प्रार्थना
ओम स्थापकाय धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः श्री श्री रामकृष्ण कथामृत मास्टर महाशय द्वारा लिपिबद्ध मास्टर महाशय दक्षिणेश्वर में रहने के लिए आए हैं। यह दूसरा फुल डे है। 15th दिसंबर 1883 अष्टम परिच्छेद यहां से आज का कथा प्रारंभ होता है। कल रात को अर्थात कि 14th दिसंबर की रात को मास्टर महाशय दक्षिणेश्वर में सोए हुए थे। रात को 3:00 बजे ना कि इतना उन्होंने ठीक किया था कि नौबत में रहेंगे। किंतु ठाकुर ने कह दिया था कि तुम पंचवटी के नीचे में जो कमरा है वहां पर रहना। वहां पर बहुत सारी तपस्या हुई है। तो वैसे तो मास्टर महाशय वहां पर जाते हैं किंतु देखते हैं कि वहां पर ऑलरेडी ठाकुर का एक भक्त संतान वहां पर झाड़ियों के बीच में बैठकर के मधुसूदन को पुकार रहा है। सरल हृदय से किस तरह से ईश्वर प्राप्ति होती है। यह कहानी जो ठाकुर ने कही थी उसकी वास्तविकता माने यह कहानी यदि सही में सही है कि नहीं इस तरह से निर्मल शुद्ध चरित्र से शांत पवित्र हृदय से यदि हम ईश्वर को पुकारते हैं तो क्या सही में ईश्वर आकर के दर्शन देंगे कि नहीं इस बात का जैसे कि परख करने के लिए यह जो ठाकुर के संतान है वह पुकार रहे थे तो अभी उनको दर्शन हुआ था कि नहीं हुआ था इस बात का तो अभी हमारे पास कोई प्रमाण नहीं है। किंतु एक बात जो हमको पता चलती है यह कल की जो तीन कहानियों से 14th दिसंबर को मास्टर महाशय को जो ठाकुर तीन कहानियां कहते हैं उससे कि यदि सरल हृदय से ईश्वर को पुकारेंगे तो आप कितना ही पांडित्य हो वेद वेदांत हो फिलॉसोफी हो यह सब पढ़कर के भी यदि आपको जो चीज की प्राप्ति नहीं होती है वह प्राप्ति यह सरल हृदय हृदयता से हो जाएगी। अभी आज का यह जो 15 दिसंबर का जो सुबह है जिस दिन को अभी यहां से आज की कथा प्रारंभ होती है। श्री रामकृष्ण देव का कथामृत प्रारंभ होता है। उसमें ठाकुर और एक फैक्टर ऐड करेंगे। जैसे कल उन्होंने हमको यह बताया कि सरल सहज विश्वास से ईश्वर मिलते हैं। तो आज और फैक्टर एक ऐड करेंगे ठाकुर। ठाकुर कहेंगे कि यदि इंद्रिय संयम नहीं होगा तो फिर इस जीवन में ईश्वर प्राप्ति की आशा रखना व्यर्थ है। ऐसा नहीं है कि कोई ना कोई आध्यात्मिक अनुभूति नहीं होगी। अवश्य होगी कि और ऐसा भी नहीं है कि एक बार यदि इंद्रियों के संयम का भंग हुआ है। एक बार इंद्रियों के विषयों में अपना मन लिप्त हुआ है तो इसको आप वापस खींच करके फिर से शुद्ध पवित्र नहीं बना सकते हैं। ऐसा भी नहीं है। यदि तपस्या करेंगे तो इंद्रियों का संयम भी हो जाएगा। तपस्या यदि करेंगे तो वह पवित्रता भी फिर से वापस आ जाएगी। तो यह सब बातें आज होने वाली है। किंतु यह इंद्रिय संयम की बात प्रारंभ हो इससे पहले ठाकुर फिर वही सरल हृदय से भक्ति पूर्वक ईश्वर को पुकारने की बात वह बात आज फिर से कहते हैं। यानी कि देखिए ये दो दिन में ठाकुर की बातें सुनकर के ऐसा लगता है कि ठाकुर जैसे कि मास्टर महाशय को यह दो सिखाना चाहते हैं। एक तो है कि सरल सहज विश्वास और दूसरा है इंद्रिय संयम। तो आज क्या होता है देखते हैं। मास्टर महाशय लिखते हैं
श्रीरामकृष्ण प्रह्लाद चरित का श्रवण कर रहे है
ठाकुर श्री रामकृष्ण दक्षिणेश्वरे से पूर्व परिचित घरे मेझ ते बोशिया प्रहलाद चरित्र सुनीते छेन ठाकुर श्री रामकृष्ण दक्षिणेश्वर के वही पूर्व परिचित घर में बैठकर के कमरे में बैठकर के जमीन पर बैठ के वह भी मेजे थे अर्थात कि जमीन के ऊपर में बैठकर के प्रहलाद चरित्र सुन रहे हैं। बेला आटा होइबे सुबह को 8:00 बजे है श्रीजुक्त तो रामलाल भक्तमाल ग्रंथोते प्रहलाद चरित्र पढ़ते छेन श्रीजुक्त तो रामलाल अर्थात कि ठाकुर के भतीजे भक्तमाल ग्रंथ में से प्रहलाद चरित्र पढ़ रहे हैं। देखिए यह भी एक बहुत बड़ी बात हमको सीखनी है। जैसे कि मेरा खास करके एक ऐसा है कि किताबों के पढ़ किताब का पाठ करने में किताबों का अध्ययन करने में मेरी थोड़ी सी रुचि है। तो कभी-कभी मैं सोचता था शुरू-शुर में कि यह जो मैं किताब पढ़कर के टाइम वेस्ट कर रहा हूं। इसकी वजह बेटर नहीं होगा कि मैं जप करके, ध्यान करके, स्मरण मनन, निदि्यासन करके, महावाक्य विचार करके अपना जीवन बिताऊं। आखिर में तो मैं साधु हुआ हूं। यदि मैं गृहस्थ होता और कोई सहज साधना का पथ अवलंबन करता जैसे कि पाठ तो वह समझ में आता था। साधु होने के बाद में यदि में जो साधना के कठिन रास्ते हैं या तो फिर कहेंगे कि साधना का जो केंद्रवर्ती जो सब आराधनाएं उपासनाएं हैं ईश्वर प्राप्त करने की आत्म साक्षात्कार करने की जो केंद्रवर्ती उपासनाएं हैं जो कि हम डायरेक्ट अपने मन के माध्यम से कर सकते हैं। जप है, ध्यान है, स्मरण मन महावाक्य विचार है, स्मरण मनन निदि्यासन है। यह सब क्या मुझे नहीं करना चाहिए? ऐसा मैं सोचता तो था। किंतु फिर देखिए कि यहां पे इवन ठाकुर स्वयं उनके पास में जब समय होता है तो बैठकर के इस तरह की यह जो भक्त आख्यान जो है धार्मिक ग्रंथ जो है उनके पाठ करते हैं। अभी देखिए कि मास्टर महाशय ने आज का दिन सीधा 8:00 बजे से प्रारंभ किया है। उन्होंने यह नहीं लिखा कि सुबह को मास्टर महाशय स्वयं कितने बजे उठे थे। ठाकुर कितने बजे उठे थे? ठाकुर का तो खैर वैसे उठने का कोई प्रश्न ही नहीं है। हो सकता है कि उनको रात को नींद ही नहीं आई होगी जो भी है। किंतु अर्ली मॉर्निंग को उठकर के यह मास्टर महाशय और ठाकुर ने क्या किया? क्या सुबह-सुबह को ठाकुर ने मास्टर महाशय को कोई सूचनाएं दी होगी। कोई जो पर्सनल साधन पद्धति यदि बताई होगी। यह सब बातें जो है मास्टर महाशय ने हमको नहीं बताई है। सीधा 8:00 बजे से प्रारंभ करते हैं। 8:00 बजे ठाकुर के पास में समय है तो फिर रामलाल को बुलाकर के भक्तमाल में से प्रहलाद चरित्र का पाठ सुन रहे हैं।
दक्षिणेश्वर का पवित्र वातावरण
आज शनिवार पहला पौष अग्रहायण कृष्णा प्रतिपदों पनेरोई दिसंबर 1883 ख्रिस्ताब् आज शनिवार है। पौष महीने की पहली तारीख है। अग्रहायण कृष्णा प्रतिपद तिथि है और इंग्लिश ईयर के इंग्लिश कैलेंडर के अनुसार 15th दिसंबर 1883 का यह दिन है। मणि दक्षिणेश्वरे ठाकुर शंगे ताहार पदो छाया बास कोरिते छेन मणि अर्थात कि मास्टर महाशय दक्षिणेश्वर में ठाकुर के पूत संग में पवित्र संग में उनकी पद छाया में उनके चरणाश्रित होकर के निवास कर रहे हैं। तिन्ही ठाकुर काछे बोश्या प्रहलाद चरित्र सुनीते छेन वह भी ठाकुर के पास में बैठकर के प्रहलाद चरित्र सुन रहे हैं। जनरली हम ठाकुर का जितना भी डिस्क्रिप्शन पढ़ते हैं कथामृत में तो हमको यह मास्टर महाशय कहते हैं कि ठाकुर उनका यह जो छोटी खाट जो है उसके ऊपर में बैठे हैं। यदि आपने ठाकुर के कमरे का दर्शन करने का सौभाग्य मिला होगा तो पता होगा कि वहां पर दो खाट है। एक बड़ी खाट है, एक छोटी। तो कभी-कभी ठाकुर यह छोटी खाट पर बैठकर के ही भक्तों के साथ में वार्तालाप करते हैं। भक्तगण सब जमीन पर बैठे हुए हैं। उनके चरणाश्रित होकर के। किंतु आज देखिए कि मास्टर महाशय का क्या सद्भाग्य है। ठाकुर स्वयं उनके पास में जमीन पर बैठे हुए