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कल हमने देखा कि किस तरह से ठाकुर जहाज में आकर के वह उपस्थित हुए हैं ब्रह्म भक्त सभी लोग ठाकुर को गिर करके ठाकुर की अमृतम वाणी सुनने के लिए तत्पर होकर के खड़े हैं और जो मास्टर महाशय ने जो एक सुंदर पोएटिक डिस्क्रिप्शन दिया कि किस तरह से कितना सुंदर रूप से एक काली मंदिर का एक नेचुरल एटमॉस्फियर है नील शरत का नील आकाश पे और इस आकाश की पृष्ठभूमि प बैक ड्रॉप जिसको कहते हैं जो लोग डिजाइन वगैरह समझते हैं उन लोगों को पता होता है कि बैकग्राउंड बड़ा सुंदर होने से फोरग्राउंड प आप जो कोई भी चित्र रखेंगे उसकी शोभा और भी बढ़ कर के आएगी तो यह नील आकाश के बैक ड्रॉप के ऊपर में सुंदर सा एक काली मंदिर है काली मंदिर के शिखर दिखाई देता है सामने तो द्वादश शिव मंदिर है दो नबत है उसके बाद में पंचवटी है और उसके बाद में छाऊ तला है तो इतना सुंदर वर्णन और फिर मास्टर महाशय कहते हैं फिर आ रहे हैं वो सनातन महापुरुष साक्षात सनातन धर्म जिस पवित्र सलीला पुण्य सलीला गंगा के किनारे बैठ कर के ऋषि मुनियों ने तपस्या की थी उसी गंगा में सवार होकर के साक्षात सनातन धर्म का फिर से आगमन हो रहा है यह सुंदर वर्णन मास्टर महाशय ने किया और उसके बाद में जब ठाकुर जहाज पर उपस्थित होते हैं तो ठाकुर को केबिन में बिठाया जाता है केबिन में बैठ कर के ठाकुर फिर कहते हैं मां के साथ में वार्तालाप करते हैं और मां के साथ में वार्तालाप करते-करते ठाकुर मां को पूछते हैं कि मां मैं क्या इन लोगों की बंधन के भीतर में से रक्षा कर पाऊ यह बंधन में से रक्षा करने का क्या अर्थ है मास्टर महाशय ने हमको समझाया बंधन अर्थात कि यह सांसारिक का बंधन अभी सांसारिक में सिर्फ कामना वासना ही नहीं होती धर्म भी होता है जैसे कि मातृ धर्म पितृ धर्म राज धर्म विद्यार्थी धर्म नागरिक धर्म ऋषि ये ऋण होता है मातृ ऋण पितृ ऋण इस तरह से इस देव ऋण ऋषि ऋण यहां पर इसका क्या अर्थ है कि आप यदि जगत में आपने जन्म लिया है तो आपके बड़े होने तक इस संसार ने आपको बहुत कुछ दिया है ऋषि मुनियों ने धर्म दिया है माता-पिता ने स्नेह दिया है आपकी जतन आपका जतन किया है राजा ने आपका लालन पालन किया है इस सोसाइटी में उन्होंने लॉ एंड ऑर्डर को बना कर के रखा है यह सब ऋण लेकर के हम बड़े होते हैं और बड़ा होने के बाद में हमको यह ऋण वापस चुकते करना है मां और पिता का जो स्नेह मिला उसके अगेंस्ट में उनकी बुढ़ापे में उनकी बड़ी उम्र में हमको उनकी जत्न रखना है उनका उनकी केयर करनी है उनका जतन करना है तो यह ऋण ये इस ऋण के ऊपर में संसार चल रहा है माने सिर्फ ये नहीं है कि मनुष्य कामिनी और कांचन से बंद करके संसार करता है वह तो एक फैक्टर है ही है साथ में धर्म भी है आपका ड्यूटी है यह कि जिन्होंने आपको बड़े होने में मदद की जो आपको बड़े होने के बाद में भी जो आपका जतन कर रहे हैं उनको आपको यह ऋण चुकाना है तो यह लेन देन ही संसार है तो इस संसार के भीतर में ज्यादातर लोग बने हुए हैं जैसे कि ये निरंजन महाराज थे तो निरंजन महाराज ने नौकरी करना शुरू किया अभी वह तो पूर्वा श्रम की बात है जब वह ठाकुर के पास आते थे उस समय की बात ठाकुर ने कहा कि यदि तुम अपनी मां के लिए नौकरी नहीं करके अपने खुद के वासनाओं की पूर्ति के लिए नौकरी करते तो मैं कहता धक सतो बार धिक तुम्हारे ऊपर में किंतु ठाकुर को पता है कि निरंजन की मां की अवस्था ी है कि उनके जतन के लिए धन चाहिए और धन के लिए नौकरी करनी पड़ेगी तो इसके लिए वो नौकरी कर देते तो देखिए कि अभी चलो बाद में तो निरंजन महाराज इस धर्म को या इस ऋण को काट कर के बाहर निकल कर के संघ में आकर के जॉइन कर पाए किंतु सभी का तो ऐसा नहीं होता अभी कुछ दिनों पहले ही मैंने एक ऐसा ब्रह्मचारी का किस्सा देखा वो आया था जॉइन करने के लिए किंतु उसके भीतर में त्याग और वैराग्य प्रचंड था आकर के ही सभी साधुओ का इतना सम्मान करता था जो भी काम उसको दिया जाए बड़ा ही सुंदर रूप से सब कार्य करता था सब कुछ करता था उसने देखा प आकर के ही कुछ ही दिनों के बाद में हमने देखा कि एकाएक उसके पिताजी का देहांत हो गया एक्सीडेंट में अभी यह तो एक बड़ा ही एक भयावह कांड हो गया क्या करेंगे उसकी मां और उसकी नानी घर में अकेले हैं तो अभी पिताजी का देहांत हुआ है तो उसको तो घर जाना ही पड़ेगा वह जो अंतिम क्रिया है उसको समाप्त करने के लिए किंतु अंतिम क्रिया समाप्त करने के लिए घर गया तब उसने देखा कि मां और नानी मां अकेले हैं और दोनों ही बड़ी उम्र के हो गए हैं और उनकी