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Sri Ramakrishna Kathamrita ·

श्रीरामकृष्ण कथामृत 27 Oct 1882 केशव सेन के साथ ठाकुर का नौका विहार 20 July 2024

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ओम स्थापक चर मस्य सर्वम स्वरूपी अवतार षय कृष्णा यते अच्छा तो अभी ऐसा ठीक किया है हमने कि जब तक मेरी किताबें वगैरह नहीं आ जाती राजकोट से हम लोग एक नया टॉपिक स्टार्ट करेंगे और इस टॉपिक पर वैसे हमने पहले भी बात किया है काफी क्लासेस हुए हैं किंतु यह टॉपिक ऐसा है श्री श्री रामकृष्ण कथामृत कि इसका जितना भी चिंतन मनन स्मरण करें उतना ही कम है तो अभी तक हमने जहां तक हमारे क्लासेस हुए हैं कथामृत के ऊपर में आई थिंक मोर देन 90 क्लासेस हो चुके हैं और ज्यादा हुआ नहीं है कवर अक्टूबर 282 तक ही पहुंचे हैं अभी हम माने कि वो पहले तीन चार चैप्टर ही हुए हैं किंतु प्रत्येक चैप्टर में प्रत्येक लाइन में ठाकुर की इतना सब कुछ डिटेल है इतना डेप्थ है स्पिरिचुअल कि हम जितना उसका चिंतन करें उतना कम है तो अभी रामकृष्ण कथामृत का प्रारंभ करेंगे यह चैप्टर का नाम है श्री राम कृष्ण समाधि मंदिर है और यदि जिन लोगों के पास में अखंड कथामृत है तो तो ठीक ही है जद दो वॉल्यूम में है तो यह चैप्टर फर्स्ट वॉल्यूम में है बंगाली में है मैं पाठ करूंगा और एक के बाद एक इसका ड़ का थोड़ा सा डिस्कशन करेंगे मास्टर महाशय आपको पता है कि कथामृत के लेखक है श्रीम या तो फिर मास्टर महाशय महेंद्रनाथ गुप्त ठाकुर के पास आए थे जिस समय आए थे उस समय उनकी मानसिक अवस्था ऐसी थी कि शायद आत्महत्या भी कर बैठे किंतु ठकुर ने जैसे तार हार की तरह उनका हाथ थाम करके भव समुद्र को पार कराया और मास्टर महाशय की हैबिट थी कि पहले से ही डायरी लिखते थे डायरी मेंटेन करते थे तो जिस दिन उन्होंने ठाकुर के साथ में श्री राम कृष्ण देव के साथ में उनका प्रथम दर्शन किया उसी दिन से उन्होंने डायरी में मेंटेन करना शुरू किया है और इसका लाभ हमको आज मिल रहा है कि उन्होंने बाद में श्री राम कृष्ण देव की महासमाधि के बाद में उस डायरी में जो नोट्स लिखी थी उस नोट्स को देख देख करके एक के बाद एक कथामृत के पांच खंड प्रकाशित किए थे जबि आपको पता हो तो सर्वप्रथम कथामृत पांच खंड में पब्लिश हुआ था और जब वोह मां के पास में गए मा के पास में जाकर के उन्होंने कहा कि मां मैंने इस तरह से ठकूर की वाणी को प्रकाशित किया है और मैं चाहता हूं कि इसके कॉपीराइट बलर मठ को दे देना जिससे कि इसकी रॉयल्टी से जो इनकम होगी जो आय होगी वो ठाकुर की सेवा में वो यकृत होगी तो मां ने कहा कि नहीं आपके भी तो आपका भी तो परिवार है संसार है उसको भी तो आपको चलाना है और ठाकुर को लेकर के वो विद्यासागर के साथ में मास्टर महाशय मतभेद ऑलरेडी हो चुका था विद्यासागर की स्कूल में मास्टर महाशय टीचर थे शिक्षक थे और इसी नाते वह ठाकुर को लेकर के विद्यासागर के पास गए थे तो विद्यासागर ने कुछ समय के बाद में मास्टर महाशय को कहा कि देखिए आपके क्लास का परफॉर्मेंस धीरे-धीरे करके बिगड़ रहा है और उसका उसके पीछे का रीजन मुझे ऐसा लग रहा है कि आप दक्षिणेश्वर के जो परमहंस है उनके पास बारबार जाते हैं तो इस तरह से आप पढ़ाई में भी ध्यान नहीं दे कर के आपका खुद का जो क्लास का डेवलपमेंट है उसमें ध्यान नहीं देकर के परमहंस के पास में आप ज्यादा टाइम बिताते हैं उसी पर ज्यादा ध्यान देते हैं तो मास्टर महाशय ने इमीडिएट अभी खुद का तो को इंसल्ट कर दे तो ठीक है चलो हम किसी भी तरह से उत्तर दे दे किंतु जब ठाकुर की बात आई तो मास्टर महाशय ने कहा कि नहीं यह तो लक्ष्मण रेखा क्रोस हो गई है इमीडिएट उन्होंने रेजिग्नेशन दे दिया और फिर व फिर उनके जीवन में भी तो स्ट्रगल बहुत था आखिर में वो एक अपना एक एकेडमी एक अलग से स्टार्ट किया था जिसके की ग्राउंड फ्लोर पर और वहां पर स्कूल थी और टेरेस में बैठ करर के अकेले अकेले वो कथामृत का पाठ किया करते थे यानी कि अ कथामृत का पाठ यानी कि उनके लिए व जो डायरी थी उस डायरी को खोल करके उसके वो प्रसंग जो लिखे हुए हैं उसका ऊपर में चिंतन मनन करते थे और यहीं पर काली कृष्ण महाराज का मास्टर महाशय के साथ में मुला बात हुई थी और काली कृष्ण महाराज यानी की बाद में स्वामी विरजानंद जी महाराज हमारे संघ के एक प्रेसिडेंट पूर्व प्रेसिडेंट तो वही काली बृष्ण महाराज अभी काली कृष्ण महाराज यह सब का क्या है पता है ना कि वो दे आर द सेकंड जनरेशन ठाकुर के पास आने वाली जो जनरेशन थी ठाकुर के पास आने वाले जो लड़के थे उसके बाद में ये जैसे आखिर आखिर में जो ण है फिर यह पडू है फिर यह पूर्ण है तो उन लोगों के आगमन के बाद में ठाकुर की महासमाधि हुई उसको अगस्ट 186 तो तब से लेकर के फिर आखिर में ये विरजानंद जी यानी कि काली कृष्णा महाराज सुद्धानंद जी यानी कि सुधीर महाराज यह सब लोगों का आगमन ऑलमोस्ट 1992 93 में हुआ बाय द टाइम स्वामी जी ऑलरेडी अमेरिका पहुंच गए थे तो ये जब ये खाली कृष्ण महाराज य फर्स्ट पर्सन माने वो जो यंग लड़कों में त्यागी शिष्यों में ये त्यागी संतान लोगों की परंपरा समाप्त होने के बाद में ठाकुर के पास आने वाले वो सर्वप्रथम है अपने ऑर्डर में यानी कि सेकंड जनरेशन कहा जाएगा तो ये सेकंड जनरेशन में से बहुत सारे लोगों ने मास्टर महाशय से प्रेरणा ली थी मास्टर महाशय को वो देखते थे कितने शांत है गंभीर है इना किसी के मैंने अपना पढ़ा जो पढ़ाना है उनका जो असली कार्य है और जो अध्यापक का वह तो अच्छे से करते हैं किंतु बाद में और किसी के साथ बातचीत नहीं करके चुपचाप वह टेरेस पर चले जाएंगे लंच ब्रेक होगा कुछ भी होगा और वो डायरी खोल कर के कुछ ना कुछ पढ़ते रहेंगे तो काली कृष्णा महाराज उस समय य काली कृष्णा महाराज के भी बड़ी सुंदर कहानी है कि उन्होंने कहा कि उन्होंने सबसे पहले देखा ठाकुर के बारे में पढ़ा उने कॉन्शियसली देखा होगा कि कोलकाता की गली में व रास्ते पर बिल्डिंग के ऊपर में बड़े-बड़े अक्षरों से नगर कीर्तन होता है ऐसा एक एडवर्टाइज लिखा गया था तो उस समय रामचंद्र दत्त ने काकड़ काछी में ठाकुर के