हैं। यह देखिए कि इतना सद्भाग्य लेकर के वह आए हैं। और वह भी देखिए कि ज्यादा कोई है नहीं वहां पे आसपास में घर में घरेशुक्त तो राखा लाटू हरीश के हो बसिया शनी ते छेन के हो जाता कोरी ते छेन हाजरा बारंदाए आ छेन यह घर में यह श्रीजुक्त तो राखाल अर्थात कि भविष्य के स्वामी ब्रह्मानंद लाटू स्वामी अद्भुतानंद और हरीश वही पगला हरीश इसका भी कितना नसीब है देखिए कोई बैठे हुए यह श्रवण कर रहे हैं पाठ का तो कोई आना जाना कर रहे हैं ठाकुर के किसी काम से ना किसी वजह से हाजरा महाशय अर्थात कि वही इनफेमस हाजरा ठाकुर कहते थे हाजरा को नरेनर फेरेंडो अर्थात इंग्लिश शब्द ठाकुर यूज़ करते हैं फ्रेंड नहीं बोल के कहते हैं फेरेंडो अर्थात कि यह हाजरा है नरेंद्र का फेरेंडो अर्थात नरेंद्र का फ्रेंड तो वही नरन का फ्रेंड हाजरा वहां पे वरांडे में बैठा हुआ है। तो यह एक सुंदर दृश्य यहां पर सामने में आप देखेंगे पूत सलीला पुण्य सलीला भागीरथी बह रही है। बाहर में यह जो फूल के पौधे हैं पेड़ जो है सुंदर उसमें से यह फूलों की खुशबू आ रही है। पंखी वगैरह होंगे तो अपनी सुबह को जो कलरव करते हैं वह कर रहे हैं। बेलूर मठ में मैंने देखा
दिव्य आनंद व शांति का आध्यात्मिक केंद्र — बेलूर मठ
जनरली यहां पर दक्षिणेश्वर में तो हमको पता है कि सुबह को जब आरती होती है, शाम को आरती होती है तो यह नहबत है, कांसर है, घंटा है वगैरह सब बजता है। और बेलूर मठ में मैंने देखा कि यह सुबह को क्या होता है। तो पुजारी महाराज जो होते हैं बेलूर मठ में इस तरह से यह घंटा कांसर नबत वगैरह आरती के समय या तो पूजा के समय नहीं बजता है तो आपको लगेगा कि वह जो एक स्पिरिचुअल एटमॉस्फियर खड़ा होना चाहिए तो वह कैसे होगा? वैसे तो मंदिर है। वैसे तो मंदिर में जाकर के आप भगवान के सामने बैठ ही सकते हैं। देखिए वहां पर कितने मंदिर है बेलूर मठ में। एक तो है ठाकुर का पुराना शाइन ओल्ड शाइन जहां पे कि बैठकर के स्वामी जी ने स्वयं उपासना की थी वो ओल्ड शाइन उसके बाद में ठाकुर का जो नया मंदिर है मेन टेंपल वो उसके बाद में थोड़ा सा गंगा के किनारे आएंगे तो फिर राजा महाराज का समाधि मंदिर फिर मां शारदा देवी का जगत जननी का समाधि मंदिर उसके बाद में स्वामी जी का समाधि मंदिर और उसके बाद में समाधि घाट घाट तो इतनी पवित्र जगह बेलूर मठ में है। किंतु सुबह को मंगल आरती या तो फिर शाम की आरती या तो सुबह की जो पूजा होती है इन सभी की इन सब में ऐसा कोई यह शंख शहनाई वगैरह नहीं बचता है। तो किस तरह से वह पवित्र वातावरण खड़ा होगा पता है क्योंकि मैं वहां पर रहता था तो मैंने यह ऑब्जर्व किया। जनरली क्या होता है? है। हम लोग ट्रेनिंग सेंटर में वैसे सभी साधुओं को ट्रेनिंग सेंटर में रहने का मौका मिलता है क्योंकि वहां पे तो हम सबको वह 2 साल का ट्रेनिंग लेना ही होगा। किंतु होता क्या है? ट्रेनिंग सेंटर में तो दिन भर का एकदम टाइट शेड्यूल होता है क्लासेस का एक्टिविटीज का वगैरह का। तो फिर क्या है कि इस मठ के जो मठ प्रांगण जो है मठ परिसर जो है वहां पर आने का मौका या तो अपॉर्चुनिटी सिर्फ मंगल आरती और संध्या आरती और भोजन के समय वही मिलता है। सुबह को जो पूजा वगैरह जो होती है उस समय वहां पर उपस्थित रहने का सद्भाग्य नहीं मिलता। तो मेरा पोस्टिंग जब हुआ था बेलूर मठ में तो मैंने यह ऑब्जर्व किया कि सुबह को पवित्र वातावरण कैसे बनता है। तो जितने भी पुजारी महाराज हैं वे लोग क्या करेंगे यहां पे अभी जैसे कि ठाकुर का मेन टेंपल जो है वहां पर ठाकुर को जो नैवेद्य ऑफर करना है वह नैवेद्य वही मंदिर में ही काटा जाता है। फल है फिर यह मिठाई है। वो सब जो थाला जो सजाना होता है वो वहां पे मेन टेंपल के पीछे में ही भंडार गह है ठाकुर का वहीं पर वो थाला सजता है वगैरह सब वहीं पर होता है तो बाहर से तो आप नहीं देख पाएंगे किंतु यह जो साइड टेंपल जो है राजा महाराज का समाधि मंदिर मां का समाधि मंदिर स्वामी जी का समाधि मंदिर इन तीनों में जब सुबह की पूजा होती है तो पुजारी महाराज क्या करेंगे यहां पर किचन है किचन के पास में ही यह एक दूसरा भंडार गृह है। वहां से यह जो नैवेद्य का थाला जो है वह वहां पर सजता है। तो वह सजा हुआ था लेकर के यह तीनों पुजारी एक के बाद एक अपने कंधे पर इतना बड़ा थाला लेकर के वो मंदिर की ओर जा रहे हैं। तो जब उनको मैं सुबह को देखता था तब मुझे एक संतोष मिलता था कि हां हम एक मंदिर प्रांगण में रह रहे हैं। और देखिए ये दूसरा एक माने मैंने जो जिस मैंने कहा था ना कि एक साधु ने मुझे कहा कि तुम वहां पर बिल्कुल आउटसाइड में मत रहना। यदि तुमको अपनी पसंद का कमरा मिलता है तो साधु निवास में ही रहना। वहां पर इतनी सारी तपस्या की तन मात्राएं हैं। वरना तो तुम जहां पर सोच रहे हो गंगा के किनारे वो जगह सिक्लूडेड है। वहां पर इतनी कोई सीनियर साधु भी नहीं रहे हैं। तुमको यह जप ध्यान करने में इतना आनंद नहीं आएगा। तो वो तो एक सलाह उन्होंने जो मुझे दी वो तो मुझे बहुत बड़ा बेनिफिट हुआ ही हुआ। किंतु फिर यह मठ जो मक्स क्वार्टर जो है साधु निवास ओरिजिनल साधु निवास बेलूर मठ का उसमें रहने का दूसरा बड़ा एक सद्भाग्य यह है कि बेलूर मठ में ये जो ट्रेडिशनल जो कुछ भी होता है पूजा होती है। पूजा की प्रिपरेशन होती है। साधु समागम होता है। साधुओं का अड्डा जहां पे लगता है। अप लगाते हैं जहां पे साधु मिलकर के वो सभी चीजों में डायरेक्ट पार्टिसिपेशन करने का या तो उसको डायरेक्ट ऑब्जर्व करने का सद्भाग्य मुझे 4 साल तक कंटीन्यूअस मिला था। तो वह मैं अपने कमरे के मेरा जो वरांडा है वहां से ही मैं देख पाता था कि यह पुजारी महाशय वहां से यह देखिए कि थाला लेकर के जा रहे हैं। अभी एक बार मुझे यह सब टाइमिंग्स वगैरह पता चल गया क्योंकि मैं ट्रेनिंग सेंटर में था तो यह सब मुझे पता ही नहीं था क्योंकि हम लोगों का ड्यूटी जब होता भी है तो वह तो अर्ली मॉर्निंग ड्यूटी होगा या तो फिर यह दोपहर को ऐसा सब ड्यूटी होगा। तो यह पुजारी महाराज नैवेद्य का थाला लेकर के वह लंबा रास्ता है। देखा होगा यदि बेलूर मठ गए होंगे तो यह जो मठ ऑफिस है मठ ऑफिस का प्रांगण में से यदि आपको साइड टेंपल जाना है तो गंगा के किनारे हुए चलते-चलते लंबा रास्ता आपको पार करना है। तो उस रास्ते से आप जा रहे हैं तो कितना सुंदर एक दृश्य दिखेगा। तो मैं मुझे एक बार पता चल गया कि यह सब टाइमिंग्स है तो मैं क्या करता था मठ प्रांगण में या तो फिर मेन टेंपल के बाहर में वो जो एक बड़ा ये चौगान जैसा है वहां पर जाकर खड़ा रह जाता था और फिर मैं देखता था कितना सुंदर लगता था कि ये तीनों पुजारी महाराज अपना-अपना ये स्वामी जी की समाधि मंदिर जो है उनके पुजारी महाराज है। मां के समाधि मंदिर के पुजारी महाराज, राजा महाराज के समाधि मंदिर के पुजारी महाराज ये तीनों थाला लेकर के जा रहे हैं और वो टाइम लगेगा। एक तो थाला हैवी है दूसरा रास्ता लंबा है। तो ये जा रहे हैं देखने में इतना सुंदर लगता है। पूरा मैं 15 20 मिनट तक यह सब देखता रहता था। तो यह एक पवित्र