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Sri Ramakrishna Kathamrita ·

श्रीरामकृष्ण कथामृत || 14 Dec 1883 - श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ दक्षिणेश्वर में || 20 Jun 2025

प्रार्थना

ओम स्थापकाय धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिणे अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णायते नमः श्री श्री रामकृष्ण कथामृत श्रीमद् द्वारा रचित 14th दिसंबर 1883 ष्ट परिच्छेद इसका हम पाठ कर रहे थे। हमने देखा कि किस तरह से मणि अर्थात कि मास्टर महाशय कालीवाड़ी में टहल रहे थे। उसके बाद में उनके मन में जो ठाकुर की बातें हैं वही मंडरा रही है। सोच रहे हैं कि क्या थोड़ा सा साधन भजन करने से थोड़ा सा वैराग्य थोड़ी सी साधना करने से क्या सही में ईश्वर दर्शन हो सकता है? क्योंकि बहुत बार तो हम लोग देखते ही हैं कि किताबों में लिखा तो बहुत कुछ है किंतु हमारी नजर के सामने इस तरह के लाइव उदाहरण देखना कि जिन्होंने सही-सही ईश्वर दर्शन किए हो बड़ा ही दुर्लभ है। स्वामी विवेकानंद की वही फेमस कहानी कि कोलकाता में लोगों को जो कि इस तरह के नाम चिन्ह है। जिन लोगों का नाम है इस तरह के धार्मिक क्षेत्रों में आध्यात्मिक क्षेत्र में जाकर के पूछ रहे हैं कि क्या महाशय आपने ईश्वर को देखा है? ईश्वर के बारे में सुना तो बहुत है, पढ़ा तो बहुत है। लोग बातें भी तो बहुत करते हैं। किंतु क्या सही-सही आपने दर्शन किया है? वो देवेंद्रनाथ टैगोर वह क्या उत्तर देते हैं कि तुम्हारी आंखें बड़ी सुंदर है। ऐसा करके बात को घुमा देते हैं। फिर जब वही स्वामी जी ठाकुर के पास आते हैं तो वह एक डेफिनाइट उत्तर मिलता है। निश्चित उत्तर मिलता है कि हां मैंने देखा है और सिर्फ इतना ही नहीं मैं तुमको भी दर्शन करवा सकता हूं। और ऐसा करके फिर स्वामी जी स्वयं जब मुलाकात का वर्णन करते हैं और फिर वहां पर उनको जैसे ही स्पर्श किया देखा कि यह जगत जैसे कि शून्य में मिल जा रहा है। यह जो महा आकाश है वह जैसे कि चारों ओर से इनको घेर रहा है। ऐसी एक भयानक अनुभूति वो स्वामी जी बेचारे चिल्ला उठे। आप मेरे साथ में क्या कर रहे हैं? मेरे मां है, मेरे बाबा है। जब ऐसा कहा तो ठाकुर ने हंसते-हंसते कहा, अच्छा ठीक है। चलो बाद में धीरे-धीरे करके यह सब होगा। तो स्वामी जी जैसे स्वामी जी लोगों के घर-घर जाकर के पूछ तो रहे हैं कि ईश्वर दर्शन हो सकते हैं कि नहीं। आपने किए हैं कि नहीं? यही स्वामी जी जब नजर के सामने दिव्य अनुभूति आ जाती है तो वह डर जाते हैं। तो खैर इस तरह का सद्भाग्य सभी का नहीं होता। मास्टर महाशय जब ठाकुर को पहली पहली बार मिलने को आ रहे थे उस समय का एक बड़ा ही सुमधुर दृश्य का उन्होंने वर्णन किया है कि नरेंद्र वो वहां पे वह जो रात का समय था संध्या का समय नरेंद्र गा रहा है। भजन और ठाकुर समाधि में मग्न है। तो मास्टर महाशय कहते हैं कि किसी के मन के भीतर में इतना आनंद हो सकता है। यह बात तो कभी हमने सोची ही नहीं है। तो यही मास्टर महाशय सोच रहे हैं कि ठाकुर को जो दर्शन हुआ है वो क्या मुझे भी हो सकते हैं कि नहीं और फिर जैसे कि माया माया को यदि आप पहचान लेंगे तो माया भाग जाएगी। तो क्या माया को भगाना इतना आसान है? वह सोच रहे हैं उस समय फिर उनको एक ब्राउटन इंस्टिट्यूशन से एक टीचर आए अपने स्टूडेंट्स को लेकर के प्रतिमा पूजा की बात हो रही थी और फिर आखिर में ठाकुर क्या कहते हैं अनुराग होले ईश्वर लाभ होए अनुराग अर्थात कि हृदय से यदि प्रेम होता है ईश्वर के ऊपर में तो ईश्वर का लाभ होगा खूब व्याकुलता चाहिए बहुत ही व्या व्याकुलता चाहिए मुमुक्षुत्व चाहिए खूब व्याकुलता होले समस्त मौन ताते गोत होए यदि बहुत व्याकुलता होगी अपने हृदय में तो पूरा मन जैसे कि ईश्वर में विलीन हो जाएगा या तो फिर ईश्वर के ऊपर में एकाग्र हो जाएगा। तो यह सब वार्तालाप उन लोगों का हुआ था। इसके बाद में यह जो ठाकुर ने पॉइंट बताया कि व्याकुलता होने से ईश्वर दर्शन कैसे होते हैं उसके बारे में उन्होंने तीन कहानियां बताई है। तो तीनों कहानियां बड़ी सुंदर कहानियां है। यदि हमारे हृदय में सरल विश्वास है तो यह सब कहानियां पढ़कर के हमको बड़ा आनंद आएगा। ठाकुर कौन सी कहानी बताते हैं? सबसे पहली कहानी में क्या कहते हैं? एक जोनेर एकटी

