prayer
ओम स्थापकायच धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपणी अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः
सर्व भूत में ईश्वर दर्शन का क्या अर्थ है
बीच-बीच में हम एक स्पेशल टॉपिक लेते हैं थोड़ा सा कॉम्प्लिकेटेड जब हम ठाकुर मां स्वामी जी की जो किताबें हैं जो कि हमारा प्राइमरी फोकस है उसको पढ़ते-पढ़ते कुछ रिकरिंग कांसेप्ट आते हैं। इस तरह के कांसेप्ट, इस तरह के आइडिया जो कि बार-बार रिपीट होते हैं और ये तीनों की जीवनी और संदेश में यह आते हैं। तब कभी-कभी मैं सोचता हूं कि इसी आईडिया को लेकर के उसको थोड़ा सा और एनालिटिकली एक्सप्लेन करके हम एक स्पेशल क्लास ले सकते हैं। जिससे होगा क्या यह बेनिफिट कि यह आईडिया जहां पे भी रिपीट होगा वहां वहां पे हमको यह जो एक स्पेशल डिस्कशन हमने किया है वो सब जगह पर हम उसको रेफर कर सकते हैं और बहुत ज्यादा फिर उस समय उसको एक्सप्लेन करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। तो वैसा ही एक आईडिया हमारे साहित्य में सतत रूप से रिपीट होता आ रहा है और उसको लेकर के हमारे मन में कभी-कभी कंफ्यूजन भी होता है और वही आईडिया जो कि लीला प्रसंग के द्वितीय भाग में प्रथम चैप्टर साधक ओ साधना उसमें जो हमारा पॉइंट था शरद महाराज कह रहे हैं कि ठाकुर की साधनाओं का विवरण प्रारंभ करने से पहले आइए भारत में साधना परंपरा साधन परंपरा के बारे में इन जनरल क्या कहा गया है? हमारे शास्त्रों में इसके बारे में क्या लिखा गया है? तो यह प्रारंभ करके फिर शरद महाराज सबसे पहला कांसेप्ट जो है हमारे सामने रखते हैं वह है सर्वम खलु इदम ब्रह्मन। इस जगत में जो कुछ भी है वह ब्राह्मण ही है। ब्रह्मन के अलावा इस जगत में और कुछ नहीं है। ऐसा कहने के बाद में ठाकुर की जो वह वाणी है कि सर्वभूत में ब्रह्म दर्शन या तो फिर ईश्वर दर्शन यह साधना का अंतिम लक्ष्य है या तो साधना की सर्वोच्च उपलब्धि है। तो यह सर्वोच्च उपलब्धि एक्चुअली क्या है? उसके बारे में क्या एक थ्योरेटिकल कांसेप्ट है वह थोड़ा सा आज हम देखते हैं। देखिए कि मैं अपने
रांची में आदिवासी/ग्रामीण विकास के मेरे दिनों की कहानी
खुद के अनुभव से सर्वप्रथम प्रारंभ करूंगा। यह जो रामकृष्ण मिशन का जो मोटो है आत्मनो मोक्षार्थम जगत हिताय च यह तो मैंने बाद में पढ़ा था। मैंने अपना जो जीवन प्रारंभ किया था स्टूडेंट लाइफ में जब मैं था और पहली पहली बार यह कॉन्शियसनेस प्रारंभ होती है हमारी छोटे होते हैं तो क्या होता है कि मम्मी पापा जो हमको सिखाते हैं या तो जिस तरह से गाइड करते हैं अपना जो एक स्कूल है यह जो एकेडमिक एनवायरमेंट है उसमें जो जो धारा है उसमें हम बहते जाते हैं। किंतु ऐसा होता है कि यह जब हम टीनएज होना शुरू हो जाते हैं। टीनएज इयर्स यानी कि यह 13 14 15 16 यह जो ऐज है अपना उसमें अपना खुद का एक इंडिपेंडेंट वर्ल्ड व्यू एक इंडिपेंडेंट आइडियाज ऑफ दिस वर्ल्ड यह हमारा डेवलप होना स्टार्ट होता है। तो मेरा जिस तरह से वह जो इंडिपेंडेंट आइडियाज डेवलप होना स्टार्ट हुआ उसमें सबसे एक इंपॉर्टेंट फैक्टर यह था कि एमैथी मैं जब अपनी स्कूल में जाता था तो फिर मैं देखता था कि वहां पर रास्ते के बगल में ही एक बड़ा ग्राउंड है। वहां पर बहुत सारे गरीब लोग झोपड़ी में रहते हैं। और यह सब डे लेबरर्स है और रूरल माइग्रेंट्स है। जब ये खेती का सीजन होता है तो गांव में चले जाएंगे। जब खेती का सीजन यानी कि बारिश का सीजन। बेसिकली यह जो गर्मी के दिन है यह जो ग्रीष्म ऋतु है उस समय ये लोग शहर में आकर के यह कंस्ट्रक्शन साइट है वगैरह पे काम करेंगे। उस समय तो मुझे यह सब आईडिया नहीं था। बाद में पता चला कि यह डायनेमि क्या है यह पॉवर्टी का? तो यह होमलेसनेस का। तो एनीवे उस समय तो मैं यह देखता था कि यह झोपड़ी में यह लोग रह रहे हैं और उनके जो छोटे बच्चे हैं उनके पास में ना ही पहनने को कपड़े हैं ना ही उनकी कोई संभाल रखता है। गंदे हैं। उनका चेहरा हाथ कोई साफ नहीं करता। उनके बाल रुक्ष हो गए हैं। ना ही उसमें कोई तेल डालता ना ही उनको कोई प्रेम करता ना ही उनको कोई कुछ सिखाता। तो ऐसे ही बच्चों को वहां पर मैदान में इधरउधर भटकते हुए देखकर के कभी-कभी रोते हैं तो रोते ही रहते हैं। जैसे कि उनको शांत रखने वाला कोई है ही नहीं। तो यह मैं जब स्कूल में आता था जाता था अपने क्लासेस में आता जाता था तो मैं यह सब देखता था। तो फिर यह 10थ का वेकेशन इस तरह से जब भी मेरे पास में कुछ समय मिला मैंने सोचा कि इनके लिए कुछ किया जाए। तो ऐसा करके मैं उस मैदान में उस झोपड़ पट्टी में जाना शुरू किया। प्रथम प्रथम जब गया तो उन लोगों ने तो पहले यही सोच लिया कि यह बच्चे को भगाने के लिए उनका अपहरण करने के लिए आया है। क्योंकि इस तरह का प्रपोजल कभी सुना नहीं था। मैंने कहा मेरे पास थोड़ा सा टाइम है। शाम को शाम को आकर के मैं उनको थोड़ा बहुत लिखना पढ़ना सिखाऊंगा। तो पहले तो उन्होंने कहा कि नहीं नहीं जरूरत नहीं है। आप चले जाइए यहां से। तो मैं समझ गया एक्चुअली न्यूज़पेपर पढ़ते हैं तो ये सब पढ़ते रहते हैं कि बच्चों को उठाने वाली गैंग होती है। तो मैंने मैंने सोचा कि अच्छा ठीक है उस दिन तो मैंने कहा मैं चला जाता हूं कल फिर से आऊंगा आपके साथ बात करूंगा ऐसा करके मुझे पता है यह जो लेबरर्स है वह तो शाम को देरी से आते हैं तो प्रतिदिन में जाने लगा उनके साथ में बात करने लगा तो उनको थोड़ा सा भरोसा बैठा कि हां यह लड़का बिल्कुल उन बच्चों को उठाने वाली गैंग का मेंबर नहीं है वो शायद जेनुइनली चाहता है कि बच्चों को सिखाए तो ठीक है मैं पहली पहली बार जब वहां पर जाता था ग्राउंड में यह बच्चों को इकट्ठा करके बैठा करके पढ़ाई लिखाई करने की शुरुआत किया। एक बहुत बड़ा सत्य मुझे समझ में आया। मुझे पहले यह बात पता ही नहीं थी कि इन बच्चों को किसी ने कल्चर नहीं किया है। इनको किसी ने किसी भी तरह का संस्कार शिक्षा नहीं दी है। इस हम लोग जो कि बचपन से ही यह बाल मंदिर है, प्री केजी है, केजी है, फर्स्ट स्टैंडर्ड है उसमें जाते हैं और हमारे घर में भी एक संस्कार होते हैं। तो हमको बिठा के कोई सिखाने का प्रयास करेगा तो हम बैठकर के सीख लेंगे। इन बच्चों का है बैठेंगे ही नहीं। जबरदस्ती बिठाने का प्रयास करेंगे तो आपस में झगड़ा करेंगे। एक इसको मारेगा, वो इसको मारेगा, वह उसके बाल खींचेगा, वह इसके साथ में झगड़ा करेगा। मुझे पहले दिन तो इतना तकलीफ हुआ। एक सेकंड उनका अटेंशन नहीं है। मैं जो सिखा रहा हूं उसके ऊपर में। मैं यह जो सब ड्रीम ले गया था कि बच्चों को बिठा करके मैं सिखाऊंगा। मुझे हृदय में से संतोष मिलेगा। ऐसा लगेगा कि मैंने कुछ किया है इस जगत में कंट्रीब्यूट किया है। किंतु वह तो सब हवा ही हो गया। उनको मतलब उनको ठीक रखते रखते फिर मुझे चिल्लाना पड़ा। समथिंग के आई कैन नेवर इमेजिन मायसेल्फ डूइंग कि बच्चों के सामने चिल्लाना। किंतु वहां पर और कोई ऑप्शन ही नहीं था। किंतु जो भी है देखिए वहां पर और दो-तीन बूढ़ी औरतें बैठी थी। दूर से देख रही थी। यंग लोग तो सब चले जाएंगे। वो लेबर कार्य वो कंस्ट्रक्शन कार्य में जो भी है वो वहां पे तो दो-तीन बूढ़ी औरतें बैठकर के देख रही थी तो उन्होंने देखा शायद उनका यह एनालिसिस होगा असेसमेंट होगा कि मैं जेनुइनली मेहनत करना चाहता हूं। तो एकद दिन तो ऐसा रहा कि मैं बच्चों को शांत ही नहीं कर पा रहा हूं। दूसरे तीसरे दिन तो मैं ऐसा फ्रस्ट्रेट हो गया था। मैंने सोचा कि अभी किसी काम का नहीं है यहां पर आना क्योंकि इन लोगों को पढ़ाई लिखाई तो बड़ी दूर की बात है। सिर्फ एक जगह पर बैठ के सुने उसके लिए ही इनको तो कितना समय समय जाएगा। तो मैं ऐसा सोच रहा था। ऐसा सोचते-सचते तीसरे ना चौथे दिन में जब गया तो आश्चर्यचकित होकर के देखा कि बच्चों के हाथ पैर धुले हुए हैं। जो नाक में से वह निकल रहा है वह सब साफ कर दिया है। ठीक-ठाक कपड़े पहनाए हैं और सबको लाइन में बिठा करके रखा है। और वह जो दो-तीन बूढ़ी अम्मा थी वह पीछे में बैठी थी और मुझे कहती है भैया तुम सिखाओ इनको। यदि हल्लागुल्ला करेंगे तो हम उसकी पिटाई करेंगे। यदि कोई बच्चा ऐसा कोई म कोई कुछ मिसचीफ करना चाहेगा तो हम उसको ठिकाने लगा देंगे। तो मैंने सोचा कि अच्छा ठीक है उस दिन मैंने बिठा करके पढ़ाया ऐसे बच्चे फटाक करके तो शांत नहीं हो जाने वाले हैं। किंतु देयर वाज़ अ लॉट ऑफ इंप्रूवमेंट इन डिसिप्लिन। काफी उन लोगों के डिसिप्लिन में मैंने यह सुधार देखा। सो दैट वाज़ माय वेरी पॉजिटिव एक्सपीरियंस। जैसे-जैसे कुछ दिन में गया पूरा टाइम तो मैं नहीं जा पाऊंगा। फिर तो पढ़ाई लिखाई सब कुछ है। वेकेशन खत्म हो गया। क्या करेंगे? भविष्य भी है। मैं कुछ महीनों तक गया था। आई थिंक जहां तक मुझे याद आ रहा है, मैं दो-ती महीने तक गया था इस तरह से। तो दैट वाज़ माय वेरी पॉजिटिव एक्सपीरियंस। उसके बाद में मैंने जब थोड़ा सा और बड़ा हुआ मैंने सोचा कि अभी कैरियर फेरियर को छोड़ देना है। कॉलेजवलेज नहीं करना है। बस मैं गांव में जाकर के मैं ये सब करूंगा एक्टिविटी। और बाय दैट टाइम मुझे गांधी जी का जो लिटरेचर है मेरे हाथ में आ गया था। तो गांधी जी के जो आइडियाज है मैं काफी प्रभावित था। ओरिजिनल गुजराती में मैंने उनको पढ़ा है और वैसे तो गांधी जी वाज वेरी प्रोफिशिएंट हिंदी और इंग्लिश बड़ा अच्छा था उनका किंतु जो मातृभाषा में जो एक्सप्रेशन होता है वो एक बात ही अलग है तो जिस तरह से वो हमको यंग मैन माने गोइंग बियों्ड फ्रीडम स्ट्रगल के बियों्ड जो उनके आइडियाज थे कि गांव