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ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिणे अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णायते नमः श्री रामकृष्ण लीला प्रसंग स्वामी शारदानंद जी महाराज द्वारा लिपिबद्ध उसमें जो हम देख रहे थे द्वितीय खंड का साधक भाव का प्रथम चैप्टर साधक और साधना। कल जो हमने ऑलरेडी टॉपिक डिस्कस किया है, फिर से एक बार पढ़ लेते हैं। शरद महाराज क्या लिखते हैं। तो सबसे पहले तो हमको यह पता है कि जगत में वैविध्य जो सृष्टि हुई है उसके बारे में शरद महाराज बात कर रहे थे और फिर यह डिस्कशन हो रहा था कि यदि किसी एक व्यक्ति को मुक्ति मिल जाती है तो बाकी सबको मुक्ति क्यों नहीं मिलती तो इसके लिए जो कुछ-कुछ टॉपिक हमारा चल रहा था कि सबको एक ही तरह जागृत अवस्था में एक ही तरह का विश्व हमको क्यों दिखता है? जागृत अवस्था में एक मोर और लेस कंसिस्टेंसी है। कर्म का सिद्धांत कार्य करता है और सिर्फ एक जन्म में नहीं जन्म जन्मांतर तक कर्म का सिद्धांत कार्य करता रहता है। वह क्यों है? यदि हम जागृत अवस्था को भी स्वप्नवत ही समझते हैं। स्वप्न अवस्था में जो इनकंसिस्टेंसी है, डिंटिन्यूटी है, इररेशनलिटी है, एकदम स्पष्ट रूप से हमको दिखाई देती है। तो यदि कोई हमको यह कहेगा कि जागृत अवस्था में भी इनकंसिस्टेंसी है, इररेशनलिटीज है। वहां पर भी आप देखेंगे कि इससे भी जो उच्च अवस्था है कम तुरीय अवस्था उसके कंपेयर में जागृत अवस्था भी स्वप्न समान है। यदि यह प्रश्न होता है, यदि हमको ऐसा कहा जाता है, तो हमको प्रश्न होगा कि आप यदि जागृत अवस्था को ही स्वप्न अवस्था के साथ में कंपेयर करेंगे तो कंसिस्टेंसी हमको जो इतनी दिखाई देती है यह जो साइंस के लॉ है और यह अपने संस्कार के लॉ है। दो तरह के तो नियम है इस जगत में। एक तरह के नियम है जो कि हमारे संस्कार को चालित करते हैं। दूसरे तरह के नियम है। साइंस को चालित करते हैं। यह ग्रेविटी है, रिलेटिविटी है, क्वांटम डायनेमिक्स है। यह आजकल का एआई है, बायोटेक्नोलॉजी है। वो तो आपको एकदम कंसिस्टेंट दिखाई देता है। ऐसा तो कभी सुनने में नहीं आया कि आज ग्रेविटी का नियम काम कर रहा था। कल उसने काम करना बंद कर दिया। पृथ्वी पर जितनी भी चीजें थी उसने हवा में उड़ना शुरू कर दिया। ऐसा तो ना ही कभी इतिहास में दर्ज हुआ है ना ही हमको कभी इस बात का अनुभव हुआ है। तो वह जितना कंसिस्टेंट है उतना ही कंसिस्टेंट हमारे संस्कार का जो प्रवाह है अच्छे कर्म का अच्छा परिणाम बुरे कर्म का बुरा फल और साथ-साथ में ही यह साधन भजन की यह जो प्रणाली है हमको बताई गई है। ब्रह्मचर्य का पालन करके तप शोच स्वाध्याय अपरिग्रह वगैरह जो है जितने भी नीति नियम आध्यात्मिक जीवन के उसका पालन करके हमको आध्यात्मिक जीवन में हमारा विकास होता है। कहां कथामृत पढ़कर के ऐसा हमने देखा कभी कि ठाकुर ने एकाएक ऐसा कह दिया। अभी आज तक तो कहते आते थे कि काम कांचन का त्याग करके ही ईश्वर प्राप्ति होती है। एकाएक उन्होंने खड़े होकर के कह दिया एक दिन सुबह को नींद से उठकर के कि नहीं नहीं काम कांचन का अनुष्ठान करके ईश्वर प्राप्ति होगी। इस तरह का उन्होंने एकदम 180 डिग्री टर्न कभी लगाया है? नहीं लगाया है। यह जो काम कांचन त्याग रामकृष्ण कथामृत का कंसिस्टेंट एक थीम आपको दिखाई देता है। यह चार योगों का अनुष्ठान और इसके माध्यम से ईश्वर प्राप्ति या आत्म साक्षात्कार रामकृष्ण संघ की यह जो एटलीस्ट 150 साल की जो परंपरा है अपनी ये कंसिस्टेंट हमको यह दिखाई देती है। तो यहां पे इतना सॉलिड कंसिस्टेंसी है। इसके पीछे का कारण क्या है? तो कारण है कि एक विश्व मन है असीम अनंत जिसके भीतर में विराट एक विश्व मन यूनिवर्सल कॉन्शियसनेस जिसके भीतर में यह जगत रूपी कल्पना का उदय होता है और बिकॉज़ कि यह सभी कल्पनाएं एक ही स्वप्न के भीतर में है। अलग-अलग लोग यदि अलग-अलग तरह के स्वप्न देखते तो डिफरेंट-डिफरेंट स्वप्न में इनकंसिस्टेंसी यदि दिखाई देती किंतु एक ही एक विराट मन है और एक ही स्वप्न देख रहा है बोलकर के इसके भीतर में कंसिस्टेंसी है। तो यह एक हमने देखा और फिर साथ-साथ में ही हमने देखा कि देखिए कि यदि विराट मन स्वयं तो वैसे स्वप्न देख रहा है किंतु इस विराट मन को यह स्पष्ट रूप से ज्ञात है कि यह स्वप्न है। कंपेयर टू अस। हम यदि स्वप्न देखते हैं तो हम लोग स्वप्न में इस तरह से ओतप्रोत हो जाते हैं। स्वप्न में यदि एकदम हमारे सामने शेर आ जाता है तो जब नींद से उठेंगे तो हमारा हृदय धकधक करता होगा। क्यों? क्योंकि जब तक मैं स्वप्न में था स्वप्न सत्य दिखता था। और जब मैं जागृत अवस्था में हूं तो जागृत अवस्था सत्य सत्य दिखती है। किंतु हमको यह पता है कि यह विराट मन जो है वह जब स्वप्न देखता है तो उसको यह स्पष्ट रूप से ज्ञात है कि यह स्वप्न ही है। दिस इज नथिंग बट ड्रीम। और इस ड्रीम के परे इस स्वप्न के परे जो तुरीय अवस्था है जो ब्राह्मण है वही एकमात्र है और कुछ नहीं है। यह विराट मन को यह स्पष्ट रूप से ज्ञात है। इसलिए ठाकुर उदाहरण देते हैं कि जैसे सांप है। सांप के मुंह में जहर है। सांप सबको दसता है। जिसको दसेगा उसको जहर लगेगा। वह जहर से मर जाएगा। किंतु सांप को खुद को जहर से कुछ भी प्रॉब्लम होता नहीं है। सांप को यह जहर का विष जो है उसके ऊपर में उठता नहीं है। तो यह कि इसीलिए इस विराट मन या तो यूनिवर्सल कॉन्शियसनेस या तो यह यूनिवर्सल माइंड वेदांत में इसको ईश्वर कहा गया है। तो यह ईश्वर या विराट मन जिसके भीतर में यह जगत रूपी कल्पना का उदय होता है। और साथ-साथ में ही जैसे कि हमने कल और भी देखा कि किस तरह से यह जो सृष्टि है यह सृष्टि के पहले क्या था और बाद में क्या होगा इस तरह का प्रश्न करना ही इलॉजिकल है क्योंकि पहले या बाद में यह भूत वर्तमान और भविष्य यह तीनों तो टाइमलाइन के ऊपर में यह सब रेखा मात्र है। अब जहां पे समय ही नहीं है वहां पे आप पहले क्या बाद में क्या यानी कि यह स्पेस टाइम भी इस जगत रूपी कल्पना के साथ में ही उसका उदय हुआ है और इसीलिए स्पेस टाइम के पहले क्या था या स्पेस टाइम के बाद में क्या आएगा यह प्रश्न करना इररेशनल है इलॉजिकल है तो क्या कहा था शरद महाराज ने नाम ओ रूप बा देश ओ काल रूप पदार्थ ध्वय नाम और रूप या देश और काल अर्थात कि स्पेस और टाइम यह जो दो पदार्थ है यह दो एलिमेंट है जहां ना था की ले कोनो रूप विचित्रता सृष्टि होइते पारे ना इन दोनों के बिना किसी भी तरह की ये सृष्टि की रचना ही नहीं हो पाएगी विचित्रता यहां पे महाराज शब्द यूज करते हैं विचित्रता की सृष्टि नहीं हो पाएगी यहां पर विचित्रता का अर्थ स्ट्रेंज के रूप में नहीं लेना है। विचित्रता का अर्थ लेना है। डायवर्सिटी के रूप में कि किसी भी तरह की डायवर्सिटी की क्रिएशन ही नहीं हो पाएगा। रचना ही नहीं हो पाएगी। यदि नाम रूप और स्पेस टाइम नहीं है तो इसीलिए जगत रूप कल्पना के मध्य जगत रूप कल्पना रही मध्यगत वस्तु नाम रूप देश काल स्पेस टाइम इस जगत रूपी कल्पना के भीतर में ही है। यह ईश्वर या विराट जो अपने मन में जगत रूपी कल्पना करते हैं। इस जगत रूपी कल्पना में जैसे कि एक ओर तो यह मैटर एनर्जी प्रकट होता है। दूसरी ओर यह स्पेस टाइम प्रकट होता है। यह नाम रूप प्रकट होते हैं। तो यह जो स्पेस टाइम है वह उसी के साथ में प्रकट होते हैं। यह जो आकाश और प्राण स्वामी जी का जो एनालिसिस है आज की मॉडर्न लैंग्वेज में हम कहेंगे कि स्पेस टाइम मैटर एनर्जी प्रकट होते हैं। स्वामी जी की लैंग्वेज में कहे तो आकाश और प्राण प्रकट होते हैं। कल हमने जिस तरह से देखा था कि मेरा खुद का अंडरस्टैंडिंग क्या है? थोड़ा सा समय फ्री था तो फ्री समय में मैंने वह चार्ट बनाया था। चार्ट में हमने देखा कि एक्स एक्सिस पे आपको दिखाई देगा यह व्यष्टि और समष्टि और यह व एक्सिस पे दिखाई देगा आपको कॉन्शियसनेस और मैटर। तो यह व्यष्टि कॉन्शस समष्टि कॉन्शियसनेस या तो यूनिवर्सल कॉन्शियसनेस क्या है? तो