श्रीरामकृष्ण कथामृत || 14 Dec 1883 - श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ दक्षिणेश्वर में || 29 Apr 2025
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धर्म ग्रन्थ पाठ है हमारे लिए सहज साधना
ठाकुर भगवान राम और परशुराम की कहानी का पाठ सुन रहे है
ठाकुर की भाव-अवस्था देखकर माँ सारदा को भय लगता है
ठाकुर भगवान राम और गुहक की कहानी का पाठ सुन रहे है
मास्टर महाशय की आध्यात्मिक यात्रा: परशुराम से गुहक तक: घमंड टूटने से शरणागति की और
श्रीरामकृष्ण भक्तों से वार्तालाप करते हैं
ईश्वर-लाभ होने से कर्म अपने से चला जायेगा : कर्म, धर्म, और ज्ञान का अर्थ समझना
प्रश्न: स्वामीजी का कर्म योग साधना का उत्तम मार्ग है
प्रश्न: कर्म योग समझौता जैसा नहीं लगता। यह ईश्वर तक पहुंचने का एक अनिवार्य मार्ग है। वेदांत के विचार इतने कठिन हैं कि हम गृहस्थों को उनमे सफल होने की कोई आशा नहीं है।
प्रश्न: क्या वेदांत विचार कर्म योग से भी बड़ा है?
प्रश्न: मोक्ष प्राप्ति के लिए अर्थ और काम -- दोनों का त्याग करना होगा
प्रश्न: अद्वैत वेदांत पढ़ने वाले लोग अपने दर्शनशास्त्र के ज्ञान को लेकर अहंकारी हो जाते हैं।
प्रश्न: साधु संग का यही लाभ है
प्रश्न: हम अपने काम में श्रेष्ठ होने का प्रयास करते हैं, लेकिन हम यह भी सोचते हैं कि हमें अपने काम से क्या लाभ हुआ है। लाभ की इस इच्छा से कैसे छुटकारा पाया जाए?
श्रीरामकृष्ण कथामृत || 14 Dec 1883 - श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ दक्षिणेश्वर में || 16 Jun 2025
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श्री रामकृष्ण पुराणों की कथाएँ सुनते हैं
श्री रामकृष्ण और कर्म
एक भक्त का प्रश्न: हम गृहस्थों को इस संसार में कैसे रहना चाहिए? -- बीच बीच में संसार से दूर होकर ईश्वर के चिंतन में लगना चाहिए
तीव्र वैराग्य से ही ईश्वर को पाया जा सकता है
हमें स्त्रियों के प्रति अपना वासना का त्याग है, उनसे घृणा नहीं करनी है
प्रश्न: आजकल लोग इतने भौतिकवादी हो गये हैं कि उनमें आध्यात्मिकता के प्रति कोई सहानुभूति नहीं है।
प्रश्न: साधक अपनी साधना के दौरान एक-दूसरे को सहयोग देने के लिए समान विचारधारा वाले भक्तों का एक समूह बना सकते हैं।
प्रश्न: हम आध्यात्मिक लोग भौतिकवादी लोगों से बचने की कोशिश करते हैं। लेकिन इस बात का खतरा है कि लोग हमें अहंकारी समझ लें।
प्रश्न: हम आध्यात्मिक लोगों के लिए दूसरों के साथ जुड़ना कठिन है। मेरा मानना है कि दूसरों को आध्यात्मिकता के मार्ग पर मार्गदर्शन करना मेरा कर्तव्य है।
श्रीरामकृष्ण कथामृत || 14 Dec 1883 - श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ दक्षिणेश्वर में || 18 Jun 2025
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आध्यात्मिक साधक को संसार के कर्म कब तक करने पड़ते है?
आध्यात्मिक साधक संसार में किस तरह से रहे?
त्याग कैसे करे? प्रारब्ध और संस्कार
वामाचार - स्त्रियों के साथ साधना - निषिद्ध है
स्त्रियों के प्रति मातृभाव ही है शुद्धभाव
प्रश्न: स्वामी सारदानन्द (शरत महाराज) कहते है की उन्होंने श्रीरामकृष्ण लीलाप्रसंग में वही लिखा है जो की उन्होंने स्वयं अनुभव किया है.
प्रश्न: ठाकुर के दर्शन और आध्यात्मिक अनुभव कितने गभीर थे!
वैज्ञानिक आइजैक न्यूटन की महानता
प्रश्न: स्वामी विवेकानंद कहते हैं कि न तो काम के पीछे दौड़ो और न ही काम से भागो. लेकिन स्वामीजी यह भी कहते हैं कि अपनी आध्यात्मिकता से दुनिया को जीतो। यह दौनो विरोधाभासी है.
प्रश्न: हम संसार से साधना करने का प्रयास करते हैं, लेकिन कभी-कभी हमें मायुसी बोध (गिल्ट फीलिंग) होता है कि हम उतना त्याग नहीं कर पा रहे हैं, जितना हमें करना चाहिए।
प्रश्न: हमारे प्रारब्ध है और बुरे संस्कार भी हैं, तो आध्यात्मिक जीवन में प्रगति कैसे करें?
प्रश्न: मां शारदा कहती हैं कि यदि आपको ठाकुर का मंत्र मिल गया है तो उन्हें आपके जीवन के अंत में आपको मोक्ष दिलाने के लिए आना होगा।
प्रश्न: रामकृष्ण लोक और ब्रह्मज्ञान में क्या फर्क है?
श्रीरामकृष्ण कथामृत || 14 Dec 1883 - श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ दक्षिणेश्वर में || 23 Jul 2025
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सरल विश्वास की कहानी: एक बालक और महापुरुष महाराज मधुसूदन को पुकारते है
सरल विश्वास की कहानी: एक बालक ईश्वर को भोग अर्पण करता है
सांसारिक बुद्धि की विडम्बना: सरल विश्वास से पुकारने से ईश्वर नहीं मिलेंगे यह पहले से ही ठीक कर के रखा है
प्रश्न: हमें विश्वास कैसे हो सकता है? हम कभी नहीं मानते कि ठाकुर अपनी तस्वीर में मौजूद हैं। हम तो बस यही सोचते हैं कि हमने यह तस्वीर किसी दुकान से खरीदी है।
प्रश्न: दूसरों के सामने अपने हृदय को खोल देना बहुत खतरनाक है। संसार में अगर मैं यह कहने की कोशिश करूँ कि "कृपया मुझे आपकी सेवा करने की अनुमति दें", तो वे केवल मेरा शोषण करेंगे।
प्रश्न: एक है अविश्वास - कैसे ईश्वर नैवेद्य खाएंगे? दूसरी और है पूर्ण विश्वास - जैसे की चंद्रमणि देवी का. तीसरा है स्वामीजी का अविश्वास - वे ठाकुर की परीक्षा करते रहते है - जिसे हम बुरी नजर से नहीं देखते. तो ये तीनों से हम क्या सीखे?
