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Sri Ramakrishna Kathamrita ·

श्रीरामकृष्ण कथामृत 27 Oct 1882 केशव सेन के साथ ठाकुर का नौका विहार 29 July 2024

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स्वामी जी कहते हैं ऑल द पावर्स ऑफ गुड अगेंस्ट ऑल द पावर्स ऑफ इवल अभी यदि आप साधक है और साधना साधन पात को फॉलो करते हैं तो शायद इस सेंटेंस का इतना जो पावर है इसके पीछे छुपा हुआ वह नहीं दिखेगा किंतु लाइक स्वामी जी जिस तरह से स्वामी जी हिस्ट्री स्टडी किए हैं ह्यूमन सिविलाइजेशन स्टडी किए हैं ह्यूमन अफेयर्स अब मनुष्य का मन किस तरह से काम करता है समाज किस तरह से काम करता है यह देश किस तरह से काम करते हैं इसको जद आपने या तो जिस किसी ने भी उसको समझने का पढ़ने का प्रयास किया होगा इनको इस सेंटेंस के पीछे एक बहुत ही एक डीप मिनि दिखता है देखिए कि जब भी बिल्कुल इसका सामान्य जति अर्थ देखे तो सबसे सामान्य अर्थ क्या है कि पहले के जमाने में किस तरह से जब राज्य सत्ता पहले के जमाने में तो क्या इवन आज के जमाने में भी इवन आज भी जब राज्य सत्ता कमजोर हो जाती है पॉलिटिकल अथॉरिटी जब वीक हो जाती है उस समय क्या होता है कि समाज में यह जो अनाचार है दुष्ट लोग है अपराधी तत्व है जो भी वे लोग हमेशा आ आदमी का उत्पीड़न करते हैं सामान्य जनता का शोषण करके उनके पास में से सब कुछ धन वगैरह हड़प कर लेते हैं जो भी कमजोर देश होते हैं उनके साथ में उसके ऊपर में मच जिन लोगों के पास में शक्ति होती है मिलिटरी पावर वे लोग आक्रमण करके उनको फिर टुकड़े-टुकड़े करके उनका जो कुछ भी धन है वगैरह वो ले लेते हैं जैसे कि भारत में तो हमने देखा कि किस तरह से 1000 साल से एक के बाद एक आक्रमण होते गए और हम लोग असहाय होक के बपस हो कर के ऑलमोस्ट यह सब कुछ देखते गए अपने को डिफेंड करने की जो एक शक्ति होती है जो कोई भी सिविलाइजेशन के भीतर में वो भी जैसे कि हम े तो यहां पर स्वामी जी ने देखा कि यदि कोई भी दुष्ट तत्व है अनिष्ट तत्व है उसका यदि सामना करना होगा तो आपको उस समाज के जितने भी अच्छे तत्व है जो भी जो लोग सत्व में जो लोग धर्म में जो लोग सत्य में विश्वास करते हैं उन सब लोगों को एक साथ लाना होगा यह इकट्ठा जदी होगी शक्ति सत्व की सत्य की और धर्म की तब कहीं जाकर के यह जो अनिष्ट तत्व है उसका मुकाबला करने के लिए आप सक्षम होंगे बहुत बार हम लोग स्टोरीज वगैरह पढ़ते हैं मैं जब छोटा था तो मैं यह सब स्टोरीज बहुत सारी पढ़ा करता था बच्चों की वो जो स्टोरी बुक्स आती है ना उसमें राक्षस होता है फिर वो जो एक अब जैसे कि रामायण की ही बात करें जिस तरह से रावण का वध करने के लिए भगवान राम ने सोचा कि मेरे अकेले से होगा नहीं या तो फिर ऐसा भी कह सकते हैं कि जो लोग सत्य में विश्वास करते हैं उन सभी को धार्मिक जितने भी लोग है धर्म में विश्वास करने वाले सभी को एक मौका मिलना चाहिए इस धर्म युद्ध में हिस्सा लेने का बोलकर के उन्होंने सुग्रीव को अपना साथी बनाया वानर सेना को