prayer
ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णायते नमः श्री श्री रामकृष्ण लीला प्रसंग का पाठ करेंगे इस सप्ताह प्रथम चैप्टर द्वितीय भाग का साधक भाव इसका प्रथम चैप्टर है साधक और साधना वह हम देख रहे थे उसमें भी जो एक पर्टिकुलर पॉइंट हम देख रहे हैं
वेदान्त कहता है कि स्वप्न, सुषुप्ति और जाग्रत — तीनों अवस्थाएँ भ्रम हैं; सत्य तो इन तीनों से परे स्थित तुरीय अवस्था है। फिर हमें जाग्रत अवस्था इतनी वास्तविक क्यों प्रतीत होती है, और क्यों सब लोग एक ही वास्तविकता को देख रहे हैं? सबको एक समान भ्रम क्यों होता है?
शरद महाराज यानी कि स्वामी शारदानंद जी महाराज लीला प्रसंग के लेखक एक प्रश्न का उत्तर देते हैं। प्रश्न क्या है कि हम सबको एक ही तरह का भ्रम क्यों होता है? सबसे पहले तो उन्होंने हमारे सामने एक उद्देश्य रखा मनुष्य जीवन का कि सर्वभूत में ईश्वर दर्शन या तो फिर कहेंगे सर्व व्यक्तियों में सर्व पदार्थों में सर्व पशुओं में ईश्वर दर्शन या तो ब्रह्म दर्शन करना वही आध्यात्मिक जीवन का सर्वश्रेष्ठ उद्देश्य है। मेरा जो आई वो जो स्मॉल आई है वो मेरे खुद के देह तक सीमित है। उसको लार्ज बना करके पूरे विश्व को अपने प्रेम, करुणा और स्नेह के बंधन में बांध देना यही है कि आध्यात्मिक जीवन की सर्वोच्च अनुभूति। तो यह प्राप्त करने के लिए ऋषि मुनियों ने इतने सालों से तपस्या की है। तो यह उद्देश्य जब हमारे सामने रख दिया गया तो फिर इसके सामने धीरे-धीरे करके महाराज जी एक के बाद एक काउंटर क्वेश्चंस कर रहे हैं कि क्या यही सर्वभूत में ईश्वर दर्शन या सही में ऐसा संभव है कि नहीं है? यह किस तरह से आप कह सकते हैं जो कि हमारी क्लासिकल शास्त्रों की परंपरा है। उत्तर पक्ष और पूर्व पक्ष एक बार एक प्रपजीशन हमारे सामने रख दी जाएगी। एक प्रूफ हमारे सामने रख दिया जाएगा। फिर यह जो आपका कांसेप्ट है उसको आपको डिफेंड करना है। आपके जो आदर्श के विरोधी है आपके थ्यरी के जो विरोधी है उनके सामने। तो यह चल रहा है। उसमें एक प्रश्न हुआ कि हम सबको एक ही तरह का भ्रम क्यों होता है? सबसे पहले तो यह कह दिया गया कि सर्वभूत में ईश्वर दर्शन ही जीवन का उद्देश्य है। फिर प्रश्न हुआ कि मुझे यह क्यों नहीं दिखता है? तो उसका उत्तर मिला कि हम लोग भ्रम में पड़े हैं। तो फिर प्रश्न हुआ कि हमको भ्रम क्यों हुआ है और सबको एक ही तरह का भ्रम क्यों दिखता है? अब जैसे कि मान लीजिए मैं अपने स्वप्न में प्राइम मिनिस्टर हूं। ऐसा मुझे दिखाई दिया। किंतु जैसे ही मैं जग जाऊंगा वो स्वप्न टूट गया तो फिर मैं वही जो हूं सो हो जाऊंगा। आज मैं यहां पर साधु हूं। एक आश्रम में रह रहा हूं। तो मेरी जो रियलिटी है वहां तक वापस चला जाऊंगा। वो जो मैं सपने में प्राइम मिनिस्टर था वह भ्रम वह सपने में ही समाप्त हो जाएगा। किंतु आप तो ऐसा कह रहे हैं कि यह पूरा जगत जो एक भ्रम है वह भ्रम नहीं है। भ्रम है। वह हमको क्यों दिखता है? क्योंकि हम सबको एक ही तरह का भ्रम हुआ है। यह कैसा है? पता है कि मान लीजिए अ हम सभी लोग अपने-अपने स्वप्न में प्राइम मिनिस्टर होते हैं। भारत की पॉपुलेशन 140 करोड़ की है तो 140 करोड़ लोग अपने-अपने स्वप्न में प्राइम मिनिस्टर हो सकते हैं। किंतु जैसे ही स्वप्न भंग हुआ जैसे ही आंख खुली तो वैसे ही पता चला कि एक ही प्राइम मिनिस्टर है भारत का। बाकी 140 करोड़ लोग सिर्फ स्वप्न ही देख रहे थे। तो वैसे ही यहां पर देखिए कि हम सभी लोग भ्रम में पतित हुए हैं। और जैसे ही भ्रम समाप्त हो जाएगा वैसे ही हमको एक ही जो सत्ता है वो दिखाई देगी। किंतु यहां पर एक क्रूशियल क्वेश्चन होता है कि हम सबको क्या एक ही तरह का सपना आता है क्या कि ऐसा होगा कि जो भारत का प्राइम मिनिस्टर आज जो है हम सभी लोग 140 करोड़ लोग स्वप्न में भी उसको प्राइम मिनिस्टर के रूप में देखें क्या यह संभव है क्या स्वप्न में तो कितने ही विभिन्न विभिन्न चीजें दिखाई देती है सिर्फ वास्तविकता में ही एक प्राइम मिनिस्टर दिखता है ऐसा कभी होगा ही नहीं कि भारत के 140 करोड़ लोग अपने सपनों में सिर्फ एक ही प्राइम मिनिस्टर को देखें। वास्तविकता एक है वह तो समझ में आता है। किंतु जो भ्रम है वह तो बहुत ही विभिन्न तरह के है। भ्रम तो कभी एक तरह का नहीं होता। आज कल रात को ही अब जो स्वप्न मैंने देखा उससे कहीं डिफरेंट स्वप्न आपने देखा होगा। उससे कहीं डिफरेंट स्वप्न और किसी ने देखा होगा। हमारी वास्तविकता समान है किंतु स्वप्न तो कभी समान नहीं हो पाएंगे। तो यहां पर शरद महाराज कहते हैं कि हम सब जब भ्रम में पड़े हैं तो यह भ्रम भी हमको एक समान दिखाई देता है। तो यह बात हमको समझ में नहीं आती। जब आप यह कहते हैं कि वास्तविकता एक समान है तो वह तो मेरे जीवन का जो एक्सपीरियंस है उसके हिसाब से मैं स्वीकार कर लेता हूं कि हां वास्तविकता एक समान है। मेरा स्वप्न आपका स्वप्न और किसी का स्वप्न वो बिल्कुल ही डिफरेंट होंगे। किंतु जैसे ही स्वप्न में से जग गए वास्तविकता में आ गए तो हम सब की वास्तविकता एक समान ही है। यह एक सिंपल हमारे सामने एक जीवन का अनुभव है। तो वह तो हमको समझ में आता है। किंतु जब आप यह कहेंगे कि नहीं भ्रम भी सबको एक समान हुआ है। ये जगत रूपी भ्रम ब्राह्मण की ऊपर में लगा हुआ है और हम सभी लोग एक ही तरह का सपना देखते हैं। यह जो हम आंख खुल जाएगी 140 करोड़ भारतवासियों की और अपनेप स्वप्न में जो प्राइम मिनिस्टर हुए होंगे उनको फिर एक ही प्राइम मिनिस्टर दिखेगा। किंतु यहां पर शरद महाराज कहते हैं जैसे स्वप्न और सुशुप्ति वह जैसे भ्रम था वैसे ही जागृत अवस्था भी भ्रम है। जागृत के परे तुरीय अवस्था है। तुरीय अवस्था में देखेंगे कि यह 140 करोड़ भारतवासी यह 140 करोड़ ब्राह्मण की एक-एक किरण मात्र है। और यह जो एक प्राइम मिनिस्टर है वह भी प्राइम मिनिस्टर नहीं है। ब्रह्मन की ही एक किरण है। आप मैं यह माइक, यह वस्त्र, यह बिल्डिंग, यह कार, यह रोड, यह समुंदर, यह पेड़, पौधे, पशु, पंख यह सब कुछ जो है मात्र और मात्र ब्रह्मण ही है। इसके ऊपर में यह नाम रूप रूपी भ्रम हमको हुआ है। तो अभी हमारी स्वप्न के बारे में अपना जो एक्सपीरियंस है कि स्वप्न सबको अलग-अलग होता है किंतु वास्तव जगत जिसको हम गिनते हैं जागृत अवस्था वो तो सबको एक ही समान दिखती है तो इसका आप क्या उत्तर देंगे? यदि आपको यह एस्टैब्लिश करना है कि जैसे जागृत अवस्था के सामने स्वप्न अवस्था भ्रम है वैसे ही तुरीय अवस्था के सामने जागृत अवस्था भी भ्रम है। तो चलो फॉर वन मोमेंट मैं आपकी बात मान लेता हूं। मुझे स्वप्न और जागृत अवस्था का डिफरेंस स्पष्ट रूप से समझ में आता है। मेरा जो जीवन है अभी तक का मुझे एक ही तरह का और सिर्फ मुझे ही नहीं सब लोगों का एक्सपीरियंस इसी डायरेक्शन में जाता है। हम लोग क्यों स्वप्न को सही नहीं मानते हैं। सही नहीं मानने के पीछे में एक बहुत बड़ा रहस्य यह भी है कि अभी इवन एक ही परिवार में मां पिताजी दो भाई दो बहन वहां पर रहते हैं। नाना नानी चाचा चाची जो लोग भी वहां पर रहते हैं। रात को सभी को डिफरेंट-डिफरेंट सपना आएंगे। किंतु जैसे ही जग जाएंगे सबकी शेयरर्ड रियलिटी एक ही है। यही पिताजी है। और कोई पिताजी नहीं हो सकता। यही मेरी मां है और कोई मेरी मां नहीं हो सकती। यही मेरा भाई या बहन है और कोई भाई-बहन नहीं हो सकता। मैं