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Sri Ramakrishna Kathamrita ·

श्रीरामकृष्ण कथामृत || 27 Oct 1882 - केशव सेन के साथ ठाकुर का नौका विहार || 2 Dec 2024

परिचय

ओम स्थापक य च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिणी अवतार वरिष्ठा राम कृष्णाय ते नमः ठाकुर का कथामृत लेते हैं इस सप्ताह एक सप्ताह हमने लिया स्वामी जी का राजयोग फिर एक सप्ताह लिया मां का जीवन तो अभी इस सप्ताह में हम लेते हैं ठाकुर का कथामृत केशव सेन के साथ में ठाकुर नौका विहार के लिए निकले थे गंगा के ऊपर में तो इस चैप्टर का हम पाठ कर रहे थे और देखा कि 27 अक्टूबर 18828 है और चैप्टर का नाम है श्री जुक्तो केशव चंद्र सेनेर सहित ठाकुर श्री राम कृष्णेर नौका बिहार आनंद और कथ उप कथन श्री केशव सेन के साथ में ठाकुर का नौका विहार नौका में बैठ कर के ठाकुर गंगा में भ्रमण करने के लिए जाते हैं आनंद करते हैं और कथ उप कथन करते हैं आनंद हमको पता है कि जहां पर ठाकुर होंगे आनंद तो होगा

कथामृत में तारीखों और विवरणों का महत्व

ही फिर हमने काफी कुछ देख ही लिया है अभी हम पंचम परिच्छेद जो है उसका आखिरी पार्ट हम लोग देख रहे थे तो हमने देखा कि किस तरह से केशव सेन कलकाता से एक जहाज भाड़े पर करके वह यहां पर आए दक्षिणेश्वर में मैसेज पहुंचाया ठाकुर अपने कमरे में बैठे हुए थे उनको मैसेज मिला कि केशव सेन आए हैं आपको बुला रहे हैं आप भी आइए तो फिर ठाकुर भी गए उनके साथ में गंगा पर भ्रमण करने के लिए उस समय ठाकुर के कमरे में विजय कृष्ण गोस्वामी भी बैठे हुए थे अभी हमको पता है कि यह ब्राह्मण समाज में किस तरह से केशव और विजय कृष्ण गोस्वामी का जो दल था जिसमें एक शिवनाथ शास्त्री भी शामिल था उन लोगों के बीच में डिफरेंस ऑफ ओपिनियन होकर के आर्गुमेंट होकर के इन लोगों ने केशव का साथ छोड़ करर के साधारण ब्राह्मण समाज की स्थापना की थी शिवनाथ शास्त्री और विजय कृष्ण गोस्वामी ने अभी यह साधारण ब्राह्मण समाज जिसमें कि स्वामी जी भी जाया करते थे स्वामी ब्राह्मण समाज के काफी कुछ डिवीजन हो चुके थे उस समय एक आदि ब्राह्मण समाज था फिर यह केशव सेन का ब्राह्मण समाज केशव सेन का ब्राह्मण समाज

स्मृति तकनीकें और कथामृत की लय

में से जब यह विजय कृष्ण गोस्वामी निकल गए और साधारण ब्राह्मण समाज की स्थापना की तो फिर केशव समाज ने अपना केशव सेन ने अपने समाज को नाम दे दिया नव विधान ब्राह्मण समाज तो यह नव विधान कहो ना कि साधारण कहो ना कि आदि यह सब डिवीजन वहां पर ऑलरेडी हो चुके थे उसमें हमको पता है कि नरन अर्थात स्वामी विवेकानंद वह खुद एक ब्रह्म समाज में जाते थे और जिस ब्रह्म समाज में जाते थे यह विजय कृष्ण गोस्वामी का साधारण ब्रह्म समाज अभी जब यह केशव सेन नौका करके ठाकुर के कमरे में ठाकुर के दक्षिण श्वर में आया काली मंदिर के पास में कहा कि आप भी चलिए हमारे साथ उस समय विजय कृष्ण गोस्वामी वहां पर बैठे हुए थे तो अभी ठाकुर जाएंगे और वहां पर वह बैठे रहेंगे ऐसा तो कैसा लगेगा ठाकुर ने कहा चलो तुम भी चलो हमारे साथ में तो यह विजय कृष्णा गोस्वामी भी ठाकुर के साथ में आए अभी किंतु देखिए ऑलरेडी विजय कृष्णा गोस्वामी और केशव सेन इन दोनों का ये डिवीजन हो चुका है और अभी ठाकुर उसको लेकर आए हैं तो उसको फिर अपमान भी नहीं कर सकते भगा भी नहीं सकते नहीं कह सकते कि हम लोगों के साथ में आप नहीं आ सकते तो अभी क्या करें ठाकुर को भी जिस तरह से निमंत्रण दिया विजय कृष्ण को भी निमंत्रण दिया वहां पर बिठाया किंतु केशव सेन थोड़े से अप्र हो गए थे थोड़े से शोभ में पड़ गए थे कि अभी क्या करें तो ठाकुर ने फिर इन दोनों के बीच में किंतु बात करवा दी कि देखो यह सब

कथामृत की त्रिगुणात्मक संरचना

तो चलता ही रहता है इसको बहुत ज्यादा माइंड नहीं करना है तो वह सब हमने काफी कुछ देख लिया है फिर यहां से आगे फिर हम लोग देखते हैं ब्रह्म यह ब्राह्मण भक्त ठाकुर को एक के बाद एक प्रश्न भी कर रहे हैं ठाकुर उनके उत्तर भी देते जाते हैं तो अभी एक ब्राह्मण भक्त ने ठाकुर को प्रश्न किया था कि महाशय शोप त्याग ना कोरले की ईश्वर के पाबा जाबे ना क्या सर्वत्र संपूर्ण रूप से त्याग नहीं करेंगे तो क्या हम ईश्वर को नहीं प्राप्त कर पाएंगे ठाकुर का जीवन तो सर्वजन विधि था ठाकुर को अभी सबको पता था कि हां उनका परिवार है अर्थात कि उन्होंने शादी की है किंतु मां शारदा के साथ में किसी भी तरह का सांसारिक संबंध नहीं है है तो दिव्य संबंध है तो वोह स्टोरी तो पूरे कलकाता में व्याप्त हो गई थी और ज्यादातर ब्राह्मण समाजी इंक्लूडिंग केशव सेन यह सब तो गृहस्थ थे तो नेचुरली है कि यह प्रश्न तो आएगा ही तो फिर ठाकुर क्या कहते हैं कि देखो मैंने तो ज्यादा साधना करके मैं तो जल गया हूं ठाकुर वो नक्शों खेला बोलकर के एक जो है उसको उदाहरण देते हैं अभी मुझे पता नहीं नक्श खेला क्या है हम जद अपनी अपना खुद से उसका एनालिसिस करें तो फिर कहेंगे कि ठाकुर कहते हैं कि ज्यादा साधना करके मैं जल गया हूं तुम लोग घर में हो अच्छे हो ठाकुर और एक जगह पर उदाहरण देते हैं कि किल्ले में से युद्ध करना और खुले मैदान में युद्ध करना किला अर्थात कि अपना परिवार यदि आपको खाने की जरूरत है बीमार हो गए हैं तो कोई संभाल रखने वाला चाहिए तो यह सब अभी जैसे कि वह पता है ना कि अ एक भामती टीका बोलक के वेदांत में एक है तो अभी क्या हुआ कि यह जो यह थे आचार्य जिन्होंने यह टीका लिखी वेदांत के ऊपर में तो उनकी उनकी शादी में उनका और और किसी एक आचार्य के साथ में आर्गुमेंट हो गया वेदांत के किसी पॉइंट को लेकर के तो इस आचार्य ने क्या किया उन्होंने कहा कि यह जो मेरा जो पॉइंट है उसको प्रूव करने के लिए मैं टीका लिखूंगा तो शंकराचार्य की ट्रेडिशनल लिखा तो अभी भाष्य लिख रहे हैं लिख रहे हैं शादी के दिन से ही प्रारंभ करके और कहीं 20 23 साल के बाद में जब यह भाष्य समाप्त हुआ तब उन्होंने देखा जब तक