एक बाल विधवा की कहानी: सरल विश्वास से ईश्वर दर्शन होते है

मे छिलो एक व्यक्ति की एक लड़की थी। खूब अल्पो बोयो से मेटी विधवा होएगी छिलो बड़ी ही छोटी उम्र में यह लड़की विधवा हो गई थी। स्वामीर मुख कनो देखे ना पति का चेहरा कभी देखा नहीं था। यह उस समय की बाल्य विवाह वाली जो सब प्रथाएं थी उस प्रथा के अनुसार हो सकता है कि पांच छ साल में ही उसका विवाह हो गया होगा और जैसे हमने मां शारदा के बारे में देखा था कि छोटी लड़कियां तो पिताजी के घर में ही रहती है। विवाह के बावजूद कभी-कभी पति के घर चली जाएगी। किंतु ज्यादातर पिता के साथ में रहती है और फिर उनकी उम्र थोड़ी सी बड़ी होगी तो फिर वह अपने ससुराल जाएगी। तो इसी तरह से हो सकता है कि उसने उसका विवाह हुआ होगा किंतु पति का चेहरा कभी देखा नहीं होगा या तो फिर छोटी उम्र में विवाह हुआ है बोलकर के उसको शायद याद भी ना हो। तो जो भी है उसका विवाह हुआ था। पति का देहांत हो चुका था। उसका विवाह हुआ था और पति का चेहरा भी नहीं देखा था छोटी उम्र में। तो फिर क्या हुआ? अन्नमेयर स्वामी आशे देखे। वह लड़की देखती है कि दूसरे जो उसकी जो सहेलियां है उनके पति उनको मिलने के लिए आते हैं। या तो फिर यह लड़कियां भी अपने पति के घर पर जाती है। से एक दिन बोले बाबा आमार स्वामी कई तो उस लड़की ने एक दिन अपने पिताजी को पूछा कि पिताजी मेरे पति कहां पे हैं? मेरे स्वामी कहां पे हैं? तार बाबा बोलले गोविंद तुम स्वामी ताके डाकले त देखा तो फिर अभी पिताजी और तो क्या उत्तर देंगे अभी इस छोटी सी बच्ची को यह बताना कि बाल विधवा है और फिर उस समय के जो समाज के नियम थे उसके अनुसार पूरा जीवन उसका कठिनाई में जाने वाला है। किसी भी तरह के सुख उपभोग उसको करने को नहीं मिलने वाले हैं। यदि उसको यहां तक कि जो शुभ मुहूर्त होता है वहां पर विधवाओं का प्रवेश लोग पसंद नहीं करते। मैंने खुद अपनी नजरों से एक घटना देखी है कि कुछ स्त्रियां शादी के बाद में कहीं पर जा रही थी। तो उन लोगों के भीतर में एक विधवा भी थी। तो जिनकी शादी नई-नई हुई थी। उसने कहा कि मैं उस विधवा के साथ में नहीं जाना चाहती। मैं जाऊंगी तो अकेली जाऊंगी। उनके लिए और कोई व्यवस्था करें। तो यह तो मैंने अपने नजरों से देखा है। उसको बात करते इस तरह से सुना है। मैं उस समय छोटा ही था। स्कूल में पढ़ता था। तो मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ। मैंने कहा यह जो विधवा है उनको तो मैं अच्छे से पहचानता हूं। उनका तो बड़ा अच्छा नेचर है और बच्चों को बड़ा प्रेम भी करती है। तो फिर उनके साथ में आप एक साथ में यात्रा क्यों नहीं कर सकते? उन्होंने ऐसा तो कौन सा गुनाह किया है? तो खैर बड़े होकर के पता चला कि यह जो सब रूढ़िच चुस्त प्रथाएं हैं रूढ़िवादी प्रथाएं अपने जगह जीवन में इसकी वजह से विधवाओं के साथ में इस तरह का अन्याय होता आ रहा है। तो जो भी है तो इसके पिताजी बेचारे क्या कहेंगे? उसको कहा कि तुम्हारा पति जो है वह है गोविंद स्वयं तो मेटी ओइको था सुने घरे द्वार दिए गोविंद के डाके और कांधे यह जैसे ही पिताजी से सुना तो यह लड़की को तो बेचारी को तो कुछ पता नहीं है अभी कि उसका स्वामी कौन और गोविंद कौन पिताजी पर भरोसा है तो पिताजी ने जैसे ही कहा वैसे ही उसने अपने के कम अपने कमरे के दरवाजे बंद करके गोविंद जी को पुकारने लगी रोती-रोती बोले गोविंदो तुम्ही एशो आमा के देखा दा तुम्ही केनो आो ना रोतीरोती कहती है गोविंदो तुम कहां पे हो आकर के मुझे दर्शन दो तुम मुझे दर्शन क्यों नहीं देते हो मुझे मिलने के लिए क्यों नहीं आते हो छोटू मेटीर से कान्हा सुने ठाकुर थकते पारले ना ताके देखा दिलन तो यह छोटी बच्ची है। उसकी उसकी जो रुदन है उसका उसकी रुलाई है यह देखकर के सुनकर के गोविंद जी रह नहीं पाए और आकर के उसको दर्शन दिए। देखिए यह कितनी सुंदर कहानी है। ठाकुर क्या कहते हैं? बालके मतो विश्वास बच्चे की तरह विश्वास चाहिए। बालक मां के देखो जेमन व्याकुल होए से व्याकुलता। बच्चा अपनी मां का दर्शन करने के लिए, मां का स्नेह प्राप्त करने के लिए, मां की गोद में वह खेलने के लिए जितना व्याकुल होता है, उसी तरह की व्याकुलता चाहिए। ए व्याकुलता हो तो अरुण उदय हो। यह व्याकुलता होगी तो अरुण का यानी कि सूर्य का उदय होगा। अरुणोदय होगा। तार पर सूरज उठबे ही उसके बाद में सूर्य उठेगा ही। ए व्याकुलता पर ईश्वर दर्शन इस तरह की व्याकुलता के बाद में ही ईश्वर दर्शन देखिए यह जो कहानी है उसके साथ में ठाकुर के मन की जो वासना है ठाकुर के मन की जो इच्छा है कितनी सुंदर रूप से मैच हो जाती है। ठाकुर ने एक बार कहा कि मेरे देखिए हम सबके जीवन में कुछ ना कुछ एक एंबिशन होता है। हम लोग आइडियल लाइफ क्या है मेरा? यदि मुझे पूछा जाए कि मैं यदि एक क्या है कि हम लोग तो यह समय के प्रवाह में बहते जाते हैं तो यह कर्म के प्रवाह में यह जो समाज है उसके प्रवाह में हम लोग बह रहे हैं। बहुत सारी चीजें हमारे हाथों से बाहर होती है। तो अभी कोई कहता है कि मैं यदि मेरे हाथ में होता मेरा भविष्य या तो फिर मेरा जीवन तो मैं कोई बड़ा साइंटिस्ट बनता। कोई कहता है कि यदि मेरे हाथ में मेरा भविष्य होता तो मैं कोई बड़ा क्रिकेटर बनता। सबकी तो एक ऐसी इच्छाएं होती है। स्वामी जी की ऐसी इच्छा थी। स्वामी जी जब उस समय बालक थे तो अभी बच्चे लोग क्या है कि इस तरह जो इंप्रेस हो जाते हैं तो कोई इस तरह से भव्य नजारा देखकर के। तो स्वामी जी कहते हैं कि वह उस समय की ये जो घोड़ा गाड़ी जो चलती थी उसका यह जो कोचमैन होता है अर्थात कि घोड़ा चलाने वाला तो उसको उसके जो अभी यह ब्रिटिश लोगों के जो घोड़ागाड़ी होती है या यह फिर गवर्नमेंट ऑफिसर की तो क्या है ना कि बड़ा उन लोगों को सजधज करके वो रहते हैं। ये कोचमैन जो होते हैं, यह डोरमैन जो होते हैं, यह सिपाही, सूबेदार वगैरह जो होते हैं, यदि आपने कोई बड़ी होटल में खाना खाने के लिए गए होंगे, तो वहां पर आपने देखा होगा कि दरवाजे के ऊपर में वो राजा का कपड़े वो माने वो दरबारी कपड़े पहन के वो फेंटा माने वो पगड़ी बांध करके वो एक आदमी खड़ा रहता है। डोरमैन फिर वो दरवाजा खोलता है। वो देख के हमको लगता है कि हां हम लग्जरी होटल में आए हैं। तो वैसे ही यह जो कोचमैन होता है यह घोड़ा गाड़ी चलाने वाला तो उनके भी इस तरह से वह दरबारी कपड़े पहनते थे। सर के ऊपर में पगड़ी लगाते थे। देखने में बड़े इंप्रेसिव लगते थे। तो ये छोटा नरेंद्र है तो उसके मन में ऐसी एक इच्छा जागृत हुई। मैं चाहता हूं कि मैं यदि बड़ा होऊंगा तो वह एक कोच मैन की तरह होऊंगा। वो घोड़ा गाड़ी चलाता है। उसका क्या वो महिमा है? उसकी क्या गरिमा है? उसका क्या वो सुंदर दिखता है वो तो बच्चों के मन में ऐसा होता है कि मैं यदि बड़ा होऊंगा तो ऐसा करूंगा या तो फिर बच्चे के मन में ऐसा होता है और हम लोग जो बड़े हो गए हैं हमारे मन में रिग्रेट होती है कि मैं वो चाहता था वो नहीं कर पाया मुझे यदि पूछा जाएगा कि आइडियल लाइफ कौन सा है अभी तो खैर अभी तो मैं जो सो हूं जो हूं सो हूं रामकृष्ण संघ का साधु होना इससे ज्यादा बड़ा सद्भाग्य कौन सा है किंतु जब मैं स्टूडेंट था। उस समय मैं सोचा करता था कि आइडियल लाइफ कौन सा है? तो मुझे एस्ट्रोनॉट होना था। दैट वाज़ माय आइडियल एट वन पॉइंट इन टाइम। मैं जब स्कूल में था क्योंकि यह जो सब ये डिस्कवरी चैनल की ये जो डॉक्यूमेंट्रीज है वो मैं बड़ा देखा करता था और मुझे लगता था कि जीवन में ऐसा कुछ करना चाहिए जो कि म एक्सट्रीम लेवल पे एक हो। माने व्हिच इज हाईएस्ट। तो अभी यह सब देखकर के बच्चे के मन में क्या दिखेगा कि वह आकाश में जाकर के पृथ्वी से बाहर जाकर के जो चांद पर जो चलता है या तो फिर स्पेस स्टेशन में से जो पृथ्वी को देखता है इससे ज्यादा अच्छा माने इससे ज्यादा भव्य कार्य और क्या हो सकता है? वो जमीन पर रह के पृथ्वी पर रह के पैसा कमाने वाले लोगों की कमी नहीं है। ऐसे लखपति करोड़पति आपको घर-घर मिल जाएंगे। किंतु एस्ट्रोनॉट कितने लोग होते हैं? तो या तो मैं बहुत बड़ा या तो मैं एक एस्ट्रोनॉट होऊंगा या तो फिर मैं आइंस्टाइन की तरह साइंटिस्ट होऊंगा। मैं बहुत बड़ी खोज करूंगा और दैट डिस्कवरी विल हेल्प द मैनकाइंड। ऐसा कुछ था मेरे मन में। तो देखिए कि ठाकुर के मन में भी इस तरह की एक इच्छा थी। ठाकुर क्या कहते हैं कि मैं चाहता हूं कि मैं एक लंबे बालों वाली एक बाल विधवा हूं। और फिर इसके पास में ज्यादा कुछ रुपए है नहीं। बस एक छोटी सी कुटिया है। कुटिया के बाहर में एक छोटा सा बागान है। वहां पर मैं सब्जी वगैरह उगाऊंगा। उगाऊंगी। और फिर वहां पर एक गाय होगी। गाय का दूध दोह करके फिर मैं ठाकुर जी के लिए पायसम रांगी। वहां पर एक बूढ़ी औरत रहती होगी जो कि मेरी संभाल लेने के लिए और बाजार में से जाकर के कुछ परचेस करना है वगैरह के लिए मुझे हेल्प करेगी। तो बस जगत के साथ में कोई नाता नहीं और फिर मैं अपना कमरा बंद करके रोती-रोती अपने स्वामी को पुकारूंगी कि गोविंद तुम कहां पर हो आओ और मुझे दर्शन दो। तो यह थी ठाकुर के मन की वासना और यह देखिए कि हमने जब मां का जीवन जब हम देखेंगे मां जो कामार पुकुर में रही थी ठाकुर की महासमाधि के बाद में वो जैसे कि ठाकुर के मन की यह वासना पूरी करने के लिए ही शायद हो सकता है कि ठाकुर ने मां के देह से मां के हृदय में जाकर के अपने यह मन की इच्छा पूर्ण की होगी क्योंकि कामार पुकुर में मां का वही हाल था कि वह लंबे लंबे बालों वाली विधवा थी। उम्र तो ज्यादा कुछ थी नहीं। ठाकुर के साथ में वह छ साल की उम्र में ही विवाह हुआ था। और वहां पर कामार पुकुर की जो परिस्थिति थी कि यह रामलाल दादा लक्ष्मी दीदी उन्होंने जैसे कि मां को एक तरह से एबेंडोन ही कर दिया था। छोड़ ही दिया था। तो वहीं ठाकुर के कमरे में ठाकुर के घर में मां रहती थी। वहां पर लाहा बाबू की जो कन्या थी प्रसन्नमई वो थोड़ा बहुत मां का ख्याल रखा करती थी। वो उनके घर में एक काम वाली थी बाई तो वो बाई को मां के घर में रात को सोने के लिए भेज दिया करती थी कि वो अल्प उम्र की मां है छोटी उम्र की तो रात में हो सकता है कि सोने में डर लगे या कुछ भी छोटा-मोटा काम है अकेली स्त्री बेचारी क्या करेगी तो इस तरह से एक बाई को वहां पर वो भेज दिया करती थी तो देखिए और फिर देखिए कि मां वही बागान में वहां पर अपने लिए सब्जियां वगैरह उगाती थी और माने देखिए कि थोड़ा बहुत तो हमको पता है लक्ष्मी दीदी के बारे में कि कितना स्नेह मां को मां उनको करती थी। मां के साथ में ही नहबत में रही। ठाकुर का इतना स्नेह उनको प्राप्त हुआ। इसके बावजूद ऐसा पढ़ने में आता है कि वह जब मां बगीचे में सब्जियां वगैरह लगाती थी तो वो लक्ष्मी दीदी जाकर के अपने पैरों से वह सब डिस्टर्ब कर देती थी कि वह सब्जियां उगे नहीं। तो माने इस तरह की एक एडवर्स परिस्थिति में इस तरह की एक मुश्किल परिस्थिति में मां को वहां पर रहना हुआ था। तो देखिए कि मां का मन क्योंकि ठाकुर के भीतर में संपूर्ण रूप से वह मग्न था बोलकर के मां को इतना कुछ कष्ट नहीं हुआ। वो मां खुद कहती है कि शुरू-शुर में ठाकुर के जाने के बाद में जो विरह अग्नि था जैसे कि उनको खा ही जाएगा। किंतु एक बार मां ने वृंदावन यात्रा की। वहां पर से जो ठाकुर का जो नियमित रूप से दर्शन होना प्राप्त हुआ। तब से कहीं जाकर के मां के मन को सियारा मिला। मां के मन में शीतलता छा गई और फिर शी वाज एबल टू लिव हैप्पीली इन कामार पुकुर। अभी इतना हैप्पीली भी नहीं क्योंकि कष्ट तो है विधवा का जीवन है। वो काली मंदिर से जो कुछ ₹ ना कि ऐसा कुछ पेंशन उनको मिलने वाला था। ठाकुर की महासमाधि के बाद में ऐसा व्यवस्था होगा कि इनकी विधवा को इतना पेंशन मिले तो वह पागल जो रामलाल दादा थे जाकर के वह पेंशन भी बंद करवा दिया। कहा कि यहां पर बहुत सारे भक्त है ठाकुर के तो उनकी विधवा को पैसों की इतनी चिंता नहीं है। ठाकुर इन्वेस्टमेंट भी करके गए हैं तो वह उनको पैसों की इतनी चिंता नहीं है। यह रुपया बंद कर दीजिए। उस समय नरेंद्र ने कहा था कि अरे मां के लिए जो पेंशन मिल रहा था वह बंद क्यों करवा दिया तो मां ने वह जो फेमस वो जो मां का सेंटेंस था ऐमन सोनार मानुष चले गो एक छायनीय झगड़ा कर छ अर्थात कि ये जो ठाकुर के अस्थियों को लेकर के जो झगड़ा चल रहा था उसके बारे में मां ने कहा था कि यह जो इतना सोने का मनुष्य गोल्डन पर्सन गोल्डन मैन यह चला गया अभी ये अस्थि ले झगड़ रहे हैं तो वही यही सब यह कि छोटी-मोटी चीजें लेकर के रुपया बंद कर दिया, यह बंद कर दिया। मां ने कहा भले बंद किया करने दो। क्या है? जैसे भी जैसा ठाकुर रखेंगे वैसा रहेंगे। तो देखिए कि मां इस तरह से वहां पर रह रही थी। तो एग्जजेक्टली यही कहानी जैसे कि ठाकुर के मन की इच्छा को भी व्यक्त करती है। मां के जीवन में हमने सही-सही में इसको देखा भी है और हम कह ही सकते हैं। मैंने ऐसा पढ़ा कहीं नहीं है। किंतु मैं कह सकता हूं अपने से कि ठाकुर ने स्वयं मां के हृदय में विराज करके उनके मन की जो इच्छा होगी वो पूर्ण की है। तो कितना सुंदर यह है कि यदि व्याकुलता होगी यदि जगत के साथ में पूरा नाता टूट जाएगा तो ईश्वर को दर्शन देना ही होगा। में ठाकुर ने एक बार अपने एक त्यागी