यहां पर स्कूल में जाता हूं, जॉब करता हूं, बिजनेस करता हूं। तो मैं कल भी जो जॉब कर रहा था, वही जॉब आज भी कर रहा हूं। यानी कि सभी को डिफरेंट-डिफरेंट सपना आएंगे। जग जाएंगे तो वही एक ही वास्तविकता दिखेगी। किंतु साथ-साथ में ही प्रत्येक दिन इवन मैं अकेला भी मेरा खुद का अनुभव देखूं। मुझे प्रत्येक दिन नए-नए सपन आते हैं। आज मैं स्वप्न में प्राइम मिनिस्टर हुआ हूं। तो कल कहीं जाकर के स्वप्न में मैं फिल्म स्टार हुआ हूं। परसों दिन स्वप्न में मैं किसी के साथ झगड़ा कर रहा हूं। तो और नेक्स्ट डे स्वप्न में मैं उसके साथ में मित्रता कर रहा हूं। किंतु मैं प्रत्येक दिन जगता हूं। तो जग करके मैं अपना जो वास्तविक जगत है अलग-अलग देखूंगा। क्या? आज मैं नींद से जगा तो मैं साधु हूं। कल मैं नींद से जगूंगा तो मैं एस्ट्रोनॉट हो जाऊंगा। परसों दिन मैं नींद से जगूंगा तो एक वर्ल्ड फेमस म्यूजिशियन हो जाऊंगा। और फिर एक दिन नींद से जगूंगा तो कहीं वो ब्रिज के नीचे में भिक्षा मांगने वाला एक भिक्षार्थी के रूप में बैठा हूं। क्या मेरे जागृत अवस्था में इस तरह के वाइल्ड फ्लक्चुएशन आते हैं क्या? नहीं आते। हां ऐसा हो सकता है कि एक मनुष्य वो साधु से एस्ट्रोनॉट हो सकता है यदि वह अपने लाइफ को ट्रांसफॉर्म करें। वही साधु वही एस्ट्रोनॉट साइंटिस्ट हो सकता है यदि वह स्टडी करके पीएचडी वगैरह करें और यही साइंटिस्ट गड़बड़ करने से नौकरी से निकाल दिया गया तो उसको ब्रिज के नीचे बैठकर के भिक्षा मांगनी होगी। किंतु यह तो एक कंसिस्टेंट लाइफ आर्क है जो कि हमको स्पष्ट दिखता है। ऐसा सडन चेंजेस कभी नहीं होने वाला है। तो हमारा सपना और जागृत यह दो अवस्था का जो स्पष्ट भेद हमको दिखता है। इस तरह का स्पष्ट डिफरेंस या तो भेद हमको जागृत अवस्था और तुरीय अवस्था के बीच में नहीं दिखता है। तुरीय अवस्था में यदि आप कहेंगे सिर्फ ब्राह्मण ही है। यह बाकी जो कुछ भी आप देख रहे थे वह सिर्फ स्वप्न ही है या तो भ्रम ही है और कुछ नहीं। तो फिर प्रश्न होगा कि यह भ्रम जो आप जिसको कह रहे हैं वो इतना कंसिस्टेंट क्यों है? क्यों मैं आज साधु हूं नींद से जगा और कल भी नींद से जगूंगा तो साधु ही होऊंगा। साधु के अलावा और कुछ यदि होता हूं तो मेरे मन में जो प्रक्रिया हो रही है यह बदलाव की मुझे स्पष्ट रूप से देखने को मिल रही है। एक समय था कि जब मैं अपने घर में था एक समय था कि मैंने यह सोचना शुरू किया कि मुझे किस तरह का जीवन जीना है और फिर मैंने यह प्रक्रिया से गुजर करके मैं साधु हुआ हूं। मेरी मेमोरी में यह बात स्पष्ट रूप से दिख रही है कि मैं विद्यार्थी था। विद्यार्थी में से साधु हुआ। यह मेरी मेमोरी स्पष्ट है। किंतु आज आप स्वप्न में देखते हैं प्राइम मिनिस्टर हुए हैं। कल आप स्वप्न में देखते हैं। आप भिखारी हुए हैं। तो वो प्राइम मिनिस्टर से भिखारी होने की यात्रा उसका कोई मेमोरी नहीं है। एक सडन जंप है। आज यहां कल वहां इन दोनों के बीच में कोई लॉजिकल रैशन टाइमलाइन नहीं है। जबकि अपनी जागृत अवस्था में एक क्लियर टाइमलाइन आपको दिखाई देती है। हां, अपनी मेमोरी कभी-कभी वीक हो जाएगी। किंतु आज के डिजिटल युग में देखिए कि हम सभी के पास में यह फोटोग्राफ है, वीडियो है, अपने जो कलीग्स है, अपने पेरेंट्स हैं, उनकी मेमोरी है हमको सहाय करने के लिए। मैं अपनी मां के साथ में कभी-कभी बात करता हूं। तो मेरे बचपन की बातें करती है कि तुम जब छोटे थे, ऐसा करते थे, वैसा करते थे। अभी आज मुझे तो याद नहीं कि मैं बचपन में क्या करता था किंतु मेरी मां को याद है। यानी कि क्या है यह जो मेमोरी है यह जो फोटोग्राफिक एविडेंस है यह वीडियो एविडेंस है वो सब क्लियर एक मुझे दिखाता है। ऐसा कब पता है कभी-कभी हम लोग देखते हैं कि किसी को एमनेशिया हो जाता है। वह अपने बारे में भूल जाता है कि मैं आज यह था। कल आज मुझे सर पर चोट लगी। मेमोरी चली गई और वह फिर जो भान में आता है होश में आता है। एक्सीडेंट हुआ मान लीजिए सर पर चोट लगी वह बेहोश हो गया। फिर जब होश में आता है उसको पहले के जीवन के बारे में कुछ याद नहीं है। ऐसे केसेस होते हैं तो मान लीजिए उसने अपनी मेमोरी गवा दी है। किंतु उसके आसपास के जो लोग हैं उन्होंने तो अपनी मेमोरीज नहीं गवाई और जैसे ये डिजिटल प्रूफ जो है आजकल के प्रिंटेड मटेरियल है, फोटोग्राफ्स है, वीडियो है और कितना सब कुछ है जो कि उसको हेल्प करेगा। उसकी जो खोई हुई याददाश्त को जो लॉस्ट मेमोरी है उसको वापस लाने के लिए। यानी कि अपना यह मेमोरी का क्लियर सेतु है बिटवीन पास्ट एंड प्रेजेंट। तो आप कैसे कह सकते हैं कि यह सब कुछ ब्रह्म है। इतना कंसिस्टेंट लॉजिक से जो जागृत जगत हमको दिखाई देता है। इतने स्पष्ट नीति नियम के अनुसार सब कुछ चलता है। आप कैसे कह सकते हैं कि यह भ्रम है। मैं जब सोता हूं तो नींद में यह जो ग्रेविटी का नियम है अप्लाई नहीं होता। हो सकता है कि मैं ऐसा स्वप्न देखूं कि मैं हवा में उड़ रहा हूं। हो सकता है कि मैं एक ऐसा सपना देखूं जिसमें मैं एक इस तरह की कार चलाता हूं जिसमें किसी भी तरह का ईंधन डालने की जरूरत नहीं है। ना ही वह उसमें बैटरी है ना ही उसमें यह पेट्रोल है ना ही डीजल है। तो नींद में किसी भी तरह के फिजिक्स के नियम अप्लाई नहीं होते। किसी भी तरह के प्राकृतिक नियम अप्लाई नहीं होते। किंतु जागृत अवस्था में यह जो फिजिक्स है, बायोलॉजी है, केमिस्ट्री है, यह सोसाइटल डायनेमिक्स है, वह स्पष्ट रूप से अप्लाई होता है। ऐसा हो ही नहीं पाएगा कि आज मैं सडनली हवा में उड़ना शुरू कर दूं। ऐसा हो ही नहीं पाएगा कि कल कहीं जाकर के पृथ्वी का ग्रेविटी रिवर्स हो गया है। आज जो सब कुछ पृथ्वी पर गिर रहा था, कल कहीं जाकर पृथ्वी में से उड़ रहा है। सब कुछ आकाश में चला जाएगा। ऐसा होगा ही नहीं। यह जो हमारी जागृत अवस्था है वो इतनी कंसिस्टेंट है, इतनी लॉजिकल है, इतनी साइंटिफिक है कि इसको भ्रम के रूप में स्वीकार करना वो अपनी बुद्धि पर एक बहुत बड़ा अत्याचार करने के बराबर है। अभी बच्चा होगा उसको आप कहेंगे कि अच्छा तुमको यह जो कुछ दिखाई दे रहा है वह सब भ्रम है। बच्चा शायद मान ले क्योंकि क्या है उसकी बुद्धि इतनी विकसित नहीं हुई है। वो वो वो ऐसा सोच सकता है कि आज मैं जमीन पर खड़ा हूं। कल मैं उड़ भी सकता हूं। बच्चे को आप कहेंगे कल तुम उड़ना सीख लोगे। कल से तुम उड़ना शुरू कर दोगे। बच्चा हो सकता है वह स्वीकार कर ले। एक साल का 2 साल का तीन साल का बच्चा होता है। चार साल का वो हो सकता है स्वीकार कर ले। अभी आज मुझे 40 साल 50 साल हुए हैं। आप मुझे यह कहेंगे कि कल से तुम उड़ना शुरू कर दोगे। मैं किसी कीमत पर उसको स्वीकार नहीं करूंगा। नॉट ओनली कि मेरे पास में यह 40 साल का अनुभव है कि ग्रेविटी कभी रिवर्स नहीं होती। यह हमारे मैंने इतिहास पढ़ा है। एटलीस्ट पिछले 1000 दो 2000 साल का इतिहास तो उसका तो कुछ रिकॉर्ड है। तो यह इतिहास मैंने पढ़ा है। ये पूरे जो 2000 ढाई हजार 3000 साल जितना भी आप कहे कि रिकॉर्डेड हिस्ट्री हमारे पास में अवेलेबल है। कहीं पे ऐसा सुना नहीं है कि कोई आदमी ने सडनली उड़ना शुरू कर दिया हो। हां, यह पौराणिक कहानियों में यह सब पढ़ने को मिलेगा। रिलीजियस लिटरेचर में मिलेगा। यह मिस्टीरियस लिटरेचर में मिलेगा। किंतु फिर क्या है? हम सबको पता है कि इस तरह की कहानियों के प्रति