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Sri Ramakrishna Lila Prasanga ·

साधक भाव : Ch. 1 साधक और साधना || श्रीरामकृष्ण लीलाप्रसंग : स्वामी सारदानन्द रचित || 8 Sep 2025

prayer

ओम स्थापकायच धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः

सर्व जीव में ईश्वर-दर्शन ही आध्यात्मिक जीवन का अंतिम लक्ष्य है

ठाकुर की साधनाओं का विवरण हमने ऑलरेडी देख लिया है। साधक साधक भाव द्वितीय खंड श्री रामकृष्ण कथा लीला प्रसंग का उसमें हमने ऑलरेडी साधक भाव की आलोचना का प्रयोजन क्या है वो हमने ऑलरेडी देख लिया है। यहां तक ही मैंने कहा है। इससे आगे हम बता रहे हैं कि क्या फिर प्रथम चैप्टर जो है द्वितीय खंड का साधक और साधना इस प्रथम चैप्टर में हमने स्टार्टिंग के कुछ पॉइंट ऑलरेडी देखे हुए हैं। अभी हमारा जो पॉइंट जो कि स्टार्ट हो रहा है, वह प्रश्नोत्तरी के माध्यम से शरद महाराज हमको साधन जीवन के कुछ फंडामेंटल कोर कांसेप्ट है। वह बता रहे हैं। क्या है साधन जीवन के वह कुछ फंडामेंटल कासेप्ट? तो वह कांसेप्ट में सर्वप्रथम तो शरद महाराज ने हमको ऑलरेडी कहा कि आध्यात्मिक जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य है सर्वभूत में ईश्वर दर्शन। यदि हम सर्वभूत में ईश्वर दर्शन करने को जाते हैं तभी हम समझेंगे कि मैंने अपना साधक जीवन का आध्यात्मिक जीवन का सर्वोच्च शिखर प्राप्त कर लिया है। तो वह एक हमने ऑलरेडी देख लिया है। इसके बाद में प्रश्नोत्तरी प्रारंभ होती है। सर्वप्रथम प्रश्न यह भी हमने देख लिया था कि यह सर्वभूत में ईश्वर दर्शन हमको क्यों नहीं हो रहा है। तो उसका उत्तर शरद महाराज ने ऑलरेडी दिया है कि हम लोग भ्रम में पतित हुए हैं। इस वजह से हमको यह दिख नहीं रहा है कि हमारे सामने जो कुछ भी हो जो यह पूरा विविध पूरा विश्व संसार है वैविध्यमय विश्व संसार उसमें आप जो कुछ भी देख रहे हैं सब कुछ ईश्वरमय ही है। सब कुछ ब्रह्ममय ही है। सब कुछ आत्ममय ही है। मेरा ही स्वरूप मुझे इस विविध रूपों में दिख रहा है। वो केलेडोस्कोप यदि स्कूल में जब हम पढ़ते थे तो वह प्रिज्म ग्लास का एक्सपेरिमेंट करते थे। ट्रायंगुलर शेप का ग्लास होता है। एक साइड में आप सफेद प्रकाश को एंटर करवाते हैं सूर्य प्रकाश को और दूसरी साइड में देखते हैं कि वही जो सफेद दिखने वाला बिना किसी कलर का दिखने वाला सूर्य प्रकाश उसी प्रिज्म के दूसरी साइड में से जब फिर से बाहर निकलेगा तो सप्तधनुष यह जो इंद्रधनुष है उसके रंगों में बट जाएगा। यह रेड कलर, ऑरेंज कलर, ब्लू कलर, पर्पल कलर यह सभी कलर में वह बिखरा हुआ हमको दिखेगा। तो प्रश्न होगा कि यही यह जो सनलाइट है वही सनलाइट हमको यहां तो कोई कलर नहीं दिख रहा है। वैसे तो इसका कलर सफेद ही है। किंतु फिर बाद में हमको जब दूसरी ओर से निकलती है तब हमको इसको मल्टीपल कलर में क्यों देखते हैं? तो वह प्रश्न जब होता है तो उसका साइंस में उत्तर क्या है कि एक्चुअली जो सनलाइट है वह विभिन्न कलर की ही बनी है। बस वही बात है कि इस सनलाइट के जो विभिन्न कलर है वो जब इकट्ठा हो जाते हैं तो वह वाइट कलर हो जाते हैं। यह साइंस का कलर थ्यरी का एक बड़ा ही एक इंपॉर्टेंट कंक्लूजन है। आपने इस तरह का एक्सपेरिमेंट भी देखा होगा कि ये कलर व्हील है अर्थात कि एक चक्र है। इस चक्र में सभी कलर के अभी रंग के जो कलर है सभी कलर जो है वो वहां पर चक्र में उपस्थित है। जैसे कि एक पिज़्ज़ा होता है या तो केक होती है तो उसके स्लाइस हम कैसे करते हैं? पाई चार्ट में जो हमको स्लाइस दिखाई देता है तो इस तरह से स्लाइस जो होती है तो इस तरह से वो सभी कलर के जितने भी कलर है वो स्लाइस के रूप में इस कलर व्हील पे हैं। तो कलर व्हील जब स्थिर रहता है तो हमको सब कलर दिखाई देंगे। फिर वो जो टीचर है यह एक्सपेरिमेंट दिखा रहा है वो क्या करेगा? इस कलर व्हील को जोरों से घुमाएगा। अब जैसे यह व्हील गोल-गोल घूमता है तो जो मल्टीपल कलर्स जो थे वो हमको सिर्फ एक ही कलर दिखता है। सफेद कलर तो हमको लगेगा कि अरे इतने सारे कलर थे। रेड था, येलो था, ब्लू था, पर्पल था। यह सब कलर कहां पे चले गए? किंतु जब व्हील फिर से स्टॉप हो जाएगा तो हमको सभी कलर फिर से दिखाई देंगे। और फिर से जब व्हील चलने लगेगा, गोल-गोल घूमने लगेगा, तो सब कलर की जगह हमको सिर्फ वाइट कलर दिखाई देगा। तो यह होता क्यों है? क्योंकि एक्चुअली जो वाइट सनलाइट है, वह वाइट सनलाइट मल्टीपल कलर की बनी है। यह मल्टीपल कलर जो है जब ब्लेंड हो जाते हैं, इकट्ठा हो जाते हैं, एक साथ में आ जाते हैं तो हमको वो फिर मल्टीपल कलर एक ही कलर में वाइट कलर में दिखते हैं। ठाकुर के पास में वो एक वो साधक आया था। वह साधक के हाथ में वो मल्टी कलर का एक ग्लास था। तो उस ग्लास में से वह जगत को निहारता था। अलग-अलग कलर का यह जगत दिखता है। किंतु जैसे ही ग्लास हाथ में उसने हटा दिया तो वही एक सिंगल उन्हें वो मल्टी कलर का जो जगत दिखता था वह अभी नहीं दिखेगा। अर्थात कि वह अपने को रिमाइंड करवाना चाहता था कि जब तक मैंने यह भ्रम या माया रूपी जो ग्लास अपने सामने रखा है, तब तक मुझे जगत में यह कलर दिखाई देगा और जैसे ही मैंने ग्लास ग्लास हटा दिया, वैसे ही जगत अपना जो ओरिजिनल कलर है, उस कलर में आकर के हमको दिखाई देगा। तो

भ्रम में पतित होने का अर्थ क्या है?