ये ले लो तुम्हारा, ये दे दो मेरा: साधक संसार से सारे संबंध तोड़ देता है

संतान के बारे में कहा था कि इसका कितना सुंदर स्वभाव हुआ है। ए ने तोमर ए दाओ अमार ए नाओ तुम्हार ए दाओ अमार यह लो तुम्हारा यह लो यह दे दो मुझे मेरा अर्थात कि देखिए कि यह लेनदेन का रिश्ता तो सबके साथ में होता है रिलेटिव्स के साथ में मित्रों के साथ में मित्र के घर में कोई प्रसंग है रिलेटिव के घर पे तो ऑब्लिगेशन है कि जाना पड़ेगा और फिर हमारे घर में प्रसंग है तो ऑब्लिगेशन है सबको इनवाइट करना पड़ेगा तो यह सब ऑब्लिगेशन की माया जाल में हम लोग इस जगत में रहते हैं। तो ठाकुर कहते हैं कि इसका स्वभाव ऐसा हुआ है कि यह लो तुम्हारा यह दो मेरा अर्थात नो ऑब्लिगेशन। जो है सो अभी मैं अपना काम करूंगा। आपके साथ में मेरा कोई नाता नहीं। तो इस तरह से जगत के साथ में नाता तोड़ करके सिर्फ एक ईश्वर के ऊपर में भरोसा करके रहना यह पता है कितना कठिन है। हम सभी लोगों को इस बात का डर लगता है। तो उनका एक ध्यान यह रहता है कि मुझे एक बड़ा नेटवर्क बना करके रखना है। भक्तों का नेटवर्क बनाना है। मित्रों का नेटवर्क बनाना है। क्यों? क्योंकि यह अकेला हो जाऊंगा यदि मैं तो मेरे पर यदि कोई मुसीबत आएगी तो मुझे कोई हेल्प करने वाला नहीं रहेगा। लोग मेरी पीछे पीछे से निंदा करेंगे। लोग कहेंगे यह तो बड़ा घमंडी हो गया है। बड़ा अहंकारी हो गया है। हमारे साथ में बात ही नहीं करता है। इससे बेटर है कि मैं लोगों के साथ में अच्छा रिलेशन बना करके रखूं। तो मुझे मित्र भी मिल जाएंगे। गप लगाने के लिए कंपनी भी मिल जाएगी। कोई पीछे से मेरी निंदा नहीं करेगा। और जब भी आवश्यकता आ पड़ी मुझे कोई ना कोई सहाय करने के लिए आ जाएगा। तो यह सब सोच समझ करके लंबा लंबा प्लान करके लोग यह सब नेटवर्क बनाते हैं। किंतु देखिए ठाकुर कहते हैं और मैंने स्वयं इस सब चीजों का अनुभव किया है। इसलिए बता रहा हूं कि यह काम कांचन जो है उसके ऊपर में से तो फिर भी हम थ्योरेटिकली अपने मन को हटा लेंगे। प्रैक्टिकल हटाना मुश्किल है। किंतु एटलीस्ट थ्योरेटिकली तो हम बड़े क्लियर है कि इसके ऊपर में से मन को हटाना है। ईश्वर पे लगाना है। किंतु यह जो सब माया जो सूक्ष्म स्वरूप धारण करके जो आती है यह जो रिलेटिव्स और फ्रेंड सर्कल के रूप में यह जो नेटवर्क के रूप में यह ऑब्लिगेशन की मायाजाल के रूप में उससे मुक्ति पाना बड़ा कठिन होता है। क्योंकि यह जो भय है अविद्या अस्मिता राग द्वेष अभिनिवेश यह जो पंच्लेश है वो जो उसका सीक्वेंस है कैसे जाता है मेरे मन के भीतर में अविद्या है अर्थात कि मुझे पता नहीं है कि मेरा सही स्वरूप क्या है? इसके बाद में प्रकट होते हैं राग और द्वेष। इसके बाद में प्रकट होती है अस्मिता। यानी कि मैं मैं हूं। मेरा नाम यह है। मेरा कर्म यह है। मेरा संस्कार यह है। मेरा यह परिवार है। मेरा यह ऑर्गेनाइजेशन है। जो सेल्फ आइडेंटिफिकेशन है वो हो गई अस्मिता। उसमें से राग और द्वेष यह चीजें अच्छी लगती है। यह नहीं लगती। किंतु आखिरी प्रोडक्ट है इन सब की वो है अभिनिवेश। अर्थात कि मृत्यु का भय। अब यह भय जो है सिर्फ मृत्यु का नहीं होता। बहुत सारी चीजों के छोटे-छोटे भय होते हैं। उसमें सबसे बड़ा माने वन ऑफ द ग्रेटेस्ट फियर बहुत बड़े-बड़े भय में से एक भय है आइसोलेट हो जाना। माने मुझे यह डर लगता है कि मैं कहीं आइसोलेटेड तो नहीं हो जाऊंगा। लोग जिस डायरेक्शन में जा रहे हैं, उस डायरेक्शन में मैं नहीं जाऊंगा। तो लोग मेरा तिरस्कार तो नहीं करेंगे। समाज मुझे तिरस्कार तो नहीं करेगा। पहले के जमानों में गांव में होता था कि यह यदि गांव में आप कोई अपराध करेंगे तो उसकी सजा क्या है? तो आपका हुक्का पानी बंद कर देंगे। क्या हुआ इसका अर्थ? कि यह जो समाज में आपको जो स्थान मिलता है, जो आपको निमंत्रण मिलता है, जहां पर मंदिर में प्रसंग में आपको सम्मान मिलता है, सब जगह से आपको एक आइसोलेट करके रख देंगे। आपको अकेले रहना है। घर में कोई तकलीफ आई तो आपको अपने से उसका सॉल्यूशन लाना है। इस तरह से आपको रहना है। यह जो भारत में जो जो तथाकथित ये जो नीची जातियों के साथ में जो अत्याचार हुआ जो जो कि पद दलित जो लोग हैं उनके साथ में यह अत्याचार हुआ। गांव का कुआं है उसमें से पानी नहीं भरना है। गांव का मंदिर है उसमें दर्शन करने के लिए नहीं आना है। गांव के यह जो पंडित वगैरह है आपके घर में कोई विधिविधान होगा तो आपके घर आएंगे नहीं। कोई आपका प्रसंग में नहीं आएंगे ना ही उनके साथ में यह विवाह का संबंध रखेंगे। वो लड़के लड़कियों का विवाह उस जाति के साथ में नहीं करेंगे। यानी कि उनको आइसोलेट करके रख दिया। अभी यह आइसोलेट यदि हो गई यह सब जातियां यह सब कास्ट तो मन के भीतर में भय तो लगता है। तो फिर क्या हुआ? विदेशी जब आक्रमणकारी आए उन्होंने इन सबको पटा लिया। कहा कि यही जो लोग हैं जो कि आपको आइसोलेट करके रखे हैं। आओ हम लोग मिलकर के उनकी पिटाई करते हैं। तो उसी में देखिए यह इंडियन आर्मी उसमें 90% तो हमारे ही देश बांधव ही तो थे। मुश्किल से 5 10% ये फॉर ये जो ब्रिटिश ऑफिसर होंगे तो ये जो आइसोलेशन का भय है वो मनुष्य के पास में बहुत कुछ करवाता है। कोई भी सोशल फंक्शन में यदि हमको ना बुलाया कहीं पर हम जाते हैं तो हमारा आदर सत्कार नहीं होता है तो या तो हम क्रोधित हो जाते हैं या तो फिर भयभीत हो जाते हैं कि अरे मेरे साथ में ऐसा क्यों हो रहा है? क्या मैंने ऐसा कोई बहुत बड़ा गलती कर दिया है कि लोग अभी मुझे जैसे कि इग्नोर कर रहे हैं। लोग मुझे आइसोलेट कर रहे हैं। यह भय यदि एक बार प्रवेशेगा तो फिर लोगों को खुश करने के लिए यह आदमी सब कुछ करेगा। उसका वही एक उद्देश्य रह जाएगा कि कैसे भी करके उसको मुझे यह जो ऑथॉरिटी फिगर है जिसके पास में यह सोशल की जो होती है ये पहले के जमाने में यह जो खास करके फ्यूडल एज था उसमें यूरोप में आप देखेंगे कि यह फ्यूडल लैंड लॉर्ड जो होते हैं उनके पास में यह पावर होता है। भारत में भी देखिए गांव में यह जो पंच होता था तो सरपंच होते थे उसमें वे लोग डिसाइड करेंगे कि किसको नाथ बाहर करना है। किसको इस तरह से जात बाहर करना है, किसको आइसोलेट करना है? तो यह जो फियर है कि हमको गांव में से हमारा हुक्का पानी बंद हो जाएगा। हमको आइसोलेट कर देंगे। हमारे साथ में विवाह का संबंध कोई ना नहीं रखेगा। व्हिच वाज़ अ वेरी पावरफुल मोटिवेशन। आप आदमी को दंड दे सकते हैं। उसकी पिटाई कर सकते हैं। उसको जेल में डाल सकते हैं। किंतु उसका बिहेवियर आप चेंज इस तरह से ईजीली नहीं कर पाएंगे। किसी का भी बिहेवियर आपको चेंज करना है, किसी को अपने वश में लाना है, तो इस तरह से सोशल सेंशंस उनके ऊपर में बिठा दीजिए। वो ईजीली आपके वश में आ जाएगा। यह सोशल सेंशन के भय से ही लोग आपकी बात सुनना शुरू कर देंगे। तो इस तरह की यह जो मनुष्य स्वभाव है इस तरह की जो हमारे मन की स्थिति है उस समय ऐसा कहना ए नाओ तुम्हार ए दाऊ आार ये लो तुम्हारा यह दो मेरा और तुम्हारे साथ में और कोई संबंध नहीं मेरे एकमात्र आश्रय दाता है ईश्वर तो वो करना कितना कठिन है थोड़ा सा इमेजिन करके सोच लीजिए थोड़ा सा मन की आंखों से वो इमेजिन देख लीजिए कि जा हम मैं यदि ऐसा कर पाऊं पाऊंगा कि नहीं आई मायसेल्फ मैं जो हूं रामकृष्ण मिशन का पार्ट हूं यहां पर हमारा एक सोशल सिस्टम है जो भी मुझे करना है मुझे यह देखना पड़ेगा कि ये लोग कहीं लोग यह लोग तो मेरे पर नाराज नहीं हो जाएंगे यहां पर दंड देने का तो कुछ है नहीं आप क्या करेंगे जेल में डालेंगे आश्रम में रहना एक तरह से तो इसी तरह का हुआ ना कि आप नहीं बाहर जाते हैं नहीं लोगों से ऐसा कुछ मिलते हैं तो यह तो फिर आप क्या दंड करेंगे तो फिर हमको लगेगा कि लोग मुझे आइसोलेट तो नहीं कर देंगे। लोग मुझे सोशल सेंशन तो नहीं बिठा देंगे मेरे मन पे मेरे ऊपर में। तो यह जो भय के मारे समाज के भय के मारे हम बहुत कुछ करते हैं जो करने की इच्छा नहीं होती और जो करने से ईश्वर के ऊपर में से अपना मन चला जाता है। हम लोग क्यों ऐसा करते हैं? यह जानने के बावजूद कि हां ईश्वर है। हां भगवान है। ठाकुर ने देखा है उनको तो मैं क्यों नहीं दे सकता? क्योंकि हम ऐसा करते हैं क्योंकि यह जो अविश्वास जो है भीतर में यह अविश्वास इतना स्ट्रांग है कि हमको ईश्वर छोड़कर के बाकी जो भी सोशल कन्वेंशन है उसमें हमको रहे उसके भीतर में हम वो करने के लिए पूरी प्राण शक्ति डालते हैं। देखिए मनुष्य की