एक ना एक संदेह हम सबके मन में है। आज हम यह कहेंगे कि पुष्पक विमान था। तो हम लोग सोचेंगे कि अच्छा आज का आज हमारे पास में विमान है बोलकर के पुष्पक विमान हो सकता है। यदि आज मैंने विमान नहीं देखा होता तो पुष्पक विमान पर मुझे संदेह हो जाता। तो क्या है कि हम लोगों के पास में कंसिस्टेंट रैशन लॉजिकल हिस्ट्री भी है। अपनी खुद की मेमोरी है। और यह जो चारों ओर हम एक्सपीरियंस के रूप में देख रहे हैं वो सब है। और कहीं आकर के अभी कोई ऐसा क्लेम कर दे कि नहीं जिस तरह से आपका स्वप्न जगत भ्रम था। स्वप्न जगत जिस तरह से इररेशनल था। स्वप्न जगत जिस तरह से इनकंसिस्टेंट था। स्वप्न जगत जिस तरह से इलॉजिकल था वैसे ही यह जागृत जगत भी इनकंसिस्टेंट है। वैसे ही जागृत जगत भी इररेशनल है। वैसे ही जागृत जगत भी इलॉजिकल है। तो फिर हमको इस तरह के व्यक्ति पे कभी भी विश्वास नहीं होगा। हम बोलेंगे कि आप मुझे पहले यह बताइए। हां, मैं स्वीकार कर लेता हूं कि इलॉजिकल है। कुछ-कुछ इलॉजिकलिटी, कुछ-कुछ इररेशनलिटी, कुछ-कुछ इनकंसिस्टेंसी हमको दिख जाएगी। किंतु यह 90% कंसिस्टेंसी, रैशनलिटी और लॉजिक ये जो साइंस के नियम है 90% केस में सही क्यों है? ठाकुर की वो फेमस घटना। वो मथुर बाबू ठाकुर को कहते हैं कि भगवान ने नियम बनाए हैं। अभी भगवान को भी उस नियम का पालन करना पड़ेगा। तो ठाकुर कहते हैं उसके उत्तर में कि अरे तुम क्या बात कर रहे हो? जिसने नियम बनाए हैं वह अपने नियम तोड़ भी सकता है। तो वह आर्गुममेंट हुई। इसके बाद में ठाकुर ने जाकर के देखा कि जवा का एक पेड़ है जासवंत का हिबिस्कस। तो उसका पेड़ है। उसमें एक ही डाल के ऊपर में दो विभिन्न कलर के फूल निकले हुए हैं। तो उस ठाकुर ने इमीडिएटली वह डाल तोड़ के वह मथुर बाबू के पास में ले गए। देखा कि भगवान ने इस पेड़ को लाल रंग के फूल वाला बनाया था। इसके ऊपर में यह पीले कलर का भी फूल आ गया। बताओ अभी तुमको क्या कहना है? क्या भगवान अपने नियम को नहीं तोड़ते क्या? तो मथुर बाबू हंस करके सम्मत हो गए। अभी आज के जो लोग हम लोग साइंस पढ़े हुए हैं, हम लोग कहेंगे कि अरे वह तो म्यूटेशन है। वह म्यूटेशन भी तो ये जो बायोलॉजी के नियम के भीतर में ही आता है। म्यूटेशन का नियम भी तो भगवान ने ही बनाया है। उसमें कुछ एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी कुछ नहीं है। तो चलो इस तरह से साइंस से हम ठाकुर की बात उड़ा दें। किंतु साथ में एक दूसरा भी एक उत्तर है। आपको कितने जासवंत के पेड़ दिखेंगे कि जिसके ऊपर में एक ही कलर के पेड़ के ऊपर में आपको दो रंग के फूल दिखेंगे। कितने मिलेंगे? ऐसे तो रेयर केसेस होंगे। हो सकता है कि 1000 पेड़ में एक पेड़ के ऊपर में इस तरह से म्यूटेशन काम करें। बाकी तो नौ 999 पेड़ में तो जिस कलर का पेड़ है अर्थात कि जिस कलर के फूल का पेड़ है उसमें उसी कलर के तो फूल आएंगे ना 999 केसेस 99 केसेस में आप देखिए कि नियम उसको फॉलो होता है। 1% केस में आप देखेंगे शायद कि नियम का व्यतिक्रम व्यतिक्रम होता है। नियम टूटता है। तो दोनों तरह से है। एक तो म्यूटेशन इटसेल्फ इज अ पार्ट ऑफ द लॉ। दूसरा है कि मान लीजिए कि 1% केस में नियम त्रुटता है तो भी क्या है? 99% कंसिस्टेंसी यहां पे है। वो कहां से आई? यह प्रश्न हम कर सकते हैं और इसका उत्तर
विराट मन में जगत-रूप कल्पना का उदय होने के कारण ही समस्त मानवों को एक समान भ्रम हो रहा है
जो शरद महाराज देते हैं वह उत्तर वैसे तो अपने शास्त्र में से ही लिया गया है किंतु जिस तरह से महाराज ने उसको जो शब्दों में बांधा है वो शब्द हमको आश्चर्यचकित लगते हैं। वो मैं पढ़ता हूं महाराज जी क्या लिखते हैं? क्या लिखते हैं? शोकोले एक प्रकार भ्रम होइलो की रूपे सबको एक तरह का भ्रम कैसे हुआ तहार उत्तरे शास्त्र बोलेन उसके उत्तर में शास्त्र कहते हैं एक असीम अनंत समष्टि मने जगत रूप कल्पनार उदय होइया छे एक असीम अनंत समष्टि मन में जगत रूपी कल्पना का उदय हुआ है देखिए सच स्टार्टलिंग स्टेटमेंट वैसे यह सांख्य के ऊपर पर में ही आधारित है। किंतु जिस तरह से उसका फार्मूलेशन किया है महाराज जी ने वि इज वेरी माने वेरी नोवेल एकदम नया है। नया खैर यह शरद महाराज का आईडिया नहीं है। स्वामी जी का आईडिया है और स्वामी जी इसके बारे में क्या कहते हैं? उसके कुछ कोट्स मैंने कंपाइल किए हैं। देखेंगे। किंतु यह इवन मैंने स्वामी जी को भी पढ़ा कि स्वामी जी इस तरह से एग्जजेक्टली फॉर्मुलेट नहीं करते। वो इस आईडिया के बहुत नजदीक आ जाते हैं। किंतु यह जो स्टेटमेंट है ना शरद महाराज का इट इज रियली यूनिक कि एक असीम अनंत समष्टि मन है। उसमें जगत रूपी कल्पना का उदय हुआ है। देखिए आप सांख्य यह महत तत्व यहां पे जो महत तत्व की बात की गई है तो सांख्य हमको क्या कहता है कि सबसे पहले तो पुरुष और प्रकृति यह अनादि कारण है इस सृष्टि के पुरुष और प्रकृति का संग जब होता है तो जो प्रथम तत्व प्रकट होता है वह है महत अभी महत में से प्रकट होता है अहम अहंकार और यह अहंकार उसका जो सात्विक िक ब्रांच है सात्विक और रजस यह गुण को मिलाकर के यह कुछ बनते हैं एलिमेंट्स उसमें से एक है मन दूसरे है पंच ज्ञानेंद्रिय और है पंचकर्मेंद्रिय और उसका जो तमस पार्ट है ये अहम का ये अहम के तमस पार्ट में से उसमें फिर रजस थोड़ा सा मिलकर के बनता है पंच तन्मात्रा तन्मात्रा और यह पंच महाभूत तो इस तरह से सृष्टि की रचना होती है। यह हम सभी लोग ट्रेडिशनली पढ़ते आए हैं। किंतु यहां पे देखिए कि ऐसा हमको लगता है कि एक एलिमेंट है। एक एलिमेंट में से दूसरा एलिमेंट बना। दूसरे एलिमेंट में से तीसरा एलिमेंट बना। यह जैसे कि हम घर में खाना पका रहे हैं। यह दूध है तो दूध में थोड़ा सा हमने वह डाल दिया। दही कल का तो आज कहीं जाकर के दूध का दही में रूपांतरण हो गया। अभी इसी दही को मैं किसी सब्जी में डालता हूं। तो वह दही बनाई यह जो दही भात यहां पे बनता है। यह साउथ इंडिया में ये जो दही भात है यह कर्ड राइस यह बड़ा फेमस है। तो यह बीच-बीच में कर्ड राइस बनाते हैं। तो यह जो ट्रांसफॉर्मेशन मुझे स्पष्ट रूप से दिखता है कि यह दूध है। दूध का दही बनाया गया। दही में से दही भात बनाया गया। यह मुझे स्पष्ट रूप से दिखता है। तो यहां पे भी ऐसा ही कुछ है कि पुरुष और प्रकृति के मिलन से हुआ महत, महत में से हुआ अहम, अहम में से हुआ यह मन, ये कर्मेंद्रिय, ज्ञानेंद्रिय वगैरह-वगैरह। तो इस तरह से ही हमारी कल्पना जाती थी कि एक के बाद एक एलिमेंट ट्रांसफॉर्म होते रहते हैं। कॉम्बिनेशन परम्यूटेशन होगा, कुछ ना कुछ प्रोसेस होगी। वो ट्रांसफॉर्म होते जाते हैं। ऐसा ही कुछ हमारे मन में था। एटलीस्ट मेरे मन में था। किंतु जब यह सेंटेंस पढ़ते हैं तो एक कंप्लीटली डिफरेंट पर्सपेक्टिव हमको दिखता है। यहां पर महाराज कहते हैं जो महत्व है जो असीम अनंत जो समष्टि मन है उसमें यह जगत रूपी कल्पना का उदय हुआ है और हम सभी लोग इस कल्पना के पार्टिसिपेंट है और इसीलिए हम सबको एक शेयरर्ड रियलिटी दिखती है। क्या कहते हैं? तोमार आार एवं जन साधारण व्यष्टि मन ओई विराट मने अंश ओ अंगीभूत होए आमादग के ओई एकई प्रकार कल्पना अनुभव करते होते छे तुम्हारा मेरा और हम सबका जो व्यष्टि मन है वो इस विराट मन के अंश और अंगीभूत है बोलकर के हम सबको एक ही प्रकार की कल्पना अनुभव होती है। देखिए