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Sri Ramakrishna Lila Prasanga ·

साधक भाव : अवतरणिका || श्रीरामकृष्ण लीलाप्रसंग : स्वामी सारदानन्द रचित || 26 May 2025

prayer

ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपि अवतार वरिष्ठाय रामकृष्णायते नमः श्री रामकृष्ण लीला प्रसंग साधक भाव अवतार जीवन में साधक भाव या तो फिर साधना का क्या प्रयोजन है इसके बारे में शरद महाराज स्वामी शारदानंद जी इस प्रकरण में इस चैप्टर में डिस्कस कर रहे हैं। हमको पता है कि यह पुस्तक स्वामी शारदानंद जी महाराज द्वारा लिखी गई श्री रामकृष्ण देव की प्रामाणिक जीवनी है। माने सबसे ऑथेंटिक बायोग्राफी ऑफ श्री रामकृष्ण। उसमें भी यह जो पांच खंड है उसमें से द्वितीय खंड। अभी जो पॉइंट हमारा चल रहा था इसी प्रकरण के भीतर में मैं एक बार थोड़ा सा पढ़ लेता हूं। फिर इसके ऊपर में डिस्कशन करेंगे। पॉइंट का टाइटल शरद

अवतार के भीतर मनुष्य का अंश भी है - इसलिए उनकी मोक्ष प्राप्ति की साधना आवश्यक है

महाराज ने क्या दिया है? मानव बोलिया ना भाबिले अवतार पुरुष जीवन और चेष्टार और पावा जाए ना। यदि हम मनुष्य के रूप में ना गिने तो अवतार जीवन में साधना का कोई अर्थ ही हमको नहीं देखने को मिलेगा। अवतार का अर्थ क्या है? ईश्वर स्वयं पृथ्वी पर देह धारण करके मनुष्य देह धारण करके अवतरण करते हैं। इनको हम अवतार कहते हैं। अभी किंतु जब वह साधना कर रहे होते हैं। ईश्वर माने यह तो ईश्वर ईश्वर के प्राप्ति के लिए माने खुद मैं खुद मेरी प्राप्ति के लिए साधना कर रहा हूं। यह तो ऐसी बात हो जाएगी। तो फिर यह किस तरह का एक इंटेलेक्चुअल डायलेमा है। एक किस तरह का फिलॉसोफिकल पैराडॉक्स है कि ईश्वर यदि पृथ्वी पर आते हैं मनुष्य होकर के तो क्या अपना ईश्वरत्व विस्मृत हो जाते हैं। अपना जो सही स्वरूप है वह भूल जाते हैं। फिर से कठोर साधना करके उनको अपना सही स्वरूप को प्रगटित करने की आवश्यकता पड़ जाती है क्या? तो यह ऐसा होगा तभी तो उनकी साधना का कुछ प्रयोजन रहेगा। यदि मनुष्य देह धारण करके अवतार पृथ्वी पर आए तो अपना ईश्वरत्व ना भूले तो फिर वह साधना करने का कोई प्रयोजन ही उनकी नजर के सामने नहीं दिखेगा। हमारे हमको ऐसा कोई प्रयोजन नहीं दिखेगा। इसके लिए यहां पर इस पॉइंट का टाइटल महाराज जी ने इस तरह से दिया है कि यदि हम एक अवतार को मनुष्य के रूप में ना सोचे तो उस अवतार की ईश्वर प्राप्ति के लिए जो उपासना है उसका कोई भी अर्थ हमको खोज करके भी मिलेगा नहीं। अच्छा इस पॉइंट में महाराज जी क्या लिखते हैं? नरे असंपर्णता जथाजथ भा अंगीकार करिया छिलेन बोलिया देवो मानव ठाकुर मानव भावे आलोचनाए आमाद गर प्रभुत तो कल्याण साधितो होय एवं ओज नहीं आरा ताहार मानव भाव शकोल सर्वदा पुरोबरती राखिया ता देवो भाबेर आलोचना करीते पाठक के अनुरोध करी नरकी या तो फिर मनुष्य की असंपूर्णता संपूर्ण रूप से स्वीकार किए थे। बोलकर के ही देव मानव ठाकुर के मनुष्य भाव की मानव भाव की आलोचना हमको प्रभूत कल्याण प्राप्त करवाएगी। ठाकुर का मानव भाव हम जितना ही चिंतन करेंगे जितना ही उसके बारे में स्मरण मनन निधि्यासन करेंगे उतना ही हमारा कल्याण होगा और इसीलिए हम उनके मनुष्य भाव को मानव भाव को हमेशा हमारी नजर के सामने रखकर के उनके देव भाव की आलोचना करने के लिए पाठक को अनुरोध करते हैं। कंट्राडिक्शन किस तरह का है? शरद महाराज कहते हैं कि सबसे पहले तो हमको यह बात याद में रखनी है, ध्यान में रखनी है कि ठाकुर का मानव भाव था। ठाकुर ने हमारी तरह ही सब बंधन जो है उन्होंने स्वीकार किए थे। अष्टपाश हो, पंच कक्लेश हो ना कि षड रिपु हो। मनुष्य देह आखिर में है क्या? मनुष्य के भीतर में यदि काम कांचन के प्रति स्पूह न रहती यदि काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह से हमारा मन भरा ना रहता, तो हम मनुष्य ही नहीं रहते, हम वैसे ही देवता बन जाते। यदि अपने शास्त्रों की दृष्टि से देखें कि मनुष्य और ईश्वर में डिफरेंस कहां पे आता है? तो यह मिरेकल सिर्फ नहीं है यहां पर तो कि भगवान कृष्ण ने जन्म ग्रहण किया तो वह पुतना है ना कि यह तणावर्त है ना कि कालीय नाग है कि इंद्र का घमंड है। जन्म के साथ-साथ में ही इन सबको चकनाचूर करते गए। यह कोई ईश्वरत्व का परिचय नहीं है। इस तरह के मिरेकल तो कोई भी कर सकता है। रावण को भी देखिए कि वह मिरेकल कर सकता था। कंस के पास में भी जादुई शक्तियां थी। वरना तो यह राक्षसों को किस तरह से भगवान कृष्ण को मारने के लिए भेजता। यानी कि मिरेकल तो कोई भी कर सकता है। राजयोग पढ़ेंगे तो स्वामी जी कहेंगे कि मिरेकल और मैजिक और यह सुपर पावर। आज की लैंग्वेज में दे आर नथिंग बट द मैनिफेस्टेशन ऑफ दी प्राणा। यह प्राण का विज्ञान यदि हम ठीक-ठीक समझ लें तो यह सूर्य, चंद्र नक्षत्रों की गति को हम परिवर्तित कर सकते हैं। यहां पर बैठ के पूरे जगत में दूर कहां पर क्या हो रहा है वह सुन सकते हैं। देख सकते हैं। रिमोट हीलिंग कर सकते हैं। यह सब शक्तियां स्वामी जी कहते हैं कि विशाल जन समुदाय है तो उनके पास में अपनी बात मनवा सकते हैं। यह पावर आजकल के नेताओं के पास में आ जाए तो वे लोग कितने खुश हो जाएंगे। आज का कोई नेता उनको कहेंगे कि सुपरमैन की तरह उड़ना सीखना है ना कि 1 लाख लोग सामने बैठे हो। उनको अपनी बात मनवानी है। उनके पास में से अपना वोट बटोरना है। क्या आप कौन सा सुपर पावर पसंद करेंगे? तो एक भी नेता ऐसा नहीं कहेगा कि मुझे उड़ने की शक्ति चाहिए ना कि स्पाइडरमैन की तरह वो दीवाल पर उठने की शक्ति चाहिए। दीवाल पर चलने की शक्ति चाहिए। यह सब कुछ नहीं चाहिए। ना ही मुझे पूतना का वध करना है। ना ही मुझे तणावर्त का वध करना है। मुझे क्या चाहिए? तो मुझे चाहिए 1 लाख लोगों के पास में मीटिंग करवा के यदि मैं उनके साथ में भाषण देता हूं तो यह लोग मुझे कैसे वोट अपना दे दे। यह उनको मैं कैसे ब्रेन वाश कर सकता हूं? वह पावर मुझे चाहिए। तो किसी भी तरह का सुपर पावर हो, किसी भी तरह का मैजिक मिरेकल हो। स्वामी जी कहते हैं ऑल दिस इज नथिंग बट द मैनिफेस्टेशन ऑफ प्राणा। प्राण की शक्तियों का ही यह बह प्रकाश है। तो यहां पर देखिए कि शास्त्र क्या कहते हैं कि मनुष्य और ईश्वर में यदि सही-सही आपको फर्क देखना है। नो डाउट ईश्वर के पास में सुपर पावर है। उसमें कोई प्रश्न ही नहीं है। किंतु मोर देन सुपर पावर्स जो सही-सही डिफरेंस है वो है कि ईश्वर ये अष्टपाश डरिपु या तो फिर यह काम कांचन या तो फिर यह पंचक्लेश इनके फंदे में नहीं पड़े हैं। इनसे वह संपूर्ण रूप से मुक्त है। जबकि मनुष्य इन सबके फंदे में पड़ा हुआ है। पंचमहाभूते फादे ब्रह्मो पड़े कादे। जैसे ठाकुर कहते हैं पंचमहाभूत का यह शरीर धारण किया है। यह खोल यदि बाह्य आवेश धारण किया है। बाह्य आवरण तो हमको रोना ही पड़ेगा। जैसे भगवान राम मां सीता के लिए रोए थे। जैसे वराह अवतार में जैसे कि भगवान विष्णु ने अपने बच्चों