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Sri Ramakrishna Lila Prasanga ·

साधक भाव : Ch. 1 साधक और साधना || श्रीरामकृष्ण लीलाप्रसंग : स्वामी सारदानन्द रचित || 29 May 2025

prayer

ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः श्री श्री रामकृष्ण लीला प्रसंग स्वामी शारदानंद जी शरद महाराज द्वारा लिखित इसका द्वितीय खंड है साधक भाव इसका इसकी की अवतरणी का इसका इंट्रोडक्टरी जो चैप्टर था हमने कंप्लीट कर दिया कल और आज से हम इसका फर्स्ट चैप्टर का पाठ प्रारंभ करेंगे। फर्स्ट चैप्टर का नाम है साधक और साधना। साधक और साधना। इसमें बेसिकली

साधना के कुछ मुलभुत तत्त्वों के बारे में विचार

शरारत महाराज हमको कहते हैं कि ठाकुर की साधनाओं का विवरण पढ़ने से पहले थोड़ा बहुत साधना क्या है? भारतीय शास्त्रों में भारतीय धर्म ग्रंथों में साधना के बारे में क्या कहा गया है? साधना का किस तरह से परिचय दिया गया है? सही साधना क्या है? और साधना के नाम पर जो गड़बड़ घोटाला चलता है, वह क्या है? तो इस तरह से एक एनालिसिस शरद महाराज, शारदानंद जी महाराज हमारे सामने रखते हैं। थोड़ा सा पाठ करते हैं। फिर इसके बारे में चर्चा करेंगे। क्या कहते हैं महाराज जी ठाकुर जीवन साधक भा परिचय जोथा जोथो पते होले आमादिको के साधना कहा के बोले तद विषय प्रथमे बुझते होइबे ठाकुर के जीवन में साधक भाव का ठीक ठीक यथायत ठीक-ठीक परिचय प्राप्त करने से पहले यदि प्राप्त करना है तो हमको साधना किसको कहते हैं इसके बारे में पहले समझना ना होगा अने के हो तो एक कथा भाभी बहन भारत तो चिरोकाल कोनो ना कोनो भाे धर्म साधने लािया रहया छे तबे ओ कोथा आभार पाडिया पंथी बाड़ाो केनो यदि आप ऐसा कहते हैं कि ठाकुर की साधनाओं का विवरण पढ़ने से पहले ठाकुर ने जो साधना शास्त्र है उसमें साधना के बारे में क्या कहा गया है उसको एक साधारण रूप में बहुत ज्यादा डिटेल में नहीं किंतु उसके जो मूल तत्व है उसके जो फर्स्ट प्रिंसिपल्स है उसके जो बेसिक आइडियाज है उसके बारे में थोड़ा सा चिंतन करना होगा। तो यह बात पढ़कर के कोई कोई हो सकता है कि इस तरह से सोचेंगे कि भारत में तो चिरकाल हमेशा से कोई ना कोई रूप में कोई ना कोई भाव में धर्म साधन लग चलता ही रहता है। तभी तो फिर यह फिर वही धर्म साधन की बात फिर से उपस्थित करके पंथी बाड़ानो केनो यह पंथी अर्थात कि थोथा जिसको कहते हैं यह पुस्तक यह पुस्तक की साइज बढ़ानी क्यों यदि आप कोई भी आप धर्म ग्रंथ खोल के देख लीजिए अभी यह प्रश्न भी तो थोड़ा सा वैलिड है क्योंकि देखिए कि जिनको साधना में थोड़ा बहुत इंटरेस्ट है धर्म जीवन में इंटरेस्ट है वही लोग ठाकुर की यह जो प्रामाणिक जीवनी है उसको पढ़ने का प्रारंभ करेंगे तो जिनको यदि साधना में धर्मशास्त्र में आध्यात्मिकता में ईश्वर प्राप्ति में थोड़ा बहुत रस है उसने कोई ना कोई धर्मशास्त्र तो पहले पढ़ा ही होगा चाहे श्रीमद्भगवत गीता हो चाहे यह श्रीमद् भागवत हो चाहे यह योग वाशिष्ट हो चाहे यह प्रकरण ग्रंथ हो पंचदशी जैसे या तो फिर यदि उनकी कैपेसिटी ज्यादा है तो फिर यह उपनिषद है या तो फिर शंकराचार्य की जो टीकाएं हैं जो भाष्य है प्रस्थान त्रय के ऊपर में उसमें से कुछ ना कुछ तो पढ़ा ही होगा और यह तो अभी क्या है कि हमारे मूलभूत ग्रंथ है इनके अलावा प्रत्येक स्टेट में प्रत्येक प्रांतर में आप जाइए। वहां के जो स्थानिक संत महात्मा है उनका जीवन चरित्र भी बड़े ही विस्तृत स्वरूप से लिखा गया है। जैसे कि गुजरात में जाएंगे तो नरसिंह मेहता है या मीराबाई है। यदि बंगाल में जाएंगे तो चैतन्य महाप्रभु है। यहां पर साउथ इंडिया में आएंगे। इतने सारे संत हो गए। एक के बाद एक तो सभी के जीवन चरित्र बड़े ही विस्तृत रूप से लिपिबद्ध किए गए हैं और जिसको आध्यात्मिकता में इंटरेस्ट होगा उसने उसमें से कुछ ना कुछ तो पढ़ा ही होगा तो वह बेसिक अंडरस्टैंडिंग के साथ में ही ठाकुर की यह जीवनी पढ़ने के लिए आता है। तो फिर ठाकुर की बायोग्राफी के बारे में डायरेक्ट बात चालू नहीं करके ठाकुर के जीवन का विवरण सीधा प्रारंभ नहीं करके यह जो एक डिटूर है या तो फिर यह एक बफरकेशन या तो कहेंगे कि एक साइड एक प्रोजेक्ट क्यों ओपन कर दिया है? क्यों आप हमको धर्म ग्रंथ के जो मूलभूत तत्व है वह समझाने को बैठे हैं। इस तरह का कोई ना कोई ऑब्जेक्शन खड़ा हो ही सकता है। आबोहमान काल होते भारत आध्यात्मिक राज्य शोल साक्षात प्रत्यक्ष करते निज जातीय शक्ति जतो दूर व्यय करिया आशिया छे एवं एकनु करते छे पृथ्वी अपर कौन देश कोन जाति एतो दूर करिया छे हमेशा से आहोमान काल होइते भूतकाल पुरातन समय से सनातन समय से देख लीजिए भारत में आध्यात्मिक राज्य के जितने भी सत्य है उसको साक्षात प्रत्यक्ष करने के लिए हमने हमारी जातीय शक्ति जितनी दूर खर्च की है और कर रहे हैं उस उतनी जातीय शक्ति पृथ्वी के दूसरे कौन देश की कौन जाति ने इतना दूर खर्च किया है भारत में देखिए स्वामी जी का जो वह फेमस ऑब्जरर्वेशन है जब वह भारत में आए लेक्चर फ्रॉम कोलंबो टु अल्मोड़ा अल्मोड़ा अह कोलंबो में यानी कि यह जो श्रीलंका आज का वहां से जो उन्होंने प्रवचन परंपरा प्रारंभ की तो पूरा भारत भ्रमण करके उन्होंने जो भारतीय संदेश उनके जीवन में भारतीयों को जो संदेश देना था वह जो उन्होंने दिया उसमें स्वामी जी का एक फेमस ऑब्जरर्वेशन है कि दो परंपरा पराए है दो तरह की टू टाइप्स ऑफ सिविलाइजेशंस दो तरह की सिविलाइजेशन है दो तरह की सभ्यता है एक सभ्यता या तो एक सिविलाइजेशन को आप वेस्टर्न सिविलाइजेशन कहिए जिसको कि वे लोग हेलेनिक सिविलाइजेशन कहते थे हेलेनिक सिविलाइजेशन अर्थात कि ग्रीस और रोम से जो प्रारंभ हुई या तो ओरिजिनली जो ग्रीस और रोम के द्वारा डेवलप की गई वो हेलेनिक सिविलाइजेशन और अपने यहां पे यह पूर्वीय सिविलाइजेशन ईस्टर्न सिविलाइजेशन जिसका कि सबसे पुरानी सभ्यता आपको वेद में दिख जाएगी। तो एक है यह वेस्टर्न हेलेनिक सिविलाइजेशन दूसरी ओर है अपनी ईस्टर्न वैदिक सिविलाइजेशन। इन दोनों में डिफरेंस क्या है? तो यह हेलेनिक यूरोपियन वेस्टर्न सिविलाइजेशन ने हमेशा बाह्य प्रकृति को समझने का बाह्य प्रकृति के विज्ञान को खोज निकालने का बाह्य प्रकृति के ऊपर में विजय प्राप्त करने को ही अपने सिविलाइजेशनल अल्टीमेट एम या तो फिर सर्वोच्च उद्देश्य माना है। जबकि यह वैदिक ईस्टर्न सिविलाइजेशन है। हम लोगों का जो सर्वोच्च धेय है जीवन का जो सबसे बड़ा सपना है वो है यह आंतर जगत में एक्सप्लोरेशन आंतर जगत को समझना इनर वर्ल्ड या तो फिर यह कॉन्शियसनेस या तो फिर यह आध्यात्मिकता या तो फिर यह ईश्वर तत्व या तो फिर यह धर्म उसको समझने का उसके विज्ञान को खोज निकालने का और उसमें विजय प्राप्त करने का या तो फिर कहेंगे कि उसमें जो सर्वोच्च धेय है आत्म साक्षात्कार या तो फिर ईश्वर दर्शन उसी को ही अपना सिविलाइजेशनल एम मान के चले हैं। और स्वामी जी साथ-साथ में यह भी कहते हैं कि जिस दिन बेस्ट एलिमेंट ऑफ वेस्टर्न सिविलाइजेशन विल कंबाइन और फ्यूज विद द बेस्ट एलिमेंट ऑफ ईस्टर्न सिविलाइजेशन। उस दिन देखेंगे कि भविष्य की नई सिविलाइजेशन की रचना होगी। तो यह स्वामी जी का ड्रीम था। अभी यहां पर स्वामी जी हमको साथ-साथ में स्वामी विवेकानंद साथ-साथ में यह भी एक बात के बारे में हमको यह बताते हैं कि देखिए कि बेस्ट एलिमेंट लेने हैं। नहीं कि यह जो धर्म के नाम पर जो अंधश्रद्धा है, धर्म के नाम पर जो कुरिवाज है, धर्म के नाम पर जो विधवाओं को जिंदा जला देते हैं। धर्म के नाम पर जो बच्चियों का 10 साल की बच्चियों का विवाह करवा देते हैं। वह जो सब कुरीतियां है उसका जो प्रारंभ हुआ उसके ऐतिहासिक कारण है। स्वामी जी हमको ऐतिहासिक कारण बताते हैं। किंतु जो भी है उस कारण जो भी हो आज के आधुनिक युग में उसका कोई भी