prayer
ओम स्थापकाय धर्मस्य सर्वधर्म स्वरूपिणे अवतार वरिष्ठाय रामकृष्णायते नमः श्री रामकृष्ण लीला प्रसंग स्वामी शारदानंद जी महाराज द्वारा लिखित द्वितीय खंड साधक भाव इसकी अवतरणी का और इंट्रोडक्शन इसका हम पाठ पाठ कर रहे
लीलाप्रसंग में ठाकुर की साधना का विस्तार से वर्णन किया गया है। इसका कारण भी बताया गया है।
थे। जो कुछ पॉइंट ऑलरेडी हमने देखे उसमें शरद महाराज एक्चुअली साधक भाव में तो हमको पता है कि ठाकुर की साधनाओं का बड़ा ही विस्तृत रूप से वर्णन है और इसीलिए शरद महाराज यह वर्णन प्रारंभ करने से पहले लिखते हैं क्योंकि जैसे होता है कि हम सभी लोग एक दूसरे के साथ में कंपैरिजन करेंगे। जैसे कि चैतन्य महाप्रभु या भगवान बुद्ध या तो फिर भगवान राम यदि हम ठाकुर को एक अवतार गिनते हैं तो नेचुरली कि उनके जीवन चरित्र उनके जीवन के प्रसंगों का उनके उपदेशों का बाकी अवतारों के साथ में कंपैरिजन होगा और जभी हम यह देखेंगे कि दूसरे अवतारों के जीवन में उनकी साधना का वर्णन कम या तो नहीं वके द्वारा किए हुए चमत्कारों का विषद वर्णन है तो फिर ठाकुर की यह किताब पढ़कर के जीवन कथा पढ़कर के लीला प्रसंग पढ़कर के यह प्रश्न अवश्य होगा कि यहां पे जैसे श्रीमद् भागवत है या फिर यह रामायण है या तो फिर इवन बाइबल है। देखिए कि वहां पे कि उन्होंने बचपन में या युवावस्था में क्या किया इसका चितार कम इसका आलेखन कम और फिर बड़े होने के बाद में युद्ध के मैदान पे ना कि फिर भक्तों के सामने किस तरह से चमत्कार किए किस तरह से भक्तों को सांत्वना दी आशीर्वाद दिया उनके कर्म हर लिए पाप हर लिए उनको उनकी बीमारी ठीक कर दी यह सब वर्णन आपको बड़ा ही विस्तृत रूप से दिखेगा जबकि यह लीला प्रसंग में देखिए कि पांच पांच खंड यदि है तो एक खंड में बाल्य अवस्था का वर्णन है। ठाकुर के बालपन का वर्णन साधक भाव में या फिर पूरा उनकी साधना का वर्णन है। और फिर तीन पार्ट है जिसमें से सिर्फ दो ही भाव पार्ट ऐसे हैं जिसमें कि ठाकुर की एज ए गुरु गुरु रूपी श्री रामकृष्ण के प्रसंगों का विवरण है। गुरु भाव उत्तरार्ध गुरु भाव पूर्वार्ध और उसके बाद में तो नरेंद्रनाथ आ जाता है तो फिर नरेंद्र के साथ में नरेंद्र को शिक्षा देकर के संघ का गठन किस तरह से करना है वो पूरा चालू हो जाता है तो ठाकुर की साधनाओं का विवरण वन फिफ्थ पार्ट में है। यदि पांच पार्ट गिन ले लीला प्रसंग के उसमें से एक साधक भाव है तो 1/5 है कि ठाकुर की साधनाओं का वर्णन तो नेचुरली यह प्रश्न होगा कि ठाकुर के बाद के जीवन के चमत्कार उनके आशीर्वाद उनके उपदेश उनकी तत्व कथाएं उनके प्रेरक प्रसंगे वह सब कम करके साधना का इतना विषद विवरण क्यों तो उसका यह जो एक जस्टिफिकेशन देते हैं शरद महाराज हालांकि उनको जस्टिफिकेशन देने की कोई जरूरत नहीं थी किंतु फिर भी यह एक जीवनी लिखना या बायोग्राफी लिखना एक एकेडेमिक एक्सरसाइज है। तो उसके अनुसार जो एक एकेडेमिक स्टेप्स लिए जाते हैं एकेडेमिक्स पॉइंट्स को राइज करके आर्गुमेंट्स राइज करके उसका उत्तर देना होता है। तो इस तरह से शरद महाराज ने किया है। स्पष्ट शब्दों में समझाया है कि यदि भक्त ऐसा सोचता है कि उनके भगवान कभी अपूर्ण थे, इष्ट कभी अपूर्ण थे तो उसकी भक्ति को हानि होगी। यह बात बिल्कुल तर्क युक्ति संगत नहीं है। और
ईश्वर के दर्शन की आकांक्षा रखने से ईश्वर से आत्मीय भाव नहीं रहता
फिर इसी सिलसिले में फिर ठाकुर ने एक बड़ी इंपॉर्टेंट बात कही है कि यदि कोई भी भक्त ऐसा कहता है कि ठाकुर के पास में आकर के मुझे ईश्वर का दर्शन प्राप्त करना है। जैसे ठाकुर तो सबको कहते रहते हैं अभी आज यह सुबह को इसका दर्शन हुआ। यह माने कोई भी दर्शन ठाकुर के जीवन में हजार दर्शन है। हजार लाख दर्शन होंगे। प्रतिदिन उनको कितने दर्शन होते थे यह सब हमको पता है। तो ठाकुर यह सब विवरण करते जाएंगे तो भक्तों के मन में भी यह वासना जागृत होगी, इच्छा जागृत होगी कि ठाकुर हमको भी ईश्वर का दर्शन करवा दे और इसके लिए भक्त यदि ठाकुर के पास आते कहते आप हमको कृपा करके दर्शन करवा दीजिए। तब ठाकुर क्या कहते कि ईश्वर का ऐश्वर्य या तो फिर ईश्वर का ऐश्वर्य खोजने को मत जाओ। ईश्वर के भीतर में डिवाइन पावर्स है। वह डिवाइन पावर से आपका जो भी समस्या है वह ठीक कर देंगे। या तो फिर आपके पाप हर करके आपके मन को शांति दे देंगे। यह सब खोजने को मत जाओ। इससे अपना अपनी भाव थाकबना। यह कितना सुंदर बेंगली शब्द है कि मेरा तुम्हारा यह अपना यह आत्मीय भाव है। वह नहीं रहेगा। स्नेह का बंधन है। एक बच्चा अपनी मां के भीतर में यदि वह मां के अलावा यदि प्राइम मिनिस्टर को देखता है। ये कल हमने कंपेयर किया था। मां का एक प्रेम है और यह देश का जो प्राइम मिनिस्टर है उसका एक कर्तव्य है। हमें ईश्वर को क्या प्राइम मिनिस्टर की तरह एक एकदम वहां दिल्ली में बैठे हुए हैं। वहां पर उनके बंगलों में सिक्योरिटी से घिरे हुए हैं। तो वैसे ही ईश्वर बैठे हैं स्वर्ग में। वो 10 उन्हें द्वारपाल आज चारों ओर खड़े हैं वगैरह वगैरह इस तरह के ईश्वर को देखना चाहते हैं ना कि ईश्वर मेरी मां स्वयं है। उनकी गोद में बैठकर के मैं खेल रहा हूं। वह मुझे स्नेह कर रही है। प्रेम कर रही है। मेरी केयर कर रही है। इस तरह के ईश्वर को मैं देखना चाहता हूं। हालांकि ईश्वर के दोनों भाव है। वह दंडदाता पिता और स्नेहमई माता यह दोनों एस्पेक्ट लाइक टू एस्पेक्ट ऑफ द सेम कॉइन यह है। किंतु हमको उसी एस्पेक्ट के बारे में सोचना है जो कि हमको ईश्वर से ज्यादा नजदीक ले जाए। हम अपनी मां को इसलिए प्रेम नहीं करते कि वह मां हमारे लिए कुछ कर देगी। हां, हालांकि करती बहुत है किंतु वह मुझे खिलाती है बोलकर के तो प्रेम नहीं करता। वो प्रेम अपना एक अपना एक उसका एक सेपरेट फाउंडेशन है। उसका एक सेपरेट प्लेटफार्म है। उसका एक सेपरेट वजूद है। वो दैट इज़ दैट इज सेकेंडरी फ्रॉम व्हाट मदर डस फॉर मी। तो वो प्रेम को लव फॉर द सेक ऑफ लव डिवोशन फॉर द सेक ऑफ डिवोशन। इसी के लिए आपको ईश्वर की आराधना करनी चाहिए। ऐसा करके ठाकुर यदि उनको शांत करते तो कोई भक्त होते थे जो कि बड़े अड़ जाते थे। बड़ी आर्गुममेंट करते थे। कहते थे कि ईश्वर की इच्छा होगी तभी दर्शन होगा। ऐसा क्यों? आपकी इच्छा और ईश्वर की इच्छा एक हो गई है। आप कैसे भी करके दर्शन करवा ही दीजिए। तो फिर ठाकुर सामने कहते कि मैं मेरी तो बहुत इच्छा है कि तुम सबको सब तरह की अनुभूति हो। किंतु ऐसा होता कहां है? तो फिर यदि म इस तरह से यदि फिर भी वो भक्त आर्गुममेंट करता ही जाता तो आखिर में ठाकुर क्या कहते कि की बोलबो बाबू मार जा इच्छा ताई हो। मैं क्या कहूंगा भाई? मां की जो इच्छा होगी वही होगा। अभी इसके बाद
ठाकुर किसी का भाव भंग नहीं करते थे
में किंतु यहां पर शरद महाराज एक बड़ा ही इंपॉर्टेंट स्टेटमेंट हमारे सामने ठाकुर का प्रस्तुत करते हैं। शरद महाराज कहते हैं कि ठाकुर किसी का भाव भंग नहीं करते थे। जैसे कि देखिए अभी गिरीश घोष है और स्वामी विवेकानंद है। स्वामी विवेकानंद का पुरुषार्थ तपस्या अपनी आत्म प्रचेष्टा से आत्मश्रद्धा से जो आध्यात्मिक जीवन में आगे बढ़ना है। ब्रह्मचर्य का पालन करना है। सत्य का पालन करना है। वो नीति नियम के साथ में जो जाना है वो स्वामी जी का एक बड़ा ही दृढ़ उसमें यह फाउंडेशन था। जबकि गिरीश घोष का था कि ठाकुर के ऊपर में संपूर्ण निर्भर होकर के रहता था। तो ऐसा ठाकुर ने स्वामी जी को कभी नहीं कहा कि तुम गिरीश घोष का अनुसरण करो। देखो कि वह मेरे पर कितनी शरणागति है। उसकी कभी आर्गुममेंट नहीं करता। तुम हो बात बातबात में मेरे साथ आर्गुममेंट करते हो। बात बातबात में मेरा टेस्ट करते हो। बात बातबात में मैं जो करता हूं उसका इन्वेस्टिगेशन करवाते हो। यह सब है क्या है? यू लर्न फ्रॉम गिरीश घोष। तो ऐसा भी कभी स्वामी जी को नहीं कहा। ना ही कभी गिरीश को कहा है कि नरेंद्र की तरह ब्रह्मचर्य का पालन करने का प्रयास करो। नरेंद्र की तरह घंटों के भर घंटों रात भर रात बैठकर के जप करो ध्यान करो क्योंकि पता है कि जिसका जो भाव है जिसकी जो प्रकृति है जिसका जो कर्म प्रवाह है उसके साथ में ऐसा ही होने वाला है। तो किसी का भाव तो भंग नहीं ही करते थे। साथ-साथ में यहां पर शरद महाराज यह बात नहीं लिखते हैं। किंतु रामकृष्ण विवेकानंद साहित्य पढ़कर के हमको यह बात बिल्कुल ठीक-ठीक पता है कि यदि जिसका जो भाव नहीं है उस भाव के ऊपर में वह जोर जबरदस्ती करके कुछ करना चाहे तो वह भी ठाकुर नहीं करने देते थे। जैसे कि एक भक्त था मोस्ट प्रोबेबबली वह दाना काली ही था। उसने देखा कि गिरीश घोष आकर के किस तरह से ठाकुर के साथ में मध्यपान करके ठाकुर को गालागाली करते हैं। तो जैसे कि यह सब भक्तों में हो गया था क्योंकि गिरीश ठाकुर का भैरव समान भक्त है। तो यह भी एक भक्त दूसरा यह देखकर के मध्यपान करके ठाकुर के पास में आया। गालागाली देने का प्रयास करने लगा। ठाकुर ने इमीडिएटली उसको शांत कर दिया। कहा कि देखो वह तुम्हारा भाव नहीं है। वह गिरीश का भाव है। तो गिरीश को उसके भाव के साथ में चलने दो। तुम अपने भाव के साथ में चलो। यानी कि जिसका जो भाव है उस भाव को भंग नहीं करना है। ना ही किसी को ठाकुर यह कहते थे कि तुम दूसरों का भाव अपनाओ ना ही ठाकुर यह पसंद करते थे कि कोई अपना खुद का भाव छोड़कर के दूसरे भाव दूसरे को देखादे कंपैरिजन करके कि अच्छा वो बड़ा अच्छा कर रहा है। चलो मैं भी ऐसा करने का प्रयास करता हूं। बोल करके अपना खुद का जो गियर चेंज करना चाहे अपना खुद का जो ट्रैक चेंज करना चाहे वो भी ठाकुर अलाउ नहीं करते थे।
