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Sri Ramakrishna Kathamrita ·

श्रीरामकृष्ण कथामृत || 16 Dec 1883 - श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ दक्षिणेश्वर में || 13 Apr 2026

मङ्गलाचरण

ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूप अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः

जब गिरीश घोष ने गालियों से श्रीरामकृष्ण के प्रति अपनी भक्ति प्रकट की

दक्षिणेश्वर में एक बार ठाकुर के कमरे में वो दिए की बत्ती जो होती है वह खत्म हो गई। वो जो कॉटन की वीक जो आती है ना वो उस समय [गला साफ़ करने की आवाज़] का घी वाला दिया या तेल वाला दिया प्रदीप उसमें आप वो कॉटन की वीक डालेंगे तो फिर वह जलती है तो वह खत्म हो गई। अब यह कॉटन की इतनी सी एक वीक आती है वह बाती तो उसको लेने के लिए अह ठाकुर ने योगेंद्र महाराज को कहा कि देखो वहां पर गिरीश घोष करके एक है उसके घर जाओ उसके घर से यह बत्ती ले आओ तो अभी योगेंद्र महाराज तो नए-नए थे उस समय उनको पता नहीं कि गिरीश घोष है कौन अह सुन के रखा था कि एक नाटक वाला है और शराब बहुत पीता है और शराब पी के पागलामी करता है। इतना उनको पता था। तो निकले पूछते-पूछते गिरीश के घर जाकर के पहुंचे और उस समय गिरीश ने अच्छे से शराब पी के रखा था। एकदम शराबी अवस्था में था। वह जैसे ही कमरे में प्रवेश किया तो अभी जिस तरह का शराबियों का चेहरा होता है उनका चलने का ढंग होता है बात करने की स्टाइल होती है योगेंद्र महाराज बेचारे सीधे साधे लड़के इस तरह का शराबी को देखकर के तो पहले तो डर ही गए फिर यह गिरीश कहता है क्यों रे कौन हो तुम क्या काम है तो बेचारे योगेंद्र महाराज डरते डरते कहते हैं कि दक्षिणेश्वर से परमहंस महाशय ने आपके पास पास में भेजा है वो दिए की एक बत्ती लाने के लिए। तो गिरीश घोष यह सुनकर के अच्छा परमहंस महाशय ने तुमको मेरे पास में भेजा एक बत्ती लाने के लिए। एक क्या बत्ती तुम पूरा बंडल ले जाओ। ऐसा बोल के वह जमीन पर बैठ गए। अभी यहां पे तो बेचारे योगेंद्र महाराज देख के ही डर और यह भय से धुझ रहे हैं कि यह पागल यह मुशरा भी पता नहीं अभी क्या करेगा। कहीं मुझे काट ना दे तो एकदम दूर जाकर खड़े रहे जितना दूर हो सके और यहां पर तो गिरीश घोष का ऐसा हाल हुआ कि अच्छा परमहंस महाशय ने एक बत्ती लाने के लिए मेरे पास में भेजा और इस बात सुनकर के मन में मन में इतना आलाद हो रहा है इतना आनंद हो रहा है और इस आनंद को व्यक्त कैसे करेगा एक शराबी तो आनंद व्यक्त करने का उनका जो स्टाइल है यूनिक गिरीश घोष स्टाइल वो बैठे-बैठे जोरदार गालियां देना शुरू कर दी और गाली दे रहे हैं और बीच-बीच में दक्षिणेश्वर की ओर उद्देश करके जमीन पर लेट के प्रणाम कर रहे हैं। उस समय क्या था [गला साफ़ करने की आवाज़] कि आज की तरह इतने सारे मकान वगैरह नहीं थे। तो गिरीश घोष के घर से वह जो दक्षिणेश्वर मंदिर का वह जो शिखर है स्पष्ट दिखता था। तो शिखर की ओर देख रहे हैं। बीच-बीच में प्रणाम कर रहे हैं और बीच-बीच में भयंकर गालियां दे रहे हैं। तो यह पूरा नाटक देखकर के यह बेचारे योगेन महाराज तो कह रहे हैं कि मुझे हार्ट अटैक ही आ जाता। मुझे स्ट्रोक ही आ जाता। ऐसा भयावह दृश्य ना भूतो ना भविष्यति उनके जैसे बेचारे एक सरल लड़के ने कभी देखा भी नहीं। तो फिर आखिर में यह कांड धीरे-धीरे करके समाप्त हुआ। गिरीश ने एक बत्ती का बंडल लाकर के योगेंद्र महाराज के हाथ में थमाया और जैसे ही यह बंडल मिला योगेंद्र महाराज ने जो सीधी दौड़ लगाई है सीधा दक्षिणेश्वर जाकर के ही रुके। फिर ठाकुर के पास जाकर कहते हैं अरे महाशय किस पागल के पास में आपने भेजा था वह तो भयानक गालियां दे रहा है। शराबी शराब पी के बैठा था। क्या पागलपन कर रहा था? मुझे तो यह डर लग गया कहीं मुझे काट ना दे। तो ठाकुर ने पूछा कि अरे वो सिर्फ गाली ही दे रहा था ना कि और कुछ कर रहा था। तो योगेंद्र महाराज ने कहा नहीं बीच-बीच में वो आपकी ओर मन दक्षिणेश्वर मंदिर की ओर बीच-बीच में भूमिष्ट होकर के प्रणाम भी करता था। तो ठाकुर ने कहा अरे साला तुम सिर्फ यही देखोगे कि वो गाली दे रहा है। साला ठाकुर का शब्द मेरा नहीं। तो ठाकुर कहते हैं कि तुम यही देखोगे कि वो गाली दे रहा है। तुमने यह नहीं कहा। यह नहीं देखा कि इसकी ओर इतनी भक्ति है। अपनी ओर इशारा करके। इसकी ओर इतनी भक्ति है। मुझे इस मंदिर की ओर देखकर के प्रणाम कर रहा है। यह सब तुमने नहीं देखा। बस तुमने यही देखा कि वो गाली दे रहा है। तो योगिन महाराज क्या बोलेंगे? इस तरह का अनुभव होने के बाद में तो देखिए कि ठाकुर फिर बाद में कहते हैं देखो यह एक खास तरह के भक्त हैं। एक स्पेशल कैटेगरी ऑफ डिवोटीज। ये इसी तरह से है। ऐसा आप मत सोचिए कि वे लोग धर्म कर्म फिर ये जो एक सदाचार युक्त जीवन जिएंगे। उनके जीवन में शराब पी के यह पागलामी करना यही सब भले ही चाहे उनके भीतर में हो किंतु इनका जो भक्ति और विश्वास है जो श्रद्धा है कितनी जबरदस्त है भले ही चाहे शराब पीता हो भले ही चाहे थिएटर में जाकर के 10 पगलामी करता हो जो भी आप कहे एथिक्स और मोरालिटी का कचरा कर देता हो किंतु श्रद्धा और भक्ति इन लोगों की देखिए कितनी है इस तरह के लोगों का इस तरह के भक्तों का यही एक सार है उनके जीवन का। तो इट्स अ वेरी फनी इंसिडेंट