संभाल रखने वाला अभी कोई नहीं है जब वो साधु बनने के लिए घर छोड़ के आया था तो पिताजी थे तो पिताजी चलो संभाल ले लेते सब चीजों की किंतु पिताजी नहीं है तो मां और नानी मां का क्या होगा तो बेचारा बड़ा ही टेंशन में आ गया और फिर अभी क्या करेगा उसने नौकरी स्वीकार की और अभी नौकरी कर रहा है इन दोनों का लालन पालन करने के लिए वो बीच में उसके साथ में मेरी बात हुई थी तो वह कहता था कि मैं कैसे भी करके कुछ सालों के बाद में फिर से वापस आ जाऊंगा किंतु यह थोड़ा सा मुश्किल लग रहा है कि किस तरह से मां की उम्र तो बढ़ती ही जाएगी वो तो कम नहीं होने वाली है और यहां पे तो जॉइनिंग का ए एक एज लिमिट है कि चलो माता जी का देहांत हो जाए उसके बाद मैं वापस आऊंगा वो तो तब तक तो वो जो अपना ग्रेजुएट है तो 30 साल 28 साल की उम्र तक जॉइन करना है वो एज लिमिट बीत जाएगी और फिर से वो जॉइन नहीं कर पाएगा तो इसलिए यह सब फैक्टर्स है कि यदि आप साधु बनना चाहते हैं या तो फिर आध्यात्मिकता के रास्ते पर जाना चाहते हैं किंतु फिर भी आप संसार में बंधे हुए हैं आप संसार का त्याग नहीं कर पाते तो त्याग नहीं कर पाते इसके लिए फैक्टर्स जो है वो फैक्टर्स सिर्फ और सिर्फ मात्र वो नहीं है जो कि आपको वासनाओं की पूर्ति करने के लिए बांध के रखते हैं किंतु यह ऋण भी है यह धर्म भी है जिसका पालन करने के लिए आपको संसार में रहना पड़ता है तो ठाकुर ने इस तरह से कहा कि मां के साथ में वार्तालाप कर रहे हैं और मां को पूछ रहे हैं क्या मैं संसार के भीतर में रह कर के इनकी रक्षा कर पाऊंगा कि नहीं मने यह लोग संसार के भीतर है तो संसार के भीतर में मैं इनकी रक्षा कर पाऊंगा कि नहीं इसके रिलेटेड एक बड़ा ही सुंदर एक इंसिडेंट है स्वामी जी जब अमे का गए 1893 सिंबर में वर्ल्ड पार्लियामेंट ऑफ रिलीजन में से उन्होंने वेदांत प्रचार करने का प्रारंभ किया और आखिर में 18956 में उन्होंने अमेरिका छोड़ा अमेरिका छोड़ कर के वह लंदन जाने वाले थे लंदन में वह सेकंड टाइम जाने वाले थे पहले तो एक बार जाके आ गए थे अमेरिका से ही लंदन गए थे लंदन से ही अमेरिका लौट आए थे तो उस समय उन्होंने लंदन में यूके में बहुत सारे प्रवचन दिए थे और इस बार सेकंड टाइम जाने वाले थे तो सेकंड टाइम लंदन में जब जाएंगे स्वामी जी तब विदेश का कार्य समाप्त करके भारत में लौटने वाले थे और 96 भारतीय परंपरा और वेदांत के वेदांत और योग इसके प्रचार पर ध्यान दिया था रदर देन की ठाकुर के प्रचार का क्योंकि वहां पे तो जीसस के फॉलोअर्स से वे लोग बोलेंगे कि यदि आप ये कहेंगे कि रामकृष्ण अवतार है तो हमारे जीसस क्राइस्ट भी तो अवतार है हम एक अवतार को छोड़ कर के दूसरे अवतार को क्यों पकड़ेंगे इसका तो कुछ रीजन दिखना चाहिए तो इसलिए स्वामी जी ने कहा सोचा कि ये अवतार अवतार का झगड़ा हो इसकी बजाय बेटर है कि ये जो अपनी धरोहर है यह जो रत्न योग और वेदांत रूपी रत्न जो कि हमारे ऋषि मुनि हमको देख गए बेटर है कि इसका प्रचार किया जाए किंतु जब आखिर में अमेरिका छोड़ने की बात आई तब स्वामी जी जाकर के खुल कर के पहली बार ठाकुर के बारे में बोलने लगे इस आशा से कि चलो वेदांत और योग तो इन्होंने समझा है तो इसके आधार पर ठाकुर के अवतार क्व की क्या विशिष्टता है ठाकुर का क्या वैशिष्ट्य है य धार्मिक जीवन में धार्मिक यात्रा में मनुष्य समाज की यह आध्यात्मिक यह शिखर की ओर जाने वाली यह जो जर्नी है उसमें ठाकुर का क्या प्रभाव है यह अभी विदेशी लोग समझ पाएंगे यह सोच कर के स्वामी जी ने ठाकुर के बारे में बोलना शुरू किया इस सिलसिले में उन्होंने न्यूयॉर्क में माय मास्टर बोलकर के प्रवचन दिया अभी यह प्रवचन जो है आज कंप्लीट वर्ड्स में जिस तरह से हमको दिख रहा रहा है बड़ा ही सुंदर प्रवचन उस तरह का प्रवचन यह हकीकत में नहीं था जो ओरिजिनल प्रवचन था स्वामी जी ने जैसे ही ठाकुर की महात्म के बारे में बोलना शुरू किया ठाकुर का स्पेशलिटी क्या है मने ठाकुर का ठाकुर के जीवन के मूल मंत्र क्या है इसके बारे में जब बोलना शुरू किया उन्होंने देखा कि उनके सामने जो ऑडियंस बैठा हुआ है वो सब तो संसार में डूबे हुए हैं कामिनी कांचन कहो ना कि ये अपना संसार धर्म कहो कि सांसारिक ऋण कहो इसमें इस इतने गहनता से ये लोग डूबे हैं उसकी जंजीर में ऐसे फंसे हुए हैं कि ठाकुर का जो मुख्य उद्देश था इस समय इस युग में अवतरित होकर के हमको सिखाने का वो उद्देश्य त्याग वो त्याग का मर्म यह लोग शायद नहीं समझ पाएंगे ऐसा स्वामी जी को लगा तो स्वामी जी स्टेज पर खड़े हैं स्टेज पर खड़े रह कर के