का उत्थान करना है जब तक उनका जो सबसे फेमस जो उनका जो आईडिया जो कि मुझे सबसे ज्यादा अच्छा लगा इंडिया लिव्स इन द विलेजेस भारत जो है वो गांव में रह रहा है और जब तक गांव का उत्थान नहीं होगा भारत का भी उत्थान होना मुश्किल है। तो यह जब मुझे समझ में आया तो मैंने भी सोचा कि मैं भी गांव में जाऊंगा। मैं भी इस तरह से कार्य करूंगा। किंतु किस तरह से मैं गांव में जाऊं। ऐसा तो नहीं है कि मैं बैग उठाकर के कपड़े डाल के उसमें सीधा गांव में चला जाऊं और गांव वाले मुझे अलाउ करेंगे हेल्प करने के लिए। सेकंड की मैं क्या हेल्प करूंगा वो भी तो एक बात है ना एक अंडर ग्रेजुएट मैंने तो ग्रेजुएशन तो किया नहीं 12th के बाद में सीधा ड्रॉप आउट हो गया था ये सोचा कि मैं सेवा करूंगा किंतु फिर जब सेवा के क्षेत्र में जाते हैं सबसे बड़ा प्रश्न आता है कि आप क्या सेवा करेंगे यदि मैं डॉक्टर हुआ होता मेडिकल लाइन लेकर के मैंने एमबीबीएस ऐसा कुछ किया होता और मैं यदि गांव में जाकर क्लीनिक ओपन करता तो एक तो रियल सर्विस होगा राइट किंतु मैंने तो एकेडमिक लाइन को छोड़ दिया है। अभी मेरे पास में है क्या ऐसा देने के लिए? आई नीड सम ऑर्गेनाइजेशनल स्ट्रक्चर। कोई एक सिस्टमेटिक कार्य हो रहा है तो मैं वहां जाकर कंट्रीब्यूट कर सकता हूं। अपने आप तो मैं कुछ नहीं कर पाऊंगा। जैसे एक डॉक्टर कर सकता है या जैसे एक सिविल सर्वेंट कर सकता है। जैसे एक धनपति कर सकता है। वो गांव में जाकर के स्कूल हॉस्पिटल बना दे। मैं तो इसमें से कुछ नहीं करने वाला हूं। करने कर सकूंगा। तो फिर ठाकुर की कृपा से रामकृष्ण मिशन में आने का सद्भाग्य मिला और रामकृष्ण मिशन की ओर से जो गांव में सेवा कार्य हो रहा है रांची में वहां पर जाने का सद्भाग्य मिला। अभी यह जो मेरा लर्निंग है देखिए कि रांची में मैंने किस तरह से मेरा इवोल्यूशन हुआ है। मैं जब ओरिजिनली यहां पर आया था इस क्षेत्र में नहीं कि साधु बनने के लिए किंतु यह जो हृदय में जो ये गरीब लोगों के प्रति ये नंगे भूखे बच्चे हैं इनके प्रति जो सहानुभूति लेकर के वो ऐसा नहीं है कि कोई मैंने वेदांत पढ़ लिया था या तो ठाकुर मां स्वामी जी मुझे समझ में आ गए थे वह सब तो बाद में हुआ। यह जो इनिशियल जो मैं जो वो जो स्लम एरिया था वो ग्राउंड में मैं जाकर के बच्चों को सिखाता था वो पहले और उसके बाद में धीरे-धीरे करके वहां पर अर्थक्वेक हुआ था गुजरात में तो अर्थक्वेक रिलीफ के लिए मैं गया लिमड़ी अपना जो आश्रम है राज दैट वास माय फर्स्ट आश्रम कि रामकृष्ण मिशन का कोई भी एक आश्रम में मैंने प्रवेश किया हो तो वहां पर लिमड़ी आश्रम में और वहां पर यह अर्थक्वेक रिलीफ चल रहा था तो मैंने उसमें पार्टिसिपेट करना शुरू किया और वहीं पर मुझे सीरियसली ठाकुर मां स्वामी जी को पढ़ने का मौका मिला और फिर पढ़कर के मैंने सोचा कि इस बेटर के रामकृष्ण मिशन को ज्वॉइ करें क्योंकि स्वामी जी के जो आइडियाज है खास करके हिस्टोरिकल इवोल्यूशन किस तरह से सिविलाइजेशन का होता है। किस तरह से एक स्पिरिचुअलिटी एंड सर्विस बोथ कैन गो हैंड इन हैंड। यह जो एक जनरल कांसेप्ट होता है ना कभी-कभी कि धर्म यानी कि जगत से भाग जाना एस्केपिज्म तो यह एस्केपिज्म इज रिलीजन ऐसा एक हमारे मन में बैठ जाता है। किंतु स्वामी जी का जो आईडिया है दैट इज नॉट एस्केपिज्म दैट इज टू एंब्रेस द वर्ल्ड। इस जगत को आलिंगनबद्ध करना। जगत को डिवाइन कर देना। तो अभी देखिए वेदांत तो मैंने उस समय भी नहीं पढ़ा था। सिर्फ स्वामी जी को पढ़ा था। ठाकुर को पढ़ा था। अच्छा बहुत लगता था। किंतु उसके भीतर के जो डीपर आइडियाज हैं वह उतने समझ में नहीं आ रहे थे जितना कि सबसे पहले मुझे स्वामी जी समझ में आ गए। खास करके यह लेक्चर फ्रॉम कोलंबो टू अल्मोड़ा उसमें स्वामी जी बार-बार जो कहते हैं कि यह कर्म योग या तो फिर यह सेवा योग या तो फिर यह 100 थाउजेंड मेन एंड वीमेन फायर विद द जेल ऑफ होलीनेस। 1 लाख लड़के और लड़कियां यह पवित्रता की अग्नि से जैसे कि अपने को सशक्त करके यह पूरे भारत में फैल जाएंगे और यह पवित्रता का जो संदेश है यह जो जनसाधारण की सेवा का संदेश है वह गांव-गांव शहर-शहर फैलाएंगे। व्हिच इज अ वेरी सिंपल मैसेज एक्चुअली जो एक आइडियलिस्टिक यंग मैन होता है उसको यह बात इमीडिएटली समझ में आना शुरू हो जाएगी। यह जो सर्वम खलव इदम ब्रह्मन वगैरह जो है वो बहुत ही हाई फिलॉसोफिकल कांसेप्ट है। उस ऐज में शायद ना भी समझ में आए। तो जो भी है स्वामी जी को समझ करके मैं जब रांची में गया उस समय के मेरे जो अनुभव है ऑलमोस्ट जो मैं 3 साल ना कि इतना कुछ रहा वहां पे मेरे जो अनुभव है वहां पे उससे मैंने यह बहुत बड़ा एक कंक्लूजन निकाला। सबसे पहली बात तो है कि मैं जितना हाई आइडियल लेकर के वहां पर गया था शायद ही मेरे लेवल साधु होना एक बिल्कुल अलग बात है। मैं वहां पर एस सच साधु होने के लिए नहीं गया था। हालांकि मैं ब्रह्मचारी के कपड़े में रहता था। किंतु साधु होना या आध्यात्मिक जीवन में कोई भी एक उच्च लक्ष्य प्राप्त करना दैट वास सेकेंडरी फॉर मी। यह गांव वालों की ये ट्राइबल लोगों की सेवा करना दैट इज माय सर फर्स्ट एंड फोरमोस्ट ऑब्जेक्ट एम एंड आइडियल इन माय लाइफ। तो ऐसा करके मैं वहां पर गया। मेरे जितना उच्च आदर्श लेकर के शायद ही कोई यंग मैन उस तरह से वहां पर गया होगा। तो अभी देखिए कि मैं प्रतिदिन गांव में जाता था। जितना हो सके बेसिकली मेरा कार्य क्या था वहां पे कि ये जो दिव्यायन है हमारा जो कृषि विज्ञान केंद्र वहां पे जो कि आईसीएआर इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चर रिसर्च उसके द्वारा मान्य माने उसके द्वारा प्रमाणित किया हुआ ये कृषि विज्ञान केंद्र है केवी इसको कहते हैं और यह जो आईसीएआर जो काउंसिल है ये जो सेंट्रल गवर्नमेंट की वो ऑल ओवर इंडिया में बहुत सारे केवी के स्पॉन्सर करती है। एक्रेडिएट करती है। सो आवर केवी कृषि विज्ञान केंद्र इट वाज़ एक्रेडिएटेड इज़ इट इज एक्रेडिएटेड बाय आईसीएआर। तो गवर्नमेंट से फंड आता है। एक के बाद एक प्रोजेक्ट गांव में चलते हैं। जैसे कि सेल्फ हेल्प ग्रुप है। वहां पर महिलाओं का एक ग्रुप बना करके सभी लोग कुछ ना कुछ सेविंग करेंगे। उस सेविंग में से लोन लेंगे और लोन में से फिर कुछ ना कुछ कोटेज इंडस्ट्री स्टार्ट करेंगे। या तो फिर यह जो उच्च किस्म के उच्च नस्ल के यह जो बीज है माने जेनेटिकली मॉडिफाइड कहते हैं उसको उस तरह के वो सीड्स उनको देना जिससे कि वो फसल ले तो फसल का यह जो उपज है या तो उसका जो आउटपुट है वह ज्यादा होगा। फिर ये जो एनिमल हस्बेंडरी है वहां पे ये जो पशुपालन हम लोगों को सिखाते हैं या तो फिर फ्लोरीकल्चर है या तो फिर ये मशीन शॉप है या तो फिर यह बी कीपिंग है। ये बहुत सारे प्रोजेक्ट चल रहे हैं। मेरा जो आई वाज अ सॉर्ट ऑफ ए फील्ड कोऑर्डिनेटर जो गांव में जो कुछ भी चल रहा है सब तरह की एक्टिविटीज पर नजर रखना और दिव्यायन के जो फैकल्टी है उनको लेकर के गांव में जाना और गांव वालों मीटिंग करके यह जो फैकल्टी है वह फीडबैक लेंगे उनसे जैसे बी कीपिंग वाले फैकल्टी है तो जिस गांव में बी कीपिंग का प्रोजेक्ट चल रहा है वहां पर फील्ड में जाकर के एक्चुअल ऑब्जरवेशन करेंगे और जो बी कीपिंग कर रहा है जो किसान उसको जो भी प्रॉब्लम है उसका सॉल्यूशन लाने का प्रयास करेंगे। सो लाइक दैट मेरा काम था पूरी एक्टिविटी को कोऑर्डिनेट करना। मैं कोई रिसोर्स पर्सन नहीं हूं। आई एम जस्ट अ कोऑर्डिनेटर। रिसोर्स पर्सन दिव्यांग से लेकर के गांव में ले जाकर के जो एक्चुअल एक्टिविटी करवा रहा कर रहे हैं उन दोनों के साथ में उन दोनों को मिला देना। फिर यह दोनों लोग आपस में देख लेंगे कि अभी फर्दर क्या करना है और जो भी कुछ भी ट्रबल शूटिंग होता है वह मुझे करना है। दैट वास माय वर्क दैट वास माय रिस्पांसिबिलिटी। तो आई यूज्ड टू गो आउट ऑफ माय वे। मैंने अपने रास्ते से म जो मुझे ऑफिशियली जो कार्य दिया गया है उससे भी कहीं ज्यादा मैंने लोगों को हेल्प करने का प्रयास किया है। किंतु एक चीज मैंने देखना शुरू किया। ये जो फैकल्टी होते हैं जो कि हमारे दिव्यान में सैलरी सैलरीड स्टाफ है। पैसा दे के सैलरी दे के हम लोग रखते हैं। सैलरी सेंट्रल गवर्नमेंट से बहुत सारा कुछ आता है। कुछ-कुछ हमारा सेल्फ फाइनेंस है। बहुत कुछ वहां पे ये है अकाउंट कॉम्प्लिकेटेड। सो एनीवे सो ये इनको सैलरी मिलता है। तो उनका एक बाबू जैसा एक एटीट्यूड कभी-कभी हो जाता था। मेरे जाने से पहले इन लोगों को क्या है कि ऐसा पुश करके गांव में ले जाने वाला या तो पुश करके बिय्ड एक जो नॉर्मल स्कोप ऑफ ड्यूटी है वो वो करवाने वाला ऐसा कोई शायद वहां पर नहीं था। तो मैंने जब इनको पुश करना शुरू किया कि जनरली आप सप्ताह में एक बार फील्ड विजिट करते हैं महीने में एक बार करते हैं तो एव्री वीक कीजिए। आप एव्री वीक यदि करते हैं तो ट्वाइस ए वीक कीजिए। यदि एक विजिट में आप एक-दो विलेजेस कवर करते हैं तो आप चार-प विलेजेस कवर कीजिए। ऐसा करके करके मैंने उनको पुश करना शुरू किया और जैसे ही मैं उनको जितना पुश करता हूं उतना ही एक तरह का रिजेंटमेंट इन लोगों में डेवलप होता है कि हमारा जो ड्यूटी है हमको जो सैलरी मिल रहा है उससे बहुत ज्यादा काम यह महाराज हमारे से करवा रहे हैं। तो फिर उन्होंने जाकर के कंप्लेन भी किया ऊपर में हमारे जो सेक्रेटरी महाराज थे तो ठाकुर की कृपा से सेक्रेटरी महाराज का मुझे 100% सपोर्ट था। तो उन्होंने तो इनको सुना नहीं किंतु यह रिजेंटमेंट उनका मेरे प्रति बढ़ने लगा। मेरा