जब यह प्रश्न होता है जब कोर कांसेप्ट हमने प्रस्तुत कर दिया कि सर्वभूत में ईश्वर दर्शन ही है आध्यात्मिक जीवन की सर्वोच्च सिद्धि और उसके बाद में जब हमने यह कह दिया कि यह सर्वोच्च आध्यात्मिक सिद्धि हमको इसलिए नहीं दिखती है क्योंकि हम भ्रम में पतित हुए हैं। तो फिर यह जितना भी है थरीज यह कहानियों के माध्यम से हमारे शास्त्र है या तो हमारे जो टीचर है वह हमको समझाते हैं कि भ्रम में पतित होने का अर्थ क्या है? अज्ञान से ग्रस्त होने का अर्थ क्या है? जो ठाकुर की वो जो फेमस कहानी है एक एक पेड़ के ऊपर में वो रहती है क्या बोलते हैं? टिक टिकी तो वो दीवार पर जो चलने वाली है तो उसके मल्टीपल कलर है जो भी उस पेड़ के नीचे में जाता है तो वो पहले तो किसी ने देखा उसको रेड कलर का दूसरे ने जाकर के देखा तो येलो कलर की तीसरे ने जाकर के देखा तो ब्लू कलर की तो सभी लोग आपस में झगड़ा कर रहे हैं। किसी ने कहा कि उसका यह कलर है। दूसरे ने कहा यह कलर तीसरे ने कहा यह कलर तो उनको झगड़ा करता हुआ देखकर के उस पेड़ के नीचे में जो आदमी रहता था उसने आकर के कहा कि नहीं वह तो बहुरूपिया है वो बीच-बीच में कलर चेंज करता रहता है। आप सब ने जो देखा है वही सही है। वह जो ठाकुर की फेमस कहानी हाथी की वह कुछ अंधे लोग हाथी को स्पर्श करके जानना चाहते हैं कि हाथी का शेप कैसा है? तो किसी ने हाथी का पैर पकड़ा अंधा है देख नहीं पा रहा है। सिर्फ स्पर्श से उसको उसके शेप का अनुमान करना है। तो किसी ने पैर पकड़ कर के कहा कि हाथी है एक खंभे की तरह। दूसरे ने एक उसकी पूंछ पकड़ कर के कहा कि नहीं हाथी तो है रस्सी की तरह। किसी ने उसका कान पकड़ कर के कहा कि नहीं हाथी तो है सुपड़े की तरह। तो इस तरह से विभिन्न लोग जो जिस सत्य को पकड़ते हैं उसी सत्य को सही अल्टीमेट सत्य है वही समझ करके प्रचार करते हैं। तो हम लोगों के साथ में यह अज्ञान या तो भ्रम जब प्रकट होता है तो हम इस जगत को विभिन्न रूप से निहारते हैं। किंतु जैसे ही यह अज्ञान का पर्दा नजर के सामने से चला जाएगा। वैसे ही हम लोगों को पता चलेगा कि यह पूरा जगत जो है वह ब्रह्ममय ही है। ब्रह्म ही है। ब्रह्मन के अलावा और कुछ नहीं है। ठाकुर जैसे कहते हैं ब्रह्म शक्ति एक। जब वह स्थिर रहता है तो मैं उसको ब्रह्मन कहता हूं। जब वह कार्य करता है तो मैं उसको शक्ति कहता हूं। तो इसी तरह से ब्रह्मन और शक्ति यथागनेर दाहिका शक्ति अर्थात कि अग्नि और अग्नि की दाहिका शक्ति जैसे दोनों एक ही है। अग्नि को छोड़कर के आप दाहिका शक्ति की कल्पना नहीं कर सकते। दाहिका शक्ति छोड़कर के आप अग्नि की कल्पना नहीं कर सकते। तो वैसे ही आप इस जगत में जो भ्रम देखते हैं, यह भ्रम हमारे भीतर में इतना गहराई तक चला गया है कि उसको निकालने के लिए हमको हमारे संस्कारों को सर्वोच्च रूप संपूर्ण रूप से परिशुद्ध करना होगा। तभी हम संपूर्ण जगत में संपूर्ण जगत को ब्रह्ममय देख पाएंगे। सर्वभूत में ईश्वर दर्शन कर पाएंगे। तो

जब तक हम माया में बंधे रहते हैं, हमें यह एहसास ही नहीं होता कि हम माया में बंधे हैं

