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Sri Ramakrishna Kathamrita ·

श्रीरामकृष्ण कथामृत || 14 Dec 1883 - श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ दक्षिणेश्वर में || 18 Jun 2025

प्रार्थना

ओम स्थापकाय धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः श्री रामकृष्ण कथामृत श्रीम द्वारा लिपिबद्ध मास्टर महाशय ठाकुर के साथ में रहने के लिए आए हैं रिट्रीट के लिए आए हैं 14th दिसंबर 1883 और चैप्टर का नाम है दक्षिणेश्वर में श्री रामकृष्ण भक्त संग एवं ठनने सिद्धेश्वरी मंदिरे गमन और पंचम परिच्छेद मणि रामलाल और श्याम डॉक्टर कांसारी पाड़ा का जो भक्त है कुछ वे लोग आए हैं और ठाकुर के साथ में वार्तालाप कर रहे हैं। हमने ऑलरेडी थोड़ा

आध्यात्मिक साधक को संसार के कर्म कब तक करने पड़ते है?

सा वार्तालाप देखा है। ठाकुर कहते हैं कि कर्म जो पूरा जीवन करता करना पड़ता है। ऐसा नहीं है। जैसे ही ज्ञान प्राप्ति होगी, जैसे ही ईश्वर प्राप्ति होगी, साथ-साथ में ही कर्म चले जाएंगे। फल होने से फूल अपने से झर जाता है। तो यहां पर हमने इसका देखा देखिए कि कर्म तो जीवन भर है। कर्म है बोलकर के जीवन धारण है। जीवन धारण है तो कर्म है। यह जो ठाकुर निर्विकल्प समाधि से वापस भी आए हैं। ईश्वर दर्शन उनको नियमित रूप से प्रतिदिन हो रहा है। इसके बावजूद देखिए कि ठाकुर भक्तों के साथ में वार्तालाप करते हैं। भक्तों को शिक्षा देते हैं। उनका भूत, वर्तमान, भविष्य सभी कालों की सभी उनकी चिंता करते हैं। और उनके संस्कार किस तरह से क्षय हो, ईश्वर प्राप्ति कैसे हो उसके लिए प्रार्थना करते हैं मां को। तो फिर देखिए कि ठाकुर भी तो कर्म कर रहे हैं। तो अब जैसे कि कहा गया है स्वप्न, जागृत, सुशुप्त और तुरी। यह चार अवस्थाएं हैं हमारी। तो जागृत अवस्था में और स्वप्न अवस्था में कर्म है ही है। कर्म है बोलकर के ही जागृत और स्वप्न अवस्था है। कर्म कहां पर नहीं है तो तुरीय अवस्था और सुशुप्ति अवस्था इस दोनों में ही कर्म नहीं है। यदि हम सो भी रहे हैं तो हम कर्म कर रहे हैं। यदि हम जागते भी हैं, जो कुछ भी करते हैं, सब कुछ कर्म है। तो यहां पर ठाकुर के कहने का क्या अर्थ है कि ईश्वर प्राप्ति होने से कर्म चले जाएंगे तो ऑब्लिगेशंस चले जाएंगे। हम जीवन धारण किए हैं। पूरे संसार का समग्र जगत का हमारे पर ऑब्लिगेशन है। उन्होंने हमारा लालनपालन किया है। हमको जीवन धारण करने में वो लोग पूरा हमारी सहाय कर रहे हैं। तो हम उनसे सहाय लेते हैं और दूसरे हाथ से हम उनको सहाय करते हैं। यह जो कॉस्मिक यज्ञ है वैश्विक यज्ञ यह वैश्विक यज्ञ हम सबको निभाना है। हमको जितना लेते हैं हम लोग उतना ही हमको वापस देना है। किंतु यह जो ऑब्लिगेशन की यह जो मायाजाल है यह जो धर्म की या तो फिर यह हमारी ड्यूटीज की यह जो चक्र है वह जैसे ही ईश्वर प्राप्ति होती है यह चक्र टूट जाएगा इस धर्म रूपी ऑब्लिगेशन रूपी मायाजाल से हम मुक्त हो जाएंगे। फिर है हमारे लिए सिर्फ मोक्ष और मोक्ष मार्ग। तो इसलिए यहां पर ठाकुर ऐसा कहते हैं। उसके बाद में कोई प्रश्न करता है कि क्या पैसों के लिए हमको प्रयास करना चाहिए? और देखा कि केशव सेन भी पैसों के लिए प्रयास करते थे। तो ठाकुर ने कहा कि केशव की बात अलग है। जो ईश्वर के ठीक-ठीक भक्त हैं उनका जिम्मा ईश्वर ही लेते हैं। जैसे कि ठाकुर ठाकुर जब इस तरह से ईश्वर प्राप्ति के झंझवात में फंसे उस समय उनके घर की चिंता, उनकी पत्नी की चिंता, उनकी मां की चिंता कुछ उनके मन में नहीं रहा था। हम जब मां शारदा देवी का जीवन चरित्र अध्ययन कर रहे थे तो हमने यह प्रश्न किया भी था कि मां बेचारी वहां पर जयराम बाटी में इतने कष्ट में रह रही है और ठाकुर के विरह में उनकी यह दुरा अवस्था है तो फिर ठाकुर क्यों उनको याद नहीं करते हैं? ठाकुर क्यों उनको स्वयं दक्षिणेश्वर नहीं पुकारते हैं? तो हमने देखा कि ठाकुर इस तरह से साधन यज्ञ में या तो फिर साधना के मार्ग में और फिर ईश्वर सानिध्य के आनंद में इस तरह से डूबे हुए थे कि संसार का कोई ऑब्लिगेशन है। संसार की उन संसार में उनका कोई जिम्मा है। यह बात ही जैसे कि उनके मन से चली गई थी। मां शारदा देवी को स्वयं जय राम भाटी से दक्षिणेश्वर आना पड़ा। अपने से इनिशिएटिव लेकर के ठाकुर ने बुलाया इसलिए नहीं किंतु देखिए कि रास्ते में वह कौन सी घटना हुई मां जब बीमार थी उस समय जब रास्ते में वह ऑलमोस्ट बेहोश होकर के पड़ी हुई थी कष्ट के मारे बुखार के मारे उस समय मां काली ने आकर के मां को कहा था शारदा मां शारदा देवी को कि मैंने तुम वहां पर जाना मैंने तुम्हारे लिए ही उनको वहां पर रखा है उनको अर्थात के श्री रामकृष्ण को मां शारदा देवी दक्षिणेश्वर आएगी। मां शारदा देवी की ठाकुर पूजा करेंगे और उनकी शक्ति से आध्या शक्ति की शक्ति से बलियान होकर के उनकी शक्ति से शक्तिमान होकर के कोलकाता में धर्मचक्र प्रवर्तन करेंगे। तो यह सब कुछ तो मां शारदा के माध्यम से मां काली को करवाना था। तो देखिए कि मां काली जैसे अपने से ही यह सब मायाजाल रच रही है। अपने से ही जैसे कि यह प्लानिंग कर रही है। निवेदिता ने एक बार स्वामी जी को कहा था कि रामकृष्ण मिशन की पॉलिसी ऐसी कुछ होनी चाहिए। ऐसा बोलकर के कुछ बोल रही थी। स्वामी जी ने इमीडिएटली कहा नो पॉलिसी। यहां पर कोई भी पॉलिसी नहीं है। ईश्वर के ऊपर में निर्भर होकर के हमको यह सब करना है। अच्छा पॉलिसी नहीं है। इसका अर्थ यह नहीं है कि स्वामी जी का प्लान ऑफ कैंपेन नहीं है। लिटरली उनका एक लेक्चर ही है माय प्लान ऑफ कैंपेन जिसका कि हम अभ्यास कर रहे हैं। तो दैट इज वन थिंग कि हमारे सामने एक गोल होना चाहिए। एक हमारे सामने उद्देश्य होना चाहिए। कि आत्मनो मोक्षार्थम जगत हिताय च शिव ज्ञाने जीव सेवा गरीब लोगों के भीतर में ये चंडाल नारायण दरिद्र नारायण गरीब नारायण रोगी नारायण ये जितने भी है उनकी हमको सेवा करनी है वो हमारा उद्देश्य है किंतु इसके लिए हम यह पॉलिसी अपनाएंगे पॉलिसी यानी कि एक स्ट्रेटजी अपनाएंगे एक डे टू डे प्लानिंग करेंगे कि हां हमको इतने लड़के चाहिए साधु होने के लिए इतने साधु साधु होंगे तो हमारे इतने सेंटर चलेंगे। इतने सेंटरों में हमको इतने डिवोटी चाहिए, इतने वंटियर चाहिए, इतना पैसा चाहिए तो हम इतनी एक्टिविटी करेंगे। ऐसा वह जो डे टू डे वाला जो होता है स्ट्रेटजाइजिंग या तो फिर प्लानिंग वो सब कुछ करने की यहां पर कोई आवश्यकता नहीं है। क्योंकि जैसे हमने देखा कि मां शारदा देवी को मां काली ने स्वयं दक्षिणेश्वर बुलाया था। ठाकुर अपने से तो ऐसे बेहोश होकर के रहते थे। इस तरह से मां काली के मां जगदंबा में वह अपने को तल्लीन करके रखते थे कि मां शारदा देवी आए उनके साथ में रहे। फिर ठाकुर का जो कर्तव्य है पति के रूप में कि मां शारदा देवी को वो एजुकेट करें धार्मिक मामलों में। फिर यह सामाजिक ये जो रीति है, प्रथाएं हैं उसमें वो उनको तो कोई अपने मन में था ही नहीं। अब जैसे मां सामने आ गई है तो ठाकुर उनको सिखाएंगे। ऐसे जो सामने आया है उसको फिर कर्तव्य को हमको निभाना है किंतु कर्तव्य को खोजने के लिए नहीं जाना है। वह कार्य है मां काली का मां जगदंबा का आध्या शक्ति का। तो यह जो ठाकुर के मन में था यह जो स्वामी जी के मन में था कि किस तरह से आध्यात्मिक जीवन और किस तरह से जो संघ जीवन है यह दोनों परिचालित होंगे तो वह मां जगदंबा के ऊपर में भरोसा करके उनके ऊपर में निर्भर होकर के उनके शरणागत होकर के रहना है। तो यहां पर भी देखिए कि जब यह कर्म की बात करते हैं तो कर्म कब तक जब कि जब तक कि अपना यह कर्तृत्व भाव है कि हां मेरे में अहंकार है और मुझे यह प्राप्त करना है तो जब तक मेरे में अहंकार है जब तक कामना वासनाएं हैं तब तक यह ऑब्लिगेशंस है। कर्म है। जैसे ही यह कामना वासना और अहंकार चले गए। कर्तृत्व भाव चला गया। साथ में ही कर्म हमारे मिट गए। इस अर्थ में कि ऑब्लिगेशंस जितने भी थे वह सब जैसे कि मां आध्या शक्ति में विलीन हो गए। तो इसलिए ठाकुर कहते हैं कि जो राजा का बेटा है जो सही-सही साधक है, उसकी चिंता तो मां जगदंबा स्वयं करेगी। उसको साधक को अपने से यह सब चिंता करने की कोई आवश्यकता नहीं है। जो लोग दासत्व करके रुपया इकट्ठा करते हैं जिनके अब जैसे कि हमने जो गीता का श्लोक जिसका स्टडी हमने किया था उसमें हमने देखा कि ये क्रूरता और दासत्व यह दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू है। जैसे कि यहां पर भगवान कृष्ण अर्जुन को कहते हैं कि यह विषम परिस्थिति में तुम्हारे मन में यह कायरता कैसे प्रकट हुई? तो उसी बात को स्वामी जी दोहराते हैं अपने पत्र में क्या कहते हैं स्वामी जी कि जो दास होते हैं वह जो क्रूर होते हैं वह दासत्व करने के ही योग्य होते हैं। अर्थात कि जगत के प्रति जिसकी सहानुभूति नहीं वे लोग हमेशा लोगों के दास बनकर के ही रहेंगे। जो जो शक्तिशाली एक दुश्मन आएगा वह उसको दास बनाकर ही रहेगा। तो यह दासत्व और क्रूरता यह दोनों साथ-साथ में चलती है और उदार हृदयता और यह फिर साथ में ही आत्मश्रद्धा यह दोनों साथ-साथ में चलता है। तो यहां पर इसलिए ठाकुर कहते हैं कि यह जो दासत्व करके जो पैसा इकट्ठा करता है जो झूठ बोल के यहां पर ठाकुर वकील का नाम लेते हैं। तो वकील जो व्यवसाय है उसके बारे में एग्जजेक्टली नहीं किंतु जो ठाकुर कहना चाहते हैं जो झूठ बोलकर के जो पैसा अर्जन करते हैं उन लोगों की बात मैं नहीं कर रहा हूं। उनके भीतर में कामना वासनाएं हैं अहंकार है। उनको कष्ट करके मेहनत करके झूठ बोल के ऐसे कैसे भी परिश्रम करके पैसा इकट्ठा करना होगा। किंतु जो राजा का संतान है जो कि संपूर्ण रूप से मां काली के ऊपर में या तो अपने इष्ट के ऊपर में निर्भर है उसको दासत्व करने की पैसों की चिंता करने की भविष्य की चिंता करने की कोई आवश्यकता नहीं।