उनके प्रति बढ़ने लगा। सब समय मेरे माइंड में एक ही बात है कि जो काम इनको करना चाहिए जो काम उनको करना उचित है ये ये काम ये लोग नहीं कर रहे हैं। तो ये तो एक फ्लैश पॉइंट स्टार्ट हुआ। दूसरा था रूरल लेवल पे गांव के लेवल पर हमने कमिटीज बनाई थी। विवेकानंद सेवा संघ। ये कमेटी के मेंबर कौन है? तो वह जो दिव्यान के एक्स ट्रेनीज है वे लोग क्योंकि दिव्यान में तो हम ट्रेनिंग देते हैं सब तरह की बी कीपिंग मशीन शॉप वगैरह वगैरह और यह ट्रेनस जब गांव में जाएंगे तो हमारा जो विवेकानंद सेवा संघ है उसके प्रेसिडेंट सेक्रेटरी ट्रेजर वगैरह यह लोग बनेंगे तो यह जो ऑफिस बियरर्स हैं हमारे उनको जो कुछ करना चाहिए दिव्यान के साथ में कोऑर्डिनेशन करके गांव के लेवल पे जो प्रोजेक्ट को स्मूथली एंड एफिशिएंटली रन करना चाहिए वो नहीं करके अपना ही जैसे कि बेनिफिट खोजेंगे। जब हम उनको यह कहेंगे कि अच्छा यह आपको बी कीपिंग का प्रोजेक्ट यहां पे हम ला रहे हैं। हम लोग आपको यह पूरा मटेरियल देंगे। तो यह मटेरियल आपको इस तरह के लोगों को आपको सिलेलेक्ट करना है। गांव में कौन-कौन हम 10 किट हमको डिस्ट्रीब्यूट करनी है बी कीपिंग की। उसमें वह बॉक्स होता है। वो वगैरह-वगैरह वह होता है। पूरा किट होता है। यदि आपको यह स्टार्ट करना है अपने घर में तो। तो यह 10 किट हम आपको दे रहे हैं। अभी यह वहां के ऑफिस बियरर्स हैं विवेकानंद सेवा संघ के। उनका रिस्पांसिबिलिटी है कि आप गांव में से 10 ऐसे रिस्पांसिबल लोगों को खोजिए जिसके पीछे में हम यह किट दे रहे हैं यानी खर्चा कर रहे हैं और हम उनको ट्रेनिंग भी देंगे और हम फील्ड विजिट भी करेंगे। तो फिर क्या है ना कि इन लोगों का भी एक रिस्पांसिबिलिटी होना चाहिए। वे लोग फांकी मारेंगे। वे लोग आलसी होंगे। बिना इच्छा नहीं है किंतु फिर भी हमने यह किया है तो फिर क्या है कि यह प्रोजेक्ट फेल हो जाएगा तो बेटर है कि 10 अच्छे लोगों को सिलेलेक्ट करके आप उसका नाम हमको दीजिए। तो शुरू शुरू में तो मैं यह ज्यादा ध्यान नहीं देता था कि ये जो हमारे विवेकानंद सेवा संघ के जो ऑफिस बेयरर्स हैं वो उनको सिलेलेक्ट करते हैं। धीरे-धीरे किंतु मुझे पता चला कुछ-कुछ केसेस में सब नहीं कुछ-कुछ केसेस में ऐसा होता है कि वे लोग किसी को फेवर करते हैं। जब किट देने का मामला है, कुछ मटेरियल देने का मामला है, कुछ विजिट का मामला है, दूसरे गांव में ले जाकर के विजिट करवाएंगे, दिव्यान विजिट करवाएंगे। फिर यह गवर्नमेंट ऑफिस है। वहां पर कुछ भी उनका कुछ मामला अटका हुआ है। हम उनको हेल्प करेंगे। तो यह लोग अपने कुछ जो उनका जो एक सर्कल होता है ना फ्रेंड्स और फैमिली का उसमें से लोगों को आगे लाना शुरू करेंगे। जेनुइनली जो पर्सन गांव में उनके सर्कल में नहीं है किंतु हार्ड वर्किंग है। उसमें ऑनेस्टी है और यह काम करने की इच्छा भी है। उसको नहीं सिलेलेक्ट करके अपना फ्रेंड या फैमिली का जो मेंबर है उसको यह लोग आगे करेंगे। जिसकी इच्छा नहीं होती है कभी-कभी यह सब करने की। फिर भी यह लोग उसको पुश करेंगे। तो ऐसा कुछ मेरी नजर में आने लगा। फिर मैंने कुछ-कुछ ऑफिस बियरर्स को कहा कि देखो भाई तुम लोग यह जो फेवरेटिज्म कर रहे हो वो ठीक नहीं है। यहां पे ये जो साधु लोग हैं मैं सिर्फ अकेला नहीं ना पूरे दिव्यान में तो इतने सारे रामकृष्ण आश्रम रांची में इतने सारे साधु काम करते हैं। हम सभी लोग घर बार छोड़कर के यहां पे आए हैं तुम लोगों की सेवा करने के लिए। हमको तो कुछ मिलता नहीं है। फिर भी हम यह सब करते हैं। जस्ट आउट ऑफ दी आइडियाज एंड आइडियल्स इज इंस्पायर्ड बाय श्री रामकृष्ण स्वामी विवेकानंद। तो हम इतना सब कुछ करते हैं तो तुम लोग थोड़ा सा तो करो तुम लोग अपना यह सेल्फिशनेस है अपना यह सेल्फ इंटरेस्ट है यह सब क्यों लेके आते हो ऐसा करके करके ही तो हमारा यह जो 1000 साल की गुलामी भुगतनी पड़ी ना जो राजा है वह इतना ही देखता है कि मेरे परिवार जन है वे लोग सुखी से रहे बाकी यह जो पूरा राज्य यदि जहन्नुम में जाता है गड्ढे में गिरता है मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता तो ऐसा एटीट्यूड जब कुछ-कुछ लोगों का डेवलप होने लगा तभी तो यह भारत का यह जो अध अधोगति हुआ अधः पतन हुआ 1000 साल तक यह जो पूरा जो जो लोग सत्ताधारी है अर्थात कि जो लोगों के पास में ऑथॉरिटी है जिन लोगों के पास में रिस्पांसिबिलिटी है वे लोग यदि सही-सही में सेल्फ सेल्फलेस नहीं होंगे तो यह फिर यह जो पूरा सिस्टम है ऑर्गेनाइजेशन है या तो एडमिनिस्ट्रेशन है वो पूरा बिखर जाएगा तितर-बितर हो जाएगा उसमें फिर यह अपना एक नेटवर्क बन जाएगा यह फ्रेंड्स फैमिली और रिटेनर्स का और चमचे लोगों का और यही लोग बेनिफिट पाते रहेंगे पब्लिक मनी से पब्लिक फाइनेंस से और जो लोग जेनुइनली डिर्व करते हैं वे लोगों को कुछ नहीं मिलेगा यानी कि एक समाज बंटवारा हो जाएगा समाज का एक चमचे लोगों का दल है दूसरा एक जनसाधारण है जो कि होता आ रहा है तो रामकृष्ण मिशन जहां पर कार्य करता है जहां पर साधु लोगों के भीतर में इतना उच्च आदर्श है हम लोग यदि अब अब गवर्नमेंट ऑफिस के साथ में काम करें और वहां पे जाकर के कोई एजेंट ऐसा कहेगा मिडलमैन कि साहब आप एक काम कीजिए यह जो इतना रुपए का प्रोजेक्ट आप गांव में चला रहे हैं मुझे दे दीजिए मैं 50% आपको देता हूं 50% मैं रख लेता हूं तो वो गवर्नमेंट ऑफिस में शायद ऐसा चल भी सकता है बट दिस इज रामकृष्ण मिशन हम साधु लोग तो बीच में कुछ भी नहीं लेते हैं प्रश्न ही नहीं आता एक भी साधु जो मैंने रामकृष्ण मिशन में ऐसा नहीं देखा कि जिसका इंटीग्रिटी इस तरह से डैमेज हुआ हो रेयरली ऐसा कभी होगा तो फिर रांची में तो बिल्कुल नहीं था। एक भी साधु ऐसा कुछ भी कार्य नहीं करेगा। तो हम लोग यदि वी आर ट्राइंग टू गवर्नमेंट से जो पैसा आता है एस मच एस पॉसिबल हम लोग आपकी सेवा के लिए खर्च करना चाहते हैं। देखिए एक बहुत बड़ी बात है कि ये जो एडमिनिस्ट्रेटिव एक्सपेंस होता है ये जो यूनाइटेड नेशंस की एजेंसीज है ना 30-4% उन लोगों का एडमिनिस्ट्रेटिव एक्सपेंस होता है इस अर्थ में कि यदि ₹1000 डेेजिग्नेट किया गया है कि अफ्रीका में जाकर के एड्स के पेशेंट जो है उनकी उनको उनके ट्रीटमेंट के लिए यह पैसा है। तो ₹1000 में से ₹300400 तो उनका सिर्फ एडमिनिस्ट्रेटिव एक्सपेंस है। इस अर्थ में कि एक बड़ा हाई हाईफाई सैलरी रख के एक एग्जीक्यूटिव को रखेंगे अफ्रीका लेवल पे। फिर उसका यह जो ट्रैवलिंग अलाउंस, उसका यह जो होटल का खर्चा, उसका खाने-पीने का खर्चा, उसका पॉकेट मनी यह सब मिलाकर के 30 40% 50% अप टू वो उसमें एडमिनिस्ट्रेटिव एक्सपेंस में चला जाता है। जो कि जनरली स्टैंडर्ड एनजीओ होते हैं वहां पे ऐसा होता है। 50% मुश्किल से जो कि इंटेंडेड बेनिफिशरी है वहां पे जाता है। जबकि रामकृष्ण मिशन का एडमिनिस्ट्रेटिव एक्सपेंस मुश्किल से 5 10% होगा। 90% अप टू 90% जो मनी आता है वह कि जाता है कि वह इंटेंडेड बेनिफिशरी तक। तो रामकृष्ण मिशन में यह इंटीग्रिटी है। रामकृष्ण मिशन में यह ऑनेस्टी है और मैं खुद इतना सैक्रिफाइस करके जब यहां पे आया हूं। मैं साधु भी नहीं बनना चाहता। मैं तो वहां पर प्राइवेट साधु के रूप में रह रहा था। आई वाज़ नॉट इवन ए मेंबर ऑफ रामकृष्ण मिशन। इतना सैक्रिफाइस करके मैं यदि गांव में आता हूं। फिर मेरी ही नजर के सामने यह सब चल रहा है। तो हाउ कैन आई सी दैट? मैं वह देख के बर्दाश्त कैसे कर सकता हूं बोल के मेरा यह जो कहेंगे कि एक तरह का एक टेंशन यह फैकल्टी के साथ में भी बनने लगा और गांव के लेवल पर कुछ-कुछ हमारे वॉलंटियर्स थे उनके साथ में भी बनने लगा। तो यह चल रहा है। चल रहा है। एक दिन सडनली मुझे ऐसा लगा कि देखिए मैं गांव में जा तो रहा हूं। माने एक थर्ड पॉइंट है। यह दो तो एक तो हुआ ही हुआ। साथ में और एक चीज है। मेरे मन में बनने लगी। मैंने कहा कि देखिए मैं जो इन लोगों को जो दे रहा हूं यहां पे आकर के एक्चुअली मैं उनको क्या दे रहा हूं। मैं ऊंची नस्ल का जो बकरा है वो उनको दे रहा हूं। फिर उनका जो नए बकरे जो इसमें से जन्म लेंगे बकरियां उसमें ज्यादा मीट होगा क्योंकि उसका वेट ज्यादा है। ज्यादा मीट सेल करेंगे तो ज्यादा पैसा मिलेगा। दैट इज सॉर्ट ऑफ द एक्टिविटी व्हिच आई एम डूइंग। किंतु इनका जो बेसिक एटीट्यूड है, उनका जो बेसिक कल्चर है, उसको तो मैं टच ही नहीं कर रहा हूं। जो एक सेल्फ सेंटर्डनेस जो कभी-कभी जनरल लोगों में देखने को मिलता है कि अपना खुद का सोच आगे सोचेंगे ही नहीं। गांव में जाऊंगा तो लोग मुझे एप्रिशिएट करेंगे। अच्छा महाराज आप आए हैं तो आपके लिए चाय वगैरह वो बकरा काटना है जो भी करना है वो सब कुछ कर लेंगे। राइट? सेवा करने में ये लोग पीछे नहीं रहेंगे। किंतु मुझसे और क्या सीखते हैं? यदि मेरी जगह कोई भी एक आईएएस ऑफिसर है। यह जो मास्टर इन सोशल एमएसडब्ल्यू ऐसा कुछ किया हुआ कोई भी एक ये जो एनजीओ का कोई ऑफिसर है वो जाएगा वो माने एक आईएएस ऑफिसर या तो एनजीओ का ऑफिसर वो जाएगा और मैं जाऊंगा एज ए साधु एज जिसने सैक्रिफाइस किया है। व्हाट इज अ डिफरेंस? क्या फर्क पड़ता है? हम सभी लोग एक ही काम करते हैं उन लोगों का जो मटेरियल जो अपलिफ्टमेंट है वो करने का। मेरे से और क्या ये लोग सीखते हैं जो एक जीवन में एक हायर आइडियल होना चाहिए। मैं जितने ये 60- 70 गांव में जो रेगुलर जाता था उसमें से क्या मैंने ऐसा किसी लड़के को देखा जिसने मुझसे यह अपेक्षा नहीं रखी कि मैं उनको कोई प्रोजेक्ट दे दूंगा। किंतु मेरे जो आइडियल्स है उसको ग्रहण करने का प्रयास किया