उसकी यह आवश्यकता नहीं। उसका कोई प्रयोजन नहीं। सो बेस्ट एलिमेंट ऑफ एस्टर्न सिविलाइजेशन दैट इज उपनिषद, पुराण, प्रकरण ग्रंथ, वेदांत की जितनी भी स्कूल है, योग की जितनी भी साधनाएं हैं उसको लीजिए और साथ में ही बेस्ट एलिमेंट ऑफ ये वेस्टर्न सिविलाइजेशन। यानी कि यह डेमोक्रेटिक जो पॉलिटिकल सिस्टम है, यह मॉडर्न इकोनॉमिक्स है। या तो फिर यह साइंस एंड टेक्नोलॉजी है, इंडस्ट्रियलाइजेशन एंड मैन्युफैक्चरिंग है, यह स्पेस एक्सप्लोरेशन है, फंडामेंटल साइंस है। इस सबको आप लीजिए और दोनों को कंबाइन करके बेस्ट सिविलाइजेशन बनाइए। यह जो स्वामी जी का सपना था यहां पर शरद महाराज देखिए कि उसका एक अंदाज हमको देते हैं। क्या कहते हैं कि ठाकुर के जीवन के बारे में जानने के लिए आपको धर्म के मूलभूत अंशों को फर्स्ट प्रिंसिपल्स ऑफ रिलीजन या तो फर्स्ट प्रिंसिपल्स ऑफ स्पिरिचुअलिटी उसको फिर से एक बार समझ लेना होगा। क्यों? बाद में महाराज जी कहेंगे क्योंकि इतनी सारी ये जो सुपरस्टिशियन हमारे धर्म के साथ में एक समय जुड़ गई थी पिछले कुछ 100 सालों में कुछ हजार साल में क्योंकि यह बाह्य आक्रमण फिर यह बौद्ध धर्म में जो यह पतन हुआ उसका करप्शन प्रारंभ हुआ तो इंटरनल एज वेल एज एक्सटर्नल कॉम्प्लिकेटेड क्वेश्चंस है और हम लोग हिंदू होकर के सिर्फ यह बाह्य आक्रमण और बुद्धिस्ट लोगों के ऊपर में सब जवाबदारी डाल दे वह भी ठीक नहीं है। हमारे खुद के भीतर में यह जाति नाती प्रथा इतनी गहराई से प्रवेश कर चुकी थी कि स्वामी जी स्वामी विवेकानंद को कहना पड़ा जब यह केरल गए थे। कहा कि यह पूरा पागलागराद है। यह पागलखाना है। यह देश पूरा यहां पर वह जो उस समय की जो नीची जाति कहलाते थे उन लोगों को एक घंटी लेकर के हाथ में चलना पड़ता था। यदि कोई उच्च जाति का उच्च वर्ण का कोई सामने आ जाए तो उसके ऊपर में अपनी परछाई ना गिरे इसलिए घंटी बजानी पड़ती थी। यह सब पागलपन चल रहा था। आजकल देखिए कि भारत बहुत हद तक इस सब चीजों से मुक्त तो हो गया है किंतु यह जब चीजों की वजह से अपने हिंदू धर्म के जो कोर प्रिंसिपल है उसके ऊपर में इस तरह का एक क्या कहेंगे कि दुरनाम हो गया है हमारा हमारे नाम पे एक ऐसा बट्टा लग गया है ऐसा एक हमारा नाम खराब हो गया है हिंदू धर्म के कोर प्रिंसिपल का कि आप देखेंगे कि ये जो सेकुलरिज्म या तो फिर यह सेकुलरिज्म के साथ में आजकल जितनी भी आईडियोलॉजीस चलती है उन सबका ये जो इन सब का जो राइज इसीलिए हुआ ये सब का डेवलपमेंट इसीलिए हुआ और इन सब का फैलावा भी इसी तरह से हुआ कि यदि हिंदू धर्म हमको डिग्निटी नहीं देता है हिंदू धर्म की ये जो उच्च वर्ण के सो कॉल्ड उच्च वर्ण के लोग हैं वो हमको यदि हमारी जो लाइफस्टाइल के ये जो जीवन जरियात की चीजें हैं वो वो हमको प्रोवाइड नहीं करते हैं। यानी कि एक डिग्निटी के साथ रहना, एक डिग्निफाइड एंप्लॉयमेंट होना, एक डिग्निफाइड फैमिली लाइफ होना, यह गांव का यह जो मंदिर है या तो फिर यह गांव का जो कुआं है उसमें से हमको पानी नहीं लेने देना, मंदिर में जाकर के प्रार्थना नहीं करने देना। तो फिर इस तरह के धर्म के साथ में रहने से हमको क्या लाभ है? तो यह सब चीजें यहां पे बहुत फैली भारत में। तो इसीलिए यहां पर शरद महाराज को यह बात पता थी। इसलिए वह कहते हैं कि देखिए धर्म के नाम पर आप लोगों ने बहुत कुछ पढ़ा होगा सही। किंतु जो पढ़ा होगा उसमें बहुत सारा कचरा भी प्रवेश कर गया होगा। तो वह कचरा निकाल करके ठाकुर का ठाकुर की जो साधना है वह धर्म के जो सर्वोच्च प्रिंसिपल है गोल्डन रूल्स है उसके ऊपर में बनी है। नहीं कि यह देश काल के रिलेटेड एक नियम कोई बना के गया आज से हजार साल पहले फिर वह देश और काल तो चले गए। वह पात्र भी चले गए उस नियम जिसको लागू होता था इन लोगों को और किंतु आधुनिक युग में वही पुराने-पुराने नियमों को बिल्कुल आउट ऑफ टर्न ट्विस्ट करके तोड़ मरोड़ करके विकृत करके आप लोग जो चला रहे हैं इसको धर्म नहीं कहते सनातन हिंदू धर्म नहीं कहते और इसके ऊपर में ठाकुर ने अपनी साधनाओं की नीव या तो फिर भित्ति या तो फाउंडेशन नहीं रखा। रखा था। तो यह बात स्पष्ट करने के लिए क्योंकि क्या है कि जैसे-जैसे ठाकुर का जीवन पढ़ते जाएंगे जब तक वह और ईश्वर है तब तक तो कोई प्रश्न नहीं है। भारतीय शास्त्रों में ईश्वर के साथ में आपका क्या रिलेशन हो आपको प्रचंड फ्रीडम दिया हुआ है। होल स्पेक्ट्रम ऑफ चॉइसेस आपके लिए ओपन करके रखा है। किंतु जैसे स्वामी विवेकानंद कहते हैं कि देखिए यह अगेन जो यह डिफरेंस है विश वेस्टर्न सिविलाइजेशन और यह इंडियन सिविलाइजेशन इन दोनों के बीच में वेस्ट में देखेंगे कि उनका जो धर्म है क्रिश्चियनिटी इतना रिजिड है। इतना वो कहेंगे कि वह आपको सोचने का थोड़ा सा भी फ्रीडम नहीं देता। किंतु वहां की जो सोशल सिस्टम है वह बड़ी लिबरल है और आपका यह जो सोशल लाइफ है उसमें आप जिस तरह के एक्सपेरिमेंट करना चाहे कर सकते हैं। भारत में किंतु रिवर्स है। जहां तक एक साधक का अपने इष्ट के साथ में संबंध जाता है। वहां पे आपको पूरी दुनिया का फ्रीडम दिया हुआ है। आप चाहे अपने को इष्ट के दास या तो इष्ट के गुलाम या तो फिर इष्ट के मित्र सखा ना कि इष्ट के प्रेमी ना कि आप जो भी संबंध इष्ट के साथ में बांधना चाहे आप बांध सकते हैं और अपने आध्यात्मिक जीवन को उन्नत कर सकते हैं। किंतु जहां तक यह सोशल लाइफ आपका जाता है। इतना रिजिड रिस्ट्रिक्शन है। किसके साथ में बैठकर खाना है? किसके साथ में विवाह करना है? किसके साथ किसको किसके घर फंक्शन में जाना है? किसको अपने घर में बुलाना है? किसके साथ में व्यवहार करना है? सब तरह का रिस्ट्रिक्शन हमारे सामाजिक जीवन में लगा हुआ है। तो इस तरह के रिजिड सामाजिक जीवन में बाद में ठाकुर ने यह जो धर्म अद्वैत वेदांत का यह जो उदार भाव है या तो फिर अद्वैत वेदांत ही क्यों? भारतीय सनातन धर्म का जो उदार भाव है जो कि एक साधक को अपने ईश्वर या तो इष्ट के साथ में इतना फ्रीडम देता है वो उदार भाव को यदि आप सोसाइटी में या तो समाज में प्रचलित करेंगे तो दुनिया भर की बाधा आएगी। देखिए कि ठाकुर और मां स्वामी जी की बात अभी छोड़ देते हैं। ठाकुर और मां दोनों को देखिए कि उन्होंने हाईएस्ट लिबरल आइडियल्स है। उस आइडियल्स के बेस पर अपनी साधना की थी। किंतु साथ में ही यह जो स्वामी जी का ऑब्जरवेशन है कि अपना बहुत ही रिस्ट्रिक्टेड समाज है। तो बड़े ही रिस्ट्रिक्टेड समाज में बड़ा रिस्ट्रिक्शन पूर्वक उन्होंने जीवन जिया था। ठाकुर का तो फिर भी ठीक है। वह तो पुरुष थे। स्त्रियों को अवस्था देखिए उस समय की। मां की देखिए मां का जीवन पढ़िए। छोटे से नहबत में मां कहती है कि उसी के भीतर में पूरा संसार था। दिन के दौरान शौच जाने की भी सुविधा नहीं थी। शौच का वेग धारण करके आखिर में पेट का रोग लग गया। तो ऐसी परिस्थिति में सब समय घुमटा टान के रहना है। पुरुषों के सामने नहीं आना है। लज्जा पटा वृता ठाकुर ने कहा था कि लक्ष्मी दीदी का ऐसा था कि सब जो उनका जो एक वैष्णव भाव था उनका तो ठाकुर ने मां शारदा देवी को कहा था कि और ताले और लय और ताले ताल दिए तुम ही अपनी अपना तुम निज लज्जा भेंगो ना अर्थात कि उसके साथ में कदम से कदम मिला करके या तो फिर उसके ताल में ताल मिला करके लक्ष्मी के अनुकरण करके लक्ष्मी का अनुकरण करके करके तुम अपनी लज्जा मत भांगना। तो फिर देखिए कि यह जो रिस्ट्रिक्टेड सामाजिक जीवन था उसके भीतर में भी उन्होंने धीरे-धीरे करके इन उदार तत्वों को प्रवेश करवाया था। किसी ने भी इन दोनों का विरोध ऑर्थोडॉक्स समाज जो था उस समय का रूढ़च समाज उन्होंने कभी भी मां और ठाकुर का विरोध किया हो। ऐसा रेयरली कभी पढ़ने को आता है। कुछ-कुछ घटनाएं हैं। किंतु फिर वह पागलपन और हद से बाहर जाकर के यह सब हुआ है। खास करके यह जो जयराम