यहां तक हमने ऑलरेडी देख लिया है। अभी यहां से आगे पढ़ते हैं कि शरद महाराज क्या कहते हैं? क्या कहते हैं कि अच्छा ओई रूप भ्रम हो बार कारण की एवं कबे हो ते बा आमादे ए भ्रम आशिया उपस्थित तो हो इस तरह के भ्रम होने का कारण क्या है और यह भ्रम हम हमारे मन में कब से आकर के उपस्थित हुआ तो एक्चुअली यह प्रश्न और इसका जो उत्तर है यह भी हमने ऑलरेडी देख लिया है शरद महाराज कहते हैं कि जब तक हम भ्रम में पड़े हैं तब तब तक हम समझ नहीं पाएंगे कि भ्रम कहां से आया और क्यों और हमको यह भी समझ में नहीं आता कि हम भ्रम में पड़े हुए हैं। यह जो माया में फंसे लोगों के बारे में ठाकुर कहते हैं ना शबाई बोले हमार परिवार भालो। क्यों बोले ना हम परिवार मंदो अर्थात कि सभी लोग कहते हैं कि मेरी पत्नी अच्छी है। कोई यह नहीं कहेगा कि मेरी पत्नी अच्छी नहीं है। अर्थात कि अभी यह तो पुरुष लोगों को कह रहे थे इसलिए यदि स्त्री भक्तों को कहते तो ठाकुर उससे उल्टा कहते। सभी लोग यही कहेगी कि मेरा पति अच्छा है। कोई यह नहीं कहेगी कि मेरा पति बुरा है। तो क्या है कि हम माया में फंसे हैं तो यह रिलेशनशिप का मोह हमारे ऊपर में सवार है। तो वो फिर वो सामने वाले का बिहेवियर जितना भी गड़बड़ वाला क्यों ना हो हमको उसमें सब अच्छा ही दिखेगा। वो जो कैप्टन की पत्नी का ठाकुर उदाहरण देते हैं। तो कैप्टन की पत्नी थोड़ी शुरू-शुर में कंजूस थी। कैप्टन विश्वनाथ उपाध्याय ठाकुर के जो भक्त थे नेपाल के जो राज्य प्रतिनिधि थे भारत में कोलकाता में वो तो उनकी पत्नी का उदाहरण देकर के ठाकुर कहते हैं कि वह थोड़ी कंजूस थी। एक बार ठाकुर उनके घर पर गए तो वो गाड़ी भाड़ा देने की बात आई तो वो कैप्टन उसको तो पुरुष है तो घर का मालिक है अर्थात कि पैसा तो वही कमाता है तो उसको तो पैसा देना चाहिए। उसकी बजाय वह अपनी पत्नी को पूछने के लिए गया कि मैं पैसा दूं क्या? तो वह पत्नी भी हिंदी में बोलने लगी जोर-जोर से क्या हुआ? क्या हुआ? ऐसा बोल के। तो फिर वो कैप्टन आकर के कहता है कि वो जब जहां पर जाते हैं वही लोग आपको पैसा दे देंगे। तो देखिए कि क्या है कि ठाकुर इसलिए कहते हैं कि जब तक हम माया में फंसे हुए हैं तब तक हमको यह माया जो है वह कभी ऐसा नहीं लगेगा कि मैं माया में फंसा हूं और मुझे इससे निकलना है। जो वह उदाहरण ठाकुर देते हैं। एक व्यक्ति है। एक एक शिष्य अपने गुरु को कहता है कि आप तो सब कुछ त्याग करके साधना करने का उपदेश देते हैं। किंतु मेरी पत्नी मुझे इतना प्रेम करती है कि मैं उसको त्याग नहीं कर पाऊंगा। तो वो गुरु कहते हैं अच्छा तुमको पता है तुम्हारी पत्नी कितना प्रेम करती है तुमको? चलो टेस्ट करते हैं जाकर के। उसने वह शिष्य को एक इस तरह का दवाई दिला खिला दिया कि शिष्य जड़ की तरह पड़ा रह गया। हाथ पैर हिल ही नहीं रहे हैं किंतु वह सुन सब कुछ पा रहा है। तो वो इस तरह से जड़ की तरह पड़ा है अपने घर में और उसकी पत्नी ने जोर-जोर से रोना शुरू कर दिया। कहा कि अरे मेरा पति मर गया तो हाय रे मैं क्या करूंगी। यानी अब क्या है कि वो शिष्य ने तो पहले ही गुरु को कहा था कि मेरी पत्नी मुझे बहुत प्रेम करती है तो मैं इसलिए मैं घर छोड़कर के जाना नहीं चाहता। किंतु और सही में उसका प्रूफ भी दिख रहा है। जब थोड़ी देर के बाद में यह जो दवाई है जो औषध है वह गुरु ने जो शिष्य को दिया है उसकी असर कम हो जाएगी तो फिर से वो वो जड़ होकर के जो पड़ा था उसमें से वापस आ जाएगा और पत्नी के सांत्वना देगा पत्नी भी शांत हो जाएगी। तो सही में वह रो रही है। वह प्रूफ है शिष्य का गुरु के लिए कि देखिए मेरी पत्नी मुझे कितना प्रेम करती है। तो अभी चलो पत्नी तो रो रही है। वह जड़ की तरह पड़ा है। बाय दैट टाइम पड़ोसियों ने ठीक किया कि उसको श्मशान में जलाने के लिए ले जाते हैं। तो ले जाने के लिए दरवाजे में से निकालने का प्रयास किया तो देखा कि वह जो जड़ होकर के पड़ा है तो हाथ पैर फैले हुए हैं तो दरवाजे में से निकल नहीं रहा है। तो किसी ने आकर के वो दरवाजा काटने का प्रयास प्रारंभ किया। तो उसकी पत्नी रो रही थी। रोते-रोते उसने जब आवाज इस तरह से होती हुई देखी तो वह दौड़ी दौड़ी आई। पूछती है कि अरे क्या कर रहे हैं आप लोग? यह दरवाजा क्यों काट रहे हैं? तो पड़ोसी ने कहा कि अरे देखिए इसको तो हाथ पैर इसके जड़ हो गए हैं। दरवाजे में से बाहर नहीं निकल रहा है। दरवाजा काटना पड़ेगा। तो वह पत्नी रोती-रोती कहती है कि आमी राण बेवा होम अर्थात कि मैं तो अभी विधवा हो गई। अभी तो मेरे लिए खाने को भी मुझे कष्ट करना पड़ेगा। मेरे छोटे-छोटे बच्चे भी हैं। उनको भी कष्ट से बड़ा करना पड़ेगा। आप दरवाजा काट देंगे तो दूसरा दरवाजा कहां से आएगा? आप एक काम कीजिए। इसी के हाथ पैर काट दीजिए और ले जाइए शशान में जलाने के लिए। तो जैसे ही शिष्य ने यह बात सुनी कि वह फड़ाक करके खड़ा हो गया और कहा कि अरे तुमको शर्म नहीं आती यह कहते हुए कि मेरे हाथ पैर काट दे रही हो दरवाजे से ज्यादा मेरी मेरी कीमत से मुझसे ज्यादा तुमको दरवाजे की कीमत है। ऐसा जैसे ही उसने कहा फट करके उसके मन में वैराग्य प्रकट हुआ और गुरु के साथ में चला गया। तो यहां पे शरद महाराज कहते हैं जब प्रश्न यह होता है कि भ्रम होने का कारण क्या है? कब से यह भ्रम