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ओम स्थापा का यॉट धर्मस्य सरवत धर्म स्वरूप ने अवतार वरिष्ठ आओ रामकृष्ण यत नमः कृष्णा किशोर के बड़े में बात हो रही थी और देखा की कृष्णा किशोर कहता है की ठाकुर कहते हैं की कृष्णा किशोर के विश्वास के बड़े में बताते थे किशोर के विश्वास के बड़े में हम कहानी बताई सबसे प्रथम तो वो वृंदावन गया था एक नीचे जाति का आदमी केन के पास में खड़ा है उसके पास से कृष्णा किशोर पानी मांग करके पिया और कहा क्या कहा की तुम शिवा का नाम लो बोलो शिवा शिवा तो तुम शुद्ध हो जाओगे और हमने कल ये भी देखा की आज यह बात शायद हमको थोड़ा सा क्या कहेंगे की विचित्र लगे या तो फिर हमारे मां को अनुरूप ना लगे की क्या कोई आदमी उच्च और नीचे हो सकता है फिर किसी नीचे आदमी कोई शिवा का नाम देकर सिर्फ अपना स्वार्थ जो है वह सिद्ध कर लेना है ऐसा चलेगा की नहीं चलेगा तो इसके बड़े में हमने काफी कुछ डिस्कस किया था तो आज वही ठाकुर अपने पूर्वज्जीवन की बातें पूर्व जीवन अर्थात अपने साधना के समय की उसे समय की की जब ठाकुर के पास में ठाकुर का भी जीवन देखिए की एक समय था की ठाकुर के पास में आप जब जाएंगे तो इतने सारे देवोटी बैठे हुए हैं की ठाकुर के साथ में आप वन तू वन परस्पर वार्तालाप नहीं कर सकते ठाकुर जो बोलेंगे आपको सुना है क्योंकि इतने सारे देवोटेड ठाकुर के पास में आते थे एक समय ऐसा होता था रामकृष्ण मिशन में ही की आप यदि महापुरुष महाराज के पास जाएंगे की अखंडानंद जी के पास में जाएंगे या तो फिर एवं शंकारानंद जी के पास में तो चलिए दीक्षा देंगे महाराज जी तो सामने आप ही अकेले ही बैठे होंगे मां की कहानी में देखिए मां की बटन में मां दीक्षा देती है मां बेटी है और आप बैठे हैं दो ही लोग बैठे हैं दो से ज्यादा तीसरा कोई नहीं है किंतु आज यदि हमारे प्रेसिडेंट महाराज के पास से दिया दीक्षा लेने को जाएंगे तो वहां पर इस मंदिर में आपके साथ में 100 से भी ज्यादा भक्ति दीक्षार्थी बैठे होंगे क्यों क्योंकि जैसे-जैसे भक्तों की संख्या बढ़नी जाति है वैसे-वैसे हमारे प्रेसिडेंट महाराज की तो संख्या बढ़ेगी नहीं वो तो एक ही रहेंगे संघ के प्रेसिडेंट तो वो आपको 100 भक्तों के साथ में दीक्षा लेनी पड़ेगी यदि आपके मां में कोई प्रश्न भी है तो महाराज के साथ में उसको मैंने सुकून से बैठकर के वार्तालाप करने का समय नहीं मिलेगा दीक्षा के बाद में शायद हो सकता है की महाराज कुछ प्रवचन दे जो की हमको सुना है सबके साथ में किंतु वह एक शाम सामने बैठ करके वार्तालाप का वो हमको मौका नहीं मिलता तो ठाकुर के पास में भी ऐसा है एक समय आया था की जबकि ठाकुर के पास में बहुत सारे भक्ति आना शुरू कर दिए थे तो फिर अब आप अकेले बैठे हैं ठाकुर के सामने और ठाकुर के साथ बात कर रहे हैं इस तरह से कम होता था हालांकि आज जितने भक्ति हमारे मंदिर में आते हैं आज जितने दीक्षार्थी आते हैं उतने तो उसे समय कभी नहीं आए बेचारे ठाकुर के पास में वो होते थे तो शायद 10-12 लोग होते थे वोट यहां पर कथामृत में वो लिखा है की कैमरा भारती लोग मैन वो पूरा कैमरा जो है ठाकुर का और रूम वो भर गया है किंतु दक्षिणेश्वर में जाकर के ठाकुर का रूम देखेंगे तो वो इतना छोटा है की वो रूम भर जाना मैन 10 से 12 लोग होना इससे ज्यादा फिर वहां पे वो नहीं सम सकता है तो किंतु इसके भी पहले का एक समय था की जबकि केशव सैया नया ठाकुर के बड़े में प्रचार करने की शुरुआत की थी ठाकुर की साधना समाप्त हो गई थी जब वो प्रथम शक्ति साधना उसके बाद में वेदांत साधना वात्सल्य भाव की साधना यह सब साधनाएं समाप्त करके यह 18668 यह सब की बात है वो तीर्थ यात्रा करके फिर से कोलकाता वापस आए थे तब से लेकर के फिर यह केश इनका आगमन