को लेकर के बड़ा मजे से संसार बना के रखा था। फिर भगवान शिव ने आकर के त्रिशूल से उनका देह भांग दिया। तब कहीं जाकर के भगवान विष्णु हंसते-हंसते स्वर्ग में चले गए। तो यह सब कहानियां हमको पता है कि यदि मनुष्य देह धारण करते हैं और तो मनुष्यत्व किस चीज को आप मनुष्यत्व कहेंगे? मनुष्यत्व और ईश्वरत्व की डेफिनेशन को आप कहां पर क्लेरिफाई करेंगे? तो मनुष्यत्व की डेफिनेशन ही है कि हम लोग यह सब आशा वो जो कहते हैं ना मोह तृष्णा ये सब के जाल में फंसे हुए हैं। तो यहां पे शरद महाराज कहते हैं कि ठाकुर ने मनुष्य देह धारण करके मनुष्यों की यह जितनी भी लिमिटेशन है वह सब स्वीकार की है। यहां पे लिमिटेशन का अर्थ हमको यह नहीं करना है कि ठाकुर चमत्कार नहीं कर सकते थे। यदि वह वैुंठ में थे तो जिस तरह के चमत्कार कर सकते थे वह पृथ्वी पर आकर के नहीं कर सकते। यह बात हमको नहीं ग्रहण करना है क्योंकि देखिए कि इवन भगवान कृष्ण के जीवन में बाल्य अवस्था से ही जैसे हमने देखा कि पुतना का वध करते हैं या तो फिर यह तृणावर्त का वध वध करते हैं तो यह बचपन से ही राक्षसों का संहार उन्होंने करना शुरू कर दिया है। मां यशोदा मुंह खोलने को बोलती है तो मुंह के भीतर में पूरा विश्व ब्रह्मांड मां को दिखाई देता है। वो सब जादू चमत्कार सुपर नेचुरल पावर भगवान कृष्ण के पास में बचपन से ही थे। किंतु मनुष्य देह धारण किया है तो मनुष्य देह का जो कोर डेफिनेशन है वह यह है। पंच क्लेश डरिपु अष्टपाश इनसे जो बंधे हुए हैं वह मनुष्य है। तो यहां पे महारा- महाराज जी कहते हैं कि मनुष्य देह धारण करने का जो सर्वप्रथम अर्थ है कि यह सब लिमिटेश से इस सब पाशों से इन सब रिपुओं से भगवान ने अपने को जानबूझकर के बांधा है। जैसे कि गांधारी ने धृतराष्ट्र के साथ में विवाह करने के समय वह अंधे थे तो अपनी खुद की आंखों पर पट्टी बांध दी। तो वैसे ही भगवान कृष्ण ने भगवान राम ने भगवान रामकृष्ण ने मनुष्य देह धारण करके मनुष्य को गाइड करने के लिए हमको रास्ता दिखाने के लिए अपनी शक्तियों पे अपनी दिव्य शक्ति यानी कि मिरेकल करने की शक्ति नहीं किंतु यह जो ओजस शक्ति है, आत्म साक्षात्कार रूपी शक्ति है, ब्रह्म ज्ञान रूपी शक्ति है, उसके ऊपर में जैसे कि उन्होंने एक काली काली पट्टी बांध दी उसको जैसे कि उन्होंने सीमित कर दिया कुछ अंश तक उन्होंने डरिपु अष्टपाश को अपने देह में प्रवेश करने दिया और फिर देह धारण करके उन्होंने इन सब से मुक्ति पाने के लिए प्रचंड तपस्या की और महाराज कहते हैं कि इस तरह से यदि हम भगवान रामकृष्ण का जीवन आलोचना करेंगे तो हमारा प्रभुत कल्याण साधित होवे। अर्थात कि हमको बहुत सारा कल्याण प्राप्त हमारे आध्यात्मिक जीवन में बहुत सारा कल्याण प्राप्त होगा। बहुत सारे यह पॉजिटिव बेनिफिट से हमारा आध्यात्मिक जीवन भर जाएगा। आमा दे तो एक जन बोलिया ता के ना भाबिले तार साधन काले अलौकिक उद्यम और चेष्टा दी कोनो अर्थ कुजीते पावा जबे ना हमारी ही तरह एक व्यक्ति बोलकर के यदि हम उनको नहीं सोचेंगे तो उनके साधन काल का अलौकिक उद्यम और चेष्टा उनका जो अलौकिक उद्यम और चेष्टा अर्थात प्रयास प्रयत्न भयानक उद्योग किया है। प्रचंड तपस्या की है। ठाकुर की तपस्या के बारे में हमको सबको जिन्होंने ठाकुर का जीवन इवन ऊपर ऊपर से भी पढ़ा हो तो उनको पता है और इस साधक भाव में ठाकुर की तपस्याओं के बारे में विषद वर्णन है। हम सब लाइन बाय लाइन पढ़कर के उसकी आलोचना भी करेंगे। तो महाराज जी लिखते हैं कि यदि हम ठाकुर को मनुष्य के रूप में नहीं सोचेंगे तो फिर उन्होंने यह जो अलौकिक उद्यम और प्रयास किया प्रचंड तपस्या की उसका कोई अर्थ हम नहीं खोज पाएंगे। ईश्वर यदि षडरिपु अष्टपाश पंच्लेश इनसे मुक्त होकर के यदि जन्म ग्रहण करते तो वह ईश्वर में और ईश्वर के अवतार में कोई डिफरेंस ही नहीं रह जाता। वही है कि ईश्वर को आप सर्वव्यापी कह सकते हैं। जबकि अवतार बिकॉज़ कि पंचमहाभूत का देह धारण किया है। तो आप उनको स्पेस में या तो फिर एक जगह पे लोकेटेड आप समझ सकते हैं कि हां ठाकुर अवतार है तो बस एक ही जगह पर विराजमान है। जैसे ठाकुर उदाहरण देते हैं कि एक जो सेठ है उसका एक बगीचा है। किंतु बहुत बड़ा बगीचा है। किंतु यदि उस सेठ को आपको देखना है धनी व्यक्ति के साथ में मुलाकात करनी है तो आप क्या पूरे बगीचे में गोल-गोल घूम करके उनको खोजेंगे कि यह तालाब है। क्या उसके किनारे वह बैठे हैं ना कि वह आम का पेड़ है। इसके नीचे में वह छांव खा रहे हैं। ना कि वहां पर बगीचा है। वहां पे एक यह जो झूला है तो झूला खा रहे हैं। नहीं आप शेठ को खोजने के लिए कहां जाएंगे? वह बैठक खाने में जाएंगे। जहां पर उसका एक घर है, घर में बैठने की गेस्ट लोगों को मिलने की जगह है। तो वह बैठक खाने में जाएंगे आप उनको खोजने के लिए। किंतु यदि ईश्वर होते यह सेठ तो पूरे बगीचे में वह व्याप्त होते किंतु ईश्वर नहीं है तो मनुष्य देह धारण किया है तो अपने बैठक खाने में वह उपस्थित है। तो यहां पर भी देखिए कि यदि ईश्वर मनुष्य देह धारण करके यदि आते हैं और अष्टपाश को स्वीकार नहीं करते हैं तो फिर तो ईश्वर और मनुष्य अवतार के बीच में कोई डिफरेंस ही नहीं रह जाएगा। एक सेपरेट कैटेगरी खड़ा करने की कोई आवश्यकता ही नहीं रह जाएंगी। आप कहेंगे कि हां वो ईश्वर सर्वव्यापी है और यह ईश्वर है जो अपने बैठक खाने में बैठे हुए हैं। वह ईश्वर अपने पूरे बागान में आपको कहीं पर भी मिल जाएंगे। झूला खाते हुए भी मिल जाएंगे। वो जो रास लीला में हुआ था। भगवान कृष्ण ने अनेक रूप धारण करके सभी गोपियों के साथ में लीला कर रहे हैं। तो वैसे ही यहां पे आपको एक ईश्वर मिल जाएंगे। वहां झूला खाते ईश्वर का और एक वर्जन या तो मैनिफेस्टेशन आपको मिल जाएगा। तालाब के किनारे और एक वर्जन मिल जाएगा वहां पेड़ के नीचे में छांव खाते हुए किंतु वह हो गए सर्वव्यापी ईश्वर और जो बैठक खाने में बैठे हैं वह एक ईश्वर देयर इज नो डिफरेंस बिटवीन देम जहां तक पावर और शक्ति का प्रश्न है तो इस तरह से कोई अर्थ ही नहीं रहता यदि ईश्वर अपने को अष्टपाश के कुछ-कछ पाशों को कुछ-कछ अंशों को अपने देह में प्रवेश ना करवा पाते तो यह एक बड़ी बड़ी इंपॉर्टेंट बात है। साथ-साथ में ही हमको यह भी ख्याल में रखना है कि देखिए कि हम जब बचपन के ठाकुर जो है कामार पुकुर के ठाकुर है या तो फिर कोलकाता में जो आए थे और जो उस समय ठाकुर की बालक गदाधर उसकी जो सत्य निष्ठा थी उसकी यह जो वचन प्रियता थी उसका जो ईश्वर के प्रति अनुराग था उसकी यह जो शुद्धता थी पवित्रता थी ईश्वर के प्रति शरणागति थी और प्रचंड आत्मविश्वास था उसका 1% भी मुझे अपने में नहीं दिख रहा है। तो फिर मैं कैसे यह विश्वास कर दूं कि भाई वह उन्होंने अपने को अष्टपाश से बंधा है। जैसे कि मैंने मैं अष्टपाश में बंधा हुआ हूं। उन्होंने अपने शरीर में षडरीपु को प्रवेश करने दिया है। जैसे कि मैं डरिपु का शिकार हूं। उनके भीतर में यह कामिनी