आध्यात्मिक साधक संसार में किस तरह से रहे?

इसके बाद में फिर एक भक्त प्रश्न करता है कि संसार में किस तरह से रहना होता है? तो ठाकुर ने कहा कि इस तरह की मछली की तरह जो कि कीचड़ में रहती है किंतु उसके देह के ऊपर में कीचड़ लगता नहीं है। तीव्र वैराग्य जब होगा तब ईश्वर प्राप्त हो जाएंगे। किंतु जब यहां पर ठाकुर तीव्र वैराग्य की बात करते हैं तब वह एक स्टेटमेंट ऐसा देते हैं कि हमारे मन में संदेह हो सकता है। ठाकुर क्या कहते हैं? स्त्री और पुत्रों को अंध कुएं की तरह देखो। उनको जैसे कि उनका त्याग करना है। उनका परिहार करना है। इस तरह से देखना है उनको। तो यह बात सुनकर के हमारे मन में शायद जो खास करके पुरुष भक्त वहां पर बैठे थे उनके मन में स्त्रियों के प्रति शायद वैमनस्य की घृणा का भाव उत्पन्न हो। द्वेष का भाव उत्पन्न हो तो यह ना हो। इसलिए साथ-साथ में ही ठाकुर यह लॉजिकल जो नेक्स्ट स्टेप होता है वह ले कहते हैं क्या जितनी भी स्त्री लोग हैं सब शक्ति रूपा है वही आध्या शक्ति ही स्त्री होकर के स्त्री का रूप धारण करके रहती है अध्यात्म रामायण में है नारद मुनि क्या स्तव करते हैं हे राम जितने भी पुरुष है सब तुम हो और हे मां सीता जितनी भी स्त्रियां हैं वह सब तुम ही हो यही स्त्री शिव के साथ में शिवानी होकर के इंद्र के साथ में इंद्राणी होकर के रहती है। यानी कि यहां पे स्त्रियों का त्याग करना है इस अर्थ में कि उनके प्रति काम भाव है। उसका त्याग करना है। उनके ऊपर में जननी का भाव हमारा होना चाहिए। वो जैसे कि यहां पर जगत जननी मां काली या तो फिर मां दुर्गा जैसे कि मंदिर में बैठी है और हमारी आराधना स्वीकार कर रही है वैसे ही स्त्रियों के प्रति जगत जननी का भाव हमको रखना है। तो यह ठाकुर एक एक्स्ट्रा क्लेरिफिकेशन देते हैं। इसके बाद में क्या कहते हैं? मोने