ठाकुर की व्यक्तिगत कहानियों का महत्व

भाष्य चल रहा था तब तक वह इतने उसके भीतर में यह प्रवेश कर गए थे कि उनके आसपास में क्या चल रहा है कौन खिलाता है क्या खाते हैं किसी चीज का होश नहीं रहा वेदांत सब्जेक्ट ही एक ऐसा है कि यदि उसमें आप गहन में डुबकी मारे तो आप जगत को भूल जाएंगे तो फिर इन्होंने यह सब भाष टीका रिसर्च करते-करते 20 साल से भी ज्यादा समय बीत गया यह भाष्य जब समाप्त हुआ तब उन्होंने नजर उठा कर के देखा कि एक स्त्री है जो कि उनके लिए खाना रख कर के जा रही है तो अभी इनको इतने सालों के बाद में हुस आया एकाएक उन्होंने पूछा कि कौन हो तुम तब यह स्त्री ने कहा कि आपको पता नहीं मैं तो आपकी पत्नी हूं जिस दिन शादी हुई थी उसी दिन से आप यह टीका लिख रहे हैं रिसर्च कर रहे हैं और मैं आपकी केयर कर रही हूं जतन कर रही हूं तो यह आचार्य एकदम कहते एकदम खुश होकर के कहते हैं अच्छा क्या नाम है तुम्हारा देखिए पत्नी का क्या नाम है वह भी उनको पता नहीं था इतना वह अपनी कहेंगे कि लेखन साधना में डूब गए थे तो फिर उन्होंने जब पूछा तो उनकी पत्नी ने कहा मेरा नाम है भामती तो फिर इन्होंने इस टीका का नाम दिया भामती टीका तो देखिए कि जद आपको सर्वत्र छोड़ कर के सब छोड़ कर के किसी एक साधना में निमग्न हो जाना है तो एक उनकी केयर करने वाली उनकी धर्मपत्नी थी बोलकर के 20 साल से ज्यादा का समय उन्होंने रिसर्च और राइटिंग में जो लगाया पता ही नहीं चला कि क्या हो रहा है मेरे आसपास में यदि वह सन्यास लेकर के वन में रहते तो पहला तो उनको टेंशन होता भिक्षा का कि कब मैं भिक्षा के लिए जाऊं कितनी भिक्षा मिल मिलेगी कैसे मैं भिक्षा ग्रहण करूंगा कहां-कहां जाऊंगा सर्दी गर्मी होने से ठंड लगने से अपनी चिंता अपने को ही करनी है तो ठाकुर यहां पर इस तरह से कहते हैं कि मैं किल्ले में आप लोग किल्ले में रहकर के युद्ध कर रहे हैं अर्थात कि आप लोग जो यह आध्यात्मिक साधना कर रहे हैं अपने परिवार से परिवृत्त होकर के इसका फायदा क्या है आपको कि आपकी साधना में बहुत ज्यादा विक्षेप नहीं पड़ेगा आपकी जो दिन प्रतिदिन की जरूरत है वह आपके परिवार जन उसका कुछ ना कुछ निराकरण करेंगे जबकि ठाकुर कहते हैं मैं खुले मैदान में रहकर युद्ध कर रहा हूं अर्थात कि अभी देखिए कि ठाकुर और मां के जीवन में तो हम देख ही रहे हैं ठाकुर की केयर करने वाला उस समय कौन था तो वह था हृदय अभी हृदय जितनी केयर करता था ठाकुर की उतना ही ठाकुर को कष्ट भी देता था इसका परिणाम यह आया कि ठाकुर एक बार आत्महत्या तक करने के लिए गंगा में डुबकी मारने के लिए गए थे यहां तक उसने ठाकुर को त्रास दिया था परेशान किया था तो देखिए व जब हृदय चला गया और जब मां रेगुलरली काली मंदिर में दक्षिणेश्वर में रहने लगी फिर मां ने जिस तरह से ठाकुर की सेवा का भार ग्रहण किया किस तरह से ठाकुर बार-बार समाधि में चले जाते हैं तो यहां पर मां है कि जो कि उनको कैसे भी करके दिन

भौतिक और मानसिक कर्म को समझना

प्रतिदिन की वार्तालाप करके ठाकुर का मन इस पृथ्वी पर रखती इस जगत के लोक में रखती ठाकुर को आहार करवाती यहां तक कि ठाकुर को झूठ बोल कर के ज्यादा ज्यादा दूध पिला देती थी मां ठाकुर को संदेह होता है मां को पूछते हैं कि यह कितना दूध है तो मां तो क्या करती थी दूध को उबाल करके घना दूध करके ठाकुर को पिलाती थी और फिर झूठ बोलती थी कि ना ये जो घना दूध जो है उसी का परिमाण ही यह ठाकुर को पिला रही है तो देखिए कि यदि आप अपने परिवार जनों से व्यापत होकर के रहते हैं तो आपको साधना में सुविधा होगी यह बात ठाकुर यहां पे ब्रह्म भक्तों को कहते हैं किंतु हम लोगों को पता है कि देखिए कि जब आप इस तरह की कोई भी बात करते हैं तो साथ में आपको ठाकुर के दूसरे उपदेशों को भी आपको साथ में स्मरण करना होगा ख्याल में रखना होगा दूसरा उपदेश क्या है कि एक बार तो नेती नेती करके संसार त्याग कर देना है यहां पर संसार त्याग का अर्थ क्या है परिवार जनों का त्याग नहीं वह त्याग जैसे कि ठाकुर एक तो पता है ना नरेण और यह भवनाथ दोनों लोग ठाकुर के पास में साथ-साथ में आते थे ठाकुर कहते थे नर पुरुष है और भवनाथ प्रकृति है तो यह भवनाथ एक बार पान और मछली यह दोनों खाना उसने छोड़ दिया था तो अभी पान और मछली क्या है कि विलासिता का चिन्ह है राजसिक आहार है तो उसने सोचा कि मैं भी साधक हूं साधना कर रहा हूं इसका मैं त्याग करूंगा तो नरेंद्र ने ठाकुर को कहा कि भवनाथ पान माच छेड़े छे अर्थात कि भवनाथ ने पान और मछली खाना बंद कर दिया है तो ठाकुर ने क्या कहा कि अरे पान मा छाड़ ले की होए माने पान और मछली का त्याग करके क्या होगा ये जो ब्रह्मचर्य रूपी साधन है जो विषय वासनाओं का त्याग है वही सही सही त्याग है कामिनी कांचन त्याग ही सही सही त्याग है तो यहां पे हमको ये जो अपनी अंडरस्टैंडिंग है ठाकुर के उपदेश की वो बड़ी ही क्लियर रखनी है भले ही चाहे ठाकुर ब्रह्म भक्तों को ऐसा कहते हो कि आप लोग किल्ले में रह कर के युद्ध कर रहे हैं उसका अर्थ है कि आपको कम कष्ट होगा किंतु साथ में समय जो लगेगा साधन संपूर्ण करने

चेतना और अधिचेतना

में वह कितने जन्म जन्मांतर तक लग जाएंगे यह जो स्वामी जी ने राजयुग में उत्क्रांति की जो बात कही कि जो एक कोशी जीव से मनुष्य तक की जो उत्क्रांति है हमको 100 करोड़ साल लगे न बिलियन ईयर पृथ्वी की उम्र है पृथ्वी सर्वप्रथम गठित हुई थी आज से 4 बिलियन साल साल पहले दैट इज 400 करोड़ साल पहले और बिफोर न बिलियन इयर्स अगो अर्थात कि 100 करोड़ साल पहले पृथ्वी पर सर्वप्रथम जीवन पनपना शुरू हुआ था एक कोशी जीव कहो वह अस्तित्व में आए थे अभी 100 करोड़ साल लगे एक कोषी जीव से आज मनुष्य तक होने में यह जो उत्क्रांति की इतनी लंबी यात्रा है किंतु स्वामी जी कहते हैं कि ट इ इट इज नॉट नेसेसरी कि आप इतने लंबे समय तक इवॉल्व होते रहे मनुष्य से देवत्व की जो यात्रा है जो उत्क्रांति है उसको आप स्पीड अप कर सकते हैं बाय द साइंस ऑफ राजयोग बाय द साइंस ऑफ साधना बाय द साइंस ऑफ उपासना तो यह स्पीड अप करना यह जो आप खुले मैदान में रहकर युद्ध करेंगे तो उसका यह एक बेनिफिट है कि आप अपनी सा साधना को स्पीड अप कर पाएंगे यदि किले में रहकर के युद्ध करेंगे तो इससे क्या होगा कि आपकी जो साधना है उसकी गति जो है बड़ी ही स्लो हो जाएंगी ऐसा क्यों नहीं हुआ कि ठाकुर ने साधना के साथ-साथ में ही मां को दक्षिणेश्वर न बुला दिया और मां से अपनी सेवा न ग्रहण की ऐसा क्यों क्योंकि ठाकुर को भी पता था कि ना ही वो इस बात के लिए तैयार है ना ही श्री मां शारदा देवी तो सभी चीजों को समय लगता है एक बार ठाकुर को ब्रह्मज्ञान में प्रतिष्ठित हो जाना पड़ेगा उन्होंने एक बार कहा था कि ज यदि वह अर्थात कि मां शारदा जयदिश कल्प कामिनी कांचन त्याग का ब्रह्मचर्य व्रत का वो टी पाता कि नहीं हालांकि ऐसा कहने के बाद में ही शारदानंद जी महाराज कि जिन्होंने यह लिखा हो शारदानंद जी महाराज ही उन्होंने साथ-साथ में कहा है कि हमको पता है कि युगा वतार श्री रामकृष्ण देव के मन का जो यह संकल्प है वह कभी टूटने वाला नहीं है ही यह महामाया जगदंबा स्वयं मां शारदा उनके मन में कभी भी इस तरह का मनोभाव प्रकट होने वाला नहीं है किंतु यदि मान लीजिए कि इस लीला के क्षेत्र में आकर के हमको यदि उनको दिखाना भी है कि हां ऐसी कोई महा आपत्ति आ जाने के बावजूद ठाकुर के मन के संयम का बांध नहीं टूटा तो शायद ऐसा हो भी सकता था