अस्थि को लेकर अस्थि को वा दे वो स्थापित करके योगो ध्यान की योगो ध्यान बनाया था ठाकुर के वहां पर नित्य पूजा होती थी और उनका बड़ा उत्साह था कि ठाकुर का नाम का प्रचार करें तो तो रामचंद्र तो नगर कीर्तन वगैरह बहुत कुछ करते थे तो उन्होंने इस तरह से वो गनी गनी में इस तरह से एडवर्टाइज डाल देते थे वो चिपका देते थे या तो बड़े-बड़े अक्षरों से लिखवा देते थे कि इस इस तारीख को यहां यहां नगर कीर्तन होगा तो काली कृष्ण महाराज ने देखा रामचंद्र दत्त के पास गए और बड़े ही प्रभावित हो गए रामचंद्र दत्त इस तरह से वो सब डिस्क्राइब करते हैं जैसे कि वही ठाकुर के प्रधान शिष्य है उन्होंने ही ठाकुर को ठीक ठीक समझा है और यह जो वो माने वही सब कुछ है ठाकुर के बाद में उन्होंने ही ठाकुर का पूरा वारसा प्राप्त किया है और ठाकुर के अस्थ भी तो योगोद्यान में स्थापित है तो कोई भी इस बात को सच मान लेगा तो काली कृष्णा महाराज वहां पर बार-बार जाते थे योगो ध्यान में रामचंद्र दत्त के पास में किंतु जब उन्होंने अपने खुद के मास्टर महाशय को देखा कि वो लंच ब्रेक होता है कि कभी भी जब कुछ काम नहीं होता है तो टेरेस पर जाकर के डायरी खोल करके क्या सब पढ़ते रहते हैं तो उनको बड़ा क्यूरियोसिटी हुआ मास्टर महाशय के ऊपर में सन्मान तो था ही उनका कितने ऋषि मुनि जैसे दिखते थे स्वभाव भी शांत थिर और गंभीर था तो काली कृष्ण महाराज टेरेस प गए मास्टर महाशय के साथ में बात किया पूछा कि डायरी में आप क्या पढ़ते हैं यह सब क्या लिखा है इसमें तब मास्टर महाशय ने कहा कि देखिए कि इसमें ठाकुर श्री राम कृष्ण देव के प्रसंग है जबकि मैं उनके पास में जाता था मैंने जो देखा मैंने यहां पर सब वर्णन किया है और जदी ठाकुर के बारे में ज्यादा जानना चाहते हो तो वराह नगर जाओ वहां भी उनके त्यागी संतान रहते हैं वही है जो भी ठाकर कोन ठीक ठीक समझे ठाकुर का जो वारसा ठाकुर का जो मेन टीचिंग त्याग और तपस्या उसका वहन उसको वहन तो यही बरा नगर के त्यागी लड़के ही कर रहे हैं रामचंद्र दत्त तो गुरु हस्त मैं खुद गुरु हस्त माश माश कहते हैं मैं खुद गुरु हस्त हम लोगों से शिक्षा नहीं लेनी शिक्षा जद लेनी है तो त्यागी संतानों से लो तो काली कृष्ण महा ने यह सुन कर के वो बरा नगर आए और बरा नगर में जाकर के वो पहली मुलाकात का व पहले दर्शन पहली विजिट का वो जो वर्णन करते हैं कि वो ग्राउंड फ्लोर प देखा वो सब वो बड़े-बड़े झाड़ जंगल जैसा वो था पूरा व वहां पर लगता था जैसे पूरा भूत का बंगला है कोई केयर टेकर जैसा लगता नहीं था किंतु जब फर्स्ट फ्लोर पे गए तो देखा एक बड़ा सा ल रूम है एक ल घर जैसा है वहां पर चटाई बिछा करके यह सब ड़ के लोग उस समय दोपहर का भोजन तो हो चुका था तो यह लड़के लोग सब ठाकुर के त्यागी संतान शशि महाराज थे निरंजन महाराज थे शायद महापुरुष महाराज भी थे ऐसे सात आठ त्यागी संतान हो गए ठाकुर के तो वो चटाई बछा करके विश्राम कर रहे थे तो जैसे ही यह काली कृष्ण महाराज गए बड़े ही स्नेह पूर्वक इनको बुलाया बिठाया शशि महाराज ने उनके साथ में बातें करना शुरू किया और शशि महाराज तो पहले पढ़ाई के बारे में पूछेंगे कि जब पढ़ाई में या स्कूल में वो तो ये छुट्टी मार करके तो यहां पे नहीं आया तो पढ़ाई लिखाई कंप्लीट करो फिर यह अध्यात्म धर्म वगैरह जो कुछ भी है वो होगा साथ-साथ में तो ठीक है काली कृष्णा महाराज इस तरह से आते रहे फिर उनको स्कूल में छुट्टी हुई समर वेकेशन नहीं कि ऐसा कुछ हुआ तो शशि महाराज ने कहा पहले तो पूछा था कि तुमको पढ़ाई लिखाई में कैसा है तुम्हारा तो काली कृष्ण महाराज ने कहा होगा कि मैथमेटिक्स में थोड़ा साय कच्चा है तो शशि महाराज ने बोल दिया जब समर वेकेशन स्टार्ट हु कि तुम अपनी किताबें वगैरह लेकर चले आना मठ में रहना मैं तुमको मैथमेटिक्स सिखाऊंगा तो वो किताबें लेकर के आए और किताबों को आखिर में जिस दिन लेकर के आए उसी दिन आखिरी बार किताब को छुआ हालांकि शशि महाराज ने कहा था कि मैथमेटिक्स वगैरह सिखाएंगे वो सब रह गया बगल में साइड पे और ठाकुर की सेवा त्यागी संतानों के साथ में कथ उप कथन र की बातें का ठाकुर की बातें सुनना यही सब में उनका दिन और समय बिता चला गया तो यह है मास्टर महाशय कितने ही लोगों को मास्टर महाशय ने ठाकुर के पास में भेजा था एक बड़ा ही इंटरेस्टिंग स्टोरी भी है कि एकने ठाकुर का भी ऐसा है देखिए कि ठाकुर हम लोग कभी-कभी कहता है ना कि हमको एंबिशन नहीं होना है जीवन में किसी भी तरह की वासना कामना नहीं होनी तो एक्चुअली ठाकुर क्या कहते हैं की कामना वासना तो होगी ही होगी रहेगी ही रहेगी सिर्फ उसका जो डायरेक्शन है उसको त्व की ओर मोड़ देना है यदि कामना करनी है तो इस तरह की कामना करनी है कि मैं ईश्वर का सबसे पहला सर्वप्रथम संतान हो सबसे उनका प्रिय संतान ईश्वर का प्रिय संतान आप कैसे हो सकते हैं प्रिय भक्त कैसे हो सकते हैं ईश्वर ने जो उपदेश दिया है या गीता में है या तो फिर उपनिषद में उसका पालन करके तो आप भगवान के प्रिय भक्त हो सकते हैं तो कामना वासना को ईश्वर की ओर मोड़ देना है रदर देन की उसको काट देना है वो तो बहुत बाद में आए वो अपने से ही दध बीज हो जाए योग शास्त्र में कहते हैं कि निर्विकल्प समाधि होने के साथ में ही या तो फिर बाद में ही यह अपने ये जो पंच क्लेश अविद्या अस्मिता राग द्वेश और अभिनिवेश उसका व दत बीज हो जाते हैं बीच यानी कि जब तक मिट्टी में वो बीज पड़ा रहेगा तब तक उसको आपको पेड़ को कितना ही काटिए उस बीज में से वो जा तो जो उसके जो रूट्स है उसमें से नए नए वो पेड़ उते ही रहेंगे निकलते ही रहेंगे किंतु जड़ समेत यदि उसको जला दिया जाए तो फिर उसमें से कुछ भी नया निकलेगा नहीं तो दग्ध बीज यानी कि उसकी जड़ मूल को जला देना कामना वासना की जड़ मूल कब जल जाएगी जब निर्विकल्प समाधि होगी अकॉर्डिंग टू योगशास्त्र किंतु जब तक वहां पे नहीं पहुंचते तब तक ये कामना वासनाओं को सात्विकता की ओर मोड़ देना है तो ठाकुर वैसे तो निर्विकल्प समाधि से नीचे आए हैं अभी वो कामना वासना है और नहीं भी है यानी कि वो पानी पे वो एक लाइन दौड़ते हैं पानी प रेखा एक जद