त्याग कैसे करे? प्रारब्ध और संस्कार

कोरले त्याग कोरा जाए ना किंतु यह त्याग की जो बात की कि मन तीव्र वैराग्य होने से सब कुछ अपना ये जो माया है उसके राज्य से मुक्त हो जाएंगे ईश्वर दर्शन प्राप्त हो जाएंगे किंतु यह एक बात याद रखनी है कि तीव्र वैराग्य होना यह कोई मामूली बात नहीं है। वैसे बोलने बोलने से ही त्याग होगा नहीं। कैसे होगा? प्रारब्ध संस्कार ए सब आभार आे यह प्रारब्ध है संस्कार है यह सब है एक जन राजा के एक जन जोगी बोलले तुम काछे बोसे थे के भगवान चिंता करो एक राजा को एक योगी ने कहा तुम मेरे साथ में बैठकर के भगवान की चिंता करना भगवान का नाम स्मरण करना राजा बोलले से बोबे ना आ थकते पारी किंतु आार एकनो भोग आज राजा कहते हैं वह होने वाला नहीं है। मैं आश्रम में आकर के रह सकता हूं किंतु मेरे अभी भी भोग है। जब तक मन के भीतर में भोग है तब तक आप आश्रम में भी जाकर के रहे हजार रिट्रीट भी कर ले वह भोग मन से जाने वाले नहीं है। किंतु फिर यह क्या है? पता है ऐसा नहीं हो जाना चाहिए इस स्टेटमेंट का। यह फिर यह मिस इंटरप्रिटेशन नहीं करना चाहिए कि अच्छा ठीक है जब तक भोग मन में है तब तक यह धार्मिक कार्य विधि विधान करने से कोई लाभ नहीं तो छोड़ो एक बार भोगों को भोग लो तो फिर क्या कर कहते हैं न जात काम उपभोगेन शम्यति यह काम है काम के उपभोग से काम का शमन कभी नहीं होने वाला है त्याग के रास्ते से ही काम का दमन होगा यदि आप अग्नि में घी डालते हैं तो अग्नि बुझेगा नहीं। वह और भुक उठेगा और भी बड़े तीव्रता से वह जलने लगेगा। तो यहां पे इस तरह का मिसअंडरस्टैंडिंग नहीं होना चाहिए। भले ही मन के भीतर में काम है। जैसे देखिए हम लोगों का जैसे हमने एक बार बात किया था दो तरह के सन्यास होते हैं। एक तो है विध्वत सन्यास दूसरा है कि विविधदिशा सन्यास। तो विध्वत सन्यास अर्थात कि मन हमारा संपूर्ण पवित्र हो गया है और संपूर्ण पवित्र मन में ईश्वर दर्शन होना ही है या तो फिर ईश्वर दर्शन हो चुका है। जैसे यह सूर्योदय होता है तो आकाश में कैसी लालिमा छा जाती है तो उस तरह की परिस्थिति में यह विध्वत सन्यास ग्रहण किया जाता है। किंतु विविध दिशा सन्यास क्या है? मध्य रात्रि है। घोर रात्रि चारों ओर अंधकार है। कामना वासनाओं का हमारे मन पर पूरा जोर चल रहा है। हमारे मन को जैसे कि गुलाम बना के रखा है। उस समय यह विविध दिशा सन्यास लेते हैं। उसका अर्थ यह है कि हम साधन भजन करके ईश्वर पर निर्भर होकर के रहना चाहते हैं। और ईश्वर की करुणा से और साधन भजन के बलबूते पे एक ना एक दिन यह अरुणोदय हमारे मन में होगा ही होगा। इस तरह की आशा आकांक्षा रखकर के जो सन्यास लिया जाता है उसको विविध दिशा सन्यास कहते हैं। और इंटरेस्टिंगली हमको पता है कि स्वामी विवेकानंद ने वराह नगर मठ में जब विजा होम करके सभी गुरु भाइयों को सन्यास दिया था। सभी गुरु भाइयों को नाम दिया था तो उन्होंने अपने लिए नाम चुना था स्वामी विवेदिशानंद तो हमको आश्चर्य होगा यह सुनकर के कि यदि कोई भी विध्वत सन्यास का अधिकारी है इस जगत में वह तो स्वामी विवेकानंद स्वयं थे वो ठाकुर ने स्वयं उनको निर्विकल्प समाधि प्राप्त करवाने में सहाय की थी उनकी यह जो ईश्वर प्राप्ति की यह जो जो प्रचंड मुमुक्षुत्व था उनका उसको देखकर के ठाकुर स्वयं लोगों को कहते थे कि देखो नरेंद्र की कितनी सुंदर अवस्था हुई है। लीला प्रसंग का पाठ करने से पता चलेगा कि एक प्रसंग है कि शारदानंद जी महाराज शरद महाराज ठाकुर के पास में जाकर के कहते हैं कि देखिए नरेंद्र की यह जो अवस्था है उसको देखकर के हम सभी लोगों के हृदय में उत्साह और आशा की किरण प्रकट होती है। तो यह गुरु भाई भी स्वामी जी से प्रभावित थे। ठाकुर स्वयं उनकी प्रशंसा करते थे। निर्विकल्प समाधि स्वयं जिनको की प्राप्त हो गई है। वह जब सन्यास लेंगे और अपना नाम विविध रखेंगे तो हमको आश्चर्य होगा। यह माने हमारे हमको यह सोचना पड़ेगा। यह विचार करना पड़ेगा कि आज मैं जहां पर बैठा हूं। उससे तो कितने आगे थे। फिर भी अपने को विविधानंद कह रहा कह रहे हैं तो मुझे और कितना लंबा जर्नी काटना है तो यह तो आध्यात्मिक जगत में यह है ही है और भी लंबा सफर है और भी लंबा सफर है ठाकुर कहते हैं ना मास्टर महाशय को वो ईश्वर साकार भी है निराकार भी है और भी कितने सब कुछ है अपने मन से अपनी वाणी से उनको मापने को जाएंगे उनका मेजरमेंट करने को जाएंगे तो यह हमारा यह जो स्केल है छोटा पड़ जाएगा। वो कहां होए बामन धरबे शशि वामन होकर के चंद्र को धरने का चंद्र को पकड़ने का प्रयास इस तरह का यह प्रयास है। किंतु क्या है कि हमको चिंता इतनी मतलब टेंशन में नहीं आ जाना है। जैसे वह दो साधकों की कहानी है। एक पेड़ के नीचे में बैठकर के साधना करते हैं। नारद मुनि जा रहे हैं। तो वह कहते हैं कि अच्छा वैुंठ लोक में जा रहे हैं। नारायण से वार्तालाप करेंगे। पूछ लीजिएगा कि हमको और कितनी देरी है। तो ठीक है। वह नारद मुनि जाकर के वापस आए। आकर के कहा इस पेड़ के ऊपर में जितनी डालें हैं, जितनी डालों के ऊपर में जितने पत्ते हैं, इतने जन्म अभी आपको लगने वाले हैं मोक्ष प्राप्त करने में। तो एक साधु बेचारा था बड़ा हताश हो गया। दूसरा था कि उठकर के नाचने लगा कि इस आशा में कि हां चलो माने एक तो समय आएगा कि जब हमको मुक्ति मिलेगी। यानी कि देखिए कि आइदर ग्लास इज हाफ फुल और द ग्लास इज हाफ एंप्टी। कोई भी एक आधा पानी का गिलास भरेंगे तो आप एक ऑप्टिमिस्टिक ऑप्टिमल ऑप्टिमिस्टिक की दृष्टि से कह सकते हैं कि ग्लास आधा भरा हुआ है और जो पैसिव पर्सन जो होता है नेगेटिव जिसका होता है माइंडसेट वो कहेगा कि ग्लास आधा खाली है। तो ऐसे यहां पे हमको एक ऑप्टिमिस्ट का एक पॉजिटिविस्ट का एटीट्यूड धारण करना है। कहना है कि नहीं आज ना आज नहीं आज तो फिर कल कल नहीं ना परसों परसों नहीं ना नरसों ईश्वर दर्शन हमको होने ही वाला है। जैसे मां बार-बार कहती थी कि यदि ठाकुर का मंत्र लिया है तो देह धारण करते-करते ही एक बार तो ठाकुर को दर्शन देना ही होगा और यदि देह धारण करते ना हो तो एटलीस्ट मृत्यु के समय तो ठाकुर को आकर के हमारा हाथ पकड़ करके श्री रामकृष्ण लोक में हमको ले जाना है। एक बार ट्रेनिंग सेंटर में भजनानंद जी हमारा क्लास ले रहे थे तो वैसे पता नहीं अभी मुझे याद नहीं आ रहा है कि कौन से टॉपिक पे उन्होंने बात करना एकाएक शुरू किया उनके क्लास सब होते थे इसी तरह कि वो वेदांत फिलॉसोफी के और ऐसे ही सब हाईली इंटेलेक्चुअल एकाएक उन्होंने ठाकुर के बारे में बोलना शुरू किया और भजनानंद जी को देखकर के लगता नहीं है मतलब ऐसा लगता है कि वह इतने बड़े ज्ञानी है किंतु थोड़ा सा उनके साथ में वार्तालाप करेंगे तो पता चलेगा कि उनको भजनानंद नाम क्यों दिया गया है? बड़े ही भीतर से भक्त है। बड़े भक्त हैं। तो बात बातबात में वो ठाकुर की बात निकली। इतना सुंदर बात कर रहे हैं। फिर आखिर में क्या कहते हैं कि देखो हमको यदि मुक्ति ना मिले तो चिंता नहीं है। यदि सिर्फ रामकृष्ण लोक मिल जाए तो भी हम संतुष्ट हो जाएंगे। तो जैसे यहां पर मां कहती है कि यदि देह धारण करके नहीं तो एटलीस्ट जीवन के अंत में मृत्यु के समय तो ठाकुर को आकर के हमारा हाथ पकड़ करके हमको वैुंठ रामकृष्ण लोक में ले ही जाना है। तो इसलिए यहां पे कहते हैं किंतु जो ठाकुर जो कहना चाहते थे कि मन से ही त्याग मन म सोचने से ही सिर्फ त्याग होने वाला नहीं है। मोने कोरले ही त्याग कोरा जाए ना सिर्फ सोचता हूं कि मैं त्याग कर रहा हूं, त्याग कर रहा हूं तो ऐसा होने वाला नहीं है। प्रारब्ध है, संस्कार है, यह सब कुछ है। पिछले जन्म के जो कर्म है, पिछले जन्म के जो कर्म के जो फल है, जो अभी फलीभूत हो रहे हैं, वह सब है। एक राजा जैसे योगी की कहानी कि योगी ने राजा को कहा कि तुम आओ मेरे साथ में आश्रम में रहो। राजा कहता है जब तक भोग है तब तक मैं आश्रम में आकर के नहीं रहूंगा। नटवर पंजा जो खो छले मानुष ए बागाने गोरू चरा तो नटवर पंजा बोलकर के एक था। वह जब लड़का था छोटा था उम्र में इसी बागान में इसी बगीचे में वह गाय को चराने के लिए लेके आता था तार किंतु अनेक भोग छिलो उसके किंतु बहुत सारे भोग थे ताई एक खून रेडर कोल कोरे अनेक टाका कोरे छे इसलिए अभी वह जो तेल का जो मिल होता है जहां पर चक्की में तेल पिसा जाता है वह करके बहुत सारे उसने पैसे बनाए हैं आलम बाजारे रेडर कोलेर बेबोशा खूब फेंदे दे छे आलम बाजार में यह तेल के यह जो मिल है उसका जो व्यवसाय है बड़ा उसने बढ़ाया है एक मते आ में मानुष

