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Sri Ramakrishna Kathamrita ·

श्रीरामकृष्ण कथामृत || 16 Dec 1883 - श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ दक्षिणेश्वर में || 14 Apr 2026

मङ्गलाचरण

ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिणे अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः कल श्री श्री रामकृष्ण कथामृत उसमें हमने देखा कि किस तरह से एक ही जो छोटा सा स्टेटमेंट है ठाकुर देते हैं तीन तीन सेंटेंस का यह जो ठाकुर का रिप्लाई है मुखजे ने कहा आपको भी उठने और बैठने की क्या जरूरत है लोगों के सम्मान के लिए तो ठाकुर ने कहा उठने और बैठने में भी क्षति कहां पे है हानि कहां पे है जल स्थिर रहने से भी जल है हिलता है तो भी जल है झड़ में झूठा पत्ता हवा जहां पर ले जाए वहां पे जाता है। मैं यंत्र हूं वह यंत्री है। इसके भीतर में ठाकुर का पूरा फिलॉसोफी आ जाता है। एक तो है ब्रह्म सत्य जगत भी सत्य। जैसे कि हरि महाराज ने कहा है ब्रह्म शक्ति अभेद यह है और उसका जो एप्लीकेशन जो है साधना के रूप में वो है शरणागति। तो शरणागति और साथ में ही स्वामी जी और मां का जो है शिव ज्ञान जीव सेवा और मातृ हृदय यह पूरा जो है थिंकिंग इस कुछ दो तीन सेंटेंस के भीतर आ जाता है। अभी क्या है मणि मुखज्ज तो चले गए दोपहर में। अभी शाम का समय है अह और मणि जो है थोड़ा सा चिंतन कर रहे हैं कि ब्रह्म सत्य है। यह तो समझ में आया किंतु जगत सत्य है कि मिथ्या है। क्योंकि उन्होंने तो यह सब फिलॉसोफिकल स्पेककुलेशन पढ़ा है। जर्मन फिलॉसोफर वगैरह जो है फॉरेन फिलॉसोफर्स को भी पढ़ा है। तो जगत मिथ्या है। इस तरह का एक जो अंडरस्टैंडिंग है वह भारतीय धर्म शास्त्र के भीतर में रिसेंटली जो है यह काफी स्पष्ट रूप से देखने को मिलता है। तो मणि इसको लेकर के चिंतन कर रहे हैं और फिर ठाकुर के साथ में वार्तालाप कर रहा है। ठाकुर को मणि प्रश्न करते हैं। मणि अर्थात मास्टर महाशय मास्टर महाशय ठाकुर को प्रश्न करते हैं कि क्या जगत मिथ्या है? तो ठाकुर फिर डिटेल में जो उत्तर देते हैं वो यही जो शॉर्ट फॉर्म में ठाकुर का था उसी को ठाकुर एक्सपैंड करते हैं। तो आज हम क्या करेंगे? पहले तो मास्टर महाशय और ठाकुर का यह जो वार्तालाप है हम पूरा पढ़ लेते हैं। और उसके बाद में फिर बाद में कुछ एक पॉइंट निकाल करके हम डिस्कस करेंगे। ब्रह्म शक्ति अभेद यह जो ठाकुर का सेंट्रल थीसिस है वह तो हमने काफी डिटेल में डिस्कस किया है। यहां पर ठाकुर भी उसको डिटेल में डिस्कस करेंगे। यानी यह टॉपिक तो समाप्त हुआ। ब्रह्म शक्ति अभेद किंतु फिर एक प्रश्न होता है और यह बड़ा ही सीरियस प्रश्न है। इस प्रश्न को हम करेंगे और फिर प्रश्न का उत्तर भी देखेंगे। तो पहले हम यह ठाकुर और मास्टर महाशय का वार्तालाप हम पढ़ लेते हैं।

शिव की दो अवस्थाएँ: समाधि में आत्माराम, और ‘मैं’ आते ही रामनाम में नृत्य

जनायर मुखजेरा चोलिया गले जनाई के मुख है वो चल गए मणि भाभीते छ मणि सोच रहे हैं। मणि अर्थात मास्टर महाशय सोच रहे हैं। वेदांत दर्शन मते शोभ स्वप्नवत वेदांत दर्शन के मत अनुसार सब स्वप्नवत है। तब जीव जगत आमी ए सब की मिथ्या तो फिर जीव जगत मैं यह सब क्या मिथ्या है मणि एक टू एकू वेदांतो देखिया छे मणि ने थोड़ा थोड़ाा वेदांत देखा था अर्थात कि मास्टर महाशय ने थोड़ा बहुत वेदांत का अभ्यास किया था आ वेदांत असफुट प्रतिध्वनि कांट एगल प्रवृत्ति जारमान पंडित देर विचार एक टू पड़े छ और वेदांत का असफुट प्रतिध्वनि कितना सुंदर पोएटिक वेदांत का असफुट प्रतिध्वनि कांट हेगेल वगैरह जर्मन पंडितों के विचारों को भी थोड़ा सा पढ़ा था किंतु ठाकुर श्री रामकृष्ण दुर्बल मानुष न्याय विचार को नहीं किंतु ठाकुर श्री रामकृष्ण दुर्बल मनुष्यों की तरह विचार नहीं करते उनको यह सब सोच के जर्मन पंडितों को पढ़कर के यहां पर यह वेदांत प्रकरण ग्रंथों को पढ़कर के चिंतन करके समझने की आवश्यकता नहीं है। उनके लिए क्या है? जगन माता ताहा के समष्ट दर्शन करैया छ जगन माता ने उनको समस्त दर्शन करवा दिए हैं। किताब पढ़कर के जानने की जरूरत नहीं कि ब्रह्म सत्य है, जगत सत्य है कि मिथ्या है, ईश्वर है कि नहीं? अवतार है कि नहीं? मनुष्य के भीतर में दिव्यत्व है कि नहीं? शरणागति यह वगैरह जो साधनाएं हैं, काम कांचन त्याग वगैरह आवश्यक है कि नहीं? यह चिंतन करने की जरूरत नहीं है। जगन माता ने स्वयं उनको साक्षात प्रत्यक्ष करवा दिया है। जो नरेंद्र ने ठाकुर को प्रश्न किया था ना महाशय आपने ईश्वर को देखा है। ठाकुर ने कहा देखा है। मैं जिस तरह से तुमको देख रहा हूं वैसे ही स्पष्ट रूप से ईश्वर को देखा है। तो अपनी आंखों से यह जो हम गंभीरानंद जी का मां का जीवन पढ़ रहे हैं। तो गंभीरानंद जी ने कहा कि मां के हृदय में नित्य मिलनोत्सव चल रहा है। फिर चर्म चक्षुओं से भी ठाकुर का दर्शन हो रहा है। ठाकुर की महासमाधि के बाद में यह जो वृंदावन वगैरह तीर्थ पर्यटन के लिए मां गई थी। हृदय की ये जो विरह ज्वाला है उसको हो सकता है कि तीर्थ दर्शन करके थोड़ी सी क्षमित हो। किंतु प्रॉब्लम क्या हो गया कि वही तो सब माने और भी विरह