खड़ा किया और इसके सहारे उन्होंने रावण के वन में आक्रमण किया भगवान कृष्ण को भी देखिए कि किस तरह से पांडवों का साथ लेकर उन्होने कौरवों का मुकाबला किया था असद की जो शक्ति है उसके लिए सद की जितनी भी शक्तियां है सद पे विश्वास करने वाले जितने भी लोग है सबको इकट्ठा करने का प्रयास हमारे धर्मशास्त्रों में देखने को मिलता है हम देखते हैं कि किस तरह से मां कुंती आखिरी दिन को कर्ण को मिलने के लिए गई यह विनती करने के लिए कि तुम अभी अधर्म का साथ दे रहे हो इसकी बजाय तुम धर्म का साथ दो तुम तो मेरे खुद के संतान हो किसी तो इस तरह का एक कारण आ गया था कि जिसकी वजह से मुझे तुम्हारा त्याग करना पड़ा था और युद्ध तुम्हारा भाई है तुम अपने भाई के विरुद्ध में जाकर के अपने भाइयों के दुश्मनों के साथ भी तुम क्यों युद्ध करोगे तो ये जितने भी जितने भी धर्मशास्त्र है जितने भी हमारे यह जो स्टोरीज है सब में देखिए कि अनिष्ट तत्व का सामना करने के लिए इष्ट जितने भी है इष्ट तत्व सभी को एक साथ में लाने का प्रयास किया जाता है इसीलिए ऑल द पावर्स ऑफ गुड अगेंस्ट ऑल द पावर्स ऑफ इविल ये कितना पावरफुल सेंटेंस है स्वामी जी का स्वामी जी अमेरिका से लेटर्स में लिखते हैं कि जिस जितनी भी हरि सभाएं हैं बंगोल में उस समय ये भगवान कृष्णा चैतन्य अर्थात कि गौरा महाप्रभु के नामत हरि सभाओं का निर्माण हुआ था वहां पे गौरा महाप्रभु के गुण गान कीर्तन वगैरह चलते थे तो स्वामी जी कहते हैं कि जितनी भी हरि सभाएं हैं सबको एक के बाद एक आपको टेक ओवर कर लेना पड़ेगा क्यों ऐसा कहा स्वामी जी ने इसलिए इस अर्थ से नहीं कहा कि गौरांग महाप्रभु से बड़े भगवान श्री राम कृष्ण है और भगवान श्री राम कृष्ण के नाम गुण कीर्तन करना भगवान गौरांग महाप्रभु के नाम गुण कीर्तन से ज्यादा अच्छा है इस दृष्टि से उन्होंने नहीं कहा इस दृष्टि से कहा कि जितने भी साधक है भारतवर्ष में सभी को इकट्ठा मिलकर के एक छत्र छाया के भीतर में इकट्ठा होना चाहिए तभी कहीं जाकर कि 1000 साल का हमारा अध पतन है उसके सामने हम डट करके खड़े रह पाएंगे यहां पे सिर्फ बात यह नहीं है कि विदेशी सत्ता हों ने हमारे पर हमला किया किंतु हमारे खुद के हृदय में जो संशय रूपी राक्षस पनप रहा है कि हां ईश्वर है कि नहीं ईश्वर में विश्वास किया जाए कि ना किया जाए मैं सुबह को उठ कर के क्यों मैं जल्दी से उठूंगा कोई भी साधक होगा वो ठीक करेगा वह ऐसा सोचेगा कि मैं किसी मंदिर में जाकर के मंगल आरती का दर्शन करूं या तो फिर मैं अपने घर में ज यदि मंदिर में जाना संभव ना हो तो मैं घर पे ही मेरा जो छोटा सा श्राइन है वहां पर मैं खुद ही भगवान जो भगवान की छवि बिठाई गई है उनकी आरती करू ये एक हम सभी लोग जितने भी साधक है ये लोग ऐसा सोचेंगे तो वो जो सुबह को अर्ली मॉर्निंग सैया त्याग करके उठना है तो यह प्रश्न अवश्य होगा कि यह जो सब मैं कर रहा हूं इसका कोई बेनिफिट तो है कि नहीं कि बस सिर्फ हवा में ही कि किसी ने मुझे कह दिया है इसलिए मैं ऐसा कर रहा हूं या तो फिर