वामाचार - स्त्रियों के साथ साधना - निषिद्ध है

निय साधन करा एक मत में है स्त्रियों को लेकर के साधन करना साधना करनी है कर्ता भजा मागी देर भीतर आमाय एक बार निय गिछ लो कर्ता भजा लोगों की जो स्त्रियों की यह जो मीटिंग होती थी साधन सर्कल जो होता था वहां पर मुझे एक बार लेकर के गए थे सब आर काछे ऐसे बस लो सभी लोग जितनी भी स्त्रियां है मेरे पास में आकर के बैठी आमी तादेर मां मां बोलाते परस्पर बोला बोली करते लाो इन्ही प्रवर्तक एकनो घाट चिने नहीं मैं जैसे ही उनको मां मां करके पुकारने लगा वे लोग आपस में वार्तालाप करने लगी कहती है यह तो अभी नौ सिखिया है यह तो अभी प्रारंभ ही कर रहा है साधना का इसको घाट क्या है वह पता नहीं अभी कि ये घाट का अर्थ क्या है? वो उनकी लैंग्वेज में जो भी होगा यहां पर ठाकुर कहते हैं कि एकनो घाट चिन अर्थात कि अभी भी आकार क्या है? उसको समझ में नहीं आता। ओदेर मते कांचा अवस्था के बोले प्रवर्तक तार पर साधक तार पर सिद्ध तार पर सिद्धेर सिद्ध यहां पर ठाकुर डायरेक्ट सिद्ध सिद्ध पे आ जाते हैं उनके मत के अनुसार उनके संप्रदाय के अनुसार जो शुरू की अवस्था है नौ सीखिए की अवस्थाएं लर्निंग लाइसेंस में अब चलते हैं तो उसको कहते हैं प्रवर्तक जो फिर धीरे-धीरे करके साधन भजन उसका पक्का होने लगता है उसको कहते कहते हैं साधक और फिर कहते हैं उसके बाद में आता है सिद्धेर सिद्ध सिद्धों का सिद्ध किंतु यहां पर ठाकुर एक स्टेप शायद मिस कर गए हैं। दूसरी एक जगह पर मैंने पढ़ा ठाकुर कहते हैं उसके बाद में आएगा सिद्ध और फिर आएगा सिद्धों का सिद्ध। तो इस तरह से कर्ता भजा के बारे में हमको जैसे कथामृत पढ़ेंगे तो काफी कुछ जानने को मिलेगा। कर्ता अर्थात कि उनके जो गुरु होते हैं वह और भजा अर्थात कि गुरु का जो गुरु की जो उपासना करते हैं गुरु की जो भजना करते हैं उसको कहते हैं कर्ता भजा संप्रदाय। अभी आप स्वाभाविक है कि यहां पर ठाकुर जैसे ठाकुर अवतार वरिष्ठ स्वयं जो कि मना करते हैं कहते हैं कि गुरु कर्ता और बाबा ये तीन जो मुझे कहता है उससे मेरे देह में जैसे कि कोई कांटे चुभो रहा है इस तरह से लगता है तो ठाकुर अच्छा ठाकुर की दो अवस्था होती थी वो फिर अर्धबाह्य दशा में जाकर के फिर अपने को चैतन्य देव के साथ में भी कंपेयर कर लेते थे कभी-कभी वो जो इसी पैरे इसी ये जो चैप्टर का आगे अगले वाला जो चैप्टर था अगले वाला उसमें हमने देखा कि किस तरह से ठाकुर कहते हैं चैतन्य देव की तीन अवस्थाएं होती थी और फिर इस तरह से ठाकुर कहते हैं इस तरह से ठाकुर हिंट देते थे कि मास्टर महाशय इमीडिएटली समझ गए कि ठाकुर क्या अपने को चैतन्य देव के साथ में कंपेयर कर रहे हैं क्या ठाकुर यह कह रहे हैं कि चैतन्य देव की तरह ही नारायण फिर से एक बार मन मनुष्य देह धारण करके इस धरा पे अवतरित हुए हैं। तो यह बात हमारे मन में बैठ जाए। इस तरह की जष्ट माने इनफ हिंट्स ठाकुर दिया करते थे। किंतु साथ में ही ठाकुर जो झूठमठ की कोई आकर के इस तरह की बातें करें तो बड़े नाराज हो जाते थे। मां का एक है मां एक एक कोई स्त्री भक्त जाकर के मां की प्रशंसा करने लगी। मां आप तो भगवती है। आप तो जगदंबा है वगैरह वगैरह। तो मां इमीडिएटली नाराज हो गई। कहती है कि बेरो एक थे के भागो यहां से। उन्होंने अर्थात कि श्री रामकृष्ण ने दया करके अपने श्री चरण के पास में मुझे स्थान दिया था। यही मेरा सद्भाग्य है। और तुम ना कि कहती हो मैं जगदंबा मैं भगवती क्या यह सब नाटक लगा रखा है। तो देखिए मां देखती थी किसकी कितनी सिंसियरिटी है। वो शायद कोई वो स्त्री भक्त जो इस तरह की प्रशंसा कर रही थी। हो सकता है उसके मन में कोई वासना हो मां के पास में उसकी पूर्ति करवाना चाहती हो घर में कोई समस्या है व्हाटएवर वो सब लोग मिन्नत मानते हैं ना यह सब जगह पर जाकर के वो पेड़ रहता है पेड़ के आसपास में वह धागा बांधते हैं श्रीफल ऑफर करते हैं मिन्नत मानते हैं तो ऐसा ही कुछ करने के लिए वो मां के पास में आई होगी और मां ने पहचान लिया तो फिर उसको कहा बेरो थे भागो यहां से तो निकलो यहां से तो अभी अभी किंतु जो सिंसियर है अब जैसे ठाकुर का भतीजा तो वो की मां के साथ में जय राम बाटी जा रहा है। वो बड़ा सा मैदान है। मैदान क्रॉस करते-करते एकाएक वो रास्ते में रुक गया। तो मां ने कहा क्यों रुक गए हो? चलो चलो अभी घर जाना है। संध्या हो गई है। यहां पर मैदान में कहां खड़े रहोगे? वह चारों ओर तो खेत है। तो वह कहता है कि नहीं पहले तुम स्वीकार करो कि तुम मां काली हो तभी मैं यहां से चलूंगा। तो अभी जैसा उन्होंने हठ पकड़ा कि वो चल ही नहीं रहे हैं। तो फिर मां ने कहा अच्छा ठीक मैं वही हूं। ऐसा करके मां ने स्वीकार किया। तब कहीं जाकर के वो फिर से चलना शुरू किया। तो देखिए कि मां सिंसियरिटी देखती थी। ठाकुर भी सिंसियरिटी देखते थे। अंतरंग भक्त हैं। उनके सामने यह स्वीकार करना कि हां उनका सही स्वरूप क्या है। भगवती कि नारायण स्वयं वो स्वीकार करने में वे लोग झिझकते नहीं थे। फेमस घटना स्वामी जी की ठाकुर कहते हैं जो राम जो कृष्णा वही श्री राम कृष्णा तो वो अंतरंग भक्तों के सामने लीला प्रकाश में वो एक मुकाम आता है एक ऐसी मंजिल आती है जबकि यह सब प्रकाशित आपको करना पड़ता है। जैसे हमने यह भार स्वीकार चैप्टर मां का हम मां के जीवन में गंभीरानंद जी की मां की लाइफ है। उसमें हम देख रहे हैं कि ठाकुर ने वैसे तो मां की शोडशी पूजा की किंतु फिर भक्तों के सामने मां का इतना प्रकाश नहीं हुआ था कि भक्तों को क्योंकि क्या है वैसे ही स्त्रियों को लज्जा में लज्जा से रहना पड़ता है। पुरुषों के सामने आना नहीं है। सिर्फ जो कुछ स्त्रियां थी वही मां के पास में आती थी और उनका भी शायद ये एटीट्यूड था कि अच्छा ठाकुर की पत्नी है। बोल के हम लोग उनको श्रद्धा करते हैं। तो ठाकुर स्वयं मां का जो स्वरूप है वह शारदा सरस्वती ज्ञान देने के लिए आई है। शारदा सरस्वती है इसलिए उसको श्रृंगार अच्छा लगता है। ये सब तो ठाकुर ने ही प्रचार करना शुरू कर दिया था मां का। तो देखिए कि जब कोई मौका आता है जो लीला जो है उनकी ये लीला विलास ये लीला विलास में वो मंजिले जब आ जाती है कि सही स्वरूप प्रकाश करने का समय आ गया है तब ये लोग झिझकते नहीं थे। किंतु यह जो इनसिंसियर लोग होते हैं सिर्फ जो बातों की बातें करते हैं जिनकी प्रशंसा सिर्फ मुंह के ऊपर में है। हृदय तक उनको कोई अभी तक यह रियलाइजेशन नहीं हुआ कि इनका स्वरूप क्या है तो इनके सामने ठाकुर कभी भी यह स्वीकार नहीं करते थे कि उनका सही स्वरूप क्या है। तो देखिए कि यदि यह ठाकुर और मां नारायण और भगवती स्वयं वे लोग भी 10 बार सोच कर के समझ कर के कब अपना सही स्वरूप प्रकाश करना है वह करते थे। मां की एक सुंदर घटना है। अभी यह सब स्मृति कथाएं ऐसी है कि हम लोग इसका ज्यादा प्रचार नहीं करते। हम लोग कहते हैं इसमें चमत्कार है बोल के नहीं करना है। तो जो भी है उद्बोधन की किताब में छपी है इसलिए मैं बता