वो है विराट या तो ईश्वर। यह यूनिवर्सल मैटर क्या है? तो यह पूरा कॉस्मोस। यह व्यष्टि कॉन्शियसनेस क्या है? तो हमारा इंडिविजुअल कॉन्शियसनेस जिसको कि हम अंतःकरण या तो फिर सूक्ष्म शरीर या तो फिर मन, बुद्धि, चित्त अहंकार के रूप में पहचानते हैं। और यह व्यष्टि मैटर क्या है? तो यह है हमारा खुद का शरीर देह। तो यहां पे देखिए यह यूनिवर्सल कॉन्शियसनेस और यह यूनिवर्सल बॉडी यानी कि पूरा विश्व ब्रह्मांड। यहां पे है इंडिविजुअल कॉन्शियसनेस और यह इंडिविजुअल बॉडी। तो ये दोनों एक स्वामी जी की लैंग्वेज में कॉस्मोस मैक्रोकोजम और यह कॉस्मोस माइक्रोकोज्म। और यह दोनों एक दूसरे को रिफ्लेक्ट करते हैं। दोनों के अब सिमिलरिटीज आपको मोर और लेस देखने को मिल जाएगी। यहां पर जिस तरह से यह मैक्रोकोजम है या तो समष्टि है यह समष्टि उसकी सृष्टि स्थिति प्रलय की साइकिल चलती रहती है और यहां पे जो है इसका जन्म मृत्यु जरा व्याधि की साइकिल चलती रहती है। देखिए ये जन्म मृत्यु जरा व्याधि या सृष्टि स्थिति प्रलय किसका होता है? ये जो मैटर पार्ट है उसका होता है। कॉन्शियस पार्ट तो सेम ही रहता है। इस अर्थ में कि ईश्वर रूपी मन की ईश्वर रूपी जो विराट मन है उसमें यह जो फिजिकल यूनिवर्स की रचना हुई है। वो फिजिकल यूनिवर्स जो है उसमें सृष्टि स्थिति प्रलय चलता है। किंतु यह जो यूनिवर्सल कॉन्शियसनेस है या तो यूनिवर्सल माइंड है वह वैसे का वैसा ही रहता है। सिमिलरली यहां पर इंडिविजुअल लेवल पर अपना जो मन बुद्धि, चित्त, अहंकार रूपी जो है अपना अंतःकरण वो तो सेम ही रहता है। वो इवॉल्व होगा अह किंतु उसका एक इंडिविजुअल एग्जिस्टेंस बना रहेगा। शरीर का जन्म मृत्यु जरा भी आधि चलता रहेगा। इस अर्थ में कि इस जन्म में मैंने इतने संस्कार कलेक्ट किए हैं। तो अभी इतने संस्कार बटोरने के बाद में यह देह जब जाएगा नया देह मेरा जो अंतःकरण है वह धारण करेगा। अंतःकरण वही है। बस यह देह बदल गया है। तो यहां पर भी यह कंटीन्यूस मान लीजिए कि 80 करोड़ ना कि जितने भी ये 84 करोड़ योनि जैसे हम कहते हैं वो जितने भी हमारे जन्म जन्मांतर की ये यात्रा है जितने भी जन्म मेरे हैं जब तक मुझे मुक्ति नहीं मिल जाती है तब तक ये जितने भी जन्म होंगे मेरा अंतःकरण तो सेम चला आएगा। वो कंटीन्यूस प्रारंभ से लेकर के अंत तक जो अंतःकरण है मेरा वो वैसे का वैसा ही रहेगा। माने उसमें इवोल्यूशन होगा। किंतु मैं मैं ही रहूंगा। मैं और किसी आपका अंतःकरण है वो आप ही का रहेगा। और किसी का अंतःकरण है उसी का रहेगा। अंतःकरण में कहीं पर मिक्स और मैच नहीं होगा। वो कंटीन्यूसली अपना इंडिविजुअलिटी मेंटेन करता रहेगा। बस देह जो है उसका जन्म मृत्यु जरा व्याधि का चक्र चलता रहेगा। तो जैसे यह इंडिविजुअल लेवल पे है वैसे ही यह कॉस्मिक लेवल पे है कि यह कॉस्मिक इंटेलिजेंस या कॉस्मिक माइंड या कॉस्मिक कॉन्शियसनेस वो तो वैसे की वैसी ही रहेगी। यह जो मटेरियल यूनिवर्स है उसका सृष्टि स्थिति प्रलय का चक्र चलता रहेगा। माने ऐसा होगा नहीं कि जैसे मेरा देह उसका अंत आ गया तो मेरा अंतःकरण का भी अंत आ गया। मेरे संस्कार का भी वहीं पर अंत आ गया। अब जैसे नया देह धारण होता है तो बिल्कुल नया अंतःकरण उसमें आता है। ऐसा तो है नहीं। तो जैसे ये इंडिविजुअल लेवल पर है वही यह कॉस्मिक लेवल पर रिफ्लेक्ट होता है। कॉस्मिक लेवल पे जितना ही ज सृष्टि स्थिति प्रलय का साइकिल चलता रहे यूनिवर्स का कॉस्मोस का यह बिग बैंग और यह बिग क्रंच और यह फिर वहां से यह पूरा जो प्रत्येक कल्प जिसको कि हम कहते हैं हिंदू शास्त्र में जितने ही कल्प की साइकिल चलती रहे यूनिवर्सल कॉन्शियसनेस वो सेम रहेगा और इसीलिए यह जो ब्रह्म और यह माया इनको जिस तरह तरह से अनादि अनंत कहा गया है। और सेम अगेन फिर से वही स्टचटरी वार्निंग कि अनादि अनंत वगैरह शब्द जो है वो ब्रह्मण और उसके साथ में जब कम उसका डिस्क्रिप्शन देंगे तो शब्द छोटे पड़ जाते हैं। किंतु खैर अपनी लैंग्वेज की लिमिटेशन की वजह से यदि हम ब्राह्मण को अनादि अनंत कहेंगे तो फिर यह माया के आवरण लगने के बाद में जो यह समष्टि मन वो जो प्रकट होता है वह भी अनंत और अनादि ही रहेगा। यह माया जिस तरह से है और यह ब्रह्म जिस तरह से है वैसे ही यह समष्टि मन है। तो यह एक हो गया कि हमारा पूरा एक अभी तक जो शरद महाराज ने कहा उसके बारे में इसके आगे थोड़ा सा पढ़ते हैं। स्थिर भावे एक चिंता कोरिया देख पाठक ओई कोथा बुझते पारबेन एवं वेदादि शास्त्र जे केनो सृजनी शक्ति मूलीीभूत कारण प्रकृति बा माया के अनादि बा कालातीत बोलिया सिखा दिया छे ताहा ओ हृदयंगम होइवेबे यह स्थिर भाव से स्थिर होकर के थोड़ा सा सोचेंगे ऊपर वाली जो पूरी बात है तो पाठक है यह बात समझ पाएगा और वेदादि शास्त्र में क्यों सृजनी शक्ति का मूलभूत कारण प्रकृति या माया को अनादि या कालातीत बोलकर के कहा गया है वह भी समझ पाएंगे। यह जैसे हमने ऑलरेडी देखा कि यह कॉन्शियस पार्ट है ना ही उसका सृष्टि स्थिति प्रलय होता है ना ही उसका यह जन्म मृत्यु जरा व्याधि का चक्र होता है। ये सृष्टि स्थिति प्रलय या तो यह जन्म मृत्यु जरा व्याधि वो मैटर पार्ट का ही होता है नहीं कि कॉन्शियस पार्ट का कॉन्शियस में दो डिवीजन है अवश्य व्यष्टि और समष्टि किंतु यह चक्र जो है कल्प का चक्र वह उसको अप्लाई नहीं होता। जगत ज मन कल्पित हो एवं ओ कल्पना आरंभो जदी आरा काल बोली ते जहां बुझ ताहार भीतरे ना पया तबे कथाटा दाणा लो ए जे काल रूप कल्पनार शंगे शंगे जगत रूप कल्पनाटा तदाश्रय विश्व मने विद्यमान रहया छे जगत ज मनः कल्पित ही हो मनः कल्पित अर्थात कि हमारे मन में कल्पित नहीं विराट मन में कल्पित जगत यदि मनः कल्पित ही है और साथ-साथ में ही इस कल्पना का आरंभ यदि हम काल बोलकर के जिसको समझते हैं उसके भीतर में ना हो तो फिर यह बात आकर के खड़ी हो जाती है कि काल रूप कल्पना के साथ-साथ में ही जगत रूप कल्पना इस विश्व मन में विद्यमान रही है। अगेन वह जो एक कप चाय पीने के बाद में यह सेंटेंस समझ में आएगा। किंतु एक्चुअली मतलब नॉट दैट डिफिकल्ट टू अंडरस्टैंड कि यदि जगत जो है जगत मन के भीतर में यदि प्रारंभ हुआ है। यह किस तरह से पता है कि एक तो है टाइमलाइन। राइट? अभी यह टाइमलाइन जो है वो टाइमलाइन भी इस मन के भीतर में जगत रूपी कल्पना के साथ में ही प्रारंभ हुई है और इसीलिए जगत रूप कल्पना जो है उसका ना ही उसका भूत है ना इस अर्थ में कि जगत रूप कल्पना के पहले क्या था ना ही वह कुछ है ना ही उसका भविष्य है कि जगत रूप कल्पना समाप्त हो जाएगी तो क्या होगा क्यों क्योंकि आरंभ मध्य और अंत यह समय रूपी जो काल है जगत रूपी कल्पना के साथ-साथ में ही प्रकट हुआ है। जगत यदि मनः कल्पित हो और इस कल्पना का आरंभ यदि हम काल बोलकर के जो कुछ समझते हैं उसके भीतर में यदि ना हो इस अर्थ में कि जगत कल्पना है किंतु यह कल्पना का आरंभ यह टाइमलाइन के साथ में जुड़ा नहीं है। टाइमलाइन जगत रूपी कल्पना के भीतर में है। नहीं कि जगत रूपी कल्पना टाइमलाइन के ऊपर में है। यानी कि जगत रूपी कल्पना के बाहर में और कुछ नहीं है। ये आज का यह जो मॉडर्न साइंस है वो वो भी बेसिकली देखिए कि आप क्रिश्चियन थियोलॉजी पढ़ेंगे और आज का मॉडर्न साइंस पढ़ेंगे। दोनों को कंपेयर करेंगे तो क्रिश्चियन थियोलॉजी हमको इतना सिंपलिस्टिक लगता है। जैसे कि आप यह पूरा नर्सरी में पढ़ रहे हैं। फर्स्ट स्टैंडर्ड में पढ़ रहे हैं और यह मॉडर्न कॉस्मोलॉजी है। पूरा पीएचडी लेवल का है। इतना स्पष्ट डिफरेंस आपको दिखेगा। किंतु यह जब वेदांत स्टडी करते हैं और फिर मॉडर्न साइंस स्टडी करते हैं तो पैरेलल तो आपको दिखेंगे ही दिखेंगे। किंतु साथ में ही आपको यह भी पता चलेगा कि आज का मॉडर्न साइंस है उसको और भी अभी कितना दूर जाना है। क्योंकि देखिए कि हमारा जो साइंटिफिक ये जो मैथमेटिकल इक्वेशंस है और ये फिजिक्स की जो थ्यरीज है वो हमको यहां तक तो लेके आई है। देखिए कि अ यह न्यूटन था। तो न्यूटन के समय में एक क्लॉक वर्क