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Sri Ramakrishna Lila Prasanga ·

साधक भाव : Ch. 1 साधक और साधना || श्रीरामकृष्ण लीलाप्रसंग : स्वामी सारदानन्द रचित || 5 may 2026

मङ्गलाचरण

ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः श्री श्री रामकृष्ण लीला प्रसंग ठाकुर की प्रमाणिक जीवनी स्वामी शारदानंद जी महाराज द्वारा रचित इसका द्वितीय भाग साधक क भाव इसका प्रथम चैप्टर साधक और साधना इसका हम पाठ कर रहे थे। इति

ईश्वरीय रूप में तन्मयता से जगत-विस्मृति और निर्विकल्प समाधि

इति पथ से निर्विकल्प समाधि लाभ का विवरण यह हमारा पॉइंट चल रहा था। शरद महाराज कहते हैं कि रूप के ध्यान में तन्मय होकर के किस तरह से जगत का अस्तित्व भूल करके निर्विकल्प समाधि अवस्था में पहुंच सकते हैं। तो जगत का अस्तित्व भूल जाना है और रूप के ध्यान में तन्मय होना है। निर्विकल्प समाधि तक पहुंचने के वैसे यह दो तरीके हैं। तो एक तो हमको पता ही है कि ज्ञान मार्ग से भी हम निर्विकल्प समाधि तक पहुंच सकते हैं और भक्ति मार्ग से भी पहुंच सकते हैं। यह इति इति पथ अर्थात कि भक्ति पथ है। तो भक्ति पथ से ज्ञान मार्ग की जो सर्वोच्च उपलब्धि है वो कैसे प्राप्त करें? एक तरह का क्रॉस वायर यहां पे हो रहा है। तो क्या है कि देखिए यह सब जो साधन पद्धतियां है, फिलॉसोफीज है यह कोई वाटर टाइट कंपार्टमेंट नहीं है। भले ही चाहे एक समय था कि आप कहेंगे कि मैं विशिष्ट अद्वैत का फॉलोअ हूं तो मैं सिर्फ इसी को फॉलो कर सकता हूं। इसको मैं कंटैमिनेट नहीं कर सकता और किसी फिलॉसोफी को एलिमेंट्स ऑफ दूसरी फिलॉसोफी के एलिमेंट्स ला के मैं अपनी प्यूरिटी को कंटैमिनेट नहीं कर सकता। जैसे कि अभी ये योग है। ओरिजिनली आप देखेंगे कि शंकराचार्य जिस तरह से भाष्य की रचना करते हैं। स्मरण मनन निध्यासन से ही अहम ब्रह्मास्मि जीव ब्रह्म ऐक्य यह अनुभूति होनी है। यह निर्विकल्प समाधि का कांसेप्ट जो कि योग शास्त्र में से वह बाद में ले आया गया है अद्वैत वेदांत के भीतर में। तो यहां पर देखिए कि धीरे-धीरे करके भारत में दोनों चीज हुई है। कोई एक संत महापुरुष दार्शनिक आते हैं। कोई एक वाद की रचना करते हैं। कोई एक फिलॉसोफी साधन पद्धति को फॉर्मुलेट करते हैं। उसका प्रचार करते हैं। और फिर धीरे-धीरे करके समय जैसे बीतता है। यह जो एल उनकी जो फिलॉसोफी है, उनका जो वाद है, दर्शन है या साधन पद्धति है, वो दूसरी साधन पद्धतियों के साथ में एक रस होती जाती है। यह आप यूरोप को देखेंगे या तो फिर इवन मिडिल ईस्ट को भी देखेंगे तो जितनी भी उनकी यह स्कूल्स ऑफ फिलॉसोफीज है क्रिश्चियनिटी के भीतर में जितना भी यह डायवर्सिटी है जितना भी एक वैविध्य लाने का प्रयास किया गया उसमें हुआ क्या कि जो लोग अभी एक उसका एक कहे एक स्कूल प्रोटेस्टेंट है कैथोलिक है ऑर्थोडॉक्स है ये तो तीन मेजर है। इसके भीतर में भी बहुत सारे सब डिवीजन है। तो ये सब डिवीजन आपस में वे लोग सॉल्यूशन लाते हैं। अपने डिफरेंसेस का सॉल्यूशन लाते हैं। फाइट करके झगड़ा करके एक दूसरों की हत्या करके युद्ध करके। हमारे यहां पे है जैसे ये डायवर्सिटी ऑफ व्यू पॉइंट डायवर्सिटी ऑफ साधना वैविध्य दर्शन शास्त्र का जितना ही बढ़ता है उसको हम फिलॉसोफिकली और प्रैक्टिकली योग मार्ग के माध्यम से इसको सिंथेसाइज करते हैं हार्मोनाइज करते हैं। इसीलिए देखिए भले ही चाहे कभी-कभी आपको कहीं पर देखने को मिले कट्टर वैष्णव है, कट्टर शैव है, कट्टर शाक्त है किंतु वे लोग आपस में एक दूसरे की हत्या नहीं करेंगे। एक दूसरों का पर्सक्यूशन नहीं करेंगे। यह विच हंटिंग जिसको कहते हैं वो भारत में नहीं होगा। जो कुछ भी है डिबेट के लेवल पे है। हाथ उठाना या तो फिर ये राज्य शक्ति का उपयोग करके एक राजा को पटा करके अपने पॉकेट में रख लेना। फिर उसको कहना कि विरोधी मत वाले जितने भी है सबको उठा के कारागार में डाल दो। सबको फांसी पर चढ़ा दो। ये जिंदा जला दो। यह सब यदि हुआ भी होगा। 10,000 साल का इतिहास है। 10 तरह के लोग हजार तरह के लोग हमारे यहां पे आए हैं। यदि हुआ भी है तो बहुत ही स्मॉल स्केल पे हुआ है। लार्ज स्केल पे नहीं हुआ। तो यह जो है यहां पे रामकृष्ण भावधारा में यह तो स्पष्ट है। भक्ति मार्ग हो ना कि यह योग मार्ग हो ना कि यह ज्ञान मार्ग हो। आपको यह सभी रास्ते अल्टीमेटली एक ही अंतिम लक्ष्य की ओर ले जाते हैं। तो यहां पर भी रूप के ध्यान में तन्मय होकर के जगत को विस्मृत करके हम किस तरह से निर्विकल्प अवस्था में स्थित हो पाए। तो इसमें किस तरह से यह लॉजिक शरद महाराज हमको देते हैं। सर्वप्रथम तो भक्त अपने इष्ट का चिंतन करता है। उनको प्रार्थना करता है। उनको शरणागत होता है। उनको अपने हृदय में स्थापित करके उनका ध्यान करता है। फिर जैसे-जैसे ध्यान गंभीर से गंभीरतम होता जाता है। इष्ट भक्त देखेगा कि अपने इष्ट जो है पूर्ण रूप से उसके हृदय में विराजमान है। यह इष्ट ही जैसे कि उसको माने सत्य प्रतीत होंगे। जगत धीरे-धीरे करके मिथ्या प्रतीत होगा। एक बार अपने इष्ट के ऊपर में अपनी पूरी प्राण शक्ति आन पड़ी। इसके बाद में जैसे कि ठाकुर का उदाहरण है कि एक ज्ञान रूपी खड़ग से इष्ट के दो टुकड़े कर दिए और फिर उसमें से ही निर्विकल्प अनुभूति हमारे मन और प्राण को छा जाएगी। हमारे मन और प्राण पे छा जाएगी। और माने मन और प्राण ये देह पंच ज्ञानेंद्रिय कर्मेंद्रिय ये कहां लुप्त हो जाएंगे वो ब्रह्म भाव में वो समझ में ही नहीं आएगा। तो यह एक लॉजिक पूरा हमको शरद महाराज कहते हैं। और इस लॉजिक के अंत में क्या कहते हैं? मैं थोड़ा सा पढ़ता हूं। जहां से पढ़ना बाकी है वहां से मैं एक सेंटेंस पढ़ता हूं। क्या कहते हैं शरद