भाव भंग नहीं करने के बारे में एक उदाहरण: स्वामीजी काली महाराज में शक्ति संचार करके उनकी साधना को अन्य रस्ते पे ले जाते है
तो इस बात का यहां पर फिर शरद महाराज ने यह पॉइंट लिख करके उसके बाद में उसका एक उदाहरण दिया है। वह उदाहरण जगत प्रसिद्ध है। रामकृष्ण भावधारा के साथ में जो लोग जुड़े हुए हैं सबको इस उदाहरण के बारे में पता है कि वही शिवरात्रि की रात वहां काशीपुर में वहां पे वो फिर वो काली महाराज को स्वामी जी उस समय ध्यान वगैरह कर रहे थे। बाद में काली महाराज को कहा कि मुझे स्पर्श करके देखो। तुमको क्या अनुभूति हो रही है? काली महाराज ने उनको स्पर्श किया तो ऐसा लगा जैसे कि एक बिजली का करंट उनके देह में पूरा घूम गया हो। उसके बाद में फिर कि ठाकुर ने नरेंद्र को बुलाकर के कहा कि अरे यह तुमने इस उसका जो एक भाव लेकर के चल रहा था उसमें तुमने अपना भाव क्यों प्रवेश करवा दिया? क्यों? क्योंकि ठाकुर सिर्फ नरेंद्र को ही अद्वैत या तो फिर निराकार साधना के लिए उपयुक्त मानते थे। बाकी सबको ठाकुर द्वैत भाव के लिए शरणागति भक्ति का मार्ग से उनको आगे बढ़ाने के लिए ठाकुर प्रयास कर रहे थे और इसके पीछे का सीक्रेट भी वही है कि देखिए यदि आपको अद्वैत मार्ग पर चलना है तो आपके भीतर में ब्रह्मचर्य का प्रचंड वो साहस शक्ति और जुनून होना चाहिए। यदि आपके मन पर 1% भी आपका कंट्रोल चला जाता है तो वह अद्वैत भाव के लिए वह व्यक्ति उपयुक्त नहीं है। अद्वैत साधना का फाउंडेशन ही है ब्रह्मचर्य और फिर द्वैत भाव का फाउंडेशन है शरणागति। 100% ब्रह्मचर्य किसी भी कंडीशन में पालन करना उसके लिए तो रेयर कोई ऐसा कोई जन्म लेता है ठाकुर मास्वामी जी को छोड़कर के ऐसा तो हमको ज्यादा तो दिखते नहीं है लोग। माने आज के आधुनिक युग की बात करें तो हमारे संघ में देखिए कि डायरेक्ट डिसाइपल से स्टार्ट करके म स्वामी जी को छोड़कर के बाकी जितने भी डायरेक्ट डिसाइपल्स थे सभी को ठाकुर ने भक्ति शरणागति यानी ज्ञान मिश्रित भक्ति का उपदेश दिया था। ऐसा नहीं है कि यह माने गिरीश की तरह ना कि रामबाबू की तरह आप संसार में डूबे रहिए। ब्रह्मचर्य को भूल ही जाइए। बस शरणागति आप ऑब्जर्व करते रहिए। ऐसा नहीं है। ब्रह्मचर्य का पालन करो। किंतु ट्रीट ब्रह्मचर्य एज ए ऑब्जेक्ट एज ए गोल रेदर देन अ स्टार्टिंग पॉइंट। यह दो डिफरेंस है भक्ति और ज्ञान में। ज्ञान में ब्रह्मचर्य स्टार्टिंग पॉइंट है। जबकि भक्ति में ब्रह्मचर्य एंड एम है। एंड है और यहां पे स्टार्टिंग है। तो यहां पे ठाकुर के जितने भी डायरेक्ट डिसाइपल थे, वे तो इस मामले में इस साधना में बहुत आगे बढ़ गए थे। किंतु वो जो एक 100% कंट्रोल होना चाहिए अपने मन के ऊपर में 100% एक तरह से आत्मसयम आत्मश्रद्धा होनी चाहिए। वो जो एक जो के वो कहते हैं ना 24 कैरेट गोल्ड वो सिर्फ स्वामी विवेकानंद ही थे। और इसीलिए जब स्वामी जी ने काली महाराज में भविष्य के स्वामी अभेदानंद उनमें यह भाव जब प्रवेश करवाया तब ठाकुर ने कहा कि देखो वह आज इतने दिनों तक एक भाव का आश्रय लेकर के आगे बढ़ रहा था। अभी तुम्हारी वजह से वह अभी निराकार में आ गया है। पता नहीं उस लड़के का क्या होगा। चलो जाने दो अभी जो हो गया सो हो गया। बाद में हमको पता है कि काली महाराज को रामकृष्ण संघ छोड़ना पड़ा था। अभी
स्वामी अभेदानंद के रामकृष्ण संघ छोड़ने के बारे में
हमारे मन में यह एक बात क्योंकि क्या है कि आज का युग तो यह संशय का युग है। आज का युग तो आर्गुममेंट का युग है और हमको आर्गुमेंट पसंद है। तो यह मेरी ओर से मैं एक आर्गुमेंट खड़ी करके कह सकता हूं कि क्या यह जो प्रसंग है उसको सही-सही रिपोर्ट किया गया है। शरद महाराज जो कहते हैं वह शरद महाराज को भविष्य पता था कि भविष्य में क्या होने वाला है। ऑलरेडी हालांकि देखिए कि शरद महाराज की समाधि महासमाधि हुई 1926 में जबकि काली महाराज ने यह जो संघ छोड़ा है या तो फिर जो आखिरी आखिरी जो सब हुआ है वो शरद महाराज के जाने के बाद में सब हुआ है। अपने महापुरुष महाराज की प्रेसिडेंसी के जो आखिरी आखिरी समय है उस समय से यह सब ज्यादा होने लगा था। पहले तो जब स्वामी जी राजा महाराज थे उस समय जब ये यहां पे आए थे काली महाराज अमेरिका से तो उनको ऐसा लगा कि उनको प्रेसिडेंट बना दिया जाएगा क्योंकि उनमें विद्वत्ता थी अमेरिका से वो सब प्रचार करके आए थे उनका एकेंस था पूरे विश्व पूरे भारत में जिस तरह से स्वामी जी को सम्मान मिला था उतना तो नहीं किंतु उसका एक अंश तो सम्मान मिला था कि चलो अपना एक भारतीय सन्यासी विदेश में वेदांत प्रचार करके आ रहा है स्वामी विवेकानंद ंद ने एक पूरा असेंबली लाइन यहां पर खड़ा कर दिया है। इस असेंबली लाइन में से निकल-निकल करके जितने भी अपने यह जो म शौर्यवान ये जो ओजस से भरपूर भारतीय सन्यासी है वह भारतीय आध्यात्मिकता का झंडा यह विदेश में जाकर के लहराएंगे। भले ही चाहे हम पॉलिटिकली गुलाम हो, इकोनॉमिकली संपूर्ण रूप से गड्ढे में गिरे हो, किंतु एटलीस्ट हमारी आध्यात्मिकता तो जागृत है। यह भरोसा वो भारत के लोगों में एक प्रकट हुआ था। तो उसी भरोसे को लेकर के यह जब अभेदानंद जी वापस आए तो उन्होंने सोचा कि शायद उनको प्रेसिडेंट बना दें। ऐसा तो हुआ नहीं। किंतु जब शशि राजा महाराज की महासमाधि हुई स्वामी ब्रह्मानंद की महासमाधि 1922 में उस समय अभी ये मेरा पर्सनल एनालिसिस है। मैंने इस तरह का कहीं पे कुछ पढ़ा नहीं है। मेरा जो पर्सनल जो ओवरऑल पढ़कर के जो मेरे माइंड में जो एक आया है मुझे ऐसा लगता है कि शशि राजा महाराज की स्वामी ब्रह्मानंद की महासमाधि के बाद में काली महाराज के मन में ऐसा एक हुआ होगा कि अभी तो एटलीस्ट यह लोग मुझे बनाएंगे क्योंकि विद्वत्ता में कहो कि यह प्रवचन देने में कहो कि इस तरह से वेदांत योग के बारे में बात करने को कहो इंटेलेक्चुअल तो मैं ही हूं तो मुझे ही तो प्रेसिडेंट होना चाहिए। तो ऐसा नहीं हो के फिर शरद महाराज पहले तो शरद महाराज को ऑफर किया गया प्रेसिडेंटशिप उन्होंने मना कर दिया कहा कि स्वामी जी मुझे तो सेक्रेटरी बना करके गए हैं। मैं सेक्रेटरी ही रहूंगा। तो वो एक हो गया। फिर ऐसा ठीक हुआ कि फिर दूसरा कौन है? तो फिर अपने महापुरुष महाराज सीनियर मोस्ट है। उनको बना देते हैं। अभी देखिए कि महापुरुष महाराज का लाइफ बाय दैट टाइम आप देखेंगे। ऐसा कोई एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी उन्होंने कुछ नहीं किया। उनकी तपस्या बहुत थी। ठाकुर के प्रति श्रद्धा भक्ति निष्ठा प्रचंड थी। उसमें कोई प्रश्न ही नहीं है। और फिर वह महापुरुष महाराज स्वयं कहते हैं कि कुछ-कुछ जो जैसे कि ईश्वर कोटि है। माने ठाकुर कहते हैं ना कि यह कुछ लोग ईश्वर कोटि है। उसमें ये राजा महाराज थे, स्वामी जी थे, निरंजनंद जी थे, योगानंद जी थे, प्रेमानंद जी थे और था। तो वो भक्त माने वो गृहस्थ रह गया। किंतु बाकी तो सब साधु थे। तो महापुरुष महाराज कहते हैं कि देखो कि ठाकुर किसी किसी को ईश्वर कोटि कह के गए हैं। बाकी को जीव कोटि कहा है। किंतु साथ-साथ में ही हमारी तपस्या और ठाकुर के आशीर्वाद से ठाकुर ने हमको ईश्वर कोटि बना दिया है। ऐसा महापुरुष महाराज स्वयं कहते हैं। तो चलो अभी उनकी साधना है। उसमें कोई प्रश्न नहीं है। किंतु ऐसा कोई एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी अचीवमेंट भी उनका ऐसा कुछ नहीं था। जिस तरह से शशि महाराज ने साउथ इंडिया को पूरा ठाकुर के उपदेश से एकदम वो प्रज्वलित कर दिया। या तो फिर अखंडानंद जी ने जैसे कि यह रिलीफ वर्क माने अखंडानंद जी की यूनिकनेस है कि रिलीफ वर्क का जो प्रारंभ हुआ जो बाद में विकास हुआ उसमें अखंडानंद जी का एक बहुत बड़ा अवदान है। हरि महाराज का एक यूनिकनेस है कि वह वेदांत के वीर थे। वेदांत केसरी थे। वेदांत साधना में उनकी बड़ी गहरी पकड़ थी। शशि महाराज का यूनिकनेस पता है। साउथ इंडिया शरद महाराज थे। जनरल सेक्रेटरी थे। तो ऐसा कोई स्पेसिफिकेशन या तो फिर ऐसा कोई स्पेशलाइजेशन जैसा महापुरुष महाराज का नहीं था। वो बेलूर मठ में ही रहते थे। एज ए मैनेजर रहते थे। सब देखते थे। और वहां पे भी इवन जब वराह नगर मठ में जब हमारा मठ था उस समय भी महापुरुष महाराज एज ए ऑर्गेनाइजर एडमिनिस्ट्रेटर या तो मैनेजर के रूप में कार्य करते थे। वो जनरल जो कुछ देखना होता है छोटा-मोटा जो सब तो उनका इसी तरह से था एक जनरल मैनेजर की