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ओम स्थापक च धर्मस्य सर्व धर्मा स्वरूप अवतार वरियम कृष्णाय ठाकुर ब्रह्मा और शक्ति इसके बारे में जो कहते हैं उसी के बारे में यह जो ठाकुर का वह जो पूरा नक्शा हमको बताया ठाकुर ने आध्यात्म जीवन का कि पहले नेति नेति करने के बाद में हम लोग नेति नेति करके अर्थात कि यह जगत मिथ्या है यह मेरे भीतर में जितनी भी कामनाएं वासना है है वह मिथ्या है ऐसा करके करके जब हम त्याग करते हैं तब ईश्वर प्राप्ति होती है उसके बाद में यह पूरा जगत ईश्वर का बना हुआ है ऐसा करके हम वापस आके जगत को पूरा हम अपनी करुणा अपने प्रेम से प्लाविला सुनाते जगत को धन्य करते हैं तो इस घटना के ये पूरी जो घटनाक्रम है यह जो पूरा साधक का जीवन चरित्र है इसके बारे में स्वामी जी क्या कहते हैं स्वामी विवेकानंद तो उसके बारे में हम थोड़ा सा देखते हैं अ यह किताब है स्वामी शिष्य संवाद हमको पता है इस किताब के बारे में काफी बातें हुई है इसके जो रचयिता है शरद चंद्र चक्रवर्ती और वह स्वामी जी के बड़े ही प्रिय थे स्वामी जी के पास में आते थे जब स्वामी जी अमेरिका से लौट कर के वहां पर भारत में आए तब से उन्होंने स्वामी जी का संग किया है और स्वामी जी की महासमाधि तक वह स्वामी जी के पास में प्रत्येक कुछ ना कुछ दिनों में आते रहते थे तो उन्होंने स्वामी जी के साथ में जो वार्तालाप हुआ यह पार्टिकुलर टॉपिक का कि साधक जीवन का जो अल्टीमेट एक आउटलाइन क्या है साधक जीवन का नक्शा क्या है किस तरह से हम प्रगति करते हैं किस तरह से हम सिद्धि प्राप्त करते हैं और सिद्धि प्राप्त होने के बाद में क्या होता है इसी के बारे में स्वामी जी क्या कहते हैं उन्होंने यहां पर लिपिबद्ध करके रखा है तो यहां पर मैं उसको थोड़ा सा पढ़ता हूं स्वामी जी कहते हैं अभी पहले जो थोड़ा बहुत इसके बारे में वार्तालाप हो गया है उसको मैं थोड़ा सा स्किप कर देता हूं क्योंकि ऑलरेडी हमने काफी कुछ समझ लिया है इसके बारे में मैं डायरेक्ट जो वो जो रिलेवेंट पोर्शन है उसी से मैं प्रारंभ करता हूं स्वामी जी कहते हैं जगते जोतो घट आछ शब गुलो अच्छा यहां से पढ़ता हूं स्वामी जी कहते हैं वेद माने अनादि सतीर समष्टि वेद का अर्थ है जो अनादि सत्य है उसकी संपूर्ण ज्ञान राशि जितने भी हमारे ऋषि मुनि समय के प्रारंभ काल से सृष्टि के प्रारंभ से जो कोई उच्च आध्यात्मिक तत्व उन्होंने चिंतन किया उसके बारे में सोचा वह सब उन्होंने वेद रूपी पुस्तकों में लिपिबद्ध कर द र है वेद पारक ऋषि गण ई सकल सतो प्रत्यक्ष करे ले वेद के जितने भी सत्य है वेद में जो भी आध्यात्मिक घटना वली अनुभूति के बारे में कहा गया है वह ऋषि मुनियों ने उसको प्रत्यक्ष किया था अति इंद्रिय दर्शी भिन्न मतो साधारण लोक दृष्टि ते सेही शकल प्रत्यक होईना हम लोग जो कि हमारे पास में अतिंद्रीय शक्ति नहीं है सुपर कॉन्शियस शक्तियां नहीं है तो हम लोगों को यह सब वेद के निहित शक्तियों को समझने में अपने खुद की आंखों से देखने में संभव नहीं हो सकते अभी स्वामी जी अपने को सामान्य व्यक्तियों में गिनते हैं किंतु हमको पता है कि स्वामी जी को खुद को एक के बाद एक कितने दर्शन हुए थे तो स्वामी जी भले ही चाहे वह कहते हो कि हम जैसे सामान्य लोग वह सामान्य लोगों की कैटेगरी में हम आते हैं स्वामी जी नहीं तो हम लोग कि जिनके पास में यह सुपरकॉन्शियस विजन नहीं है जैसे कि महाभारत का युद्ध हो रहा था और वो धुत राष्ट्र को संजय बैठ कर के बोल रहा था कि अभी यह कुरुक्षेत्र में इस तरह से युद्ध हो रहा है यह इस तरह से हो रहा है वो हो रहा है तो वो जो टेलीविजन था उसका संजय का वो जो टेलीविजन किंतु इस जगत में था एक जगत से दूसरे जगत मतलब इसी पृथ्वी पर ही एक लोकेशन से दूसरे लोकेशन तक उनकी दृष्टि जाती थी टेलीविजन था किंतु यहां पर एक लोक से दूसरे लोक में दृष्टि जानी पड़ेगी करनी पड़ेगी वो जो सुपर कॉन्शियस विजन चाहिए उसके लिए जो कि समाधि या तो फिर जप ध्यान साधन भजन करके ही जो प्राप्त होती है तो वह हमारे पास में नहीं है ताई बदे ऋषि शब्द अर्थ मंत्रा दृष्टा पैता गोलाई ब्राह्मण नोई यह जो ऋषि लोग जो कि यह अति इंद्रिय सत्य को अपनी आंखों से देख सकते थे इसीलिए ऋषि को ऋषि शब्द की व्याख्या की है जो कि मंत्र दृष्टा है अर्थात कि यह मंत्र में जो विजन ग कहे गए हैं उन्होंने अपनी आंखों से प्रत्यक्ष देखे हैं पोइता गोला ब्राह्मण नहीं अर्थात कि ये जो वंश परंपरागत जो ब्राह्मण के घर में जन्म हुआ तो वो भी ब्राह्मण है अभी वो पैता अर्थात कि वो उपनयन पहन लिया और उपनयन पहन के फिर अभी वो जो चाहे वो वो करेगा उपनयन सेरिमनी का नाम पैता अर्थात की जनोई येय जनोई पहन कर के वो जो अभी अपने को कहलाएगा कि या मैं पंडित हूं ब्राह्मण हूं किंतु वो सिर्फ ब्राह्मण के घर में जन्म लिया है इसलिए ऋषि नहीं कहे जाएंगे वो सही सही मंत्र दृष्टा है जैसे कि ठाकुर का एक कोटेशन है कि यदि ब्राह्मण हरि नाम नहीं लेता है तो वह किस बात का ब्राह्मण और यदि शुद्र हरि नाम लेता है तो वह किस बात का शुद्र अर्थात कि हरि नाम नहीं लेने से कोई भी ब्राह्मण का कोई अधिकार नहीं हरि नाम लेने से किसी भी जात में घर किसी के घर में भी जन्म हुआ हो अपने को ब्रह्मण का वो पथिक कह सकता है ब्राह्मण कह सकता है ब्राह्मणा आदि जाति विभाग परे हुए लो यह ब्राह्मण के घर में जन्म लेने से ब्राह्मण होगा शुत्र के घर में जन्म लेने से शूद ही होगा वह सब बाद में हुआ था वेद शब्दा क्मक अर्थात भावात्मक अनंत भाव राशिर समष्टि मात्रा वेद ये जितने भी भाव है आध्यात्मिक भाव राज्य के जितने भी विचार है जितने भी आइडियाज है उन सबका कलेक्शन मात्र है शब्द पदर वैदिक प्राचीन अर्थ होचे सुख भाव जा परे स्थूला का ग्रहण परे निजे के प्रकाशित करें अर्थात कि वेद में शब्द एक सूक्ष्म विचार के रूप में है एक आइडिया के रूप में है जो कि बाद में स्थूल स्वरूप ग्रहण करता है जैसे कि गाय शब्द है तो शब्द वेद में कहा गया तो यही शब्द आखिर में स्थूल रूप से गाय बनकर के प्रकट हुआ सतरा जखन प्रलय होए तखन भावी सृष्टि सुख बीज समूह बद संपुटित थाके अर्थात की जब प्रलय होता है त भावी सृष्टि के जितने भी बीज है वह सब वेद में समाहित हो जाते हैं ताई पुराणे प्रथमे मीन अवतारे वेदर उद्धार सृष्टि होए उधार दृष्ट होए अर्थात की इसीलिए जब प्रलय के बाद में फिर से सृष्टि की रचना होती है तो मीन अवतार के रूप में प्रभु प्रकट होकर के सर्वप्रथम वेद का उद्धार करते हैं प्रथमा अवतारे वेदर उद्धार साधन होलो ईश्वर के प्रथम अवतार में ही वेद का उद्धार सार्थक हुआ ईश्वर ने प्रथम अवतार ग्रहण करके सर्वप्रथम वेद