अधिकतम परिणाम पाने के लिए अपनी प्राण शक्ति को केन्द्रित करें

प्राण शक्ति होती है जो कि लिमिटेड होती है। आज मैं कहूं कि मुझे सब कुछ करना है। मुझे एक साइंटिस्ट भी होना है। मुझे एक एस्ट्रोनॉट भी होना है। उसके लिए मैं अपने को फिट करके ट्रेन करूंगा। वो जो बीच-बीच में ये जो सुनीता विलियम्स उसका वीडियो आते थे वो किस तरह से फिजिकल फिटनेस मेंटेन की जाए। वो कहती थी इंडियन लोगों की फिटनेस इतनी नहीं है। हमको करनी चाहिए फिटनेस। तो मैं सोचूं कि मैं विराट कोहली की तरह क्रिकेटर भी होऊंगा। उसकी तरह मैं एस्ट्रोनॉट भी होऊंगा। फिर इसकी तरह मैं सिंगर भी होऊंगा। स्वामी जी की तरह ईश्वर दर्शन भी कर लूंगा। तो वो तो होने वाला नहीं है। अपनी ये जो प्राण शक्ति है वह लिमिटेड है। नरन था कि जिसकी प्राण शक्ति बहुत ज्यादा थी। तो ठाकुर ने कहा था कि नरेंद्र सब विद्या में पारंगत है। गाय गाने में बजाने में और फिर ये जो उसका ये जो मेधा शक्ति है वो भी कितनी तीव्र है। तो इस तरह से ठाकुर स्वयं नरेंद्र की ये जो प्राण शक्ति की कैपेसिटी जो थी टैलेंट की वो प्रशंसा करते थे। किंतु हम लोगों की टैलेंट तो लिमिटेड है। यदि मैं यह चाहता हूं कि मैं क्रिकेटर होना होऊंगा तो फिर यह क्रिकेटर होने में ही मुझे मेरी पूरी प्राणशक्ति लगानी पड़ेगी। अच्छा सिंगर होना चाहता हूं तो उसी में प्राणशक्ति लगानी पड़ेगी। अच्छा साधु होना चाहता हूं तो उसी में पूरी प्राणशक्ति लगानी पड़ेगी। थोड़ा बहुत इधर-उधर हम लोग देख लेते हैं। उसमें कोई दिक्कत वाली बात नहीं है। किंतु एक्सपर्टाइज तो ज्यादा से ज्यादा एक ही फील्ड में होती है। बाकी सब फील्ड में अपनी हॉबी होती है। उसको एक्सपर्टाइज नहीं कह सकते। तो वो जो है कि प्राणशक्ति लिमिटेड है और इसी लिमिटेड प्राणशक्ति को फिर हम यदि लोगों को खुश करने में लगाएंगे कि हां मेरे से समाज की यह अपेक्षा है। मुझे इसको फुलफिल करना है तो फिर मेरे ईश्वर के लिए मैं क्या दे दूंगा? फिर रहा ही क्या है आखिर में ईश्वर के लिए? किंतु फिर भी बहुत सारे लोगों के साथ में मैंने यह बात देखी है कि सोशल कन्वेंशन है उसको फुलफिल करना है। लोग क्या कहते हैं? उसको समझ करके उसके अनुसार अपने को चलना है। मैं मेरा ईश्वर के साथ में क्या रिलेशन है? ईश्वर मुझे क्या आदेश देते हैं? मेरे मन में ईश्वर प्राप्ति के बारे में कौन सी यह सब धारणाएं हैं? उसको मुझे साइडलाइन करके समाज क्या चाहता है? जैसे मैं साधु हूं तो मैं यदि चाहूं भी तो बहुत सारा कुछ मैं नहीं कर पाऊंगा। कभी-कभी मैं सोचता हूं संध्या के बाद में मैं सुबह को तो मैं मंगल आरती के बाद में यह बीच पर जाता हूं। वहां पर बहुत कम लोग रहते हैं। तो वॉकिंग भी करता हूं। फिर समुंदर के किनारे वो जो रेती में बैठकर के वो थोड़ा बहुत ईश्वर का भी चिंतन स्मरण मनन कर लेता हूं। सामने खुला दरिया है। सूर्योदय हो रहा है। इतना सुहाना वातावरण है। किंतु मैं यदि ऐसा सोचूं कि मैं शाम को भी इवनिंग आरती है। संध्या आरती उसके बाद में मैं यदि जाऊं और बीच पर बैठूं और वहां पर यदि मैं ईश्वर का स्मरण मनन करूं तो कितना अच्छा होगा। कमरे में बैठने से तो वहां पर बैठना अच्छा है। किंतु यदि मैं वहां पर जाऊंगा और मैं यह करूंगा तो मुझे स्पिरिचुअली बहुत बेनिफिट होगा किंतु मैं कभी नहीं जाऊंगा। क्यों? क्योंकि यह समाज का कन्वेंशन है। बहुत सारे लोग वहां पे उस समय होते हैं। लेडीज भी होती है, बच्चे भी होते हैं। सब होते हैं। उसके बीच में जाकर के बैठना इस तरह से समुंदर के किनारे वो ठीक नहीं है। उचित नहीं है। वो जाने दो इस बात को। अपने कमरे में ही बैठ लेते हैं। यानी कि मेरी जो इच्छा है कि और मेरी जो समझ है आध्यात्मिक जीवन की मुझे ऐसा लगता है कि यह करने से मेरा अच्छा प्रोग्रेस होगा, डेवलपमेंट होगा। मैं इच्छा होने के बावजूद उसको नहीं कर सकता क्योंकि समाज क्या कहता है वह हमेशा मुझे देखना पड़ता है और सिर्फ यह मेरे साथ में ही नहीं है। यह जो समाज का कन्वेंशन का जो डर है यह हम भारतीयों के भीतर में बड़ा ही स्ट्रांगली बैठा हुआ है। यह काला पानी क्रॉस किया तो स्वामी जी को वो काली मंदिर में नहीं प्रवेश करने दिया। क्यों? अभी स्वामी जी को और तो कुछ दंड नहीं कर सकते हैं। तो उनको काली मंदिर में प्रवेश नहीं करने देंगे। तो इसके डर से बहुत सारे लोग जाते भी नहीं थे समुंदर पार करके बोल कर के हम लोग ये जो पहली बार वो जो ट्रेन चालू हुई साउथ इंडिया में कहीं पे एक आदमी उसको देखने के लिए गया स्पेशली अपना गांव छोड़कर के वापस आया तो पता चला कि उसको नाथ बाहर कर दिया है। क्यों गांव छोड़कर के वहां पर गए थे। तो देखिए कि इस तरह के जो भय है समाज का डर उसके माध्यम से उसके भय से चलते-चलते भारत की बड़ी ही अवनति हुई है। विदेश में थोड़ा सा समाज का डर कम रहता है। वो थोड़ा सा ज्यादा बोल्ड होते हैं। किंतु जैसे स्वामी जी ने कहा ना वहां पे धर्म का डर है। जैसे कि भारत में देखें कि रिलीजियस फील्ड में स्पिरिचुअल फील्ड में आपको 100% फ्रीडम है कि किस तरह के देवता की उपासना करना चाहते हैं। तंत्र माध्यम तंत्र विद्या से करना चाहते हैं। शब साधना भी यदि करना चाहते हैं। यदि यह कर्ता भजा की तरह स्त्रियों को लेकर के भी साधना करना चाहते हैं। सब तरह की साधनाएं अपने यहां पे प्रो प्रिस्राइब्ड है और आप जो चाहे वह करेंगे। लोग ज्यादा से ज्यादा बातें करेंगे आपके पीछे में किंतु इससे कोई बुरा परिणाम नहीं आएगा। किंतु समाज अपना बड़ा ही रिस्ट्रिक्टेड है। तो स्वामी जी कहते हैं इसका एग्जैक्ट रिवर्स अमेरिका में है। समाज में आप जो कुछ भी करें एक आदमी 10 शादी भी करता है। एक औरत 10 बार डिवोर्स भी लेती है तो न्यूज़पेपर में बड़ा एकदम उसकी प्रशंसा करके आएगा कि उसका इतने नंबर का डिवोर्स हुआ। अभी इसके बाद में तीसरा डिवोर्स इसके बाद में चौथा डिवोर्स नया हस्बैंड। तो ये सब चीजों की उनको कोई ये टेंशन नहीं है। किंतु धर्म के मामले में वो जो पादरी जो कहता है स्वामी जी कहते हैं कि ये जो पादरी जो होते हैं वे लोग क्या करते हैं? ये जो धनवती जो महिलाएं हैं उनको पकड़ते हैं। अभी उनका जो पति है वह तो सब दो नंबर का धन इकट्ठा किए हैं। तो फिर भगवान का डर दिखाएंगे उनको और उनके पास में से पैसा निकालेंगे। और इस तरह से ये अफ्रीका और एशिया में यह मिशनरी एक्टिविटीज करेंगे। तो देखिए कि यह जो समाज का डर यहां पे है तो वहां पर वह धर्म के भीतर में डर दिखा करके लोगों को यह जो ऑथॉरिटी फिगर्स है लोगों को कंट्रोल में रखते हैं। यदि ईश्वर दर्शन सही-सही में करना है तो अपनी प्राण शक्ति लोग क्या कहते हैं इस तरह में नहीं वेस्ट करके संपूर्ण रूप से ईश्वर पे भरोसा रख के व्याकुलता पूर्वक यदि उनको पुकारेंगे तो ईश्वर हमारे पर अवश्य कृपा करके हमको आशीर्वाद देंगे हो सकता है कि दर्शन भी दे दे किंतु वो जो जर्नी है देखिए यह जो पाश है ना जो अष्टपाश हमारे ऊपर में इतने सारे बंधे हुए हैं कि हम लोग बोल बोलते तो हैं कि हां मैं इससे मुक्त हो गया हूं। उससे मुक्त हो गया हूं। किंतु अपनी प्राणशक्ति को 100% फोकस हम कभी नहीं कर पाते। ये एक के बाद एक पाश, लज्जा, घृणा, भय, जाति, कूल, शील, मान, अभिमान इन सबके भीतर में ही हमारी यह प्राणशक्ति जैसे कि वेस्ट हो जाती है। ईश्वर को देने के लिए जैसे कि ज्यादा कुछ बचता ही नहीं है। यदि ईश्वर को सही-सही प्राप्त करना है तो लोग क्या कहते हैं? यह जैसे कि यह ठाकुर ने इसको कहा था। मोस्ट प्रोबेबबली यह अपने विजय कृष्ण गोस्वामी को ही कहा था कि यह तुम ऐसा मत सोचो कि मैं यदि हरि नाम में मत्त होकर के यदि मैं नृत्य कीर्तन करूंगा तो लोग क्या कहेंगे? ठाकुर कहते हैं लोगों को बोलने दो। बड़ा तुमको तुम्हारे लिए बड़ा अच्छा है। यदि लोग ऐसा बोले कि यह पागल हो गया है। हरि नाम में मत्त होकर के कीर्तन करता है। बोलने दो लोगों को। तुम इस तरह से यह जो सिर्फ लज्जा है, घृणा है, भय है, उसको छोड़ो और संपूर्ण रूप से ईश्वर के पास में अपने को समर्पित कर दो। तो यह समर्पण की जो यात्रा है हमारी, जैसे-जैसे हम आगे बढ़ते जाएंगे, पता चलता जाएगा कि ऐसे सूक्ष्म सब पाश आकर के हमको घेर के रखते हैं। काम कांचन बड़ा ही ग्रॉस लेवल का है। पता चल जाता है इंस्टेंटली कि यह है और हमको इससे मुक्त होना है। किंतु यह जो बाकी सब सूक्ष्म पाश है वो पता ही नहीं चलते कि हमारे पे वह लगे हुए हैं। हमारी प्राण शक्ति को जैसे कि वह व्यष्ट कर रहे हैं। पता ही नहीं चलता। तो, यह हमारी बुद्धि भी साथ-साथ में सूक्ष्म होनी चाहिए। सूक्ष्म से सूक्ष्मतर होनी चाहिए। तभी तो कहीं जाकर के एक दिन ऐसा आएगा कि हम इन पाशों को काटते जाएंगे। यह जो बंधन है मेरे पे, इसको काटते जाएंगे और संपूर्ण समर्पण की ओर आगे बढ़ेंगे। तो इसीलिए यहां पर देखिए, कितनी सुंदर कहानी। इसके बाद