मुझे डर है मैं परीक्षा देना है मुझे परीक्षा में पास होना है तो चलो भगवान को थोड़ा सा एक प्रलोभन दे दिया जाए कि भगवान देखो कि मैं सुबह में मंगल आरती अटेंड कर रहा या तो फिर मैं तुम्हारी पूजा वगैरह कर रहा क्या यह भगवान को प्रलोभन देकर देव को प्रलोभन दे कर के किसी भी तरह से अपना कोई हित साधित कर लेने वाली बात है कि सही सही में हम ईश्वर का जो उच्च स्वरूप है ईश्वर के जो ईश्वर की जो अवधारणा है उसका किस तरह से क्रम विकास हुआ इसके बारे में हमने पहले भी चर्चा की स्वामी जी का जो फेमस नेचर है इवोल्यूशन ऑफ द आइडिया ऑफ गॉड तो किस तरह से ईश्वर के बारे में सबसे पहले तो हम यह सोचते हैं कि मैं जब मेरे परिवार जन है में जब हम उस समय ट्राइबल हमारा एक्जिस्टेंस था हम लोग जंगल में रहा करते थे आज से 10 15 20 हजार साल पहले की बात कि जबकि सिविलाइजेशन की प्रारंभ भी नहीं हुआ था उस समय कहां से मृत्यु आ जाएगा कहां से व्याधि आ जाएगा कहां से कोई कराल एक विकट एक ऐसा कुछ आ जाएगा कि या तो मेरी हत्या करेगा मुझे हानि पहुंचाएगा या तो फिर मेरे परिवार जन है उनको हानी पहुंचाएगा तो उस समय जैसे कि आग लग गई जंगल में ना कि फ्लड आ गया ना कि पडेम फैल गया ना कि जंगली पशु तो उस समय चारों ओर फैले हुए थे उन्होंने आकर के हमला कर दिया सांप ने दस लिया कुछ भी हो सकता है सांप का दसना तो अभी इस युग में भी है वह जो मां की फेमस कहानी है कि मां के वहां पे गाय रखी थी मां के घर में जयराम बाटी में मां के पास में गाय थी और गाय की सेवा करने के लिए एक एक लड़के को रखा गया था तो अभी एक दिन ऐसा हुआ कि एकाय उसको साप ने काट लिया तो अभी यह बात उस समय वहां पर एक चिकित्सक भी उपस्थित थे तो जैसे ही सांप ने काटा उस लड़के को तो इमीडिएट इस चिकित्सक ने वैद्य ने क्या किया कि जनरली जो आज की जो होती है मेथड कि साप काटते हैं तो वहां पर काट कर के वहां से फिश जो है वो निकाल लेते हैं और फिर वहां पर बैंडेज वगैरह लेकर लगा देते वैक्सीन वगैरह तो उस समय था किंतु इतना तो कर सकते हैं तो जैसे ही इस चिकित्सक ने वहां काटा उस उंगली में लगा था तो उंगली में जहां पर 10 नगा वहां पर काटने की शुरुआत की उसी समय मां वहां पे आ गई जैसे ही मां को पता चला कि इसको सांप ने काटा है मां ने कहा नहीं नहीं इसको इस तरह से काटो मत इसको सिंहवाहिनी के मंदिर में ले चलो तो वहां पे मंदिर में बच्चे को सुलाया गया मंदिर की जो मिट्टी है जिसकी जिसकी हिली प्रॉपर्टी जिसकी स्वास्थ्य करर जो उसका गुण है मिट्टी का उसके ऊपर में मां को तो बहुत विश्वास था तो माने उस मिट्टी का ने बच्चे बच्चे के कपड़े निकाल कर के पूरे शरीर पर मिट्टी का प्रलेख करवाया और मां ने कहा कि मैं यहीं पे इसी के साथ में रहती फिर बाद में आप सब लोग जाना चाहते तो जा सकते हैं तो पूरी रात भर मां उसके साथ में दिन भर रही थी और दूसरे दिन देखा कि जहां पर वो शंद जहां पे काटा ग गया था वहां पे वो जैसे ही मिट्टी को निकालना शुरू किया तो वह जो पहली उंगली के ये जो पहले