उद्दीपनाजनक जगह है यह वृंदावन में जहां पे कि श्रीमती राधा रानी और भगवान कृष्ण की यह सब लीलाएं हुई वहां पे योगिन मां भी थी मां भी गई और फिर दोनों मिलकर के रो रही है रो रही है यहां तक कि ठाकुर को आकर के बोलना पड़ा दर्शन देकर के अरे तुम लोग इतना रोते क्यों हो मैं गया कहां हूं यह तो इस घर से उस घर में ना इतना ही तो क्या इतना रोने की जरूरत जरूरत है। तो क्या है कि विरह अग्नि जो प्रशमित करने के लिए किंतु फिर ठाकुर ने दर्शन की परंपरा जो प्रारंभ कर दी तो यह दर्शन परंपरा चर्म चक्षुओं से यह अर्थात कि बाह्य चक्षुओं से भी मां ठाकुर का दर्शन करती थी। हृदय में भी नित्य मिलनोत्सव चल रहा है। तो यह स्पष्ट रूप से ठाकुर हो, मां हो, स्वामी जी हो, राजा महाराज हो स्पष्ट इन आंखों से ईश्वर के दर्शन होते थे। तो जगन माता उनको समस्त दर्शन करवा दिए हैं। जगन माता ने उनको समस्त दर्शन करवा दिए। मणि ताई भक्ष तो मणि यही सोच रहे हैं। कित खण परे ठाकुर श्री रामकृष्ण मणि शहीद एकाकी पश्चिम गोल बारंदा कथा को हते छ कुछ ही समय के बाद में ठाकुर श्री रामकृष्ण मणि के साथ में पश्चिम की ओर का जो गोल बरांदा है व वरांडा है वहां पर बात कर रहे हैं। यदि आपने दक्षिणेश्वर का दर्शन किया होगा तो आपको पता होगा कि ठाकुर का घर के सामने गंगा के और जो हाफ सर्कुलर वो जो अर्ध वर्तुलाकार जो वरांडा है बड़ा सुंदर दिखता है। तो वहां पर बैठकर के खड़े रह के यह लोग वार्तालाप कर रहे हैं। सम्मुखे गंगा कुल कुल रबे दक्षिण प्रवाहित होते छन सामने में गंगा है कुल कुल रवे रव अर्थात कि शब्द कुलकुल शब्द से कुलकुल संगीत से दक्षिण की ओर प्रवाहित हो रही है। शीतकाल शीतकाल अर्थात कि ठंडी का समय है। सूर्यदेव एकनो देखा जते छे दक्षिण पश्चिम कोने सूर्य देव अभी भी दिख रहे हैं दक्षिण पश्चिम की ओर जहार जीवन वेदमय जिनका जीवन वेदमय है जहार श्री मुख नििश्रुत वाक्य वेदांत वाक्य जिनके श्री मुख से निश्रुत अर्थात कि श्री मुख से प्रगटित हुआ वाक्य वेदांत वाक्य है चाहा हार श्री मुख दिया श्री भगवान कथा कौन जिनके श्री मुख से श्री भगवान स्वयं वार्तालाप करते हैं जहार कथामृत लैया वेद वेदांतो श्री भागवत ग्रंथाकार धारण करें जिनकी जिनके कथामृत को लेकर के वेद वेदांत श्री भागवत ग्रंथ का आकार धारण करते हैं से ओहेतुक कृपा सिंधु पुरु पुरुष गुरु रूप धारण कर या कथा कहते छ वही अहेतुक कृपा सिंधु पुरुष गुरु रूप धारण करके वार्तालाप कर रहे हैं। देखिए मास्टर महाशय में जब यह कवित्व का यह उथला आता है तो इतने सुंदर सुंदर वाक्यों की रचना करते हैं कि वहां पश्चिम का जो हाफ सर्कुलर वरांडा है वहां पर बैठे हैं। बातें कर रहे हैं। सुंदर ये कुल कुल करती ये जो कल कल निनादिनी जिसको कहते हैं कल कल जिसका निनाद है इस तरह की गंगावारी दक्षिण की ओर प्रवाहित हो रही है। ठंडी का समय है। सूर्यदेव अभी भी दिख रहे हैं। फिर जिनका जीवन वेदमय है। जिनके कथामृत से ही तो यह वेद वेदांत उपनिषद वगैरह ग्रंथ उनकी रचना हुई है। जिनके कथामृत को ही धारण करके जिन ग्रंथों की रचना हुई है वही अहेतुक कृपा सिंधु किस तरह के कृपा सिंधु अहेतुक जिनका हमारे पर कृपा करने के लिए कोई स्वार्थ नहीं है। निस्वार्थ रूप से अपने मन के आनंद से हमारे पर कृपा परवश होकर के जो कृपा करते हैं। इस तरह के वेद पुरुष स्वयं गुरु रूप धारण करके पृथ्वी पर अवतरित हुए हैं। वही जो श्री अर्जुन को जिन्होंने कुरुक्षेत्र के युद्ध मैदान में उपदेश दिया था वही श्री कृष्ण फिर से श्री रामकृष्ण के रूप में अवतरित हुए हैं। गुरु रूप धारण करके मणि प्रश्न करते हैं जगत की मिथ्या जगत क्या मिथ्या है? श्री रामकृष्ण मिथ्या केो मिथ्या क्यों वो सब विचार को था वह सब विचारों की बात है प्रथमटा नेति नेति विचार कर बार समय त जीव न जगत न चतुर्विशति तत्व नोन होए जाए पहले पहले विचार करने के पहले पहले नेति नेति विचार करने के समय तिनी अर्थात कि वह वह अर्थात कि ईश्वर या या तो फिर अल्टीमेट रियलिटी या तो फिर आत्मन या ब्रह्मन जिस पर हमारा विश्वास हो जीव नहीं जगत नहीं चतुर्विंशति तत्व नहीं हो जाते हैं यही शोभ स्वप्न बोत होए जाए यह सब जो है स्वप्नवत हो जाता है किंतु तार पर अनुलोम विलोम तार उसके बाद में अनुलोम और विलोम ऊपर जाना नीचे आना तो तीन जीव जगत होए छ बोध हो जब आप निर्विकल्प समाधि के बाद में वापस आते हैं तो बोध होता है। ऐसा समझ में आता है। माने ऐसा कन्विक्शन होता है कि वही जीव और जगत हुए हैं। माने साक्षात्कार होता है। तुम सीढ़ी धरेधरे छादे उठ ले। तुम सीढ़ी पकड़ पकड़ करके सीढ़ी के ये जो स्टेप्स है उसको पकड़ पकड़ करके छत पे उठे। किंतु जतोण छाद बोध ततो खण सीढ़ियों वाच किंतु जब तक तुम्हारे पास में यह छत यह है एक ऐसा जब तक तुम्हारे मन में बोध है तब तक यह सीढ़ी है ऐसा भी बोध है क्या कहना चाहते हैं ठाकुर लक्ष्य है छत और मार्ग है साधन है सीढ़ी तो जब तक मुझे अपने लक्ष्य तक पहुंचना है तब तक मुझे साधन मार्ग की आवश्यकता चाहिए मुझे तब तक साधन मार्ग चाहिए ज ऊंचू बोध आ तार नीचू बोध ओ आ जिसको यह बोध है कि यह ऊपर में है उसको वह बोध है कि यह नीचे है किस तरह से मुझे