कहानी: जयरामबती के रूढ़िवादी ब्राह्मणों ने माँ शारदा से जुर्माना वसूला

भाटी में नाथ और जात का इतना था कि एक बार यह ब्राह्मण भोजन चल रहा था। उस समय जो मां के ये जो त्यागी संतान थे कोलपाड़ा के लड़ के कोलकाता से जो कोई गए होंगे तो वे लोग वे लोग थे सन्यासी किंतु क्या है कि अभी सन्यासी सन्यास ले लिया है तो आप जाति धर्म वर्ण से तो ऊपर हो गए हैं किंतु ऐसा नहीं यह जो ब्राह्मण लोग खाने को बैठे थे देखा कि वह त्यागी संतान परोस रहे हैं तो उनको तो पता है कि वह तो ब्राह्मण शरीर नहीं है वो साधु हो गए तो क्या है ब्राह्मण शरीर नहीं है। तो यह लोग सब नाराज होकर के खाना बंद कर दिया और कहा कि क्यों यह जो ये जो अब्राह्मण जो है वह ब्राह्मण को परोसेगा क्यों? ऐसा करके वह खाना छोड़कर के खड़े हो गए। मां बेचारी अपने सर पर वह साड़ी ऐसा घूंघट टान करके सबको विनती कर रही है कि अरे आप इस तरह से चालू खाने में खड़े होकर के अधूरा खाना छोड़कर के खड़े होकर चले जाएंगे तो अकल्याण होगा। किसका अकल्याण होगा वह आप समझ लीजिए तो अकल्याण होगा आप मेट करके खा लीजिए किंतु यह ब्राह्मण लोगों का भी यह जो अभिमान था जाति अभिमान इतना स्ट्रांग था कि वो खाना अधूरा छोड़कर के चले गए अभी यह बात वो जो मां के वो जो सोल्जर थे काइजर म वो ललित बाबू वो जो मां के वो वीर शिष्य उनके कान में गई तो वह आए एक दिन वहां पे बंदूक ले आए वो जाकर के पहले तो चालाकी ऐसी की कि ग्रामोफोन था वो गांव के बीच में जाकर के और ग्रामोफोन चालू किया। अब यह ब्राह्मण लोगों ने सिर्फ खाना छोड़कर के चले ही गए या तो मां का अपमान किया। ऐसा नहीं मां के पास में से दंड भी वसूल किया था। तो यह तो एक पागलपन की हद आ गई। तो तो यह ललित बाबू ग्रामोफोन चालू किया गांव के बीच जाकर के। तो ये जितने भी थे ये जो सब मुरब्बी गांव के वो ब्राह्मण लोग वो सुनने के लिए इकट्ठा हो गए कि अच्छा इस तरह का ग्रामोफोन तो कभी सुना नहीं क्या है थोड़ा सा सुनते हैं तभी जैसे सब लोग इकट्ठा हुए तो ललित बाबू ने वह ग्रामोफोन बंद किया वो बंदूक निकाली और हवा में फायरिंग करके कहा कि अभी का अभी मां के पास में से जो दंड वसूल किया है वापस दे दो वरना सबको गोली मार दूंगा तो वे लोग बेचारे डर के मारे पैसा वापस दे दिए तो ऐसी कुछ-कुछ घटनाएं आपको शायद मिलेगी। किंतु बाय एंड लार्ज जनरली स्पीकिंग कि आपको यह जो इनका जो फ्रीडम या तो लिबरलिज्म जो था आध्यात्मिक जीवन में उस आध्यात्मिक जीवन के लिबरलिज्म या तो फ्रीडम को यह ठाकुर और मां दोनों ने सामाजिक जीवन में भी प्रसारित किया था। सामाजिक जीवन में भी प्रवेश करने दिया था। यह जो निवेदिता है जोसेफाइन मेकलाउड इन सबको मां ने कितना प्रेम पूर्वक स्वीकार किया था। पुरुष फोटोग्राफर के सामने मां ने बिना लाज किए वो फोटो लेने दिया था। तो यह सब हमको पता है और इसीलिए भविष्य में इस तरह की कोई चर्चा प्रारंभ ना हो कि अच्छा ठाकुर ने हिंदू धर्म के अनुसार साधना तो की किंतु फिर हिंदू धर्म की ये जो सामाजिक रूढ़िच चुस्तता है उसको 1% क्यों नहीं फॉलो किया? ठाकुर ने किया है 1% किंतु क्या है ना कि जिसको दोष निकालना है वह निकालता ही रहेगा। इसलिए यहां पे शरद महाराज ने हमको कहा कि भले ही चाहे यह बात सही है कि सनातन काल से भारतीय जाति ने हिंदू जाति ने जितनी अपनी क्षमता अपनी जितनी प्राण शक्ति आध्यात्मिक साधना के पीछे पीछे चाहे खर्च की हो जितनी इतनी खर्च की हो कि जितनी और किसी जाति ने भी नहीं की हो किंतु फिर भी हमको इसके बारे में चर्चा करने की आवश्यकता है कौन देश ब्रह्मज्ञ अवतार पुरुष शकले आविर्भाव ए तो अधिक परिमाण होइया छे कौन से देश में ब्रह्मज्ञ या तो फिर अवतार पुरुष का आविर्भाव इतने बहुल मात्रा में हुआ है इतने सारे ब्रह्मज्ञ अवतार पुरुष और कौन से देश में जन्मे हैं अत एव साधनार शहीद चिर परिचितो आमादग के ओई विषय मूल सूत्र गोली पुन पुनरावृत्ति कोरिया बोला निष्प्रयोजन इसलिए साधना के साथ में चिर परिचित हम लोगों को हम हिंदुओं को उस विषय के जो मूल सूत्र है उनकी पुनरावृति करना निष्प्रयोजनीय है। कोई आवश्यकता नहीं है।