दौड़ते अपनी अंगुल से तो कैसी एक सेकंड तक दिखेगी दूसरी ही सेकंड में वो मिट जाएगी ऐसा वो कामना वासना का दिखावा रहता है भीतर में से उसकी जड़ बिल्कुल समाप्त हो गई है यानी किय आर्टिफिशियल पौधा हम लोग आजकल लगाते हैं ना वो आजकल प्लास्टिक के वो फल मिलते हैं कभी-कभी जब असली फल खिलना मुश्किल होता है या तो फिर रखना मुश्किल होता है तो मेंटेनेंस ज्यादा होता है तो आर्टिफिशियल फूल लाकर के लोग सजा देते हैं और आजकल लोग ऐसा कहते भी है किय असली फूल कितना खूबसूरत है बिल्कुल प्लास्टिक जैसा दिखता है वो अपना वो परसेप्शन पूरा चेंज हो गया तो ऐसा वो प्लास्टिक के फूल की तरह वो असली कुछ नहीं व बाहर से दिखा हुआ एक रहेगा तो ठाकुर की भी इच्छा थी उन्होंने कहा था कि भक्तों का राजा हूं ऐसी मेरी इच्छा है तो मास्टर महाशय जब एक के बाद एक लड़को को ठाकुर के पास ले आ रहे तो ठाकुर के मन में भी एक रोप प्रकट हुआ कि देखो तो जहां से मास्टर महाशय इतने सारे लड़कों को लेकर आते हैं यदि मैं वहां पर जाऊं तो मुझे मैं अपनी ना जो मास्टर महाशय को तो कैसे मतलब कोई आकर के अभी जैसे काली कृष्ण है काली कृष्ण मास्टर महाशय के पास में पढ़ रहे थे तो उन्होंने जाकर के मास्टर महाशय को पूछा कि क्या आप क्या कर रहे हैं मतलब ये जो आप आपकी जो डायरी है उसमें आप क्या पढ़ रहे हैं ऐसा तो आप क्या कर रहे हैं तो ऐसा जद पूछेंगे तो मास्टर महाशय को पता चलेगा कि इसके भीतर में एक आध्यात्मिकता का बीज है या तो फिर एक साधक होना जाता है जब तक वो कुछ बोलेगा नहीं जब तक पूछेगा नहीं तो माश महाशय को कैसे पता चलेगा किंतु ठाकुर है ठाकुर के पास में तो एक्सरे है एक्सरे विजन है वो सीधा अपने भीतर में झाक करके देख पाएंगे कि किसके भीतर में क्या है तो मश महाशय ठाकुर मास्टर महाशय को कहते हैं तुम एक काम करो तुम मुझे अपनी स्कूल में ले चलो जहां से तुम इतने सारे लड़कों को लेके आते हो तो मैं वहां पे जा कर के देखूंगा कि और कितने कितने अच्छे लड़के हैं सबको पकड़ कर के मैं अपने वश में कर लूंगा ये शब्द मेरे ठाकुर के नहीं तो मास्टर वहां से थोड़ा सा चिंता में पड़ गए ऑलरेडी देखिए कि ये जो नारायण वगैरा है व जो ठाकुर के पास में आते थे तो घर में उनके उ उनकी पिटाई भी करते थे कभी-कभी पेरेंट्स तो और ऑलरेडी ये बातें फैलना शुरू हो गई थी गिरीश भोस ने एक बार कहा था कि मास्टर महाशय ये सब लड़कों को लेकर के ठाकुर के पास में लाते हैं तो ठाकुर बड़े नाराज हुए बोला कि इसके बारे में तुम ज्यादा मुंह पर मत बोलो सबके सामने मत बोलो चुप रहो ऑलरेडी मास्टर महाशय का एक तरह से निंदा शुरू हो गई थी कि लोगों लड़कों को पकड़ कर के दक्षिणेश्वर के जो पागल पागल जो एक परमहंस है उसके पास में ले जाते हैं और फिर ये परमहंस लोगों का ब्रेक बुश करके यंग लड़कों का अपने पास में रख देते हैं ऐसी बात ऑलरेडी फैलना शुरू हो गई थी तो जब ठाकुर ने ऐसा कहा यहां तक तो ठीक है कि मास्टर महाशय ऐसे उनके पास में जो आते हैं जिन्होंने अपने मुंह से स्वीकार किया है कि हां मुझे आध्यात्मिकता के के बारे में मुझे रस है ज्यादा जानने के लिए उनको मास्टर महाशय जद लेके आते हैं तो तो एक चीज होगी ठाकुर जद एक स्कूल में आ करर के लड़के को देखेंगे और किसी लड़के प अपना जादू चलाएंगे और उसको पकड़ के ले जाएंगे तो तो कितनी बड़ी मुसीबत होगी मास्ट मा से थोड़ा सा सोच में पड़ जाए कि ठाकुर ने जब ऐसा कहा है तो अभी क्या उत्तर दिया जाए क्या किया जाए फिर थोड़ी देर के बाद उन्होंने कहा अच्छा ठीक है एक काम कीजिए और भी तो बहुत सारे वीआईपी है वहां प विजिट के लिए आते हैं जैसे वो स्कूल में जैसे वीआईपी जाता है तो आप भी आइए आप भी इस तरह से विजिट के लिए आइए तो अभी मुझे पता नहीं कि ठाकुर एक्चुअली माश माश की स्कूल में विद्यासागर की स्कूल में विजिट के लिए गए थे कि नहीं किंतु इस तरह का वार्तालाप इन दोनों में अवश्य हुआ था तो एक तो है कि मास्टर महाशय फिर जिस तरह से देखिए कि विद्यासागर के स्कूल से मास्ट वास ने रिजाइन दे दिया था विद्यासागर को ठाकुर मिले तो ठाकुर ने कहा कि इसको पता नहीं है कि भीतर में सोना छुपा हुआ है बाहर में यह सब सत कार्य कर रहा है किंतु जिस दिन भीतर का उसको असली आस्वादन मिल जाएगा तब बाहर की चीजों को वो भूल जाएगा अभी विद्यासागर और ठाकुर की मुलाकात ठकुर क्या वो जो इतना सुंदर वर्णन कथामृत में है विद्यासागर हालांकि बाहर से ठाकुर को तो बड़ा ही सम्मान देते हैं किंतु शायद भीतर भीतर में से उन्होंने ठाकुर की महत्ता को स्वीकार नहीं किया था अदर वाइज तो क्यों वो मास्टर महाशय के पास में से रेजिग्नेशन ले लेते नर के साथ में भी यही हुआ स्वामी जी स्वामी विवेकानंद का बचपन का नाम नरेद नरेद के पिताजी का देहांत हो गया स्कूल में पढ़ाई कर रहा है घर में मां है छोटे भाई है बहन है उनके खाने के क्या होगा वही सबसे बड़ा लड़का है अभी उसी के ऊपर में सब कुछ पूरा भार है तो किसी की रिकमेंडेशन से शायद मास्टर महाशय की रिकमेंडेशन से विद्यासागर की स्कूल में एज ए टीचर उनको एडमिशन मिल गया एज ए टीचर उनको जॉब मिल गई तो वो टीचर का काम विद्यासागर की स्कूल में कर रहे थे यह पिताजी के देहान के बाद की बात है ठाकुर उस समय शायद जीवित थे तो अभी विद्यासागर की स्कूल में जा रहे हैं और नरेंद्र की जो प्रतिभा है वो तो मैंने सर्वतो मुखी प्रतिभा जिस क्षेत्र में वो हाथ डालेगा वो सक्सेस होना है तो एस ए टीचर नरेण यानी कि स्वामी जी इतने मतलब इफेक्टिव थे इतने पॉपुलर थे बाद में तो हमने देखा विदेश में जाकर के कितने सारे लोगों को उन्होंने शिक्षा दी पूरे विश्व में कुन करके तो वो जो प्रतिपा थी उनकी वो तो उसी समय से वो प्रकट हो रही थी तो सभी बच्चे उनसे प्रभावित हो गए थे तो यह देख कर के विद्यासागर का जमाई उनकी बेटी का पति पति विद्यासागर की लड़की का पति विद्यासागर का जमाई वो उसके भीतर में बड़ा ही ईर्षा का आविर्भाव हुआ उसने सोचा कि मैं तो विद्यासागर का यह हूं मैं वारस हूं विद्यासागर के मृत्यु के बाद में ये स्कूल वगैरह शायद मुझे ही मिलेगा ऐसे उसकी सोच थी किंतु यदि नरेण इतना