इष्ट एक, रूप अनेक— भक्त-साधक के दिव्य दर्शन

महाराज? परे आार इष्टोई इच्छा में तो नाना रूप धारण करिया छे ए विश्वास फले भक्तों साधक आपन इष्ट मूर्ति होते नाना रूप दिव्य रूप सकलेर संदर्शन लाभ करेन एक बार मैंने अपने इष्ट को जीवंत दर्शन कर लिया इसके बाद में मेरे इष्ट ही अपनी इच्छा के अनुसार विविध रूप धारण किए है। मेरे इष्ट ने ही इच्छा के अनुसार विविध रूप धारण किए हैं। यह विश्वास के परिणाम से भक्त साधक अपनी इष्ट मूर्ति में से विविध दिव्य रूप सभी का दिव्य रूप समग्र का संदर्शन लाभ करता है। संदर्शन लाभ करता है। अर्थात क्या कि एक अभी देखिए एकम सत विप्रा बहुधा वदंती राइट सत्य तो एक ही है वैविध्य जो है यह सत्य के भीतर में से ही विभिन्न रूप से प्रकट हुआ है वो जो एक साधक आया था दक्षिणेश्वर में अपने हाथ में कैलडोस्कोप जैसा रख के घूमता था झाड़ झाड़ेर कॉलम बांग्ला वर्ड है मेरे मुझे लग रहा है उसका ट्रांसलेशन कैलडोस्कोप ही होगा तो उसमें क्या होता है। आप अपनी नजर के सामने उसको रख करके देखेंगे तो आपको बहुत सारे कलर दिखाई देंगे। प्रिज्म या ऐसा कुछ तो ये प्रिज्म या कैलडोस्कोप या झाड़ेर कॉलम तो क्या है कि अपनी वैसे तो हमको ये जिस तरह से दिखता है उसको सामने रखेंगे बहुत सारे कलर दिखाई देंगे। तो क्या है कि वह आरोप करता है अपने ऊपर में कि एक ही सत्य है। यह वैविध्य जो है यह बीच में एक आवरण आया है। इस आवरण की वजह से मुझे यह वैविध्य दिख रहा है। तो यह आवरण क्या है? अविद्या या तो अज्ञान या तो फिर माया। या तो फिर कहेंगे पिछले जन्मों के संस्कार। जिस तरह से भी आप इसको डिफाइन करना चाहे। यह एक आवरण हमारी नजर के सामने है। बोलकर के जो एक सत्य है ब्रह्मण सतित आनंद वो इस पूरे वैश्विक वैविध्य में परिणत हुआ है। तो किंतु जब हम एक दिव्यता की ओर जाना शुरू करेंगे। ये समिट एसेंड करना शुरू करेंगे। जमीन पर खड़े हैं तो यह आसपास के जितने मकान है इतना ही मुझे दिखाई देता है। किंतु अब जैसे हमारे आश्रम के सामने ही समुंदर है, महासागर है तो हमारी लाइब्रेरी की छत के ऊपर में मैं कभी-कभी शाम को वॉकिंग करता हूं। तो अभी मैं जब आश्रम में हूं, मेरी नजर ज्यादा से ज्यादा कहां जाएगी? ये आश्रम की दीवार है। बाउंड्री वॉल है। वहां तक थोड़ा सा इधर देखूंगा तो मंदिर दिखेगा। थोड़ा सा इधर देखूंगा तो फिर यह ऑफिस दिखेगा। ज्यादा से ज्यादा मैं 50 फुट 10 मीटर, 20 मीटर, 30 मीटर इतना ही तो दूर देख पाऊंगा। किंतु जब मैं यह लाइब्रेरी की छत पर वॉकिंग करता हूं तो मुझे क्षितिज्य दिखाई देती है। होराइजन दिखाई देती है। ऊपर में देखूंगा तो खुला आसमान दिखाई देता है। आजकल शहर में रहकर के खुला आसमान देखना मुश्किल है। चारों ओर बड़े-बड़े बिल्डिंग है। किंतु बिकॉज़ की नजर के सामने सीधा समुंदर है। आप ऊपर देखेंगे तो खुला नील आकाश और नीचे देखेंगे तो खुला नील समुंदर। अनंत समुंदर और जहां पर यह आकाश और समुंदर इकट्ठा होते हैं वहां पर आपको दिखाई देता है होराइजोन क्षितिज तो क्षितज तक आपकी नजर जाती है तो जैसे-जैसे हम यह समिट एसेंट होना शुरू करते हैं आध्यात्मिक जीवन की अपनी नजर यह जो एक आश्रम रूपी यहां जो मैं रहता हूं आश्रम को देखता हूं इस आश्रम रूपी दायरे में मेरी नजर बंद है और फिर मैं जब समुंदर का दर्शन करता हूं तो क्षितिज तक मेरी नजर जाती है तो क्या है कि मुझे पूरा एक विराट वैविध्य दिव्यता का दिखाई देता है। तो पहले तो हमको यह जड़ पदार्थ रूपी वैविध्य दिखता है। उसके बाद में जैसे-जैसे दिव्यता की ओर जाएंगे तो फिर यह दिव्य रूप जो एक दिव्य रूप जिनका मैं ध्यान कर रहा हूं। जैसे कि मेरे इष्ट है श्री रामकृष्ण तो अपने हृदय में श्री रामकृष्ण को स्थापित करके जैसे ही मैं उनका ध्यान उनके ध्यान में मैं तन्मय होता जाऊंगा वैसे ही क्या होगा कि इस एक रूप के भीतर में से बाकी जितने भी रूप है दिव्य रूप वो सब एक के बाद एक प्रकट होकर के दिखाई देंगे ठाकुर को जैसे कि मां सीता का दर्शन हुआ था महावीर हनुमान का दर्शन हुआ था चैतन्य महाप्रभु का दर्शन हुआ था। इवन जीसस क्राइस्ट और मोहम्मद के भी दर्शन हुए थे। तो क्या है कि जितने भी रूप वैविध्य है इस विश्व में मां काली का दर्शन वो एक ही इष्ट में से ठाकुर के इष्ट है मां काली तो मां काली के एक रूप की कल्पना या तो फिर एक रूप के ध्यान में तन्मय हो गए तो फिर बाकी जितने भी ईश्वर है ईश्वरीय रूप जितने भी है सब एक ही इष्ट के भीतर में से प्रकट होते हुए दिखाई देंगे। कल जैसे हमने गोपाल की मां का उदाहरण देखा था कि किस तरह से वो माहेश बोलकर के एक जगह है। वहां पर वह गई थी और इस माहेश वहां पर रथ जगन्नाथ का रथ चल रहा है। तो जैसे ही जाकर के एकाएक उनको और फिर क्या है कि ठाकुर की महासमाधि हो चुकी थी तो हृदय भी जैसे कि एक तरह से अशांत था विरह अग्नि में वो प्रज्वलित हो रहा था। उस समय एकाएक उन्होंने देखा कि रथ है। रथ के ऊपर में श्री श्री जगन्नाथ महाप्रभु है। जो लोग रथ को खींच रहे हैं। फिर यह जो विराट जन समुदाय है सब जैसे कि भिन्नभिन्न रूप से गोपाल ही यह विभिन्न रूप धारण करके वो घूम रहे हैं। तो जैसे ही यह दर्शन हुआ यह गोपाल की मां उन्मत्त होकर के वो क्या कहती है? ऐसे नेचे कुरुक्षेत्र माने कोरे छिलाम हंसते नाचते गाते कुरुक्षेत्र खड़ा किया था माने ऐसा एक तमाशा किया था खड़ा कि सभी लोग उनको देखना शुरू कर दे कि अरे क्या हो रहा है तो देखिए कि एक ही रूप के भीतर में से विभिन्न रूपों का दर्शन हमको होता है ठाकुर बोली तेन ठाकुर कहते थे जे व्यक्ति एकटी रूप कोई प्रकार जीवंत भावे दर्शन कोिया छ ताहार अन्न अन सब रूप दर्शन सोज उपस्थित हो जिस व्यक्ति ने जिस भक्त साधक ने इस तरह से एक रूप को जीवंत भाव से दर्शन किया है उसके सामने अन्य सब रूप दर्शन सहज रूप से आकर के उपस्थित होते हैं। ठाकुर ने मां काली का जैसे ही दर्शन किया वैसे ही अन्य रूप तो छोड़ ही दीजिए। पहले ही दर्शन में मां काली के हमको पता है शरद महाराज कहते हैं कि यह प्रकाश की तरंगों रूपी महासागर आकर के ठाकुर को घेर लिया। यानी कि सिर्फ यह नहीं कि आपको अन्य विभिन्न रूप के दर्शन होते हैं। इवन जो रूप के परे अरूप है उसका भी साक्षात्कार हो जाता है। कल ही हमने जैसे देखा था कि मां काली के दर्शन की प्रार्थना करते उनको यह निराकार अनुभूति हुई और निराकार अनुभूति प्राप्त करने की चेष्टा कर रहे थे तो बीच में मां काली आ जाती थी। तो यह जो क्रॉस किस तरह से हो रहा है ठाकुर के जीवन में