प्रश्न: परीक्षा कर उत्तर के रूप में जो सत्य प्रगट होता है, स्वामीजी में उस सत्य को स्वीकार करने की क्षमता थी. हम में ना ही परीक्षा करने की शक्ति है ना ही सत्य को स्वीकार करने की.
प्रश्न: सारदानन्द (शरत महाराज) रामकृष्ण मिशन के सेक्रेटरी थे. उनमें विश्वास भी था, साथ ही जगत के साथ व्यवहार करने की क्षमता भी थी.
प्रश्न: जैसे अपने कहा, हमें विश्वास है की सरल पुकार सुनकर ईश्वर आने वाले नहीं। हमें लम्बी साधना करनी ही होगी.
श्रीरामकृष्ण कथामृत || 14 Dec 1883 - श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ दक्षिणेश्वर में || 24 Jul 2025
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दक्षिणेश्वर में पंचवटी स्थित कुटिया का माहात्म्य
ईश्वर को प्रेम करना ही है जीवन का उद्देश्य
प्रश्न: बचपन से ही हमें विवेक का प्रयोग करना सिखाया जाता है। हम कभी भी दूसरों की कही बात को आँख मूँदकर स्वीकार नहीं करते। इस संस्कार के सामने हम विश्वास कैसे प्राप्त कर सकते हैं?
प्रश्न: जैसा कि आपने कहा कि हमें "लज्जा, घृणा और भय" से साधना करने में कतराना नहीं चाहिए। ठाकुर ये बात मास्टर महाशय को कहते है. लेकिन ठाकुर यह भी कहते हैं कि साधना "मन में, वन में, कोने में" करनी चाहिए। तो क्या ये दोनों विरोधाभासी नहीं हैं?
श्रीरामकृष्ण कथामृत || 15 Dec 1883 - श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ दक्षिणेश्वर में || 26 Aug 2025
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आज के शारीरिक - मानसिक दुर्बलता के युग में तपस्या कैसे करे: अपमान करने वाले के प्रति सहनशीलता बढ़ाकर
सहज संस्कार-शुद्धि: ठाकुर और स्वामीजी की डांट की महिमा
साथ में रहने की, एक दूसरे को सहन करने की तपस्या
क्या कर्मयोग पर श्रीरामकृष्ण का मंतव्य अस्पष्ट था?
ठाकुर कहते है की पूर्ण ज्ञानी अपने पास किताबे नहीं रखता, किन्तु ठाकुर के कमरे में तो किताबे थी.
प्रश्न: क्या ठाकुर दक्षिणेश्वर मंदिर में अपना वेतन स्वीकार करते थे ?
प्रश्न: ठाकुर, माँ और स्वामीजी की शिक्षाओं में विरोधाभास हैं। क्या विरोधाभासरूपी इस पहेली को सुलझाने से हमें आत्मज्ञान प्राप्त होगा?
प्रश्न: जो लोग हमारे भक्त नहीं हैं वे हमारे विचारों पर हास्यास्पद टिप्पणियाँ करते हैं।
प्रश्न: मास्टर महाशय ने कथामृत में स्वयं को कितनी अच्छी तरह छुपा कर रखा है!
प्रश्न: जब कोई साधु डांटता है तो हम उसे तपस्या मान सकते हैं, लेकिन हमारे सांसारिक जीवन में जब कोई हमारे साथ दुर्व्यवहार करता है तो हम उसका प्रतिकार किए बिना रह नहीं सकते। तो इस विरोधाभास को कैसे सुलझाया जाए?
जब गांधीजी बेलूर मठ आए तो स्वामीजी मठ में मौजूद नहीं थे। यह भारत के लिए सबसे बड़ा अवसर खो गया।
सहनशीलता (सहिष्णुता) और संघर्ष—क्या ये समान हैं या विरोधाभासी? -- हमें विज्ञान, कला, राष्ट्र-निर्माण जैसे क्षेत्र में पराक्रम प्रकट करना है, लेकिन कामना-वासनाओ का दमन करना है.
प्रश्न: राष्ट्र-निर्माण में चीन कितना सफल है!
प्रश्न: ट्राइबल लडके बहुत अच्छी तरह से विद्याभ्यास करने में सक्षम हैं।
श्रीरामकृष्ण कथामृत || 15 Dec 1883 - श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ दक्षिणेश्वर में || 27 Aug 2025
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कर्म कर्तव्य है या पूजा?
स्वामी विवेकानंद: कर्तव्य (ड्यूटी) तपते सूर्य के समान जला देने वाली है
भगवान कृष्ण का कर्म का सिद्धांत और हिटलर के कर्म के सिद्धांत में फर्क क्या है?
यदि हमारे नेता हमें अधार्मिक कार्य करने का आदेश देते है, तो क्या हमें उनके आदेश का पालन करना चाहिए या नहीं?
पूर्णज्ञान का लक्षण है किताबी ज्ञान से परे चले जाना
हमारे धर्मग्रंथों में सच्चे ज्ञान के साथ अनावश्यक ज्ञान भी मिलाया गया है। केवल ब्रह्म-ज्ञान को ही ग्रहण करें।
मा शारदा का जीवन आज की आधुनिक महिलाओं के लिए किस प्रकार प्रासंगिक है?