यूनिवर्स था। इस अर्थ में कि यह सूरज है, यह चांद है, यह पृथ्वी है। यह बाकी के जो ग्रह है, प्लेनेट्स है, वह है और फिर यह सब सितारे हैं। तो, आपने शायद कभी यह प्लेनेट का यह मैकेनिकल मॉडल देखा होगा। उस समय ये जो 17th सेंचुरी यूरोप, 18th सेंचुरी यूरोप में यह प्लेरी मॉडल बनाया करते थे। इस प्लेरी मॉडल में क्या है? तो यह बीच में सूरज है और उसके चारों ओर यह वायर के ऊपर में यह सब ग्रह जो है वह ग्रह को सबको रखा गया है। अभी यह ग्रह को आप घुमाएंगे तो यह जो ऑर्बिट है प्रत्येक ग्रह की सूरज के आसपास में किस स्पीड से जाती है वो स्पीड भी उसमें आपको पता चलेगा। यदि आप वो मैकेनिकल मॉडल का वो चाबी दीजिए और जैसे वो घड़ी घूमती है ना चाबी देने के बाद में घड़ी के कांटे कैसे घूमते हैं तो वैसे ही ये जो मैकेनिकल मॉडल है उसमें आप चाबी दीजिए तो ये सूरज और सूरज के आसपास में आठ ग्रह आई थिंक नाइंथ तो बाद में खोजा गया प्लूटो और एक्चुअली सेवंथ ही थे उस समय सात ही ग्रह थे आठ और नौ तो बाद में खोजे गए तो जितने भी ग्रह हो यह सभी ग्रह उस अपनी-अपनी रिलेटिव स्पीड के साथ में सूरज के आसपास में घूमेंगे। अब पृथ्वी सूरज के जो चारों ओर एक ऑर्बिट लगाती है तो 1 साल लगता है। 1 साल यानी कि 365 दिन पृथ्वी के अनुसार। तो अभी ये जो मार्स ग्रह है उसको कितने दिन लगते हैं? पृथ्वी के मेजरमेंट के अनुसार पृथ्वी का डे लेंथ यदि देखें या तो पृथ्वी के जो एक साल है उसको यदि एक यूनिट मेज़मेंट गिने तो पृथ्वी के साल के अनुसार यह जो मंगल ग्रह है हो सकता है कि उसको आधा साल ही लगे सूरज की परिक्रमा करने में जुपिटर है उसको पृथ्वी के समय के अनुसार 3 साल लगे। ऐसा माने यह पूरा एकदम इलेबोरेटली क्लॉक वर्क यूनिवर्स बिठाया हुआ था। जिस तरह से घड़ी के कांटे घड़ी को आप चाबी देंगे मैकेनिकल क्लॉक आपने यदि पहले के समय में देखी होगी तो मैकेनिकल क्लॉक आती थी। प्रत्येक दिन रात को उसको चाबी देनी पड़ती थी और चाबी देने के बाद में फिर उसमें अलार्म भी फिक्स होता था। और वह अलार्म इतना जोरों से बजता था घर करके कि चारों ओर जितने भी लोग हैं सब नींद से जग जाएंगे। मां की कहानी है यह जो चाबी देने वाली घड़ी उस समय वहां पर मिलना शुरू हो गई थी। तो अभी मां को क्या है? यह जितना कल कब्जा मां इसको कहती थी। कल कब्जा अर्थात कि यह मैकेनिकल जो यह सब ये चीजें हैं तो मां कहती थी कि मुझे तो यह सब कुछ समझ में ही नहीं आता। फिर देखा कि जयराम बाटी में एक लड़की आई है शादी करके तो मां कहती है अरे वह जो नई बहू आई है ना जयराम बाटी में उसको घड़ी में चाबी देना आता है ऐसा वो मां इंप्रेस हो गई थी तो देखिए कि यह घड़ी चाबी जिस तरह से घड़ी में चाबी देते हैं और यह स्प्रिंग है यह लीवर है ये कितना एकदम परफेक्ट मोशन में घूमते हैं वैसे ही यह यूनिवर्स की उनकी क्लॉक वर्क यूनिवर्स कल्पना थी कि ये प्लेरी सिस्टम है उसको को आप चाबी देंगे तो ये मैकेनिकल मॉडल में कितना परफेक्टली ये घड़ी के कांटे की तरह एक साल पृथ्वी को लगता है। तो 2 साल लगेगा जुपिटर को 3 साल लगेगा सैटर्न को। अभी ये एग्जैक्ट फिगर मैं भूल गया कि कितना साल लगता है प्रत्येक प्लेनेट को सूरज का ऑर्बिट करने में। किंतु इट्स अ परफेक्टली क्लॉक वर्क यूनिवर्स। यह न्यूटन का यूनिवर्स था कि ग्रेविटी के सिद्धांत जो है इतना परफेक्टली कार्य करते हैं। किंतु जैसे ही यह 20थ सेंचुरी आई और ये आइंस्टाइन ने ये जो पत्थर फेंका इस क्लॉकवर्क यूनिवर्स में ये थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी ये जो समय है इटसेल्फ ये सापेक्ष है। यदि आप हाई स्पीड के साथ में जाते हैं तो आप देखेंगे कि समय स्लो हो जाता है। टाइम स्लोस डाउन। कैन यू बिलीव इट कि जो चीज हमने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि समय कभी स्लो हो सकता है क्या? समय स्लो हो जाता है और मान लीजिए और अभी तो यह सब प्रूफ हो चुका है। यह सब थ्यरी नहीं है। दीज़ आर एक्चुअली एक्सपेरिमेंटेड प्रूफ कि दो जुड़वा भाई है। एक जुड़वा भाई पृथ्वी पर रहता है। दो मान लीजिए दोनों की उम्र 25 साल की है। तो एक जुड़वा भाई यदि पृथ्वी पर रहता है तो दूसरा जुड़वा भाई ट्विन जो है उसका वह एक स्पेसशिप में बैठकर के वो दूसरे ग्रह की मुलाकात के लिए जाता है। तो मान लीजिए कि उसने उसकी जो स्पेसशिपिप है इट ट्रैवल्स एट ऑलमोस्ट 25% ऑफ द स्पीड ऑफ लाइट। स्पीड ऑफ लाइट कितनी है? 3 लाख कि.मी./ सेकंड। तो मान लीजिए उसकी स्पेसशिप 500 कि.मी./ सेकंड ना कि इतना स्पीड से वह उड़ती है। और यह जब यदि यह दूसरा भाई मान लीजिए कि 5 साल के बाद में पृथ्वी पर वापस आएगा तो ऑब्वियसली हमको समझ में आता है लॉजिकली कि पृथ्वी पे जो भाई होगा उसकी उम्र 5 साल के बाद में 25 साल की वजह होगी 30 साल। किंतु यह जो जुड़वा भाई जो कि स्पेसशिप में गया था वह वापस आता है तो उसकी उम्र 5 साल नहीं बढ़कर के सिर्फ ढाई साल बड़ी है या 2 साल ही बड़ी है यानी कि वो हुआ है 25 26 27 साल का और यह उसका जुड़वा भाई हो गया है 30 साल का यानी कि माने ये एग्जैक्ट फिगर तो आपको कैलकुलेशन करके कि स्पीड कितना स्पीड से वो स्पेसशिप जाता है कितना टाइम डलेशन होता है वो परफेक्ट इक्वेशन है इक्वेशन आपको एग्जैक्टली अमाउंट बता देगा कि इतना स्पीड से गति करने से इतना टाइम डिफरेंस आता है। देखिए हमारे सबके मोबाइल में ये जीपीएस है। अभी ये जीपीएस का अर्थ क्या है कि तीन चार सेटेलाइट एक साथ में आपको आपका ये लोकेशन डेटा भेजते हैं। फिर उसको ट्रायंगुलेट करके पृथ्वी पे एग्जैक्टली आप कहां पे खड़े हैं वह आपका जीपीएस बता देगा। किंतु देखिए कि जीपीएस सेटेलाइट जो है वह ऑर्बिट में गति करता है तो स्पीड कर वो इतना स्पीड से वो जाता है कि थोड़ा सा टाइम डलेशन आकर के खड़ा हो जाता है। एक सेकंड का 100 पार्ट ना कि इतना टाइम डलेशन होता है। उसके लिए टाइम इतना स्लो हो जाता है। अभी यह टाइम डलेशन आप कैलकुलेट नहीं करेंगे और सीधा-सीधी ट्रायंगुलेट करेंगे तो आपकी पोजीशन है पृथ्वी के ऊपर में 1520 मीटर इधर-उधर हो जाएगी जो कि बहुत ज्यादा है। तो ये इक्वेशन के भीतर में ये टाइम डलेशन है कि सेटेलाइट वो ऑर्बिट करता है तो उसके लिए टाइम स्लो हो जाता है। तो यह स्लो टाइम एग्जैक्टली आपको कैलकुलेट करके ये जीपीएस के इक्वेशन में डालना होगा। तब कहीं जाकर के आपको परफेक्ट आपका लोकेशन मिलेगा। यानी ये जो टाइम डलेशन कि जितना स्पीड ज्यादा बढ़ेगा उतना ही टाइम हमारा स्लो होगा। यह तो मैथमेटिकली प्रूव है। अभी हम लोग जो पृथ्वी पर जितनी गति से जाते हैं अपनी बुलेट ट्रेन 1000 700800 कि.मी. पर आवर की स्पीड से जाती है। या तो फाइटर जेट है जो कि मेक थ्री जिसको कहते हैं। मेक मेक अर्थात कि स्पीड ऑफ साउंड। तो मेक वन अर्थात कि स्पीड ऑफ साउंड की गति से। मेक टू अर्थात कि टू टाइम्स द स्पीड ऑफ साउंड। किंतु यह जो टू टाइम, थ्री टाइम, फोर टाइम स्पीड ऑफ साउंड उससे कोई टाइम स्लो नहीं होता। यहां पे स्पीड ऑफ लाइट आपको देखनी पड़ती है। नहीं कि स्पीड ऑफ साउंड। स्पीड ऑफ साउंड ऑलमोस्ट 1000 कि.मी. पर आवर है और लाइट स्पीड है ऑलमोस्ट 3 लाख कि.