स्वामी सारदानन्द का अद्भुत सेवाभाव: बीमारी भूले, अतिथि के लिए स्वयं बनाई चाय

और एक इंसिडेंट है। इट्स वेरी माने आध्यात्मिक जीवन के ये जो फसेट्स है ना हम लोग एक स्ट्रेट जैकेट में एक सिंपलीफाइड वे में हम आध्यात्मिक जीवन को बांध के रखना चाहते हैं। किंतु आध्यात्मिकता के जो फैसेट्स है हीरा होता है ना एक000 फसेटेड डायमंड के 1000 पासे वाला हीरा तो प्रत्येक आप जैसे-जैसे आप उसको रोटेट करते जाएंगे ना डायमंड को आपको एक नया-नया कलर हीरे के भीतर में देखने को मिलेगा। सहस्त्रदल पद्म थाउजेंड पेटल लोटस प्रत्येक पेटल जो है प्रत्येक दल जो है वो कमल का वो उसका एक अपना एक ब्यूटी है सो रामकृष्ण संघ में यह जो भाव है भाव का जो माधुर्य है भाव का यह जो वैविध्य है कैसा है शरद महाराज की एक कहानी है [गला साफ़ करने की आवाज़] शरद महाराज आलम बाजार मठ नयानया स्थाप स्थापित हुआ है। वराह नगर से आलम बाजार मठ शिफ्ट हुआ है। मुश्किल से एक सप्ताह ही बीता होगा। तो कौन सी चीज कहां पर रखी है वगैरह अभी तो सब कुछ केओटिक ही पड़ा है। तो वहां पे शरद महाराज और काली कृष्ण महाराज भविष्य के अपने वीरानंद जी महाराज उनको बुखार हुआ था और लेटे बुखार के यह जो ये बुखार की वजह से उनका पूरा देह जो है वो वीक हो गया है। [गला साफ़ करने की आवाज़] निर्बल हो गया है और ध्रुज रहे हैं बुखार की वजह से। अभी शरद महाराज का बुखार जो है उसी दिन उतरा था। किंतु यह वीकनेस जो है और यह जो धुजारी जो है शरीर में वह वैसे का वैसा है। उसी समय स्वामी जी के जो छोटे भाई है महेंद्रनाथ दत्त वो वहां पर जाकर के पहुंचे। अभी एकाएक शरद महाराज के मन में आया कि मोहिन बाबू सब उनको कहते थे मोहिन तो मोहिन को चाय बना के पिलाना है। मोहिन मोहिन बाबू को चाय पीना बहुत अच्छा लगता था। तो बीच-बीच में कोई एक गुरु भाई उनको कहते भी थे कि देखो यह तुम्हारा बड़ा भाई है ना उन मोहिन बाबू के बड़े भाई यानी कि नरेंद्र बाबू स्वामी विवेकानंद तो यह तुम्हारा जो बड़ा भाई है वो हुक्के में तंबाकू पीता है तो देखो उसकी बुद्धि कितनी प्रखर हो गई है और तुम ये बिना मतलब की चाय पीते घूमते हो चाय को छोड़ो और हुक्के में तंबाकू टानो तो जब मोहिन बाबू को चाय बड़ा अच्छा लगता था योग शरद महाराज ने अभी तो ज्वर उसी दिन उतरा है। पूरा वीकनेस है। हाथ पैर ध्रुज रहे हैं। इसी अवस्था में शरद महाराज ने मोहिन बाबू को कहा कि भाई मैं अपने हाथों से बना करके तुमको चाय पिलाना चाहता हूं। अभी मोहिन बाबू तो ऐसे आश्चर्यचकित हो गए। उनको तो पता है कि शरद महाराज को तो आज ही बुखार उतरा है और देख रहे हैं कि हाथ पैर ऐसा करके धुज रहे हैं और वीकनेस है खड़े हो रहे हैं तो पैर इधर गिरता है एक पैर तो दूसरा पैर उधर गिरता है। ऐसी अवस्था में अग्नि प्रज्वलित करके यह चाय का गर्म पानी गर्म करना यह कहीं आग म गर्म पानी उनके ऊपर में ना ढल जाए कितना डेंजरस है ऐसी अवस्था में चाय बनाना तो मोहिन बाबू कहते हैं अरे नहीं नहीं आप चाय क्यों बनाएंगे मुझे चाय पीना है मैं अपने से बना लूंगा मैं तो कोई गेस्ट थोड़ी ना हूं स्वामी जी के छोटे भाई है एक तरह से ये जो मठ के परिवार के सदस्य ही है वो कोई गेस्ट तो है नहीं कि उनको आप चाय बनाकर पिलाइए किंतु शरद महाराज के मन में वो शरद महाराज ऐसा बार-बार कहते हैं कि देखो घर बार छोड़कर के यहां पर आया ठाकुर जैसे गुरु भी मिले नरेंद्र जैसा एक गुरु भाई भी मिला किंतु पता नहीं साधन भजन मेरे जीवन में कितना हुआ सिद्धि कितनी प्राप्त हुई वह तो कुछ समझ में ही नहीं आ रहा। मैं तो चाहता हूं कि बस अभी सेवा करके जीवन पात कर दूं। ऐसे लोगों की ऐसे रोगियों की सेवा करते थे कि जिनको कोई स्पर्श नहीं करना चाहता था। यह जो इनफेशियस डिसीज होते हैं स्वामी जी के ही घर में स्वामी जी तो निकल चुके थे बाय दैट टाइम प्रवरज्या में तो स्वामी जी के ही घर में एक सदस्य को एक इनफेशियस डिसीज हो गया। कोई उस घर में प्रवेश नहीं करना चाहता। वैद्य कविराज भी नहीं जो भी इंस्ट्रक्शन देना है बाहर में खड़े-खड़े दे देंगे कि तुम ऐसा ऐसा करो। अभी रोगी जो है बेचारा इनफेशियस डिसीज लेकर के संपूर्ण पथारीवश है। वह बेचारा क्या इंस्ट्रक्शन का पालन करेगा। तो यह जब न्यूज़ शरद महाराज के कान में गया सीधा आए दौड़े हुए और कहते हैं कि मैं इस रोगी की सेवा का भार ग्रहण करता हूं। ऐसा बोलकर के उनके बगल में बैठ गए उस कमरे में और [गला साफ़ करने की आवाज़] उनके हाथ में उनका जो छोटा उंगली है उस समय किसी वजह से कट गया था। अब आप सोच के देखिए। एक तो इनफेशियस डिसीज के रोगी की सेवा कर रहे हैं। ऊपर से उंगली कटी है। यानी कि हाथ से ही तो सेवा करनी है। उंगली कटी दैट मींस कि आपको इंफेक्शन के चांसेस कितने हैं। तो उन्होंने एक कपड़े से उंगली को बांध दिया और फिर ऐसा हाथ रखकर के वो रोगी की एक उंगली को ऊपर रख के रोगी की सेवा कर रहे हैं। तो देखिए कि जब तक रोगी ठीक नहीं हुआ। उन्होंने पूरी सेवा का भार ग्रहण किया था। यह शरद महाराज के मन में यह जो भाव था एक दीनता और हीनता का वैसे देखिए हम लोगों ने बहुत बार यह सब डिस्कस किया है कि आत्मश्रद्धा ठाकुर का ये जो प्रज्वलित उज्जलित भावे हाशे कादे नाचे गाए भाव में हंसता है रोता है नाचता है और गाता है यह जो प्रफुल्लित भक्ति है वो अपने संघ का ट्रेडमार्क है वह ठाकुर की जो असली भक्ति या तो रामकृष्ण संघ की असली पहचान है। किंतु यह जो सेवा भाव है एक दीन हीन भाव है। अपने को संपूर्ण रूप से एक तरह से गला देना है। अपने ईगो को संपूर्ण रूप से न्योछावर कर देना है। यह भी एक भाव है। रामकृष्ण संघ की भावधारा में सब भावों का समावेश है। एक समय की बात है। बेलूर मठ की ही बात है कि उत्सव हुआ था। पब्लिक सेलिब्रेशन ठाकुर की तिथि पूजा ही मोस्ट प्रोबेबबली होगी। तो बहुत सारे लोगों को भोजन की व्यवस्था थी। जैसे अभी भी होती है वो खिचड़ी प्रसाद फिर यह बूंदे बूंदी का बूंदी वगैरह जो देते हैं तो उस समय भी सब दिया गया था और फिर जो जितना उच्छिष्ट है यह जो झूठे पत्ते वगैरह है सबको एक जगह पर ढग करके जमा किया गया था। अभी आप सोच ही सकते हैं कि वह ढग होगा वह कितना विकृत होगा। उसमें से कैसी गंध आती होगी। वो तो झूठा सब पात्र है। उसमें जो झूठा अन्न भी पड़ा होगा। तो शरद महाराज और फिर एक दो वॉलंटियर्स फिर जब यह समाप्त हो गया भोजन समारोह वो क्लीन करने को निकले मैदान को क्लीन करने के लिए। देखा शरद महाराज ने कि इस तरह से झूठे पत्ता पत्ते जो है उसका ढक पड़ा है तो वह वहां पे गए भयानक बदबू आ रही है और जो अन्न उच्छिष्ट अन्न होगा आप इमेजिन कर ही सकते हैं कि वो किस तरह का दिखता होगा क्या उसकी हेल्थ हजीन सेनिटेशन सिचुएशन होगी तो उसमें उंगली डालकर के शरद महाराज ने थोड़ा सा अन्न अपने हाथ में लिया और मुंह में डाल के ग्रहण किया और कहते कहते हैं कि देखो यह भक्त का अन्न है। यह भक्तों ने यहां पर आकर खाया है। यह भक्त का अन्न है। कितना पवित्र है। देखिए ठाकुर के बारे में जब हम कहते हैं ना कि ये लज्जा घृणा भय जाति कुल शील मान अभिमान यह जो अष्टपाश है अष्टपाश को तोड़ने के लिए सिर्फ मन में ही मन में नहीं कि मैं ब्राह्मण के घर में जन्म लिया है। मैं ब्राह्मण हूं और यह मुझे ब्राह्मण ब्राह्मणत्व का कोई घमंड नहीं। मैं काली मंदिर में पुजारी हूं और फिर तो पुजारी तो एक रिस्पेक्टेड पोजीशन है। किंतु मुझे इस बात का कोई घमंड नहीं। तो यह सब बोल के सोच के इमेजिन करके नहीं ठाकुर ने एक्चुअली एक्शन लेकर के यह सब चीजों को हटाया है अपने मन में से। अपने बालों से वह रसिक मेहतर जो है उसका टॉयलेट क्लीन किया है। आपको एक्शन लेकर के यह सब चीजों से मुक्ति प्राप्त करनी है। नहीं कि मन में मन में सोच करके तो यहां पे भी शरद महाराज ये जो लज्जा, घृणा, भय, जाति, कूल, शील, मान, अभिमान, अष्टपाश जो है उससे मुक्त होने के लिए सिर्फ ये इमेजिन नहीं करते कि हां मैंने गेरुआ पहन लिया है। मैं मुक्त हो गया हूं। वो एक्चुअली ही टेक्स एक्शन। सो यही शरद महाराज की सेवा भाव उनके भीतर में एकदम प्रकट हो गया था। तो अभी यह आलम बाजार मठ वहां पे बुखार अभी उतरा है। वीक है। हाथ पैर ध्रुज रहे हैं। मोहिन बाबू को कहते हैं भाई मैं तुमको चाय बनाकर पिलाता हूं। अभी मोहिन बाबू जितना भी मना कर रहे हैं। किंतु कौन सुनने वाला है? ऐसी ही अवस्था में शरद महाराज खड़े हुए और डाउन स्टेयर्स नीचे में नीचे वाले फ्लोर में जहां पर यह सब रखा था खाना बनाने का सामान तो अभी अंधेरा है और अभी एक ही सप्ताह हुआ है वराह नगर से आलम बाजार आए हैं तो कौन सी चीज कहां पे है वह भी कुछ ठिकाना नहीं तो अंधेरे में ही अंधेरे में ऐसा हाथ करतेकरते वो नीचे में उतरे उतरे और कहां से वह जो केरोसिन का जो डिब्बा होता है उसका जुगाड़ किया। फिर कहां पे यह चूल्हा रखा है वहां पर गए। फिर कहां पर पानी रखा है वह खोजा। किटली कहां पर रखी है वह निकाली। किटली में पानी भरा। वहां पे अग्नि प्रज्वलित किया और फिर पानी गर्म करके वो ऊपर में आ रहे हैं सीढ़ी चढ़ के। अब यह पूरा दृश्य मोहिन बाबू देख रहे हैं। बार-बार रिक्वेस्ट कर रहे हैं कि महाराज आप मुझे करने दीजिए। आप क्यों बोलते हैं नहीं भाई मैं अपने हाथों से तुमको बना के चाय पिलाना चाहता हूं। तो अभी पानी गर्म हो गया। पानी के भीतर में जो चाय डालनी है वगैरह सब एक बार रेडी हो गया। अभी ऊपर आना है क्योंकि चाय बेड पीने के लिए तो वह जो डाइनिंग हॉल वगैरह जो भी है मेन हॉल जो है वहां पर तो जाना है तो सीढ़ी चढ़ के गर्म पानी का किटली लेकर के ऊपर उठ रहे हैं। पैर तो उनके ध्रुज रहे हैं। पैर इधर से उधर गिर रहे हैं और फिर भी दीवाल को पकड़ पकड़ करके एक हाथ से किटली ले ऊपर आ रहा है। मोहिन बाबू ने उनके हाथ में से किटली लेना चाहा। वह भी नहीं दिया। नहीं भाई मैं अपने हाथों से सब करूंगा। तो अभी मोहिन बाबू बेचारे क्या बोलेंगे? साथ-साथ में चल रहे हैं। यह डर है कि कहीं गिर ना जाए और कहीं यह गर्म पानी उनके ऊपर ना गिरे। तो यह डर ले साथ-साथ में चल रहे हैं। ऊपर में आए। फिर एक बाटी लिया। बाटी में थोड़ा सा यह चाय डाला और चाय देख डाल के अपने हाथों से शरद महाराज ने मोहिन बाबू को दिया कि देखो भाई अभी तुम यह चाय पियो। तो मोहिन बाबू वो चाय पी रहे हैं। सो देखिए वो कहते हैं बाद में कि उस दिन शरद महाराज के चेहरे पे ये जो दिव्यता का शांति का परितृप्ति का जो भाव देखा मुझे चाय पिला करके यह दिव्यता कैसी है? ऐसा नहीं है कि कोई बहुत ज्यादा जप, ध्यान, साधन, भजन, तपस्या करके देखिए शरद महाराज के जीवन में जप, ध्यान, साधन, भजन, तपस्या का कोई अभाव नहीं है। किंतु उस दिन जबकि जस्ट अभी बुखार में से उठे हैं और फिर इस तरह से अपने को कि किस शब्दों में यह भाव को वर्णन करेंगे कि अपने को पूरा जो है वो मिला दिया है। अपने को संपूर्ण रूप से उन्होंने समर्पित कर दिया है। ईश्वर के चरणों को चरणों में अपने को संपूर्ण रूप से विलीन कर दिया है। जैसे कि और फिर बाटी में चाय निकाल के मोहिन बाबू के हाथ में देते हैं। भाई यह तुम पियो और मोहिन बाबू जब पी रहे हैं चेहरे पर जो तृप्ति का भाव, चेहरे पर जो दिव्यता का भाव, चेहरे पर जो शांति का भाव ऐसा भाव कब दिखेगा आपको? जबकि आप समाधि में से आप जब नीचे आते हैं या तो उच्च भाव में से आप जब वापस आते हैं तब चेहरे पर जो परितृप्ति है जब चेहरे पर वो जो शांति है उस तरह का भाव उनके चेहरे पर था। सो देखिए