साधना के बारे में कुछ गलत धारणाएँ

किंतु जो नेक्स्ट पैराग्राफ में शरद महाराज कहते हैं साधना संबंधे साधारण मानवे भ्रांतो धारणा साधना के बारे में साधारण मनुष्य जो है उसकी भ्रांत धारणा अर्थात कि यह विपरीत उसके जो विचार है उसके भीतर में यह जो साधना के रिलेटेड फेक न्यूज़ जो सब घुस गए हैं उस समय अच्छा था एटलीस्ट कि यह सोशल मीडिया नहीं था और फेक न्यूज़ का प्रकोप नहीं था ऐसा ऐसा कहेंगे कि सोशल मीडिया नहीं था। फेक न्यूज़ का प्रकोप तो हमेशा से रहा है। तो जो भी है साधारण मनुष्य को साधना के बारे में जो उटपटांग भ्रांतिजनक विचार है उसके बारे में थोड़ा सा महाराज कहते हैं। क्या कहते हैं? कथा सत्य होइले ओ ओ रूप कर बार प्रयोजन आ क्लासिकल क्लासिक शरद महाराज उनकी जो लैंग्वेज है कहते हैं कि पहले तो प्रश्न खड़ा किया पहले तो कहते हैं कि ठाकुर की साधनाओं का विवरण सुनने से पहले साधना के फर्स्ट प्रिंसिपल है उसके बारे में थोड़ा सा चर्चा कर लेते हैं। फिर यह जो पॉइंट के बाद में काउंटर पॉइंट खड़ा करते हैं कि भारत में सनातन काल से इतने सारे ब्रह्मज्ञ अवतार पुरुष जन्म लेते ही रहे हैं। भारतीय हिंदू जाति ने साधना के पीछे में अपनी जितनी प्राणशक्ति खर्च की है, इतनी और किसी देश ने नहीं की होगी और किसी जाति ने नहीं की होगी और साधना के साथ में हिंदू जाति चीर परिचित है तो फिर इस तरह का जो विवरण फिर से खड़ा करके कि साधना क्या है? मूलभूत तत्व क्या है? यह सब विवरण लिख के पंथी बड़ानो केनो यह थोथा बढ़ाने की क्या आवश्यकता है? यह पुस्तक की साइज बढ़ाने की क्या आवश्यकता है? तो शरद महाराज कहते हैं बात सच होने से भी ऐसा करने की आवश्यकता है। ओ रूप कर बार प्रयोजन आ ऐसा करने का प्रयोजन है। क्या है? कारण साधना संबंध अनेक स्थल जनसाधारण एकटा किमभूत किमाकार धारणा देखते पावा जाए। कारण है कि साधना के बारे में साधारण लोगों के बीच में एक किमभूत किमाकार धारणा देखने को मिलती है। किमभूत किमाकार विचित्र विकृत माने और आउट ऑफ द शेप ट्विस्टेड एक कोई फेक न्यूज़ वाली कोई धारणाएं साधारण लोगों के भीतर में देखने को मिलती है। उद्देश्य बा गंतव्य प्रति लखो हया तहारा अनेक समय केवल मात्र शारीरिक कठोरताए दुष्प्राप्य वस्तु शकले संजोगे स्थान विशेष क्रिया विशेष निरर्थक अनुष्ठाने श्वास प्रवास रोधे एवं की असंबद्ध मानव असंबद्ध मने विषद चेष्टा दते ओ साधनार विशिष्ट परिचय पया थाके उद्देश्य या तो फिर गंतव्य इसके प्रति लक्ष्य भूल करके इसका इसको विस्मृत हो के लोग बहुत बार सिर्फ केवल मात्र सिर्फ शारीरिक कठोरता में दुष्प्राप्य वस्तुओं के संग्रह करके कोई एक विशेष स्थान में विशेष क्रिया का निरर्थक अनुष्ठान करके स्थान विशेष क्रिया विशेष अर्थात कि विशेष स्थान पे विशेष क्रिया का निरर्थक अनुष्ठान करके या तो फिर श्वास प्र्वास के रोधन में यानी कि यह जो प्राणायाम कुंभक वगैरह होता है उसमें या तो फिर यहां तक कि असंबंबद्ध मनेर विषद चेष्टा जो असंबद्ध मन है जिसका कि मन विकृत हो गया है जिसका कि मन खराब हो गया है उसकी यह जो विसदृष्ट चेष्टा है जो कि अशोभनीय उसके जो कार्यकलाप है उसमें साधना का विशिष्ट परिचय खोजते रहता है। देखिए फिर से एक बार पढ़ता हूं। उद्देश्य या तो फिर गंतव्य के प्रति लक्ष्य हार करके अनेक समय यह लोग केवल मात्र शारीरिक कठोरता में दुष्प्रा दुष्प्राप्य वस्तुओं के संयोग में यानी कि दुष्प्राप्य वस्तुओं के कलेक्शन में स्थान कलेक्शन करके इकट्ठी करके स्थान विशेष में क्रिया विशेष का निरर्थक अनुष्ठान करने में श्वास प्रवास का रोधन करने में रोधने में या तो फिर यहां तक कि असंबद्ध मन जो है उसकी जो विसदृष्ट चेष्टा है उसमें साधना का विशिष्ट परिचय पाते रहते हैं। देखिए इसमें बहुत कुछ है। थोड़ा सा हमको अनपेक करना होगा। क्यों जनसाधारण में साधना के प्रति किम्भुत किमाकार धारणा देखने को मिलती है। विचित्र विकृत धारणाएं क्यों देखने को मिलती है? किस तरह की धारणाएं देखने को मिलती है? तो महाराज जी कहते हैं कि पहले तो यह लोग उद्देश्य क्या है या तो फिर अपना अल्टीमेट डेस्टिनेशन क्या है? उसको भूल जाते हैं। उद्देश्य क्या है साधना का? ईश्वर प्राप्ति ही तो उद्देश्य है। आध्यात्मिक जगत में विकास करना यही तो साधना का अंतिम लक्ष्य है। निर्वाण प्राप्ति या तो मोक्ष प्राप्ति यही तो साधना का अंतिम उद्देश्य है। ईश्वर के आशीर्वाद प्राप्त करना ईश्वर के प्रति प्रेम गोरगरो मतवारा जैसे कि ठाकुर के बारे में कहा है। प्रेम में इतने मतवाले हो गए हैं कि आंखों में से आंसुओं की धारा निकलते रखती है। मन विगलित हो जाता है। उनके प्रति भक्ति से हम लोग संपूर्ण रूप से आत्मसमर्पण करते हैं। यही तो वह साधना का लक्ष्य है। किंतु यह लक्ष्य को भूल करके हम लोग क्या करते हैं? तो क्या है कि दुष्प्राप्य वस्तु जितनी भी है उसका कलेक्शन करके किसी एक स्थान के ऊपर में बैठकर के किसी एक विशेष क्रिया करने को हम लोग कहते हैं साधना। अच्छा ये जो पहला स्टेटमेंट है कि पहली मिसअंडरस्टैंडिंग क्या है? साधना के बारे में। पहली विकृत समझ क्या है? तो है अभी जैसे कि एक उदाहरण देकर के कहे। अभी यह उदाहरण देखिए कि हमको यह बात समझनी होगी कि ठाकुर जो कोई भी साधना का अनुष्ठान करते हैं या कोई भी साधना प्रारंभ करते हैं तो ठाकुर तो हमेशा 100% मन देकर के कह करते हैं। किंतु ठाकुर ने की हुई साधना यदि कोई आम आदमी या तो फिर कोई कहेंगे कि कामना वासना के लोभ में पड़ा आदमी करेगा तो उसका वह बिल्कुल विकृत अर्थ घटन करेगा। जैसे कि देखिए कि बेलतला