कांचन के प्रति स्प्रूहा है। जैसे कि मेरे मन में है। कहां कोई मैच नहीं हो रहा। इवन कर्सरी स्टडी भी करेंगे। गदाधर के बचपन के दिनों का हमारे जीवन के साथ में कहीं कोई मैचिंग नहीं है। तो फिर यह शरद महाराज की इस बात को हम कैसे स्वीकार कर लें? थ्योरिटिकली पढ़ना तो बड़ा अच्छा लगता है। इन प्रैक्टिस हम देखेंगे कि ठाकुर के पिताजी के देह दे देहांत के बाद में उस समय ठाकुर की उम्र कितनी होगी? छ सात साल की ही तो होगी। उसी समय से उनके भीतर में जो वैराग्य प्रकट हुआ था वह जो भूतिर खाल यानी कि यह जो सब श्मशान वगैरह जगह पर जाकर के वो साधना करने की शुरुआत कर दी थी। ऐसा मेरे जीवन में यदि ऐसा ठाकुर की कृपा से इस तरह की ट्रेजडी मेरे बचपन के जीवन में नहीं हुई। यदि हो भी जाती तो आई डू नॉट थिंक कि मैं कोई श्मशान में जाकर तपस्या करता। तो यहां पर एक बात याद रखनी है कि भले ही चाहे अवतार ने अपने मनुष्य देह के भीतर में यह डरिपु वगैरह को प्रवेश करने दिया हो उनके भीतर में सत्व का प्राधान्य था और हम लोगों के भीतर में तमस और रजस का प्राधान्य है। तो अब अभी देखिए कि इतना तो अपने बस में है ठाकुर की तरह तपस्या करके प्रचंड तपस्या करके ब्रह्म साक्षात्कार प्राप्त करना शायद आई डोंट थिंक कि मेरे से इस जन्म में हो पाएगा मुझे नहीं पता मुझे नहीं लगता कि हजार जन्म में भी होगा किंतु एक चीज जो मेरे हाथ में है जिसको कि मैं रियलिस्टिकली एक्सपेक्ट कर सकता हूं वो यह है कि मैं यदि तपस्या करतेकरते जन्म जन्मांतर के बाद में यह जो तमस और रज का प्राधान्य है। उसमें से मुक्ति पा सकता हूं। इतना तो मुझे एक ह्यूमनली पॉसिबल लग रहा है कि आज से मान लीजिए हजार जन्म 1 लाख जन्म इसके बाद में मेरे भीतर में सत्व का प्राधान्य हो जाए। इतना तो एटलीस्ट मुझे विदिन द रियल्म ऑफ पॉसिबिलिटी यह संभव है। ऐसा करके मुझे लग रहा है। तो यहां पर भी देखिए कि ठाकुर की जो अलौकिक उद्यम है, प्रचंड तपस्या है, उसका अर्थ घटन हमको इस तरह से करना है कि यदि ठाकुर सत प्रधान होकर के जन्मे हैं तो मेरे भीतर में भी वह क्षमता है कि इस जन्म से इस पल से इस क्षण से यदि मैं तपस्या प्रारंभ कर दूं तो एक जन्म तो मेरा ऐसा अवश्य आएगा कि मैं सत्वप्रधान गुण लेकर के नया जन्म धारण करूं। जन्म जन्मांतर के तमस और रजस का यह जो अभिशाप मेरे ऊपर में छाया हुआ है। इससे मैं कैसे ना कैसे करके मुक्ति प्राप्त कर लूं। यह आशा मैं अवश्य रख सकता हूं। इसीलिए यहां पर महाराज जी लिखते हैं कि और दूसरी बात कि यदि मेरे पास में यह आशा नहीं होती ठाकुर यदि यह सत्वभाव धारण करके फिर उद्यम करके तपस्या करके आत्म साक्षात्कार प्राप्त नहीं करते या तो फिर अपने सही स्वरूप में फिर से स्थित नहीं हो जाते तो फिर क्या है कि हम लोग इस तरह का उद्यम करना ही छोड़ देंगे। देखिए एक दो लाइन पढ़ लेते हैं। उसके बाद में इसके बारे में और थोड़ा सा विशद रूप से डिस्कस करते हैं। मने होइबे जीनी नित्य पूर्ण ताबार शतो लाभ जन चेष्टा केनो हमारे मन में होगा कि जो नित्य पूर्ण है उनको फिर सत्य लाभ के लिए प्रयास करने का क्या प्रयोजन है क्या आवश्यकता है मोने हो बेताहार जीवन पाती चेष्टाटा एक लोक देखानो व्यापार मात्र हमारे मन में होगा कि उन्होंने यह जो जीवन पाती चेष्टा प्राण पण तपस्या की है इस तरह तरह की तपस्या कि जिसमें प्राण धारण करने का भी संदेह प्रकट हो गया था। अपने जीवन को भी जिन्होंने न्योछावर कर दिया था। जीवन के प्रति तृष्णा या स्प जो है उसको जिन्होंने न्योछावर कर दिया था। उनको फिर यह जो तपस्या की है क्या वो सिर्फ लोक दिखानो मात्र क्या लोगों को दिखाने के लिए सिर्फ तपस्या की है? तो यह फिर जैसे कि कहते हैं ना हाथी के दिखाने के दांत अलग है, खाने के दांत अलग है। ठाकुर ने तपस्या की है हमको दिखाने के लिए। भीतर में तो वह पूर्ण सत्य में पहले से ही प्रतिष्ठित थे। तो यह जो ठाकुर तो खुद तो कहते हैं मन मुख एक कोरा। मन और मुख को एक करना है। यदि मन में वह ऑलरेडी आत्मज्ञान लेकर बैठे हुए हैं। किंतु मुंह पर बोलते हैं कि मां तुम आकर के मुझे दर्शन दो। यदि मन के भीतर में स्वयं मां जाग काली जाग्रता विराजमान है। उनको यदि संपूर्ण रूप से यह बात पता है कि वह मां काली स्वयं है और फिर मुंह से मां काली को पुकार रहे हैं कि मां आकर के दर्शन दो तो यह तो पूरा कंट्राडिक्शन हो जाएगा। सत्य रक्षा इस बात में नहीं होगी। इसके लिए हमको यह समझना है कि उन्होंने मनुष्य की तरह कुछ ना कुछ बंधन स्वीकार किए थे। शुद्ध ताहा नो है सिर्फ इतना ही नहीं ईश्वर लाभ भेर जन उच्चादर्श समूह हो निज जी ने सु प्रतिष्ठित करब जनो ता उदम निष्ठा ओ त्याग आमादग के ओ रूप करते उत्साहितो ना कोरिया हृदय विषम उदासीनताए पूर्ण करबे एवं इो जीवन आमादग आर जड़त्व अपनोदन होइबे ना सिर्फ इतना ही नहीं ईश्वर लाभ के लिए उच्च आदर्श समूह अपने जीवन में सुप्रतिष्ठित करने के लिए उनका जो उद्यम है निष्ठा है और त्याग है उनको देखकर के हम उसका अनुसरण करने की बजाय हमारा हृदय विषम उदासीनता से पूर्ण हो जाएगा। आश्चर्य की बात है कि यदि मैं देखता हूं कि ठाकुर तो अवतार मतलब ईश्वर स्वयं है ना ही कामिनी कांचन का बंधन है ना ही डरिपु का बंधन है ना ही भोग विषयों के प्रति कोई तृष्णा है हू हू करके उनका मन सब समय ब्रह्म भाव की ओर ही वह जाता रहता है उस समय यदि मैं उनका जो उच्च आदर्श उनके जीवन में देखता हूं उनका जो उद्यम है निष्ठा है त्याग यदि देखता हूं तो उसको देखकर करके मैं उनको फॉलो नहीं करूंगा। मैं तो मेरा हृदय विषम उदासीनता से पूर्ण हो जाएगा। क्यों? क्योंकि मैं यह मान बैठूंगा कि यह जो उच्च आदर्श है, यह त्याग है, या तो फिर निष्ठा है, शरणागति है, तपस्या है, वह अवतार के जीवन में ही संभव है। मेरे जीवन में इन सब बातों का संभावना ही नहीं है। मुझे मैं यदि इसको करने को जाऊंगा तो अपने मुंह के बल गिरूंगा। लगेगी। बहुत ज्यादा आघात होगा। बहुत भयानक मुझे इंजरी होगी। और इसके बाद में यह सब करने का मैं प्रयास ही नहीं करूंगा। तो फिर ईश्वर यदि बिना किसी लिमिटेशन के मनुष्य देह धारण करते हैं तो फिर उनकी त्याग तपस्या वगैरह लोगों को दिखाने मात्र के लिए रह जाएगा। उससे हमको कोई फायदा नहीं होगा। एवं इ जीवन आमादग आर जड़त्व अपनोदन होइबे ना और इस जीवन में हमारा इस जड़त्व यानी कि तमस रजस से हमको मुक्ति कभी नहीं मिलेगी। उनसे हम कभी मुक्त नहीं होंगे। देखिए कि ईश्वर अवतार के बारे में हम किस तरह से सोचते हैं। यदि क्रिश्चियनिटी के बारे में सोचे या तो इवन भागवत के बारे में श्रीमद् भागवत के बारे में देखें तो हमको ऐसा लग रहा है कि अवतार के भीतर में किसी भी तरह की अपूर्णता है ही नहीं। उन्होंने बचपन से ही जैसे कि सभी तरह की यह अष्टपाश वगैरह से मुक्ति प्राप्त करके ही या तो फिर उनसे बिना बंधे हुए ही जन्म धारण किया है। ईश्वर का सही स्वरूप क्या है? लोगों के सामने प्रदर्शित करने के