यहां पे बड़ा ही क्लेवरली वेदांत और सांख्य को महाराज जी ने मिला दिया है। वेदांत में आपको यह महत तत्व वगैरह ऐसा कुछ देखने को नहीं मिलेगा। वेदांत में वैसे ईश्वर है कि ब्रह्मन और ब्रह्मन के ऊपर में अविद्या का अज्ञान या माया का आवरण होने से उसका जो सत्वगुण है उसमें से ईश्वर प्रकट होते हैं और फिर उसका जो तमस रजस है उसमें से यह व्यष्टि रूपी यह हम व्यक्ति का जीवात्मन प्रकट हुआ हमारे भीतर में जो है चेतन तत्व उसको कहेंगे जीवात्मा और यह जो समष्टि चेतन तत्व है उसको कहेंगे ईश्वर पर किंतु मैं जब यह वेदांत स्टडी कर रहा था वहां पर मैंने इस तरह से मुझे याद नहीं आ रहा है कि मैंने ऐसा पढ़ा हो कि यह जो ईश्वर के ही मन में यह कल्पना होती है और यह कल्पना से जगत की सृष्टि होती है। हो सकता है कि मेरा जो वेदांत का जो स्टडी है वह थोड़ा सा कम हो बोल करके मुझे नहीं पता किंतु जो भी है यहां पर पहली बार स्वामी जी के भीतर में भी ये पहली बार इस तरह का मुझे एक योग सांख्य और वेदांत का एक इतना सुंदर मिश्रण देखने को मिला है। असीम अनंत मन है। समष्टि मन महत तत्व सांख्य की लैंग्वेज में ईश्वर तत्व वेदांत की लैंग्वेज में उसके मन में यह जगत रूपी कल्पना का उदय हुआ है और हम यह व्यष्टि तत्व जितने भी हैं जीवात्मन हम जितने भी हैं इंडिविजुअल हम सभी लोग इसी कल्पना के पार्ट हैं। बोलकर के हम सबको एक ही तरह का अनुभव होता है। अभी देखिए ये सच अ रेडिकल आईडिया हमारा ओरिजिनल क्वेश्चन क्या था? ओरिजिनल क्वेश्चन था कि आप जैसे कहते हैं कि जागृत अवस्था में स्वप्न अवस्था भ्रम जैसी दिखती है। तो हम लोग यह बात तो स्पष्ट रूप से स्वीकार करेंगे कि जागृत अवस्था में एक संपूर्ण रूप से कंसिस्टेंसी है। मेरा पास्ट, मेरा प्रेजेंट, मेरा फ्यूचर मुझे स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। कर्म का सिद्धांत जो कि अपने ही शास्त्र कहते हैं कि आप आज आज आपने जो किया है जो कर्म उसका फल आपको कल भुगतना पड़ेगा। जो यस्टरडे आपने जो कर्म किए हैं, वह आज उसका फल भुगतना पड़ता है। यानी कि यह कर्म का सिद्धांत हमको जागृत अवस्था में स्पष्ट रूप से दिखता है। यह जो साइंस है, टेक्नोलॉजी है वह सब काम करते हुए हमको स्पष्ट रूप से दिखते हैं। किंतु स्वप्न में तो ऐसा नहीं है। मान लीजिए कल मैंने स्वप्न में किसी का मर्डर किया और आज मैं स्वप्न में राजा बनके बैठा हूं। तो वहां पर तो कर्म का सिद्धांत काम नहीं करता कि मैंने कल मर्डर किया तो आज मुझे जेल में होना है। नहीं कल मर्डर किया तो आज मैं राजा भी हो सकता हूं। आज मैं राजा हूं तो कल मैं भिखारी भी हो सकता हूं। कहीं पर कुछ ना ही कर्म का सिद्धांत लगता है ना ही यह मॉडर्न साइंस टेक्नोलॉजी लगता है। तो यह हमको स्पष्ट दिखाई देता है कि स्वप्न और जागृत में तो बहुत बड़ा डिफरेंस है। किंतु कि जहां तक तुरीय अवस्था का प्रश्न है तुरीय अवस्था में जागृत अवस्था भी स्वप्न के समान ही है। तो प्रश्न होगा कि स्वप्न इतने कंसिस्टेंट क्यों है भैया? ये कर्म का सिद्धांत लग रहा है हमारे ऊपर में। ये साइंस एंड टेक्नोलॉजी लग रहे हैं। यह जो जनरल सोशल डायनेमिक्स है, हिस्ट्री है, सिविलाइजेशन है, सब कुछ यहां पे अप्लाई हो रहा है। तो ये कंसिस्टेंसी कहां से आया? तो कंसिस्टेंसी आया इसलिए क्योंकि हम सभी लोग किसी के सप्न का एक पार्ट है। व्हिच इज सो ब्यूटीफुल। सी आज 10 लोग स्वप्न देखेंगे तो 10 स्वप्न 10 तरह के होंगे। किंतु एक ही व्यक्ति स्वप्न देखता है और एक ही दिन देखता है तो वह तो उस स्वप्न में तो एटलीस्ट कहीं ना कहीं कंसिस्टेंसी होगी। तो एक ही व्यक्ति स्वप्न देख रहा है या तो एक ही एंटिटी है वह स्वप्न देख रही है। एंड दैट एंटिटी इज दिस महत्व। अनंत असीम अनंत समष्टि मन। यह जो है वह सपना देख रहा है और हम सब उस सपन में पार्टिसिपेंट है तो एक सप्न के भीतर में एक दिन देखे हुए सपना के भीतर में तो आपको कंसिस्टेंसी शायद दिखाई ही देगी बोलकर के हमको यह कंसिस्टेंसी दिखती है। मेरा जो पृथक अस्तित्व है वही नहीं है। मैं किसी के स्वप्न का ही पार्ट हूं। वो मेरा और कोई एकिस्टेंस है ही है ही नहीं। देखिए बहुत बार आज के इवन मॉडर्न साइंस में एक होलोग्राफिक यूनिवर्स बोल के एक थ्यरी है। इस थ्यरी का क्या है कि अभी मान लीजिए कि आप कंप्यूटर में एक प्रोग्राम बनाते हैं। ये प्रोग्राम को आप किसी रन करेंगे तो रन करके आपको उसका पूरा होलोग्राम आपको दिखाई देगा। जैसे कि आप एक वीआर गोगल्स पहने हैं। ठीक है? अभी वर्चुअल रियलिटी गगल्स अभी वर्चुअल रियलिटी गगल्स के भीतर में मुझे जो कुछ भी दिखता है वह कहीं ना कहीं प्रोग्राम बनके पड़ा है। बोल के अभी मैं अपने गोगल्स के भीतर में वर्चुअल रियलिटी के भीतर में मैं उसको देख पाता हूं। यह बड़ा सा पहाड़ दिखता है। मैं हाथ म एक्सटेंड करूंगा तो मैं पहाड़ के पास में जाऊंगा। म बहुत कुछ हम वर्चुअल रियलिटी में कर सकते हैं। तो किंतु वह सब कहां से आया? वो तो जो प्रोग्राम लिखा गया है कंप्यूटर उसमें उसका यह प्रोजेक्शन है यह होलोग्राम शायद आपने देखा होगा एक 3D मशीन आता है होलोग्राम क्रिएट करने का जैसे एक मूवी होता है ना वो टू डी होता है कि तो होलोग्राम होता है 3D होता है तो ये 2D मूवी है या 3D होलोग्राम है वो कहीं ना कहीं डिजिटल रूप में इंफॉर्मेशन पड़ी हुई है वो उसका प्रोजेक्शन मात्र है और कुछ नहीं तो यह होलोग्राम यूनिवर्स का थ्यरी क्या है कि एक बहुत बड़ा कंप्यूटर कोड कहां पे लिखा गया है। इस कंप्यूटर कोड को प्रोजेक्ट करके यह पूरा ब्रह्मांड रूपी होलोग्राम हमको दिख रहा है। यह होलोग्राम के अलावा और कुछ नहीं है। मैं स्पर्श करता हूं तो एक्चुअली मैं कंप्यूटर कोड को ही स्पर्श कर रहा हूं। यह कंप्यूटर कोड कहता है कि यह हाथ है। यह कंप्यूटर कोड कहता है यह माइक है। कंप्यूटर कोड कहता है कि माइक और हाथ टच होंगे। तो इस तरह का सेंसेशन मुझे हाथ में दिख अनुभव होगा। यह ठंडा है, यह हार्ड है। इस तरह का यह कोल्ड एंड हार्ड यह माइक है। उसका ही मैं आंखों से देखूंगा तो इसका कलर मुझे पार्टिकुलर टाइप का दिखाई देगा। यह सब कुछ कंप्यूटर प्रोग्राम है। इसके अलावा और कुछ नहीं है। कंप्यूटर प्रोग्राम में जो कोडिंग किया गया है, वही हमको दिखाई देता है। वीडियो गेम आज हम वीडियो गेम खेलते हैं। मैं गाड़ी में बैठा हुआ हूं। गाड़ी में बैठकर के इधरउधर दौड़ रहा हूं। किंतु यह गाड़ी, यह रास्ता, यह जगत, दूसरी गाड़ियां यह सब कंप्यूटर प्रोग्राम ही है। इसके अलावा और कुछ नहीं। और फिर यह लोग कहते हैं कि हम सभी लोग यह कंप्यूटर प्रोग्राम के भीतर में छोटे-छोटे प्रोग्राम ही है। मान लीजिए कोई सुपर स्मार्ट एलियन है। उसने अपने कंप्यूटर में यह पूरा प्रोग्राम किया है और हम प्रोग्राम ही रन हो रहे हैं और कुछ नहीं। तो देखिए अभी ये सब तो स्पेककुलेशन है। साइंटिस्ट लोगों को भी इस तरह के सपनों और फेंटसी देखना अच्छा लगता है। तो ये होलोग्राम यूनिवर्स की एक कल्पना है। तो यहां पे भी देखिए कि जिस तरह से होलोग्राम यूनिवर्स में हम लोग सिर्फ एक छोटे-छोटे कोड मात्र है। छोटे-छोटे प्रोग्राम मात्र है और जिस तरह से यह सुपर प्रोग्राम जो है मेन मेन फ्रेम जिसको कहते हैं। यह मेन फ्रेम जिस तरह से वह हमको मैनपुलेट करेगा उस तरह से हम लोगों को बिहेव करना है। आजकल की लैंग्वेज