तंत्र साधना के बारे में गलत धारणाएं

के नीचे में बैठकर के तंत्र साधना या शक्ति साधना का जो ये कहेंगे कि ऑस्पिशियस जगह क्या है? ऐसी कौन सी जगह है जहां पर बैठकर के यदि आप तंत्र या शक्ति साधना करें तो उसका शुभ परिणाम आएगा। तो बिल्व वृक्ष है उसके नीचे में बैठ के तो यह है कि स्थान विशेष हो गया। साधना करनी है तो कोई एक अच्छा स्थान शुभ मंगलमय स्थान खोजना होगा। तो यह बिल्व वृक्ष हो गया। फिर क्या है? दुष्प्राप्य चीजों का संग्रह करना होगा। अभी यह भैरवी ब्राह्मणी ने यह पंच मुंडी आसन तैयार किया था। अभी मैं भूल गया कौन से पांच ये थे। मुंडी अर्थात कि स्कल। स्कल अर्थात कि यह जो खोपड़ी जिसको कहते हैं हिंदी में यह जो मनुष्य का जो सर होता है सर के भीतर का जो स्केलेटन उसको कहते हैं यह स्कल। तो यह जो पांच तरह के जानवरों के इसमें शायद एक मनुष्य का भी एक स्कल होगा। उसका जमीन में गाड़ करके पंचमुंडी आसन तैयार किया जाता है। तो यह देखिए कि दुष्प्राप्य चीजों को इकट्ठा किया और एक स्थान विशेष यानी कि बिल्व वृक्ष के नीचे में यह सब रखा और फिर क्रिया विशेष यानी कि जो जो विभिन्न तरह की साधना जो भैरवी ब्राह्मणी ठाकुर को करवाती थी। तो एक्चुअली देखिए स्थान क्रिया विशेष का निरर्थक अनुष्ठान अभी देखिए कि यह जो भैरवी ब्राह्मणी ठाकुर के पास में से यह जो सब साधना करवाई इसका लक्ष्य यह था अभी जैसे कि यह जो मनुष्य की खोपड़ी है उसमें का जो मांस है उसको रंध करके ठाकुर को कहा कि थोड़ा सा ग्रहण कीजिए। अभी यह जो किया उसके पीछे का लक्ष्य क्या था कि लज्जा घृणा भय ठाकुर कहते हैं अष्टपाश जो है लज्जा घृणा भय जाति शील कुल मान अभिमान इससे मुक्ति पाने का तो यह जो घृणा एक है तो घृणित स्थान जिसको हम कहते हैं वहां पर हम नहीं जाएंगे तो वो घृणित स्थान पर जाकर के क्योंकि अपनी ये जो जाति शील कुल जो है कि मैं ब्राह्मण हूं यह एक अभिमान है फिर मैं ये जो सब घृणा है जो कि नॉन ब्राह्मण या तो अपवित्र जगह है तो यह जो उनका जो जनेऊ है वह जनेऊ फेंक के ठाकुर साधना करते थे घृणा से मुक्ति प्राप्त करने के लिए जहां भी यह कांगाली लोग हैं उन लोगों का जो खाने का जो खाकर के जो पात्र उन्होंने फेंका हुआ है उसको ठाकुर ने अपने सर के ऊपर में वहन किया था। अपने जो बाल लंबे हो गए थे उससे उन्होंने वह जो रसिक था जो कि लोग नीच जाति का उस समय कहा जाता था तथाकथित नीच जाति का उसका टॉयलेट ठाकुर ने अपने बालों से क्लीन किया था। फिर यह जो मनुष्य की खोपड़ी के भीतर में स्कल के भीतर में मांस रंध करके जब भैरवी ने उनको खाने को कहा उसको फिर ठाकुर ने थोड़ा सा खाया था। तो क्या है कि घृणा से मुक्ति पाने के लिए यह सब किया जाता है। तो यह जो है कि दुष्प्राप्य चीजों को इकट्ठा करना है। विभिन्न जो पशुएं हैं उनकी खोपरी को एक एक स्थान विशेष पे जाना है। यानी कि यह पंचवटी है जो कि यह साधना के लिए उत्कृष्ट जगह मानी जाती है। जहां पे पांच यह जो यह जो वृक्ष होते हैं वृक्षों का समूह पांच तरह के तो यह पंचवटी पंचवटी पांच वृक्षों का समूह ऐसा ही कुछ है व्हाटएवर उसकी डेफिनेशन है लीला प्रसंग में तो और या तो फिर यह बिलव वृक्ष के नीचे में बैठकर के तो ये स्थान विशेष में बैठकर के क्रिया विशेष ये जो सब ठाकुर ने क्रिया की उसका निरर्थक अनुष्ठान कब होगा जबकि नजर के सामने जो लक्ष्य है कि लज्जा घृणा भय भय इन तीन से मुक्त होकर के ईश्वर प्राप्ति करनी है तो यह जो सब क्रियाएं सार्थक होगी। किंतु जब हमने अपना लक्ष्य ही भूल गए कि ईश्वर प्राप्ति नहीं करके कोई पर्सनल बेनिफिट मिल जाए। तंत्र में जो लिखी हुई साधना है उसका अनुष्ठान करके यदि मैं कोर्ट केस मेरा चल रहा है उसमें मैं जीत जाऊं। यह बीमारी आकर के लगी है मुझे या मेरे परिवार जनों को उससे मैं मुक्ति पा लूं या तो फिर मेरे दुश्मन है उसको मुझे अहित करना है या तो फिर मेरी नजर किसी जमीन के ऊपर में किसी संपत्ति के ऊपर में है वह मेरे पास में नहीं आ रही है तो वह मेरे पास में आ जाए सांसारिक कुछ लाभ मिल जाए कोई आर्थिक कुछ लाभ हो जाए यह सब कामना वासना करके हम लोग यह सब दुष्प्राप्य चीजें इकट्ठा करके किसी एक स्थान विशेष में जाकर के कोई एक क्रिया विशेष का निरर्थक अनुष्ठान करें तो यह एक पहली भ्रांतता धारणा हो गई कि आध्यात्मिक जगत के बारे में। दूसरा देखिए मां का एक सुंदर उदाहरण है। देखिए इन लोगों के जीवन में निष्ठा इतनी प्रचंड थी कि इस प्रचंड निष्ठा के आधार पर ये लोग जो कुछ भी करते थे ना वह सब कुछ जैसे कि एक तरह से क्या है कि पवित्र हो जाता था।