ईश्वर के अस्तित्व पर छिपा संदेह हमारे स्वास्थ्य को नष्ट कर रहा है
हमें शास्त्रों में से सार ग्रहण करना है
मन मुख एक करना: ठाकुर दिखावे के लिए कुछ करते नहीं थे
प्रश्न: कुछ वक्ता बुद्धि से बोलते हैं, कुछ - जैसे ठाकुर - हृदय से बोलते हैं। यदि वे हृदय से बोलें, तो हो सकता है कि वे तथ्यों के साथ कुछ गलतियाँ कर दें, लेकिन उन्हें सुनकर हम धन्य महसूस करते हैं।
प्रश्न: यदि आधुनिक युग में ठाकुर, मा, स्वामीजी की शिक्षाओं को कैसे लागू किया जाए, इस पर पुस्तकें लिखी जाएं तो यह हम भक्तों के लिए बहुत लाभदायक होगा।
प्रश्न: कुछ लोग ठाकुर में आस्था तो रखते हैं, लेकिन उनकी शिक्षाओं से सीखकर अपने जीवन में बदलाव नहीं लाते। वे झूठ बोलना या धोखा देना बंद नहीं करते।
प्रश्न: वहां गणेश पूजा का उत्सव कैसा होता है?
प्रश्न: क्या जन-कल्याण के लिए कर्म करने से ईश्वर प्राप्ति होगी?
श्रीरामकृष्ण कथामृत || 15 Dec 1883 - श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ दक्षिणेश्वर में || 29 Aug 2025
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श्रीरामकृष्ण और स्वामी विवेकानन्द : असंस्कृत आचरण, परन्तु अद्वितीय आध्यात्मिकता
कहानी: जब स्वामी विवेकानंद की उंगलियों पर अचार गिरता है, तो वे उन्हें चाट लेते हैं
व्याकुलता है आध्यात्मिक साधना का ईंधन
योगेन महाराज (स्वामी योगानन्द) की कहानी
श्री रामकृष्ण की ईश्वरनिष्ठा: सर्व भूत में ईश्वर दर्शन
पहले नेति-नेति बाद में इति-इति: ईश्वर ही सब हुए है 1
अवतार को भी क्यों करनी पड़ती है साधना
पहले नेति-नेति बाद में इति-इति: ईश्वर ही सब हुए है 2
ब्रह्म का वर्णन वाणी या शब्दों से नहीं किया जा सकता
प्रश्न: दीन-हीन भाव के प्रति ठाकुर की घृणा दिखाती है कि उनकी शिक्षा कितनी क्रांतिकारी है
प्रश्न: यह मानना सहज है कि आत्मा मनुष्य, प्राणी और वृक्ष जैसे सजीवों में है; परन्तु यह स्वीकार करना कठिन लगता है कि आत्मा रेत, पत्थर या जल जैसी निर्जीव वस्तुओं में भी विद्यमान है। इसी प्रकार यह मानना सरल है कि प्रत्येक प्राणी में आत्मा है, लेकिन यह मानना कठिन है कि वही एक ही आत्मा सबमें है
प्रश्न: अगर AI हर सवाल का जवाब दे सकता है, फिर गुरु की क्या जरूरत है?
प्रश्न: हमारी consciousness के लिए AI पहली चुनौती है
श्रीरामकृष्ण कथामृत || 15 Dec 1883 - श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ दक्षिणेश्वर में || 3 Nov 2025
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बीच-बीच में संसार से हटकर, मन के एकांत में—कभी वन में, कभी घर के कोने में—ईश्वर को पुकारना आवश्यक है
में मुक्त आत्मा हु, में क्यों पिंजरे में बद्ध पंखी की तरह होने को जाऊंगा
जब ब्रह्म ही सब हुए है, तो फिर भगवान राम को घर त्याग कर संन्यास लेने की क्या जरुरत है?
उत्तम गुरु श्रीरामकृष्ण भक्तों के मन में आध्यात्मिक उपदेश कैसे दृढ़ता से अंकित कर देते हैं?
जिसे न मन छू सके, न वचन पकड़ सके — वही है ब्रह्म
यदि मन ज़रा-सा भी कामिनी-कांचन से आकृष्ट है, तो ईश्वर-दर्शन असम्भव है
श्रीरामकृष्ण का अप्रतिम त्याग: एक सुंदरी स्त्री ठाकुर का ध्यान आकर्षित करने का प्रयास करती है, पर सफल नहीं होती
प्रश्न: क्या उम्र बढ़ने पर जीवन का उत्साह स्वाभाविक रूप से घटता है?
प्रश्न: जब वेदांत हमें आधुनिक युग के अकेलेपन से ही न उबार सके, तो उसका लाभ क्या?
प्रश्न: भक्ति योग हमें दीनता और शरणागति सिखाता है, पर इसी कारण हम हज़ार साल गुलाम रहे—ठाकुर दीनता का स्पष्ट विरोध करते हैं। उसी तरह, वेदांत को पलायनवाद समझ लिया गया, जबकि स्वामीजी ने हमें सच्चा वेदांत सिखाया।
Master Mahashaya's Retreat in Dakshineshwar 16 Dec 1883
श्रीरामकृष्ण कथामृत || 16 Dec 1883 - श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ दक्षिणेश्वर में || 6 Nov 2025
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शंकराचार्य का ‘नेति नेति’ साधनमार्ग बनाम श्रीरामकृष्ण का ‘इति इति’ साधनमार्ग
प्रश्न: कृपया साँप और रस्सी वाले उदाहरण को फिर से समझाइए; इसे समझने में थोड़ी दिक्कत हो रही है।
प्रश्न: आपने कहा कि शंकराचार्य के ज्ञानमार्ग में त्याग सबसे महत्त्वपूर्ण है, भक्ति-मार्ग में शरणागति सबसे महत्त्वपूर्ण है, परन्तु श्रीरामकृष्ण कहते हैं कि दोनों ही समान रूप से महत्त्वपूर्ण हैं। कृपया इसे फिर से समझाइए। और क्या स्वामीजी और माँ के जीवन में भी ज्ञान और शरणागति दोनों समान रूप से महत्त्वपूर्ण हैं?
त्याग और करुणा की अद्भुत कहानी: माँ सारदा स्वच्छ पानी पीना नहीं चाहती थीं, क्योंकि उसे घर तक लाने में उनके त्यागी संतानों को बहुत परिश्रम करना पड़ता था
प्रश्न: ठाकुर इतने सात्त्विक थे कि वे न तो पैसे छू सकते थे और न ही ऐसे व्यक्ति का लाया हुआ पानी पी सकते थे जिसके संस्कार अच्छे न हों। परन्तु माँ तो सात्त्विकता से भी परे हैं।
प्रश्न: 'इति इति' मार्ग के बारे में और बताइये
प्रश्न: हम लोगों की सेवा दो तरह से कर सकते हैं—निर्विकल्प समाधि से पहले इसे साधना के रूप में, और निर्विकल्प समाधि के बाद स्वाभाविक जीवन के रूप में। अब यह बताइए कि जिस व्यक्ति को हमारी सेवा मिलती है, क्या उसके लिए हमारे भीतर की भावना कोई महत्त्व रखती है?