वातावरण बेलूर मठ में बनता है। और यदि दुर्गा पूजा के समय यदि आपने वह बेलूर मठ का दर्शन किया होगा तो प्रश्न ही नहीं है कि जैसे ही सुबह होती है वह प्रभात की राग रागिणियां बजना शहनाई पे शुरू हो जाता है। तो वह एक हमको दक्षिणेश्वर ओरिजिनल जो दक्षिणेश्वर था उसका जो एक रियल फील आता है दुर्गा पूजा के समय में मुझे अभी भी याद है कि मैं उस समय बेलूर मठ में जॉइ करने के लिए गया था। यह जो ज्वॉइ करने के लिए नए लड़के आते हैं उन लोगों को पीपीटीसी में रखते हैं। वह एक प्री प्रोबेशनल ट्रेनिंग सेंटर है जो बेलूर मठ में ही है। जितने भी नए लड़के आते हैं सब वहां पर रहते हैं। उन लोगों का भी क्लासेस होता है। जैसे एक मेन ट्रेनिंग सेंटर है। इसी तरह से यह प्री प्रोबेशनल ट्रेनिंग सेंटर है। तो वहां पे भी क्लासेस होते हैं। वहां पे भी यह डोरमेट्रीज वगैरह है। तो दुर्गा पूजा प्रारंभ हुई। अभी मैं एग्जैक्टली भूल गया कि कौन से दिन से यह शहनाई बजना प्रारंभ होता है। षष्ठी से ना कि पंचमी से ना कि जो भी है। तो मैं अपने कमरे में था उस समय अर्ली मॉर्निंग की बात है। सूर्योदय हुआ होगा। बस कि सूर्योदय हो रहा है। उसी समय की बात है। एकाएक शहनाई का आवाज चलने लगा। तो भीतर से ना ऐसा एक मेरा एक अट्रैक्शन हुआ इस आवाज के प्रति कि जैसे कि ना उस समय मेरे में इतनी सब अकल नहीं थी या तो फिर उस समय मेरा रीडिंग इतना नहीं था किंतु आज मुझे लगता है वो पहला दिन जिस दिन मैंने यह सुबह को बेलूर मठ में दुर्गा पूजा के प्रारंभ में जो शहनाई सुनी थी आज मुझे ऐसा लग रहा है जैसे कि दक्षिणेश्वर का वो बुलावा आया हो ना सीधा मैं अपने कमरे में से बाहर निकल कर के दौड़ा दौड़ा बाहर में आया जहां और देखिए हमारा जो प्री प्रोबेशनल ट्रेनिंग सेंटर है उसके सामने में ही इन लोगों ने नहबत खड़ा किया था। ऑफ कोर्स यह नबत और वो नहबत में बड़ा डिफरेंस है। यहां तो सीधे-सीधे वो बांस जो होते हैं बांस का एक मंच बनाते हैं। वो कपड़े से लपेट मंडप जैसा एक बनता है। और उसमें फिर कोई यह आदमी लोग नहीं रहते। एक्चुअल वह जो यह शहनाई बजाने वाले नहीं वह तो माइक लगा हुआ स्पीकर लगा हुआ था तो स्पीकर में से वह शहनाई की आवाज आ रही थी जो भी है किंतु वो जो आवाज इतनी सुमधुर थी तो सीधा मैं दौड़कर के रास्ते पर आ गया और देख रहा हूं चारों ओर ऐसा तो नहीं ना कि वो गलती से मैं दक्षिणेश्वर पहुंच गया अनजाने म पता ही नहीं वो जैसा कभी-कभी होता है ना बच्चों का जैसे इमेजिनेशन होता है हम लोग उस दिन बात कर रहे थे उनके सामने यह जगत है ना इट्स ब्लैंक कैनवास जैसे कि यह एक जादू का जगत है। कभी भी कुछ भी हो सकता है। हम लोगों का मन जो है इतना अभी यह वर्ल्डली वाइज हो गया है कि हमको 100% पता है कि ऐसा कभी होने ही नहीं वाला कि मैं आंख खोलूं बेलूर मठ में और एकाएक पता चले मैं सीधा दक्षिणेश्वर में पहुंच गया हूं। या तो फिर मैं विशाखापट्टनम में सोया हुआ हूं। सुबह उठकर देखा तो मैं बेलूर मठ पहुंच गया। ऐसा कभी होने ही नहीं वाला। यह 100% हमको पता है। किंतु बच्चों के दिमाग में कुछ भी चलता रहता है। वे लोग कुछ भी इमेजिन कर सकते हैं। वो लोग विश्वास भी करते हैं कि हां ऐसा हो सकता है। फिर यह जगत जो है जीवन जो है मारमार करके उनको ठिकाने लगा देता है कि यह कल्पना शक्ति है उसको कंट्रोल में रखो। उसमें जो है तुम इमेजिन करते हो ऐसा कुछ होने वाला नहीं। वि इज अ ग्रेट मिसफर्च्यून कि बड़ा होने का यह बड़ा मिसफर्च्यून है। किंतु जो भी है उस दिन जेनुइनली मुझे ऐसा लगा था कि कहीं पर मैं गलती से तो दक्षिणेश्वर नहीं पहुंच गया। दक्षिणेश्वर में पढ़ा है। सुना तो है नहीं। अगेन दक्षिणेश्वर में मैंने जितनी बार दर्शन करने का सौभाग्य मिला है। मैंने तो कभी वह नहबत में से वो शहनाई की आवाज सुनी नहीं है। पता नहीं ऐसा कभी होता भी होगा कि नहीं। आज का दक्षिणेश्वर उस समय का बड़ा डिफरेंस है। उस समय जो जेन्युइन डिवोशन था ईश्वर के प्रति और यह जो नारायण और लक्ष्मी जगत जननी स्वयं वहां पर निवास कर रहे थे। तो वो जो पवित्र वातावरण बनेगा उसका तो कोई प्रश्न ही नहीं है कि उस तरह का वातावरण आज के दक्षिणेश्वर में शायद नहीं है। हां उनकी तन मात्राएं हैं। हां उनकी पवित्रता है। किंतु वो जो एक पूरा भी एक इतना भीड़भाड़ रहता है। इतने सारे लोग रहते हैं कि खैर अभी वो दूसरा मामला है। किंतु उस दिन मुझे जेन्युइनली ऐसा लगा था। पहली बार मैंने शहनाई सुनी दुर्गा पूजा से पहले कि ऐसा लगा कि मैं सही में दक्षिणेश्वर पहुंच गया हूं या तो फिर दक्षिणेश्वर आकर के बेलूर मठ में उपस्थित हो गया है। इतना सुंदर और फिर दुर्गा पूजा के जो दिन थे ना मुझे अभी भी याद है मेरे जीवन के जो सर्वश्रेष्ठ क्षण जो होंगे सर्वश्रेष्ठ जो दिन जो होंगे उसमें से ये कुछ दिन है मेरी बेलूर मठ में पहली दुर्गा पूजा उस समय और क्या है कि मैं तो गुजरात से आता हूं इस हालांकि गुजरात में फेस्टिवल्स की कमी नहीं है किंतु बेलूर मठ में जिस तरह से दुर्गा पूजा का आयोजन होता है। दुर्गा पूजा में पूजा होती है। पुजारी महाराज की श्रद्धा यह जो भक्त दर्शन करने के लिए आते हैं उनकी यह जो उनके भीतर में एक श्रद्धा साधुओं के हृदय में जो उमंग है और फिर यह काली कीर्तन है आगमनी है इनका यह जो गान होता है ये इतना सुंदर वातावरण खड़ा करते हैं कि मैं कभी सोचा नहीं था कि उत्सव में इतना आनंद आ सकता है। मैं जब छोटा था तब हम अपने गांव में जाते थे दीपावली की छुट्टियों में। तो दीपावली का जो त्यौहार है गांव में मनाते थे बहुत आनंद आता था। बहुत बड़ा संयुक्त कुटुंब था। बहुत सारे बिखरे हुए जो रिलेटिव्स थे उस समय उस हमारे गांव में इकट्ठा होते थे। बहुत सारे यह फायर वर्क्स हम लोग परचेस करते थे। पूरी रात दीपावली की रात नए साल की रात जो गुजराती न्यू ईयर है वो पूरी रात भर यह सब हम लोग कुछ ना कुछ होता रहता था। पारायण होता था। उत्सव होता था। गप लगाते थे सब लोग। फिर लक्ष्मी पूजा ये जो गुजराती जो ट्रेडिशंस है तो दैट वास मुझे ऐसा लगता था कि वो जो अभी मैं बड़ा होकर के मैं अभी वो फिर से मुझे मौका नहीं मिलने वाला है उस इस तरह के उत्सव के आनंद का। मुझे नहीं लगता कि ऐसा फिर से कभी मिलेगा। ऐसा मैं डिटरमाइन करके ठीक करके बैठा था। किंतु बेलूर मठ की जो पहली दुर्गा पूजा है मुझे बिल्कुल ऐसा लगा कि बचपन के जो दीपावली का जो आनंद है हमारे गांव में उससे कहीं मिलियन टाइम्स लाखों लाखों गुना ज्यादा होकर के बेलूर मठ में दुर्गा पूजा का वो आनंद मिला था। तो दैट इज कि यह जो सुबह का जो पूरा मास्टर महाशय लिख रहे हैं वर्णन तो यह मुझे थोड़ा सा लगा कि बेलूर मठ में भी आप देखेंगे कि यह सुबह की जो पवित्रता है मंदिर में जो पूजा होती है पुजारी महाराज की जो श्रद्धा है और सुबह को फायदा यह है अभी आजकल की बात नहीं पता एटलीस्ट मैं जब था बेलूर मठ में बहुत कम भक्त लोग रहते थे तो यहां पे और गंगा के सामने किनारे से सूर्योदय हो रहा है। तो वो बड़ा सुंदर सूर्य का प्रकाश अर्ली मॉर्निंग का