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Sri Ramakrishna Lila Prasanga ·

साधक भाव : Ch. 1 साधक और साधना || श्रीरामकृष्ण लीलाप्रसंग : स्वामी सारदानन्द रचित || 16 Oct 2025

prayer

ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिणे अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः श्री रामकृष्ण देव का जीवन चरित्र स्वामी शारदानंद जी महाराज द्वारा लिपिबद्ध श्री श्री रामकृष्ण लीला प्रसंग इसका भाग दो द्वितीय खंड साधक ओ साधक भाव उसका प्रथम चैप्टर साधक और साधना इसका हम पाठ कर रहे थे। एक जो टॉपिक हमारा चल रहा है शरद महाराज कहते हैं कि

एक अनंत, असीम सामष्टि-मन में जगतरूप कल्पना उदित हुई है -- इस विचार पर सारदानन्द और विवेकानन्द का मंतव्य

एक असीम अनंत समष्टि मन में जगत रूप कल्पना का उदय हुआ है। तो अभी यह जो स्टेटमेंट है कि एक असीम अनंत समष्टि मन जिसमें कि यह जगत रूपी कल्पना का उदय होना यह वैसे तो हमको पता ही है कि किस तरह से सांख्य और वेदांत दोनों यह जगत की सृष्टि का यह जो कांसेप्ट हमको समझाते हैं उसमें वैसे तो यह आ ही जाता है। अब जैसे कि सांख्य है। सांख्य में आप देखिए कि अ एक तो है पुरुष और एक है प्रकृति, एक है चेतन तत्व, एक है जड़ तत्व। इन दोनों के संयोग से मिलन से सर्वप्रथम प्रकट होता है महत तत्व। तो यह जो महतत्व है इसी को यहां पर शारदानंद जी महाराज असीम अनंत समष्टि मन के रूप में पहचानते हैं। उसका उसको हमको कहते हैं। फिर इस महत तत्व में से प्रकट होता है अहम तत्व और अहम तत्व में से फिर उसके दो बेसिकली पार्ट हो जाते हैं। एक तो है ऑर्गेनिक दूसरा है इनऑर्गेनिक। तो यह ऑर्गेनिक पार्ट जो है जीवंत जो सब एलिमेंट्स हैं तो वह सत्व और रजस के कॉम्बिनेशन से बनते हैं। सर्वप्रथम आता है मन। उसके बाद में आता है पंच ज्ञानेंद्रिय और पंचकर्मेंद्रिय। और यहां पे जो इनऑर्गेनिक जो पार्ट है वह बनता है यह रजस और तमस के कॉम्बिनेशन से और उसमें आते हैं पंचतन मात्रा और पंच महाभूत। तो यह इस तरह से 24 तत्व है जो कि सांख्य हमको समझाता है। तो यह देखिए कि यह हो गया सांख्य का कांसेप्ट। यहां पर जो महत तत्व है महत तत्व में से तो वैसे यह मन प्रकट हुआ है। सृष्टि प्रकट हुई है। किंतु शरद महाराज की उसको जो एक्सप्लेन करने की पद्धति है वि इज रियली यूनिक कि एक महत तत्व है। असीम अनंत समष्टि मन है जिसमें कि जगत रूपी कल्पना का उदय होता है। यह जो एक्सप्लेन करने का एक जो इंसाइट है यहां पे एक विज़न नहीं होने से यह इंसाइट नहीं आएगा। क्योंकि देखिए कि सांख्य का चार्ट तो शायद हम सब ने देखा ही होगा। उसमें सीधा-सीधी ये सब लाइन रेखाएं खींच दी गई है कि यह महत तत्व है। महत में से अहम आता है। अहम में से यह मन प्रकट होता है। मनुष्य का इंडिविजुअल मन। तो यहां पर महत अहम तत्व और उसके बाद में मन तो हमको कभी-कभी ऐसा लगेगा कि जैसे यह मुर्गी है वह जिस तरह से अंडा देती है वैसे ही शायद ऐसा हो सकता है कि महत तत्व में से अहम और अहम में से मन प्रकट हुआ होगा। या तो फिर जिस तरह से दूध में से दही बनता है दूध ट्रांसफॉर्म हो जाता है और दही बनता है या तो फिर जैसे यह स्पाइडर है वो किस तरह से अपने में से यह स्पाइडर वेव निकालता है तो शायद इस तरह से निकला होगा या तो फिर जैसे कि मान लीजिए कि यह पृथ्वी में आप बीज डाल देते हैं तो बीज में से कैसे पौधा खड़ा होता है तो शायद इस तरह से यह पौधा की तरह निकला होगा यह महत तत्व में से किंतु यहां यहां जो शरद महाराज की जो पार्टिकुलर इंसाइट है कि एक अनंत असीम समष्टि मन में जगत रूपी कल्पना का उदय हुआ है। वि इज सच ए पावरफुल इंसाइट कि हमको इससे एक नया डेप्थ जानने को मिलता है। तो यह तो एक हो गया। और फिर देखिए कि हमने स्वामी जी में भी स्वामी जी के जो स्टेटमेंट्स है उसको भी स्टडी किया था। स्वामी जी के स्टेटमेंट में हमने यह देखा कि स्वामी जी हमको कहते हैं कि एक तो यह महत तत्व है। उसको स्वामी जी यूनिवर्सल या तो कॉस्मिक इंटेलिजेंस या तो कॉस्मिक माइंड इस तरह से रिकॉग्नाइज करते हैं। किंतु माने यह देखिए कि शरद महाराज की ये अनंत असीम समष्टि मन वाला जो कांसेप्ट है वैसे तो स्वामी जी ने उसको दे ही दिया है कि कॉस्मिक माइंड कॉस्मिक कॉन्शियसनेस यूनिवर्सल कॉन्शियसनेस किंतु शरद महाराज की यह जो पर्टिकुलर इनसाइट है कि यह जो बाकी जो कुछ भी है यह कॉस्मिक माइंड में कल्पना की तरह प्रकट हुआ है। इमेजिनेशन या ड्रीम जो प्रकट हुआ है। इस तरह की इंसाइट हमको इवन स्वामी जी में भी नहीं मिलती। या तो है और मुझे नजर नहीं आई होगी। नाइन वॉल्यूम्स उसमें आप यदि कुछ खोजने को बैठेंगे तो ऐसा हो सकता है कि बहुत कुछ आपको मिले और कुछ-कुछ ना भी मिले। तो एनीवे मुझे ऐसा लग रहा है आज एज ऑफ टुडे मेरा जो रीडिंग एक्सपीरियंस है कि यह जगत रूपी कल्पना का उदय होना दिस इज यूनिक टू लीला प्रसंग। ओके तो इतना तो हमने देख