ठाकुर के बारे में बोल रहे हैं अचानक उनके भीतर में से एक ऐसा क्रोध प्रकट हुआ एक ऐसा गुस्सा प्रकट हुआ और स्वामी जी एका एक रुद्र भाव धारण करके जो लोग बैठे थे उनको एका एक डांटना शुरू किया कहना शुरू किया कि तुम लोग जो सांसारिक में डूबे हो तुम लोग जो ये सामाजिक ऋण के भीतर में ही ऋण के चक्र में ही जो घूम रहे हो इससे बाहर जब तक नहीं आओगे तब तक ठाकुर का असली भाव नहीं समझ पाओगे इस अर्थ को विस्तार करके स्वामी जी ने उनको जो डांटा है जो डांटा है कि क्या कहे लोग बड़े स्तब्ध हो गए ऐसे बड़े आश्चर्य चकित हो गए भयभीत भी हो गए क्योंकि जब त हमेशा स्वामी जी को देखा है कि बड़े ही सौम्य भाव से वोह प्रवचन देते हैं योग और वेदांत तो सब्जेक्ट ही ऐसे है कि ईश्वर के प्रति शरणागति या तो फिर मन की एकाग्रता या तो फिर निष्काम भाव से कर्मा या तो फिर हमारे हृदय में जो अपना असली स्वरूप छुपा हुआ है अपना ब्रह्म भाव साक्षी भाव से उसको प्राप्त करना है वो सब तो टॉपिक तो आपको सौम्य हो कर के ही सिखाने है कभी उत्तेजित हो जाएंगे किंतु वो विषय वस्तु लेकर थे किंतु यह पहली बार ऑडियंस ने देखा कि दर्शक श्रोताओं के ऊपर में स्वामी जी ने क्रोध करना शुरू किया कि जब तक तुम लोग संसार की इस जंजीरों से मुक्त नहीं हो पाओगे तुम लोग ठाकुर को तनिक भी समझ नहीं पाओगे ठीक है प्रवचन समाप्त हो गया स्वामी जी जब वापस अपने जहां पर रह रहे थे अपने घर गए तब उनको लगा कि इन लोगों को डाट करके मैंने थोड़ा सा ज्यादती कर दिया है क्योंकि यह लोग तो ठीक है चलो संसार के भीतर में है किंतु फिर भी इतना तो समझे हैं कि संसार के परे कुछ है और परे जो है उसको प्राप्त करना है और वही प्राप्त करना ही जीवन का सर्वोच्च उद्देश्य है यदि ये लोग में इतनी अकल नहीं होती तो मेरी वाणी सुनने के लिए क्यों आते है ठाकुर के बारे में माय मास्टर जो प्रवचन का टॉपिक पहले से ही अनाउंस करके रख दिया है वो सुनने के लिए ये लोग आते ही क्यों तो अभी वो लोग आए हैं तो उन्होंने ये इच्छा जाहिर की है कि वो संसार से इस धीरे-धीरे करके निकलना चाहते हैं और यह संसार त्या की जो जर्नी है वह तो एक के बाद एक कदम भर के ही तो होगी वो एक साथ में त्याग हो जाए वह तो सभी का होने वाला नहीं है जन्म जन्मांतर की यात्रा है आज जो भी सन्यासी है कितने जन्मों से उन्होंने धीरे-धीरे त्याग करके इस स्टेज पर पहुंचे हैं तो यह त्याग की यात्रा तो बहुत लंबी है जन्म जन्मांतर की है इन लोगों को बिना मतलब डांट के तो ठीक नहीं हुआ तब स्वामी जी ने क्या कहा कि माय मास्टर जो प्रवचन है वो जो नोट कर रहा था उसी टाइप का प्रवचन स्वामी जी ने लंडन में भी दिया था तो स्वामी जी ने बाद में कहा कि अमेरिका में माय मास्टर प्रवचन का प्रथम हिस्सा जो है जब जहां पर वो ठाकुर की वैशिष्ट्य ठाकुर की विशिष्टता के बारे में बात करते हैं वो रखो किंतु बाद में जब मैं डांटना शुरू करता हूं वो पार्ट को काट दो और वो काट कर के लंडन वाला जो माय मास्टर प्रवचन है उसके साथ में उसको मिला दो तो ऐसा करके न्यूयॉर्क वाला आधा प्रवचन और लंडन वाला प्रवचन इन दोनों को इकट्ठा करके आखिर में जो एक नया ही प्रवचन तैयार हुआ और उसको आज कंप्लीट वर्क में दिया गया है तो देखिए कि ठाकुर भी यह प्रश्न करते हैं कि यदि आप संसार में बद्ध है तो मेरा भाव ले पाएंगे कि नहीं और स्वामी जी भी यह प्रश्न करते हैं हालांकि ठाकुर और स्वामी जी दोनों को पता है कि यह यात्रा जन्म जन्मांतर की है इसीलिए वे लोग घर-घर जाकर के लोगों को अमृतवाणी सुनाते हैं अपने वेदों की अपने सनातन शास्त्रों की यदि इन दोनों को यह लगता कि संसार में रह कर के हमारा भाव कोई ग्रहण नहीं कर पाएगा तो ठाकुर क्यों केशव सेन के पास में जाकर के जहाज में जाकर के इस तरह से जहाज में जो वो सब पैसेंजर्स है ब्राह्मण समाजी है उन लोगों को उपदेश क्यों सुनाते और दूसरी बात देखिए इसमें विशिष्टता क्या है कि ठाकुर मां को पूछते हैं कि मां तुम मुझे यहां पर क्यों लाई हो इसका अर्थ क्या हुआ ठाकुर अपने से इच्छा करके यहां पर नहीं आए ऐसा सोच कर के कि चलो मैं खुले आसमान में ठंडी हवा बह रही है प्राकृतिक नजारा है उसमें मैं जहाज में सवार होकर के आनंद करने के लिए जाऊंगा ऐसा नहीं मां ने उनको आदेश दिया है इसलिए वो जहाज में आए हैं इसलिए वो मां को पूछ रहे हैं कि मां तुम मुझे यहां पर क्यों लाई हो और यदि स्वामी जी भी इस बात को नहीं समझते तो स्वामी जी अमेरिका जैसे महा भोगवा दी देश में जाकर के महा मटेरियल कंट्री में जाकर के ठाकुर स्वामी ठाकुर