मी. पर सेकंड। तो उसका सिग्निफिकेंट प्रोपोर्शन आप जाते हैं तो टाइम स्लो होगा। तो देखिए कि यह सब मॉडर्न साइंस है। मॉडर्न साइंस ने आखिर में यह खोज निकाला कि जैसे-जैसे आप भूतकाल में जाते जाएंगे वैसे-वैसे ही जितना मैटर है वो पास और पास में आ रहा है। क्योंकि अभी यूनिवर्स एक्सपैंड हो रहा है। उसका अर्थ वही होगा कि यूनिवर्स कॉन्ट्रैक्ट हो रहा था। कॉन्ट्रैक्ट होते-होते एक पॉइंट आएगा जहां पे कि यूनिवर्स एक छोटे से बिंदु में पूरा कॉन्ट्रैक्ट हो गया होगा। इस बिंदु को यह लोग कहते हैं बिग बैंग। बिग बैंग में से ये यूनिवर्स प्रकट हुआ। तो अभी देखिए कि ये जो टाइम इटसेल्फ जो है टाइम इटसेल्फ इज रिलेटिव और टाइम इटसेल्फ है स्टार्टेड विद द बिग बैंग। बिग बैंग के पहले टाइम था ही नहीं। तो देखिए कि इतना सोफेस्टिकेटेड रीजनिंग हम लोगों ने आज के मॉडर्न साइंस के माध्यम से किया है। तो इतना मॉडर्न साइंस आज जहां पर पहुंचा है तो हजारों साल पहले अपने ऋषि मुनि ऑलरेडी कि टाइम रिलेटिव है और टाइम जो है इस यूनिवर्स के साथ में ही प्रारंभ हुआ है और यूनिवर्स के साथ में ही टाइम का अंत आएगा। यह तो हमने ऑलरेडी खोज निकाला है। और सिर्फ इतना ही नहीं हम तो यह टाइम और स्पेस या तो मैटर और एनर्जी इसके परे जाकर के क्या है वो ब्रह्म जो कि चेतन तत्व सतित आनंद उसको भी हमने खोज निकाला है। यानी कि देखिए कि आज का मॉडर्न साइंस तो अभी 10% तक आया है। जब हम 100% पहुंच गए हैं। आज का मॉडर्न साइंस सिर्फ 10% तक आया है कि हां टाइम रिलेटिव है और फिर टाइम जैसे-जैसे आप भूतकाल में जाएंगे वैसे-वैसे यूनिवर्स कॉन्ट्रैक्ट होता जाता है। टाइम भी जब यूनिवर्स प्रारंभ हुआ है उसी के साथ में टाइम भी प्रारंभ हुआ है। यहां तक वे लोग सिर्फ पहुंचे हैं। किंतु हम लोग इसके बाद में कहते हैं कि यह जैसे कल्प है। यह सृष्टि स्थिति प्रलय सृष्टि स्थिति प्रलय यह साइकिल चलती ही रहेगी। इसका कोई अंत नहीं है। किंतु हमको इससे परे जाकर के इसका जो अधिष्ठात्रा जो देवता है उसको प्राप्त करना है। जो चेतन चेतन तत्व है सबके पीछे में वो ब्रह्मन को प्राप्त करना है। दैट इज वहां तक हम लोग पहुंच गए। तो यहां पर देखिए कि जगत यदि मन के भीतर में ही कल्पित है तो इस कल्पना का आरंभ हमने हम जिसको काल बोलकर के समझते हैं समय बोलकर के जिसको समझते हैं उसके भीतर में नहीं हुआ है। समय भी जगत के साथ में ही प्रारंभ हुआ है। नहीं कि जगत समय के भीतर में है। समय जगत के भीतर में है। जगत समय के भीतर में नहीं है। आमाद खुद मन बहुल धरिया ओ कल्पना देखी ते थाकिया जगत अस्तित्व दृढ़ धारणा करता कोरिया रह छे हम लोगों का सामान्य व्यष्टि मन बहुत समय से इस कल्पना को देखता रहता है देखता रहा आ रहा है कि हां यह जगत है जगत के यह जितने भी नियम है वह सब सही है मेरा संस्कार मेरा संस्कार रूपी जो नियम है वह भी सही सही है माने कर्म का सिद्धांत है वह भी सही है और यह रिलेटिविटी क्वांटम डायनेमिक्स है वह भी सही है बोलकर के जगत सही है यह हमारे मन में दृढ़ धारणा होकर के बैठ गया है एवं और इसीलिए यह जो ठाकुर और मथुर बाबू का वो जो डिस्कशन फेमस डिस्कशन कि मथुर बाबू कहता है कि ईश्वर ने सृष्टि की रचना की है बोलकर के ईश्वर को भी यह सृष्टि की रचना के जितने भी नियम है वह सबको फॉलो करना करना होगा। ठाकुर कहते हैं कि नहीं सृष्टि जो है ईश्वर के भीतर में से प्रकट हुई है या तो फिर ईश्वर की कल्पना के रूप में सृष्टि प्रकट हुई है। पुराणों की वो जो फेमस कल्पना है कि यहां पर भगवान विष्णु है शेष नाग के ऊपर में शैया निद्रागत है। सो रहे हैं और फिर उनकी नाभि में से एक कमल की उत्पत्ति होती है। तो वह कमल जो है वह ब्रह्मा जी उस कमल का प्रो कहां तक जाता है ऊपर में वह खोजने का प्रयास करते हैं वह भी नहीं मिलता और कहां से प्रारंभ हुआ है वह भी उनको बेचारे को नहीं मिलता अर्थात कि सृष्टि भले ही अनादि अनंत जैसी दिखती हो वो तो है तो ईश्वर के भीतर में ही ईश्वर के बाहर में सृष्टि का कोई अस्तित्व नहीं है किंतु हम लोग इस सृष्टि के भीतर में इतने सालों से रह रहे हैं। इतना दृढ़ रूप से रह रहे हैं कि हमको यह समझ में नहीं आता कि सृष्टि के परे भी एक सुपर रियलिटी है। सृष्टि जो है वह स्वप्न समान ही है। सही-सही यदि हमको नींद से जगना है तो वही हमको ईश्वर प्राप्ति या तो ब्रह्म साक्षात्कार करना होगा। एवं जगत रूप कल्पनार अतीत अद्वय ब्रह्म वस्तुर साक्षात दर्शने बहुकाल वंचितो थाकिया जगत जे मनः कल्पित वस्तु मात्र ए कथा एक काले भुलिया गया आपनार भ्रम एकोन धरते पारते छेना बहुत समय से हम लोग हमारा जो क्षुद्र व्यष्टि मन है इस कल्पना को देखकर के जगत के अस्तित्व की दृढ़ धारणा कर बैठा है और साथ में ही जगत रूप कल्पना के अतीत जो अद्वय ब्रह्म वस्तु है उसका साक्षात बहुत साक्षात दर्शन उससे हजारों माने बहुत समय तक वंचित रहकर के जगत जे सिर्फ मनः कल्पित वस्तु मात्र है। यह बात हमेशा के लिए संपूर्ण रूप से भूल गए हैं और हमारा भ्रम अभी ध पकड़ नहीं पा रहे हैं। महाराज की लिखने की स्टाइल किंतु उसका अर्थ बड़ा स्पष्ट है कि ये जो हैबिट होता है ना कि ये हैबचुएटेड हम लोग हो गए हैं। तो हैबिट होने की वजह से कि हम लोग हम हैबिट हो गया है। ये जगत सही है और हैबिट हो गया है कि ब्रह्म साक्षात्कार कभी हुआ ही नहीं है। बोल करके ब्रह्म है बोल करके कुछ हम स्वीकार नहीं करते। हैबिट की वजह से ये अपना ये जो कंडीशनिंग इसको कहते हैं ये कंडीशनिंग की वजह से हम लोग यह जगत के परे कुछ है उस बात को स्वीकार नहीं कर पाते। ये देखिए कंडीशनिंग के बारे में पेवलो बोलकर के एक रशियन साइंटिस्ट था। उसने एक बड़ा इंटरेस्टिंग एक्सपेरिमेंट किया था कि एक कुत्ता है तो कुत्ते को खाना दिया। अभी जितनी बार कुत्ते को खाना देते हैं उतनी ही बार एक घंटी बजाते हैं तो रिंग बजाते हैं तो टिंग करके रिंग लगेगा और साथ में ही कुत्ते को खाना मिलेगा। तो अभी कुत्ते को मन में जो है उसके माइंड में यह कंडीशनिंग हो गया है। एसोसिएशन हो गया है कि घंटी बजेगी साथ में खाना मिलेगा। तो अभी क्या है कि हम खाना खाते हैं तो मुंह में से क्या है कि यह लाल गिरती है। माने यह जो सलाइवा है और सलाइवा अपने मुंह में वो प्रकट होता है। क्यों? सलाइवा जो है खाने उसके भीतर में एंजाइम होते हैं। डाइजेस्टिव एंजाइम। अर्थात कि मुंह में जब सलाइवा प्रकट होगा तो अब जब हम दांतों से चिबाएंगे खाना तो वह ईजीली यह जो सलाइवा रूपी एंजाइम है वो खाने के साथ में मिक्स होगा और ये जब ये अपने ये उसमें जाएगा पेट में तो वह ईजीली डाइजेस्ट हो जाएगा। तो देखिए कि कुत्ता जब खाना खाएगा या तो फिर उसको ये जो उसके सामने यह खाना रखेंगे नेचुरली उसके मुंह में जो है सलाइवा प्रकट होगा। यह मुंह में पानी आ गया। ऐसा हम कहते हैं ना कि अच्छा खाना देखकर के अच्छी मिठाई देखकर के मुंह में पानी आ जाता है। तो कुत्ते के साथ में भी वही होगा कि उसके सामने खाना जैसे रखा उसके मुंह में पानी आ गया। किंतु अभी देखिए कुत्ते के मन में अभी ये एसोसिएशन बिठा दिया गया है कि जैसे घंटी लगेगा वैसे खाना मिलेगा। और वैसे ही कुत्ते के मुंह में जैसा खाना देखेगा पानी आएगा। तो यह सीक्वेंस तो बिठा दिया। घंटी लगा खाना दिया। खाना देखकर के कुत्ते के मुंह में पानी आया। ओके? अभी यह कुत्ते के माइंड में फिट बैठ गया है कि जैसे घंटी लगता है वैसे खाना मिलता है। और जैसे खाना मिलेगा वैसे ही उसके मुंह में पानी आएगा। अभी कुछ समय के बाद में साइंटिस्ट ने क्या किया? पावलो जो था जिसने ये एक्सपेरिमेंट किया है उसने खाने को हटा दिया। सिर्फ घंटी लगाया। अभी घंटी लगाया है, खाना नहीं रखा किंतु ऑटोमेटिक कुत्ते के मुंह से पानी आना शुरू हो गया है। सलाइवा प्रकट होना शुरू हो गया है। क्यों? क्योंकि उसके माइंड में यह लॉ ऑफ एसोसिएशन बैठ गया है कि घंटी लगेगा तो खाना मिलेगा। खाना मिलेगा तो मुंह से पानी आएगा। अभी ये उसके माइंड में फिट बैठ गया है। तो घंटी लगा खाना नहीं भी रखा है। उसके मुंह से पानी आना सलाइवा होना शुरू हो गया। इसको कंडीशनिंग कहते हैं। और यह कंडीशनिंग ये आर्मी ट्रेनिंग वगैरह होती है। उसमें काफी सबको यूज किया जाता है। साइकोलॉजिकल अंडरस्टैंडिंग है हमारी कि अब जैसे देखिए हम लोग किस तरह से कंडीशंड होते हैं। अब जैसे ये आरती का शंख बजता है। तो जैसे ही यह शंख बजता है ना वैसे ही यह पवित्र विचारों से अपना मन भर जाता है। क्यों? क्योंकि हमने सालों सालों से आरती के शंख को हमने आरती के साथ में एसोसिएट करके रखा है। तो जैसे ही आरती का शंख बजा हम लोगों को लग गया कि हां चलो अभी आरती में जाना है। आरती में भगवान के सामने बैठेंगे। पुजारी महाराज जो है वह दिया घुमाएंगे भगवान के साथ में और हम लोग यह जो आरती क्रम है जो हमारा भजन वो गाएंगे और मन