और दूसरी हड्डियां होती है वो निकल गई क्योंकि बीच में वो जो डॉक्टर ने काटा था किंतु फिर उसका जो रात को जिस तरह से भयावह हालत हो गई थी कि पूरा शरीर फूल गया था आंखें बिल्कुल अंधी हो गई थी पूरे शरीर में ज्वर और भयानक भीतर में से जो पीड़ा वो सब सुबह तक शांत हो गया और बच्चा बच गया तो यह साप वगैरह तो काटने की घटनाएं हमेशा से होती रही है तो पहले सबसे पहले ईश्वर ऐसे थे कि जिनको कि हम कुछ सैक्रिफाइस ऑफर करें जिससे कि वह हमारी रक्षा करें इसके बाद में धीरे-धीरे ईश्वर की अवधारणा का विकास हो करके क्रम विकास हो करके एक ऐसे ईश्वर की कल्पना की जो कि प्रेममय है मनुष्य जीवन की इस तरह से कल्पना की कि यह जो समाज में जो कुछ भी है एक बहुत बड़ी जमीन एक राजत्व एक लोगों के ऊपर में शासन करने की क्षमता बहुत सारी बहुत सारी गाय बहुत सारा धन यह सब कुछ मुझे नहीं चाहिए मुझे तो सिर्फ ईश्वर ही चाहिए क्योंकि ईश्वर का स्वरूप है सत चित आनंदमय ईश्वर को प्राप्त कर नेने से बहुत सारी गायों बहुत सारी जमीन बहुत बड़ा राजत्व इन सबसे बहुत सारी सोना बहुर इन सब इनमें से जो आनंद होता है है इससे कहीं गुना आनंद मुझे ईश्वर को प्राप्त करके होगा तो यह ईश्वर की धारणा का धीरे-धीरे क्रम विकास होता गया अभी यह देखने की बात है कि जिस तरह से यह सिविलाइजेशन का डेवलपमेंट हुआ सब समय ऐसे तत्व जो कि साधक वर्ग है जो लोग अच्छे रास्ते पर जाना चाहते हैं उनके रास्ते में अंतराय स्वरूप बन कर के खड़े हैं सबसे पहले तो शुंभ निश रूपी राक्षस थे बाद में अभी अपने हृदय में संशय रूपी राक्षस प्रकट आज के जमाने आज के जमाने में मैं सुबह को क्यों उठूंगा मैं क्यों साधना करूंगा मैं क्यों ऐसे किसी विश् ईश्वर में विश्वास करूंगा जो कि जिनको की प्राप्त करके मुझे बाकी सब चीजों के प्राप्त होने से भी ज्यादा आनंद प्राप्त हो यह सब संशय इस संशय के साथ में युद्ध करने के लिए आपको साधना करनी है किंतु देखिए कि स्वामी जी की मेथड क्या है स्वामी जी ने सिर्फ यह नहीं कहा कि साधव को साधना करके अपने साधन राज्य में अग्रसर होना है साधन राज्य में विजय प्राप्त करना है किंतु जितने भी साधक है उन सबको इकट्ठा होना है ऑल द पावर्स ऑफ गुड अगेंस्ट ऑल द पावर्स ऑफ इवल दोनों तरह से समाज में भी यदि अपने देश की मुक्ति अपने ये जद साधकों को सुख और शांति चाहिए जिस तरह से अपने पुराणों में दर्शाया गया है कि भगवान राम या भगवान कृष्ण अकेले पूरे शत्रुओं का विनाश करने की क्षमता रखते थे ब्रह्मास्त्र कहो कि भगवान कृष्ण का ये सुदर्शन चक्र कहो उसमें वो शक्ति थी किंतु फिर भी भगवान राम ने वानर सेना की सहाई ली भगवान कृष्ण ने पांडवों की सहाई ली क्यों क्योंकि इष्ट इष्ट में विश्वास करने वाली इष्ट को फॉलो करने वाली जितनी भी शक्तियां हैं उन सबको इकट्ठा लाना इस सब समाज के लिए बहुत बड़ी आवश्यकता है भगवान श्री राम कृष्ण ने एक बार कहा था ठाकुर ने कहा था अ कि मैं यदि चाहूं तो पूरे कामा टुकुर को सोने का मढ कर के जा सकता हूं सोने का बना कर के