मां वेदांत और योग हमारे ऋषियों की सनातन वाणी इसका उपदेश देते ही क्यों स्वामी जी को पता था कि इनमें से कोई कोई तो होगा कि इसी जन्म में ग्रहण करेगा और फिर जो बीज वो बोके जाएंगे अपने सनातन धर्म के वो आज नहीं ना कल कल नहीं ना परसों इस भूमि में वो प्रतिफल होने ही वाले हैं उसमें से पौधा होगा ही होगा पौधा बड़ा होंगे वृक्ष होगा और उसमें फल भी आएंगे यह भरोसा यदि स्वामी जी को ना होता तो स्वामी जी भी तो अपने से इच्छा करके अमेरिका नहीं गए हालांकि जब स्वामी जी को जब वो गुजरात वगैरह में थे वेस्ट इंडिया में उनको बताया गया कि इस तरह से अमेरिका में वर्ल्ड पार्लिमेंट ऑफ रिलीजन है और आप जाकर के वहां पर प्रवचन दीजिए तो स्वामी जी ऐसे इमीडिएट जाने को उत्सुक नहीं हो गए थे तैयार नहीं हो गए थे वो कन्याकुमारी में वहां पर जब वह रोक पे ध्यान कर रहे थे जिसको कि आज विवेकानंद रोक कहा जाता है उस रोक उस चट्टान पर बैठ कर के जब ध्यान कर रहे थे तब उनको दर्शन हुआ कि ठाकुर उनको पश्चिम की ओर इशारा करके कह रहे हैं कि नरेण तुमको वहां पर जाना होगा तब कहीं जाकर के नर अर्थात स्वामी विवेकानंद पश्चिम में गए थे तो दो चीज है सर्वप्रथम ठाकुर और स्वामी जी दोनों को पता है कि संसार में रह करर के यह वासना और ऋण इन दोनों की जंजीर से जब तक हम बद्ध है तब तक हम आध्यात्मिक के रास्ते पर आगे नहीं बढ़ पाएंगे बहुत ज्यादा एक हद तक जा पाएंगे किंतु साथ-साथ में इन दोनों को यह भी पता है कि यह जंजीर तोड़ने का सर्वप्रथम कदम जो यह लोग ले इसी के लिए इनका आगमन हुआ है कि उनके जीवन और उनकी वाणी की प्रेरणा से हम सभी लोग जो कि संसार में बते है एक के बाद एक कदम लेकर के एक के बाद एक स्टेप लेकर के इस जंजीर से मुक्त हो और ये जन्म जन्मांतर की यात्रा चलेगी किंतु पूरी यात्रा के दौरान जैसे ठाकुर कहता है कि बच्चा यदि अपने पिताजी का हाथ पकड़ के चले तो हो सकता है कि उसका हाथ छूट जाए और वो गिर जाए किंतु पिताजी यदि बच्चे का हाथ पकड़ के चले तो बच्चा बच्चे के गिरने की संभावना नहीं तो वैसे ही एक बार हमने ठाकुर रूपी तारक ब्रह्म मंत्र ले लिया तो ये मंत्र सिर्फ एक जन्म के लिए नहीं है जन्म जन्मांतर की यात्रा के लिए है जब तक ब्रह्म भाव में स्थित नहीं हो जाते जब तक ईश्वर दर्शन नहीं होता जब तक नारायण लोक में हम नहीं पहुंच जाते तब तक ठाकुर हमारा हाथ थाम कर के रहेंगे ये मंत्र सिर्फ एक जन्म का नहीं जन्म जन्मांतर का यह मंत्र है तो इसीलिए ठाकुर ये अभी ठाकुर ये सब कॉन्शियसली नहीं सोचते यह तो अपनी एक बैड हैबिट है एनालिसिस करने की चिंतन करने की इस बैड हैबिट से हम लोग यह सब सोचते हैं कि ठाकुर जो यहां पर आए जहाज में सवार हुए इसके पीछे का क्या तात्पर्य है स्वामी जी ने जो माय मास्टर प्रवचन दिया तो पहले तो डांटा सबको बड़े अच्छे से डांटा फिर अपने को खुद को पश्चाताप हुआ और फिर जो प्रवचन जब पब्लिश हुआ उसमें से डांटने वाला पार्ट पार्ट काट दिया तो इसके पीछे का क्या तात्पर्य यह तात्पर्य एनालिसिस करने का बैड हैबिट हमको यह लोग यह सब सोच कर के नहीं करते थे इंस्टिंक्टिवली हो जाता था मां उनके पास में से यह सब करवाती थी तो अच्छा अभी थोड़ा सा आगे पढ़ते हैं मास्टर महाशय क्या लिखते हैं मास्टर महाशय लिखते हैं ठाकुरे क्रम बच ज्ञान ईते ठाकुर को धीरे-धीरे बाह्य ज्ञान हो रहा है गाजीपुर मील माधव बाबू और एक जन ब्रम भक्तो पहारी बाब कथा पाले गाजीपुर से नील माधव बाबू और एक ब्रह्म भक्त वहां पर उपस्थित थे उन्होंने बहारी बाबा की बात उठाई एक ब्रह्म भक्त ठाकुर प्र एक ब्रह्म भक्त ठाकुर को कह रहा है महाशय राश पहारी बाबा के देखे छ महाशय यह लोग सब पहारी बाबा को देखने के लिए उनके दर्शन करने के लिए गए थे तीनी गाजीपुर थाके वो गाजीपुर में रहते हैं आप नार मतो आर एक जन आपके जैसे और एक सिद्ध पुरुष अभी ठाकुर की कंपेरिजन तो वैसे किसी के साथ नहीं हो सकती किंतु इन जनरल हम कह सकते हैं कि ठाकुर जैसे आध्यात्मिक जगत को लेकर के रहते थे या तो फिर आध्यात्मिक जगत में रहते थे वैसे ही बहारी बाबा भी आध्यात्मिक जगत में रहते थे और उनको पता है बड़ा ही फेमस घटना कि स्वामी जी को भी मतलब पहारी बाबा से स्वामी जी भी इंप्रेस हो गए थे यहां तक उनकी आध्यात्मिक शक्ति थी और स्वामी जी ने सोचा कि यह जो शरीर है उस शरीर के द्वारा तो बहुत सारे कार्य होने वाले हैं तो क्यों नहीं ठाकुर के पास में रहकर के मैंने निर्विकल्प समाधि आध्यात्मिक राज्य में शक्ति प्राप्त की तो पहारी बाबा के साथ में रह कर के मैं हठयोग सीख लेता