रहा हूं कि मां के पास में जयराम बाटी में एक छोटी लड़की रहा करती थी। जो घर का कुछ छोटा-मोटा काम है वह सब करने के लिए वह सहाय करती थी। अभी हुआ ऐसा कि बगल वाले गांव में मेला है और बहुत सारी स्त्रियां और लड़कियां वहां पर गई तो इसने भी वासना बाला देवी इस लड़की का नाम था। तो इसने मां को रिक्वेस्ट की कि मां मुझे भी जाने दीजिए। तो मां ने कहा देखो सब जा रहे हैं। तुम मैं तो अकेली हूं। यहां पर मेरे साथ में कोई रहेगा तो अच्छा रहेगा। बोलकर के तुम मत जाना। ऐसा मां ने जब कहा तो बेचारी दुखी हो गई। अब रह तो गई किंतु मन में है कि हां देखो सब लोग वहां पर मेले में गए हैं। वहां पर क्या सब होगा? सब आनंद करेंगे। मुझे जाने को नहीं मिला। ऐसा सोच के रात को बड़ी दुखी होकर के लेटी हुई थी। एकाएक उसने देखा कि पूरी कुटिया में जैसे कि प्रकाश छा गया। प्रकाश छा गया। वो खड़ी होकर के देख रही है कि वही जो वृद्धा मां जो कि वहां पर सोई हुई थी उनकी जगह पे जैसे कि एक सुपा देवी अपने दिव्य प्रकाश से प्रकाशमान होकर के वो वहां पर बैठी हुई है। तो यह दृश्य देखकर के यह जो लड़की थी वासना बाला उसके मन के सब जैसे कि यह ताप संताप शोक था वो सब बह गया मां के श्री चरणों में और उसके मन को तृप्ति हुई। तो देखिए कि जब अपना अभी यह है अपनी किताब में ही है किंतु इस तरह से हम ज़्यादा प्रचार नहीं करते जो भी है। जब समय आ जाता था तब अपना जो सही स्वरूप है वह प्रकट करने में ठाकुर और मां को वैसे कोई दिक्कत नहीं थी। किंतु वे लोग बड़े सोच समझ करके ऐसा करते थे। तो ये भगवती और नारायण स्वयं इतने सावधान थे तो एक आम आदमी एक सामान्य साधक को आप एक गुरु की पदवी दे दीजिए और फिर उसकी पूजा कीजिए तो फिर उसका घमंड है अहंकार है कैसा सर के ऊपर में बैठ जाएगा इसलिए यह कर्ता भजा संप्रदाय उसके बारे में ठाकुर जब कुछ बोल रहे थे उस समय यह जो गिरीश घोष ने थोड़ा सा व्यंग करके कहा व्यंग व्यंग के माध्यम से कहा कि महाशय मैं उनके ऊपर में एक नाटक लिखूंगा। अर्थात कि आजकल के न्यूज़ पेपर में किसी का वह चरित्र का पर्दाफाश करते हुए न्यूज़ जैसे आते हैं ना इस तरह से उनका यह वहां पर क्या-क्या सब गड़बड़ हो रही है उसका पर्दाफाश करता हुआ एक नाटक बनाऊंगा। लोगों को भी पता चले क्या सब वहां पे ये धतिंग चल रहे हैं। तो ठाकुर ने इमीडिएटली कहा नहीं यह भी तो एक साधन का रास्ता है। तो इसलिए ठाकुर देखिए कि कहते तो थे कि इस तरह की साधन पद्धति में नहीं ठाकुर का कहना बड़ा सुंदर उदाहरण से ठाकुर यह सब बताते। कहते थे कि यह जो सही-सही साधना का रास्ता है कामना वासना को त्याग करके जो ईश्वर के पास जाने का वो किसी मकान के भीतर में प्रवेश करने का मुख्य द्वार है और फिर यह इस तरह से स्त्रियों को लेकर के साधन या तो कुछ-कुछ तांत्रिक साधनाएं जिसमें कि मध्यपान शराबपान किया जाता है। वह सब है कि जैसे कि पिछले दरवाजे से जहां पर टॉयलेट वगैरह है उसके रास्ते से घर में आना इसके जैसा है। आप मुख्य द्वार से भी आप घर के भीतर में प्रवेश कर सकते हैं। पीछे वाले दरवाजे से भी जहां पर बदबू आ रही है, गंदगी पड़ी हुई है, वहां से भी आप वो घर में प्रवेश कर सकते हैं। किंतु वो रास्ता है, सहज रास्ता है, सुंदर रास्ता है और जो दूसरा रास्ता है, वह विकृत रास्ता है। रास्ते दोनों हैं। तो जिसके अभी जैसे वो एक तांत्रिक के बारे में ठाकुर कहते हैं। मैंने देखा कि जब यह लोग तंत्र साधना करते हैं तो सब लोग शराब पी के फिर वो सब पागलामी ही ज्यादा करते हैं। किंतु ये अचलानंद को देखा उसको एक को कि वो शराब पीता है तब वो स्थिर होकर के वो फिर जप करता है। तो ये ठाकुर का ऑब्जरवेशन था कि इस तरह के भी साधक होते हैं। ये जो गंदा रास्ता उसके ऊपर में से एक इंसिडेंट याद आया। ठाकुर जब स्टार थिएटर में गए थे तो उस समय एक बार ऐसा हुआ कि वहां पर दरवाजे पर खड़े हैं और पता नहीं वह शायद पहली बार गए होंगे कि जो भी है। वहां पर बहुत सारा कूड़ा कचरा पड़ा हुआ है। मछली जो खाते हैं तो मछली की हड्डियां है वह सब फेंकी हुई थी वहां पे तो गंदगी पड़ी हुई थी। तो ठाकुर वहां पर खड़े हुए अपेक्षा कर रहे हैं। किसी ने मैसेज भेजा गिरीश को कि ठाकुर आए हैं। तो गिरीश एकदम दौड़ा दौड़ा आया। एकदम सुंदर सफेद कपड़े पहने हुए थे और किंतु फिर भी यह जो रास्ते में इस तरह की गंदगी पड़ी है मछली की हड्डियां वगैरह सब वो सब नजरअंदाज करके सीधा ठाकुर के पैरों में साष्टांग प्रणाम करने के लिए दंडवत गिरा और जब ठाकुर कहते हैं अरे अरे खड़े हो जाओ खड़े हो जाओ यहां तो चारों ओर गंदकी है तो फिर वह जब खड़ा हुआ उसके सुंदर कपड़ों पे सफेद कपड़ों पर ये गंदकी लगी हुई है उसका कोई ख्याल नहीं है सीधा सीधा ठाकुर को देखकर के ठाकुर में इतना तन्मय हो गया था। तो देखिए कि यह भी एक भाव है। तो यहां पर ठाकुर कहते हैं कि इस तरह के भी संप्रदाय है यदि आपके मन में वासना है और वासना को लेकर के यदि आप सिंसियर नहीं है। देखिए ऐसा नहीं है कि जो साधक होता है जो साधना का प्रारंभ करता है उसके मन में वासना नहीं होती। वासना से मुक्ति प्राप्त करने के लिए तो हम साधना करते हैं। यदि मुक्त हो गए तो साधना किस काम की? वह तो फिर सीधा हम हिमालय में जाकर के बैठ जाएंगे और गुफा में जाकर के बर्फ से घिरे हुए हैं। कोई आता जाता नहीं है। बस वही ईश्वर साधना में ईश्वर के आनंद में बूंद होकर के बैठे रहेंगे। तो वह तो परिस्थिति अपनी नहीं है। मन में विकार है बोलकर के ही हम लोग साधना करते हैं। किंतु एक दो बात होती है। एक तो है अपनी सिंसियरिटी। एक बहुत बड़ा प्रश्न है। यदि हम यहां पे आए हैं सिंसियरली कि हां मन में से जितनी भी विकृतियां है उसको दूर करनी है। भले ही चाहे जन्म जन्मांतर की सफर काटनी पड़े किंतु करेंगे हम। सिंसियरली करेंगे। वह एक बात है। दूसरा है कि यह मंद वैराग्य जैसा कुछ होता है। एक मरकट वैराग्य जैसा कुछ होता है। घर में कुछ तकलीफ हुई या तो फिर किसी का मृत्यु हो गया कि ऐसा कुछ शोक समाचार मिला। जगत में कोई बड़ा कष्ट आ गया तो सोचा चलो भाई ईश्वर का भी नाम ले लेते हैं। देखते हैं वहां से कुछ प्रॉफिट होता है कि नहीं। बोल के वह आए तो है किंतु मन की वासनाएं जा नहीं रही है। तो फिर यह लोग यह वासनाएं विकृत स्वरूप धारण करके फिर इस तरह की साधन पद्धतियों की खोज करना शुरू करेगी कि जहां पर आप मुंह से तो कह रहे हैं। मन मन को संतोष तो आप दे रहे हैं कि हां मैं ईश्वर के पास जाने की साधना कर रहा हूं। किंतु वास्तविकता में आप अपनी वासनाओं का ही चरितार्थ कर रहे हैं। वासनाओं की ही पूर्ति कर रहे हैं। तो ऐसे लोगों की बात यहां पर ठाकुर कहते हैं। जब स्त्रियां आकर के बैठी तो ठाकुर ने मां-मां करना शुरू कर दिया तो वे लोग आपस में बात करने लगी कि ठाकुर को अभी तक पता नहीं है कि यह साधना या तो फिर स्त्रियों के साथ में रहना इसका क्या अर्थ है। तो और फिर ठाकुर क्या कहते हैं? प्रवर्तक साधक सिद्ध सिद्धों के