होना और केशव सैया अपने समाचार पत्रों में ठाकुर के बड़े में कहना तो ये जब कहा तो धीरे-धीरे करके ठाकुर के पास में बहुत सारे लोग आना शुरू हो गए तो अब जब ठाकुर साधना करते थे तो साधना में ही व्यस्त है फिर ठाकुर के पास में 1875 1873 75 78 तब से लेकर के जो भक्तों का आगमन शुरू हुआ तो ठाकुर के सामने इतने सारे भक्ति बैठे हैं और ये 18665 64 यह सब की बात है की ठाकुर जो साधना में ही मगन थे वो बाहर में और बाकियों भूमि में आकर के बाकियों कॉन्शसनेस धरण करके लोगों के साथ बात करना वगैरा इतना मौका उनको नहीं मिलता था तो यह जो पीरियड है ठाकुर के जीवन का ऑलमोस्ट 10 साल का पहले लीजिए 1865 से लेकर के 1875 तक और उसके बाद में भी आगे पीछे दो तीन साल एड कर दें तो ये 10 11 साल 12 साल का पीरियड ऐसा है की जब ठाकुर मतलब बात भी करते थे और सामने बैठने वाले ठाकुर के ठाकुर के साथ में बात करने वाले लोग भी शायद एक दो एक दो ऐसे होंगे तो ये कितना सुमधुर समय है और हमारे मां में कभी कभी ऐसी आशा प्रगति होती है की उसे समय यदि ठाकुर के साथ मुलाकात होती उसे समय ठाकुर के दर्शन होते हैं मुलाकाच शब्द ठीक नहीं है दर्शन यदि ठाकुर के होते उसे समय यदि हम ठाकुर के शरणागत हुए होते तो हमको ठाकुर के साथ में बात करने का अपना हृदय खोल करके अपने मां की जितनी भी बातें हैं सब उनके सामने रखना का हमको कितना सुंदर मौका मिलता है किंतु खेर वह तो अभी उसके लिए दूसरी बार आना पड़ेगा पहले से ही ठाकुर के पास में रिजर्वेशन करवा देना पड़ेगा की अब ठाकुर जब भी नेक्स्ट टाइम आएंगे हमको इस तरह से लेकर आना की जब आपके पास में फ्री टाइम हो या हम आपके साथ हम बात कर सके तो यह जो सब घटनाएं भी वह उसे दोनों की है जबकि ठाकुर साधना भी उन ठाकुर के साधना तो वैसे समाप्त कभी नहीं होती और पहले तो बात है दूसरी बात है की ईश्वर को वैसे साधना की जरूर भी नहीं है ये सब तो लोगों को दिखाने का एक लोक शिक्षा देने का एक बहन है तो जो भी है ये इतने सुंदर दोनों की सब बातें हैं की वो पढ़कर के मां को इतना शांति मिलता है की चलो ठाकुर किसी के साथ में इस तरह से वो वहां पे साधु आया है तो कृष्णा किशोर को बोलते हैं चलो साधु को देखकर के आते हैं और दोनों उनको मिलने को जाते हैं आज जल्दी हमारे प्रेसिडेंट महाराज है या तो फिर हमारे कोई सीनरी साधु किसी जगह की मुलाकात लेंगे तो साथ में कितने भक्ति कितने सेवक सन्यासी दूसरे भी साधु कितने लोग साथ में जाएंगे क्योंकि क्या है की आज रामकृष्ण मिशन का जो एक भक्तों का रामकृष्ण मिशन के प्रत्येक श्रद्धा भक्ति इतना बाढ़ गया है की हमारे प्रेसिडेंट महाराज या तो फिर हमारे सीनरी साधुओं के साथ में उनका सत्संग करने का एक इस तरह का एक सबके हृदय में एक ऐसी आकांक्षा जागृत हुई है हमारे सीनरी साधुओं का सत्संग करने से जीवन में सुख शांति मिल सकते हैं हमारे कर्मों का ये जो बंधन है या तो बाहर है वो लाखों हो सकता है वो कम हो सकता है ये सबको अभी धीरे-धीरे पता चलने लगा है तो हमारे अभी जैसे की यहां पे प्रेसिडेंट मारा जाएंगे तो कभी-कभी मैं सोचता था की चलो प्रेसिडेंट महाराज या तो वाइस प्रेसिडेंट महाराज या तो दीक्षा गुरु आए हैं तो हम साधु लोग उनके साथ में बैठ करके थोड़ी सी बात करेंगे मैं अपने मां का कोई प्रश्न करूंगा किंतु वह भी संभव ही नहीं है क्योंकि इतने सारे लोग लाइन लगाकर महाराज के साथ को महाराज को प्रणाम करने के लिए खड़े होते हैं उसे समय हम साधु लोग पहले प्रणाम कर देते फटाफट चलो प्रणाम कर लो देवोटी लोगों की लंबी लाइन खड़ी है ऐसा बोल के फटाफट प्रणाम करके निकाल गए और फिर भक्तों का प्रणाम एक के बाद एक चालू हो जाता है तो इस तरह से अभी क्या है की लोगों की श्रद्धा भक्ति बाढ़ रहे