में कहे तो एआई और एजेंट यह पूरा एक एआई है। उसके भीतर में हम सब लोग एजेंटिक प्रोग्राम है। जिस तरह से यह मदर एआई जिस तरह से हमको डायरेक्ट करेगा उसी तरह से यह जो छोटे-छोटे एजेंट है वे लोग एक्शन लेंगे, कार्य करेंगे। तो सिमिलरली यहां पर एक विराट समष्टि मन है महत तत्व उसके भीतर में हम सभी लोग स्वप्न के रूप में प्रकट हुए हैं। इसके अलावा हमारा इंडिविजुअल एग्जिस्टेंस है ही नहीं है। आज मैं अपने के ऊपर में इतना एक मुझे प्राइड है कि हां मैं एक हूं। मेरा एक इंडिविजुअल एग्जिस्टेंस है। मेरा हम लोग क्या है पता है कि अपने फैमिली के ऊपर में हमारा बड़ा प्राइड रहता है। मैं इस कास्ट का हूं। यह कास्ट का मुझे एक बड़ा एक अहंकार होता है। मैं इस देश का हूं। मेरे देश के ऊपर में एक बड़ा मुझे गर्व रहता है। जिसको [गला साफ़ करने की आवाज़] हम पेट्रियोटिज्म कहते हैं। यह वगैरह-वगैरह। तो यह मेरा देश, यह मेरी कास्ट, यह मेरा फैमिली, मैं स्वयं हम सभी लोग यह विराट समष्टि मन में जो कल्पना प्रकट होती है, इसके अलावा और कुछ नहीं है। सी हाउ ब्यूटीफुली वेदांत एंड योग आर कंबाइंड। इसके बाद में महाराज के जो दो पैसेज है वह पढ़कर के फिर हम स्वामी जी इसके बारे में क्या कहते हैं वह देखेंगे क्योंकि अल्टीमेटली यह शरद महाराज का खुद का आईडिया नहीं है स्वामी जी का आईडिया है किंतु शरद महाराज जिस तरह से इसको फॉर्मुलेट किए हैं ना व्हिच इज रियली यूनिक मैं स्वामी जी को कल पढ़ रहा था देख रहा था ज्ञान योग में स्वामी जी किस तरह से इसको एक्सप्लेन करते हैं। किंतु इवन स्वामी जी की एक्सप्लेनेशन की मेथड है। उसका एक यूनिकनेस है। और शरद महाराज ने यह जो एक लिखा है, असीम अनंत समष्टि मन में जगत रूपी कल्पना का उदय हुआ है। दिस इज ट्रूली अ यूनिक स्टेटमेंट। माने शरद महाराज को हम बेसिकली फिलॉसोफर के रूप में नहीं पहचानते। जनरली स्वामी जी ने जो कहा है, ठाकुर ने जो कहा है, मां ने जो कहा है, उसी को उन्होंने लिपिबद्ध किया है। किंतु मुझे ऐसा लग रहा है कि यह जो स्टेटमेंट है, इट इज यूनिक टू शरद महाराज। वो हम स्वामी जी के कोटेशन पढ़ेंगे तब हम कंपेयर करके देखेंगे कि स्वामी जी ऑलमोस्ट यही बात करते हैं। किंतु एग्जजेक्टली यह करते हैं कि नहीं वि आई एम अ बिट डाउटफुल। तो यह पैसेज पूरा एक बार पढ़ लेते हैं। ए
विराट मन में जगतरूप कल्पना का उदय तो होता है, परन्तु वह हमारी तरह अज्ञान के बंधन में नहीं बँधता
जनमरा प्रत्येक पशु टाके पशु भिन्न अन्न किशु बोलिया इच्छा मत देखते बा कल्पना करते पारी ना इसीलिए क्यों क्योंकि एक ही विराट समष्टि मन में हम कल्पना के रूप में प्रकट हुए हैं। स्वप्न के रूप में प्रकट हुए हैं। बोल के हम सभी लोग एक ही स्वप्न का पार्ट है। बोल के हम यदि मुझे यह गाय दिखती है तो आपको भी गाय ही दिखेगी। यदि मुझे यह ग्रेविटी का नियम लगता है तो आपको भी वही ग्रेविटी का नियम लगेगा। इसके अलावा और कुछ अलग से होगा नहीं। ओ जन या बार यथार्थ ज्ञान लाभ कोरिया आमादे मध्य एक जन सर्व प्रकार भ्रमर होस्त हो ते मुक्ति लाभ कर ले ओ अपर शकले जेमन भ्रमे पिया आ से रूपई थाके इसीलिए यथार्थ ज्ञान लाभ करके हम में से यदि एक व्यक्ति सब तरह के भ्रम के हाथों से मुक्ति लाभ कर लेता है तो भी बाकी सब लोग जिस तरह से भ्रम में पड़े हैं उसी भ्रम में ही पड़े रहेंगे। यह देख लीजिए। यह भी एक बहुत बड़ा पॉइंट है। यदि भ्रम हमारे ऊपर में है। यदि मैं स्वप्न से जग जाता हूं तो फिर मेरा भ्रम रूपी जगत टूट जाता है। तो वैसे ही यदि एक ही सत्ता है। एक ही सत्ता यदि नींद से जग जाएगी तो क्या सभी लोग भ्रम में से नहीं मुक्त हो जाएंगे? भ्रम में से मुक्त होने का क्या अर्थ करते हैं? जागृत अवस्था में जाना। वही तो माने निद्रा स्वप्न अवस्था में से जागृत अवस्था में जाना यहां पे कहेंगे जागृत अवस्था में से तुर अवस्था में जाना यदि एक व्यक्ति भी चला जाता है और एक ही व्यक्ति है उसके अलावा दूसरा तीसरा तो है नहीं तो एक व्यक्ति यदि मुक्ति प्राप्त करता है तो यह जो पूरा डायवर्सिटी है वह कोलैप्स नहीं हो जाएगा क्या सभी लोगों को एक साथ में मुक्ति नहीं मिल जाएगी क्या तो उसका उत्तर यह है कि एक्चुअली हमारी इंडिविजुअलिटी जो हम जिसको जागृत अवस्था में देखते हैं वो इंडिविजुअलिटी अलग है। तुरीय अवस्था में जिसको इंडिविजुअलिटी कहते हैं वो अलग है। जागृत अवस्था में जो हमारी इंडिविजुअलिटी है वो सिर्फ स्वप्न का ही एक पार्ट है। यह जगत रूपी कल्पना का ही एक पार्ट है। वही इंडिविजुअलिटी ही वही मुक्त होगी। बाकी जो एलिमेंट्स है उस स्वप्न के वो वैसे के वैसे ही रहेंगे। वि इज अ वेरी स्टार्टलिंग स्टेटमेंट आर एक कथा और एक बात है विराट मने जगत रूप कल्पनार उदय होले ओ तनी आमादिग मतो अज्ञान बंधने जड़ीभूत होइया पड़े ना तो और एक बड़ा ही इंपॉर्टेंट पॉइंट है कि विराट मन में जगत रूपी कल्पना का उदय हुआ है बोलकर के क्या यह विराट मन स्वयं क्या अपने भ्रम में पतित हुआ है क्या तो नहीं क्यों कारण सर्वदर्शी तीनी अज्ञान प्रसुतो जगत कल्पनार भीतरे ओ बाहिरे अध्वय ब्रह्म वस्तु के ओतप्रोत भावे विद्यमान देखी ते पयाता के कारण कि सर्वदर्शी जो है ईश्वर या तो महत वो अज्ञान प्रसूत अज्ञान से प्रकट हुई जगत कल्पना के भीतर में और बाहिर में ब्रह्म वस्तु को ओतप्रोत भाव से विद्यमान देख सकता है। अर्थात मैं जब स्वप्न देखता हूं तो मुझे यह ज्ञान नहीं होता कि मैं स्वप्न देख रहा हूं। शायद कभी-कभी हो जाएगा कि अरे यह तो बहुत ज्यादा विचित्र चीजें लग रही है। क्या यह सही है कि स्वप्न शायद थोड़ा सा एक म एक डाउट हमारे मन में होगा। किंतु स्वप्न अवस्था में ऑलमोस्ट हम लोग स्वप्न के साथ आइडेंटिफाई कर सकते हैं। कर देते हैं। किंतु जो विराट है यह महत है या ईश्वर है वह यदि स्वप्न भी देखता है किंतु उसको यह स्पष्ट ज्ञान रहता है कि यह स्वप्न के अलावा और कुछ नहीं है। यह मेरे मन की कल्पना के अलावा और कुछ नहीं है। जा सहीसही में देखें तो ब्रह्मन ही है। यानी कि उसकी जो सेल्फ अवेयरनेस है वो स्वप्न अवस्था में भी बनी रहती है। जबकि हमारी सेल्फ अवेयरनेस हम अपनी स्वप्न अवस्था में खो बैठते हैं। उहा करी ते पारिना बोलियाई आमादे कथा स्वतंत्र हो या पड़े हम लोग स्वप्न अवस्था में भी सेल्फ अवेयर नहीं रहते हैं। बोलकर के ही हम में और ईश्वर में इतना बड़ा डिफरेंस है। ठाकुर जी मन बोली ते ठाकुर जैसे कहते शापेर मुखे बी रोए छे शाप ओई मुख दिए नितो आहार आदि कोर छे शापेर ताते किु हो ना सांप के मुंह में विष है सांप उसी मुंह से सब कुछ खाता भी है किंतु सांप खुद अपने विष से मरता नहीं है किंतु सांप जाके कामड़ा है वही विषय ततार तत खणात मृत्यु किंतु सांप जिसको काटेगा जिसको दसेगा उसका उसका विष के माध्यम से, जहर के माध्यम से, पोइजन से इमीडिएटली मृत्यु हो जाएगा। देखिए कि अगेन सेम थिंग के हम लोग सेल्फ अवेयर नहीं है। स्वप्न अवस्था में सुशुप्ति अवस्था में भी हम लोग सेल्फ अवेयर नहीं है। सिर्फ जागृत अवस्था में ही हमारी अवेयरनेस बनी रहती है। जबकि यह महत तत्व है। वो उसको सुशुप्ति जागृत ऐसा अवस्था भेद नहीं है। जो कुछ भी है एक ही अवस्था है। यदि कल्पना भी करता है तो उसकी सेल्फ अवेयरनेस जो है वह बनी रहती है। तो
स्वामी विवेकानन्द विराट मन में जगतरूपी कल्पना के बारे में क्या कहते है?
