Transcript
सो राम कृष्णा कथामृत एक दिन स्वामी जी एक दिन ठाकुर जिससे की वह ठीक से कर होगा तो ठाकुर कहते हैं मास्टर विद्यासागर को मिलने के लिए गए और विद्यासागर के साथ में डिस्कशन हो रहा है ठाकुर कहते हैं यदि ईश्वर पर प्रीति पैदा हो जाए तो इन कर्मों की अधिक आवश्यकता नहीं जब तक हवा नहीं बाटी तभी तक पंख की जरूर होती है यदि दक्षिणी हवा आप ही आने लगे तो पंखा रख देना पड़ता है फिर पंख का क्या कम देखिए ठाकुर उदाहरण भी इतने सुंदर देते हैं की यदि आप जैसे अभी आजकल पंखा नहीं आज ऐसी अभिजड़ी बारिश हो रहा है ठंडी के दिन है और टेंपरेचर ड्रॉप हो जाता है तो आपको ऐसी की जरूर नहीं है और जैसे अभी आजकल हो रहा है गुजरात में तो 42 43 डिग्री तक टेंपरेचर जाएगा तो फिर आपको जो है एक की जरूर पड़ेगी तो वैसे ही जीवन में सड़क के जीवन में क्या होता है की हम लोग कभी-कभी सोचते हैं की चलो मैं साधना कर रहा हूं मैं इतने दोनों से कर रहा हूं तो धीरे-धीरे मेरा प्रगति तो होगा उसमें फिर मुझे औरतें को एक बार मैंने दिन के एक-एक हजार जब करना शुरू कर दिया और एक बार मुझे ध्यान करके जो आनंद मिल गया है तो जीवन में तो अभी सब समय ऐसा ही तो बना रहेगा ना सही तो होना चाहिए जैसे स्कूल में होता है स्कूल में एक बार हमने परीक्षा पास कर दी और परीक्षा में जैसे ए ग्रेट हमको मिल गया 78% मिल गए तो ऐसा तो नहीं है की वो से परीक्षा हमको बार-बार देनी होगी और हर बार रिजल्ट चेंज होता होगा ऐसा तो नहीं है फिफ्थ स्टैंडर्ड की परीक्षा दी तो वो पास करके भी सिक्स्थ स्टैंडर्ड की देंगे सिक्स्थ की पास करके सेवंथ की देंगे ऐसा तो होगा नहीं की हर बार जितनी भी भर में परीक्षा देता हूं फिफ्थ की भी फिर से दूंगा सिक्स्थ की भी दूंगा सेवंथ की भी 8 9 10 जितने भी परीक्षाएं मैंने जितनी भी बार दी है मैं नई परीक्षा देने से सबको पहले से देना होगा ऐसा तो इस जीवन में नहीं होता है हमारा सैलरी है हमारा प्रमोशन है हमारा जब है सब जगह पे हमने यदि एक कोई अचीवमेंट किया है तो जनरली वो वहां पे स्थिर राहत है बाद में हमको नया अचीवमेंट करना है किंतु पहले वाला अचीवमेंट तो है हमारा सर्टिफिकेट तो है कॉलेज का सर्टिफिकेट में जो लिखा है मेरा ए ग्रेट बी ग्रेट जो भी है वह तो होना ही है फिर भले ही चाहे एन मैं वो सब चीजों को भूल जो किंतु सर्टिफिकेट में तो कुछ चेंज होना नहीं है तो ऐसा बाहर के जीवन में जो होता है संसार में अध्यात्म में ऐसा नहीं होता प्रति दिन आपको परीक्षा देनी पड़ती है कल मुझे जब ध्यान करके वो मां में आनंद आया मैं मुझे वो एक इस तरह का एक संतोष और प्रेम की लगती प्रकट की मेरे हृदय में ठाकुर के प्रति तो नोट नेसेसरी की आज मैं यदि 1000 जब करूंगा फिर आंख बैंड करके ध्यान करूंगा तो मेरे मां में वही से भाव जो है आगे वाला वह फिर से प्रकट हुआ हो सकता है कुछ ना हो जैसे मैं यहां से क्या करता हूं रात को अपने ऑफिस से रूम में जाता हूं और कोई मां की या तो ठाकुर की कोई किताब पढ़ना हूं कभी-कभी ऐसा होता है की किताब पढ़ते-पढ़ते फिर वो एक-दो पैराग्राफ पड़े फिर वो तो र गया वैसे ही पैराग्राफ और मैं उसे चिंतन में चला गया की हां ठाकुर ऐसा बोलते थे अच्छा मैन ऐसा कहा है तो चिंतन करते-करते समय कहां पर बीट गया सोनी का टाइम हो गया वो पता भी नहीं चला है और कभी-कभी ऐसा होता है मैं पढ़ने ही जाता हूं पढ़ने ही जाता हूं ना