प्रश्न: माँ ने पागल राधू के साथ रहकर हमें सहनशीलता का पाठ पढ़ाया। वेदान्त के अनुसार लीला केवल हमें मूल्य सिखाने के लिए होती है। पर क्या यह पूछना उचित है कि माँ के प्रेम से स्वयं राधू ने क्या पाया?
सेवा का उद्देश्य चित्त को शुद्ध करना है—पुण्य कमाना नहीं
प्रश्न: ठाकुर यदु मलिक से कहते थे—पहले माँ काली का दर्शन करो, उसके बाद भिखारियों को भिक्षा देना। लेकिन स्वामीजी से उन्होंने कहा कि निर्विकल्प समाधि में बने रहना केवल स्वार्थ है; तुम्हें तो वटवृक्ष बनना है, लोगों को छाया देने के लिए।
प्रश्न: चैतन्य महाप्रभु पहले तो कहते हैं—“मगुर मछली का रस और युवती का आँचल -- बोल हरि बोल।” लेकिन इसी के साथ जब हरिदास एक स्त्री-भक्त से बातचीत करते हैं, तो महाप्रभु उन्हें त्याग देते हैं।
श्रीरामकृष्ण कथामृत || 16 Dec 1883 - श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ दक्षिणेश्वर में || 7 Nov 2025
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श्रीरामकृष्ण ‘नेति नेति’ और ‘इति इति’—दोनों मार्गों का अद्वैत-अनुभूति के रूप में समन्वय करते हैं
प्रश्न: हृदय और मस्तिष्क के समन्वय के बारे में स्वामीजी की एक अच्छी कहानी है. उनके विशाल हृदय और करुणा के कारण स्वामीजी को बहुत कष्ट झेलने पड़े। मुझे लगता है कि यही उनकी विशिष्ट देन है।
प्रश्न: ठाकुर दो विरोधाभासी बातें कहते हैं — यदि हम किसी कमरे में, जो हज़ार साल तक बंद रहा हो, बिजली जलाएँ तो वह तुरन्त प्रकाशित हो जाएगा। दूसरी ओर, यदि किसी प्याले में लहसुन रखा हो तो उसकी गन्ध हटाने के लिए उसे आग में भूनना पड़ता है। इन दोनों का सामंजस्य कैसे बैठता है?
प्रश्न: हम ठाकुर, माँ और स्वामीजी के बारे में इतना पढ़ते और सीखते हैं, लेकिन अब चुनौती यह है कि इसे व्यवहार में कैसे उतारा जाए।
प्रश्न: स्वामीजी कहते है की उपनिषद् के प्रत्येक पन्ने पर मुझे शक्ति - आत्मश्रद्धा - दिखाई देती है. पर मुझे तो ऐसा नहीं दिखता। उपनिषद् में शक्ति का प्रदर्शन करने की बात तो आती ही नहीं. हमने उपनिषद् की सौम्यता अपनायी परन्तु हम रूद्र-काली को भूल गए.
श्रीरामकृष्ण कथामृत || 16 Dec 1883 - श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ दक्षिणेश्वर में || 8 Dec 2025
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Slide 1: टाइटल पेज पे दक्षिणेश्वर का चित्र
Slide 2: जो लोग योगभ्रष्ट है, वे भक्त बन धनि परिवारों में जन्म लेते हैं
Slide 3: जो लोग योगभ्रष्ट है, वे भक्त बन धनि परिवारों में जन्म लेते हैं, नहीं की "बड़े बाप की बिगड़ी औलाद" हो कर के
Slide 4: आत्मज्ञानी संसार में रहते है वासना-मुक्त हो कर
Slide 5: "नेति नेति" या "इति इति"
Slide 6: ईश्वर की इच्छा से जिव-जगत हुए है. परन्तु जो पूर्ण-काम है वो इच्छा करेंगे ही क्यों?
Slide 7: ईश्वर इच्छा करते है तो उसमे गलत क्या है: जब वो स्थिर हो कर रहते है तब ब्रह्म, जब कार्य करते है तब शक्ति
Slide 8: ब्रह्म और शक्ति अभेद
Slide 9: कर्म और लीला
Slide 10: जीव, जगत, और ईश्वर मिल के ही पूर्ण होता है
Slide 11: द्वैत, अद्वैत, और श्रीरामकृष्ण वेदान्त
Slide 12: धुंआ आकाश को काला नहीं करता
Slide 13: जब स्थिर है तब ब्रह्म, जब कार्य करते है तब शक्ति
Slide 14: core insights
Slide 15: Conclusion
कामिनी-कांचन ही माया है — बस ये दो मन से हटाइए, योग अपने-आप होगा
प्रश्न: एक ओर साधना के बिना आध्यात्मिक जीवन में प्रगति संभव नहीं है, और दूसरी ओर साधना करने से भी ईश्वर-प्राप्ति की कोई गारंटी नहीं है — तो इन दोनों विरोधी प्रतीत होने वाले सत्यों का समन्वय कैसे किया जाए?
श्री रामकृष्ण का समन्वय : योग समन्वय और वेदान्त समन्वय
प्रश्न: औपचारिक शिक्षा का अभाव ठाकुर के लिए अत्यंत सहायक सिद्ध हुआ; इसी कारण वे दूसरों के विचारों के बोझ से मुक्त होकर स्वतंत्र रूप से चिंतन कर सके।
प्रश्न: मास्टर महाशय इतने सत्यनिष्ठ हैं कि बिना किसी कटुता के यह भी लिखते हैं कि ठाकुर ने उनका अपमान कैसे किया
श्रीरामकृष्ण कथामृत || 16 Dec 1883 - श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ दक्षिणेश्वर में || 9 Dec 2025
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Infographics: ब्रह्म और शक्ति अभेद
कामिनी-कांचन ही माया है — बस ये दो मन से हटाइए, योग अपने-आप होगा
कामिनी-कांचन रूपी मन के मैल से कैसे मुक्त हो? 1) ईश्वर-दर्शन के लिए व्याकुल होकर क्रंदन करो—अश्रुधारा मन का मैल धो देगी
भक्ति मार्ग से -- ईश्वर-दर्शन के लिए -- क्रंदन करने से प्राप्त होते है कुम्भक और समाधी
प्रश्न: साधना के प्रारम्भ में तो हम ईश्वर के बारे में जानना शुरू करते हैं। फिर ईश्वर-प्राप्ति के लिए रोना और अश्रु बहाना तो साधना के अंतिम मुकाम पर होना चाहिए, न कि प्रारम्भ में। दूसरा, यदि क्रंदन-योग इतना सहज होता, तो उसका सहारा लेकर ईश्वर-प्राप्ति करने वालों में हमने केवल ठाकुर को ही क्यों देखा है—और किसी को क्यों नहीं?