हैं इस पर गलत कुछ नहीं है किंतु फिर भी यह देखकर के हमारे मां में वह एक ऐसी आकांक्षा एक ऐसा सपना एक ऐसी एक क्या कहेंगे की एस्पिरेशन तो आएगी ही आएगी की ठाकुर के साथ में इस तरह से मिला जाए जब मैं और ठाकुर कृष्णा ईश्वर की जगह मैं हूं और ठाकुर के साथ में जा रहे हैं रास्ते में वो चलते-चलते और फिर वो साधु को मिलने के लिए गए अभी साधु को मिलने का तो बहन है ठाकुर का जो रास्ते में संघ होता है वही एक सबसे बड़ा हमारे लिए प्राप्त किया है तो यह उसे दोनों की बात है यह साधु की साधु को मिलने जान की तो बात हुई इसके बाद में ठाकुर अपने उसे जीवन की बात आगे बढ़ते हैं कहते हैं लेकिन कृष्णा किशोर ने मुझे पूछा था तुमने यह जो ऊपर क्यों दिया कहते हैं जो की ब्राह्मण लोग गले में वह जो कॉटन जो का उसका वह जो यह 3d कहते हैं की तुमने अपना पवित्र फेक क्यों दिया जो अभी यह तो पता है की ब्राह्मण के लिए ओपन सेरेमनी का यह जो भीम है अप वित्त पहने की भीम जो है अप पट पहने का वो जो एक इंपॉर्टेंट है एक उसका एक नेसेसिटी है वो जो जो ब्राह्मण है उनको पता है की क्या है की ये हमारे संस्कारों में से एक है और वो क्या है की वो विद्याभ्यास करने के आगे इसको पवित्र पहने जाता है रामकृष्ण मिशन में भी जब ब्रह्मचर्य की दीक्षा देते हैं तब ब्रह्मचारी को ऊपर्वित ये जो ब्रह्मचर्य दीक्षा की जो सेरेमनी है उसका ही एक भाग है पवित्र धरण करना फिर जब सन्यास ग्रहण करते हैं तो यही उपविवित को हम जो अति पवित्र विराज होम है वीर जा अग्नि है उसके भीतर में दाल दिया पहले धरण किया क्योंकि विद्या व्यास एक पवित्र जीवन का वो चिकन है ब्रह्मांत्व का वो चिकन है और सन्यास के समय दाल दिया क्योंकि जितनी उपाधि है जितने भी लक्षण है जितने भी अहंकार को प्रकट करने वाली चीज हैं ये तो सात्विक अहंकार है ब्राह्मण होने का विद्याभ्यास करने का साधना करने का तो उसको भी किंतु तिलांजलि दे देनी है उसको भी अग्नि में उसको दाल देना है तो सन्यास के समय उपवित जो है हम लोग भी उसको अग्नि में उसको स्वाहा कर देते हैं तो यहां कृष्णा किशोर पूछता है की पत्ता फेल लेकिन हो पवित्र क्यों फेक दिया जख्म ठाकुर कहते हैं जोखन अमर आयो अवस्था हलो तो खून अश्विनी जुड़े और तो एकता की ऐसे कोठाई की उड़िए लो जब मेरी प्रथम यह अवस्था हुई तब अश्विन की झाड़ की तरह क्या एक स्वर हो गया मेरे सर पे और मेरा सब कुछ लेक चला गया अभी देखिए यहां पर कुछ डिफरेंट डिफरेंट कॉन्सेप्ट है हमने ऑलरेडी बात की है की ठाकुर का क्या कहना चाहते हैं जब वह कहते हैं है की मेरी यह अवस्था हुई यह अवस्था अर्थात ईश्वर का भर ऐसे हुआ की वह उनकी मां फिर उन श्री शरदामणि देवी जिनके साथ में उनका विवाह हुआ था फिर वो कालीबाड़ी के ब्राह्मण है कालीबाड़ी के पुजारी है सब चीज कहां उनकी चली गई दिन रात ईश्वर का नाम लेकर के पागल हो गए थे और अब जैसे वो कालीबाड़ी के वो खजांची है वगैरा उनके कानों में बात गई की चौक भट्टाचार्य ने ठाकुर को ठाकुर के बड़े भाई को भट्टाचार्य महाशय कहते थे तो ठाकुर को कहते थे छोटे भट्टाचार्य महाशय तो यह जो छोटे भट्टाचार्य महाशय है वह कुछ विचित्र ढंग से मां की पूजा कर रहे हैं तो यह लोग देखने के लिए आए देखा क्या देखा की मां के श्री चरणों में जो फूल अर्पण करना है वह कभी अपने सर पर धरण कर देते हैं मां को भोग जो देना है तो कभी अपने से ही ग्रहण कर देते हैं या तो फिर मां को भोग में देने के लिए जो पुरी बनाई है वो बिल्ला बिल्ली को मिला देते हैं बिल्ली मां का प्रतीक क्या है मां काली का तुम बिल्ली को बिल्ली के भीतर में महाकाली को देखकर के बिल्ली को वो भूख की पुरी मिला दी ऐसा किस तरह से एक विचित्र आचरण करते हैं और कोई इस तरह का आचरण करेगा पुजारी