माँ सारदा और एक ठग तांत्रिक की कहानी

मां का उस समय बाली का भाव था। राधु बीमार हो गई थी और कोवालपाड़ा में रह रहे थे सब लोग और राधु के लिए मां सब कुछ सब तरह का वो उपचार है ट्रीटमेंट है करवा रही थी किसी भी चीज से फर्क नहीं पड़ रहा था फिर किसी ने आकर के काली मामा मां के जो भाई है काली मामा हमारे लिए तो उन्होंने आकर के कहा कि अरे वहां पे एक तांत्रिक है वह तांत्रिक देखा सुना है कि वह बहुत कुछ यह सब अच्छी-अच्छी चीजें कर सकता है लोगों को ट्रीट कर सकता है। तो उसके पास में से जाकर के कुछ हम व्यवस्था करवा के आते हैं। तो मां ने तो मां का तो बिल्कुल बाली का भाव है। मां ने कहा देखो कि बेचारी राधु इतना बीमार है। श्वास प्रश्वास लेने में कष्ट हो रहा है। फिर यह अफीम है। यह जो ओपियम वो खाने की उसने हैबिट बना ली है। वो खड़ी होकर के चल भी नहीं सकती है। प्रेग्नेंट है या तो फिर बच्चा उसी समय हुआ होगा। जो भी है वो तो इतनी बुरी अवस्था में है बेचारी। उसके लिए कुछ करो। बोलकर के मां सबके सामने अपना दुखड़ा रो रही है। तो फिर यह काली मामा ने वो वरदा महाराज को लेकर के कहा कि चलो हम लोग वो तांत्रिक के पास में जाते हैं। तो गए तांत्रिक के पास में तो तांत्रिक समझ गया कि यह दो मूर्ख मेरे पास में आए हैं। अभी उनको अच्छे से लूट लूंगा मैं। तो फिर यह जो दाना वगैरह है चारों दिशा में फेंक करके कुछ अगड़म बगड़म बोलते बोलते उसने कहा कि अच्छा मुझे पहले से ही पता था आप लोग मेरे पास में आने वाले हैं। मैं आऊंगा आप लोगों के साथ में और वहां पर वो जो जो भी एक भयानक चीज हो रही है वो आपकी लड़की के साथ में उसको मैं दूर कर दूंगा वगैरह-वगैरह बोल के तो फिर यह काली मामा तो बड़े इंप्रेस हो गए। किंतु वरदा महाराज लिखते हैं कि देखिए मां का जो बाली का भाव है किस तरह का यही तांत्रिक वहां पे जब आया कोवालपाड़ा में तो मां ने अपने वो घुमटा लाज निकाल के घुमटा डाल के वो इस तरह से वह तांत्रिक को बोल रही है हाथ जोड़ के अनुनय विनय कर रही है कि यदि वह तांत्रिक उसको नहीं कुछ करेगा राधु के बारे में तो बेचारी मां का सर्वस्व लूट जाएगा ऐसा करके वह अनुनय विनय कर रही है तांत्रिक तो बड़ा खुश हो गया कि यह तो अच्छे मूर्ख लोग मिले हैं। फिर उसने क्या-क्या सब नाटक किया और फिर एक लंबा लिस्ट दे दिया। तेल बनाना है तो उस तेल में दुष्प्राप्य चीजें इकट्ठा करनी है। दवाई जो दवाई का यह जो उसने किया कि यह दवाई उसको दीजिए। यह औषधि या दीजिए उसको तो उसमें सब तरह की दुष्प्राप्य चीजें कहां-कहां से यह सब कलेक्ट करना है। ऐसा बोल करके पैसा पड़ा करके वह तो चला गया। अभी कुछ दिन तो मां ने बड़ा उत्साह दिखाया कि कहां से यह तेल, कहां से वह जड़ी बूटी, कहां से वह किंतु कुछ ही दिन में समझ में आ गया कि यदि वह तांत्रिक ने जो कहा है ठीक-ठीक करने को जाएंगे तो यह दुष्प्राप्य चीजें हैं। ऐसी चीजें जो कि इजीली नहीं मिलती है या तो असंभव है उसको मिलना। वह मिल ही नहीं पाएगी। तो फिर कुछ दिनों के बाद में मां ने हताश होकर के पूरे कार्यक्रम को छोड़ दिया। तो क्या है कि देखिए यह तांत्रिक लोग भी बड़े चालाक है। अभी ऐसा कोई जड़ी बूटी दे देंगे कहेंगे तुलसी है बिल पत्र है उसको मिलाकर के खा लो तो यह तो आपके घर में मिल जाएगा। उसको मिलाकर के खाने से तो कुछ हुआ नहीं तो तो फिर किस काम का यह तांत्रिक है किंतु ऐसीऐसी सब चीजें उसने लिख करके दी है। बता करके गया है कि वहां से यह ले आओ, वहां से यह ले आओ जो कि आप कभी कलेक्ट नहीं कर पाएंगे। तो आप कलेक्ट नहीं कर पाए। आप उसको खिला नहीं पाए। उसका अर्थ ही हुआ कि तांत्रिक की यह जो आदेश था या तो फिर तांत्रिक का जो समाधान था उसका पालन आप नहीं कर पाए तो रोगी ठीक नहीं हुआ उसका गलती किसका है तो वह आपका है नहीं कि तांत्रिक का तो यह सब क्या है कि भारत में अभी देखिए मां और ठाकुर की तो कैटेगरी ही बिल्कुल अलग है। वे लोग जो कुछ भी करते थे इतनी निष्ठा के साथ में करते थे कि सभी चीजों के भीतर में पवित्रता प्रवेश कर जाती है। किंतु हमको पता है कि जो ज्यादातर लोग ये तांत्रिक के पास में जाएंगे या तो फिर यह जो तंत्र साधना करेंगे पंचमुंडी आसन का स्थापना करेंगे वगैरह वगैरह उन सभी के भीतर में कामना वासनाएं भरी होती है। वह अपना जो लक्ष्य स्थान है ईश्वर के प्रति संपूर्ण शरणागति उससे तो कहां विचुत हो गए हैं। कहां कामना पूर्ति के पीछे में दौड़ रहे हैं। इसके लिए जो ओरिजिनली जो सही-सही साधनाएं होंगी उसका एक भयानक विकृत स्वरूप लोगों के मन में बैठा हुआ है। इसलिए यहां पर शरद महाराज ने बताया कि जो भ्रांत धारणाएं हैं साधना के बारे में वह कौन-कौन सी है? तो यह जो लिस्ट बताते हैं इस लिस्ट में सर्वप्रथम कह दिया कि जिस उद्देश्य से जिस साधना का परिवर्त प्रवर्तन किया गया था जिस उद्देश्य के साथ में जिस साधना का प्रारंभ विकास किया गया था वो उद्देश्य तो भूल ही गए हैं और इन साधनाओं का एक विकृत वासनाओं को पोषण करने का स्वरूप हमारी नजर के सामने रहा है। तो, इस लिस्ट में सर्वप्रथम जो आइटम जो पॉइंट महाराज ने कहा, उसका हमने डिस्कस किया। इसके बाद में

प्राणायाम के बारे में गलत धारणाएं

क्या कहते हैं? श्वास प्रश्वास रोधे। यह जो स्वास प्रस््वास है अपने उसको रोधने में उसको रोकने में कुंभक करने में हम लोग धर्म को खोजते हैं। अभी देखिए कि जिन लोगों ने स्वामी जी का राजयोग पढ़ा है उनको तो स्पष्ट पता है कि यह पूरा विश्व आकाश और प्राण का बना हुआ है। जो भी मैटर है वह सब आकाश में से प्रकट हुई है। और जो भी एनर्जीस है, जो भी फोर्स है वह सब ये प्राण में से प्रकट हुई है। यदि आप प्राण को नियमन कर ले तो आप पूरे विश्व ब्रह्मांड को नियमन कर सकते हैं। कंट्रोल कर सकते हैं। सूर्य चंद्र को अपनी ये जो ऑर्बिट है उसमें से धक्का मार के भगा सकते हैं। रिमोट हीलिंग कर सकते हैं। आपके भीतर में सब मैजिकल सुपर पावर्स प्रकट कर सकते हैं। तो प्राण का विज्ञान है वह तो सही-सही विज्ञान है। किंतु यह जो सब उसका भी जो विकृति हुआ और विकृति के साथ-साथ में ही प्राणायाम को प्राण के विज्ञान को एक विचित्र रूप से विकृत रूप से जो लोगों के सामने रजू किया गया तो इसके लिए प्राणायाम को भी शरद महाराज ने इस लिस्ट में गिन लिया है। और क्या यहां तक कि