प्रश्न: क्रंदन-योग के विषय में अभी भी संदेह बना हुआ है। एक बार एक युवक ठाकुर के पास आया—कीर्तन सुनकर उसे भाव हो गया था। किंतु ठाकुर ने कहा कि उसका यह भाव टिकेगा नहीं; जैसे ही स्त्री-संपर्क होगा, भाव भंग हो जाएगा। इसी कारण तो अपने संघ में वैराग्य को इतनी महत्ता दी गई है—पहले वैराग्य, उसके बाद भाव। तो फिर प्रश्न यह है कि ठाकुर साधना के प्रारम्भ में ही रोने और क्रंदन का आग्रह क्यों करते हैं?
श्रीरामकृष्ण कथामृत || 16 Dec 1883 - श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ दक्षिणेश्वर में || 10 Dec 2025
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जहाँ साधना को दिशा और आधार मिले—वह आश्रय है रामकृष्ण मिशन
कर्मयोग में self reflection (आत्म-निरीक्षण) का महत्व
ध्यान से ब्रह्मज्ञान प्राप्ति
प्रश्न: हम सब जानते हैं कि क्या सही है और क्या गलत, फिर भी सही को करने की संकल्पशक्ति हमारे भीतर नहीं होती. ज्ञान है, विवेक है, फिर भी आचरण में अभाव रह जाता है. इस संकल्पशक्ति को कैसे बढ़ाया जाए?
प्रश्न: विपश्यना कहती है कि यदि क्रोध को उसके उठते ही पहचान लिया जाए, तो उस पर विजय पाई जा सकती है; पर यदि पहचान में देर हो जाए, तो वह तेजी से बढ़ता है और फिर उसे नियंत्रित करना अत्यंत कठिन हो जाता है। This matches with your concept of self analysis
प्रश्न: अष्टांग योग के अनुसार हम अभ्यास और वैराग्य से भी तो मन का नियमन कर सकते है
प्रश्न: रांची के उस शिक्षक के साथ आपका अनुभव हमें एक महत्वपूर्ण शिक्षा देता है—आध्यात्मिक जीवन में शिथिलता का कोई स्थान नहीं है। इतना सब त्याग करने के बाद भी आपको क्रोध से सावधान रहना पड़ता था
प्रश्न: आप इतने लंबे समय से आत्म-निरीक्षण का अभ्यास कर रहे हैं। क्या साधना के साथ-साथ यह आत्म-निरीक्षण भी improve होता जाता है?
प्रश्न: साधक में कर्म के प्रति पूर्णता (perfection) का आग्रह स्वाभाविक रूप से होता है। जब यह अपेक्षा पूरी नहीं होती, तो सहज ही क्रोध प्रकट हो जाता है। वास्तव में, कर्म में पूर्णता भी बनाए रखना और मन में किसी प्रकार का विकार उत्पन्न न होने देना—यह अत्यन्त कठिन है।
प्रश्न: क्या यह आत्म-निरीक्षण ही साक्षी-भाव है?
प्रश्न: मुंबई के एक काफ़ी पढ़े-लिखे व्यक्ति ने मुझसे कहा कि उसे उपनिषद् समझ में नहीं आते थे। बाद में उसने सेवा-कार्य किया; तब शास्त्र उसे अच्छी तरह समझ में आने लगे।
श्रीरामकृष्ण कथामृत || 16 Dec 1883 - श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ दक्षिणेश्वर में || 12 Dec 2025
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काम-कांचन से दूषित मन की गंदगी कैसे धुले? -- ईश्वर के सामने रोओ और ध्यान करो
स्वामी विवेकानन्द की दृष्टि से: ध्यान में प्रवेश का साधन है कल्पना (imagination)
स्वामी विवेकानन्द की दृष्टि से: मन को एकाग्र करने के लिए कल्पना का खेल (play of imagination) अनिवार्य है
मन को सौंदर्य प्रिय है—इसीलिए ध्यान हेतु सुंदर दृश्यों की आंतरिक लाइब्रेरी बनाइए
ध्यान में मन पाकिस्तान है, हृदय भारत। मन नकारात्मक विचार भेजकर हृदय में घुसपैठ करता है — इसलिए ध्यान से पहले मन और हृदय के बिच की बॉर्डर सील करो
ध्यान के लिए मन को सात्त्विक कल्पना पर एकाग्र करना है, राजसिक या तामसिक पर नहीं।
मैं ही साधक हूँ, मैं ही साध्य हूँ। कल्पना की सहाय अज्ञान की अवस्था में ही होती है। ज्ञान तो ‘अहं ब्रह्मास्मि’ के श्रवण मात्र से भी प्रकट हो सकता है।
प्रश्न: ध्यान में मन को बाँधने के लिए—क्या कल्पनाओं का विशाल भंडार चाहिए, या कुछ चुनी हुई, स्थिर कल्पनाएँ ही पर्याप्त हैं?
प्रश्न: क्या मन को शत्रु मानकर उससे लड़ना चाहिए, या मित्र मानकर उससे संवाद करना चाहिए?
उद्धरेदात्मनाऽऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्।
प्रश्न: ठाकुर को भाव होता था. अब, भाव भी तो एक तरह की इमेजिनेशन ही है न. अर्थात ध्यान में इमेजिनेशन का इस्तेमाल करना ठाकुर की शिक्षा के खिलाफ नहीं है.
प्रश्न: एक अमेरिकी study के अनुसार नववर्ष संकल्प औसतन केवल 19 दिन ही टिकते हैं। तो फिर कल्पना-साधना में हमारी रुचि को निरंतर कैसे बनाए रखें?