जप और उच्चतर भावनाओं की शक्ति

देखिए एक बात मां और ठाकुर जब मां पहली पहली बार दक्षिणेश्वर में आई थी तब वह पूर्ण यौवना थी और ठाकुर के साथ में ही वह उनके कमरे में ही शयन करती थी तो ठाकुर ने एक वो तो ठाकुर को तो रात को सोना नहीं था था कहीं वह भजन गाते कहीं जब ध्यान करते व समाधि में भाव में जाकर के वह समय बिताते तो ठाकुर ने एक दिन रात को श्री मां को अपने पास में सोते हुए देख कर के कहा कि मन इसी को कहते हैं स्त्री शरीर और इसी के लिए पूरा जगत संसार पागल होकर के दौड़ रहा है क्या तुम इसका भोग करना चाहते हो यदि चाहते हो तो यह त्री शरीर तुम्हारे सामने ही है भोग कर लो मन और मुख एक रखो मुह से तो तुम बोल रहे हो कि कामिनी कांचन त्याग की बात किंतु मन में यदि तुम्हारा दूसरा कोई विचार है तो ऐसा मत करो मन में जो विचार है उसको बाह्य जगत में उसको इंप्लीमेंट कर दो ऐसा करके जैसे ही ठाकुर ने मां को स्पर्श करने के लिए हाथ बढ़ाया वैसे ही ठाकुर का मन समाधि में मग्न हो गया और दूसरे दिन कितने घंटों तक ठाकुर समाधि में ही रहे थे कितनी चेष्टा के बाद में हृदय है मां है वह ठाकुर को समाधि में से इस लौकिक जगत में ले आ पा रहे थे ले आ पाए थे तो देखिए कि ठाकुर जब हमको यह कहते हैं कि हां किल्ले में से युद्ध करना तुम लोगों के लिए अच्छा है मैं मैदान में रह कर के युद्ध कर रहा हूं वो मेरे लिए बड़ा कठिन है तो साथ में यह भी याद रखना है कि अभी जैसे इवन यह याद रखना है कि मैदान में से युद्ध

स्वतंत्रता और आत्मविश्वास पर ठाकुर के उपदेश

करने से उत्क्रांति की अर्थात कि सन्यास लेकर के आप साधन भजन करेंगे तो यह आध्यात्मिक उत्क्रांति की जो स्पीड है वह बहुत बढ़ जाएगी कंपेयर टू यदि आप गृहस्थाश्रम में रहते हैं और यह जो युद्ध का जो उदाहरण दिया ठाकुर ने यदि आप युद्ध शास्त्र का अभ्यास करेंगे तो उसमें भी आपको एगजैक्टली यह ठाकुर की उपमा फिट बैठी हुई मिल जाएगी देखिए कि किल्ले पर जब आक्रमण होता है दुश्मन का तो किल्ले को वह घेर लेते हैं और फिर क्या करते हैं व जितना भी सप्लाई चेन होता है किल्ले के भीतर में जाने का जैसे कि आहार है जैसे कि पानी है जैसे कि और कोई जीवन जरूरियत की चीजें हैं वह सब सप्लाई कट ऑफ कर देते हैं अभी किल्ले वाले सेफ तो है दुश्मन के सामने किंतु यह जो सप्लाई तो सब कट ऑफ हो गया है बाहर से जितने भी रास्ते किल्ले के भीतर में आते हैं खेत में से अनाज आता है नदी में से पानी आता है वह सब तो कट ऑफ हो गया है अर्थात कि शत्रु के पास में अभी समय ही समय है किल्ले में रहने वाले लोग धीरे-धीरे करके चीज वस्तुओं के अभाव में उनका मृत्यु होना शुरू हो जाएगा वहां पर बीमारी महामारी फैले गी और जब वह भीतर में से वीक हो जाएंगे तब यह लोग किल्ले का दरवाजा तोड़ कर के शत्रु से ना भीतर में चली जाएगी यानी एक लंबा एक सीज चलता है तो यदि किंतु यदि आपके सामने शत्रुओं का आक्रमण हो और आप किल्ला छोड़ कर के मैदान में आकर के एक बार युद्ध कर ले तो आर न पार जीतना है तो जीतना है हारना है तो हारना है कुछ ही घंटों में निश्चित हो जाएगा तो यह इसकी दृष्टि से भी युद्ध शास्त्र की दृष्टि से भी ठाकुर की उपमा बिल्कुल परफेक्ट है गृहस्थाश्रम में भी ईश्वर प्राप्ति होगी यह तो ठाकुर का वचन है अर्थात कि हम सबको भरोसा है किंतु एक बात है कि यदि आप त्याग के रास्ते पर जाते हैं तो आपकी आध्यात्मिक यात्रा की स्पीड बहुत बढ़ जाएगी बस इतना ही ठाकुर ने कहा यहां पे फिर कहते हैं देखो कितना बड़ा महामंत्र ठाकुर ने दे दिया है सतो बोल छी तुमरा संसार कोर छो ते दोष ई सत्य कहता हूं तो तुम लोग संसार कर रहे हो इसमें कोई भी दोष नहीं है देखिए कभी-कभी एक गिल्ट फीलिंग हमारे सर पर सवार हो जाती है मैं कुछ-कुछ लोगों ने मुझे बताया कि महाराज हम लोग भी तो साधु होना चाहते थे किंतु हो नहीं पाए उस समय अपने हमारे घर की जो जवाबदारी ऐसी हमारे सर पर आ गई बूढ़ी मां थी तो उनका केयर करने वाला कोई नहीं था तो किंतु अभी हमको पश्चाताप हो रहा है 50 60 साल की उम्र हो गई गई है अभी पश्चाताप हो रहा है कि हमने कैसे भी करके वह एक बार स्ट्रगल करके क्यों जॉइन करने के लिए नहीं आ पाए देखिए यह मैं जब राजकोट में था तब एक ब्रह्मचारी आया था तो उसका जो डेडिकेशन था उसका जो रामकृष्ण लिटरेचर रामकृष्ण विवेकानंद लिटरेचर पर जो प्रेम था अद्भुत था यही साउथ इंडिया से ही आया था और इंजीनियर था हाईली टैलेंटेड और उस समय में ब्रह्मचार्य के क्लास लिया करता था तो मैं सब समय उसको ऑब्जर्व करता था एंकरेज करता था देखता था कि व कितना उसमें डेडिकेशन है मैंने एक दो लोगों को कहा भी था कि देखो इस बच्चे का

स्वामी विवेकानंद की भूमिका और विरासत

भविष्य बड़ा ही उज्जवल है किंतु देखिए कि जैसी कैसी अभी ईश्वर की इच्छा ठाकुर की इच्छा कि उसके पिताजी का एक्सीडेंट में मृत्यु हो गया अभी घर में सिर्फ मां है और मां की मां अर्थात कि वो नानी है उसकी दो ही लोग हैं घर में और घर गांव में है और इन लोगों का ऐसा कोई पढ़ाई लिखाई नहीं कि अपने से अपना जीवन चला सके तो बेचारे को रातों-रात रात को जब न्यूज़ आया रात को बेचारा रो रहा है आधी रात को सब साधु लोग उसके पास में बैठे हैं उसको सांत्वना दे रहे हैं सुबह-सुबह अर्ली मॉर्निंग वो एक दूसरे महाराज जी के साथ में वह प्लेन में बैठ कर के अपने जो गांव के पास वाला शहर वहां पर आया फिर अपने वहां से गांव में गया अभी हम लोग यहां पे देख रहे हैं सोच रहे हैं कि अभी इसका क्या होगा मुझे तो पता चल गया था कि ऐसी परिस्थिति में वापस आना मुश्किल है किंतु यह ब्रह्मचारी फोन करके बाकी सबको कहता है वहां पर कि मैं आ ही रहा हूं कुछ दिन में बस यह थोड़ा सा यहां का मामला निपटा ल किंतु देखिए कि एक साल के बाद में जब वोह वापस भी आया तो उसका सर्टिफिकेट वगैरह लेने के लिए उसको वापस आना पड़ा और फिर वह जो गया सो गया हम लोगों ने अभी उसके वापस आने की आशा छोड़ दी है ये कैसा ठाकुर का यह लीला है कि इसकी इतनी इच्छा होने के बाद में भी एक ऐसी दुर्घटना हुई कि अभी उसको बेचारे को वापस जाना पड़ा अभी क्या है कि वह सब समय कहता है कि ना मैं कैसे भी करके वापस आऊंगा किंतु अपने ऑर्डर के जो नियम है एज लिमिट है कि ग्रेजुएट है तो 28 30 साल की उम्र में आपको जॉइन कर लेना है इसके बाद में अभी हम आपको एक्सेप्ट नहीं करेंगे तो अभी और दो-तीन साल जाएंगे उसकी एज लिमिट क्रॉस हो जाएगी फिर यदि वह घर का सब ठीक-ठाक करके वापस भी आना चाहेगा तो अपना संघ उसको साधु के रूप में एक्सेप्ट नहीं कर पाएगा तो क्या होगा कि उसके मन में शायद यह एक रह जाए कि अरे मैंने यह जो मेरा समय था साधु होने का वह समय मैंने गवा दिया और मैं सन्यास की सन्यास लेकर के साधना नहीं कर पाया यह गिल्ट फीलिंग क्या उसके मन में रह जाएगा तो यहां पर ठाकुर भरोसा देते हैं कहते हैं सततो बोल जीी तुमरा संसार कर छो ते दोष नाई सत्य सत्य कहता हूं कि तुम लोग जो संसार कर रहे हो उसमें कोई भी दोष नहीं है तबे ईश्वर द के मोन रखते होवे किंतु फिर क्या है पता है ईश्वर की ओर मन रखना होगा जैसे ठाकुर कहते हैं ना कि कामिनी कांचन तो मन में से जाने वाले नहीं है तो अपने मन की जो डायरेक्शन है उसको घुमा देना है क्रोध करना है तो करना है कि यह माया जो है क्यों मुझे प्रलोभन करने के लिए आ रही है यदि मेरे मन में अहंकार है तो ये अहंकार क्यों है कि मैं बड़ा आदमी हूं मेरे पास में पैसा है ऐसा अहंकार करो कि मैं ईश्वर का सबसे बड़ा भक्त हूं मेरे जैसा ईश्वर के प्रति निष्ठा और किसी की नहीं है इस तरह का अहंकार करो मैं इस तरह का क्रोध करो तो यह जो मन की दिशा है उसको घुमा देना है ईश्वर दिके मोन रखते होबे ईश्वर की ओर मन को रखना होगा ता ना होले होबे ना यदि ऐसा नहीं करेंगे तो किंतु होगा नहीं गृहस्थ आश्रम में रहते हैं मन को आपने कामिनी कांचन में लिप्त करके रखा है तो फिर गृहस्थाश्रम में ईश्वर साधना करना मुश्किल है किंतु गृहस्थाश्रम में रहते हैं और धीरे-धीरे करके अभी ऐसा तो नहीं है अभी जैसे अखंडानंद जी जब वह