श्रीरामकृष्ण वेदान्त : ब्रह्म-शक्ति-अभेद superposition of brahma & shakti

यह जो भाव है अपने संघ के वैविध्यपूर्ण भाव यह सब भाव इसका पपस क्या है? अ हम अभी यह सप्ताह श्री श्री रामकृष्ण कथामृत का पाठ करेंगे। मास्टर महाशय आए हुए हैं दक्षिणेश्वर में और जनाई के एक मुख के साथ में ठाकुर का वार्तालाप हो रहा था। पिछले जो हमारे क्लासेस थे उसमें हमने देखा कि जब मुखज जब विदाई ले रहे हैं ठाकुर स्वयं खड़े हुए जैसे कि उनको सम्मान करने के लिए तो हमने काफी विस्त विस्तृत रूप से देखा था कि ठाकुर को तो यह जो सामाजिक शिष्टाचार वगैरह है उससे कोई लेना देना नहीं था। इस अर्थ में नहीं कि वो माने अशिष्ट थे। इस अर्थ में कि उनका मन इतनी आध्यात्मिक ऊंचाई पर बैठा हुआ है कि शिष्टाचार उनके लिए सिर्फ एक मुखौटा मात्र है। सिर्फ एक हाइपोक्रेसी मात्र है। तो इस तरह के ठाकुर जब खड़े हुए उनको विदाई देने के लिए तो मुख ने हंसते-हंसते पूछा कि अपना राबार उठा बसा। म आपको आपको भी क्या उठना बैठना तो ठाकुर ने साहस्य कहा हास्य पूर्वक स्वर से कहा आभार उठा बसाबा खोति की और उठने में और बैठने में क्षति क्या है माने हानि क्या है जल स्थिर होले वो जल और हिलने धुलले वो जल जल यदि स्थिर है तो भी जल है हिलता है धुलता है तो भी जल है झोड़े रेटो पाता हवाते जे दिखे लोए जाए झड़ में यह झूठा पत्ता है। हवा उसको जहां पर ले जाए वह जाए। आमी जंत्रो तीन जंत्री मैं यंत्र हूं वो यंत्री है तो उस समय हमने देखा था कि किस तरह से इस तरह के एक मंडेन क्वेश्चन एक सामान्य प्रश्न के उत्तर में ठाकुर ने अपनी पूरी फिलॉसोफी एनकैप्सुलेट कर दी है। पूरी फिलॉसोफी का डीएनए जो है ठाकुर की वह एक ही अति सामान्य प्रश्न के उत्तर में हंसी मजाक व्यंग विनोद में व्यंग तो नहीं माने हंसी मजाक विनोद में जो प्रश्न किया गया है उस प्रश्न के उत्तर में ठाकुर ने अपना पूरा फिलॉसोफी को एनकैप्सुलेट करके दे दिया है। यानी देखिए ठाकुर के पास में सामान्य या तो मंडेन या तो फिर यह संसारी गृहस्थ इस तरह का कुछ नहीं था। जो भी है ईशावासम इदम सर्वम ये जो जगत है पूरा जो ईश ईश्वर से या ब्रह्म तत्व से छाया हुआ है। इसमें जगत में कुछ भी ऐसा नहीं कि जो कि ईश्वरमय ना हो जो कि ब्रह्ममय ना हो। तो इस तरह के सामान्य प्रश्न के उत्तर में भी हमने डिस्कस किया था कि ठाकुर ने अपना पूरा फिलॉसोफी दे दिया। इसमें हम जब पिछले क्लासों में डिस्कस कर रहे थे फिलॉसोफिकल एस्पेक्ट हमने डिस्कस कर लिया था। किस तरह से कि [गला साफ़ करने की आवाज़] जल स्थिर होले वह जल आार हेले दुले वह जल पानी स्थिर रहने पर भी पानी है हलन चलन करता है तब भी पानी है यह ठाकुर का जो सिद्धांत है मूलभूत सिद्धांत ब्रह्म शक्ति अभेद और यह ब्रह्म शक्ति अभेद का एक क्या ये जो पूरा वेदांतिक फ्रेमवर्क है ओवरऑल इसमें कहां पे यह आता है वह भी हमने देखा कि रामानुजाचार्य का परिणामवाद है। सगुण ब्रह्म और सगुण ब्रह्म का एक अंश कहो जो कि यह जीव जगत उसमें परिणत होता है जीव और जगत के रूप में तो सगुण ब्राह्मण है जैसे कि देह दे और जीव और जगत है देह। तो इस तरह से जो वैष्णव भावधारा या तो फिर विशिष्ट द्वैत वेदांत कहता है तो वह एक परिणामवाद है। यहां पे दूसरा एक्सट्रीम हमने देखा था कि गडपादाचार्य का अजातिवाद है कि निर्गुण ब्राह्मण मात्र है। जगत की उत्पत्ति ही नहीं हुई। जगत तीनों कालों में था ही नहीं। जगत असत है। जिस तरह से स्वप्न असत है, वैसे ही ये जागृत अवस्था भी असत है। स्वप्न में जिस तरह से कर्म का सिद्धांत जो है वो जब तक स्वप्न में है तब तक दिखता है। स्वप्न में से बाहर आ गए कुछ भी कैरी फॉरवर्ड नहीं होता। वैसे ही जागृत अवस्था में आपको लगेगा कि यह कर्म का सिद्धांत कार्य कर रहा है। किंतु एक बार आपने मुक्ति प्राप्त कर दी। कर्म का कुछ भी कैरी फॉरवर्ड नहीं होगा। तो दैट इज अनदर एक्सट्रीम कि जगत है ही नहीं। यहां पर है सगुण ब्रह्मण और सगुण ब्रह्मण का ही एक तरह से रूपांतरण जगत में हुआ है। यहां पे निर्गुण ब्राह्मण और जगत है ही नहीं। अभी प्रोस एंड को्स भी हमने देखे थे। निर्गुण ब्राह्मण का बेनिफिट यह है कि आध्यात्मिक जगत में जो सर्वोच्च उपलब्धि है वो निर्गुण ब्राह्मण के द्वारा आप कर सकते हैं यदि आप निर्गुण ब्राह्मण वाले कांसेप्ट को फॉलो करते हैं किंतु साथ में ही प्रॉब्लम क्या है कि व्यवहारिक जगत में किस तरह से रहना एथिक्स और मोरालिटी का क्या स्थान है वो आपको इमीडिएटली क्लियर नहीं होता तो वो एक प्रो एंड प्रोस एंड क्स हमने देख लिया था यहां पे सगुण ब्रह्म आपको जगत क्या व्यवहारिक सत्ता तो है जगत तो है क्योंकि सगुण ब्रह्मन ही एक तरह से परिणाम परिणत होकर के जगत बने हैं किंतु दैट इज उसका प्लस कहेंगे एथिक्स मोरालिटी कंपैजन दया करुणा वगैरह का एक महात्म है वगैरह का औचित्य है किंतु फिर सगुण ब्रह्मण जो है आपको एक लिमिट बांध देता है आध्यात्मिक जीवन में कहां तक आप जा सकते हैं। तो यह दो जो थी फिलॉसोफी शंकराचार्य ने इनको एक तरह से बीच में कहीं पे कंप्रोमाइज किया। एक ओर तो उन्होंने निर्गुण ब्राह्मण को स्वीकार किया। अर्थात कि आध्यात्मिक जगत में आप जितना ऊपर जा सकते हैं वो जाइए। देयर इज अल्टीमेट जो है निर्गुण निराकार ब्राह्मण वह तो एक हो गया कि उन्होंने स्वीकार किया। एट द सेम टाइम जगत की एक व्यावहारिक सत्ता उन्होंने स्वीकार की। तो यह जो है मायावाद शंकराचार्य का यह अजातिवाद गपादाचार्य का विशिष्ट अद्वैत रामानुजाचार्य का परिणामवाद तो शंकराचार्य का है मायावाद। मायावाद क्या कहता है? जब तक हमको यह जगत दिखता है तब तक उसका रिलेवेंस है। जैसे ही जगह हम ज्ञान प्राप्त करेंगे जगत अदृश्य हो जाएगा और हमको सिर्फ ब्रह्मन ही ब्रह्मन का ही साक्षात्कार होगा। ब्रह्मन दिखेगा नहीं। देखने के लिए तो सब्जेक्ट ऑब्जेक्ट और दृश्य डलिटी चाहिए। डलिटी अदृश्य हो अदृश्य हो जाती है। सिर्फ सेल्फ ही बच जाता है। तो फिर जैसे वो रज्जु और सब सर्प की उपमा कि सर्प चला जाता है। रज्जू रहता है। जब ज्ञान होता है। अज्ञान होता है तो फिर सर्प दिखता है। रज्जू नहीं दिखता। यानी कि है एक ही आइदर और करके दिखता है। सो शंकराचार्य ने एक तरह से