वो जो बीच में जो बड़ा सा लोन जो है बड़ा सा ग्राउंड जो है ये जो गंगा और मेन टेंपल के बीच का वहां पर यदि आप खड़े रहेंगे सुबह का एक घंटा पूजा का समय का इतना सुंदर जाएगा। मैंने यह सब टाइम ठीक करके रखे थे कि कहां पर कौन से समय मुझे उपस्थित रहना है। जैसे कि संध्या आरती के बाद का समय संध्या आरती के बाद के समय से भोजन का जो रात्रि भोजन का 9:10 में ऐसा कुछ टाइम था तो उस समय दौरान मुझे गंगा के किनारे ही रहना है और कहीं जाना नहीं है। और उस समय तो ऐसा था कि किसी भी भक्त को उस समय गंगा के किनारे पर रहने की परमिशन नहीं थी। बिल्कुल गंगा का किनारा एकदम डेजर्टेड रहता था, खाली रहता था। सिर्फ ये साधु लोग ही वहां पे रहेंगे। और साधुओं में भी फिर से एक तरह का ऐसा डर बैठ गया था कुछ-कुछ साधुओं में कि यह जो गंगा का पवन जो है गंगा की जो यह ह्यूमिड हवा जो है वो स्वास्थ्य के लिए बड़ी डेंजरस है। तो मैं जब वहां पर टहलता रहता था एक मंदिर से दूसरे मंदिर कभी मैं राजा महाराज समाधि मंदिर में बैठकर के थोड़ा सा चिंतन करूंगा। कभी यह जो ओल्ड शाइन है वहां पर बैठूंगा। कभी मां के मंदिर के सामने बैठ गया। कभी यह स्वामी जी के जो समाधि मंदिर है उसका फर्स्ट फ्लोर है। ओमकार जहां पे है उसके आज चारों ओर वरांडा है। तो वरांडे में पीछे की ओर जाकर के गंगा को फेस करके वहां पर कभी बैठ गया। कभी प्रेसिडेंट महाराज क्वार्टर तक जाता हूं। कभी यह समाधि घाट तक जाता हूं। ऐसा करके दो ढाई घंटे मुझे एग्जैक्ट वहीं पर ही बिताने हैं। एकदम पक्का मेरा नियम था। कोई मुझे कहता भी था कि यह गंगा की हवा तुम इतनी लेते हो देखो तुमको कहीं कुछ हो ना जाए। तो मैंने कहा महाराज मेरा स्टे जो है यहां पे वो टेंपरेरी है। मुझे पता है। फिर यहां पर कब आने का मौका मिलेगा पता नहीं। तो जितने दिन मैं यहां पे हूं वो गंगा का किनारा छोड़कर मैं और कहीं जाने वाला नहीं। बेलूर मठ में मैं चार साल था। एक दिन मैंने छुट्टी नहीं ली है। एक दिन मैं मठ छोड़ के कहीं पे और गया नहीं हूं। हां, मुझे कोलकाता आना पड़ता था क्योंकि यह अद्वैत आश्रम है। यह सेवा प्रतिष्ठान है या इंस्टट्यूट ऑफ कल्चर है। कुछ ना कुछ काम रहता था। यह आत्मूपानंद जी थे हमारे सीनियर हमारे इंचार्ज महाराज तो उनको लेकर के कभी-कभी सेवा प्रतिष्ठान आना पड़ता था। अद्वैत आश्रम से हमारा बिजनेस रिलेशन था। तो वहां पर जाना पड़ता था। इंस्टट्यूट ऑफ कल्चर में इतना बड़ा लाइब्रेरी है। एक दो मित्र थे तो उनको मिलने के लिए चला जाता था। तो दिन के दौरान कभी बाहर जाना हुआ है। किंतु रात जो है मैंने 4 साल में एक भी रात बेलूर मठ से बाहर नहीं बिताई है। इतना मैंने उसका बेनिफिट ले लिया है। अभी फिर कब मिलेगा यह मौका पता नहीं। किंतु देखिए कि यह जो पवित्र जगहएं हैं ये पवित्र जगहों पर आप जैसे रहेंगे ना यह पवित्र ये जो क्षण जो है शुभ क्षण जो है ये कितनी ईश्वर की कृपा से अपने जीवन में आते हैं। तो जब आते हैं तो पूरा हृदय में भर के उसको बैठ जाना है। फिर जैसे वो गाय जो है ना गाय चिबाती रहती है। पहले एक बार खाना खा लेती है। पुवाल वगैरह जो गाय के सामने डालेंगे सब्जी वगैरह तो एक बार तो वह खा लेती है फिर बैठे-बैठे वह चिबाती रहेगी तो वागोडू इन्हें गुजराती में कहते हैं। तो इस तरह से एक बार यह सब बेनिफिट्स ले लेने हैं शुभ क्षण के और फिर जीवन भर उसके ऊपर में चिंतन करते रहना है। फिर से इमेजिन करना है कि मैं वहीं बेलूर मठ में सुबह के समय हूं। पूजा का समय चल रहा है। यहां पर वह साइड टेंपल जो है उनके पुजारी महाराज नैवेद्य का थाला अपने कंधे पर उठा के अपनेप मंदिर की ओर जा रहे हैं। यहां पे आप यदि बेलूर मठ का जो मेन टेंपल जो है उसके साइड में आप देखेंगे ठाकुर का जो शाइन है साइड में देखेंगे ग्रिल है। अर्थात कि पुजारी महाराज जो पूजा कर रहे हैं आप सीधा देख सकते हैं। तो यह वहां से पुजारी महाराज पूजा कर रहे हैं तो मंत्रोच्चारण का जो आवाज ये सुंदर आवाज आता है म्यूजिक की तरह वो जो हवा में फैलता है वो आप सुन रहे हैं तो ऑल दिस ये इमेजिनेशन जैसा हम करते जाएंगे वैसा ही देखेंगे कि अपना हृदय कितना निर्मल से निर्मलतर होता जाता है। निर्मलतम होता जाता है। तो यहां पर भी देखिए कि मास्टर महाशय ने और कोई साधना की होगी या नहीं। सुबह को उठकर के ठाकुर ने उनको क्या इंस्ट्रक्शन दिया होगा कि तुम इस तरह से ध्यान करो ना कि इस तरह से जप करो ना कि इस तरह से ईश्वर का चिंतन करो। वह तो हमको पता नहीं है। किंतु ठाकुर के कमरे में बैठकर के यह सुबह के जो अर्ली मॉर्निंग प्रकाश के किरण जो चारों ओर फैल रहे हैं। दक्षिणेश्वर रूपी पवित्र वातावरण में ठाकुर के साथ में बैठकर के ठाकुर खाट के ऊपर नहीं बैठे हैं। जमीन पर ही पास में ही बैठे हैं और प्रहलाद चरित्र सुन रहे हैं। मुझे लगता है मास्टर महाशय का इसी से सब हो गया होगा। ठाकुर की इंस्ट्रक्शन का पालन किया होगा। नहीं किया होगा पता नहीं यह भविष्य में जब भी अपनी स्कूल में बैठे होंगे मास्टर महाशय अपने घर में बैठे होंगे साधन भजन करने की इच्छा हुई होगी तो वही दिन फिर से याद कर लेना है फिर से रिमेंबर कर लेना है उसी में सब हृदय मन चित्त सब निर्मल हो जाएगा और कुछ करने की जरूरत नहीं है। तो यहां पर भी देखिए कि क्या लिखते हैं आगे ठाकुर प्रहलाद चरित्र
भावसमाधी में श्रीरामकृष्ण
कथा सुनीते सुनीते भावाविष्ट होते छ ठाकुर प्रहलाद चरित्र की कथा सुनते सुनते भाव में आविष्ट हो रहे हैं भावाविष्ट हो रहे हैं जोखन हिरण्य कश्यिपु वध होइलो नसिं रुद्रमूर्ति देख्या ओ सिंहनाद शून्या ब्रह्मादि देवतारा प्रलया शंकाए प्रहलाद केई नरसिंह काछे पाठाई दिले जब हिरण्यकशिप का वध हुआ नरसिंह की रुद्र मूर्ति देखी और सिंहनाद जब सुना तब ब्रह्म आदि देवता उनको प्रलय की आशंका हो गई। उनको डर लग गया कि प्रलय होने वाला है। तो इस प्रलय आशंका में भगवान को शांत करने के लिए उन्होंने प्रहलाद को ही नरसिंह के पास में भेज दिया। प्रहलाद बालके न्याय तबो कोते छ प्रहलाद बच्चे की तरह स्तव कर रहे हैं। भक्त वत्सल स्नेहे प्रह्लादे गा चाटते छेन और यहां पे नरसिंह तो है विराट विकराल रूप तो धारण किया है किंतु बच्चे जो उनका जो प्रहलाद के प्रति जो पुत्र स्नेह जो है भक्तवत्सल भगवान ये स्नेह से प्रहलाद का जो देह है वह चाट रहे हैं। जैसे शेर को बिल्ली को इनको देखा होगा। किस तरह से मां अपने बच्चे का देह चाटती है। तो इसी तरह यह तो सिंह का देह धारण किया है। तो एक जो शेरनी जो है जो सिंह जो है अपने बच्चे का देह कैसे चाटता है? उसी तरह प्रहलाद को स्नेह कर रहे हैं। ठाकुर भावाविष्ट होइया बोलते छ आहा आहा ठाकुर भावाविष्ट होकर के बोल रहे हैं आहा आहा भक्त ऊपर की भलो भाषा भक्त के ऊपर में भगवान का कितना स्नेह है बोलीते बोलीते ठाकुर भावो समाधि को लो कहते कहते ही ठाकुर को भाव समाधि हुई स्पंदहीन चोखेर कोने प्रेमाश्रु स्पंदहीन अर्थात कि किसी किसी भी तरह का मूवमेंट नहीं स्थिर निश्चल होकर के बैठे हैं। आंखों के कोने में