akhandananda

पहली पहली बार दक्ष पहले उनकी तो इच्छा ही नहीं थी दीक्षा देने की महापुरुष महाराज ने बार-बार कहा तब कहीं जाकर करके उन्होंने दीक्षा देना प्रारंभ किया अभी

shivananda

किंतु दीक्षा देते हैं तो अखंडानंद जी के एकदम कठिन नियम है पति-पत्नी जद दीक्षा लेते हैं तो उनको व्रत लेना होगा महाराज जी को वचन देना होगा कि आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन करें अभी दो चीजें हो सकती है यदि आपकी सही सही में इच्छा है कि रामकृष्ण संघ के संघ में से दीक्षा ले तो फिर आपको इतना कठिन व्रत लेना होगा अभी यह किस तरह से आप इसका पालन करेंगे पति-पत्नी यह तो ताना मुश्किल है हो सकता है कि भविष्य में यह व्रत का कभी भंग हो जाए और फिर मन में एक भयानक गिल्ट फीलिंग आ जाए या तो फिर ऐसा हो सकता है कि झूठ मुठ का बोल दिया महाराज जी के पास जाकर के कि हां महाराज ब्रह्मचर्य का पालन करेंगे किंतु ऐसा तो होने वाला नहीं है तो अभी यह जो एक क्या कहेंगे कशमकश में जो यह जो पड़े थे जो भक्त लोग उन्होंने जाकर के महापुरुष महाराज जी को कंप्लेन किया कि महाराज गंगाधर महाराज है इस तरह का असंभव व्रत असंभव वचन हमसे चाहते हैं हम लोग गृहस्थाश्रम में रहकर के आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन करें कैसे हो सकता है यदि ऐसा हो सकता हम लोग क्या साधु नहीं हो जाते तो फिर महापुरुष महाराज ने अखंडानंद जी को बुला कर के कहा देखो गंजे तुम जिस तरह से ये गंगाधर महाराज को ये लोग गंजे से पुकारा करते थे स्वामी जी ने शुरुआत की थी तो गंजे से अर्थात की गंगा नदी जो है उसका इंग्लिश नाम है तो गंगाधर महाराज नाम में गंगा है तो गंजे से कर दिया तो महापुरुष महाराज महाराज कहते हैं कि देखो भाई हम लोग जिस तरह की तपस्या करते करते थे करते हैं इस तरह की तपस्या की तुम गृहस्थ लोगों के पास से अपेक्षा मत करो वे लोग तुमसे दीक्षा लेने के लिए शायद झूठ बोल देंगे और यदि वचन सही सही दिल से भी दे किंतु वचन का पालन नहीं कर पाएंगे फिर बिना मतलब संकोच में पड़ जाएंगे सोच में पड़ जाएंगे पश्चाताप करेंगे यह सब होगा अर्थात कि तुम दीक्षा देने के जो नियम है उसको थोड़े से रिलैक्स करो तो अभी देखिए कि अपने संघ में आज जो दीक्षा देते हैं अपने परम पूजनीय प्रेसिडेंट महाराज या तो फिर वाइस प्रेसिडेंट महाराज इस तरह का असंभव वचन किसी से नहीं मांगते हैं कि हां पति-पत्नी दीक्षा लेते हैं या तो फिर कोई गृहस्थ दीक्षा लेता है तो आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन करना पड़ेगा इस तरह का वचन कोई नहीं मानता है ज्यादा से ज्यादा इतना ही कहेंगे संकल्प के रूप में कि जो मंत्र लिया है उसको 108 बार प्रतिदिन हो सके तो जप करना यहीं तक वह वचन मांगा जाता है पहले पहले में गुजरात में किसी-किसी को कहता था आप दीक्षा लीजिए अभी तो मैं किसी को कहता नहीं किंतु जब नए-नए आते हैं ना हम लोग तो एक उत्साह रहता है लोगों को कन्वर्ट करने का तो मैं कहा करता था आप दीक्षा लीजिए तो फिर अभी क्या है कि जैन लोगों का तो एक ऐसा है कि दीक्षा लेना यानी कि कितनी तपस्या करना कितना कठोर करना क्या-क्या नहीं करना तो फिर मैं समझाता था नहीं रामकृष्ण संघ में कुछ नहीं है आपको हो सकता है कि दीक्षा लेने से पहले गुरु महाराज पूछे कि आपने यह दो-तीन किताबें पढ़ी कि नहीं स्वामी जी की कोलंबो टू अल्मोड़ा या तो लेटर्स ठाकुर का कथामृत बस

kathamrita

यही दो-तीन किताबें पढ़नी है उसी से आप एलिजिबल हो जाएंगे दीक्षा लेने के बाद में 108 जप करना है प्रतिदिन इससे ज्यादा कोई बहुत कठिन कार्य नहीं है तो देखिए कि वो एक था कि एक ऐसी डिमांड की जाती थी कि आपको एकदम कठोर नियमों का व्रतों का पालन करना होगा तब से लेकर के आज तक धीरे-धीरे करके सबको समझ में आता है कि महामाया के राज्य में जब रह रहे हैं तो 100% परफेक्ट होना किसी से संभव नहीं है गृहस्थ से तो नहीं ही है हम सन्यासियों से भी नहीं है यह एक मैं नाम भूल गया कि किस महाराज के साथ मोस्ट प्रोबेबली विरजानंद जी महाराज के साथ में यह घटना हुई है मोस्ट प्रोबेब तो अभी जैसे कि कोई सीनियर साधु है वह जूनियर साधु को डांटता है कहता है कि अरे हम तुम जैसे थे तो हम इतनी तपस्या करते थे हम उतनी तपस्या करते थे तुमको पता नहीं है रामकृष्ण संघ में साधु होने का क्या अर्थ है उस समय यह चाहे शारदानंद जी ने कि ऐसा ही किसी ने कहा उनको कि देखो भाई तुम जितनी तपस्या की हो उतनी तपस्या वह तुम्हारी नई जनरेशन नहीं करने वाले हैं वह संभव ही नहीं है और हमने जितनी तपस्या की है उसनी तप तपस्या तुम लोग भी नहीं कर पाओगे तो ऐसा कोई घमंड मत रखो वरा नगर की बात तो सबको पता है कि किस तरह से वे लोग

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तपस्या मय जीवन जीते थे और ठाकुर ने जितनी तपस्या की है उतनी तपस्या तो ये डायरेक्ट डिसाइल भी नहीं करने वाले हैं नहीं कर पाएंगे वो काशीपुर की वह फेमस घटना कि शरत

kashipur

महाराज लीला प्रसंग में लिखते हैं कि जब नरेंद्र जब ध्यान साधन भजन उपासना में ऐसा डूब गया था कि हम लोग भी बड़े प्रेरित

young naren

होते थे उनको देखकर के एक ऐसा एक उत्साह का वातावरण उस समय काशीपुर मठ में काशीपुर में था तो जब य ये बात ठाकुर को कही गई तो ठाकुर कहते हैं कि देखो नरेंद्र जो जितना ये कर रहा है तपस्या बहुत अच्छी बात है किंतु एखाने है अर्थात कि अपनी ओर इशारा करके कहते हैं कि यहां पे मेरे सर के ऊपर में से साधन भजन का जो प्रवाह बहा है जो एक झंझावात बहा है उसका एक शिकर शिकीयोकू माने अर्थात कि उसके सवा हिस्सा भी नरन नहीं कर पाया या नहीं कर पाएगा तब यह शरत महाराज कहते हैं यह बात सुनकर के