तो वो तो पाप में पद जाएगा किंतु ये तो ठाकुर है अभी ठाकुर अभी ये लोग जो सब देखने के लिए आए तो हमारे मां में प्रश्न होगा की ठाकुर को इस तरह से करते देख कर के हृदय खुद कहता है की मैं जाकर के ठाकुर को देखने के लिए गया तो मां ठाकुर मां काली को शयन करवा रहे हैं तो शयन करवाते करवाते बोल रहे हैं जैसे मां काली के साथ में सही अभी उसको तो यह नहीं दिखेगा हृदय को हृदय ठाकुर का सेवक था भांजा था ठाकुर का सेवक था तो हृदय को ये सुनने में आया की ठाकुर इस तरह से विचित्र कुछ आचरण कर रहे हैं तो देखने के लिए गया देखा की मां काली के सायंक्ष में ठाकुर मां काली को शयन करवा रहे हैं तालिका एक बेड बना है बिस्तर जो बना है उसके अभी उसके सामने जाकर के ठाकुर मां काली के साथ बात कर रहा है इस तरह से बात कर रहे हैं जैसे की ग रहा हो की मां ठाकुर को का रही है की तुम मेरे साथ में इस बेड के ऊपर में तुम मेरे साथ में शयन करो जिसे मां अपने बच्चे को कहती है अपना एकदम लाडला बच्चा है तो मां रहेगी मैं भी लेटी हूं आओ तुम भी मेरे साथ में आकर के सो तो मां का इतना प्रेम होता है इतना स्नेहा होता है बच्चे के ऊपर में तो ठाकुर बोलते हैं महाकाली को अच्छा मां क्या तुम कहती हो की मैं तुम्हारे साथ में सॉन्ग अच्छा ठीक है ऐसा बोलकर के ठाकुर महाकाली के पेड़ के ऊपर में उनके साथ में लेट गए इतना भयभीत हो गया वह सोचता है क्या देवता के साथ में आप इस तरह से थोड़ी ना कर सकता है यह तो किस तरह का महापाप है तो अभी हमारे मां में प्रश्न होगा हृदय जब यह सब देखा है तो क्या ठाकुर को उसे समय उसने कुछ कहा नहीं होगा की अरे मामा आप यह क्या कर रहा है हृदय ठाकुर को मामा करके पुकारता था है की वह उनका भांजा था तो अभी हृदय खुद लिखना है की इस समय ठाकुर जब मां काली के साथ में बात कर रहे हैं उसे समय उनके चेहरे पे इस तरह की एक प्रचंड एक पवित्रता की अग्निशिखा वो प्रज्वलित हो रही होती थी की उनके ऐसा लगता था की ठाकुर के सामने स्वयं मां काली और यही जग तीनों लोक को धरण करने वाली मां जगदंबा स्वयं ठाकुर के सामने खड़ी है बात कर रही है ठाकुर को स्नेहा कर रही है और यदि ठाकुर को हम कुछ ऐसा कुछ खाने को जाएंगे ऐसा भाव भी यदि मां में प्रकट होगा तो ऐसा भयानक एक डर उनके हृदय में बैठ जाता था जैसे मां काली की कप दृष्टि उनके खुद दृष्टि उनके ऊपर में गिरेगी तो जो महाकाली एक नजर से तीनों लोक को जलाकर भस्म कर सकते हैं तो यह तो कालीबाड़ी ये लोग तो सब कौन सी खेत की मूली है यदि मां उनके ऊपर नाराज हो गई तो क्या से क्या नहीं कर देगी तो ये खजांची फिर हृदय ये सब अपनी नजरों से देखते हैं ये सब सुनकर के ठाकुर किस तरह की पूजा करते हैं तो देखने के लिए आए अपनी नजर से देखते हैं की ठाकुर इस तरह का आचरण कर रहे हैं किंतु ठाकुर को उनके सामने कुछ भी खाने का उनका साहस नहीं है क्योंकि मां का स्वयं उपस्थित वहां पे है तो ये ठाकुर कहते थे की मेरी जब यह अवस्था हुई तब अभी दूसरा है कहते हैं की अश्विन की जड़ की तरह क्या एक आया अभी अश्विन की झाड़ ये अश्विन महीने में एक बहुत बड़ा तूफान आया था अभी वह कौन से साल में आया था वह मैं भूल गया वो साल मैंने यह कथम रूप में उसका वर्णन है और किस तरह का वर्णन है देखिए की तूफान आया था बहुत लोगों को याद है बहुत सर नुकसान हुआ था तो लोग बात बात में कहते हैं की अभी इस तरह से समय गणना तो इतनी परफेक्ट नहीं होती थी पहले के दोनों में तो बोलते थे पशुं के झाड़ आई थी उसे समय हम यह घटना हुई थी या तो अश्विन की जड़ आने से पहले की बात है या तो उसके बाद की बात है तो वो झाड़ इतनी मतलब उसने नुकसान किया था की लोगों को सब समय वो था की अपने मां में की वो एक इस तरह से तूफान आया था अभी मास्टर महाशय