मन की विकृतियों को आध्यात्मिक साधना में प्रगति मानना

असंबद्ध मनेर विषदृष चेष्टा जो असंबद्ध मन है एक पागल मन है उसकी ये जो पागल जो विचित्र उसकी ये जो चेष्टाएं हैं कार्यकलाप है उसमें लोग साधना का विशिष्ट परिचय पाते हैं। अभी देखिए ये जो असंबद्ध मन की जो विसदृष्ट चेष्टा पागल मन की पागल कार्यकलाप तो उसका उदाहरण भी देखिए अगेन ये सब चीजों के भीतर में डीप गहन आध्यात्मिकता छुपी हुई है तो अभी जैसे वो जो काली मंदिर में एक वो पागल आया और वो जिस तरह से वह स्तोत्र पाठ कर रहा था ठाकुर कहते हैं पूरा मंदिर हिल गया इसके बाद में वह बाहर आकर के वह क्या करता है वह जो काली मंदिर में जहां पे वह जो साधु संतों के लिए खाना वहां पे नहीं जाकर के कुत्ते जहां पे खा रहे हैं वहां पे जाकर के वो खाना खा रहा है। तो कुत्तों ने भी उसके ऊपर में आक्रमण नहीं किया। आराम से उसको वो जो खाना खाने दिया। यानी कि जो जो वहां पर वह जो भोजनशाला में बचा हुआ खाना जहां पर फेंकते हैं वहां पर जाकर के खा रहा था। तो इस उसका जो माने वह बड़े-बड़े लंबे बाल हो गए हैं। स्नान पता नहीं कब किया होगा और कोई जाएगा तो उसको चिल्ला करके भगा देगा। मार के भगा देगा। किंतु यदि कोई धर्मशास्त्र के बारे में बात करना चाहेगा तो वो एकदम उसके भीतर में इतना विज़डम दिखाई देगा। तो फिर ठाकुर कहते हैं मैंने रोते-रोते जैसे कि यह हलधारी ना हृदय इनको कहा कि अरे ना ठाकुर ने रोते-रोते मां को कहा कि अरे मेरी भी क्या ऐसी ही अवस्था होगी क्या? क्योंकि क्या है कि परमहंस जो होता है वह कैसा होता है? वो बालकवत होता है। वह पिशाचवत हो जाता है। जड़वत हो जाता है। तो यह पिशाचवत हो जाऊंगा क्या मैं इसकी तरह? तो फिर ठाकुर को वो डर लग गया था। अभी देखिए कि यह जो पिशाचवत या तो बालकवत या तो फिर यह जड़वत जिनका आचरण होता है बाहर से तो लगते हैं विकृत किंतु क्या है कि उनके भीतर में गहन आध्यात्मिक सम संचय वो इकट्ठा हुआ है। गहन आध्यात्मिक अनुभूति उन्होंने प्राप्त की है। यदि वह सीरियसली सही-सही मार्ग पर जाते हैं। किंतु एक बार हमने यह कहीं पर पढ़ लिया कि जो परमहंस है वो बालकवत जड़वत पिशाचवत होता है। फिर जो सही-सही में जड़वत और पिशाचवत है या तो सही-सही में वह बड़ा होकर के भी बालकवत रहता है। उसकी बुद्धि इमैच्योर अन डेवलप्ड रहती है। उसके भीतर में यदि हम ऐसा कोई आध्यात्मिकता खोजने को जाए, उसके पास में जाकर के कहे कि आपको इतना दक्षिणा देते हैं। आप हमारा यह दुख दूर कर दीजिए तो फिर वो पागलपन हमारे लिए पागलपन के अलावा और कुछ नहीं है। तो देखिए कि यहां पे जितने भी उदाहरण शरद महाराज ने दिए हैं उसके जो पस्ट फॉर्म में लिए जाएंगे तो वो साधना के जगत में आपको आगे ले ही जाएंगे। किंतु महाराज ने जैसे कि फर्स्ट सेंटेंस में ही जो कंडीशन रख दी थी कि अपना उद्देश्य या तो फिर अपना लक्ष्य विस्मृत होकर के खो के यदि हम ये सब चीजों में जाएंगे तो साधना का जगत हमको इस तरह से गोलगोल भवंडर में घुमाएगा। इस तरह से एक एक क्या कहेंगे कि तूफान में घुमाएगा कि हम अपना जीवन तो बर्बाद हो ही जाएगा। अपनी जो बुद्धि है, अपना धन है, उसको भी गवा बैठेंगे। इसलिए महाराज यह सब जो वार्निंग है, वह हमको पहले से ही दे देते हैं। अच्छा, अभी यह पैराग्राफ इससे काफी आगे जाता है। तो, उसको अभी हम कल देखते हैं। ओम शांति शांति शांति। हरि ओम तत्सत श्री राम

प्रश्न: क्या मां काली को मांसाहारी भोजन अर्पित करना उचित है? जीव हत्या तो बड़ा पाप है.

कृष्णपणमस्तु देखिए जैसे मैंने कहा कि भारत में जो आध्यात्मिक साधना है उसमें आपको काफी फ्रीडम दिया गया है। आप जिस तरह की जो आपकी जो साधना में आप विश्वास करते हैं। शक्ति साधना है। उसके कितने सारे ये ये है ब्रांचेस है। उसमें या फिर ये वैष्णव साधना है वगैरह-वगैरह उसमें से जिस अ तरह की फिलॉसोफी में आपको विश्वास हो वो आप कर सकते हैं। जनरली शक्ति साधना में मां काली को नॉनवेज भोग ऑफर किया जाता है। किंतु भोग ऑफर करना नॉनवेज ऐसा कंपलसरी कुछ भी नहीं है। जो भारतीय आध्यात्मिक साधना में जो दो एक मैं कहूंगा कि जिसको कि आप अल्टीमेटली आपको करना चाहिए करना उचित है तो ठाकुर कहते हैं सत्य और ब्रह्मचर्य जैसे वो ठाकुर स्वामी जी कहते हैं ना यह अपना धर्म पूरा किचन में घुस गया है रसोई घर में घुस गया है क्यों क्योंकि नॉनवेज खाना नहीं खाना फिर यह वैष्णव लोग इस तरह से तिलक करेंगे फिर शाक्त लोग इस तरह से तिलक करेंगे साउथ इंडिया में इस तरह का तिलक नॉर्थ नॉर्थ इंडिया में इस तरह की माला इसी में हम उलझ गए हैं। एक्चुअली आध्यात्मिक जीवन में सत्य और ब्रह्मचर्य इसका अनुष्ठान करना है। ईश्वर के प्रति शरणागति रखनी है। मन को एकाग्र करके कामना वासनाओं से दूर रखना है। यह हो गया धर्म का मूल सिद्धांत। ये नहीं सोच के हम बाकी सब चीजों में अपना ये जो आजकल खास करके ये वेज नॉनवेज का बड़ा चला है। हिंदू है तो आपको नॉनवेज हो आपको वेजिटेरियन होना ही है। यह हिंदू त्यौहार है तो आपको यह जो बाकी जो नॉनवेज चीजें हैं वो नहीं उसका वो सेल होना चाहिए। एक्चुअली दिस इज जस्ट वन ब्रांच ऑफ हिंदूइज़्म। वेजिटेरियन नॉन वेजिटेरियन वगैरह। किंतु इसी को लेकर के हम लोग ऐसे सर के ऊपर में बैठ गए हैं कि सर के ऊपर में बिठा करके हम लोग इतना यह हो गए हैं कि इसलिए यह सब मूलभूत तत्वों की आलोचना करना बड़ा आवश्यक है। देखिए देखिए यह जो पूरा वेज नॉनवेज का डिबेट है ना वो डिबेट में जाने का यह जगह नहीं है। क्योंकि क्या है कि उसको आध्यात्मिकता के साथ में कोई लेना देना नहीं है। जैसे कि यहां पर शरद महाराज ने स्पष्ट रूप से कहा आध्यात्मिक जीवन का जो लक्ष्य है वो है ईश्वर के प्रति शरणागति मन को कामना वासना से मुक्त करना। वो आप चाहे कैसे भी रास्ते से करें। यदि नॉनवेज खाकर के आपका मन वासना से मुक्त होता है तो अच्छा है। वेज खाकर के मुक्त रहता है तो वह अच्छा है। वेज नॉनवेज का जो पूरा डिबेट है वो एक पूरा एक सेपरेट इशू है। उसके बारे में बात करने से हमको उसके भीतर में जाने से कोई लाभ नहीं है। यहां पे जो पॉइंट शरद महाराज करना चाहते थे कि हम लोग यह सब डिबेट में ना डूब जाए और हमारी नजर के सामने ईश्वर के प्रति शरणागति रूपी जो लक्ष्य है उससे भटक ना जाए यह बात उनको स्पष्ट रूप से हमारे सामने रखनी थी। इससे ऊपर उठना है। हां देखिए आप अपनी बिलीफ के अनुसार रहिए। किसी के ऊपर में अपनी बिलीफ को यह मत कर दीजिए कि मैं जो मानता हूं वही सही है। बाकी सब गलत है। इस तरह का भाव यह अपने भारतीय आध्यात्मिक जीवन में नहीं है। तो आप अपनी बिलीफ के अनुसार अपनी जो भी है पद्धति उसको फॉलो करके ईश्वर प्राप्ति कर लीजिए। एक बार ईश्वर प्राप्ति होगी फिर जीवन के जितने भी प्रश्न है उसका समाधान आपको ईश्वर ही करके दे देंगे। अपनी यह जो छोटी बुद्धि है उससे तो हम एक सर्कल में घूमते ही रहेंगे। घूमते ही रहेंगे। तो पहले कैसे भी करके ईश्वर प्राप्त कर लीजिए। उसके बाद के जो जितने भी प्रश्न हैं उनका समाधान वही कर