प्रश्न: कभी-कभी हमारे मन में अध्यात्म को लेकर संदेह उत्पन्न हो जाता है, तब साधना डगमगाने लगती है। दीर्घकालीन साधना के लिए श्रद्धा आवश्यक है, जो हमें यह आश्वासन देती है कि हम सही मार्ग पर हैं। तो इस “संशय-राक्षस” से स्वयं की रक्षा कैसे करें?
श्रीरामकृष्ण कथामृत || 16 Dec 1883 - श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ दक्षिणेश्वर में || 22 Jan 2026
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ईश्वर-प्राप्ति का मार्ग: ज्ञान, भक्ति, और योग साधना का समन्वय
सच्ची आस्था सुख में नहीं, संकट में जन्म लेती है
प्रश्न: हम सामान्यतः सुरक्षा और स्थिरता की तलाश करते हैं। लेकिन ठाकुर के सन्यासी शिष्यों ने वराहनगर मठ को छोड़कर प्रव्रज्या करते हुए अनिश्चितता और भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण का जीवन अपनाया। इसके पीछे राज़ क्या है?
प्रश्न: जब त्रैलोक्यनाथ ने हृदय को जाने के लिए कहा, तब ठाकुर भी दक्षिणेश्वर काली मंदिर छोड़ने के लिए तैयार हो गए। ठाकुर तुरंत अपने कक्ष से बाहर निकल आए। मुझे नहीं लगता कि उन्हें ज़रा भी अंदाज़ा था कि वे कहाँ जाएंगे। लेकिन वे इस अनिश्चित भविष्य को लेकर बिल्कुल भी चिंतित नहीं थे।
प्रश्न: वृंदावन में प्रेमानंदजी कहते हैं कि जब उनकी किडनी ने काम करना बंद कर दिया, तो उन्हें हर आश्रम से बाहर कर दिया गया। क्योंकि उन्हें अपने पास रखने का मतलब था उनका इलाज करवाना—जो बहुत महंगा था। यही वह समय था—जब सारे दरवाज़े बंद हो गए—तभी महान आस्था के द्वार खुल गए। अब हमें किसके लिए प्रार्थना करनी चाहिए—सुरक्षा के लिए या संकट के लिए?
प्रश्न: आप सही कह रहे हैं। हमारा समय बहुत सीमित है। ऐसे में हम दुनिया में सफल कैसे हों और साथ ही आध्यात्मिक रूप से भी सफल कैसे बनें?
श्रीरामकृष्ण कथामृत || 16 Dec 1883 - श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ दक्षिणेश्वर में || 23 Jan 2026
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ईश्वर के दर्शन किए जा सकते हैं और उनसे वार्तालाप भी कर सकते है
प्रश्न: ईश्वर माया का Product भी हैं और मायाधीश भी; ये दोनों बातें एक साथ कैसे संभव हैं?
प्रश्न: विशिष्ट अद्वैत के सगुण ब्रह्म और ठाकुर के ब्रह्म-शक्ति अभेद -- क्या यह दोनों एक ही है न अलग?
प्रश्न: ठाकुर का यह जो concept है -- ब्रह्म-शक्ति अभेद -- यहाँ अवतार का क्या स्थान है?
पारंपरिक द्वैत या अद्वैत की दृष्टि से ठाकुर की भावधारा को नहीं समझा जा सकता। 'ब्रह्म और शक्ति का अभेद'—इसी अवधारणा से ठाकुर की वाणी को समझा जा सकता है।
प्रश्न: आप के समझाने से पहले पता नहीं था की traditional द्वैत या अद्वैत से भी परे ठाकुर का यह ब्रह्म-शक्ति अभेद concept है
प्रश्न: एक बार ठाकुर को समझ लेने के बाद हमारी बुद्धि और हृदय, दोनों का विस्तार हो जाता है। इसके बाद पारंपरिक द्वैत या अद्वैत—दोनों ही मतों के आचार्यों को सुनना अच्छा लगने लगता है।
प्रश्न: ईश्वर के दर्शन हो सकते हैं—इस श्रद्धा को और अधिक सुदृढ़ (मजबूत) कैसे किया जाए?
प्रश्न: स्वामीजी कहते हैं कि आत्मश्रद्धा (Self-confidence) चाहिए, किंतु प्रश्न यह है कि यह आत्मश्रद्धा आएगी कहाँ से?
श्रीरामकृष्ण कथामृत || 16 Dec 1883 - श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ दक्षिणेश्वर में || 3 Mar 2026
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आज के युग का महावाक्य: ईश्वर के दर्शन हो सकते है
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क्या श्री रामकृष्ण असभ्य है? सही शिष्टाचार क्या है?
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प्रश्न: हमारे भीतर तीन प्रकार के अविश्वास होते हैं—
प्रश्न: विश्वास का जिम्मा किसका है? हमें अपने से विश्वास करना पड़ेगा न ईश्वर हमें विश्वास करवाएंगे?
प्रश्न: स्कूल में पढ़ाई एक सिस्टम के अनुसार चलती है—टीचर, एग्ज़ाम, रिज़ल्ट, प्रमोशन सब कुछ स्पष्ट होता है। लेकिन आध्यात्मिक जीवन में आगे कैसे बढ़ रहे हैं, इसका कोई इतना स्पष्ट सिस्टम दिखाई नहीं देता। इसका क्या उपाय है?
प्रश्न: इतिहास में समय-समय पर आदि शंकराचार्य जैसे महान आचार्य अवतरित हुए हैं। उन्होंने धर्म और अध्यात्म को नई दिशा दी, लेकिन उनके बाद वैसी ही आध्यात्मिक ऊँचाई वाला व्यक्तित्व फिर बहुत कम दिखाई देता है।
प्रश्न: विश्वास के बारे में सुना तो बहोत है किन्तु यह समझ नहीं आता की विश्वास आए कैसे?
प्रश्न: धार्मिक विद्यालय अक्सर उपदेशक, प्रचारक तो तैयार कर देते हैं, लेकिन गहरे आध्यात्मिक साधक बहुत कम निकल पाते हैं।
श्रीरामकृष्ण कथामृत || 16 Dec 1883 - श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ दक्षिणेश्वर में || 4 Mar 2026
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स्थिर जल या बहता जल — है दोनों एक
वेदान्त को प्रैक्टिकल बनाना ही होगा
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सांख्य और योग का अवदान : युक्ति और विज्ञान के आधार पे आध्यात्मिकता
सांख्य के युक्ति-वाद के आधार पे बने बौद्ध धर्म और गौड़पादाचार्य का अजाति वाद
शंकराचार्य का अद्वैत भक्ति मार्ग के ईश्वर तथा गौड़पादाचार्य के अजातिवाद के निर्गुण ब्रह्म का सामंजस्य कैसे करता है?