जब ध्यान में देखा ईश्वरीय रूप जाग्रत जगत जितना वास्तविक लगने लगे

इति पूर्व जे शकल कथा बोला हो ताहा एकटी विषय हमरा बुझते पारी इसके पहले जो सब बातें हुई उसमें से हम एक विषय समझ सकते हैं कोई रूप जीवंत मूर्ति शकले दर्शन लाभ जार भाग्य उपस्थित हो तार निकट जागृत काले दृष्ट पदार्थ शकले न्याय ध्यान काले दृष्ट भव्य राज्य जगत ओ शकल मूर्ति समान अस्तित्व अनुभव होते थाके इस तरह की जीवंत मूर्तियों के दर्शन लाभ जिनके भाग्य में उपस्थित होते हैं। देखिए जन्म जन्मांतर की सुकृति जन्म जन्मांतर की साधना जन्म जन्मांतर के ये जो सुसंस्कार है उसको जब हम बटोरते जाते हैं उनको हम कलेक्ट करके जाते हैं तब कहीं जाकर के उनके भाग्य में यह जीवंत मूर्ति का दर्शन लाभ उपस्थित होता है और उनके सामने जागृत काले दृष्ट पदार्थ सकल की तरह ध्यान काले दृष्ट भाव राज्य जगत कोई शकल मू वह सब मूर्ति का समान अस्तित्व अनुभव होता रहता है। कॉम्प्लिकेटेड किंतु मीनिंग बड़ा सहज है। जिनके भाग्य में इस तरह से यह जीवंत ईश्वर की मूर्तियों का ईश्वर के जीवंत स्वरूप का दर्शन होता है। जिन लोगों को ध्यान काल में यह भाव राज्य का यह दर्शन होता है। उन लोगों को उस मूर्ति का समान अस्तित्व अनुभव होता है। ओई रूपे बाह्य जगत और भाव राज्य समान अस्तित्व बोध जतोई वृद्धि पते थाके इस तरह से बाह्य जगत और भाव राज्य का समान अस्तित्व जितना वृद्धि प्राप्त करता है जितना बढ़ता जाता है तत्व ताहार मने बाह्य जगत टाके मनः कल्पित बोलिया धारणा होते थाके उतना ही उसका मन में उसके मन में बाह्य जगत मनः कल्पित बोल करके धारणा होती रहती है। देखिए होता क्या है? जैसे-जैसे हम आध्यात्मिक जगत में आगे बढ़ते हैं, वैसे-वैसे ही क्या होगा? हमको हमारे भीतर में यह जो आध्यात्मिक जगत तो यह यह जो अपनी बाह्य जो बाहर की ओर गति करती जो इंद्रियां है उसको तो रिवर्स करके भीतर में लाना है। प्रति आहार करना है। प्रत्याहार प्रतिआहार जो योग शास्त्र में यह जो स्टेप है कि परांचिक हानि अर्थात कि हमारी इंद्रियां सब समय बाहर के विषयों की ओर बाहर के पदार्थों की ओर दौड़ती जाती है। आध्यात्मिक जगत में इंद्रियों के विषय को अंतर्मुख करना है। उसको प्रति आहार आंख का आहार है दृश्य कान का आहार है श्राव्य तो ये दृश्य श्राव्य बाहर के जगत की वजह अंतर के जगत की ओर मोड़ देना है मेरे हृदय में इष्ट है उनका मुझे दर्शन करना है इष्ट के साथ में जो वार्तालाप हो रहा है उसका श्रवण करना है जैसे कि गोपाल मां वो देख रही है बाल गोपाल को अभी यह देख रही है बाह्य जगत में किंतु क्या है? यह जो बाह्य जगत की जो रियलिटी है वो भीतर में से प्रोजेक्ट होती है। दिस इज वेरी इंटरेस्टिंग। दर्शन भीतर में भी होता है। जैसे हमने उस दिन कहा था एआर और वीआर ऑगमेंटेड रियलिटी और वर्चुअल रियलिटी। अभी वर्चुअल रियलिटी का क्या अर्थ है? बाहर का जो जगत है वह अदृश्य हो जाता है। भीतर का ही जगत वही दिखता है। और ऑगमेंटेड रियलिटी क्या है? कि बाहर का जगत है उसके ऊपर में भीतर का जो जगत है वह सुपरइंपोज है। तो यह जो बाल गोपाल की नटखट लीलाएं गोपाल मां जो दर्शन करती थी वो ऑगमेंटेड रियलिटी की तरह था। कभी यह वर्चुअल रियलिटी की तरह हो जाएगा कि बाह्य जगत संपूर्ण रूप से विलुप्त हो जाएगा। सिर्फ बाल गोपाल ही रह जाएगा और कभी-कभी ऑगमेंटेड रियलिटी की तरह ये बाहर का जगत तो दिख रहा है। यहां पर ठाकुर बैठे हैं। यहां पर भक्तगण बैठे हैं। और यह जो बाल गोपाल है वो शरारती बच्चे की तरह दौड़ता हुआ पूरे कमरे में कभी ठाकुर के भीतर में प्रवेश करता है। कभी वह दूसरे भक्तों के भीतर में प्रवेश करके गोपाल मां को कहता है कि यह जो ऑर्थोडॉक्सी है यह जो सूचीवाई है यह जो नात जात छुआछूत जिसके भीतर में जो इतनी डूबी हुई है यह ब्राह्मण है। यह ब्राह्मण नहीं है। यह अपर कास्ट है। यह लोअर कास्ट है। इसके हाथ से खा सकते हैं। इसके हाथ से नहीं खा सकते। सभी भक्तों के भीतर में प्रवेश करके बाल गोपाल अपनी मां को समझाता है अगोरमणि देवी को कि इस तरह का कास्ट डिवीजन रखना भक्तों के लिए उचित नहीं। तो क्या है कि यह जो गोपाल रूपी रियलिटी है वो चाहे बाह्य जगत में हो कि चाहे अंतर जगत में हो। तो एक तो हो गया कि दिव्य मूर्ति का दर्शन हुआ। दूसरा है कि भाव प्रबल हुआ। अभी गोपाल मां का बाल गोपाल के प्रति मातृभाव है। अभी प्रॉब्लम क्या था पता है? गोपाल मां के साथ में बड़ी ही स्पष्ट वक्ता थी। जो लोग स्पष्ट वक्ता होते हैं ना उन लोगों को कटु वचन कहने में लज्जा नहीं रहती। आज हमको किसी को किसी का कोई हैबिट है, किसी का किस तरह का बिहेवियर है, यदि हमको अच्छा नहीं लगता तो स्पष्ट करके उसके मुंह पे नहीं कह देंगे कि अरे भाई तुम ऐसा मत करो। माने देखिए जो बाहर के लोग हैं जो मित्र हैं वे लोग तो ठीक ही है। इवन जो हमारा स्टाफ है अब जैसे मेरे यहां पे एक लड़का काम करता है उसका हाथी जैसा मोटा-छोटा शरीर है और पैर घिसट घिसट करके चलता है। मुझे इतना इरिटेशन होता है जब ये वो पैर घिसट करके चलता है। खास करके मैं क्लास ले रहा हूं। अभी उसको काम दिया गया है कि का क्लास समाप्त होने के बाद में लोगों को रिफ्रेशमेंट देना। तो अभी क्लास चल रहा है, वेदांत है, मेडिटेशन है। इस सब टॉपिक पे एकदम कंप्लीट साइलेंट है। और जैसे ही वो एंटर होगा, पैर घिसट घिसट करके चलेगा। मुझे इतना इरिटेशन होता है। किंतु क्या है? अब किसी के मन को दुख नहीं पहुंचाना है। फटाक करके बोल के क्या रे वेट कम करो। थोड़ा सा ठीक से चलो। हम हिंट दे सकते हैं कि भाई थोड़ा हेल्थ का ध्यान रखो। वेट तुम्हारा बहुत ज्यादा है। ऐसा पैर घिसट के चलना ये तमस का निशानी है। ऐसा हम एक दो बार बोल सकते हैं। किंतु फड़ाक करके किसी का इंसल्ट करके बोल देना कि ये क्या है? है ना वो इवन स्टाफ के साथ में भी इस तरह का सलूक हम नहीं करेंगे। भले ही चाहे हमको कितना ही एक इरिटेशन फील होता हो। जिन लोगों का मुंह इस तरह से खुल जाता है ना मैंने इस तरह के लोगों को देखा है। मुंह पे कोई फिल्टर ही नहीं है। भीतर में जितना इरिटेशन है ना फट करके मुंह पे आ जाएगा। तो क्या है इस तरह के लोग सब तरह से अनपॉपुलर हो जाते हैं। फिर आइसोलेट हो जाते हैं। और फिर लोग दूसरे लोग फिर उनके पीछे में उनकी निंदा करना शुरू कर देंगे। और फिर यह लोग जो है जिनके मुंह पे कोई फिल्टर ही नहीं है वो कंप्लेन करेंगे। देखा यह लोग पीछे-पीछे मेरी निंदा करते हैं। तो भैया अपना बिहेवियर तो थोड़ा देखो। अपने मुंह पे थोड़ा फिल्टर रखो। यह जगत जो है कोई अपनी इच्छा के अनुसार सब कुछ नहीं होने वाला है। म इवन अपना स्टाफ भी जो है जिनको हम सैलरी देते हैं उनको भी थोड़ा सा एक डिसेंसी से हमको ट्रीट करना है। तो यह जो एक डिसेंसी का एक फिल्टर जो हमने अपने मुंह पर रखा है तो गोपाल मां का क्या था पता है? ये फिल्टर जो है ना वो नहीं था। शुरू शुरू में बड़ी ही स्पष्ट वक्ता थी। अभी स्पष्ट वक्ता टेफुली शरद महाराज ने लिखा है। किंतु हमको पता है कि स्पष्ट वक्ता लोग किस तरह के होते हैं। बिना फ़्टर के अपने मन में जो है फट करके बोल देंगे। अभी यह गलत नहीं है। अब जैसे ये मेरा यह स्टाफ है। वो ओवरवेट है। पैर घिसट के चलता है। तो उसको तो मुझे मेरा फर्ज है। उसको यह बताना। राइट? कि यह तुम्हारे हेल्थ के लिए अच्छा नहीं है। बहुत ही ज्यादा तामसिक हो जाओगे। यंग एज में तामसिक होगे तो थोड़ा सा एज बढ़ेगा तो क्या होगा? अभी मैं उसके भले के लिए भी यदि कहूं ना टेकफुली कहना है। जबकि ये बिना फिल्टर के लोग ये सोचते क्या है? पता है मैं तो अच्छे के लिए ही तो कर रहा हूं। मैं तो आश्रम के या कम्युनिटी के इसके भले के लिए ही तो कह रहा हूं। तो ऐसा भला करके भी कहने के लिए ना विद्या विनयन शोभते हमेशा है ना आपका पास में कितना ही टैलेंट हो कितना नॉलेज हो विनय नहीं है तो विद्या किसी काम की नहीं तो गोपाल मां का ऐसा था है तो बड़ी ऑनेस्ट इंटीग्रिटी है आध्यात्मिक है तापस है जापक है ठाकुर पे श्रद्धा भक्ति है सब कुछ है किंतु साथ में ही थी स्पष्ट वक्ता तो यह उनका भाव था किंतु जैसे जैसे-जैसे गोपाल ने उनको समझाना शुरू किया कि इस तरह से किसी का मन दुभाकर के बात नहीं करनी है। अब जैसे एक उदाहरण था कि एक स्त्री भक्त थी। उसने अपनी लड़की का अभी यह स्त्री भक्त है ब्राह्मण किंतु उसने अपनी का लड़की का विवाह एक ऐसे घर में करवाया है जो कि ब्राह्मी नहीं है या तो फिर ब्राह्मण में भी उच्चनीच होता है तो उसमें नीची जात का ब्राह्मण होगा जो भी है तो यह गोपाल मां का बड़ा एक भीतर में से एक था कि अरे अपनी लड़की का विवाह नीची जात के साथ में करवा दिया बोल के यह जो लेडी डिवोटी है उसके साथ में कटु वचन करके बात करेगी या तो फिर वैसे मन दुभा करके बात करना। तो अभी एक दिन हुआ ऐसा कि ठाकुर ने भाव में इस लेडी डिवोटी को स्पर्श किया। तो अभी ठाकुर भी तो बाल गोपाल और ठाकुर दोनों तो आइडेंटिकल है गोपाल मां के मन में तो उन्होंने जैसे ही यह देखा कि ठाकुर ने भाव में इस लेडी डिवोटी को स्पर्श किया है और हम सबको पता है कि जो अत्यंत शुद्ध पवित्र नहीं होते इनको ठाकुर इसके अलावा और किसी को स्पर्श नहीं कर सकते हैं। तो जैसे ही गोपाल मां ने यह देखा साथ में ही इस लेडी डिवोटी के प्रति उनका बिहेवियर संपूर्ण रूप से बदल गया। कितना विनय और कितना जैसे कि आजीजी करके उनके साथ में बात करती है कि अरे मैंने तो यह सोचा था कि तुम अपनी लड़की का विवाह ऐसे किसी के साथ करवाया बोलकर के मैं तुमको तुच्छ ताक्षिल्य करती थी। किंतु गोपाल ने स्वयं गोपाल यहां पे अर्थात ठाकुर गोपाल ने स्वयं तुमको भाववस्था में स्पर्श किया। इसका अर्थ है कि तुम भीतर में से कितनी शुद्ध पवित्र हो। मुझे क्षमा कर दो। ऐसा करके कितनी माने माने उनके सामने वो आजीजी विनती करके बात करती है तो क्या है ये जो स्वभाव का जो ट्रांसफॉर्मेशन होता है स्पष्ट वक्ता अर्थात कि जो रूढ़ कथा लोगों के मन में कष्ट पहुंचे इस तरह की बात एकदम फड़ा करके मुंह पर कह देना वहां से लेकर के एकदम आजीजी विनती करके इतनी विनम्रता पूर्वक क्षमा मांगना ये जो भाव का जो परिवर्तन है तो यहां पे देखिए शरद महाराज कहना क्या चाहते हैं एक्चुअली यह जो दो कॉम्प्लिकेटेड सेंटेंस के माध्यम से एक तो है कि रूप दर्शन प्रारंभ हो जाता है आध्यात्मिक जीवन में आगे बढ़ते हैं उस समय दूसरा है कि हमारे भाव का परिवर्तन होता है। भाव की शुद्धि होती है। भाव की तुष्टि होती है। तो यह जो भाव और मूर्ति दर्शन ईश्वर इष्ट दर्शन और विभिन्न रूपों का दर्शन और यह भाव का परिवर्तन भाव का एक तरह से सुसंस्कृतिकरण जैसे-जैसे होता जाता है वैसे-वैसे ही यह जो बाह्य जगत है और बाह्य जगत के साथ में एसोसिएटेड जितने भी भाव है वो हमको पहले तो तुच्छ प्रतीत होते हैं और उसके बाद में मिथ्या प्रतीत होना शुरू हो जाते है। अब जैसे ठाकुर कहते हैं कि मां काली का दर्शन नहीं हुआ बोलकर के अब क्या है कि एक वैसे तो दर्शन हो चुका है किंतु ठाकुर की जो भूख थी दर्शन की इतनी तीव्र थी कि वह सतत दर्शन के राज्य में रहना चाहते हैं। एक क्षण भी दर्शन में विच्छेद हुआ तो आकुल व्याकुल होकर के रोना शुरू करेंगे। प्रार्थना करना शुरू करेंगे। मिट्टी पे जमीन पर गिर के मिट्टी में अपना मुंह रगड़ना शुरू करेंगे तो और जब ऐसा करेंगे तो लोग इकट्ठा हो जाते थे देखने के लिए कि छोटू भट्टाचार्य महाशय [हंसी] माने जो भट्टाचार्य महाशय अर्थात कि रामकुमार ठाकुर के बड़े भाई और यह जो ठाकुर है छोटे भट्टाचार्य तो ये जो छोटे भट्टाचार्य जो है वो या तो पागल हो गए हैं या तो फिर पेट में शूल वेदना हो रही है तो ऐसा लोग देखने के लिए इकट्ठा हो जाते थे किंतु ठाकुर कहते हैं कि मैं उनको वे लोग मुझे ना एक छाया की तरह प्रतीत होते थे। म परछाई की तरह या तो जैसे छवि आकी हुई है इस तरह से प्रतीत होते थे। उनके सामने मुझे लज्जा भय ऐसा कुछ लगता ही नहीं था। आज मैं ईश्वर प्राप्ति नहीं हुई। बोल के अपने आश्रम के सामने जमीन पर लेट के मिट्टी में मुंह घिसो और फिर 10 लोग इकट्ठा हो तो मुझे लज्जा ना हो भय ना हो ऐसा असंभव है। किंतु अब जैसे-जैसे भीतर का राज्य हमारा हमको दृष्टिगोचर होता है। भीतर के यह जो भाव जो है भाव समूह है तुष्ट परितुष्ट होते जाते हैं। साथ-साथ में ही यह बाह्य जगत के साथ में अपना नाता जो है विच्छेद होता जाता है। बाह्य जगत को हम लोग एक परछाई की तरह या तो फिर एक छवि की तरह देखते हैं। अभी मान लीजिए पूरा विशाखापटनम शहर खाली हो गया। यहां पर जो लोग थे जितने भी आदमी थे उनका एक-एक पेंटिंग रह गया है। बाकी जीवंत आदमी चले गए हैं। तो अभी मैं फिर भी मैं थोड़ा सा बोल्ड मैं महसूस करूंगा कि बाहर रास्ते में जाकर के लेटेेटे वो जमीन पर अपना मुंह रगड़ूं और जोर-जोर से चिल्लाऊं कि ईश्वर प्राप्ति क्यों नहीं हो रही है बोल के। किंतु जब तक अन्य लोग हैं तब तक तो मैं यह कभी नहीं करने को जाऊंगा। प्रश्न ही नहीं आता है। तो देखिए किंतु जैसे-जैसे भीतर का भाव तुष्ट परितुष्ट होता है बाह्य जगत जो है हमको इसी तरह परछाई की तरह ही दिखेगा इसी तरह छवि की तरह ही दिखेगा भीतर के जो भाव भीतर के जो दर्शन है वही हमको सही प्रतीत होंगे और फिर भीतर में से जब बाहर में प्रोजेक्ट होते हैं जैसे कि ठाकुर ने कहा कि पंचवटी में मैं बैठा था नीचे में पंचवटी के नीचे और ऐसा नहीं है कि मैं जप कर रहा हूं या ईश्वर चिंतन कर रहा हूं। वैसे ही बैठा था। एकाएक देखा कि मां सीता उनकी नजर के सामने चली आ रही है। तो क्या है कि यह भीतर का ही दर्शन है। यहां पे और यदि मान लीजिए हम लोगों का यह सद्भाग्य होता ठाकुर के साथ में वहां पर रहने का। अब जैसे वह वहां के काली मंदिर के यह जो ब्राह्मण है, यह जो द्वारपाल है, यह माली है। यह लोगों का सद्भाग्य था। किंतु उन लोगों में पता नहीं इतनी अकल थी कि नहीं कि बाकी सब छोड़कर के ठाकुर का ही संग करते रहे। किंतु मान लीजिए यदि हम वहां पर उपस्थित होते तो हमको तो मां सीता नहीं दिखती। क्यों? क्योंकि मां सीता ठाकुर के भीतर का कॉन्शियसनेस का हृदय का प्रोजेक्शन है। वो ठाकुर ही देख पाएंगे। हम लोग नहीं देख पाएंगे। तो यह दर्शन चाहे हम आंख बंद करके करें अपने हृदय के भीतर में जिस तरह से हम ध्यान के दौरान करते हैं या तो फिर आंख खुली करके करें भीतर में से बाहर में वह प्रोजेक्ट होता है। तो आंख खुली हो ना कि आंख बंद हो। यह दर्शन ही हमको सत्य प्रतीत होते हैं। यह जो जड़ जगत है जिसको कि हम अनुभव करते हैं नॉर्मल परिस्थिति में वह हमको छाया मात्र की तरह दिखने लगता है। यह जो एसेंट जितनी भी होती है इस शिखर के ऊपर में समिट के ऊपर में वैसे ही देखेंगे। आज मान लीजिए यह 101 आदमी है जो कि आश्रम में है उनको लेकर के ही मेरा पूरा काम है। उनको लेकर के ही मैं परेशान हूं। उन्हीं के साथ में इसके साथ कैसे बिहेव किया जाए? उसके साथ कैसे बिहेव किया जाए? वही जो मेरे मन में 24 घंटे चलता है। अभी मैं हिमालय पे चला जाऊं। एवरेस्ट शिखर पर बैठा हूं और फिर वहां से यह विशाखापट्टनम को देखूंगा। दिखेगा कि नहीं पता नहीं। मान लीजिए दिख सकता है तो यह जो 101 लोग हैं वो तो चींटी की तरह मुझे प्रतीत होंगे। कहीं उनके साथ में कोई रिलेशन वगैरह है जो हिमालय की यह जो मेजेस्टिक ब्यूटी है यह जो धवल हिम शिखर है यह जो सौंदर्य है प्रकृति का यह जो मन की उत्फुलता जो प्रकट होती है उसके सामने यह विशाखापटनम के 10-15 लोग जिनको लेकर के मैं परेशान रहता था कहां अदृश्य हो जाएंगे कहां चले जाएंगे पता नहीं चलेगा ऑफ कोर्स फिर यदि मैं वापस आऊंगा छुट्टी खत्म हो के तो फिर से वही लोगों को ले रहना है। किंतु एस लॉन्ग एज मैं वहां पे हूं तब तक तो मैं जगत को भूल जाऊंगा। तो वैसे ही यहां पे भाव राज्य में आध्यात्मिक जगत में जैसे-जैसे प्रगति करते जाएंगे वैसे-वैसे ही यह जड़ जगत और जड़ जगत में हमारे जितने भी यह अट्रैक्शन कहो, इंटरेस्ट कहो, एंगेजमेंट कहो, वह सब हमको छाया की तरह प्रतीत होना शुरू होंगे। आ गंभीर ध्यान काले अच्छा किंतु यह जो मैं