यह हो गया पूरा शरद महाराज का विवरण। इसके ऊपर में अभी स्वामी जी क्या कहते हैं? देखिए स्वामी जी का जो कांसेप्ट है अगेन मैंने जब पहली बार पढ़ा था मुझे बड़ा ही रेडिकल लगा कि स्वामी जी इस तरह की जो बात कर रहे हैं उसमें मेरा शास्त्र पढ़ने का जो लिमिटेड एक्सपीरियंस है बहुत डिटेल में नहीं पढ़े किंतु जो मेरा लिमिटेड एक्सपीरियंस ट्रेनिंग सेंटर में भी पढ़ा और उसके बाद में भी जो कुछ पढ़ा उसमें इस तरह का तो मुझे कुछ नहीं दिखाई देता है। तो फिर मैं जैसे-जैसे स्टडी करता गया, वैसे-वैसे मुझे समझ में आया कि स्वामी जी एक्चुअली बहुत सारे कांसेप्ट्स को इकट्ठा करके उसको थोड़ा सा सिंपलीफाई कर देते हैं। और दूसरा कि यह वेदांत और सांख्य बेसिकली भारत में आप देखेंगे कि सृष्टि की उत्पत्ति का यह जो कांसेप्ट है, पहले तो सांख्य में आया है। उसके बाद में वेदांत ने उसको ले लिया है। वैसे किंतु वेदांत ने उसके ऊपर में अपना एक इंटरप्रिटेशन सेपरेटली बिठाया है। स्वामी जी इसके ऊपर में एक अपने से एक इंटरप्रिटेशन बैठाते हैं। स्वामी जी यह जो वेदांत की सृष्टि की कल्पना जो है कि इस तरह से सृष्टि प्रारंभ हुई है। उसका बेसिक एलिमेंट तो ले लेते हैं किंतु उसको एग्जैक्टली फॉलो नहीं करते। यह जो पंजीकरण की प्रोसेस है वेदांत में उसको स्वामी जी दो चीज है या तो उनको ऐसा लगता है कि यह सब जितने भी प्रवचन है विदेश में दिए गए हैं बोलकर के यह पंजीकरण रूपी कॉम्प्लिकेटेड प्रोसेस इनको क्या समझानी इनको थोड़ा सा सिंपलीफाई करके समझाते हैं और दूसरा कि यह मॉडर्न साइंस जो है उसके खुद के जो कुछ-कुछ आइडियाज अभी उस समय पॉपुलर होना शुरू हो गए थे वाइडली एक्सेप्टेड होना शुरू हो गए थे तो स्वामी जी ने ऐसा कुछ किया है कि वेदांत का जो बेसिक आईडिया लेकर के मॉडर्न साइंस के साथ में उसको मिलाकर के अपना एक इंटरप्रिटेशन दिया हो। अभी जब स्वामी जी ऐसा करते हैं तो हमारे मन में सीरियस प्रश्न उठना शुरू हो जाता है कि स्वामी जी ने वेदांत की जो ट्रेडिशनल प्रोसेस है उसको फॉलो नहीं करके यह मॉडर्न साइंस के साथ में मिलाकर के जो कुछ भी कहा है वह क्या इसीलिए कहा है कि यह जो आज के जो मॉडर्न यूरोपियन और अमेरिकन लोग हैं वह उसको इजीली एक्सेप्ट कर ले इसके लिए कहा है ना कि सही-सही में ऐसा हुआ है। देखिए ये प्रश्न बड़ा इंपॉर्टेंट इसलिए है कि एक यदि हम ऐसा कहेंगे कि हां आज के मॉडर्न मनुष्य जो है उसको सहज रूप से समझ में आ जाए इसके लिए स्वामी जी ने मॉडर्न साइंस के साथ में मिलाकर यह सब कहा तो प्रश्न होगा उसका कंक्लूजन होगा कि स्वामी जी झूठ बोल रहे हैं। अह कि वेदांत की जो प्रोसेस है उसको हटा करके यदि वेदांत की प्रोसेस ही सही है। उसको मॉडर्न साइंस के साथ में कोई लेना देना नहीं। उसको आप रेफर सिर्फ इसीलिए करते हैं क्योंकि लोग इसको इजीली एक्सेप्ट करें तो तो आप झूठ बोल रहे हैं। आप असत्य बोल रहे हैं। आप मिथ्या कथा कह रहे हैं। तो स्वामी जी के ऊपर में इस तरह का आक्षेप लगाना तो ठीक नहीं है। स्वामी जी कभी भी लोग मेरी बात को स्वीकार करें बोलकर के झूठ बोले ऐसा स्वामी जी कभी नहीं करेंगे। स्वामी जी अब जैसे ठाकुर है ठाकुर क्या कह करते हैं कि वेदांत के जो सब गहन सत्य है उसको उपमा देकर के समझाते हैं तो अभी ऐसा नहीं है कि उपमा देने से उसको कोई आप अब जैसे वो वैराग्य का कांसेप्ट तो ठाकुर कहते हैं कि एक काम वाली बाई है जो कि शहर में रहती है जिसके घर में काम करती है उसके लड़के को अपने बच्चे की तरह बड़ा करती है किंतु उसका मन गांव में अपने घर में पड़ा है जहां पे उसका खुद का लड़का रहता है। तो उसको स्पष्ट रूप से पता है कि यह जो मेरे मालिक का लड़का है उसको चाहे मैं जितना ही मेरा राम मेरा बेटा मेरा ऐसा करके कहूं किंतु जिस दिन मेरी नौकरी चली जाएगी उस दिन इस घर को छोड़कर के इस लड़के को छोड़कर मुझे चले जाना है। तो यह स्पष्ट वैराग्य किस तरह से हमको अपने जीवन में डालना है यह ठाकुर समझाते हैं। तो ठाकुर तो उपमा देते हैं। ठाकुर यह नहीं कहते कि यह जो एंशिएंट साइंस ऑफ वेदांत जो है उसको आपको मॉडर्नाइज करके आज के उसके कांसेप्ट को ही चेंज कर देना है। राइट? ये तो उपमा के रूप में हुआ। किंतु स्वामी जी जब यह सब कुछ समझाते हैं तो वह उपमा ही नहीं उपमा के रूप में भी बहुत कुछ लेते हैं। सिमाइल के रूप में भी बहुत कुछ लेते हैं। और कुछ-कुछ कहीं-कहीं पर हमको ऐसा लगेगा कि स्वामी जी एक्चुअली उसको मॉडर्न साइंस को वेदांत का एक कंपोनेंट बना करके हमारे सामने प्रेजेंट कर रहा है। या तो फिर कहेंगे कि वेदांत को मॉडर्न साइंस की दृष्टि से एक्सप्लेन कर रहा है। जो कि सिमाइल या उपमा नहीं है। इस कांसेप्ट को उठा के यहां पर बिठाया गया है। कॉपी पेस्ट किया गया है। सो वि इज हमारे मन में यह प्रश्न होगा। हम देखेंगे डिटेल में देखेंगे कि किस तरह से स्वामी जी दोनों को मिक्स एंड मैच करते हैं और कहां पर यह डिफर होता है। खास करके देखिए इसके बारे में ऑलरेडी काफी डिटेल चर्चा हमने दो प्रवचनों में कर ही दी है। एक तो था हमारा ज्ञान योग के ऊपर में जो सीरीज थी कि कॉस्मोस मैक्रोकोजम और कॉस्मोस माइक्रोकोजम उस सीरीज में हमने ऑलरेडी इस कांसेप्ट को काफी डिटेल में डिस्कस किया है। दूसरा कि हमने अह राजयोग की जो प्रवचनमाला थी हमारी, उसमें भी इसी कांसेप्ट को काफ़ी डिटेल में डिस्कस किया है। यानी कि यह कांसेप्ट हमारे लिए एस सच नया नहीं है। और मैं यहां पे इसमें इतना डिटेल में नहीं जाऊंगा। थोड़ा ऊपर में ही देख लूंगा। यदि डिटेल डिस्कशन एग्जजेक्टली पॉइंट बाय पॉइंट कि कहां पर ट्रेडिशनल वेदांत कहां पर यह मॉडर्न साइंस दोनों को मैच कर रहे हैं, मिक्स कर रहे हैं। कहां पे कहां स्टार्ट होता है, कहां क्या एंड होता है। तो वो उस प्रवचन माला में ऑलरेडी हमारे वो जो क्लासेस है उसमें ऑलरेडी काफी डिस्कस हो चुका है। मैं उसको रिपीट नहीं करूंगा। वरना तो फिर हमारा लीला प्रसंग का स्टडी रुक जाएगा। मैं यहां पर बस कुछ-कुछ पैसेज मैंने जो यहां कंपाइल किए हैं उसको मैं रीड करके पढ़ करके उसका जो बेसिक कांसेप्ट है शरद महाराज के साथ कहां मैच हो रहा है? बेसिकली हमको शरद महाराज को भी फॉलो करना है। लीला प्रसंग को फॉलो करना है। तो लीला प्रसंग को फॉलो करते-करते कहां पे शरद महाराज ने यह स्वामी जी का कांसेप्ट लिया है। अनंत असीम समष्टि मन वो कांसेप्ट कहां से स्वामी जी में से लिया है? और उन्होंने अपना जो एक ट्विस्ट दिया है कि इस अनंत असीम मन में जगत रूपी कल्पना का उदय हुआ है। हाउ दिस इज यूनिक? यही हमको देखना है सिर्फ। तो अभी आज समय समाप्त हो गया है और यह डिस्कशन काफी लंबा है। तो अभी हम इसको कल से देखना शुरू करेंगे। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु
प्रश्न: महत को स्वप्न आना हमारा मूवी देखने के बराबर है. हमें पता रहता है की हम मूवी देख रहे है उसे सत्य नहीं मान लेते.