ही शब्दों में कोई अर्थ निकलता है ना ही वो भीतर में से कोई भाव या कोई प्रेरणा प्रकट होती है तो ऐसा होता है जीवन में तो ऐसा क्या है की हमको आध्यात्मिक जीवन में परीक्षा प्रतिदिन देनी पड़ती है और कल हमको ए ग्रेट मिला तो आज हमको ए ग्रेट मिलेगा ऐसा कोई गारंटी नहीं है आज हो सकता है सी में भी चले जाए सेल भी हो जाए सीक्रेट भी हो जाए फेल भी हो जाए कुछ भी हो सकता है तो क्या है की यह जो निष्काम होकर के जो साधना करनी है वो ये सब का चीज अब यहां पर कम लगता हैं बहुत सारे लोग बोलते हैं हम लोगों को जोर जबरदस्ती ध्यान नहीं करना है मां रक्ष हो जाता है मंजरी ड्राइव हो जाता है तो उसे समय जाप नहीं करना है जाप करने से उसमें रस मिलन चाहिए ध्यान होने करने से उसमें एकाग्रता हनी चाहिए तभी वो ध्यान ठीक होगा और यदि ध्यान में कब्रता ना हो जब करने में रस ना बैठे तो उसको छोड़ दो ऐसा कुछ-कुछ लोग बोलते हैं किंतु इन लोगों की बात नहीं सुन रही है हम लोग बेलूर मठ में मैंने जब जॉइन किया था तो क्या था की हमारे वो इन कर स्थिरता जी महाराज उसे समय वो असिस्टेंट जनरल सेक्रेटरी थे आज अभी वो वाइस प्रेसिडेंट है तो उन्होंने वो हमारा एक मॉनिटर होता है हम लोग जो नए-नए जॉइन किया हैं हम लोगों का क्लास होगा और क्लास में एक मॉनिटर होगा तो उन्होंने मॉनिटर को इंस्ट्रक्शन दिया है की रात को संध्या के समय क्या होता है बेलूर मठ में की वहां पर वह में टेंपल में आरती होती है सब लोग अटेंड करते हैं और वो तो कितना भाव एक सुंदर एक एक्सपीरियंस है आपके लाइफ टाइम का तो वो एट शुरू करने के बाद में अपने यदि बेलूर मठ गए तो गंगा का किनारा है बहुत सुंदर और गंगा के किनारे बहुत ठंडी हवा आई है और एक के बाद एक पहले तो राजा महाराज का समाधि मंदिर है फिर मां का समाधि मंदिर है फिर स्वामी जी का है फिर वो समाधि घाट है तो हम लोगों को स्वामी जी के समाधि मंदिर के जो पहले जो फ्लोर है फर्स्ट फ्लोर जहां पे वो ओम का मंदिर है ओंकार तो वहां पे वो गंगा को फेस करके वो पैसे जो है चारों और तो गंगा की साइड में जाकर के हम लोग बैठने थे लाइट वगैरा सब बैंड राहत था और अंधेरा चारों और मतलब वो फर्स्ट फ्लोर पे लाइट बैंड राहत था तो अंधेरा भी है और रात भी है और सामने गंगा भी है और ठंडी हवा भी ए रही है तो वहां पे बैठ करके हमको एक घंटा जो है नियमित रेगुलर जाप करना है बिना किसी और उसमें मतलब व्याख्या तो अभी सुनीता नंद जी ने हमारे मॉनिटर को बोला था की जो एक घंटा तुम खुद बैठो और तुम सब के ऊपर नजर रखो की कौन 1 घंटे से पहले उठकर खड़ा होकर चला जाता है तुम उसका नाम नंद करो और फिर जो एक दो दिन ऐसा करता है कोई ब्रह्मचारी तो उसे पर उसका नाम मुझे दो मैं उसको घर जान को बोल दूंगा तो मैंने तो पहले बार इस तरह से मैं ऐसा क्या था की अभी तो हम में नया-नया गया था और कहां से एक घंटा बैठ करके जब ध्यान करेंगे और फिर वो पत्थर का वो जमीन है हम लोग आसन लेकर गए थे लेकिन तो आसन तो पतला होता है तो पतले आसन पे पत्थर की जमीन पर बैठना और 1 घंटा क्या हो संभव है बिल्कुल नए गए हैं तो मैं खड़ा होकर आधे घंटे के बाद चला आया तो मैं अपने रूम में बैठा हूं हमारा जो रेजिडेंट है वहां पर ट्रेनिंग सेंटर था तो उसे कुछ डर के बाद मॉनिटर आया मॉनिटर आकर के बोलना है की तुम क्या ये आधे घंटे के बाद चले आए थे मैंने देखा तो मैंने कहा मुझे ऐसा बैठने