गोपाल की माँ के स्वभाव का दिव्य-रूपांतरण

गोपाल मां की बात कर रहा था हमने देखा कि किस तरह से उनका यह स्पष्ट वक्ता होना यानी कि कटु वचन कहने में जरा सा भी लज्जा नहीं होना यह सब कैसे धीरे-धीरे करके मृदुता की ओर किस तरह से वोर्य मंडितुर्य मंडित एक स्वभाव की ओर उनका एक ट्रांसफॉर्मेशन हुआ है। यह ट्रांसफॉर्मेशन जो है दैट इज आध्यात्मिकता का एक रियल सीक्रेट है। देखिए हम लोग एक माने एक एब्स्ट्रैक्ट वेदांत है। यहां पे शरद महाराज ने एक एब्स्ट्रैक्ट वेदांत की बात कही कि जैसे-जैसे दर्शन प्रारंभ होते हैं बाह्य जगत हमको छाया की तरह प्रतीत होता है। ओके वेरी गुड। किंतु फिर उसको प्रैक्टिकल क्या अर्थ है? तो प्रैक्टिकल देखिए गोपाल मां कहां वो स्पष्ट वक्ता लोगों के मन में कष्ट हो। इस तरह के रूढ़ वाक्य बोलने में थोड़ी सी भी लज्जित नहीं होती थी। बहुत ही अभिमानी नहीं थी। कोई कुछ भी बोल दे तो फटाक करके उनकी ईगो पर लग जाता था। तो किंतु वह ईगो भी पूरा समाप्त हो गया। यह जो कटु वचन कहना रूढ़ शब्द कहना वो भी पूरा चला गया। यह जो स्वभाव का ट्रांसफॉर्मेशन हुआ है। यह जो बादबाद में यह निवेदिता है, सारा ओलीबुल है, जोसेफाइन मैक्लाउड है। जब उनके दर्शन करने को गई तो कितनी चार्ड हो गई थी। कितनी वो प्रभावित हो गई थी। अभी यदि ठाकुर को मिलने से पहले वाली जो घोरमणि देवी का दर्शन करते तो पता नहीं क्या हो जाता। तो ये जो पूरा ट्रांसफॉर्मेशन होता है हमारे स्वभाव में बहुत बार हम सोचते हैं कि अच्छा ये ब्रह्मसत्य जगत मिथ्या का अर्थ क्या है? माने ये जगत हमको क्या परछाई की तरह धुएं की तरह दिखाई देगा। अभी ये माइक को स्पर्श करूंगा तो माइक क्या धुएं की तरह अदृश्य हो जाएगा। यह जो मेरा देह है जो कि मुझे इतना प्रिय है जिसको टिकाने के लिए जिसका हेल्थ मेंटेन करने के लिए मैं सब समय तो सोचता रहता हूं यह देह क्या संपूर्ण रूप से विलीन हो जाएगा नहीं यह सब तो वैसे का वैसा ही रहेगा माइक माइक ही रहेगा ये देह में यदि जितने भी रोग है वो रोग तो वैसे के ही वैसे ही रहेंगे ठाकुर को कैंसर था कहां उसका इलाज इस तरह से हुआ ठाकुर ने चाहा नहीं हालांकि उस लेवल पर पहुंच गए थे जो चाहते हो जाता तो चाहा नहीं उन्होंने तो क्या है कि यह सब तो वैसे का वैसा ही रहेगा। किंतु क्या है कि हमारा जो स्वभाव है, हमारे संस्कार है, हमारी जो बुद्धि है, उसमें आमूल परिवर्तन हो जाएगा। फंडामेंटल ट्रांसफॉर्मेशन हो जाएगा। दैट इज द सीक्रेट ऑफ स्पिरिचुअल लाइफ। कोई भी व्यक्ति स्पिरिचुअल डेवलपमेंट करता है। उसका साइन क्या है? आप देखिए कि उसके स्वभाव में परिवर्तन परिवर्तन क्या मृदुता आती जाती हैुर्य आता जाता है एक सबके प्रति सहानुभूति प्रकट होती है सबके प्रति मित्रता का भाव प्रकट होता है और जिस चीज को लेकर के दूसरे लोग इतने परेशान रहते हैं प्रमोशन चाहिए मटेरियल बेनिफिट चाहिए मटेरियल लग्जरी चाहिए उस सबके प्रति इसके मन में वैराग्य प्रकट होता जाता है मिला तो मिला नहीं मिला तो नहीं मिला अभी गृहस्थ आश्रम में है पत्नी पत्नी पुत्रों का संभाल रखना है। बोल के जो करना है वह करना है। मास्टर महाशय ने ठाकुर को पूछा था कि क्या मैं ज्यादा पैसा मिले इस तरह के मैं प्रयास कर सकता हूं क्या? तो ठाकुर कहते हैं अवश्य कर सकते हो। उसमें गलत कुछ नहीं है। सत सतार्ग से प्रयास करना। असत का आश्रय लेकर के पैसा नहीं लेना है। और ठाकुर ने किसी के बारे में कहा था वह डेप्यूटी डेपुटी नहीं कैसा ही कोई गवर्नमेंट पोजीशन पे तो इतना रुपया उसको महीने का मिलता है सैलरी फिर इतना रुपया जो है वो गलत गलत वाउचर लिख के लेता है। तो उसी समय यह करप्शन का था वो मामला और ठाकुर स्पष्ट समझ पाते थे। ठाकुर की दृष्टि से तो कुछ अदृश्य नहीं है। गलत वाउचर लिख के यह कौन सा शब्द इंग्लिश शब्द ही ठाकुर ने यूज किया है बिल ना कि वाउचर ऐसा ही कुछ ऐसा गलत कुछ लिख के वो बाकी के रुपए लेता है। तो देखिए कि सतमार्ग से जितना हो सकता है जीवन धारण करने के लिए चेष्टा कर सकते हैं, प्रयत्न कर सकते हैं। सब कर सकते हैं। अल्टीमेटली देखिए किंतु कि यह जो एक प्रचंड आकर्षण जो होता है वैयिक चीजों का उससे हमको दूर रहना है। अब ये वैयिक चीजों से याद आया कल ही मैंने चाय का मसाला मंगवाया है Amazon पे। चाय मुझे पीना बहुत पसंद है। और क्या था मैं राजकोट में था तो वहां पे तो मेरा एक वर्कर था। तो वो सब कुछ मेरे लिए बना करके तैयार रखता था। चाय बनाने के लिए जितना भी मसाला वगैरह है वो आश्रम में ही सब माने ऑर्गेनिक में ये भी करता था कल्टीवेट भी करता था अपने से सब ये मसाला बनाता था सब करता था यहां पे ऐसा कुछ करना मुश्किल है तो फिर परचेस करना पड़ता है म बाजार से तो कल ही चाय का मसाला आया है आज मैं वो चाय का मसाले का नया चाय पऊंगा देखता हूं कैसा लगता है तो देखिए ठाकुर क्या कहते हैं बड़े-बड़े जो भोग है उसको संपूर्ण रूप से त्याग कर देना है और छोटे-छोटे भोग है उसको भोग करके त्याग कर देना है। तो यह चाय का भोग मैं चाय पी के त्याग करने वाला हूं।