का ही उ ार किया तार पर सेही वेद थे के क्रम सृष्टि विकास होते लागलो उसके बाद में उसी वेद में से सृष्टि का विकास होने लगा अर्थात वेद निहित शब्द अवलंबन विश्वे सकल स्थूल पदार्थ एके एके तेरी होते लाख अर्थात की वेद में जितने भी शब्द रचित है उस शब्दों में से स्थूल रूप ग्रहण करके धीरे-धीरे करके सृष्टि की रचना होने लगी कारण सकल स्थूल पदार्थ रेही सुख रूप शब्द सुख रूप होचे शब्द बा भाव अर्थात कि जितने भी स्थूल पदार्थ है उन सबका सूक्ष्म रूप है शब्द या तो फिर भाव यह ऐसा है मान लीजिए अभी आज की जद थोड़ा सा मॉडर्न एग्जांपल इसका दिया जाए तो यह जैसे देखिए कि कंप्यूटर में एक प्रोग्राम है प्रोग्राम है एक किसी एक घड़ी बनाने का का ठीक है अभी मैंने घड़ी बनाने का पूरा नक्शा कि इस तरह से घड़ी बनेगी इस तरह से घड़ी के जो गियर है व गियर बनेंगे फिर इस तरह से घड़ी का जो कांटा है वह जो मिनट एंड ववर एंड और सेकंड हैंड वो जो वो बनेंगे और फिर इस तरह से उसका डायल तैयार होगा वगैरह वगैरह पूरा नक्शा बना कर के मैंने कंप्यूटर में डाल दिया अभी इस कंप्यूटर के साथ में मैंने एक 3डी प्रिंटर अटैच कर दिया अभी जैसे ही मैं 3d प्रिंटर ऑन करूंगा ये कंप्यूटर क्या करेगा यह जो घड़ी का जो नक्शा है वो 3डी प्रिंटर को भेजेगा और यह 3डी प्रिंटर इस घड़ी को प्रिंट करेगा यदि आप लोगों को 3डी प्रिंटर यदि पता है तो वो आजकल का एक नया टेक्नोलॉजी है डी प्रिंटर अर्थात की ये पेपर पे जो प्रिंट होता है और 3डी प्रिंटर अर्थात कि एक्चुअल एक कोई पदार्थ वो प्रिंट करता है तो ये ऐसे ही यह वेद के भीतर में जितने भी शब्द है वो सब शब्द एक एक नक्शे के रूप में ब्लूप्रिंट के रूप में डीएनए के रूप में वेद के भीतर है इसी डीएनए या ब्लूप्रिंट को धीरे-धीरे करके मटेरियल इज करके ही सृष्टि की रचना होती है गाय का गाय शब्द का डीएनए या तो ब्लूप्रिंट वेद के भीतर में है ये आम का पेड़ है उसका डीएनए या ब्लूप्रिंट वेद के भीतर में है यह जो वटवृक्ष है उसका अश्वत्थ का जो वृक्ष है घोड़ा है फिर यह पशु पंखी है मनुष्य है यह पूरा जो विश्व ब्रह्मांड है कि हां यह सोलर सिस्टम है यह गैलेक्सी है यह इलेक्ट्रॉन है यह न्यूट्रॉन है यह प्रोटॉन है जितने भी पदार्थ इस जगत में है उन सबका ब्लूप्रिंट वेद के भीतर में है और सृष्टि के प्रारंभ में इसी वेद में रहे हुए इस ब्लूप्रिंट में से जिसको कि स्वामी जी शब्द या भाव दो शब्दों से वर्णित करते हैं तो इसी शब्द या इसी भाव में से इस सृष्टि की रचना होती है एक कथा वैदिक संधार मंत्र आ यह बात वेद के जो संध्या मंत्र है जो ब्राह्मण होते हैं वे लोग प्रतिदिन संध्या आरती कर संध्या करते हैं वह एक प्रकार की एक विधि है तो उसी के मंत्र में है वह क्या कहते हैं मंत्र सूर्या चंद्र मस धाता यथा पूर्वम कल्प दिव्य पृथम चांतर क् मथ स्वः पूज ली अभी इसका अर्थ क्या है स्वामी जी ने नहीं बताया और मुझे भी पता नहीं तो किंतु जो भी है इसको एक बार देखेंगे कभी किंतु इस मंत्र के द्वारा अच्छा इस मंत्र का जो मैं यदि अर्थ करता हूं तो ऐसा होगा सूर्य चंद्र मसौधा आता यथा पूर्वम अकल्प यत पूर्वम अकल्प पूर्वम कल्प अर्थात कि पूर्व कल्प में जो सूर्य चंद्र वगैरह थे इस कल्प में भी उसको उसी तरह से उसकी रचना की है दि वंच पृथ्वी चा अंतरिक्ष मथ सह पृथ्वी और अंतरिक्ष भी इसी तरह से पूर्व पूर्व कल्प में जिस तरह से थे इसी कल्प में भी इसकी उसी तरह से रचना हुई है यह संध्या मंत्र में है जो लोग ब्राह्मण होंगे जो लोग संध्या करते होंगे उनको पता होगा अच्छा अभी जब स्वामी विवेकानंद ने यह बात कही तो उसके उत्तर में अभी यह जो शरद चंद्र अच्छा स्वामी जी का ऐसा है कि जो जिस के मन में एक संदेह स्वामी जी को हजरा क्यों पसंद था हजरा का स्टोरी भी एक बड़ा एक फनी स्टोरी है हजरा ठाकुर के घर के सामने रहता था वो ठाकुर का घर का जो बरामदा था वहीं पर रहता था बैठता था वहां पे एक पीतांबरी पहनता था और वो मंत्र जप करता रहता था और ठाकुर को और अपने को फिर ठाकुर से भी सुपीरियर समझता था कभी-कभी कि देखो मैं तो सब समय जप करता रहता हूं ठाकुर ना की किसके किसके घर जाते हैं किसके घर प खाके आते हैं नात जात का विचार नहीं करते और ये राखल वगैरह जो लोग है सब हो हो करे बेड़ा है वो हाजरा कहता है अर्थात कि हल्लागुल्ला करके घूमते रहते हैं ज ध्यान तो कोई करता नहीं ऐसा एक सुपीरियोर कॉम्प्लेक्शन हजरा के पास में जाकर के बैठा रहता था नरेण अर्थात स्वामी विवेकानंद भविष्य के तो नरेद हजरा के पास में जाकर बैठा रहता था काफी गल लगाता था क्यों क्योंकि हजरा सहज ही कोई भी चीज को मान नहीं लेगा उसको कोई भी कुछ भी कहेगा कि पुराण में ऐसा लिखा है वेद में ऐसा लिखा है तो वो सामने 10 प्रश्न करेगा कि अच्छा यह बुद्धि से तो ठीक नहीं लग रहा है लॉजिक लगा करके देखते हैं तो इलॉजिकल लग रहा है इंटेलेक्चुअल नहीं लग रहा है तो उसमें पीछे में कुछ ना कुछ गड़बड़ है तो 10 प्रश्न करेगा स्वीकार करने से पहले तो उसका ये जो संश करके मूर्ख की तरह सब कुछ निगल नहीं लेना वो स्वामी जी को बड़ा पसंद था तो यहां पर भी य शरत चंद्र का है कि स्वामी जी कुछ भी कहेंगे तो उसके सामने वो काउंटर प्रश्न करेगा आर्गुमेंट करेगा फिर स्वामी जी और ये आर्गुमेंट करते करते ही जो सूक्ष्म तत्व है वो बाहर आते हैं वरना तो क्या होता है पता है कि हमने कोई एक बात कह दी किसी एक गुरु ने तो अभी शिष्य यदि सामने प्रश्न नहीं करेगा 10 प्रश्न तो यह जो प्रत्येक बाद का जो बुढा अर्थ होता है वो प्रकट नहीं होता गुरु को पता नहीं चलेगा कि अच्छा मैंने जो बताया उसका जो असर है वह शिष्य के ऊपर में या तो श्रोत वृंद के ऊपर में कितना हो रहा है क्योंकि वेद तो अनंत है आध्यात्मिक जगत भी अनंत है ठाकुर मा स्वामी जी की कहानियां भी अनंत है तो यदि आपने सिर्फ एक बार बोल कर के छोड़ दिया और श्रोताओं ने सिर्फ आंख बंद करके एक बार सुन लिया तो इसके बाद में जदी जो वक्ता है उसके भीतर में जो और भी डीपर आइडियाज और और भी ज्यादा डीपर एनालिसिस करने की यह जो कैपेसिटी है वह प्रकट नहीं होगी तो यह जो शरद चंद्र थे वह इसी तरह के एक शिष्य थे वह प्रति प्रश्न करेंगे स्वामी जी के ऊपर में स्वामी जी को कहेंगे किंतु महाशय वेद में तो ऐसा लिखा है उपनिषद में तो ऐसा लिखा है आप ऐसा क्यों कह रहे हैं इसलिए स्वामी जी फिर जोर से फिर काउंटर आर्गुमेंट करना शुरू करेंगे तो इससे क्या होता है कि स्वामी जी के मन के जितने भी गहन विचार हैं हमारे सामने प्रकट होते हैं जैसे नरेंद्र ठाकुर के सामने प्रश्न करके ठाकुर के मन की सब बात निकल वाता था जिस तरह से निद स्वामी जी को प्रश्न