अच्छा काम कर रहा है एज ए टीचर इतना पॉपुलर हो रहा है तो हो सकता है शायद कि विद्या सागर इससे प्रभावित होकर के नर को सब स्कूल वगैरह देके जाएंगे तो मैं तो रह जाऊंगा मेरा क्या होगा तो उसने क्या किया ईर्षा के मारे नरेंद्र के ऊपर में द्वेष करके विद्यासागर के पास करके सब कंप्लेन करना शुरू किया कि यह लड़का वही उने पता नहीं क्या कंप्लेन किया मैं तो अनुमान करके कह रहा हूं कि शायद वही ठाकुर का नाम लेकर ही कंप्लेन किया होगा कि जैसे वो मास्टर महाशय थे लड़कों को ब्रेन वश करते थे वो दक्षिणेश्वर के परमहंस के पास में भेज के तो यह लड़का उसी दल का है वो भी इसी तरह से ब्रेन वश कर रहा है आप यदि उसको निकालेंगे नहीं तो पता नहीं क्या क्या मुसीबत आपत्ति हम रे सर प आ जाए यह समय अनुमान करके कह रहा हूं तो जो भी है विद्यासागर ने नरेंद्र को वहां से निकाल दिया या तो फिर नरें ने ही समझ कर के रिजाइन दे दिया जो भी है वो एकट डिटेल अभी मुझे पता नहीं पढ़ा नहीं है मैंने किंतु जो भी है तो स्वामी जी जब अमेरिका गए तो उन्होंने जब कहा कि भारतीय लोगों में इतनी ईर्षा है कि अपना एक भाई जो कि पर में आ रहा है यदि वह प्रगति कर रहा है तो सब मिलकर के उसके पैर खींच के उसको जमीन प पटकने का प्रयास करेंगे यह बात का मैंने स्वामी जी को पहले से ही अनुभव हो चुका था माने अमेरिका जाकर के वो मजूमदार को मिले मजूमदार था यह ब्रह्म समाज का नेता उस समय का तो पहले तो मजूमदार ने सोचा अरे ये क्या वेगे बंड लड़ता है ये स्वामी जी अपने बारे में वेगे बंड शब्द अपने से ही प्रयोग करते हैं वेगे बंड अर्थात की जो मारे मारे सब जगह पर घूमता है बिना किसी काम के वो कहीं ना कहीं जाकर के ट्रबल खड़ी करेगा ट्रबल मेकर तो वो विद्या पहले तो मजूमदार ने स्वामी जी को बिल्कुल यही कर दिया मने आउट ऑफ हैंग उनको कि ऐसे कितने ही लड़के घूमते रहते हैं किंतु बाद में जब स्वामी जी सही में वर्ल्ड फेमस हो गए तो मजूमदार ने ईर्षा के मारे भारत में जाकर के स्वामी जी के बारे में जितने भी झूठ है वो सब फैलाने शुरू किए कि यह दुर्गुण है नरेंद्र में वो दुर्गुण है वो सब अखाद्य खाना खाता है ऐसा ना जो कि हिंदू लोगों को नहीं खाना चाहिए ऐसा वर्तन जो कि हिंदू सन्यासी नहीं करते ये सब उसने कहलाना शुरू किया तो स्वामी जी ईर्षा के बारे में भारतीयों में इतनी ईर्षा है ये है वो है ये सबके बारे में पत्र में जो कुछ लिखते हैं तो पहले पहले मेरा ऐसा अनुमान था कि ये मजूमदार वगैरह का बिहेवियर देख कर के या तो फिर ये थियोसोफिकल सोसाइटी है इन लोगों का बिहेवियर देख कर के वर्तन देख कर के स्वामी जी ने यह सब कहा होगा किंतु स्वामी जी को ईर्षा का द ष का जो दंश होता है ना वैसे वो ईर्षा का दन स्वामी जी को पहले ही हो चुका था विद्यासागर की स्कूल में तो ये यह है पूरी मास्टर महाशय और यह कथामृत की कहानी कि किस तरह से यह कथामृत ने सालो सालों से कितने ही ज्ञान पि पासुओ को साधकों को गाइड किया है रास्ता दिया है तो यही कथामृत पाठ करते हैं प्रकरण का नाम है श्री रामकृष्ण समाधि मंदिर है आज उजागर लक्ष्मी पूजा आज उजागर लक्ष्मी पूजा है शुक्रवार सा अक्टूबर 18826 अक्टूबर घर में विराजमान है विजय कृष्ण गोस्वामी और रोना शहित कथा वार्ता कोन विजय मष्ण गोस्वामी एक बड़ा ही फेमस नाम राम कृष्ण संघ के जितने भी भक्त है उसके बारे में उन्होंने पढ़ा ही है विजय का एक बड़ा ही सुंदर छोटा सा एक इंसिडेंट है कि वह कहां वह ढाका वगैरह कहां कहा गया और फिर आखिर में जाकर के ठाकुर के पास में आकर के कहता है कि महाशय हम लोग सोचते थे कि कलकाता के पास में ही यदि आपके जैसे महापुरुष का निवास स्थान है तो यदि हम कहीं जंगल में वन में पहाड़ में जाएंगे तो आपसे कितने बड़े-बड़े महात्मा कितने बड़े-बड़े साधक सिद्ध लोगों का दर्शन होगा किंतु सब कुछ घूम कर के आया यहां पर जो सत्ता विराजमान है ठाकुर को कहते हैं यहां प जो सत्ता विराजमान है उसके जैसा और कहीं नहीं देखा तो वही विजय कृष्ण स्वामी और फिर यह हरदा अभी ये विजय कृष्ण का ए भी एक है कि ब्राह्मण समाज में केशव चंद्र सेन के साथ में उनके वो वन ऑफ द लीडर्स ब्रह्मो समाज के एक नेता थे किंतु केशव और ब्रह्मो समाज के कुछ कुछ नियम थे उसमें ये जो मिनिमम मैरिज एज यानी कि लड़कियों की मिनिमम एज ये जो बाल्य विवाह प्रथा य रिफॉर्मेशन के बारे में सोशल रिफॉर्मेशन के बारे में इन लोगों का बड़ा विश्वास था ब्राह्मण समाज का कि ये ईश्वर वगैरह तो ठीक है पहले सोसाइटी को रिफॉर्म करना चाहिए यह जो सती प्रथा है यह बाल्य विवाह प्रथा है विधवा का विधवा के ऊपर में इतने अत्याचार हो रहे हैं यह जो सब कु प्रथाएं हैं भारत की वह सब बंद करनी चाहिए ब लड़की की मिनिमम मैरेज एज ये होनी चाहिए ऐसा करके पूछ रखा था 12 ना कि 14 की ऐसा कुछ जोक बहुत ज्यादा थी उसके समय में मां का विवाह तो 5 साल 6 साल की उम्र में हुआ था ये तो हालाकि मां और ठाकुर की बात अलग है इस इस इशू के साथ में उनका कोई लेना देना नहीं कि तो जो भी है बाकी सब लड़कियों के साथ में तो ये अत्याचार होता ही था तो एक तरह से ये बात ठीक भी है कि सोशल रिफॉर्म होना चाहिए किंतु रिलीजन इज रिलीजन ये जो अपने भीतर में अपने भीतर के अंतर सागर जो है अंतः महासागर जो है उसके भीतर में डुकी दे देना जगत को भूल जाना संपूर्ण रूप से ईश्वर मय हो जाना ये पूरा जगत ही अलग है सको वो बाह्य रिफॉर्मेशन के साथ में क्या ले दे बाह्य रिफॉर्मेशन होने चाहिए कि नॉट एट द कॉस्ट ऑफ स्पिरिचुअलिटी जो स्पिरिचुअल है वो स्पिरिचुअल है वो फिर स्पिरिचुअलिटी में सिद्धि प्राप्त करके वापस आ कर के लोगों को उपदेश दे वो एक चीज है किंतु ठाकुर ने जैसे कहा है कि काली मंदिर में काली काली घाट गए कोलकाता में काली घाट है बड़ा फेमस काली मंदिर है वहां पे तो काली घाट यदि आप दर्शन के लिए गए तो क्या काली मा काली कैसे भी करके भीड़ है तो धक्का मुखी करके पहले मां काली दर्शन कर लेंगे ना कि बाहर में जो भिखारी लोग बैठे हुए हैं उनको भिक्षा देंगे वोने भिक्षा देते देते वो मंदिर बंद हो जाएगा दर्शन रह जाएगा पहने कैसे