जा सकता हूं किंतु मुझे पता है कि ऐसा करने से तुम लोगों को कोई लाभ नहीं होगा यहां पे दो दृष्टि से इस बात को देखना है सबसे पहले तो बहुत सारा सोना मचाने से भी मेरे जीवन में कोई सुख शांति आएगी ऐसा कोई ठीक नहीं है सोना आने से अशांति ही बढ़ती है कोई चोरी करके ना ले जाए ऐसा एक टेंशन दूसरे सर के ऊपर में खड़ा हो जाता है यह तो एक चीज है ठाकुर ने काम और कांचन का त्याग करने को कहा था दूसरा है कि यदि भारतवर्ष को आजादी चाहिए तो ठाकुर मां स्वामी जी हमको ऐसा चमत्कार करके आजादी दिलवा देते तो हम उसको मेंटेन नहीं कर पाते क्यों नहीं कर बाते क्योंकि हमारे बराह होने की हमारे पराजित होने की सबसे बड़ी वजह ही वही थी कि हमने समाज के एक बहुत बड़े हिस्से को अछूत बोल कर के समाज में से बाहर कर दिया अभी यह लोग बेचारे पूरे सफर कर रहे हैं उनको गांव में जो कुआ है उसमें से पानी नहीं भरने देंगे गांव की जो जमीन है उसके ऊपर में उनको कार्य नहीं करने देंगे गांव का जो मंदिर है उस मंदिर में उनको पूजा नहीं करने देंगे जो कुछ भी करना है अपना सेपरेट करो तो ऐसा ऐसा करते करते उनकी ऐसी अव दशा हुई कि जब विदेशी आक्रमण आरंभ हुए तो उन्होंने विदेशियों ने सबसे पहले समझ लिया कि हम एक संख्या में बड़े कम और यह भारतवर्ष है संख्या में बहुत बड़ा और साइज में भी बहुत बड़ा इसको पर में जद विजय प्राप्त करना है तो हमारे से अकेले से नहीं होगा किंतु यहां पर देखिए कि बहुत बड़ा वर्ग है जो कि शासक वर्ग के ऊपर में बहुत ही नाराज है तो ऐसे पद दलित लोगों का सहाय लेकर के जितने भी शासक है ब्रामीण है ना कि वैश्य है ना कि ये फिर क्षत्रिय है जिनको कि अपर कास्ट कहा जाता है इनके पर में विजय प्राप्त कर ली जाए तो देखिए कि समाज के भीतर में एक बहुत बड़ी दरार पड़ी हुई थी उसी दरार का फायदा लेकर के हमारे में राजत्व जलाया गए बाहर वाले बाहर से आए लोगों के द्वारा तो यह जो तरार है हमारे समाज के भीतर में इस तरार को पूरी करने के लिए यह एक फॉर वन फैक्टर एक एक कि स्वामी जी ने कहा कि ऑल द पावर्स ऑफ गुड अगेंस्ट ऑल द पावर्स ऑफ इविल सत्य की सभी शक्तियां असत्य की शक्तियों के सामने खड़ी रहे ऐसा स्वामी जी ने ये एक रीजन की वजह से कहा दूसरा है कि साधना की दृष्टि से भी देखिए जैसे जैसे आप साधना में आगे बढ़ते जाते हैं वैसे-वैसे ही देखेंगे कि ये संशय है न कि आलस है न कि तमस है ना कि फिर ये प्रलोभन है यह सामने आते ही जाएंगे आते ही जाएंगे भगवान की जो वो फेमस कहानी है कि जिस दिन रा को उनको निर्वाण प्राप्त होने वाला था उस दिन मारा को लगा मारा अर्थात कि वो राक्षस जिसको कि बुद्धिस्म में उसका उल्लेख है जोक भगवान बुद्ध को प्रलोभन देख लेने के लिए वो उसका वो आया था तो उसको लगा कि भगवान बुत जद उनको निर्वाण प्राप्त हो जाएगा तो राक्षसी शक्तियां इस संसार में बराह हो जाएगी तो भगवान बुद्ध को प्रलोभन देने के लिए प्रथम प्रहर में एक के बाद एक चार प्रहर होते हैं आखिरी प्रहर में भगवान बुद्ध को निर्वाण प्राप्त किंतु इससे