हमारे ऊपर में आकर आकर के उपस्थित हुआ। क्यों हुआ उपस्थित? तो शरद महाराज कहते हैं जब तक हम भ्रम में फंसे हुए हैं तब तक हमारे पास में यह कहने का, यह सोचने का या तो फिर यह चिंतन करने का कोई उपाय नहीं है कि मैं भ्रम में पड़ा हूं। मुझे यह समझ में भी नहीं आ रहा। बहुत बार जब तक गुरु की कृपा ना हो जाए। जब तक आप कोई सत ग्रंथ का पाठ ना कर ले। जब तक कहां से ईश्वर की कृपा से कोई महापुरुष आकर के आपको यह ज्ञान ना करवा दे कि हां आप भ्रम में पड़े हैं तब तक आपको यह समझ में ही नहीं आएगा कि मैं भ्रम में पड़ा हूं और जब तक आपको यह समझ में नहीं आता है यही जन्म मृत्यु जरा व्याधि इसी के चक्र में हम घूमते ही जाएंगे घूमते ही जाएंगे। स्वामी जी कहते हैं एक प्रवचन में कि मैं जब छोटा था तो मेरे पास में एक खिलौना था। खिलौना किस तरह का कि एक चक्र है वो चक्र ऐसा गोल गोल गोल घुल के घूमता है और चक्र के भीतर में एक चूहे को रख दिया है। तो सिलेंडर की तरह अभी यह चूहा जितना भी दौड़ता जाएगा तो यह चक्र भी साथ-साथ में सिलेंडर भी गोल-गोल घूमता जाएगा। चूहा यह सोचता है कि मैं इस जेल में फंसा हुआ हूं। तो मैं जितना फास्ट दौडूंगा उतना ही हो सकता है। संभावना है इस जेल में से मैं निकल जाऊं। किंतु बेचारा चूहा जितनी स्पीड से दौड़ता है, उतनी ही स्पीड से वह चक्र घूमता रहता है। अभी आज तो वो उसको माने दौड़ने का कोई लाभ नहीं है। चक्र से छूट नहीं पाएगा। इसका यदि आधुनिक एक एनालॉजी देना है तो जिम्नेशियम होता है या तो फिर कहीं-कहीं पर आप देखेंगे वह ट्रेड मिल होती है। तो ये ट्रेड मिल का क्या अर्थ है? आपको जोगिंग प्रैक्टिस करवाने के लिए उसके ऊपर में दौड़ना है। वैसे तो आप अपने फर्श के ऊपर में अपने कमरे में दौड़ेंगे तो एक ही सेकंड में यहां से वहां पहुंच जाएंगे। तो एक दीवार से दूसरी दीवार की ओर तो आपको जोगिंग तो ज्यादा होगा नहीं। जॉगिंग करने के लिए या तो फिर आपको रेस ट्रैक पे जाना पड़ेगा या इस तरह की जगह पे जाना पड़ेगा। आजकल तो बहुत सारे शहरों में आप देखेंगे कि सुबह को इस तरह से रास्ता ब्लॉक करके रखते हैं जोगिंग करने के लिए। मैं राजकोट में था तो राजकोट में भी देखा मैंने। यहां पे भी मैं देख रहा हूं कि यह सी बीच जो है वह रास्ता सुबह को ब्लॉक कर देते हैं व्हीकल के लिए। इस इस वजह से यह जो नागरिक है सिटीजन जो है वह वहां पर जोगिंग कर पाए सुबह को तो आप बाहर में तो जाकर जोगिंग कर सकते हैं किंतु घर में रह के जोगिंग करना है तो आपको वह ट्रेड मिल परचेस करना पड़ेगा। उसके ऊपर में खड़े रह के आप जोगिंग कीजिए। राजकोट में अपने आश्रम में इस तरह से एक ट्रेड मिल परचेस किया था। तो कोई-कोई साधु उसके ऊपर में सुबह को जोगिंग करते थे। तो वह ट्रेड मिल पर रह के आप जोगिंग कर रहे हैं। अभी आपको तो पता है कि मैं एक्सरसाइज करने के लिए यह सब कुछ कर रहा हूं। किंतु कोई अज्ञानी व्यक्ति है उसको उसके ऊपर में खड़ा रख के बोले कि तुम इस प्रजन में फंसे हो। इस प्रजन में से इस जेल में से तुम कभी नहीं निकल पाओगे। दौड़ना चाहते हो तो जितना फास्ट दौड़ना चाहे दौड़ लो। कभी तो इसमें से निकल जाओगे। तो वो आदमी जितना भी दौड़ेगा वो ट्रेडमल के ऊपर में से कभी नीचे नहीं आने वाला है। क्यों? क्योंकि वह जितना फास्ट दौड़ता है उतना ही वह नीचे वाला जो बेल्ट है वह इतना ही फास्ट घूमता है। बोलकर के वह एक ही जगह पर खड़ा रहेगा। उसमें से बाहर आएगा ही नहीं। तो यहां पे शरद महाराज कहते हैं जब तक हम इस माया के राज्य में है तब तक यह जानने का कोई उपाय ही नहीं है। तब तक यह जानने का कोई साधन ही नहीं है कि हां मैं भ्रम में पड़ा हूं। जब ऑफ कोर्स साधन है। साधन के बारे में बातें करेंगे। किंतु जनसाधारण के लिए जिनको यह सब कांसेप्ट क्लियर नहीं है उन लोगों के लिए सही में यह सब चीजों से निकलने का उपाय नहीं है। ठाकुर की वह फेमस कहानी है। कुछ शराबी लोग रात को एक नौका में बैठकर के उन्होंने नौका चलाने का प्रयास किया। वो जो यह ओर्स जो होते हैं ना हलेसा जिसको गुजराती में कहते हैं उसकी वजह उसकी मदद से वह नौका को चला रहे हैं चला रहे हैं पूरी रात भर नौका चलाई कि सुबह उठकर जब सुबह हुई सुबह सूरज का प्रकाश हुआ तब पता चला वे लोग किनारे पर किनारे पे ही है वहीं पर है जहां से उन्होंने प्रारंभ किया था तो वे लोग आपस में शराब पिया है तो शराब का नशा अभी उतर गया होगा तब उन्होंने देखा कि वो नौका जो है रस्सी से तो वही कहीं पर बंधी हुई है किनारे पे तो जब तक रस्सी नहीं तोड़ेंगे तब तक जाएंगे कैसे तो वैसे ही यह रस्सी क्या है यह अज्ञान है यह अज्ञान की वजह से जब तक हम अज्ञान के राज्य में रहते हैं तब तक कहना मुश्किल है कि हां मैं अज्ञानी हूं तब तक यह करना अर्थात कि अज्ञान से मुक्ति पाना मुश्किल है। तो यह प्रश्न कि भ्रम क्यों हुआ? कहां से प्रारंभ हुआ? कैसे हुआ? महाराज जी कहते हैं जब तक हम भ्रम में पड़े हैं तब तक उसका कोई डेफिनाइट उत्तर देना मुश्किल है। जब तो क्षण स्वप्न देखा जाए तत खण सत्य बोलिए प्रतीति होए। जब तक मैं स्वप्न देख रहा हूं तब तक यह स्वप्न मुझे सत्य ही बोलकर के प्रतीति होता है। जब मैं नींद से जग जाऊंगा और स्वप्न भंग हो जाएगा तब पता चलेगा कि अरे मैं तो यह सपना देख रहा था।