प्रश्न: आपने धर्म के विकास का एक अत्यंत रोचक इतिहास प्रस्तुत किया। वह काल निश्चित ही तीव्र संघर्ष और टकराव का समय रहा होगा।
प्रश्न: उदाहरण के लिए शंकराचार्य और मंडन मिश्र का ऐतिहासिक शास्त्रार्थ, जहाँ मंडन मिश्र की पत्नी ने निष्पक्ष निर्णायक बनकर अपने पति को पराजित घोषित किया।
प्रश्न: अजातवाद तो पूरा रुखा सुखा है, नहीं?
प्रश्न: एक ज़बरदस्त समुद्रमंथन चल रहा है और लगातार नए-नए विचार उत्पन्न हो रहे हैं। इनमें सबसे नवीनतम हैं श्री रामकृष्ण।
प्रश्न: अद्वैत के छत्र तले समस्त दर्शन आश्रय पा सकते हैं। केवल द्वैत को ही अद्वैत से आपत्ति है — कि आपने हमारे ईश्वर को ब्रह्म के मुकाबले दूसरे स्टेप पर क्यों रखा?
प्रश्न: हर किसी को लगा कि ठाकुर हमारे अपने हैं। वैष्णवों, ब्रह्म समाजियों—सभी ने यही सोचा
श्रीरामकृष्ण कथामृत || 16 Dec 1883 - श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ दक्षिणेश्वर में || 5 Mar 2026
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विशिष्ट-अद्वैत और अजाती-वाद के अनुसार सृष्टि की रचना: निमित्त कारण और उपादान कारण
अजाति-वाद और विशिष्ट-अद्वैत के गुण और दोष: जीव निर्गुण ब्रह्मन् के साथ एकीकृत हो सकते है, सगुण ब्रह्मन् के साथ हमेशा दुरी बनी रहेगी
अजाति-वाद और विशिष्ट-अद्वैत के गुण और दोष: ब्रह्मन् निर्गुण होने से मानव स्वप्न मात्र है उसकी सेवा किसी काम की नहीं। सगुण ब्रह्मन् ही मनुष्य हुए है तो मानव-सेवा ईश्वर-उपासना हो सकती है।
शंकराचार्य का मध्यम-मार्ग : अद्वैत-वेदान्त : पारमार्थिक और व्यावहारिक सत्ता
शंकराचार्य के मध्यम-मार्ग-रूपी अद्वैत-वेदान्त के गुण और दोष: व्यवहार की सत्ता है, परन्तु ईश्वर द्वितीय कक्षा पे है
श्रीरामकृष्ण का ब्रह्म-शक्ति-अभेद वाद : ज्ञान और भक्ति का समन्वय
प्रश्न: श्रीरामकृष्ण के “ब्रह्म-शक्ति अभेद” ने शंकराचार्य की उस समस्या का पूर्ण समाधान कर दिया, जिसमें ईश्वर को दूसरे स्तर पर रखा गया था। अब ब्रह्म और शक्ति दोनों समान स्तर पर हैं।
प्रश्न: अद्वैत-वेदांत और जातिवाद के बीच में डिफरेंस है ऐसा सोचा नहीं था
प्रश्न: एक पूर्ण अजातिवाद के साधक -- जैसे की गौड़पादाचार्य -- का जीवन कैसा होगा।
श्रीरामकृष्ण कथामृत || 16 Dec 1883 - श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ दक्षिणेश्वर में || 6 Mar 2026
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अजातिवाद का दार्शनिक सौंदर्य
अजातिवाद का नैतिक संकट : जब कुछ उत्पन्न ही नहीं हुआ, तब पाप और पुण्य क्या हैं?
परमार्थ और व्यवहार: अजातिवाद की नैतिक समस्या पर शंकराचार्य का समाधान
सगुण ब्रह्म: अद्वैत के माया-जनित ईश्वर की समस्या पर रामानुजाचार्य का समाधान
श्रीरामकृष्ण का समाधान : ब्रह्म और शक्ति एक हैं : इसलिए भक्ति, सेवा और मातृस्नेह भी सत्य हैं
Superposition in Quantum dynamics
Superposition of Brahma and Shakti : duality in the nature of ultimate reality
प्रश्न: यदि ब्रह्म और शक्ति अभेद हैं, तो उन्हें दो अलग नाम क्यों दिए गए? हमें भ्रमित क्यों किया गया?
प्रश्न: जैसे ठाकुर की कहानी है, कुछ अंधे लोग हाथी के विभिन्न अंग स्पर्श करके कहते है की हाथी सर्पाकार है, है सूपड़े की तरह है, वैसे ही लगता है की हमारे भीतर का अज्ञान हमें समझने नहीं देता की ब्रह्म-शक्ति अभेद है.
प्रश्न: दुनिया के बारे में हमारी समझ बहुत सीमित है। उदाहरण के लिए, मुझे यह नहीं पता कि मेरा मोबाइल कैसे काम करता है, या मेरी कार कैसे काम करती है।
प्रश्न: अंत में तो हमें माँ के पास ही आना है। क्योकि यह समझना बहुत कठिन है कि बिल्ली एक ही समय में मृत भी है और जीवित भी।
प्रश्न: आइंस्टीन क्यों कहता है god does not play dice?
प्रश्न: उपनिषद् में यही बात है:
प्रश्न: मैंने पढ़ा है कि जब हम इलेक्ट्रॉन को देखने के लिए उस पर प्रकाश डालते हैं, तो वह उसे ऊर्जा प्रदान करता है और उसकी कक्षा बदल जाती है। इसलिए निरीक्षण की क्रिया स्वयं ही इलेक्ट्रॉन की स्थिति में हस्तक्षेप करती है। इसी कारण हम कभी भी इलेक्ट्रॉन की वास्तविक स्थिति को ठीक-ठीक नहीं जान सकते।
इसीलिए ठाकुर कहते हैं— पत्ते गिनने में मत लगे रहो, आम खाओ। यह ठीक quantum physics जैसा है।
प्रश्न: हम बड़े शौक से कहते हैं कि जगत मिथ्या है, लेकिन जब काँटा चुभता है तो दर्द बिल्कुल वास्तविक महसूस होता है।
प्रश्न: हम अभी तक ठाकुर के ब्रह्म-शक्ति-अभेद का माहात्म्य नहीं समझे है. अभी तक हम अद्वैत-वेदान्त की मायाजाल में फंसे है.