हो। वह मुझे कभी नहीं दिखा। एक दो स्टूडेंट्स थे अह स्कूल जब हमारा तो नाइट स्कूल चलता था वहां रूरल नाइट स्कूल तो वहां पे क्या होता था कि अभी आप जो गवर्नमेंट ऑफ इंडिया के लेबर लॉ है आप चाइल्ड लेबर वो प्रोहिबिटेड है कि बच्चे की एक सर्टेन एज जब तक नहीं होती तब तक उसको खेत मजदूरी का काम या तो फैक्ट्री में काम कंस्ट्रक्शन में काम नहीं दे सकते किंतु यह थ्योरेटिकल है। हमको सबको पता है तो डोमेस्टिक जो वर्कर्स भी होते हैं कभी-कभी अंडर एज होते हैं। गांव में खास करके खेत मजदूरी में वो मां-बाप अपने बच्चों को लेकर के ही जाते हैं। जब बहुत छोटे होते हैं तो वो साइड में बैठे रहते हैं। थोड़ा सा भी बड़े होते हैं तो मां-बाप को हेल्प करना शुरू कर देते हैं। हम मां शारदा के जीवन में ही देखा किस तरह से वो अपने मां-पिताजी के साथ में खेत में जाती थी। मां किस तरह से उनको हेल्प करती थी। यदि डायरेक्ट खेत में काम नहीं करना है तो बच्चों की संभाल रखती थी अपने छोटे बच्चों की। तो गांव के लेवल पर यह सब थ्यरी है कि चाइल्ड लेबर नहीं होना चाहिए। वो प्रैक्टिकल लेवल में सब कुछ चलता है। तो अभी देखिए कि जो बच्चों को पढ़ाई लिखाई करनी चाहिए वह टाइम जो है डे टाइम वो तो खेत में बिताते हैं। तो हमने एक गवर्नमेंट का अभी गवर्नमेंट को भी पता है कि ये जो कि सदियों से चली आई हुई प्रथा या आप ऐसा फटाक करके तो चेंज नहीं कर देने वाले और फिर इकोनॉमिक जो सिचुएशन है वो उसका जब तक आप उसको इंप्रूव नहीं करेंगे तब तक किस तरह से आप मां-बाप को प्रेरित करेंगे कि डे टाइम में बच्चों को स्कूल में भेजिए। तो यह रूरल नाइट स्कूल का कांसेप्ट गवर्नमेंट का ही है और गवर्नमेंट से ही सहाय लेकर के हमने 60 70 नाइट स्कूल वहां पर चला रहे थे। इट्स वेरी ब्यूटीफुल टू सी आप यदि शाम को जाएंगे संध्या हो गई है और वहां पे इलेक्ट्रिसिटी तो है नहीं। यह जो बच्चे हैं सब लटन का प्रकाश में स्टडी करते हैं। प्रत्येक बच्चे के सामने एक-एक लटन है। वह जमीन पर बैठा हुआ है। झुक करके कुछ लिख रहा है। उसकी जो पार्टी होती है उसमें स्लेट के ऊपर में या तो नोटबुक में तो और सामने एक लटन है। तो बड़ा ही सुंदर दृश्य होता है। मैं गांव में जाकर के देखता था जब मैं विजिट के लिए जाता था और एक दो ट्रिक भी मैंने वहां पर सीख लिया था। अभी गाड़ी ले जाएंगे जनरली। अभी गांव में तो गाड़ी फाड़ी होती नहीं है। कार जीप तो जैसे ही जीप का आवाज आएगा वो तो शांत है ना जगह वहां पे तो और तो कोई नॉइज़ पोल्यूशन है नहीं। दूर से ये लोग समझ जाएंगे जो टीचर होते हैं ना तो फांकीबाज जो टीचर होते हैं वे लोग क्या करेंगे? जैसे ही गाड़ी का आवाज सुनेंगे ना वैसे ही वो बच्चों को पढ़ाना शुरू कर देंगे। जोर-जोर से उनको वो कुछ ना कुछ सिखाएंगे। किंतु जैसे वह पता इन जनरल यदि कोई नहीं है वहां पे इंस्पेक्शन के लिए तो वे लोग फांकी मारेंगे या प्रेजेंट नहीं रहेंगे या तो फिर साइड में बैठकर के और किसी के साथ गप लगाएंगे बच्चों को जो करना है वह करने दो तो फिर मैंने एक ट्रिक सीखा था दो-तीन बार ऐसा मैंने देखा मैं क्या करता था गाड़ी को दूर रख के आता था फिर वहां पैदल चल के जाते थे पैदल चल के फिर सीधा क्लासरूम में नहीं प्रवेश कर जाना है वो अगेन वे लोग तो अलर्ट हो जाएंगे तो क्लासरूम के बाहर में जो विंडो होता है जो बाहर से विंडो से मैं भीतर में देखता था कि क्या चल रहा है। तो बहुत बार बड़ा ही सुंदर नजारा देखने को मिलता था। फाकीबाद टीचर कम ही होते हैं। ज्यादातर काफी ऑनेस्ट होते हैं। तो वो टीचर पढ़ा रहे हैं और बच्चे सब वो लटन की लाइट में पढ़ रहे हैं। व्हिच इज वेरी गुड सीन। मैंने अपने हृदय को लगेगा कि हां जो सैक्रिफाइस किया उसका कुछ ना कुछ तो हमको मिल रहा है। सामने सेटिस्फेक्शन। तो इस तरह के बच्चों में कभी-कभी मैं देखता था कि एक आइडियलिज्म है। उनके भीतर में एक हायर लाइफ क्या है वो सोचने समझने का एक कांसेप्ट है उनके भीतर में। क्योंकि क्या है कि अभी तक संसार उनको स्पर्श नहीं किया है। जब तक संसार स्पर्श नहीं करता तब तक भीतर में यह आइडियल्स और आइडियाज होते हैं। तो जो भी है अदर देन यह कुछ बच्चों को छोड़ दें जिनका कि मेरे साथ में रेगुलर इंटरेक्शन होता था। मैं सब बच्चों को मार्क करके रखता था। इस तरह के कि हां इसका एक बेटर फ्यूचर है। तो ऐसे कुछ बच्चों को छोड़ दे तो एक जो 60 70 गांव में मैं रेगुलर जाता था जो 1000 2000 लोगों के साथ में मेरा रेगुलर इंटरेक्शन होता था उसमें मुझे ऐसा कोई नहीं मिला जो कि मेरे से आइडियाज सीखे रेदर देन कि मेरे पास में से ये प्रोजेक्ट लेकर के अपना मटेरियल डेवलपमेंट करें और अपना एक सेल्फ सेंटर्ड लाइफ जो है उसको इंप्रूव करने का प्रयास करें। अभी दैट इज सच अ क्लेश माने देखिए कि यह जो हमारे विवेकानंद सेवा संघ के वलंटियर्स या तो फिर हमारे फैकल्टी इन लोगों के साथ में जो भी मेरा एक बड़ा ये था मेरा नाराजगी वो तो अपनी जगह पे है इट कैन बी मैनेज्ड किंतु यह जो लार्जर मैंने जो देखा कल्चरल डिफरेंस कि मेरा जो मैं जिस कल्चर या संस्कार को रिप्रेजेंट करता हूं इसका मैं प्रतिछी जो है एक रिफ्लेक्शन है मैं वहां पे नहीं देख पा रहा हूं। तो अभी क्या है ना कि हमारे जीवन में हमेशा एक ब्रेकिंग पॉइंट आता है कि हमारे हाथ में हमारे मन में हमारे हृदय में चाहे जितने भी हायर आइडियल्स हो एट वन पॉइंट हमको सडनली ऐसा लगता है कि इनफ जब तक ये आइडियाज सराउंडिंग जो है अपना वहां पर रिफ्लेक्ट नहीं होंगे तो फिर हम सिर्फ अकेले एक टॉर्च बियरर होकर के अंधेरे में आप आइडियाज को ले जाएंगे ऐसा ऐसा कब होगा जब कि आपको ब्रह्म ज्ञान प्राप्त हुआ है। मैं तो आध्यात्मिकता में मैंने तो पैर ही नहीं रखे हैं। जैसे जनरली दिव्यान में रांची में जो बाकी सब साधु हैं वो तो साधु होने के लिए आए थे। ठाकुर मां स्वामी जी से इन जनरल आध्यात्मिक प्रेरणा लेकर के आए थे। मेरा तो ऐसा नहीं था। वो पूरा जो है वो ब्रांच है वो पूरा अभी ब्लैंक ही था मेरा। मैं तो सिर्फ सेवा कार्य को समझ करके यहां पे आया था। सो मुझे ऐसा लगने लगा कि मेरे जो आइडियाज यदि यहां पर रिफ्लेक्ट नहीं होते तो फिर मैं यदि मान लीजिए कि सालों सालों तक हजार साल तक भी इस तरह से इनकी सेवा करता रहूंगा। एट वन पॉइंट मुझे यही लगेगा कि मैंने इनका मटेरियल इंप्रूवमेंट ही किया है। उनका जो सेल्फ सेंटर्ड लाइफ है एक आदमी यदि गांव के लेवल से रांची में आ जाएगा उसका लाइफ इंप्रूव करके तो रांची में आकर क्या करेगा? वो एक जनरल पब्लिक की तरह एक सेल्फ सेंटर्ड लाइफ ही लीड करेगा। वह किसी को सहायभूत होगा या उसके खुद के जीवन में कोई हायर आइडियल स्पिरिचुअल या तो सोशल सर्विस के कोई आइडियल डेवलप होंगे। ऐसा तो कुछ मुझे नजर नहीं आ रहा था। हो सकता है कि होंगे। आई डोंट नो। किंतु वो जो मेरा एक उस समय का थिंकिंग था उस समय तो मुझे यह नहीं लग रहा था। तो फिर धीरे-धीरे मुझे लगा कि नहीं आई विल नीड टू मुझे यहां से निकल जाना होगा। और आई नीड टू डू सम रिथिंकिंग अबाउट मायसेल्फ। क्योंकि लोगों को जैसे मैंने सबसे पहले जो मार्क किया था सबसे पहली बार मैंने जब घर छोड़ा था हमारी क्वालिफिकेशन क्या है लोगों को सर्व करने की यह बहुत बड़ा प्रश्न मेरे सामने था मैं यदि डॉक्टर होता इंडस्ट्रियलिस्ट होता फिलथ्रोपिस्ट होता सीईओ होता मैं बड़ा आसानी से गांव में जाकर के हेल्प कर सकता था बट आई एम नन ऑफ दैट ना ही ऐसा कोई इंटेलेक्चुअल अचीवमेंट है ना ही ऐसा कोई मेरे पास में मनी पावर है कि मैं गांव में जाकर के कुछ इंपैक्ट कर सकूं। आई हैव टू बी अ पार्ट ऑफ एन ऑर्गेनाइजेशन एंड विद इन द प्लेटफार्म ऑफ दिस ऑर्गेनाइजेशन व्हाटएवर मेरे से होगा वो मैं करूंगा। सो वो उस समय जो मेरा प्रश्न था कि मेरा क्वालिफिकेशन क्या है? म मेरे पास में है क्या देने के लिए? नाउ द सेम क्वेश्चन हैज़ अराइज़न अगेन इन अ डिफरेंट मैनर। मेरे पास में क्या वो स्पिरिचुअल बैकअप है क्या? स्पिरिचुअल रिजर्व है क्या? कि मैं अपने आइडियल्स को रिफ्लेक्ट होता नहीं देख पा रहा हूं। और फिर भी मैं इस आइडियल पे काम किए ही जा रहा हूं। किए ही जा रहा हूं विदाउट एक्सपेक्टिंग एनीथिंग इन रिटर्न। ऐसा नहीं है कि हमको प्रज़ चाहिए या हमको मनी चाहिए, पैसा चाहिए, नेम एंड फेम चाहिए। यदि आप आइडियल को लेके जीते हैं तो आपका सबसे बड़ा एक्सपेक्टेशन यही होगा कि आप इसी आइडियल्स को अपने सामने वाले में रिफ्लेक्ट होता हुआ देखें। यदि रिफ्लेक्ट होता हुआ देखते हैं तो सही में आपको आनंद आएगा। यू कैन गो ऑन वर्किंग इनफाइनाइटली। किंतु वह आइडियल आप रिफ्लेक्ट नहीं होता देख पाएंगे। तो आपको बिल्कुल धीरे-धीरे करके आपके हृदय में मायूसी, हताशा और डिप्रेशन जैसा भाव होना शुरू होगा। एक सिंपल एग्जांपल है कि आप बच्चों को पढ़ाते हैं कुछ। अब जैसे कि यहां पे समर कैंप था तो मैं बच्चों के क्लास लिया करता था। अभी भी लेता हूं जो संडे-संडे को चलता है। कभी-कभी देखता हूं कि मैं जो कुछ कहता हूं बच्चों को उसमें बड़ा इंटरेस्ट आता है। तो उनको इंटरेस्ट है बोल करके मैं और भी ज्यादा इंटरेस्ट से उनको सिखाता हूं। कभी-कभी देखता हूं कि इन लोगों को इंटरेस्ट ही नहीं है। मुझे जो कहना है। एक तो लैंग्वेज बैरियर है। तेलुगु नहीं आती मुझे। दूसरा कि एक तो कल्चरल बहुत बड़ा डिफरेंस है। बहुत कुछ है यहां पे। तो मैं बोलता ही जा रहा हूं। प्रयास करता ही जा रहा हूं। उनके भीतर में कुछ नहीं जा रहा। वे लोग इधर-उधर देखते हैं। एक दूसरे के साथ में बात करते हैं। वो म रेस्टलेस