सविकल्प समाधि: जब बाह्य जगत् अदृश्य हो जाए

आ गंभीर ध्यान काले भाव राज्य अनुभव भक्त मने ए तो प्रबल होया उठे जे ए समय जनो तार बाज जगत अनुभव ई मात्र थाके ना और फिर गंभीर ध्यान के समय में भाव राज्य का अनुभव भक्त के मन में इतना प्रबल हो उठता है कि उस समय उसके मन में उस समय के उस समय के लिए फॉर दैट ड्यूरेशन उसके मन में उसके वो जो बाह्य जगत का अनुभव ईश मात्र भी रहता नहीं है। जब वह गंभीर ध्यान में भाव राज्य में गंभीरता रूप से वह प्रवेश करता है। यह अनुभव प्रबल हो जाता है। तो फॉर दैट ड्यूरेशन यह जो बाह्य जगत है उसके सामने संपूर्ण रूप से अदृश्य हो जाता है। भक्त ओई अवस्था के शास्त्र सविकल्प समाधि नामे निर्देश करिया छे भक्त की इस अवस्था को ही शास्त्र ने सविकल्प समाधि के नाम से निर्दिष्ट किया है। जैसे-जैसे मेरे दर्शन अब जैसे हम लोग ध्यान करते हैं तो ध्यान में क्या करते हैं? अपने हृदय में ठाकुर को स्थापित करके ठाकुर का चिंतन करते हैं। किंतु क्या है कि अभी मैं ध्यान कर रहा हूं। किसी ने वो घंटी बजाया कोई बाहर में खड़ा है या तो फिर बाहर में वो गली है। गली में बच्चे दौड़धाम कर रहे हैं। खेल रहे हैं। माने हल्लागुल्ला कर रहे हैं। तो वी आर अवेयर ऑफ एवरीथिंग। सब कुछ चीजों के प्रति अवेयर है। और मान लीजिए कि किसी किसी को किसी एक डिवोटी ने मुझे कहा था कि उसका घर जो है वो उसके सामने ही एक मेस है। मेस अर्थात कि ये जो स्टूडेंट्स के रहने का और खाने की जगह तो वहां पर बहुत हल्लागुल्ला होता है। तो क्या करूं? ध्यान ठीक से नहीं होता। मैंने कहा ये नॉइस कैंसिलिंग ईयरफोन है वो ले आइए। देखिए यदि उससे हेल्प होता है। इसके अलावा तो क्या हो सकता है? है माने ध्यान इतना गंभीर हो कि सामने मेस है। मेस में स्टूडेंट हल्ला मचाते हैं। वह हमको बिल्कुल रूप से म श्राव्य ना हो ना सुनाई दे वो तो अब कितनी ऊंचाई पे जाने से होगा ना। स्वामी जी जैसे स्वामी जी दक्षिणेश्वर में ध्यान करते थे तो दक्षिणेश्वर में ना कि कहां पे वो ध्यान करते थे तो पास में ही वो जो मिल है मिल का वो जो ये है वो विसल वो सुनाई देता था तो स्वामी जी को परेशानी होती थी। जो ठाकुर ने सॉल्यूशन दिया उसी के ऊपर मैं अपने मन को एकाग्र करो। अभी वो विसल तो फिर भी चलो उसके ऊपर आप एकाग्र कर सकते हैं मन को दक्षिणेश्वर की ही बात है क्योंकि क्योंकि दूसरी भी एक कहानी है वो चंद्रामणि देवी उसको कहती थी वैुंठ का यह जो शंख [हंसी] उसका अर्थ यह हुआ कि ये जो विसल बजती है उसके एग्जैक्ट टाइम पे दो परको ना की जो भी हो तो चंद्रामणि देवी सोचते तो बेचारी सीधी साधी भोलीभाली थी ना तो वो सोचती है कि वैकुंठ में सिटी बजी है इसका अर्थ है कि अभी भगवान ने खाना खा लिया है तो अभी वह भी खाना खाएगी। अभी प्रॉब्लम यह है कि ऐसा आम और कोई भी दिन तो ठीक है। अभी जब संडे को जब ये मिल में छुट्टी रहती है वो सिटी नहीं बजती तो वह फिर सोचेगी आज भगवान का खाना नहीं हुआ तो मैं भी नहीं खाऊंगी। तो अभी ये ठाकुर परेशान मां बेचारी भूखी है क्या करें? क्या ना करें? तो हृदय ने उसमें क्या किया? पीछे में जाकर के शंख बजाया और फिर आकर के कहता है कि देखो मां यह शंख बज गया। हो गया भगवान का खाना वैुंठ में। तो चंद्रामणि देवी हंसते-हंसते कहती है मुरजे क्या मूर्ख समझ के रखा है तुमने शंख बजाया वो थोड़ी ना वैकुंठ का शंख है [हंसी] तो मोस्ट प्रोबेबबली ये दक्षिणेश्वर का ही होगा तो देखिए प्रॉब्लम क्या है जब तक हम ये ईश्वर दर्शन इतना गंभीर ना हो जाए हम वी विल बी ऑलवेज कनेक्टेड टू आउटसाइड वर्ल्ड फिर ये नॉइस कैंसिलिंग ईयरफोन है आंख बंद करके बैठना वो जो आंखों पे पट्टी आती है ना फ्लाइट में आप एयरप्लेन में ट्रैवल करेंगे ना आंखों पे पहनने के लिए वह आपको ब्लैक वो पट्टी देते हैं। अभी क्या है प्लेन में तो सब समय लाइट चलती ही रहेगी। आपको विश्राम करना है तो आंख बंद करके भी आपको प्रकाश दिखाई देगा। तो उसके लिए आंखों के ऊपर काली पट्टी बांध देते हैं। तो आप यह नॉइस कैंसिलिंग ईयरफोन भी पहन लीजिए। उसमें क्लासिकल म्यूजिक या तो कोई ध्रुपद संगीत भी चला दीजिए। आंखों पर पट्टी भी पहन लीजिए। जगत के साथ में शायद आप अपने को डिसोसिएट कर भी पाए। किंतु जो देह है उससे कहां डिसोसिएट कर पाएंगे अपने को बैठे हैं 510 मिनट कमर में दर्द पैरों में दर्द या तो फिर किसी किसी को क्या-क्या सब होता है समझ पता ही है देह है तो देह के समस्याएं हैं तो क्या है ये जो जगत के साथ में जो नाता है ईजीली जाता नहीं है किंतु जब ध्यान गंभीर होता है और भक्त के मन में यह भाव राज्य का अनुभव अत्यंत प्रबल हो उठता है। उस समय के लिए उसको बाह्य जगत का अनुभव तिल भर भी रहता नहीं है। वो जो मेस है मेस में स्टूडेंट हल्ला कर रहे हैं। यह रास्ता है। रास्ते पर बच्चे हल्ला कर रहे हैं। यह घर में कोई टीवी चल रहा है। बगल वाले रूम में बहुत सारे लोगों को सुना है। किस कोई कहता है कि मैं पढ़ाई लिखाई करना वो मुश्किल होता है क्योंकि घर में बड़े जोर-जोर से लोग टीवी देखते हैं। अभी उनको तो जाकर कह नहीं सकते टीवी का आवाज कम करो। तो यह सब तो है ही है। किंतु जैसे ही यह भाव राज्य का अनुभव इतना गंभीर हो जाएगा कि बाह्य जगत का अनुभूति संपूर्ण रूप से लुप्त हो जाएगी। और इस अवस्था को ही शास्त्र सविकल्प समाधि के नाम से निर्दिष्ट करते हैं। सविकल्प समाधि और निर्विकल्प समाधि में डिफरेंस क्या है? ज्ञाता गेय और ज्ञान यह त्रिपुटी हमेशा बनी रहती है। सविकल्प समाधि में इस अर्थ में कि यदि मैं ठाकुर का दर्शन ठाकुर मैं ठाकुर के ऊपर में ध्यान कर रहा हूं। वही चिर परिचित कमरा ठाकुर का मास्टर महाशय कहते हैं ना कथामृत में वही चिर परिचित कमरा तो इसका मैं यदि अपने हृदय में ध्यान करता हूं और सही में बाकी सब अदृश्य हो गया मेरा देह ये मैं जिस कमरे में बैठा हूं सब अनुभूतियां मेरे लिए शून्य हो गई मैं सही-सही में ठाकुर के कमरे में जाकर बैठा हूं किंतु यह जो मैं हूं ठाकुर है और यह मेरी अनुभूति का प्रवाह है ठाकुर के प्रति श्रद्धा का शरणागति का उनके प्रति आदर का उनके प्रति स्नेह का यह जो प्रवाह है वह प्रवाह बना रहेगा मैं बना रहूंगा ठाकुर बने रहेंगे ठाकुर के प्रति मेरी भक्ति बनी रहेगी ज्ञाता गेय ज्ञान ध्याता धेय ध्यान ये त्रिपुटी है वो बनी रहेगी इसको कहते हैं सविकल्प समाधि और निर्विकल्प समाधि इज ऑफ कोर्स कि ज्ञाता गेय ज्ञान ध्याता धेय ध्यान [हंसी] साधक साधना और साध्य यह जो त्रिपुटी है वह अदृश्य हो जाएगी। मैं ठाकुर ठाकुर के प्रति मेरी श्रद्धा सब कहीं विलीन हो जाएगा। ब्रह्म राज्य में सब कुछ एकीकृत हो जाएगा। सुखदेव जब गए जनक राजा के पास में ब्रह्म ज्ञान प्राप्त करने के लिए तो पहले जनक राजा कहते हैं पहले गुरु दक्षिणा दे दीजिए। तो यह सुखदेव कहते हैं कि पहले गुरु दक्षिणा क्यों दूं भाई? ये तो पहले आप मुझे ज्ञान दीजिए बाद में मैं दक्षिणा दूंगा। तो फिर जनक राजा कहते हैं ब्रह्म ज्ञान होने के बाद में कौन गुरु कौन शिष्य कौन सी शिक्षा सब कुछ अदृश्य हो जाएगी। पहले दक्षिणा दे दीजिए बाद में सब बात [हंसी] इसको कहते हैं जब तक ध्याता धेय ध्यान मैं हूं ठाकुर है। ठाकुर के प्रति मेरी श्रद्धा है। ये त्रिपुटी जब तक बनी रहती है तब तक इस अवस्था को शास्त्र सविकल्प समाधि के नाम से निर्दिष्ट करते हैं। और ये योग सूत्र का जो सूत्र है अ वितर्क विचार आनंद अस्मिता रूप अनुगमात संप्रज्ञात अर्थात कि वितर्क स्थूल विचार सूक्ष्म चिंतन ये वितर्क अर्थात कि स्थूल चिंतन विचार अर्थात कि सूक्ष्म चिंतन आनंद और अस्मिता इन अवस्थाओं के साथ इन अवस्थाओं के रहते रहते जो समाधि होती है उसे असंप्रज्ञात या तो फिर सविकल्प समाधि कहते हैं। इसके बाद का जो है अभी हम नेक्स्ट क्लास में देखेंगे। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु

प्रश्न : ध्यान इतना गहरा कैसे हो कि बाह्य जगत् विस्मृत हो जाए?

नहीं ऐसा तो प्रैक्टिस मेक्स परफेक्ट और तो कुछ है नहीं वो ठाकुर का ही उदाहरण कि आदमी मछली पकड़ रहा है पीछे में जैसे पूरा बारात चला गया वो पता नहीं चला। माने इवन सांसारिक चीज भी है। अब मां जैसे वो खाना बनाती है तो अभी बच्चे हल्लागुल्ला करते भी है तो खाना बनाने में ऐसा कंसंट्रेटेड है कि वो फिर और कुछ डिस्टर्ब नहीं करता। सो दीज़ आर प्रैक्टिस मेक्स परफेक्ट।

प्रश्न : बाहर के डिस्टर्बन्स से तो शायद हम मुक्ति पा भी लें, किंतु भीतर के डिस्टर्बन्स से कैसे छूटें? ऐसा तो है नहीं कि बाहर पूरी तरह शांति हो जाने मात्र से ही हमारा ध्यान लग जाएगा।

किंतु देखिए मैं तो हमेशा कहता हूं कि आप कथामृत साथ में रखिए ध्यान करने के टाइम में थोड़ा सा अब क्यों मैं अपने अनुभव से कहता हूं मुझे सीरियसली इंटरनल डिस्टरबेंस जैसा अभी मैं भूल ही गया हूं ऐसा कुछ है बोल के हां म दैट माने इतना सेटिंग हो गया माने कथामृत इस जस्ट नेम मैं बहुत सारी किताबें हैं मेरे पास में अभी अभी जैसे मेरे पास में ये ये दोनों किताबें मेरे बेड पे ही है। तो सोने के टाइम में ये ये है न्यू डिस्कवर इसका सिक्स्थ वॉल्यूम है और ये लीला प्रसंग है। तो ये दो-तीन किताबें मेरे बेड पे हमेशा रहती है। जैसा ही आंख बंद करके मैं बैठूंगा थोड़ा सा भी डिस्टरबेंस हुआ दो-तीन लाइन पढ़ना शुरू कर देना है। वो फट करके वो सब चला जाएगा। फिर एटलीस्ट 20-30 मिनट के लिए नो डिस्टरबेंस। फिर से यदि डिस्टरबेंस खड़ा हो फिर से चारप लाइन पढ़ लेना आराम से देयर इज़ एब्सोलुटली नो प्रॉब्लम

प्रश्न : आपको मोबाइल डिस्टर्ब नहीं करता क्या? वह भी तो आपके पास ही पड़ा रहता होगा।

पड़ा रहता है किंतु नहीं देखिए पहली बात तो है कि कोई मुझे कॉल नहीं करता माने वो पूरे दिन मेरे पूरे हो गए कि मेरा कोई यूज़फुलनेस अभी है नहीं तो [हंसी] म सही सही में साधु हूं। मुझे यहां पे आके ही पता चला। [हंसी] तो इस तरह से तो कोई है ही नहीं प्रॉब्लम और फिर माने मोबाइल खोल देखिए न्यूज़ आई एम ऑब्सेस विद न्यूज़। आपको पता ही है शायद तो किंतु नहीं ध्यान करने के समय मोबाइल खोल के देखूं कुछ ऐसा बिल्कुल कभी नहीं होता। ना किंतु मैं सही बताता हूं। ये आप किताब रख के साथ में रखिए। मोबाइल की बजाय पहले किताब को पकड़िए अपने लिटरेचर को और फिर देखिए कि वेदर इट हेल्प्स यू ऑ नॉट। और उस समय फिलॉसोफी नहीं पढ़ना है। उस समय आपको कहानियां ही पढ़नी है। यह जो न्यू डिस्कवरी का सिक्स्थ वॉल्यूम मैं पढ़ता हूं। उसमें कहानियां ही कहानियां है। कैलिफोर्निया में जो स्वामी जी गए इतनी सुंदर-सुंदर कहानियां है। आपका मन फ्रेश हो जाएगा। इसमें देखिए वह फाइट वगैरह भी है क्रिश्चियन मिशनरी के साथ में ऐसा किया वैसा किया वह सब स्किप कर देना है फिर प्रत्येक प्रत्येक पेज पे मेरे इतने सारे मार्किंग रहते हैं आप देखेंगे पता नहीं आपको दिखाई देगा कि नहीं ये जैसे बहुत सारे मार्किंग्स है मार्किंग दिखाई देते हैं मार्किंग भी दिखाई दे शायद वो शायद वो अलग टाइप से भी होंगे ओ अच्छा अच्छा ओ ये ये ये जो है ना अच्छा एनीवे मार्किंग्स बहुत सारे सारे मार्किंग्स है। मार्किंग्स ही मार्किंग्स है। तो मुझे पता है कि कहां पे कहानी है, कहां पे वह पढ़ने लायक है, रिपीट पढ़ने लायक है। तो मैं हमेशा पेंसिल लेकर के ही बैठता हूं और हमेशा मार्किंग करता रहता हूं। अब सेकंड रीडिंग में फिर वो वही वाला पोर्शन पढ़ना है। तो एकदम आपका मन ये फिट बैठ जाएगा।

प्रश्न : किसी-किसी को बहुत साधन-भजन करने के बाद दर्शन होते हैं, और किसी-किसी को एकाएक, in a flash, दर्शन हो जाते हैं। तो इन दोनों में फर्क क्या है?

यह जो फ्लेश दर्शन की बात कही ना वो खतरनाक है। एक तरह से देखें तो स्वामी जी ने कहा ना कि यह भाव वगैरह होने के समय मैंने बहुत लोगों को माने ठाकुर जब नृत्य कीर्तन करते थे बहुत सारे लोगों को भाव होता था। किंतु फिर भाव में जाकर के यदि त्याग नहीं होगा एकाएक दर्शन होगा तो क्या है मन बहुत ही उच्च अवस्था में चला जाएगा। किंतु अभी त्याग रूपी फाउंडेशन नहीं है ना तो फड़ाक करके जमीन पर गिरेगा वि इज इवन मोर डेंजरस। तो यह फ्लेश दर्शन कब होता है? यदि किसी महापुरुष के संपर्क में हम आए और फिर हिज स्पिरिचुअलिटी रब्स अपॉन अस। तो एकाएक फट करके दर्शन तो हो गया। त्याग रूपी फाउंडेशन नहीं रहने से वह कहां हम चले जाएंगे गिरेंगे। कुछ पता नहीं। अब सिकल्प समाधि कब होती है? त्याग का स्टेडी फाउंडेशन बनाते जाते हैं। उसके ऊपर में यह सविकल्प समाधि होती है। सो देयर इज नो डेंजर माने एस सच कि सविकल्प समाधि में से बाहर आने के बाद में फटाक करके मन जमीन पर गिरा ऐसा होगा नहीं जनरली

प्रश्न : एक बार सविकल्प समाधि हो गई, तो निर्विकल्प समाधि का मार्ग खुल गया है। अब रास्ते में कोई बड़ी बाधा नहीं रह जाती, ठीक?

माने एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी सिचुएशन ना आ जानी चाहिए। अभी विश्वामित्र का तप भंग करने के लिए मेनका को भेजा गया। ठीक है ना? दैट इज एन एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी सिचुएशन। [हंसी] हम लोग म थैंकफुली वी आर नोबडी। तो हमारा तप भंग करने के लिए किसी को भेजा नहीं

प्रश्न : माँ काली की ठाकुर पर इतनी कृपा थी, और ठाकुर के हृदय में माँ काली के प्रति इतनी गहरी श्रद्धा और संतान-भाव था। फिर भी कैंसर के समय जब ठाकुर असह्य कष्ट सह रहे थे, तब उन्होंने माँ काली से अपने रोग को ठीक करने की प्रार्थना क्यों नहीं की?