तरह वो थे तो अभी उनको प्रेसिडेंट बनाना और यह अभेदानंद जी खुद के बारे में मानते हैं कि मेरा इतना बड़ा यूनिकनेस है इतना बड़ा स्पेशलाइजेशन है कि स्वामी जी के बाद में मैंने ही जैसे कि अमेरिका में प्रचार किया है और बात उनकी गलत भी नहीं है। देखिए कि हरि महाराज को भेजा गया तो हरि महाराज को तो वैसे ही वहां से थक गए थे। उनका स्वास्थ्य बिगड़ गया था। तो वैसे ही वह भारत आए ही थे, लौट ही रहे थे और रास्ते में पता चला कि स्वामी जी की महासमाधि हो गई है 4th जुलाई 1902 को। उसके बाद में फिर हरि महाराज ने ठीक ही कर दिया कि मुझे वापस जाना ही नहीं है। तो वो तो उनका हो गया। उसके बाद में त्रिगुणातिनंद जी को भेजा गया। तो त्रिगुणातिनंद जी ने कार्य तो बहुत अच्छा किया। किंतु क्या है कि उस समय आज जैसे कि यह वेस्टर्न अमेरिका है कैलिफोर्निया वगैरह जिसका कि इतना इकोनॉमिकल उनका ये है माने आज कैलिफोर्निया की इकोनमी कैलिफोर्निया की ये यूनिवर्सिटीज कैलिफोर्निया की ये जो कॉरपोरेशंस वहां का सिलिकॉन वैली वहां का हॉलीवुड वो सब देखिए कि अमेरिका में अमेरिका के ओवरऑल डेवलपमेंट में कैलिफोर्निया का एक बहुत बड़ा योगदान है। किंतु ये आज की बात है। उस समय का कैलिफोर्निया यानी कि लॉस एंजेलिस, सैन फ्रांसिस्को इतना कुछ डेवलप नहीं था। था डेवलप किंतु कंपैरेटिवली ये जो ईस्ट कोस्ट के जो सिटी थे बोस्टन, न्यूयॉर्क वगैरह उसके सामने तो कुछ नहीं था। तो यह नेचुरली काली महाराज सोचेंगे कि मैंने तो न्यूयॉर्क में रहकर के वेदांत प्रचार किया है। उस समय का वन ऑफ द ग्रेटेस्ट सिटीज ऑन अर्थ यह लंदन है, टोक्यो था। इसी तरह से यह न्यूयॉर्क था। तो कोलकाता था उस समय का ब्रिटिश राज्य का वह राजधानी कैपिटल। तो इसी तरह का न्यूयॉर्क है। तो न्यूयॉर्क में रहकर के मैंने वेदांत प्रचार किया है। इसके बावजूद यह लोग मुझे प्रेसिडेंट क्यों नहीं बनाएंगे? यह बात शायद उनके मन में रह गई होगी और इसी से धीरे-धीरे करके सब सेपरेशन होना स्टार्ट हुआ। तो यह सब घटनावली थी। स्वामी ब्रह्मानंद जी की महासमाधि हुई 1922 में और शरद महाराज की महासमाधि हुई 1926 में। तो यह जो चारप साल का जो गैप था उसी में शरद महाराज को शायद ऐसा लगने लगा होगा कि अभी जो काली महाराज का जो हमारे ऊपर में एक तरह से भीतर में से जो आक्रोश है भीतर में से जो नाराजगी है वो शायद अपने भक्तों को लेकर के अपने डिसाइपल्स को लेकर के सेपरेट हो जाए। अभी एक्चुअली देखिए कि यहां पे भी बहुत सारे कंट्रोवर्सीज है। काली महाराज खुद आखिरी घड़ी तक वो बेलूर मठ के ट्रस्टी बॉडी के मेंबर थे। बीइंग ए डायरेक्ट डिसाइपल। वो तो ऐसा तो नहीं कहेंगे कि मैं बेलूर मठ से सेपरेट हूं या वगैरह ऐसा कुछ और क्या है कि जैसे देखिए अखंडानंद जी ने भी वो सारगाछी में आश्रम स्थापित किया था। विज्ञान महाराज का भी इलाहाबाद में आश्रम था। तो इनका भी एक रामकृष्ण वेदांत आश्रम था काली महाराज का। अभी हम लोग मेन ब्रांच से सेपरेट है कि मेन ब्रांच से जुड़े हुए हैं। वो सब एडमिनिस्ट्रेटिव डिटेल वो उस समय इतना कोई क्रिस्टलाइज नहीं हुई थी कि यहां पे हेड क्वार्टर से कहा जाए कि सेंटर में यदि डायरेक्ट डिसाइपल खुद इस सेंटर में बैठे हैं तो हेड क्वार्टर जहां पे कि शुद्धानंद जी महाराज बाद बात बाद में जनरल सेक्रेटरी हुए थे शरद महाराज के जाने के बाद में तो वो क्या कर लेने वाले हैं? तो वहां पर डायरेक्ट डिसाइपल स्वयं बैठे हैं। वो तो ईश्वर के संतान है। आप लोग तो फिर भी आदमी इंसान मात्र है। शुद्धानंद जी है ना कि जितन महाराज है ना कि ये शंकरानंद जी है वगैरह वो तो फिर भी इंसान है। यह तो सब ईश्वर के देवदूत स्वयं है। ठाकुर के साथ में जन्म जन्मांतर से ये लोग आते हैं। ठाकुर की लीला के नित्य संगी है। तो उनके सेंटर में जाकर के कोई आपको मैनेजमेंट करने की तो कोई प्रश्न ही नहीं आता। जिस तरह से आज हेड क्वार्टर का सभी सेंटर के ऊपर में कंट्रोल है। तो अभी जहां पर अखंडानंद जी बैठे हैं, जहां पर विज्ञान महाराज स्वयं बैठे हैं, जहां पर काली महाराज स्वयं बैठे हैं या तो फिर यह चेन्नई में शशि महाराज स्वयं बैठे थे तो वहां पर जाकर के कोई बहुत ज्यादा आपको डिस्टरबेंस करने की जरूरत नहीं है। हालांकि जब शशि महाराज चेन्नई में थे उस समय तो शरद महाराज जनरल सेक्रेटरी थे। शशि महाराज की महासमाधि हुई 1911 के आसपास में तो वो तो खैर सेपरेट मामला है। यदि म शरद महाराज की महासमाधि के बाद में जब शुद्धानंद जी जनरल सेक्रेटरी हुए उस समय ये तीन डायरेक्ट डिसाइपल थे जो कि सेंटर इंचार्ज थे तो वहां पर जाकर के ज्यादा कुछ तो आपको करना नहीं है। विज्ञान महाराज, अखंडानंद जी महाराज और काली महाराज तो ऐसा कोई क्रिस्टलाइज नहीं था कि यह सेपरेट है या इकट्ठा है। किंतु बाद और यहां तक कि अभेदानंद जी आखिरी तक अपने मृत्यु तक बेलूर मठ के ट्रस्टी बॉडी के मेंबर थे। एक बड़ा सुंदर प्रसंग भी है कि अभेदानंद जी महाराज बेलूर मठ आते हैं। महापुरुष महाराज प्रेसिडेंट थे उस समय। तो अभी ट्रस्टी मीटिंग चल रही है। उसी में एकाएक किसी एक पॉइंट को लेकर के अभेदानंद जी महापुरुष महाराज के साथ के महापुरुष महाराज पे नाराज हो गए। और सबके सामने उन्होंने महापुरुष महाराज के साथ में आर्गुममेंट करना शुरू कर दिया। आवाज भी थोड़ा सा ऊंचा कर दिया। वगैरह-वगैरह कुछ हुआ। अभी जो सेवक महाराज वहां पर उपस्थित थे जिन्होंने ये स्मृति कथा लिखी है वो कहते हैं कि मैंने देखा कि ये ट्रस्टी मीटिंग में तो ये दोनों इस तरह से आर्गुमेंट कर रहे हैं। महापुरुष महाराज तो ऐसे आर्गुमेंटेटिव नहीं थे। काली महाराज का थोड़ा था कि पॉइंट लेकर के कुछ बोलेंगे जो कि बोलना भी चाहिए। एक्चुअली उनका उनकी रिस्पांसिबिलिटी है। अदरवाइज व्हाई आर यू पार्ट ऑफ ट्रस्टी बॉडी। राइट? यदि कुछ आपको दिखता है कि यह ठीक नहीं हो रहा है तो ट्रस्टी मीटिंग में उसको उठाना चाहिए। वो उनका नेचुरल ड्यूटी है। उनका धर्म है। तो जो भी है। तो यह सेवक महाराज लिख रहे हैं कि वहां ट्रस्टी मीटिंग में तो देखा कि काली महाराज इतना आर्गुमेंट कर रहे हैं। किंतु फिर जब ट्रस्टी मीटिंग समाप्त हुई। मैं महापुरुष महाराज के कमरे में गया। उनकी सेवा करने के लिए देखा कि काली महाराज और महापुरुष महाराज दोनों साथ-साथ में चेयर पर बैठे हैं। वह दोनों हंसी मजाक कर रहे हैं। और यहां पे काली महाराज महापुरुष महाराज को कहते हैं कि भाई मीटिंग में यदि मैंने तुम्हारे साथ में जो आर्गुममेंट की है वो तो एक वो जो कोई मैटर था पॉइंट था उसको लेकर के की है। तुम्हारे साथ में व्यक्तिगत कुछ नहीं है। तुम बुरा मत मानना। और महापुरुष महाराज सामने हंसते-हंसते कहते हैं अरे भाई उसमें क्या है? मीटिंग की बात है। वह मीटिंग में हो गई खत्म। अभी हमारे बीच में तो ऐसा कुछ नहीं है। तो यह दोनों महापुरुषों को ये बच्चे की तरह हंसी मजाक करते देखकर के वो सेवक महाराज लिखते हैं अपनी स्मृति कथा में कि मैं तो आश्चर्यचकित हो गया। ऐसा लगता था जब काली महाराज आर्गुममेंट कर रहे थे कि कितने ही जैसे कि महापुरुष महाराज पर नाराज है। कितना ही उनके ऊपर में उनका आक्रोश है। किंतु बाद में उनके कमरे में जाकर देखा तो दूसरा ही दृश्य देखने को मिलता है। तो यह था उनका गुरु भाइयों में जो आपस में प्रेम था काली महाराज का ठाकुर के ऊपर में जो श्रद्धा भक्ति निष्ठा थी उसका कोई प्रश्न ही नहीं है। उसको कोई सपने में भी क्वेश्चन नहीं कर सकता। और फिर काली महाराज आखिर तक कहते थे जब उनकी आखिरी आखिरी समय जब उनका आया था तब उन्होंने कहना शुरू कर दिया था कि मुझे बेलूर मठ में जाकर के क्रिमेट करना मेरी जब मेरा मृत्यु होगा तो बेलूर मठ में मुझे वहां पे वो अग्निदाह देना जहां पे बाकी सब डायरेक्ट डिसाइपल को अग्निदाह दिया गया है जो समाधि घाट है आज का बेलूर मठ में यदि आप बेलूर मठ गए होंगे तो आपने देखा होगा तो वहां पे जाके मुझे क्रिमेट करना ऐसा काली महाराज आखिरी तक कहते थे। किंतु जैसे वह होता है कि उनके डिसाइपल्स ने यह सोच लिया। अभी इसका भी तो कोई ऑफिशियल रिकॉर्ड नहीं है। यह सब अनुमान की बातें हैं। जो भी हमको सरकमस्टेंशियल एविडेंस मिलता है। कही सुनी जो बातें हैं उसके ऊपर से उनके डिसाइपल्स ने शायद यह सोच लिया होगा कि यदि काली महाराज को बेलूर मठ में जाकर के क्रिमेट करेंगे तो वह हमारे हाथ से निकल जाएंगे। फिर बेलूर मठ कहेंगे कि वह तो जैसे दूसरे डायरेक्ट डिसाइपल है वैसे ही यह है। हम अपना यदि सेपरेट करना चाहते हैं रामकृष्ण वेदांत मठ यदि बेलूर मठ से सेपरेट करना चाहते हैं तो हमको काली महाराज को अपने हाथ में रखना होगा वगैरह-वगैरह जो भी कुछ मेरा यह अनुमान है सोच करके उन्होंने काली महाराज को ले जाकर के काशीपुर में उनको क्रिमेट करवाया था। यहां पे एक साइड में देखेंगे कि ठाकुर की समाधि है। उसके बगल में काली महाराज की समाधि है। तो उन्होंने कहा कि ठाकुर के संतान ने ठाकुर के साथ में उनको क्रिमेट किया है। उसमें गलत किया