कंप्रोमाइज किया। व्यवहार और परमार्थ इस तरह से बांट दिया। परमार्थ जो है निर्गुण निराकार ब्राह्मण किंतु व्यवहार के लिए हमको जगत की रिलेवेंट रिलेटिव सत्ता स्वीकार करनी होगी। तो यह एक पूरा था। किंतु इवन शंकराचार्य के ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या वाले सिद्धांत को हम फॉलो करें तो यहां पे जो बादबाद में जो रामकृष्ण संघ में जो दो डेवलपमेंट हुआ ठाकुर स्वामी विवेकानंद को वो मां शारदा देवी को रख के गए थे अपना आध्यात्मिक वारसा सुप्रत करके गए थे और उनके माध्यम से जगत में ठाकुर की भावधारा का प्रचार होना था। अभी यह मां और स्वामी जी दोनों का आप जीवन अध्ययन करेंगे तो आप देखेंगे कि अजातिवाद कि ब्राह्मण ही है। जगत की उत्पत्ति कभी हुई ही नहीं। यह यदि हम कहेंगे तो मां का जो जीवन का जो सार तत्व है मातृभाव वो मातृभाव का फिर कोई रिलेवेंस नहीं रह जाता। और फिर स्वामी जी के जीवन का और टीचिंग्स का जो सार भाव है कि शिव ज्ञान जीव सेवा उसका भी कोई तात्पर्य नहीं रह जाता। तो ना इधर शंकराचार्य का ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या वाला जो मायावाद है ना ही यह अजातिवाद जो है गडपादाचार्य का कि ब्राह्मण ही है जगत है ही नहीं। इन दोनों फिलॉसोफी में फिर स्वामी जी का शिव ज्ञान जीव सेवा और मां का जो मातृभाव है उसका रिलेवेंस नहीं रहता। आप रिलेटिवली इस जगत में है स्वप्न राज्य में है तो स्वप्न राज्य के नियम के अनुसार भले ही चाहे आप लोगों की सेवा कीजिए वो आपके पॉजिटिव कर्म एक्यूमुलेट होते रहेंगे। चित्त शुद्धि होती रहेगी। किंतु चित्त शुद्धि के एक लेवल पर पहुंच जाने के बाद में आपको फिर ज्ञान मार्ग का आश्रय लेना होगा। यदि ये जगत रूपी भ्रम से मुक्त होना है, जगत रूपी स्वप्न से मुक्त होना है, जागृत होना है, तुरीय अवस्था निर्विकल्प समाधि ब्रह्म ज्ञान आत्म साक्षात्कार प्राप्त करना है, तो फिर वो ज्ञान मार्ग ही एकमात्र मार्ग है, अन्य जितने भी मार्ग है भक्ति मार्ग, कर्म मार्ग उसका रिलेवेंस आपकी चित्त शुद्धि तक ही है। उससे ऊपर में नहीं है। यदि आप रामानुजाचार्य का परिणामवाद फॉलो करें तो शिव ज्ञान जीव सेवा और मां का मातृभाव दोनों का रिलेवेंस आता है क्योंकि जगत भी तो ईश्वर का ही सगुण ब्रह्मण का ही परिणत स्वरूप है तो फिर यहां पर यदि आप लोगों की सेवा करेंगे दीन दुखियों की सेवा करेंगे लोगों के प्रति मातृभाव रखेंगे तो वही भाव आपको सगुण ब्राह्मण या तो ईश्वर साक्षात्कार तक ले ले जाएगा। किंतु वहां पर प्रॉब्लम क्या है कि सगुण ब्राह्मण या तो ईश्वर ईश्वर साक्षात्कार तक ले जाएगा। किंतु आध्यात्मिक जीवन की उपलब्धि अंतिम उपलब्धि सर्वोच्च उपलब्धि तो उससे भी परे जाती है। वह तो निर्गुण निराकार ब्रह्मण तक जाती है। तो क्या करें? हम अपनी फिलॉसोफी को क्या दो लेयर में बांट दें कि हम जब तक अधिकारीवाद जिसको कहते हैं यह जो पूरा यह जो बट जाता है दो तरह के स्प्लिट हो जाता है अपना फिलॉसफी तो उसको रिकंसाइल करने के लिए अधिकार अधिकारीवाद डेवलप किया गया है। हम किस चीज के अधिकारी हैं? जब तक हम माया में फंसे हुए हैं तब तक विशिष्ट अद्वैत के अनुसार मातृभाव हो। लोगों के प्रति दया करुणा हो। लोगों को सहाय करना है। यह सबका रिलेवेंस है। और यह सबका रिलेवेंस आपको सर्वोच्च उद्देश्य जो है विशिष्ट अद्वैत का ईश्वर साक्षात्कार वहां पर ले जाएगा। और जैसे ही आपको ईश्वर साक्षात्कार हो गया आप अद्वैत वेदांत के अधिकारी हो गए। अभी आप अद्वैत वेदांत के रियाल में अद्वैत वेदांत के राज्य में प्रवेश करते हैं और फिर वहां से आप अभी निर्गुण निराकार ब्राह्मण प्राप्त करने के लिए सेकंड स्टेज की साधना प्रारंभ कीजिए। जब तक मैं माया में फंसा हूं तब तक मैं यह कहूंगा कि मैं माया के परे जाकर के निर्गुण निराकार ब्राह्मण प्राप्त करने के लिए ज्ञान योग का आश्रय ले रहा हूं। वो सब मिथ्या बातें हैं। वह सब मुंह से बोलना है। वास्तव में कुछ नहीं है। लोगों को ठगने के बराबर है। तो यह अधिकारीवाद एक डेवलप हुआ है कि यह दो डिस्टिंक्ट लेयर है उन दोनों को कनेक्ट करने के लिए। किंतु देखिए कि हमको अधिकारीवाद का आश्रय लेने की आवश्यकता नहीं है। ठाकुर का जो है ब्रह्म शक्ति अभेद यह यह जो ठाकुर का सिद्धांत वो हमको वििन वन फिलॉसोफिकल फ्रेमवर्क मां का मातृभाव है। स्वामी जी का शिवज्ञान जीव सेवा है और ठाकुर की निर्विकल्प समाधि की अनुभूति है। यह तीनों एक्सपीरियंस तीनों फैसेट्स जो है विदिन वन फिलॉसोफिकल फ्रेमवर्क हमारे सामने प्रस्तुत करते हैं। तो यह हो गया ठाकुर का ब्रह्म शक्ति अभेदवाद और इसमें हमने यह भी देखा था ऑलरेडी हमने यह देख लिया है कि ठाकुर जिस तरह से उदाहरण देते हैं सांप जो है कुंडली मार के बैठा है पड़ा है तो भी वही सांप है और वो जो सर्पाकार गति से चलता है तब भी वही सांप है। बाबू जब अपने कमरे में बैठकर के विश्राम कर रहे हैं तब भी वही बाबू है और फिर जब यही बाबू ऑफिस में जाकर के कर्म करते हैं तब भी वही बाबू है। जल स्थिर है तब भी वही जल है और समुंदर का जल और जब उसमें यह लहरें उठती है तो भी वही जल है। स्थिर होना और कर्म करना। ये ये जो स्टैटिक एंड डायनेमिक दोनों जो एस्पेक्ट है दीज़ आर मियरली टू एस्पेक्ट ऑफ द सेम अल्टीमेट रियलिटी। बस मोड चेंज होता है। तो, उसमें हमने यह देखा था कि हाउ इज़ इट पॉसिबल कि यह दोनों एस्पेक्ट पैरेलली को एग्ज़िस्ट हो सकते हैं। क्योंकि जिसको आज निर्विकल्प समाधि प्राप्त हुई जिसने कि यह जो शांत जल का दर्शन किया। अभी बाकी का पूरा जगत तो ये लहरों का दर्शन कर रहा है। शांत जल का साक्षात्कार किया और बाकी का जगत लहरों पर उछल रहा है। तो हाउ इज इट पॉसिबल के दोनों समय एक साथ में कोएस्ट करते हो। यह तो हम समझ सकते हैं कि जब जल शांत है तो शांत है। जब लहरें उठती है तो लहरें उठती है। क्या किंतु शांत और शांत होना और लहरें उठना दोनों संभव है। बाबू एक साथ में ही बैठे-बैठे विश्राम भी कर रहा है अपने घर में और साथ में ही ऑफिस में जाकर के कर्म भी कर रहा है। क्या दोनों चीज एक साथ में संभव है? सांप एक ही साथ में कुंडली मार के पड़ा है और साथ में ही सर्पाकार गति से चल