हूं यह कब की घटना है ठाकुर की महासमाधि 18864 वहां पर ये जो प्रमादा दस मित्र है उनके साथ में उनका वार्तालाप हुआ था फिर ये पहारी बाबा है उनके साथ में उनका वार्तालाप हुआ था तो ये उस पहले दो भ्रमण की घटनाएं तो उसमें से एक भ्रमण में एगजैक्टली कौन सा पहला कि दूसरा मुझे याद नहीं मोस्ट प्रोबेबली दूसरा ही होगा स्वामी जी बहारी बाबा के पास में रहकर के योगशास्त्र हठ योग हठ योग अर्थात की आसन और प्राणायाम जिससे कि शरीर स्वस्त रहे यह योग वो हठ योग की साधना करना चाहते थे किंतु साधना करते करते जब स्वामी जी जिस बंगले में रह रहे थे एक शेख जी के बंगले में शायद वो रह रहे थे तो रात को सोने के लिए जब वो वापस आते थे तब देखते थे कि ठाकुर उनके बेड के सामने खड़े हैं और कुछ बोल नहीं रहे किंतु बड़े ही करुण दृष्टि से स्वामी जी की ओर देख रहे हैं तो स्वामी जी सोचे कि ठाकुर ऐसा क्यों कर रहे हैं इस तरह का दर्शन क्यों दे रहे है जितनी भी बार में सोने को जाता हूं उपस्थित तो होते हैं बोलते कुछ नहीं किंतु करुण दृष्टि से मेरे सामने देखते रहते हैं तो ऐसा एक बार हुआ दो बार हुआ तीन बार हुआ फिर कहीं जाकर के स्वामी जी को लगा कि नहीं ठाकुर की इच्छा नहीं है कि मैं पहारी बाबा से हठी योग की शिक्षा करूं इसके लिए फिर उन्होंने पहारी बाबा को छोड़ द छोड़ कर के फिर वो निकल गए थे वहां से और यह पहारी बाबा नाम क्यों हुआ क्योंकि पहारी बाबा एक गुफा में रहते थे अंडरग्राउंड जमीन के नीचे में और बहुत अल्प आहार करते थे अल्प आहार इतना अल्प आहार करते होंगे शायद खाना ही नहीं खाते होंगे कि लोगों को लगता था वो हवा खा कर के जीते हैं इसलिए उनका नाम पहारी बाबा हुआ था तो यह बहारी बाबा के वहां पर जाकर के कुछ ब्राह्मण भक्त दर्शन करके आए थे तो वो दर्शन करके आकर के ठाकुर को कहते हैं तो ठाकुर एकन कथा पार छ ना ईत हास्य कोले ठाकुर अभी भी बात नहीं कर पा रहे जब उन्होंने कहा कि हम लोग जाकर के देख के आए कि आपके जैसे एक महापुरुष है तो ठाकुर बात कुछ नहीं कर पा रहे बस थोड़ा सा हस करके रुक गए हैं ब्रह्म भक्त आगे कहते हैं महाशय पहारी बाबा निचे घरे अपना फोटोग्राफ ख दिए ब्रह्म भक्त ने आगे कहा कि महाशय पहारी बाबा ने अपने घर में आपका एक फोटोग्राफ रख दिया है तो ठाकुर त आश्य परया मिजर देह द के अंगोली निर्देश कोरिया बोली लेन खोलता जब ऐसा कहा कि पहारी बाबा की गुफा में या तो उनके घर में जहां पर भी यह लोग जा कर के मिले होंगे आपका फोटो है तो ठाकुर ने थोड़ा सा हंस के अपने देह की ओर इशारा करके कहा कि खोलता खोल अर्थात की बाह्य आवरण ये बाह्य आवरण का फोटो रखा है नहीं कि मेरा देखिए कि किस तरह से ठाकुर साक्षी भाव में डिटैच होकर के रह रहे हैं इस शरीर के साथ में ठाकुर का कोई एसोसिएशन नहीं ठाकुर कहते हैं जब हाथ टूट गया था बड़ा ही दर्द हो रहा था उस समय ठाकुर कह रहे थे देख रहा हूं कि इसके भीतर में सिर्फ दो ही है एक है मां और दूसरा है मां का संतान और कुछ अभी इस देह के भीतर में नहीं है तो वैसे ही मां है और मां का संतान है वही अभी ठाकुर की आइडेंटिटी है यह देह धारण किया है जैसे कि आप बड़ी लंबी जर्नी करना चाहते हैं तो आपको गाड़ी में कार में बैठ कर के ना कि ट्रेन में बैठ कर के ना कि एरोप्लेन में बैठ कर के आपको जर्नी करनी पड़ेगी आप सिर्फ पैदल इतना लंबा नहीं चल पाएंगे किंतु यदि आप जिस कार में बैठे हैं वो कार तो कोई आपका आइडेंटिटी नहीं कार तो एक साधन मात्र है जो को आपको एक डेस्टिनेशन से दूसरे डेस्टिनेशन तक ले जाती है एक जगह से दूसरी जगह ले जाने वाला वाहन मात्र है तो वैसे ही ये देह है ये अपनी जो जीवात्मा है इस जीवात्मा को अपने भीतर में जो अंतःकरण है इस अंतःकरण को एक जन्म से दूसरे जन्म की यात्रा करवाने के लिए एक वाहन मात्र है एक बाह्य आवरण मात्र है पंचमहाभूत का बना हुआ इससे ज्यादा इसका कोई अर्थ कोई तात्पर्य कोई प्रयोजन नहीं है यदि इस देह की संभाल रखने के लिए देह के सुख और उपभोग में ही यदि हम मत्त हो जाएंगे तो ऐसा होगा कि हम अपना खाना खाना पीना छोड़ दिया है और जो अब हमने कार नहीं ली है उस कार के मेंटेनेंस में ही कार को धोने में कार को ठीक करने में उसको नया सीट का डालने में उसको नया कलर करने में उसी में हम पूरा दिन बिता दे रहे हैं अपना खुद का आहार नित्रा वगैरा सब छोड़ कर के नौकरी परिवार सब छोड़ कर के कार की ही जतन में हम लग गए यह ऐसा हो गया कि जद मैं देव के ही जतन में लगा हूं और मेरा अपने भीतर में हृदय के भीतर में जो अंगुठा तरम पुरुष जो वेद में कहा गया