ईश्वर तक पहुंचना है यह ईश्वर है मेरे से ऊपर में कहां पे दूर मेरे से है तो ईश्वर यदि दूर है तो मैं यहां पे हूं नीचे में अर्थात कि यह सब्जेक्ट ऑब्जेक्ट डलिटी रहता है। मैं हूं सब्जेक्ट। मुझे ऑब्जेक्ट है जिसको मुझे प्राप्त करना है। वह है ईश्वर। यह साध्य और साधक और तीसरा है साधना। साध्य जिसको कि हमको प्राप्त करना है। साधक जो कि मैं हूं और यह है साधन मार्ग जिसके माध्यम से मुझे साध्य को प्राप्त करना है। मैं जमीन पर हूं अर्थात कि मैं नीचे हूं। ईश्वर ऊपर में है। छत पे है और बीच में सीढ़ी है जो कि साधन मार्ग है। माने नीचू बोध अर्थात कि मैं नीचे में हूं। यह बोध। ऊंचू बोध अर्थात कि ईश्वर ऊपर में है छत के ऊपर में वहां पर मुझे जाना है वह मेरा लक्ष्य है और फिर तीसरी बात जो ठाकुर कहते हैं जब तक छाद बोध आज है जब तक छत है यह बोध होता है तब तक सीढ़ी भी है अर्थात कि जब तक छत है तब तक वह ऊपर है मैं नीचे हूं और यह बीच में सीढ़ी है साध्य साधक और साधना यह हमको स्पष्ट प्रतीत होता है आ छादे उठे देख ले जेनी से छाद त होए छे ईंट चून सुर की से जिननी से सीढ़ी तैयार होए छे और जब छत के ऊपर उठ के देखोगे कि जिस चीज का छत तैयार हुआ है ईंट है चू चुना है सुरकी यानी ये रेती सीमेंट वगैरह जो आज की लैंग्वेज में ये मेटल के ये जो बार्स आते है वह जो सब चीज की यह छत तैयार हुई है से जीनी से सीढ़ी तैयार होए उसी चीज की यह सीढ़ी तैयार हुई है ये यहां पे वो लकड़ी की सीढ़ी नहीं वो जनरली सभी घरों के भीतर में वही सीमेंट और ईंट की जो बनती है सीढ़ी वो सीढ़ी तो देखिए कि जब तक मैं नीचे हूं तब तक ये नीचू बोध आ जब तक ईश्वर दूर है तो ऊंचू बोध आ और तब तक यह सीढ़ी है। यह बोध है। किंतु जब छत के ऊपर मैं जाकर देखूंगा कि जिस चीज की छत बनी है, उसी चीज की सीढ़ी भी बनी है। और यहां पर ठाकुर ने मेंशन नहीं किया। किंतु वहां पर यह भी होगा कि मैं भी उसी चीज का बना हूं। जो दिव्य तत्व से सीढ़ी छत बनी है। मैं भी उसी चीज का बना हूं। साध्य साधक और साधना एकाकार हो जाते हैं। आर जेमन बेलेर कथा बोले जी और जिस तरह से मैंने बेल फल की बात कही है। यहां पर ठाकुर उसको विस्तार करके नहीं कहते किंतु हमको पता है कि बेल फल की क्या बात कही है। ठाकुर ने कहा कि बेल फल का एक आउटर केसिंग होता है और भीतर का मावा होता है। भीतर का पल्प होता है। अभी आप कहेंगे कि बेल फल में से मुझे फल पल्प जो है भीतर का उसी को निकाल करके उसी का शरबत बनाना है या उसी को खाना है तो होगा क्या? आपने जो आउटर शेल जो है आउटर केसिंग है उसको यदि डिस्कार्ड कर दिया तो बेल फल का जो ओरिजिनल वेट था वो कम हो गया। अर्थात कि बेल फल के जब हम बात करते हैं तो भीतर का पल्प और आउटर शेल दोनों को मिलाकर के यह बेल फल होता है। आप यह नहीं कह पाएंगे कि भीतर का पल्प है वही उसका सार गर्भ पदार्थ है और आउटर शेल को डिस्कार्ड कर दो। यदि आउटर शेल निकाल दिया हम सबको पता है कि उसके बाद में जो पल्प को सेपरेट करके रख दिया तो 3-4 घंटों में ही उसको आपको व्यवहार कर देना पड़ेगा खा जाना पड़ेगा वरना फिर वो स्पॉइल हो जाएगा आउटर शेल जो है वह उसका प्रोटेक्शन है तो बिना प्रोटेक्शन के भीतर का जो पल्प उसका क्या फायदा है तो इसीलिए ठाकुर कहते हैं जिस तरह से मैंने तुमको ऑलरेडी बेल फल की उपमा दी है जार अटल आ तार टल ओ आे जो अटल है वो टलता भी है। वे जो भाव में आकर के ठाकुर के पैर जब इधर-उधर पलते थे, टलते थे तो जो अटल है उसका टल भी है। जो स्थिर है उसका फिर प्रवृत्ति भी है माने जो स्थिर है उसका साथ में क्रिया भी है तो आमी जाब नोए मैं तो जाने वाला नहीं हूं। आमी घट जतो क्षण रहे छे ततो क्षण जीव जगत रहे छे मैं रूपी घट अर्थात कि मैं रूपी अहम का लेश मात्र भी जब तक है तब तक जीव और जगत भी रहे हैं ताके लाभ कर ले देखा जाए तीन जीव जगत होए छ किंतु जब ईश्वर प्राप्ति होगी आत्म साक्षात्कार होगा तब पता चलेगा वही जीव जगत हुए है शुद्ध बिचारे नो है। देखिए यहां पर ठाकुर जैसे कहते हैं ना जय राम जय कृष्ण श्री राम कृष्ण किंतु तो वेदांत दिख दिए ना जो राम जो कृष्णा वही राम कृष्ण किंतु तुम्हारे वेदांत के दृष्टिकोण से नहीं। यहां पर भी ठाकुर स्पष्ट कहते हैं कि यह स्पष्ट देख सकते हैं ईश्वर या ब्राह्मण ही जीव और जगत हुए हैं। यह सब बातों की बातें नहीं है। सिर्फ विचार करके नहीं साक्षात उपलब्धि कर सकते हैं। शिबेर दुई अवस्था शिव की दो अवस्था है। जोखन समाधिष्ठो महाजोगे बसे छ तोखन आत्माराम शिव की दो अवस्था है। जब समाधस्थ है महायोग में बैठे हुए हैं तब आत्माराम है आबार जखन श अवस्था थे के नेबेश और फिर जब उस अवस्था में से नीचे आते हैं एक टू आमी था के थोड़ा सा भी अहम का एक लेश प्रकट होता है तखन राम राम करे नृत्य करें तब राम राम करके नृत्य करते हैं ठाकुर शिबेर अवस्था वर्णना कर की निज अवस्था स्थाित ठाकुर क्या शिव की अवस्था की वर्णना करके अपनी खुद की अवस्था की ओर इंगित कर रहे हैं इशारा कर रहे हैं। तो देखिए यहां पर यह पूरा पैसेज समाप्त होता है। इसके बाद में संध्या होती है और संध्या में भी यही एक थोड़ा सा डिस्कशन होगा। किंतु फिलहाल यह जो पूरा पैसेज जो है मुखजे के चले जाने