जाग्रत अवस्था की स्मृति स्वप्न अवस्था में प्रकट होकर यह संकेत देती हैं कि यह केवल स्वप्न है, एक भ्रम मात्र है

किंतु यह एक बात है कि कभी-कभी हमको सपने में भी एक अंदाज आ जाता है कि यह सत्य नहीं है। यह सब कुछ गड़बड़ गड़बड़ कुछ ना कुछ हो रहा है। दाल में कुछ काला है। जिस तरह से वह हम लोग कहते हैं। तो क्यों? क्योंकि क्या है कि हमारे मन में जागृत अवस्था की स्मृति कभी-कभी वह स्वप्न अवस्था में भी रहती है। उसकी वजह से हमको यह पता कभी-कभी एक अंदाजा आ जाता है कि यह स्वप्न है कि सत्य। देखिए अभी कुछ दिनों पहले की ही बात है। कल परसों की ही बात है। हम लोग बात कर रहे थे साधु लोग ही कुछ मिलकर के कि न्यूयॉर्क में एक फेमस स्वामी थे जो कि अभी उनका कुछ समय पहले कुछ सालों पहले देहांत हुआ। तो वो कौन थे? कौन थे? बोलकर के मैंने क्या किया? अभी यह प्रश्न का उत्तर नहीं मिल रहा है कि वह कौन फेमस स्वामी थे? अभी तो सर्वप्रियंद जी है। किंतु उनसे पहले एक फेमस स्वामी थे वहां पे न्यूयॉर्क वेदांत सोसाइटी में। तो कौन थे वो नाम किसी को याद नहीं आ रहा तो फिर मैंने क्या किया एआई को पूछा कि न्यूयॉर्क वेदांत सोसाइटी में एक फेमस स्वामी थे जिनका कि देहांत कुछ चारप साल पहले हुआ है तो उनका नाम बताओ तो नाम एआई ने दिया स्वामी तथागतानंद तो मैंने कहा हां ये तथागतानंद जी यस यस उन्हीं के बारे में हमारी बात चल रही थी अभी नाम याद नहीं आ रहा था तो फिर एक साधु ने प्रश्न किया कि आप कैसे बता सकते हैं कि तथागतानंद नाम सही है कि नहीं। यह नाम हमको किसी को याद नहीं था। किंतु अब जैसे एआई ने कहा तो एआई तो बहुत बार हेलुसिनेट करता है तो गलत उत्तर भी देता है। कोई भी एआई चैट बोर्ड में आप जो उत्तर होता है नीचे में ही लिखा होता है कि इस उत्तर में गलती हो सकती है। आप कंफर्म करके देख लीजिए। तो आपने आपको जो उत्तर मिला कि स्वामी तथागतानंद ही वहां पर न्यूयॉर्क वेदांत सोसाइटी में थे जिनका कि कुछ सालों पहले मृत्यु हुआ। इस इस उत्तर पर आप विश्वास कैसे करेंगे? तो मैंने उसको उत्तर दिया कि देखिए वो मेरे से जूनियर है। तो मैंने कहा देखो तुम्हारा गांव का जो नाम है मान लो कि किसी वजह से तुम भूल गए। अर्थात कि जिस गांव में तुम्हारा घर था बहुत लंबा तुमने जर्नी किया तो हो सकता है कि तुम उस अपने खुद के घर जिस गांव में है उसका नाम भूल गए हो। अभी मान लो कि तुम किसी को पूछ रहे हो किसी को प्रश्न कर रहे हो। अच्छा मेरा घर जो है जिस गांव में उसका नाम मैं भूल गया। मैं बहुत साल बाहर था तो नाम बताओ तो तो जैसे ही उसने यह नाम बता दिया फट करके तुम्हारे मन में क्लियर हो जाएगा कि हां हां यही नाम था। यही नाम मेरे घर का है। अभी मान लो कि तुमको गलत उत्तर मिला। मान लो कि तुम्हारा गांव है विशाखापट्टनम में या माने तुम्हारा घर था विशाखापट्टनम में और तुमको उत्तर यह मिला कि कोलकाता में तुम्हारा घर था तो तुम क्या इस बात पर विश्वास कर लोगे? क्यों नहीं करोगे? क्यों? क्योंकि भले ही चाहे तुमको तुम्हारे घर का जो जिस शहर में था वह नाम तुम भूल गए हो किंतु फिर भी जो तुम्हारे सबकॉन्शियस लेवल पर जो संस्कार है वो इतने दृढ़ रूप से बने हुए हैं कि यदि कोई कोलकाता का नाम देगा तो तुम इमीडिएटली रिजेक्ट कर दोगे कि नहीं कोलकाता तो नहीं ही हो सकता और कोई कुछ हो सकता है कोलकाता में तो मेरा घर नहीं था यह मैं पक्के पाए कह सकता हूं उसके बाद में यदि कोई तुमको कहेगा कि अच्छा तुम्हारा घर तो विशाखापटनम है तो तुम इमीडिएटली स्वीकार कर लोगे। क्यों? क्योंकि वो संस्कार तो पड़े ही हुए हैं सबकॉन्शियस लेवल पे। बस तुम उसको मोमेंटरीली भूल गए हो। तो जैसे ही तुमको सही बात पता चली वैसे ही तुमने उसको स्वीकार कर लिया। तो यहां पर भी देखिए कि एग्जजेक्टली वही बात शरद महाराज कहते हैं कि जब हम स्वप्न देख रहे होते हैं तब भी हमको कभी-कभी यह बात लगता है कि अरे यहां पर कुछ ना कुछ तो गड़बड़ है। यह जो मैं कुछ देख रहा हूं वह सही नहीं हो सकता। क्यों? क्योंकि जागृत अवस्था की जो स्मृति है, जो सबकॉन्शियस लेवल पर जो संस्कार पड़े हैं, वह संस्कार हमको दृढ़ रूप से कहते हैं कि स्वप्न में मैं भले ही चाहे सुपरमैन बनकर के उड़ रहा हूं, महावीर बनकर के मैं समुंदर छलांग लगा रहा हूं या तो फिर मैं राम बनकर के यह रावण का वध कर रहा हूं। किंतु यह जो जागृत अवस्था के जो यह संस्कार है वह मुझे बताते हैं कि ना ही मैं कभी सुपरमैन की तरह उड़ा हूं ना ही मैंने कभी महावीर की तरह यह समुंदर को छलांग लगा के पार किया है ना ही मैंने राम बनकर के कभी रावण का वध किया है। यह जो मैं देख रहा हूं मेरे संस्कार के साथ में मैच नहीं हो रहा। कुछ ना कुछ तो गड़बड़ है। तो वैसे ही यहां पर शरद महाराज कहते हैं कि इस जागृत अवस्था में वैसे तो हम भ्रम में पड़े हैं। किंतु यह जो तुरीय अवस्था है जागृत अवस्था से भी ऊपर स्वप्न जागृत सुशुप्ति तो ये तीन अवस्थाओं से परे जो तुरीय अवस्था है जिसमें कि हम अपने ब्रह्म ज्ञान में स्थित होते हैं। उसका सबकॉन्शियस लेवल पर वो तो अवेलेबल है ही है। अर्थात कि हमारे भीतर में ब्रह्मन तो ऑलरेडी है ही है। मेरा सही स्वरूप ही तो ब्रह्मन है। तो बोलकर के जो अपने वह जो वह वाले संस्कार है ब्रह्म संस्कार ऑफ कोर्स यह कहना कि ब्रह्म संस्कार छोड़ता है वह तो एकदम कंट्राडिक्शन इन टर्म हो गया। संस्कार के परे जो है वह ब्राह्मण है। तो एनीवे अद्वैत वेदांत के बारे में जब बात करने को जाएंगे तो इस तरह से लैंग्वेज अपनी गोलगोल घूम ही जाएगी। क्या करें? तो जो भी है वह ब्राह्मण है मेरा सही स्वरूप वह स्मृति वह एक कोने में तो जागृत है बोल के कभी-कभी मुझे लगता है कि अरे यह मेरा जो जीवन है उसमें मैं यह परिवार है यह रिस्पांसिबिलिटीज है यह भविष्य की चिंता है भूतकाल का यह जो एक तरह का रिग्रेट जो है प्रियजनों का यह बिछड़ने का जो शोक जो है मेरी एक्सपेक्टेशन जिस तरह से थी मेरी मेरी करियर के प्रति जीवन के प्रति वह फुलफिल नहीं हो रही है तो उसका एक नाराजगी भी है पूरे जगत के साथ में तो यह पूरा जो कॉम्प्लेक्स है मेरे साथ में मेरे मन के ऊपर में मेरे सर के ऊपर में बैठा हुआ मुझे लगता है कि मेरा जो सही स्वरूप है इन सबके परे है। यदि इन सबके परे नहीं होता तो फिर मैं क्यों इस माने एक चूहे की तरह जैसे स्वामी जी का वो खिलौना था वो चूहे की तरह मैं एक सिलेंडर में घूमता ही रहता हूं दौड़ता ही रहता हूं या तो मैं वो ट्रेड मिल के ऊपर में दौड़ता ही रहूंगा दौड़ता ही रहूंगा पता चला कि आखिर में तो मैं वहीं पर खड़ा था जहां से मैंने प्रारंभ किया वह शराबी नौका में बैठकर के जितना ही उसको चलाना चाहे पूरी रात चाहे जितना ही परिश्रम कर ले। सुबह को उठकर के पता चला वहीं पर पड़े थे वो वो नदी के किनारे जहां से प्रारंभ किया था वहीं पर वो अभी भी पड़े हैं। तो फिर मैं यह जो जीवन है जन्म मृत्यु जरा व्याधि जन्म मृत्यु जरा व्याधि का चक्र आज मैंने अच्छे से वो नौकरी करने का प्रयास किया। कहीं पर कुछ प्रॉब्लम हो गया। किसी के साथ में कुछ झगड़ा हो गया। वो टेंशन लेकर मैं घर आता हूं। घर में झगड़ा हुआ। नौकरी पर जाता हूं। प्रतिदिन का यह जो एक चक्र है, मेरा संसार यदि अच्छा भी रहेगा, सुख पूर्व भी मैं यदि जी रहा हूं, किंतु यह सांसारिक सुख हमारे मन को एक दिन तो आएगा समय कि मेरे मन को तृप्ति नहीं दे रहा है। इन सबके परे भी कुछ ना कुछ होना चाहिए। यदि इन सब के परे कुछ नहीं है, वही बस एक चक्र में मुझे घूमते रहना है तो इस जीवन का तात्पर्य क्या है? तो यहां पर शरद महाराज कहते हैं स्वप्न देखी बार काले कखनो कनो कोनो कोनो व्यक्ति रामी स्वप्न देखी ते छी ए रूप धारणा ताकीते देखा जाए स्वप्न देखने के समय भी किसी किसी व्यक्ति को मैं स्वप्न देख रहा हूं यह धारणा हो रही है ऐसा देखा जाता है शेखाने जागृत अवस्थार स्मृति होते तहा देर मने बाबेर उदय होया था के वहां पे भी जागृत जागृत अवस्था की स्मृति से ही उस तरह के भाव का उदय होता है। जागृत अवस्था में जगत प्रत्यक्ष करने के समय में किसी किसी को अद्वय ब्रह्म वस्तु की स्मृति इसी तरह से होती देखी जाती है। एक तो है कि जब तक मैं स्वप्न में माया में या भ्रम में फंसा हुआ हूं तब तक मुझे समझ में ही नहीं आ रहा कि मैं भ्रम में फंसा हुआ हूं। ये येन केन प्रकारारेण जैसे कहते हैं मैं पैसा कमाने का इंद्रिय सुख बढ़ाने का प्रयास करता हूं। ये ये जो कहते हैं कि ऋणम कृत्वा घृतम पिवत वो चारवाक लोगों का है। ऋणम कृत्वा घृतम पिवत अर्थात कि ऋण करके भी मुझे यह घी खाना है। यदि मुझे यह जो आजकल होता है ना कि वो मंथली इंस्टॉलमेंट पे लोग परचेस करते हैं। तो क्या है कि यह जीजीविषा जो है यह भोग्य वस्तुओं की यह मटेरियलिज्म जो है वह इतना स्ट्रांग हो जाता है हम लोगों के मन में कि बस यह जितनी भी मटेरियल वस्तुओं का कलेक्शन मैं करता रहूं उतना ही मेरा जीवन अच्छा जाएगा। तो वह तो एक बात है कि जब तक भ्रम में पड़े हैं तो यही सब ऋणम कृतवा घृतम पब साम दाम दंड भेद कैसे भी उपाय करके पैसा अर्जन करना है इंद्रियों के सुख जो है कैसे भी करके बढ़ाने हैं येन केन प्रकारारेण जीवन को हमको अच्छा करना है भ्रम में पड़े होने से ऐसा ही होता है किंतु जैसे-जैसे कभी ईश्वर की कृपा से महापुरुष का संग मिल जाए गुरु का आशीर्वाद हो जाए या तो फिर यह जो इनेट जो हमारा ब्रह्म स्वरूप है एकाएक जागृत हो जाए तो फ्लैशेस ऑफ रियलाइजेशन स्वामी जी का शब्द है जैसे कि एक झपकार की तरह फ्लैश की तरह सडनली कभी-कभी पता चलेगा कि अरे यह मैं क्या कर रहा हूं यह मैं क्या कर रहा हूं मैं इस जन्म मृत्यु जरा व्याधि यह सुख भोग के पीछे दौड़ रहा हूं इसके परे भी कुछ होना चाहिए तो इतना जो है शरद महाराज बताते हैं उसके उसके बाद में प्रश्न होता