प्रेमाश्रू बह रहे हैं। देखिए कितना सुंदर यह ठाकुर का भाव और यह भक्ति का यह जो महात्म है यही नरसिंह अवतार को यदि आपको आराधना करनी होगी तो यह ब्रह्म आदि देवतारा कितने स्तवों की रचना करेंगे। कितना यह सब करेंगे। तब कहीं जाकर के तपस्या करेंगे। तब कहीं जाकर के ईश्वर प्रसन्न होंगे। किंतु यह संतान भाव है। यह बालक भाव है। इतना शुद्ध भाव है कि भगवान स्वयं आकर के हमको स्नेह करेंगे। वही जो फेमस कहानी ठाकुर कहते हैं कि मां पार्वती अपने दो संतान है। गणेश और कार्तिक कहती है कि जो आप विश्व की जो ब्रह्मांड की परिक्रमा करके जो पहला वापस आएगा उसको मैं अपने गले का यह हार दूंगी। तो कार्तिक भगवान उनका वाहन मोर तो यह पिकॉक के ऊपर में बैठकर के पूरे ब्रह्मांड की परिक्रमा करने के लिए चले। कभी कितना कष्ट हुआ होगा, कितना स्ट्रगल हुआ होगा तो तो वही जाने इतनी लंबी परिक्रमा में किंतु जब वापस आए तो देखा कि यह धुंधाड़ा देव गणेश को तो क्या कहते हैं? धुंधड़ा देव अर्थात कि हेल्दी तो है इतने मोटे-छोटे हैं। ऊपर में से उनका वाहन है यह चूहा उंदर मूषक। तो ये मूषक पर बैठकर के इतने यह जो हाथी जैसे शरीर वाले भगवान गणेश कब पता नहीं उन्होंने यह पूजा यह परिक्रमा कर ली और फिर अभी वह आकर मां के गोद में बैठ भी गए हैं। मां ने उनको यह गले में हार भी पहना दिया है। तो आश्चर्यचकित होकर पूछा कि कब परिक्रमा की? कैसे की? कि किस तरह से यह मयूर और कार्तिक इससे ज्यादा फास्ट परिक्रमा कर सकते हैं। यह मूषक के ऊपर में बैठे हुए इतने मोटे-छोटे अपने गणेश जी। तो फिर उन्होंने उत्तर दिया कि मैंने मां की ही परिक्रमा कर ली है। मां के भीतर में ही पूरा ब्रह्मांड है। तो यहां पे भी आप देखिए एक है ज्ञान मार्ग, एक है भक्ति मार्ग। ज्ञान मार्ग का जो हृदय है, ज्ञान मार्ग का जो हार्ट है, वह है त्याग। आपको त्याग करना ही होगा। अदरवाइज ज्ञान मार्ग में ज्यादा आगे नहीं जा सकते। हजार फिलॉसोफी लगाइए कि मैं वही आत्मन हूं। यह मन बुद्धि प्राित्त अहंकार ये जो 24 ये जो तत्व ये जो तत्व वगैरह जो है पंचमहाभूत पंच ज्ञानेंद्रिय पंचकर्मेंद्रिय पंच प्राण पंच तन्म मात्रा उसमें से मैं कुछ भी नहीं हूं वगैरह वगैरह ये आपका यह सत्व रजस तमस इससे भी मैं परे हूं स्वप्न जागत सुशुप्ति से भी परे मैं तुरिय अवस्था में हूं मैं प्रकृति नहीं पुरुष हूं माया नहीं ब्राह्मण हूं। इस तरह का 1 लाख फिलॉसोफी आप लगा लीजिए। जब तक त्याग नहीं होगा, इंद्रिय संयम नहीं होगा, यह ज्ञान के रास्ते पर हम एक कदम भी आगे नहीं बढ़े हैं। तो वह हो गया ज्ञान का रास्ता। यहां पर हो गया भक्ति का रास्ता। बिल्कुल एक बच्चे की तरह होकर के बच्चे की पवित्रता से बच्चे की सरलता से ईश्वर को पुकारना है। तो देखिए इतने विकट विकराल जो देव थे यह नरसिंह अवतार वो खुद इस प्रहलाद का देह अपनी जीहवा से चाट रहे हैं। तो यह दो रास्ते भक्ति और ज्ञान। हालांकि देखिए कि जैसे मैंने पहले भी कहा था पहले यह भक्ति का तो काफी कुछ ठाकुर ने बोल दिया। इसके बाद त्याग और संयम की भी बात ठाकुर करेंगे। रामकृष्ण मिशन का जो है ट्रेडमार्क कहो ना कि अपना यह जो सेंट्रल कांसेप्ट ज्ञान मिश्रा भक्ति यह है हमारा हार्ट। यहां पर यदि एक प्योर भक्ति करने को जाएंगे उसको भी शायद इतना एनकरेजमेंट नहीं मिलेगा और यदि प्योर ज्ञान करने को भी जाएंगे तो आपका जो मन है वह रुखा सूखा हो जाएगा। वो पहले के जमाने में त्रेता द्वापर में यह सब ठीक था कि उनका जो मन है देह है तपस्या के लिए अनुकूल था बोलकर के वह प्योर ज्ञान प्योर भक्ति के रास्ते पर जा सकते थे। यह जो ब्रज के जो गोप गोपियां थी उनमें सरलता इतनी थी और यह जो अपने अरण्य में ऋषि मुनि रहते थे उनमें यह तपस्या इतनी थी तो यह तपस्या और सरलता इतनी थी लोगों में कि प्योर ज्ञान प्योर भक्ति के रास्ते पर वे लोग जा सकते थे आज कलयुग में क्या प्रॉब्लम है सब कुछ मिक्स हो गया है ना ही इतनी तपस्या किसी के भीतर में है ना ही इतनी सरलता किसी के भीतर में तो हमको क्या करना है? दोनों साधनाओं में से कुछ कुछ अंश लेकर के एक खिचड़ी रूपी उपासना करनी है। तो वह हो गई यह ज्ञान मिश्रा भक्ति। यह त्याग भी करना है। ज्ञान मार्ग का यह जो उपासना वह भी लेनी है। और भक्ति मार्ग की जो उपासना है उसका जो सेंट्रल कांसेप्ट है यह सरलता और विश्वास इसको भी लेना है।
ईश्वरप्राप्ति के मार्ग पर रहते हुए भी स्त्रियों के साथ संबंध रखने वालों के प्रति ठाकुर का क्रोध और घृणा
भाव उपसोम में पोर ठाकुर छोटो खाट खानी ते गिया बोसिया छेन जैसे ही भाव का उपशम हुआ ठाकुर अपने छोटा खाट है उसके ऊपर में जाकर के बैठे मणि मेजर ऊपर तहार पाद मूले बोशीले मणि जमीन के ऊपर में उनके चरण के पास में बैठे ठाकुर तहार शंगे कथा कहते छे ठाकुर उनके साथ में वार्तालाप कर रहे हैं ईश्वर पथे थाकिया जारा स्त्री संगो करे ताहा दे प्रति ठाकुर क्रोध ओ ता देर प्रति ठाकुर क्रोध और घृणा प्रकाश करते छे ईश्वर के रास्ते में रहकर के ईश्वर प्राप्ति की आराधना करतेकरते जो लोग स्त्री संग करते हैं उनके प्रति ठाकुर क्रोध और घृणा प्रकाश कर रहे हैं। श्री रामकृष्ण ठाकुर क्या कहते हैं लज्जा हो ना लज्जा नहीं हो रही है छेले होए गए छ बार स्त्री शंगो बच्चे हो गए हैं उसके बाद में भी स्त्री संग कर रहे हैं घृणा कोना घृणा नहीं होती है क्या पशु देर मतो व्यवहार पशुओं की तरह व्यवहार नाल रक्तो मल मूत्र ए सब घृणा करे ना ये नाल रक्त मल मूत्र पंचमहाभूत के देह में तो यही सब है तो इसको लेकर के आनंद क्या घृणा नहीं होती है जे भगवान पादो पदो चिंता को तार परमा सुंदरी रमणी चितार भस बोले बोध होय जे भगवान के पाद पद्म की चिंता करता है चिंतन करता है उसको परम सुंदरी रमणी चिता की भस्म है इस तरह से अनुभूति होती है अनुभव होता है जे शरीर थाकबे ना ज भीतर कृमी क्लेद श्लेषमा जतो प्रकार अपवित्र जी से शरीरनीय आनंदो लज्जा हो ना जो शरीर रहने वाला नहीं है जो शरीर क्षणभंगुर है जिसके भीतर में क्रमी क्लेद श्लेषमा जितनी भी प्रकार की अपवित्र चीजें हैं वह सब पड़ा हुआ है उस शरीर को लेकर के आनंद लज्जा नहीं होती है क्या देखिए यह जो ज्ञान योग जो है अद्वैत वेदांत जो है निराकार साधना जो है उसका एकदम हार्ट हो गया। यह ठाकुर की यह बातें देखिए यह जो दो रास्ते हैं एक तो है कि भगवान के प्रति प्रेम या तो फिर आत्मन के प्रति आकर्षण वो एक पॉजिटिव रास्ता हमको भगवान की ओर ले जाता है। दूसरा है कि यह देह के जो सुख है इसके प्रति घृणा तो यह घृणा एक नेगेटिव टाइप की साधना है। वो हमको आगे ईश्वर की ओर या तो आत्म साक्षात्कार की ओर वो हमको आगे बढ़ाती है। तो यह दोनों तरह की साधना होनी चाहिए। यह जो खास करके ज्ञान योग में इस तरह की बातें बहुत ज्यादा आती थी। आती है। यह जो ठाकुर अपने जो त्यागी संतान थे उनको एक अलग से ले जाकर के या तो फिर उस समय कमरे में और कोई नहीं होता है। यह जो देख के आसपास में देख के कि और कोई गृहस्थ होते हैं कि नहीं है वहां पे। उस समय जो ठाकुर अपने त्यागी