ब्रह्म-शक्ति-अभेद की नींव है काम-कांचन-त्याग

के बाद में यह लेट आफ्टरनून का अभी भी सूर्य डूबा नहीं है। माने संध्या हुई नहीं है। लेट आफ्टरनून का यह जो समय है इसमें यह जो पूरा डिस्कशन हुआ इसका माने डिटेल हमने काफी ऑलरेडी देख ही लिया है कि ब्रह्म सत्य जगत सत्य या तो फिर ब्रह्म शक्ति अभेद यह फिलॉसोफी यदि हम ठाकुर का जो कोर आइडिया है इसको पकड़ेंगे तभी यह सब कुछ माने हम स्वीकार कर सकते हैं। किंतु अ यहां पे ना अभी हमको थोड़ा सा एक तरह से एक स्टेप बैक लेना है। सबसे पहली बात तो है कि ये जो ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या वाला जो कांसेप्ट है वो आया कहां से? अह इस तरह के कांसेप्ट की रचना करने का प्रयोजन हुआ ही क्यों? देखिए हमारे वेदों की वेद के भीतर में जिस तरह से वो डिवीजन है वो उसके भीतर में कि संहिता है उसके बाद में यह जो ब्राह्मण है फिर आरण्यक है और फिर उपनिषद है जिसको कि वेदांत भी कहा जाता है। तो यह संहिता और यह ब्राह्मण पोर्शन जो है खास करके कर्मकांड के रिलेटेड है। धर्म की उत्पत्ति ही कैसे हुई? मनुष्य कष्ट में है। मनुष्य को कष्ट में से निकल कर के सुख में जाना है? यह सुख प्राप्ति के लिए ही तो जीवन का सब कुछ है। किसको कष्ट में रहना है? किसको दुख में रहना है? किसको डिसीज में रहना है? किसको एक्सीडेंटल डेथ चाहिए? आजकल तो फिर भी हम बहुत ही सेफ और सिक्योर सोसाइटी में जीते हैं। तो जब हम जंगल में रहते थे, वनवासी थे, सर्वप्रथम हमने गांव की रचना करना शुरू किया। जो सिविलाइजेशन का प्रारंभ ही हुआ था। यह लैंग्वेज, कल्चर वगैरह धीरे-धीरे डेवलप हो रहे थे। हम एक जो हायर थिंकिंग करना शुरू किए थे। यह जो आहार, निद्रा, भय, मैथुन यह जो पशुओं के जो व्यवहार है, पशुओं के गुणधर्म है उससे ऊपर उठकर के अवकाश की ओर देखकर के अंतरिक्ष की ओर देखकर के सर्वप्रथम जिज्ञासा वृत्ति हमारे मन में जब प्रकट हुई थी कि यह जो मेरा जीवन है, मैं कि जो पीसता जा रहा हूं, इससे परे भी कुछ है कि नहीं? एकाएक जंगल में आग लगती है। मेरा समग्र कुछ जो है नष्ट हो जाता है। एकाएक बीमारी आ जाती है। फटाक करके सब कुछ मेरा खत्म हो जाता है। तो यह जो क्षण भंगुर जीवन है दुख से भरा हुआ क्या इससे परे भी क्या परम शांति की नित्य शांति की अवस्था नित्य सुख की अवस्था है कि नहीं? दिस इज द बिगिनिंग ऑफ रिलीजन। कि हमने एक हायर पावर को स्वीकार करना शुरू किया। सर्वप्रथम हम उससे डरते थे। बाद में हमने उनको प्रेममय ईश्वर के रूप में स्वीकार किया। हम उनको ऑफर कर रहे हैं। किंतु ऑल ऑफ दिस हमारा पर्पस क्या है? हमको आनंद चाहिए, सुख चाहिए। जो कि चार पुरुषार्थ वेद में कहे गए हैं। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष। इसमें से यह जो प्रथम तीन है अर्थ और काम यह जो है सर्वप्रथम तो हमको अर्थ और काम ही चाहिए किंतु फिर जैसे-जैसे धर्म का डेवलपमेंट हुआ हमको पता चला कि अर्थ और काम इन दोनों को यदि धर्म के आधार पर अनुष्ठान किया जाए तो फिर ईश्वर प्रसन्न होंगे। तो धर्म के आधार पर अर्थ रूपी पुरुषार्थ का अनुष्ठान करना। यह था बहुत लंबे समय तक यह धर्म के नाम पर यही चलता था। इसमें भी आप देखेंगे कि यह देवता है। इस देवता की आरा विधि या होम हवन करने से कर्मकांड करने से किसी प्रकार का हमको इस तरह के स्वर्ग की प्राप्ति होगी। इस पुतष्टि यज्ञ है। फिर यह जो राजसूय यज्ञ है। यह जितने भी यज्ञ है उसका एक मटेरियल बेनिफिट है। पुत्र प्राप्ति के लिए यज्ञ है। राज्य प्राप्ति के लिए यज्ञ है। शत्रुओं के विनाश के लिए यज्ञ है। सुख हेल्थ और बेनिफिट के लिए यह प्रोस्पेरिटी के लिए यज्ञ है। तो क्या है कि अर्थ और काम के लिए ही जितना धर्म का अनुष्ठान होता था। किंतु फिर धीरे-धीरे करके यह जो क्षत्रिय ब्रांच जो है एक सेपरेट होता गया और उसमें फिर यह मोक्ष मार्ग जो है उसका प्रचलन हुआ। भगवान कृष्ण, भगवान राम, भगवान बुद्ध यह जो अपना एक ग्लोरियस क्षत्रिय ट्रेडिशन है उसमें आप देखेंगे कि किस तरह से उन्होंने मोक्ष मार्ग के बारे में कहा है। स्वामी जी ने कहा ना कि ब्राह्मण का ब्रेन और क्षत्रिय का हार्ट यह जब दोनों इकट्ठा थे तब तक अपनी भारतीय संस्कृति सर्वश्रेष्ठ संस्कृति थी। इन दोनों में जब स्प्लिट हुआ ब्राह्मण का ब्रेन जब सेपरेट हो गया क्षत्रिय के हृदय से तभी यह सब हमारे साथ में जो झमेला है प्रॉब्लम है यह सब स्टार्ट हुए हैं। तो देखिए कि यहां पे मोक्ष मार्ग एक है। मोक्ष मार्ग के भीतर में आपको अर्थ काम और धर्म धर्म अर्थ काम तीनों को त्याग करके संपूर्ण त्याग करके जीवन से संपूर्ण विराग लेकर के आपको मोक्ष मार्ग के लिए साधना करनी है। आराधना करनी है। योग वगैरह जो मार्ग है उनका अनुष्ठान करना है। और उसका लक्ष्य क्या है? आत्म साक्षात्कार तो देखिए कि आत्म साक्षात्कार के लिए धर्म, अर्थ, काम तीनों को त्याग करके मोक्ष मार्ग पर चलना आवश्यक है। अब यह मोक्ष शास्त्र जो है यह धीरे-धीरे करके यह वेदांत रूपी उपनिषद रूपी जो पोर्शन है उसमें यह जगत मिथ्यात्व का कांसेप्ट प्रारंभ हुआ। यहां पे देखिए जैमिनी बोलकर के जो ऋषि