भ्रम या अज्ञान से मुक्त होना निश्चित संभव है

है तब उपाय तो अभी उपाय क्या है? चलो फ्लेशेस ऑफ रियलाइजेशन हो गए या तो फिर महापुरुष की कृपा से इतना तो पता चल गया कि यह जो भ्रम में पड़ा हुआ जीवन इंद्रियों के सुख को चरितार्थ करने वाला जीवन जो है वो सर्वोच्च नहीं है। इसके भी परे कुछ है। यह पता तो चल गया। तो फिर उपाय क्या है? तो उत्तर है उपाय उस अज्ञान को दूर करो। उपाय ओ अज्ञान दूर करो उपाय है उस अज्ञान को दूर करो वही भ्रम बा अज्ञान जे दूर करा जाए ताहा तो देर निश्चित बोलते पारी यह भ्रम या अज्ञान हम दूर कर सकते हैं यह बात मैं आपको निश्चित रूप से बता सकता हूं पूर्व ऋषि गण उहा दूर करते समर्थ होया छिले एवं केमोन कोरिया दूर करते होबे बोलिया गया छे पहले पहले के ऋषि गण उसको दूर करने में समर्थ थे। समर्थ हुए थे और किस तरह से दूर करना चाहिए वह बोल के गया है। गए थे गए हैं। अज्ञान में पड़े हैं तो अज्ञान का उपाय क्या है? तो सिंपल उपाय है कि उसको दूर करना। तो यह तो एक बात है। दूसरा है कि क्या दूर हो सकता है कि नहीं? अब जैसे आजकल कैंसर हो जाता है या तो फिर इस तरह का कोई लाइफस्टाइल डिजीज लग जाता है तो फिर अभी हमको पता है कि अभी इसका कोई उपाय ही नहीं है। अभी यह तो जानलेवा बीमारी है। टर्मिनल डिसीज है। जान लेकर के ही छोड़ेगा। कभी-कभी डॉक्टर कहते हैं कि आपके जो पेशेंट है उसको हॉस्पिटल में रखने से कोई लाभ नहीं। अननेसेसरी आप पैसा खर्च करेंगे। अननेसेसरी आपको पेशेंट को हॉस्पिटल में ख कष्ट हो रहा है उसको घर ले जाइए शांति से उसका देह त्याग होने दीजिए। पहले ऐसा बोलते थे आजकल कोई बोलेगा नहीं। वो इवन न्यूज़ पेपर में तो कभी-कभी आता है कि इवन डेड बॉडी को भी रखे रहते हैं वो उसमें फिर वो हॉस्पिटल में और चार्ज बढ़ा देते हैं। आज उसका मृत्यु हुआ है तीन दिन के बाद में और वो बिल बन बनाते हैं छ दिन का और तीन दिन तो डेड बॉडी को रखे रहे हैं। तो वो खैर वो मेडिकल माल प्रैक्टिस छोड़ दे। तो यहां पर प्रश्न होगा कि कैंसर हो गया है तो यह तो टर्मिनल डिजीज है। जान तो लेकर के ही रहेगा। एडवांस हो गया है। प्राइमरी स्टेज में पता चल जाता तो कोई सॉल्यूशन आ जाता। अभी तो कैंसर काफी एडवांस हो गया है। लंग्स में फैल गया है। लंग्स रिप्लेस नहीं कर सकते। तो अभी तो यह जान ले ही छोड़ेगा। चलो काशी कहीं चले जाते हैं। वृंदावन चले जाते हैं। वहां पर भगवान का नाम ले मृत्यु प्राप्त करें। तो यह क्या टर्मिनल डिसीज है? भ्रम उसकी तरह कि एक बार लग गया तो फिर अभी कोई सॉल्यूशन ही नहीं है। तो नहीं भ्रम से मुक्ति हो सकती है। निश्चित में बता सकता हूं। इस तरह से शरद महाराज कहते हैं और किस तरह से मुक्ति प्राप्त हो? तो वही पूर्व ऋषि गण हमको बता के गए हैं कि इस इस उपाय से भ्रम से आप मुक्त हो सकते हैं। वो गिरीश घोष की वो फेमस कहानी कि ठाकुर कहते हैं कि एक कटोरी में लहसुन जब रखा है और फिर आप कटोरी को चाहे जितना भी धो दो, पानी से धोओ, साबुन से धोओ, 10 तरह के डिटर्जेंट इस्तेमाल कर दो। वह लहसुन की गंध कटोरी में से जाएगी नहीं। तो गिरीश घोष बेचारा बड़ा ही ये सुनकर के थोड़ा डिप्रेस हो जाता है। फिर आखिर में वह जब ठाकुर को ठाकुर थोड़े अकेले होते हैं उस समय जाकर के ठाकुर को पूछता है कि महाशय रशुनेर गंधो जावे ना कि महाशय यह लहसुन की गंध है क्या जाएगी नहीं कि मैंने यह जितने भी पाप किए हैं पाप क्या अभी हमेशा मेरे सर पर बैठे ही रहेंगे तब ठाकुर आश्वासन देकर क्या कहते हैं आगुने पोडाले जावे अर्थात कि अग्नि में कटोरी को फेंक देंगे तो अग्नि में वह कटोरी तपेगी वो गर्म होगी तो गर्मी जो है हीट जो है एनर्जी जो है वह कटोरी को फिर से शुद्ध कर देगी लहसुन की गंध चली जाएगी तो ठाकुर गिरीश जैसे गिरीश को यह उपाय दिखाते हैं अर्थात कि भले ही चाहे पाप कर्म किया हो भले ही चाहे दुष्कृत किया हो भले ही चाहे हजार जन्म के दुसकार हमारे सर पर सवार हो यदि हम तपस्या करें तो हजार तरह के संस्कार से मुक्ति प्राप्त कर सकते हैं। लहसुन की गंध कटोरी में से यह देह रूपी कटोरी है। उसमें से यह संस्कार रूपी लहसुन की गंध को हम अदृश्य कर सकते हैं। बस वही है कि साधन भजन तपस रूपी अग्नि में उसको डालकर के गर्म करना होगा। ऐसा करने से ही वह चली जाएगी। तो यहां पे शरद महाराज भरोसा देकर के कहते हैं कि हां भ्रम दूर कर सकते हैं। ए तोमादे निश्चित बोलते पारी देखिए ये निश्चित शब्द शरद महाराज ने यूज किया है। मैं आपको निश्चित बता सकता हूं कि भ्रम दूर हो सकता है। और सिर्फ इतना ही नहीं पूर्व पूर्व ऋषि गण है। उन्होंने अपने जीवन से यह भ्रम दूर किया है और हमको रास्ता दिखा के गए हैं। यह सब हवाहवा में नहीं है। एंपिरिकल प्रैक्टिकल साइंस है।

अल्पसंख्यक ऋषि कहते हैं कि यह जगत भ्रम है। प्रश्न यह है — क्या वे सही हैं, या वे बहुसंख्यक लोग सही हैं जो इस जगत को सत्य मानते हैं?