को बड़ा ही शांति मिलेगा। भगवान के सामने हम प्रार्थना करेंगे। तो यह आरती के शंख के साथ में यह पूरी इमोशन है वह एसोसिएटेड हो गई है। बोलकर के जैसे ही शंख बजेगा वैसे ही हमारा मन कि हां चलो आरती का टाइम हो गया और उसके साथ में एसोसिएटेड जो बायोकेमिकल प्रोसेस है वो भी स्टार्ट हो जाएगी बहुत बार। अब जैसे कई बार युद्ध है युद्ध में वो जो नगारे क्यों जोर-जोर से बजाते हैं? क्योंकि क्या है कि ये कंडीशनिंग करने के लिए अभी आपको कोई एक लड़का आया है। लड़के को आपको ट्रेनिंग देनी है युद्ध की तो अभी उसको तो आप युद्ध में तो नहीं भेज सकते ना। वो ऐसा युद्ध कहां पे होने वाला है? युद्ध की ट्रेनिंग में। तो क्या है कि यह नगारे बजाते हैं जोर-जोर से ना कि ऐसा कुछ करते हैं। एक कंडीशनिंग खड़ा करते हैं। मैं ये थोड़ा पुराने जमाने की बात कर रहा हूं। आजकल के बैटल फील्ड में नगारे नहीं बजाते। पहले के बैटल फील्ड की बात कर रहा हूं। यह 18th सेंचुरी, 19थ सेंचुरी उस सब की। इवन यह फर्स्ट वर्ल्ड वॉर में भी इस तरह से होता था। बाद में सेकंड वर्ल्ड वॉर में यह मैकेनाइज्ड वॉरफेयर हो गया ना। टैंक और प्लेन आ गए बोलकर के नगारे का वह काम चला गया है। यह किंतु पहले ऐसा होता था कि युद्ध होता है तो जोर-जोर से नगारे बजाते हैं। अभी एक्चुअली इसका पर्पस क्या है कि ये ट्रेनिंग देने के समय ये लोग इस तरह से वो बजाते हैं जिससे कि ये लड़के लोग हैं एकदम वो माने उत्साह में आ जाए और उत्साह वो जो वहां पर ट्रेनिंग के टाइम में खड़ा हुआ है। वही उत्साह आपको यह बैटल फील्ड में खड़ा करना है। किंतु फिर देखिए आजकल क्या होता है? इवन खास करके सेकंड वर्ल्ड वॉर से क्या स्टार्ट हुआ कि यह जो मेथ मेथ वगैरह जो यह ड्रग्स जो है वो ड्रग्स लेना हमने शुरू कर दिया मतलब सोल्जर्स ने तो ड्रग्स के माध्यम से ये लोग अपना जो ये है किलिंग इंस्टिंक्ट है या बारबेरिटी है वो उसको ये करते हैं मैग्नीिफाई करते हैं। तो ये ड्रग्स के माध्यम से आजकल हम लोग सोल्जर्स को सुपर सोल्जर बनाने का ट्राई करते हैं। पहले यह सब लोग साइकोलॉजी यूज करते थे। तो देखिए कि यह बेसिकली है कंडीशनिंग वो चाहे आप ड्रग्स ले ना कि इस तरह से नगारे बजाए ना कि व्हाटएवर आपके माइंड को अब जैसे कि देखिए इवन हमारा जब ध्यान है राइट तो कोई भी चीज को आपको इजी बनानी है कंडीशनिंग करना है तो उसके साथ में ना आपको यह बना देना रूटीन बना देना होगा प्रोसीजर्स बना देनी होगी अब जैसे कि संध्या के समय ही जब ध्यान क्यों करते हैं तो इसका पर्पस यह है कि ऑलरेडी संध्या के ये जो पूरा जगत में जो परिवर्तन होता है ना हमारा माइंड भी कंडीशंड हो गया है कि संध्या हुई है बोलकर के जब ध्यान करना है। अभी मैं रैंडमली जब ध्यान करने को बैठूंगा ना कल मैं दो सुबह को 10:00 बजे काम कर रहा था। आज मैं सुबह को बजे 10:00 बजे मेडिटेशन कर रहा हूं। प्रॉब्लम क्या होगा कि मेरा माइंड जो है अभी एक सप्ताह 10:00 बजे काम करने के बाद में 10:00 बजे मेरे माइंड में एक राजसिक रिएक्शन प्रकट होता है। अभी मैं 11वें दिन को मैं यदि जप करने को बैठूंगा, ध्यान करने को बैठूंगा। किंतु यह जो कंडीशनिंग है कि 10:00 बजे रजस ही खड़ा होता है तो उस रजस को मुझे फाइट करना होगा। बायोरिदम कहते हैं इसको आजकल की लैंग्वेज में। ये बायो बायोलॉजिकल क्लॉक कहते हैं जिसको ये खाना जो है खाना आपको समय पर खाना चाहिए। क्यों नहीं खाएंगे तो क्या होगा? हमने 1 महीने तक दोपहर को 12:00 बजे दोपहर का खाना खाया। अभी क्या है? हमारा जो बायोकेमिस्ट्री है वो जैसे ही 12:00 बजता है तो वो वो ऑटोमेटिकली ये जो डाइजेस्टिव एंजाइम है उसको रिलीज करना शुरू कर देता है। अभी आप 12:00 बजे खाना नहीं खाएंगे तो वो डाइजेस्टिव एंजाइम जो है वो आपके वो लीवर में वो फिर एसिडिटी खड़ा करेंगे क्योंकि उसको फूड नहीं मिल रहा है। वो कुछ ना कुछ तो खाएंगे तो वो लीवर को खा जाएंगे। आपको एसिडिटी हो जाएगा। तो और फिर आपका जो खानेपीने का जो शेड्यूल है खाने का सोने का यह यदि डिस्टर्ब हो जाता है तो बहुत ही ज्यादा फिजिकल प्रॉब्लम्स हमारे साथ में खड़े होते हैं क्योंकि वो हमें हमेशा से हम लोग ये कंडीशन होते आ रहे हैं कि जैसे अंधेरा होता है चलो सोने का समय हो गया। उजाला होता है चलो उठने का समय हो गया। ये दोपहर को 12:00 बजे हैं। शाम को 7 8:00 बजे हैं। चलो खाने का समय हो गया। तो हमारा बायोलॉजिकल रिदमम जो है बायोलॉजिकल क्लॉक जो है वो उसके अनुसार वो बॉडी केमिस्ट्री को एडजस्ट करता रहता है। प्रिएटिवली एडजस्ट करता है। अभी 10:00 बजे हैं 12:00 बजे जैसे नजदीक आ रहे हैं। 11:30 हुआ तो यह एंजाइम रिलीज होना शुरू हो जाएंगे धीरे-धीरे करके। क्योंकि वो हमारा बॉडी प्रेडिक्ट करता है कि अभी आधे घंटे के बाद में इसको खाना मिलने वाला है। तो पहले से ही रेडी हो जाओ। तो क्या है? इसको कंडीशनिंग कहते हैं। बांग्ला में उसको कहते हैं पित्त रखा। अर्थात कि यह जो पित्त जो रिलीज होता है अपने बॉडी में खाना जो टाइम पे खाना चाहिए उसको कहते हैं पित्त रखा। अर्थात कि एग्जैक्ट टाइम के जो अपना बॉडी एंजाइम रिलीज होता है पित्त जिसको कहते हैं। कफ, पित्त और वायु जो आयुर्वेद में है ना तीन एलिमेंट का है हमारे शरीर के स्वास्थ्य के लिए। कफ है, पित्त है, वायु है। तो पित्त है वो जो डाइजेस्टिव एंजाइम जिस तरह से है। तो 12:00 बजे आपको खाना खाना चाहिए। यदि खाना नहीं खाया तो फिर क्या है? आपको फिर प्रॉब्लम होना शुरू होगा। डाइजेस्टिव कुछ प्रॉब्लम शुरू होगा। तो पित्त की रक्षा करनी है। इसको कहते हैं पित्त रखा खाने को। तो अपने ये त्रिगुणातिनंद जी। वो त्रिगुणातिनंद जी वो कहीं पे वे लोग जा रहे हैं भ्रमण में वो दो-तीन हमारे गुरु भाई तो बोले खाने का टाइम हो गया। तो त्रिगुणातिनंद जी ने क्या किया? अभी खाना तो कुछ था नहीं वहां पे। तो दुर्वा घास जो होता है ना दुर्वा कोमल दुर्वा घास तो उस दुर्वा घास को लेकर के खाना शुरू कर दिया तो वो गुरु भाई कहते हैं अरे भाई तुम क्या कर रहे हो तो बोला पित्त रक्षा तो करनी होगी ना अर्थात इस टाइम पे बॉडी में वो एंजाइम तो रिलीज होते हैं अभी मैं यदि कुछ नहीं खाऊंगा तो वो मेरे पेट को खा जाएंगे बेटर है कि मैं घास खा लूं तो ये जो एंजाइम है उसको खाने को कुछ मिल जाएगा तो ये जो है कंडीशनिंग तो यहां पे भी महाराज जी क्या कहना चाहते हैं कि हम लोग हजारों सालों से ये जो अपना ह्यूमन सिविलाइजेशन है, हमारा ह्यूमन माइंड है, वह कंडीशन हो गया है कि जगत को सत्य रूप में देखने के लिए और ब्रह्म साक्षात्कार नहीं किया है। दोनों तरह से जगत को सत्य समझ बैठे हैं और ब्राह्मण है बोलकर के हमको सिर्फ कहानियां ही लगती है। बोल कर के हम लोग इस भ्रम को समझ नहीं पा रहे हैं। कंडीशनिंग बड़ा ही स्ट्रांग हो गया है हमारे ऊपर में। बोल के हम भ्रम नहीं समझ पा रहे हैं। कारण पूर्व ही बोलिया छ अभी इसका कारण पहले ही बता दिया है। यथार्थ वस्तु ओ अवस्थार सहित तुलना कर आमरा बाहरे ओ भीतरे भ्रम धरते सर्वदा सखम होई जो सही-सही वस्तु है या तो फिर अवस्था है उसके साथ में कंपेयर करके ही हम बाहर का और भीतर का भ्रम समझने में सक्षम होते हैं। किंतु यहां पर यही प्रॉब्लम है कि यह सही अवस्था कहां पर है? कहां पर हमको आकर दिखेगी? हमको ना ही इस जगत में यह सही अवस्था तुरीय अवस्था दिख रही है। ना ही बाहर के जगत में दिख रही है ना ही भीतर के जगत में दिख रही है। रेयर केसेस में होगा। यह भगवान बुद्ध का वर्ल्ड फेमस एग्जांपल कि मृत देह देखा, बीमार व्यक्ति को देखा, वृद्ध व्यक्ति को देखा। इमीडिएटली भगवान बुद्ध को लगा कि अरे मेरा जो सौंदर्य है यह जो मेरी युवानी है यह जो मेरी शक्ति है देह में यह जो मेरा धन है वैभव है वह सब क्या एक समय ऐसा आएगा कि सब मिट्टी में मिल जाएगा क्या तो फिर जीवन का सत्य क्या है तो फिर आखिर में उन्होंने इस शमान को देखा तो श्रमण को जैसे ही देखा उसके मुंह पर जो अनंत शांति देखी और भगवान बुद्ध