करती थी वैसे ही शरद चंद्र भी स्वामी जी को प्रश्न करता है तो अभी यह शरद चंद्र पूछता है किंतु महाशय कोनो जिनिस नाथा कीले कहार उद्देश शब्द प्रुक तो हो देखिए बड़ा ही इंपोर्टेंट प्रश्न है यदि कोई भी चीज नहीं होती है सृष्टि के प्रारंभ में सृष्टि का प्रारंभ हुआ अर्थात कि सृष्टि है ही नहीं बस एक नाद ब्रह्म जैसा कुछ प्रकट होगा सामने कुछ नहीं है तो यह जो शब्द प्रयोग है आप किके ऊपर में करेंगे किसको आप शब्द सुनाएंगे आर कहार उद्देश्य शब्द प्रयुक्त होवे आर पदार्थ नाम शकोल बा की कोरिया तेरी होवे बस जितने भी पदार्थ है उसके नाम किस तरह से तैयार होंगे किसको आप यह शब्द सुनाएंगे किस पदार्थ में से सृष्टि की रचना होगी या जो शब्द है वेद में लिखे हुए वो शब्द ही ऑटोमेटिक व स्थूल स्वरूप धारण कर लेंगे जैसे कि डी प्रिंटर का मैंने उदाहरण दिया तो डी प्रिंटर में भले ही चाहे नक्शा कंप्यूटर के भीतर में हो यदि आपको कोई भी चीज को 3डी प्रिंट करना है तो आपको कोई मटेरियल चाहिए सेरामिक है या प्लास्टिक है ना कि मेटल है ऐसा कोई पदार्थ चाहिए जिसको यूज करके जो 3डी प्रिंटर है उसको वो शेप देता है घड़ी के रूप में अब ये जो प्लास्टिक का एक बॉल जैसा कुछ नहीं है प्लास्टिक की रस्सी जैसा जिसको कि वो घड़ी के शेप में वो डी प्रिंटर ना डाल सके तो वो वो तो एक चाहिए मैटर तो चाहिए जिसमें से वो पदार्थ ब्लूप्रिंट जो है उसका पदार्थ में कन्वर्जन हो तो अब शब्द प्रयोग किसके ऊपर में करेंगे ऐसे बड़ा ही सुंदर प्रश्न किया है उसके उत्तर में स्वामी जी कहते हैं आपात तो ताई मने होई बटे ऊपर ऊपर से देखने से लगता है कि हां यदि सृष्टि के प्रारंभ में ब्रह्मांड पूरा शून्य ही है समय और अवकाश भी अभी प्रारंभ नहीं हुए तो शब्द प्रयोग आप किसके ऊपर में करेंगे किस चीज से यह ब्रह्मांड प्रारंभ होगा यह ऊपर ऊपर से देखने से ऐसा लगता है सही किंतु बोझो किंतु समझो एक घट भे गले घट नाश होई की यह जो घट है जैसे कि एक घड़ा है मिट्टी का वो घड़ा यदि टूट जाता है तो घड़ा का जो कांसेप्ट है कि हां मिट्टी को पानी में डाल कर के उसको वो नरम कर कर के इसको घट का एक आकार दे सकते हैं इस नरम घट को सूरज में में तपा करके इसको कठिन बना सकते हैं फिर इस घट के भीतर में हम पानी भर सकते हैं यह जो आइडिया है वो आईडिया क्या गायब हो जाएगा घट जद टूटेगा तो घट के पीछर में जो आईडिया है जो विचार है वो क्या टूट जाएगा नहीं जद यह किताब फट गई यह किताब नष्ट हो गई तो किताब बनाने की टेक्नोलॉजी किताब बनाने का जो पूरा हिस्ट्री है वो क्या नष्ट हो जाएगा नहीं किताब का आईडिया तो रहेगा भले ही चाहिए यह पर्टिकुलर किताब नष्ट हो जाए ना ऐसा होगा नहीं केनो घट हो स्थूल किंतु घटता हो कटेर सूक्ष्म बा शब्दावु है किंतु घट के पीछे का जो विचार है जो टव है वह है सूक्ष्म या तो फिर शब्द ई रूपे शकल पदार्थ है शब्दा वस्था हो ई जिनी सक्षम अवस्था प्रत्येक चीज जो यह चाहे यह कंप्यूटर हो यह चाहे लाइट हो ना कि यह वाटर फिल्टर मशीन हो ना कि यह पानी हो न किय समुंदर हो न किय टेबल हो यह वस्त्र हो यह चश्मे हो जो कुछ भी कहो जगत में इन सबका सूक्ष्म विचार शब्द के रूप में तो रहेगा ही रहेगा आर आमरा देखी सुनी धरी छई जिनिस सेग हो रूप सुख बा शब्दा अवथा अवस्थित पदार्थ सले स्थूल विकास भले ही चाहे यह चश्मे का विचार वेद में हो और जिसको मैं स्पर्श कर सकता हूं जिसको मैं पहन सकता हूं वह चश्मे जो है उसका स्थूल स्वरूप है यह जो वस्त्र है वस्त्र का विचार या तो शब्द वेद में है उसका स्थूल स्वरूप जिसको कि मैं धारण कर सकता हूं जेमन कार्ज आर तार कारण जैसे कि कार्य और उसका कारण जैसे दूध में से दही बनता है तो वैसे ही कार्य और कारण जगत ध्वंस होए गले हो जगत बोधात्मक शब्द वा स्थूल पदार्थ सकले सुख स्वरूप समूह ब्रह्मे कारण रूपे थाके जगत ध्वंस हो जाने के बाद में भी जगत का जो विचार है वह सूक्ष्म रूप से ब्रह्म के भीतर में रहता है बहुत ही इंपोर्टेंट स्टेटमेंट है हम लोग समझते हैं कि ब्रह्म में किसी तरह का विकार नहीं ब्रह्म में किसी भी तरह का अ ब्रह्म किसी दो तीन चीजों का समूह नहीं है ब्रह्म तो एक मात्र है क्योंकि जो दो तीन चीजों के मिश्रण से बना होता है उसमें विकृति आ सकती है किंतु जो एक मात्र है जिसमें किसी भी तरह की विकृति नहीं आ सकती अटल अचल निष्क्रिय सुमेरु वत जिसको कहा जाएगा तो यहां पर स्वामी जी कहते हैं किंतु ब्रह्म के भीतर में सूक्ष्म रूप से विचार रहेंगे जगत विकास प्रा काले प्रथमे सुखो स्वरूप समूह समष्टि भूतो ई पदार्थ हो उद्वेलित होए उठे जगत के विकास के प्रारंभ में ही यह जितने भी विचार है जितने भी शब्द है उद्वेलित होए उठे अर्थात कि यह मंथ मंथन होकर के वो प्रकट होते हैं एवं तारे ही प्रकृत स्वरूप जैसे कि ये समुद्र मंथन किया उसमें से कैसे वह अमृत प्रकट हुआ वैसे ही ब्रह्म को मंथन करके यह विचार उसमें से प्रकट होते हैं एवं तार प्रकृत स्वरूप शब्द गर्भम अनादि नाद ओंकार आपना आपनी उठते थाके और उसी के परिणाम से शब्द गर्भ अर्थात कि मूल शब्द जो है ओमकार उसका नाद अपने से प्रारंभ हो जाएगा क्रम ई समष्टि होते एक एकटी विशेष विशेष पदार्थ प्रथम सुख प्रतिकृति बा शाब्दिक रूप और परे स्थूल रूप प्रकाश पाय और बाद में धीरे-धीरे करके एक के बाद एक जितनी भी चीज वस्तुएं हैं उसका सूक्ष्म रूप इस ओमकार नाद से प्रकट होता है और फिर वही सूक्ष्म रूप स्थूल रूप में परिणत होता है मैंने एक प्रश्न यदि हो सकता था कि जगत में जितनी भी सारी चीजें हैं जो कभी भी इन्वेंट होगी वो सभी चीजों का शब्द स्वरूप क्या ब्रह्म में विभिन्न रूप से अलग करके स्टोर रहेगा तो स्वामी जी यहां पर करते हैं शब्द गर्भ रूप ओमकार नाथ अर्थात की आदि शब्द जो है वह आदि शब्द ओमकार उसका नाद सर्वप्रथम प्रारंभ होगा और फिर इसी ओमकार ओमकार नाद से ही बाकी सब बाकी सब शब्द प्रकट हो ई शब्द ब्रह्म ब्रह्म शब्द वेद शब्द ही ब्रह्म है शब्द ही वेद है अभी शब्द को ब्रह्म करके स्वामी जी ने कहा है वो किस हिसाब से वो मुझे समझ में नहीं आता बड़ी उच्च कक्षा की यह बात है किंतु हम लोग मान लेते हैं कि स्वामी जी ने कहा है जो ओमकार नाथ रूपी जो शब्द था वही ब्रह्म है और यह जो आदि शब्द जो है वही वेद के रूप में धीरे-धीरे करके परिणत होता है इहा शायने अभिप्राय शायन यण बोलकर के एक महा ऋषि थे और जिस तरह से शंकराचार्य ने उपनिषदों का उद्धार किया वैसे ही सायण ऋषि ने उन्होंने वेद का उद्धार किया है वेद के ऊपर में टिकाए लिखी है जिस तरह से वह अपना वैदिक युग था सत्य युग था उसके अंत में जिस तरह से बुद्धिज्म का प्रारंभ हुआ यह महाभारत का युद्ध वगैरह जो सिविल