है। तो खैर ठीक है अभी आपको सोचना है जैसा सोचिए। किंतु फिर धीरे-धीरे करके ये लोग पूरा सेपरेट ही हो गए। तो यह काली महाराज का पूरा एक था कि यहां पे ठाकुर के पास में जब आते थे ठाकुर ने उनको भक्ति मार्ग है या तो फिर यह शरणागति का रास्ता है। उसको लेकर के आगे बढ़ने को कहा होगा। यहां पर ठाकुर इतना कोई यह डिटेल नहीं बताते कि कौन सा रास्ता उन्होंने काली महाराज को दिया है। किंतु ऐसा अवश्य कहते हैं कि उसका जो रास्ता था जो इस रास्ते को लेकर के जो इतना आगे बढ़ रहा था उसमें तुमने डिस्टरबेंस क्यों खड़ा किया? ऐसा बोलकर के ठाकुर स्वामी जी को स्वामी जी के सामने कंप्लेन करते हैं। तो यह था पूरा काली महाराज का हिस्ट्री। अभी जो प्रश्न हमारे मन में उठ सकता है कि यह शरद महाराज जब यह लीला प्रसंग लिखते थे उस समय ऑलरेडी उनको लगा होगा कि भविष्य में काली महाराज शायद उनका जो उनके जो डिसाइपल है वह अपने संघ में नहीं रहेंगे। तो क्या काली महाराज को डिफेम करने के लिए या तो फिर काली महाराज को पहले से ही उनके सामने एक क्वेश्चन मार्क रखने के लिए कि बाद में वह जो संघर्ष सेपरेट हुए वह ठीक नहीं था। ऐसा एक क्वेश्चन मार्क खड़ा करने के लिए उन्होंने लीला प्रसंग में इस घटना का वर्णन किया है। यह प्रश्न हो सकता है और स्पेसिफिकली स्पेशली शरद महाराज का इतना तो एकेडेमिक इंटीग्रिटी है कि इन्होंने इस प्रसंग के साथ में एक फुटनोट भी दिया है। फुटनोट में वह कहते हैं कि जैसे देखिए यह काली महाराज का भी शायद ऐसा कुछ कैलकुलेशन रहा होगा कि मेरा भविष्य का प्लान क्या है? यह सोचकर के उन्होंने अपनी जीवन कथा लिखने की शुरुआत की थी। आम जीवन कथा ना कि ऐसा ही कुछ नाम है उनकी ऑटोबायोग्राफी का। अपने संघ में जहां तक मुझे मैं समझता हूं दो ही साधु माने दो ही डायरेक्ट डिसाइपल ने अपनी ऑटोबायोग्राफी लिखी है। उसमें से एक है अह स्वामी अखंडानंद जी महाराज और दूसरे हैं यह स्वामी अभेदानंद जी महाराज। तो अभेदानंद जी ने अपनी ऑटोबायोग्राफी लिखने की शुरुआत ठाकुर के साथ में प्रथम दर्शन जो उनका हुआ वहां से प्रारंभ करके वो वराह नगर मठ छोड़कर के लंदन जाने के लिए जो यात्रा उन्होंने की थी वराह नगर ना आलम बाजार व्हाटएवर तो वहां से उन्होंने निकल कर के आलम बाजार मोस्ट प्रोबेबबली वो लंदन जाने के लिए जो यात्रा की तो वहां तक उनकी ऑटोबायोग्राफी आती है। यानी कि वह लंदन में जाकर के फिर लंदन से अमेरिका जा करके उन्होंने क्या वेदांत प्रचार किया। फिर भारत में आकर के क्या उन्होंने सोचा? क्या यह वो सब ये इतना उन्होंने कुछ नहीं लिखा। किंतु जब तक वह भारत में थे तब तक का उन्होंने पूरा डिटेल उन्होंने दिया है और पढ़ने लायक है। बड़ा ही सुंदर है। मैंने पढ़ा है। अभी हुआ है ऐसा कि वो रामकृष्ण वेदांत मठ जो है वो उन्होंने क्या किया कि फिर उनके एक साधु ने एक सीनियर साधु ने उनकी बायोग्राफी का सेकंड पार्ट लिखा। जहां से अभेदानंद जी ने छोड़ा है कि वह लंदन जाने के लिए रवाना हुए स्वामी जी के आह्वान पे। तो वहां से जो उन्होंने छोड़ा है तो उसका वहां से प्रारंभ करके अखंड अभेदानंद जी के आखिरी दिनों तक की जो कहानी है वो वहां के एक साधु ने लिखी है। यानी कि अभी जो अभेदानंद जी की जो बायोग्राफी प्राप्त है वो दो वॉल्यूम में है। फर्स्ट वॉल्यूम उनकी ऑटोबायोग्राफी है। उन्होंने खुद लिखा है ठाकुर के साथ में दर्शन से प्रारंभ करके वो भारत छोड़ा वेदांत प्रचार के लिए पश्चिम में गए वहां तक और सेकंड पार्ट है जो कि एक उनके एक डिसाइपल ने लिखा है वो वहां से वो स्टार्ट करते हैं जहां पे अभेदानंद जी ने छोड़ा है वो प्रारंभ किया भारत से यात्रा वहां से लेकर के उनके जीवन के आखिरी दिनों तक अभी मैंने इस ऑटो इस बायोग्राफी का पहला पार्ट मैंने पढ़ा है क्योंकि वह काली महाराज ने स्वयं लिखा है सेकंड पार्ट मैंने पढ़ा नहीं है। तो यानी कि भारत में आकर के वापस आकर के वो जब आई थिंक 1906 के आसपास में ये काली महाराज वापस आए थे। एग्जैक्ट ईयर मैं भूल गया तो व्हाटएवर तो वो वापस आकर के फिर काली महाराज ने क्या किया? किस तरह से रामकृष्ण वेदांत मठ की स्थापना की? वहां के क्या कार्यकलाप थे? वो मुझे पता नहीं है। तो दैट इज माय कनंफेशन कि उनका मन के उनके खुद के संघ की दृष्टि से अभेदानंद जी का थिंकिंग प्रोसेस कैसा था आई डू नॉट नो और इतना वो डिटेल में जाने की मेरी इच्छा भी नहीं है। इंटरेस्टिंगली अपने संघ में दो लोग हैं। वैसे मैंने सभी के बारे में बहुत डिटेल में पढ़ा है। ठाकुर मां स्वामी जी डायरेक्ट डिसाइपल किंतु दो लोग हैं इंटेलेक्चुअल पर्सनालिटीज कि जिनका प्रोलिफिक आउटपुट है। बहुत उन्होंने लिखा है। बहुत कुछ उन्होंने म बोला है। उनका इंटेलेक्चुअल कंट्रीब्यूशन है। किंतु इन दोनों को मैंने ज्यादा नहीं पढ़ा या तो फिर कुछ रिलेवेंट पोर्शन ही पढ़े हैं। वो दो है निवेदिता और अभेदानंद जी महाराज। निवेदिता का देखिए प्रोलिफिक उसका लिटरेचर है। किंतु मैंने वही पार्ट पढ़े हैं जो कि स्वामी जी के साथ में रिलेटेड है। यानी कि निवेदिता के लेटर्स मैंने सभी पढ़े हैं। किंतु फिर मैं उसमें उसमें देखेंगे कि स्वामी जी के बारे में निवेदिता क्या कहती है। दैट इज माय मेन पॉइंट ऑफ फोकस। फिर भारतीय साहित्य, कल्चर, ट्रेडिशन, रिलीजन के बारे में निवेदिता क्या कहती है? उतना मैं उस डिटेल में नहीं गया। क्योंकि एक बार स्वामी जी को पढ़ने के बाद में बाकी सब आपको फीका लगने लगेगा। यदि स्वामी जी का टेक आज की लैंग्वेज में कहेंगे व्हाट इज माय टेक व्हाट इज योर टेक? सो वंस यू रीड स्वामी जीसस टेक ऑन हिंदूइज़्म बाकी सबका टेक आपको अच्छा नहीं लगेगा। सो दैट इज व्हाई निवेदिता का वही पोर्शन पढ़ा है वि इज रिलेटेड टू स्वामी जी वो जो वंडरिंग्स इन हिमालय फिर माय मास्टर फिर ये जो लेटर्स में खास करके निवेदिता जो स्वामी जी के बारे में लिखती है और ये मैं जब राजकोट में था मैगजीन का एडिटर था उस समय मैंने एक डिवोटी को कहा था कि यह जो निवेदिता के लेटर्स है वो मैंने पढ़े हैं उसमें स्वामी जी के बारे में बड़ी अद्भुत इंसाइट है इस तरह की इंसाइट की जो आपको कहीं पर देखने को नहीं मिलेगी तो वो इंसाइट्स को कलेक्ट करके कंपाइल करके उसको गुजराती में आप ट्रांसलेट कीजिए। तो वो कुछ एक आध साल तक ये ट्रांसलेशन चला था और भी बहुत कुछ होने वाला था। किंतु खैर फिर बाद में तो मैं मेरा ट्रांसफर हो गया। तो दैट इज वन थिंग कि निवेदिता को मैंने इतना ही पढ़ा है वि इज मोर रिलेटेड टू स्वामी जी एंड सिमिलरली विद अभेदानंद जी कि अभेदानंद जी का पूरा जो प्रोलिफिक साहित्य है माने जिस तरह से स्वामी जी का यह है ना विवेकानंद इन द वेस्ट सिस्टर गार्गी ने लिखा है वैसे ही उनके बारे में एक सिस्टर शिवानी है मोस्ट प्रोबेबबली इफ आई रिमेंबर करेक्टली सिस्टर शिवानी है शी हैज़ रिटन द सेम माने बड़े-बड़े वॉल्यूम है अभेदानंद इन द वेस्ट और काफी रिसर्च करके बहुत कुछ लिखा है और अभेदानंद जी की रेमिनेशंस बहुत सारे अवेलेबल है। किंतु उसमें से मैंने सिर्फ आम जीवन कथा जो कि उनका ऑटोबायोग्राफी का फर्स्ट वॉल्यूम जो कि उन्होंने अपने से लिखा है उतना ही पार्ट मैंने पढ़ा है उनके बारे में और अदर देन दैट कि अपने साहित्य में बाकी डायरेक्ट डिसाइपल्स के रेमिनेशंस में अभेदानंद जी कहां पे आते हैं वो पार्ट मैंने ऑब्वियसली पढ़े हैं। सो दैट इज माय कन्फेशन कि यहां पे जो मैंने जो कुछ कहा बहुत सारा स्पेकुलेशन है और रामकृष्ण संघ के पॉइंट ऑफ व्यू से मैंने कहा है नॉट फ्रॉम द पॉइंट ऑफ व्यू ऑफ अभेदानंद जी तो यहां पे शरद महाराज का एकेडेमिक इंटेग्रिटी देखिए यहां पे वो यह पूरी घटना जो हुई है कि स्वामी जी को स्पर्श करके अभेदानंद जी को करंट जैसा लगा उसके बाद में ठाकुर ने कहा कि अरे तुमने इसका जो पूरा कर्म प्रवाह साधन प्रवाह क्यों उसने तुमने बदल दिया और और फिर बाद में अभेदानंद जी के जीवन में जो थोड़ी-थोड़ी सी असामंजस्यता यानी कुछ ना कुछ ये जो ये ऐसा दिखने लगा था क्या कहेंगे कि वो प्रॉब्लम तो नहीं कहेंगे कि कुछ-कुछ इश्यूज जो दिखने लगे थे वो दैट वास बिकॉज़ ऑफ दिस इवेंट। अभी जब यह वर्णन करके अभ शरद महाराज फुटनोट देते हैं कि अभेदानंद जी स्वयं अपनी बायोग्राफी में ऐसा लिखते हैं कि मैंने जब नरेंद्र को स्पर्श किया उस समय अवश्य मुझे ऐसा लगा कि जैसे मेरे शरीर में इलेक्ट्रिक शॉक बह गया हो। किंतु इस घटना का ना ही मेरे विचारों के प्रवाह के ऊपर में ना ही मेरी साधना के प्रवाह के ऊपर में कोई असर हुई है। यदि नरेंद्र या तो फिर नरेंद्र के संगी है जो यह सब क्लेम करते हैं कि हां मेरा जीवन परिवर्तित हो गया। जिस रास्ते को लेकर के मैं चल रहा था उसमें पूरा कंफ्यूजन हो गया। मेरे माइंड में कंफ्यूजन खड़ा हुआ। तो यह सब बातें बिल्कुल गलत है। अभी मैं एग्जैक्ट उनके वर्ड नहीं है। मैं थोड़ा पैरेफ्रेज कर रहा हूं। उनके एग्जैक्ट वर्ड हम पढ़ेंगे जब यह पाठ करेंगे उस समय। तो यह देखिए कि प्रश्न