भी करके दर्शन कर लो बाद में जो भी भिक्षा वगैरह देना है देते रहना तो ठाकुर का वो था उपदेश तो ये ब्रह्म समाज हों का कि मिनिमम मैरेज एज एक होनी चाहिए लड़कियों की किंतु अब केशव सेन हालांकि ब्राह्मण समाज का सर्वोच्च नेता है उसने नौका देख कर के वो किसी राजा के जमींदार के लड़के के साथ में अपनी बच्ची का विवाह होता होता देख कर के उसने इमीडिएट अपनी बच्ची का विवाह करवा दिया जोक मैरेज एज से उसकी उम्र थोड़ी सी कम थी खुद की बच्ची की अभी क्या पिताजी तो अपनी बच्ची का भलाई ही देखेंगे ना इतना बड़ा घर में जद विवाह हो रहा है इतने धनवान घर में वो जमींदार का लड़का ना कि ऐसा कुछ था तो उसके घर में जद विवाह हो रहा है तो फिर वो मैं उसकी उम्र वगैरह कौन दिखता है कैसे भी करके लड़की को उसके ससुराल भेज दो वो भी सुखी रहेगी हम भी शांत हो जाए कि चलो एक ना पूरा जीवन का एक पूरा खत्म हुआ एक बहुत बड़ा कर्तव्य तो उसने तो यह विवाह कर दिया किंतु यह विजय कृष्ण गोस्वामी और यह जो तीन चार दूसरे लीडर थे उन लोगों को लगा कि यह अपने ही नियम का पू करके वह नेता के रूप में कैसे रह सकता है तो उन्होंने कहा कि या तो यह तो आपने बड़ा गलत काम किया है जो मिनिमम जज है मैरिज की उससे भी कम उमर की लड़की का आपकी खुद की लड़की का यदि आपने विवाह कर दिया तो हम दूसरे लोगों को जाकर क्या कहेंगे कि आप अपनी लड़की का विवाह छोटी उम्र में मत करवाइए तो ऐसा करके फिर दो दल हो गए ये केशव सेन और दूसरे लोग जाकर के एक साधारण ब्राहमम समाज का गठन किया और फिर विजय कृष्णा गोस्वामी विजय कृष्ण गोस्वामी और बाकी उसके मत के जितने भी लोग थे केशव सेन से नाराज होकर के सेपरेट होकर के साधारण ब्राह्मण समाज का गठन किया स्वामी जी जिस ब्राह्मण समाज में जाते थे वो यही साधारण ब्राह्मण समाज विजय कृष्ण गोस्वामी का जिसके वो लीडर थे और फिर इस बात से नाराज होकर के केशव सेन ठाकुर के पास आकर के कंप्लेन करके कहता है कि देखिए महाशय कि वो तो चला गया यानी कि ये जो विषय कृष्ण गोस्वामी वगैरह जो है वो साथ साथ में मेरे बहुत सारे शिष्यों को भी दे दिया और इतना ही नहीं मेरा एक राइवल एक दूसरा एक ब्रह्म समाज खड़ा किया है तब अकर ने कहा कि देखो तुम बिना सोचे समझे शिष्य बनाते हो मने दल बढ़ाने के लिए संख्या बढ़ाने के लिए इसीलिए ऐसा होता है है तो फिर बाद में केशव सन ने अपने ब्रह्म समाज का नाम बदल कर के ना कि नव विधान व ब्रह्म समाज ने कि ऐसा कुछ दिया था जो भी है उस समय के बाद में किंतु ब्राहमम समाज का अस्तित्व धीरे-धीरे करके समाप्त हो गया जैसे इस तरह से वो जो डिवीजन वगैरह हुए थे तो यहां पर वही विजय कृष्ण गोस्वामी ठाकुर के साथ में बैठ कर के वार्तालाप कर रहे हैं उसी दौरान एक जॉन आशिया बोली ले एक व्यक्ति ने आकर के कहा कि केशव सन जहाज कोरिया टे उपस्थित केशव सन एक जहाज में बैठ कर के यहां पे काली मंदिर के जो चांदनी घट है वहां पे आकर के उपस्थित हुए हैं काली मंदिर का यदि दर्शन किया होगा कलकाता के पास में ही है दक्षिणेश्वर में तो आपको पता होगा कि बहुत छोड़ी गंगा के किनारे ये काली मंदिर है और गंगा का किनारे पे जो घाट है काली मंदिर का दक्षिणेश्वर काली मंदिर का उसका नाम था चांदनी तो चांदनी के घाट पर केशो सेन जहाज लेकर के आकर के उपस्थित है केशर शिरा प्रणाम कुरिया बोली बन केशव के शिष्यों ने प्रणाम करके कहा महाशय जहाज ऐसे आपना के जेते होवे महाशय जहाज आया है आपको आना पड़ेगा चलो बन आइए थोड़ा सा घूम कर के आते हैं केशव बाबू जहाज अ आमार पाने केशव बाबू जहाज में है नेे जा देखिए कि उस समय का एक था कि नौका विहार करते करते ईश्वर का नाम गुण कीर्तन करते करते आप गंगा में जा रहे हैं नौका में बैठ के कितना सुंदर लगेगा तो स्वामी जी जब आखिर आखिर में जब बीमार थे उस समय डॉक्टर ने यह परामर्श दिया था कि आप एक काम कीजिए गंगा में नौका लेकर के थोड़ा सा विचरण कीजिए उससे ये जो ये जो धीरे-धीरे करके जो नौका हिलती ढलती है गंगा का जो वो जेंटल वेव्स जो होते हैं तरंगे उसमें जो नौका हिती बुलती है और वो जो खुली हवा खुला आसमान चारों और प्राकृतिक नजारा सुंदर दृश्य यह देख कर के आपके मन को थोड़ा सा शांति मिलेगा और और आपको दवाई की वजह इससे ज्यादा आपके रोग को आराम होगा तो उस समय स्वामी जी इस तरह से स्वामी जी के लिए बेल मठ के द्वारा एक नौका का बंदोबस्त किया गया था और ये शरद चंद्र चक्रवर्ती जो कि स्वामी शीष संवाद के प्रण था वो स्वामी जी के साथ में इस तरह से नौका विहार में गए हैं एक दो बार और बहुत सारा वार्तालाप स्वामी जी का उन्होंने इस तरह से वो नोट डाउन किया है तो वो एक बड़ा ही सुंदर प्रथा है कि सुंदर नग है चारों ओर प्राकृतिक दृश्य है बड़ा खुला आसमान है तो चलो बड़ी सी नौका लेकर चलते हैं साधक लोग होंगे साथ में हो सकता है कि कोई आध्यात्मिक चर्चा करेंगे या तो फिर भगवान का नाम गुण कीर्तन करेंगे कितना सुंदर मने गंगा में कितना मजा आएगा तो वैसे ही केशव सेन उस दिन ठीक किया कि जहाज लेकर चलते हैं दक्षिणेश्वर जाते हैं वहां से परमहंस महाशय को ले लेंगे और फिर वो जो ठाकुर जो भी उपदेश दे सुनते सुनते गंगा में विचरण करेंगे तो इसीलिए वो करके चांदनी के घाट पर खड़े हैं वो अपने शिष्यों को भेजा जाओ जाकर के ठाकुर को आमंत्रित करके ले आओ बेला चार का बाजिया गया छ शाम के 4 बज गए हैं ठाकुर नोका कुरिया ज उ एक छोटी सी नौका लेकर के ठाकुर जहाज के पास में आए और फिर जहाज में उन्होंने व वहां पर उठे जहाज में उन्होने उठे संगे विजय साथ में विजय है नोका समा जैसे ही ठाकुर ने नौका में पैर रखा वैसे ही वो बाक्य शून्य हो गए समाधि स्थ हो गए मास्टर जहाज दाईया सेही समाधि चित्र देखीते छ मास्टर महाशय भीते व प उन्होंने देखा कि ठाकुर जहाज में प्रवेश करके ही समाधि स्त हो गए हैं और यह सुमधुर चित्र मास्टर म से देख रहे हैं हम भी थोड़ा सा इमेजिनेशन करके वही दक्षिणेश्वर में चांदनी के घट के पास में जहाज में गंगा में विचरण कर रहा है सुंदर ला नील आकाश है चारों प्रकृति का सौंदर्य जहाज में ठाकुर स्वयं ईश्वर स्वयं ीन लोक के कर्ता स्वयं