हो जाते हैं। समझ में आ जाता है बॉडी लैंग्वेज देख के कि दे आर नॉट इंटरेस्टेड इन लिसनिंग व्हाट आई एम सेइंग। तो उस समय ना बोलना बड़ा कष्टकर हो जाता है। वो फिर मैं क्या कितना बोलूंगा? यदि उनको इंटरेस्ट ही नहीं है तो सुनने में। तो सिमिलरली यदि सेवा का कार्य करते हैं और जिनकी हम सेवा कर रहे हैं यदि मान लीजिए आप सिर्फ रिलीफ करते हैं रिलीफ एक्टिविटी बहुत सारी जगह पे हमारी रिलीफ एक्टिविटी चलती है जैसे गुजरात में अर्थक्वेक हुआ था कहीं पे फ्लड होता है यह होता है हम लोग जाकर के खिचड़ी वगैरह बना करके उनको खिला देंगे फूड ग्रेन डिस्ट्रीब्यूट करेंगे बिल्डिंग बना देंगे स्कूल बना देंगे घर बना देंगे सेवा कर दी हम चले आए दैट इज ओवर फिर उन लोगों के साथ में कोई सस्टेंड इंटरेक्शन हमारा नहीं है। किंतु जिनके साथ में हमारा सस्टेंड इंटरेक्शन है, जिनकी हम सेवा कर रहे हैं, उसमें यदि यह आइडियल रिफ्लेक्ट होता हुआ ना देखे, तो एक तरह का मायूसी हमारे मन में जन्म लेता है। एंड इट वास दिस एट वन पॉइंट कि मुझे लगा कि नहीं आई नीड टू गो अवे फ्रॉम दिस। मुझे अपना खुद का एक रीइवैल्यूएशन करना होगा। भीतर में यदि स्पिरिचुअलिटी नहीं है और मैं सिर्फ सेवा करने का प्रयास कर रहा हूं तो वह कार्य लंबे समय तक नहीं टिकेगा। हो सकता है मेरे मन में धीरे-धीरे करके करप्शन आना शुरू हो जाए। जैसे मैंने वो एक डॉक्टर का उदाहरण दिया था रांची का ही सेवा करने के लिए तो आया। एक बड़ा ही एक प्रॉफिटेबल कैरियर रनाउंस करके आया। वो उसका करोड़ों लखपति लखपति करोड़पति हो सकता था। यदि वह अपना नॉर्मल कैरियर फॉलो करता। वो छोड़ के गांव में आया। वो गांव वालों की सेवा कर रहा है। 10 20 साल के बाद में लगा कि नहीं इससे तो कोई मामला बन नहीं रहा है। तो फिर वहां पर एक एनजीओ था। उसका डायरेक्टर बन के बैठ गया 20, 25,000 की सैलरी में। अभी क्या उसका लाइफ रहा? उसको कहते हैं ना माया मिली ना राम दोनों ओर से ना ही माया मिली अर्थात कि लखपति करोड़पति हो पाया, ना ही मिले राम कि जीवन के आखिर तक वो सेवा कार्य कर पाया। तो मुझे ऐसा डर लग गया था कि मैं कहीं इस डायलेमा में ना फंस जाऊं। ना ही मैं साधु हूं प्रॉपर्ली ना ही मैं प्रॉपर सेवा कर रहा हूं। सो दैट वे आई हैड टू रनाउंस रांची। उन्हें रांची छोड़ के जाना पड़ा। किंतु यह जो लर्निंग है
worldview vs heart
मेरा उसने मुझे समझाया कि देयर आर टू एस्पेक्ट ऑफ आवर लाइफ। एक तो है कि हमारा वर्ल्ड व्यू। एक तो है हायर वर्ल्ड व्यू। दूसरा है कि हमारा हार्ट। हमारे हार्ट में जो चल रहा है जैसे कि लोगों के साथ लोगों के पास से अपेक्षा रखना कि मेरे आइडियल को रिफ्लेक्ट करें। लोगों के पास में यह अपेक्षा रखना कि वह मैं जितना सैक्रिफाइस करता हूं उतना ही सैक्रिफाइस यह वॉलंटियर्स और यह स्टाफ करें, फैकल्टीज करें। यह दोनों चीजें जो मैं अपेक्षा रखता हूं, दैट मेरा एक सेल्फ सेंटर्डनेस है। यह मेरे हृदय में एक कमी रह जाती है। मेरा वर्ल्ड व्यू तो बहुत बड़ा है। इस अर्थ में कि मैं पूरे गांव वालों की सेवा करना चाहता हूं। मुझे अपना खुद का करियर, खुद का फैमिली उसकी चिंता नहीं है। वर्ल्ड व्यू मेरा एक्सपंड हो गया है। किंतु हार्ट जितना एक्सपंड होना चाहिए था कि जो ये लोग किसी भी तरह का बिहेवियर करें डज नॉट मैटर। जैसे मां के जीवन में हमने देखा कि मां कोई भी बच्चा हो मां का जिसको मां प्रेम वो बच्चा परीक्षा में पास भी होता है या तो फेल भी होता है। मां बच्चे को समान रूप से स्नेह करेगी। वैसे ही मेरा जो सहानुभूति मेरा जो एंपैथी है सबके प्रति समान होना चाहिए। जो एंड बेनिफिशियरीज है उनके प्रति भी ऐसे वॉलंटियर जो कि अपना खुद का सेल्फिश इंटरेस्ट खोजते हैं उनके प्रति भी इस तरह के फैकल्टी जो अपना खुद का कंफर्ट चाहते हैं उसके प्रति भी सबके प्रति वो जो दो-तीन बच्चे जैसे मैंने कहा कि नाइट स्कूल में मैं उनको देखता था और उनको देखकर के सही में मुझे सेटिस्फेक्शन होता था। उनके प्रति जो मेरा सहानुभूति जाता है सेम इक्वल अमाउंट ऑफ लव इक्वल अमाउंट ऑफ एंपैथी इक्वल अमाउंट ऑफ सहानुभूति सबके प्रति रहना चाहिए जो कि नहीं हो रहा था जिसके जिसका मेरे प्रति एक जो मेरे आइडियल्स को रिफ्लेक्ट करता है उनके प्रति सहानुभूति है जो मेरे आइडियल्स को रिफ्लेक्ट नहीं करता उनके प्रति सहानुभूति नहीं है यानी कि मेरा जो एक एंपैथी मेरा हृदय है वो इतना डेवलप नहीं हुआ है कि सबको एक समान रूप से वह स्नेह कर पाए या एक समान रूप से स्वीकार कर पाए। बट दिस इज द हार्ट ऑफ दिस स्पिरिचुअल लाइफ। मां का जीवन जितना ही पढ़ेंगे देखिए कि मां ठाकुर स्वामी जी तीनों का जो कोई भी महापुरुष है जो कोई भी अवतार है भगवान बुद्ध जीसस यू नेम इट जो भी संत महापुरुष है भारत के आध्यात्मिक जीवन का हार्ट क्या है? सर्वभूत में ईश्वर दर्शन प्रत्येक व्यक्ति के भीतर में आत्मन और ब्रह्मन है। वो फिर चंडाल नारायण हो, मूर्ख नारायण हो, करप्ट नारायण हो ना कि फांकीबाज नारायण हो ना कि वो सेल्फिश नारायण हो जो कोई भी हो सब नारायण है। सबके प्रति तो समान व्यवहार होना है। मैं ऐसा क्यों देखता हूं कि यह सेल्फिश है, ये सेल्फलेस है। यह स्पिरिचुअल है, यह नॉन स्पिरिचुअल है, यह फाकीबाज है, यह आलसी है, यह करप्ट है। व्हाई डू आई लुक लाइक देम? मैं यह देखता ही क्यों हूं? मुझे यह सब देखने की क्या पड़ी है? मैं अपना घर छोड़ के आया हूं। आदर्श ले आया हूं। सेवा करने के लिए आया हूं। अब ये कभी अपेक्षा नहीं रखनी कि यह सेवा जो आइडियल है वो रिफ्लेक्ट होगा सामने में। मुझे प्रज़ मिलेगा। मुझे एक तरह का सम्मान मिलेगा। मुझे एक रिकॉग्निशन मिलेगा। नेम एंड फेम मिलेगा। भविष्य में यही लोग बड़े होकर के मेरी प्रशंसा करेंगे। नो एक्सपेक्टेशन हैज़ टू बी देयर। किसी भी तरह का एक्सपेक्टेशन नहीं होना चाहिए। मुझे सिर्फ देना है। बस इतना ही तो मेरा कार्य है। वो ले ना ले ग्रहण करें ना करें। भगवान बुद्ध की कहानी एक घर में वो भिक्षा लेने के लिए गए तो वो घर का मालिक था। भगवान बुद्ध को गाली दे रहा है। सतत गाली दे रहा है। भगवान बुद्ध चुपचाप सुन रहे हैं। तो फिर वो आदमी जो था घर मालिक गृहस्थ वो थोड़ा आश्चर्यचकित हो गया। कहता है मैंने आपका इतना अपमान किया। इतना अब्यूज किया। आप चुपचाप शांति से कैसे सुन पा रहा है? तो भगवान बुद्ध ने क्या उत्तर दिया? सुंदर उत्तर कि तुमने जो दिया मैंने ग्रहण तो किया नहीं है उसमें से कुछ भी तो वह तो तुम्हारे ही पास में रहा ना मैं यदि उसको ग्रहण करता तो तुम्हारे पास से मेरे पास में आता फिर मुझे कुछ रिफ्लेक्शन उसका कुछ रिएक्शन दिखाना पड़ता मैं भी नाराज हो जाता मैंने कुछ भी ग्रहण नहीं किया तो फिर मुझे नाराजगी किस बात की तब वो आदमी भगवान बुद्ध के चरणों में गिर गया यहां पे कि एक देने का जो आइडियल है सेवा का आइडियल है इट हैज़ टू एक और तो मेरा जो वर्ल्ड व्यू था कि एक सेल्फ सेंटर्ड करियर ओरिएंटेड फैमिली ओरिएंटेड वर्ल्ड व्यू से बहुत ज्यादा डेवलप हुआ कि मेरे वर्ल्ड व्यू के भीतर में मेरी सहानुभूति के भीतर में पूरे गांव वाले आ जाते हैं। जितने भी गरीब हैं सब आ जाते हैं। किंतु मेरा हार्ट जो है वह इक्वली एक्सपैंड नहीं हो रहा है। यहां पे एक मिसमैच चल रहा है। यह जो मेरा अनुभव है इससे मैंने एक बहुत बड़ी बात सीखी। देखिए कि हम आइडियल्स हमारे जीवन में कितने ही ज्यादा बड़े हो और बहुत सारे लोगों के जीवन में बहुत सारे आइडियल्स होते हैं। बट हायर आइडियल्स डज नॉट मीन कि आपका हृदय भी उतना ही एक्सपैंड होगा। यह जो मेरा थ जो मेरा लर्निंग है उसके बेस के ऊपर में मैंने एक चार्ट बनाया है। एक चार्ट मैं आपके साथ में शेयर कर रहा हूं। देखिए पहली बात तो है एक है सर्वम खल सर्वम खलविदम ब्रह्म तजजालिनीति संसित उपसित यह छंदोग्य उपनिषद का है ऑल दिस इज ब्रह्मन फ्रॉम इट द यूनिवर्स कम्स फोर्थ इन इट द यूनिवर्स मजेस एंड इन इट द यूनिवर्स ब्रीथ्स यह जो जगत में जो कुछ भी देख रहे हो सब ब्रह्मण है। इसी ब्रह्मण में से ही यह जो विश्व ब्रह्मांड है उसका जन्म होता है। इसी के भीतर में इसका जैसे कि वो ये हो जाता है। इसके भीतर में मर्ज हो जाता है। डिजोल्व हो जाता है और यह जो यूनिवर्स है वह ब्रह्मन के भीतर में ही वह ब्रीथ करता है। ब्रह्मन के भीतर में ही यह जीता है। व्हिच इज वेरी स्टैंडर्ड उपदेश और इसी के बारे में हम लीला प्रसंग में भी डिस्कस कर रहे थे। अभी देखिए जो मेरा पर्सनल जो एक एक्सपीरियंस है वह मैं वह उससे मैंने क्या सीखा कि अपना वर्ल्ड व्यू चाहे कितना ही बड़ा हो हमारा हार्ट जो है कभी-कभी उसके साथ में मैच नहीं होता। तो यह जो डायनेमिक्स है वो किस तरह से वर्कआउट होते हैं हमारे जीवन में। एक जनरल एटीट्यूड आप देखिए। जनरल एटीट्यूड क्या है कि हमारा जो लाइफ होता है, हमारा जो वर्ल्ड व्यू होता है, हमारा फैमिली और हमारी करियर यहां तक यह सीमित होता है और हमारा जो एक हार्ट है, वो एक जनरल सेल्फ सेंटर्डनेस होता है कि हां मैं अपना कैसे भी करके ग्रेजुएशन करके अच्छा सा शादी करके एक फैमिली बसा लूंगा। एक नया घर लूंगा, नई कार लूंगा, नए गैजेट्स लूंगा और अपने बीवी बच्चों की संभल रखूंगा। एक जनरल एक मेरा सेल्फ सेंटर्ड एटीट्यूड होता है। कभी-कभी क्या होता है कि मेरा वर्ल्ड व्यू जो है वह एक्सपंड तो बड़ा होता है किंतु मेरा हार्ट जो है उसके साथ में एक्सपैंड नहीं होता और यह जब ऐसी परिस्थिति आती है तो बड़ा ही भयानक एक कांड होता है। मैं मान लीजिए कि मैं पेट्रियोट हूं। मैंने सोचा न्यूज़ पेपर