इसके बाद में प्रश्न होता है अच्छा किंतु वही उपाय जानी बार पूर्वे आरो दुई एक्ट प्रश्नो कोते इच्छा होते छे प्रश्न है कि अच्छा अभी आप भ्रम दूर करने का जो उपाय बताएंगे तो उस उपाय को सुनने से पहले मुझे और कुछ प्रश्न करने की इच्छा हो रही है। आमरा एतो लोके जहां देखते छ प्रत्यक्ष करते छहा के तुम भ्रम बोलते छो और अल्पसंख ऋषिरा जहां बा जे रूपे जोग के प्रत्यक्ष करिया छहा ही शत बोलते छो जो हम इतने सारे लोग देख रहे हैं उसको तुम भ्रम के रूप में प्रदर्शित कर रहे हो और जो कुछ अल्पसंख्यक ऋषि थे उन्होंने जो देखा उसको तुम सत्य सत्य के रूप में प्रचार कर रहे हो एटा की संभव होते पारे ना जे तारा जहां प्रत्यक्ष करिया छहाई भूल क्या यह संभव नहीं है कि ऋषि मुनियों ने जो प्रत्यक्ष किया है सत्य वही गलत है और इस जगत में जो करोड़ों-करोड़ों लोग देख रहे हैं कि यह पेड़ पेड़ ही है। पौधा पौधा ही है। पानी पानी ही है। यह जमीन जमीन ही है। यह माइक माइक ही है। वस्त्र वस्त्र ही है। ना ही यह वस्त्र ब्राह्मण है। ना ही यह माइक ब्राह्मण है। ना ही यह पेड़ ब्राह्मण है। ना ही यह बिल्ली ब्राह्मण है। ना ही यह समुंदर ब्राह्मण है। जो यह करोड़ों-करोड़ों लोग पृथ्वी पे जिसको देख रहे हैं वो सब गलत। और यह जो मुट्ठी भर ऋषि ने कह के गए कि ना ही यह माइक माइक है माइक है ब्रह्मन वस्त्र है ब्राह्मण समुंदर है ब्रह्मन पृथ्वी है ब्राह्मण जगत में जो कुछ देख रहे हो ब्राह्मण का ही विविध तरंगे हैं ब्रह्म समुद्र में विविध लहरियां है नेम एंड फॉर्म नाम और रूप का ही पूरा प्रपंच है इस जगत में जो यह अल्पसंख्यक ऋषि गण कहते हैं क्या वही सत्य क्यों हो सकता है कि उनको भी तो भ्रम हुआ होगा ठाकुर को जाकर के स्वामी जी बार-बार कहते हैं कि आपका यह जो दर्शन हो रहा है वह सब हेलुसिनेशन है। ये एग्जजेक्टली वही वर्ड जो स्वामी जी कहते हैं ना हेलुसिनेशन तो वही वर्ड आजकल जो एआई के बारे में यूज होता है। एआई जब गलत उत्तर देता है या तो कुछ अपने पॉकेट में से निकाल के गलत चीजें कहता है तो वो लोग कहते हैं एआई इज हेलुसिनेटिंग। या हेलुसिनेट कर रहा है। वो माने उसको भ्रम दर्शन हो रहे हैं। तो यहां पर स्वामी जी ठाकुर को कहते हैं कि आपकी यह जो दर्शन वगैरह है सब हेलुसिनेशन है। आपके मन का भ्रम है। तो ठाकुर बेचारे बड़े दुखित होकर के मां काली को जाकर के कहते हैं कि नरेंद्र ऐसा कह रहा है कि तुमने मुझे जो दिखाया वह सब गलत गलत है। तो फिर मां काली ठाकुर को सांत्वना देकर कहती है वह जानता नहीं है इसलिए यह सब कहता है। जिस दिन जान लेगा तब वो वो भी सब कुछ स्वीकार कर लेगा। तो देखिए कि हम लोग ऐसा कहे कि उपनिषद में जो लिखा है कि वही सत्य और करोड़ों-करोड़ों लोग जो है वो जो देख रहे हैं वो गलत तो क्या ऐसा नहीं हो सकता? ऋषियों को भी एक्चुअली ऋषियों को ही भ्रम हुआ है। एक्चुअली ऋषि मुनि ही हेलुसिनेट कर रहे हैं। क्या ऐसा संभव नहीं है क्या? तो यह प्रश्न हो सकता है उत्तर है बहुसंख्यक व्यक्ति जरा विश्वास करबे ताहाई जे सर्वदा शतो होइबे ऐन किछु नियम नहीं बहुसंख्यक व्यक्ति जिस पे विश्वास करते हैं वही सिर्फ सत्य हो ऐसा कुछ ठीक नहीं है ऐसा नियम नहीं है ऋषि दग प्रत्यक्ष शत बोलते छ कारण ओ प्रत्यक्ष शत सहाय तारा सर्वबद्ध दुख खर होते मुक्त होइया सर्व प्रकार भय शून्य ओ चिर शांति अधिकारी होइया छिले ऋषियों के प्रत्यक्ष को या तो फिर ऋषियों के दर्शन को सत्य कहता हूं कारण के उस दर्शन के सहाय से ही सत्य प्रत्यक्ष सहाय से ही उन्होंने सर्वविद प्रकार के दुखों के हाथ से मुक्त होकर के सर्व प्रकार के भय से भय से शून्य होकर के चीर शांति शांति के अधिकारी हुए थे। अभी देखिए यह जो पहला सेंटेंस है कि जो बहु बहुत सारे लोग जो देखते हैं वह गलत और जो अल्पसंख्यक देखते हैं वह सही ऐसा आप कैसे कह सकते हैं? मेजॉरिटी का रूल तो सब जगह पर लगना चाहिए। बहुमत के अनुसार यदि सरकार बनती है तो बहुमत के अनुसार यह भी ठीक होना चाहिए कि हां जो ज्यादा से ज्यादा लोग जो देखते हैं मेजॉरिटी में जो लोग हैं वह जो देखते हैं वही सत्य है। किंतु देखिए कि यहां पे हम सबको पता अब अब जैसे एक छोटा सा ही उदाहरण लेते हैं। एक क्लास रूम है। क्लास रूम में 50 स्टूडेंट बैठे हुए हैं और एक टीचर है। अभी 50 स्टूडेंट के मन में यह है कि ये टीचर कब अपना क्लास खत्म करें? कब रिसर्च स्टार्ट हो? हम लोग दौड़े, खेले, झगड़ा करें, ममारी करें, खाना खाए, नाश्ता करें, गप लगाए। यह सब हमको करना है। नहीं कि टीचर का क्लास अटेंड करना है। तो एक क्लास में 50 लड़के ऐसा करना चाहता है, चाहते हैं। किंतु टीचर का वो फोकस है कि वो कैसे भी करके अपना सिलेबस समाप्त करें। जिससे कि वो सिलेबस समाप्त करेगा तो यह लड़के लोगों का भविष्य अच्छा होगा। अच्छे मार्क से पास होंगे। अच्छी जॉब मिलेगी। अच्छा करियर बनेगा। तो यह टीचर का यह फोकस है कि मुझे अपना सिलेबस कंप्लीट करना है। मुझे अच्छे से अच्छे अपने स्टूडेंट को सिखाना है। एक टीचर ऐसा सोचता है जबकि ये 50 बच्चे उल्टा सोचते हैं। तो यदि आप मेजॉरिटी का नियम यहां पर लगाएंगे तो पता चलेगा कि ये 50 स्टूडेंट इकट्ठा होकर के जो ठीक करेंगे वही होगा क्लास रूम में। वे लोग कहेंगे कि ये दिन में जो छह सात क्लास है और एक ही रिसेस है उसको उल्टा कर दो। सब क्लास रिसेस के रूप में परिणत कर दो। एक क्लास सिर्फ स्टडी के लिए रखो। तो यदि मेजॉरिटी वाला रूल लाएंगे तो सब कुछ गड़बड़ हो जाएगा। क्यों? क्योंकि मनुष्य का जो मन है सहज रूप से तमस और रजस की ओर आकर्षित होता है। एक सेल्फ डिसिप्लिन में रह के एक सिस्टमेटिक रह के कोई भी चीज सीखना उसके लिए मुश्किल होता है। तो वही स्टूडेंट बहुत कम स्टूडेंट आपको इस तरह से दिखेंगे कि उनको डांटने की जरूरत नहीं पड़ती है। उनको टोकने की जरूरत नहीं पड़ती है। वह अपने से अपना जो होमवर्क है वह कर लेते हैं। सामने से टीचर के पास जाकर के प्रश्न करते हैं कि सर यह प्रश्न मुझे यह जो फार्मूला है यह जो मैथमेटिक्स का यह जो ये प्रॉब्लम है उसको मैं सॉल्व नहीं कर पा रहा। तो आप मुझे थोड़ा सा समझाइए। अल्प ही स्टूडेंट होंगे कि टीचर आज सेकंड चैप्टर पढ़ा रहे हैं तो वह एडवांस में जाकर के थर्ड और फोर्थ पढ़ लेता है जिससे कि उसका जो नॉलेज होराइजन है वो ज्यादा से ज्यादा एक्सपैंड होता है। अल्प ही स्टूडेंट होंगे जो कि अपना सेल्फ स्टडी करके और ज्यादा से ज्यादा पढ़ना चाहेंगे। मैं जब 12th में था तो वहां 11th में था। 