जाए। देखिए उन्होंने नहीं कहा ऐसा नहीं है। माने देखिए ठाकुर तो बालक स्वभाव थे। हृदय ने कहा आपको मां के साथ में हॉट लाइन है आपका तो मां से कुछ सिद्धाएं मांग लीजिए। सिद्धि प्राप्त कर लीजिए। तो ठाकुर गए बोला कि हृदय ऐसा कह रहा है तो तुम्हारी क्या इच्छा है? तो मां ने क्या दर्शन दिया? वो एक वृद्ध वो वैश्या वो पीछे की ओर बैठकर के विष्ठा कर रही है। शौच कर रही है और मां ने बता दिया कि इसकी ये विष्ठा की तरह ये सिद्धि है। सो ठाकुर आकर के हृदय पे नाराज हो गए। देखो तुम्हारी वजह से मुझे ऐसा देखना पड़ा। तो ऐसा नहीं है कि ठाकुर ने नहीं मांगा या किंतु क्या है? अब जैसे ठाकुर ने कहा भी था मां को कि खा नहीं सकता हूं तो थोड़ा खाने जैसा कर दो। तो माने वो जो एशियाटिक सोसाइटी म्यूजियम या वो जो स्केलेटल है वो जो तार से बांधा हुआ उसको दिखा दिया कि इस तरह से तुम्हारे शरीर को बांध के रखा है। फिर मां ने ही बता दिया नहीं खा पा रहे हो। इतने लोगों के मुंह से खा रहे हो तुम। है ना? तो ठाकुर नहीं मांगते थे ऐसा नहीं। बालक स्वभाव थे। वो मांगने नहीं मांगने से परे चले गए थे। किंतु मां उनको इस तरह के दर्शन करवा देती थी। टू गो बियों्ड मटेरियल वर्ल्ड। देह हो कि मटेरियल लोभ की चीजें हो। स्पिरिचुअलिटी बियड सफरिंग जो है दे अ पार्ट एंड पार्सल ऑफ़ मटेरियल वर्ल्ड। सो दैट वी हैव टू टेक जन्म मृत्यु जरा व्याधि ये जो सफरिंग कष्ट ये साइकिल चलती रहेगी। वी हैव टू एलिवेट आवरसेल्व्स अबव एंड बियड दैट। स्पिरिचुअलिटी इज़ नॉट फॉर द फॉर द बेटरमेंट ऑफ़ वर्ल्डली लाइफ। स्पिरिचुअलिटी इज़ फॉर द सेक ऑफ़ स्पिरिचुअलिटी इटसेल्फ। माने आध्यात्मिक जीवन तो इस तरह के उदाहरण से भरपूर है ना। जीसस को क्रुसिफाई किया गया तो वह कहते हैं फादर फॉरगिव देम दे नो नॉट व्हाट दे आर डूइंग। राइट? सो वो तो मांग सकते थे कि अच्छा मुझे यहां से नीचे उतारो। वह बहुत कष्ट हो रहा है।

प्रश्न : हमारे यहाँ ठाकुर, माँ और स्वामीजी से आर्थिक या बाह्य जीवन में हमारी उन्नति हो, यह तो हम लोग माँगते ही नहीं हैं। ठीक है ना?

नॉट नेसेसरी। यह आप मंदिर का साइज देखिए जो मेरे पीछे है। कहां मां रहती थी छोटे नहबत में और कहां यह मां के नाम पर यह सब बड़े-बड़े मंदिर बन रहे हैं। [हंसी] नॉट नेसेसरी। अब जैसे सुदामा का उदाहरण है। देखिए इफ यू आर जेन्युइन यू हैव टू पास दिस जेनुइन टेस्ट। राइट? टेस्ट ऑफ बीइंग जेन्युइन। मैं यदि मेरे मन में एक रत्ती भर भी यह भाव है कि मुझे मटेरियल बेनिफिट हो तो फिर मैं उस लेवल पे नहीं पहुंचा। तो सुदामा गया है कृष्ण के पास में संपूर्ण रूप से वो ऐसे जेन्युइन फ्रेंडशिप के सख्य भाव लेकर के एक मन में इतना भी नहीं है कि मैं कृष्ण से कुछ मांगू तो रिजल्ट आया कि जब घर वापस आए तो कृष्ण ने सब दे दिया बट ही हैज़ टू क्रॉस दैट बैरियर देखिए उस उस बैरियर को क्रॉस करने के बाद में कुछ मिलता है नहीं मिलता है वी विल बिकम इनडिफरेंट दैट इज़ अ रियल टेस्ट दैट इज़ अ रियल टेक अवे फ्रॉम द होल थिंग कि वी विल गो बियों्ड दिस फिर मिलता है नहीं मिलता डज नॉट मैटर मिलता है ज्यादातर केस में हमने देखा है और ऐसे भी कैसे केसेस से कुछ नहीं मिला राइट कष्ट में भी जीवन गया है ऐसे भी केसेस है माने जेनुइन साधक के और ऐसे भी साधक है कि आखिर में उनको काफी अब जैसे ठाकुर को ही देखिए ना ठाकुर ने सब कुछ त्याग कर दिया टाका माटी माटी टाका करके किंतु यही ठाकुर जब बीमार हुए तो कैंसर ट्रीटमेंट करने के लिए उनको काशीपुर गार्डन हाउस पूरा भाड़े पे ले गया इतने सारे सारे डिवोटी है उनकी सेवा कर रहे हैं। आज ठाकुर ने लोभ करके वह काली मंदिर का पुजारी का वह पैसा है दो नंबर से जितना मिलता है वह सब कुछ किया होता वुड ही हैव गेट दिस टाइप ऑफ ट्रीटमेंट है ना सब त्याग करके बेस्ट ट्रीटमेंट उनको मिला है यदि [हंसी] रामलाल दादा को यदि ऐसा होता कौन इतनी ट्रीटमेंट करने को जाता हृदय को देखिए आखिर में कपड़े बेचने पड़े घरघर जाकर के माने यू वंस यू गो बियों्ड दैट यू बिकम इनडिफरेंट ठाकुर यही ठाकुर कहते कहते हैं ना जब वो पैसा कलेक्ट करने की बात आई नारायण को कहते हैं तुम्हारे कंधे पे बिठा के जहां पे ले जाओगे वहां पे जाऊंगा भिक्षा का खाना भी खिलाओगे तो भिक्षा का भी खाना खाऊंगा ठाकुर इज रेडी फॉर दैट और फिर बाकी सब आ जाता है मींस फ्रॉम विद इन योरसेल्फ यू हैव टू बी 100% जेन्युइन आप मां को तो मूर्ख नहीं बना सकते ना आप बाकी सबको मूर्ख बना सकते वो हाजरा पीतांबरी पहन के वो माला जप कर रहा है तो कुछ-कुछ ब्राह्मण लोग बड़े ही प्रभावित हो गए थे तो इस तरह से लोगों को आप मूर्ख बना सकते हैं अब भगवान को कहां मूर्ख बनाएंगे आप? हां। माने ठाकुर को ही आप देखिए ना ठाकुर ने जब माने जस जो इच्छा है मथुर बाबू पूरी करता है। सच्चे जरी का पोशाक पहना है सीधा सच्चे जरी का पोशाक आ गया। तकिए पे बैठना है तो तकिया आ गया। वो रूपा के नल वाले हुक्के में वो तंबाकू खाना है वो आ गया। डस दैट मेक एनी डिफरेंस टू ठाकुर नहीं। सोचिए कि कामार पुकुर में ठाकुर रहते थे। वहां पर घर का इतना दरिद्र्य है। सोचा था कि कोलकाता जाकर नौकरी करूंगा। तो नौकरी की तो ऐसी नौकरी की कि इतना बड़ा जमींदार उसका वो पूरा गुलाम की तरह रहा है। तो ठाकुर तो म इतने म ये हो जाने चाहिए ना कि देखिए मैंने बाजी मार ली मैंने जगत जीत लिया। मथुर क्या कहता है नहीं कहता है। इस ठाकुर इस कंप्लीटली डिफरेंट टू दैट।

प्रश्न : मथुर ने जब चाहा कि ठाकुरके नाम पर जमींदारी लिख दे या उनके नाम से इन्वेस्टमेंट कर दे, तब ठाकुर ने उसे भी मना कर दिया। वैसे देखा जाए तो मथुर की सलाह आर्थिक दृष्टि से बिल्कुल उचित थी, फिर भी ठाकुर ने उसे स्वीकार क्यों नहीं किया?

देखिए देखिए देखिए अगेन अगेन अगेन ही यहां पे काव्या ने वो जो कंडीशन है ठाकुर ने अपने लिए नहीं लिए मां के लिए किंतु उन्होंने इन्वेस्टमेंट किया है वो हां वो बलराम बाबू के वो जमींदारी में वो ₹400 ₹500 कितना वो रखा था जिससे कि मां को महीने में इतना रुपया वो वहां से इंटरेस्ट मिले

प्रश्न : ओबेसिटी और तमस, इन दोनों में संबंध है—यह आपने ठीक ही कहा। हमें भी अब अपने वेट के बारे में थोड़ा सावधान होना होगा।

अभी देखिए मेरा भी ओबेसिटी है ऐसा मेरा भी तो ओवरवेट हूं मैं भी एटलीस्ट मैं पैर घिसट करके नहीं चलता देखिए कोई कैसा भी हो जब तक वो ऐसा कुछ ना करे जिससे कि हमको इरिटेशन हो हम ज्यादा ध्यान नहीं देते वो मोटा है तो है अभी क्या करें वो पैर घिसट के जो चलता है वो मुझे बड़ा इरिटेट करता है नहीं राजा महाराज महाराज को देखिए स्वामी जी को देखिए दोनों तो मोटे थे हां म शरद महाराज शरद महाराज शशि महाराज वो सभी तो स्थूलकाय हो गए थे आखिर आखिर में वो जो शरद महाराज का इतना वो फनी विवरण है राममई महाराज गौरेश्वरानंद जी लिखते हैं कि वो मां का घर है ना जयराम बाटी का वो सीधे घुस नहीं पाते थे वो दरवाजे में ऐसा साइड में होकर के उनको भीतर में जाना पड़ता था ना गांव में नेचुरली लोग स्लिम ही होंगे ना गांव में मोटापन का प्रश्न नहीं नहीं खेत में काम करना है खाना सिंपल है अभी ये बेचारे कोलकाता से गए वो अच्छे से वो मिठाईठाई खा करके और दिन भर डेस्क के ऊपर में बैठ के लिखते रहना है जीएस का काम करना है जनरल सेक्रेटरी का बट इन जनरल इट इज ऑलवेज गुड टू नॉट टू हैव ओबेसिटी क्योंकि इवन राजा महाराज को डायबिटीज हो गया था सबको तो आखिर में स्वामी जी 39 में चले गए डायबिटीज था वो अस्थमा था हाइपरटेंशन था हार्ट डिसीज था वो अमरनाथ गए तो हार्ट एनलार्ज हो गया था। म ऐसा करके ही तो मिस मूलर दूर हो गई ना। मिस मूलर है, ईटी स्टडी है। वो लोग सब ट्रेडिशनल स्पिरिचुअलिटी उन्होंने ईटी स्टडी इंडिया आकर के हिमालय में वो स्टडी करके गया है। वो कहता है स्वामी जी को आप किस तरह के साधु हैं? आप नॉनवेज खाना खाते हैं, सिगार स्मोक करते हैं। फिर आपका लाइफस्टाइल पूरा साधुओं का जैसा नहीं है। बोल करके ही तो ये लोग स्वामी जी से दूर हो गए कि अपेरेंटली जो एक हीलिंग ये जो थियोसोफी का एक जो पूरा कांसेप्ट था ना कि आप हीलिंग कर सकते हैं। महात्मा देख सकते हैं। वो सब तो कहां है स्वामी जी में बोल के तो ये लोग दूर हो गए।

प्रश्न : स्वामीजी ने अपने देह में बीमारी को भी आने दिया। साथ ही उनका लाइफस्टाइल भी काफी नॉन-ट्रेडिशनल था—वे बंगाली लोगों का पारंपरिक नॉन-वेज खाना खाते थे, सिगार स्मोक करते थे, और थोड़ा ओबेसिटी भी था। फिर जिस तरह उन्होंने शंकराचार्य आदि के इंटरप्रिटेशन को रिजेक्ट करके उपनिषदों को सीधे समझाने का प्रयास किया, उससे हमें लगता है कि स्वामीजी यह सिग्नल देना चाहते थे कि आध्यात्मिक जीवन के प्रति उनका एप्रोच काफी अलग था। क्या यह बात ठीक है?