यहां पर ऐसा खड़ा होता है। आउट ऑफ ह एकेडमिक इंटेग्रिटी शरद महाराज ने दोनों पॉइंट ऑफ व्यू हमारे सामने रख दिए हैं। रामकृष्ण संघ का ठाकुर के डायरेक्ट डिसाइपल का स्वामी जी के गुरु भाइयों का क्या पॉइंट ऑफ व्यू था इस पर्टिकुलर घटना के बारे में और अभेदानंद जी का स्वयं क्या पॉइंट ऑफ व्यू था। अभी इंटरेस्टिंग तो प्रश्न हो सकता है। अच्छा स्वामी जी का क्या पॉइंट ऑफ व्यू था? स्वामी जी ने खुद ने क्या सोचा होगा इस घटना के बारे में? में तो अनफॉर्चूनेटली वह हमको कहीं पे देखने को नहीं मिलता है और एटलीस्ट मैंने कहीं नहीं पढ़ा है। सो दैट इज़ यदि स्वामी जी इसके बारे में कुछ कहते हैं तो दैट वुड हैव बीन रियली फैंटास्टिक। ये पूरा मामला का एक पूरा जैसे कि वो सुप्रीम कोर्ट में जाता है ना वो मामला या हाई कोर्ट में यह दिया उनको जजमेंट वो बोलता है नहीं जाकर के अपील करेंगे। किंतु सुप्रीम कोर्ट में जाकर के अपील करने से वह सब मामला ठीक हो जाता है। यहां पे निश्चय ही ठाकुर का वर्डिक्ट हमारे पास में है। किंतु फिर वही जो प्रश्न अभी जो मैं रेज करने वाला था कि शरद महाराज इस घटना को ठीक-ठीक रूप से लिखे हैं। इस बात का क्या कुछ प्रमाण है या तो फिर क्या कोई भविष्य में ऐसा क्लेम कर सकता? देखिए हमारा मूवमेंट अभी बड़ा यंग है। कैथोलिक चर्च या बुद्धिस्ट संघ को 2000 साल ढाई हजार साल जिसका हिस्ट्री है उसका इतिहास में हमको आज पता चलता है कि छोटी-छोटी चीजों को लेकर के कितना कंट्रोवर्सी है। जो जीसस को जब क्रुसिफाई करके वो गुफा में उनको क्रिमेट किया गया। उसके बाद में वह रेज हुए हैं। रिजरेक्शन हुआ है। इस बात का क्या प्रूफ है? बहुत सारे लोग पूछते हैं आपने वो जैसे वो मैरी मैकडेलिन उसने ही देखा सिर्फ और फिर वह जाकर के बाकी सब एपोस्टल है उनको गुड न्यूज़ देने को कही तो प्रश्न है कि हु इज मेरी मैकडेलिन उसका तो बाइबल में ऐसा कुछ वर्णन नहीं है। फिर कुछ-कुछ लोगों ने ऐसा स्टार्ट करना शुरू किया कि अच्छा जीसस का रिजरेक्शन तो बड़ा ही इंपॉर्टेंट घटना है। उसको प्रथम देखने वाली यदि मैरी मैकडेलिन थी और उसका बाइबल में या तो फिर न्यू टेस्टामेंट में इतना ज्यादा कुछ उल्लेख नहीं है। दैट मींस देयर इज़ समथिंग मिस्ट्री इनवॉल्वड हियर। शी माइट हैव बीन द वाइफ ऑफ़ जीसस और समथिंग लाइक दैट कि जीसस के साथ में उसका होगा। देखिए कि क्रिश्चियनिटी का उसके बारे में बात करने का सबसे बड़ा फायदा यह है कि वो लोग जो जिसको कहते हैं ना हायर क्रिटिसिज्म। अपने धर्म का बारे में जो आर्गुमेंट करना वो लोग खुद करते हैं। उसका फायदा यह है कि हम यदि उसके बारे में कुछ आर्गुममेंट करने को जाएंगे वो हमारे पीछे नहीं लगेंगे। दैट इज वन बेनिफिट ऑफ दैट। और दूसरे किसी धर्म के बारे में हम सोच भी नहीं सकते। इस तरह की बात करना इवन हिंदू धर्म जिसका कि इतना पूर्व पक्ष उत्तर पक्ष ये न्याय वगैरह का इतना लंबा हिस्ट्री है। आजकल हिंदू धर्म के बारे में भी कुछ बोलना है तो सोच समझ कर के बोलना पड़ता है। सो व्हाटएवर यहां पे किंतु मैं भविष्य को देखकर के यह आर्गुमेंट उठा रहा हूं कि भविष्य में शायद कोई कह सकता है कि शरद महाराज ने यह गप तो नहीं लगाया। अपने पॉकेट में से तो नहीं निकाल दिया। ठाकुर की बात यह पूरा प्रसंग कि अभेदानंद जी का जीवन परिवर्तन हो गया। इस स्पर्श को लेकर के माने इस घटना को लेकर के इसलिए उन्होंने ऑर्डर छोड़ा या कि फिर उनका ऑर्डर छोड़ने का वही और कोई कारण था गुरु भाइयों में झगड़ा था गुरु भाइयों में क्या आपस में मतभेद थे वाद विवाद थे तो गुरु भाइयों के भीतर में आपस में मतभेद वाद विवाद कोरल डिफरेंस ऑफ ओपिनियन थे उसको छुपाने के लिए क्या शरद महाराज ने इस पूरे घटना को घड़ा है अपने पॉकेट में से निकाला है एकदम 100% झूठ बोला है वी डू नॉट नो ऐसा करके भविष्य में कोई कह सकता
हमारी पुस्तकों के एडिट करने के बारे में
है और देखिए कि कंट्रोवर्सीज आर पार्ट ऑफ रिलीजियस ऑर्डर मैं जब बेलूर मठ में था कंप्लीट वक्स एडिट कर रहा था तो मैं सोचता था यह अपेक्षा रखता था कि कोई आके मेरे से पूछे कि अच्छा आप कंप्लीट वर्क्स में क्या कर रहे हैं वह वेरी नाइस थिंग मैं उनको बताता मैं उनको बड़ा डिटेल में कहता कि हम लोग क्या-क्या कर रहे हैं मेरा वो पूरा एक एकेडमिक ओरिएंटेशन किंतु प्रॉब्लम यह था कि जो कोई मुझे वैसे तो ज्यादातर लोग कभी भी पूछते नहीं थे और जो पूछते भी थे ना तो ऐसे प्रश्न करेंगे। अच्छा हमने सुना है कि आप लोग कंप्लीट वर्क्स में से हिंदू शब्द पूरा हटा दे रहे हैं। क्या यह बात सही है? मैंने कहा क्या बात कर रहे हो? तो उस समय ऐसा था कि ये हिंदू माने ये हिंदुत्व के ऊपर में से आरएसएस वालों ने जिस तरह से हिंदू धर्म को प्रोजेक्ट करते हैं और उसमें जिस तरह से वह स्वामी जी का सहारा लेते हैं व्हिच इज अ बिट डिफरेंट। वो जिस तरह से वे लोग स्वामी जी को प्रोजेक्ट करते हैं और जिस तरह से हम लोग स्वामी जी को इंटरप्रेट करते हैं ऑब्वियसली देयर आर सम फंडामेंटल डिफरेंसेस। तो उन लोगों को कहीं मसाला ना मिल जाए इसके लिए क्या हम लोग कंप्लीट वर्ड्स में से हिंदू शब्द ही हटा दे रहे हैं क्या? मैंने कहा भाई देखो पहली बात तो है कि मैंने खुद ने हटाया नहीं। मेरा मेरा खुद का जितना कार्य है उसमें तो मैंने इस तरह का कोई एडिटिंग किया नहीं। दूसरा कि यह कंप्लीट वर्ष तो पिछले सवा5 सालों से एडिट होता चला आ रहा है। मैं एडिट कर रहा था यह 2015 16 17 और 18 में। जबकि ये कंप्लीट वर्ष का कंपाइलेशन तो जब से स्वामी जी ने शिकागो लेक्चर दिया तभी से प्रारंभ हो गया था। तो उस समय भूतकाल में यदि कोई हैवी एडिटिंग हुआ होगा आई डू नॉट नो। ना ही हमारे पास में ऐसा कोई रिकॉर्ड है। बट मैं अपनी ओर से कह सकता हूं कि मैंने तो ऐसा कुछ नहीं किया। सो देखिए कि कंट्रोवर्सीज हैव ए वे ऑफ फाइंडिंग देयर वे। कोई भी महत कार्य हो रहा है वह कंट्रोवर्सी आकर मिल ही जाएगी। उसमें फिर ईंधन देने वाले भी कुछ इंसिडेंट हो जाते हैं। जैसे कि यह मैंने कुछ-कुछ पाया है अपने रिसर्च में कि स्वामी जी के जो शब्द थे ओरिजिनल शब्द उसको ना काफी मॉडिफाई किया गया है। खास करके ऐसे कुछ-कुछ डॉक्यूमेंट्स पड़े हैं जिसमें कि अभी स्वामी जी का कोई लेक्चर है या कोई यह कुछ है। उसको बड़ा हैवीली एडिट किया गया है। रेड पेन से यह मेरे ख्याल से मिज सेवियर ने इस तरह का कुछ-कुछ एडिटिंग किया था। मिज सेवियर जो कि मायावती में थी। हमको पता है कि स्वामी जी कैप्टन और मिज सेवियर को लेकर के अमेरिका से भारत आए थे। ब्रिटेन से ले आए थे इन दोनों को और वहां पर मायावती आश्रम की रचना की थी। अद्वैत आश्रम स्थापा था। वहां से प्रबुद्ध भारत पब्लिश हो रहा था और वहीं वो पब्लिकेशन सेंटर बना था। तो हमको पता है कि अद्वैत आश्रम इन जनरल स्वामी जी का कंप्लीट वर्स एडिट करने का अपने ऑर्डर में किसके पास में राइट है? ओरिजिनल तो वह अद्वैत आश्रम के पास में है। इवन जो हम लोग बेलूर मठ में एडिट कर रहे थे अल्टीमेटली इट विल बी पब्लिश्ड बाय अद्वैत आश्रम। जैसे कि अभी वो जो स्वामी जी के लेटर्स ऑलरेडी पब्लिश हुए हैं। तो उस समय मायावती में मिज सेवियर स्वामी जी के जो कुछ-कुछ लेक्चर्स वगैरह एडिट कर रही थी। उसमें से अभी मैं भूल गया कि एग्जैक्टली मैंने कहां पे यह बात पढ़ी थी। किंतु मैंने पढ़ा है जिसने यह बात लिखी है, वह कहता है कि मिज सेवियर के द्वारा एडिटेड मैनुस्क्रिप्ट मैंने देखी है। वहां पर जो स्वामी जी के कुछ-कुछ शब्द है, कुछ सेंटेंस है, उसको रेड लाइन मार्क करके उन्होंने क्रॉस कर दिया है। और फिर कमेंट लिखी है कि यह जो शब्द है या तो फिर जो स्टेटमेंट है बड़ा इनफ्लेमेटरी है या तो फिर बड़ा इररिलेवेंट है या बड़ा यह है वो है। इसको हटा दो या तो इस तरह से मॉडिफाई कर दो। तो आई डू नॉट नो अल्टीमेटली इतना डिटेल में भी मेरे पास में नहीं है कि मिज सेवेर ने इस तरह से जो इतना हैवीली एडिट किया था स्वामी जी के लेक्चर या व्हाटएवर वो था मेनुस्क्रिप्ट उसको फिर एडिटेड अवस्था में ही हमने रखा है कि उसको रिवर्स एडिट किया गया है। आई डू नॉट नो वो लीला प्रसंग के बारे में जो जैसे मेरा खुद का अनुभव मैं बताता हूं। उद्बोधन में लीला प्रसंग सीरियल वाइज पब्लिश होना शुरू हुआ था। हमको पता है कि शरद महाराज ने लीला प्रसंग लिखा। क्यों? क्योंकि उद्बोधन भवन का निर्माण किया था उन्होंने चंदा लेकर के वो उधार लेकर के तो उधार वापस भी तो देना है तो उसके लिए लीला प्रसंग लिखा वो किताब सेल होगी तो उसका वो सेल के प्रोसीडिंग में से ये वो हमने वो उधार हम वापस कर देंगे तो ऐसा बोलकर के लिखने की शुरुआत की किंतु उसको साथ में उद्बोधन में सीरियलाइज भी कर दे थे। अभी मैं जब लीला प्रसंग पढ़ रहा था मुझे यह प्रश्न हो रहा था कि यह ओरिजिनल ही है ना कि इसमें कुछ एडिटेड है। यह प्रश्न मुझे क्यों हुआ? क्योंकि मैं अगेन थोड़ा सा बैक ट्रैक करके स्टोरी को मैं रामकृष्ण उद्बोधन के द्वारा पब्लिश