वॉर ये जो बाह्य आक्रमण वगैरह प्रारंभ हुए तो वेद भी जैसे कि अदृश्य हो गए थे लुप्त हो गए थे तो ये सायनाचार्य ने वेद का उद्धार किया था वो कहा जाता है साउथ के किसी राज्य में वह मंत्री थे राजा के और फिर उन्होंने उसी पद पर रहकर ना कि पद से रिटायर होकर के वेदों की ऊपर में टिका लिखी है जो भी है वो डिटेल मुझे पता थी एक समय इनकी पूरी कहानी अभी मैं भूल गया हूं तो वही यह सायनाचार्य का यह अभिप्राय है अभी शिष्य कहता है किंतु महाशय भालो भूषित पारित छिना महाशय आप जो कहते हैं मुझे ठीक-ठीक समझ में नहीं आ रहा है और य शिष्य ऐसा कहता है अच्छा ही है क्योंकि यदि शिष्य प्रश्न करेगा तो स्वामी जी और डिटेल में बोलेंगे और डिटेल में बोलेंगे तो हम भी थोड़ा अच्छे से समझ पाएंगे तो अच्छा स्वामी जी डिटेल में कहते हैं स्वामी जी कहते हैं जगते जोतो घट सबलो नष्ट होले घट शब्द ते ज पारे ता तो बुझे जगत में जितने भी घट है सभी घट जद टूट जाए तो घट के पीछे का जो विचार है और शब्द है वो रह जाएगा यह तो तुम समझ सकते हो जैसे कि जैसे कि डायनोसर सबसे बड़ा उदाहरण है डायनोसोर एक समय था कि पृथ्वी पर डायनोसोर चलते थे तो अभी एक वो जो एक उल्कापात हुआ एक मेटराइड एक इंपैक्ट हुआ एस्टेरॉइड का पृथ्वी पे और उसी में से जो महा भयानक विनाश पृथ्वी पे हुआ उसी में यह डायनोसोर का एक्सटिंक्शन हो गया उनका विनाश हो गया तो अभी आज हमारे पास में डायनोसोर की ये हड्डियां है एक एक्सक वेशन करके वो मिलती है तो भले ही चाहे डायनोसोर अपने से समाप्त हो गए किंतु डायनोसोर क्या थे डायनोसोर किस जीनस किस स्पेसस का नाम था वो विचार तो अभी भी हमारे पास में है वो विचार तो रहेगा तो वैसे ही घट जितने भी है उन सबका एक्सटिंक्शन भले हो जाए घट रूपी शब्द तो रहेगा और डायनोसोर के बारे में हमको तभी पता चला जब हमने एक्सक वेशन करके डायनोसोर की हड्डियां खोजनी प्रारंभ की अभी किंतु यहां पे मनुष्य के नॉलेज की बात नहीं है मान लीजिए कि हमको एक्सक वेशन में डायनासोर की एक भी हड्डी नहीं मिलती तो हम ने डायनासोर के बारे में कभी सोचा ही नहीं होता ऐसे बहुत सारे प्राणी है जो कि इवोल्यूशन की ये जो 4 बिलियन ईयर 4 बिलियन ईयर अर्थात कि 400 करोड़ साल का जो पृथ्वी पे 100 करोड़ साल का 1 बिलियन ईयर अ ऑर्गेनिस्ट म पृथ्वी पे आया है पृथ्वी का जीवन है 4 बिलियन ईयर का अर्थात कि 400 करोड़ साल पहले पृथ्वी का गठन हुआ था उसमें से 1 बिलियन ईयर पहले अ जीवन यहां पे प्रारंभ हुआ है तो 1 बिलियन ईयर का जो इवोल्यूशन है उसमें तो कितनी ही स्पेसस आज एक्सटिंक्ट हो गई होगी जो कि हम जिसके बारे में उस उन्होंने कुछ भी पीछे में नहीं छोड़ा किसी भी तरह के एविडेंस किसी भी तरह की हड्डियां कुछ भी पीछे में नहीं छोड़ा तो उसके बारे में आज हमको नहीं पता किंतु वेद को तो पता है वेद में तो वह शब्द रूप में आइडियाज के रूप में रहेगा ही रहेगा तो वैसे ही घट जितने भी है भले ही चाहे टूट जाए उसके पीछे का विचार है वो तो रहेगा इतना तो तुम स्वीकार कर करते हो तबे जगत धंस होले हो बा ज सब जिनिश कुलो के निय जगत श गुलो सब भे चोरे गले हो तत्व बोधात्मक तत्व बोधात्मक शब्द गली केनो ना ते पारवे जितनी भी चीजें है टूट जाएगी किंतु उनके पीछे के शब्द है व क्यों नहीं रहेंगे आर्ता के पुनः सृष्टि केन बान होते प और जो शब्द रह गए वो जब सृष्टि स्थिति प्रलय की साइकल समा होगी और प्रलय के समय जितने भी शब्द है वेद में रहेंगे नई सृष्टि के प्रारंभ के समय ईश्वर सर्वप्रथम अवतार लेकर के सर्वप्रथम वेद का उद्धार करेंगे वेद में से ये ओमकार नाद शब्द गर्भ रूपी ओमकार नाद प्रारंभ होगा और उसमें से बाकी सब शब्द प्रकट होंगे और उसमें से पूरी सृष्टि प्रारंभ होगी ऐसा क्यों नहीं होगा देखिए आज की यदि लैंग्वेज में इसको थोड़ा सा मॉडिफाई करके कहा जाए एक समय था कि माना जाता था कि यह गाय हो घोड़ा हो पशु हो पक्षी हो अश्वत्थ का वृक्ष हो वट वृक्ष हो मनुष्य हो सब कुछ एक ही साथ में प्रकट हो गए हैं जैसे कि बाइबल में कहा जाता है कि भगवान ने इच्छा की कि सृष्टि का प्रारंभ हो तो पूरी सृष्टि आज जिस तरह से दिखती है एगजैक्टली उसी तरह प्रारंभ हो गई है किंतु मॉडल साइंस तो कहता है कि सृष्टि का इवोल्यूशन हुआ है दोनों तरह से ऑर्गेनिक इवोल्यूशन भी हुआ है कॉस्मिक इवोल्यूशन भी हुआ है कॉस्मिक इवोल्यूशन किस तरह से कि पहले तो ये बिग बैंग एक्सप्लोजन हुआ उसमें से ये फिर मैटर और एनर्जी प्रकट हुए फिर ये मैटर अर्थात की इलेक्ट्रॉन प्रोटॉन न्यूट्रॉन और उससे पहले स्ट्रिंग होगी या जो कुछ भी होगा तो उसके स्ट्रिंग में से पहले इलेक्ट्रॉन प्रोटॉन न्यूट्रॉन हुए फिर ये जो एटॉमिक पार्टिकल है वो मॉलिक्यूल उस उन्होंने बनाए फिर उसी मॉलिक्यूल में से ये पूरा स्टार्स है प्लेनेट है गैलेक्सी है ये हाइड्रोजन लिथियम जितने भी पदार्थ है जो भी सृष्टि है वो प्रकट हुई फिर पृथ्वी ग्रह के ऊपर में धीरे-धीरे करके बायोलॉजिकल इवोल्यूशन प्रारंभ हुआ कि इन ऑर्गेनिक मैटर धीरे-धीरे करके ऑर्गेनिक मैटर में प्रकट हुई और ऑर्गेनिक मैटर धीरे-धीरे करके मछली के रूप में फिर जलचर स्थल चर अर्थात कि पानी में चलने वाले पशुओं के रूप में फिर पृथ्वी जमीन पर चलने वाले पशुओं के रूप में और उसमें से बंदर फिर उसमें से इवोल्यूशन होकर के ए और एक में से मनुष्य तो आज हम ऐसा नहीं मानते कि चलो किसी ने जादुई छड़ी घुमाई या कोई एक चमत्कार हुआ तो पूरी सृष्टि एक साथ में बन गई आज हम सृष्टि के बारे में बड़ा ही कॉम्प्लिकेटेड नुआंस व्यू धरा हैं कि सृष्टि का इवोल्यूशन हुआ है तो किंतु आप देखिए कि यदि आप बोलते हैं इवोल्यूशन शब्द यूज करके क्या वेद मिथ्या हो जाएंगे बाइबल को तो उन्होंने रिजेक्ट कर दिया कि बाइबल में जो लिखा है वो सब मॉडल साइंस के साथ में मैच नहीं होता किंतु वेद का ऐसा नहीं है जैसे कि हमने कॉस्मो मैक्रोकॉस्म और माइक्रो कजम स्वामी जी की ये दोनों प्रवचन में देखा था स्वामी जी ने कहा था कि जद यदि हम लोग इवोल्यूशन कर स्वीकार करने को तैयार है यदि आप इवोल्यूशन स्वीकार करें इवोल्यूशन क्या है कि एक बार पृथ्वी की रचना हो गई उसका अभी प्रलय होगा प्रलय के समय ये जो पूरा विश्व ब्रह्मांड का नक्शा है डीएनए है या तो फिर ब्लूप्रिंट है वो ब्रह्मण के रूप में सूक्ष्म होक के रहेगा फिर जब नई सृष्टि का प्रारंभ होगा तो यही डीएनए धीरे-धीरे करके अनफोल्ड होगा इवोल्व होगा नई सृष्टि के रूप में तो वेद और इवोल्यूशन या मॉडर्न कॉस्मोलॉजी मॉडर्न बायोलॉजी के साथ में किसी भी तरह का क्लेश नहीं है यहां पर स्वामी जी उसी बात को थोड़ा सा ट्रेडिशनल रूप में कहते हैं जो मैक्रो कजम और माइक्रो कजम