देखिए यहां पर दो पॉइंट है। एक तो है कि उनका लाइफस्टाइल माने जो आप पॉइंट आउट करना चाहते हैं स्मोकिंग करते हैं ऐसा ट्रेडिशनल योगिक वह जो हठ योग सीखने को गए थे वैसे हेल्थ के लिए वो स्वामी जी बार-बार कहते हैं कि यह जो बंगाल में जन्म लेकर के भेतो शरीर बेंगली लोग भात खाते हैं तो तो भात खाने वाला भेतो शरीर इसको लेकर के ज्यादा तपस्या हुई नहीं इस जन्म में तो हठ योग सीखने का प्रयास करते हैं। अल्टीमेटली ही अबेंडों्स एवरीथिंग। राइट? सो यहां पर मेरा जो एक थिंकिंग है ऐसा नहीं है कि जिसको कि हम एक आयुर्वेद के और योग के सिद्धांत पे जो एक डिसिप्लिन लाइफस्टाइल है उसको स्वामी जी रिजेक्ट कर रहे हैं। प्रॉब्लम इज कि आज की जो जनरेशन है ना वो गुरुकुल ब्रह्मचर्य आश्रम में से हम पसार ही नहीं हुए हैं। कि व्हिच इज अ टाइम टू लर्न एवरीथिंग। अब बूढ़े होने के बाद में 30 40 50 के बाद में यह सब सीखने का कोई अर्थ ही नहीं है। वह सीख भी नहीं पाएंगे। वह टाइम है जैसे हम स्कूल में भर्ती होते हैं किरगार्डन में से बाल मंदिर में से तभी से यह सीखने का टाइम है। तो वो हमने सीखा नहीं। वो टाइम हमारा स्किप हो गया है। तो यह जो जनरेशन है यह कहीं आध्यात्मिकता से विमुख ना हो जाए बोलकर के स्वामी जी का इस तरह का लाइफस्टाइल है। स्वामी जी एक ट्रेडिशनल गुरुकुल पद्धति में पढ़कर के आते और जो कहते उनका जो माइंडसेट रहता उसके साथ में अपना कोई कनेक्शन कभी बैठता ही नहीं। बोल के ही आल्सो कम्स फ्रॉम द सेम बैकग्राउंड एस कि हम लोग जनरली आते हैं। एक मिडिल क्लास एजुकेटेड फैमिली पिताजी एटर्नी है तो घर में एक मोर और लेस आपका खानेपीने का दिक्कत नहीं है। पढ़ाई लिखाई का माहौल है। करियर बनाना है। यह जो एक मिडिल क्लास माइंडसेट है जो कि आज ज्यादातर लोगों का है। दैट वाज़ स्वामी जी का। बोल के इन द कॉन्टेक्स्ट ऑफ दिस माइंडसेट स्वामी जी ने जो कहा वी फील वेरी वी कैन आइडेंटिफाई आवरसेल्व्स विद दैट किंतु दिस कैन नॉट बी ए इटरनल सॉल्यूशन गुरुकुल को वापस लाना होगा आज की जनरेशन नहीं कल की जनरेशन कल की नहीं तो परसों की जनरेशन ये गुरुकुल ब्रह्मचर्य आश्रम जो है वी नीड टू ब्रिंग इट बैक एजुकेशन सिस्टम को फंडामेंटली हमको रिफॉर्म करना होगा वैदिक जो लाइफस्टाइल है आयुर्वेदिक जो लाइफस्टाइल है उसकी ओर जाना होगा। सो दैट इज़ अ फॉर अ फ्यूचर जनरेशन टू मैनेज। सो फार आज की जनरेशन के लिए स्वामी जी का जो बैकग्राउंड है राजा महाराज का जो शरद महाराज का वी कैन इज़ली आइडेंटिफाई आवरसेल्व्स विथ देम। सो दैट इज़ ये गैप ना हो जाए बोलकर के उनका इस तरह का बैकग्राउंड है। सो दैट इज़ वन थिंग एंड ऑफ कोर्स जहां तक उनकी फिलॉसोफी का प्रश्न है ही वाज़ नॉट अ ट्रेडिशनलिस्ट। किंतु बस ट्रेडिशन तो अभी का है ना। भारत की ये जो 10,000 20,000 साल का ये जो हिस्ट्री है उसमें 1000 साल तो इज़ अ ब्लिंक ऑफ एन आई। तो ऐसा कहना कि शंकराचार्य इज़ अ ट्रेडिशन। सो डजंट दैट मींस वी डू नॉट नो आवर ट्रेडिशन कि कितना पीछे तक जाता है। स्वामी जी ने स्पष्ट कहा है शंकराचार्य तो माने जो आचार्य लोग हैं पंडित जी मात्र थे। उनका एक दर्शन और एक कॉम्प्लिकेटेड थ्यरी खड़ा करना दैट वास देर एम। अदरवाइज तो जो आध्यात्मिक जो धरोहर है राम और कृष्ण से प्रारंभ होती है। दैट इज आवर रियल धरोहर। तो गीता पढ़िए आप यह जो रामायण पढ़िए देखिए कि कितना उदात भाव है वहां पे अब मां के प्रसंग पढ़ना शुरू कर दीजिए। देखिए वो कोई थ्यरी आपको मैं यहां पे एक आते हैं एक डिवोटी उनके साथ में मैं कभी-कभी वेदांत चिंतन करता रहता हूं। तो कभी-कभी यह होता है डिस्कशन अह कि अच्छा यह यह थ्यरी इस तरह की है। अब जैसे रिसेंटली एक डिस्कशन हुआ कि ये मांडूक्य उपनिषद में अजातिवाद को लेकर के तो ठीक है। एक अच्छा डिस्कशन हुआ इंटेलेक्चुअल। किंतु उसके साथ में आप मां का लाइफ देखिए। हजार मांडूक्य उपनिषद पढ़ लीजिए। हजार अजातिवाद की चिंता कर लीजिए। तो मां का जीवन पढ़ के ही कितना सब कुछ स्पष्ट हो जाता है। माने आध्यात्मिकता कहां पे है? मां के जीवन में अब ऐसा कहेंगे कि मांडूक्य उपनिषद इज ग्रेटर देन मदर्स लाइफ तो मैं कहूंगा ना ही मदर्स लाइफ समझे ना ही मांडूक्य उपनिषद समझे। [हंसी] और फिर वहां पे प्रॉब्लम क्या है कि आपको करके सब कुछ हासिल करना है। राइट? यहां पे तो आपको बनाया खाना पड़ा है। आप ध्यान करने को बैठिए। मन एकाग्र नहीं हो रहा। आप मांडूक्य उपनिषद पढ़ेंगे तो और ज्यादा हो सकता है डिस्टर्ब हो जाएगा। किंतु मां के दो प्रसंग पढ़िए फट करके मन एकाग्र हो जाएगा। फिर से आपका ध्यान आधे घंटे के लिए तो पक्का है। फिर डिस्टरबेंस हो फिर से मां को पढ़िए। देखिए घंटों के बाद घंटों तक यू कैन गो ऑन मेडिटेटिंग नेवर एनी प्रॉब्लम। ये मैं एकदम आपको पक्का अनुभव के साथ कहता हूं। यहां पर मेरा जो कमरा है चारों ओर ऐसा फॉरेस्ट जैसा है। एकदम शांत जगह है। अभी रात को मैं कभी-कभी मेरी देरी तक पढ़ने की हैबिट है। तो पहले बहुत कुछ पढ़ता था। अभी मैं यही सब ठाकुर मां स्वामी जी यही सब पढ़ता रहता हूं। तो अब जैसे कि मां की किताब खोल करके अब जैसे मैं ये न्यू डिस्कवरी पढ़ रहा हूं आजकल। तो तीनचार प्रसंग पढ़े फिर आंख बंद करके लेटे माने सोते-सोते ही तीन चार प्रसंग पढ़े और फिर मेरे पास में ना वो डेस्क लैंप है इस तरह का वो एक डेस्क लैंप है तो इससे क्या है कि वो आपको वो ट्यूबलाइट करने की जरूरत नहीं है आप इतना वो जो जहां पे लाइट चाहिए उतना ही लाइट रहेगा तो ये डेस्क लैंप में पड़ना है थोड़ा सा पड़ा फिर इसको बंद करके लेटे रहना है एकदम शांति है अंधेरा है और आपका मन कहां वहां विचरण करता रहेगा। फिर 15 20 मिनट आधे घंटे के बाद में लगा अच्छा ठीक है थोड़ा जमीन पे आता है तो फिर चलो थोड़ा सा और पढ़ ले दो-तीन प्रसंग वो पढ़ लिया फिर आपका 15 20 मिनट आधे घंटे तक वो हवा में उड़ता है। सो रात ऐसे जाती है पता नहीं चलता। मैं कई रात तक मैं सोता तक नहीं हूं। उन्हें मुश्किल से 3:00 बजे नींद आएगी। 3 से 5:00 बजे तो मंगल आरती है। आई डोंट फील टायर्ड एट ऑल। क्योंकि फिर इस टाइम मुझे क्लास लेना है। टायर्ड होने से तो फिर मुंह से शब्द ही नहीं आए। लाइफ का दो बेनिफिट है ना। एक तो देखिए अंडरस्टैंडिंग बहुत इजी हो जाता है। दूसरा कि ये तो बना बनाया खाना है। शास्त्र क्या है? आपको इंग्रेडिएंट्स देते हैं। आप खाना बनाइए। लाइफ तो बना बनाया खाना है। खा लीजिए। सीधा आपका ध्यान में चले गए। वरना आजकल वो कहते हैं ना सभी चीजों के लिए टेबलेट है। आपको वो विटामिन की टेबलेट है, प्रोटीन की टेबलेट है या वो मेडिटेशन की टेबलेट है। ओम