कहते हैं मास्टर महाशय की उसके साथ में एक बहुत ही अच्छी एक स्मृति कथा है मास्टर महाशय उसे समय छोटे बच्चे थे और वह इस यह जो जब तूफान ए रहा था अश्विन महीने का उसे समय अपने घर में अकेले थे शायद उनके माता-पिता कहानी किसी मुलाकात के लिए कहानी बाहर गए होंगे किसी कम से जो भी है घर में अकेले थे और यह जैसे तूफान आना शुरू हुआ तब उनको इतना भयानक तूफान था की क्या से क्या नहीं हो जाएगा पृथ्वी पर जैसे प्रलय ए जाएगा इस तरह का तूफान था तो मास्टर महाशय सोच रहे हैं की अभी मेरा मृत्यु होने ही वाला है और छोटे बच्चे हैं तो क्या वो किसको प्रार्थना करेंगे क्या करेंगे किस तरह से सडनली उनको अनुभूति हुई की किसी एक व्यक्ति ने प्रगति हो करके उनको सांत्वना दे रहे हैं उनको शांत कर रहे हैं उनको धैर्य धीरज और साहस दे रहे हैं तो ये उनकी अनु उपस्थित अनुभव करके मास्टर महाशय को शांति मिले अभी बहुत सालों के बाद में मास्टर महाशय तो उम्र में बड़े हो गए ठाकुर के साथ में ठाकुर का दर्शन हुआ फिर एक दिन सोचते सोचते सडनली उनके मां में स्ट्राइक हुआ की अश्विन का जो तूफान आया था उसे समय मैंने जो उपस्थित किसी की अनुभव की थी वह यह ठाकुर की ही थी ठाकुर ने ही जैसे की वहां पर उपस्थित हो करके उनको सत्य हर दिया था उनको सांत्वना दी थी उनको साहस बंधुवाया था तो यह अश्विन की जड़ तो इसलिए ठाकुर उसको याद कर रहे हैं की वह अश्विन महीने का जो तूफान था जिसने इस इतना नुकसान फैलाया था तो ठाकुर कुमार देखकर के का रहे हैं मेरी जब यह अवस्था हुई जबकि मुझे ईश्वर के अलावा कुछ भी नहीं दिखता था उसे समय अश्विन के तूफान की तरह मेरी अचार ये जो व्यवहार जो सब कुछ जैसे की कोई ईश्वर का ईश्वर के प्रति प्रेम्मद यह प्रेम उन्माद मेरा अचार विचार ब्राहमणत्व सब कुछ कहा उदा के ले गया मुझे समझ में ही नहीं ए रहा ये जो उन्होंने कहा ना की उपवित क्यों फेक दिया तो जब यह ब्रह्मांत्व का अहंकार भी फेक दिया ठाकुर ने और ठाकुर ने अपने अहंकार को निर्मल करने के लिए की मैं ब्राह्मण हूं बाकी सब अहंकार से तो हम लोग क्या है की शायद हमको दिखता है की धन का एक अहंकार होता है एक पावर का एक अहंकार होता है विद्या का एक अहंकार होता है किंतु ब्राह्मण होने का वगैरा अहंकार इतने सूक्ष्म होते हैं की कभी-कभी हमको पता भी नहीं चला की मेरे भीतर में वह अहंकार है तो इस तरह अहंकार से मुक्ति अपने के लिए ठाकुर ने क्या किया था वहां जो बेहतर थी वो जहां के टॉयलेट वगैरा जो क्लीन करता है नीचे जाति का उसका टॉयलेट ठाकुर ने जाकर के अपने बालों से क्लीन किया था सोच लीजिए की वो मतलब किस तरह से उन्होंने अपना ये जो भीतर का ये जो अहंकार है उसके ऊपर में आघात करने के लिए उसको तोड़ देने के लिए किस तरह से उन्होंने ये सब साधनाएं की थी यह अहंकार जो मतलब अहंकार स्थल अहंकार घमंड जिसको कहते हैं वो दिखता है किंतु यह जो सूक्ष्म अहंकार है ना जन्म-जन्मांतर का चला आता हुआ वो इतना इजीली नहीं दिखता स्वामी जी की जो कहानी है बड़ी फेमस कहानी है गरीब रजत थे और पूरे भारत में घूम रहे थे भिक्षा मांग करके जो भिक्षा देगा जितनी भिक्षा मिलेगी वो खाएंगे रहेंगे तो एक दिन क्या हुआ रास्ते से जा रहे हैं और एक आदमी को देखा बैठा-बैठा हुक्का पी रहा है अभी स्वामी जी को भी यह सब थे वह हैवी वगैरा बहुत लगी हुई थी तो उन्होंने रास्ते जाते देखा वो आदमी हुक्का पी रहा है तो जाकर के उसको बोला की अरे भैया मुझे भी थोड़ा सा हुक्का पीने दो तो वो आदमी बड़ा संकुचित होकर के बोला की महाशय आप तो साधु है मैं नीचे जाति का हूं मैं अपना हुक्का आपको कैसे पीने डन तो स्वामी जी भी बोलना है अच्छा ठीक है चलो वो तो नींद जाति का है मैं और ऐसा बोल कर के सोच से सोचते तो आगे चले