नाम और रूप हों या देश और काल — इसी जगत-रूपी कल्पना के भीतर समाये हुए है

लिया। अभी देखिए कि और एक टॉपिक इसी के बाद में शरद महाराज प्रारंभ करते हैं। क्या कहते हैं? अत यहां टॉपिक का नाम है जगत रूप कल्पना देश काले बाहरे वर्तमान प्रकृति अनादि यह जगत रूपी कल्पना है वह देश और काल अर्थात कि स्पेस और टाइम के परे है और वह प्रकृति जो है वह अनादि है। क्या लिखा है इस टॉपिक में? अतः ए शास्त्र दृष्ट देखा गलो विश्व मुनेर कल्पना शंभूत जगतटा एक भाबे आमादेरो मनः कल्पितो इसी तरह से शास्त्र की दृष्टि से देखा गया कि यह विश्व के विश्व रूपी यह वैश्विक मन है उसमें यह कल्पना की तरह जगत जो प्रकट हुआ है विश्व मन में कल्पना संभूत जगत संस्कृत है पूरा कि यह विश्वूपी मन है या मन रूपी विश्व है उसमें यह कल्पना के माध्यम से जो प्रकट हुआ जगत है वह हमारे हमारे भी मनः कल्पित ही है। वह हमारे भी मन में एक कल्पना के रूप में ही है। थोड़ा सा कॉम्प्लिकेटेड सेंटेंस है। किंतु समझना कोई इतना डिफिकल्ट नहीं है। सर्वप्रथम तो महाराज ने यह कह दिया कि ये जो यूनिवर्सल कॉन्शियसनेस या तो यह यूनिवर्सल यूनिवर्सल माइंड जो है विराट या महत तत्व है वेदांत में जिसको कि ईश्वर तत्व के रूप से पहचाना गया है वो ईश्वर विराट महत या कॉस्मिक माइंड इसके भीतर में जगत रूपी कल्पना का उदय होता है। अभी देखिए कि हम खुद अभी जैसे मेरा खुद का कॉन्शियसनेस जो है वह इस जगत रूपी कॉन्शियसनेस का ही एक पार्ट है। ईश्वर के भीतर में जो कल्पना होती है उस कल्पना में से मैं प्रकट होता हूं। यानी कि मेरी भी कल्पना और यह ईश्वर की कल्पना ओतप्रोत भाव से जुड़ी हुई है। यह जो स्वामी जी का जो विज़न था कि यह व्यष्टि और समष्टि इन दोनों के बीच में एक कंटीन्यूअस रिलेशनशिप है और जो व्यष्टि में है वही समष्टि में रिफ्लेक्ट होता है। जो समष्टि में है वही व्यष्टि में रिफ्लेक्ट होता है। वही काकड़ी घाट अल्मोड़ा जाने के रास्ते में स्वामी जी का जो विज़न था उसी के बेस पे उन्होंने स्वामी जी ने बाद में यह कॉस्मोस मैक्रोकोजम और कॉस्मोस माइक्रोकोजम यह दो प्रवचन दिए थे ज्ञान योग के जिसका कि हमने उसके ऊपर में काफी चर्चा भी की है। तो यहां पर वही कांसेप्ट को शरद महाराज इस तरह से कहते हैं कि यदि यह विराट मन में कल्पना होती है जगत की तो फिर यह जो व्यष्टि मन है मनुष्य का मन मेरा मन इसके भीतर में भी यही जगत की कल्पना होती है। बस डिफरेंस क्या है कि विराट मन जो है पूरे ब्रह्मांड की कल्पना करता है। यहां पे यदि आज के मॉडर्न साइंस को ऊपर में थोड़ा विश्वास किया जाए तो मॉडर्न साइंस कहता है कि एक तो है ऑब्जरवेबल यूनिवर्स। ये ऑब्जरवेबल यूनिवर्स जो है वो समथिंग लाइक 19 बिलियन लाइट ईयर यह वास्ट है उसकी साइज और प्रकट हुआ है। यही कुछ 1415 बिलियन साल पहले। तो यह आज का मॉडर्न साइंस कहता है बिग बैंग कब हुआ था? समथिंग लाइक 14 15 बिलियन इयर्स एगो। और इसके बाद क्या होने वाला है? या तो फिर यह यूनिवर्स कोलैप्स हो जाएगा बिग क्रंच में या तो फिर इनफाइनाइटली एक्सपैंड होता जाएगा या तो फिर इन दोनों के बीच में एक बैलेंस बना के चलेगा। डिपेंड्स अपॉन कि किस तरह से यह यूनिवर्सल मास और ये यूनिवर्सल कांस्टेंट कॉस्मोलॉजिकल कांस्टेंट इन दोनों के बीच में किस तरह से बैलेंस बनता है। तो यह है आज का मॉडर्न कांसेप्ट मॉडर्न कॉस्मोलॉजी। तो यहां पर ईश्वर के मन में जो जगत की कल्पना होती है, वह यह पूरे विश्व ब्रह्मांड की कल्पना होती है। और ऑफकोर्स अपना हिंदू शास्त्र तो इससे भी परे जाता है। कहता है कि कल्प है। सृष्टि स्थिति प्रलय सृष्टि स्थिति प्रलय यह चलता ही रहेगा। चलता ही रहेगा। सतत एक के बाद एक ब्रह्मांड की उत्पत्ति होती ही जाएगी। भगवान ब्रह्मा जी जो है सृष्टि की रचना करेंगे। भगवान विष्णु जो है उसकी उसकी स्थिति या पालन करेंगे उसको परिपुष्ट करेंगे और भगवान शिव जो है उसका संहार करेंगे तो यह सृष्टि स्थिति प्रलय यह जो पूरी साइकिल है वह इस विराट मन के भीतर में चलती जाएगी। यह जो साइकिल रूपी कल्पना है वो इस विराट मन के भीतर में होती है और मेरे मन के भीतर में जो कल्पना रूपी विश्व जो प्रकट होता है वो कौन सा है तो वो यही छोटा सा विश्व है यह जो मैं यहां जिन लोगों को मैं पहचानता हूं जिन लोगों के साथ में मेरी मुलाकात होती है यह जो मेरा लिमिटेड देह है और इस लिमिटेड देह के भीतर में मेरा यह जन्म मृत्यु जरा व्याधि का जो चक्र है मेरा जो इंडिविजुअल संस्कार की जो यात्रा है कि इस जन्म में मैंने इतने संस्कार अर्जित किए पॉजिटिव नेगेटिव जो भी बैलेंस है वो नेक्स्ट जन्म में कैरी फॉरवर्ड होगा। फिर नेक्स्ट जन्म में मैंने जो कर्म किए उसके अनुसार पॉजिटिव नेगेटिव संस्कार का यह बैलेंस उसके बाद के जन्म में कैरी फॉरवर्ड होगा। और आखिर में अंतिम में एक समय ऐसा आएगा कि जो पॉजिटिव संस्कार नेगेटिव संस्कार दोनों एक दूसरे को काट देंगे और मेरी मुक्ति हो जाएगी। मैं यह जो कल्पना है यह कल्पना से मुक्त हो जाऊंगा। तो यह जो मेरी व्यष्टि कल्पना है वो है यह जन्म मृत्यु जरा व्याधि का चक्र और यह जो समष्टि कल्पना है वो यह सृष्टि स्थिति प्रलय का चक्र। यानी कि देखिए कि किस तरह से यह व्यष्टि मन और समष्टि मन एक दूसरे को रिफ्लेक्ट करते हैं। यह जो साइकिल है जिसको कि हम संसार चक्र कहते हैं। यह संसार चक्र व्यष्टि मन के भीतर में जो कल्पना होती है वहां पे ये संसार चक्र हमको जन्म मृत्यु जरा व्याधि की साइकिल के रूप में दिखता है। और यह जो समष्टि मन के भीतर में जो कल्पना है, उसमें यह संसार चक्र सृष्टि स्थिति प्रलय की साइकिल के रूप में दिखता है। तो यहां पर महाराज जी कहते हैं कि देखिए यह दोनों एक दूसरे को रिफ्लेक्ट करता है। अर्थात कि जिस तरह से यह सृष्टि स्थिति प्रलय है। वो यह महत तत्व है। यह विराट सुप्रीम को या तो यूनिवर्सल कॉन्शियसनेस है। उसके भीतर की जैसे वह कल्पना है वैसे ही यह मेरा जो व्यष्टि मन है उसमें यह संस्कार प्रवाह की कल्पना है। अत एब शास्त्र दृष्ट देखा गैलो इसीलिए शास्त्र को पढ़कर के समझ में आया विश्व मनेर कल्पना शंभूत जगत तटा अर्थात कि विश्व मन में कल्पना के द्वारा प्रगट जगत एक भाबे आमादे मनः कल्पित एक तरह से देखा जाए तो हमारे भी मन की कल्पना ही है कारण आमादग खुद्र व्यष्टि मोन समष्टि भूत विषम मुनेर सहित शरीर अबयादी निक्षेद संबंध नित्य अवस्थित कारण हमारा यह जो क्षद्र अर्थात कि छोटा सा व्यष्टि मन जो है वह समष्टि भूत विश्व मन के साथ में जिस तरह से शरीर और शरीर के अवयव है इसी तरह से अविछेद्य जिसमें कि किसी भी तरह का सेपरेशन नहीं है। उस तरह से यह नित्य अवस्थित है। अगेन कॉम्प्लिकेटेड सेंटेंस यह जो पूरा चैप्टर के यह जो पॉइंट है प्रत्येक पॉइंट का प्रत्येक सेंटेंस जो है वो उसके ऊपर में सीरियसली विचार करना पड़ेगा। मैं राजकोट की बात है पब्लिकेशन डिपार्टमेंट में मैं काम करता था। तो वहां पे एक शास्त्री जी करके एक वॉलंटियर आते थे। अभी यह शास्त्री जी थे हमारे अनफॉर्चूनेटली अभी तो उनका देहांत हो गया है किंतु उस समय वह नियमित पब्लिकेशन में आते थे और क्या करते थे रामकृष्ण जो गुजराती मैगजीन है उसके लिए वो आर्टिकल लिखते थे अभी क्या है शास्त्री जी है संस्कृत और व्याकरण और यह शास्त्र के प्रकांड पंडित उनके द्वारा लिखी हुई किताब ये जो अपना ये काशी के यह जो सब फेमस पब्लिक हाउस है ना चौखंबा जिस तरह से जो कि आज कहा जाता है कि शास्त्र पब्लिश जहां पर होता है ये चौखंबा वगैरह ये जो पब्लिकेशन एकदम स्टैंडर्ड माने जाते हैं। तो शास्त्री जी की लिखी हुई किताब वे लोग पब्लिश करते थे। अर्थात आप सोच लीजिए कि ऑल इंडिया लेवल पर उनका एक स्टेटस था। तो और वो थे उस समय एक रिटायर्ड टीचर और राजकोट आश्रम के साथ में और गुजराती पब्लिकेशन के साथ में बहुत ही अच्छे तरीके से जुड़े हुए थे। तो अभी क्या है कि शास्त्री जी प्रत्येक प्रत्येक इशू में अपने गुजराती मैगजीन के एक-एक आर्टिकल लिखेंगे। अभी उनका जो आर्टिकल है वैसे तो लिखते थे गुजराती में क्योंकि यह है गुजराती मैगजीन किंतु वो जो उसमें यह जो पावर था ना संस्कृत और शास्त्र का इतना जबरदस्त था कि अभी एडिट तो हमको करना है ना जो साधु है वो एडिटर है उसको तो ये आर्टिकल को एडिट तो करना ही होगा अभी शास्त्री जी का आर्टिकल समझ में आए तो हम तो उसको एडिट करेंगे ना प्रश्न तो यहां पे आ जाता है तो वहां पे मेरे जो सीनियर्स स्वामी जी थे पब्लिकेशन में उनका नाम बकुल महाराज। तो बकुल महाराज कहा करते थे शास्त्री जी का आर्टिकल एडिट करने के समय आपको चाय का एक थर्मोस भर के बैठना पड़ेगा। एक-एक सेंटेंस को एडिट करने के लिए आपको चाय का एक-एक कप पीना पड़ेगा। तभी एक-एक सेंटेंस एडिट होगा। तो यहां पे भी देखिए ये शरद महाराज के यह जो एक-एक सेंटेंस है, चाय का एक कप पीने से वह हमको समझ में आएंगे। इस तरह के है। यहां पे क्या कहते हैं? हमारा जो क्षुद्र अर्थात कि सामान्य व्यष्टि मन है वो यह समष्टिभूत विश्व मन के साथ में इस तरह से जुड़ा हुआ है जिस तरह से कि शरीर और शरीर के अवयव जुड़े हैं। अभी यहां पे कहना क्या चाहते हैं? देखिए यह जो विशिष्ट अद्वैत है,