saradananda

हम लोग आश्चर्य में गर काव हो गए हम आश्चर्य में पतित हो गए कि अरे नारद की जो ये उपासना है साधना है वही हमको अभिभूत कर देती है और ठाकुर कहते हैं कि उनकी साधना का 100वां भाग भी नहीं नरेण नहीं कर पाएगा नहीं कर पाता है तो ठाकुर ने किस तरह की साधना की होगी किस तरह की तपस्या की होगी तो ये ऐसा है कि हम जद ऐसा कभी नहीं कह सकते कि हम लोग साधना में परफेक्ट है तपस्या में परफेक्ट है यथा संभव सन्यासी हो ना कि गृहस्थ हमको साधना करनी है तो ठाकुर कहते हैं किंतु ईश्वर की ओर मन रखना है बिल्कुल छोड़ देना वो भी उपाय नहीं है कभी-कभी क्या होगा होने ही नहीं वाला है तो छोड़ो दीक्षा ली मंत्र लिया गुरु महाराज से उसके बाद में कितने दिनों तक मंत्र का जप ही नहीं करते हैं ऐसे है कुछ कुछ लोग मैं राजकोट में कभी-कभी कोई दीक्षा मुझे पता है कि उन्होंने दीक्षा ली है रिसेंटली तो फिर जब वह आते हैं मुझे मिलने के लिए तो मैं मजा करके पूछता हूं क्या रे मंत्र याद है तो कि मंत्र भी भूल गया है दीक्षा लेने के बाद में 108 तो छोड़ ही दीजिए वो मंत्र भी याद रहता है कि नहीं वो भी मतलब मुझे पता है कि उनको याद है मैं मजाक करके पूछ रहा हूं तो देखिए कि यह दोनों एक्सट्रीम है कि एक्सट्रीम तपस्या यह भी हमसे नहीं किसी से संभव नहीं दूसरा कि बिल्कुल छोड़ देना यह अपने मन को बिल्कुल एक वासनाओं का गुलाम बनक बना के रख देना अपनी जो संकल्प शक्ति विल पावर है इसको बिल्कुल कमजोर हो कर देना यह भी उपाय नहीं है मध्यम पंथा जीवन में होने चाहिए यदि सन्यासी हो न कि चाहे गृहस्थ हो मन रहेगा ईश्वर की ओर इतना तो हमको करना है जैसे वह कंपास होता है ना जहाज को देखिए कि जहाज किसी भी डायरेक्शन में जाएगा वह यदि तूफान आता है झड़ आता है कुछ भी यह स्टोम होता है बारिश होती है जहाज कहां से कहां चला जाएगा किंतु कम कंपास का वो जो ये यह है साइन उसका वो ट्रू नॉर्थ ध्रुव अर्थात कि वो जो उत्तर का जो यह है उत्तर ध्रुव उसी की ओर वो पॉइंट करके रहेगा तो वैसे ही हमारा जीवन भी ऐसा होना चाहिए हमारा यह जीवन रूपी जहाज यदि झड़ वृष्टि यह तूफान उसमें फंस करके इधर से उधर मोमेंट हो भी जाए किंतु हमारा मन जो है वह ईश्वर की ओर ही पॉइंटेड होना चाहिए ईश्वर की ओर ही उसकी डायरेक्शन होनी चाहिए इससे होगा क्या कि जो मोमेंट हम रास्ता भूल गए हैं वहां से हम वापस आ जाएंगे और ऐसा होगा ही होगा यह जो भवसागर है संसार समुद्र है इसमें यह तूफान आते ही रहेंगे सुनामी आ ही रहेगी क्लाउड बर्स्ट होता ही रहेगा ऐसा किसी का जीवन नहीं है कि एकदम शांत पानी य एकदम उसका शांत महासागर की तरह हो और जिस दिन आपने यात्रा शुरू की जो ट्रू नॉर्थ उत्तर ध्रुव की ओर तो व उत्तर ध्रुव की ओर ही चलती जाएगी कभी भी इसमें किसी भी तरह का विघ्न नहीं आएगा जहाज भटक नहीं जाएगा ऐसा किसी के साथ होने वाला नहीं है किंतु जो जहाज है और कंपास है जहाज चाहे कितना ही और दूसरी दिशा में भटके कंपास हमेशा ट्रू नॉर्थ की और ही पॉइंट करके रहेगा तो वैसे ही अपना जीवन कितनी ही चाहे स्टोम है ना कि सुनामी है उसमें फस जाए मन ईश्वर की ओर रहना चाहिए ता ना होले होबे ना वो यदि नहीं होगा तो होगा नहीं एक हाथे कर्म करो आर एक हाथ ईश्वर के धरे था को एक हाथ से कर्म कीजिए और दूसरा हाथ से ईश्वर को पकड़ के रखिए कर्म शेष होले दई हाथे ईश्वर के धर मेंे कर्म जब शेष हो जाएगा समाप्त हो जाएगा तब दोनों हाथों से ईश्वर को पकड़ना है देखिए यह बड़ा ही सुंदर उपदेश है यदि गृहस्थाश्रम में है तो हमको पता है कि पहले 25 साल गृहस्थाश्रम उसके बाद में 25 वान स्था श्रम और 25 सन्यास आश्रम अर्थात कि आपको य एक समय दिया जाता है कि आपके भीतर में जो रजस है उसको वर्क आउट कर दीजिए यदि रजस है मन में और उसको आप वर्क आउट नहीं करेंगे तो आप सीधे तमस में जाकर के डूबेंगे यह जो सन्यास अपने समय से प्रीमेच्योर सन्यास ले लेना जब कृष्ण अर्जुन भगवान कृष्ण को कहता है कि मैं युद्ध करना नहीं चाहता तो भगवान क्या कहते हैं कि तुम्हारी हड्डिया तुम्हारे से युद्ध कर करवाएगी क्यों क्योंकि इसके भीतर में रजस है कथामृत में एक सुंदर उपमा ठाकुर देते हैं एक साधु ने जाकर के एक बादशाह को कहा कि आप भी हमारे साथ में आश्रम में आ जाइए आप भी हमारे साथ में बैठ कर के जब ध्यान कीजिए तो यह राजा ने क्या कहा कि महाराज मैं यदि आपके आश्रम में आऊंगा तो मैं वहां पर एक राज्य चालू कर दूंगा क्यों क्योंकि भीतर में रजस है वो रजस है तो उसका वो यह चाहिए फूड चाहिए आउटलेट चाहिए वर्क का वह नहीं करके आप जोर जबरदस्ती आप कर्म विहीन अवस्था में रहेंगे तो भीतर में से एक ऐसा रिएक्शन आएगा कि बिल्कुल आप मोरल करप्शन के गड्ढे में गिरेंगे तो बेटर है कि इसको आप वर्कआउट कर दीजिए किंतु एक बात है कि यदि अग्नि में घी डालने से अग्नि प्रशम नहीं होगा वह जैसे गीता में कहा गया है कि इसी तरह से यदि आप सकाम कर्म करते रहेंगे तो कर्म का फेरा कभी समाप्त नहीं होगा कर्म का फेरा यदि समाप्त करना है कर्म से मुक्ति पानी है तो आपको निष्काम कर्म करना पड़ेगा यह एक बहुत बड़ी कंडीशन यहां पर है जो कि हमको स्वामी जी ने समझाई है तो यह है कि अभी देखिए कि कितने स्टेजेस है एक तो है सकाम कर्मा जिसमें हम पढ़ेंगे एक बार अपने स्वार्थ के लिए सिर्फ स्वार्थ के बारे में ही सोचेंगे और दूसरों के बारे में कभी नहीं सोचेंगे तो फिर हम इस संसार चक्र से ऊपर कभी नहीं आएंगे किंतु एक ऐसा समय आएगा कि एक उदात्त विचार सध विचारधारा विचार सरणी हमारे मन में आकर के घर करेगी दूसरों के सामने भी हम देखना शुरू करेंगे अपने मन में करुणा दया और प्रेम का उदय होगा उस समय क्या होगा कि दूसरे को कष्ट समझ कर के यथाशक्ति उनको मदद जितनी कर सकते हैं वो प्रारंभ करेंगे तो ये निष्काम कर्म का प्रारंभ हुआ जितना निष्काम कर्म करेंगे उतना ही इसका पुण्य सकाम कर्म से जो पाप प्रकट होता है उसको काटता जाएगा और एक दिन ऐसा आएगा कि इन दोनों का सकाम कर्मा निष्काम कर्म का एक बैलेंस इक्वल हो जाएगा और अपना अकाउंट क्लोज हो जाएगा ये रजस का अकाउंट क्लोज हो जाएगा और हम सत्व के राज्य में सर्वप्रथम स्टेप्स रखेंगे तो यह है अपनी आध्यात्मिक यात्रा तो ठाकुर कहते हैं कि एक हाथ से कर्म करो एक हाथ से अर्थात कि सकाम कर्म जद करते हो अच्छा है दूसरे हाथ से निष्काम कर्म करना शुरू करो फिर एक समय आएगा कि सकाम कर्मा और निष्काम कर्मा अपने दोनों हाथों में जो दो तरह के कर्मा है उसका बैलेंस इक्वल हो गया और फिर क्या करेंगे दोनों हाथों से ईश्वर को पकड़ लो अर्थात कि पहले एक हाथ से सकाम कर्म करना ना है निष्काम कर्म में ईश्वर आराधना है या तो फिर करुणा है दया है सब आ जाता है तो दोनों हाथ से दो तरह का कर्म करते जाओ पॉजिटिव कर्म नेगेटिव कर्म एक समय आएगा यह नेगेटिव कर्म का अकाउंट क्लोज हो जाएगा फिर दोनों हाथों से ईश्वर को पकड़ लो कर्म शेष होले दई हाथे ईश्वर के धर्वे जब कर्म शेष हो जाएगा समाप्त हो जाएगा तब