को लगा कि नहीं यही एनलाइटनमेंट ही जीवन का एकमात्र उद्देश्य है। तो देखिए कि स्वामी जी के साथ में सिमिलरली कि देखिए कि ठाकुर ने कहा था कि नरेंद्र यदि यहां पर ना आता तो कोई एक दल का वो लीडर होकर के रह जाता केशवसेन की तरह। किंतु बिकॉज़ कि नरेंद्र को ठाकुर मिल गए। बोल कर के उन्होंने यह नरेंद्र में से स्वामी विवेकानंद में परिणत हुए। तो क्या है कि एक हमको एक आदर्श दिखना चाहिए। नजर के सामने या तो भीतर में से वैराग्य प्रकट हो। जैसे ठाकुर के पिताजी का देहांत हुआ। साथ-साथ में ही लीला प्रसंग में शरद महाराज लिखते हैं कि वह बालक गदाधर उसका जो वर्तन है, बिहेवियर है उसमें बहुत बड़ा डिफरेंस लोगों को दिखाई देने लगा। पहले तो वह बालक मुक्त मन से पूरे कामरार कुकुर में वो विचरण करता घूमता था। इसके साथ में गप लगाएगा। उसके साथ में हंसी मजाक करेगा। उसका मतलब जो नौटंकी वाले जो भंड लोग होते थे अर्थात कि जिन लोगों के आचरण में एक तरह की क्या कहेंगे कि एक ये दिखाई देता था लोगों को ठगने की प्रवृत्ति तो वो जाकर के बालक इतनी मजाक उड़ाता उनकी कि वो बेचारे शर्म के मारे भाग जाते या तो बालक के शरणागत हो जाते तो वह जो गदाधर का जो एक मुक्त जीवन था किंतु जैसे ही पिताजी का देहांत हुआ उसका वर्तन विचार वाणी सब कुछ बदल बदल गया। जैसे कि वह अकेले रहने लगा। फिर यह शशान है। वहां पर जाकर के लंबा समय बिताने लगा। अकेले-अकेले क्या करता है पता नहीं किसी को। तो देखिए कि यह जो परिवर्तन आ गया एकाएक बालक गदाधर के मन में तो एक ट्रिगर होता है। एक ट्रिगर है जो कि इसने यह परिवर्तन लाया है। तो क्या है कि यह ट्रिगर हम सबको मिलना चाहिए। ईश्वर की कृपा से किसी किसी को कोई इस तरह से हो जाता है। सबके जीवन में कोई ना कोई एक ट्रिगर होती है। तो ये एक ट्रिगर कहीं से होनी चाहिए। तो हम लोग जिस प्रवाह में जा रहे हैं, जिस संसार में बह रहे हैं कि हां अभी मुझे पढ़ाई लिखाई करनी है, उसके बाद में अभी मुझे नौकरी करनी है, अभी मुझे शादी करनी है। अभी बच्चे हुए हैं तो बच्चों की संभाल रखनी है। वह बच्चे को स्कूल में भर्ती करना है। बच्चे को स्कूल का टेंशन बच्चे को जितना होता है उससे 10 गुना तो उसके मां-बाप को होता है। फिर वह जो बूढ़े मां-पिताजी हैं उनकी सेवा करनी है। फिर नया घर खरीदना है। घर के लिए लोन जो ली है उसके हफ्ते देने हैं। अभी घर आ गया है तो फ्रिज चाहिए, टीवी चाहिए, गाड़ी चाहिए, स्कूटर चाहिए, गहने चाहिए, उत्सव में इस तरह से सेलिब्रेट करना है। यानी कि क्या है कि यह संसार चक्र में फंस गए तो फंस गए। किंतु कोई कोई भाग्यवान अभी देखिए ट्रिगर तो सबके जीवन में आती है। ऐसा नहीं है कि यह ट्रिगर या तो फिर यह जो एक डिस्कंटिन्यूटी किसी के जीवन में ना आती हो। आती है सबके जीवन में। किंतु भाग्यवान होते हैं जो कि इस ट्रिगर या डिस्कंटिन्यूटी को जैसे पकड़ लेते हैं वैसे ही उनके भीतर में वैराग्य का उदय होता है। ऐसे भाग्यवान कुछ होते हैं। अगेन ठाकुर की वो जो कहानी हमने जिसका आश्रय लेकर के हम समझते हैं कि मछुआरे ने जाल फेंकी है। तीन तरह की जाल है। तीन तरह की मछलियां है। एक मछली है वो कि एक प्रथम टाइप की। उसको समझ में आ गया कि जाल में फंसे हैं। मछुआरा जैसे जाल खींचेगा मर जाएंगे। तो कितना मेहनत करके कैसे भी करके वो जाल में से निकल जाएगी। वो हो गई मुक्त जीव। फिर दूसरे टाइप का है कि मछली उसको समझ में तो आ गया जाल में फंसे हैं। यह भी तो समझ में आ गया कि निकलना है। किंतु उसकी शक्ति है वह कम पड़ जा रही है। वो माने प्रयास तो बहुत करती है। उछल कूद तो बहुत करती है। जाल में से निकल नहीं पाती। तो वह हो गया मुमुक्षु जीव और वह हो गया बद्ध जीव कि उसको पता तो है कि जाल में फंसे हैं मृत्यु है किंतु क्या है कि रेती में अपना मुंह छुपा करके बैठी है। वह सोचेगी मैं यदि मछुआरे के सामने या जाल के सामने ना देखूं तो मैं बच जाऊंगी। किंतु ऐसा तो होते होने वाला नहीं। तो जगत में देखिए कि 70% लोग हैं वो बुद्ध जीव है। 20% है कि जो कि मुमुक्षु होंगे और फिर ये 10% होंगे जो कि मुक्त जीव होंगे। तो इसीलिए महाराज यहां पर लिखते हैं कि यह ब्रह्म वस्तु का साक्षात दर्शन उससे हम बहुत समय तक वंचित रह गए हैं और इस जगत जो मनकल्पित वस्तु मात्र है यह बात संपूर्ण रूप से भूल गए हैं। बोलकर के हम अपना भ्रम समझ नहीं पा रहे हैं। जब तक हम यथार्थ वस्तु और अवस्था के साथ में अपनी तुलना ना करें तब तक यह बाहर और भीतर का भ्रम समझने में हम सक्षम नहीं रहेंगे। इसके बाद का जो है लीला प्रसंग के नेक्स्ट क्लास में ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु घड़ी लखेर एकटा दुटो केटे हसे दाऊ मा हाथ चापड़ी [हंसी] माने लाखों पतंग मां काली उड़ा रही है। उसमें से एक दो को काट देगी और हंसते-हंसते ताली बजाएगी। [हंसी] तो ये ऐसा है। अब जैसे कि मैं स्वप्न देख रहा हूं तो अभी मेरे सप्न में बहुत सारे एलिमेंट है तो लोग भी है। मान लीजिए 101 लोग हैं मेरे सपने में। अभी उसमें से कोई मर जाता है। तो वो तो निकल गया सपने में से। राइट? बाकी तो सपना चलता रहेगा। कोई एक एलिमेंट निकल गया तो बाकी का सपना तो एज इट इज चलता रहेगा। तो इसी को आप विराट मन में ट्रांसफर कर दीजिए कि हम सब लोग विराट मन के भीतर में एक एलिमेंट मात्र है विराट मन के सप्न के भीतर में। अभी हम लोग निकल भी गए तो बाकी का सपना तो एज़ इट इज़ चलता रहेगा। तो लाइक दैट। कल ही आपने उदाहरण दिया था ना कि आपके सपने में आपका मित्र है। अह तो दैट इज़ यूनिक टू यू। आपका मित्र के सपने में क्या आता है? दैट इज समथिंग एल्स। किंतु यदि आपका मित्र आपके सपनों में आता है और यदि वह निकल भी जाता है तो राइट। सो आपके सपनों में मित्र का आना और मित्र का चले जाना दैट आपका सपना एज इट इज बना रहेगा। वो मित्र आया कुछ समय के लिए बाद में चला गया। लाइक दैट। नहीं ये देखिए ना ये तीन मछलियों का उदाहरण। अभी हम अपने को बद्ध मानते हैं तो वो बद्ध मछली है ही है। वो प्रयास ही नहीं करेगी। यदि हम यह सोच के बैठे रहे कि सब कुछ ईश्वर के हाथ में है तो मुझे प्रयास ही नहीं करना। तो अभी अभी जितना वो अगेन वो वो ठाकुर का ही उदाहरण कि गाय को रस्सी से बांध के रखा है तो जितनी रस्सी है उतना तो घास खा ले फिर ऑटोमेटिक वो जो है उसका किसान वो रस्सी को बढ़ा देगा। तो हम वो इतना भी घास यदि नहीं खाएंगे तो किसान क्यों रस्सी को बढ़ाएगा? [हंसी] यदि अब जैसे बद्ध जीव मुमुक्षु जीव और मुक्त जीव फर्क क्या है कि आप एफर्ट कर रहे हैं जितना आप एफर्ट बढ़ाते जाएंगे ना उतना ही आपके पास में शक्ति आती जाएगी इवन आप जिम्नेशियम में जाकर देखिए ना आज आपने वो आधे किलो का वेट उठाना शुरू किया 2 महीने के बाद पता चला आप 1 किलो का वेट उठा सकते हैं उसके 2 महीने के बाद पता चला कि 3 किलो उठा सकते हैं किंतु वो प्रैक्टिस के बिना तो आएगा नहीं ना पहले ही दिन जाके बोला 3 किलो का उठा लेना है तो वो मस्कुलर क्रे रैंप हो जाएंगे तो फिर [हंसी] वो ऑर्थोपेडिक को दिखाना पड़ेगा। तो सुमो होते हैं ना सुमो मैंने एक बार सुमो ट्रेनिंग के बारे में पढ़ा था एक आर्टिकल तो आपको पहले तो आपको खाने खाने का हैबिट बनाना है क्योंकि उसका शरीर तो ऐसा होता है ना आप पहले दिन खाना खाना शुरू कर दें एकदम हैवी हैवी तो क्या है कि आपका वो मतलब कोलेस्ट्रॉल वगैरह बढ़ जाएगा तो पूरा एक रेजीमेंट होता है उसका कि किस तरह से आपको खाना बढ़ाना है उसका पूरा साइंस है कि पहले आपको बटर है ये मीट है इतना खाना है फिर इतना बढ़ाना है फिर इतना बढ़ाना है फिर इतना बढ़ाना है और जैसा आपका वेट बढ़ता होता जाएगा। उसके प्रपोर्शन में आपको बढ़ाना है। कम ज्यादा करेंगे, कम करेंगे तो वेट रिड्यूस हो जाएगा। बढ़ाएंगे तो फिर फिजिकल प्रॉब्लम हो जाएंगे। यानी एग्जैक्ट प्रपोर्शन में आपको बढ़ाना है। तो इट्स अ वेरी इंटरेस्टिंग आर्टिकल कि इतना मोटा सुमो को देखा है ना इतना मोटा होता है। कैसे होता है? इट्स