परेशानी हो रही थी तो उसने कहा की देखो तुम आज तो तुम को छोड़ देता हूं फिर से ऐसा किया तो मुझे सुविधानन जी को बोलना पड़ेगा और स्वैथानंद जी तुमको घर वापस भेज देंगे तो मैं तुम्हें एकदम आश्चर्य चकित हो गया मैंने कहा है ऐसा थोड़ी ना पॉसिबल है की अभी मैं आज ही आया हूं आज से ही मैं एक घंटा बैठना शुरू कर डन तो बोलना है की नहीं नहीं यदि तुमको कोई प्रश्न आए तो सुविधानन से बात करो किंतु उन्होंने ऐसा नियम बनाया है मेरे लिए तो मैंने कहा ठीक है चलो अभी जो भी नियम थे तो पालनपुर तो कर नहीं पढ़ेंगे उसके बाद में सी धनंजय तो यह सब बार-बार वो बीच-बीच में क्लास लेते थे तो वह सब समझते थे की वो इस तरह से नियम क्यों बने हैं तो उन्होंने कहा था की देखो यदि मां एन भी बैठे यदि आपको एकाग्रता मां में नबी आए जब जिसकी ऊपर में ठाकुर के ऊपर ध्यान कर रहे हो मां एकाग्र एन भी हो मां में से जब करते-करते ठाकुर के प्रति प्रेम भक्ति यदि उत्पन्न एन भी हो फिर भी जो है आपको एक घंटा तो बैठना ही बैठना है यह डिसिप्लिन मेंटेन करके चलना है हमको तो जो है की मैं जाप करता हूं तो ठाकुर को यह मेरा आफरिंग है यदि मेरे मां में उसके प्रति उसे समय यदि कोई प्रेम भक्ति नाही उत्पन्न हो तो ऐसा थोड़ी ना है की ठाकुर तुमको सब समय आशीर्वाद देते रहेंगे तभी तुम ठाकुर का नाम लोग और ठाकुर तुमको थोड़ी डर के लिए यदि भूल जाएंगे तुम भी ठाकुर को भूल जाओगे ठाकुर हमको भूलते नहीं ठाकुर हमारी परीक्षा करते हैं और दूसरी यह भी बात है की इतने सारे जो संस्कार लेकर आए हैं विकसित्तता के संस्कार विभिन्नता के संस्कार बचपन से ही पहले ही कक्षा से बाल मंदिर से ही यदि एकाग्रता और ये सब ध्यान करने की प्रैक्टिस की होती तो आज ये हमारे लिए बहुत फायदा कारक होती उसकी वजह हमने देखा है की वह जो मां में मुख्य सेंट करना सीखने हैं किंतु एक ध्यान करना नहीं सीखना है यह कैसा विडंबना है हमारी एजुकेशन सिस्टम का आइडियल एजुकेशन सिस्टम स्वामीजी कहते हैं की यदि मेरी पढ़ाई-लिखाई मेरे हाथ में रहती तुम्हें ये सब म्यूकस करने वाला सोशल साइंस मैथमेटिक्स वह को छोड़कर के सबसे पहले मां को एकाग्र करना सीखना सबसे पहले में ध्यान करना सीखना ध्यान सीखने के बाद में इस एकाग्र मां से जी विषय पे मां को एकाग्र केंद्रित करूं वो विषय में इमिगली सिख लेट तो वो आइडिया एजुकेशन सिस्टम है किंतु अभी क्या कर रहे हैं तो हम लोग तो बड़े होने के बाद में यहां पे ठाकुरमार स्वामी जी के बड़े में जानते हैं और फिर यदि थोड़ी बहुत साधना हम लोग क्या 17 18 19 20 22 की उम्र के बाद में ही आरंभ करते हैं तो हमको हमारे लिए खास करके यह बहुत इंपॉर्टेंट है ठाकुर कहते हैं की ईश्वर पर प्रीति पैदा हो जाए तो इन कर्मों की आवश्यकता नहीं जब तक हवा नहीं बाटी तभी तक पंख की जरूर होती है किंतु जब तक हवा नहीं देती तब तक पंख की जरूर तो होती ही है ठाकुर जो कहते हैं उसका हम थोड़ा उल्टा अर्थ कर देते हैं जब हवा आने की शुरुआत होगी तो पंखा बैंड कर दो ठाकुर ऐसा कहते हैं तो हमको यह समझना है की जब तक हवा नहीं आई है तब तक तो फैन चलाना ही पड़ेगा तब तक तो ऐसी चलाना ही पड़ेगा तो वैसे ही यदि मैं जब ध्यान करता हूं और इमीडीएटली मेरा मां जो है ईश्वर में मगन हो गया ठाकुर का दर्शन होने लगा अश्रुपूलक कंपन होने लगे ठाकुर के प्रति ये जो बालक भाव मातृ भाव फिर ये मधुर भाव सक भाव 10 