भयभीत बच्चे की कहानी: सरल विश्वास से ईश्वर दर्शन होते है

में दूसरी एक कहानी ठाकुर कहते हैं। क्या कहते हैं? जटिल बालक कथा आ जटिल नाम के बच्चे की बालक की कहानी है। से पाठशाले जे तो वो पाठशाला में जाता। एक टू बनेर पोथ दिए पाठशाले जेते हो तो वन के रास्ते से उसको पाठशाला में जाना पड़ता था। ताई से भय पे तो इसीलिए वह डर जाता। मां के बुलाते मां बोले तोर भय की तू मधुसूदन के डाकवी मां को जब बताया तो मां ने कहा कि तुमको भय किस चीज का है तुम मधुसूदन को पुकारना छेलेटी जिज्ञासा कोर ले मधुसूदन के बच्चे ने पूछा कि यह मधुसूदन कौन है मां बोलले मधुसूदन तो दादा होए मां ने कहा मधुसूदन है तुम्हारे बड़े भाई दादा बांग्ला में दादा का अर्थ है बड़ा भाई गुजराती में दादा का अर्थ है ग्रैंडफादर तो यह मधु मधुसूदन है तुम्हारा बड़ा भाई तो कौन एकला जेते जेते जाई भय पे छे अमनी डेके छे दादा मधुसूदन तो फिर जैसे ही मां ने ऐसा कहा तो यह जटिल बालक वो रास्ते से जा रहा है वन में से जब डर लगा वैसे ही पुकारना शुरू किया कि दादा मधुसूदन कहां हो आओ मुझे दर्शन दो किंतु क्या हुआ क्यों को थाव नहीं कोई कहां पे कुछ नहीं है तखन उच्च ही स्वरे काते लाो कोथाई दादा मधुसूदन तुम एो हमार बोड़ो भय पे छे तब यह लड़का जोरों जोरों से रोने लगा और कहने लगा कहां पे हो दादा मधुसूदन तुम आओ मुझे बड़ा भय लग रहा है ठाकुर तो थकते पारलेना ऐसे बोलले एजमी तो भय की उस समय ठाकुर यानी कि मधुसूदन स्वयं वो रह नहीं पाए अपने को रोक नहीं पाए बच्चे की पुकार कार सुनकर के बच्चे का क्रंदन सुनकर के उनका हृदय विगलित हो गया। कृपा से परवश होकर के उसके सामने अवतीर्ण होकर के उसके बड़ा भाई का स्वरूप धारण करके कहता है कि या यह तो मैं हूं। तुमको डर किस चीज का है? ए बोले शंगे कोरे पाठशाला रास्ता परंतो पहुंचिए दिलन। ऐसे ही बोल के उसका हाथ पकड़ कर के पाठशाला के रास्ते तक पहुंचा दिया। यह जो वन पार हो गया जंगल जब पसार हो गया तो फिर डर क्या है फिर तो लोग है रास्ते पर दूसरे तो इस तरह से पहुंचा दिया आर बोललेन और कहा तू जोख डाकबी आमी आशबो भय की तुम जब पुकारोगे तो वैसे ही मैं आ जाऊंगा आकर उपस्थित होऊंगा तुमको डर किस बात का है ए बालक विश्वास ए व्याकुलता तो ऐसा ही बच्चे का विश्वास और ऐसी ही व्याकुलता चाहिए देखिए ठाकुर का पूरा जीवन देखेंगे तो ठाकुर के साधना के दो फेज हमने देखे हैं। दूसरा फेज जिसमें कि एक के बाद एक गुरु ने आकर के ठाकुर को विद्या की शिक्षा दी है। अपने अपने वो साधन पथ की पथ की शिक्षा दी है। तंत्र साधना, शक्ति साधना, फिर यह वैष्णव साधना, यह वात्सल्य भाव की साधना, फिर यह वेदांत साधना, यह सब साधनाओं की शिक्षा देते देते ठाकुर ने विधि पूर्वक उसका अनुष्ठान करके उस साधना का जो सर्वोच्च शिखर है, उसको प्राप्त किया है। यहां तक कि क्रिश्चियनिटी और इस्लाम की साधना भी उन्होंने कर ली थी। तो फिर किंतु यह जो हो गया सेकंड फेज था ये। फर्स्ट फेज में ठाकुर ने सिर्फ और सिर्फ व्याकुलता के माध्यम से ही मां काली का जगत जननी का दर्शन प्राप्त हुआ था। और वह जो व्याकुलता कैसी थी उसके बारे में भी हमने पढ़ा था। वो मां के साथ में एक आत्मीयता का संबंध बनाना है। मां के ऊपर में अपना अधिकार है। मां यदि दर्शन नहीं देगी तो मैं मां के ऊपर में नाराज होकर के मां को कंप्लेन भी कर सकता हूं। मां के साथ में झगड़ा भी कर सकता हूं। मां को मैं धमक भी दे सकता हूं। यदि दर्शन नहीं दोगी तो यहां पे मैं अपना गला काट दूंगा। दर्शन नहीं दोगी तो फिर यह मुकदमा चालू करूंगा तुम्हारे सामने। तो यह सब जो आबदार है बांग्ला में बोले आबदार। हिंदी में कहेंगे मान और अभिमान। यह जो पूरा सिलसिला है वह जगत जननी के साथ में ठाकुर का चला। और आखिर में वही फेमस वो प्रसंग है कि जैसे ही ठाकुर ने मां के सामने खड़ग उठाया वैसे ही मां ने आकर के ठाकुर को दर्शन दिया और फिर वो प्रस किस तरह से दर्शन दिया क्या अनुभूति हुई वह भी तो ठाकुर कहते हैं कि चारों ओर से यह प्रकाश का उर्मिल प्रवाह आकर के प्रकाश की तरंगे दिव्य प्रकाश की तरंगे आकर के मेरे पर छा गई और मैं जैसे कि होश गवा गवा बैठा और फिर बाद में शारदानंद जी महाराज कहते हैं कि इसी तरह से यह दिव्य प्रकाश के रूप में ही शायद मां जगदंबा ने आकर के अपने दिव्य अपना जो चिन्मय रूप है उसका दर्शन शायद ठाकुर को दिया होगा। तो यह जो जितनी ही व्याकुलता आती है वैसे ही हम ईश्वर की ओर आगे बढ़ते हैं। किंतु देखिए कि यह व्याकुलता यहां पर छोटी सी कहानी में बात तो बड़ी सहज लगती है। किंतु जैसे कि हमने ठाकुर के जीवन का अभ्यास किया। यह हृदय जाकर के ठाकुर को कहता है कि अरे यह जनेऊ उठाकर के तुमने फेंक दी है। कितने यह जन्मों के बाद में यह ब्राह्मण का शरीर देह धारण होता है। तो इतना तुम यह जो फॉर्चूनेट हो तुम इतने भाग्यवान हो तो तुमने ऐसा घमंड में आकर के जनेऊ भी उतार करके फेंक दी। ये क्या पागलपन कर रहे हो? यही यह जो हलधारी है ठाकुर को कहते हैं कि अरे तुम्हारे बच्चों का विवाह कैसे होगा? तो देखिए कि यह जो सोशल सेंक्शन है चारों ओर से ठाकुर के ऊपर में बैठे हुए थे। एक बार ठाकुर वहां पे शिव मंदिर में जाकर के शिव महिमन स्तोत्र का पाठ कर रहे हैं। पाठ करते-करते ऐसे भाव में आ गए कि आंखों में से वह अश्रुधारा बहती ही जाती है और वह प्रार्थना करते ही रहते हैं। 10 लोग वह जो काली मंदिर में थे इकट्ठा हो गए। किसी ने कहा भट्टाचार्य पागल हो गए हैं। उनको पकड़ करके उनके कमरे में थोड़ा सा ले जाए तो थोड़ा शांत होंगे कहीं पे। किंतु वो मथुर बाबू थे वहां पे। ठाकुर के पक्के सेवक तलवार निकाल कर के खड़े थे। किसी का साहस है तो ठाकुर को हाथ लगा के देखो अभी सर काट दूंगा। तो इस तरह के भैरव के रूप में जो रक्षक ठाकुर को मिले थे। वह भी तो इस तरह की व्याकुलता से ही तो मिले थे। हमको लगता है कि सिर्फ मां का दर्शन ही होगा। इससे अलावा और कुछ नहीं होगा। किंतु देखिए कि ठाकुर को यह मथुर बाबू का रक्षण प्राप्त था। काली मंदिर का यह जो प्रोटेक्शन उनको प्राप्त था। तो यह जो सब है उसको प्राप्त करने के लिए आपको प्रचंड व्याकुलता और संपूर्ण जैसे कि यह समाज के ऊपर में से समाज का जो भय है, डर है, वह आपके मन में से निकल जाना चाहिए। यह जो फेमस कहानी हमने काफी बार उसको रिपीट किया है कि बेलूर मठ से कुछ यंग साधु पैदल चल के जयराम भाटी गए कहा मां को कि मां हमको घेरवा दे दीजिए सन्यास दीक्षा दे दीजिए हम लोग काशी जाकर के तपस्या करना चाहते हैं तो मां ने कहा अरे बेटा वो ठाकुर के लिए तो यह जो मछली का माथा और यह खीर की कटोरी वह तो मथुर बाबू देते थे मथुर बाबू जुगाड़ करते थे तुमको कौन खिलाने वाला है यह धूप में वह भिक्षा करके करके के तुम लोग परेशान हो जाओगे। इससे बेटर है बेलूर मठ में जाओ शांति से रहो। अभी दुर्गा पूजा भी आ रही है। वहां पे कितना काम होगा। तो वो तुम वहां पे वो जो भी आपका जो कर्म योग है वह करो और फिर जो समय मिलता है उसमें आप लोग ईश्वर चिंतन करो। तो अभी क्या है कि देखिए कि किसके मन की व्याकुलता कितनी है। यह जो समाज के प्रति भय डर किसका है जितना ये जो वासनाओं के प्रति हमारा आकर्षण कितना है? यह देखकर के ही तो मां इस तरह की सलाह देती होगी। अदरवाइज ठाकुर ने यह जो सब किया मां को नहीं पता है कि थरी क्या है? सब कुछ त्याग करके ईश्वर का आप चिंतन मनन कीजिए। ईश्वर प्राप्त होने वाले हैं। किंतु फिर भी मां देखती थी कि किसके हृदय में क्या कैपेसिटी है। किस की कितनी क्षमता है। देखकर के ही तो मां ने कहा कि लंबा समय जाएगा ईश्वर दर्शन करने के लिए। बेटर है कि संघ की सुरक्षा में रहकर के आप साधन भजन कीजिए। तो यह हो गई व्याकुलता की बात और आखिर में देखिए कि यह जो दिव्य ये