प्रश्न: क्या ठाकुर जानते थे कि वे ऐसे महान दार्शनिकों और विद्वानों को चुनौती दे रहे हैं?
प्रश्न: स्वामी विवेकानन्द अजातिवाद के बारे में क्या कहते है?
प्रश्न: अब आगे हम इसके व्यावहारिक प्रयोगों को समझेंगे, है न?
भारतीय दार्शनिक परम्परा : असत से सत तक : नागार्जुन से लेकर गौडपाद - गोविन्दपाद - शंकराचार्य - से श्री रामकृष्ण तक.
प्रश्न: स्वामी विवेकानन्द को कठोपनिषद् से इतना प्रेम क्यों था?
उपनिषद् को प्रैक्टिकल करने ही होंगे वरना बौद्ध धर्म की तरह अधःपतन आएगा
श्रीरामकृष्ण कथामृत || 16 Dec 1883 - श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ दक्षिणेश्वर में || 13 Apr 2026
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जब गिरीश घोष ने गालियों से श्रीरामकृष्ण के प्रति अपनी भक्ति प्रकट की
स्वामी सारदानन्द का अद्भुत सेवाभाव: बीमारी भूले, अतिथि के लिए स्वयं बनाई चाय
श्रीरामकृष्ण वेदान्त : ब्रह्म-शक्ति-अभेद superposition of brahma & shakti
एक भक्त : ब्रह्म-शक्ति-अभेद और विज्ञानवाद में फर्क क्या है?
एक भक्त : जगत असत या मिथ्या है तो गौड़पादाचार्य या शंकराचार्य ने भाष्य क्यों लिखे ?
एक भक्त : संसार को हम असत या मिथ्या ही मानते रहे है अभी तक. किन्तु ठाकुर ही हमें संसार का माहात्म्य सिखाते है
एक भक्त : ब्रह्म-शक्ति-अभेद को सुनकर भी हम कर्मयोग को मुख्य साधना के रूप में नहीं स्वीकार करते
एक भक्त : किसी ने ऐसा कहा की स्वामीजी ने ठाकुर के सन्देश को बिगाड़ दिया है. ठाकुर परंपरागत संत ही थे - बिना मतलब स्वामीजी सेवाकार्य की बात ले के आये है.
एक भक्त : किसी ने ऐसा कहा की हमें स्वामीजी का सेवाकार्य अच्छा नहीं लगता
श्रीरामकृष्ण कथामृत || 16 Dec 1883 - श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ दक्षिणेश्वर में || 14 Apr 2026
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शिव की दो अवस्थाएँ: समाधि में आत्माराम, और ‘मैं’ आते ही रामनाम में नृत्य
ब्रह्म-शक्ति-अभेद की नींव है काम-कांचन-त्याग
एक भक्त: पहले तो अंध भोगवाद आता है, त्यार बाद धर्म के आधार पे भोग, बाद में ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या, और अभी है ब्रह्म और जगत दोनों एक ही है. इस पुरे विकास में हम क्यों तमस में गिर गए?
श्रीरामकृष्ण कथामृत || 9 Dec 1883 - श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ दक्षिणेश्वर में || 28 Apr 2025
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पूर्वभूमिका: मास्टर महाशय ने दक्षिणेश्वर में ठाकुर के सान्निध्य में साधना करने का निर्णय लिया
सेवक हृदय में: मास्टर महाशय ठाकुर के बारे में क्या सोच रहे है
कहानी: लुटेरों का हमला होने से ठाकुर सभी देवी देवताओं को पुकारने लगते है
क्या विवाह और पुत्र प्राप्ति के बाद भी ईश्वर प्राप्ति हो सकती है?
व्याकुलता और धैर्य : ईश्वर प्राप्ति के लिए दोनों का संतुलन होना चाहिए
कहानी: माँ सारदा के पास एक पागल भक्त आता है
इस अद्भुत विश्व का रचयिता कौन है?
एक लोभी भक्त की कहानी
मास्टर महाशय दक्षिणेश्वर में ठाकुर के सान्निध्य में रहने के लिए आते है
धर्म रक्षा के लिए तत्पर श्री रामकृष्ण: जिस उद्देश्य के लिए पैसा दान किया गया है, उसी के लिए खर्च करें
प्रश्न: साधना चतुष्टय एक अच्छा आधार है, जिसे आप व्याकुलता और धैर्य के बीच संतुलन कहते हैं.
प्रश्न: धैर्य सहित मुमुक्षुत्व और धैर्य रहित मुमुक्षुत्व में क्या अंतर है?
प्रश्न: मुझे लगता है कि स्वामीजी के चार योगों का समन्वय आपके व्याकुलता और धैर्य के बीच संतुलन के उत्तर से मेल खाता है।
प्रश्न: ठाकुर का कथामृत पढ़ना रुई के गट्ठे में चिंगारी फेंकने जैसा है। एक चिंगारी पूरी रुई को जला देगी।
प्रश्न: हम संसार के दुखों के बारे में कभी गहराई से नहीं सोचते। अगर हम सोचेंगे तो हमें समाधान अवश्य मिलेगा। हमें इस व्यावहारिक आत्म-परीक्षण की आवश्यकता है।
प्रश्न: हममें से अधिकतर लोग जीवन में संकट आने पर अध्यात्म की ओर आते हैं।
प्रश्न: सब कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि हम संकट का सामना कैसे करते हैं
प्रश्न: जैसा कि ठाकुर ने स्वामीजी से कहा, हम कब तक प्रश्न करते रहेंगे? एक समय ऐसा आएगा जब हमें विश्वास करना ही होगा।
प्रश्न: जैसा कि किसी ने कहा है, दुख छिपे हुए आशीर्वाद के समान हैं
प्रश्न: क्या हम कह सकते हैं कि संस्कार बीज हैं और दुःख उपजाऊ भूमि है?
प्रश्न: हम सभी में संस्कार हैं, अब हमें दुख के लिए प्रार्थना करनी चाहिए!