है पूर्व मीमांसा शास्त्र जो कि यह अह संहिता और ब्राह्मण पोर्शन के ऊपर आधारित है। उसमें मेनली है कि कर्मकांड के बारे में बताया गया है। यह विधि करके कौन सा बेनिफिट हमको मिलता है। अर्थ और काम का अनुष्ठान मुझे जीवन में अर्थ भी चाहिए और काम वासना भी है। तो किस तरह से काम वासना को चरितार्थ किया जाए। किस तरह से धन बटोरा जाए। यह सब धर्म के मार्ग पर रहकर के कैसे करना है। यह सब जो है पूर्व मीमांसा शास्त्र या तो कर्मकांड के भीतर में यह डेवलप होने लगा। वेद के संहिता और ब्राह्मण पोर्शन में तो यह है ही है। बाद में फिर जैमिनी ऋषि और फिर कुमारिल भट्ट इन लोगों ने इस मीमांसा शास्त्र को काफी डेवलप किया है। खास करके यह कुमारिल तक जब कुमारिल भट्ट तक जब यह बात आती है। यहां पे देखिए कि मोक्ष मार्ग जो है ज्ञान मार्ग जो है इन पैरेलल डेवलप हो रहा है। क्षत्रिय लोगों ने इसमें काफी कंट्रीब्यूशन किया है। और जब तक शंकर गडपादाचार्य तक जब बात आती है फिलॉसोफिकल फॉर्मुलेशन करने की गडपादाचार्य और शंकराचार्य तब तक यह बात ठीक हो गई है कि अर्थ, काम और धर्म तीनों को त्याग करके संपूर्ण ज्ञान मार्ग पे आप नहीं आएंगे। संपूर्ण मोक्ष मार्ग पे आप नहीं आएंगे। तब तक जो है मुक्ति प्राप्ति असंभव है। तो फिर उन्होंने यह कांसेप्ट डेवलप किया कि जगत या तो असत है माने एक्सट्रीम पोजीशन गडपादाचार्य का नागार्जुन का एक एक्सट्रीम पोजीशन कि जगत क्षणभंगुर है। गडपादाचार्य का एक्सट्रीम पोजीशन कि जगत असत है। स्वप्नवत है। और फिर शंकराचार्य का थोड़ा सा मॉडरेट पोजीशन कि जगत असत तो नहीं है। मिथ्या है। एक रिलेटिव उसका एग्जिस्टेंस है। किंतु ये जगत का असतत्व या तो फिर यह मिथ्यात्व इसके पीछे में फंडामेंटल आइडिया क्या है कि आपको अर्थ और काम का त्याग करना है। जब तक अर्थ, काम और धर्म इन तीनों का आप धर्म का अर्थ इन जनरल एथिक्स एंड मोरालिटी नहीं। धर्म का अर्थ है कि रूल्स एंड रेगुलेशंस ड्यूटीज गृहस्थ धर्म एक है। क्षत्रिय धर्म एक है, विद्यार्थी धर्म एक है। सती धर्म एक है। तो वो जो ड्यूटीज आपको जो समाज में दी जाती है उसका पालन करना यह धर्म है। विधि विधान है, क्रियाकांड है, कर्मकांड है। इसको यहां पर धर्म के रूप में कहा गया है। तो धर्म अर्थात कि मेरे संसार में जो भी ड्यूटीज है उसको मुझे त्याग करना है। मुझे सन्यास मार्ग ग्रहण करना है और अर्थ और काम का संपूर्ण त्याग करना है। तभी मैं मोक्ष मार्ग पे चलने के लिए ज्ञान मार्ग पर चलने के लिए एलिजिबल होता हूं। तो देखिए कि वेदांत का डेवलपमेंट इसीलिए हुआ है कि एक्सेसिव हमारा एक कंसर्न हो गया था कि कर्मकांड का सहाय लेकर के विधि विधान की सहाय लेकर के यह यज्ञ होम की सहाय लेकर के पूजा पाठ की सहाय लेकर के कैसे भी करके मुझे अपने ज्यादा से ज्यादा धन बटोरना है। ज्यादा से ज्यादा प्रेस्टीज चाहिए। ज्यादा से ज्यादा पावर चाहिए। ज्यादा से ज्यादा काम चरितार्थ करना है। मुझे काम वासना मुझे उसको चरितार्थ करना है। यह जो एक एक्सेसिव मटेरियलिज्म में इंद्रियों के भोग सुख में जो समाज डूब गया था उसके अगेंस्ट में यह रेबेलियन है। ज्ञान मार्ग, मोक्ष मार्ग और उनका जो फंडामेंटल कांसेप्ट है ब्रह्म सत्य किंतु जगत असत या तो फिर मिथ्या। तो देखिए कि यह वेदांत का फंडामेंटल है। अभी जब हम ठाकुर की ओर आते हैं और फिर ठाकुर जब यह कहते हैं कि ब्रह्म भी सत्य, जगत भी सत्य, ब्रह्म शक्ति अभेद तो फिर हमारे मन में एक डर खड़ा होता है कि क्या यह जो पहले क्रियाकांड कर्मकांड का आश्रय लेकर के हमारा समाज जो मटेरियलिज्म में डूब गया था। क्या फिर से हम लोग उसी डायरेक्शन में तो नहीं चले जाएंगे कि कहेंगे जगत सत्य है तो फिर तो जगत के जो भोग सुख है जगत के साथ में अपना इंटरेक्शन है वह भी तो सत्य है जगत में धन है मुझे धन चाहिए जगत में इंद्रियों के सुख है मुझे इंद्रियों के सुख चाहिए जगत में काम है तो मुझे काम सुख चाहिए जगत सत्य है तो जगत को भोग करना भी तो इतना ही सत्य है यह ऐसा हो गया कि मुझे डायबिटीज है। डॉक्टर ने मना किया है। मिठाई मत खाओ। तो अभी मैं सोच रहा हूं कि मैं तो मेरा मन तो इतना दुर्बल है। मिठाई सामने आने से ही तुम्हें फट करके मुंह में डाल दूंगा। डॉक्टर ने जो वार्निंग दिया है वह तो उस समय मुझे याद नहीं रहेगा। बाद में फिर यह इंसुलिन लेने की बात आएगी। तब मुझे पछतावा होगा। अरे भाई मैं क्यों ये मिठाई खा ली? तो मैं इसका सॉल्यूशन खोज रहा हूं। खोज रहा हूं। एक फिलॉसोफर ने आकर मुझे बता दिया कि देखो भाई तो एक बात समझो कि मिठाई जो है ना वो मिथ्या है। मिठाई जो है वो असत है। मिठाई जो है वो स्वप्नवत है। उसका अस्तित्व ही नहीं है। उसके अस्तित्व को ही तुम नकार दो। यदि उसका अस्तित्व ही नहीं है तो उसको खाने की इच्छा तुमको होगी कैसे? खा के वो खाने की वासना तुम्हारे मन में कैसे प्रकट होगी? तो मैं सोचूंगा यार बात तो अच्छी है। वैसे तो मेरा खुद के विल पावर मेरी इंद्रियों पर संयम नहीं। यदि मैं मिठाई को सत्य मान लेता हूं तो मैं खाऊंगा ही खाऊंगा। किंतु यदि मैं कोई मुझे आकर के इस तरह से कन्विंस करता है कि मिठाई सिर्फ नाम रूप मात्र