में स्वामी जी ने जो कहा था विदेशी ऑडियंस के सामने कहा था यहां पे जो स्वामी जी कहते हैं वो अपने देशी ऑडियंस के सामने कहते हैं तो और ज्यादा वैदिक और ट्रेडिशनल शब्दों का ज्यादा प्रयोग करते हैं वहां पर जद वेद शब्द ये ये जो सब शब्द प्रयोग किए होते हैं तो वो विदेशी लोग बोलते कि क्या ये उल्टा पुल्टा सिखा रहे है तो वहां पर स्वामी जी ने साइंस को लेकर के उदाहरण दिया था यहां पर बिकॉज की शरद चंद्र चक्रवर्ती ब्राह्मण है वेदों का थोड़ा अभ्यास किया है तो वैदिक शब्दों से कहते हैं किंतु आईडिया वही है इवोल्यूशन और इवोल्यूशन प्रलय और सृष्टि यह दोनों चक्रा का में चलता रहता है साइकल की तरह सृष्टि होगी वेद में से शब्द नाद प्रकट होगा उसमें से सूक्ष्म शब्दों में से स्थूल चीजें प्रकट होगी फिर जब प्रलय होगा तो जितनी भी स्थूल चीजें हैं घट है पट है ये वस्त्र है ये चश्मे है ना कि मनुष्य है ना कि गाय है हाथी है सांप है पक्षी है जो कुछ भी है वो वही ओमकार में मिलित हो जाएंगे ओमकार वेद में मिलित हो जाएगा वेद हो सकता है ब्रह्मण में मिलित हो जाए फिर जब सृष्टि का नए सिरे से प्रारंभ होगा ब्रह्मण या ओमकार की ब्रह्मण में से ये ओमकार का नाद प्रकट होगा ओमकार में से बाकी सब सूक्ष्म डीएनए अनफोल्ड होना शुरू होंगे और डीएनए या तो सूक्ष्म शब्दों में से स्थूल सृष्टि प्रकट होगी तो ये एक सुंदर साइक्लिकल रचना स्वामी जी ने बताई थी अभी किंतु देखिए कि शिष्य क्या प्रश्न करता है किंतु महाशय घोट घोट बोलिया चित्कार करी ले तो घट तेरी होई ना कहता है कि महाशय ये घट घट ऐसा चित्कार करते रहेंगे चिल्लाते रहेंगे उसमें से तो घट तैयार नहीं होगा तो स्वामी जी उत्तर देते हैं तुई आमी ओई रूपे चित्कार करले होए ना तुम और मैं जद बैठ कर के चिल्लाए घट घट करके तो यह घट तैरी हो जाए तो होने वाला नहीं है किंतु सिद्ध संकल्प ब्रह्म में घट स्मृति होवा मात्र ट प्रकट होए सिद्ध संकल्प ब्राह्मण के भीतर में घट की स्मृति प्रकट होने से ही सूक्ष्म घट में से स्थूल घट प्रकट होता है सामान साधक इच्छा जोख नाना घटन अटन होते पारे तोन सिद्ध संकल्प ब्रह्मे क्या कथा यदि कोई एक सामान्य साधक है वह कोई संकल्प करता है तो वह संकल्प सिद्ध हो जाता है तो फिर सिद्ध संकल्प ब्रह्म है उनके बारे में तो बात ही क्या है कोई साधक होता है यदि किसी को आशीर्वाद दे देते हैं तो देखिए कि आशीर्वाद फलते हैं क्योंकि उस साधक ने तपस्या की है तपस्या का बल इसके पीछे में रहता है साधक यदि किसी को श्रप भी दे देता है तो श्राप भी फलेगांव का फल बल शक्ति उसके पीछे रहेगी तो जद एक सामान्य साधक के श्राप या आशीर्वाद या इच्छा मात्र से सब चीजें होती है अभी ये स्वामी जी के बारे में ही हमने देखा कुछ ही दिनों पहले की बात है कि स्वामी जी यहां पे बेलूर मठ में बैठ कर के बोलते हैं कि जदिया के महाराजा ना कि ऐसा कोई एक बड़े महाराजा कलकाता की मुलाकात के लिए आए थे वो यदि मठ में आ जाए तो मैं मानूं कि हां ठाकुर सही है तो वो सही में स्वामी जी कलकाता गए थे उस समय जब कलकाता से वापस आए तो उनके गुरु भाइयों ने कहा कि अरे वो महाराजा पास में से ही गुजर रहे थे उन्होंने किसी सेवक को भेज कर के बोला कि स्वामी जी है कि नहीं यदि है तो मैं उनका दर्शन करने के लिए तो नहीं थे तो नहीं आए तो यदि स्वामी जी अपने को सामान्य कहते हैं कि तो हम स्वामी जी को सामान्य नहीं कहेंगे किंतु जो भी है एक कोई भी साधक कोई संकल्प लेता है तो वो संकल्प जद सिद्ध होता है तो सिद्ध संकल्प ब्राह्मण स्वयं यदि वो कोई संकल्प करते हैं तो वो सिद्ध क्यों नहीं होगा सृष्टि प्रा काले ब्रह्म प्रथम शब्दा क्मक होन सृष्टि के प्रारंभ में ब्रह्म सर्वप्रथम शब्द स्वरूप धारण करते हैं परे ओमकाराम बा नादा क्मक होए जान फिर उसमें से ओमकार या नाद रूप हो जाते हैं तार पर पूर्व पूर्व कल्पे नाना विशेष विशेष शब्द उसके बाद में पूर्व पूर्व कल्प के पहले पहले की सृष्टि के विभिन्न विभिन्न शब्द जैसे कि भू भूव स्व ये जो लोक है भू भव स्व यह सब लोक है बा गो मानव घट पट इत्यादि ई ओमकार थके बेरते थाके और फिर इसी ओंकार में से विभिन्न लोक और विभिन्न पदार्थ जैसे कि गाय है मनुष्य है घट है पट वगैरा उसी ओमकार में से प्रकट होना शुरू होते हैं सिद्ध संकल्प ब्रह में ई ई शब्द क्रम एक एकटा परे होवा मात्र ई ई जिनिस कुलो नी खनी बेरिए क्रम विचित्र जगते विकास पए पड़े सिद्ध संकल्प ब्रह्म में से वह सब शब्द एक एक करके प्रकट होने से ही वह चीजें भी स्थूल रूप में सृष्टि में प्रकट होना शुरू हो जाती है एक बार बुझली शब्द की रूप सृष्टि मूल अभी तुमको समझ में आया कि शब्द किस तरह से सृष्टि का मूल है श हां एक प्रकार बलाम बटे हां थोड़ा बहुत तो मुझे समझ में आया किंतु ठीक ठीक धारणा होते छ ना किंतु ठीक ठीक धारणा नहीं हो रही है स्वामी जी स्वामी जी कहते हैं धारणा हुआ प्रत्यक्ष अनुभव कराटा की सोज रे बाप अरे भाई यह जो धारणा होना कि सृष्टि की स्थिति कैसे होती है प्रलय कैसे होता है प्रारंभ कैसे होता है यह सब प्रत्यक्ष करना क्या सहज है रे बाप मोन जोखन ब्रह्मा बगा ब्रह्मा वही होते थाके तखन एक एकट पर एकटा कोरे य सब अवस्था भतर दिए गए शेषे निर्विकल्प उपस्थित होए मन जब ब्रह्म वगा ही अर्थात की ब्रह्म अभिमुख होना शुरू होगा तब धीरे-धीरे करके यह सब विचार हमको निर्विकल्प अवस्था की ओर ले जाएंगे समाधि मुखे प्रथम बोझा जाए समाधि का प्रारंभ होने से सर्वप्रथम समझ में आएगा जगत टा शब्द मय जगत ए शब्द मय तार पर गभीर ओमकार ध्वनि ते सब मिलिए जाए उसके बाद में गभीर ओंकार ध्वनि में सब मिलित हो जाता है देखिए जब समाधि होती है तो एक्चुअली प्रलय होता है स्वामी जी का विचार कितना भयानक है सृष्टि का प्रारंभ होता है तो ब्रह्म में से ओमकार ओंकार में से शब्द शब्द में से सब स्थूल चीज है तो ये हो गया इति इति करके जगत की रचना करना किंतु जब समाधि की ओर जाते हैं नेती नेती करके प्रलय की ओर जाते हैं स्थूल जगत विस्मृत हो जाता है सब कुछ शब्द मय दिखने लगता है शब्द ओमकार में विलीन हो जाते हैं और आखिर में ओमकार ब्रह्मण में वो जो ठाकुर का है ना कि संध्या गायत्री के लय हो गायत्री ओमकार में और फिर ओमकार ब्रह्मण में तो वैसे ही यह एक्चुअली प्रलय की घटना उन्होंने वर्णित की है तार पर ताओ सोना जायना आखिर में सब कुछ ओमकार ध्वनि मिलित हो जाता है और आखिर में ओमकार भी नहीं सुन पाओगे ताओ आछ की नहीं रूप बोध होय ओमकार भी है कि नहीं वह बोध होगा टे हो अनादि नाथ यही है अनादि नाथ तार पर प्रत्येक ब्रह्म में मन मिलिए जाए उसके बाद में प्रत्यक ब्रह्म में मन विलीन हो जाता है बस सब