समाधि स्त होकर के खड़े हैं यह दृश्य जिन्होंने देखा होगा वोह कितने फॉर्चूनेटली हमारे पास में वह भाग्य तो नहीं इस आंखों से इस दृश्य का दर्शन करना किंतु मास्टर महाशय की ये जो वाणी है वाणी से उसका श्रवण अवश्य दर् सक और अपनी कल्पना की डान से वहां जाकर के इस ब्रह्म भक्तो में से एक बन कर के वहां पर बैठ कर के ठाकुर की अमृत वाणी का श्रवण करने का एक अको एक अपॉर्चुनिटी मिलता है तो मास्टर वही जहाज में खड़े खड़े काता य सुमधुर समाधि चित्र देख रहे हैं तेली बेला टार समय केशवी जहाजे चड़िया कोलकाता होते आया दोपहर को 3 बजे केशव ने जब जहाज रवाना किया होगा कोलकाता से उसी समय से मास्टर महाशय जहाज में थे केशव केसेन के साथ में और वह भी वहां पर आए हैं ब्रह्म भक्तों के साथ में जद केशव सेन और मास्टर महाशय के बीच में रिलेशन फैमिली रिलेशन एक्सेप्ट डिटेल में ूल गया हू किंतु दोनों के बीच में फैमिली रिलेशन था तो इस है मास्टर महाशय जब पहली बार ठाकुर के साथ में वार्तालाप होती है तो ठाकुर पूछते हैं कि अच्छा बताओ तो केशव कैसा है पहले दिन तो नहीं सेकंड शायद दूसरे तीसरे दर्शन के दौरान की यह बात है ठाकुर पूछते हैं कि केशव सेन कैसा है तो मास्टर महाशय ने कहा अच्छा है तो उस समय ठाकुर ने कहा था कि देखो मैंने मां के लिए मां के पास में उसके लिए डाब चीनी की मिन्नत मानी है डाब यानी कि ये खोपरा कोकोनट और चीनी यानी कि शुगर ये कोकोनट और शुगर की मिन्नत वानी है मां के पास में यदि केशव सेन अच्छा हो जाएगा तो ये मैं मां को ऑफर करूंगा यदि केशव को कुछ हो गया तो मैं कोलकाता में किसके घर जाकर के वार्तालाप करूंगा किसके साथ में भक्तो को मिलकर के आनंद करूंगा ऐसा बाद बाद में तो ठाकुर के बहुत सारे भक्त हो गए थे कलकाता में किंतु यह पहले पहले दिनों की बात है तो वही केशव सन और यही मास्टर महाशय मास्टर महाशय भी जहाज में आए बड़ो शद देखी बेन ठाकुर ओ केश बेर मिलन तहा देर आनंदो सुनी बेन ता देर करता मन में बड़ा उत्साह है मन में बड़ी इच्छा है कि ठाकुर और केशव का मिलन देखेंगे दोनों के बीच में क्या वार्तालाप हो रहा है क्या आनंद प्रमोध हो रहा है वोह देखेंगे और सुनेंगे पता है कि केशव सेन बड़े प्रख्यात नेता है उस समय के क्वीन विक्टोरिया लंडन जब गए थे क्विन विक्टोरिया ने स्वयं उनका सन्मान किया तो यह वो केशव और यहां पर श्री राम कृष्ण देव स्वयं जिनको कि उन्होंने अपना गुरु अपने इष्ट के रूप में स्वीकार किया है तो ये दो महापुरुष का मिलन एक मिलन इस तरह से मास्टर महाशय ने देखा था ठाकुर और विद्यासागर के बीच में तो यह दूसरा दो महापुरुषों का मिलन देखने की उनके मन की बड़ी ही साध है बड़ा ही बड़ी ही इच्छा है केशव और ठाकुर का मिलन देखेंगे देखेंगे कि किस तरह से ये दोनों लोग वार्ता लाभ कर रहे हैं केशव ताहर साधु चरित्र और भक्ता बले मास्टर न्याय अनेक बंगी जुबक नन करया केशव ने अपने साधु चरित्र और वार्तालाप की मदद से बंगाल के मास्टर महाशय जैसे बंगाल के अनेक लड़कों का मन हरण किया है उनको उनके ऊपर में अपना प्रभाव विस्तारित किया है अनेक तहा के परम आत्मीय बोधे हदय भार भाषा दिया छ बहुत सारे लोगों ने अपने परम य के रूप में केशव को स्वीकार किया है केशव के ऊपर में उनकी श्रद्धा है केशव अंग्रेजी पढ़ा दो अंग्रेजी दर्शन साहित्य पढ़िया छ केशव ने अंग्रेजी में दर्शन शास्त्र वगैरा का अभ्यास किया है नीया बार देव देवी पूजा के अनेक बार पौत लिकता बोलिया छन उस समय की जो प्रथा थी बहुत बार ये देव देवियों की पूजा को पौत लिकता या तो फिर ये वशिप या तो आइकन वशिप य इस तरह से वो उसकी निंदा करते थे उसकी तुता करते थे और यहां पर ठाकुर है जो कि काली के पुजारी है दोनों के बीच में कहा उने कहा ठाकुर बिल्कुल अपने भारतीय बंगाली गांव के पढ़े लिखे गांव में बड़े हुए पढ़ाई लिखाई के नाम पर बेचारे का कुछ है नहीं दरिद्र अनपढ़ ब्रामीण उन्होने सिर्फ अपनी आत्म चेष्टा से आत्म प्रयास से उन्होंने ईश्वर दर्शन किया और यहां पर केशव है कि जो कि आधुनिक समय आधुनिक युग और आधुनिक जो लर्निंग वगैरह है उसमें उन्होंने बड़ा ही अपना नाम किया है तो यह पूरा पूर्व और पश्चिम का मिलन मने दो अपोजिट लोग नहीं हो सकते थे उस समय कलकाता में है तो परफेक्ट अपोजिट का मिलन यह मास्टर महाशय को देखना था तीनी आबाद देव देवी के अनेक बार तलिता बोलिया छन बहुत बार देव देवियों की पूजा को मूर्ति पूजा बोलकर करके उसकी निंदा की है ए रूप लोग श्री राम कृष्ण के ति श्रद्धा को बार माझे माझे दर्शन कोरीते आन एटी विस्मय करर व्यापार बटे इस तरह के लोग ठाकुर को श्रद्धा भक्ति करते हैं ठाकुर को बीच-बीच में दर्शन करने के लिए आते हैं उनका वार्तालाप उनके अमय उपदेश सुनने को आते हैं यह एक विस्मय करर घटना ही है तहा देर मनेर मील न खाने बा केमन करिया होतो रश करी दे करते मास्टर आदि अनेकी कोपला प्रांतो पया छन इन दोनों के मन का मिलन कैसे हुआ कहां पे हुआ इस रहस्य का भेद करने के लिए रहस्य मोचन करने के लिए मास्टर जैसे बहुत सारे लोग विस्मित है कौत हल आक्रांत है कौत हल यानी कि क्यूरियस बड़े ही क्यूरियस है कि कहां प ये इष्ट और यह कहां पे वेट इन दोनों का मिलन कैसे हुआ हालांकि यदि सही सही इष्ट और वेश का मिलम देखना है तो वह नरेण उमा ठाकुर का था क्योंकि वो केशव तो फिर भी उसका इंटेलेक्ट का एक सीमा नरेंद ने जिस तरह से पश्चिमी विद्या पश्चिमी सभ्यता को जिस तरह से वह समझ लिया था जिसको ग्रास किया था वो नरेंद्र जब ठाकुर को अपने गुरु के रूप में इष्ट के रूप में स्वीकार करते हैं वो तो बात ही अलग है तो वो तो खैर मास्ट महासने वो सब तो देता ही था किंतु उस समय जबक जिस दिनों की यह सब बातें हैं उस समय नरेंद्र की महिमा इतनी ख्यात नहीं थी इसीलिए केशव सेन और मां ठाकुर इन दोनों का मिलन कैसे हुआ कहां हुआ यह कतन यह क्यूरियोसिटी बहुत सारे लोग की अच्छा तो आज यही तक समाप्त करते हैं कल तो संडे है अभी हम मिलेंगे नेक्स्ट मंडे शोमा मने ठाकुर ने क्यों ऐसा नहीं कहा कि केशव ठीक हो जाए देखिए ठाकुर ने खुद भी कहा है कि तीन बातें हमार गाय काटा बीत मने तीन