लिए वह आए हैं। बचपन से ही ईश्वरीय मिरेकल करते रहे हैं। जिससे कि उनके प्रति हमारी शरणागति बने और फिर वह जो उपदेश देते हैं कि हां त्याग तपस्या फॉलो करो। यदि तुमको मुझे प्राप्त करना है तो वही भगवान कृष्ण को प्राप्त करने के लिए ना कि जीसस को प्राप्त करने के लिए हम लोग त्याग तपस्या करेंगे। अदरवाइज त्याग तपस्या करने का अपने आप में कोई महत्व नहीं है। उन्होंने कहा है तो हम कर रहे हैं। अदरवाइज और कोई लॉजिक नहीं बनता है। त्याग तपस्या करने से हम लोग अपने यह कामना वासनाओं से मुक्त हो जाएंगे। यह सब कोई आशा है ही नहीं। कृपा ही केवलम कृपा के माध्यम से ही सब कुछ होगा। हमको यह त्याग तपस्या सिर्फ इसीलिए करनी है क्योंकि स्नेह के किसी पात्र ने हमको यह करने को कहा है। मां यदि अपने बच्चे को प्रेम से कहती है कि थोड़ा सा घर काम में मदद कर दो। रोटी बेलने में ना कि यह जो है वगैरह-वगैरह छोटा-मोटा काम कर दो क्लीनिंग करने में। तो बच्चा उस काम को मां के प्रति स्नेह से परवश होकर के करता है। वही अदरवाइज बच्चे को यह समझ नहीं है कि यह सब काम करने से उसका चरित्र गठन होता है। भविष्य में जब बड़ा होगा तो यह अपने घर में इस तरह की सहाय खुद का घर जब होगा मां-बाप तो बूढ़े हो जाएंगे एक समय वो मर भी जाएंगे किंतु उसका खुद का घर संसार जब होगा तो यह सब जो सीखा हुआ है बचपन में वो उसको काम में लगेगा। यह लॉजिक उसके पास में नहीं है। वह कर सिर्फ इसलिए रहा है क्योंकि मां ने कहा है मां के प्रति प्रेम है, स्नेह है। बोल के वह कर रहा है। कोई-कोई बच्चा ऐसा भी होते हैं कि मां के प्रति प्रेम बहुत होता है किंतु मां जो कहती है वो करने की उनकी थोड़ी सी भी इच्छा नहीं होती। ऐसे बच्चों को भी हमने देखा है। तो देखिए कि लॉजिक यदि हमको यह डिक्टेट नहीं करता है कि हां घर काम करने से मां को काम में सहाय करने से भविष्य में जब हम अपना गृहस्थ संसार खोल करके बैठेंगे अपना खुद का घर चलाने को जाएंगे तो यह सब चीजें मुझे बड़ी हेल्प करेगी। उस समय ही यदि मैंने सीखना शुरू नहीं किया तो बड़े होकर के वो मेरे लिए तकलीफ का कारण हो जाएगा। फिर यह पति है या पत्नी है जो स्पाउस है अपना उसके साथ में प्रतिदिन कुछ ना कुछ लगता रहेगा झगड़ा होता रहेगा आजकल तो पहले की तरह जॉइंट फैमिली नहीं है कि फिर वो एक मां जो है वह रोटी बनाएगी चाची जो है वह सब्जी बनाएगी और दूसरी चाची जो है वह थोड़ा घर काम देख लेगी और एक कोई है जो कि वह बर्तन धो देगी ऐसा तो नहीं है जो कुछ है पतिप है मां-बाप है उनके साथ में उन्हीं को मिलाकर के घर चलाना है। तो यदि हस्बैंड यदि हेल्प नहीं करेगा घर चलाने में तो फिर तो कैसे चलेगा? वाइफ भी जॉब करती है, हस्बैंड भी जॉब करता है तो घर काम घर आकर के खाना बनाना, बर्तन धोना तो दोनों को करना पड़ेगा। दैट यू विल हैव टू लर्न। यदि आप मेट्रोपोलिस में रहते हैं। यदि कोई बड़े शहर में दोनों जॉब करते हैं तो इस तरह से तो वर्क शेयरिंग करना पड़ेगा। यह सब बचपन में ही सीखा जाता है। तो देखिए कि तपस्या हम यह जो भागवत है श्रीमद् भागवत उनकी यदि भावधारा ऊपर ऊपर से फॉलो करें मैं कोई भागवत का एक्सपर्ट नहीं हूं। किंतु फिर भी जो एक कर्सरी मैंने रीडिंग किया है उस रीडिंग के माध्यम से मुझे ऐसा लगा है कि भगवान कृष्ण के ऐसा नहीं है कि भगवान कृष्ण ने सिर्फ भक्ति मार्ग का ही उपदेश दिया है। उन्होंने सिर्फ ऐसा नहीं कहा कि मेरे प्रति भक्ति होने से ही तुम लोगों का सब कुछ हो जाएगा। उन्होंने ज्ञान मार्ग का, कर्म मार्ग का, राजयोग का यथेष्ठ उपदेश दिया है। जिन्होंने भी श्रीमद् भागवत है, वशिष्ठ रामायण है ना कि फिर यह गीता है। ये जितने भी भारतीय धर्म ग्रंथ पढ़े होंगे। सबको पता है कि भगवान राम भगवान कृष्ण जो हमारे सर्वश्रेष्ठ दो अवतार हैं। उन्होंने ज्ञान मार्ग के बारे में बहुत सारा कुछ कहा है। भक्ति और ज्ञान यह दोनों उनके समांतर उपदेश चलते हैं। किंतु उस ज्ञान के उपदेश में बात यह स्पष्ट है कि भगवान कह रहे हैं तो आपको ज्ञान को फॉलो करना है। देखिए यदि आप अद्वैत मार्ग को फॉलो करते हैं तो फिर अवतार वाली पूरी बात ही निकल जाती है। पू प्योर आपका एक रैशन एप्रोच हो जाता है कि हां मेरे भीतर में आत्मन है। मेरे भीतर में यह ब्राह्मण है। उसका साक्षात्कार करना है। यही मेरे जीवन का एकमात्र लक्ष्य है। तो अद्वैत मार्ग अद्वैत वेदांत के द्वारा जो ज्ञान योग बताया गया है, वह प्योर रैशनलिटी के ऊपर में आधारित है। उसमें कोई प्रश्न ही नहीं है। किंतु भक्ति मार्ग के भीतर में भी ज्ञान के बहुत सारे एलिमेंट है। सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह, ब्रह्मचर्य, तप, शोध, संतोष, स्वाध्याय, ईश्वर प्रणिदान ये जितने भी एलिमेंट्स है, वह सभी के सभी आपको भक्ति मार्ग के भीतर में भी दिख जाएंगे। किंतु वहां पर वह भक्ति मार्ग के भीतर में जो ज्ञान मार्ग को फॉलो करना है या तो फिर भगवान कृष्ण के द्वारा सूचित ज्ञान मार्ग को फॉलो करना है। इसका यह अर्थ है कि भगवान कृष्ण के प्रति हमारी प्रीति है। उनके प्रति हमारी भक्ति शरणागति है। बोलकर के वह जो कह रहे हैं, उसका मैं अनुसरण कर रहा हूं। ज्ञान मिश्रित भक्ति यह श्रीमद् भागवत हो कि श्रीमद्भगवत गीता हो इन दोनों के बीच में दोनों के भीतर में हमको पूरा-पूरा देखने को मिल जाएगा। प्योर डिवोशन उसका भी एक वैल्यू है और यह ज्ञान मिश्रित भक्ति उसका भी एक वैल्यू है। किंतु यहां पे ऐसा नहीं है कि आपको यह कहा गया हो कि भगवान कृष्ण के भीतर में मनुष्य भाव था। उस मनुष्य भाव से मुक्ति प्राप्त करने के लिए उन्होंने तपस्या की और उस तपस्या के माध्यम से उन्होंने यह ईश्वरत्व धारण किया। यह जो जर्नी है वह जर्नी आपको वहां पर नहीं दिखाई देगी। या जिस तरह से श्री रामकृष्ण देव के जीवन में यह जर्नी हमको दिखाई देती है। आध्यात्मिक यात्रा दिखाई देती है। साधक भाव के भीतर में प्रचंड साधना उसके बाद में यह साधन पर्व उसके बाद में आनंद पर्व में जितने भी भक्त आते हैं ठाकुर के पास उन्होंने ज्ञान मिश्रित भक्ति की तो बात की है। किंतु ज्ञान को उन्होंने ज्ञान के खुद के रैशनलिटी पर खड़ा रखकर के सिखाया है। ऐसा नहीं कि मैं मुझे प्राप्त मैं ईश्वर हूं। मुझे प्राप्त करना है तो ज्ञान मार्ग का आसरा लो। नहीं अद्वैत वेदांत की यह जो टर्मिनोलॉजी है, अद्वैत वेदांत की जो रैशनलिटी है, उसी रैशनलिटी के आधार पर ही उन्होंने स्वामी जी को अद्वैत वेदांत का उपदेश दिया था। तो वह भी है और आत्म प्रकाश पर्व में उन्होंने स्पष्ट घोषणा की है कि जो राम जो कृष्ण वही राम कृष्ण जिस तरह से श्रीमद् भागवत में स्पष्ट घोषणा है कि कृष्णस्तु भगवान स्वयं कृष्ण स्वयं भगवान है तो वो स्पष्ट घोषणा हमको यहां पे आत्म प्रकाश पर्व में दिख जाती है। किंतु देखिए कि अह रामकृष्ण की भगवान रामकृष्ण की तो जर्नी है तो तो यह जर्नी हमको शायद श्रीमद् भागवत में नहीं देखने को मिलेगी। अगेन