थोड़े दूर गए सदैली उनको स्ट्राइक हुआ है ये ये क्या मतलब मैं स्वामी जी कहते हैं की सबको इक्वल होना है सबको इक्वल अपॉर्चुनिटी मिलनी है और यहां तक कहते हैं की ब्राह्मण के लड़के को यदि एक टीचर की आवश्यकता है एक शिक्षक की आवश्यकता है तो शुद्ध के लड़के को 10 शिक्षक की आवश्यकता है क्यों क्योंकि उसके बेचारे के पास में ये हिस्टोरिकल अन्य हुआ है उसके पास में ये शिक्षा प्राप्त करने का उसका ये जो हक है उसकी जो अपॉर्चुनिटी है उससे उसको वंचित किया गया है तो ब्राह्मण के लड़के के लिए एक शिक्षक की व्यवस्था करते हो तो शुद्ध के लड़के के लिए 10 शिक्षक की व्यवस्था करो ये खाने वाले स्वामी जी वैसे ही आगे बाढ़ गए क्या शुद्ध है वह उसका कौन पिएगा थोड़े दूर जान के बाद में उनको लगा अरे मैं ही ऐसा सोचता हूं तो सोच लो की दूसरों के साथ क्या स्थिति होगी वापस आए फिर उसके साथ में बैठे बोला दो का तो बेचारा बड़ा संकोच करके बोल रहा है की महाराज जी महात्मा जी मेरा हुक्का पिएंगे तो फिर मुझे पाप होगा ऐसा सब उल्टा-पुल्टा लोगों को पढ़ा गया हो तो स्वामी जी ने जोर करके हुक्का उसके हाथ से खींच लिया हुक्का पिया बड़े मजे से उसको आशीर्वाद भी दी है फिर आगे निकाल गए तो ये जो जन्मगत जो संस्कार का जो अहंकार होता है वो कितना सूक्ष्म होता है समझ में नहीं आता तो इस अहंकार से मुक्त होने के लिए ब्राह्मण की ये जो निशानी है उपवित वो ठाकुर ने निकाल कर के रख दिया था यह ठाकुर कहते हैं तब अश्विन के तूफान की तरह क्या एक आया और मेरा सब कुछ उदा करके ले गया घोषणाएं कपड़ पड़े जाते मां करें किसी तरह का होश नहीं राहत था जब ईश्वर का आवेश होता था कपड़ा तक निकाल जाता था धोती जो पहना थे वो भी वो निकाल जाति थी तो यह उपाधित कैसे रहेगा परमहंस जो होता है बालक की तरह हो जाता है लज्जा घृणा भाई तीन उसके भीतर नहीं राहत जब हम जैसे दिगंबर होंगे तो लोगों के सामने तो हम दिगंबर रहने के किस तरह से कल्पना कर सकते हैं हमको लज्जा होगी किसी को घृणा भी होगी डर भी लगेगा की लोग क्या कहेंगे किंतु यह तीनों जो बच्चा होता है वो देखेंगे छोटा बच्चा वैसे ही बिना कपड़ों के इधर-उधर दौड़ रहा है मां उसके पीछे दौड़ रही है कपड़े पहने के लिए वो पकड़ी है बच्चे को तो बच्चे चिल्लाना शुरू कर देता है तो यह बच्चे की तरह उसका अचार हो जाता है परमहंस जो होता है बिल्कुल बच्चे जैसा होता है छोटे शिशु जैसा होता है निर्मल पवित्र शिशु जैसा तो वह अभी कपड़े ही शरीर के ऊपर में नहीं रहते तो ऊपर भी कहां से रहने वाला है ठाकुर कहता है आर्मी बोलना तोमर एक बार उन्माद हुए तहला तुमि बोजो में ठाकुर ने कहा कृष्णा किशोर को तुम यह जो बोल रहे हो की बार-बार मुझे मेरे सर पे ऊपर में प्रमोद मैड हो जा रहा है तो यह जो ब्राह्मण होने कितने जनों के बाद कितने जनों की तपस्या पूनिया करने के बाद ब्राह्मण शरीर धरण होता है तो इस ब्रह्मांत्व को तुमने फेक करके महाप्रज किया है उल्टी-पुल्टी बातें कर रहे हो तो तुम्हारे सर पे एक बार प्रेमोनाद ईश्वर के ऊपर में हो जाएगा स्वर तब तुम देखना की क्या व्यवस्था होती है ठाकुर कहते हैं उसको खुद को उन्माद हो गया उसके घर वालों ने सोचा माता खराब हो गया है बोलकर के कविराज की उसे समय के अवैध दिया उसको बुलाया नता घोड़े राम कविराज येलो नतागढ़ जगह का नाम है मुझे पता नहीं कहां पे है किंतु है वहां के कविराज अर्थात की विद्या उसका नाम है राम राम कविराज आया नतागढ़ से कृष्णा किशोर ताकि मल लोगो अमर रोग आराम करो किंतु देखो हमारे अमर ओंकार दी आराम करो ना कृष्णा किशोर ने उसको कहा मेरा ये जो रोग हुआ है की मैं चुपचाप एक घर में बैठा राहत हूं और किसी चीज के प्रति मेरा मां नहीं जाता वो तुम ठीक कर देना क्योंकि मेरा