ईश्वरीय महिमा की कहानी: रांची में हाथियों का उत्पात

सब कहानियां है इसके बारे में हमको लगता है कभी-कभी कि यह सब क्या वो थ्यरी में ही होती है या तो किताब में ही पढ़ने को मिलती है। तो मेरा एक गुड फॉर्च्यून हुआ था इस तरह की एक घटना का दर्शन करने का मेरी खुद की आंखों से यदि मैंने देखा नहीं होता तो मैं विश्वास नहीं करता उस समय में रांची में था और रांची में हमारा फार्म है गतलसुद दो फार्म है गेथलसुद और महेशपुर वो पूरे 7075 एकड़ के दोनों फार्म है तो गवर्नमेंट ने हमको दिए हैं वहां पे यह ट्राइबल लड़कों को ट्रेनिंग देने के लिए तो बहुत सारी एक्टिविटी होती किंतु क्या है कि बीच-बीच में जो एक बैच समाप्त हो के दूसरी बैच जो स्टार्ट होने वाली है उसमें थोड़ा गैप रहता है और वो जो हमारा डोरमिटरीज वगैरह है वह खाली रहता है तो और मैं वहां पर जाकर के रेगुलर रहता था रात को क्योंकि दिन भर मुझे ट्राइबल एरिया में घूमना है तो दिव्यायन से रांची से आते-आते समय लग जाता था। एक डेढ़ घंटे दो-ती घंटे लग जाते थे गतलसुद आते-आते। फिर और भी वहां पर इंटीरियर में जाना है हमको तो और तीन-चार घंटा तो बेटर है कि यदि कंटीन्यूअस प्रोग्राम चल रहा है तो कुछ दिन गतलसुद में ही रह गए रात को और रोज सुबह को वहीं से गांव में जाएंगे रात को आकर के वहीं पर रह लेंगे तो मैं इस तरह से कुछ समय वहां पर रह रहा था यह जो लड़के लोग थे डोरमेट्री में जो जनरली रहते थे वे लोग थे नहीं गैप था दो बेंच के बीच में और कोई नहीं था पूरे फार्म में दो चौकीदार थे और वहां का एक मैनेजर था तो मैनेजर का फैमिली था तो वहां पे हम मैं था उस दिन रात को पूरा अंधेरा ट्राइबल एरिया में तो पता है स्ट्रीट लाइट वगैरह तो कुछ होता नहीं है। चांद का और तारों का जो प्रकाश है वही प्रकाश है। एकाएक वो जोर-जोर से हाथियों की गर्जन सुनाई दी। तो वो मैनेजर मुझे चिल्ला करके कहता है कि महाराज ये हाथियों का पूरा झुंड आ गया है। आप अपने घर कमरे में से बाहर मत निकलिएगा। तो मैंने कहा अरे भाई तुम शांत हो जाओ चिल्लाओ मत उन लोगों का नजर हमारी ओर आकर्षित मत करो मुझे पता है कि हाथी जब आते हैं तो कमरे में ही रहना है बाहर नहीं निकलना है इतना तो टाइम मैंने बिताया है ट्राइबल एरिया में मुझे पता है तो अभी देखिए कि हाथियों का 15 20 हाथियों का पूरा एक दल हमारे वो कैंपस था वैसे तो फार्म बहुत बड़ा है किंतु एक छोटा कैंपस में हम लोग रहते थे डोर मीटरीज थी किचन था हमारे रहने के लिए घर थे वहां पे और वहां पे एक सोलर पर एक यह बिठाया हुआ था टंकी पानी गर्म करने का वो था और उसके कोने में यह कैंपस के एक कोने में एक शाइन बनाया था तो शाइन भी कैसा कि वो टिन का शाइन है टिन के उसकी छत है उसका वो शाइन था और फिर ज्यादा कुछ था नहीं दीवालें भी नहीं थी वो जैसे रेलिंग ही थी चारों ओर बाहर में एक ग्रिल का दरवाजा था चारों ओर रेलिंग थी और सर के ऊपर में टिन का एक शेड था ठाकुर मां स्वामी जी का फोटो था वहां पे में बैठा करता था। इतना सुंदर लगता था क्यों गांव का वातावरण है, शुद्ध हवा है। चारों ओर जहां तक नजर जाए यह ग्रीन खेत ही खेत दिखते हैं आपको। यह और थोड़ा सा दूर देखेंगे तो वन देखने को मिलेगा और थोड़ा सा जाएंगे तो नदी आएगी। बड़ा सुंदर दिव्य नजारा। तो तीन शेड वाले मंदिर में मैं बैठा करता था और मुझे बहुत अच्छा लगता था। और जब ये स्टूडेंट वहां पर रहते थे तो स्टूडेंट का एक लीडर हमारी ओर से एक अपॉइंट होता था। वो यह खंडना गाता था। उसको लड़के को हम सिखा देते थे। तो यह लड़का और जो ट्राइबल लड़के हैं, वह हारमोनियम पे खंडना गा रहे हैं। और मैं वहां पे कोने में बैठा हूं। वन ऑफ द बेस्ट मेमोरीज ऑफ माय लाइफ। माने यह बेलमठ का भी मैं यदि कंपेयर करूं तो वो जो टिन शेड वाला जो शाइन था माने इट कम्स नियर टू बेलरम टेंपल। जो मेरा खुद का अनुभव है। उसकी बात कर रहा हूं। तो वो शाइन है वहां पे। यहां पर किचन है। यहां पर वह जो सोलर टैंक है पानी गर्म करने का और यहां पर एक कोने में हमारे कमरे हैं। और सामने के कॉर्नर में वो डोरमेट्रीज है। ऐसा एक कैंपस था। एकाएक ये जो हाथियों का झुंड है इस कैंपस में घुस आया और फिर आकर के जो तबाही मचाना शुरू किया है। और वहां पे तो मिट्टी की दीवार है। तो यह जो किचन था उसकी दीवाल तोड़ी। उसके भीतर में जाकर के बर्तन-फर्तन जो अपनी सूंड से पकड़ करके इधर-उधर फेंकना शुरू किए। फिर यह जो पानी का वो सोलर टैंक था उसको उठा के ऐसा फेंकना शुरू किया जैसे फुटबॉल की तरह टैंक को बड़ी सी टैंक थी मेटल की। किंतु फिर भी वह फुटबॉल की तरह एक हाथी यहां से फेंकता है तो दूसरा हाथी वहां से फेंकता है। मैं अपनी खिड़की में से देख रहा हूं और सोच रहा हूं लाइट वाइट सब बंद कर दी है हमने अपने कमरे की और सोच रहा हूं कि यदि हाथी इस कमरे की ओर आए तो वो तो मिट्टी की दीवार है। एक धक्का मारेंगे तोड़ेंगे और फिर हमको पूरा मार देंगे। वो जो दो चौकीदार थे वह तो वैसे ही भाग गए जैसे ही हाथियों की आवाज सुनी। अब हम लोग कहां पे भागेंगे? तो हम लोग को कमरा वो मैनेजर का फैमिली था और मैं मैं सोच रहा हूं कि कहां भागेंगे यह सब छोड़ के। तो कमरे की लाइट बंद करके हम लोग बैठे हैं। खिड़की में से मैं देख रहा हूं कि ये टैंक को इधर से उधर फेंक रहे हैं। किचन को तबाह कर दिया। डोर मीटर इसको तोड़ा और फिर आखिर में ठाकुर की कृपा से हमारे कमरे की ओर तो नहीं आए। किंतु आखिर में तीनचार हाथी वो शराइन जो था वहां पर गए। मैं लिटरली मैंने अपनी नजरों से देखा है। नहीं देखा होता तो यह नहीं बताता। लिटरली शाइन का वह जो ग्रिल का दरवाजा है उसको तो पकड़ कर के खींच करके तोड़ के फेंक तो दिया किंतु जैसे ही उसके भीतर में जैसे एक पैर रखा वहीं पर रुक गया। अभी देखिए कि देयर इज नो प्रोटेक्शन। ठाकुर के चित्र जो ठाकुर का यह जो ये था चित्र कोई प्रोटेक्शन नहीं है। ऊपर में टिन की दी ये छत है और चारों ओर ग्रिल है और कुछ नहीं है। लिटरली कुछ नहीं है। तो उस हाथी ने भीतर में एक पैर रखा। मैं अपनी नजरों से देख रहा हूं। मैं सोच रहा हूं कि ठाकुर के फोटो को उठा करके फेंकेगा तो कितना बड़ा अपराध होगा। मेरे ही सर पर आएगा। मैं वहां पर इंचार्ज था। तो व्हाटएवर ठाकुर वो हाथी ने एक पैर रखा। कुछ देर वहां पर खड़ा रहा। फिर वहां से रिटर्न होकर के वह चला आया और वहां से जो वो एक हाथी जो निकला उसके पीछे बाकी सब हाथी धीरे-धीरे करके वहां से चले गए। मैंने कहा देखिए यह ठाकुर की कैसी महिमा है। माने इस तरह के हाथियों को यदि आपको भगाना है तो गांव वाले वो अग्नि जलाएंगे। ड्रम बजाएंगे। क्या-क्या सब करेंगे तब यह हाथियों का झुंड यह तबाही करना बंद करेगा और वहां से भागेगा। किंतु यह मैंने देखा लिटरली अभी इसके पीछे कोइंसिडेंस है कि चमत्कार है वह आप अपने से सोचिए। मुझे तो सही में लगा कि यह जो प्राण की रक्षा हुई थी उस दिन मेरी यह जो रांची में जो कुछ भी मैंने सिंसियरली काम किया ठाकुर ने मेरा जीवन रक्षा उस दिन इस तरह से की वरना तो लिटरली उस दिन मुझे लग रहा था जिस तरह से किचन को तोड़ा था कि जिस तरह से किचन के भीतर में जाकर के तबाही मचाई थी डोरमीट्रेस को जिस तरह से तोड़ा था मुझे लगा कि हमारे कमरे की बारी आने ही वाली है। तो खैर वो बच गए तो देखिए कि यह जो सब कहानियां है यह बिल्कुल गलत भी नहीं है। हमारे जीवन में भी कभी-कभी ठाकुर की कृपा से यह सब देखने को मिलता है। अच्छा तो आज यहीं तक अभी कल मिलते हैं। मंडे को मिलते हैं। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु

प्रश्न: सुधा मूर्ति में सस्ती क्लास में यात्रा करने का साहस है। उनमें सामाजिक दबाव का सामना करने का साहस है।

बट वी नीड टू हैव करेज टू स्टिक टू आवर गंस अह स्वामी शारदानंद जी महाराज अह ड्यूरिंग दिस फर्स्ट कन्वेंशन ऑफ़ रामकृष्ण मिशन 1926 ही गव अ वेरी इंपॉर्टेंट लेक्चर देयर ही सेज़ दैट एनी ग्रेट मूवमेंट इट अंडरगोस सेवरल फेस। सो व्हेन द ग्रेट मूवमेंट स्टार्ट्स फर्स्ट पीपल विल इग्नोर यू। देन दे विल रिडिक्यूल यू। देन दे विल अपोज यू। एंड देन फाइनली इफ दे थिंक इफ दे सी दैट इग्नोरिंग देम, आइसोलेटिंग देम, रिडिकुलिंग देम, मेकिंग फन ऑफ़ देम ऑर अपोज़िंग देम। इट डज़ नॉट मेक एनी इफ़ेक्ट ऑन दिस मूवमेंट। दे गो ऑन डूइंग व्हाट दे वांट टू डू। देन पीपल विल स्टार्ट एक्सेप्टिंग यू। सो दैट इन दैट इनिशियल टर्बुलेंट फेज वी ऑल हैव टू पास वी ऑल हैव टू स्टैंड द टेस्ट ऑफ़ टाइम। सो दिस इज़ वी ऑल हैव टू डू इफ वी आर सिंसियर इन आवर बिलीफ। मेनी पीपल मेनी ऑर्गेनाइजेशन वेयर द मोमेंट दे सी एनी लिस्ट अमाउंट ऑफ अपोजिशन लिस्ट अमाउंट ऑफ रेजिस्टेंस दे विल लोअर देयर आइडियल इमीडीिएटली। सो वी हैव टू डिसाइड वेदर वी स्टैंड फॉर आइडियल्स ऑर वी स्टैंड फॉर सोशल एक्सेप्टेंस।

प्रश्न: सामाजिक दबाव का सामना करने के लिए हमें दृढ़ विश्वास की आवश्यकता है।

बट वी हैव टू चूज़ आवर फाइट। वी हैव टू पिक एंड चूज़ आवर फाइट। सी ठाकुर एंड स्वामी जी बोथ एक्सेप्टेड ठाकुर एंड मदर बोथ एक्सेप्टेड मेनी सोशल कन्वेंशन। द वे वीमेन शुड लीव। वी हैव सीन मदर्स लाइफ। शी यूज्ड टू लिव इन दैट नौबत। शी यूज्ड टू बी सो रिस्ट्रिक्टेड इन हर मूवमेंट। शी वाज़ सो कंजर्वेटिव आल्सो। सो वी हैव टू पिक आवर फाइट। वी कैन नॉट गो ऑन फाइटिंग फॉर एव्री पॉइंट दैट वी बिलीव इन। ठाकुर ही वाज़ ही हिमसेल्फ यूज़्ड टू बिलीव इन सो मेनी थिंग्स। राइट? सो इन अह इनस्पाइट ऑफ़ हिज़ एटनिंग निर्विकल्प समाधि ही वाज़ सोशियली कंजर्वेटिव। बिकॉज़ ही न्यू दैट सी इफ वी बिकम टू मच रेडिकल पीपल विल स्टॉप एक्सेप्टिंग अस। सो फॉर एग्जांपल देयर वाज़ सो मच ऑपोज़िशन टू बेलूर मठ इन बाली सराउंडिंग अ बेलूर मठ एरिया। बट द मोमेंट वी स्टार्ट दुर्गा पूजा एवरीवन रियलाइज दैट नो दे आर आल्सो वेरी ट्रेडिशनल हिंदू मोनेस्टिक ऑर्गेनाइजेशन। सो दे स्टार्टेड रिस्पेक्टिंग अस। सो सी वी हैव टू पिक एंड चूज़ आवर फाइट। वी कैन नॉट फाइट एंड एव्री पॉइंट ऑन एव्री बिलीफ दैट वी हैव। वी हैव टू कंजर्व आवर प्राणशक्ति आवर साइकिक एनर्जी एंड फोकस इट ऑन द पॉइंट्स व्हिच वी ट्रूली बिलीव इन। यह जो मां कहती है ना कि मनना मत तो हस्ती। मन है ना कि पागल हाथी है। मत हाथी है। सब समय मन को काम में लगा करके रखना चाहिए। थोड़ा सा भी मन को खाली रखने दिया तो यह पागलपन करेगा ही करेगा। देखिए यहां पे जो ठाकुर कहते हैं ना कि यह सब छोड़कर के यह दो ए नाओ अमार ए नाओ तुम्हार एदा दाऊ अमार ये लो तुम्हारा यह दो मेरा यह सब क्या है पता है? ईश्वर के साथ में जो अपना रिलेशन है उसके लिए मां ने जैसे कहा मां ने स्पष्ट कहा ठाकुर कहते हैं लज्जा घृणा भय तीन थकते नहीं आमी बोलची लज्जा घृणा भय तीन थकते होए ठाकुर ने कहा है कि लज्जा घृणा भय यह तीन रहते नहीं होगा किंतु मैं कहती हूं कि लज्जा घृणा भय तीन थकते होगा तो क्या है कि यह सोशल कन्वेंशन जो है उसको थोड़ा बहुत मान के हमको चलना होता है मन को कष्ट भी होता है तो क्या करेंगे किंतु तो जहां तक ईश्वर का प्रश्न आता है देखिए ईश्वर प्राप्ति में कोई विघ्न डालता है। ठाकुर क्या कहते हैं कि यह जो हम लोग जनरली बड़ा भाई है, पिताजी है इन सब की बातों को सुनते हैं। समाज की बातों को सुनते हैं। किंतु विभीषण को देखिए भगवान राम के लिए बड़े भाई की बात उन्होंने अस्वीकार कर दी। ये ध्रुव को देखिए भगवान प्राप्ति के लिए पिताजी को अस्वीकार कर दिया। तो जहां तक ईश्वर प्राप्ति के मार्ग में बाधा बनता है समाज तो उनको रिजेक्ट कर देना है। ईश्वर प्राप्ति के मार्ग में हमारी प्राण शक्तियों को जो बिखेर देता है उस सब कन्वेंशन से हमको मुक्ति पानी है। किंतु इन जनरल यदि अपनी कामना वासनाओं की पूर्ति करने के लिए यदि कोई बाधा आकर के खड़ी होती है और हम पागल हाथी की तरह बिहेव करें तो वह भी तो नहीं चलेगा। जनरली हमको लगता है कभी-कभी कि समाज के सभी यह जो कन्वेंशन है गलत है। किंतु ऐसा भी तो नहीं है। मन की वासनाओं को कंट्रोल करने के लिए तो यह सब बनाया गया है ना। यह यह विवाह की प्रथा है। क्यों? आप समाज में विवाह की प्रथा प्रारंभ की। पशुओं में तो ऐसा नहीं होता है कि एक पत्नी या एक पति के साथ में विवाह करके उसके साथ में जन्मजन पूरा जीवन भर का रिश्ता निभाए। ऐसा तो होता नहीं है। हमारे में क्यों है? क्योंकि मन की वासनाओं को कंट्रोल करने के लिए विवाह प्रथा नहीं होती और जिसको जिसके साथ में वह करना है वह यदि इस तरह का संबंध बनाना है बनाएगा तो समाज में पूरी अराजकता फैल जाएगी। बोल कर के विवाह प्रथा है। बोल के यह पति का पत्नी का यह जो सब धर्म बनाए गए हैं यह धर्म क्यों बनाए गए हैं? क्योंकि मन के भीतर में कामना वासना है। उसको पूरी करने के लिए हम प्रयास करेंगे। तो वेद कहते हैं कि भले मनुष्य का हृदय है कामना वासना रहेगी। उसमें आप कुछ कर नहीं सकते। किंतु आप उसको पूर्ण कीजिए। धर्म के रास्ते पर कीजिए। आप समाज के कुछ नियमों को स्वीकार करके कामना वासनाओं की पूर्ति कीजिए। कोई इसमें दिक्कत नहीं है। किंतु कामना वासना की पूर्ति करने के लिए राक्षस की तरह बिहेव करना शुरू कर दिया। यह चंगेज खान आर्मी लेकर के जाता था। जो शहर जो गांव रास्ते में आया सब पुरुषों को मार दिया। स्त्रियों पर अत्याचार किया। बच्चों को जिंदा जला दिया। उनका सर काट के उनके मस्तिष्क का बड़ा सा यह पहाड़ बना दिया। इस तरह से जो राक्षसी पशुवत आचरण करेंगे तो सभ्यता तो खत्म हो जाएगी। इसके लिए यह सब कन्वेंशन बने हैं। कन्वेंशन का आवश्यकता क्या है? वह समझना है। हमारी कामना वासनाओं को कंट्रोल में रखने के लिए बने हैं। और कन्वेंशन को कहां पर छोड़ देने हैं, वह समझना है। कि ईश्वर प्राप्ति में यदि बाधा होते हैं तो फिर उसको रास्ते में नहीं रहना चाहिए। उसको फिर रास्ते में से हटा देना चाहिए। हम जितना हम जितना ठाकुर को पढ़ते जाएंगे जितना रामकृष्ण विवेकानंद साहित्य का अभ्यास करते जाएंगे वैसे ही देखेंगे कि यह जो दिन प्रतिदिन की जो चैलेंजेस है अपनी साधना में अपने आध्यात्मिक जीवन में सब के जैसे कि समाधान हमको मिलते जाएंगे और साथ में ही सिर्फ समाधान ही नहीं मिलेगा। हमको पता भी नहीं है। इस तरह की समस्या हमारे जीवन में है। वह भी पता चलना शुरू होगा कि यह समस्या थी बोल के मुझे पता ही नहीं था। माने सिर्फ समाधान ही नहीं मिलता है। समस्या भी मिलती है। ये पता चलेगा कि यह समस्या है और इसका यह समाधान है। वरना तो यह पाश मेरे पे बंधा हुआ है। पता ही नहीं चलता। सो दिस इज़ अ ग्रेटनेस ऑफ़ रामकृष्ण विवेकानंद लिटरेचर।