भाव यह सब भाव उत्पन्न होने लगे तब तक तो कोई आश्चर्य तब तक तो कोई प्रश्न ही नहीं है की हमारा जब ध्यान साधन भजन बहुत ही सुंदर रूप से चलेगा किंतु यह आशारू पलक कंपन वगैरा यदि नबी हो भाव वगैरा एन भी आए ईश्वर ठाकुर के प्रति प्रेम यदि नबी प्रकट हो तब भी जो है हमको पंखा चला के किंतु जब जैन करना ही पड़ेगा ऐसी चलाकर जब ध्यान करना ही पड़ेगा वो यदि छोड़ देंगे तो हवा कभी नहीं आने वाली है पंख में बैठ करके हमने थोड़ी हवा खाई कभी यह जो यह जो है बाहर की दक्षिणी हवा आएगी यदि हमने पंखा बैंड करके बैठे की दक्षिणी हवा आएगी तब हम हवा खाएंगे तो यह कभी नहीं होने वाला है पहले में एक में बैठ के अपने को ठंडा कर लो फिर वह जो है वो जो कुदरत जो हवा है नेचुरल और वो बाद में आएगी पहले तो एक में बैठना ही पड़ेगा तो यहां पे भी ऐसा है की जब भी मां चाहे एकाग्र हो की ना हो मां में यदि कोई भाव प्रेम उत्पन्न हो की भी ना हो एक घंटा या तो आधा घंटा जितना भी हमने नियम किया है उतना बैठ करके जब ध्यान साधन भजन हमने जो भी साधन प्रणाली निश्चित की है उसको करना ही करना है अभी ठाकुर विद्यासागर को बोल रहा है तुम जो कम कर रहे हो यह सब अच्छे कर्म है विद्यासागर है जो लोक सेवा का कार्य करते थे लोक कल्याण का कार्य करते थे जो ठाकुर कहते हैं वह सब अच्छे कर्म है यदि मैं करता हूं इस भाव को छोड़कर निष्काम भाव से कर्म कर सुकून तो और भी अच्छा है यह जो नार्सिसिस्म बोलते हैं ना आजकल साइकोलॉजी में की मैं कर रहा हूं मैं कर रहा हूं मैंने ये किया मैंने वो किया और यह सिर्फ गृहस्ती में नहीं साधुओं में भी कभी-कभी देखा है की कोई लेक्चर देने के लिए चला वो कोई अच्छा लेक्चर दे दिया तो आकर के सबको बोलते हैं मैंने लेक्चर में ये ये कहा अभी हमको सुनने की इच्छा भी नहीं है फिर भी हमको सुना पड़ता है तो ऐसा है की मैं यह कर रहा हूं मैं वो कर रहा हूं ये जो भाव जो है नार्सिसिस्म जब तक वो नहीं राहत है तब तक यह कल्याण पद कर्म यह जो जगत हटा है जो जो कर्म है वो करने से सही सही लाभ होगा किंतु यदि साथ-साथ में ही ये घमंड पैदा हो जाए की मैं कर रहा हूं तो यह कार्य हो रहा है यदि मैं नहीं करता तो कुछ नहीं होता इन लोगों को कितना कष्ट पहुंचता तो जो है की आपको पता है देखिए हमारे ऑर्डर में भी ऐसे विचित्र नियम इस तरह की ये ठाकुर को पढ़ करके ही कुछ कुछ विचित्र नियम हमने बनाया है की जैसे की नॉर्थ ईस्ट में जाएंगे तो बातें ऐसी है की हमको सिर्फ ठाकुर का नाम प्रचार ए मतलब हमको तो सेवा करने के लिए नॉर्थ ईस्ट में गए हैं ना ये जो त्रिपुरा और मणिपुर फिर ये जो असम ये वहां पर हेलो वहां पे तो हमने बहुत अच्छे-अच्छे स्कूल बनाए हैं किंतु नियम ऐसा है की वहां पे ठाकुर का नाम नहीं लेना है मिनिमम जो इंडियन कल्चरॉलिटी के बड़े में जनरल जो बताना है वो बताना है ठाकुरमार स्वामी जी का प्रोपेगेंडा नहीं करना है प्रचार नहीं करना है क्यों क्योंकि हम लोग तो क्रिश्चियन मिशनरी जैसे नहीं है क्रिश्चियन मिशनरी आपको पढ़ाई भी करवाएंगे और आपका कन्वर्जन भी करवाएंगे हम लोग तो कन्वर्जन करने के लिए नहीं आए हम लोग तो पूरे सेवा करने के लिए आए तो बच्चे जो लोग वहां के लोकल किड्स है बच्चे हैं तो हमारी हजार हजार स्कूल की बच्चों की कैपेसिटी वाली स्कूल है इतनी बड़ी-बड़ी किंतु फिर भी वो 12 स्टैंडर्ड तक पहले कक्षा से लेकर के 12th 12वीं कक्षा