दोनों हाथों से ईश्वर को पकड़ना मन निय कोथा मन को लेकर के ही सारी बातें हैं सारा यह जो मामला है अपने मन को लेकर के ही है वह जो महापुरुष महाराज कहते हैं गुरु कृष्ण वैष्णव तीन दया होलो एकर दया बिने जीव छारे खारे गेलो अर्थात की गुरु कृष्णा और वैष्णव तीन की दया अपने पर हुई किंतु एक की दया नहीं हुई तो अपना जीवन हो गया बरबाद तो यह एक कौन तो वह है अपना मन मने तेही बद्धो मने ते मुक्तो मन से ही बद्ध है मन से ही मुक्त है मन जे रंगे छुपावे सेही रंगे छुपे मन को जिस कलर में आप डालेंगे जिस कलर आप मन के ऊपर में बिठाए वही कलर का मन होगा वो जो एक बड़ी एक सुंदर किताब है व जो श्री राम कृष्ण रंगर गाम अर्थात की ठाकुर ये जो ये उपमा देते हैं ना जिस कलर के रंग में वो गमले में अर्थात कि वह पात्र में रखेंगे उस रंग में रंग करके आपके कपड़े हो जाएंगे तो फिर वो कहते हैं कि जिस कलर का रंग जो रंगने वाला जो है वो जिस कलर का है वही रंग चाहिए हमको ठाकुर इसको बताते हैं कि जेमन धोपा घरेर कापड़ी से कि ये जो आप धोबी के वहां पर अपना वस्त्र देते हैं लाल छुपाओ लाल नीले छुपाओ नील सबूज रंगे छुपाओ सबूज यदि लाल कलर का वस्त्र करना चाहते हैं तो उसके पास में लाल कलर का डाई है यदि आपको ब्लू कलर का वस्त्र करना है तो ब्लू कलर का डाई है सफेद वस्त्र करना है तो सफेद जे रंगे छुपाओ से रंगे छुपे जिस रंग का डाई करेंगे उसी रंग का कलर उस वस्त्र पर होगा देखो ना जद एकट अंग्रेजी पढ़ो तो अमनी मुखे अंग्रेजी कथा ऐसे पढ़े जद थोड़ा सा इंग्लिश बोलेंगे सीखेंगे तो फटाफट करके आप इंग्लिश बातें बोलना शुरू कर देंगे ठाकुर खुद कम नहीं है वो जो वो एक उदाहरण देते हैं ना एक आदमी गया एक वहां पे हजाम के वहां पे वो हजामत करवा रहा है तो एकाएक क्या हुआ कि वो हजामत करते-करते वो अस्त्रा जो है उसकी धार इसको लग गई कस्टमर को थोड़ा सा खून निकल आया तो यह कस्टमर बोल उठ बोल उठा डम अभी ठाकुर ये बोलते हैं ना वो इंग्लिश शब्द ठाकुर खुद व्यवहार करते हैं डम तो ये जो हजाम था वो बड़ा ही नाराज हो कर के बोलता है किसको डेम बोलते हो क्या क्या है डेम का अर्थ उसको पता नहीं क्या है तो वो कस्टमर थोड़ा सा डर गया गया देखा कि हजाम के हाथ में अस्त्रा है और मोटा सोटा भी है तो बोला नहीं नहीं कुछ नहीं कुछ नहीं मैंने कुछ नहीं बोला तो वो हजाम वो नाराज हो कर के कहता है यदि डैम बुरा है तो तुम डैम और यदि डैम अच्छा है तो मैं डैम और सिर्फ डैम नहीं डे डे डैम डम जब ठाकुर यह बात कर रहे थे वो बंकिम चंद्र वगैरह जो भी थे बड़ा हंसना शुरू कर दिए ये मामला कैसे चालू हुआ था बंकी वो जो व उस समय का बड़ा साहित्यकार ठाकुर को साथ में ठाकुर का दर्शन करने के लिए आया ठाकुर की बातें सुन कर के आपस में गप लगा रहे हैं आपस में एक दूसरे के साथ में इंग्लिश में बोल रहे हैं ठाकुर के बारे में ही कुछ बोल रहे है अभी ठाकुर तो मूर्ख नहीं है इंग्लिश इतना नहीं आता तो यह समझ गए कि मेरे बारे में बात कर रहे हैं तो फिर वह पूछा कि क्या बोल रहे हो तो कोई उत्तर नहीं मिला तो फिर ठाकुर ने ये जोक कहा तो सब लोग हसना शुरू कर दिए तो देखिए कि ठाकुर ये शुरू से जब कलकाता में आए थे तो यह मथुर बाबू है रानी बहुत अंग्रेजी शिक्षक थे ही थे और उसके बाद में ये रामचंद्र द नरेण य राखल शशि शरद यह सब जो विश्वविद्यालय के पड़े हुए लड़के उनके पास में आना शुरू कर दिए थे वो अधर सेन था वो तो डेप्युटी था अर्थात कि वो डेप्युटी मैजिस्ट्रेट बड़ी उच्च पोजीशन कॉलोनियल इंडिया में तो मास्टर महाशय वो तो खुद टीचर थे तो ऐसे लोगों के साथ में वो बैठ कर के अंग्रेजी ये लोग बात करते हैं तो ठाकुर को भी अंग्रेजी सीखना वो बरा मैंने सुनते सुनते सीख लिया था एक बार ठाकुर नरेंद्र को और मास्टर महाशय को कहते हैं कि तुम दोनों लोग अंग्रेजी में तर्क करो मैं सुनना चाहता हूं यानी ठाकुर की भी ये सब क्यूरियोसिटी थी कि अंग्रेजी में तर्क कैसे होता है ठाकुर जैसे कि अपना ही उदाहरण दे रहे हैं कि एक टू जद अंग्रेजी पढ़ो तो अमनी मुखे अंग्रेजी कथा ऐसे पढ़े थोड़ा सा ही इंग्लिश पढ़ेंगे मुंह में इंग्लिश बातें आने लगेगी तो ठाकुर इन दोनों को कहते हैं मास्टर महाशय और नरेण कि इंग्लिश में तर्क करो मैं देखना चाहता हूं कैसे इंग्लिश में आर्गुमेंट होती है तो किंतु इन दोनों ने तर्क किया नहीं थोड़ा सा हंस कर के वे लोग चुप रह गए बांगला मेंही बातें उन्होंने की तो देखिए ठाकुर कहते हैं फूट फाट ईट मीट अर्थात कि फूट फाट ईट मीट ऐसे इंग्लिश शब्द अपने मुंह में आ जाते हैं सकलर हस्य सभी लोग हंसना शुरू कर दिए आभार पाए बूट जूता शीष दिए गान कोरा य सब ऐसे जूट में और फिर पैरों में जूता पहन कर के शूज ये जो बूट है बूट पहनना आ जाता है फिर यह मुंह में वो सीटी बजाते बजाते गान करना यह सब आन पड़ता है क्यों क्योंकि ये जो सब अंग्रेज लोग थे उन लोगों कीय सब हैबिट थी तो अंग्रेजी लोगों से यदि आप उनकी भाषा सीखेंगे तो उनके जो खानपान आचार व्यवहार वह सब भी तो आ जाएगा तो ठाकुर कहते हैं कि उनकी तरह ही बूट पहनेंगे और सीटी बजाते बजाते चलेंगे आबार जदी पंडित संस्कृत पढ़े अमनी सोलोक झाड़ में और यहां पर जद पंडित संस्कृत पढ़ेगा तो वैसे ही वह श्लोक झाड़ना शुरू कर देगा मन के जद कु संगे राखो तो शे रकम कथा वार्ता चिंता ऐसे जावे जद भक्ते संगे राखो ईश्वर चिंता हरि कथा ई सब हवे यदि आप मन को कुसंग में रखेंगे यदि आप ऐसे लोगों का संग करेंगे कि जिनका चरित्र अच्छा नहीं है तो मुंह में इसी तरह की बातें आ जाएगी और उनका संग करेंगे जिनका चरित्र अच्छा है तो उनके साथ में यही सब बातें आ जाएगी मन नियश मन को लेकर के ही सब कुछ है एक पासे परि बार एक पासे संतान एक और परिवार अर्थात की अपनी धर्म पत्नी है और एक और अपना संतान है एक जन के एक भाबे संतान के आर एक भाबे आदर करें अपनी पत्नी को एक तरह से वह उसके ट्रीट करता है अपने संतान को दूसरी तरह से ट्रीट करता है किंतु एकही मन किंतु एक ही मन है यह जैसे देखिए यह शेर होता है वो तो शेरनी जो होती है उसको अपने छोटे-छोटे बच् ब को लेकर के जाना है तो क्या करेगी अपने मुंह से उसको उठाएगी अपने दांत उसके जो दांत है शेरनी के वो तो कितने भयानक है यदि शिकार के ऊपर में वो जो जदी अपने दांत बिठा देगी तो पूरा उसको नोच लेगी किंतु वही दांतों से वही मुंह से अपने बच्चे को उठा कर के जा रही है किंतु कितना जेंटली उसको पकड़ा है तो यही दांत है शेरनी के वही शेरनी है वही मुह है किंतु शिकार को पकड़े गी तो ऐसा उसको नोच लेगी और अपने छोटे बच्चे को पकड़े गी तो इतना सावधानी से पकड़े गी कि बच्चे को थोड़ा सा भी इजा नहीं होगा इंजरी नहीं होगी तो एक ही शेरनी एक ही मुंह एक ही दांत किंतु शिकार को अलग पकड़े गी बच्चे को अलग पकड़े गी तो यहां पर यह जो चैप्टर है यह जो परिच्छेद पंचम परिच्छेद यहां पर समाप्त होता है कल से षष्ठ परिच्छेद इसका प्रारंभ करेंगे ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम

किले में रहकर साधना करने के बारे में -- रामकृष्ण संघ is best of both worlds.

[हंसी] कृष्णर्पण यह पॉइंट मुझे निकालना चाहिए था ठाकुर की लैंग्वेज में कहे तो विद्या का संसार किंतु यह देखिए बुद्धिस्ट संग के साथ में यह मां का बोध गया का जो है वो अच्छा आपका इनसाइट है कि बुद्ध ने शुरू किया था किंतु हम लोग बुद्धि संघ के साथ में कंटिन्यूटी है अपना यह पॉइंट मिस हो जाता है अभी मां का खुद का ही उदाहरण है मां ने उनको देख कर के ठाकुर को प्रार्थना की थी वेरी गुड कनेक्शन बिटवीन देम एंड अस किंतु देखिए मरब साधु उड़वे छाई तब साधुर गुण गाई साधु जब मरेगा उसकी चिता जलेगी राख उड़ेगी तब साधु का गुण गाना है यहां पर देखिए ठाकुर जो कहते हैं ना कि

ठाकुर कहते हैं कि जैसे-जैसे ईश्वर प्राप्ति की ओर बढ़ा जाएगा, वैसे-वैसे कर्म भी समाप्त होते जाएंगे। स्वामीजी कहते हैं कि सेवा ही सबसे बड़ा कर्म है। मोक्ष और भक्ति को भूल जाओ। यह विरोधाभास क्यों?

मने बध हो मने तेही मुक्तो तो बात यह नहीं है कि हम अपने देह से क्या कर्म करते हैं बात है कि मन से हम क्या करते हैं तो हमने इसका कर्म का टेक्निकल डेफिनेशन राजयोग में देखा था देखिए कर्म क्या है एक तो है सब्जेक्ट दूसरा है ऑब्जेक्ट और इन दोनों के बीच में जो इंटरेक्शन है वह है कर्मा यह मेरे हाथ से मैं जो लिख रहा हूं तो मेरा हाथ है सब्जेक्ट पेन है ऑब्जेक्ट और हाथ से जो लिख रहा हूं लेखनी क्रिया है वो है कर्मा तो सिमिलरली इट इज ऑन द लेवल ऑफ अवर कॉन्शियस एक तो है मेरा सेल्फ और दूसरा है यह जो जगत वहां पे प्रतिबिंबित हो रहा है कोई भी व्यक्ति है कोई भी आइडियाज है उसके साथ में मैं इंटरेक्ट कर रहा हूं देन द कर्म बिगिंस तो कर्म योग क्या है कि ये जो पहले तो जो मेंटल कर्म है उसको काट देना है फिजिकल वर्क को कंटिन्यू रखना है दिस इज द बिगेस्ट थिंग आप देह से कुछ कर्म करें ना करें मन से ही सब कुछ है इसीलिए तो जैसे कहते हैं ना कि कि यदि आप हत्या भी करेंगे तो वह हत्या हत्या का पाप नहीं लगेगा हत्या हत्या में गिरी नहीं जाएगी भगवान कृष्ण गीता में कहते हैं क्यों क्योंकि आपने देह से हत्या की है मन तो मुझे दे दिया है तो निमित्त मात्र भव सव्य साचीन तुमको सिर्फ निमित्त होना है इन लोगों का हत्या तो मैं ऑलरेडी कर चुका हूं तो देखिए कि वट इज कर्म कर्मा है देह से जो करते हैं व भी कर् कर्मा है मन से जो करते हैं वह भी कर्म है किंतु कर्म योग क्या है कि मन से जो कर्म हमने विच्छेद कर दिया है मन ज्ञान में स्थित हो गया है अब देह कर्म करता रहता है देखिए इसका मैं एक प्रैक्टिकल उदाहरण देता हूं हम लोग जब ट्रेनिंग सेंटर में थे तो जब नए-नए जॉइन किए थे तो हम लोगों को ना वेजिटेबल कटिंग करना होता था सुबह को 6:30 का नाश्ते का टाइम है और फिर 7:00 बजे से 8 बजे एक घंटा वहां पे किचन में जाके वेजिटेबल कटिंग करना है तो क्या होता है अभी वेजिटेबल कटिंग में ज्यादा कुछ नहीं है आलू है तो उसको पलना है उसकी ये जो उसका ऊपर का यह होता है लेयर उसको छिलना होता है सिर्फ या तो फिर और कोई तरी सब्जी होगी तो उसको काटना है तो यह जो एक घंटे का जो यह था वेजिटेबल कटिंग वो हम सबके लिए एक साधना जैसा बन गया था शुरू शुरू में मुझे समझ में नहीं आया किंतु जब हम हमारे सीनियर हमको कहते हैं कि देखो कि शरीर आपका काट रहा है वेजिटेबल या तो आलू छिल रहा है आपका मन जो है वह ईश्वर चिंतन कर रहा है तो मैंने कहा यह मैंने देखिए कि आप मंदिर में जाकर के एक घंटा बैठने का प्रयास कीजिए बड़ा ही कठिन होगा किंतु आपका देह ऐसा कोई रिपिटेटिव कार्य करने में रखा है तो जैसे क्या है ना कि बॉडी मोशन में है किंतु आपका माइंड स्थिर है इट इज अ वेरी गुड एक्सरसाइज कि एक घंटा वेजिटेबल कट करते-करते या तो गीता का श्लोक मुख स्त करता हूं ना कि और ऐसा होगा कि एक ब्रह्मचारी वहां पर बैठ कर के कथामृत पड़ेगा यानी आपका मन वो कथामृत में लगा है आपके हाथ काट रहा आलू छिल रहे हैं सो दिस इज द परफेक्ट एग्जांपल कि आपका देह कर्म करता रहे मन से तो आप मुक्त है ठाकुर ने क्या कहा मन से ही बद्ध मन से ही मुक्त देह का कर्म तो चलता रहेगा नहीं चलता रहेगा तो स्वामी जी का भी देखिए स्वामी जी का मन कहां मने थोड़ा सा ही उनको चांस मिला तो हूहू करके वो निर्विकल्प समाधि की ओर दौड़ता था तो यह हमको याद रखना है कि जैसे-जैसे निष्काम कर्म करते जाएंगे ना तो देह का कर्म तो चलता ही रहेगा मन किंतु धीरे-धीरे करके सब्जेक्ट ऑब्जेक्ट और इनका इंटरेक्शन है वो शिथिल होता जाएगा सब्जेक्ट में प्योर अवेयरनेस में हम स्थित हो जाएंगे उसके बाद में एक ऐसा समय आएगा कि मन प्योर अवेयरनेस में स्थित है देह कार्य कर रहा है ऐसे कितने ही डॉक्टर हैं वो कहते हैं ना कि वो एक एक जोन में चले जाते हैं माने वो सर्जरी करते हैं माइंड एकदम फ्रीज हो गया है वो जो हाईएस्ट लेवल के जो स्पोर्ट एथलीट्स होते हैं वो लोग जब एक्सट्रीम परफॉर्मेंस देते हैं उनका माइंड फ्रीज हो जाता है सो लाइक दिस कि देह कर्म कर रहा है माइंड स्थिर हो गया है ट विल बी द हाईएस्ट आइडियल ऑफ कर्म योगा और आपने जो कहा वह ठीक ही है कि जिस समय माइंड एंगेज रहेगा कर्म में अब जैसे कि सॉफ्टवेयर लिखना है ट इज अभी देखिए कि यह जो पुराने कार्य थे ना जो बढ़िया काम है प्लंबिंग का काम है वो आदमी फिजिकल इतना वर्क करेगा ना फिर भी थकेगा नहीं ऑन द अदर हैंड कंप्यूटर प्रोग्रामर एक घंटा प्रोग्रामिंग करेगा फिजिकली एग्जॉस्ट हो जाएगा व्हाई क्योंकि वहां पे प्लंबिंग या कड़िया काम में माइंड इतना नहीं चलता दैट मींस कि फिजिकल एक्सरसाइज होती है यहां पे आपका शरीर हो सकता है एसी चेंबर में बैठा हो एकदम बड़ी पेडे चेयर है उस परे बैठा हो किंतु माइंड आपका फुल्ली एंगेज है ही गेट्स एग्जॉस्ट वैसे लोगों को नींद नहीं आती रात को जबकि आप वो कड़िया काम करेंगे रात को जैसे लेटे सीधा आंख बंद हो [हंसी] गई वो राजा महाराज वो इंस्पेक्शन करके जा रहे हैं देखा सब ब्रह्मचार्य ने आलू छिले हुए रखे हैं उसमें से उन्होंने एक आलू उठाया कहा इसको जिसने छिला है वह उसको ज्ञान प्राप्त होगा वो थे शुद्ध जी महाराज फिफ्थ प्रेसिडेंट ऑफ अवर ऑर्डर जिसको आजकल माइंड फुलनेस कहकर पुकारा जाता कि जो भी काम करे पे अटेंशन टू इट हमने अपने मन का ये जो संकल्प विकल्प है दूर हो जाएगा फोकस ऑन योर वर्क तो माइंडफुल सब कुछ माइंडफुल ने करना है स्नान भी कर रहे हैं तो माइंडफुल से ड्राइविंग भी करना है तो माइंड फुलनेस

आलू छिलने के समय परफेक्ट छिलने पे ध्यान दे, न मन को ईश्वर पे लगाए, हाथो को अपना काम करने दे?