मैं कह रहा हूं तो यह डिस्क्लेमर कर ही दूं कि भागवत के बारे में मेरा कोई इतना इन डेप्थ नॉलेज नहीं है कि इस बात को मैं ऑथोरिटेटिवली कहूं। किंतु फिर भी जो मेरा कर्सरी नॉलेज है उसके बेस पर कह रहा हूं। यहां पे देखिए कि ठाकुर का जो साधक भाव जो है उसके साथ में और दो फिलॉसोफीस परफेक्टली मैच हो जाती है। एक तो अपना सनातन अद्वैत वेदांत है ही है। शंकराचार्य का जीवन पढ़ेंगे तो उनकी जो तपस्या है उनका जो यह कठोर परिश्रम है आत्म साक्षात्कार प्राप्त करने का या तो फिर विदिन अद्वैत वेदांत हमको जो रैशनलिटी दी गई है जो रैशनल दिया गया है कि हां कि हमारे भीतर में आत्मन है उसको प्राप्त करने के लिए मंदिर मंदिर यह तीर्थ तीर्थ महात्मा महात्मा ऐसा घूमने की कोई जरूरत नहीं है। घूमिए आप मना कोई नहीं करता है। किंतु जब तक हम इंद्रियों का संयम कर नहीं करेंगे तब तक वह घूमना फिरना व्यर्थ है। एक ही मात्र उपाय है इंद्रिय संयम और प्रचंड तपस्या तभी आपको आत्मज्ञान प्राप्त होगा। तो यह अद्वैत वेदांत के भीतर में एकदम एक सुनिश्चित सुतार्किक ज्ञान मार्ग बताया गया है और साथ में ही बुद्धिज्म में यह एकदम सुतार्किक एकदम रैशन लॉजिकल ज्ञान मार्ग बताया गया है। तो यह भगवान बुद्ध का आत्मदीपोभव हम अपना खुद का स्वयं प्रकाश बने। हमारी आध्यात्मिक यात्रा हम अपनी तपस्या के माध्यम से उसको सुप्रकाशित करें। तो यह अद्वैत वेदांत और भगवान बुद्ध का रैशनलिटी यह हमको ठाकुर के साधक भाव में देखने को मिलेगा। साधक पर्व में देखने को मिलेगा और साथ में ही इसका जो दूसरा स्पेक्ट्रम है आत्म प्रकाश पर्व उसमें हमको यह जो गीता का या श्रीमद् भागवत का जो शंखनाद है कि कृष्णस्तु भगवान स्वयं वो हमको जो राम जो कृष्ण वही राम कृष्ण इस उद्घोषणा से मिलता है। यानी कि हमारे बात सिर्फ भक्ति और ज्ञान की नहीं है। भक्ति और ज्ञान का मिश्रण हमको भारत के जितने भी धर्म ग्रंथ हैं उस सबके भीतर में मिल जाएगा। किंतु इवन शंकराचार्य के जीवन में भी देखिए कि उन्होंने यह एक के बाद एक भक्तिपूर्ण स्तोत्रों की रचना की थी। अभी कोई कहता है कि वह आदि शंकराचार्य ने नहीं की या वो रचनाएं तो जो भी है उसको थोड़ा सा साइड पर रख दे उतना सारा डिस्कशन तो एक जनरल व्यू यदि पकड़ते हैं तो जिन शंकराचार्य ने जिन आदि शंकराचार्य ने ब्रह्मसूत्र भाष्य के ऊपर में ब्रह्मसूत्र के ऊपर में भाष्य लिखा उसी शंकराचार्य ने यह जो मोहम मुद्ग स्तोत्र है या तो फिर यह जो आनंद लहरी है वगैरह जो एक भक्ति से पूर्ण जो सूत्र स्तोत्र है उनकी भी रचना उन्होंने ही की है। तो यह ज्ञान मिश्रित भक्ति अपने पूरे साहित्य में सब जगह देखने को मिल जाएगी। वही बात है कि ज्ञान के पीछे का जो रैशनल है, ज्ञान के पीछे का जो लॉजिक है, वह हमको भक्ति मार्ग और ज्ञान मार्ग में या तो फिर कहें बेटर शब्द है कि द्वैत वेदांत में और अद्वैत वेदांत में और बुद्धिज्म में ये दोनों जगह पर डिफरेंट-डिफरेंट मिलता है। ठाकुर के जीवन में एज इफ कि अद्वैत वेदांत और बुद्धिज्म का जो रैशनलिटी है उसको साधक भाव के भीतर में उसका प्रदर्शन हुआ है और श्रीमद् भागवत का जो भगवान के अवतार की ये जो गुणगान गाए गए हैं उनके प्रति संपूर्ण शरणागति करने से हमारे जीवन के जितने भी पाप कर्म है सब धुल जाएंगे। वह जो उन्मना जो भक्ति है उन्मना भक्ति या तो फिर यह पराभक्ति भक्ति की पराकाष्ठा वह हमको आत्म प्रकाश पर्व में देखने को मिलती है। आनंद पर्व में उसका प्रारंभ होता है। आत्म प्रकाश पर्व में उसका कलमिनेशन होता है। तो यह पूरा स्पेक्ट्रम ठाकुर के जीवन में हमको देखने को मिलता है। सिर्फ साधना का स्पेक्ट्रम नहीं कि ज्ञान मार्ग, कर्म मार्ग, योग मार्ग या तो भक्ति मार्ग इन चारों का ही सिर्फ कॉम्बिनेशन नहीं मिलता। किंतु यह जो फिलॉसोफी जो है यह अद्वैत वेदांत और बुद्धिज्म और एक ऑन वन हैंड और दूसरी और है द्वैत या तो फिर विशिष्ट अद्वैत वेदांत। यह पूरा स्पेक्ट्रम फिलॉसोफिकल स्पेक्ट्रम भी हमको ठाकुर के जीवन में देखने को मिलता है। और इसीलिए हम ठाकुर को भगवान कृष्ण की तरह पहले से ही ऐसा नहीं कहेंगे कि श्री रामकृष्ण भगवान स्वयं थे। एट द सेम टाइम भगवान बुद्ध की तरह एक रैशन महापुरुष कि जिन्होंने तपस्या करके ईश्वर प्राप्ति की है या तो अप टू एन एक्सटेंट शंकराचार्य की तरह कि तपस्या करके आत्मज्ञान प्राप्त किया है तो उस कैटेगरी में भी आखिरी आखिरी समय में आत्म प्रकाश पर्व में हम ठाकुर को नहीं रखेंगे। उस भाव से शायद उन्होंने प्रारंभ किया होगा किंतु अंत उन्होंने उस भाव से नहीं लाया है। तो देखिए कि कितने सारे विभिन्न दृष्टि बिंदु, कितने सारे विभिन्न थ्रेड्स ठाकुर के जीवन में हमको देखने को मिल जाते हैं। कंफ्यूजन भी कभी हो जाएगा कि ठाकुर को हम किस भाव से देखें। यदि हमको तपस्या करनी है तो हम किस भाव से करें। इस भाव से करें प्योर वेदांत या तो प्योर बुद्धिज्म के भाव से कि निर्वाण या तो आत्मज्ञान हमारे भीतर में ही है। तपस्या करके उसको प्राप्त करना है। या तो फिर वो ज्ञान मार्ग का आश्रय ले जिसको कि मोर और लेस यह हमको श्रीमद् भागवत में देखने को मिल जाता है कि भगवान के कहने से हम उसका पालन करते हैं। तो दैट कंफ्यूजन माइट रिमेन इन आवर माइंड। किंतु यह जो बहुत बड़ा जो एक स्पेक्ट्रम है उसका फायदा यह एक होगा कि हमारे भाव की तरह मेरा जो भाव है उसके अनुसार मुझे रास्ता यहां पर दिखता है। यहां पर किसी एक भाव के लिए ही सब कुछ है। बाकी जिसका जिसका जो भाव है उसके लिए यहां पर रास्ता नहीं है। आप दूसरे संघ में जाइए ऐसा नहीं है। जिसका जो भाव है उसके लिए यहां पे सब कुछ पूरा मटेरियल मिल जाएगा। और देखिए सबसे बड़ा उदाहरण है स्वामी जी स्वयं स्वामी जी का पूरा एक जर्नी था ना क्योंकि यह विभिन्न भाव अल्टीमेटली क्या है कि जिस तरह से यह साधना की जर्नी है वैसे फिलॉसोफी की भी जर्नी है स्वामी जी के खुद के जीवन में कि जब आए थे अल्ट्रा रैेशनालिस्ट थे किंतु फिर जब ठाकुर ने उनको अद्वैत वेदांत सिखाया तब यह अद्वैत वेदांत के माध्यम से तर्क या तो फिर लॉजिक या तो तपस्या से उन्होंने जो सिद्धि प्राप्त की और आखिर आखिर में स्वामी जी को देखते हैं तो स्वामी जी कहते हैं कि मैं फिर से वही नरेंद्र हो गया हूं जो कि दक्षिणेश्वर में पंचवटी तले ठाकुर के श्री चरण के पास में बैठकर के मंत्रमुग्ध होकर के उनकी वाणी का श्रवण किया करता था। तो स्वामी जी के जीवन में भी फ्रॉम अल्ट्रा रैशनलिस्ट टू अल्ट्रा तपस्वी टू अल्ट्रा डिवोटी यह पूरा हमको स्पेक्ट्रम देखने को मिलता है। सो आइदर कि हम फिलॉसोफी के बारे में चर्चा करें ना कि हम किसी साधन मार्ग के बारे में चर्चा करें। हमारे जीवन की जो आध्यात्मिक यात्रा पर हम कौन से पॉइंट पर खड़े हैं, उस पॉइंट के अनुसार हमको यह सब चीजों को देखना है। तो यह एक पूरा इसका एक है डिस्कशन। इसके बाद का पैराग्राफ वैसे प्रारंभ कर देते हैं। लंबा है वैसे। बद्ध