है कि मेरे हृदय में जो आत्मन विराजमान है उसको मैं भूल गया हूं सिर्फ देह का जतन कर रहा हूं तो वो ऐसा होगा कि परिवार को छोड़ के नौकरी को छोड़ के मेरा खुद का स्वास्थ्य छोड़कर मैं अपनी नई ली हुई नई खरीदी हुई कार के पीछे ही पूरा दिन भर पड़ा रहता हूं व्हि इज वेरी स्ट्रेंज कार का उदाहरण तो हम सबको समझ में आता है किंतु देह का जद हम कहेंगे तो हम सभी लोग कहेंगे कि नहीं यह देह और मुझ में फर्क क्या है ग्रेट डिफरेंस और इसीलिए ठाकुर यहां पर अपने को इस देह से लग करके कहते हैं इस देह का फोटो पहारी बाबा के वहां पर लगा हुआ है नहीं कि मेरा मैं इस फोटो और यह देह और इसके जो सब प्रलोभन है इससे कहीं उधव ब्रह्म भाव में स्थित ऐसा ठाकुर हमको कहे अभी नया एक सेक्शन एक नया टॉपिक स्टार्ट होता है उसका टाइटल ज्ञान योग भक्ति योग और कर्म योग का समन्वय अभी मास्टर महाशय ने ठाकुर ने जो कहा देह और खोलने बालिता खोलता उसका थोड़ा सा अर्थ विस्तार कर र हैं मास्टर महाशय क्या कहते हैं कि बालि और तार खोलता बालिस अर्थात की तकिया और तार खोलता अर्थात की उसके ऊपर का यह जो आवरण जो कि तकिए के ऊपर में हम लगाते हैं जिससे कि तकिया या जो सोने के लिए जो कुषण है जो हम इस्तेमाल करते हैं वह खराब ना हो जाए इसके लिए हम उसके ऊपर में एक कवर लगाते हैं कपड़े का तो यह बाली और दर होल्टा यानी कि सोने के लिए या बैठने के लिए जो ये है तकिया और उसके ऊपर का आवरण देही और देह ये इसके भीतर में देही है देह को धारण किया हुआ देह है ठाकुर की बोली ते छ जे देहो बिन शवर ताकी बेना जो ठाकुर क्या यह कहते हैं कि देह तो नश्वर है आज है कल नहीं है जन्म मृत्यु जरा व्याधि के चक्र में फस कर के एक के बाद एक देह धारण करता है एक के बाद एक शरीर धारण करता है लंबी यात्रा करता है वो है और नहीं है देहर भीतर जीनी देही तीनी अविनाशी देह के भीतर में जो देही है ठाकुर कहते हैं ना कि आमी गाड़ी तुम्ही इंजीनियर आमी घर ही घरनी अर्थात ठाकुर साधन है और साधन को चालित करने वाले ठाकुर यंत्र है और यंत्र को चालित करने वाली महाकाली स्वयं है तो यहां पर भी देह और देही देह है एक वेकल एक साधन एक वाहन और इसके भीतर में सवार है देही तो यह देह व नश्वर है आज एक एक कार आपने खरीदी कल यह कार अच्छी नहीं लगी या पुरानी हो गई आपने दूसरी कार ले ली किंतु आप तो खुद तो यहां प ही है यह तो वैसी बात हो गई कि राधाकांत की मंदिर की मूर्ति लेकर के पुजारी जा रहे हैं एकाएक पुजारी का पैर फिसल गया मूर्ति पड़ गई हाथ से गिर गई और मूर्ति का पैर टूट गया तो अभी सब पंडितों की सभा बुलाई गई ये ठीक करने के लिए कि जिस मूर्ति के पैर टूट गए उसके साथ में अभी क्या किया जाए तो सभी लोगों ने यह मत प्रदर्शित किया कि खंडित ठाकुर की पूजा नहीं होती खंडित मूर्ति की पूजा नहीं होती अच्छा है कि एक नई मूर्ति स्थापित की जाए तो उस समय यह जो ठाकुर के जो बड़े भाई थे ना कि ठाकुर ठाकुर खुद थे उन्होंने क्या मत प्रदर्शित किया क्या उन्होंने सजेशन दिया कि जदी रानी रासमुल बाबू उनका पैर कहीं पर यदि एक्सीडेंट होकर के फ्रैक्चर हो जाए या पैर टूट जाए तो क्या आप नया जमाई ले आएंगे कि वही जमाई को रख कर के ही उसके ट्रीटमेंट वगैरह करेंगे तो जब ठाकुर ने यह परामर्श दिया तब कहीं जाकर के वो रानी रामानी ने कहा कि नहीं खंडित मूर्ति को फिर से साधा जाए और इसी की पूजा की जाए क्योंकि इस मूर्ति की तो प्राण प्रतिष्ठा की गई है यह तो अभी सि पत्थर की मूर्ति नहीं रही इसके भीतर में ठाकुर विराजमान है प्राण प्रति था देखिए कि बहुत सारे रिचुअल हम सिर्फ रिचुअल के रूप में ही देखते हैं उसको कोई उसका वास्तव जीवन में उसका कोई यह है स्थान ऐसा हम कभी नहीं मान कभी-कभी नहीं मानते तो वैसे ही ठाकुर के मंदिर में ठाकुर की प्राण प्रतिष्ठा हुई है किंतु फिर भी हम लोग यही समझते हैं कि अरे ये तो पत्थर की मूर्ति ही है या तो सिर्फ एक फोटोग्राफी है और वही मंदिर के सामने खड़े रह कर के दुनिया भर के लोगों की निंदा करेंगे सांसारिक बातें करेंगे क्या-क्या करेंगे तो यह सब बातें करने का साहस हम में क्या होता यदि ठाकुर स्वयं हम लोग मान लीजिए हमारा ऐसा गुड फॉर्च्यून है कि दक्षिणेश्वर जाने का मौका मिल गया ठाकुर के कमरे के सामने खड़े हैं कमरे के भीतर में ठाकुर विराजमान है स्वयं सदैव विराजमान है और उस कमरे के बाहर में आकर के हम लोग संसार की बातें करेंगे लोगों की निंदा करेंगे यह सब हम साहस करेंगे क्या ठाकुर के सामने ही यह सब करने का वो साहस हम यदि नहीं करेंगे तो मंदिर में जो