द्वैत, विशिष्टाद्वैत और अद्वैत वेदान्त के बीच का अंतर

द्वैत, अद्वैत और विशिष्ट अद्वैत। हमको तो पता है कि यह तीन मेजर ब्रांचेस है। उसमें यह द्वैत वेदांत क्या कहता है कि यह जैसे सृष्टि और ईश्वर इन दोनों के बीच में किस तरह का डिफरेंस है? तो जैसे कि ईश्वर ने सृष्टि को जन्म दिया है। यह हमेशा दोनों सेपरेट ही रहेंगे। एक भक्त है भगवान की आराधना करेगा। आराधना करते-करते भगवान के आशीर्वाद प्राप्त होंगे। और उसके भीतर में यह दैवी गुणावली प्रकट होगी। किंतु यहीं तक जैसे कि मां अपने बच्चे को बहुत ही स्नेह करती है। किंतु क्या बच्चा कभी मां के भीतर में परिणत हो जाता है क्या? बच्चा खुद मां बन जाता है क्या? बच्चा बच्चा ही रहेगा। मां मां ही रहेगी। तो यह दोनों के बीच में जो डिफरेंस है, एक बार बच्चे को जन्म देने के बाद में मां और बच्चे हमेशा अलग ही रहेंगे। भले ही चाहे कितना ही स्नेह दोनों में हो, मां चाहे बच्चे को 24 घंटे अपनी गोद में उठाकर के घूमती रहे, सोती रहे, बच्चा तो मां से सेपरेट ही रहेगा। तो यह ईश्वर और यह सृष्टि और यह भक्त इन दोनों के बीच में यह जो सेपरेशन है, अनंत बना रहेगा। इसको द्वैत वेदांत कहते हैं। द्वैत अर्थात कि दो। तो दो सत्ताएं हैं। दो रियलिटीज है। एक है ईश्वर, दूसरा है जीव और जगत। तो यह हो गया द्वैत वेदांत। अद्वैत वेदांत विशिष्ट अद्वैत वेदांत क्या कहता है कि यह सृष्टि और यह ईश्वर दोनों के बीच में किस तरह का रिलेशन है? जैसे कि शरीर एक ही है। द्वैत वेदांत में तो क्या दो शरीर हो गए। मां और बच्चा। एक बार मां ने बच्चे को जन्म दे दिया हमेशा सेपरेट। किंतु विशिष्ट अद्वैत कहता है कि भले चाहे शरीर एक ही है। हम लोग दो शरीर को स्वीकार नहीं करते। किंतु एक ही शरीर में अंग तो बहुत सारे हैं ना। अब जैसे मैं हूं मैं तो एक ही हूं। किंतु यह जैसे मेरा हार्ट है, मेरा लीवर है, मेरी किडनीज है, मेरी आंखें हैं, मेरे कान है, मेरे हाथ है, मेरे पैर है, यह मेरे बाल हैं। ये अवयव तो सब अलग-अलग है। अब मैं भले चाहे एक ही हूं। किंतु अब जैसे मेरा हाथ है। मान लीजिए मेरा हाथ कट गया तो ठाकुर ना करे किंतु यदि ऐसा एक्सीडेंट हो गया मेरा हाथ कट गया तो मैं क्या मर जाऊंगा? नहीं। क्योंकि मेरा हाथ जो है वह मैं नहीं हूं। मेरा हाथ मेरे साथ में बहुत ही क्लोजली कनेक्टेड है। मेरे हाथ के बिना मुझे बहुत तकलीफ होगी जीने में। किंतु हाथ यदि कट जाता है तो इसका अर्थ यह नहीं है कि मेरा मृत्यु हो जाएगा। मैं जीवित रहूंगा क्योंकि मेरा हाथ मैं नहीं हूं। ऑन वन हैंड मेरा हाथ मेरे साथ में बहुत ही क्लोजली कनेक्टेड है। ऑन द अदर हैंड यह हाथ मैं नहीं हूं। तो ईश्वर या तो ब्रह्मन और सृष्टि इन दोनों का रिलेशन इस तरह से है। ईश्वर एक ही है। सृष्टि और ईश्वर एक ही है। बस वही है कि विभिन्न अवयवों की तरह डिफरेंशिएशन है। यह हो गया विशिष्ट अद्वैत। और अद्वैत क्या कहता है? सिर्फ एक ही है। ईश्वर ही सृष्टि के रूप में हमको दिखाई देते हैं क्योंकि हमको भ्रम हो गया है। और इसका उदाहरण फेमस उदाहरण शंकराचार्य का कि रास्ते में जा रहे हैं अंधेरे में। आपको लगा कि सांप है तो हम डर गए। फिर आजकल का मोबाइल में तो वो टॉर्च आती है ना। टॉर्च के मोबाइल की टॉर्च के लाइट में देखा कि अरे वो तो सांप नहीं रस्सी ही है। तो फिर पता चला कि रस्सी अलग है। सांप अलग है किंतु सांप अलग दिख रहा है बिकॉज़ कि मेरा अज्ञान है। जिस तरह से अज्ञान चला गया उसके सांप भी अदृश्य हो गया। तो अद्वैत वेदांत कहता है कि ईश्वर ही हमको सृष्टि के रूप में दिखाई देते हैं। ईश्वर के अलावा या तो ब्रह्मन के अलावा और कुछ नहीं है। बस हमारा अज्ञान है बोलकर के हमको यह सृष्टि दिखाई देती है। तो यह हो गया अद्वैत वेदांत। अभी देखिए द्वैत वेदांत कहता है मां बच्चे को जन्म देती है। मां और बच्चा हमेशा सेपरेट रहेंगे। भले ही चाहे मां बच्चे को 24 घंटे अपनी गोद में उठाकर के घूमती रहे वो हो गया द्वैत वैज्ञान द्वैत वेदांत यानी कि दो विशिष्ट अद्वैत अद्वैत ही है अर्थात कि एक ही है। किंतु विशिष्टता यह है कि यह जो ब्रह्मण के भीतर में विभिन्न विभिन्न अवयव है, अंग है, ऑर्गन्स है, हाथ है, पैर है, आंख है, कान है, नाक है। तो वैसे ही ब्रह्मण के भीतर में यह सृष्टि है। विभिन्न विभिन्न रूप से स्पेशलाइज की हुई। तो यह हो गया विशिष्ट अद्वैत और यह अद्वैत वेदांत कहता है ब्राह्मण ही है और कुछ नहीं है। और जो कुछ भी आप देख रहे हैं मन के भ्रम के अलावा और कुछ नहीं। तो यहां पे जब

सारदानन्दजी क्या सिखा रहे हैं—अद्वैत या विशिष्टाद्वैत?