अष्ट पाश से बद्ध मानव ईश्वर या अवतार का मानव भाव ही समझ सकता है

मानव मानव भावे मात्र बुझते पारे। बद्ध मानव जो होता है वह मानव मानव भाव को ही समझ सकता है। अभी इसका क्या अर्थ है थोड़ा सा देखते हैं महाराज क्या लिखते हैं ठाकुर कृपा लाभ प्रत्याशी होले ओ आमादग के ताहा के आमादगे न्याय मानव भाव संपन्न बोलिया ग्रहण करते होबे ठाकुर के कृपा लाभ के लिए हम यदि आशा रखकर के भी यदि बैठे हो तो भी हमको उनको हमारी ही तरह मानव भाव संपन्न बोलकर के ग्रहण करना होगा इसका अर्थ क्या है यदि मैं ठाकुर ठाकुर को अवतार ईश्वर मानता हूं और आत्म प्रकाश पर्व में ठाकुर ने जो कहा कि तुम चैतन्य हो तो स्पर्श मात्र से जिनके पास में चैतन्य दे देने की शक्ति है इस तरह से यदि मैं मानता भी हूं उनको फिर भी मुझे ठाकुर के भीतर में मानव भाव का दर्शन करना होगा क्यों कारण ठाकुर आमादिग दुखे क्षम वेदना भागी होई तो आमादिग दुख मोचन अग्रसर होइबेन क्यों क्योंकि ठाकुर यदि हमारी तरह दुख भोग नहीं करेंगे तब तक वह हमारे दुख का विनाश करने के लिए अग्रसर क्यों होंगे? हमारा दुख उन्होंने भुगता है और उस दुख को दूर करने के लिए उन्होंने प्रयास किया है। यहां पे कौन सा दुख यह भी देखना है कि गरीबी का दुख नहीं। देखिए पॉवर्टी या तो फिर यह इकोनॉमिकल स्ट्रगल हम सबके जीवन में है। सांसारिक स्ट्रगल हम सबके जीवन में है। किंतु इनसे भी जो सबसे बड़ी आध्यात्मिक स्ट्रगल है वो है हमारे यह कामना वासनाओं के प्रति हमारी स्पसे बचने का हमारा जो संघर्ष है वो। तो ठाकुर उन्होंने सिर्फ हमारी तरह गरीबी या तो फिर यह सब धारण नहीं किया। मान लीजिए अभी अमेरिका में ठाकुर के बारे में बताना है कुछ तो वहां की वो पर कैपिटा इनकम है $900 नियरली $900 पर एनम 89 ने ऐसा कुछ है उनको यदि हम यह कहेंगे कि हमारी तरह ही ठाकुर ने गरीब घर में आकर के जन्म ग्रहण किया तो फिर उनको तो यह सब बात स्पर्श नहीं करेगी। उनके लिए जो चैलेंजेस है डे टू डे लाइफ का स्ट्रेस क्या है? यह जो करियर में जो प्रमोशन के लिए जो रेड रेस जो लगता है वहां पर चूहे की दौड़ रेड रेस तो वो वो क्या है तो यह सब तो हमारे कामिनी कांचन के प्रति आकर्षण से ही तो यह सब होता है। तो उसका जो एक अंश ठाकुर ने ग्रहण किया था और उस अंश से मुक्ति पाने के लिए उन्होंने साधना की थी यह बात हमको पहले से ही समझना होगा। तभी तो हम हमको लगेगा कि ठाकुर की हमारे प्रति सहानुभूति है। हम लोग जो सहन कर रहे हैं, वह ठाकुर ने सहन किया है और इसीलिए उससे मुक्त होने के लिए उन्होंने तपस्या की है। तो यह जो देखिए जो सुंदर शब्द महाराज ने यूज़ किया है। क्षम वेदना भागी समवेदना जिनकी जिन्होंने हमारी पीड़ा अनुभव की है और हमारी पीड़ा को अनुभव करके जो खुद पीड़ित हुए हैं। समवेदना जिन्होंने हमारी स्वीकार की है वो है श्री रामकृष्ण। यानी कि श्री रामकृष्ण की कृपा देखिए। उनकी करुणा देखिए। उन्होंने सिर्फ एक जादुई हाथ घुमा करके एक जादू ऐसा करके कि हां तुम लोगों की सब की मुक्ति हो जाए तो ऐसा जादू करके उन्होंने हमको मुक्त नहीं कर दिया है जो कि उनके पास में शक्ति है। ईश्वर के पास में सब तरह की शक्ति है। ईश्वर जो चाहे वह कर सकते हैं। किंतु इस तरह से जादुई छड़ी नहीं घुमा करके जैसे ठाकुर ने कहा था कि मैं चाहता तो तुम्हारे हृदय को कहा था कि तुम्हारे पूरे कामार पुकुर को सोने से मढ़ करके जाता। सोने का पूरा वर्क पूरे कामर पुकुर पे लगा के जाता। किंतु मुझे पता है कि इससे तुम लोगों का कुछ कल्याण होने वाला नहीं है। भीतर में जो एक वासनाओं के प्रति स्प्रूहा है वह तो वैसी की वैसी ही रहेगी। तो इसलिए उन्होंने ऐसा नहीं करके हमको हमारी जो वासना के प्रति जो हमारी जो स्प्रोहा है उसका एक अंश उन्होंने रख के तपस्या की। उन्होंने उसका एक अंश रख के हमारी वेदना के समभागी हुए और इस वेदना के समभागी होकर के उन्होंने तपस्या की तो देखिए कि उनकी हमारे प्रति करुणा कितनी है अतः ए जेद के दिया देखो ताहा के मानव भाबा प बोलिया चिंता करा भिन्नो आमाद गर गत्यंतर नाई इसलिए जिस तरह से भी देखिए ठाकुर को ईश्वर भाव से सुसंपन्न बोलकर के चिंता करने के अलावा हमारे पास में और कोई उपाय नहीं है। अच्छा यह पैराग्राफ अभी बहुत लंबा है तो उसको समाप्त करने को अभी हम कल देखते हैं आज यहीं तक। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु।

प्रश्न: अवतार तत्व को समझना बहुत कठिन है

देखिए अवतार तत्व के बारे में कि पहले तो हमको यह स्वीकार कर लेना है कि अपनी बुद्धि से हम यह तत्व 100% समझ नहीं पाएंगे। मतलब जितना इजीली हम ज्ञान तत्व या तो भक्ति तत्व एस सच हम समझ लेते हैं। ईश्वर क्या है समझ लेते हैं। मनुष्य क्या है समझ में आ जाता है। भगवान बुद्ध ने मनुष्य हो मनुष्य ही है। अवतार तो हमने बनाया है। उन्होंने खुद ने तो कहा नहीं कि मैं अवतार हूं। तो एक मनुष्य एक राजकुमार जिसने कि सुख-भोग से परेशान होकर के या तो फिर उपजा करके तपस्या की और निर्वाण प्राप्ति की। ये एक स्ट्रेट फॉरवर्ड लॉजिकल समझ में आता है। श्रीमद् भागवत एकदम स्पष्ट समझ में आता है कि भगवान ने राक्षसों का वध करने के लिए पृथ्वी पर ग्रहण जन्म ग्रहण किया। जब-जब कि धर्म की हानि होती है। अधर्म का बढ़ावा होता है तब तक साधु पुरुषों की रक्षा करने के लिए मैं जन्म ग्रहण करता हूं। वो वादा निभाने के लिए उन्होंने जन्म ग्रहण किया। सो इट्स वेरी ईजी टू अंडरस्टैंड। स्ट्रेट फॉरवर्ड वो गाड़ी चलती है कि ये दोनों को मिश्रण करेंगे। ठाकुर मानव भी है और भगवान कृष्ण की तरह वह देवी गुण से भी संपन्न है। हाउ इज दैट पॉसिबल? यहां पे हम सब लोग इंटेलेक्चुअल कंफ्यूजन में पड़ जाते हैं। सो दो चीज है। पहले तो कि समझ लेना है कि इट विल टेक अस अ लॉन्ग टाइम। माने एक के बाद एक जैसे कि प्रत्येक धर्म में एक फिलॉसोफर्स आते जाते हैं। जैसे क्रिश्चियनिटी में देखिए कि सेंट थॉमस एक्विनास है। ना कि फिर ये ऑगस्टाइन है। सेंट ऑगस्टाइन। तो एक के बाद एक ग्रेट फिलॉसोफर्स ने आकर के क्रिश्चियन थियोलॉजी का फाउंडेशन डाला। अपना भारतीय इतिहास तो एकदम स्पष्ट है। शंकराचार्य है, वेदव्यास है, रामानुजाचार्य है, मधवाचार्य है। एक के बाद एक आचार्यों ने आकर के हमारी जो रिलीजियस फिलॉसोफी है, वेदांतिक फिलॉसोफी उसका एक फाउंडेशन डाला है। सो इट विल टेक रामकृष्ण मिशन आल्सो ए लॉन्ग टाइम। लॉन्ग सक्सेस लाइन ऑफ सक्सेसर्स ऑफ थियोलॉजियंस एंड फिलॉसोफर्स। कि ठाकुर का यह मानव भाव और यह अवतार भाव। यह जो स्पेक्ट्रम है हाउ टू डिफाइन दिस हाउ टू कंपेयर एंड कंट्रास्ट विद अदर अवतार इट विल टेक अस अ लॉन्ग टाइम सो इस म इजीली वो हमारे लिए समझने के लिए शक्य नहीं है किंतु साथ में यह भी बात याद रखना है कि इस क्वेश्चन को स्किप कर देना या तो फिर इससे नजरअंदाज करके इसको अवगणना करना इसको इग्नोर करना दैट इज आल्सो नॉट हेल्दी फॉर अस स्वीकार कर लीजिए कि इज अ नोटी क्वेश्चन जिसका कि उत्तर हमको भविष्य में कभी मिलेगा बट राइट नाउ वी आर स्ट्रगलिंग थिंग वी आर ट्राइंग आवर बेस्ट टू अंडरस्टैंड इट। सो देयर इज नथिंग रोंग विथ