देखिए अभी यह तो महत्व के बारे में हो गया या तो कहेंगे ईश्वर कि ईश्वर जब सपना देखता है ईश्वर को अवेयरनेस हमेशा रहेगी कि यह सपना ही है किंतु हमारे साथ में भी ऐसा हो सकता है जब नेति नेति करके हम निर्विकल्प समाधि प्राप्त करके इति इति करके जब वापस आएंगे तो वैसे सप्न देख रहे हैं किंतु क्लियर अंडरस्टैंडिंग है कि यह सपना है। सो दैट फेज में यह हम महत के साथ में एक हो जाएंगे।
प्रश्न: यदि मेरा अज्ञान मिट जाए और मैं ब्रह्म में लीन हो जाऊँ, तो फिर बाकी सब लोग माया में बंधे क्यों रहेंगे?
वो यहां पर शरद महाराज ने जैसे इलेबोरेट किया ना कि जो विराट तत्व है महत तत्व है जो कि यह स्वप्न देख रहा है वह तो हमेशा देखता ही रहेगा क्योंकि क्या है कि विराट के लिए स्वप्न देखना और स्वप्न में से बाहर आना इस तरह का कोई नेसेसिटी नहीं है। यह नेसेसिटी हम लोगों के लिए है। क्यों? क्योंकि हम जब सपना देखते हैं तो हम अपना रियल आइडेंटिटी को गवा बैठते हैं। तो हम लोगों को लिए लगता है कि नहीं मेरा रियल आइडेंटिटी सब समय बना रहना चाहिए। स्वप्न में मुझे यदि मैं अपना सही स्वरूप भूल जाता हूं तो मुझे स्वप्न से बाहर निकलना चाहिए। किंतु विराट तत्व जो है जो महत तत्व जो कि स्वप्न देख रहा है उसको स्वप्न में भी अपना आइडेंटिटी इक्वली बना है। तो उसके लिए स्वप्न में से बाहर निकलने की कोई आवश्यकता नहीं। बोलकर के यह सपना विराट मन के भीतर में सतत चलता रहेगा और सपना का यदि एक एलिमेंट बाहर निकल आया तो बाकी के एलिमेंट वैसे ही पड़े रहेंगे। अब जैसे ठाकुर का वो जो उदाहरण है ना कि यह मुक्त जीव मुमुक्षु जीव बद्ध जीव वो जो एक ठाकुर उदाहरण देते हैं कि एक मछुआरा है तो जो जाल फेंकता है तो अभी कुछ-कुछ अभी मान लीजिए 30-40 मछलियां जाल में फंस गई। उसमें से एक मछली बड़ा जोर-जोर से जाल में से निकलने का प्रयास करती है। तो वह प्रयास के फल पर सफल होकर जाल में से निकल गई। तो वो हो गया मुक्त जीव। अब दूसरा है दूसरी मछली प्रयास तो करती है किंतु निकल नहीं पाती। तो हो गई मुमुक्षु जीव। और तीसरी मछली है कि वो अपना मुंह जो है वह रेती में डालकर के छुप के बैठी रहेगी। सोचेगी मैं बच जाऊंगी। तो वह हो गया बद्ध जीव। ऑफ कोर्स चतुर्थ है कि नित्य मुक्त कैटेगरी। उसको पता ही है कि इस एरिया में मछुआरा जाल फेंकता है तो वहां पर जाना ही नहीं है। तो ऐसे ही ये मछुआरे की जाल तो हमेशा वहीं पर रहेगी। बस कुछ मछलियां निकलती है कुछ नहीं निकलती।
प्रश्न: अद्वैत तो कहता है कि हम सब एक ही हैं, हमारी अलग-अलग व्यक्तित्व की भावना ही माया है। तो फिर जब एक को मुक्ति मिल जाती है, तब बाकी सब लोग माया में कैसे बंधे रह जाते हैं?
देखिए यह जो इवन महत जो है ना महत या ईश्वर वह भी तो माया के जगत में ही है। ब्राह्मण जो है ब्रह्मण के ऊपर में अविद्या का आवरण होने से यह ईश्वर या तो फिर यह महत प्रकट होता है। यानी ऑलरेडी हम माया के राज्य में आ चुके हैं। माया के राज्य में है बोलकर के ही तो महत्व को सपना आता है। अदरवाइज यदि ब्राह्मण ही है तो सब कुछ एक ही है। ब्राह्मण कभी सपना देखेगा ही नहीं। राइट? सो ऑलरेडी हम माया के राज्य में आ चुके हैं। ऑलरेडी वैविध्य के प्लुरलिटी के जगत में आ चुके हैं। ना किंतु देखिए कि हमारा जो अनुभव है ना काफी हद तक ये विराट वाली जो कल्पना है ना महतत्व की स्वप्न वाली कल्पना उसके साथ में मैच हो जाएगा। अब जैसे कि हम लोग हमारा स्वप्न है और जागृत अवस्था है। उन दोनों में डिफरेंस क्या है? जागृत अवस्था में कंसिस्टेंसी है जो कि स्वप्न में नहीं है। जागृत अवस्था में रियलिटी जैसा है कि जो लोग भी स्वप्न देखते हैं जागृत अवस्था में है सब लोगों को एक ही तरह का दिखता है जबकि स्वप्न अवस्था में ऐसा नहीं है। तो सिमिलरली आप इसको अभी ये तुरय अवस्था और जागृत अवस्था को ये कीजिए तो तुरीय अवस्था में जो कंसिस्टेंसी है 100% कंसिस्टेंसी उतना कंसिस्टेंसी इवन आपको स्वप्न जागृत अवस्था में नहीं दिखेगा। 1% इनकंसिस्टेंसी दिख ही जाएगी। यह जो वैराग्य कैसे होता है? हम सभी लोग ये जगत में इंद्रियों के आनंद में पड़े हुए हैं। एकाएक कहीं पर कुछ होता है और फटाक करके हमको लगता है अरे यह मैं क्या कर रहा हूं? अरे मैं ये क्या कर रहा हूं? एक फटाक करके इन अ फ्लेश ये वैराग्य का उदय होता है। अभी ज्यादातर लोगों के साथ में क्या होता है कि फिर वह ड्रिंकिंग एंड वो सब स्टार्ट कर देंगे जिससे कि यह वैराग्य का जो स्पार्क है वह चला जाए। किंतु फिर उसे 1% लोग होते हैं। उनको लगता है कि नहीं यह जगत और जगत के साथ में जो कुछ भी है उसको परे कुछ है जो कि मुझे प्राप्त करना है। मैं मोस्ट फेमस उदाहरण भगवान बुद्ध का कहां राजकुमार के रूप में रहते थे। अभी लाखों लाखों राजकुमार विश्व के इतिहास में हुए हैं जो कि अपने पैसों पैसों में अपने वो जो वैभव है सुख उपभोग है उसमें ही डूबे रहे हैं। किंतु भगवान बुद्ध को एक जो फ्लैश हुआ कि वृद्ध व्यक्ति को देखा बोला कि अरे मैं भी वृद्ध हो जाऊंगा। बीमार व्यक्ति को देखा तो यह जो सुंदर युवान शरीर है, वह भी इस तरह से यह हो जाएगा, बीमार हो जाएगा। मृत देह को देखा तो यह मैं भी आज जीवंत हूं कल मर जाऊंगा और फिर वो जो शमान को देखा क्या शांति है उसके चेहरे पे तो एक फट करके इन अ फ्लश एक वैराग्य का उदय हुआ तो उन्होंने उसको फॉलो करके ही अल्टीमेटली अटेंड निर्वाण सो कि ये मुक्त जीव ये ठाकुर जो उदाहरण देते हैं सुखदेव जैसे हैं कि नित्य मुक्त है क्योंकि माया में फंसे ही नहीं है किंतु जो जाल में फंसे हैं उसमें से वैराग्य का उदय जिनको होता है उसमें उसमें से कोई-कोई जाल तोड़ के निकल जाता है। व्हिच इज दिस आवर भगवान बुद्ध। सो एक्चुअली क्या है कि आपको दोनों में सिमिलरिटी दिखाई देगी। ओनली थिंग इज कि स्वप्न अवस्था में 100% इनकंसिस्टेंसी है। तो जागृत अवस्था में 1% ही इनकंसिस्टेंसी है। किंतु वह 1% जब स्ट्राइक होगी तब फटाक करके वैराग्य का उदय होगा।
प्रश्न: स्वप्नावस्था में असंगति तो है ही, पर जाग्रत अवस्था में उससे भी अधिक असंगति है।
किंतु आप जो कह रहे हैं ना वह इनकंसिस्टेंसी नहीं है। आप जो कह रहे हो उसको केओस कहेंगे। इनकंसिस्टेंसी क्या है जो कि हमको वैराग्य की ओर ले जाए। केओस जो है हमको और भी ज्यादा मटेरियलिस्टिक बनाता है। यदि किसी के साथ झगड़ा होता है तो मेरा रिवेंज लेने का ही मेरे मन में सबसे पहले आएगा। इनकंसिस्टेंसी किसको कहेंगे? यह जो भगवान बुद्ध का एक्सपीरियंस ये स्वामी जी का एक्सपीरियंस। पिताजी का मृत्यु जब तक नहीं हुआ था, ठाकुर की मजाक उड़ाया करते थे। जिस क्षण पिताजी का मृत्यु हुआ मां काली के पास में गए रोटी कपड़ा मकान मांगने के लिए और मन में मुंह में बार-बार यह ज्ञान भक्ति वैराग्य आ रहा है दैट वास इनकंसिस्टेंसी कि म जिस इनकंसिस्टेंसी ने स्वामी जी का लाइफ परिवर्तन कर दिया राइट तो इनकंसिस्टेंसी का डेफिनेशन हम क्या करेंगे वेयर इज द ब्रेक इन दिस सरफेस लेवल कि जो कि हमको वैराग्य की ओर ले जाए बाकी का तो फिर केओसी है माने वैसे ही मूड है तमस में डूबे हैं ऊपर में झग झगड़ा होगा, युद्ध होगा तो और ज्यादा डूबेंगे। अभी ये पाकिस्तान के साथ में युद्ध हुआ तो उसका परिणाम यह नहीं है कि हम लोग सब वैराग्य की ओर चले जाए। हम और भी बड़े फाइटर प्लेन बनाएंगे और भी बड़ी आर्मामेंट खड़ा करेंगे। तो वो झगड़ा हमको और ज्यादा झगड़े की ओर ले जाएगा। वो तो हमको मुक्ति की ओर नहीं ले जाने वाला है।