स्त्रियों के प्रति मातृभाव ही है शुद्धभाव

सिद्ध एक जन में वैष्णव चरण काछे गए बोसले एक स्त्री वैष्णव चरण के पास में जाकर के बैठी वैष्णव चरण के जिज्ञासा कोराते बोलले ए बाली का भाव जब ठाकुर ने वैष्णव चरण को पूछा कि यह स्त्री कौन है तो फिर वैष्णव चरण ने कहा इसका बाली का भाव है फिर ठाकुर क्या कहते हैं स्त्री भावे शीघ्रपतन होए मातृभाव भाव शुद्ध भाव यदि स्त्रियों के साथ में कोई भी संबंध रखना है तो फिर यदि उनको स्त्री के रूप में देखते हैं उनके साथ में कामना का संबंध है वासना का संबंध है और यह दोनों परस्पर म जैसे ठाकुर यहां पर पुरुषों के साथ में बात कर रहे हैं बोलकर के स्त्रियों के बारे में ऐसा कह रहे हैं जब स्त्रियों के साथ में बात करेंगे तो पुरुषों के बारे में ऐसा कहेंगे जो ऑपोजिट जेंडर है उसके साथ में जो आपका रिलेशन है वो पुरुष या स्त्री भाव वाला नहीं होकर के बाल मातृ भाव या तो फिर संतान भाव इस तरह से हो तो सबसे ज्यादा अच्छा है मातृ भाव है शुद्ध भाव कांसारी पाडार भक्तरा गात्रोत्थान कर लेन और बलि लेन तबे आमरा आशी ये कांसारी पाड़ा के जो भक्त है वह खड़े हुए और कहा कि अभी हम आते हैं मां काली के आर ठाकुर के दर्शन करो मां काली के आर आर ठाकुर के दर्शन करो। मां काली का दर्शन करेंगे। और भी जितने भी मंदिर है यह द्वादश शिव मंदिर राधाकांत का मंदिर वहां पर जाकर के दर्शन करेंगे। तो यह चैप्टर हुआ। यहां परिच्छेद हुआ समाप्त। इसके बाद का षष्ठ परिच्छेद है। ठाकुर श्री रामकृष्ण और प्रतिमा पूजा व्याकुलता और ईश्वर लाभ। मास्टर महाशय कालीवाड़ी के अन्य जगह-जगह पे वो पैदल चल रहे हैं, टहल रहे हैं और फिर ठाकुर ने जो कहा है उसके ऊपर में थोड़ा सा चिंतन कर रहे हैं। तो यह जो सब है इसको अभी हम कल देखेंगे आज यहीं तक। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु।

प्रश्न: स्वामी सारदानन्द (शरत महाराज) कहते है की उन्होंने श्रीरामकृष्ण लीलाप्रसंग में वही लिखा है जो की उन्होंने स्वयं अनुभव किया है.

उन्होंने तंत्र साधना के लिए दीक्षा ली थी। पता है ना पूर्णाभिषेक उसको कहते हैं तंत्र साधना की दीक्षा को तो वह और योगिन मां दोनों ने साथ में यह पूर्णा अभिषेक किया था और उनके देहांत के बाद में वो जो डायरी मेंटेन करते थे आखिर आखिर में राजा महाराज का जब देहांत हुआ उसके बाद में हालांकि वह सेक्रेटरी तो थे किंतु फिर वह जिम्मा जैसे कि प्रैक्टिकली स्पीकिंग यह जो ट्रस्टी बॉडी बनाई गई थी शुद्धानंद जी है वीरजानंद जी है वो जितन महाराज है वही शंकरानंद जी है। उन्होंने ही सब ने ले लिया था। तो वो वैसे उद्बोधन में रहते थे और सुबह को अर्ली मॉर्निंग जो बैठते थे मेडिटेशन में वो तीन चार घंटे तक सतत बैठे रहते थे। तो अभी सब लोग देखते हैं और वो आनंद भी तो लहरें भी तो बहती है ना। सब लोग अनुभव भी करते हैं कि मां के जाने के बाद में जैसे कि फिर से मां का शारदानंद जी के रूप में आगमन हुआ है। बोल के सब लोग उद्बोधन में कहते थे। अभी किंतु उस समय तो महाराज कुछ बोलते नहीं थे शरद महाराज उनके देहांत के बाद में वो जो डायरी मेंटेन करते थे उसको पढ़ा गया तो उसमें उन्होंने प्रतिदिन की वो जो डेली जो नोट होती है उसमें उन्होंने लिखा है कि आज 4 घंटे मुझे इस तरह के दर्शन हुए इस तरह का आनंद हुआ सिंगल सिंगल लाइन नोट वो एक सिंगल लाइन नोट पढ़कर के ही आप आश्चर्यचकित हो जाएंगे एक लाइन पढ़ के यदि हमको यह म आश्चर्य होता है कि इतना डेप्थ तो एक्चुअल यदि वह विवरण लिखते हैं वो चार घंटे घंटे में उन्होंने क्या प्राप्त किया? क्या आनंद मिला? क्या दर्शन हुए तो तो पता नहीं क्या से क्या हो जाता। यह जो इसके बारे में पता है ना हमने पहले भी एक दो बार डिस्कस किया था। मुझे कभी-कभी ऐसा लगता है ये जो मने वने और कोने वाला जो एक सीक्रेटिव भाव है अपने ऑर्डर में इस मतलब सिर्फ अपने ऑर्डर में नहीं विदिन हिंदूइज़्म एस सच कि ये जो ईश्वर प्राप्ति के बारे में जो कुछ है इसके बारे में कम बातें करें तो अच्छा है तो ये कहीं अपने गले में एक वो बड़ा सा पत्थर हो करके तो नहीं रह गया हिंदू धर्म के डेवलप माने विकास में इस अर्थ में कि जैसे दूसरे धर्म अभी ये जो अह आप स्टैटिस्टिक्स पढ़ेंगे तो उसमें अभी मैंने रिसेंटली पढ़ा कि ये जो अभी तक यह क्रिश्चियनिटी सबसे ज्यादा था 2.6 बिलियन की ऐसा कुछ अभी इस्लाम उससे भी आगे निकल गया है। इस्लाम इज द फास्टेस्ट ग्रोइंग रिलीजन राइट नाउ और यह बुद्धिज्म में तो एक्चुअली कम हो रही है संख्या। हिंदूइज़्म वहां का वहां बैठा है। जो अपना जो रेट ऑफ प्रोग्रेस है वो ऑलमोस्ट जीरो है। तो ये सब पढ़ के हमको लगेगा कि ये जो एक्सेसिवली सीक्रेटिव भाव है अपने धर्म में यह कोई डेंजरस तो नहीं है ना? सो दैट इज देयर। किंतु अभी क्या करें? देखिए डेप्थ इतनी है कि जो सिंसियर होगा साधक उसको यहां पे आना ही होगा। ठाकुर ने कहा ना कि जो सिंसियरली ठीक-ठीक ईश्वर को पुकारेगा उसको यहां पर आना ही होगा। आना ही होगा। आना ही होगा। ठाकुर तीन बार कहते हैं तीन सत्य करवा लेते हैं तो वो एक