पहला तो मैंने कथामृत पढ़ा गुजराती में गुजराती में कथामृत पढ़ने के बाद में जब मैं पहली बार बेंगली में कथामृत पढ़ना शुरू किया मुझे अभी भी याद है पहला जो सेंटेंस है कि जे शालारा हरि नाम मत होए नाचते पारवे ना श्री शाला देर कनो होवे ना जो साले हरि नाम का हरि नाम में मत्त होकर के नाच नहीं सकने हैं कभी नाचने नहीं वाले उन सालों का कभी होगा नहीं। तो मैं तो इतना आश्चर्यचकित हो गया। ठाकुर साला बोल के गाली देते हैं। लोग हम लोग स्कूल में पढ़ते थे तो हमको बताया जाता था कि अपशब्द नहीं बोलना है। मैं अपने जीवन में कभी अप्रशब्द व्यवहार नहीं किए। और यहां पे ठाकुर प्रारंभ में ही वो शाला बोल रहे हैं। बाद में क्या बोलेंगे किसको पता? आई वास सो शॉक्ड। और फिर मैंने गुजराती पढ़ा था रिसेंटली। बाद में मैं यह पढ़ रहा था बेंगली। मुझे बहुत सारे ऐसे चेंजेस मिले। बहुत सारे मींस उस समय बहुत ज्यादा लगते थे। आज इतना ज्यादा नहीं लगता। अभी वो मेनली तो मछली खाने की बात है। तो जहां पर बंगाली में ठाकुर मछली खाते हैं तो गुजराती में उनको संदेश है आलू का सब्जी खिला दिया है। तो दैट इज कल्चरल वो जो सब होता है। किंतु उसी समय मेरे माइंड में बैठ गया कि जो ओरिजिनल है और अभी का जो ट्रांसलेशन है वगैरह उसमें डिफरेंस है। सो ऑलवेज फॉलो ओरिजिनल। अभी भी मैं जो क्लास लेता हूं ओरिजिनल को ही पढ़ के मैं अपना ही अनुवाद करता हूं। आई नेवर डिपेंड अपॉन एनी ट्रांसलेशन। क्योंकि मैंने खुद ने ट्रांसलेशन किया है। मुझे पता है इट नेवर कैप्चर्स द प्रॉपर स्पिरिट। तो यह तो मेरे माइंड में ऑलरेडी था। फिर मैं जब लीला प्रसंग पढ़ रहा था उस समय मुझे लगा कि यह क्या ओरिजिनल ही है ना कि देयर आर सम चेंजेस। तो अभी हाउ टू चेक ओरिजिनल फर्स्ट एडिशन कहां मिलेगी वह सब तो आई डू नॉट नो और मैं तो उस समय टीसी में था या तो फिर उस समय ऐसा ही कुछ था। उस समय यह उद्बोधन का 100 इयर्स सीडी पब्लिश हुआ था। तो मैंने इमीडिएटली 100 इयर्स वाला सेट परचेस कर लिया। उसके बाद में मेरा पोस्टिंग जब लिमड़ी में हुआ तो वहां पे कंप्यूटर में बैठकर के मैं यह सीडी एक के बाद एक देख रहा हूं। मैं देखना चाहता हूं कि जो फर्स्ट टाइम जो आर्टिकल पब्लिश हुआ उसमें जो शरद महाराज ने जो लिखा उसके साथ में अभी आज की किताब का कंपैरिजन किया जाए। आई वास वेरी सरप्राइज़्ड कि जो पहला सीढ़ी मैंने डाला अभी मैं डिटेल भूल गया क्योंकि वो सब इन्वेस्टिगेशन मैंने लिमड़ी में किया था। दैट वाज़ इन 2010 मोर देन 14 इयर्स पास हो गए हैं। और वो भी मैं तो कोई एकेडमिशियन नहीं हूं कि प्रॉपर ये सब रिसर्च करूं। अपनी बुद्धि चला करके जो मैंने सीडी डाला और उसमें इंडेक्स जो होता है इंडेक्स में मैंने देखा कि यहां पे लीला प्रसंग है इस पेज के ऊपर में। तो मैंने इमीडिएटली पेज जाकर के देखा तो देखा वो पेज ही गायब है। नाउ आई डू नॉट नो। भाई वो पेज गायब था कि माने वो अभी क्या है कि 100 साल पहले के उद्बोधन को स्कैन करके वो सब किया है तो तो वो हो सकता है कि वो मिस हो गया हो कि व्हाटएवर देयर आर 100 रीज़ंस किंतु मेरे माइंड में जो कांस्परेसी का भाव चल रहा था इमीडिएटली मैंने सोच लिया कि ये लोग ओरिजिनल एडिशन को छुपा के रखना चाहते हैं। अगेन आई डू नॉट नो वो सब इन्वेस्टिगेशन मैंने उस समय किए थे। बाद में तो मेरा राजकोट जब पोस्टिंग हुआ मैं पब्लिकेशन में इतना बिजी हो गया कि फिर वो सब करने का टाइम भी नहीं मिला और वगैरह-वगैरह तो जो भी कर्सरी एक मेरा था इन्वेस्टिगेशन मुझे ऐसा लग रहा था कि यदि इस तरह से ओरिजिनल को इसके साथ में कंपेयर करें तो कितना डिफरेंस मिलेगा। तो यहां पर जो मैं प्रश्न जो उठाना चाहता था कि सभी जितने भी साधु सन्यासी संघ है, रिलीजियस ऑर्डर है, रिलीजियस ऑर्गेनाइजेशन है उसके साथ में कहीं ना कहीं से कुछ ना कुछ कंट्रोवर्सी जुड़ी जाती है। अच्छा किंतु यहां पे और एक जो पॉइंट मैं बताना चाहता था कि ये तो लीला प्रसंग का हुआ। उसके बाद में मैंने कथामृत को स्टडी करना शुरू किया और कथामृत का ओरिजिनल आपको पता होगा कि मास्टर महाशय ने पांच वॉल्यूम में पब्लिश किया था और उसके बाद में उसका जब वो कॉपीराइट चला गया आई थिंक समवेयर अराउंड 1950 1960 तब उद्बोधन ने हमारी ओर से कथामृत का पहला एडिशन पब्लिश किया और फिर बाद में सब एडिशन एक के बाद एक पब्लिश हो रहे हैं। आज जो कथामृत पढ़ते हैं राम उद्बोधन का पब्लिश कथामृत मैं पढ़ता हूं बंगाली में किंतु साथ-साथ में ही जो क्योंकि ये सब चल रहा था मेरे माइंड में कि ओरिजिनल के साथ में कंपेयर किया जाए मैंने सोचा कि वो जो मास्टर महाशय का जो पांच वॉल्यूम वाला कथामृत है उसको लिया जाए और उसके साथ में करंट कथामृत का लाइन बाय लाइन कंपैरिजन किया जाए। अगेन आई वास सरप्राइज कि शब्दों को चेंज किया गया है। शब्दों को जैसे कि थोड़ा सा मॉडर्नाइज किया गया है। कहीं-कहीं पे कुछ-कुछ ऑलमोस्ट एव्री पेज मुझे कुछ ना कुछ चेंजेस मिले। व्हिच इज वेरी सरप्राइजिंग। हमको लगता है कि अरे मास्टर महाशय खुद इतने विद्वान थे। प्लस उनका शब्दों का जो चयन होगा भले ही चाहे थोड़ा सा पुराना क्यों ना हो। इट इज मोर ऑथेंटिक टुवर्ड्स श्री रामकृष्ण। ठाकुर के समय के जो शब्द थे, ठाकुर के समय के जो एक्सप्रेशन थे, उसी के मच मोर नियरर होगा। व्हिच इज गुड फॉर अस टू रीड। आप शब्दों को क्यों चेंज करेंगे? मॉडर्नाइज क्यों करेंगे लैंग्वेज को? व्हाट इज द नीड फॉर दैट? आपको ऐसा लगता है कि आज की बेंगली और उस समय की बेंगली में डिफरेंस है। आज के बेंगली रीडर उस समय की बेंगली नहीं समझेंगे तो आप फुट दे देते। जैसे आज का जो करंट इंग्लिश जो पढ़ते हैं उन लोगों को विक्टोरियन इंग्लिश है। ये चार्ल्स डिकंस वगैरह की कहानियां पढ़ने में तकलीफ होगी। अंडरस्टैंडेबल है। शेक्सपियर्स को पढ़ेंगे। सेम इंग्लिश लैंग्वेज है। किंतु आज का इंग्लिश कितना चेंज हो गया है। यू डोंट आप ऐसा सपने में भी सोच सकते हैं कि शेक्सपियर का इंग्लिश आप मॉडर्नाइज कर दें। आप मुझे उसका एकेडमिक स्टडी कीजिए। 1000 फुटनोट यूज़ कीजिए। हजार आर्टिकल लिखिए। उसके ऊपर में कि शेक्सपियर के इंग्लिश में यह था और आज के इंग्लिश में यह है। वो आप वाला डिफरेंस और कंपैरिजन कंट्रास्ट कीजिए। विल यू एवर डेयर टू चेंज शेक्सपियर्स इंग्लिश? वह उन्हें वह एकेडेमिक जो इंटीग्रिटी होनी चाहिए व्हिच इज़ सो क्लियर इन वेस्टर्न कंट्रीज़। और आपने यहां पे है कि देखा कि वो हम लोग सीधा-सीधी मास्टर महाशय के शब्दों को मॉडर्नाइज कर दे रहे हैं। पता नहीं किसका यह बुद्धि था। बट आई हैव सीन दैट। सो अगेन ऑल दिस क्वेश्चंस विल कम। अभी ये तो सब इनोसेंट चीजें हैं। तो थोड़ा सा मॉडर्नाइज करने से मैं आज के बंगाली को समझता हूं। तो आज का मॉडर्न लीला प्रसंग कथामृत पढ़ने में मुझे कोई दिक्कत नहीं हो रही है। व्हिच इज़ गुड फॉर मी इन वन वे। बट अगेन दैट एकेडमिक इंटीग्रिटी नाउ कम्स इन क्वेश्चन कि आपने क्या-क्या चेंज किया है। मैं तो अपनी लिमिटेड बुद्धि से लाइन बाय लाइन चेक करता गया। मुझे डिफरेंस दिखने लगे। नाउ इफ यू डू इट सिस्टेटिकली मच मोर सीरियस वे। तो व्हाट वी विल फाइंड वी डू नॉट नो। सो कि हमेशा एक एकेडेमिक इंटीग्रिटी जब आप बायोग्राफी लिखते हैं, रिलीजियस लिटरेचर लिखते हैं, वह होना चाहिए। अदरवाइज़ फ्यूचर विल आस्क यू क्वेश्चन। तो, यहां पे जो क्वेश्चन हम रेज़ करते थे कि यह प्रसंग सही है कि गलत है। वी डू नॉट नो नेचुरली बीइंग ए मक ऑफ रामकृष्ण मिशन, हम लोग सपने में भी नहीं सोच सकते कि शरद महाराज आउटराइट झूठ बोलेंगे। किंतु यह प्रश्न भी तो हो सकता है कि शरद महाराज को भ्रमित किया गया हो। शरद महाराज ने जिस सोर्स के पास में से अभी वहां पे तो सभी लोग प्रेजेंट है। अगेन और यह तो सेकेंडरी सोर्स नहीं है। ठाकुर की साधनाओं का वर्णन सेकेंडरी है। बहुत कुछ शरद महाराज ने हृदय के पास में से सुना था। वहां के जो लोकल लोग थे उससे सुना था। कामारपुकुर की घटनाओं का वर्णन कामारपुकुर के जो गांववासी थे उनसे सुना था। व्हिच इज़ अ सेकेंडरी सोर्स। किंतु जो काशीपुर की घटना हुई इज़ अ फर्स्ट हैंड सबका ऑब्जरवेशन था। फर्स्ट हैंड सबका एक्सपीरियंस था। तो यहां पे उनको भ्रमित करके कोई लिखवा दे। ऐसा तो मुझे नहीं लगता कि यह आर्गुमेंट टिक सकता है। सो अगेन बीइंग ए मक ऑफ़ रामकृष्ण मिशन हम तो कहेंगे कि शरद महाराज झूठ बोल ही नहीं सकते इन स्पेसिफिकली इन सच अ सीरियस मैटर इज़ दिस। बट अगेन वी हैव टू कंसीडर दैट फ्यूचर हाउ वी डू नॉट नो हाउ द फ्यूचर विल ट्रीट टू दिस इंसिडेंट। तो यह तो अपना एक प्राइमरी एनालिसिस है। कल हम थोड़ा सा इस एनालिसिस को डिटेल में देखेंगे अपना नेक्स्ट क्लास में। आज यही तक। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु ना ये जो आपका आईडिया है ना
प्रश्न: अभेदानन्दजी के साथ अन्याय हुआ. बेचारे अपनी गलती से तो रास्ता भटक नहीं गए थे. ठाकुर ने उनको हुए अन्याय को undo क्यों नहीं किया?