प्रश्न: कई लोग हम श्रीरामकृष्ण के भक्तों से प्रश्न पूछते हैं कि आप मांसाहारी क्यों है? तब हम भक्तों को उसका उत्तर देना पड़ता है।

देंगे। आंसर देने की कोई जरूरत भी नहीं है। देखिए कोई पूछेगा कि क्यों आप लोग नॉनवेज खा रहे हैं? उसका आंसर देने की कोई जरूरत नहीं है। आपको हमको फॉलो नहीं करना। दैट इज योर लॉस। ठाकुर आए हैं इस जगत में इस युग के अवतार के रूप में। अब ठाकुर को आप इसलिए फॉलो नहीं करेंगे क्योंकि ठाकुर खुद नॉनवेज खाते थे या तो ठाकुर के फॉलोअ नॉनवेज खाते थे तो उसमें नुकसान किसका है? हमारा तो नहीं है। जो प्रश्न करके वो भाग जाता है यहां से उसका है। उसको वो समझे उसका काम जाने। हमको उत्तर देने की क्या जरूरत है? यह जो स्वामी जी उस समय वराह नगर मठ की बात है वह बार-बार घर जाना पड़ता है। वो कोर्ट में केस चल रहा है। तो प्रश्न होगा कि अरे जो सन्यासी है उसको यह कोर्ट केस में जाने की क्या जरूरत है? वगैरह-वगैरह उसने तो घर त्याग कर दिया है। तो एक दिन काली महाराज के साथ में स्वामी अभेदानंद जी के साथ में नरेंद्र का स्वामी जी स्वामी विवेकानंद का डिस्कशन चल रहा है। तो काली महाराज नरेंद्र को कहते हैं कि तुम्हारा जो बिहेवियर है उसके लिए मुझे लोगों को उत्तर देना पड़ता है। तो स्वामी जी ने फटाक करके बोल दिया तुमको उत्तर देने की कोई जरूरत नहीं है। जिसको प्रश्न करने हैं करने दो। उसको मुझे क्या है लेना देना। देखिए कि अपने जीवन में अपनी साधना में निष्ठा होगी तो हजार करोड़ लोग प्रश्न करने वाले आएंगे और चले जाएंगे। उससे हमको कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। देखिए जिनको निंदा करनी है ना वह लोग वह किसी भी चीज को लेकर निंदा करेंगे और जिसको ठाकुर के प्रति भक्ति है वह समझेंगे कि देखो कि बाकी सब जो है सो है। ठाकुर हमारे लक्ष्य है। जब तक ठाकुर तक पहुंच पहुंच सकते हैं इस संघ के माध्यम से तब तक ये संघ की आवश्यकता है। उसके बाद में आप कहेंगे मैंने ठाकुर का दर्शन प्राप्त कर दिया है। संघ की ये जो नियमावली उसके साथ में मेरा कोई लेना देना नहीं तो वो ठीक है। भविष्य में जाकर के आप वो सब कीजिए किंतु जब तक ठाकुर को प्राप्त नहीं किए हैं तब तक तो यह संघ का सहारा लेकर के साधना करना हम सबके लिए श्रेय है।

दो कहानियाँ: जो लोग ठाकुर और स्वामीजी के प्रति सच्ची श्रद्धा रखते हैं, वे कभी भी तुच्छ कारणों को लेकर के उनकी निंदा नहीं करेंगे

यहां पर मैं और एक बात बताता हूं। यह जो स्वामी जी अमेरिका से वापस आए रामकृष्ण मिशन की स्थापना की उसके बाद में बहुत सारे जो भारत के यह जो प्रतिष्ठित लोग हैं उन लोगों के साथ में स्वामी जी का वार्तालाप हो रहा था। कोई-कोई कहता था कि रामकृष्ण मिशन बहुत अच्छा कार्य कर रहा है। हम लोग आपको सब तरह की सहाय देंगे। यह जो महाराजाओं भृंगा वह जो काशी में गए थे स्वामी जी और उनके साथ में मुलाकात हुई। उस समय वह प्राय रिटायर जैसे ही हो गए थे और एक बागान के एक गार्डन में रहते थे और गार्डन से बाहर कहीं नहीं जाते थे तो उनको स्वामी जी से मिलना था तो स्वामी जी को मैसेज पहुंचाया कि मैंने नियम लिया है कि मैं गार्डन से बाहर नहीं जाऊंगा किंतु मेरी आपको आपका दर्शन करने की बड़ी इच्छा है तो आप मुझे मिलने के लिए आ सकते हैं क्या तो स्वामी जी ने कहा मैं अवश्य आऊंगा मिलने के लिए स्वामी जी उनको उनके गार्डन में मिलने के लिए गए वार्तालाप हुआ महाराजा बड़े खुश हो गए बार-बार कह रहे हैं देखिए मुझे क्षमा क्षमा कर दीजिए। साधुओं के पास में तो राजा को सामने से जाना चाहिए। किंतु मैंने यह जो व्रत लिया है इसके लिए मैं यहां से बाहर नहीं निकलना चाहता। तो स्वामी जी ने कहा देखिए साधुओं का यह कर्तव्य है कि किसी का व्रत भंग ना करवाएं। आपने व्रत लिया है अच्छी बात है। उस समय महाराजा ने उनको कहा कि आप यहां पे आप आश्रम चालू कीजिए। काशी में मैं पैसा दूंगा। तो ये काशी का यह जो अपना सेवाश्रम है वगैरह वो अद्वैत आश्रम ना सेवा आश्रम जो भी है वो जो महाराजा के पैसों से प्रारंभ हुआ। तो ऐसे लोग थे कि स्वामी जी के प्रति इतनी भक्ति है। फिर यह जो टैगोर फैमिली है ठाकुर फैमिली जो कोलकाता का इतना बड़ा ब्राह्म समाज वाले रविंद्रनाथ टैगोर वगैरह-वगैरह उसमें से कुछ-कुछ लोगों का निवेदिता के साथ में था रिलेशन। तो वे लोग निवेदिता को कहते हैं कि देखिए स्वामी जी का जो उद्देश्य है उसके साथ में तो हम लोग बड़े ही यह हो गए हैं सहमत हैं। किंतु यह जो ठाकुर का नाम लेके जो आप चला रहे हैं ना ठाकुर को भगवान बोलकर के आप पूजा कर रहे हैं वो हमको अच्छा नहीं लगता। एक आम आदमी को भले ही चाहे कितना बड़ा साधु संत हो उसका मंदिर बना करके उसकी पूजा करना यह व्यक्ति पूजा हमको अच्छी नहीं लगती। आप ठाकुर को हटा दीजिए तो फिर आपको जो हेल्प चाहिए वह हम करेंगे। तो यह निवेदिता के माध्यम से स्वामी जी को यह सब सुनने को मिला। वो जो भारती बोलकर के जो मैगजीन था उस वो पत्रिका की वो जो संपादक संपादिका थी वो लेडी क्या नाम है उसका भूल गया। उसने वो स्वामी जी को इस तरह का कुछ प्रस्ताव दिया था। तो स्वामी जी पत्र में बंगाली पत्र में लिखते हैं कि भारत के लिए जिनका हृदय इतना धग-धग कर रहा है वो लोग एक सामान्य ठाकुर के नाम से वो हमको सहाय करने को तैयार नहीं है तो फिर भारत के प्रति उनकी जो सहानुभूति है वो किस काम की है यानी कि ठाकुर यदि आपके रास्ते में आ रहे हैं इसके लिए भारत का उत्थान रूपी जो महत कार्य स्वामी जी ने शुरू किया है वो आप नहीं करेंगे तो समझ लीजिए कि भारत के प्रति आपकी सहानुभूति सिर्फ दिखावे की है। वह ठाकुर बीच में आ गए इसलिए मैं आपको हेल्प नहीं करूंगा। यह क्या सब पागलपन लगा रखा है। मुझे पक्का पता है कि यदि हम ठाकुर को छोड़ भी दे तो भी आप लोग कुछ हेल्प नहीं करने वाले। यानी कि जो यह निंदुक लोग हैं उनकी आप सब बात मान लेंगे। नॉनवेज सब बंद कर देंगे तो यह दूसरी बात लेकर निंदा करेंगे। ऐसे लोगों की बातों पर ध्यान देने की कोई आवश्यकता नहीं है।