रहा है। क्या दोनों एक साथ में संभव है? कैसे संभव है? क्योंकि हमारा जो आध्यात्मिक जीवन का एक्सपीरियंस तो यही कहता है। किसी एक साधक को निर्विकल्प समाधि हुई डज नॉट मीन कि पूरा जगत रुक जाए चलना। तो फिर दोनों को साथ में पैरेलली को एक्जिस्ट होना है। हाउ इज दिस पॉसिबल? यानी दो सत्ता नहीं दो मोड। एक गाड़ी को आप टॉप गियर में ले जाएंगे तो आगे चलेगी। न्यूट्रल गियर में रखेंगे तो वहां पे खड़ी रहेगी। गाड़ी एक ही है। उसके गियर आप चेंज कर रहे हैं। हाउ इज इट पॉसिबल के एक ही गाड़ी एक साथ में टॉप गियर में भी चलती है और न्यूट्रल गियर में बैठी भी है। हाउ इज दिस पॉसिबल? तो इसके लिए हमने जो हमने यानी कि मैंने जो एक अनुमान करके जो कांसेप्ट रेडी किया था क्वांटम डायनेमिक्स में से निकाल करके सुपरपजीशन। क्वांटम डायनेमिक्स में यह जो इलेक्ट्रॉन या सब एटॉमिक पार्टिकल होते हैं दो पोजीशन में एक साथ में होते हैं। वेव और पार्टिकल जो ड्यूलिटी है उनके नेचर का वो सुपर पोजीशन में होती है। जब उसको आप ऑब्जर्व करेंगे तब यह वेव फंक्शन कोलैप्स हो जाएगा। आइदर वेव रहेगा और पार्टिकल रहेगा। यह श्रोडिंजर्स के का यह जो श्रोडिंजर बोल के एक साइंटिस्ट उसने यह एक्सपेरिमेंट किया था। किया यह कर नहीं सकते हैं किंतु उसने यह थॉट एक्सपेरिमेंट गडांगकेन जर्मन वर्ड है गडांगकेन उसका अर्थ है थॉट एक्सपेरिमेंट तो ये उस समय बहुत सारे साइंटिस्ट जो थे ना फंडामेंटल फिजिक्स के वो सब जर्मन थे आइंस्टाइन इंक्लूडेड तो ये जर्मन वर्ड जो है वो एक साइंस की लैंग्वेज में आ गया है तो उसने ये जो थॉट एक्सपेरिमेंट किया कि एक बिल्ली है एक बॉक्स में रखी है बॉक्स में एक एटॉमिक डिवाइस है अभी अभी ये एटॉमिक डिवाइस सम सॉर्ट ऑफ सुपरपजीशन में है। यानी कि वो एटॉमिक डिवाइस एक जहर की एक शीशी है। उसको रिलीज करती है। अभी जहर रिलीज होगा तो बिल्ली मर जाएगी। और जहर रिलीज नहीं होगा तो बिल्ली जिंदा है। अभी एटॉमिक डिवाइस है सुपरपजीशन में। यानी कि आप डिटरमाइन नहीं कर सकते कि जहर रिलीज हुआ है कि नहीं हुआ। बिल्ली जिंदा है कि मरी हुई है? इन दिस सिचुएशन क्या होगा कि बिल्ली जो है सुपरपजीशन में है। थ्योरेटिकली दिस इज पॉसिबल कि जिंदा भी है, मृत भी है। ऑफ कोर्स प्रैक्टिकली पॉसिबल नहीं क्योंकि ये जो क्वांटम फिनोमिना जो है सब एटॉमिक पार्टिकल पे ही लगते हैं। मैक वर्ल्ड में बड़े जगत में यानी कि एट सब एटॉमिक पार्टिकल के ऊपर के लेवल में क्वांटम फिनोमिना अप्लाई नहीं होते। किंतु जो भी है दिस इज़ अ थॉट एक्सपेरिमेंट। एक सामान्य आदमी को समझ में आए ये कितना वियर्ड है ये क्वांटम डायनेमिक्स कितना विचित्र है तो एक बॉक्स में बिल्ली है शी इज इन अ इट इज इन अ सुपरपजीशन जिंदा भी है और मृत भी है जब तक आप बॉक्स खोल के उसको देखेंगे नहीं ऑब्जर्व नहीं करेंगे जब तक उसका वेव फंक्शन कोलैप्स नहीं होगा तब तक यह बिल्ली दोनों पोजीशन में साथ में रहेगी इस कांसेप्ट को कहते हैं सुपरपिशन। सो इस सुपरपज़िशन वाले कांसेप्ट को यदि हम यहां पे अप्लाई करें ब्राह्मण एक साथ में स्थिर भी है और कार्य भी कर रहे हैं। और यह जो सुपरपिशन है उसी की वजह से यह दोनों स्टेट को एग्जिस्ट करते हैं। जब हमको निर्विकल्प समाधि प्राप्त होगी तब यह वेव फंक्शन कोलैप्स हो जाएगा। हमको स्थिर निर्गुण निराकार ब्रह्मण का ही साक्षात्कार होगा। किंतु जैसे ही यह रिलेटिव वर्ल्ड में वापस आएंगे, सुपरपजीशन फिर से अप्लाई होगा, इंपोज होगा, वेव फंक्शन फिर से बनेगा और हमको यह जगत जो है कार्यकर्ता सा दिखाई देगा। सो दिस इज ये हमने डिस्कस किया था। हमारा जो आखिरी पॉइंट इसमें जो बचा था कि जैसे ये हमने कहा ना कि ये ये जो दो-तीन जो सेंटेंस है तीन सेंटेंस है तीनों सेंटेंस में ठाकुर ने अपना पूरा फिलॉसोफी रख दिया है। पानी स्थिर रहने से भी पानी है और हिलता चलता है तो भी पानी है। यानी कि ये ब्रह्मशक्ति अभेद वाला कांसेप्ट यहां पे क्लियर हुआ। अभी यह जो बाकी के यह जो दो अह स्टेटमेंट है, यह झड़ में यह जो झूठा पत्ता है, हवा उसको जहां पे ले जाती है, वहां पे जाता है। मैं यंत्र हूं वो यंत्री है। यानी कि देखिए कि यहां पे सगुण ब्रह्म या तो फिर ईश्वर का अस्तित्व स्वीकृत किया गया है। वहां पहले वाले स्टेटमेंट में उन्होंने निर्गुण निराकार ब्रह्मण जो है उसका अस्तित्व स्वीकार किया है। सेकंड वाले स्टेटमेंट में ईश्वर का भी अस्तित्व स्वीकार किया है। दोनों एक समान ऑन अ सिंगल पेडेस्टल यह है। हाउ इज दिस पॉसिबल? ब्रह्म शक्ति अभेद रहने से ही यह पॉसिबल है। यदि रामानुजाचार्य की तरह आप सगुण ब्रह्म पे आ जाए तो फिर निर्गुण निराकार ब्राह्मण चला जाता है। शंकराचार्य या गडपादाचार्य की तरह जगत का अस्तित्व को आप या तो नकार देते हैं या तो फिर एक रिलेटिव लोअर पोजीशन में ले आते हैं। निर्गुण निराकार ब्राह्मण को ही सर्वोच्च पेडेस्टल पर रखते हैं। तो फिर यह जगत में हम जो यह शरणागति है, यह दया है। ये भाव जो है वो फिर क्या है ना उसका महात्म्य उसका प्राधान्य जैसे कि कम हो जाएगा। ये शरद महाराज का ये जो भाव हमने डिस्कस किया ये कितना गंभीरता से आता है। उनका बार-बार कहते हैं शरद महाराज कि अरे भाई ईश्वर प्राप्ति तो हुई नहीं। ब्रह्म साक्षात्कार तो हुआ नहीं। बस मैं लोगों की सेवा करके जीवन पात कर देना चाहता हूं। यदि सेवा करते-करते मैं मर भी जाऊंगा तो भी मुझे वो मंजूर है। तो क्योंकि मुझे ईश्वर प्राप्ति तो हुई नहीं। तो देखिए ये जो सेवा करके करके जीवन पात कर देना जीवन को अपने अपनी लाइफ को होम देना उसके भीतर में संपूर्ण रूप से गला देना इसका आध्यात्मिक रिलेवेंस क्या है? ऐसा करके करके ही आप ब्रह्म साक्षात्कार कर सकते हैं। आपको फिर यह अधिकारीवाद यहां पर लाने की जरूरत नहीं है। मां का जीवन देखिए। मां की करुणा के कितने कितने एग्जांपल हम लोगों ने देखे हैं। तो वह सब क्या स्वामी जी का यह शिव ज्ञान है जीव सेवा मां का यह मातृभाव मां की यह करुणा यह शरद महाराज का यह जो सेवा भाव क्या यह सब हमारी चित्त शुद्धि के लिए ही है क्या यह हमको यह सिर्फ एक अधिकारीवाद में लोअर अधिकारी से हायर अधिकारी वन स्टेप ऊपर ले जाने के लिए ही है क्या उसके