बातों से मेरे अंग में मेरे शरीर में कांटे लगते हैं गुरु कर्ता और बाबा जो कोई मुझे गुरु बोलता है कोई कर्ता बोलता है या कोई बाबा बोलता है यानी कि उनसे कोई मने जागतिक अपेक्षा रखता है रदर देन की कोई आध्यात्मिक अपेक्षा रख जागतिक अपेक्षा रखता है फिर ठाकुर ने कहा है ना कि ईश्वर तीन बात में हंसते हैं जब वो वैद्य कह देता है कि चिंता मत करो आपके लड़को को मैं ठीक कर दूंगा तो जो ठीक करने वाला मारने वाला तो ईश्वर है वो खुद क्या यानी कि अपने ठाकुर ने इस हद तक शरणागत हो गए थे कि अभी देखिए कि माने यह तो जागतिक विषय में हो गया आध्यात्मिक विषय में भी ठाकुर बोलते हैं एक बार समाधि में किसी के कंधे प या किसी की छाती प पैर रख दिया अभी यह तो उनके फ समाधि में तो वो तो पूरे मानी उनके शरीर में आविर्भव होती है तो समाधि समाप्त होने के बाद में ठाकुर कहते हैं कि अरे मैं जब ऐसा कुछ करता हूं तो फिर मुझे शर्म आती है कि अरे मैंने ऐसा क्यों कहा एक्चुअली उन्होंने तो ऐसा कुछ नहीं कहा है किया है वो करने वाले तो य जो उनके भीतर में जो माथ उन्होंने किया तो जब तक ठाकुर वो जो बाह्य भाव में रहेंगे तब तक तो कुछ भी आशीर्वाद देना या ऐसा करना ऐसा नहीं करेंगे वो तो जब मां का आविर्भाव होगा तब ऐसा कुछ होगा राइट जब वो समाधि में चले जाएंगे मां का आविर्भव हो तब ठाकुर जो चाहे वो कर सकता है माने मरे हुए को भी जिंदा कर सकते है उसम कोई फिर वो लक्ष्मण रेखा जैसा नहीं बाह्य भाव से इसलिए मने समाधि या तो कोई आयर कॉशसनेस में नहीं जा करके इसलिए कि देख की के प्र मां के पास में प्रार्थना तो कर सकते हैं यानी कि ठाकुर कह सकते हैं कि मैं मां के पास में प्रार्थना करता हूं ठकर यह नहीं कहेंगे कि मैं ठीक करूंगा ट य दो डिफरेंस जब वो अमृत यानी की उनका लड़का केशव का लड़का वो जब कहता है कि ठाकुर को की उनको आप सर पर हाथ रखिए यानी कि ठाकुर खुद उनको ठीक करेंगे और वहां पर ठाकुर ने मां के पास प्रार्थना की है तो मां केस तो किसी भी चीज के बारे में प्रार्थना कर सकते हैं ट इ वन थिंग यहां तक की जब हृदय ने कहा कि जाइए जाकर के थोड़ी सी दई मांगी मां के पास में तो वो भी मांगने को पहुंच ग थे माने कुछ विचित्र दश्य दिखा दिया वो अलग बात है किंतु वो भी तो मां के पास में मांगने को पहुंच गए है ना तोव मां के पास मांगना एक चीज है अपने खुद से हाथ रखना अपने खुद से वो आशीर्वाद ना वो ट डिफरेंट डिफरेंस एटीट्यूड में जैसे हमने कल डिस्कस किया था ना कि एक्शन में हमको डिफरेंस नहीं दिखेगा डिफरेंस हमको दिखेगा एटीट्यूड में एक हम पूजा के रूप में कर रहे हैं मानवी को ईश्वर देख कर के मानवी के भीतर में ईश्वर की पूजा जो कि राम कृष्ण मिशन का एटीट्यूड है और अभी जैसे देखि ईश्वर चंद्र विद्यासागर जो कर रहे थे वही हम कर रहे हैं एक तरह से जद देखे लोग भी स्कूल चला रहे हैं तो आप बोलेंगे कि ठाकुर ने तो ये मना किया है ना देखिए ये चक्कर में अपने डायरेक्ट डिसाइल भी फस गए थे वो बोल रहे हैं कि नरेंद्र ये सब क्या करें ठाकुर ने जिस बात का विरोध किया है स्पष्ट शब्दों में विरोध किया है इन माने कोई गोल गल घुमा करके ना कि इस तरह सेने स्पष्ट शब्दों में जिसका विरोध किया है कि पहले काली घर में गए काली घाट गए हैं तो कैसे भी करके धक्का मुख करके मां काली का दर्शन कर लीजिए बाद में जो भी आपको दान दक्षिणा देना है दो तो ये सब ठाकुर की पूजा छोड़ कर के स्वामी जी बोलते हैं कि भक्ति मुक्ति को मारो गोली जन्म जन्मांतर तक नहीं मिलेगी कोई चिंता नहीं मैं गरीब लोगों के लिए अपने प्राण में छावर कर दूंगा गोस इन कंप्लीट अपोजिट डायरेक्शन किंतु यहां पर प्रॉब्लम क्या है कि जैसे हमने कहा कि अधिकारी भेद कि ईश्वर में मगन हो जाना तभी संभव है जब हम सात्विक है सत्व का आवे मने सत्व का हमारे भीतर में मेजोरिटी जो फीलिंग है वो सात्विक है तभी यह सब होगा जद रजस और तमस में है तो वो हम लोग बाहर से वो कपड़े पहन कर के वो तिलक लगा कर के वो जो वो एक चादर ओड़के माला लगा कर के हम फिर दूसरों को ठग ही श्वर श्रद्धा भक्ति या साधन भजन तो कुछ होगा नहीं लोगों को ठग लोगों को झूठ मुठ का पैसा लोगों के पास में से निकालेंगे जैसे हाजरा था हाजरा वहां ठाकुर के घर के सामने बैठा रहता था बड़ी वो पीतांबरी पहन के वो माला जपता रहता था आशय यह था कि कुछ देना था रुण था कुछ तो कोई बड़ा आदमी फस जाए उसके चक्कर में तो पैसा वगैरह उसके पास में से निकाल दे तो ये मने वो सब हो जाए बेटर है कि अपना वो जो रजस और तमस में से पहले सतो में आओ अपने मन को विराट बनाओ पूरे विश्व की चिंता पूरे विश्व के प्रति सहानुभूति करुणा अपने भीतर में प्रकट करो तब तो कहीं जाकर के यह विश्व के जो नियंता है ईश्वर उनके प्रति हमारा मन धावित होगा यानी ये सर तमस में से रजस में जाने की यात्रा है सा साधना या आध्यात्मिकता सही सही शब्दों में से ही स्टार्ट होती है ज जब तक हम तमस या रजस में है हमको यह मैत्री करुणा मुदिता उपेक्षा यह जो चित्त प्रसाद है वो सबसे पहले डेवलप करने होंगे अपना भाई किसी अभी गरीब आदमी है रास्ते के ऊपर में मैं तो हम लोग तो जाते हैं तो देखते हैं छोटे-छोटे बच्चे अभी मैं अहमदाबाद गया था तो गाड़ी में कहां प भी जाते थे तो चौरा गाड़ी खड़ी रहती है वो गरीब बच्चे आकर के वो डैशबोर्ड व जो गाड़ी के काच है वो क्लीन करते हैं और रुपया मांगते हैं तो अभी भीतर में से कैसी करुणा का एक भाव आता है अरे ये मैं जब छोटा था तो मेरे माताजी पिताजी ऐसा नहीं कि मैं कोई बहुत बड़े परिवार से हो साधारण परिवार से हो किंतु फिर भी पिताजी माताजी इतना जतन करके मुझे रखे हैं कि कभी भी मुझे ऐसा नहीं लगा कि अरे मेरे साथ में क्या होगा और मेरी य मैं उस उम्र का था इसी उम्र के ये बच्चे बेचारे रास्ते रास्ते भीख मांगते घूम रहे है देखो तो क्या परिस्थिति है वो जो करुणा उनके प्रति नहीं होगी तो किस मह से हम ईश्वर के पास जाकर के अपने लिए कुछ मांगेंगे या ईश्वर से भक्ति मांगेंगे यह जो हृदय की विशालता यह भीतर में एक एक मने एक लिबरल एटीट्यूड एक श्रद्धा भक्ति मने लेवल तो आना चाहिए ना