तक को पड़ता है ठाकुरमार स्वामी जी के बड़े में उसको कोई आइडिया भी नहीं है बाहर जाके क्रिश्चियनिटी में कन्वर्ट हो जाता है और फिर हामी को गली देना शुरू करता है ऐसा एक विचित्र नियम है हमारी स्कूल में बच्चा 12 साल पढ़ना है तो क्या वो ठाकुरमार स्वामी जी के बड़े में कुछ नहीं बताएंगे वो नहीं बताएंगे क्यों क्योंकि हमको कन्वर्जन नहीं करना है निष्काम सेवा करनी है चलो ये भी एक क्या कहेंगे की वो बच्चे को यदि भविष्य में यदि समझ आई है तो उसको यदि अकाल आई है की हां चलो मैं नहीं यहां पे 12 साल पढ़ाई भी किया इतना अच्छा मुझे एजुकेशन भी मिला साधुओं का प्रेम भी मिला भालोबासा भी मिला और फिर भी उन्होंने मेरे मां को मेरे ब्रेन को वॉश करने की कोशिश नहीं की ब्रेनवाश करने की तो ये लोग बटर है ये क्रिश्चियन डिक्शनरी से ऐसा यदि उसमें कभी अकाल आता है स्टूडेंट में तो अच्छी बात है अदर वाइस हम लोग जो है वो सिर्फ पढ़ाएंगे और क्रिश्चियन मिशनरी लोग फिर क्या करते हैं की वो कन्वर्ट करेंगे और हम लोग पढ़ाएंगे यानी तो ऐसा हो गया की हम खाना बनाएंगे और बर्तन मझेंगे किंतु खनक खाएंगे तो इस तरह के कुछ-कुछ विचित्र नियम थे अपने यहां पे तो जो भी है अभी ठाकुर ने कहा है तो कहां है देखिए ये इंडिविजुअल लेवल पे साधना करने से जी तरह से हम लोगों पे क्लेरिटी होता है की कर्म क्या है कर्म का फल क्या है मैं कर्म कर रहा हूं तो मुझे फल की अपेक्षा नहीं करनी मुझे घमंड नहीं रखना है ये सब चीज जो है की इंडिविजुअल साधना में बड़े क्लियर होते हैं किंतु जैसे इंस्टीट्यूशन लेवल पे ये सब बड़े कंफ्यूज हो जाते हैं देखिए गांधीजी ने अहिंसा का आंदोलन किया तो नॉन कोऑपरेशन सत्याग्रह का आंदोलन किया तो उसमें अहिंसा एक बहुत बड़ा इसका एक हिस्सा है अभी वो गांधीजी जहां पे गुजरात में थे तो एक जैन उससे वह बड़े ही प्रभावित है तो जैन साधु ने उनको क्या है की यह जो विदेश में गए थे पहले बार तो कुछ नियम उनसे दिलवाए थे की वो मांस में ही खाएंगे दारू नहीं पियेंगे उसे स्त्रियों से दूर रहेंगे इससे कुछ उनसे नियम दिलवाए थे तभी वो गांधीजी की मैन परमिट उनको परमिशन दिया था की वो तुम ब्रिटेन में जाकर के ये जो है वकील का वो जो है कोर्स करो तुम लॉयर बानो तो अभी गांधी जी के मां में ये जो जैन आइडियल इतने फिट बैठ गए थे की उन्होंने कहा की अभी जो पूरा भारत देश है उसको अहिंसा के आधार पे चलना है अभी क्या हुआ की भारत और पाकिस्तान का डिवीजन हुआ और पाकिस्तान लोगों ने हम पर हमला कर दिया कश्मीर के ऊपर में जैसे ही जी दिन डिवीजन हुआ और पार्टीशन हुआ इस के कुछ समय के बाद में तो अभी नेहरू भी इस तरह से मूर्ख है की वो जब वो उनका आर्मी ए गया है तो हमको तो सामने से आदमी भेजना चाहिए या तो फिर हमको प्रेम की उसे ट्राई करनी चाहिए उसकी वजह वो बोलना है की हम यूनाइटेड नेशन में जाकर के हम दरखास्त करेंगे वे लोग जो है हमारा इसका निर्णय लेंगे यूनाइटेड नेशन क्या है दो बिल्ली एक बंदर वाली बात हो तो जैसे ब्रिटिश अंपायर था वैसे ही आपने एक यूनाइटेड नेशन को खड़ा कर दिया जैसे ब्रिटिश अंपायर हिंदू मुस्लिम को झगड़ा करके वो अपना एक मलाई का लेते थे वो दो रोटी इसको बोला एक बिल्ली बोलती है की उसकी रोटी पड़ी है तो छल्ला हो तो बड़ी रोटी में सिर्फ टुकड़ा में का लेट हूं अभी वो बोलती है अरे उसकी रोटी बड़ी हो गई तो उसकी रोटी में सिर्फ टुकड़ा वो का लिया तो वैसे ब्रिटिश अंपायर था तो वैसे ही यूनाइटेड नेशंस था तो अभी जो इंडिविजुअल लेवल पे जो मोरालिटी और जो एथिक्स होता है इंडिविजुअल लेवल पे जो साधना होती है उसको आप इंस्टीट्यूशन लेवल पे कहां तक ले जा सकते हैं वो सब देखने वाली बात है जैसे सत्य है सत्य तो होना ही चाहिए इंस्टीट्यूशन में जैसे हमारा अकाउंट है एकदम परफेक्ट राहत है कभी भी एक भी पैसे का इधर से उधर नहीं होता जो पैसा डिस्पेंसरी में आया है डिस्पेंसरी जैसे राजकोट आश्रम में डिस्पेंसरी समय वह सरप्लस में चला है और पब्लिकेशन है सब समय डिफिसिट में चला है क्योंकि किताब इतनी ज्यादा बिकती नहीं है किंतु हमको छापना तो पड़ेगा ही तो पब्लिकेशन लॉस में चला है और डिस्पेंसरी में बहुत पैसा आता है डोनेशन तो वो सरप्लस चला है तो अभी ऐसा नहीं है की पब्लिकेशन का जो लॉस है वो डिस्पेंसरी के प्रॉफिट से उसको बैलेंस कर दो नहीं ये लॉस्टैलूज दिखाएगा वो प्लस का प्लस ही दिखाएगा तो वो सत्य को जो है की आपको वो इंस्टीट्यूशन लेवल पे वो आज आईटी इस रखना है किंतु जैसे ये प्रचार नहीं करना है या तो बिना किसी आशा के कर्म करना है ये सब आप इंस्टीट्यूशन लेवल पे कैसे करेंगे वो थोड़ा देखने की बात है क्योंकि यदि हम लोगों से अपेक्षा नहीं रखेंगे इतना सैलरी दे रहे हैं तो इतना कार्य कम किसी को करना है यदि किसी को हायर किया है किसी स्टाफ को तो निष्काम कर पैसा दे दिया अभी उसको कम करना है तो करें ना करना है तो ना करें हमको क्या है हम तो निष्काम कर्म कर रहे थे ऐसा तो नहीं चलेगा राइट और तो मैनेजमेंट के जो ट्रिक रूल्स हैं वो तो सब जगह पे अप्लाई करने ही पढ़ेंगे तो वैसे ही वो स्कूल में पढ़ते हैं तो ऐसा नहीं है की वो सिर्फ मैथमेटिक्स फिजिक्स केमिस्ट्री ही पढ़ाएंगे ठाकुरमार स्वामी जी के बड़े में भी तो बोलना ही चाहिए अदर वाइस क्या होगा की वो हमारा जो फाउंडेशन स्पिरिचुअल फाउंडेशन जो लड़के कोई फ्यूचर में है बेनिफिट करेगा वो चला जाएगा उससे वो वंचित हो जाएगा तो ठाकुर कहते हैं तुम जो कम कर रहे हो यह सब अच्छे कर्म है यदि मैं करता हूं इस भाव को छोड़कर निष्काम भाव से कर्म कर सको तो और भी अच्छा है यह कर्म करते करते ईश्वर पर भक्ति और प्रीति होगी इस प्रकार निष्काम कर्म करते जो तो ईश्वर लाभ भी होगा उन पर जितनी ही भक्ति प्रीति होगी उतने ही तुम्हारे कम घटते जाएंगे बृहस्थ की बहू जब गरबिनी होती है वो गर्भवती प्रेग्नेंट होती है तब उसकी स उसका कम कम कर देती है 9 महीने पूरे होने पर बिल्कुल कम चुने नहीं देती उसे डर राहत है की कहानी बच्चे को कोई हनी ना पहुंचे संतान प्रसव में कोई विपत्ति ना हो सहस्य हंसते-हंसते कहते हैं तुम जो कार्य तुम जो कम कर रहे हो उससे तुम्हारा ही उपकार है निष्काम भाव से कर्म कर सकोगे तो चित की शुद्ध होगी ईश्वर पर तुम्हारा प्रेम होगा प्रेम होते होते ही तुम उन्हें प्राप्त कर लोग संसार का उपकार मनुष्य नहीं करता वे ही करते हैं जिन्होंने चंद्र सूर्य की सृष्टि की माता पिता को स्नेहा दिया देखिए कितना पोएटिक बात कर रहे हैं चंद्र सूर्य की जिसने सृष्टि की माता पिता को जिसने स्नेहा दिया सत्पुरुषों में दया का संचार किया और साधु भक्तों को भक्ति दी जिसने यह किया है वो क्या वो जगत का उपकार नहीं कर सकते आवश्यक कर सकते हैं जो मनुष्य कामना शून्य होकर कर्म करेगा वह अपना ही हिट करेगा अभी देखिए जैसे