बाद में जब हम अधिकारी हो गए दया या तो सेवा यह भाव हमारे में आरोप करके हम यदि अधिकारी हो गए तो फिर क्या हमको कंपलसरी ज्ञान मार्ग का आश्रय लेना होगा सेकंड स्टेज ऑफ साधना करने के लिए क्या तो वो जो प्रश्न होता है वो प्रश्न का उत्तर यही है कि ब्रह्म शक्ति अभेद यदि दया भाव है करुणा है मातृभाव है यह सेवा भाव है इसके माध्यम से आप सीधा निर्विकल्प समाधि की ओर जा सकते हैं आपको कोई यह बीच में फेस चेंज करने की जरूरत नहीं है। अधिकारीवाद को यहां पर लाने की जरूरत नहीं है। सो दिस इज व्हाट कि एक ही तीन सेंटेंस के उत्तर में ठाकुर ने अपना पूरा फिलॉसोफी यहां पर बताया है। देखिए इसको लेकर के हम बहुत कुछ डिस्कस कर सकते हैं। कर्म का जो सिद्धांत है, कर्म का सिद्धांत तो तभी अप्लाई होता है जब कि हम इस रिलेटिव वर्ल्ड में होते हैं। ब्रह्म साक्षात्कार जहां पे हुआ वहां पर कर्म और कर्म के फल का कोई अस्तित्व ही नहीं रहता। और तो फिर यदि यहां पर आप यह कहेंगे कि ब्रह्म शक्ति अभेद तो यहां पर आप कर्म के सिद्धांत को किस तरह से अप्लाई करते हैं वो एक क्वेश्चन आता है। दूसरा एक बड़ा ही सीरियस फिलॉसोफिकल एक खड़ा होता है अ इशू कि ठाकुर की भावधारा के भीतर में बेसिकली भारत की तीन मेजर स्ट्रीम्स का समावेश हुआ है। एक तो वैष्णव भावधारा है। दूसरी वेदांत भावधारा है। तृतीय है शक्ति साधना। तो वैष्णव भावधारा वेदांतिक फिलॉसोफी शक्ति साधना तीनों का संगम ठाकुर की भाव में ठाकुर की फिलॉसोफी में है। वैष्णविज्म का आप देखिए अवतारवाद ठाकुर के जीवन में अवतारवाद खास करके बाद में यह प्रगटित होता है। यह तो हमने स्पष्ट रूप से देखा है। वह जो महिमा चरण के साथ में ठाकुर वार्तालाप कर रहे हैं। तो ठाकुर बार-बार ऐसा कह रहे हैं कि चैतन्य देव की यह अवस्था थी। चैतन्य देव की यह अवस्था थी। फिर ठाकुर ने स्पष्ट रूप से कहा देखो इस शरीर में ना स्वप्न में भी कभी काम भोग नहीं हुआ है। यानी कि ठाकुर स्पष्ट रूप से कहना चाहते थे। माने मैं अवतार हूं। यह शब्द नहीं यूज करके जो बाकी जितने भी शब्द यूज करना पॉसिबल है, सब यूज करके उन्होंने कह दिया। किंतु फिर भी वह जड़ आदमी ऐसा वो कहता है महाशय आपके अदृष्ट का जोर है इसलिए आपको यह सब हुआ है। मास्टर महाशय लिखते हैं कि यह क्यों क्या सुनकर के भी नहीं सुन रहा है। समझ करके भी नहीं समझ रहा है कि ठाकुर अपने अवतारत्व को प्रकट कर रहे हैं। तो देखिए ठाकुर ने बात सिर्फ यह नहीं कि कैंसर हो गया है। नरेंद्र सामने बैठा है। नरेंद्र पूछता है कि इस समय आप कहिए कि आप अवतार है तो मैं मानू। उस समय ही नहीं पहले भी कितने ही डिवोटी को एक बार उनको लगा कि ये एक एलिजिबल पर्सन है अपना जो सही स्वरूप है वो प्रकट करना शुरू कर दिया था। मास्टर महाशय नए-नए आए हैं ठाकुर के पास में ये द्वितीय ना कि तृतीय ही मुलाकात है। 1881 की बात है ये सब। उस समय ठाकुर पूछते हैं कि बताओ तो मैं तुमको किस तरह से आमीतोमा के की रूप बोध होए? तुम मुझे किस दृष्टि से देखते हो? मेरे बारे में तुम्हारी क्या धारणा है? तो बताओ मुझे कितना आना ज्ञान हुआ है? तो मास्टर महाशय बेचारे कहते हैं कि कितना आना यह तो पता नहीं किंतु आपके भीतर में जो भक्ति है, भाव है, प्रेम है, त्याग है, इस तरह का और कहीं नहीं देखा। तो ठाकुर हंसने लगे। यानी ठाकुर जब एक बार देख लेते हैं कि अंतरंग भक्त होने के लायक है और अंतरंग नहीं भी है। महिमाचरण जैसे सबके सामने एक बार तो अपने स्वरूप के बारे में चर्चा करते ही करते हैं। ठाकुर यह देखते हैं कि वह मेरे बारे में क्या धारणा करता है। उसके अनुसार उसकी उपलब्धि का मेजरमेंट करते हैं। नहीं कि एस सच उसके भीतर में कितना तपस्या वगैरह है। नो डाउट इन सब में तपस्या वगैरह का कोई अभाव नहीं। त्याग का कोई अभाव नहीं किंतु सिर्फ त्याग इनफ नहीं है। अंतरंग के रूप में गिनने के लिए आपको आपके भीतर में फिर यह ठाकुर के प्रति जो धारणा है वह भी परिवर्तित करनी होगी। ठाकुर को अवतार के रूप में स्वीकार करना होगा। सो ये देखिए कि अवतार तत्व ठाकुर को जब भी आप ठाकुर का जीवन पढ़ेंगे स्पष्टतम रूप से दिख जाता है कि अवतार तत्व को लेकर के ही उनका पूरा जीवन चल रहा है। तो वह तो वैष्णव भावधारा का अवतार तत्व शक्ति तत्व में कोई प्रश्न ही नहीं है कि ठाकुर ने शक्ति की आराधना की थी। ब्रह्म शक्ति अभेद यह स्पष्ट रूप से कहा है मां शारदा का अपने संघ में होना शक्ति का म एक मूर्तिमंत शक्ति मां शारदा सो शक्ति तत्व है उसका कोई प्रश्न ही नहीं है और तीसरा वेदांत बात निर्विकल्प समाधि अद्वैत वेदांत ये तो सब स्पष्ट है जग जाहिर है तो ठाकुर के जीवन उनकी शिक्षा और उनकी फिलॉसोफी में यह तीनों किस तरह से एक साथ में इंटरवोवन है। दैट इज वन चैलेंज दैट वी हैव टू सॉल्व। देखिए ठाकुर के ये जो महामंत्र है महावाक्य है कि ब्रह्म शक्ति अभेद यह एक महावाक्य है काम कांचन त्याग ये दूसरा महावाक्य है जय राम जय कृष्ण किंतु तोर वेदांत दिख दिए नहीं जय राम जय कृष्ण श्री राम कृष्ण से श्री दम राम कृष्ण किंतु तोर वेदांत दिख दिए नहीं जो थे राम जो थे कृष्ण वही आज राम कृष्ण के रूप में अवतरित हुए हैं किंतु तुम्हारे वेदांत की दृष्टिकोण से नहीं यानी कि सबके भीतर में वही ब्राह्मण है। वह चींटी के भीतर में भी और यह केले के पत्ते के भीतर में भी वही ब्राह्मण है जो कि राम और कृष्ण में थे। उस दृष्टि से नहीं वही राम वही कृष्ण आज रामकृष्ण के रूप में अवतार के रूप में प्रकट हुए हैं। आविर्भाव हुए हैं। तो ये जो कुछ-कुछ महावाक्य है श्री रामकृष्ण कैनन के रामकृष्ण लिटरेचर के उस सबको कलेक्ट करके एक ओवरऑल फिलॉसोफी का गठन हमको करना है। एक ओवरऑल फ्रेमवर्क को हमको बनाना है। जिससे कि क्या होगा कि यह अधिकारीवाद जैसा एक पेच वर्क जो है हमको यहां पे ना एंप्लॉय करना पड़े। विद इन दैट सिंगल फिलॉसोफिकल फ्रेमवर्क ठाकुर मां स्वामी जी तीनों का जीवन संदेश और उपदेश हम एक ही साथ में यूनिवर्सली एज ए होल हम समझ पाए। सो दैट बिग वर्क इट रिमेंस टू बी डन। सो अभी इसके बाद में अभी हम कल से देखना शुरू करेंगे कि आगे ठाकुर क्या कहते हैं। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु

एक भक्त : ब्रह्म-शक्ति-अभेद और विज्ञानवाद में फर्क क्या है?

देखिए विज्ञानवाद बोलकर के कुछ है नहीं वो आयन ने खड़ा किया है। एक्चुअली ठाकुर जो कहते हैं कि नेति नेति करके ब्रह्म साक्षात्कार करना है। इति इति करके वापस आना है। तो इति इति करके आप वापस आएंगे ही क्यों? यदि जगत का कोई रिलेवेंस नहीं है तो वापस आने का कोई प्रश्न ही नहीं है। यह ऐसा हो गया कि मान लीजिए मैं अजातिवाद को फॉलो करता हूं। आज मैं स्वप्न से जग गया तो फिर मैं क्या स्वप्न में वापस जाऊंगा? स्वप्न में जितने भी लोग थे उनको मैं देख के कहूंगा कि अरे भाई आप सब लोग स्वप्न से जग जाइए। जागृत अवस्था इज मच बेटर देन ड्रीमिंग अवस्था। मैं ऐसा करूंगा नहीं करूंगा। क्योंकि स्वप्न में जो देखा उसका कोई अस्तित्व ही नहीं है। यह ठाकुर का जो उदाहरण है वो जो दो-तीन मित्र गए एक मित्र ने वह दीवार पर खड़े उठ के देखा कि वहां पे बहुत ही सुंदर दृश्य है। तो हो करके हंसते-हंसते उस साइड में कूद गया। एक मित्र जो है किंतु वो देखने के बाद में दीवार से इस साइड वापस आया और सबको कहता है कि दीवार के उस साइड ही चलो। राइट? यह कब होगा कि जब जो लोगों का अस्तित्व माने एक रिलेवेंस है उनका एक अस्तित्व है तभी तो आप आएंगे। रियलिटी रियल है बोल के तो वापस आएंगे। तो ठाकुर वापस आते हैं इति इति करके। उसका अर्थ ही है कि जगत का एक अस्तित्व है। यह शंकराचार्य के ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या वालेवाद में भी फिट नहीं होता। अजातिवाद में तो होता ही नहीं है। सो ठाकुर वापस आए। दैट मींस कि जगत उसका अस्तित्व है। जगत में आप जो करते हैं आमी चीनी होते चाइना मा चीनी खेते भलो बाशी मैं चीनी होना नहीं चाहता चीनी खाना चाहता हूं। हाउ इज दिस पॉसिबल चीनी सत्य है तभी तो आप उसको खाएंगे। चीनी यदि स्वप्न में ही है वो खाने के क्या आनंद मिलने वाला है। सो देयर इज नथिंग समथिंग कॉल्ड विज्ञानवाद। देयर इज ब्रह्म शक्ति अभेद जो कि ठाकुर ने स्वयं कहा है।

एक भक्त : जगत असत या मिथ्या है तो गौड़पादाचार्य या शंकराचार्य ने भाष्य क्यों लिखे ?

देखिए उन लोगों का क्या आंसर है? शंकराचार्य का आंसर बड़ा क्लियर है कि ब्रह्म साक्षात्कार के बाद में जो शरीर टिकता है जो जीवन मुक्ति की अवस्था वो है कि कर्म का जो माने जो कर्म ऑलरेडी आपने कर दिए हैं उसका भोग समाप्त हो वह करने के लिए जब तक वह कर्म का भोग समाप्त नहीं होता। नए कर्म तो बनने वाले नहीं किंतु जो कर्म कर दिए हैं उसका कर्म फल समाप्त हो। इसके लिए जीवन मुक्ति वाली अवस्था है। जब यह कर्म फल समाप्त हो जाएंगे आप विदेह मुक्ति प्राप्त कर लेंगे। यानी कि फिर मुक्ति के बाद में देह चला जाएगा। यानी कि ये जो कर्म का सिद्धांत है उसका एक रिलेवेंट एक्सपीरियंस एक रिलेटिव एकिस्टेंस है और वो रिलेटिव एग्जिस्टेंस निर्विकल्प समाधि के बाद में भी बना रहता है और इसलिए आपको कर्म का भोग संपूर्ण करना होगा। दैट इज शंकराचार्य का है। गडपादाचार्य का तो सजदी स्वप्नवत ही है सब कुछ। तो ब्रह्म साक्षात्कार के बाद में कर्म का भोग वो कांसेप्ट ही नहीं आता। कर्म का भोग समाप्त करना वह कांसेप्ट ही नहीं आता। वहां पर विदेह मुक्ति का प्रावधान है। तो गडपादाचार्य ने कारिका क्यों लिखी? उसका एक ही उत्तर हो सकता है कि ब्रह्म साक्षात्कार करने से पहले उन्होंने यह कारिका लिखी होगी। जैसे ही ब्रह्म साक्षात्कार हो गया विदेह मुक्ति प्राप्त कर दी। सो दैट इज फ्रॉम देयर पॉइंट ऑफ व्यू।

एक भक्त : संसार को हम असत या मिथ्या ही मानते रहे है अभी तक. किन्तु ठाकुर ही हमें संसार का माहात्म्य सिखाते है