स्वामी जी बहुत सुंदर बात करते हैं स्मन जी मैं जब पीपीटीसी ब जवाइन करने के लिए गया था स्मन जी महाराज मोस्ट प्रेसिडेंट महाराज अभी जो है हमारे वो उस समय जनरल सेक्रेटरी थे तो वह स्मन जी महाराज जी उस समय बार-बार कहते थे हमारे क्लास में हम लोगों के क्लास लेते थे रात को डिनर के बाद में उनके कमरे में हम लोग सब जाते थे बच्चे हम और वो क्लास लेते थे वो कुर्सी पे बैठते थे हम लोग वहां पे जमीन पे वो चटाई मछा करके हम लोग बैठ ग थे महाराज जी कुर्सी पर बैठेंगे और एकदम शांत माहौल जनरल मिशन ऑफिस यानी कि हेड क्वार्टर ऑफ राम कृष्ण मिशन जहां पे रिवर्ड जनरल सेक्रेटरी महाराज रिवर्ड असिस्टेंट से टरी महाराज रहते हैं वहां पे किसी का सास नहीं है हल्लागुल्ला करने का एकदम सुशांत जगह उस समय महाराज जी ऐसा बैठ कर के ऐसे बोलते रहते थे बिना किसी टॉपिक के वैसे ही जनरल क्योंकि वो सुनना इ सौभाग्य की बात थी वो बार-बार कहते थे जो स्वामी जी ने कहा कि फर्स्ट बिकम ए जेंटलमैन एंड देन बिकम ए मव ये बहुत ही आवश्यक है एक एथिक्स तो होना चाहिए ना भाई झूठ नहीं बोलना दूसरों की चीजों पे नजर नहीं डालनी मने ये सब जो बेसिक एथिक्स नहीं होंगे हृदय विराट नहीं होगा तो किस मुंह से आप आध्यात्मिक जीवन में आएंगे तो वो जर्नी स और यह जो सेवा है हम जो कर रहे है वो खतर में एथिक्स मोरालिटी और यह चित्त प्रसाद इसको प्रकट करने के लिए है यहां पर एक पॉइंट ड कर दू सॉरी टू इंटर कि जद मैं ईश्वर प्राप्ति के लिए सेवा करता हूं ना तो व अपोजिट हो जाए मैं निस्वार्थ होने के लिए सेवा कर रहा हूं अभी मैं कहता हूं कि चलो मैं सेवा थोड़ा सा करलू तो देखता हूं कि ईश्वर के पास में बैंक बैलेंस कितना बढ़ रहा है कम हो रहा है कब ईश्वर प्राप्ति होगी ये तो उल्टा हो जाएगा सेवा करनी है हृदय खोल कर के पूरा समाज समर्पण करके नहीं कि ईश्वर प्राप्ति के लिए ईश्वर प्राप्ति हो दैट इज अ बाय प्रोडक्ट अरे किंतु ईश्वर प्राप्ति के लिए सेवा करना तो गोलमा करके वही प चले आए स्वार्थ वृद्धि प ओके प्लीज कंटिन्यू पैराडॉक्सस वहा प व जो दूध बांटता था ना काली मंदिर में तो आकर के मां को ज्यादा ज्यादा दूध दे जाता था क्यों क्योंकि वो जो पुजारी पंडित लोगों को ब्राह्मण लोगों को देगा पता नहीं क्या क्या किसको किसको खिलाएंगे बोला मां के पास जद आएगा तो वो उसका सत्कार्य सदय होगा अ देखिए इस तरह से भी एक हृदय का खुलना एक होता है ना एक लिबरल एक फस्ट एटीट्यूड डेवलप होता है फिर आप उसको लेवरेज करके स्पिरिचुअल लाइफ में इसको आप ए स्पिंग स्टोन यूज करे ना करें आप एक सर्टेन लेवल पर तो पहुंच गए हैं नेक्स्ट बर्थ में वहां से स्टार्ट करेंगे आप डॉक्टर सरकार जो कि ठाकुर की सेवा ठाकुर का ट्रीटमेंट करते थे आखिर आखिर में जब ठाकुर को कैंसल हो गया था तो वो मतलब आर्गुमेंट कैसी कैसी करते थे ना वो आकर के ठाकुर के पास में तो एक बार वो जो दो तीन ठाकुर के भक्त है ना वो बोल रहा है कि नेक्स्ट जन्म में डॉक्टर सरकार को पत्थर ईट पत्थर से शुरुआत करनी पड़ेगी इतने नास्तिक है मनुष्य जन्म तो मिलेगा ही नहीं पशु पक्षी का जन्म भी नहीं मिलेगा एक पुत्र से शुरुआत करनी प किंतु वह डॉक्टर सरकार खुद कहते हैं जब ठाकुर उनको बड़ा परेशान करते हैं क्वेश्चन करके करके तो डॉक्टर सरकार कहते हैं आपको समझ में नहीं आ रहा है क्या कि मैं मेरा सब काम छोड़ कर के आपके साथ में छ सात घंटा बैठा हूं मने मेरा यह जो एक्शन है उससे भी आप नहीं समझ पाते मेरे मुंह से बुलवाएं क्या तुम यहां पे एक डिफरेंस है ठाकुर की जो सेवा मैंने ठाकुर ने ये जो देवघर वाली जो फेमस घटना है कहा मथुर बाबू को कीन को मैं कुछ देने भी दे बिना नहीं जाऊंगा वह किस तरह से पता है हम लोग जो सेवा कर रहे हैं हम लोगों है कि तमस में से रजस रजस में से सत्व में जाने के लिए कर र है हमारी एक साधना का अभी एक गुस्सा है पार्ट ऑफ साधना जबकि ठाकुर ने साधना में सिद्ध होकर के पूरे विश्व के साथ में एक ही भूत हो गए थे दूसरों का दर्द वो अपना दर्द समझ कर के महसूस कर रहे थे वो जो तीन चार फेमस डेंट है कि वो एक दिन देखा कि उनके शरीर पर एकदम वो जलन जैसा हो रहा है बड़ा ही दर्द हो रहा है देखा कि वहां पर वो नया हस उगा हुआ था बारिश में तो उसके ऊपर में से कोई पेर दे के चल रहा है तो उनके शरीर पर आघात हो रहा ऐसा हुआ गंगा में देख रहे हैं वो नाविक जा रहा है दो नाविक नौका में जा रहे किसी ने उसको चाटा मारा चपड़ मारा तो ठाकुर के शरीर में आघात की चीना माने कि वो एक ही भूत हो गए वो सर्व भूत में जो दर्शन आत्म दर्शन उस लेवल पर जाकर के ठाकुर ने कह रहा है कि उनका कष्ट मेरा कष्ट है एक्चुअली ही इ फिलिंग ट और हम लोगों का है व सब उस लेवल को छोड़ी दो दूसरों को कष्ट देने में हमको आनंद आता है उस लेवल से उस लेवल प सो म ग्रेट डिफरेंस ठाकुर जो सेवा कर रहे हैं और हम कर रहे हैं जैसे ये जो परमहंस है ना बहुत बार ऐसा लगता है कि अरे तो सामान्य आदमी की तरह ही तो है उनके कार्यकलाप हमारे ही जैसे है किंतु भीतर में देखेंगे उन का एटीट्यूड इज कंपलीटली डिफरेंट ये पूरा एटीट्यूड का प्रश्न है ये जो बाहर से गेरुआ पहन के वगैरह ठाकुर ने सन्यास लिया है हमारी ही तरह वो पूरी संप्रदाय में से उन्होंने सन्यास लिया है क्यों गेरुआ नहीं पहना क्यों मस्तक मुंडन नहीं करते थे क्यों पत्नी का परिवार का त्याग नहीं किया माता जी का त्याग नहीं किया ऐसा क्यों क्योंकि उस लेवल पे जब चले गए निर्विकल्प समाधि में तो वो पत्नी में भी वही ब्रह्म दर्शन मां में भी वही ब्रह्म दर्शन अपने में भी वही ब्रह्म दर्शन यदि सब कुछ ब्रह्मण है तो ब्रह्मण ब्रह्मण का भोग कैसे करेगा राट भोग करने के लिए आपको सब्जेक्ट और ऑब्जेक्ट दो होने चाहिए तब तो कहीं जाके सब्जेक्ट ऑब्जेक्ट रिलेशनशिप बनता है सब्जेक्ट ही सब कुछ है ऑब्जेक्ट है ही नहीं तो रिलेशनशिप ही कट गई सबने आत्म भाव आ गया ये जो वेदांत का जो सूक्ष्म तत्व है वो जब हम समझेंगे तब पता चलेगा कि मैंने ठाकुर और कितने डिफरेंट है हमसे बाहर से भले चाहे कुछ कुछ कार्यकलाप अपने जैसे दिखते ठीक है तो फिर मंडे को