प्रश्न: अवतार के जीवन में चमत्कार

दैट। इट इज नॉट लाइक दैट देयर वेर नो मिरेकल्स इन ठाकुर लाइफ। देयर वर मिरेकल्स इनफ। जो वन ऑफ़ द वेरी फेमस इंसिडेंट्स दैट व्हेन श्री रामकृष्ण वाज़ इन श्यामपुकुर एंड सुरेन मित्र वाज़ परफॉर्मिंग दुर्गा पूजा एट दैट टाइम बिकॉज़ श्री रामकृष्ण हैड कैंसर, ही कुडंट गो देयर इन पर्सन। सो इन विज़ ही वेंट देयर दैट अ पाथ ऑफ लाइट कनेक्टेड श्यामपुकुर वेयर ठाकुर वास स्टेइंग एंड बिटवीन द होम ऑफ सुरेन मित्र एंड बाय दिस पाथ ऑफ लाइट श्री रामकृष्ण वेंट देयर ही सॉ एवरीथिंग दैट ऑल द लैंप्स आर बर्निंग एंड इन फ्रंट ऑफ देम सुरेन इज़ क्राइंग बिकॉज़ ठाकुर कुडंट गो देयर देन ठाकुर रिटर्न फ्रॉम द सेम पाथ ऑफ लाइट ही टोल्ड हिज डिवोटीज़ दैट दिस इज़ द सिचुएशन इन सोरेंस होम प्लीज गो देयर। तो डिवोटिज़ थॉट दैट सी इट इज़ वन थिंग टू हैव विज़न ऑफ़ गॉड बट टू टू एक्चुअली मैनिफ़ेस्ट इन वन पर्टिकुलर प्लेस एंड टू सी एवरीथिंग एंड देन टू रिटर्न एंड इनफॉर्म इज़ दिस इवन पॉसिबल दिस फॉल्स इन द कैटेगरी ऑफ़ मिरेकल। हैविंग अ विज़न इज़ फॉल्स इन अ कैटेगरी ऑफ़ स्पिरिचुअल रियलाइज़ेशन। बट एक्चुअली दिस आइटम इट फॉल्स विद इन द कैटेगरी ऑफ़ मिरेकल। सो डिवोटीज वेंट एंड दे वर सरप्राइज टू फाइंड इट इज़ एवरीथिंग एज ठाकुर हैड डिस्क्राइब। सो देयर वर मिरेकल्स इनफ ठाकुरस लाइफ एंड नॉट ओनली दैट ठाकुर हैड आस्क्ड नरन दैट यू आर गोइंग टू हैव टू डू लॉट ऑफ वर्क सो आई हैव अर्न मेनी मिरेकुलस पावर्स ड्यूरिंग माय लाइफ एंड आई वांट टू गिव इट टू यू इफ यू विश देन इट दिस पावर्स विल बी वेरी बेनिफिशियल टू यू। तो नारायण इमीडिएटली आस्क दैट विल दे हेल्प मी इन रियलाइजिंग गॉड? ठाकुर सेज़ नो नो इट विल नॉट हेल्प यू इन रियलाइजिंग गॉड देन इमीडिएटली नरन सेज़ देन आई डोंट वांट ऑल दिस पावर्स इनस्पाइट ऑफ़ दैट वी नो एट द एंड ऑफ़ हिज़ लाइफ ठाकुर ट्रांसफरर्ड हिज़ पावर ट्रांसमिटेड हिज़ पावर विद इन नरन सो इट इज़ नॉट लाइक दैट दिस पावर्स और मिरेकल्स वेर नॉट अवेलेबल टू श्री रामकृष्ण ही चूज़ नॉट टू एक्सरसाइज देम एंड फिलॉसोफिकली श्री रामकृष्ण आई डोंट थिंक दैट ही इज़ अगेंस्ट मिरेकल पर से अदरवाइज़ देयर वेर दे मिरेकल्स इनफ इन आवर स्क्रिप्चर्स इन आवर पुराणा। सो ठाकुर हैज़ ऑलवेज सेड आई हैव कम टू फुलफिल ऑल आवर एंशिएंट ट्रेडिशंस नॉट टू स्टार्ट समथिंग न्यू। सो रामकृष्ण ऑर्डर्स पोजीशन इज़ वेरी क्लियर दैट विदिन हिंदूइज़्म देयर आर मिरेकल्स एंड मिरेकल्स आर गुड सो दैट वी कैन हैव डिवोशन टू गॉड एट द सेम टाइम। फॉर अस इन मॉडर्न एज मिरेकल्स माइट बी अ हिंडरेंस। बिकॉज़ वी आर अगेन एट दैट टाइम अह भागवत सेस दैट इन द सतयुग धर्म यूज्ड टू स्टैंड ऑन फोर लेग्स देन वन आफ्टर अनदर इन त्रेता युग द्वापर युग कलियुगा धर्म हैज़ कम टू स्टैंड ऑन ओनली वन फीट। सो इन टुडेज़ ऐज पीपल डू नॉट हैव दैट कैपेसिटी टू डू एक्सट्रीम तपस्या। द वे ध्रुवत तपस्या स्टैंडिंग ऑन वन लेग फॉर थाउजेंड्स ऑफ इयर्स। इट इज़ नॉट पॉसिबल फॉर अस। ठाकुर सेस कलिते अन्नगतो प्राण इन द कली एज आवर प्राण इज़ आई मीन वी आर मोर ऑफ अ अन्नमय कोश इज़ देयर आवर माइंड्स आर मोर लोकेटेड इन दिस अन्नमय कोष एंड फॉर अस जप एंड प्रेयर आर द बेस्ट साधनाज़। सो वी हैव टू अंडरस्टैंड व्हेन द धर्म वाज़ स्टैंडिंग ऑन फोर लेग्स एट दैट टाइम मिरेकल्स वेर नॉट अ हिंडरेंस बट नाउ दैट धर्म इज़ स्टैंडिंग ऑन ओनली वन लेग द मिरेकल्स विल ब्रेक द बैक ऑफ आवर

प्रश्न: हमारे भक्तों में दूसरों की तुलना में अधिक त्याग है। अन्य मंदिरों में भक्तगण अपनी बीमारी ठीक करने या कुछ सांसारिक लाभ प्राप्त करने के लिए जाते हैं। हमारे भक्त जानते हैं कि ठाकुर चमत्कार को प्रोत्साहित नहीं करते हैं, बल्कि त्याग और उपासना सिखाते हैं। कुछ लोगों को ठाकुर की कथामृत उबाऊ लगती है क्योंकि अन्य धार्मिक पुस्तकों की तरह इसमें कोई चमत्कार नहीं है।