मूर्ति प्रतिष्ठित है उस मंदिर के भीतर में इस मंदिर के आश्रम में रहकर के हम लोग यह सब निंदा वाद कटू निंदा कटू वाद यह सब करने का साहस कैसे करते हैं करते हैं इसलिए क्योंकि हम मानते हैं कि अरे वो तो पत्थर की मूर्ति ही है जिसके सामने वो हम दो बार तीन बार भोग धरते हैं फिर यह भोग हम लोग खा जाते हैं ठाकुर का खाने को आते हैं ऐ यहां तो ऐसा नहीं होता व ठाकुर जो कहानी बताते हैं छोटे बच्चे को कहा गया कि जाओ ठाकुर को जाकर के भोग करा दो तो छोटा बच्चा तो अभी तो बिल्कुल छोटा बच्चा है वो तो समझता है ठाकुर खुद आकर के उसको भोग जो दिया है उसका आहार करेंगे तो जा कर के बैठा है सब भोग देने के लिए देख रहा है कि ठाकुर तो बस मूर्ति में ही है बड़े से शांति से बैठे हैं बाहर आ करके भोग नहीं आहार आहार नहीं कर रहे तो बड़ा बच्चा बेचारा रोने लगा और ऐसा व्याकुल होकर के रो रहा है पुकार रहा है कि ठाकुर आप आइए इसको ग्रहण कीजिए तो ठाकुर मने भगवान कृष्ण वो बेचा अपने को रोक नहीं पाए वो स्वयं उपस्थित होकर के हंसते हंसते सब कुछ भोग का जो आहार रखा था उन्होंने ग्रहण कर लिया तो जब ये बड़े लोग जाकर के वहां पर देखे कि ये अभी भोग का समय तो हो गया वो जो आ क्यों नहीं रहा है प्रसाद क्यों नहीं आ रहा तो बच्चे ने कहा कि क्यों वो तो भगवान कृष्ण आकर के सब कुछ खाके चले गए तो इन लोगों ने मंदिर में जाकर देखा कि सही सही में सब कुछ खाना वो भगवान कृष्ण ने खा लिया था अभी यहां पर तो मैंने तो अभी राम कृष्ण मिशन में सुना नहीं कभी कि ठाकुर ने मूर्ति में से बाहर प्रकट हो करर के वो भोग का जो दिया हुआ है वो ग्रहण कर लिया है यदि हुआ भी होगा तो जिस पुजारी के सामने ये सब हुआ होगा उसने ये सब सीक्रेट रखा होगा कई जाहिर में ये लोग बताते नहीं तो एटलीस्ट मेरे ध्यान में तो नहीं आया तो हमको ऐसा लगता है कि ये तो पत्थर की एक मूर्ति ही तो है इसके सामने बैठ के हम जो चाहे कर सकते हैं जितना भी किसी की निंदा करो जितना ही चाहे वो गलत काम करो कि जितना भी चाहे विष वाले विचार टॉक्सिक सब थॉट्स जो होते हैं वैशक चिंता सांसारिक चिंता हमारे मन में लेकर आओ यह सब हम बड़े आराम से कर देते हैं क्योंकि हमको लगता है कि वह पत्थर की मूर्ति ही है किंतु जिस क्षण हम यह जो विधि जो है ना अपनी वेद की ये जो कर्मकांड इसको सीरियसली लेना शुरू करेंगे तो पता चलेगा कि इस मूर्ति के इस प्रतिमा में तो प्राण प्रतिष्ठा हुई है जो भी मंदिर होता है सिर्फ रामकृष्ण संघ के नहीं हिंदू धर्म के दूसरे धर्मों के बारे में मुझे नहीं पता इतना किंतु हिंदू धर्म के कोई भी मंदिर की प्रतिष्ठा होगी उसमें यदि मूर्ति की प्रतिष्ठा होती है तो प्राण प्रतिष्ठा महोत्सव होता ही होता है और प्राण प्रतिष्ठा का अर्थ ही है कि निर्जीव चट्टान के भीतर में ईश्वर को आवाहन करना और फिर ईश्वर आवाह आगमन करके आ आरोहण करके उसमें विराजमान होते हैं तब कहीं जाकर के इस ईश्वर की प्रतिदिन पूजा होती है हम लोग चट्टान की पूजा नहीं करते ये जो मास्टर महासी ठाकुर के पास आकर के जो उपदेश देना शुरू कर दिया था ना कि ठाकुर पूछते हैं तुमको साकार अच्छा लगता है कि निराकार तो मास्टर महाशय ने कहा फिलहाल तो मुझे निराकार ही अच्छा लगता है तो जब उन्होंने ऐसा कहा तो ठाकुर ने कहा कि अच्छा देखो तुम ऐसा मत सोचना कि सिर्फ निराकार ही सही है ईश्वर तो साकार भी है निराकार भी है और कुछ कितना ही सब कुछ है तो फिर मास्टर महाशय पूछते हैं कि अरे तो फिर यह निर्ज मूर्ति जो है इसकी पूजा करनी है क्या मने दि साकार की पूजा तो इसका तो अर्थ वही हुआ कि आप पत्थर की पूजा करते हैं प्रतिमा पूजा करते हैं पतलि कता उस समय के लोग जो कहते थे क्रिश्चियनिटी से प्रभावित होकर के यह सब लोग तो पतलि है पुतले की पूजा करते हैं तो ठाकुर कहते हैं क्यों ये मृणमय प्रतिमा नहीं है मृणमय प्रण अर्थात की मिट्टी की बनी हुई ये तो चिन्मय प्रतिमा है इसमें तो मां सदेव विराजमान है तब मास्टर महाशय कहते हैं इसका अर्थ कि हमको तो लोगों को समझा देना होगा कि ये इसके भीतर में चेतन विराजमान है मां स्वयं विराजमान है अब पत्थर की मूर्ति की पूजा नहीं कर रहे तो ठाकुर बड़े नाराज हो करर के बोले कि तुम कोलकात्ता वालों का वही एक है कि इसको प्रवचन दो उसको उपदेश दो खुद को कौन समझाए इसका कुछ ठीक नहीं तो यहां पे ठीक है हम लोग समझाते हैं आपस में एक दूसरे को किंतु यह साधना के रूप में करते हैं नहीं कि दूसरे को समझाने की इच्छा से यह सब करते हैं यह जो सब बातें करते हैं ठाकुर की वो इस हेतु से कि चलो सुबह