संतानों को जो बात कहते थे वह बात ठाकुर ने आज प्रकाश में जाहिर में सबके सामने कह दी कि यह ईश्वर की ओर सिर्फ आकर्षण होना यह इनफ नहीं है। आपके मन के भीतर में यह मनुष्य देह के प्रति कोई सॉफ्ट कॉर्नर यदि रहता है तो वो सॉफ्ट कॉर्नर जो है आपको आज नहीं ना कल कल नहीं ना परसों कहीं ना कहीं आपका पैर कभी ना कभी कोई ना कोई जगह पर फिसलने वाला है। यानी कि यदि आपको ठीक-ठीक साधक होना है। ठीक-ठीक साधना करनी है तो दोनों चीजों को आपको एक साथ में आपकी सा आपको प्रैक्टिस करनी होगी, साधना करनी होगी। क्या? एक तो है कि ईश्वर के प्रति आकर्षण। यदि आप साकार में विश्वास करते हैं और यदि निराकार में विश्वास करते हैं, तो यह एकाग्रता रूपी जो कोई भी साधना करते हैं, महावाक्य विचार रूपी जो कोई साधना करते हैं, वह तो आपको करनी ही है। यह दो साधनाएं भाव साधना या तो फिर महावाक्य विचार। यह भाव साधना है भक्ति मार्ग का श्रेष्ठ साधन पद्धति और महावाक्य विचार है ज्ञान मार्ग की श्रेष्ठ साधन पद्धति। तो यह तो आपको करना ही करना है किंतु साथ-साथ में ही एक कॉमन प्रकार की साधना है। वह भी आपको करनी है और वह है देह के प्रति घृणा। यह घृणा यदि उत्पन्न नहीं होगी तब तक हम इसके अकरण क्षण से मुक्त नहीं होंगे। किंतु साथ में ही यह बात ख्याल रखनी है कि ठाकुर पहले भी इसके अगले दिन भी ठाकुर जब यह स्त्रियों का संग त्याग करने को उपदेश दे रहे थे और यह पुरुषों को स्त्रियों को कहेंगे कि पुरुषों का संग त्याग करो। तो वह जो ठाकुर उपदेश दे रहे थे तो साथ-साथ में ही फिर ठाकुर ने यह भी कह दिया क्यों यह एंटीीडोट दे दिया कि स्त्रियों के प्रति घृणा ना हो जाए इसके लिए समझना है कि स्त्रियां यह सब ईश्वरी की यह एक-एक रूप है। भगवती के एक-एक रूप है। सीता होकर के श्री राम के साथ में विराज रही है। शिवानी होकर के शिव के साथ में विराज रही है। राधा होकर के कृष्ण के साथ में लीला कर रही है। तो देह के प्रति जो घृणा है किसी व्यक्ति के प्रति वह घृणा ट्रांसफर ना हो जाए। यह बड़ा डिस्टिंक्शन ख्याल में रखना है। यह जो काम वासना और काम वासना जिसके प्रति आकर्षित होते हैं वो देह देह के प्रति घृणा करनी है। किंतु जिस देह जिस व्यक्ति का है उसके प्रति नहीं। देखिए ठाकुर ने इस तरह की कितनी ही साधनाएं की होंगी। इसके बावजूद उन्होंने मां शारदा देवी को शक्ति रूपणी या शक्ति स्वयं समझ करके शक्ति स्वयं के रूप में उनकी उपासना की थी। आराधना की थी। तो ठाकुर के यह सब कांसेप्ट क्लियर थे। यह कॉनंसेप्चुअल क्लेरिटी हमारे सबके भीतर में होनी चाहिए। वरना तो फिर क्या होगा? कहीं यदि यहां पर पैर फिसलता है या तो फिर यहां पर पैर फिसलेगा या तो फिर विषयों के आनंद में मन बैठ जाएगा या तो फिर स्त्री जातियों के प्रति या तो फिर और किसी के प्रति घृणा का भाव आ जाएगा तो यह घृणा का भाव भी एक पाश है। लज्जा घृणा भय अष्टपास में से यह भी एक पाश है। इसका भी त्याग करना है। तो यह सब समझ करके सब बैलेंस करके साधना करनी है। मणि चुप करिया हट मुख होया आन मणि चुपचाप सुन रहे हैं अधोवन होकर के हट मुख अर्थात कि अपना चेहरा झुका करके नतमस्तक होकर के सब कुछ सुन रहे हैं। जैसे कि ठाकुर उन्हीं को डायरेक्टली एड्रेस कर रहे हैं। उनके मन की जो वासना है सीधी उसी को एड्रेस कर रहे हैं ठाकुर ऐसा उनको लग रहा है। ठाकुर श्री रामकृष्ण आभार बोली ते छ श्री रामकृष्ण फिर से कह रहे हैं तार प्रेमर एक बिंदु जदी के उपाय कामिनी कांचन अति तुच्छ बोले बोध हो तार अर्थात कि उनके प्रेम का अर्थात कि ईश्वरीय प्रेम का एक बिंदु भी यदि कोई प्राप्त करता है तो उसको कामिनी कांचन अति तुच्छ बोलकर के समझ में आएंगे बोध होंगे मिचरी शरीर पाना पेले चीटे गुड़े पाना तुच्छ होए जाए यह मिश्री अर्थात कि साकर का शरबत यदि मिलता है तो यह गुड़ का वगैरह का जो शरबत होता है उसके सामने उसका टेस्ट तुच्छ हो जाएगा ताके व्याकुल होए प्रार्थना कर ले तार नाम गुणगान सर्वदा कीर्तन को ले तार ऊपर भालो भाषा क्रमे होए उनको व्याकुल होकर के प्रार्थना करने से उनके नाम गुण सर्वदा सदा कीर्तन करने से उनके ऊपर में धीरे-धीरे करके स्नेह, प्रेम, श्रद्धा, भलोभासा प्रकट होगा। क्रम देखिए ठाकुर ने यह कंडीशन पहले से ही लगा दी है कि हम यदि यह अपेक्षा करेंगे सुबह को बैठे कुछ करने के लिए साधन भजन एक घंटे में कुछ हुआ नहीं तो छोड़ो यह सब हमारे से कुछ होने वाला नहीं है। बोल के खड़े होकर निकल पड़े। तो ऐसा भी नहीं क्रम होगा। धीरे-धीरे होगा। पूरा श्रद्धा भक्ति के साथ में लंबे समय तक बैठकर के यह सब आराधनाएं करनी पड़ेगी।
सांसारिक वासनाओं में फंसे परिवारजनों पर माँ सारदा का क्रोध
देखिए मां का भी एग्जजेक्टली इसी तरह का एक प्रसंग है। मां जब जयराम बाटी में थी तो एक लड़का मां के पास में सन्यास लेने के लिए आया। मनसा यदि मुझे याद है एग्जजेक्टली तो यही उसका नाम था। मनसा बोलकर के एक लड़का आया। मां के पास में सन्यास की प्रार्थना की तो मां ने भी कहा उसका चरित्र देखा उसके संस्कार देखे उसके शुभ लक्षण देख लिए तो मां ने कहा हां बेटा मैं तुमको गेरवा दूंगी तुम गेरवा कपड़ा जो है वस्त्र लेकर के आना तो यह लड़का भी वो गेरुआ लेकर के आया मां ने उसको आशीर्वाद दिया उसको यह गेरुआ वस्त्र प्रदान किया और फिर यह लड़के ने गेरुआ पहन के मां का जो कमरा जो है यदि जय राम बाटी का दर्शन किया होगा तो देखा होगा कि यह जो मां का घर का यह जो वरांडा है उसके सामने में एक चौगान जैसा है खुला सा ग्राउंड जैसा है तो वहां पर बैठकर के वो भजन गान करने लगा और उसका गला भी बड़ा सुंदर है। तो मां के घर की जितनी भी स्त्रियां थी मां के साथ में सब वे लोग वहां पर बैठकर के वह सुन रहे हैं। सुनकर के बड़ा उनको प्रसन्नता हो रही है। उसी में यह नलिनी दीदी ने बोलना शुरू किया कि देखो कि इतना सुंदर लड़का है। इतना सुंदर आवाज है। उसका गले का सुर है। इतना संस्कार है। उसकी मां ने कितना स्नेह प्रेम से उसका लालनपालन किया है। और मां आपने क्या किया? इसको घेरुआ बना दिया। साधु बना दिया। अभी क्या है इसका जीवन? क्या करेगा यह? तो हरिद्वार में जाकर के यह रोगियों के मलमूत्र साफ करेगा। वहां पर अपनी हॉस्पिटल थी। तो माने स्वामी जी ने तो कहा है ना शिव ज्ञान से जीव सेवा तो यह गरीबों की सेवा करेगा यह जो रोगी है उनके मलमूत्र साफ करेगा क्या उसको नरक में डाल दिया किस तरह का जीवन आपने बना दिया घर में यदि रहता तो विवाह करता किसी स्त्री का सद्भाग्य होता उसकी पत्नी होने का तो उसका भी जीवन बनता उसकी मां जो है उसका भी भविष्य वो जैसे कि वह अपने बच्चे के साथ में रहती तो वह भी सुख पूर्वक रहती तो वह नहीं आपने वह सबका घर उजाड़ दिया उसको साधु बना दिया ऐसा सब नलिनी बोल रही है तो पहले तो मां ने चुपचाप सुन लिया कहा कि अरे देखो बेटा यह तो सब देव शिशु है यह देव शिशु थोड़ी ना संसार में रहने के लिए आए हैं। इनका तो जन्म ही हुआ है ईश्वर प्राप्ति की आराधना करने के लिए। पहले तो ऐसा कुछ बोला किंतु फिर भी