सब कम रुक जाता है किंतु यह मेरा ओंकार है उसको ठीक मत करना वो वैसे ही रहने देना यह ओंकार का जो रोग लगा है वह रोग यहां से निकालना की कोई जरूर नहीं ईश्वर करें की ओंकार जाप करने का रोग सब समय मेरे सर पर बना रहे किंतु मैं कुछ और कुछ नहीं कर का रहा चुपचाप एक कमरे में बैठा हूं उसको थोड़ा ठीक कर दो क्या कहते हैं की मेरा सब कुछ ठीक कर दो किंतु ओंकार ठीक करता नहीं ठीक मत करना सब लोग हंसने लगे एक दिन यह अच्छी बोसे भाव से ठाकुर ने कहा की एक दिन में कृष्णा किशोर के घर जाकर के देखा की बैठकर के सोच रहा है अभी हम लोग भी थोड़ा सोच कर थोड़ा कल्पना कर सकते हैं की ठाकुर अपने कमरे में बैठे होंगे या तो काली मंदिर में वो मां की पूजा करने के बाद में थोड़ा सा समय मिला होगा वो गंगा के किनारे टहल्दे टहल से सदा ही उनके मां में ए गया होगा की चलो जाकर के कृष्णा किशोर को मिलते हैं वो उनके घर जा रहे हैं रास्ते में और आज की तरह ट्रॉफी को धुआं और ये सब तो नहीं है कोई मैन पापुलेशन तो उसे समय आज से कितनी 150 ऐसी कुछ होगी तो मतलब कितना सुंदर दृश्य होगा एक और गंगा है कहानी पे वो बहुत सुंदर ये जो पेड़ वगैरा है पोट है फूल है और सुंदर रास्ता है मिट्टी का बना हुआ वहां से ठाकुर जा रहे हैं और मां भी कहां पे वो उद्धव ऊपर में वो चला गया होगा तो मैंने ये कल्पना अभी ये सब चीज देखिए की इसके ऊपर में कोई हम एन वीडियो बनाते हैं मूवी बनाते हैं या ऐसा कुछ बनाते हैं तो कितना सुंदर होगा किंतु पता है ना अपने इंडिया में क्या होता है कोई धार्मिक मूवी बनाना हमको आता ही नहीं पहले ऐसा होता था ये संत तुकाराम है या मेरा बाइक की है मैंने ब्लैक और व्हाइट वो मूवी अच्छी है बहुत पुरानी इंडिपेंडेंस से पहले की ना की उसके बात की ब्लैक और व्हाइट तो इतना सुंदर वो सब मूवी और ये सब बंता था धार्मिक आजकल धर्म के नाम पे जो कुछ भी मूवी या टीवी शो बनते हैं उसमें वो कचरा को छोड़कर के और कुछ नहीं राहत तो मैंने हम लोग कभी-कभी कल्पना कर सकते हैं की यह जो कथामृत में जो सुंदर वर्णन है उसके ऊपर में कोई जी ऐसा कोई प्रोड्यूसर या डायरेक्टर जो की ठाकुर के प्रति संपूर्ण श्रद्धा मां है जिसको की हिंदू धर्म हिंदू संस्कृति हिंदू हमारी परंपरा उसका बहुत अच्छे से ज्ञान है ईश्वर साधना क्या होती है उसको वह समझना है स्वयं सड़क है ऐसा कोई करैक्टर इस तरह की मूवी बनाएगी तो कितना सुंदर मूवी बनेगा इसके प्रत्येक सीन जो है आपको ऐसे लगेंगे जैसे की हम लोग सब समय अपने हृदय में उसको धरण करके रखें तो उन्होंने ठाकुर कहते हैं की एक दिन जाकर के देखा की वो बैठे-बैठे सोच रहा है चिंता में डूबा हुआ है तो मैंने एक ही सेंटेंस के पीछे आप देखिए की इतना सुंदर आप बना सकते हैं की ठाकुर रास्ते से जा रहे हैं उन उद्याृष्टि है या तो फिर अंतर्मुख दृष्टि है ईश्वर के प्रति ईश्वर को छोड़कर के और कुछ नहीं जानते किंतु फिर भी समाज में र रहे हैं जगत में र रहे हैं तो साधु संत का सत्संग करने की साधु संघ का साथ में बात करने की वो एक एक उनकी एक सात्विक इच्छा जो है वह भी इतनी प्रबल है की उनको पकड़ करके जैसे की कृष्णा किशोर के पास में ले जा रही है उनके घर में गए देखा कृष्णा किशोर बैठकर के चिंता में डूबा हुआ है जिज्ञासा कुर्ला की हो छे ठाकुर ने कहा की मैंने पूछा की क्या हुआ चिंता क्यों कर रहे हो क्या बैठकर के क्या सोच रहे हो तो कृष्णा किशोर बोल ले 100 वाला ऐसे छन लो ताई भाग ई कृष्णा किशोर ने कहा टैक्स वाले आए थे इसलिए मैं चिंता में डूबा हुआ हूं अभी वो टैक्स आज भी हम दे रहे हैं उसे समय भी टैक्स देना था मेरी इतनी इनकम है तो इतना वो गवर्नमेंट को देना है जिससे की आइडियल स्पीकिंग की मैं गवर्नमेंट को इतना रुपया देता हूं