की शुरुआत तो ठाकुर का नाम लेकर के हो जो बोलता है उसका भी कुछ कल्याण होगा जो सुनते हैं शायद उनका भी कुछ कल्याण हो जाए तो इसीलिए नहीं कि उपदेश देने के लिए तो यहां पे जो देही है तीनी ई अभिनाशी इस देह के भीतर में जो देही है इस यंत्र को चलाने वाली जो इंजीनियर है ठाकुर का शब्द इंग्लिश शब्द यूज करते हैं आमी गाड़ी तुम इंजीनियर तो वो जो इंजीनियर है इसको भीतर में रहने वाली वही अविनाशी है अत एव इसलिए देहर फोटोग्राफ लैया की ई ब इसलिए इस देह का फोटो लेकर के क्या होगा देहो अनित्य जिनीश देह अनित्य है एर आदर कोरे की होबे इसका आदर जत्न करके क्या होगा बरम ज भगवान अंतर्जी मानुष हृदय मध्य विराज कोरीते छेन ताहा र पूजा करा उचित इस देह का फोटो लेकर के इसको सजा करके रखने की वजह इस इस देह के भीतर में जो अंतर्यामी भगवान हमारे हृदय में विराजमान है उन्हीं की पूजा करना उचित है यह मास्टर महाशय का ठाकुर ने जो एक शब्द बोला लटा यानी कि आवरण इस आवरण को लेकर के मास्टर महाशय ने इतना विचार किया इसके बाद में जो घटना वली है जिसके बारे में हम कल देखेंगे ओ प्रारंभ नहीं किया सिर्फ संकल्प ही लिया बत सही है यदि मैंने ऐसा कहा होगा कि योग शिक्षा ले रहे थे तो वो गलत है उने संकल्प लिया था फ संकल्प में ही फिर ठाकुर ने आक के जब दर्शन देना शुरू किया तो उन्होंने व रख दिया था वह संकल्प प्रारंभ नहीं किया था बात सही है ठीक रने नो दे के ऊपर में सब अटेंशन आ जाएगा ना क्योंकि क्या होगा क्या प्रॉब्लम क्या होगा बात सिर्फ यह नहीं है कि दूसरा गुरु नहीं करना है वैसे तो शिक्षा गुरु और दीक्षा गुरु का प्रभेद अपने शास्त्र में है कि दीक्षा गुरु एक ही होते हैं शिक्षा गुरु आप कितने ही कर सकते हैं स्वामी जी ने तो क्रिश्चन सेमिनरी में जाकर के क्रिश्चन थियोलॉजी स्टडी किया था जब वो भ्रमण कर रहे थे तब गोवा में सेमिनरी में रहे थे तो वो तो कोई बड़ी बात नहीं है कि दूसरे गुरु क्यों कर रहे हैं बात यह है कि मेरा एनालिसिस है बात यह है कि देह के ऊपर में फिर ध्यान चलाएगा अपना जो देह के परे जाकर के जो चिंतन करना है वो नहीं हो पाएगा और अभी देखिए कि देह की रक्षा तो करनी ही पड़ेगी हालांकि शास्त्र में कहा है कि शरीर माध्य खल धर्म साधन शरीर ही तो है धर्म का साधन शरीर जद वीक हो जाएगा आप धर्म का साधन कैसे करेंगे तो ठाकुर को कैंसर हो गया था तो मास्टर डॉक्टर सरकार ने आकर कहते थे बार-बार कि आपको भाव और समाधि नहीं होना चाहिए वरना तो ये आपका कंडीशन और भी बिगड़ जाएगा तो ये इसलिए देह का थोड़ा सा तो जतन करना है किंतु वो जतन करने की उम्र क्या है ना विद्यार्थी अवस्था की है एक बार आप 20 30 पार कर गए उस समय तो आपका मन ऐसे उच्च आध्यात्मिक राज्य में विचरण करना चाहिए दूसरा स्वामी जी के पास समय भी ज्यादा नहीं था पहले से ये सब ठीक ही था कि 39 या कम उम्र में ही चले जाना है तो अभी तो ये युग कार्य प्रारंभ कर देना है य अभी तो यह सब देह की चिंता करने का समय यदि था तो वो कब का बीत गया स्वामी जी तो दंड ये सब व्यायामशाला में जाकर के व्यायाम सीखे हैं कुस्ती सीखे हैं तो ऐसा नहीं कि उन्होंने देह की संभाल नहीं रखी जितने भी गुरु भाई है ये राजा महाराज होंगे शशि महाराज होंगे ये विज्ञान महाराज होंगे सब तो कुश्ती कर कुश्ती थे तो उन्होंने देह की संभाल तो अच्छे से रख दी है किंतु वो विद्यार्थी अवस्था में एक बार आध्यात्मिक जगत में आप कदम रखना शुरू कर दे फिर उसकी चिंता इतनी नहीं करनी वो एक सुंदर उदाहरण है ठाकुर का य महावीर सिंह बोलकर के एक पहलवान एक मुस्लिम पहलवान के साथ में उसका कुश्ती होने वाला है तो यह महावीर सिंह आकर के ठाकुर के पास आशीर्वाद मांगने के लिए आया तो ठाकुर ने कहा फिर वो ठाकुर को क्या कहता है पता है कि मेरी जीत जो है ना वह अनिवार्य है बहुत सारे लोग बोलते हैं कि मैं उपवास कर रहा हूं तपस्या कर रहा हूं और वो जो मुस्लिम पहलवान है वो दिन रात बैठ कर के दूध और मांस यह सब खा रहा है तो सब लोग सोचते हैं बढ़िया सा खाना खा रहा है तो वही जीत जाएगा और मैं उपवास कर रहा हूं तो मैं हार जाऊंगा किंतु मैंने जाकर के उसकी विषा चेक की है उसका जो मल है मल मैंने देखा है वोह ठीक से वो जो खा रहा है डाइजेस्ट नहीं कर पा रहा डाइजेशन नहीं होगा तो आपका वोह भीतर में ही रह कर के दुनिया भर के प्रॉब्लम खड़ा करेगा खाना तो सही बात सही हुई कि कुश्ती चालू हुई तो वो महावीर स जीत गया तो ये मतलब देह की संभाल भी कैसे रखनी वो भी एक साइंस है और सिर्फ कुश्ती करके सिर्फ खाना खाके नहीं होगा