चुप बस सब चुप हो गया सब कुछ शांत हो गया जगत ही पूरा चला गया ब्रह्मण में हम एकी भूत हो गए अभी जब स्वामी जी ऐसा कहते हैं तब शिष्य वर्णन करता है स्वामी जी कथाए शिष्य परिष्कार बोध ईते लागी लो स्वामी जी की बात सुनकर के शिष्य को प्रत्यक्ष सुस्पष्ट समझ में आने लगा अनुभूति होने लगी स्वामी जी वही शकल अवस्था भीतर दिया अनेक बार स्वयं समाधि भूमि ते गमना न करिया छन स्वामी जी उस सम व्यवस्था में बार-बार मिलीन होकर के अनेक बार समाधि भूमि में उन्होने आना जाना किया है नतबा एमन विषद भावे एक शकल कथा की रूपे बुझाया बोते छन या जद स्वामी जी को खुद को बारबार समाधि नहीं होती बार-बार वो स्थूल जगत को शब्द जगत में शब्द को ओमकार में और ओमकार को ब्रह्मण में विलीन होता हुआ प्रत्यक्ष नहीं कर तो इतना सुंदर स्पष्ट रूप से यह घटना का वर्णन स्वामी जी कैसे कर पाते होंगे शिष्य अबाक होया सुनीत ते लाग शिष्य अवाक होकर के सुनता है और सोचता है निजर देखा सुना जिनिश ना होले कनो के हो रूपे बलते बा बुझाते पारे ना मैं जिसने खुद ने स्वयं अनुभूति नहीं की है तो कोई भी इतना विषद रूप से इस घटना का वर्णन नहीं कर सकता स्वामी जी बोली ते लागी लेन स्वामी जी कह रहे हैं अवतार कल्प महापुरुष हैरा समाधि भंग पर आबार जखन आमी आमार राजत्व नेम सेन अवतार कल्प जो पुरुष है वह जब समाधि भंग के बाद में आमी और आमार मैं और मेरा इस जगत में जब वापिस आते हैं खन प्रथम अव्यक्त नादर अनुभव करे तब पहले ही व्यक्त नाद अर्थात की अनादि नाद का अनुभव करते हैं अनुभूति होती है क्रम नाद सुस्पष्ट हुए ओमकार अनुभव करेन उसके बाद में अनादि नाद स्पष्ट होक के ओमकार में परिणत होता है ओमकार थके परे शब्द मय जगते प्रतीति करेन ओमकार में से बाद में शब्द मय जगत की प्रतीति होती है ठाकुर कहते हैं तो आमी तामा खाओ अमी बाजे जाओ अर्थात की मन को जमीन पर लाने के लिए ठाकुर ये तंबाकू खाना यह मिठाई खाना शौच जाना यह सब याद करते हैं जैसे कि शब्द जगत में से स्थूल जगत में व जमीन पर आ पाए तार पर सर्व शेषे स्थूल भूत जगत प्रत्य कोरेन और शब्द जगत में से आखिर में स्थूल भूत जगत में आते हैं सामान्य साधक क रा किंतु अनेक कष्ट कोनो रूपे नामर पारे गी ब्रह्मे साक्षात उपलब्धि करते पारले सामान्य साधक बड़ा ही मेहनत करके कष्ट करके कैसे भी करके शब्द के पार जो ब्रह्मण है उसकी उपलब्धि कर पाएंगे पुनरा स्थूल जगते प्रत्यक होय जे निम्न भूमि ते शेखाने आर नामत पारे ना कैसे भी करके मेहनत करके स्थूल जगत में से शब्द जगत में तो चले गए किंतु समाधि के बाद में शब्द जगत में से स्थूल जगत में कभी भी नहीं आ पाएंगे ब्रह्म मिलया जाए खीरे निरव ब्रह्म में ही मिल जाएंगे समुंदर में पानी डालने से जिस तरह से पानी अदृश्य हो जाता है विलीन हो जाता है बाहर नहीं आएगा वैसे ही सामान्य साधक एक बार ब्रह्मा भूति करेंगे तो फिर वो अनादि नाद से ओमकार नाद से शब्द जगत और स्थूल जगत की यात्रा फिर से नहीं कर पाएंगे अवतार कल्प जो होंगे वह यह यात्रा कर पाए ई शकोल कथा होते छ ममन समय महाकवि श्री जुक्तो गिरीश चंद्र घोष महाशय शेखाने उपस्थित हो अच्छा यह सब जब बात होती है उस समय गिरीश घोष ने आकर के सुंदर यह सब चर्चा हो रही थी उसमें पत्थर डाला और उसके बाद की बात तो पता है कि गिरीश घोष समाज की ऐसी अवस्था का वर्णन करते हैं विभीषण अवस्था का भीषण अवस्था का कि स्वामी जी रोते-रोते वहां से चले जाते हैं और तब यह गिरीश घोष शिष्य शिष्य बड़ा नाराज हो जाता है कि अरे महाशय इतनी सब ब्रह्म जगत ओमकार नाथ अनादि नाथ यह सब बातें हो रही थी क्या आप सब नाटक इसमें चालू कर दिया तो गिरीश कहता है कि भाई तुम्हारे स्वामी जी को मैं इसलिए मानता हूं कि उनका बड़ा हृदय है नहीं कि वह ओमकार नाद से ब्रह्म नाद में मिलीन हो गए वह तो कोई भी हो जाएगा बड़ा हृदय जिसका होना वही असली बात है आज ही कल फिर से मिते ह शी कृष्णा यह जो गान होते हैं ये जो अपनी साधक परंपरा में जो गान है वो भीय समाधि के उच्च तत्व को य प्रकट करते हैं और ठाकुर के जितने भी गान देखिए और ठाकुर कुछ कुछ गान जब गाते हैं कोई तो वो ठाकुर मना कर देते हैं यह गान में तत्व कथा नहीं है अथवा तत्व की बातें नहीं गान भले ही सुमधुर हो गान में तत्व कथा नहीं है तो वो सब गान मत करो जिसमें तत्व कथा है उस वही सब गान करो तो ठाकुर के गान भी ये सब उच्च भावात्मक एक एक गान को लेकर के आप पीएचडी लिख सकते हैं वो जो राम प्रसाद के कमलाकांत के यह सब एक एक गान आप लेंगे गिरीश घोष के यहां तक कि जुड़ाई से जाई थाई जुड़ाई ये एक एक लेकर के आप पीएचडी कर सकते हैं और स्वामी जी का ये जो काली दम मदर ये स्वामी जी का काली दम मदर मेरा एकदम प्रिय है तो ये उसको आप जितना आप चिंतन करें आरा जन दक्षिणेश्वर जाते हैं ना तो बड़े बड़े होर्डिंग होते हैं उसमें य जितने भी साधक है उसके बारे में सब लिखा होता है तंत्र कोई तांत्रिक होता है कोई साधक होता है वो पढ़ के में पहले पहले तो मैं ज बांगला पढ़ना सीखना शुरू किया था तो होर्डिंग पढ़कर करके मुझे बड़ा आनंद आता था दक्षिणेश्वर जब जाएंगे तो रास्ते से चलते चलते में काफी बार गए एक बार क्या हुआ था एक बार हम चार पांच साधु शाम के समय ब देर शाम के समय माने 8 बजे के आसपास हमने सोचा दक्षिणेश्वर जाते हैं तो दक्षिणेश्वर गए और फिर बेलून मठ में किसी को पता नहीं था कि हम लोग वहां पर है तो फिर सोचा कि पैदल चलते जाते हैं और पैदल चलकर वापस आएंगे किसी को बताने की जरूरत नहीं तो हम तीन चार साधु थे वो वापस आ रहे आते आते तकरीबन 10 बज गए होंगे रास्ता खाली था अकेले-अकेले हम चल रहे थे बड़ा मजे से गफ लगा कर के आनंद करते करते आ रहे थे तो एकाएक क्या हुआ एक गाड़ी बगल में आकर के रुक गई और गाड़ी का दरवाजा खुला और हमारे ट्रस्टी महाराज बध सारानगर में से देखते हैं क्या कर रहे हो तुम लोग इस समय रास्ते पे वो किसी फंक्शन में गए होंगे तो रास्ते पे आते होंगे तो रास्ते में देखा कि गेरवा परे तीन चार लोग है कौन है अभी कलकाता में गेरवा पहने लोगों की तो कमी नहीं है नॉट नेसेसरी अपने ऑर्डर के ही होंगे किंतु हुआ ऐसा हम सभी लोग मिशन ऑफिस में काम करते थे हम सबको पर्सनली पहचानते थे तो देख कर के ही गाड़ी रोकी चलो बैठ जाओ भीतर में अव्यक्त ओमकार अनादि नाद में समाहित हो जाता है स्वामी जी कहते हैं ना कि एक समय ऐसा आएगा कि आपको ओमकार भी सुनाई नहीं देगा वो हो गया अनादि नाथ देखिए ये जो ओमकार में से अव्यक्त नाथ और फिर अव्यक्त नाद में से ओंकार यह सब चीजों की सही सही धारणा तो तभी होगी जब हम उस अवस्था में जाएंगे स्वामी जी ने खुद ने कहा ना कि भाई जब तक यह सब अनुभूति नहीं