प्रश्न: हम सभी लड़ाइयां नहीं लड़ सकते। हमें अपनी लड़ाइयां चुननी होंगी, क्योंकि अपनी प्राण शक्ति सीमित है।

सबको अपना-अपना बैटल लड़ना है। क्योंकि दिस आर हाइली कस्टमाइज्ड। अब जिसका जो जीवन है फिंगरप्रिंट की तरह सबका यूनिक लाइफ पैटर्न है। रूल ऑफ थंब यह है कि जो ठाकुर कहते हैं मने वने और कोने यह जो बैठकर के जो तपस्या करनी है उसमें बाधा जब तक नहीं आती है तब तक कोई वो आ बेल मुझे मार बोल के जाने की जरूरत नहीं है। जैसे इनमें बाधा आना शुरू होती है। मैं शांति से बैठा हूं यहां पे और फोन बज रहा है। मैं फोन नहीं उठाऊंगा तो सामने वाला मुझे गाली देगा कि क्यों फोन नहीं उठाया। इन दैट केस हमको थोड़ा सा सोचना पड़ेगा कि अरे भाई यह क्या हो रहा है। राइट? सो अपनी जो जो साधना हमने निश्चित की है जैसे कि ये सुबह का क्लास है हमारा। मैं देख रहा हूं कि सभी लोग मोर और लेस रेगुलर आ रहे हैं। तो अभी यदि आपने ये एक बैटल चूज़ की है कि सुबह क्लास ना कि यदि बहुत सारे हमारे डिवोटी मंगल संध्या आरती में जाते हैं। इफ आई हैव चूज़ दिस एस माय साधना तो फिर मुझे देखना है कि इसमें बाधाक ना आए ऐसा करना है। सो साधना मेरी यह मैं कर सकता हूं। दिस इज़ मेरा यह कैपेसिटी है। मैं इतनी साधना कर सकता हूं। बहुत सारे लोग जैसे अभी रिट्रीट में जाते हैं तो वो उसके लिए आपको तो समय चाहिए। बाकी सब कंपनियों में इतना तो फटाफट छुट्टी मिलेगा नहीं कि मुझे एक महीना रिट्रीट में जाना है, एक सप्ताह जाना है तो मुझे छुट्टी दे दीजिए तो नहीं मिलता है। सो इन दैट केस आपको सोचना है कि फिर यह कंटिन्यू करें कि ना करें यहां पे। सो अपने लिए एक साधना निश्चित कर देनी है और जब तक साधना में विघ्न नहीं आता है तब तक हमको फिर वी हैव टू एक्सेप्ट व्हाटएवर देयर इज। उसमें जब बाधा आनी शुरू हो जाए तो फिर देखना है। अभी सोच लिया कि मैं सुबह को अर्ली मॉर्निंग उठूंगा। अपने बहुत सारे डिवोटी है कि जो कि अर्ली मॉर्निंग 5:00 बजे क्लास करते हैं। वो तो व्हिच इज़ वेरी सरप्राइजिंग। तो वेरी गुड एक्चुअली मैं भी सोच नहीं सकता ऐसा इस समय क्लास करना। तो ये जो करते हैं। सो विद व्हिच इज़ वेरी गुड। तो अभी यदि आपने यह ठीक किया है कि सुबह को 5:00 बजे यह प्रेयर का क्लास है ऑनलाइन वगैरह करना ही है तो फिर रात को यदि मुझे देरी तक जगा के जो रखता है उसको मुझे छोड़ना पड़ेगा राइट सो यह हमको अपना साधना यह है पहले यह डिटरमाइन किया और फिर साधना में क्या विघ्न डालता है उसको फिर छोड़ना शुरू करो दिस इज अ रूल ऑफ थंब अभी मैंने वो उदाहरण दिया था ना वो जो प्राइवेट सेंटर था आई 1970 से वो वो जुड़े हुए हैं और पूरा जीवन जैसे कि यूथ से ही कॉलेज के बाद से ही जैसे वो राम विवेकानंद केंद्र अपना वो जो प्राइवेट सेंटर था रामकृष्ण विवेकानंद केंद्र उसको डेडिकेट किया तो वो मुझे बता रहे अभी तो वो रिटायर भी हो गए उनका लड़का भी अभी साधु है अपने ऑर्डर में तो वो मुझे बता रहे थे कि देखिए महाराज मैंने ठीक किया कि जैसे जॉब से आऊंगा सीधा मैं अपने केंद्र पे आऊंगा और फिर और कुछ टेंशन नहीं लेना है मुझे जो भी सोशल कन्वेंशन है मेरी वाइफ जाएगी मैं नहीं जाऊंगा तो फिर कुछ समय के बाद में मेरे रिलेटिव्स ने मुझे बुलाना भी बंद कर दिया। सो आई एम ओके विद दैट। तो देखिए कि यह जीवन भर का व्रत ले लिया। मैंने खुद ने अपनी नजरों से देखा है। मैं केंद्र पे जाता था। ऐसा दिन हो ही नहीं सकता कि भाई नहीं आए वहां पे वो छुट्टी के मतलब जॉब से निकलने के बाद में। तो देखिए कि यह उन्होंने ठीक कर लिया कि शाम तो मुझे केंद्र पे ही बैठना है। और फिर रास्ते में जो आएगा उसको छोड़ दूंगा। ऐसा नहीं है कि मैंने जॉब छोड़ दी है। बीवी बच्चों को छोड़ दिया। ऐसा नहीं। घर किया है, नौकरी भी करते हैं। किंतु जो मेरे पास में टाइम है कि नौकरी के बाद में दो-ती घंटा मुझे मिलते हैं तो यह फालतू का बिताने की बजाय मैं केंद्र पर जाकर बैठूंगा। सो इतना भी जो उन्होंने पकड़ लिया और उसके सामने जो बाधा आई उसको हटा दिया। तो ऐसा नहीं कि जॉब छोड़ दी, परिवार छोड़ दिया। ऐसा भी नहीं किया और यानी कि जैसा आपने कहा कि साधना पकड़ करके अपनी लाइफ को एंकर कर देना है उसमें। फिर आसपास में जो होता रहे होता है। यह जो एग्जैक्टली ऐसा उदाहरण

प्रश्न: तस्मिन् तुष्टे जगत तुष्टम - इसका क्या अर्थ है?

अपने ऑर्डर में है ना कि वह विज्ञान महाराज विज्ञानानंद जी वो घाट पर खड़े रह के वो घाट बना रहे थे। बेलूर मठ में धूप है। बड़ी प्यास लगी है। वहां पे अपने कमरे के वरांडे में स्वामी जी खड़े हैं। वो शरबत पी रहे हैं। दूध वगैरह कुछ पी रहे होंगे। तो पिया फिर वो खाली गिलास एक सेवक को दिया। बोला कि जाकर के वो पेशेंट को दे दो। तो यह विज्ञान महाराज के पास खाली गिलास ले आए हैं। तो विज्ञान महाराज सोचते हैं स्वामी जी मेरे साथ में ये कैसा कटाक्ष कर रहा है? खाली गिलास दिया तो ठीक है चलो स्वामी जी का वो ये है प्रसाद है तो एक बूंद वो पड़ा था शरबत का वो जैसे ही पिया वो वैसे ही देह मन पूरा शीतल हो गया। अभी आप इसको चमत्कार कहेंगे कि विज्ञान महाराज की स्वामी जी पे श्रद्धा कहेंगे? दैट इज़ अभी इज़ अ मैटर ऑफ़ डिबेट।

प्रश्न: चमत्कार ईश्वर की शक्ति से होता है न हमारी भक्ति से? पूजा की विधि में शक्ति है या पुजारी की भक्ति में?

जैसा आपने पूछा कि एक फैक्टर क्या है ऐसा होने का? यानी इज़ अ चमत्कार व्हिच इज़ ऑब्जेक्टिव। कि वो कोई वर्कर भी खड़े थे वहां पे। उनको दे दिया होता तो उनका भी प्यास बुझ जाता। क्या? माने चमत्कार इज़ इंडिपेंडेंट ऑफ डिवोटी। माने इस ऑब्जेक्टिव रियलिटी कि उनकी भक्ति थी बोल कर के उनकी प्यास बुझी। वो वर्कर्स जो खड़े होंगे मजदूर वगैरह। उनकी तो ऐसे स्वामी जी पे भक्ति नहीं होगी। तो वह पिएंगे तो उनकी प्यास हो सकता है कि नहीं बुझी होगी। सो वेदर दिस मिरेकल इज ऑब्जेक्टिव और इट इज सब्जेक्टिव व्हिच इज वी डू नॉट नो। ये ये देखिए आपने ये जो थॉट एक्सपेरिमेंट के बारे में कहा ना मैं भी एक ऐसा एक थॉट एक्सपेरिमेंट सोचता हूं कभी-कभी। जैसे कि ये पूजा की विधि है। राइट? तो ये पूजा की विधि ऑब्जेक्टिव है ना कि सब्जेक्टिव है? इस अर्थ में कि पुजारी भगवान के सामने बैठकर पूजा करता है। अभी पूजा की यह जो पंचोपचार या दशोपचार की विधि जो शास्त्र में बताई गई है उसको टू द डॉट उसको फॉलो करता है। एज एग्जैक्टली एस पॉसिबल। तो विधि में पावर है ना कि यह पुजारी में पा मतलब पुजारी की भक्ति में शक्ति है। तो देख लीजिए कि मान लीजिए कि एक पहाड़ है। पहाड़ के ऊपर में एक मंदिर है। मंदिर में एक रोबोट को बिठाया है और यह रोबोट वो पंचोपचार पूजा कर रहा है ना वहां पे कोई नहीं है ना किंतु प्रश्न यह है कि वह देवता प्रसन्न होंगे कि नहीं क्योंकि पूजा की विधि तो हमने कर दी राइट किंतु पुजारी जो है वो वहां पे एब्सेंट है वो तो मैकेनिकली पूजा हो रही है तो पावर किस में है जो पूजा की भक्ति में पावर है ना कि ये विधि में पावर है। राइट? सो ऐसा थॉट एक्सपेरिमेंट हम कर सकते हैं। आंसर माइट नॉट बी एज ऑब्वियस एस पॉसिबल। अभी तक मेरा जैसे कहा कि एक सेकुलर माइंडसेट था तो मैं हमेशा ये साइकोलॉजी की दृष्टि से ही सोचता था। एवरीथिंग इज सब्जेक्टिव इन द वर्ल्ड ऑफ रिलीजन। यदि मेरी भक्ति है तो मैं विधि विधान के अनुसार पूजा करूं कि ना करूं। ठाकुर का तो हमने देखा विधि को कहां उठा के फेंक दिया था। फिर भी मां प्रसन्न हुई। तो विधि में तो ऐसा कुछ नहीं है। पुजारी की भक्ति में ही सब कुछ है। किंतु दूसरी ओर जब हम शास्त्र पढ़ते हैं कहते हैं कि विधि में इटसेल्फ पावर है। तो फिर यह सब प्रश्न खड़े होते हैं कि रोबोट यदि पूजा करेगा तो यदि ईश्वर प्रसन्न होंगे कि नहीं होंगे?