शारदानंद जी महाराज हमको कहते हैं कि हमारा जो व्यष्टि मन है वह समष्टि मन के साथ में इस तरह से जुड़ा हुआ है कि जैसे कि शरीर और शरीर के अवयव। तो इससे हमको समझ में क्या आता है कि क्या शारदानंद जी महाराज विशिष्ट अद्वैत के बारे में बात कर रहे हैं क्योंकि यह जो उदाहरण है कि शरीर और शरीर के अवयव यह विशिष्ट अद्वैत के साथ में ही जुड़ा हुआ है। कोई भी अद्वैती जो है इस तरह का उदाहरण नहीं देगा कि ब्राह्मण और सृष्टि का संबंध देह और देह के अंग के समान है। अद्वैति यही कहेगा कि एक ही है और एक के अलावा और कुछ नहीं। विशिष्ट अद्वैती ही आपको यह कहेगा कि हां यहां पे आपका यह देह और देह के अंग के समान डिफरेंस है। देखिए इसके पहले वाले पॉइंट में हमने जो डिस्कस किया था शरद महाराज का लीला प्रसंग का जो तृतीय भाग है तृतीय भाग में शरद महाराज हमको समझाते हैं कि यह ब्राह्मण और सृष्टि का रिलेशन किस तरह से है? तो महाराज जी कहते हैं तीन तरह के भेद होते हैं। एक तो है कि विजातीय भेद अर्थात कि मैं मनुष्य हूं। यह पत्थर है। यह समुंदर है तो यह पेड़ है। यह पृथ्वी है तो यह सितारे हैं। तो अभी क्या है कि यह पूरा डिफरेंस है। ये स्पीशीज ही अलग है। तो मेरे में और पत्थर में जो डिफरेंस है इसको विजातीय भेद कहते हैं। क्योंकि पत्थर पदार्थ ही अलग है और मैं जीवंत पदार्थ हूं। वह निर्जीव पदार्थ है। मैं ऑर्गेनिक हूं। वह इनऑर्गेनिक है। तो यह पदार्थ ही अलग है। इसको कहते हैं विजातीय भेद। तो शरद महाराज हमको याद है कि शरद महाराज ने कहा कि ब्राह्मण के भीतर में विजातीय भेद नहीं है। इस अर्थ में कि यह ब्राह्मण है। यह सृष्टि है। यहां पे दूसरे तरह का ब्राह्मण है। वहां पर शैतान है। यहां पे कुछ दूसरा ही है। ऐसा नहीं। एक ब्राह्मण ही मात्र है तो विजातीय भेद नहीं है। फिर हो गया सजातीय भेद कि चलो मैं हूं मैं मनुष्य हूं तो आप भी मनुष्य हैं। किंतु हम सब में क्लियर डिफरेंस पता है हमको मेरा संस्कार प्रवाह एक तरह का है। मेरा जन्म मृत्यु जरा व्याधि का चक्र एक तरह से चलेगा। आप यहां पर जो सुन रहे हैं आपका सबका जन्म मृत्यु जरा व्याधि का जो चक्र है वो आपके आपके संस्कारों के प्रवाह के अनुसार चलेगा। हम सभी मनुष्य हैं किंतु हम सबका यह संस्कार प्रवाह अलग-अलग रूप से चल रहा है। तो हम लोगों के बीच में यह सजातीय भेद है। किंतु माने एक ही जाति के हम सब हैं। किंतु हमारा सबका संस्कार, प्रवाह, देह अलग है। मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार अलग है। तो हम लोगों के बीच में सजातीय भेद है। तो शरद महाराज कहते हैं कि ब्राह्मण के भीतर में यह सजातीय भेद भी नहीं है। इस अर्थ में कि डि ब्राह्मण है एक स्पीशीज और उसके बहुत सारे डिफरेंट-डिफरेंट अभी पृथ्वी का ब्राह्मण एक, चंद्र का ब्राह्मण एक, हिंदुओं का ब्राह्मण एक या तो यह मुस्लिम लोगों का एक, क्रिश्चियन लोगों का एक। ऐसा नहीं। ब्रह्मण एक ही है। यानी कि स्पीशीज भी एक है और स्पीशीज के भीतर में स्पेसिमेन भी एक है। इसका अर्थ यह हुआ कि पूरे विश्व में बस एक ही मनुष्य है और वह मैं हूं। मेरे अलावा और कोई मनुष्य नहीं है। तो यहां तक तो हम आए कि सजातीय भेद भी नहीं है। विजातीय भेद भी नहीं है। किंतु शरद महाराज कहते हैं ब्रह्मण के भीतर में स्वगत भेद है। यह स्वगत भेद का अर्थ क्या हुआ? एक ही देह है। उसके भीतर में विभिन्न विभिन्न अवयव है। तो यह जो विभिन्न अवयव है वह हमको इस सृष्टि के रूप में दिखाई देते हैं। अभी इसका अर्थ यह हुआ कि इस पूरे विश्व ब्रह्मांड में देखिए मैं ही एक हूं। ना ही पत्थर है, ना ही हाथी है, ना ही घोड़ा है, ना ही यह बिल्ली है, ना ही समुंदर है, कुछ नहीं है। बस मैं ही एक हूं। अभी कहेंगे कि मेरे जैसे 10 लोग हैं क्या? नहीं। मेरे जैसे 10 लोग भी नहीं है। बस मैं ही एक हूं। अर्थात कि हाथी, पत्थर, घोड़ा वो भी नहीं है। और मनुष्य जैसे कि मेरा नाम है कृष्ण सखानंद। फिर आपका नाम है और कुछ तो वो भी नहीं। एक ही जाति का एक ही व्यक्ति। किंतु जैसे मेरे विभिन्न अवयव है। इसी तरह से ब्रह्मन के भीतर में यह विभिन्न अवयवों की तरह सृष्टि लगी हुई है। तो उस समय भी हमको एक अंदाज आ गया था कि यदि आप अद्वैत वेदांत को पढ़ेंगे तो अद्वैत वेदांत ये स्वगत भेद को भी स्वीकार नहीं करेगा। अद्वैत वेदांत कहेगा कि ब्राह्मण है तीनों भेद के रहित है। सजातीय, विजातीय और स्वगत अर्थात कि ब्राह्मण ही है। यह जो आपको विभिन्न अंग प्रत्यंग दिखाई दे रहे हैं वो सिर्फ कल्पना के माध्यम से दिखाई देते हैं। तो उस वाले पॉइंट में भी शरद महाराज ने हमको एक स्वगत भेद बताया। यहां पर तो वह स्पष्ट रूप से कहते हैं कि यह जैसे कि शरीर के विभिन्न अवयव है वैसे ही यह सृष्टि के भीतर में यह विभिन्न विभिन्न व्यष्टि मनुष्यों का निर्माण सृष्टि का निर्माण हो रहा है। यह जो वैश्विक मन के भीतर में सृष्टि का निर्माण हो रहा है। तो यह दोनों को पढ़कर के हमको यह प्रश्न होगा कि क्या शरद महाराज हमको यहां पे विशिष्ट अद्वैत सिखा रहे हैं क्या? किंतु जैसे हम स्वामी जी को पढ़ेंगे तो अभी स्वामी जी ऐसा नहीं कहते कि इवन ठाकुर का हम सबको पता है। ठाकुर कभी ऐसा नहीं कहेंगे कि यह विशिष्ट अद्वैत सही है या द्वैत सही है ना कि यह अद्वैत सही है। ठाकुर कहते हैं कि यह सब अवस्थाएं हैं। ईश्वर और भी क्या कुछ है जो कि हमारी मन बुद्धि और वाणी और वचन से परे हैं। तो ईश्वर का क्या स्वरूप है हम स्वीकार म डिटरमाइन करना मुश्किल है। तो वो तो हमको पता है कि फिलॉसोफिकली ठाकुर ने ऐसा कोई अपने से कोई सिद्धांत ग्रहण नहीं किया था। किंतु बात बातबात में देखें तो मां और स्वामी जी दोनों ने अद्वैत वेदांत को प्राधान्य दिया है। स्वामी जी अद्वैत वेदांत के बारे में बोलते हैं। वह तो जग जाहिर है और मां का भी वह वर्ल्ड फेमस लेटर है कि मायावती से किसी ने कंप्लेन करके लेटर लिखा कि स्वामी जी ने यहां से ठाकुर का शराइन हटा दिया है। तो मां ने उत्तर में लिखा था कि आपके गुरु जो थे ठाकुर वह भी अद्वैत थे और आप भी अद्वैतवादी हैं। अभी यहां पर मां स्पष्ट कहती है ठाकुर अद्वैत अर्थात कि ब्राह्मण ही थे। तो देखिए कि मां और स्वामी जी दोनों को स्टडी करके हमको अद्वैत वेदांत की जो प्राइमसी है फिलॉसोफिकली वो समझ में आती है। तो फिर अभी देखिए कथामृत की बात है। कथामृत में मास्टर महाशय को ऐसा लगता था कि ठाकुर जो है विशिष्ट अद्वैत सिखा रहे हैं। अर्थात कि मास्टर महाशय ने कथामृत में स्पष्ट रूप से दो-तीन जगहों पे उल्लेख किया है कि ठाकुर का क्या यह विशिष्ट अद्वैतवाद है? ऐसा करके उन्होंने उल्लेख किया है। यहां पर भी शरद महाराज की यह बात पढ़कर के कि जैसे कि शरीर और शरीर के विभिन्न अवयव है। उसी तरह से यह वैश्विक मन यानी कि समष्टि मन और यह हमारा व्यष्टि मन यानी कि इंडिविजुअल कॉन्शियसनेस। यह दोनों देह और देह के विभिन्न अवयवों की तरह है। तो यह पढ़कर के लगता है क्या शरद महाराज का यह विशिष्ट अद्वैतवाद है? किंतु देखिए थोड़ा सा इसको

व्यष्टि मन और समष्टि मन के बीच देह और देह के अवयवों का सम्बन्ध है, नहीं की ब्रह्मन् और सृष्टि के बीच

और डिटेल में देखें तो शरद महाराज यह नहीं कहते कि ब्राह्मण के भीतर में ब्रह्मन के साथ में यह जो देह और अवयवों का संबंध है। ऑलरेडी स्वामी महाराज जी लिखते हैं कि यह विराट मन और यह व्यष्टि मन समष्टि मन और व्यष्टि मन इन दोनों के बीच में यह रिलेशन है। नहीं कि ये सृष्टि और ये ब्राह्मण इन दोनों के बीच में ये रिलेशन देखिए बड़ा ही फिलॉसोफिकली सूक्ष्म पॉइंट दिखेगा किंतु थोड़ा सा सोचेंगे तो बड़ा ही स्पष्ट हो जाएगा कि ब्रह्मन जो है वह तो एक ही है। ना ही उसके भीतर में स्वगत भेद है ना ही सजातीय भेद है ना ही विजातीय भेद है। भेद कहां से प्रारंभ होता है? एक बार उसके ऊपर में नाम रूप का आवरण लगेगा। एक बार उसके ऊपर में अविद्या या अज्ञान का आवरण आएगा। उसके बाद में जो कुछ दिखाई देता है, उसके भीतर में यह स्वगत भेद है। उसके भीतर में यह देह और देह के अवयव इस तरह का भेद है। एक बार आप नाम रूप का आवरण हटा दें। एक बार आप यह अविद्या या अज्ञान या माया का आवरण हटा दें। उसके बाद में जो ब्रह्म साक्षात्कार होगा तो इस ब्रह्म साक्षात्कार में या तो ब्रह्मण के भीतर में ना ही सजातीय ना ही विजातीय ना ही स्वगत भेद दिखेगा ना ही इसके भीतर में शरीर और शरीर के विभिन्न अवयव इस तरह का डिफरेंशिएशन दिखेगा। ब्रह्मन एक ही है। ब्रह्मन ही है। अद्वैत यह जो लिटरली उसका जो मीनिंग है वही अनुभूति होने वाली है। यह स्वगत भेद या तो फिर देह और देह के अवयव यह डिफरेंशिएशन यह तो एक बार अविद्या अज्ञान माया या भ्रम या तो फिर नाम रूप इसका आवरण जब आता है। इसके बाद की जो सृष्टि है उसके भीतर में यह सब दिखाई देता है। आपको यह स्वगत भेद दिखाई देगा। देह और देह के अवयव दिखाई देंगे। यानी कि यहां पे एक माया का पर्दा है। माया के पर्दे के इस पार देखेंगे। जहां पर ब्राह्मण है तो वहां पे अखंड अद्वैत सत्ता दिखाई देगी। और माया के पर्दे के इस ओर जहां पर सृष्टि प्रारंभ हो चुकी है वहां पर आपको फिर यह विशिष्ट अद्वैती ये जो कांसेप्ट है देह और देह के अवयव या तो फिर स्वगत भेद वो वहां पे दिखाई देंगे। तो यह एक क्लेरिटी कि भले ही चाहे प्राथमिक रीडिंग में हमको ऐसा लगता हो कि शरद महाराज हमको विशिष्ट अद्वैत दिखा रहे हैं, सिखा रहे हैं। किंतु थोड़ा सा डिटेल में जाएंगे और जो यहां की जो वाक्य रचना है उसको ठीक-ठीक हम पढ़ेंगे तो स्पष्ट लगेगा कि ब्रह्मण के भीतर में इस तरह के किसी भी डिफरेंशिएशन की बात महाराज नहीं करते। माया के आवरण के बाद में सृष्टि चक्र प्रारंभ जब होता है उसके भीतर में यह सब डिफरेंशिएशन की बात महाराज करते हैं। तो अच्छा देखिए मैंने एक चार्ट बनाया