प्रश्न: ठाकुर के दर्शन और आध्यात्मिक अनुभव कितने गभीर थे!

किंतु यह भी एक बात है कि जो दर्शन हुए थे उसका हो सकता है मुश्किल से 1% ठाकुर ने बताया हो ना वो ठाकुर केशव को कहते हैं कि इससे ज्यादा बताऊंगा तो तुम्हारा दल टल रहेगा नहीं तो केशव कहता है महाशय तो अभी

वैज्ञानिक आइजैक न्यूटन की महानता

यहीं तक ठीक है ये जो छलक जाता है वो बात आपने कहा ना एक इंसिडेंट है तो 16th सेंचुरी आइजक न्यूटन उस समय जीवित था तो एक मैथमेटिशियन था। उसने एक मैथमेटिक्स का एक प्रॉब्लम उसके सामने था। बड़ा ही कॉम्प्लिकेटेड। उसका कोई सॉल्यूशन नहीं मिल रहा है। तो उस समय के जो ग्रेट साइंटिस्ट थे उन सबको फिजिसिस्ट मैथमेटिशियन थे। उनको ये भेजा उसने क्वेश्चन कि ये प्रॉब्लम है मैथमेटिक्स का उसको सॉल्व करके दिखाइए आप। तो किसी ने उसका सॉल्यूशन मिल किसी को मिला नहीं। एक दिन किंतु उसके पास में एक एनोनिमस लेटर आया बिना नाम लिखा हुआ जिसमें कि वह सॉल्यूशन था और इतना एलगेंट मैथमेटिकल सॉल्यूशन था कि यह जिसने उसको भेजा था सबको उसने आइजक न्यूटन को लेटर लिखा। आई कैन रिकॉग्नाइज द लायन बाइट्स पो। मैंने शेर को अपने पंजे से मैं समझ सकता हूं। शेर ऐसा पंजा मारेगा तो वह जो पड़ जाएगा ना दरार है उससे मैं समझ गया यह शेर है बोले ठाकुर अपने शेर है बोले छुपाना कितना ही चाहते हैं वी कैन रिकॉग्नाइज बाय हिज पोक ये कैसा एक पंजा मारेंगे माया भाग जाएगी

प्रश्न: स्वामी विवेकानंद कहते हैं कि न तो काम के पीछे दौड़ो और न ही काम से भागो. लेकिन स्वामीजी यह भी कहते हैं कि अपनी आध्यात्मिकता से दुनिया को जीतो। यह दौनो विरोधाभासी है.

स्वामी जी फिर ये सब वो बीच-बीच में गुगली मारते हैं ना कि 100 थाउजेंड मैन एंड वमेन फायर्ड विद द ज़ील होलीनेस फर्टिफाइड वि द करेज ऑफ लायन शैल गो टू द लेंथ एंड ब्रेड्थ ऑफ द कंट्री टू स्प्रेड द गोस्पेल ऑफ सेल्वेशन। यह सब पढ़ने से फिर लगता है अरे भाई यह गले में पत्थर भी बांध दिया है। बोल रहे है तेरो कैसे चलेगा? देखिए इसका कोई ऐसा लॉजिकल सॉल्यूशन नहीं है। अपने मन की स्थिति पे जब सब कुछ है। जब तक स्वामी जी के नजर के सामने प्रॉब्लम था कि भारत तमस में डूबा हुआ था। तो तमस में डूबे हुए भारत को रजस में लाना था। बोल कर के ऐसा वो चाबुक मारना पड़ा रजस का। किंतु अमेरिका में उन्होंने बिल्कुल बिल्कुल राजयोग और ज्ञान योग को ही ज्यादा यह प्राधान्य दिया है। क्यों? क्योंकि वे लोग इतने राजसिक ऑलरेडी है कि अभी उनको सत्व में जाने की परि मतलब आवश्यकता है। तो तमस में जब है तो रजस में आना है। रजस में जब है तो सत्व में जाना है। अभी आज आज का जो भारत है ना वो उस समय के अमेरिका के ऑलमोस्ट मैच हो गया है। आज के भारत में जो रजस की शक्ति है, रजस का जो तांडव है, वो अभी बड़ा बढ़ गया है। अभी हमको थोड़ा सा सत में जाने की जरूरत है। माने यदि आप शिव स्वामी जी को पढ़ेंगे उसमें तो कॉन्फ्लिक्ट होगा ही होगा। किंतु फिर साथ में आप ठाकुर और मां को ऐड कीजिए। फिर देखिए क्या सब गड़बड़ घोटाला होता है। ना किंतु ठाकुर भी तो साथ-साथ में ही कह देते हैं ना कि मिसअंडरस्टैंडिंग ना हो कि वही शिवानी है। वही आध्या शक्ति स्वयं है। सीता ही सभी स्त्रियों का रूप धारण करके आई है। तो ठाकुर खुद इमीडिएटली समझ जाते हैं। क्योंकि क्या ये लोग साइकोलॉजी समझते हैं साधक के मन की। आप यह जो एक बटन दबाएंगे तो उसका क्या रिएक्शन आएगा? दूसरा बटन दबाएंगे तो क्या रिएक्शन आएगा? वह जो मेडिसिन होती है ना अभी यह आपको वह कोई गर्म दवाई देंगे तो साथ में ही कहेंगे दूध पियो। उसका एंटीडोट दे देंगे या तो फिर सामने वो एंटी एसिड दे देंगे कि ये हां एंटेसिड क्या है? उसका एंटीडोट है कि इससे वो रिएक्शन आएगा बॉडी में तो साथ-साथ में यह ले लो। तो ठाकुर को भी पता यह दवाई देने से इसका क्या रिएक्शन आएगा। साथ-साथ में वो एंटसिड दे देते हैं। उनको इस तरह से सोचिए कि वो वैदिक जो प्रथा थी कि ब्रह्मचर्य आश्रम, गृहस्थ आश्रम, वानप्रस्थ आश्रम और सन्यास आश्रम तो वो जिस आश्रम में थे उस आश्रम की ड्यूटी को वो निभाते थे। गृहस्थ आश्रम में है, पत्नी भी है, बच्चे भी है संभाल भी रखते हैं। जैसे वानप्रस्थ आश्रम में पहुंच गए। बच्चों को दे दिया। अपने से रिटायर होकर रह रहा है। फिर सन्यास आश्रम यानी अब जैसे यज्ञवल्ल्य स्वयं ना वह जा रहा है सन्यास लेके और पत्नियों को बुलाता है कि मुझे संपत्ति को बांटना है तो मैं तुम्हारे में बांटूंगा। तो मैत्रई है कि वह पूछती है कि क्या इससे मुझे ब्रह्म ज्ञान प्राप्त होगा कि नहीं? तो देखिए कि वो वेद में जो चतुर चार आश्रम की जो प्रथा है उसी को फॉलो कर रहा है।

प्रश्न: हम संसार से साधना करने का प्रयास करते हैं, लेकिन कभी-कभी हमें मायुसी बोध (गिल्ट फीलिंग) होता है कि हम उतना त्याग नहीं कर पा रहे हैं, जितना हमें करना चाहिए।