साधना। देखिए आई डू नॉट नो कि हमारे ये सेल्फ कांग्रेचुलेटरी भाव कितने दिन तक टिकेगा। क्योंकि हमारे पास में दो उदाहरण है। एक तो है बुद्धिज्म का दूसरा है क्रिश्चियनिटी का। देखिए हमारे घर वाले उदाहरण से ही स्टार्ट करें। तो स्वामी जी ने खुद ने माय प्लान ऑफ कैंपेन में कहा है। देखिए देयर कैन बी नो मोर रैशन नो अवतार माइनस मिरेकल नो ग्रेटर अवतार माइनस मिरेकल देन बुद्धा भगवान बुद्ध का जितना रैशनलिस्टिक अप्रोच था मिरेकल की जहां पर कोई जगह नहीं थी ईश्वर को कम संपूर्ण रूप से अस्वीकार कर दिया तो इस तरह का और कोई भगवान बुद्ध के अलावा और कोई नहीं दिखेगा। इसी बुद्धिज्म में धीरे-धीरे क्या हुआ कि यह अशोक ने तो एक तो उठा लिया अपने सर पर और फिर चारों ओर मिनिस्ट्रीज भेज के चारों ओर मिशनरीज को बेच करके जितने भी है इनडिसक्रिमिनेटली उनको कन्वर्ट करना शुरू कर दिया। तो स्वामी जी कहते हैं माय प्लान ऑफ कैंपेन में कि ये जो जितने भी ये जो दूसरे दूसरे रेसेस वाले आते गए जो अपने वो भूत पिशाच को साथ में लेकर आए। बुद्धिज्म में एक बार यह जो भूत पिशाच जो प्रवेश किए तो फिर उसने पूरा बुद्धिज्म का वो बड़ा सत्यानाश कर दिया। तो कहां भगवान बुद्ध का जो इनिशियल हाईली रैशनलिस्टिक हाईली एथिकल हाईली तपस्यामय उनका संदेश और कहां बात बादबाद में यह भूत पिशाच दानव पलित सब इकट्ठा हुए। किस तरह का महा भयानक करप्शन जो उसने भारत देश में जो घुसाया पूरा भारत का सत्यानाश करके बिठा दिया। सेकंड एग्जांपल क्रिश्चियनिटी का है कि जीसस के डेथ के बाद में क्रुसिफिक्शन के बाद में जो इनिशियल कम्युनिटीज थी उनके भीतर में प्रचंड तपस्या का भाव था। यहां तक कि यह जो रोमन एपरर है उनका पर्सक्यूशन करते थे तब भी वे लोग उन्होंने अपना आदर्श नहीं छोड़ा। सोच के देखिए कि चिता पे जिंदा जला रहे हैं। बोल रहे हैं कि रनाउंस क्रिश्चियनिटी तो हमको छोड़ देंगे तुमको। वो जिंदा जलना पसंद करेंगे किंतु दे विल नॉट रनाउंस जीसस। ये प्रचंड तपस्या यदि नहीं होती तो क्रिश्चियनिटी का बाद में डेवलपमेंट नहीं होता। किंतु एट द सेम टाइम ये जो कॉनस्टेंटाइन ने ये जो उठा लिया क्रिश्चियनिटी को और फिर जिसको सबको पता चला कि यदि राज फेवर यदि हमको चाहिए गवर्नेंस में माने पॉलिटिकल फेवर तो क्रिश्चियन हो जाना बेटर है। इवन कास्टेंटाइन खुद क्यों क्रिश्चियन हुआ? उसने देखा कि उसकी आर्मी में बहुत सारे लोग क्रिश्चियन है। तो उसने फिर अभी यह सही में हुआ कि फिर उसने अपनी अकल चला करके किया। पता नहीं वो कहता है कि मुझे एक विज़न दिखा सूरज के सामने क्रॉस तो फिर मैंने क्या किया? जितने भी सैनिक है उन सब के शील्ड के ऊपर में क्रॉस बिठा दिया। बोला अभी लड़ो। अभी जो सैनिक है वो मर जाएगा किंतु वो अपना जो शील्ड है या तो फिर अपनी ये जो फ्रंट लाइन है उसको टूटने नहीं देगा। तो ही मेड अ यूज़ ऑफ दिस लोगों का यह जो डिवोशन है। अगेन यू कैन से मेड अ यूज़ ऑफ इट कि वो सही विज़न हुआ। वी डू नॉट नो। किंतु दोनों केसेस में यह बात स्पष्ट है कि एक बार पॉलिटिक्स घुसता है धर्म में तो वो धर्म चकनाचूर हो जाता है। सो ये जो हमारा जो अभी का सेल्फ कांग्रेचुलेटरी भाव है कि कब तक रामकृष्ण संघ में पॉलिटिक्स नहीं आएगा तब तक ही ठाकुर की कृपा कर मतलब ठाकुर की कृपा हो कि यह ना आए। स्वामी जी का जो यह दुरंदेशी कितना स्पष्ट था। जिस क्षण निवेदिता ने यह सोचा कि भारत को मुक्त करवाने के लिए मुझे पॉलिटिक्स में जाना होगा। उस क्षण हमने यह कह दिया कि भारत की मुक्ति से भी ज्यादा अभी ऐसा उन्होंने नहीं किया। ये तो मैं अपने शब्द में कह रहा हूं म रीडिंग बिटवीन द लाइंस कि इवन ग्रेटर देन भारत की मुक्ति आत्मन की जो मुक्ति है विच इज इवन ग्रेटर। तो आत्मन की मुक्ति के लिए जो पथ हमने ठाकुर ने प्रदर्शित करके गए हैं उसमें करप्शन ना आए वि इज इवन मोरेंट फॉर अस टू थिंक अबाउट तो यह विज़डम हमारे संग में कितने दिन तक टिके रहेगा वी डू नॉट नो दो हिस्टोरिकल एग्जांपल अपने सामने है ऑलरेडी स्वामी जी का नाम उठा के लोग क्या-क्या कर रहे हैं ठाकुर को एप्रोप्रियट करेंगे नहीं कितने दिन वो वो जो कहना कहना चाहते हैं कि रामकृष्ण संघ वाले स्वामी जी को एनकेश नहीं कर रहे हैं। इंटरेस्टिंगली यह जो आपने मार्चिंग वाली बात कही ना अपना यह जो ठाकुर का जो संध्या आरती है ना खंडन भव बंधना उसमें एक जो वो मार्चिंग म्यूजिक जो है ना अमेरिका यूरोप का मतलब बैटल फील्ड में जो मार्च करने के लिए जो जिस तरह का ड्रम बिट्स का यूज़ होता है उसका एक एलिमेंट स्वामी जी ने अपने खंडन भव बंधना में भी रखा है। वि इज वेरी इंटरेस्टिंग एक्चुअली कि इसको प्योरली स्पिरिचुअल नहीं बनाया है। बैटल फील्ड एलिमेंट भी इसके भीतर में है। अभी मेरा म्यूजिक का इतना नॉलेज नहीं है कि मैं आपको टेक्निकली समझाऊं। किंतु आप थोड़ा सा भी कर्सरी सर्च भी नेट पे करेंगे तो आपको यह इंफॉर्मेशन मिल जाएगी। ड्रमबिट वगैरह नॉट इन अ टेक्स्ट बट विद इन द राग राग ड्रमबिट समथिंग लाइक दैट। ताल और राग जिसको कहते हैं ना उसके भीतर में कहीं पे। मैं इतना सब कुछ पढ़ने के बाद में अभी देखिए आश्चर्य की बात कहूं। समथिंग कंप्लीटली कि ब्लो माय माइंड लीला प्रसंग इतनी बार पढ़ा है जस्ट रिसेंटली मैं रैंडमली खोल के पढ़ रहा था देखा ठाकुर का राशी कृत नाम देखने को मिल गया पता है क्या है ठाकुर का राशी कृत नाम मां शारदा का राशीकृत नाम बहुत सारे लोगों को पता होगा पता है किसी को राशि के अनुसार मां का क्या नाम था और किसी को नहीं पता किसी को सुबीरदा अपनी जानन अरे मां का नाम था खेमंकारकरी राशीकृत नाम ठाकुर का क्या था ये मैंने लीला प्रसंग कितनी बार पढ़ा है किंतु अभी जस्ट रिसेंटली खोल रहा था तब मैंने देखा अरे तू शंभूनाथ है शंभूनाथ ना शंभू राम एग्जैक्टली देखना पड़ेगा किंतु ये ठाकुर का राशीकृत नाम है इतनी बार लीला प्रसंग पढ़ने के बाद में भी मैंने इस बात को स्किप कर दिया या तो मेरे मेमोरी में नहीं रहा। मां का था खेमंकारी। ठाकुर का है शंभूनाथ ना शंभू राम। एक्सैक्टली मैं देखना पड़ेगा। मैं भूल गया अभी दिस इज ठाकुर राशी कृत नेम। लीला प्रसंग में है। हा अच्छा मां शारदा का शारदा नाम कैसे आया पता है ना? ये मां को राशी कृत नाम दिया गया खेमंकरी। किंतु फिर वो जो मां की मां जो थी उनका कोई रिलेटिव की लड़की का नाम था शारदा। तो उसका रिसेंटली डेथ हो गया था। तो उसने कहा कि यह छोटी बच्ची को देखकर के मुझे मेरी बिटियां शारदा की याद आ जाती है। तो उसमें वह मां का नाम शारदा बैठ गया। जो एक लेडी

कहानी: श्रीरामकृष्ण के साथ विवाह नहीं हुआ इसलिए एक महिला अफसोस करती है

थी ना मैं नाम भूल गया। कृष्ण भानी देवी ना कि क्या नाम है? वो एक बार जय राम बाटी जाकर के मां के साथ में बैठी हुई है। मां के सब डिवोटी आते हैं। बहुत कुछ लेकर के प्रसाद फल मूल प्रणामी मिठाई वगैरह लेकर के मां के सामने रखते हैं। साड़ी, वस्त्र वगैरह-वगैरह। तो वो लेडी देख रही है सब कुछ। फिर वह लंबी गहरी निश्वास डालकर के बोलती है बड़े दुख के साथ में कि परमहंस महाशय के साथ में तो मेरा ही विवाह ठीक हुआ था किंतु पिताजी ने सोचा कि यह पगला है उसके साथ में कहां मैं अपनी बिटिया का विवाह करवाऊं तो बोल करके मेरा उनके साथ विवाह नहीं हुआ विवाह हो जाता तो यह सब मेरे पास आता तो सब लोग हंसने लगे फिर माँ ने कहा अरे तुम लो ना तुमको क्या चाहिए जो चाहे ले लो इसमें से वो नौबत में रह के तपस्या करने की जरूरत नहीं है ले लो वैसे ही ले ठाकुर कहते हैं ना वो इसके बाद में थोड़ा सा पायस मुंडी हो जाए यानी कि वो बहुत वो ज्ञान चर्चा हुई उसके बाद में पायस मुंडी अर्थात कि खीर और मछली का माथा यानी कि नृत्य कीर्तन