ब्रह्मन्, सृष्टि, महत्, और जीव के बीच संबन्ध का चार्ट

है। थोड़ा सा क्या है कि इनमें बैठा था तो था थोड़ा सा टाइम मेरे पास में तो मैंने यह बनाया। अभी क्या है इस तरह के चार्ट को थोड़ा सा केयरफुली लेना होता है क्योंकि ये तो एक कांसेप्ट ही है कांसेप्ट के अलावा और कुछ नहीं जस्ट एक फॉर एक जनरल अंडरस्टैंडिंग के लिए इस तरह के चार्ट को कभी भी बहुत ज्यादा सीरियसली नहीं लेना है विद दिस डिस्क्लेमर मैं आपको यह समझाता हूं देखिए कि यह है ब्राह्मण सेंटर में आपको ब्राह्मण दिखाई देता है उसके के ऊपर में माया का हुआ है आवरण। इसके बाद में क्या होता है? देखिए कि यह जो x एक्सिस है उसमें यह है समष्टि और व्यष्टि। यह दो डिफरेंशिएशन हमको दिखते हैं। समष्टि का अर्थ तो हम समझ ही गए यूनिवर्सल या तो कॉस्मिक और व्यष्टि का अर्थ तो हम समझ ही गए कि इंडिविजुअल। तो यह एक्स एक्सिस पे हमको समष्टि और व्यष्टि दिखाई देता है। एक बार माया का आवरण हुआ उसके बाद की बात और यह जो y एक्सिस है उसमें हमको दिखाई देता है कॉन्शियसनेस और मैटर। देखिए आप यदि सांख्य में सृष्टि की रचना का अभ्यास करेंगे तो हमको यह मैटर और ऑर्गेनिक और इनऑर्गेनिक इस तरह से दो स्पष्ट स्वरूप देखने को मिलते हैं। एकदम स्पष्ट रूप से दिखाई देता है कि यह पुरुष और प्रकृति के मिलन से प्रकट हुआ महत तत्व, महत तत्व में से प्रकट हुआ अहम तत्व और अहम तत्व के बाद में दो डिवीजन हो जाते हैं। बेसिकली सत्व और रजस मिलकर के ऑर्गेनिक वर्ल्ड की सृष्टि होती है। ऑर्गेनिक वर्ल्ड की सृष्टि में हमको दिखता है कि मन है, ज्ञानेंद्रिय है और कर्मेंद्रिय है। और यहां पे तमस और रजस इन दोनों को मिलकर के यह इनऑर्गेनिक वर्ल्ड की सृष्टि होती है। जिसमें हमको दिखता है यह पंचमहाभूत पंच तन्मात्रा पंचमहाभूत। तो यह जो है कि यहां पर स्पष्ट रूप से आपको ऑर्गेनिक और इनऑर्गेनिक दिखता है। तो यहां पर मैंने यह कॉन्शियस और मैटर इस तरह से मैंने यह y एक्सिस पे लिया है और यदि आप वेदांत पढ़ेंगे तो वेदांत में आपको स्पष्ट रूप से दिखता है कि समष्टि और व्यष्टि का डिफरेंशिएशन यह सत्वगुण से ईश्वर प्रकट होते हैं। और उसके बाद में रजस और तमस गुण से यह पूरी सृष्टि का व्यष्टि लेवल पे इंडिविजुअल कॉन्शियसनेस वो यूनिवर्सल कॉन्शियसनेस ईश्वर और यहां पे इंडिविजुअल कॉन्शियसनेस तो यह ऑर्गेनिक और इनऑर्गेनिक डिफरेंशिएशन आपको सांख्य में स्पष्ट रूप से दिखते हैं और यह व्यष्टि समष्टि डिफरेंस आपको वेदांतिक कॉस्मोलॉजी है उसमें स्पष्ट रूप से दिखते हैं। मैंने दोनों को यहां पर कंबाइन करके x एक्सिस पर मैंने ले लिया है समष्टि और व्यष्टि डिफरेंस और यहां पर y एक्सिस पर मैंने ले लिया है कॉन्शियसनेस और मैटर। तो इस तरह से x और y एक्सिस बनाने के बाद में इस सृष्टि में चार तत्वों का प्रगट प्रागट्यकरण होता है। क्या है? कॉन्शियस और समष्टि अर्थात कि यह यूनिवर्सल कॉन्शियसनेस है। उसमें से बनता है महत तत्व या तो फिर ईश्वर तत्व। यह समष्टि और मैटर अर्थात कि यह इनऑर्गेनिक और कॉस्मिक यह दो एलिमेंट से बनता है यह कॉस्मोस या तो फिर कहेंगे विश्व ब्रह्मांड जिस सृष्टि स्थिति प्रलय की यह जो साइकिल है वो इस कॉस्मोस के साथ में बनती है। इसके बाद में कॉन्शियसनेस और व्यष्टि यानी कि इंडिविजुअल लेवल कॉन्शियसनेस। तो इसमें से हमारा सूक्ष्म शरीर बनता है। हमारी इंडिविजुअल कॉन्शियसनेस बनती है। ज मेरा खुद का मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार इसके साथ में जो जुड़ा हुआ है। और फिर व्यष्टि और मैटर इन दोनों को मिलकर के बनता है मेरा स्थूल शरीर। तो इस तरह से देखिए कि बेसिकली इस विश्व ब्रह्मांड में चार एलिमेंट ही तो है। एक तो है कि और दोनों एक दूसरे को रिफ्लेक्ट करते हैं। एक तो है कि कॉस्मिक अब जैसे मैं अपने खुद को देखूं तो दो लेवल पर मुझे मेरा एग्जिस्टेंस स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। एक तो कॉन्शियसनेस है। दूसरा यह मेरा कॉन्शियस एग्जिस्टेंस है। मन बुद्धि चित्त अहंकार रूपी और यह मेरा मटेरियल एग्जिस्टेंस है। पंचमहाभूत पंचतन मात्र का बना हुआ। तो जिस तरह से मेरा इंडिविजुअल कॉन्शियसनेस और इंडिविजुअल बॉडी है वैसे ही इसको समष्टि लेवल पर रिफ्लेक्ट होता है यूनिवर्सल कॉन्शियसनेस जिसको कि महत्व या ईश्वर कहते हैं और यह यूनिवर्स इटसेल्फ ये चांद सितारे ये ग्रेविटी यह इलेक्ट्रोमैग्नेटिज्म यह क्वांटम डायनेमिक्स यह सृष्टि स्थिति प्रलय बिग बैंग बिग क्रंच यह रिलेटिविटी क्वांटम डायनेमिक्स जो कुछ भी आप कह कह लीजिए यह संसार के जितने भी यह नोबेल प्राइज विनर जो लोग सब नई-नई डिस्कवरी करते हैं यह एआई है आज का जो कुछ भी कहो वो स्थूल कॉस्मोस का पार्ट है। मटेरियलिस्टिक कॉस्मोस का पार्ट है। तो यहां पे इस तरह से सृष्टि को समझाने के लिए यह चार्ट मैंने बनाया है। ऑफकोर्स जैसे मैंने कहा यह सिर्फ अंडरस्टैंडिंग के लिए ही है। सो दैट अच्छा लेट अस रिटर्न टू आवर क्या कहते हैं शरद महाराज आ ओई जगत रूप कल्पना जे एक