ये जो वरा नगर मठ में सुरेश बाबू और बलराम बाबू आते थे ना। अच्छा बलराम बाबू की एक बड़ी सुंदर कहानी है। तो मतलब ठाकुर के महासमाधि के बाद में ही जब वरा नगर मठ प्रारंभ हुआ था तो नरेंद्र तो वेगा बोंड की तरह इधर-उधर घूमता रहता था ना। खाने का तो है नहीं मठ में। जिसके घर बैठ गए। जिसने दे दिया खा लिया। तो ऐसा बलराम बाबू के घर पे अड्डा चल रहा था उस समय तो दूसरे भी दो-तीन लड़के थे। बलराम बाबू नरेंद्र को कह रहे हैं कि देखो नरेंद्र तुम तो कितने धन्य हो। हम दोनों ठाकुर के पास जाते थे। मैं भी ऐसा संसारी का संसारी ही रह गया और तुम देखो कि किस तरह से मस्त फकीर होकर के घूम रहे हो ठाकुर का नाम लेकर के। तो ऐसा बोलकर के शोक प्रकाश कर रहे थे। तो उस समय नारायण ने कहा क्या पता है कि देखिए बलराम बाबू कि ठाकुर स्वयं कहते हैं कि आपका अन्न शुद्ध है। आपके घर में वह बार-बार आए हैं और कोलकाता में रात्रिवास यदि किया है कहीं पे तो आप ही के घर में किया है। आपकी ठाकुर पे जो श्रद्धा है, आपकी ठाकुर के ऊपर में जो भक्ति है, उसका और कोई दूसरा उदाहरण मिलना मुश्किल है। आप इतने दुखी क्यों होते हैं? ऐसा बोलकर के नरेंद्र ने इतना सुंदर रूप से बलराम बाबू को समझाया। बलराम बाबू बड़े खुश हो गए। और फिर वो जितने भी भक्त आते हैं सबको कहते हैं देखो मुझे नरेंद्र ने ऐसा कहा देखो मुझे नरेंद्र ने ऐसा कहा [हंसी] फिर यही बलराम बाबू वो थूकदानी लेकर नरेंद्र के सामने खड़े रहेंगे तो क्या इसीलिए लीला चिंतन है कि मन की आंखों से चले जाना है बलराम बाबू की जगह हम खड़े हैं नरेंद्र हमको बता रहा है

प्रश्न: हमारे प्रारब्ध है और बुरे संस्कार भी हैं, तो आध्यात्मिक जीवन में प्रगति कैसे करें?

एक्चुअली स्टार्टिंग में ही उन्होंने बता दिया कि गृहस्थ आश्रम में कैसे रहना है तो बीच-बीच में आपको रिट्रीट पे जाना है। वहीं से ठाकुर स्टार्ट करते हैं और फिर उसका एक्सपेंशन यह सब है। माने अब यदि आप डॉक्टर को पूछेंगे कि आपने मुझे यह दवाई क्यों दी? तो फिर डॉक्टर आपको पूरा डायग्नोसिस समझाएंगे कि आपने यह जो एंजियोग्राफी करवाई उसमें ऐसा रिजल्ट आया इसलिए यह दवाई है। तो यहां पे अपनी एंजियोग्राफी करके ठाकुर समझा रहे हैं कि अपना साइकोलॉजी अपना ये जो प्रारब्ध वगैरह कैसे काम करता है? डायनेमिक्स क्या है? अह बेस्ड ऑन दैट मेडिसिन तो पहले ही दे दिया है। और महाराज जी बोलते हैं ठाकुर का मंदिर है तो इस इस दर्शन देंगे जीवित अवस्था में आइए उसप मतलब मतलब ये बहुत प्रॉमिस लगता है क्योंकि

प्रश्न: मां शारदा कहती हैं कि यदि आपको ठाकुर का मंत्र मिल गया है तो उन्हें आपके जीवन के अंत में आपको मोक्ष दिलाने के लिए आना होगा।

किंतु ये बात मां बार-बार कहती है। बार-बार कहती है। एक दो बार कह दिया तो जैसे यह वासनावाला देवी का कि एक यूनिक है। रेयर ऐसे दो-तीन उदाहरण है। एक हरिहरानंद महाराज का है कि वो मां के साथ में वहां पर गए थे एक गांव में मां राधु की ट्रीटमेंट करने के लिए। वो जो वैुंठ डॉक्टर था ना कि उसके ट्रीटमेंट लेने के लिए तो एक रात में कमरे में बैठे मां के पैर दबा रहे हैं। सोच रहे हैं कि वह जगत जननी के पैर ऐसे कैसे हो सकते हैं? तो दे जैसे ही देखा तो देखा कि एक सुंदर युवती के पैर है। फिर से मां के सामने देखा तो जगत धात्री स्वयं एकदम सुंदर रूप धारण करके बैठी है। सो दीज़ आर रेयर इंस इंसिडेंट्स जो कि लिपिबद्ध किए हैं। सो यदि ऐसा कुछ रेयर होता तो हम उसको एक सेपरेटली ट्रीट करते। किंतु मांका यह जो कहती है वो रेयर नहीं है। इट्स बार-बार कहती है कि आखिर में ठाकुर को आना ही है। आपको वो रामकृष्ण लोक में ले जाना ही है। सो दिस इज नॉट समथिंग कि एक पात्र को देख के एक यूनिक उपदेश दे दिया। ऐसा दिस इज़ जनरल फॉर एवरीवन।

प्रश्न: रामकृष्ण लोक और ब्रह्मज्ञान में क्या फर्क है?

अब जैसे हमारे भजनानंद जी कहते हैं तो ब्रह्म ज्ञान नहीं मिला तो चलेगा। रामकृष्ण लोक में जाने से चल जाएगा। ना फर्क नहीं है। यदि भजनानंद जी ऐसा कहते हैं कि मैं रामकृष्ण लोक से संतुष्ट हूं तो समझ लीजिए कि वह भजनानंद जी ब्रह्म ज्ञान से कम में संतुष्ट नहीं होने वाले हैं। वो यदि ऐसा कह दे कि मैं रामकृष्ण लोक से संतुष्ट हूं तो समझ लेना फिर कोई फर्क नहीं है। देखिए प्रॉब्लम हमारे सामने क्या है कि हमारे लेवल पर ये सब चीजों की व्याख्या किसी काम की नहीं। हमको ये सब चीजों में थोड़ा महापुरुषों का अनुकरण करना अनुसरण करना पड़ेगा। वह जैसे ठाकुर उदाहरण देते हैं ना कि यदि वह लटन जो होती है वह कांच उसमें कांच का यह रहता है उसके भीतर में वह जो प्रदीप जलता रहता है जिससे कि वो वो हवा से उसको यह ना हो तो कहते हैं कि जब अंतिम अवस्था आ जाती है तो जैसे कि वो ज्योति है एकदम नजर के सामने दिखाई देती है किंतु बस एक छोटा सा व्यवधान मात्र है कांच का तो हो सकता है कि जा ये जो वैकुंठ लोक है या वैष्णव साधना की जो चरम ये परिणति है वहां पर जैसे ठाकुर कहते हैं ना कि चीनी होते चाइना मां चीनी खेते चाहिए वह अवस्था हमारी होगी कि ईश्वर सामने ही है साक्षात उनके साथ में वार्तालाप हो रहा है और हम लोग उनके आनंद का आस्वादन कर रहे हैं यदि ब्रह्म ज्ञान हो गया ठाकुर कहते हैं ब्रह्म ज्ञान देकर के बेहोश करिस नामा तो वो तो फिर तो विलीन हो गए सब कुछ ये साध्य साधक साधना सब हो गया एक एकीकृत तो वहां पर चीनी भी नहीं है कुछ भी नहीं है रसास्वादन नहीं है तो हो सकता है कि रसास्वादन के लिए यह सब लोक है। देखिए मैं जो अपनी जो कि जो कथामृत वगैरह में पहली पहली बार पढ़ना शुरू किया ना तो जैसे ही ठाकुर समाधि में जाते हैं तो सभी लोग उनको समाधि में से नीचे लाने का प्रयास करते हैं। ठाकुर स्वयं ये जो वो राखाल को पहली बार भाव हुआ तो उसकी छाती पे हाथ घुमा घुमा करके ऐसा करके कहते हैं कि भाव शांत हो जा। तो मुझे ऐसा लगता था हम लोग पूरा जीवन भर प्रयास कर रहे हैं। थोड़ा बहुत समाधि हो, थोड़ा बहुत दर्शन हो। ये लोग उल्टा क्यों कर रहे हैं? दर्शन हो रहा है तो होने दीजिए ना। जोर जबरदस्ती क्यों इस संसार में वापस ला रहा है?