अ प्रॉपर्ली साइंटिफिक ट्रेनिंग। [हंसी] हां। हेल्दी भी होते हैं। राइट? दैट इज अ मेन थिंग ना। वो तो एक की पार्ट है। आप खा के मोटा तो कोई भी हो जाएगा। बट आपको रेसलिंग करना है फिर वहां पे जाकर के। देखिए यदि हम अद्वैतिष्ट हैं और स्पेशली ठाकुर मां स्वामी जी के जो फॉलोअ है आपने एक बिल्कुल ठीक ही बात पकड़ी है और इसीलिए देखिए इस बात का बहुत ही डिटेल डिस्कशन ना शरद महाराज ने द्वितीय जो पार्ट हमने प्रारंभ किया ना उसकी पूर्व भूमिका में ही कर दिया है कि ठाकुर को साधना करने की जरूरत क्यों पड़ी? आप आप जो प्रश्न कर रहे हैं उसी प्रश्न को थोड़ा सा डिफरेंट तरीके से उन्होंने रखा है। ठाकुर यदि पूर्ण ब्रह्म सनातन है तो उनको साधना करने की जरूरत क्यों पड़ी? और साथ-साथ में ही शरद महाराज कहते हैं बहुत सारे डिवोटी यह कहेंगे अब जैसे आपने वैष्णव उसका उदाहरण दिया। भगवान कृष्ण ने साधना की है। वह बात ही वहां पे नहीं आती। जन्म से ही पूर्ण ब्रह्म सनातन है। उस कॉन्शियसनेस के साथ में ही जन्म लिया है। कॉन्शियसनेस के साथ में ही मृत्यु हुआ है। उनकी स्पिरिचुअल लाइफ में इवोल्यूशन नहीं दिखता। क्योंकि इवोल्यूशन का अर्थ है कि आप कमजोर थे फिर सशक्त हुए। विच इज नॉट द केस। वो हमेशा एक ही तरह की उनकी शक्ति थी। जबकि अपने यहां पे कि उनको साधना करनी पड़ी है। क्यों? क्योंकि यह चेतन और जड़ दोनों का समन्वय उनके भीतर में है। बोलकर के ही मनुष्य लक्षण भी है और दैवी लक्षण भी है। दोनों को मिलकर के अवतार बने हैं। तो मनुष्य की जो लिमिटेशन है तमस और रजस वो भी उनके भीतर में है। और जो ईश्वरीय जो गुणावली है जो कि प्योर सत्व है वह भी उनके भीतर में है। बोलकर के उनको साधना करनी पड़ी है। और शरद महाराज इस बात को स्पेसिफिकली डिस्कस करते हैं कि क्या साधना इसलिए करनी पड़ी है कि लोक शिक्षा के लिए कि मैं थोड़ी साधना करूंगा तो दूसरे लोग करेंगे। किंतु ये दिखाने वाली बात नहीं है। ना ठाकुर के जीवन में स्पष्ट रूप से देखिए ठाकुर दिखावे के लिए कुछ नहीं करते थे। जो कुछ करते थे जेनुइन करते थे। यानी कि लोक शिक्षा के लिए साधना की है। वह भी वहां पर नहीं आता। बात स्पष्ट है कि उनके भीतर में भी रजस और तमस का एक अंश था जिसको कि साधना करके उन्होंने समाप्त किया और इससे हम लोग सीखे कि हमारे भीतर में सत्व का एक अंश है। उनके भीतर में था कि रजस और तमस का एक अंश था। बाकी पूरा सत्व था। हमारे रिवर्स है कि पूरा रजस और तमस है। सत्व का एक अंश है। तो हम भी साधना करके रजस और तमस को मिटा सकते हैं। वो दैट क्लियर वो उनके जीवन से मिलता है। तो वो एक बात है कि क्यों ठाकुर को साधना करने की जरूरत पड़ी थी। तो इस प्रकार का प्रश्न ऑलरेडी शरद महाराज ने डिस्कस किया है कि भक्तों की भक्ति को यह बात पढ़कर के हानि हो सकती है। दूसरा कि मैं जो आपके स्पेसिफिक क्वेश्चन पर आऊंगा कि ठाकुर भी एक भ्रम का भाग है तो फिर ठाकुर की पूजा करना यह भी तो भ्रम या तो स्वप्न ही है। यह भी तो मिथ्या है। तो इसको क्यों दोहराते रहे? तो यहां पर क्या है पता है? हम लोग जो अद्वैती है हमको ना अपनी दृष्टि को थोड़ा सा विशाल करना होगा। ठाकुर सिर्फ यह स्वप्न के पार्ट नहीं है। ठाकुर स्वप्न के परे जो ब्रह्म तत्व है। ब्रह्म तत्व के साथ में ठाकुर का डायरेक्ट रिलेशन था। यह कैसा हो गया पता है? देखिए ये जो तीन मछलियों वाली कहानी है ना उस उसका मैं यदि उदाहरण देता हूं। मुक्त जीव मुक्त जीव अर्थात कि जिसने मेहनत करके जाल में से निकल गया। ठीक है? यह हो गया कि नेति नेति वाली साधना। मेहनत करके आपको सिद्धि प्राप्त करनी है। किंतु ठाकुर क्या है पता है? ये सिद्धि प्राप्त करने के बाद में इति इति बोलकर के जगत में वापस आते हैं। इस अर्थ में कि यह मुक्त मछली जो है जाल में से एक बार निकली तो है। किंतु फिर वो मुक्ति का पावर लेकर के जाल में वापस आती है। अभी जब जाल में वापस आती है उसके पास में इस तरह की शक्ति है कि जाल अभी उसको बांध नहीं पाएगी। अपनी इच्छा के अनुसार जाल में से निकलेगी। जाल में से वापस आएगी। वो वापस क्यों आई? क्योंकि ये जो बद्ध मछलियां हैं जो पहले तो मुमुक्षु मछलियां है उसको थोड़ा सा ये करने के लिए चीयर चीयर लीडिंग का काम करने के लिए उनको शक्ति देने के लिए और जो बद्ध मछलियां है उनको जागृत करने के लिए तो ठाकुर क्या है रिटर्न आई हुई मछली है कि वो जगत में वापस आए हैं ब्रह्म शक्ति को लेकर के और इसलिए उनकी आराधना करना आवश्यक है। ये ये जो शरद महाराज पूछते हैं ना उनको किनको त्रिगुणाती जी किनको कहते हैं कि ये नरेंद्र जो है ना इतना कंफ्यूजन खड़ा करता है आज ये बोलता है कल वो बोलता है परसों और भी कुछ बोलता है समझ में नहीं आता क्या करें क्या ना करें तो वो महाराज क्या गुरु भाई उनको उपदेश है तुम मां के शरण में जाओ मां के शरण में सब ठीक हो जाएगा [हंसी] योगेन महाराज तो वैसे ही अब ये ये जो हो गया एक सप्ताह फिर उसके बाद में वो मां की कहानियां स्टार्ट हो गई सब ठीक हो जाएगा [हंसी] यहां पे जितना कंफ्यूजन खड़ा हुआ है वहां पे सब ठीक हो जाएगा। [हंसी] मैं भी तो अपने घर में था ना [हंसी] जो नजरों से देखा है वही बता रहा हूं। मेरे मां मेरे पिताजी को मेरे से ज्यादा टेंशन मेरी कैरियर का मैं है ना वो एयरक्राफ्ट कैरियर होता है ना अमेरिका के पास में बहुत सारे एयरक्राफ्ट कैरियर है तो एक मैं वीडियो देख रहा था तो एयरक्राफ्ट कैरियर पे आपको लैंड करना है एयरक्राफ्ट को फाइटर प्लेन को तो एक्चुअली प्रॉब्लम क्या है उसका जो रनवे है बहुत छोटा है माने जमीन पे तो लंबा रनवे मिलेगा वो जो जहाज तो पानी में चल रहा है लिमिटेड है तो वहां पे ना एक एक कॉर्ड बांध देते हैं रस्सी बांध देते हैं और जब ये एयरक्राफ्ट लैंड होना है ना तो उसमें से एक हुक निकलता है। जैसे उसका यह जो लैंडिंग गियर यानी व्हील जैसे जब वह फ्लाइट होता है तो व्हील कैसे भीतर में चले जाते हैं। जब लैंडिंग करना है तो कैसे व्हील बाहर आ जाते हैं। तो व्हील के साथ में एक हुक आता है। अभी जैसे यह लैंड करना है ना तो हुक क्या करेगा कि वो जो रस्सी बांधी है उसको पकड़ेगा। अब जैसे ही रस्सी को पकड़ेगा तो वैसे ही अभी एयरक्राफ्ट जैसे फट करके जो दौड़ रहा था और यदि हुक को नहीं पकड़ा तो क्या गिर जाएगा पानी में। तो उस हुक को जैसे ही पकड़ा रस्सी ने ऐसा करके हुक को पकड़ा एयरक्राफ्ट कैरियर रुक गया हमने प्लेन रुक गया तो यानी छोटे से रनवे में वो लैंड कर पाएगा। अभी क्या है? पायलट को ट्रेनिंग दी जाती है कि आप जितनी भी बार लैंडिंग करें ना तो आपको यह हुक जो है ना रस्सी में भराना है। यदि नहीं भरा ना तो आपको सीधा प्लेन उड़ा देना है। क्योंकि यदि प्लेन नहीं उड़ाएंगे जो लैंड करना शुरू किया ना तो पानी में गिरेंगे। तो यह ट्रेनिंग वीडियो मैं देख रहा हूं। नया पायलट ट्रेनिंग कर रहा है। वो आता है वो एयरक्राफ्ट कैरियर पे हुक निकालता है और रस्सी में भराने का प्रयास करता है। फर्स्ट ट्राई में नहीं होगा। तो वैसे ही वो फट करके उड़ना शुरू कर देगा। फिर वापस आएगा। फिर से वो हुक जो है रस्सी में भराने का प्रयास करता है। फिर से नहीं हुआ तो फिर से उड़ जाएगा। आखिर में वो हुक भर गया तो एयरक्राफ्ट वहां पे रुक गया। दैट मींस कि आपका लैंडिंग सक्सेसफुल है। तो क्या है कि यह हुक रस्सी में भराना दैट इज़ दैट आपका एक स्किल है। वह जितने भी फाइटर पायलट है एयरक्राफ्ट करियर में सबको सीखना है। तो अभी क्या है ना देखिए हमारा भी ऐसा फाइटर प्लेन की तरह है कि यह जो जगत है ना बीच-बीच में यह ओकेजन हमारे सामने फेंकता रहता है जो कि त्याग और वैराग्य इंड्यूस करते हैं। हमको इस ओकेजन को सहज कर लेना है। यदि हम नहीं पकड़ पाएंगे ना इस ओकेजन को तो हमारा फ्लाइट चलता ही रहेगा माया के जगत में चलता ही रहेगा हम कभी यह ब्रह्म रूपी रनवे पे लैंड ही नहीं कर पाएंगे तो अभी ऐसा नहीं है कि यह ओकेजन आते नहीं है सबके जीवन में आते हैं किंतु ये स्किल डेवलप