देश और काल - space & time - सृष्टि के भीतर मे ही है

काले विश्व मने छिलोना परे आरंभ हो एकथा बोली ते पारा जाए ना और फिर यह जगत रूप कल्पना कभी थी ही नहीं एक समय थी नहीं और एक समय प्रारंभ हुई ऐसा भी आप नहीं कह पाएंगे कारण नाम ओ रूप बा देश ओ काल रूप पदार्थ ध्वय जहां ना थाकिले कोनो रूप विचित्रता सृष्टि होते पारेना जगत रूप कल्पना रही मध्यगत वस्तु कारण नाम और रूप या तो फिर कहेंगे देश और काल या तो फिर आज की मॉडर्न लैंग्वेज में कहेंगे स्पेस एंड टाइम यह जो पदार्थ है दो वो ना रहेंगे तो किसी भी तरह तरह की सृष्टि की रचना ही नहीं होगी। कारण जगत रूप कल्पना रे मध्यगत वस्तु अथवा ओई कल्पना सहित उहारा अभिक्षिद्ध भावे नित्य वर्तमान यह नाम और रूप देश या काल या स्पेस या टाइम यह जगत रूपी जो कल्पना है उसी के भीतर में है और इस कल्पना के साथ में स्पेस एंड टाइम जो है एकदम क्लोजली कनेक्टेड है। अगेन आपको [हंसी] चाहे चाय के दो कप लग जाएंगे यहां पे ये समझने के लिए क्या कहना [गला साफ़ करने की आवाज़] चाहते हैं? एक्चुअली कांसेप्ट बड़ा सहज है। किंतु अगेन एक्सप्लेन करने की कैपेसिटी जब इतना सब कुछ कॉम्प्लिकेटेड हम एक्सप्लेन करने का प्रयास करते हैं तो हमको ऐसा लगता है कि हमारी जो वाणी है और हमारे शब्द है वो जैसे छोटे पड़ जाते हैं। किंतु खैर इसके बारे में हमने काफी डिस्कशन यह जो कॉस्मोस मैक्रोकोजम और माइक्रोकोजम जो था उसके उस समय किया था। उसी को मैं फिर से यहां पर दोहरा देता हूं क्योंकि शरद महाराज और स्वामी जी दोनों बात तो एक ही करते हैं। क्या कहते हैं कि देखिए प्रश्न यह है बेसिक प्रश्न क्या है कि क्या ऐसा कोई समय था कि जब कि सृष्टि नहीं थी। फिर एक समय ऐसा हुआ कि सृष्टि प्रारंभ हुई और फिर एक ऐसा समय आया कि जब सृष्टि नहीं थी। अर्थात कि एक ऐसा समय था कि जब हम नींद में सोए हुए थे। फिर अलार्म बजा अर्थात कि ये बिग बैंग हुआ ये विस्फोट हुआ महा जो सृष्टि का प्रारंभ हुआ इसके बाद में हम जग गए जग पूरे दिन भर हमने काम किया उसके बाद में रात को हम सो गए तो प्रश्न है कि हमारे जीवन में दो स्पष्ट फेसेस देखने को मिलते हैं। एक तो हम सोए हुए हैं दूसरा हम जगे हुए हैं। तो यहां पर प्रश्न है कि क्या सृष्टि के साथ में इस तरह के दो स्पष्ट फेसेस देखने को मिलते हैं? सृष्टि नहीं थी। फिर यह बिग बैंग हुआ। यह अलार्म जैसे बजता है। यह बिग बैंग हुआ। फिर सृष्टि प्रारंभ हुई। फिर सृष्टि का अंत आ गया। और फिर एक ऐसा लंबा समय बीता कि जबकि सृष्टि सोई हुई है या सृष्टि है ही नहीं। तो क्या ऐसा संभव है? उसका उत्तर है यह संभव ही नहीं। क्यों? क्योंकि यह जिसको हम समय कहते हैं, काल कहते हैं, यह टाइम जिसको कहते हैं और दूसरा कि स्पेस जिसको कहते हैं, नाम रूप, देश काल या स्पेस टाइम वह दोनों ये तीनों जो है एक्चुअली कांसेप्ट एक ही है। तीन तरह के नाम है। यह जो पूरा जो स्पेस टाइम है वह सृष्टि के साथ में ही प्रारंभ हुआ है और सृष्टि के अंत में ही उसका विलय हो जाएगा। यानी कि यह कहना कि सृष्टि के पहले क्या था? इस प्रश्न का कोई उत्तर ही नहीं है। क्यों? क्योंकि सृष्टि के पहले समय ही नहीं था। इसके पहले का कांसेप्ट ही नहीं है। पहले और बाद में भूत, वर्तमान और भविष्य। यह जो डिफरेंशिएशन है टाइमलाइन के ऊपर में यह तो टाइम लाइन के ऊपर में ही है। यदि टाइम ही नहीं है तो ना ही भूत है ना ही वर्तमान है ना ही भविष्य है। जो कुछ भी यह आप देख रहे हैं कार्य कारण रूपी यह जो कॉज एंड इफेक्ट रूपी यह जो पूरी चैन है यह जो कर्म का पूरा सिद्धांत है वो देश और काल या तो स्पेस और टाइम के साथ में अविछेद्य रूप से इनसेपरेबली जुड़ा हुआ है। यदि टाइम एंड स्पेस ही नहीं रहेंगे तो ना ही कॉज एंड इफेक्ट रहेगा ना ही यह कार्य कारण रहेगा ना ही यह कर्म का सिद्धांत रहेगा ना ही यह जन्म मृत्यु जरा व्याधि रहेगा ना ही यह सृष्टि स्थिति प्रलय रहेगा और काल और देश और काल स्पेस और टाइम विलीन किस में होते हैं वो ब्रह्मण में विलीन हो जाते हैं तो ब्रह्मण के भीतर में ऐसा भूतकाल वर्तमान भविष्य कार्य कारण कोजेशन कर्म का सिद्धांत सृष्टि स्थिति प्रलय जन्म मृत्यु जरा व्याधि ऐसा कुछ भी नहीं है। ब्रह्मण ही है और कुछ नहीं है। ब्राह्मण के बाद में अविद्या का ऊपर में जब पर्दा आता है और उसके बाद में यह विराट प्रकट होता है और विराट के प्रकट होने के साथ-साथ में ही इसके मन के भीतर में जगत रूपी कल्पना प्रकट होती है और साथ-साथ में ही यह दे स्पेस टाइम देश काल नाम रूप प्रकट होते हैं। यह समष्टि के भीतर में कॉस्मिक अह कॉन्शियसनेस के भीतर में और फिर इसी को कॉस्मिक कॉन्शियसनेस के भीतर में यह व्यष्टि मन जो है ये इंडिविजुअल कॉन्शियसनेस है वो प्रकट होते जाते हैं। तो हमारे इंडिविजुअल लेवल पे एट द सेम टाइम कॉस्मिक लेवल पे जो कुछ भी फिनोमिना है वह देश काल के भीतर में है। इसके परे कुछ है ही नहीं। देखिए यह चार्ट देखिए। चार्ट के भीतर में आप देखिए यह है ब्रह्मन। ब्रह्मन के भीतर में ना ही है स्पेस, टाइम, ना ही है नाम, रूप, ना ही है यह देश और काल। किंतु एक बार जब उसके ऊपर में यह माया का आवरण आता है। उसके बाद में आप देखेंगे कि स्पेस, टाइम, देश, काल, नाम, रूप, कॉन्शियस और यह मैटर, यह समष्टि और व्यष्टि, यह सूक्ष्म शरीर, यह महत्व, यह कॉस्मोस, यह स्थूल शरीर यह सब कुछ इसके बाद में ही प्रकट होता है। इसी के साथ में ही देश काल प्रारंभ होते हैं। देश काल के साथ में ही यह सब कुछ है। अर्थात कि यह कहना कि देश काल नहीं था, स्पेस टाइम नहीं था। जब उस समय कॉस्मोस क्या कर रहा था? तो यह तो एकदम नॉनसेंस प्रश्न है। इस प्रश्न का कोई उत्तर ही नहीं है। क्योंकि उत्तर बड़ा स्पष्ट है कि देश और काल में से ही स्पेस और टाइम के बाद में ही स्पेस और टाइम के भीतर में से ही यह सृष्टि की रचना हुई है। इसके पहले कुछ नहीं था। इसके बाद में कुछ नहीं है। तो यही शरद महाराज हमको यहां पर कहना चाहते हैं कि यह जगत रूप कल्पना जे एक समय नहीं थी इस विश्व मन में या तो फिर एक समय था कि जब जगत रूपी कल्पना प्रारंभ हुई ऐसा आप नहीं कह सकते। यह विश्व मन जिस क्षण प्रकट हुआ साथ-साथ में ही यह स्पेस टाइम भी प्रकट हुए और साथ-साथ में ही यह जगत रूपी कल्पना भी प्रकट हुई और जिस क्षण और यह जो कॉस्मिक जो कॉन्शियसनेस है उसका अंत कभी नहीं आने वाला है। जिस तरह से यह जो ब्राह्मण है वो इटरनल है। अगेन इटरनल शब्द यहां पे छोटा पड़ जाता है। इटरनल शब्द स्पेस और टाइम के साथ में ही आप इस्तेमाल कर सकते हैं। किंतु मान लीजिए कि यदि ये छोटा सा शब्द से ब्रह्मन को हमको डिस्क्राइब करना है। ये कैसा है पता है? ब्रह्मण के बारे में इटरनल कहना। सूरज के सामने आप टॉर्च लाइट फेंक रहे हैं। सूरज को उजालित करने के लिए कहां सूरज की शक्ति, कहां टॉर्च लाइट की शक्ति। तो यह ऐसा है कि ब्राह्मण यदि इटरनल है तो फिर यह जो जगत रूपी कल्पना है वह भी इटरनल है। इस अर्थ में कि दोनों हमेशा अस्तित्व में रहने वाले हैं। उसका ना ही बिगिनिंग है ना ही मिडिल है ना ही एंड है। किंतु यह जो व्यष्टि है जगत रूपी कल्पना के भीतर में यह जो व्यष्टि मन जो प्रकट हो रहे हैं उसका आरंभ और अंत है। जैसे कि यह समुंदर है। समुंदर हमेशा यहां पे वैसा का वैसा ही बना रहने वाला है। किंतु इसके ऊपर की जो लहरें हैं हमेशा नई-नई लहरें बनती जाएगी। पुरानी लहरें जो है वो किनारे पर आकर के सबसाइड होती जाएगी। ये जो लहरों के बारे में ये जो उसका जन्म है उसका मृत्यु है। उसका प्रारंभ है। उसका अंत है। किंतु समुंदर के साथ में ऐसा कुछ नहीं। तो वो हो गया। ये समुंदर है। यहां पे ये कॉस्मिक माइंड। तो यह कॉस्मिक माइंड जो कि स्पेस और टाइम के साथ में अविछेद्यय रूप से वर्तमान है। इस कॉस्मिक माइंड को हम इटरनल कह सकते हैं। और इस इटरनल माइंड के भीतर में ये इंडिविजुअल जो व्यष्टि माइंड जो है व्यष्टि शरीर जो है व्यष्टि संस्कार जो है वो प्रकट होंगे, लय हो जाएंगे। उनका जन्म होगा, उनका मृत्यु होगा। किंतु यह दोनों के परे जो ब्रह्मन है वो ब्रह्मन इज कंप्लीटली बिय्ड स्पेस एंड टाइम। तो ब्रह्मन इटरनल है। ब्रह्म अनादि अनंत है। ब्रह्मन यह है वो है। वो सब शब्द ही ब्रह्मन के लिए छोटे पड़ जाएंगे। यानी कि देखिए बेसिकली हमारे सामने तीन रियलिटीज दिखती है। एक तो है ब्रह्मण। ब्रह्मन के ऊपर में जब अविद्या का आवरण होगा तो एक समष्टि और एक व्यष्टि। तो यहां पर देखिए ब्रह्मन हमेशा है। अविद्या के आवरण के बाद में जो समष्टि है या ईश्वर है वह भी अनादि अनंत है। किंतु यह जो व्यष्टि यानी कि हम लोग जो इंडिविजुअल है हमारा जन्म है हमारा मृत्यु है। हम लोग भूत, वर्तमान और भविष्य के कालपाश में बंधे हुए हैं। किंतु ना ही यह ईश्वर या महत तत्व या कॉस्मिक कॉन्शियसनेस कालपाश से बंधे हैं। ना ही यह ब्राह्मण है। ब्रह्मण काल पाश से बंधा है। तो यह महाराज जी हमको यहां पर कहना चाहते हैं। अभी इसके बाद का जो है वो नेक्स्ट क्लास में ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु।