पढ़ के जैसा आजकल सोशल मीडिया पोस्ट पढ़ के कि ये जो जगत है उसमें मेरा जो देश है उसको जो सम्मान मिलना चाहिए उसका एक जो एक इंटरनेशनल जिओपॉलिटिकलेंस होना चाहिए वो नहीं मिल रहा है। खास करके यह जो हमारे सामने कुछ-कुछ एग्जांपल है स्टेलिन, माओ, हिटलर। हिटलर का देखिए कि सेकंड वर्ल्ड फर्स्ट वर्ल्ड वॉर के बाद में हिट जर्मनी की इतनी भयानक अवदशा थी कि हिटलर ने यह सोचना शुरू किया कि जो फादरलैंड है जर्मनी उसको फिर से ग्रेट बनाना है। किंतु फादरलैंड को ग्रेट बनाते बनाते उसका जो हार्ट है वो इतना टॉक्सिक हो गया था। उसके हार्ट उसका जो हार्ट है इतना टॉक्सिकली सेल्फ सेंटर्ड हो गया था कि देश का प्रगति करने के लिए उसने आधे विश्व को युद्ध में डाल दिया। सिर्फ इतना ही नहीं यह जो जूस है यहूदी है उनका भयानक रूप से हत्याकांड करना शुरू किया। और देखिए कि कभी-कभी ना उसका जो राक्षसी ये जो स्वभाव है वो हमको समझ में नहीं आता। हम लोग उसके वर्ल्ड व्यू को लेकर के बड़े ही इंप्रेस हो जाते हैं। मेरा एक खुद का अनुभव बताता हूं। एक ग्रुप था है ऑनलाइन वे लोग इस तरह से लेक्चर्स करते हैं। तो मुझे एक बार बुलाया कि हम लोग मुझे मैसेज किया उसने कहीं से मेरा नाम सुना होगा उस समय मैं राजकोट में था। कहा कि अच्छा हम लोगों का इस तरह से ग्रुप है तो आप हमको आकर के ऑनलाइन एक युवाओं के लिए एक स्पीच दीजिए। इंस्पिरेशनल स्पीच स्वामी जी के आइडियाज पे। मैंने कहा ठीक है टाइम और वगैरह सब ठीक करो। हम लोग करेंगे तो उसने टाइम वगैरह ठीक किया मैंने वो बोला भी सही स्वामी जी के आइडियाज वगैरह वगैरह सब कुछ समाप्त हो गया पर और उसका ये जो उनका यह था जो मेन आदमी वहां का कोऑर्डिनेटर मुझे बड़ा अच्छा लगा वो यूथ के साथ में काम करता है और वो इंटरेस्ट रखता है कि इस तरह के साधुओं को बुला के लड़कों के सामने स्पीच दिया जाए वि इज वेरी गुड बहुत अच्छा लगा तो मैंने फिर स्पीच समाप्त करके उसको मैंने बड़ा धन्यवाद भी दिया उसकी बड़ी प्रशंसा भी की सब चल रहा है आखिर आखिर में इस आदमी ने एक स्टेटमेंट दे दिया कि देखो कि हमको पेट्रियोटिज्म हमारे सबके भीतर में होना चाहिए। स्वामी जी का एक बहुत बड़ा आइडियल है। ये गांव में जो शिव ज्ञान जीव सेवा यह एक तो बहुत बड़ा आइडियल है। फिर यह पेट्रियोटिज्म एक बहुत बड़ा आइडियल है। देखिए कि फिर यह आदमी कह रहा है। देखिए कि हिटलर में भी इतना पेट्रियोटिज्म था। हिटलर ने चाहे और जो कुछ भी किया हो उसका पेट्रियोटिज्म हमको सीखना चाहिए। जैसे ही उसने यह कहा वैसे ही मेरा टेंपर एकदम आउट ऑफ कंट्रोल हो गया। मैंने कहा अरे पगले तुमको कुछ समझ में भी आता है कि नहीं? तुमने इतिहास फतिहास कुछ पढ़ा है कि नहीं? तो पूरे भारतवर्ष में तुमको और कोई आदर्श नहीं मिला पेट्रियोटिज्म का। ये लाल बाल पाल ये जो अपने है जस्ट रीड अपना भारत का ये जो स्वतंत्रता संग्राम है ये जो जवाहरलाल नेहरू है सरदार पटेल है महात्मा गांधी है ये सुभाष चंद्र बोस है और ये तो मैं जस्ट कुछ नाम कह रहा हूं आप लोकल लेवल पर जाइए प्रत्येक गांव में प्रत्येक शहर में प्रत्येक राज्य में आपको कितने कितने पेट्रियोट देखने को मिलेंगे वो पूरा भारत का इतिहास खोज के देख लीजिए ये झांसी की रानी है शिवाजी है महाराणा प्रताप है कौन थे ये लोग सब तुमको क्या पेट्रियोटिज्म का और कोई उदाहरण नहीं मिला। वो पगले हिटलर को यहां पे ले आ रहे हो। ऐसा बोल के मैं तो जो मेरा हो गया था मेरा टेंपर हाई हो गया था। वो भी डर गया एकदम। देखिए उस समय मुझे यह बात का आश्चर्य हुआ था कि उसने हिटलर का नाम क्यों लिया पेट्रियोटिज्म सिखाने के लिए? किंतु बाद में मैंने देखा है कि एक पूरा एक ग्रुप है। माने एक पूरा एक माइंडसेट है भारत में। जो लोग हिटलर को बड़ा रिस्पेक्ट करते हैं। हिटलर में पेट्रियोटिज्म था। भले ही चाहे उसने और जो कुछ भी किया हो उसके पास में से हमको पेट्रियोटिज्म सीखना है। ये जो आईडिया है ये जो कांसेप्ट है कितना डेंजरस है। हम उसका वर्ल्ड व्यू शायद पेट्रियोटिज्म देश का भला होना है। इस बात में तो कोई इंकार नहीं करता। पेट्रियोटिज्म बहुत अच्छा एक गुण है। स्वामी जी ने खुद ने हमको सिखाया है। किंतु उस गुण के साथ में उसका जो हृदय था बड़ा ही भयानक राक्षसी हृदय था। जिस तरह से उसने लोगों पे अत्याचार किया है, जिस तरह से कंसंट्रेशन कैंप में जूस के ऊपर में यह जो मेडिकल एक्सपेरिमेंट होते थे, उनका जो माने गेस्ट चेंबर में उनका हत्या होती थी। और भी क्या-क्या? सेकंड वर्ल्ड वॉर का हिस्ट्री पढ़िए। हिटलर का हिस्ट्री पढ़िए। वो आदमी नहीं था, राक्षस था। और वैसे ही ये स्टालिन और माओ। यह माओइज़्म का बड़ा चलता है। माओस्ट है हम लोग। क्यों? क्योंकि माओ ने अपने देश का इतना कल्याण किया। हम भी करना चाहते हैं। इस माओ ने जो पागलपन चाइना में किया है, चाइना में खुद में माओ का लिगसी है। उसको रिजेक्ट कर दिया है। तो हम लोगों को कभी-कभी यह समझ में नहीं आता कि किसी का वर्ल्ड व्यू बहुत अच्छा है। किंतु उसका हृदय जो है ना राक्षस का है। ऐसे लोगों को बिल्कुल आपको रिजेक्ट कर देना है। और एक ऐसा एक उदाहरण एक मेड साइंटिस्ट किताबों में एक आता है कि उसने बहुत बड़ा बहुत बुद्धि तो बहुत था उसका। वर्ल्ड व्यू बड़े हाई साइंटिफिक आइडियाज है। किंतु हाई साइंटिफिक आईडियाज से उसने किया क्या? तो वेपंस ऑफ मास डिस्ट्रक्शन बनाए। ऐसा कुछ भयानक कुछ उसने कर दिया कि पूरी पृथ्वी को उससे खतरा हो गया। यानी कि सिर्फ वर्ल्ड व्यू आपका उच्च कक्षा का है, पेट्रियोटिज्म है, हायर साइंटिफिक आइडियाज है, कोई आर्टिस्टिक अचीवमेंट है। डज नॉट मीन कि आपका जो हार्ट है, वह भी सोने का होगा। हो सकता है कि उसमें टॉक्सिक सेल्फ सेंटर्डनेस भरी हो जो कि पूरे समाज को उससे बड़ा खतरा हो। सो दैट इज़ वन थिंग वी हैव टू रिमेंबर। इसके बाद में देखिए कि एक तो देख लिया कि जिसका वर्ल्ड व्यू है वह भी लिमिटेड है। उसका हार्ट है वह भी लिमिटेड है। दूसरा देखा कि वर्ल्ड व्यू तो उसका हायर है किंतु उसका हार्ट जो है बड़ा ही टॉक्सिकली सेल्फ सेंटर्ड है। व्हिच इज़ वेरी बैड। उसके बाद में एक कैटेगरी आता है कि वर्ल्ड व्यू तो उनका बड़ा हायर है। जैसे कि महात्मा गांधी का पेटियोटिज्म देखिए। अल्बर्ट आइंस्टाइन के यह जो हाई साइंटिफिक आइडियाज देखिए। मेरा खुद का एक जो भीतर में था कि मैं गांव में जाकर काम करूंगा और साथ में हार्ट देखिए। एंपैथी होती है। एंपैथी नहीं होने से आप इस तरह का कार्य नहीं कर पाएंगे। तो एमैथी होती है किंतु साथ-साथ में ही सेल्फ सेंटर्डनेस होती है जो कि हम समझ नहीं पाते कि वह है। बड़ा लंबा सेल्फ एनालिसिस करने के बाद में आखिर में समझ में आता है कि वो सेल्फ सेंटर्डनेस है यहां पे। तो वो एक कैटेगरी है। इसके बाद में देखिए कि वर्ल्ड व्यू तो बड़ा लिमिटेड है किंतु उनका हार्ट जो है वह सोने का हो चुका है। जैसे कि यह एग्जांपल है वो बड़ी फेमस कहानी कि वो ब्रह्मचारी है उसको बड़ा नाराज हो गया तो पंखियों को उसने जला दिया। किंतु वही ब्रह्मचारी जब शहर में जाता है, गांव में जाता है भिक्षा लेने के लिए और वह जो एक सती है उसको धमक देता है तब वह सती क्या कहती है कि देखिए आपको वो जो कौवे और जो बतख है उसको जलाने वाली बात यहां पर नहीं है। मैं अपने पति की सेवा कर रही हूं तो सेवा जब समाप्त होगी तब मैं आपको भिक्षा दूंगी। तब यह ब्रह्मचारी भी बेचारा समझ में आया कि उसकी जो तपस की शक्ति है वो सती पर काम नहीं कर रही है। उसके बाद में इसी सती ने इस ब्रह्मचारी को एक कसाई के पास में भेजा। अभी देखिए कसाई है ना कि एक गृहिणी है। उनका वर्ल्ड व्यू तो बड़ा लिमिटेड है। वही जो लिमिटेड वर्ल्ड व्यू यहां पे फैमिली और कैरियर का था वही लिमिटेड वर्ल्ड व्यू यहां पे फैमिली और कैरियर का है। किंतु उनका जो हार्ट है उसमें यह जो सर्वम खलवम इदम ब्रह्मन का जो कांसेप्ट है वह एक्चुअली वहां पे ये हुआ है। प्रैक्टिकल हुआ है। और सही में उनके हृदय में इनफाइनाइट लव टुवर्ड्स ऑल यह प्रकट हुआ है। और हाईएस्ट कैटेगरी है। वह तो हमको पता ही है। ठाकुर मां स्वामी जी इनका वर्ल्ड व्यू कहां-कहां तक गया था। ठाकुर का निर्विकल्प समाधि मां शारदा का समस्त मनुष्य प्रजा के प्रति जो प्रेम यह जो स्वामी जी का सिविलाइजेशनल अंडरस्टैंडिंग बुद्ध और जीसस का जो प्रजा के प्रति प्रेम और साथ में ही उनका जो हार्ट है उसमें था इनफाइनाइट लव। तो दिस इज द हाईएस्ट आइडियल कि हमारा वर्थ क्या है? तो हमारा हृदय जो है हृदय जो कहता है दैट इज आवर रियल असेसमेंट दैट इज आवर रियल वर्थ यदि मैं टॉक्सिकली सेल्फ सेंटर्ड हूं तो फिर मेरा वर्ल्ड व्यू कितना ही हायर हो डज नॉट मैटर यदि मेरा वर्ल्ड वर्ल्ड व्यू आगे बढ़ता है हायर होता है और साथ में मेरे हृदय में भी संस्कार होना शुरू हो जाता है तब कहीं जाकर के मैं यह जो आध्यात्मिक जगत है उसमें मैं आगे कदम करना शुरू करता हूं आगे कुछ करना शुरू करता हूं सो दिस इज एक मेरा जो रांची का जो लर्निंग है बेस्ड ऑन दिस यह जो आईडिया है सर्वम खलविदम ब्रह्म उसका मेरा एक एनालिसिस तो आज यहीं तक अभी कल फिर से ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु
प्रश्न: यदि वे आपको पुनः रांची भेजेंगे तो आप कैसे काम करेंगे?
मैं वही वही सब कुछ करूंगा जो कि मैंने पहली बार किया था। किंतु यह जो मेरे हार्ट में ये जो रिजेंटमेंट जो डेवलप हो गया था कुछ-कुछ लोगों के प्रति उसको मैं बड़ा एक्टिवली मिनिमाइज करने का प्रयास करूंगा।
प्रश्न: क्या आप पुनः रांची जाना चाहते हैं?