है। उसके भीतर में कुछ सब्सटेंस ही नहीं है तो फिर हो सकता है कि मिठाई सामने आने पर भी उसको खाने की मेरी इच्छा ना हो। तो वेरी गुड। वो मैंने इस तरह से फिलॉसोफी प्रैक्टिस की नेति नेति नेति नेति यह मिठाई नहीं है मिठाई नहीं है यह मिथ्या है स्वप्नवत है रस्सी है रस्सी के ऊपर में झूठमठ का मुझे यह मिठाई दिख रहा है तो यह जब तक मैं करता रहूंगा तब तक मैं बढ़िया मजे से हूं कि हां भाई मैं मिठाई से मैं मुक्त हो गया हूं नेक्स्ट टाइम जब डॉक्टर के पास जाऊंगा वो शुगर चेक करेंगे डॉक्टर भी खुश हो जाएंगे अरे वाह भाई आप तो बढ़िया अच्छा कंट्रोल कर रहे हैं खानेपीने पे और मैं मन में हंस रहा हूं मैं खानेपीने पर कंट्रोल नहीं कर रहा। मैं यह जो मिठाई है वह मिथ्या है। इस तरह का फिलॉसोफी में अप्लाई कर रहा हूं। तो यहां तक तो सब कुछ ठीक चल रहा है। फिर एक दूसरा आदमी आकर के मुझे कहता है अरे भाई ये मिठाई मिथ्या किसने तुमको बता दिया? मिठाई तो सत्य है। ये तुम देख नहीं पा देख नहीं रहे हो क्या? उसको स्पर्श करो। सत्य है कि नहीं? तो स्पर्श किया तो सत्य है। तो टच तो होता है। मुंह में सूंघ करके देखो। उसकी सुंदर खुशबू आ रही है कि नहीं? तो हां आ रही है। चक करके देखो जीहवा पे लगा के देखो टेस्ट आ रहा है कि नहीं आ रहा हां आ रहा है तो फिर तुम इसको मिथ्या कैसे कह सकते हो यह सत्य है मिठाई तो फिर अब मैं फिर से कन्विंस हो गया मिठाई सत्य है किंतु फिर अभी वही प्रॉब्लम खड़ा हो गया जिस प्रॉब्लम को काटने के लिए मैंने ओरिजिनली मिठाई मिथ्या है यह बात कही थी अभी जैसे ही पता चल गया कि मिठाई सत्य है साथ में ही अभी उसको खाने की लालसा वासना मेरे मन में जागृत हो गई। जब भी मेरे सामने यह परोसी जाएगी यह मोहन मोहन थाल है। यह हलवासन है ना कि फिर यह मैसूर पाक है ना कि ये बर्फी है वो राजकोट के वो जो पेड़ा वो जो वहां पे मिलते हैं बढ़िया से तो ये सब जैसे ही नजर के सामने आएगा फट करके मैं उठा लूंगा। फट करके मैं खा लूंगा। अभी तो पूरा गोल घूम करके हम स्क्वायर वन पे ही आ गए। जगत मिथ्या क्यों कहा गया? धर्म अर्थ काम से मुक्ति पाने के लिए धर्म अर्थ काम से मुक्ति पाने के लिए जिसको मैंने मिथ्या कहा उसी को यदि मैं सत्य कह देता हूं तो फिर क्या मेरा मन फिर से धर्म अर्थ काम की ओर नहीं जाएगा यह दिस इज अ वेरी बिग क्वेश्चन हियर और इसीलिए और फिर क्या है स्वामी जी कहते हैं शिव ज्ञान जीव सेवा ये शिव ज्ञान जीव सेवा कब होगी जब आप जीव को सत्य मानेंगे तभी होगी मां कहती है मातृभाव मातृभाव कब होगा जब आप ठाकुर के संतानों को ठाकुर के जो भक्तगण है यह जगत संसार समग्र है उनको सत्य मानेंगे तभी तो उनके ऊपर में दया और एक प्रेम स्नेह का भलोभाषा का एक संबंध बनेगा। मैं कोई हवाहवा में किसी के साथ में थोड़ी ना अभी ये आजकल एआई एआई जनरेटेड ये अवतार आते हैं। ये एआई वीडियो जनरेशन होता है ना तो वीडियो जनरेशन में बहुत कुछ जनरेट करते हैं। एक आदमी है फिर राक्षस के साथ लड़ रहा है। अभी कोई एक्चुअल मूवी होगा तो मूवी में क्या होगा? एक्टर या एक्ट्रेस होंगे। अभी मैं उनका फैन हो सकता हूं। किंतु ये एआई जनरेटेड वीडियो है। उसमें जो एक एक्टर या एक्ट्रेस है वो तो एआई जनरेटेड है। उसका मैं फैन कैसे हो सकता हूं? हो सकता हूं। किंतु क्या है कि फिर वो कोई असली व्यक्ति का तो फैन नहीं हुआ। मैं तो एआई का फैन हो गया। सो सिमिलरली कि यदि जगत को सत्य मानेंगे तभी तो हम लोग यह शिव ज्ञानी जीव सेवा कर पाएंगे। हां आप कहिए कि जगत सत्य है इस अर्थ में कि ब्राह्मण ही है। ब्राह्मण के ऊपर में नाम रूप का मुखौटा है। किंतु नाम रूप का मुखौटा तो है तो अदरवाइज आप सेवा क्यों करेंगे? यदि ब्राह्मण ही ये कष्ट पा रहे हैं तो ब्राह्मण कष्ट पाए ना उससे मुझे क्या है? वो उनके पास में पावर है कष्ट पाने का कष्ट से मुक्त होने का। अब मुझे क्या टेंशन लेना है? जब कष्ट सही है, कष्ट का एक रियलिटी है और उसको मैं सर्व कर रहा हूं साधन के रूप में। देखिए कहेंगे कि साधना के रूप में हम कष्ट निवृत्ति कर रहे हैं। तो किंतु फिर वो यदि कष्ट निवृत्ति यदि सत्य नहीं है तो फिर यह साधन भी तो सत्य नहीं हुआ। वो तो झूठ-मूठ का मन को बहलाना हो गया। फिर तो आप सेवा करने को क्यों जाएंगे? कर्म योग ही करना है तो मिट्टी को काटिए वह पावड़े से और फिर जब गड्ढा हो जाए तो मिट्टी को भर दीजिए। निष्काम कर्म ही करना है तो गड्ढा कीजिए और गड्ढे को भर दीजिए। पक्का निष्काम कर्म हुआ। यह 10 दिन आप करेंगे 10 बार गड्ढा खोदा 10 बार गड्ढा भर दिया। आपके हाथ में कुछ नहीं आया। तो निष्काम कर्म करना है तो यह भी कर सकते हैं। हम क्यों लोगों की सेवा करने को जाएंगे? लोगों की एक सत्ता है। बोलकर के हम सेवा करेंगे। यह जो मां की जितनी भी स्नेहमय कहानियां है कहेंगे कि अरे यह तो मिथ्या है। मिथ्या के भीतर में यह सब कर रहे हैं। तो क्या है ना एक तरह का हमको निराशा हो जाती है कि मां भी क्या इस तरह का नाटक करती है। मां का जो हमारे प्रति स्नेह है क्या वो सिर्फ दिखावा मात्र है। दिखावा रूपी इस जगत में स्नेह भी दिखावा है। ऐसा हो जाता है। तो ठाकुर तो कह ही दिए हैं कि