है दोनों के पीछे टेक्निकल जो अंडरलाइन जो है बॉटम लाइन वह है कि मन के संकल्प विकल्प से बचना है अभी कथामृत सुन रहे हैं कि आलू छीनने पर ध्यान दे रहे हैं मन के भीतर में जो माइंड फीवर है वो उससे आप बचे हैं दैट इज द बॉटम

आलू छिलने में परफेक्शन या ईश्वर में मन -- दोनों में से आदर्श क्या है?

लाइन नो रिलेशन क्योंकि ठाकुर क्या कहते हैं मन से ही मुक्त है मन से ही बद्ध है यदि मन को आप एक हायर लेवल पर ले गए तो आलू अच्छा छिला नहीं छिला उसे फर्क नहीं पड़ता क्योंकि जगत तो माया है आलू छिलना तो कोई उद्देश्य नहीं है आलू छिलने के माध्यम से मन को ईश्वर में लगाना है जैसे कि ये ठाकुर वो उदाहरण देते हैं मकर ध्वज का वो काच की बोतल में मकर ध्वज रखा है मकरध्वज तैयार हो गया फिर बोतल रही की तुटी दैट डज नॉट मैटर वो जगत में बोतल का परफेक्शन डज नॉट मैटर भीतर में मकर ध्वज तैयार हो दैट इज द मैटर किंतु यह है मने

भोजन से पहले के मन्त्र "ब्रह्मार्पणं" की व्याख्या सुनी - आहार, आहार करने वाला, और आहार करने की क्रिया -- तीनो ब्रह्म है.

इनिशियल जो आपका कंडीशन है कि पहले नेती नेती करके क्रिया को त्याग करना है तभी वह क्रिया फिर इती इती करके वापस आएंगे सबको आप यह कर पाएंगे कि हां अब पहले से ही जद कहेंगे सब कुछ ब्रह्म है प्रॉब्लम यह है कि मन तो कामिनी कांचन में लगा है तो फिर एक भयानक परिस्थिति खड़ी हो पंजाबी वेदांत कि क्यों ऐसा दुष्कर्म किया तो मैंने नहीं किया मेरे शरीर ने किया है तो अच्छा ठीक है शरीर को फांसी दे देते हैं तुमको छोड़ देते हैं तो ऐसा मोरल कंफ्यूजन ना खड़ा हो जाए एक बार त्याग कर लेना है मन को एक बार दृढ करके संकल्प शक्ति डेवलप कर देनी है फिर अभी ठाकुर कहते हैं ना परमहंस जो होता है बेताल ताल पर मने मने इच्छा करके भी गलती से भी उससे गलती नहीं होगी क्योंकि मां उसकी रक्षा करती है जब कि इस परिस्थिति में नहीं जाकर के हम सब कुछ अपनाने का प्रयास करेंगे तो हो सकता है कि वी माइट गेट डाउन मने कहीं प फिसल जाए दैट इज वन थिंग हां संकल्प शक्ति पहले कैसे भी करके डेवलप करनी है मन को व कामिनी कांचन से कैसे भी करके एक बार मुक्त करना है फिर आप सब कुछ यह कर सकते हैं एक्सेप्ट कर सकते हैं जैसे आज हमने डिस्कस किया पहले ही दिन क्यों मां को नहीं बुला दिया क्यों इतने दिनों तक हृदय का त्रास सहन किया तो बिकॉज के ही वो अभी कह नहीं सकते कि ठाकुर के बारे में कि ही वाज नॉट रेडी किंतु जगत को तो दिखाना है ना तो जगत की दृष्टि से ना ही वह तैयार थे ना ही मां तैयार थी यह जो आयन जो है ना यह विज्ञान वाद की बात करता है अपने साधुओं को जो उसके सामने जो विरोध है वह यही है कि पहले तो ठाकुर ने नेति नेति कहा है एंड वो निर्विकल्प समाधि को हाईए स्टेज कहा है बाद में कहते वहां से नीचे आना है इती इती करके सो पहले से ही कैसे क दिया कि विज्ञान वाद इज द हाईएस्ट है ना विज्ञान वाद इज द अल्टीमेट बट इट इज नॉट द हाईएस्ट हाईएस्ट इज निर्विकल्प समाधि निर्विकल्प समाधि को प्राप्त करके जगत को आप इति इति कीजिए अदर वाइज वेरी ग्रेट डेंजर इज अहेड ऑफ अस ना अब कितना ही गोल घूम के देख लीजिए त्याग का कोई विकल्प नहीं है व आध्यात्मिक जीवन में यही होता है देखिए जो यह श्री श्री वगैरह जो आज के बड़े-बड़े नाम किए हुए आध्यात्मिक स्पीकर है लोग उनको सुनकर इतने प्रभावित हो जाते हैं चलो हम भी चालू कर देते हैं कितने ही सॉफ्टवेयर इंजीनियर उनके आश्रम में इधर-उधर घूमते हैं किंतु होता क्या है कुछ समय के बाद में फ्रस्ट्रेशन आ जाता है जितना सहज स्पिरिचुअलिटी को करके आप दिखाते वो है नहीं एंड दैट इज द डेंजर आपको पहले से ही बताना होगा इनिशियल पाथ इज रियली डिफिकल्ट बाद में वो सहज होता जाएगा किंतु देखिए

कई लोग आध्यात्मिकता को जीवन सरल करने का उपाय समजते है. अपने यहाँ आध्यात्मिकता का अर्थ है सम्पूर्ण जीवन परिवर्तन, कठोर तपस्या।

ठाकुर क्या कहते हैं यदि ये मीठी रोटी है चीनी डाली हुई उसको सीधा करके खाएंगे कि आड़ा टेढा करके खाएंगे वो मीठी लगने ही वाली है ये वो ईश्वर सम क्षीर सागर में आप इच्छा करके गिरे ना कोई धक्का मार के गिरा दे आप अमर होने ही वाले हैं तो उद्देश्य चाहे कोई भी हो चाहे मन की शांति हो शारीरिक स्वास्थ्य हो न कि ईश्वर प्राप्ति हो एक बार साधना की तो साधना का फल तो इक्वल मिलने वाला है कोई यदि ऐसा सोच के कहेगा कि ना मुझे अभी ये पेन हो रहा है पेन रिलीफ के लिए मुझे योगासन करना है कोई कहेगा नहीं मुझे कुंडलिनी जागृत करने के लिए करना है योगासन दोनों कर रहे हैं लाभ इक्वल ही होगा सो दैट इज द थिंग कि और इसमें क्या है ना पता है ना मनुष्य का मन कभी-कभी हाईएस्ट को पकड़ने के लिए समर्थ नहीं होता तो कभी ये लोवर हैंगिंग फ्रूट्स उसको दिखाए जाते हैं तो एक बार वह खाया तो उसको हष्ट पुष्ट हुआ बल मिला तो फिर और ज्यादा जंप लगा सकता है वह भी एक है और जद फिर आगे नहीं भी बढ़ा तो भी भगवान क्या कहते हैं गीता में कि स्वल्प मस्य धर्मस्य त्रय महतो भया अल्प की मात्रा में किया हुआ धर्म भी बड़े भय से बचा लेता है सो ऐसे करें ना कि ऐसे करें एक बार कैसे भी करके घुस जाओ हां फिर यह सब नहीं देखेंगे तो क्या देखेंगे दुनिया भर का एंटरटेनमेंट यह विदेशी संस्कृति का आक्रमण इससे तो मच बेटर है यह जो अहमदाबाद में वर्ल्ड कप था ना तो अपने जगन्नाथ महाराज के पास में ऐसी कितनी ऑफर आ गई थी आप तो अहमदाबाद में रहते हैं हमारे लिए टिकट का जुगाड़ कर दीजिए अपने ही सब भीतर के ही लोग अब जितना रुपया लगेगा हम देंगे जगन्नाथ महाराज ने बेचारे ने प्रयास भी किया था टिकट का जुगाड़ हो जाए किंतु नहीं हुआ अभी कंपेयर टू देखिए ये आपके ये आ रहे हैं अपने प्रेसिडेंट महाराज जा रहे हैं मठ का उद्घाटन हो रहा है महाराज बोलते हैं हमने हजार की आशा रखी थी जब महाराज के साथ बात हुई बोले 300 के अभी 300 से भी कम आ रहे है अभी शायद हो गया होगा किंतु उस समय महाराज बोल रहे

साधु की चिता जलेगी तब उसके गुणगान करे" यह बात हम स्त्रीओ के बारे में सुनते आ रहे है. "नारी की चिता जलेगी तब उसके गुणगान करे

थे ये यह बात जो है ना रयान जी कहते हैं रयान जी कहते हैं राजस्थान गए थे ना राजस्थान में उन्होंने सुना था मरबे सती उ तब सतीर गुण गई वहा तो सती प्रथा थी ना तो तो महाराज कहते हैं साधु के बारे में एटली यही है मवे साधु उड़वे छई तब साधुर गुण गई ठाकुर कहते हैं कि गुरु जद सड़ी बाड़ी हो जाए तब गुरु गुण गाई केनो ज वो गुरु है तो यह भी एक सेंटीमेंट है किंतु अपने अपने उसके ऊपर में है अपना खुद का क्या भाव है तब हमार गुरु नित्यानंद राय गुरु जद सुनी वाड़ी जाए तब हमार गुरु नित्यानंद राय