ना देखिए मैं इंटरेस्टिंगली मैं रांची से वापस आया तो फिर सुहिता वहां पे मैं बेलूर मठ में था जॉइ करने के लिए वापस आया। तो मेरा जब पोस्टिंग होना था तो सुहितानंद जी ने मुझे कहा कि देखो हम लोग तुमको नागपुर भेजते हैं। वहां पर नया मंदिर बन रहा है। तो मंदिर में काम करना क्योंकि तुम्हारा पूरा आउट ऑफ बैलेंस है सब कुछ। वो गांव का काम ये वो सब अपना एक ट्रेडिशनल स्पिरिचुअलिटी तुम सीखो वरना तो फिर क्या है तुम अपने ऑर्डर में कभी एडजस्ट नहीं हो पाओगे। तो मैंने कहा ठीक है महाराज जैसा आपका है अभी तो यहां पे आ गए हूं। अभी तो आप जो बोलेंगे स्वीकार करना ही है। मैं चाहूं ना चाहूं। तो ठीक है मैं नागपुर गया। तो नागपुर के बाद में ट्रेनिंग सेंटर और ट्रेनिंग सेंटर के बाद में पता नहीं कैसे वो पब्लिकेशन में आ गया। सो नाउ फॉर 20 इयर्स नियरली जितना भी टाइम मैंने अपने ऑर्डर में बिताया है इफेक्टिवली स्पीकिंग मैंने पब्लिकेशन में ही बिताया है और इसके बाद में अभी कुछ भी नहीं है। म ना ही पब्लिकेशन है ना ही रूरल डेवलपमेंट है। किंतु अभी क्या है कि मेरा जो माइंडसेट है अभी ये आइडियाज को लेकर के इतना इनवॉल्वड है। मैं दिनरा यही सब सोचता रहता हूं। फिर मैं लिखता हूं। फिर यह सब जो मेरा रिसर्च एंड डेवलपमेंट चल रहा है। सो मुझे देखिए मुझे यदि रांची भेजेंगे भी आई विल ट्राई टू वर्क माय बेस्ट किंतु मैं अपने से जाना नहीं चाहूंगा। आई विल राइट नाउ मैं क्या चाहूंगा कि मेरे पास में इतना इनफ टाइम हो कि मैं अपने आइडियाज को डेवलप कर पाऊं। बिकॉज़ मुझे ऐसा लग रहा है कि दिस इज वन फील्ड वेयर आई कैन रियली कंट्रीब्यूट। मैं रांची में यदि मेरा सब कुछ लगा भी दूंगा ना तो मैं इतना कंट्रीब्यूशन नहीं कर पाऊंगा अल्टीमेटली जितना कि मैं वर्ल्ड ऑफ आइडियाज में कर पाऊंगा।
प्रश्न: रांची के ग्रामीण क्षेत्रों में हमारे काम का क्या प्रभाव पड़ा?
बहुत अच्छा माने यू हैव टू सीन टू बिलीव माने आप जब तक नहीं देखेंगे ना आप विश्वास नहीं करेंगे। कुछ-कुछ हमारे जैसे कि किसान मेला होता था। साल में एक बार किसान मेला होगा। यह सर्दी के सीजन में यह जो पाक जब हो जाता है ना फसल जब आ जाती है तो किसान मेला होता है सब किसान इकट्ठा हो के अपना जो कुछ भी है वहां पे सेल करने के लिए आएंगे लाइव स्टॉक है वो हनी है उनकी फसल है वगैरह तो वो किसान मेला इतना सुंदर होता था हमारा वैसे और भी ऑर्गेनाइजेशन है इवन गवर्नमेंट ये किसान मेला करवाती थी फार्मर्स फेयर तो किंतु हमारा था वो यूनिक था क्योंकि जो पार्टिसिपेशन था। लोगों का हृदय से पार्टिसिपेशन था। ऐसा नहीं है कि कोई वीआईपी आ रहा है तो ट्रक भर के आदमियों को ले आओ। पर हेड उनको इतना देना है। पर ट्रक इतना देना है आपको। ऐसा करके लोगों को ले आए। ऐसा नहीं जो पार्टिसिपेशन है वो हाईएस्ट था और वो फ्रॉम द हार्ट था। और वहां पे जो कल्चरल एक्टिविटीज होती थी। हमारे बच्चे जो सब प्रेजेंट करते थे, प्रेजेंटेशन करते थे। अपने वो भजन है, नृत्य है, वो गांव के वगैरह कहानी है, वहां के गांव के लीडर्स का जो उनका एक स्पीच रहता था व्हिच वास वंडरफुल। जिन लोगों ने वो हमारा किसान मेला देखा है उस समय का वे लोग उसको कभी नहीं भूलेंगे। इस तरह का बॉटम ऑफ द हार्ट पार्टिसिपेशन वो भी इन लोगों का ट्राइबल एरिया देखिए कि वहां पे मैक्सिमम कन्वर्सेशन कन्वर्शन है। आज उस लोगों का यह पार्टिसिपेशन व्हिच इज़ रियली यूनिक। और दूसरा कि जो चीज आपको एकदम नजर से सामने दिख जाएगी वह आप गांव में जाएंगे तो आपको जो रिस्पेक्ट मिलेगा आप इवन जो वहां का जो ये होता है डीएम वगैरह जो होता है वहां के जो दरोगा होते हैं ये जो आईएएस ऑफिसर होते हैं वे लोग जाते हैं तो रिस्पेक्ट मिलता है किंतु हमारी ओर से जब आप जाएंगे ना यू यू विल रियली फील डिफरेंस ये जो बहुत सारे जो ये होते हैं ना लोकल गवर्नमेंट ऑफिसर हमारे साथ में गांव में आना पसंद करते थे एक तो है कि एमसीसी का कभी डर नहीं रहेगा माओवाओवादी कभी हमारे पे हमला नहीं करेंगे और किसी पे हमला करें वो बड़ा ही डेंजरस एरिया था जहां पे हम काम करते थे तो हमारे पे पूरा हिस्ट्री में एक भी अटैक नहीं हुआ है व्हिच इज वेरी यूनिक तो वो सेफ है दूसरा कि हमको जो रिस्पेक्ट मिलता है व्हिच इज जेन्युइन अब जाने से ही आपको समझ में आएगा सो व्हिच आर यूनिक एस्पेक्ट्स ऑफ आवर वर्क
प्रश्न: हमारे काम से आदिवासियों के जीवन में वास्तविक सुधार हुआ होगा?
चेंज आता है किंतु वो चेंज है ना फिर आपको जनरेशनल लेवल पर दिखाई देगा विद इन वन लाइफ टाइम नहीं दिखाई देगा ठाकुर की कृपा से देखिए 1900 तो 28 ना कि ऐसा कुछ वहां से हम काम कर रहे हैं। तो और ये जो करंट जो हमारा केवी के लेवल का वर्क है वो 30-4 इयर्स से होता आ रहा है। तो विदिन 30-4 ईयर लाइफ टाइम स्पान आप देखेंगे तो काफी आपको इंप्रूवमेंट दिख जाएगी। सो दैट इज वन थिंग। आप दो-ती साल देखिए हमारा कभी-कभी कोई प्रोजेक्ट चलता है ना तो जहां से पैसा आता है वे लोग बड़े दौड़े-दौड़े आते हैं। महाराज आप लोग एक साल से प्रोजेक्ट कर रहे हैं। अभी सक्सेस स्टोरी दिखा दीजिए क्योंकि क्या उनका तो करियर ही पूरा सक्सेस स्टोरी दिखाने पे बनता है ना। अभी वहां से प्रोजेक्ट चल रहा है तो उनके कुछ मैनेजर आके कहेंगे कैसे भी करके सक्सेस स्टोरी दिखा दीजिए तो हमारा प्रमोशन हो जाए। अब यह प्रमोशन हो जाए ऐसा मुंह से तो नहीं बोलेंगे किंतु इतना समझ में ना आए ऐसे मूर्ख तो हम नहीं है। तो किंतु अभी एकद साल में आप क्या सक्सेस स्टोरी दिखाएंगे? दिखा सकते हैं दिखाने के लिए। किंतु ये सब सरफेस लेवल पे होगा। रियली आपको चेंज देखना है। यू कैन सी द चेंज। 20-30 इयर्स टाइमलाइन पे आप देख सकते हैं चेंज। एक्चुअली क्या है पता है? शशांकानंद
प्रश्न: क्या रांची में काम अभी भी चल रहा है?
जी जहां पे सेक्रेटरी थे उस समय उनका यह बहुत ही एक इंटरेस्ट का विषय था। तो शशांकानंद जी ने बहुत पुश करके यह सब गांव के लेवल पर कार्य करवाते थे। अभी क्या है? थोड़ा सा हमारा वर्किंग मेथड चेंज हो गया है। अभी यूनिवर्सिटी का कैंपस है वहां पे एक्सटेंशन कैंपस। यह जो अपना आरकेएम वेरी जो है बेलूर मठ का यूनिवर्सिटी उसका रूरल डेवलपमेंट कैंपस वहां पे है। तो अपना फोकस अभी ये बीएससी वगैरह जो कोर्सेज ऑफर करने में ज्यादा है। व्हिच इज़ इन अ वे अपग्रेडेशन। इसके पहले जो केवी के जो कोर्सेज होते हैं वो तो बड़े बेसिक लेवल के होते थे। अभी हम हायर कोर्सेज बीएससी, एमएससी, एमएसडब्ल्यू, पीएचडी वहां तक अभी हम ऑफर कर रहे हैं। तो दैट वे वह एक अपग्रेडेशन है। किंतु यह जो गांव के लेवल पे एक साधु जाएगा नियमित रूप से गांव के लेवल का हमारा टीम ऑफ वॉलंटियर है, विवेकानंद सेवा संघ है, वह सब चीजें अभी जहां तक मैंने सुना है, मैं कभी वापस नहीं गया। किंतु जहां तक मैंने सुना है, अभी इतनी एक्टिव नहीं है।
स्वामी शशांकानंद
देखिए, मैं संघ में हूं। बिकॉज़ ऑफ शशांकानंद जी मैं जब बेलूर मठ छोड़ के वहां पर गया था सुतानंद जी ने रिकमेंडेड तो मुझे कर दिया था एक रिकमेंडेशन लेटर लिख दिया था कि यह लड़का आता है उसको साधु होना ऐसा नहीं किंतु गांव में काम करना चाहता है तो उसको देखिए आप क्या कर सकते हैं तो शशांकानंद जी ने मुझे पूछा कि क्या तुमको यह कॉन्फ्लिक्ट है कि तुमको सेवा करनी है किंतु साधु नहीं होना मैंने कहा ऐसा कोई क्फ्लिक्ट नहीं है किंतु अपने ऑर्डर में रहेंगे तो मुझे नहीं लगता सेवा का मौका मुझे इस तरह से मिलेगा ये ये लोग मुझे कहीं पूजा-पूजा में लगा देंगे जो कि मुझे नहीं करना। मुझे डायरेक्ट सेवा ही करनी है। तो मुझे बोला कि अच्छा ठीक है तुम एज अ ब्रह्मचारी रहो और गांव में जाकर सेवा करना। तो वो जो उन्होंने मुझे संभाल लिया उस क्रिटिकल टाइम में और फिर मुझे इतना सपोर्ट किया है। इतना सपोर्ट किया है। मेरे जितने भी रिस्की एडवेंचर थे सब उन्होंने मुझे सपोर्ट किया है। सो टू माय सेटिस्फेक्शन टू माय हार्ट्स कंटेंटमेंट मैंने काम किया जो कि उनके अलावा संभव ही नहीं था। उतना और कोई मुझे सपोर्ट नहीं करता। और आखिर में जब यह जो मेरा एक डिसइल्यूजनमेंट एक प्रारंभ हुआ कि अरे नहीं यहां पर बहुत हो गया तो उन्होंने डायरेक्ट सुहितानंद जी को बोला कि ये लड़का अभी यह बोल रहा है कि ये यहां पे नहीं रहना वो बोल रहा है कि मैं गांव में जाकर रहूंगा ऐसा कुछ गड़बड़ गड़बड़ सोच रहा है। तो इमीडिएटली सुहेानंद जी ने उनकी रिकमेंडेशन पे मुझे वापस ले लिया। सो आई एम हियर ओनली बिकॉज़ ऑफ़ शशांकानंद जी। उनका मेरे पर बहुत बड़ा ऋण है। देखिए मैं
प्रश्न: रांची में आपके सब कर्म क्षय हो गए
वर्ल्ड ऑफ आइडियाज जिसमें अभी रह रहा हूं वह यदि रांची में मेरा वर्कआउट नहीं हुआ होता रजस तो मैं कभी भी नहीं रह पाता। मेरे भीतर में से इतना रेस्टलेसनेस आता मैं ऑर्डर में नहीं रह पाता। यदि मैं जॉइ कर भी लेता मैं बेलूरम गया था जॉइ करने के लिए। यदि अपने मन को मार करके वहां पे रह भी जाता ना तो इवेंचुअली ऐसा होता 10 12 साल के बाद में कि वहां से जाना ही होता। तो क्योंकि भीतर में यह जो रजस होता है उसको वर्कउ करना होता है। नहीं करेंगे तो इट विल कम आउट इन अनदर वे और बेटर है कि इस तरह से वर्कआउट हो गया और मुझे बहुत बड़ा लेसन मिला लाइफ का स्पिरिचुअल लेसन और और भी देखिए यह तो मैं कुछ ऊपर ऊपर से बता रहा हूं। बहुत सारी चीजें हम सीखते हैं। एक्सपीरियंस जो हमको सिखाता है उसको आप शब्दों में व्यक्त भी नहीं कर पाते। उसको आप आर्टिकुलेट भी नहीं कर पाते। जो हृदय के संस्कार जो वर्कआउट होते हैं संस्कारों का जो ये होता है वो जो वाशिंग मशीन उसमें डाल के उसका यह जो सफाई जो होती है उसको तो हम आर्टिकुलेट भी नहीं कभी कर पाएंगे