Q & A

ऑफ कोर्स क्योंकि स्वामी जी को यह जो कि व्यष्टि और समष्टि यह जो स्वामी जी को जो था कि विज़न कि बोथ आर मिरर इमेज ऑफ ईच अदर कि वो को वो यूनिवर्सल लेवल पे है। यह इंडिविजुअल लेवल पे है। बट बोथ आर मिरर इमेज ऑफ़ ईच अदर। दैट इज़ व्हाट इज़ स्वामी जीसस इनसाइट वाज़। नाउ बोथ आर रिफ्लेक्शन ऑफ़ ईच अदर। ऑब्वियसली किंतु यहां पर देखिए सूर्य और सूर्य का प्रकाश ना दैट इज अ सिमाइल बिटवीन ब्रह्मन और व्यष्टि। राइट? यहां पे हमारा सिमाइल है समष्टि और व्यष्टि का। तो अल्टीमेटली थ्री एंटिटीज है कि ब्रह्मन है, समष्टि है और व्यष्टि है। तो आज जो सिमाइल हमने देखा देखिए हमारा कंफ्यूजन कहां पे आ सकता था कि यदि शरद महाराज स्पष्ट रूप से विशिष्ट अद्वैत का उदाहरण देते हैं। ये जो देह और देह के अवयव ये विशिष्ट अद्वैत का स्टैंडर्ड जैसे रज्जु सर्प स्टैंडर्ड है। अद्वैत का आप अद्वैत वेदांत और रज्जु सर्प ये दोनों को आप सेपरेट कर ही नहीं सकते। तो वैसे ही ये जो देह और अवयव ये विशिष्ट द्वैत का स्टैंडर्ड एग्जांपल है। तो पढ़कर के ही इमीडिएटली लगेगा कि शरद महाराज क्या विशिष्ट अद्वैत सिखा रहे हैं। नहीं शरद महाराज समष्टि और विष्टि का रिलेशन समझा रहे हैं। नहीं कि ब्रह्मण और सृष्टि का। हां। हां दोनों माया के भीतर में है। हां हां हां कि ब्रह्मण और माया का डिफरेंस नहीं समझा रहा है। माया के भीतर में व्यष्टि समष्टि का डिफरेंस समझा रहा है। देखिए हमारा बहुत सारा कंफ्यूजन कहां से स्टार्ट होता है कि ये जो तीन एंटिटी है ना ये तीनों को हम क्लियरली समझ नहीं पा रहे हैं। हम सृष्टि और ब्राह्मण अद्वैत पढ़कर के बेसिकली यही एक समझते हैं। सृष्टि है, ब्रह्मन है। किंतु आप थोड़ा प्रैक्टिकल में जाएंगे ना। सृष्टि में आपको ईश्वर दिखाई ही देंगे। प्रश्न ही नहीं है। तो यहां पे सबसे बड़ा प्रश्न आता है ईश्वर और ब्रह्मन में क्या रिलेशन म क्या सिमिलर है? क्या डिफरेंट है? मनुष्य और ईश्वर में क्या सिमिलर है? क्या डिफरेंट है? मनुष्य और ब्रह्मन में क्या सिमिलर है? क्या डिफरेंट है? ट्रायंगुलर रिलेशनशिप यहां पे बनती है। सो दैट ट्रायंगुलर रिलेशनशिप हैज़ टू बी क्लियर इन आवर माइंड। कि ये ब्रह्मन है। ब्रह्मन के ऊपर में माया का आवरण है। उसके बाद में समष्टि और व्यष्टि। इस तरह से तीन एंटिटीज होते हैं प्रकट। और ऑफ कोर्स यदि आप अविद्या कोई एक एंटिटी गिने तो दैट इज फोर्थ एंटिटी बट बेसिकली [गला साफ़ करने की आवाज़] आप तीन एंटिटी के रूप में इसको पूरे को एनालाइज कर सकते हैं। जितने भी एग्जांपल है थोड़ा सा आप देखेंगे कि किसके बीच में है ये एग्जांपल या तो ब्रह्मण और सृष्टि के बीच में है ना कि यह सृष्टि के भीतर में ही व्यष्टि समष्टि के बीच में है। दैट यदि हमारा क्लेरिटी हो जाए तो ज्यादातर वेदांत हमारे लिए क्लियर हो जाएगा। म एकदम फंडामेंटल हो गया। रेदर देन सेइंग ग्रोस कहेंगे कि एकदम रूट लेवल पे है। मशीन लैंग्वेज जिसको कहते हैं ना जीरो वन वाला ये मशीन लैंग्वेज लेवल का डिफरेंस है। यदि एक बार हमने सर्प स्वीकार कर लिया तो सर्प की आंख भी है, सर्प का मुंह भी है, सर्प के दांत भी है, सर्प की पूंछ भी है। ये सब कुछ स्वीकार करना पड़ेगा। सो यह बाकी का एनालिसिस सर्प को स्वीकार करने के बाद का है। देह अदेह के अवयव स्वगत भेद विजातीय सजातीय भेद वो सब बात के डिफरेंस आ जाते हैं। देखिए ब्रह्मन के भीतर में होमोजेनिटी है। ब्रह्मन के भीतर में किसी भी तरह का डिफरेंस आप प्रकट नहीं कर सकते। किंतु एक बार सृष्टि को स्वीकार किया। फिर सृष्टि में डिफरेंस है। और सृष्टि के डिफरेंस को आप कैसे समझाएंगे? यदि आप यह मां और बच्चे वाला डिफरेंस आप सृष्टि में ले आएंगे ना तो यह बहुत ज़्यादा रियलिस्टिक हो जाएगा कि सृष्टि के डिफरेंट-डिफरेंट प्रकार है। किंतु सृष्टि के डिफरेंट प्रकार नहीं है। सृष्टि इटसेल्फ इज़ होमोजनियस इन दैट सेंस कि ये जो क्वांटम डायनेमिक्स और रिलेटिविटी के रूल्स जो पृथ्वी पे लगते हैं तो आपको एंड्रोमीडा गैलेक्सी के अलावा दूसरी गैलेक्सी है। जैसे यह हमारी मिल्की वे गैलेक्सी है। फिर यह एंड्रोमीडा गैलेक्सी है। तो मिल्की वे गैलेक्सी में जिस तरह से ग्रेविटी का नियम काम करता है वही आपको एंड्रोमीडा गैलेक्सी में भी काम करता दिखाई देगा। और यदि नहीं करता है तो उसकी साइंटिफिक एक्सप्लेनेशन भी है। सो विद इन दिस सृष्टि एवरीथिंग इज होमोजेनियस इन दैट सेंस कि सृष्टि का डायनेमिक्स तो सेम ही है। यानी कि आप अच्छा देखिए अ ब्राह्मण और सृष्टि को डिफरेंस समझाने के लिए बेसिकली तीन तरह की वेदांतिक ब्रांचेस है। द्वैत विशिष्ट द्वैत और अद्वैत। राइट? अह द्वैत में मां और बच्चा यानी कि दो कंप्लीटली डिफरेंट एंटिटी। विशिष्ट अद्वैत में है देह और देह के अवयव। एंटिटी एक ही है किंतु उसके स्पेशल स्पेशलाइजेशंस है उसके भीतर में। और रज्जु सर्प में तो एंटिटी एक ही है। सर्प जैसा कुछ है ही नहीं। यह सृष्टि और ब्राह्मण को डिफरेंस समझाने के लिए हमको समझाया गया है। और कोई भी लॉजिकल माइंड होगा वो अद्वैत वेदांत को ही स्वीकार करेगा। किंतु जब सृष्टि को समझाने की बारी आती है तो हम अभी पहला उदाहरण तो हम ले ही नहीं सकते कि सिर्फ सृष्टि ही है। सृष्टि के अलावा और कुछ नहीं। सृष्टि के भीतर में प्रचंड वैविध्य है। ये तो मतलब अंधे को भी दिखता है। तो यह रज्जु सर्प वाला उदाहरण यहां पे काम नहीं करेगा। तो बच गए दो उदाहरण कि एक तो मां और बच्चे वाला उदाहरण है, देह और अवयव वाला उदाहरण है। अभी यदि मां और बच्चे वाला उदाहरण को लेते हैं उसका अर्थ यह हुआ कि मल्टीपल टाइप की यह सृष्टि है। यह आज के मॉडर्न साइंस में जिसको हम पैरेलल यूनिवर्स कहते हैं कि एक यूनिवर्स है उसमें उसके नियम, उसके फिजिक्स के नियम, केमिस्ट्री, बायोलॉजिकल नियम कंप्लीटली डिफरेंट। फिर एक पैरेलल यूनिवर्स है जिसमें कि कंप्लीटली डिफरेंट नियम अप्लाई होते हैं। मां और बच्चे के बीच में जिस तरह से अब बॉडी केमिस्ट्री भी डिफरेंट है, संस्कार प्रवाह भी डिफरेंट है तो वो हो गया पैरेलल यूनिवर्स वाला कांसेप्ट मां और बच्चे वाला किंतु देह और देह के अवयव वो कांसेप्ट है कि यूनिवर्स एक ही है। इस यूनिवर्स की बॉडी केमिस्ट्री कहो कि संस्कार प्रवाह कहो एक ही है। एक ही ग्राम ग्रेविटी के रूल एक ही फिजिक्स केमिस्ट्री के रूल पूरे ब्रह्मांड में अप्लाई होते हैं। किंतु ब्रह्मांड के भीतर में स्पेशलाइजेशन तो है ही है दैट कि एक चांद है, एक तारा है, मनुष्य है, पत्थर है, पानी है, हवा है। एटसेटरा एटसेटरा। तो यहां पे शरद महाराज कहना चाहते हैं बेसिकली दिस इज़ अ वेरी स्टार्टलिंग स्टेटमेंट कि पैरेलल यूनिवर्स जैसा कुछ नहीं है। एक ही यूनिवर्स है किंतु एक यूनिवर्स के भीतर में सेपरेशन है। मतलब स्पेशलाइजेशन है। शेशर को था रे शटा तो शेशर को था वो तो [हंसी] आखिरी घड़ी की बात है रे वो तो ये शरद महाराज कब मांग रहे थे शरद महाराज उद्बोधन के आखरी आखिरी दिन थे ना शरद महाराज के देखिए मां की तो महासमाधि हो चुकी है और वैसे तो शरद महाराज को प्रेसिडेंट बनाने की बात थी किंतु उन्होंने कहा कि नहीं स्वामी जी मुझे सेक्रेटरी बना के गए मैं आजीवन सेक्रेटरी रहूंगा किंतु ऑब्वियसली कि अभी यंगर जनरेशन ने चार्ज ले लिया है। तो क्या है कि शरद महाराज के जीवन के जो महत उद्देश्य थे मां की सेवा करना वो भी समाप्त हो गया। ठाकुर की जीवनी की रचना करना वो भी समाप्त हो गया। वो स्वामी जी ने जो कार्य भर दिया था वो भी उसमें से मोर और लेस वो रिटायर हो गए हैं। ये यंगर ट्रस्टीज है उनको सब दे दिया है। तो ठाकुर मां स्वामी जी तीनों का काम समाप्त करके शरद महाराज उद्बोधन में रह रहे हैं। उन दिनों की बात है। 