यह नलिनी दीदी है और बाकी सब स्त्रियों भी अभी क्या है? सुंदर लड़का है तो संस्कार है तो शुभ उसके संस्कार स्त्रियों का हृदय जो है एक मातृ हृदय एक स्नेह ऑलमोस्ट एक हो जाता है तो वे लोग भी बोल रही अरे क्या इसके साथ में बेचारे के साथ में कर दिया फिर अभी उन्होंने इस तरह से बोलना शुरू किया मां का टेंपर उठा मां ने फिर जैसे गुस्सा होकर के क्रोध भरे स्वर से बोली कि तुमको शर्म नहीं आती है तुमको बार-बार अपने पति के पास में जाती हो तुमको इतने बच्चे हो गए हैं फिर भी यह पति पति सुख नहीं छोड़ना चाहती हो। वही यह सूअर की तरह यह जो पीग जो होता है उसी की तरह तुम लोग इस संसार चक्र में फंसे हुए हो। संसार की जो गंदगी है उसमें से अपना मुंह नहीं उठाना चाहते हो। बार-बार पति के पास जाओगी। बार-बार बच्चे होंगे। फिर यदि तुम पति के पास जाओगी तो मैं तुमको यहां से भगा दूंगी। मेरे पास में रखूंगी नहीं। समझ लेना। ऐसा मां ने जब क्रोध के स्वर से कहा तब सब स्त्रियां शांत हो गई। तो देखिए कि ठाकुर हो ना कि मां हो इनका स्नेह जो था हमारे ऊपर में वो स्नेह की वजह से वह हमको डांटना भी नहीं चुकते थे। यदि यह देह के प्रति आकर्षण रहेगा तो संसार में ही हम फंसे रहेंगे। आध्यात्मिक जीवन में ज्यादा उन्नति नहीं करेंगे। किंतु साथ में ही देखिए यह 100% ब्रह्मचर्य का पालन करना वह भी तो कठिन है। वह मनसा जैसे कुछ लोग होंगे लाखों में एक जिनका कि यह सद्भाग्य होता है। बाकी सबके लिए जैसे वो नलिनी थी या तो फिर यह मास्टर महाशय है। मां और ठाकुर ने क्या कहा? ऐसा नहीं कहा कि तुम लोग शादी मत करो। यही राधु मां की बच्ची उस मां ने खुद ने उसका विवाह ठीक करके पात्र ठीक करके राधु का विवाह करवाया। किसी ने पूछा मां से कि मां आपने राधु का विवाह क्यों करवाया? उनको शायद ऐसा लगा होगा कि मां जैसे सब लड़कों को यह गिरवा वस्त्र देती है तो शायद अपनी खुद की बच्ची की वो विवाह के बारे में कहे कि विवाह मत करना। किंतु फिर मां ने कहा कि देखो यह भी एक संस्कार है। माने ये जो संस्कार जो होते हैं ना वेद में जो संस्कार लिखे गए हैं उसमें विवाह भी एक संस्कार है। यह जनेऊ ग्रहण करना वह भी एक संस्कार है। मृत्यु संस्कार होता है वगैरह-वगैरह। तो विवाह भी एक संस्कार है। दूसरा कि मां ने कहा देखो कि सभी का एक भीतर में एक रहता है कामना वासना कि किसकी कितनी पवित्रता है। तो उसको देखकर के यह सब करना है। भीतर में पवित्रता नहीं है और बाहर में आप साधु जीवन बिताने का प्रयास करेंगे तो आप भी डूबेंगे दूसरों को भी लेकर डूबेंगे। तो बेटर है कि राधु का विवाह हो। तो यहां पर भी मास्टर महाशय भले ही चाहे पत्नी के साथ में रहते हैं। यह नलिनी भले ही चाहे अपने पति के घर जाती होंगी। किंतु इनका क्या कहना है? एक दो बच्चे यदि हो जाते हैं तो फिर पवित्र जीवन जीना शुरू कर दो। जैसे कि अपनी वेद की जो प्रथा थी ब्रह्मचर्य आश्रम, फिर गृहस्थ आश्रम, फिर वानप्रस्थ आश्रम और फिर सन्यास आश्रम। जैसे-जैसे दिन ढलते जाते हैं अपने वैसे-वैसे ही मन ईश्वर की ओर नेचुरली ट्रांजिशन होना चाहिए। गृहस्थ आश्रम में रहकर के वह जो गृहस्थ धर्म था वह तो पालन कर लिया। अभी किंतु समय आ गया है ईश्वर धर्म पालन करने का। जैसे ही एक उम्र होती है वैसे ही धीरे-धीरे करके अपने मन को भगवान में केंद्रित करते जाना है। तो यह ठाकुर और मां दोनों का भरोसा है हम सबके लिए। ए बोलिया ठाकुर प्रेमन मत होइया घरे मध्य नाचिया बेड़ाई ते लागी लेन और गान कर ते लागी लेन। पहले तो यह डांटा अच्छे से कि जिसको ईश्वर के प्रेम का एक बिंदु भी यदि मिल जाता है उसको कामिनी कांचन तुच्छ बोलकर के बोध होते हैं। जिसको कि यह जो मिचरी अर्थात कि साकर का शरबत मिल जाता है। उसको गुड़ का शरबत अच्छा नहीं लगता। तुच्छ हो जाता है। जिसको भी ईश्वर के पाद पद्म की चिंता करता है, वह परमा सुंदरी रमणी उसको चिता की भस्म की तरह दिखने लगती है। ऐसा बोलकर के अच्छे से उपदेश तो दे दिया किंतु इसके बाद में यही बोलिया यह सब बोलकर के ठाकुर प्रेमोत्त होइया। प्रेमोन्मत्त होकर के घर के बीच में नाचते नाचते गान करने लगे। सुर सुर धनी रतीरे हरि बोले के बुझी प्रेम दाता निताई ऐसे छे सुर धनी नदी का नाम है इसके किनारे पे हरि हरि का नाम कौन लेता है लग रहा है कि प्रेम दाता निताई आए हैं निताई नोइले प्राण जुड़ावे की से निताई नहीं होंगे तो अपने प्राणों को शीतलता कैसे मिलेगी हृदय को ठंडक कैसे मिलेगी तो यह पूरा प्रसंग यहां पर समाप्त होता है। इसके बाद का प्रसंग अभी कथामृत के नेक्स्ट क्लास में लेंगे। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु।
प्रश्न: भक्ति का प्रत्येक संप्रदाय त्याग पर जोर देता है। चैतन्य महाप्रभु के संप्रदाय की तरह
एक्चुअली क्या है कि हम लोगों के साथ में जो प्रॉब्लम है ना एक कलयुग में अपना कैपेसिटी तो बड़ा एक लिमिटेड है। यदि आप द्वापर त्रेता में रहते हैं तो प्योर अद्वैत फॉलो कर रहे हैं। तो अद्वैत मार्ग में जो लिखा है वह कर लिया। यहां पर नवधा भक्ति पूरा फॉलो कर लिया। अभी हमारे पास में ऐसा है कि वह ठाकुर वहां पर कामार पुकुर जा रहे हैं पालकी में बैठकर के तो वह डाकू आ गए रास्ते में तो ठाकुर ने सभी का नाम लेना शुरू कर दिया सभी देवताओं का राम कृष्ण काली जो आए और जो मारे डाकुओं को तो हमारी ऐसी हालत है जो लिखा है सब कर लो जो काम करे उसमें से फिर यदि कहते हैं कि देह को घृणा करो तो यह भी कर लिया कहते हैं कि महावाक्य विचार करो तो यह भी थोड़ा बहुत कर लिया कहते कहते हैं नवधा भक्ति करो तो ये भी थोड़ा सा कर लिया क्या जाता है सिर्फ ठाकुर ही नहीं भारत के जो दो श्रेष्ठ अवतार हैं तीन में से तीनों शादीशुदा है भगवान राम भगवान कृष्ण भगवान राम कृष्ण ऐसा सन्यासी सिर्फ बौद्ध भगवान बुद्ध ही हुए तो बुद्ध को तो हम हिंदू ट्रेडिशन में गिनते नहीं है यही रीजन है ना कि ये जो प्योर जो ज्ञान पंथ जो थे बुद्धिज्म और जैनिज्म जैनिज्म लिमिट हो गया और बुद्धिज्म गायब हो गया भारत में से। यह भारत की जो मिट्टी है ना यहां पर वह प्योर आपको वह फॉलो करने ही नहीं देंग। आपको यह मिश्रण करके ही चलना है। किंतु देखिए ज्ञान उस समय तो हमको सहज दिखा कि कार्तिकेय को पूरा ब्रह्मांड की परिक्रमा करनी पड़ी। बहुत कष्ट हुआ। भगवान गणेश को एक ही मां की परिक्रमा सहज सरलता पूर्वक कर दी। ज्ञान का रास्ता अच्छा है। ज्ञान था। तत्वज्ञान था। किंतु तत्वज्ञान प्राप्त करने के लिए कितनी तपस्या करनी पड़ी होगी वह एक अलग इशू है। यानी एट द एंड ऑफ द डे देयर इज नो फ्री लंच। इंग्लिश में कहते हैं ना ये ये जो आपने कहा ना 50% तैर गए। 