11th का वेकेशन प्रारंभ हो गया था और नेक्स्ट ईयर तो 12th है। तो वेकेशन है डेढ़ दो महीने का जो वेकेशन होता है तो मेरा एक मित्र था। वो काफी अच्छा वो स्टूडेंट था। माने गुजरात में वो बोर्ड की एग्जाम जब होती थी तो टॉप 10 में उसका नंबर आता था। तो वो मुझे एक दिन आकर के कह रहा है कि चलो एक काम करते हैं। हम लोग वेकेशन बैच ज्वाइन कर लेते हैं। वेकेशन में ही यह पढ़ना खास करके मैथमेटिक्स 12th का मैथमेटिक्स बड़ा डिफिकल्ट सब्जेक्ट है। तो वेकेशन में हम वेकेशन बैच स्टार्ट करते हैं मैथमेटिक्स का। तो थोड़ा सा एडवांस मैथमेटिक्स सीख लेंगे। तो जब हमारा ये जो स्कूल ईयर प्रारंभ होगा तो हम 2 महीना एडवांस जाएंगे। तो मैंने कहा भाई अभी ये तो वेकेशन है थोड़ा सा आनंद करने दो। थोड़ा सा मैं इधर-उधर किसी के घर जाऊंगा। अपने रिलेटिव्स के वहां पे अपने गांव जाऊंगा। किसी के साथ गप लगाऊंगा। थोड़ा घूमने को जाएंगे। तुम अभी यार वेकेशन में से ही क्लास स्टार्ट करवा रहे हो। अभी देखो ना नेक्स्ट ईयर तो 12th है। पूरा साल हमको वैसे ही मेहनत करनी है। वैसे ही पसीना निकाल देगा। वेकेशन तो थोड़ा सा एंजॉय करने दो। तो वो कहता है नहीं नहीं तुम चलो मेरे साथ। मैं अकेले नहीं जाना चाहता। मैंने एक टीचर को खोज लिया है। तो वो टीचर बहुत अच्छे हैं। किंतु मैं अकेला हूं वेकेशन बेच और कोई करने वाला नहीं है। तो यदि तुम भी साथ में रहोगे तो हम दोनों जाएंगे। तो मैंने कहा चलो अभी तुम खींच करके ले जाते हो तो चलो। तो हमने वो दो महीना वेकेशन बैच किया था मैथमेटिक्स का। टीचर बहुत अच्छे थे। और एक्चुअली क्या है? ये टीचर के क्लासेस वैसे तो फुल जाते हैं। किंतु वो फुल कब होंगे? वो जब वो स्कूल ईयर स्टार्ट होगा तब से तो वेकेशन में तो हम दो ही थे। तो फायदा यह हुआ कि बेस्ट टीचर हमको मिले हैं और फोकस करने के लिए सिर्फ दो स्टूडेंट है। उसमें से भी जो सेकंड स्टूडेंट है वो काफी हेल्पफुल है। मेरा मित्र मैं यदि अटक जाता हूं तो टीचर मुझे हेल्प जितनी हेल्प करते हैं उससे उतनी ही हेल्प ये मेरा फ्रेंड मुझे करता है। बोल कर के वेकेशन में 2 महीने में मैंने जो मैथमेटिक्स सीख लिया था मुझे नहीं लगता कि पूरे साल भर में मैंने इतना अच्छा सीखा होगा। तो देखिए कि अल्पसंख्यक स्टूडेंट ही होते हैं जो कि कुछ एडवांस करना चाहते हैं। सामने से विद्या अर्जन करना चाहते हैं। ज्यादातर स्टूडेंट के मन में यही होता है कि कब स्कूल से छुट्टी प्राप्त हो। कब दौड़े-दौड़े घर जाए, कब दौड़े-दौड़े मित्रों के पास में जाए, कब दौड़े-दौड़े खेलना शुरू करें वगैरह-वगैरह। तो यदि मेजॉरिटी रूल्स से चलता तो स्कूल सब के सब स्कूल जो है वो खत्म हो जाती। सिर्फ इतना ही नहीं यह जो अपना देश जो चल रहा है सभी लोगों को नियम कानून में रहकर के कार्य करना है। वरना तो फिर जिसका लट्ठी उसका भैंस ये जो हिंदी कहावत है कि जिसके पास में लाठी है उसी की है भैंस। ऐसा यदि होगा तो जो लोग शक्तिशाली है जिन लोगों के पास में पॉलिटिकल पावर है वे लोग आम आदमी का अत्याचार करेंगे। आम आदमी का शोषण करेंगे। तो ऐसा तो नहीं होना चाहिए। आपके पास शक्ति है बोलकर के आप लोगों का शोषण करो। ऐसा तो बिल्कुल नहीं होना चाहिए। नियम कानून के अनुसार ही सब कुछ कार्य करना चाहिए। तो यह नियम कानून जो है वो कब वो एक्चुअली कोई भी रूल है वो क्या करता है? कमजोर की रक्षा करता है शक्तिशाली के सामने। जो कमजोर के राइट है उसकी रक्षा करता है। शक्तिशाली जो है जिसके पास पॉलिटिकल पावर है, मनी पावर है, मसल पावर है वह तो अपने राइट्स की रक्षा कर ही लेगा। वो तो अपना जो धन वैभव, सुख उपभोग है वह तो प्राप्त कर ही लेगा। जो कमजोर है उसके लिए यह कायदे कानून का कॉन्स्टिट्यूशन का गवर्नमेंट का रक्षण चाहिए। तो यहां पर भी जब उत्तर प्रश्न होता है कि जो अल्पसंख्यक है वह कहते हैं वही सही और यह जो बहुसंख्यक पृथ्वी की पपुलेशन है 700 करोड़ की एज ऑफ टुडे अराउंड 700 करोड़ तो यह 700 करोड़ लोगों में से मान लो कि 1015 लाख लोग हैं वे लोग ऐसा कहते हैं कि मेरा सही स्वरूप ब्राह्मण है और बाकी जो कुछ भी देख रहे हो वह सब कुछ ब्रह्मन ही है तो वह 1015 लाख लाख लोग सही और यह जो बाकी के 700 करोड़ लोग हैं वे लोग कह रहे हैं कि मैं मैं हूं तुम हो यह माइक माइक है वस्त्रवस्त्र है तो यह 700 करोड़ लोग गलत यह बात आपने कैसे कह दी तो शरद महाराज कहते हैं कि जो मेजॉरिटी कहते हैं वही हमेशा सत्य माइनॉरिटी जो कहते हैं वह हमेशा गलत ऐसा कुछ नहीं है। कोई भी देश का इतिहास देखिए, कोई भी समय का आप खोल करके देख लीजिए। इतिहास के पन्नों पर अल्पसंख्यक लीडर ही होते हैं जो कि बहुसंख्यक लोगों को नियंत्रित करते हैं, चालित करते हैं। अल्पसंख्यक लीडरशिप के अंडर में ही पूरे देश सक्सेसफुल हुए हैं। तो पहले तो इस सेंटेंस का हमने थोड़ा चर्चा किया। इसके बाद का जो सेंटेंस है लंबा है कि ऋषियों ने जो प्रत्यक्ष किया है उस प्रत्यक्ष करने की सहाय से उन्होंने सब तरह के दुखों से मुक्ति प्राप्त कर ली है वगैरह जो यह सेंटेंस है उसको अभी हम कल देखेंगे। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णारपणमस्तु ओम