होगी तब तक धारणा नहीं होगी अभी क्या है कि जैसे मैंने पढ़ा है आपने पढ़ा है अब जैसे हम अपना एक बुद्धि चला कर के इसकी कोई ना कोई व्याख्या करते हैं तो व्याख्या में हमने स्वामी जी ने जो कहा वो पढ़ा कि ओमकार में से अव्यक्त नाद और बाकी में जब वापस आने के समय अव्यक्त नाद में से ओमकार अभी इसकी ठीक धारणा नहीं होती तो शब्दों से तो कभी नहीं होने वाली है क्योंकि शब्दों के परे का यह जगत है जैसे कि शब्द स्वयं रुक जाते हैं ओमकार में विलीन हो जाते हैं ओमकार स्वयं जब अव्यक्त नाद में मिलीन हो जाता है तो उसकी धारणा शब्द से तो कभी होने वाली नहीं हम प्रयास करें कि कुछ ना कुछ अनुभूति हो तब य ठीक ठीक धारणा होगी तब तक तो हमको ये किताब में ही पढ़ना है इसी बुद्धि से सोचना है इसी शब्दों से ही सोचना है डिफरेंट कहेंगे प्रार्थना कब करेंगे जब हम किसी के शरणागत होते तो प्रार्थना करते हैं अर्थात की दो है एक प्रार्थना सुनने वाला प्रार्थना करने वाला दत जबकि संकल्प होता है वह अद्वैत एक ही है एक ही के भीतर में संकल्प प्रकट हुआ है यानी कि वह अद्वैत यानी द्वैत और अद्वैत यह डिफरेंस है नहीं प्रार्थना हम करते हैं किसी चीज को प्राप्त करने के लिए यानी कि अपूर्णता है और संकल्प होता है सिद्ध संकल्प पूर्ण जो है उसके मन में आप प्रार्थना कब करेंगे कि मुझे मन की शांति चाहिए मुझे आनंद चाहिए मुझे त्याग ज्ञान भक्ति वैराग्य चाहिए स्वामी जी ने मां काली के मंदिर में जो मांगा था वो कपड़े वगैरह रोटी कपड़ा मकान मांगने को गए थे मांग बैठे ज्ञान भक्ति वैराग्य तो ज्ञान भक्ति वैराग्य मांगा इसलिए क्योंकि था नहीं और चाहिए था अभी था नहीं ऐसा नहीं उसके ऊपर में मिट्टी लग गई थी मिट्टी हटाने से निकल आएगा किंतु आपात तः नहीं था तो मांगा और संकल्प कब होता है पूर्ण है और पूर्ण में से संकल्प करते हैं नहीं ब्रह्मण कमी देखिए यह बात मैंने उसी समय कही थी स्वामी जी ने कहा ना कि ये शब्द ब्रह्मण में रहता है ब्रह्मण में छुपा रहता है तभी मैंने यह कहा था कि स्वामी जी ने कितना बड़ा स्टेटमेंट दे दिया ब्रह्मण हमेशा पूर्ण है और ब्रह्मण किसी विकार का परिणाम नहीं है किसी मिश्रण का परिणाम नहीं है ब्रह्म एक ही है एक के भीतर में कभी विकार कभी नहीं होगा उसके भीतर में अपूर्णता कभी नहीं होगी हमेशा पूर्ण होगा तो पूर्ण ब्रह्म संकल्प क्यों करेगा इस बात को हम अपनी बुद्धि से नहीं समझ पाएंगे जैसे कि ये ठाकुर कहते हैं ना कि निर्विकल्प समाधि ने उन्होंने सुना कि तू एक भाव मुख्य थाक अभी ईश्वर ने ऐसा संकल्प लिया अभी जद हम अद्वैत को विश्वास करते हैं तो ईश्वर कहां से आ गया और यदि ईश्वर जद है या ब्रह्मण है वो यदि पूर्ण है तो ऐसा आदेश क्यों करेंगे कि भाई तुम भाव मुखे रहे वगर यानी कि उस लेवल पे ब्राह्मण के लेवल प क्या होता है बुद्धि से समझना बड़ा ही मुश्किल है आइडियल स्पीकिंग कुछ भी नहीं होना चाहिए जड़ वत हो जाना चाहिए ब्रह्म एक ही है किसी भी तरह की अपूर्णता नहीं है किसी भी तरह की कमी नहीं है किसी भी तरह का डिजायर नहीं है देन वई वुड ही एक्ट किसी भी तरह की एक्शन होती है वह अपूर्णता का परिणाम है अभी पूर्णता में से एक्शन क्यों प्रकट होगी वो एक मात्र लीला है एक आनंद के लिए है एक आभास है वो ये हम शब्द यूज करते हैं किंतु इसका सही सही अर्थ तो हमको नहीं पता है वो जब तक अनुभूति नहीं होगी यानी कि अद्वैत वेदांत के हार्ट में देर इज अ कंट्रक्शन और ये कंट्रक्शन अद्वैत वेदांत अपने से उसको ही सोल कर सकता है उसके लिए अनुभूति ही चाहिए यदि हम त को फॉलो करते हैं तो बहुत ही आसान है समझना कि ईश्वर सब कुछ करता है तो बात ही खत्म हो गया ईश्वर लीला करते हैं ईश्वर कार्य करते है कि ब्रह्म तो पूर्ण है ब्रह्म कार्य करेगा ही क्यों माया इट सेल्फ इ सस्पेंस अकाउंट ब्रह्मण ही है तो माया कहां से आ ना पूरा वर्ल्ड ना सस्पेंस नहीं जद मॉडर्न एग्जांपल यद देना है तो यह गृह स्वामी है और एक एआई है आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जो कि सब करता है वो रियल तो है नहीं आर्टिफिशियल है किंतु फिर भी करता है देखिए कि मां का जो एक प्रसंग है मां को आशीर्वाद के अलावा माने अपने जीवन में किसी को कुछ दिया नहीं है जिसने कितना ही मां के साथ में अत्याचार किया हो मां ने सब आशीर्वाद ही दिया है किंतु एक बार था कि वोह पागली मामी मां को मारने के लिए आई और मां ने गुस्से में कह दिया कि तोरा हाथ टा खोश पड़ ब तुम्हारा हाथ गल करके गिर जाएगा और आखिर में हुआ भी सही मा पागली मामी को कुष्ठ रोग हो गया उंगलियां वगैरह गल के चली गई तो मां ने जैसे ही ऐसा कहा वैसे ही सामने से मां एकदम एकदम चमक गई अरे मेरे मुंह से यह शब्द क्यों आ गया मैंने किसी को श्राप क्यों दे दिया तो देखिए जब हम यह समाज में रहते हैं जब एक रिएक्शन और रिएक्शन स्टार्ट होते हैं उस समय मां भी अपने को नहीं रोक पाई श्रब देने से तो हम लोग तो कौन से खेत की मूली है तो ऐसा एक गिल्ट फीलिंग बहुत ज्यादा नहीं रखना है कि भाई मैं परफेक्ट क्यों नहीं हूं जब एक्शन होता है तो मैं क्यों रिएक्ट कर देता हूं तो वो तो एक बात हो गई मनुष्य स्वभाव है मां ने जब श्राप दे दिया तो हम किस खेद की मूली वो तो चलता रहेगा बात यह है कि जब सुबह शाम जब हम शांत चित्त होकर के बैठते हैं उस सम ये रिफ्लेक्ट करना है रिफ्लेक्ट करना है कि दिन भर में मैंने कैसे-कैसे रिएक्ट किया तो ये जो रिफ्लेक्शन है ना एक्शन ऑफ रिफ्लेक्शन कि हां मुझे पता है कि मैंने यहां पे गलती की है यहां पे गलती की है यह रिकग्निशन इट सेल्फ इज अ वेरी पावरफुल टूल ऑफ अंडरस्टैंडिंग कि जैसे-जैसे धीरे-धीरे करके अंडरस्टैंडिंग बिल्ड अप होती जाएगी शुरू में क्या होगा कि जब मैं शांति से बैठता हूं सोचने के लिए कि हां मैंने यहां पे रिएक्ट किया यहां पे किया तो उसी समय ये रिएक्शन है ऐसा पता चलता है किंतु धीरे-धीरे करके ये अवेयरनेस जो है ना कि हां मैं रिएक्ट कर रहा हूं वो लाइव हो जाएगा यानी कि आप रिएक्ट कर रहे हैं उस समय आपके मन में पता है उस समय आपको पता चल रहा है कि मैं रिएक्ट कर रहा हूं तो सबसे पहले तो ये अवेयरनेस होना डेवलप करना जरूरी है जब तक हम अवेयरनेस नहीं डेवलप करेंगे डायग्नोसिस जब तक नहीं होगा तब तक ट्रीटमेंट नहीं होगा तो सबसे पहले अवेयरनेस को डेवलप करना है कि हां मैं रिएक्ट कर रहा उसके बाद का स्टेज है कि हाउ टू काउंटर दिस रिएक्शन तो वो है कि अपना साधन भजन जो नियमित रू विल पावर डेवलप करना पड़ेगा आपको तो ये सबसे पहले अवेयरनेस जो कि रिकॉग्नाइज करता है लाइव रिकॉग्निशन देता है आपको कि हां मैं यहां पे यहां पे रिएक्ट कर रहा हूं