प्रश्न: कभी-कभी धनी लोग भी हमारी सेवाओं का लाभ उठाने का प्रयास करते हैं
ना किंतु यहीं पे हमारा लर्निंग ये जो मेरा जो लर्निंग था यहीं पे मुझे यह बात समझ में आई ना कि आइडियल वि इज वेरी डिफरेंट हम लोगों को मेजर करते हैं कि इसका कैपेसिटी है पे करने का इसका कैपेसिटी नहीं है। एक्चुअली देयर शुड बी नो मेज़रमेंट। जो आता है वह अह प्राप्त्य है। वह सेवा ग्रहण करने का वह अधिकारी है। मां के पास में एग्जैक्टली यही प्रश्न आया। वहां पे वह जो दातव्य चिकित्सालय चल रहा था चैरिटेबल डिस्पेंसरी, वहां के जो इंचार्ज स्वामी जी थे, जाकर के मां को बोला कि मां यहां पे तो गरीब लोगों के लिए हम लोग दवाई रखते हैं। किंतु जिन लोगों के पास में पैसा देने की क्षमता है, वह भी आकर के यहां पे दवाई मांगते हैं। तो, हम क्या करें? तो मां ने क्या उत्तर दिया? बेटा जो मांगता है, वह गरीब है। उसको यह दे दो। यानी कि बिना किसी विचार के सेवा करना। मां का प्रेम बच्चे पर कि वो बच्चा पास होता है परीक्षा में कि फेल होता है। डज नॉट मैटर। हर लव इज इक्वल टुवर्ड्स ऑल। ये सर्वम खलवम इदम ब्रह्म। व्हाट इज दैट? कि हम लोग लोगों में कैटेगरी कभी नहीं करते। यह इसका अधिकारी है। यह अधिकारी नहीं है। जब तक हम लोगों को कैटेगराइज करेंगे, जब तक हम लोग लोगों को डिवाइड करेंगे, तब तक हम यह आध्यात्मिकता का जो बेसिक कांसेप्ट है, वही नहीं समझे हैं। यह बड़ा इंटरेस्टिंग इंसिडेंट है। नियम होने चाहिए। बिना नियम के कुछ अभी चलता नहीं है। संघ चलाना है तो बिना नियम के आप कैसे चलाएंगे? वहां पर बेलूर मठ में एक नौकर था जिसने चोरी की और चोरी करते पकड़ा गया। स्वामी जी के पास उसको लाया गया। स्वामी जी ने उसको धमक देकर भगा दिया। अब यह नौकर भी बड़ा चालाक था। गया सीधा उद्बोधन जाकर मां के पास में रोने लगा कि मां स्वामी जी ने धमक दी और मुझे वहां से भगा दिया। तो मां बेचारी कहती है अच्छा बेटा डरो मत चिंता मत करो मैं तुमको वापस भेजती हूं। अभी उसी दिन बाबूराम महाराज वो वहां पर मां को प्रणाम करने के लिए आए। तो मां ने कहा बाबूराम एक काम करो इस नौकर को ले जाओ। वहां पर फिर से नौकरी पर रख देना। तो बाबूराम महाराज तो पता है कि स्वामी जी का गुस्सा कैसा है? तो डरते डरते मां को कहते हैं मां इसने चोरी की है। मैं यदि वापस ले जाऊंगा तो स्वामी जी मुझे मार ही डालेंगे। तो मां बोलती है मां नाराज हो गई। कहा कि मैं कहती हूं इसको ले जाओ। तुम कौन होते हैं स्वामी जी? मेरी आज्ञा का उल्लंघन करने वाले। तो मां ने ऐसा जोर देकर कहा तो बाबूराम महाराज डर गए। लेकर डरते डरते गए बेलूर मठ में। जैसे ही स्वामी जी ने देखा वो नौकर को लेकर के वो बाबूराम महाराज आ रहे। जोर से चिल्ला उठे कि देखो बाबू रामेर कांडो। देखो उसका क्या उसने गड़बड़ कर दी है। उसको वापस ले आया है। तो बाबूराम महाराज ने सीधा मां का नाम ले कहा कि मां ने उसको वापस भेजा है। स्वामी जी एकदम चुप हो गए। बोला कि मां ने भेजा है। अच्छा ठीक है। रख लो इसको वापस। तो दिस इज द आइडियल जो कि मुझे रांची में धीरे-धीरे करके समझ में आ रहा था कि हम लोग नियम के अनुसार सब कुछ करना चाहते हैं। व्हिच इज वेरी गुड। बट बिय्ड द लॉ देयर इज द लॉ ऑफ़ द हार्ट। देयर इज़ अ लॉ ऑफ़ द वर्ल्ड एंड देयर इज़ अ लॉ ऑफ़ द हार्ट। यह हृदय का जो नियम है कि सबके प्रति समान प्रेम चोर हो ना कि उचक्का हो ना कि वह फांकीबाज हो ना कि करप्ट हो डज नॉट मैटर हृदय में से सबके प्रति समान प्रेम रहना चाहिए व्हिच इज समथिंग हमको सबको सीखने की जरूरत है
प्रश्न: हम सभी से समान रूप से प्रेम कर सकते हैं, लेकिन हम सभी के साथ एक जैसा व्यवहार नहीं कर सकते।
यस यस यस अगेन अगेन मां का ही उदाहरण मां का ही उदाहरण मां के एक शिष्य ने कुछ गड़बड़ कर दी तो ठीक हुआ अभी ये जो अपने वरिष्ठ लोग थे संघ के शरद महाराज राजा महाराज ठीक किया कि उसको भगा देंगे ऑर्डर से। तो यह साधु रोता मां के पास गया। कहा कि मां मैंने गलती की है वो मैं क्षमा चाहता हूं। आप कैसे भी करके मुझे संग में रख दीजिए। मां ने कहा देखो बेटा तुम्हारे प्रति मेरा स्नेह वैसा ही रहेगा जैसा पहले था। किंतु जो संघ के नियम है उसके अनुसार यदि तुमको जाने को कहा जाता है तो तुमको जाना होगा। ऐसा मां ने उसको कहा। तो ऐसा नहीं है कि अब जैसे मेरी नजर के सामने करप्शन चल रहा है तो मैं थोड़ी ना उसको अलऊ करूंगा। मुझे तो बोलना ही होगा। प्रश्न कहां पे आता है कि उसके प्रति रिजेंटमेंट मेरे हृदय में नहीं होनी चाहिए। दैट इज द क्रिटिकल डिस्टिंशन।
प्रश्न: कभी-कभी हम दूसरों पर नाराज हो जाते हैं। इस आक्रोश से कैसे छुटकारा पाएँ?
देखिए इसीलिए तो ये साधना है ना। राजा महाराज क्या कहते हैं? वर्क इज वरशिप तो बाद में होगा। पहले वर्क एंड वरशिप कर लो। ये जो ट्रेडिशनल साधना है जप ध्यान कथामृत पाठ पूजा तीर्थ तीर्थ भ्रमण ये जो सत्संग ये सब साथ-साथ में चालू रखना है। मैं जो रांची में यह बात नहीं समझ पा रहा था शुरू-शुर में कि सिर्फ सेवा करनी है इस आदर्श से गया था। स्पिरिचुअल प्रैक्टिस मेरी कोई इतनी वहां पे नहीं थी। बाद में मुझे पता चला यदि अपनी स्पिरिचुअल प्रैक्टिस नहीं है तो अपना हार्ट ना धीरे-धीरे करके संकुचित होने लगेगा। हम सबको दोष की दृष्टि से देखना शुरू कर देंगे। तो उच्च आदर्श भी होना चाहिए जीवन में। साथ-साथ में यह आध्यात्मिक जो प्रैक्टिससेस है, साधना है, उसको भी हमको चालू रखना है।
प्रश्न: कुछ लोग हमारे साथ बुरा व्यवहार करते हैं। हम उनसे दूर रहने की कोशिश करते हैं, लेकिन वास्तव में हम उनके प्रति दयालु नहीं हो पाते। तो क्या इससे मेरी साधना को नुकसान होगा?
नहीं नहीं बिल्कुल नहीं। जैसे देखिए बाबूराम महाराज की मां जाकर ठाकुर को कहती है कि मैं तो सबके हाथ का खाना नहीं खा सकती हूं। अभी जो एक आइडियल होता है कि आप नाथ जात यह सब भेदभाव मत देखें। वैष्णव लोगों में कभी-कभी बहुत होता है। इसके हाथ का खाना खाना है। उसके हाथ का नहीं खाना है। हमारी जात यह जात वो सब बहुत ये नीति नियम होता है। तो अभी ठाकुर का उदाहरण तो सबको पता है कि सब नाथ जात से परे चले गए। तो ये बाबूराम महाराज की मां जाकर कह दिया ठाकुर को कि मैं तो सबके हाथ का खाना नहीं खा सकती। तो मेरा आध्यात्मिक डेवलपमेंट कैसे होगा? ठाकुर ने इमीडिएटली कहा कि सबके हाथ का खाना खाना क्या यह आध्यात्मिक जीवन की साइन है? यह नहीं है। आध्यात्मिक जीवन का आपका प्रोग्रेस हो रहा है। उसका साइन क्या है? आपका हृदय धीरे-धीरे करके करुणा और श्रद्धा भक्ति से भर जा रहा है। यह साइन है। आप सबके हाथ का खाना खाए ना खाए व्हिच इज सेकेंडरी। ये राइट? ठाकुर ने खुद ने नाथ जात से परे जाकर के अपना ये जो जनेऊ है हृदय जाकर के ठाकुर को डांटता है। इतने जन्म जन्मांतर के बाद में ब्राह्मण जन्म मिलता है। इतने सद्भाग्य आप है आपका और आप जनेऊ फेंक के साधना करते हैं। ये क्या पागलपन है? तो ठाकुर ने नाथ जात से परे जाकर के जाति कुल शील ये जो अष्टपाश जो होते हैं जाति कुल शील लज्जा घृणा भय मान अभिमान ये सबसे परे जाकर के ठाकुर ने साधना की थी। किंतु वो आदर्श तो फिर तो धीरे-धीरे करके होगा डेवलप। अभी हम शुरू में ही कर दें कि मैं जाति कुल शील का अभिमान नहीं दूर कर पा रहा हूं तो फिर क्या मेरे मन में जो गिल्ट फीलिंग बैठ जाएगा वो आर भी मुझे डैमेज करेगा। यानी कि आप साधना करते जाइए। बाकी जो अभिमान वगैरह जो दूर होना है जाति अभिमान वगैरह ठाकुर पे छोड़ दीजिए। लोगों के प्रति रिजेंटमेंट है दुश्मनावट है आपकी तो उनसे दूर चले जाइए। व्हिच इज व्हाट वी हैव टू डू। साधना चालू रखिए साथ में।
प्रश्न: मैंने भी वही गलती की है जो मेरे मित्र ने की है। लेकिन परिणाम स्वरूप केवल मैं ही पीड़ित हूँ, जबकि मेरा मित्र काफी खुश है। तो फिर कर्म फल हम पर अलग-अलग क्यों लागू होता है?
वह ठाकुर की वह फेमस कहानी है ना कि दो मित्र हैं। एक मित्र बैठा है जहां पर भागवत पाठ चल रहा है। दूसरा मित्र बैठा है जहां पर वो लड़कियां नृत्य कर रही है। अभी जो नृत्य देख रहा है वो बोल रहा सोच रहा है कि मेरा मित्र कितना ये है अच्छा है। वह भगवत सुन रहा है। और जो भगवत सुन रहा है वह सोच रहा है कि मेरा मित्र कितना चालाक है। वहां पर आनंद कर रहा है। अभी जब जाने की बारी आई मृत्यु की तो भागवत सुन रहा था वह गया नर्क में और नृत्य देख रहा था वह गया स्वर्ग में राइट तो आपने गलती की है डज नॉट मैटर आपका एटीट्यूड क्या है उस समय का यदि आपने ऑनेस्टली कोई गलती कर दी है तो शायद उसका इतना बुरा कर्मफल नहीं लगेगा आपका एटीट्यूड देखना है नहीं कि आपकी एक्शन ये जो मैंने यह जो चार्ट बनाया है ना आप देखिए कि वह जो गृहिणी है वह तो सिर्फ पति की सेवा ही करती है। वह जो कसाई है वह तो जानवर को ही काटता है। अभी कहां पर यह हिटलर स्टेलिन उन लोगों का जो पेट्रियोटिज्म है वह इतना स्ट्रांग था इसके बावजूद यह हिटलर फिटलर सब राक्षस है जबकि वह गृहिणी थी वह संत हो गई आपकी एक्शन क्या है वो डिटरमाइन नहीं करती कि आप कहां पर बैठे हैं या आपका अंतिम गति क्या है आपके हृदय का भाव क्या है वह डिटरमाइन करता है कि आपका आध्यात्मिक जीवन कहां पे जा रहा है। देखिए कर्म का प्रवाह गहना कर्मणो गति जैसे गीता में कहा है कर्म का जो प्रवाह है इतना गहन है कि आप डेफिनेटली नहीं कह पाएंगे कि 1 + 1 = 1 + 1 कभी 11 भी होता है कभी -1 भी हो जाता है जीरो भी हो जाता है। सो इस तरह से डेफिनेटली कुछ भी कहना मुश्किल है। किंतु एक बात जो जनरल नियम है हमेशा ख्याल में रखना है कि हमारे कर्म नहीं हमारी भावना हम डिटरमाइन करती है आध्यात्मिक जीवन को।