प्रश्न: रामलाल दादा ने ठाकुर का इतना सत्संग किया, इसके बावजूद उन्होंने माँ की पेंशन बंद करवा दी, तो सत्संग से क्या लाभ हुआ?

माने वो तो फिर भी गृहस्थ थे। अभेदानंद जी तो साधु थे। ठाकुर के डायरेक्ट डिसाइपल थे। फिर भी ऑर्डर छोड़ के चले गए। राइट? सो यह सब है कि देयर इज क्या कहेंगे इसके बारे में? कर्म का प्रवाह जिसको जहां ले जाए हम लोग बस प्रार्थना यह करें कि हम इस तरह के क्रॉस करंट में ना फंस जाए। एट द सेम टाइम हमको अपनी एक्सपेक्टेशन को मैनेज करना है। जैसे उसका रिवर से गिल्ट फीलिंग ना आ जाए कि इतने साल सत्संग किया फिर भी कुछ नहीं हुआ। मुझे 20 साल हुए रामकृष्ण संघ में। आई एम नॉट सेटिस्फाइड विद माय साधना। मैं जब राजकोट में था मैं हमेशा सोचता था कि भूतेशानंद जी भी तो यहां पे रहे हैं ना तो भूतेश आनंद जी की साधनाओं के बारे में तो हमने क्या-क्या सब सुना है वो जप करते हैं तो करते ही रहते हैं करते ही रहते हैं मैं वहां पे पागल की तरह पब्लिकेशन में बैठ के काम करता हूं तो भूतेश आनंद जी यहां पे और इस तरह से जो रहे मैं क्यों नहीं कर पा रहा हूं इतना जप इतना वो ठाकुर पे श्रद्धा क्यों नहीं हो रहा है और होगा भी नहीं शायद इस जन्म में उनके जितना तो यह गिल्ट फीलिंग भी नहीं आ जाना चाहिए अभी जिसका जो कर्म का प्रवाह है ठाकुर ठाकुर ने हो सकता है मुझे चुना है पब्लिकेशन में काम करने के लिए उनको चुना है जप करने के लिए। सो वी हैव टू मैनेज आवर एक्सपेक्टेशन। म स्लेक नहीं हो जाने देना है और सामने वो गिल्ट फीलिंग भी नहीं आ जाने देनी है। फाइन मेंटेन करना है। मां को एक बार साधु ने एक गृहस्थ ने आकर के कहा लड़का है वो कहता है कि साधु तो नहीं बनेगा किंतु वो शादी नहीं करना चाहता। बोलता है मैं वैसे ही कंवारा रहूंगा और सब अनमैरिड रहूंगा और सेवा वगैरह करूंगा। किंतु मेरे मन में ये डर है कि एक कामना वासना कब आ जाएगी? मेरा कब पैर फिसल जाएगा? समाज में बदनामी होगी। तो शादी नहीं करके रहना क्या डेंजरस नहीं है। साधु हो गए तो क्या है? मठ का प्रोटेक्शन है। आप अनमैरिड है। समाज में रह रहे हैं। दैट मींस यू आर लिविंग विदाउट एनी प्रोटेक्शन। तो मेरे मन में यह दुविधा है। तो मां ने कहा डरो मत बेटा। तुम चिंता मत करो। कली में मन का पाप पाप नहीं है। तो वो लड़का तो बड़ा खुश हो के चला गया। चलो मन में पाप हुआ तो कुछ नहीं है। कली में मन का पाप पाप नहीं है। किंतु मैंने जब पढ़ा मैंने सोचा यह बड़ा डेंजरस टीचिंग है। क्यों? क्योंकि ये जो अपना पाजी मन जो होता है ना हमेशा एक्सक्यूज खोजता है गड़बड़ करने का। अभी ये मां का स्टेटमेंट हमको मिल गया कि मन का पाप पाप नहीं है। तो मन में पाप करते रहो। प्रॉब्लम यह होता है कि जो मन में है वह वाणी में रिफ्लेक्ट होगा। जो वाणी में है वो वर्तन में रिफ्लेक्ट होगा। आप कहीं पर एक को स्टॉप नहीं कर सकते हैं। तो या तो हमको लाइसेंस मिल गया है क्या गड़बड़ करने का? तो राइट। सो क्या है कि मां ने एक और सहारा मको यह भी दिया है कि गिल्ट फीलिंग ना आ जाए कि मन में पाप चलता रहता है तो मैं क्या साधक होने के लायक हूं कि नहीं। तो एक और हमको भरोसा भी दिया है कि मन का पाप पाप नहीं है कली में। दूसरी ओर इस भरोसे को लाइसेंस में नहीं परिणत कर देना है कि जो करें वो करो फिर। सो दैट फाइन बैलेंस वी हैव टू मेंटेन।

प्रश्न: हम सभी को अकेलेपन का डर रहता है। बुढ़ापे में हमारी देखभाल कौन करेगा? अकेलेपन के इस डर से कैसे मुक्त हुआ जाए?

वो बेलूर मठ जब बना तो पता है कि वो क्रांतिकारियों का बड़ा उस समय चल रहा था। तो वो सीआईडी पुलिस उस समय की सब समय क्रांतिकारियों को खोजती रहती है। तो उस समय वह सीआईडी का जो चीफ इंस्पेक्टर होगा वो बड़ा बेलूर मठ के ऊपर में नाराज होकर के घूमता था। सोचता था बेलूर मठ में यह सब क्रांतिकारियों को अभी पनाह मिल रही है और यह जो उस समय शुरू-शुर में जो बेलूर मठ के विरोध में कुछ लोगों ने बोलना शुरू किया यह वायसरॉय वगैरह तो ये जोसेफाइन मैक्लाउड फिर यह जो अमेरिकन एंबेसडर था इंडिया में मिस्टर पेटरसन उसकी वाइफ ये लोग जाकर के वो वाइस को मिले कहा कि देखिए आप ये सब मिशन के बारे में ऐसा मत बोलिए यह लोग किसी इललीगल एक्टिविटी में शामिल नहीं है। तो ये जो सीआईडी ब्रांच वाले उनको भी बड़ा गुस्सा आ जाता था कि इन लोगों के पास में ये वीआईपी पेट्रोन है तो अपने को बचा करके घूमते हैं किंतु सही सही में ये सब क्रांतिकारियों को पनाह देते हैं। तो सोचा एक बार एक दिन रात को बेलून मठ पे रेड करेंगे। बेलून मठ पे छापा मारेंगे। सब साधुओं को पकड़ करके ले जाएंगे जेल में और पिटाई करेंगे। पता चल जाएगा कि कैसे वह ब्रिटिश गवर्नमेंट के विरोध में काम करते हैं। तो अभी हुआ ऐसा यह प्लान बन रहा था सीआईडी में तो कुछ डिवोटी अपने वहां पे थे तो वो सीधे आकर के राजा महाराज को बोल दिए राजा महाराज उस समय प्रेसिडेंट है। तो बोला कि महाराज देखिए आज रात को सीआईडी वाले यहां पर रेड करने वाले हैं। साधुओं की हो सकता है पिटाई भी करें। पता नहीं ठाकुर घर की पवित्रता भी भंग करें। तो अभी क्या करें बताइए? तो उस दिन रात को ऐसा टेंशन फैल गया पूरे बेलून मठ में। सभी साधु लोग आकर और ये ब्रिटिश गवर्नमेंट है। आप क्या कर लेंगे उनके सामने? सीआईडी का पावर जबरदस्त पावर था और यह सब क्या है ना कि ये ब्रिटिश लोग आपस में मिले हुए थे। वाइससराॉय एक स्टेटमेंट देगा सीआईडी जाकर दूसरा कुछ करेगा। तो सब तो मिलीभगत थी भीतर में वो जज लोग भी उन्हीं के साथ में चलेंगे। तो पूरा सोसाइटी माने जो पावर सॉलिड पावर इन लोगों के पास में था। अपने पास में कुछ नहीं है। तो सभी लोग राजा महाराज के घर के सामने इकट्ठा हो गए। तो राजा महाराज वहां पर बैठे हैं। तो पहले तो थोड़े ध्यान में चले गए और फिर पता न्यूज़ आया उस समय यह जो डिवोटी जो वहां पर काम कर रहे थे उनके पास में न्यूज़ आया कि वहां से वो पार्टी है पूरी निकल गई है छापा मारने की और गंगा में नौका में बैठकर के गंगा में से आ रहे हैं। अभी बेलुरुल मठ के पास में आधा रास्ते पहुंच गए हैं। तो यह राजा महाराज को बताया कि आधे रास्ते तक पहुंच गए हैं। अभी क्या कर रहे हैं? तो राजा महाराज कुछ नहीं बोलते। चुपचाप बैठे। फिर उन्होंने क्या किया? एकाएक कि गंगा की ओर देखकर के हवा में ऐसा कुछ निशान किया कुछ साइन वगैरह कुछ किया ऐसा कुछ किया फिर से आराम से बैठ गए अभी सभी भक्त भी बैठे हैं साधु भी बैठे हैं सब लोग देख रहे हैं कि अभी राह देख रहे हैं कि वो लोग आएंगे रेड करेंगे पता नहीं क्या से क्या होगा मर्डर भी कर दे तो कुछ ठिकाना नहीं है अभी तो सब लोग चुपचाप बैठे हैं पूरी रात बीत गई कोई नहीं आया फिर यह जो डिवोटी था जिसने यह न्यूज़ लाया था भीतर का अपना आदमी वो गया ऑफिस में और खबर निकाला कि क्यों क्या हुआ? आधे रास्ते तक तो पहुंच गए। ऐसा न्यूज़ तो आया था। उसके बाद क्या हुआ? तो फिर न्यूज़ ऐसा मिला कि वह जो चीफ इंस्पेक्टर था आधे रास्ते पे आकर के एकाएक रुक गया। पता नहीं उसके मन में क्या आया। वहां से नौका रिवर्स करके वापस चला गया। तो अभी देखिए कि सही-सही में ठाकुर पे विश्वास है। ठाकुर का नाम लेकर के बेलूर मठ की स्थापना की है। पूरे ब्रिटिश गवर्नमेंट की आंखों में हमने उंगली डाली है। तो उस समय हम बच गए थे। तो कैसे बच गए? ठाकुर की राजा महाराज की शक्ति से ही तो बचे हैं। तो उस भयानक शक्ति से यदि हम बचे हो तो यह सब आजकल तो छोटी-मोटी शक्तियां है। क्या है? डेमोक्रेसी है। अपना खुद का राज्य है। ज्यादा से ज्यादा क्या बिगाड़ लेंगे? रामकृष्ण संघ की शक्ति आज देखिए कि प्राइम मिनिस्टर, प्रेसिडेंट सब लोग हमको स्वीकार करते हैं। सो आज तो हमारे सामने ऐसा कोई चैलेंज है ही नहीं। थोड़ी सी भी ठाकुर पर श्रद्धा होगी। हमको कोई हमारा बाल भी बांका नहीं करने वाला है।