ठाकुर ने अनडू क्यों नहीं किया ये बड़ा यूनिक आईडिया है ये मैंने भी कभी नहीं सोचा था और अगेन ये सब प्रश्नों का कोई उत्तर तो होता नहीं है किंतु यदि हम स्पेकुलेट करना चाहे तो मेरा स्पेककुलेशन यह रहेगा कि ऑलरेडी ठाकुर को पता था कि नरेंद्र को जगत हितायच के लिए कार्य करना है और अपनी सभी शक्ति उनको नरेंद्र को देनी थी। वह जो फेमस घटना कि ठाकुर ने स्पर्श करके यही म यही घटना किंतु इन अ डिफरेंट कॉन्टेक्स्ट कि जैसे वो नरेंद्र ने शक्ति संचार किया। ठाकुर ने नरेंद्र को स्पर्श करके उनमें शक्ति संचार किया। तो उसके लिए ठाकुर को अभी जो अपनी सभी शक्ति थी वो बचा करके रखनी थी। ही कैन नॉट म एफर्ट टू वेस्ट इट नाउ कि काली महाराज के ऊपर में जो इतना सब कुछ जुल्म सितम हो गया बेचारे के ऊपर में अभी अनडू करने में जो शक्ति जाती तो फिर वो पूरा भरत का जो उत्थान करना था स्वामी जी को हो सकता है उसमें फिर कुछ कमी हो जाती सो ठाकुर कैन नॉट डेयर और वी विल नॉट अफोर्ड और व्हाटएवर ये अपना स्पेकुलेशन है वो जो नरेंद्र के बारे में पता है ना कि स्वामी जी के सर के ऊपर में ऐसा घाव का निशान है यदि आपने फोटो देखा होगा उस तरह के पुराने तो ठाकुर कहते हैं वो पता की घटना ऐसी है कि छोटे थे गिर गए थे बहुत सारा खून निकल गया था तो ठाकुर क्या कहते हैं कि अच्छा हुआ यह खून निकल गया यदि वह पूरी शक्ति लेकर के यदि वो प्रचार चालू करता तो जगत को तोड़पाड़ कर देता माने शक्ति इस तरह से व्यय होती है सो ठाकुर माइट नॉट हैव विश इट टू बी वेस्टेड लाइक दिस देखिए दोनों के बीच में ट्रस्ट तो
प्रश्न: स्वामीजी और काली महाराज का क्या रिलेशन था?
बहुत था और काली महाराज ने जिस तरह से दो बहुत सारी घटनाएं हैं वैसे कुछ-कुछ घटनाएं हैं कि हमको पता है ऑलरेडी हमने डिस्कस की थी एक दो घटनाएं कि काली महाराज ने एक बार सोचा कि स्वामी जी को कॉर्नर करते हैं आर्गुमेंट में। कभी हो नहीं रहे थे। एक बार कॉर्नर हो गए तो अवेानंद जी बड़े खुश हो गए कि आज तो नरेंद्र को हरा दिया। किंतु स्वामी जी कहते हैं अच्छा ठीक है आज यहीं तक कल फिर से स्टार्ट करते हैं। फिर से दूसरे दिन इस तरह से स्वामी जी ने ऐसी अद्भुत अद्भुत आर्गुमेंट न भूतो न भविष्यति ना कहीं सुना है ना कहीं देखा है। तो ऐसी आर्गुमेंट करना शुरू किया। काली महाराज खुद लिखते हैं। माने यह प्रसंग काली महाराज का कथित है। कहता है कि नरेंद्र की जो मेधा शक्ति है उसमें कोई प्रश्न ही नहीं है कि ठाकुर की शक्ति उनमें आई है। तो यह काली महाराज का नरेंद्र के प्रति प्रचंड एक अनुग था। या तो फिर उनके प्रति एक श्रद्धा थी। स्वामी जी चाहते थे कि गुरु भाइयों में से कोई लंदन आए। जब उस समय स्वामी जी लंदन में थे। पहले शशि महाराज को बोला तो शशि महाराज को कोई स्किन डिसीज था। तो स्वामी जी बोलते हैं ऐसा यहां गोरे लोग यदि इसको स्किन डिसीज देखेंगे तो बिल्कुल उसको अछूत कर देंगे। तो फिर वो कैंसिल हुआ। फिर शरद महाराज का चल रहा था। तो शरद महाराज का बार-बार डिले हो रहा है। किंतु फिर काली महाराज का ऐसा हुआ कि हां चलो काली महाराज को जैसे ही बोले सब कुछ एफिशिएंटली उन्होंने करके वो लंदन आ गए। तो दैट इज टू हिज क्रेडिट कि स्वामी जी चाहते थे वो कार्य कर देते थे। और ऐसा ही म हुआ ऐसा कि काली महाराज जब लंदन आए ऐसा कुछ मिसकम्युनिकेशन हो गया कि वो ईटी स्टडी जो उनको जो जहाज रिसीव करने के लिए जाने वाला था डॉग के ऊपर में तो जा नहीं पाया तो वो अपने से एड्रेस खोज करके उसके घर पे आ गया। सो दैट इज टू हिज क्रेडिट कि ऐसा नहीं बैठकर के कंप्लेन करते हैं, बहानाबाजी करते हैं। जैसे कि शरद महाराज के केसेस में चल रहा था, शशि महाराज के केस में चल रहा था। या तो फिर इवन हरि महाराज को तो देखिए स्पष्ट मना कर दे रहे हैं कि मैं नहीं जाना चाहता। बट हियर वास काली महाराज कि एकदम इमीडिएटली दौड़ के चले आए। उससे पहले भी यदि घटना देखे कि स्वामी जी अमेरिका में थे कंट्रोवर्सी चल रही थी। स्वामी जी कहते हैं कि वहां पे मीटिंग करके रेजोल्यूशन पास करके भेजो कि विवेकानंद इज़ एन एक्रेडिएटेड रिप्रेजेंटेटिव ऑफ हिंदूइज़्म। तो वो सब में काली महाराज की अग्रिम भूमिका थी। सो दैट इज़ कि स्वामी जी की इच्छा के अनुसार कार्य करना वगैरह-वगैरह वह बड़े अच्छे से करते थे। सो इसमें कोई प्रश्न ही नहीं है। किंतु वह भी एक बात था कि खास करके स्वामी जी का सेकंड विजिट था अमेरिका में। उस समय जो काली महाराज वहां पे थे और स्वामी जी के डिसाइपल्स के साथ में उनका झगड़ा होना शुरू हुआ था। तो ये फ्रांसिस मिस्टर लेगेट मिसेस लेगेट जोसेफाइन फिर ये मिसेज ओलीबुल जोसेफाइन मैकलाउड यह सब वो न्यूयॉर्क वेदांत सोसाइटी से सेपरेट हो गए। और उस समय स्वामी जी कैलिफोर्निया में थे तो सभी लोग स्वामी जी को लेटर लिख रहे कि देखिए आपके गुरु भाई ऐसा कर रहे हैं। तो स्वामी जी ने कहा कि देखो मुझे किसी को कुछ कहना अभी मेरी इच्छा नहीं है। वैसे ही मेरे मन में वैराग्य प्रकट हो रहा है। दूसरा कि मैं गुरु भाइयों को इस तरह से माइक्रो मैनेज नहीं करना चाहता कि मेरे डिसाइपल के साथ में तुम क्यों इस तरह से मिस बिहेव करते हो। व्हाटएवर वी डू नॉट नो कि वो एग्जैक्ट कंट्रोवर्सी क्या थी तो जो भी है। किंतु स्वामी जी कहते हैं मैं माइक्रो मैनेज नहीं करना चाहता। उसको उपदेश लेना नहीं चाहता। उसको न्यूयॉर्क दिया है वो मैनेज करें। इसके बाद में जब स्वामी जी न्यूयॉर्क आए तो काली महाराज स्वामी जी को बार-बार कहते हैं कि देखो तुम थे तो तुम्हारे साथ में इतने सारे लोग थे। अभी ये लोग मेरे से दूर हो जा रहा है। तो दिस इज योर न्यूयॉर्क। यू टेक इट बैक। तुम्हारा न्यूयॉर्क है। तुम वापस ले लो। तो एक दो बार बोला तो स्वामी जी कुछ रिप्लाई नहीं दिए। किंतु चार पांच बार जब काली महाराज ने ऐसा कहा तो स्वामी जी थोड़े से नाराज हो गए और कहा कि देखो न्यूयॉर्क तो मैंने तुमको दे दिया है मेरे लिए पूरा जगत पड़ा है तो जो उनका जो पूरा ट्रेजेक्टरी था स्वामी जी और काली महाराज का माने स्वामी जी जब गुजरात में भ्रमण कर रहे थे तो स्वामी जी का पीछा करने वाले कौन थे अखंडानंद जी थे काली महाराज थे अभी हमको पता है कि अखंडानंद जी स्वामी जी के कितने अनुग्य थे अनुग्य थे तो इतने ही मतलब अखंडानंद जी के साथ में कंपटीशन करने वाले थे यह काली महाराज कि नरेंद्र का पीछा करके उसको कहां-कहां से पकड़ करके उसके साथ में बात करना। सो उनका जो पूरा ट्रेजेक्टरी है तो उनके प्रति जो एक बार स्वामी जी का जो इंपेशंस या नाराजगी जैसा कुछ दिखा हो तो वो न्यूयॉर्क की घटना को लेकर के बाद में आगे या पहले बाद में कुछ नहीं है। सो दैट वे उन दोनों का रिलेशन तो कोई अबव बोर्ड था। अनक्वेश्चन था। बात बाद बात में ये मैंने कहा ना कि उनके मन में ये घुस गया था एक बार कि ये मैं स्वामी जी के बाद में मैं ही एक हूं तो मुझे प्रेसिडेंट बनाना चाहिए तो मुझे क्यों नहीं बनाया ये मेरा खुद का क्योंकि ये पूरा लिटरेचर पढ़ेंगे ना कहीं पे कोई कंट्रोवर्सी नहीं दिखती है अभी दो क्वेश्चन है कंट्रोवर्सी रियली नहीं थी या तो फिर कंट्रोवर्सी थी और उसको छुपा दिया गया है वी कैन नॉट से एनीथिंग राइट नाउ और हां एक कंट्रोवर्सी जो खड़ी हुई थी बट दिस इज नॉट बिकॉज़ ऑफ स्वामी जी काली महाराज जब वह प्रवरज्या कर रहे थे नॉर्थ इंडिया में कहीं पे थे तो वह अपने साथ में एक लड़के को लेकर के वरागर मठ आए। अभी जैसे देखिए कि स्वामी जी भी तो गुप्त महाराज को लेकर वरागर मठ आए थे। तो गुप्त महाराज को वहां पे रहने के लिए स्ट्रगल करना पड़ा था। क्योंकि कल्चर ट्रेडिशन ठाकुर का जो पूरा हिस्ट्री वो बिल्कुल डिफरेंट था और डायरेक्ट डिसाइपल के साथ में रहना वो तो कोई मजाक नहीं है। तो गुप्त महाराज को स्ट्रगल करना पड़ा था। तो वैसे ही काली महाराज एक लड़के को लेकर के आए। वरा नगर में रहा वह लड़का कुछ दिन। किंतु काली महाराज इधर-उधर गए। उसमें गुरु भाइयों ने उसको भगा दिया। या तो उसको भगा दिया या तो अपने से चला गया। वी डू नॉट नो। किंतु जब काली महाराज वापस आए पता चला कि वो लड़का चला गया है और इन लोगों ने केयर नहीं की। उस समय से उनके मन में कुछ ऐसा लग गया कि मैं उसको लेकर के आया था और इन्होंने उसको भगा दिया। सो दैट इज नॉट बिकॉज़ ऑफ स्वामी जी बट दिस गुरु भाई। और उस समय भी ये जो महापुरुष महाराज थे शायद मुझे ऐसा लग रहा है रीडिंग बिटवीन द लाइन कि वहीं से वो महापुरुष महाराज के प्रति थोड़ा सा इनके माइंड में हुआ होगा। तो दैट कंटिन्यूड कि फिर महापुरुष महाराज को जब प्रेसिडेंट बना दिया तो दैट वास रियली अ शोकर फॉर हिम। नहीं यहां पर एक ही बात कहूंगा कि यह सब चीजों का ना डॉक्यूमेंटेड एविडेंस नहीं है। दिस इज और स्पेककुलेशन एंड हियर से मैंने कहा ना कि मैंने निवेदिता और अभेदानंद जी इन दोनों का ऐसा कोई डिटेल स्टडी नहीं किया किंतु फॉर्चूनेटली और अनफॉर्चूनेटली उनका 1150 एनिवर्सरी चल रहा था अभेदानंद जी का। उस समय मैं बेलूर मठ में था। ये कंप्लीट वर्स एडिट कर रहा था। तो मुझे एक्स्ट्रा असाइनमेंट दिया गया कि बेलूर मठ ने रामकृष्ण वेदांत मठ से राइट ले लिया है। एक अभेदानंद रीडर हमको पब्लिश करना है। तो उसको कंपाइल मुझे करना है। एडिट मुझे करना है। अभी मैंने कहा कि ना ही मैंने उनको कभी डिटेल में पढ़ा है। ना ही उनके बारे में ऐसा कोई जानकारी है। कंप्लीट वर्क्स एडिट करना इट इज माय ओनर एंड प्लेजर। अभिदानंद जी को कंप्लीट वर्क्स में से एडिट करके कंपाइल करके रीडर पब्लिश करना आई डोंट नॉट नो। किंतु अभी वह बोला है तो करना पड़ेगा। सो दैट वास द फर्स्ट टाइम कि उनके आईडियाज में थोड़ा डिटेल में गया था। एक एक म हम लोग क्या है कि इतना सोफिस्टिकेशन के ये है ना हैबचुएटेड है अपना लिटरेचर का ग्रामर सेंट्रल स्ट्रक्चर आइडियाज नो इट्स अ इंटरनेशनल स्टैंडर्ड उसमें कोई प्रश्न ही नहीं है। तो हम लोग कम और हम तो कंप्लीट वर्क्स एडिट कर रहे थे। अपना जो स्टैंडर्ड था कंप्लीट वर्स एडिटिंग का से हाईएस्ट इन आवर ऑर्डर म उस स्टैंडर्ड को लेकर के जब आप अभेदानंद जी के कंप्लीट वर्क्स में आप यदि दृष्टिपात करेंगे ना यू विल बी डीपली डिसपॉइंटंटेड कि एडिटिंग का स्टैंडर्ड बड़ा ही लवजी है सेंटेंस स्ट्रक्चर बड़े ही माने ये है अभी यू कैन नॉट से कि अभेदानंद जी का यह है कि ही वाज़ ग्रेट स्कॉलर तो फिर बाद बात बाद बात बाद का जो एडिटिंग पब्लिशिंग प्रोसेस है इट्स अ वेरी सब पार्ट और उसमें से जब मैंने कंप्लीट वर्क में से वो कंपाइल करना शुरू किया। मुझे बड़ा हैवी एडिट करना पड़ा था। और सब समय मुझे वही प्रश्न अभी अभी सेम क्वेश्चन मुझे सताया जा रहा है। एकेडमिक इंटीग्रिटी मेंटेन करनी है। यू कैन नॉट चेंज ओरिजिनल। यू शुड गिव फुटनोट। यदि आपका कोई भी क्वेश्चन है। किंतु यदि मैं फुटनोट देने को जाता तो यदि 100 पेज का अभिदानंद रीडर है तो 100 पेज का फुटनोट हो जाता। एक्चुअली काली महाराज का मैं ऐसा
प्रश्न: स्वामीजी और काली महाराज के कम्पलीट वर्क्स में क्या डिफरेंस है?