ब्रह्म शक्ति अभेद अर्थात कि यह जो जगत है जीव है उसका भी एक अस्तित्व है। ब्रह्मन के साथ में ही है किंतु उसका अस्तित्व है। तो फिर क्या है कि यह तो हम फिर से स्क्वायर वन पे आ गए। यदि जगत का अस्तित्व है तो फिर मैं क्यों नहीं उसका भोग करूं। तो इसीलिए जब हम यह कांसेप्ट डेवलप करते हैं ठाकुर का कोर फिलॉसोफी कि ब्रह्म शक्ति अभेद तो फिर जैसे यह सिक्के की एक साइड है सिक्के की दूसरी साइड जो है वो है काम कांचन त्याग जो है ना कि ईशा वास्यम इदम सर्वम यह सब कुछ जो है ई से व्यापत है तेन ततेन भंजीता माने उसका आनंद आनंद करो त्याग करके। यानी कि यह जो त्याग है यदि आप यह कहेंगे कि सब कुछ ईश्वर है, सब कुछ ब्रह्मन है तो साथ में ही त्याग को आपको उतना ही इक्वल पेडेस्टल पर रखना होगा। एक और यदि हम कहते हैं ब्रह्म शक्ति अभेद तो साथ में ही आपको काम कांचन त्याग कामिनी कांचन त्याग यह जो ठाकुर का महामंत्र है इसको कॉम्प्लीमेंटरी उसका उच्चारण करना होगा। बिना कामिनी कांचन त्याग के आप ब्रह्म शक्ति अभेद नहीं कर सकते हैं। शक्ति को आपको हायर पेडेस्टल पे ब्रह्मन के साथ में ही रखना है। ब्रह्मन का ही एक गियर चेंज करके शक्ति होता है। अह और गियर चेंज होता है। नहीं तो फिर यह स्थिर शांत जल और गियर चेंज होता है तो जल में तरंगे तो शक्ति को यदि उस पेडेस्टल पर रखना है तो शक्ति का भोग नहीं कर सकते हैं। शक्ति का अह कामना शक्ति के प्रति कामना वासना का त्याग करना होगा। यानी कि यह दो है कॉम्प्लीमेंट्री फिलॉसोफी है। यह तो कहेंगे कि एक ही कोर फिलॉसोफिकल फ्रेमवर्क है। इसके यह दो कॉम्प्लीमेंट्री दो साइड्स ऑफ द सेम कॉइन टू साइड्स ऑफ द सेम कॉइन है। ब्रह्मशक्ति भेद काम कांचन त्याग। तभी जो है कि यह जो ठाकुर जो कुछ भी कह रहे हैं यह वेदांत के साथ में धीरे-धीरे करके कंटिन्यूटी में आएगा। वरना यदि हम काम कांचन त्याग को इक्वल फुटिंग ना दें ब्रह्म शक्ति अभेद के साथ में तो फिर हम वही जो पुरानी कर्मकांड की जो पूरी थिंकिंग थी उसकी ओर चले जाएंगे। तो यह जो यदि इसको फॉर्मुलेट करना है ब्रह्म शक्ति अभेद काम कांचन त्याग इसको यदि फॉर्मुलेट करना है तो ब्रह्म सत्य जगत सत्य काम कांचन मिथ्या इस तरह से हम फॉर्मुलेट कर सकते हैं। सो सी कि ये दोनों को एक साथ में यदि रखेंगे तब ठाकुर का प्रॉपर फिलॉसोफिकल कोर जो है वो डेवलप होगा। ये फर्स्ट प्रिंसिपल है। फिर फर्स्ट प्रिंसिपल से बाकी का सब कुछ डिराइव होता है। अच्छा अभी ये तो हमने कुछ प्रिंसिपल्स डिस्कस किए। अभी ये जो पैसेज है ना अभी नेक्स्ट क्लास में हम इसको फिर से एक बार पढ़ेंगे और विद दिस इन माइंड ये जो हमने कोर प्रिंसिपल डेवलप किया है विद दिस इन माइंड फिर से उसके ऊपर में एक बार चर्चा अभी हम नेक्स्ट क्लास में करेंगे। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णारपणमस्तु

एक भक्त: पहले तो अंध भोगवाद आता है, त्यार बाद धर्म के आधार पे भोग, बाद में ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या, और अभी है ब्रह्म और जगत दोनों एक ही है. इस पुरे विकास में हम क्यों तमस में गिर गए?

देखिए स्वामी जी विदेश में जो कर्म योग सिखाते हैं और यहां पे आकर लेक्चर फ्रॉम कलंब टू अल्मोड़ा जो उनके लेक्चर सीरीज है जस्ट रीड रीड देम पैरेलल आसमान जमीन का फर्क दिखता है। अमेरिका में जो कर्म योग सिखाया है मच मोर बेस्ड ऑन गीता कि निष्काम कर्म करना चाहिए। इसमें आप गड्ढा कीजिए और गड्ढे को भर दीजिए। वो वो भी चलेगा। निष्काम कर्म करना है। किंतु भारत में आकर कहा है गड्ढा करके गड्ढा भरना इससे कोई लाभ हमको होने वाला नहीं। शिव ज्ञाने जीव की सेवा करो। व्हिच इज अ रेडिकल न्यू आईडिया। माने जो छोटा बच्चा होता है वो तो मिठाई को सही ही मानेगा। उसमें कोई प्रश्न ही नहीं है। उसका जो ब्रेन है वो अभी अनडेवलप है। मैच्योरिटी नहीं आई है। किंतु जब बड़ा होगा डायबिटीज होगा तब फिर वो एक मिथ्या की ओर चला जाएगा। किंतु जैसे-जैसे समय जाएगा विडम बढ़ता जाएगा तब पता चलेगा नहीं मिठाई सही है किंतु उसके साथ में अपना रिलेशन चेंज कर दो। देखिए वहां पर रैंपेंट मटेरियलिज्म है। स्वामी जी ने कहा कि वेल्थ की सर्वोच्च सीमा पर बैठे हैं। आजकल भी आप देखिए ना रैंपेंट मटेरियलिज्म सेंसुअल डिजायर्स को फुलफिल करना माने उसका पूरा जीवन जो है इसमें लगा है। अब साइंस वगैरह तो फिर भी ठीक है किंतु सेंसुअल डिजायर को फुलफिल करना दैट इज़ देयर माने पर्पस इन लाइफ। इसीलिए तो धर्म के आधार पर अर्थ काम ना वह हार्ड वर्क तो करते हैं दे डिर्व इट कि हार्ड वर्क किया है तो वी नीड अ रिवार्ड ऐसा तो नहीं है कि बिना काम करके चोरी लूटफाट करके यह सब करते हैं धर्म अर्थ काम डिर्व द डिजायर दैट यू वांट टू फुलफिल किंतु देखिए यह जो आपका एनालॉजी है ना वह अभी एग्जजेक्टली यहां पर नहीं अप्लाई होगा इस अर्थ में कि वहां पर मटेरियलिज्म है तो उनको यह बुद्धिज्म या तो फिर यह अजातिवाद या शंकराचार्य का मिथ्यात्व सिखाना है। दैट इज वेरी गुड। अभी यह नहीं है कि इंडिया इज फर्दर इवॉल्व बोलकर के ब्रह्म शक्ति अभेद वाला कांसेप्ट लाए हैं। इवॉल्व है इसलिए नहीं कि नेसेसिटी है। इसलिए