1925 26 उस समय की बात शरद महाराज सुबह को जब ध्यान में बैठते थे ना तो सीधे पांच छ घंटे निकाल देते थे। सीधे एक आसन पे बैठ के और जो मतलब देखकर के ही लगता था कि वो समाधि में चले गए। तो वो तो एक लोगों के ना अपनी आंखों से देखा है और महाराज की जब महासमाधि हुई और उसके बाद में उनकी डायरी जो मिली वो डायरी में उन्होंने नोट्स लिखी है एक-एक सेंटेंस की आज चार घंटा ईश्वरीय कम्युनियन हुआ डिवाइन कम्युनियन हुआ ईश्वर के साथ में कम्युनिकेशन हुआ आज 3 घंटा हुआ आज छ घंटा हुआ माने एक-एक दिन वो जो रोजनीशी होती है ना वह आज की तारीख और उसमें एक सेंटेंस आज 3 घंटा आज चार घंटा, आज 5 घंटा वो डायरी पढ़कर हमारे रोंगटे खड़े हो जाएंगे। [हंसी] किंतु उसका फाउंडेशन उन्होंने बचपन से ही डाल दिया ना। देखिए हमारे पास में भी तो अभी ऑप्शन है ना। हम लोग यहां पे जितने भी हैं मोर और लेस अपने 40 50ज में है। वी स्टिल हैव एटलीस्ट 20 30 इयर्स इन आवर हैंड। तो आज से ही हम डेली उम् कुछ प्रारंभ करें कि वह समय आने से इतना बड़ा समस्या ना हो जाए। हम लोगों के साथ में वो 4 घंटा 5 घंटा समाधि यदि ना भी हो एटलीस्ट सुख और शांति से जाए वो एटलीस्ट नहीं आपके साथ में होता है तो हमारे साथ में वही होता है। देखिए मैं यह सब बातें कर रहा हूं। अभी कल का ही मैं उदाहरण दूं। यहां पर वो हमारा क्लास होता है तो गीता चटिंग के लिए किताब लेनी है। तो मैंने कहा कि देखो बहुत सारे बच्चे ना आजकल तेलुगु मीडियम में पढ़ते ही नहीं है। तेलुगु पढ़ना ही नहीं आता। इंग्लिश मीडियम में पढ़ते हैं। तो अभी मैंने कहा उसको ये जो हमारा ये है परचेस करने वाला कि मैंने कहा देखो इंग्लिश में श्लोक हो इस तरह का किताब लाना। ये तेलुगु पढ़ना ही नहीं आता बच्चों को। संस्कृत तो भूल ही जाइए। तेलुगु भी नहीं आता। तो इंग्लिश में श्लोक हो इस तरह का गीता का किताब लेके आना। तो मूर्ख ले आया किताब श्लोक है संस्कृत में और उसका इंग्लिश मीनिंग है। मैंने कहा भाई तुमको मैंने एकदम स्पष्ट रूप से समझाया कि बच्चे को तेलुगु नहीं आता है पढ़ना। उनको सिर्फ इंग्लिश ही आता है। तो इंग्लिश मीनिंग नहीं चाहिए मुझे। मुझे तो इंग्लिश जो श्लोक चाहिए। अदरवाइज वो कैसे वो पढ़ेंगे। वो मैंने उसको डांट दिया एकदम फटाक करके। फिर मैं वहां से निकला। मैंने सोचा यार ये मैं सुबह को ये सब इतनी बड़ी-बड़ी बातें करता हूं। नहीं छोटी चीज में मुझे गुस्सा क्यों आ जाता है? [हंसी] ₹10 की किताब है वह एक्स्ट्रा एक आ गई है तो कोई फर्क नहीं पड़ता है [हंसी] रामकृष्ण मिशन को किंतु फड़ा करके मैं इरिटेट हो जाता हूं। ऐसा क्यों होता है भाई? देखिए मैं अपना कंक्लूजन बताता हूं कि ऑब्वियसली कि हम लोग सुबह मंगल आरती के बाद में थोड़ा बहुत जप ध्यान कर लेते हैं। संध्या आरती के बाद में कर लेते हैं। किंतु मैंने जो अपने खुद के जीवन के एक्सपीरियंस से पाया है ना मेरा जो कुछ भी डेवलपमेंट है ना वो ठाकुर मां स्वामी जी की कहानियां पढ़ के हुआ है। नहीं कि जब ध्यान करके यह मेरा बड़ा ही क्लियर अंडरस्टैंडिंग है। और पिछले मैं जब से मैं यहां पे आया हूं ना विशाखापटनम में राजकोट में मेरा ये था कि हां ठाकुर मां स्वामी जी की कहानियां इंपॉर्टेंट है किंतु साथ में मेडिटेशन जप ध्यान वगैरह-वगैरह किंतु विशाखापटनम आने के बाद में ना ये मेरा एकदम क्लियर हो गया है कि मेडिटेशन देखिए साधना करने की कैपेसिटी हम में है ही नहीं जो कुछ भी है सब ग्रेस है और कुछ नहीं है बिना ग्रेस के कुछ नहीं है तो आशीर्वाद कैसे मिले तो सबसे सरल तरीका है कि इनकी जो कहानियां है ना उसका चिंतन हो उनका श्रवण हो उसके बारे में बात वार्तालाप हो बस यही एक है और जैसे कुछ है ही नहीं मेरे लिए आज इतनी बड़ी साधना हो गया है ये क्लास जब मैं नहीं करता अभी परसों दिन में रात को बहुत देरी तक जगह था कभी-कभी यह मेरे पुराने दिन मुझे याद आ जाता है देरी तक पढ़ता रहता हूं फिर सुबह को क्लास करने की इच्छा नहीं होती पहले मैं राजकोट में था तो बीच-बीच में छुट्टी ले लेता था अभी मैं रेयरली छुट्टी लेता हूं किंतु जिस दिन छुट्टी लेता हूं ना उस दिन फिर सुबह को ऐसा लगता है ना समथिंग इज मिसिंग जैसे कि साधना नहीं हुई है। अब जप किया है जो कि स्टैंडर्ड टाइम है वह मैं बैठा हूं। किंतु इंस्पाइट ऑफ दैट क्लास नहीं किया तो साधना नहीं हुई। ऐसा भी लगने लगता है। ठाकुर मां स्वामी जी की वाणी उनकी चर्चा वाणी और वार्तालाप कथाओं का नहीं। बांग्ला बोले कथाओं का नहीं। हम कहें वाणी और वार्तालाप यह जो है ये हमारे लिए ना सबसे इंपॉर्टेंट साधना है। मुझे तो लगता है ठाकुर ने कहा ना कल ते अन्नगत प्राण तो कली में अन्नगत प्राण है तो अभी अन्नगत प्राण लेकर के हम अब ध्रुव की तरह एक पैर पर खड़े रह के हजारों साल तपस्या थोड़ी ना होने वाली है हमसे। सो यह वाणी और वार्तालाप यही है हमारी मुख्य साधना इस युग की। क्या मैंने कहा ना कि यह अनुभव मतलब यह अनुभूति मुझे यहां पर आकर ही हुई है। जब तक मैं राजकोट में एक प्रवाह में चल रहा था ना तब मुझे लगता था ओके दिस इज़ अ पार्ट ऑफ साधना बट अब जैसे राजयोग है। सो इट्स मन को एकाग्र करना एकाग्रता कंसंट्रेशन कंसंट्रेशन शुड बी मेन साधना। ऐसा मुझे वहां पे लगता था कि मेडिटेशन इज द हाईएस्ट सर्विस। स्वामी जी का वो है ना तो हाईएस्ट सर्विस कहो ना कि हाईएस्ट साधना कहो इट इज़ कंसंट्रेशन वो एक मेरा था वहां पे किंतु यहां पे आके मुझे लगता है कि नहीं ये वाणी और वार्तालाप ये है हमारी मेन साधना [हंसी] एक सर्टेन ऐज अभी हो जाता है मैं पूरा एक पूरा एक लाइफ चेंज हो जाता है इवन यदि मैं आज राजकोट में होता ना तो शायद मुझे ये अनुभव नहीं हुआ होता राजकोट में रहते रहते मुझे और पांच छह साल लग जाते हैं यह अनुभव होते किंतु यहां पे एक सडन एक ब्रेक हो गया और सडन एक सब हो गया। सो दैट मींस कि यह अनुभूति मेरी और ज्यादा पक्की हो गई। [हंसी] हिडन बेनिफिट ये जो वो ट्रंप ट्रंप ने टेरिफ लगाए बहुत सारे लोग कहते हैं जैसे ये क्या कह हिडन बेनिफिट ना कि ऐसा हिडन एडवांटेज है हमारे लिए। [हंसी] क्योंकि हमारी इकॉनमी पावरफुल होगी। अभी इकोनमी पावर फ्लो होगी कि पता नहीं किंतु मुंह से तो बोलना पड़ता है म वो होगा कि नहीं होगा किंतु बोलना तो पड़ेगा ना साधु शंगे बेलूर मठ दर्शन होए जा अच्छा [हंसी] आज आज आज क्या हुआ पता है ये बैकग्राउंड चेंज करने वाला है ना तो मैं बीच-बीच में देखता रहता हूं ये Google मीट है ना उसमें नए-नए बैकग्राउंड देते रहते हैं अब उत्सव के अनुसार तो यह दिवाली आई है ना तो दिवाली का बैकग्राउंड दिया है तो मैं यह दिवाली का बैक बैकग्राउंड लगा करके मैं थोड़ा सा देख रहा था। फिर मैंने सोचा कि नहीं बेलूर मठ बेलूर मठ है। वह चाहे वो Google मीट के जितने ही ब्यूटीफुल बैकग्राउंड हो बेलूर मठ की कंपेयर कोई नहीं कर सकता। तो थोड़ी देर वो दिवाली वाला रखा फिर से मैं बेलूर मठ वाला कर दिया। बेलूर मठ में दिवाली, काली पूजा, दुर्गोत्सव सब समय चलता रहता है। देखिए ये ठाकुर की वाणी और वार्तालाप आप जितना बोलेंगे, जितना श्रवण करेंगे, वैसे ही संस्कार शुद्धि तो होती ही रहेगी। यानी उसमें तो कोई प्रश्न ही नहीं है। फिर बाकी का ठाकुर के हाथ में है। किंतु इतना तो होता ही होता है। ओम