नहीं कहूंगा कि इससे मोर अद्वैत ओरिएंटेड। इट्स मोर निराकार ओरिएंटेड। इन दैट सेंस के स्वामी जी को यदि आप पढ़ेंगे तो आपको सब कुछ मिलेगा। भक्ति भी मिलेगी कर्म है स्वामी जी का जो कर्म से जग जाहिर है राजयोग भी है ज्ञान योग भी है जबकि अवेदानंद जी को पढ़ेंगे तो आपको वो माने सबसे पहले तो यह सब एब्सेंस नजर आना शुरू हो जाएगा कि डिवोशन को लेकर के इतना कुछ नहीं है। कर्म को लेकर के तो बिल्कुल माने मोर और लेस वो जीरो ही है। अगेन अभी यह तो मेरा सब कर्सरी रीडिंग है। मुझे रीडर कंपाइल करना था तो मैंने पहले तो रीडर के लिए जितना मटेरियल चाहिए था खोज निकाला। देन आई वेंट डिपर इंटू दैट। सो माय स्टडी इज़ नॉट कॉम्प्रिहेंसिव स्टडी। किंतु स्वामी जी से बहुत डिफरेंट नहीं है आइडियाज़। जो हमको नजर में आता है ना वह एब्सेंस नजर में आती है रेदर देन एनी डिफरेंस कि स्वामी जी का जो वास्टनेस है वी आर सो हैबचुएटेड टू कि यहां से यहां यहां से यहां कहां से वो कॉस्मोलॉजी से वो जेनेटिक्स और ह्यूमन इवोल्यूशन ह्यूमन हिस्ट्री ह्यूमन सोसाइटी फिलॉसोफी ईस्टर्न वेस्टर्न कहां से कहां वो जंप लगाते हैं जो वास्टनेस ऑफ हिज ब्रेन एंड वास्टनेस एंड डायवर्सिटी ऑफ़ हिज आइडियाज दैट यू विल फाइंड वास्टली मतलब एकदम आपको रिस्ट्रिक्टेड दिखते हैं। सो दैट इज़ वन थिंग दैट आई हैव फाउंड। फिर कोई पर्टिकुलर टॉपिक को लेकर के स्वामी जी और अभेदानंद जी में डिफरेंस है दैट आई हैव नेवर स्टडीड। जी सबसेट सबसेट माने वास्टली रिड्यूस सबसेट। वास्टली रिड्यूस सबसेट। माने देखिए मुझे ऐसा कहना नहीं चाहिए। बट स्टिल आई विल से दिस कि स्वामी जी को पढ़ने के बाद में ना अभदानंद जी आपको बड़े बोरिंग लगेंगे। म ऐसा कुछ नहीं है कि जहां मैं आपको ऐसा कुछ नया जानने को, सीखने को या माइंड डेवलप हो ऐसा कुछ मिले आपको। आई शुडंट से दिस बट आई एम सेइंग दिस। निवेदिता का फिर भी है। निवेदिता का जो स्पार्क्स है ना स्पार्क्स वो आ जाता है। मतलब इवन मां काली के बारे में बोलती है। इंडियन ट्रेडिशन के बारे में बोलती है। वो स्पार्क्स आ जाते हैं। म एकदम यूनिक क्रिएटिव आइडियाज। इस तरह के यूनिक क्रिएटिव आइडियाज का अभेदानंद जी में बहुत अभाव दिखता है
प्रश्न: निवेदिता के आइडियाज स्वामीजी से भी ज्यादा रेडिकल लगते है.
मुझे। और रेदर और रेदर ना जो जो आपने कहा ना उसका मैं एक और एक पॉइंट ऐड करता हूं। आपने कहा निवेदिता साउंड्स मोर रेडिकल इट इट कैन बी आल्सो दैट कि स्वामी जी प्रेजेंट्स रेडिकल आइडियाज टू हर व्हिच ही नेवर प्रेजेंट्स टुवर्ड्स एनीवन एल्स। म दिस इज़ आल्सो पॉसिबल। क्योंकि स्वामी जी देखिए स्वामी जी वाज़ लाइक ए थाउजेंड फसेटेड डायमंड। शरद चंद्र उनको एक दृष्टि से देखता है। राजा महाराज एक दृष्टि से देखते हैं। शशुद्धानंद जी एक दृष्टि से देखते हैं। वीजानंद जी एक दृष्टि से निवदिता एक दृष्टि से देखती है। तो स्वामी जी एस सीन बाय निवेदिता इट्स अ यूनिक स्वामी जी ये म स्वामी जी खुद कन्नफेस करते हैं कि निवेदिता के पास में जो आइडियाज वो ये करते हैं ना प्रेजेंट खास करके ये जो कश्मीर पंजाब की यात्रा थी या ग्राउंड ब्रेकिंग जो सेकंड टाइम अमेरिका गए थे जहाज की यात्रा थी अगेन स्पार्कलिंग कन्वर्सेशन निवदिता हमेशा नोटपैड लेकर के तैयार हो करके बैठती थी स्वामी जी जो बोलते थे वो म एकदम नोट डाउन कर देती थी अगेन दैट अ ग्रेट समर इन रिजली मैनर निवेदिता वहां पे थी। सो दीज़ आर सम ऑफ द टाइम्स के स्वामी जी गव 100% टू निवेदिता यू नो एक्सक्लूसिवली। मैं उनको डिस्ट्रक्ट करने के लिए कोई नहीं था। जब फर्स्ट टाइम लंदन में गए निवेदिता से मुलाकात हुई उस समय बहुत सारे लोग थे हु डिमांड स्वामी जीसस अटेंशन। किंतु ये कश्मीर यात्रा यह ओशन व टू सेकंड टाइम टू अमेरिका एंड दिस रिचली मैनर। दीज़ आर सम ऑफ़ द यूनिक टाइम्स कि निवदिता इस सो फ़ॉर्चूनेट टू फाइंड स्वामी जी एक्सक्लूसिवली फॉर हरसेल्फ। सो उसके जो बाद के जो स्टार्टलिंग आईडियाज जो है ना आई थिंक दैट इट माइट हैव बीन इकोस ऑफ स्वामी जी हिमसेल्फ दूसरा दूसरा विवेकानंद इस विवेक ने क्या किया था स्वामी जी ने जो ठाकुर के बारे में कहा था अपने गुरु भाइयों को कि तुम लोगों ने ठाकुर को जो अपनी एक सीमित दायरे में बांध दिया है ना उसमें से निकाल कर के मैं ठाकुर को पूरे जगत में छोड़ दूंगा तो सेम थिंग वी कैन से कि रामकृष्ण ऑर्डर जिस तरह से स्वामी जी को बांधता है लगता है कि निवेदिता उसमें से निकालकर के स्वामी जी को स्प्रेड करने वाली [हंसी]
प्रश्न: स्वामीजी पूरे विश्व के हैं। बहुत से लोग उनसे बहुत से अलग-अलग तरीकों से प्रेरणा लेते हैं।
है ना ऐसा होना ही चाहिए ना तभी तो अदरवाइज क्या होगा कि देखिए रामकृष्ण मिशन इटसेल्फ इज अ वेरी लिमिटेड मूवमेंट और वो कभी भी इस तरह से बिलियन फॉलोअ लेवल पर पहुंचेगी आई डू नॉट नो आई आई आई डोंट थिंक दैट इट शुड इवन रीच बिकॉज़ उसकी एक तो एक होना चाहिए प्योरिटी मेंटेन करनी चाहिए वरना तो फिर जैसे बुद्धिज्म में देखिए हमने अभी देखा कि जोर जबरदस्ती करके कन्वर्जन किया या तो फिर ड्यू डिलीजेंस नहीं पे किया तो फिर वे लोग अपनी अंधश्रद्धाएं लेकर के घुस गए। तो व्हिच अल्टीमेटली रिजल्टेड इन द डाउनफॉल ऑफ़ बुद्धिज्म। सो अपना जिसको एडमिट करते हैं ड्यू डलिजेंस होना चाहिए। प्रॉपर उनका ये वेटिंग होना चाहिए। ठाकुर ने खुद ने इसको कहा केशव सेन को। तुम ही देखे चेला करो ना। बोले भेंगे भेंगे चले जाए। माने वो जिसको तिस को घुसा दिए हो बोल के तुम्हारे दल में से निकल जाते हैं। अपना दूसरा दल बनाते हैं। ऊपर से तुमको गाली देकर जाते हैं। तो ठाकुर के पास में इतने ही चंद चुनिंदा लोग ही आते थे। बट दैट फाउंडेशन वाज़ सो स्ट्रांग। सो सिमिलरली हमको अपना एक प्योरिटी मेंटेन करना चाहिए। एंड वी शुडंट क्लेम कॉपीराइट ऑन स्वामी जी। मेरा जो पहला सबसे पहला मानना है लेट स्वामी जी बी यूनिवर्सल। लेट एनीवन इंटर हम नहीं ही करते हैं। जैसे टू आवर क्रेडिट हम ऐसा क्लेम कभी नहीं करते कि दूसरों का स्वामी जी डिफरेंट है या तो ऑथेंटिक नहीं है। हम लोग ऐसा क्लेम नहीं करते। दैट इज टू आवर क्रेडिट और होना भी नहीं चाहिए भविष्य में। लेट एवरीवन एडप्ट स्वामी जी अकॉर्डिंग टू देयर ओन एबिलिटीज। अभी पता नहीं क्या ना? इफ यू आर अ साइंटिस्ट यू कैन हैव ड्रॉ इंस्पिरेशन फ्रॉम स्वामी जी। इफ यू आर अ म्यूजिशियन यू कैन ड्रॉ इंस्पिरेशन फ्रॉम स्वामी जी। इफ यू आर अ स्पोर्ट्समैन यू कैन ड्रो इंस्पिरेशन फ्रॉम हिम। इफ यू आर एन एस्ट्रोनॉट यू कैन ड्रो इंस्पिरेशन फ्रॉम हिम। स्वामी जी हैज़ मिलियन फैसेट्स। व्हचएवर फील्ड यू आर।