ना किंतु देखिए ठाकुर की फिलॉसोफी में सब कुछ फिट बैठ जाता है। इवन धो ठाकुर कहते हैं नेति नेति ब्रह्म साक्षात्कार इति इति किंतु यही कांसेप्ट जब मां और स्वामी जी के हाथ में आता है तो ट्रांसफॉर्म हो जाता है। इति इति ब्रह्म साक्षात्कार इति इति राइट यदि यह इति इति प्रारंभ में नहीं होता यदि प्रारंभ में नेति नेति ही करना होता तो मां का मातृत्व और स्वामी जी का शिव ज्ञान जीव सेवा वाला वही हाल होता जो कि शंकराचार्य की फिलॉसोफी में होता है कि चित्त शुद्धि के लिए है। एक साधना के रूप में है। अपने आप में उसका कोई रिलेवेंस नहीं है। यानी कि बाय प्रोडक्ट के रूप में है। यह आप करेंगे। आपका आपका उद्देश्य है ईश्वर प्राप्ति ब्रह्म साक्षात्कार किंतु सीधा नहीं हो सकता आप इस माध्यम से जाइए उल्टा कान पकड़ने वाली बात जबकि आप ब्रह्म शक्ति अभेद इस कांसेप्ट को पकड़ते हैं तो आप जगत में जो करते हैं उसका एक रिलेवेंस है वो सीधा आपको ब्रह्म साक्षात्कार की ओर लेके जाता है यानी मातृभाव और यह सेवा भाव ये दोनों दे आर परफेक्टली रिलेवेंट विद इन दिस वर्ल्ड यानी इति इति ब्रह्म साक्षात्कार इति इति दैट इज इज़ द अल्टीमेट कंक्लूजन ऑफ रामकृष्ण भावधारा। यह नेति नेति इति यह भी कांसेप्ट फिर ठाकुर का फिर बाद में सुपरसीड हो जाता है। म वो वो कांसेप्ट सुपरसीड हो जाता है बाद में। ये ने जो किया है ने क्या किया है? सिर्फ ठाकुर के इस स्टेटमेंट को पकड़ करके उसने फिलॉसोफी की है कि पहले नेति नेति फिर निर्विकल्प समाधि और फिर इति इति करके वापस आना। स्वामी ठाकुर क्या कहते हैं? एक एक ज्ञानी है जिसने कि दूध के बारे में सुना है, जानता है, विज्ञानी है जिसने दूध खाया है। इस अर्थ में कि वो ब्रह्म साक्षात्कार करने के बाद में वापस आता है। दैट इज कि विज्ञानी की अवस्था। तो इस स्टेटमेंट के बेस पे वो विज्ञानवाद चल आता है। किंतु हम लोग जो है जो कि ठाकुर मां स्वामी जी तीनों को एक ही गिनते हैं। हमारे हिसाब से ठाकुर का यह जो स्टेटमेंट है वो भी बाद में सुपरसीड हो जाता है। वि इज कि जो लोग अवतारवाद को फॉलो करेंगे। उनको यह थोड़ा आश्चर्यजनक लगेगा। अवतार ने जो कहा बाद में उनके शिष्यों के द्वारा कहे हुए स्टेटमेंट से अवतार का स्टेटमेंट कैसे सुपरसीड हो जाएगा। बट दैट इज ट्रू। माने हमारे पास में इनफ प्रूफ है। रामकृष्ण विवेकानंद साहित्य बड़ा ही क्लियर है। एक तीन तीन एक ठाकुर मां स्वामी जी माने यहां पे आप यदि ब्रह्म शक्ति अभेद कहते हैं तो हम कहेंगे ठाकुर मां स्वामी जी अभेद व्हिच इज द मोस्ट फंडामेंटल स्टेटमेंट ऑफ रामकृष्ण विवेकानंद भावधारा इसीलिए इसीलिए सिंगल सिंगल स्टेटमेंट को लेकर के आप जाएंगे तो आपके कंफ्यूजन होने की संभावना है। आप तीनों को एक साथ में लीजिए। रामकृष्ण विवेकानंद साहित्य समग्र इफ आई मे यूज़ दैट वर्ड इसको आप लीजिए देन ओनली द कंट्राडिकशंस विल बी कट ऑफ

एक भक्त : ब्रह्म-शक्ति-अभेद को सुनकर भी हम कर्मयोग को मुख्य साधना के रूप में नहीं स्वीकार करते

यहां पे देखिए बात सिर्फ यह नहीं है कि वेदांत आपको कहता है ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या इवन ठाकुर को भी आप पढ़ेंगे तो कर्मनाशा एक नदी है उसमें जंप लगाने से ही हुआ अ कर्म का त्याग करके वैराग्य की ओर जाना या तो फिर ये नेति नेति करके ईश्वर साक्षात ब्रह्म ज्ञान प्राप्त करना ये ठाकुर के कथामृत में भी ये माने भरपूर रूप से पड़ा हुआ है। राइट? सो माने यह जो कंफ्यूजन है उसका रूट सिर्फ वेद वेदांत ही नहीं उपनिषद ही नहीं किंतु इवन कथामृत पढ़कर के भी आपको लगेगा कि सेम कि जगत छोड़कर के कहीं पर चले जाना है। सो किंतु मां और स्वामी जी है जो कि ठाकुर का ये जो डीप मैसेज है उसको एक क्या कहेंगे कि उसको क्या कहेंगे कि उसको कंप्लीट करते हैं। दैट इज वन पार्ट ऑफ द इक्वेशन। ठाकुर इज वन पार्ट ऑफ द इक्वेशन। माय एंड स्वामी जी आर द अदर पार्ट ऑफ द इक्वेशन। सो तीनों को साथ में पढ़ने से ही यह कंफ्यूजन कम होगा। अदरवाइज इवन आप कथामृत और लीला प्रसंग को पढ़ेंगे इट विल साउंड लाइक नथिंग बट द एक्सटेंशन ऑफ ये जो अपनी ट्रेडिशनल भाव है कि अवतारवाद वो तो था ही था। इतने सालों से है। माने हजारों सालों से है। अवतारवाद या वैष्णव भाव तो अपने घर-घर में फैला हुआ है। वेदांत तो है ही है। शक्ति साधना इतनी पुरानी है। ठाकुर को पढ़ने से सिर्फ इतना लगता है कि उन्होंने ये तीनों स्ट्रीम्स को रिकंसाइल किया है। यहां तक कि एक उनका रिलेवेंस रखता है। बट अदर पार्ट ऑफ द इक्वेशन के शक्ति इज़ एज रियल एज ब्रह्मन दैट कम्स इनटू प्ले ओनली विद दी अंडरस्टैंडिंग ऑफ मदर एंड स्वामी जी। सो दैट इज देयर

एक भक्त : किसी ने ऐसा कहा की स्वामीजी ने ठाकुर के सन्देश को बिगाड़ दिया है. ठाकुर परंपरागत संत ही थे - बिना मतलब स्वामीजी सेवाकार्य की बात ले के आये है.

माने ये लोग यदि मां की लाइफ को पढ़ेंगे तो क्या होगा [हंसी] भाई संसार में रहती थी राधुराधु बोल के पागल हो जाती थी [हंसी] माने इन लोगों की दृष्टि से ठाकुर का यदि कंट्रीब्यूशन है तो वही है कि उन्होंने ने ये जो तीन मेजर स्ट्रीम है उनका रिकंसिलिएशन किया है। दैट इज ठाकुर कंट्रीब्यूशन। किंतु ठाकुर का जो इवन ग्रेटर कंट्रीब्यूशन है कि ये जो ब्रह्मा और जगत यानी कि माने अदर वर्ल्डली रियलिटी एंड दिस वर्ल्डली रियलिटी इन दोनों का जो रिकंसिलिएशन ये बहुत कम लोगों को समझ में आता है। इवन यहां पे भी आप देखेंगे हमारे बीच में स्प्लिट हो जाता है। कोई कहेंगे कि उपनिषद और कथामृत वाले ठाकुर को फॉलो करो। नहीं कि मां को तो फिर भी चलो आप एक मातृत्व की ममता की मूर्ति बोल के आप एक शाइन में बिठा देंगे। स्वामी जी को किसी भी तरह से आप रिकंसाइल नहीं कर सकते। [हंसी]

एक भक्त : किसी ने ऐसा कहा की हमें स्वामीजी का सेवाकार्य अच्छा नहीं लगता

एक्चुअली देखिए जब हम स्वामी जी का लाइफ स्टडी करेंगे ना स्वामी जी के खुद के जीवन के जो एस्पेक्ट्स जो है ना माने दे आर सो रिच एव्री एस्पेक्ट ये शरद महाराज का ये जो ये जो सेवा भाव था इतना डीप था उनके भीतर हम सबको पता है कि मां के माने मायर भारी माने मां का जो पूरा रिस्पांसिबिलिटी मां का जो सेवा करना सब उनके ऊपर में था गणेश मां कहती थी मेरे गणेश थे तो म यह [गला साफ़ करने की आवाज़] पता होने के बावजूद भी जब शरद महाराज की यह सब कहानियां सुनेंगे देयर आर सो मेनी सच स्टोरीज व्हिच ब्रिंग्स आउट दिस रिचनेस ऑफ दिस नेचर तो यह तो शरद महाराज है स्वामी जी की स्टोरी स्वामी जी के नेचर का यह जो डेप्थ है रिचनेस है दैट इज फार ग्रेटर जितना जितना हम स्वामी जी की लाइफ का स्टडी करते जाएंगे इतना ही हमको पता चलेगा कि ही इज़ नॉट जस्ट अ कर्म योगी जो स्पिरिचुअल डेप्थ उनमें था। उनके नेचर के जो विभिन्न एस्पेक्ट है सो रिच दे आर हां वो हां हां हां [हंसी] हां वो जो सब हिमालय से सब वापस आए और सभी म छोटा सा वराह नगर मठ हो गया था लगभग पांच छह गुरु भाई इकट्ठा हो गए थे स्वामी जी ने अपने हाथों से वो डिश बनाई थी बिरयानी ही मोस्ट प्रोबेबबली नाम भूल गया मैं सो व्हाटएवर हरि महाराज ये स्टोरी कहते हैं हरि महाराज ने खाया बहुत अच्छा लगा तो स्वामी जी ने पूरे का पूरा उनको दे दिया बोला कि ये तो मैंने तो बहुत सारा आ तो ढेर खए छ सब मैंने तो यह सब बहुत खाया है। अभी तुम ही लोग खाओ और तुमको खाता देख के मुझे तृप्ति मिलेगी। तो हरि महाराज कहते हैं देखिए स्वामी जी ने इतना मेहनत करके बनाया एक कण भी अपने मुंह में नहीं डाला। सब गुरु भाइयों को दे दिया। ओम