टैक्स देता हूं तो यह जो सब गवर्नमेंट सर्विसेज जो है यह रास्ता है पानी है बिजली है यह लो और ऑर्डर है मिलिट्री है यह सब ठीक से चले किंतु हमको पता है की हम जो टैक्स देते हैं पता नहीं कितना करप्शन होता होगा की सही सही में वो पब्लिक सेवा के लिए कितना खर्च होता होगा कितना कहानी किसी के पॉकेट में जानता होगा किंतु जो भी है उसे समय भी टैक्स वाले आए थे और वह क्या बोले बोले टेक्स्ट देने की बात थी टैक्स नहीं दिया तो टैक्स टैक्स वाले कहते हैं पैसा नहीं डॉग तो तुम्हारे घाटी बाटी अर्थात की ये जितने भी बर्तन है वो बीच देंगे फिर अभी बर्तन बीच देंगे तो किस चीज में खाएंगे किस में खाना पकाएंगे अभी यह बात सुनकर के कृष्णा किशोर टेंशन में बैठा है बेचारा तो ठाकुर कहते हैं आम ही बोलना की होने बेबी मैंने कहा अभी इतना टेंशन लेकर के इतनी चिंता करने से क्या होने वाला है ना ही घाटी बाटी चाहे वो बर्तन वगैरा लेक चले जाए तो मां के तो लोहे जैसे पर्दे ना और यदि तुमको भी बंद करके ले जाते हैं जय में डालने के लिए तो तुमको तो नहीं ले जा पाएंगे देखिए ठाकुर किस तरह से वो उन्होंने मजाक कर रहे हैं हंसी मजाक कर रहा है तुम ही तो कागो अर्थात आकाश का चिन्ह जैसे अध्यात्म रामायण वगैरा में आता है की हम लोग आकाशवत है अर्थात मां है शरीर नहीं है तो बंद करके ले भी जाएंगे जय में डालने के लिए तो तुम्हारे शरीर को ले जाएंगे तुमको नहीं ले जा पाएंगे तुमको नरेंद्र वगैरा हंसने लगे यह बात सुनकर के ठाकुर कहते हैं कृष्णा किशोर बोलतो अमी आकाश बर्थ ठाकुर कहते हैं कृष्णा किशोर कहता था की मैं आकाशवत हूं अध्यात्म पर टोकी ना अध्यात्म रामायण पढ़ना था की नहीं इसलिए माझे माझे तुमि को बोले था-करता| इसलिए ठाकुर कहते हैं मैं बीच-बीच में तुम ख हो ऐसा बोल करके उसके साथ में हंसी मजाक करता था ऐसे बोलना ठाकुर कहते हैं मैंने हंसकर के कहा तुम्ही हो तुम तो का हो टक्सन टोमेक तो टांगे पर्दे टैक्स वाले जो है वह तुमको तो बंद करके नहीं ले जा पाएंगे जय में डालने के लिए यह देखिए की यह कभी-कभी हमने पिछली बार भी इसको डिस्कस किया था की यह जो वेदांत जो है वह ठीक ठीक से समझ में नहीं आने से हम लोग किस तरह की विचित्र बातें करते हैं की मैं आकाशवत हूं अर्थात मेरा कोई रोग नहीं है शोक नहीं है मेरा कोई रिस्पांसिबिलिटी नहीं अब मेरे सर पर कोई रिस्पांसिबिलिटी दे देगा की जो बाजार में से ये सब्जी खरीद के ले आओ मैं बोलूंगा अरे मैं तो का हूं मैं तो आकाश हूं मैं आकाश थोड़ी ना सब्जी लेने के लिए जाएगा और किसी को बोलो ऐसा करके हम जो है रिस्पांसिबिलिटी दाल देंगे किंतु जब यह टैक्स वाले आए हैं वो बोलेंगे तुम पैसा दो टैक्स दो वरना तुमको जय में दाल देंगे तब बड़े टेंशन में ए जाते हैं तब हम यह नहीं सोचते की शरीर को बांधकर के जय में डालेंगे तो मैं तो का हूं मुझे थोड़ी ना पकड़ के बांधने वाले हैं तो ये वेदांत ठीक-ठीक नहीं समझना से या तो फिर वेदांत के नाम पे चालाकी करने से क्या होता है जो जवाबदारी है जो रिस्पांसिबिलिटी है जो ब्यूटी है उसको हम भूल जाएंगे या तो फिर उसको छोड़ने का ट्राई उसमें से निकालने का ट्राई करेंगे बोलेंगे की मैं मेरे यह सब ड्यूटी मुझे नहीं लगती क्योंकि मैं आत्मा स्वरूप किंतु जब यह कोई बहुत बड़ा कष्ट ए जाता है शोक ए जाता है तब हम रो बिना की टेंशन लिए बिना की चिंता करें बिना नहीं र सकते तब हम यह नहीं सोच पाते हैं की मैं आत्मवृत्त हूं मैं आत्मा हूं या तो मैं आकाश हूं जब सही सही में मा कष्ट महा मुसीबत खड़ी हो जाए और मेरा मां शांत रहे तब समझना है की वेदांत हमने टिक टिक समझा है उससे पहले नहीं तो आज यही तक कल फिर से मिलते हैं ओम शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णा