यहां पे लाए हैं। माने यहां पे एक तरह से देखें तो स्वामी जी फर्दर नहीं जा रहे। स्टेप बैक कर रहे हैं। कि धर्म अर्थ काम का अनुष्ठान करो आप लोग तमस में से रजस में जाओ यह स्वामी जी सिखा रहा है सब टेक्स्ट इस के ऑफ कोर्स कि आपको काम कांचन त्याग करना है किंतु यदि आप शिव्ञान जीव सेवा का जो एकदम प्रचंड उपदेश जो स्वामी जी ने दिया उसमें इंप्लाइड है कि तमस में से रजस में आ जाइए भले आप भोग करके आइए किंतु करके आइए एक बार यहां पे और यह तभी होगा जब आप जगत को सत्य मानेंगे। राइट? जगत का आप भोग तभी करेंगे जब आप जगत को सत्य मानेंगे। सब टेक्स्ट है कि जगत को सत्य मान के कब कब मानना है? जगत के साथ में रिलेशन को ट्रांस मतलब ट्रांसफॉर्म करना है। व्हिच इज अ सबक्स्ट बट द ओवरऑल मैसेज इज के मटेरियलिज्म में आप आइए। आप अल्टीमेटली देखिए कि अब Google ने जितनी सेवा की है या एआईआई जितना कंट्रीब्यूशन कर रहा है रामकृष्ण मिशन के 1000 सेंटर भी हो जाए तो इस तरह का कंट्रीब्यूशन हम नहीं कर पाएंगे। आज एक नोबेल प्राइज विनर है वो जो एक एक हरित क्रांति ये जो अपना ग्रीन रिवॉल्यूशन आया यह जो अपना वाइट रेवोल्यूशन आया डॉक्टर कोरियन ने जो अमूल की रचना की रामकृष्ण मिशन ने उसमें से कुछ नहीं किया। स्कूल हॉस्पिटल हमने चलाई है तो ऐसी हजार स्कूल हॉस्पिटल है। व्हाट इज़ आवर यूनिक कंट्रीब्यूशन राइट? तो कंट्रीब्यूशन तो इन लोगों ने किया है। जो नोबेल प्राइज विनर्स है जो कि ये आजकल के सॉफ्टवेयर इंजीनियर्स हैं ये जो वर्ल्ड लीडर्स जो है दे आर डूइंग रियल कंट्रीब्यूशन। सो आप ये जो तमस में डूबे हैं वहां से आप कंट्रीब्यूशन के लेवल पर आइए। दैट इज स्वामी जी उनको लात मार के बताते हैं। बट सबटेक्स्ट इज कि कंट्रीब्यूशन करने के समय आप इंद्रियों के भोग के प्रति नजर मत रखिए। हायर एक नजर रखिए। कंट्रीब्यूशन करने से आपको ब्रह्म ज्ञान प्राप्ति होगी। दैट इज योर एम। नहीं कि आपको फिर अर्थ और काम मिलेगा कंट्रीब्यूशन करके। सो स्वामी जी इन अ वे स्टेप्स बैक एंड स्टेप्स फॉरवर्ड बोथ टुगेदर। क्योंकि देखिए हमारा प्रॉब्लम यही हो गया ना बहुत ज्यादा एक्सेसिव मटेरियलिज्म में डूब गए थे। मटेरियलिज्म से बचने के लिए जगत का मिथ्यात्व हमने प्रतिपादित किया। प्रॉब्लम यह हुआ कि जगत का मिथ्यात्व प्रतिपादित करके ज्ञान मार्ग से जो ब्रह्म साक्षात्कार करना है वह तो मुट्ठी भर लोगों ने किया। मैक्सिमम लोग तो तमस में डूब गए। अभी ये जगत को भारत को तमस में से निकालना है तो जगत का सत्यता साबित करना होगा। एट द सेम टाइम जो मुट्ठी भर लोग हैं जो कि ब्रह्म ज्ञान के पिपासु है उनके लिए भी एक पैरेलल मार्ग तैयार करना होगा। सो विद दिस आईडिया कि ब्रह्म शक्ति भेद काम कांचन त्याग विद दिस कॉम्प्लीमेंट्री सेट ऑफ आइडियाज दोनों सेटिस्फाई हो जाते हैं। जो कि ब्रह्म मार्ग के पिपासु है उनके लिए काम कांचन त्याग वाला एस्पेक्ट है और जो कि तमस में डूबे हुए हैं। उन लोगों के लिए ब्रह्म शक्ति अभेद है। राम अवतार में धोबी था। [हंसी] कहां से? रावण भी था, कंस भी था। ये लोग कहां से? कौरव? 100 कौरव थे। पांच पांडव देखिए ये जो परफेक्ट अपना रेश्यो है 100 * 5 [हंसी] देखिए एक एक लेवल पे ये रिकंसिलिएशन हुआ था इसीलिए तो चार पुरुषार्थ को साथ में कहा जाता है ना धर्म अर्थ काम मोक्ष ऐसा कहीं नहीं कहा गया कि ये जो फॉलोअ है कर्मकांड के धर्म अर्थ काम को स्वीकार करते हैं। ज्ञान कांड के जो फॉलोअ है वो सिर्फ मोक्ष मार्ग को पुरुषार्थ मानते हैं। ऐसा नहीं पुरुषार्थ तो चार पुरुषार्थ कहे गए हैं। गीता में देखेंगे कि समन्वय पूरा हुआ है। अनफॉर्चूनेटली क्या है कि यह जो समन्वय जो हुआ रिकंसिलिएशन जो हुआ वो सोसाइटी में स्प्रेड नहीं हुआ। दैट इज माय अंडरस्टैंडिंग। अदरवाइज ठाकुर जो कुछ भी कहते हैं, स्वामी जी जो कुछ भी कहते हैं, सब कुछ आपको गीता में डायरेक्ट मिल जाएगा। मोर और लेस आपको मिल जाएगा। फॉर्मुलेशन नया है किंतु गीता में सब कांसेप्ट्स एक साथ में मिलकर के पड़े हुए हैं। प्रॉब्लम यही है कि उसका स्प्रेड नहीं हो पाया। ये स्प्रेड अभी हमको आज करना है। देखिए मैं साइंटिस्ट हूं। यदि मैं भोग त्याग करके साइंस में अपने मन को लगाऊंगा वो साधना हो जाएगा। मैं सोल्जर हूं। भोग त्याग करके मैं देश की रक्षा करूंगा वो साधना हो जाएगा। वो मेरे लिए ब्रह्म ज्ञान का मार्ग है। मैं यदि राजनेता हूं भोग त्याग करके देश की सेवा करता हूं। वो मेरे लिए ब्रह्म ज्ञान का मार्ग है। मैं जो कुछ भी करता हूं ईच इज ग्रेट इन ह ओन प्लेस। स्वामी जी का जैसे है। मैं जो कुछ भी करता हूं झाड़ू वाला झाड़ू लगाता है निष्काम भाव से वो भी उसके लिए ब्रह्म ज्ञान का मार्ग है। टीचर शिक्षा देता है वो उसके लिए ब्रह्म ज्ञान का मार्ग है। सती पति की सेवा करती है। तो कितने ही ब्रह्मचारी आकर के उसको धमकी दे दे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। वही उसके लिए ब्रह्म ज्ञान का मार्ग है। [हंसी] वो जो कहानी है ना वो काकी बकी भस्म कराना है ना माने आप जो कुछ भी करते हैं आप निष्काम भाव से कीजिए। ईश्वर आराधना के रूप में कीजिए सब कुछ पूजा हो जाएगा।