प्रश्न: मुक्त जीव तो मुक्त हो चुका है, बद्ध जीव संसार का आनंद ले रहे हैं — और पीड़ा में हैं केवल हम मुमुक्षु। इसलिए हमें मुमुक्षुओं का एक कम्युनिटी बनाना चाहिए, ताकि हम एक-दूसरे का सहारा बन सकें।
एक्चुअली देखिए। अमेरिका में ये जो योगा क्लास इतने फैल रहे हैं ना तो मैं एक आर्टिकल पढ़ रहा था अच्छे मैगजीन में अ कि व्हाट इज बिहाइंड अ पॉपुलैरिटी ऑफ योगा क्लास माने आपको क्या ना कि ऐसा शौक हो गया है सुबह अर्ली मॉर्निंग उठ के है ना कि अपने बिजी शेड्यूल में से टाइम निकाल करके आपको वहां जाके यह फिजिकल कंटोरशन है वगैरह करना है डाइट कंट्रोल करना है वगैरह वगैरह एक रूम में सभी लोग एक साथ में योगा कर रहे हैं। आपको कौन सा ऐसा एक नीड और नेसेसिटी आ गया है कि इतने सारे लोग योगा में जाते हैं। तो उसका फिर काफी योगा प्रैक्टिशनर का इंटरव्यू लिया तो लोग क्या कहते हैं पता है वी कम मेनली फॉर कम्युनिटी यहां पे जो यह योगा स्टूडियो में जो एक कम्युनिटी खड़ी होती है ना व्हिच इज यूनिक हमारा जो हमारा जो ये जो जॉब का जो एक कम्युनिटी है मेरा फैमिली है मेरा जो जहां पे रहता हूं वो जो मेरी कम्युनिटी है ना वैसे टॉक्सिक कम्युनिटी कि लोग जेलस है एक दूसरे के पीछे लगते हैं सब समय मुझे अवेयर होकर तलवार निकाल कर के खड़ा रहना पड़ता है अपने को सेल्फ डिफेंड करने के के लिए यहां पे ना आई कैन रिलैक्स बिकॉज़ कि मेरी जो गलतियां है, मेरी शॉर्टकमिंग है, पीपल आर नॉट गोइंग टू जज इट नेगेटिवली। यह जजमेंट यहां पे सब जगह पे मुझे लोग जज करते रहते हैं। ये योगा कम्युनिटी में कोई मुझे जज नहीं करता है। दैट इज व्हाई आई फील सो रिलैक्स एंड दैट इज़ व्हाई आई कम हियर रेगुलरली। सो दिस इज़ [हंसी] कि कोई भी हम सभी को ऐसी सेफ स्पेस चाहिए कि वहां पे कोई हमको जज ना करे। हमारी शॉर्ट कमिंग है तो वी कैन लिव वि आवर शॉर्ट कमिंग। राइट? ऐसा नहीं है कि हम लोग मैं परफेक्ट हूं। कोई भी परफेक्ट नहीं है इस जगत में। किंतु किसी किसी का ईगो बहुत बड़ा होता है जो कि वो अपनी इंपपरफेक्शन को छुपा के रह सकता है। किंतु बहुत सारे लोग होते हैं ना कि उनका ईगो इतना स्ट्रांग नहीं होता कि वह उसको सब समय डिफेंड कर पाए। और फिर आध्यात्मिक जगत में तो आपको ईगो से मुक्त होना है। दैट मींस यू बिकम वनरेबल। तो फिर अपनी शॉर्ट कमिंग्स को मैं साथ में जी पाऊं। एक सेल्फ एक सेफ जगह मिले। वी ऑल सर्च फॉर इट। दैट इज व्हाई कि आश्रम की कम्युनिटी आप देखेंगे कि जो आते हैं उन लोगों का आपस में ज्यादा मिल होता है रेदर देन कि रिलेटिव्स के साथ में।
प्रश्न: इसीलिए ठाकुर ने यह कम्युनिटी स्थापित किया था — ताकि मुमुक्षुजन एक-दूसरे के सहारे, संगति और साधना से मुक्ति के मार्ग पर आगे बढ़ सकें।
ना इसीलिए तो ठाकुर मां को लेकर आए ना। कम्युनिटी का कांसेप्ट सिर्फ ये लड़कों को इकट्ठा करना नहीं था। कम्युनिटी के पीछे में पूरी शक्ति लगानी मां का तो जीवन ही तो कम्युनिटी लाइफ के लिए है ना। हमारा जो वो फ्रेमवर्क है ठाकुर फॉर इंडिविजुअल स्पिरिचुअलिटी, मदर फॉर कम्युनिटी, स्वामी जी फॉर सिविलाइजेशनल स्टडी। आई मीन कम्युनिटी इज़ वन ऑफ द थ्री मोस्टेंट फैक्टर इन द वर्ल्ड फॉर अस। वो जो चंद्र की कहानी हमने देखी थी ना वो उद्बोधन का वर्कर। तो चंद्र की कहानी में हमने देखा था कि उसके बड़े भाई उसके ऊपर में बहुत नाराज है। क्योंकि उसकी दुकान है चंद्र की। वह चल नहीं रही है ठीक से और बड़े भाई के घर रह रहा है। उसके पैसे उड़ा रहा है तो बोलता है तुम मेरे घर में से निकलो वरना तो तुम नौकरी करना शुरू कर दो। ऐसा कितने दिन मेरे पैसों से रहोगे? ऐसा बोल के उसको इतना बुरी तरह डांटते हैं। मारते भी है उसको तब वो कहीं वो घर से निकल के दौड़ा दौड़ा मारामारा फिरता है। यदि मुझे कहीं पर नौकरी मिल जाए जब जब तक मुझे नौकरी नहीं मिलेगी मैं घर नहीं जाऊंगा। और यदि नौकरी नहीं मिलेगी ना तो मैं चलता ही जाऊंगा। चलता ही जाऊंगा। भले कहां पे भी जाऊं घर नहीं वापस जाऊंगा। ऐसा ठीक करके वो गया। अभी उसको पता है कि वहां पे यह बलराम भवन है। बलराम भवन में इस तरह से साधु रहते हैं। शायद वहां पे मुझे नौकरी मिलेगी। तो बलराम भवन आता है। तो बलराम भवन में एक अभी एक्चुअली वो तो मोनेस्ट्री उस समय नहीं था। तो बलराम बाबू का घर ही था और वहां दरवाजे पे एक बड़ा पहलवान जैसा एक वो चौकीदार खड़ा था। तो उसने भगा दिया कि जाओ जाओ भागो यहां से। यहां पे कुछ नहीं मिलेगा। तो फिर वो उद्बोधन आया। तो उद्बोधन में बाहर खड़ा अभी वह डर के मारे वो सोच रहा है कि मैं भीतर में जाऊंगा दूसरा पहलवान मिल जाएगा मारेगा पता नहीं क्या होगा तो एक डिवोटी भीतर में जा रहा है वो वो देख रहा है कि ये आदमी यहां पे काफी समय से खड़ा है चेहरे से लग रहा है कि बेचारा बड़ा डिप्रेस है तो डिवोटी ने जाकर पूछा क्यों भाई यहां पे क्यों खड़े हो तो बोलता है मुझे नौकरी चाहिए और आपके यहां पे जो सबसे बड़ा जो है उसके पास में मुझे ले ले जाइए [हंसी] तो डिवोटी सीधा ले गया मां के पास में और देखिए डिवोटी भी बड़ा चालाक है शरण महाराज के पास नहीं ले गया। ले गया मां के पास में और बेचारा चंद्र जाकर सीधा मां के चरणों में साष्टांग प्रणाम कर देता है। कहता है मां मुझे नौकरी चाहिए। खाने पीने को कुछ नहीं है। तो मां उसको देखकर के कहती है अच्छा ठीक है बेटा तुम एक काम करो शरद को जाकर बोलो वो तुमको नौकरी दे देगा। तो अभी देखिए कि चंद्रबाबू ये चंद्रबाबू कहते हैं कि म जो उद्बोधन का जो मां का जो परिवार जो देखा म आश्चर्यचकित हो गया इस तरह का जो स्नेह प्रेम मेरे प्रति सहानुभूति मेरे जैसे कंप्लीटली निकम्मे व्यक्ति के प्रति सहानुभूति और गया है नौकरी मांगने के लिए नहीं कि भक्ति मुक्ति मांगने के लिए उनके प्रति भी इसकी इतनी सहानुभूति व्हिच इज यूनिक दशरथ महाराज के पास जाकर कहता है कि मां ने कहा है कि मैं आपके के पास सामने नौकरी के लिए अप्लाई करूं। आपको देना है तो आप दे सकते हैं। तो शरद महाराज कहता है मां ने मां को ये सजेशन देती है तो वो ऑर्डर ही है। मां का सजेशन सजेशन नहीं है। वो तो ऑर्डर ही है। मां ने सजेस्ट किया मतलब नौकरी मिल गया। ओम