दूसरा हो गया विल पावर कि जब रिएक्शन स्टार्ट होता है तो पहले तो होगा कि रिएक्शन स्टार्ट होगा बाद में मैं अपने को कंट्रोल करूंगा थोड़ा बहुत गाली गलोज कर दिया बाद में मैंने संयमित कर लिया अपने को तो वो धीरे-धीरे करके विल पावर इतना बढ़ता जाएगा कि जैसे ही वो स्टार्ट होगा रिएक्शन वैसे ही आप उसको कल में कर पाएंगे तो सस आर द टू टूल्स अवेयरनेस एंड विल पावर और फिर अवेयरनेस और विल पावर कैसे बढ़े तो उसके लिए तोव जो चार योग है है कर्म ज्ञान भक्ति ध्यान किंतु जो एक्चुअल टूल है दिस आर दिस टू और सबसे बड़ा है कि कभी भी गिल्ट नहीं डेवलप करना है कि अरे मैं इतना कर रहा हूं फिर भी नहीं होता इतना कर रहा हूं नहीं होगा वो माया है ही ऐसी विचित्र 100% परे कोई नहीं होने वाला है ठाकुर कहते ना सारे गामा पानी नी इतना तीव्र सर है कि वहां पर आप ज्यादा समय नहीं रह पाएंगे सारे गामा पर आपको आ ही जाना पड़ेगा तो बीच बीच में वहां पर जाते हैं ब्रह्म भाव बैटरी रिचार्ज कर देते आज की भाषा में और फिर से वहां पर जगत में आकर के हमारे साथ में वो बातें करते हैं व गाड़ी जैसे थोड़ा समय चलाएंगे बैटरी चार्ज करली फिर व माइलेज बढ़ जाएगा उसका ऐसा ठाकुर कहते है ना कि चीनी खेते चाहे चीनी होते चाइना चीनी खाना चाहता हूं चीनी होना नहीं चाहता चीनी यानी शुगर ये जो स्वामी जी ने स्वामी जी ने कहा ना कि अवतार कल्प पुरुष होते हैं वह वापस आएंगे जो सामान्य साधक है एक बार विलीन हो गए तो हो गए फिनिश क्योंकि देखिए पूर्ण में संकल्प नहीं होता स्वामी जी जो कहते हैं कितना एक पावरफुल स्टेटमेंट उन्होंने दिया है कि ब्रह्मण के मन में संकल्प होता है ब्रह्म संकल्प क्यों करेगा भाई क्रिया तभी करेगा जबी वह पूर्ण है ब्रह्म तो पूर्ण है क्रिया करेगा क्यों तो यह ब्रह्म में से माया या तो फिर संकल्प या तो फिर शक्ति क्यों प्रकट होती है इस बात का उत्तर कहीं पर नहीं है प्रकट हो होती है यह स्वीकार कर उसके बाद में क्या होता है हम सब डिस्क्राइब कर देंगे किंतु वो जो क्रिटिकल जो कंपोनेंट है जैसे कि वो है ना मेरे गांव में मसाल में मेरी मां के वहां पे हम लोग एक एक लारी थी लारी होता है ना कॉलेज स्ट्रीट थी वहां पे वहां प एक लाड़ थी बहुत ही अच्छी वो आइटम बनाता था कुछ कुछ चीजें हम लोग खाने के लिए जाते थे फिर वो आने के समय उसको पूछते थे अरे भैया तुम्हारा बताओ ना ये किस तरह से तुम बनाते हो तो वो सब कुछ बताता पहले इसको फ्राई करना है यह करना है वो करना है फिर इसम मसाला डाल देना है मसाला किस चीज का बना है तो वो मैं बाद में [हंसी] बताऊंगा वो मसाला जद बता दिया तो आप आएंगे क्यों वने बाकी सब कुछ उने बता दिया मसाला नहीं बताएगा [हंसी] माया है उसके बाद क्या है सब बताएंगे माया का मसाला नहीं बताएंगे यहां पर देखिए यहां पे यहां पे यहां पे एक क्रिटिकल चीज है कि मान लीजिए कि लोटे में से जो पानी था आपने समुंदर में डाल दिया उसके बाद में लोटे में फिर से पानी भरा किंतु वोह जो पानी है वह पुराना वाला पानी नहीं है क्यों पुराना वाला पानी अर्थात की पुराने जितने भी संस्कार थे सब विलीन हो गए अभी जो नया जो अहम प्रकट होता होता है उसमें कोई भी संस्कार नहीं है और इसके बाद में जितने भी कर्म होंगे ना कर्म संस्कार बनाएंगे नहीं यह बड़ा क्रिटिकल डिफरेंस है देखिए शरीर तो वही रहता है शरीर वही रहता है अहम जो होता है अहम नया हो जाता है ये एक बात समझनी है लोटा वही है किंतु लोटे का पानी डिफरेंट है शरीर वही है किंतु शरीर के भीतर में साधना के समय का अहम और सिद्ध होने के बाद का अहम यह दोनों डिफरेंट है जैसे कि वो तोतापुरी को ठाकुर ने कहा कि लोटा जो है यदि सोने का हो जाए तो फिर उसको डेली धोने की जरूरत नहीं तो जो नया अहम जो होता है नया जो पानी भरा है वो सोने का पानी है उसमें कभी भी किसी भी तरह के संस्कार नहीं बनते यानी सेम पानी नहीं है डिफरेंट पानी है लोटा सेम है पानी डिफरेंट है ना ना बिल्कुल नहीं अवतार कल्प के लिए फिर वो शुद्ध अवम हो जाएगा संस्कार ऊपर ऊपर से दिखेंगे सेम है मेमोरीज लगेगी सेम है किंतु वो पूरा डिफरेंट पानी है इसीलिए तो अहम पूरा उनका ये निर्दोष हो गया उस अहम से अभी किसी भी तरह का कर्म होगा नहीं उससे पहले कर्म हुआ था देखिए किस तरह से जब ठाकुर के बड़े भाई है बड़े भाई को जब आखिर आखिर में डॉक्टर ने पानी पीने को मना कर दिया था तो जब भी पानी पीते थे ठाकुर जा कर के कहते बड़े भाई तुम पानी क्यों पीते हो ऐसा करके एक बार पानी पी रहे तो आत में से पानी खींच लिया तो बड़े भाई ने राम कुमार ने एकदम श्राप दे दिया कि तुम्हारा भी ऐसा समय आएगा गले के भीतर में तो पानी नहीं जा पाएगा तो देखिए कि ठाकुर का उस समय तो निर्विकल्प समाधि प्राप्त नहीं हुई थी जो कर्म किया कर्म का परिणाम उनको आखिर कैंसर के स्वरूप में भुगतना पड़ा अभी ठाकुर ने खुद कहा है अभी कैंसर की बहुत सारी डेफिनेशन है कि जगत का पाप लेकर के कैंसर हुआ किंतु ठाकुर ने खुद ने इस बात को मेंशन किया है कि मेरे भाई के हाथ में से पानी खींच लिया मेरे भाई ने ऐसा कहा इसलिए मुझे आज भुगतना पड़ रहा है स्वामी श्री ठाकुर का खुद का कहना है तो ये जद सिद्ध हो जाते बाद में ऐसा किया होता तो वो उसका कर्म का फल नहीं लगता क्योंकि वो पूरा सोने का वो हो गया है उनका उसके बाद में किसी भी तरह का फल उनको नहीं लगने वाला है तो यह दो डिफरेंस है और इस जन्म का नहीं कितने कितने जन्म का इस जन्म का तो एटलीस्ट पता है वो अदृश्य कर्म आ कर के हमको भुगतना पड़ रहा है पता भी नहीं चल रहा है उसको पता होगा तो कुछ काउंटर करेंगे किंतु देखिए हम लोग ठाकुर की शरण में आ गए हैं तो ठाकुर तो है अपने कर्म काटने वाले वो ठाकुर ने कहा ना कि भगवान की शरण में जाने से पैर कटना था तो कांटा लग के काम समाप्त हो गया तो यहां पे भी सोल्यूशन तो है ठाकुर के पास जाने से पैर कटने की वजह कांटा लगेगा कांटा लगेगा वो काटा जाएगा नहीं किंतु पैर नहीं कटेगा एटलीस्ट वो वो सदिया है हमको देखिए मैं सही में बताता हूं मेरा ऐसा कोई जब ध्यान वगैरह कुछ नहीं है सुबह को शाम को मैं आरती के मंगल आरती के बाद में संध्या आरती के बाद में रूम में आता हूं ना मैं सिर्फ अपनी किताबें ही पढ़ता हूं या तो अभी आजकल ऑडियो बुक बहुत चलती है तो अपनी ऑडियो बुक सुनता हूं और ये टेक्स्ट टू स्पीच चलता है तो स्वामी जी का पूरा कंप्लीट वर्क टेक्स्ट में है मेरे पास तो उसको मैं वो सुनता रहता हूं स्पीच करके एक मि डाल के यही मेरी साधना है इसी से मन इतना शांत हो जाता है व और कुछ बहुत बड़ा कुछ करने की जरूरत नहीं है जिसको वो सब करना है करें मेरे लिए दिस इज गुड इनफ