ठाकुर ने कितना सुंदर उदाहरण दिया है वह जैसे गर्भवती स्त्री का जैसे जैसे करो उसका वह जो प्रेगनेंसी का बढ़ता जाएगा डिलीवरी का टाइम आता जाएगा वैसे वैसे ही जो उसकी जो अभी तो मतलब वो आजकल तो क्या है की वो अपने मां के घर चली जाते हैं वो जब औरत स्त्री जो होती है अपने मां के घर चली जाति है मेरा खुद ऐसा ही हुआ था मेरी मां अपने घर चली गई थी मां के घर और मेरा जन्म भी वहीं पे हुआ था तो आज कल ऐसा वो नहीं है वो समाज में की सु जो है वो इतनी कड़ी है वो उसको अपनी बहू के ऊपर में सब समय वो डिसिप्लिन करती रहती है आज इतना नहीं है आज जो है या तो फिर वो हसबैंड वाइफ सेपरेट चले गए रहने के लिए या तो फिर वाइफ है जो अपनी मां के वहां चली जाएगी मायके क्योंकि चलो वहीं पे वो डिलीवरी होगी तो जो भी है वो एक समय था की स का जो बहू के ऊपर में जो कंट्रोल था वो कुछ ज्यादा ही था तो फिर किंतु जो अच्छे स होती है वो देखते है की हां फिर बहू को अपनी लड़की की तरह ही रखना चाहिए जी तरह से उसकी खुद की लड़की है उसकी वो जितना जतन करेगी उतना ही तो इस तरह से ही तो बहू का करना चाहिए और जैसे-जैसे उसके दिन बढ़ते जाएंगे वैसे-वैसे कम कम करते करते फिर जब डिलीवरी होगी ठाकुर यहां पर नहीं कहते लेकिन तो और एक जगह पर कहते हैं की जब वो संतान प्रसव होगा तो फिर जो है वो बच्चे को लेकर के ही रहेगी फिर वो घर का और कोई कम नहीं करेगी तो वैसे ही यहां पे आध्यात्मिक जीवन में है जैसे-जैसे हमारा हमारा जो प्रगति होता जाएगा दिन बढ़ते जाएंगे और आज आज जैसे मुझे तकरीबन 18 19 साल हो गए रामकृष्ण सॉन्ग में तो अभी क्या है की एक लेवल पे मैं पहुंच गया हूं की मैं जब आंख बैंड करके बैठूंगा तो इस तरह से नहीं तो उसे तरह से मैंने एक मेथड से नहीं होता है मां में यदि कोई आनंद का भाव प्रगति तो दूसरी मेथड से दूसरी मेथड से नहीं होता है तो तीसरी मेथड से इस समय ने बहुत साड़ी मैथर्ड अभी मेरे पास में है जो की मैं 10 15 20 मिनट तो एटलिस्ट अपने मां को आनंद से भर दो उसके बाद में फिर जो होना है सो हो तो इतना तक तुम्हें पहुंच गया हूं तो ये जो है नियमित रूप से आप प्रतिदिन 20 मिनट 25 मिनट आधा घंटा एक घंटा आप यदि साधन भजन करते जाएंगे तो उसका फल जो है आवास या मिलन है हां जैसे हमने कहा की प्रतिदिन ठाकुर टेस्ट करेंगे किंतु जो है अभी वो नेचुरल और है प्रतिदिन नहीं है वो ऐसी की ऐसी में भी बैठना पड़े पंख की हवा भी खानी पड़े है किंतु जो है उसको साधन भजन को छोड़ना नहीं है और साधन भजन करते रहेंगे तो अवश्य ठाकुर की कृपा होगी जिन्होंने चंद्र सूर्य की सृष्टि की माता पिता के भीतर में स्नेहा दिया सत्पुरुषों में दया का संचार किया और साधु भक्तों को भक्ति दी क्या वो जो है ईश्वर जैसे जगत का कल्याण कर सकते हैं यहां उसे अर्थ में दिया है उदाहरण हम उसको थोड़ा अलग अर्थ में लेते हैं की जिसने ये सब किया है जी ईश्वर ने क्या वो ईश्वर हमको प्रेम भक्ति श्रद्धा ज्ञान वैराग्य नहीं दे सकते अवश्य दे सकते हैं बस वही है की हमको वो साधना छोड़ने नहीं है अनियमितता सबसे बड़ा गन है साधना भीतर सुवर्णा है अभी तक तुम्हें पता नहीं चला ऊपर कुछ मिट्टी पड़ी एक बार पता चल जाए तो अन्य कम घाट जाएंगे बृहस्थ की बहू के लड़के होने से अभी देखिए यहां पे ठाकुर कहते हैं की लड़का जल्दी हो गया तो वह लड़के को ही लेकर के रहती है इस को उठाती बिठाती है