यों ठाकुर तो इतने आध्यात्मिक थे आज नहीं ना कल तो दर्शन मिलने वाला था इतनी व्याकुलता आ गई इतना फ्रस्ट्रेशन आ गया सुसाइडल हो गए पूरे तो मने ये इपेटुस होने से अच्छा ही है बुरा कुछ

प्रश्न: एक साधु 20 वर्षों तक क्लास ले रहे थे लेकिन वह एक तरह की ही बातें सिखाते रहे।

नहीं ठाकुर के बारे में है हृदय ठाकुर को कहता है कि अरे मामा आप तो सब जगह प एक ही तरह की बातें करते हैं थोड़ा सा बातों को चेंज कीजिए ना तो ठाकुर बोलते हैं साला मैं कुछ भी बोलूं उससे तुमको क्या है जो महापुरुष होते हैं वो सामने वाले भक्तों की अवस्था देख कर के बोलते हैं तो कि उनको इस चीज की आवश्यकता है इसलिए ये बोलना है वे लोग प्लान नहीं करते कि मुझे वै विद्य चाहिए जिससे कि ये जो मास्टर महाशय बैठे हैं वो सब तरह सब समय नई-नई बातें करें लिखेंगे मास्टर महाशय को किसी ने पूछा कि कथामृत में बहुत सारी बातें रिपीट होती है तो आपने उसको हटा क्यों नहीं दिया बिना मतलब का कथामृत इतना बड़ा बना दिया तो मास्टर महाशय क्या कहते हैं कि ठाकुर की बातों का एक फ्लो होता है वो फ्लो को यदि हम तोड़ देंगे ना तो फिर पढ़ना अच्छा नहीं लगेगा दूसरा कि ठाकुर किसको क्या उपदेश देते हैं वो भी एक बड़ा इंटरेस्टिंग साइकोलॉजिकल स्टडी है केशव सेन को इस तरह से बोलते हैं फिर ये विद्यासागर को इस तरह से बोलते हैं नरन को इस तरह से बोलते हैं मास्टर महाशय को खुद को इस तरह से बोलते हैं तो एक पूरा उपदेश जद मिलेगा कि केशव को जो जो बोला उसमें से ये ये पॉइंट विद्यासागर में रिपीट हुए और ये ये पॉइंट नर में रिपीट हुए मेक्स अ वेरी इंटरेस्टिंग साइकोलॉजिकल स्टडी इसको यदि हटा देंगे तो वह फ्लो भी ब्रेक हो जाएगा और एक सुंदर स्टडी भी नहीं होगा