50% म डूबे नहीं है। किंतु फिर वह जो बेनिफिट लेना था नहीं ले पाए। देखिए छह लोग का नाम लिया है मास्टर महाशय ने। एक तो स्वयं है, फिर लाटू है और राखाल है। तो ये तीनों तैर गए ठाकुर का संग करके। फिर ये हरीश था, यह रामलाल थे और यह हाजरा थे। हरीश पागल हो गया। रामलाल की बुद्धि भ्रष्ट हो गई और हाजरा अपने घमंड में रहा। अभी तेर तो छह हो गए होंगे कोई प्रश्न नहीं है। किंतु ये जो सहजता से जो आनंद पूर्वक ये जो डायरेक्ट डिसाइपल मास्टर महाशय वो तैर गए। वह सद्भाग्य उनको नहीं मिला। यानी कि संस्कार को तो मानना ही पड़ेगा। आखिर एट द एंड ऑफ द डे। किंतु एक बात है देखिए हम सभी के बारे में मैं बता रहा हूं कि ठाकुर की वाणी पे एक बार प्रेम जागृत हो गया है। उसका अर्थ है कि हम बहुत आगे निकल आए हैं। माने बाकी सब संसारियों से और मैं सिर्फ ठाकुर की बात ऐसी नहीं कर रहा। माने किसी भी भगवान की वाणी पर प्रेम हुआ है तो बाकी लोगों से वो आदमी माने वो साधक बहुत आगे निकल आया है। नाउ इट्स अ मैटर ऑफ टाइम एंड एफर्ट। वह लाइन में आ गया है। अभी बस वह टाइम उनको बिताना है सही रास्ते पर। वरना वह जो अंधेरे में भटक रहे थे कहां वह क्रिमिनल रास्ते पर चला जाएगा। कोई अपना चरित्र नष्ट कर बैठेगा। कोई क्या कर बैठेगा? उससे तो हम लोग ऊपर आ गए हैं। हमारी जर्नी कभी स्लो होगी, कभी फास्ट होगी, हमको कभी निराशा होगी, कभी आनंद आएगा। किंतु रास्ता सही पकड़ लिया है हम लोगों ने। वह बिल्कुल सही है कि मैं खुद का लाइफ जब देखता हूं, मैंने ऐसा कॉन्शियसली एक बार भी नहीं सोचा कि मुझे रामकृष्ण संघ में साधु होकर आराधना करके ठाकुर का दर्शन करना है। यह जितने भी जो छोटे-छोटे स्टेप लिए मैंने कि गरीबों की सेवा करनी है। ट्राइबल एरिया में जाना है। उनको हेल्प करना है। फिर चलो कि अभी यहां पे बहुत हो गया। अभी थोड़ा सा और ऑप्शन एक्सप्लोर करते हैं। तो यह उस समय जितने बेबी स्टेप्स थे एव्री स्टेप वेयर बेबी स्टेप जो कि मुझे कहां पे भी ले जा सकते थे। रूरल डेवलपमेंट ही करना है तो रामकृष्ण मिशन से और भी कई संस्थाएं हैं जो कि कर रही है। तो वहां पे ही क्यों नहीं गया? यहां पे ही कैसे आ गया? मेरा जर्नी जो स्टार्ट हुआ तो फिर वो वहां पे प्राइवेट सेंटर था हमारे शहर में तो वहां पे ही मैं क्यों गया? इतना बड़ा शहर इतने सारी एनजीओ में कहीं पर भी जा सकता था वो वो अर्थक्वेक रिलीफ करने के लिए आरएसएस में जा सकता था उनका तो बड़ा नाम था और भी वहां पे इतने वो स्वामी नारायण है ये है कितनी बड़ी-बड़ी संस्थाएं वहां पे नहीं जाकर के एक छोटा सा एक बिल्डिंग है एक छोटा सा एप ये है छोटा सा कमरा है वहां पे हमारे शहर में प्राइवेट सेंटर बोल के जो था छोटा सा एक कमरा है उसमें दो-तीन कपबोर्ड थे जिसमें किताब रखा था और जमीन पर बैठकर के पास में ही बाथरूम है। बाथरूम को वो कर्टेन से ढक दिया था और उसके बगल में ठाकुर शाइन बनाया था। तो वहां पे ही मैं कैसे पहुंच गया? उस समय पता नहीं चलता था। आज लगता है कि अरे भाई ये अपना कोई सुकृति नहीं है। वही हाथ पकड़ के कान पकड़ कर के खींच के लाए हैं। किंतु ये सब कुछ ठाकुर में ठाकुर के हाथ में है। अभी अपने प्रेसिडेंट महाराज है वो एक गति से जा रहे हैं। हम लोग जनरल कैटेगरी में एक स्पीड से जा रहे हैं। ठाकुर की कब इच्छा किसको कहां पर बिठा ले कुछ ठीक नहीं है। हमको बिल्ली के बच्चे की तरह रहना है। वो मां उसको उठा के बिछाने में बिठाती है तो कभी धूल में मिट्टी में बिठाती है। अपने नसीब को ख कोसना नहीं है। अननेसेसरी अपने को कांग्रेचुलेट नहीं करना है। कल क्या हो जाए किसको पता वह जैसे वह फेमस वो कि एव्री सेंट हैज़ ए पास्ट एंड एव्री सीनर हैज़ अ फ्यूचर। माने आज हम जहां पे हैं कल हम कहां पे होंगे कुछ ठीक से नहीं बोल पाएंगे। सो अपने को कांग्रेचुलेट नहीं करना है। अपने नसीब को कोसना नहीं है। एक बार ठाकुर के पास मतलब रास्ते पे यदि आ गए हैं तो यह ग्रेटेस्ट फॉर्च्यून है। यह समझ करके जितना हो पड़े हो सके उतना करना है।
मेरी साधना
देखिए आप लोग यह जो प्रतिदिन यह समय देते हैं एक घंटा वो ठाकुर की वाणी का श्रवण करने का उसके बारे में वार्तालाप करने का दैट इटसेल्फ शोस कि आप लोग कितना आगे बढ़ चुके हैं। मैं खुद की बात करता हूं। मेरे लिए ये एक तप साधना ही है कि मैं प्रति पहले मैं शुरू शुरू में क्लास स्टार्ट किए थे। मैं बहुत छुट्टी लगाता था। अभी मैं रेयरली छुट्टी लगाता हूं। क्योंकि मुझे भी ऐसा लग रहा है कि मेरे लिए इससे अच्छी साधना और कोई नहीं है। दिन भर फिर मैं मेरा लिखना है। यही सब करता रहता हूं। तो क्या है कि देखिए इंटेंसिटी बढ़ेगी ना तो प्रयास हम सबको करना है। किंतु फिर ये अनरियलिस्टिकल एक्सपेक्टेशंस नहीं रखने हैं। अदरवाइज क्या होगा कि फिर वही वो आत्म श्लाघा आ जाएगा, आत्मघणा आ जाएगी कि अरे मैंने तो इतना करना चाहिए मुझसे नहीं। मेरे खुद के लाइफ में मेरा ट्रेनिंग सेंटर के बाद में लिमड़ी पोस्टिंग हुआ था। तो अभी ट्रेनिंग सेंटर का वो जो एक फोर्स होता है ना साधना का वो एक इंटेंस जगह है ट्रेनिंग सेंटर। वहां पर आचार्य महाराज होते हैं। बेलूर मठ में रिवर्ड प्रेसिडेंट महाराज, वाइस प्रेसिडेंट महाराज, ट्रस्टी लोग यह सब हमारे क्लासेस लेते हैं। फिर प्रेसिडेंट महाराज को प्रणाम करने का मौका प्रतिदिन आता है। वो एक इंटेंस दिन थे। तो मैं अभी लिमड़ी में आया तो एकदम खाली जगह है। कहां वो बिलूर मठ का इंटेंसिटी और होईचई बांग्लादेश जेवन बोले हल्लागुल्ला और यहां कहां लिमड़ी एकदम खाली जगह तो मुझे लगा कि मैं ये अपनी जो तपस्या की इंटेंसिटी मेंटेन कर पाऊंगा कि नहीं। बेलूर मठ में प्रत्येक सैटरडे को ट्रेनिंग सेंटर में प्रत्येक सैटरडे को जप यज्ञ होता है। पूरी रात जप करके आपको जप करना है। दिन के पांच क्लासेस होते हैं। वो सुबह को 3:30 से डे स्टार्ट होता है। रात को 11:00 बजे तक चलता है। वगैरह-वगैरह तो मैंने सोचा मैं ट्रेनिंग सेंटर का ही रूटीन लिमड़ी में फॉलो करूंगा। प्रयास किया आप विश्वास नहीं करेंगे कि एक ही महीना हुआ। दूसरे महीने से मैंने वह रात को जगना भी बंद कर दिया। सैटरडे को वह 5 घंटा जो स्टडी करना चाहिए था वह सब भी बंद हो गया। एकदम लाइफ है ना एकदम मिडओकर होकर के रह गया। तो शुरू शुरू में मुझे बहुत भीतर से ये होता था कि ये मैं क्या कर रहा हूं? कहां मुझे रामकृष्ण मिशन का साधु आशिष्टों दृढ़िष्ठो बलिष्ठो यह क्या होना चाहिए और मैं क्या एक एक मिडिल क्लास एक मैंने एक तरह से मैं हो गया हूं यहां पे मीडियकर किंतु क्या है कि देखिए कुछ समय के बाद में मैंने अपने को कोसना बंद कर दिया क्योंकि वह एक और भी बड़ा डेंजर है। अपने को कोसना अपने को गाली देना यह तपस्या नहीं करने से भी बड़ा डेंजरस यह है। तो फिर क्या है कि देखो समय और परिस्थिति जो करवाते हैं रिस्पांसिबिलिटीज अपनी जो होती है उसको सामने रख के करना है। अभी जो चीज ट्रेनिंग सेंटर में नहीं थी वह हमको लिमड़ी में करना है। शिव ज्ञान जीव सेवा तो वहां पर डिस्पेंसरी भी चलती थी। वहां पर स्कूल्स में कार्यक्रम होते थे। तो सब कुछ मैं देखता था। तो यह भी तो एक पुण्य अर्जन करने जैसा ही है। आपको संसार है। ईश्वर का ही संसार है। ईश्वर के नाम पर ही सब कर रहे हैं। सब समर्पित करके उस भाव से यह करना है। फिर ऐसा है ना साधना और संसार उसमें ये आर्टिफिशियल डिवीजन नहीं दिखेगा। दोनों एक हो जाएगा।