इस के साथ खेलती है फिर उसकी स उसे करके कम में हाथ नहीं लगाने देती तो जब साधना और साधन भजन में जब सिद्धि प्राप्त हो जाए तो फिर ऐसा होगा की सहज ध्यान सहज समाधि सहज साधन ये सब हो जाएगा की जरूर ही नहीं पड़ेगी मैं ऑफिस में बैठा हूं अभी तो हुआ नहीं है लेकिन तुम्हें आशा रख रहा हूं की ऐसा होगा की मैं ऐसा ऑफिस में बैठा हूं और वही कम थोड़ा सा शांत पड़ा है फोन बैंड नहीं ए रहा है लोगों का आना जाना कम हो गया है कोई मुझे टांग करने के लिए भी नहीं ए रहा 10-10 मिनट पे 5 मिनट पे अकेले बैठा हूं तो सुद्दनली मां जो है इतना वो फट फट करके ऐसे है वो हवा में उड़ने लगा ठाकुर कुमार स्वामी जी के चिंतन उनकी यह जो प्रेरणादाई जो घटनाएं है जैसे क्लास ले रहा हूं तो उसका भी मैं वो निष्काम कर्म नहीं कर रहा मैं अपेक्षा रखना हूं की यह जो सब ठाकुर्मा स्वामी जी के जो प्रसंग का वर्णन में सुबह को करता हूं तो ये सब वर्णन जो है जब मैं अकेले थोड़ा क्षण बैठता हूं और जैसे यहां पे पब्लिकेशन में एक रूम है ऑफिस में तो सब समय हल्ला चला राहत है किंतु एक रूम है यहां पे वो मेरा एक पर्सनल रूम जैसा है जहां पे कोई नहीं जाता मैं ही अकेला जाता हूं तो अभी बैठे-बैठे जल्दी वो कमर में है वो जल्दी अभी देखतीफ हो जाति है कमर में थोड़ा दर्द होने लगता है तो मैं वहां पे जाकर के थोड़ा एक्सरसाइज करता हूं और रूम एकदम शांत रूम है मंदिर के एक्सेप्ट सामने है तो वहां पर जब मैं बैठता हूं थोड़ी डर के लिए तो इतना शांति महसूस होती है की सामने मंदिर है नीचे में सब भक्ति लोग घूम रहे हैं और कर्म चल रहा है तो कर्म का भी तो एक प्रभाव है तो उसे रूम में जाकर के बैठने से मुझे बड़ा शांत लगता है तो अभी अभी ऐसा नहीं होता किंतु भविष्य में ऐसा होगा की मैं जाकर के 10 मिनट के लिए उसे रूम में बैठ गया वो मैन पद्मासन में और फिट करके मेरा मां जो है समाधि स्थल हो गया तो ऐसी आशा रख सकते हैं क्यों नहीं रखेंगे आशा तो अमर है इस जन्म में नहीं होगा तो अगले जन्म में अगले जन्म में नहीं होगा तो उसके बाद का जन्म ठाकुर के साथ में ठाकुर के सॉन्ग में बार-बार जन्म लेना है ठाकुर को ही ये जितने भी जन्म होंगे और फिर आज से लेकर के अंतिम जन्म तक सब अपूर्व को समर्पित कर दिए हैं ये सच ठाकुर को प्रार्थना की ऐसा कभी ना हो भविष्य के जन्म में की आपको छोड़कर के मेल रहूं आपके साथ में ही रहूं आपके सॉन्ग में ही रहूं भले चाहे मैं सन्यासी ना हो कॉम भविष्य में कभी दूसरे जनों में किंतु आपका भक्ति हो करके तो रहूंगी रहो और भक्ति भी ना हो पाऊं तो यहां पर हमारा गेटमैन है हमारा गेटमैन की मुझे बड़ी इच्छा होती है कभी-कभी उसको कम कुछ नहीं है वो गेट पर बैठा राहत है और वो सामने ही मंदिर है तो मंदिर को देखो बहुत सुंदर आश्रम है तो आश्रम कैंपस से तो गार्डन को देखो भक्तों की बातें सुनो और वहां पर बैठे रहो मैं यदि इस तरह से गेटमैन का मुझे जब मिलता तो मुझे कुछ करने की जरूर नहीं थी मैं वहां पे बैठे-बैठे कटहनुत पड़ता राहत है गार्डन देखा और मंदिर देखा और वो आरती भजन तो सब सुने देते हैं वेट करके वो कुर्सी पर बैठकर पढ़ना है तो यदि मैं सन्यासी ना हो पाऊं तो भक्ति हूं भक्ति एन हो पाव तो कम से कम वो गेटमैन तो हो ही हो आपके मंदिर में आपको छोड़कर के मेरा एक भी जन्म अभी भविष्य में ना हो यही ठाकुर को प्रार्थना तो आज यही पर कल फिर से मिलता है