करना कि ऐसा कुछ डिस्कंटिन्यूटी हुआ तो पकड़ लो फिर इस डिस्कंटिन्यूटी को पकड़ करके फिर उसका बेनिफिट उठा लो दैट इज अ रियल स्किल यदि ये सब बेनिफिट नहीं उठाया रस्सी का हुक भी है, रस्सी भी है। किंतु हुक रस्सी में भीतर में हुक लगाने की स्किल हमने नहीं डेवलप की। तो यह माया के जगत में उड़ते ही रहेंगे, उड़ते ही रहेंगे। अब अब किसी का भी जीवन देख लीजिए। सबके जीवन में ये ओकेजन आते हैं कि एकाएक हमको लगेगा अरे यह क्या हो रहा है? ये क्या हो रहा है? किंतु जो ज्यादातर लोग फिर क्या है ना वो बोलेंगे चलो आज रेस्टोरेंट में जाकर खाना खा लेते हैं। ये सब माया को यहीं पर खत्म कर देते हैं। माने इतने भोग लगाते हैं तो भोग लगा के यह सब जो वैराग्य वाले विचारों को उड़ा देते हैं। माने आप थर्ड पार्टी के डेथ या तो इवन अपने खुद के घर के डेथ की बात कर रहे हैं। ठाकुर तो वो जिसका डेथ हो रहा है उसी का एग्जांपल देते हैं। मृत्यु शैया पे बैठा है और अपने लड़के को कहता है अरे ये दिए की वाट थोड़ी कम करो ज्यादा तेल जल रहा है। [हंसी] उस अवस्था में उसको अकल नहीं आती। क्या बोलेंगे अभी बद्ध जीव का इससे बड़ा उदाहरण क्या हो सकता है? [हंसी] ठाकुर ने उसको मौका दिया। राइट? कि आप मृत्यु शैया पे बैठे हैं तो एटलीस्ट अभी तो थोड़ा ईश्वर चिंतन कर लो। तो वो भी नहीं कर पाता है। मैं जब छोटा था ना मुझे एक मेमोरी मेरी बड़ी स्पष्ट मेमोरी है। सेवंथ ए्थ स्टैंडर्ड में पढ़ता था तो एकदम नजर के सामने बोर्ड की एग्जाम है। 10थ बोर्ड की एग्जाम और इतना हमको डरा दिया गया था। अरे बोर्ड की एग्जाम में अच्छे मार्क आने चाहिए। वरना लाइफ खत्म वगैरा वगैरह। तो मैं हमेशा सोचता रहता था। अरे यार एक बार बोर्ड की एग्जाम निकाल दे फिर तो राजा है। फिर तो आनंद करेंगे। [हंसी] बोर्ड की एग्जाम निकालने के बाद पता चल रहा है। अभी तो प्रॉब्लम स्टार्ट हुए है। [हंसी] ये मैं अभी पिछले सप्ताह ये इसके बारे में सोच रहा था मैं। ना एक्चुअली ये जो है ना अपना आरती है। सत्संग है। यह स्वाध्याय है। यह भक्तों के बीच में आपस में गप लगाना है। मंदिर में जाना, आश्रम में जाना, उत्सव मनाना। दीज़ आर द ऑल द पार्ट ऑफ रिकंडीशन। क्योंकि देखिए फटाक करके तो होने वाला नहीं है। इट्स गोइंग टू टेक अ टाइम। अब जैसे पावलो वाला एक्सपेरिमेंट है कि वैसे उसने कितने दिनों तक घंटी बजाया और कुत्ते को कंडीशन किया। तो अभी ना उसको रिवर्स कंडीशनिंग करने के लिए उतने ही दिन लगेंगे कि अभी घंटी बजने के साथ में नहीं मिलने वाला है खाना। तो अभी और तीन-चार महीना बिताओ घंटी बजाए। खाना नहीं मिला तो कुत्ते के मुंह से वो लाल निकलना बंद हो जाएगा। वो अभी उसको लग रहा है कि अरे डिसपॉइंटमेंट है। झटमुट का घंटी बजा रहा है। सो हमको भी इट विल टेक टाइम। सो यह जो हमारा चल रहा है आश्रम में आना, आरती अटेंड करना, सत्संग अटेंड करना। दिस आर ऑल पार्ट ऑफ रिकंडीशनिंग और अनकंडीशनिंग व्हाई विल वी रिकंडीशन आवरसेल्फ। दिस इज़ अ अनकंडीशनिंग प्रोसेस डी हिप्नोटाइज [हंसी] ठाकुर की ठाकुर की एग्जजेक्टली यही कहानी है। एक लड़का सबको डरा रहा है। अब जो डर गया सो डर गया। अब जो नहीं जिसको पता चल गया अरे तुम ही तो सही हो रहे हैं। तो हरे वही मास्क हटा करके वो हंसता हंसता चला जाता था। एग्जजेक्टली ठाकुर की कहानी देखिए एक्चुअली हमारे सबके साथ में ऐसा ही है ना हम लोग जब बहुत ज्यादा भोग करने को जाते हैं साथ में रोग आ ही जाएगा भोग अनडाइल्यूटेड 100% प्योर भोग कभी होने ही नहीं वाला है तो हमको भी भोग करते-करते डंडा पड़ता है किंतु हमारी अकल फिर भी नहीं खुलती है फिर भी हम बार-बार भोग करने को जाते हैं ठाकुर का वो जो फेमस उदाहरण कि वो ऊंट जो है वो कैमल वो कांटे वाला वो ये खाता है वो पौध यह पौधा खाता है। उसके मुंह से वो रक्त निकल रहा है। किंतु फिर भी वह पौधा खाने का आनंद है ना उसको वह छोड़ ही नहीं पाता। यानी डंडा पड़ने से भी हमारा वो भोग खत्म नहीं होता। हमारा प्रॉब्लम यहां पे आता है। देखिए इसका एग्जांपल पूजा में है। पूजा एकजेक्टली इज अ साइंस ऑफ लॉ ऑफ एसोसिएशन। माने पूजा का एक साइंस है। किंतु उसको थोड़ा ग्रॉस लेवल पर देखें। आप अगरबत्ती जलाते हैं। आप पुष्प अर्पण करते हैं। आप चंदन घिसते हैं। यह सब क्रियाएं हैं ना। अब अगरबत्ती की खुशबू जैसे ही आती है, वैसे ही मन शांत हो जाएगा। जैसे ही वह चंदन की खुशबू आती है, वैसे ही मन शांत हो जाएगा। फूल की खुशबू जैसे आती है, वैसे ही मन। क्यों? क्योंकि हम लोग पूजा में ये सब का इस्तेमाल करते हैं। चंदन है, पुष्प है, अगरबत्ती है। तो दीज़ आर ऑल लॉ ऑफ़ एसोसिएशन। अब बहुत सारे साधु मैं भी अपने कमरे में अगरबत्ती जलाऊंगा। तो वि अभी ये हम लोग कॉन्शियसली नहीं सोचते कि अगरबत्ती जलाने से वह पूजा करने वाला आनंद आएगा। किंतु वह होता है। सो दी आर ऑल लॉ ऑफ एसोसिएशन। अपनी जितनी भी इंद्रियं है वह सबको लगा देना है काम में। आंखों से आपको यह सब यह जो पूज्य वस्तुएं हैं जब ध्यान करने के पहले या तो पूजा करने के पहले या आरती से आरती के समय अब बहुत सारे साधु अब मैं मैं भी आरती जब चलती है तो मैं एकदम ध्यान से देखता हूं। पुजारी महाराज वो एक के बाद एक पंच प्रदीप एक प्रदीप वो आरती करते हैं तो अपनी आंख एसोसिएट करती है। कानों से आरती की आवाज आती है। नाक से ये उसकी जो चंदन की वगैरह की खुशबू आती है। मुंह से वाणी से हम आरती गाते हैं। तो दिस अपनी इंद्रियों को हम एसोसिएट करते हैं। तो क्या है कि इसके साथ में अपना मन जो शांत होता है। अभी आप कमरे में आइए। ट्राई टू डू द सेम थिंग। अगरबत्ती जलाइए कुछ पुष्प रख दीजिए। वो कुछ पाठ कीजिए बोल के पाठ कीजिए रेदर देन कि सोच करके सो ट्राई टू सिमुलेट द सेम कंडीशन वो फ्लाइट सिमुलेटर आता है ना वो एयरक्राफ्ट बड़ा महंगा होता है तो उसमें बिठाने की बजाय वो फ्लाइट सिमुलेटर में वो प्रैक्टिस करवाते हैं जो एक्सीडेंट हो भी गया तो डैमेज नहीं होगा [हंसी] तो ऐसे फ्लाइट सिमुलेटर अपने कमरे में खड़ा कर लॉ ऑफ़ एसोसिएशन विल करेस्पोंडिंगली ब्रिंग दैट पीस ऑफ़ माइंड इन आवर हार्ट ना इसीलिए बहुत जो पुराने मंदिर होते हैं ना एक ही तरह का प्रसाद वो आप जैसे तिरुपति में जाएंगे वही प्रसाद बेलूर मठ में जाएंगे बताशा प्रसाद या खिचड़ी प्रसाद वो एक ही प्रसाद देंगे क्यों क्योंकि फिर अभी यहां पे पायस प्रसाद है अभी मिठाइयां तो हजार टाइप की है बंगाली अपना संघ है बंगाल में तो हजार लाख मिठाइयां है ऐसा क्यों नहीं करते डायवर्सिटी एक दिन रसगुल्ला है दूसरे दिन यह गुलाब जामुन है तीसरे दिन मोहन थाल है ऐसा क्यों नहीं करते हैं अपने पास में मेन पावर है यह सब करने का किंतु फिर भी पायस तो पायस खीर तो खीर वही एक देना है क्यों यह सब एसोसिएशन हो जाता है। अभी आप रसगुल्ला खाने से वह पवित्र भावना नहीं आएगी। मिठाई खा रहे हैं ऐसा लगेगा। किंतु पायस जैसे खाएंगे वह पवित्र भावना आ जाएगी। मैं जब छोटा था ना तो मेरे घर के बगल में वो वैष्णव एक फैमिली रहता था। तो गुजरात में पता है वैष्णव लोगों का एक वो मीठी एक पूरी बनाते हैं। उसके ऊपर में वो शुगर का एक लेयर रहता है। मैं भूल गया उसका नाम एग्जैक्टली। तो वो वैष्णव लोगों का खास करके गुजरात में वो स्टैंडर्ड वो एक प्रसाद के रूप में वो बांटते हैं। मंदिर में ऑफर करते हैं। तो बिकॉज़ कि वे लोग पड़ोसी थे और वो मैं जब भी जाता था ना वो ये मुट्ठी वो पूरी खिलाते थे। सो दैट इज मेरे मन के भीतर में वैष्णवज्म के साथ में इसका जो इतना स्ट्रांग कनेक्शन बैठा हुआ है। बहुत सालों के बाद में राजकोट में पोस्टिंग हुआ था वो किसी ने लाकर के वही पूरी दिया। जैसे ही खाया ना मेरी चाइल्डहुड मेमोरी सब जैसे कि वापस आ गई कि मैं उनके घर जाता था मैं भूल गया था कंप्लीटली कंप्लीट भूल गया था पूरा वो उनके घर जाता था वगैरह वगैरह वो खाने के साथ में सब याद आ गया जैसे [हंसी] ना वही होगा वही होगा श्रीनाथ जी हां वो लोग श्रीनाथ जी वाले ही थे आई थिंक ओम