पहले के प्रहर में एक के बाद एक मैंने तो प्रलोभन दिखाए प्रलोभन राजत्व सुख शांति आरा को सब कुछ दिखाया इससे भी यदि भगवान बुद्ध का मन ये नहीं हुआ प्रलोभन नहीं हुआ तो भय नि खाना शुरू किया एक के बाद एक विकट आकार धारण करके विकट मूर्तियों का रूप धारण करके भगवान को वो भई दिखाने लगा कितने राक्षस पिशाच भूत ये सब आकर के आपको खा जाएंगे यदि आप तपस्या में लगे रहेंगे किंतु फिर भी भगवान बुद्ध तपस्या में लगे रहे आखिर में निर्वाण प्राप्त किया अपने हिंदू धर्म में भी देखिए कि विश्वामित्र मुनि जब तपस्या कर रहे थे तो इंद्र को लगा कि मेरा इंद्रासन चला जाएगा तो फिर वह अप्सराओं को भेजते हैं उनकी तपस्या का भंग करने के लिए भगवान राम कृष्ण के सामने भी ठाकुर के सामने भी ऐसा प्रल बनाया एक बार पंचवटी में वह पंचवटी के नीचे बैठे थे दक्षिणेश्वर जहां पर काली मंदिर है जहां पर श्री ठाकुर रहते थे वहां पर पंचवटी बोलकर के सुंदर एक जगह बनाई थी जहां पर वह बैठ कर के ज ध्यान किया करते थे साधन भजन किया करते थे तो पंचवटी के नीचे बैठे थे उस समय एक गोरा खलासी यह जो ना ये जो सेलर होते हैं ना ब्रिटिश सेलर तो ब्रिटिश सेलर के पास क्योंकि ब्रिटेन का पावर ही तो ये गन बोट है गन बोट डिप्लोमेसी ये लोग कहते थे ज जो भी देश जो भी राजा उनके विरुद्ध में जाए वहां पे ये गन बोट भेजे और वो गन बोट जाकर के उनको ऐसा धका आएगी या तो गुलाब बारुद फेंके गी कि राजा सीधा उनके वश में आ जाए तो ये जो जो ब्रिटिश सेलर जो होते थे उनको का बड़ा उस समय नाम था और वो लाल कलर के वो कोट वगैरह पहना करते थे जो कि बड़े फेमस थे उस समय तो एक ब्रिटिश सेलर ही रिप्रेजेंट्स द पावर इट सेल्फ जोक शक्ति को रिप्रेजेंट करता है अथॉरिटी को रिप्रेजेंट करता है सत्ता शासन को रिप्रेजेंट करता है वह आकर के इसके हाथ में बहुत बड़ा थाल है उसमें सभी प्रलोभन की चीजें रखी हुई है सोना मन है संदेश है सुंदर वस्त्र है वगैरह और दो-तीन स्त्री या नर्तकी इतने आकर के ठाकुर को प्रलोभन दिखाने लगे तब ठाकुर ने क्या कहा मां को रोते-रोते प्रार्थना करते हुए कहा कि मां यदि इस प्रलोभन को मेरी नजर के सामने से अदृश्य नहीं करोगी तो मैं अपने गले में ूरी मार कर के आत्महत्या कर लूंगा क्यों क्योंकि किसी भी प्रलोभन की एक बार आप बस हो गए तो सालो सालों की साधना आपकी मिट्टी में मिल जाए तो यह साधना में जद हम को टिके रहना है तो अकेले साधना करना बड़ा ही भयावह है किंतु ठाकुर ने जिस तरह से जा जाते के अपनी महासमाधि से पहले अपने संघ की रचना करके गए इस संघ में क्या होता है जितने भी साधक है या या तो फिर सन्यासी हो ना कि फिर संसारी सभी साधक आकर के एक छत्र छाया में साधन भजन जप ध्यान प्रार्थना वगैरह कर सकते हैं कल यहां पे मंदिर में ज्ञान यज्ञ जप यज्ञ का आयोजन हुआ था तो मैंने देखा कि बड़े ही सिंसियर भक्त आते हैं सुबह को 9:00 बजे से लेकर के दोपहर के 4 बजे तक बैठे रहते हैं बीच में सिर्फ एक घंटे का भोजन विश्राम होता है बाकी सतत अजन है प्रवजन है फिर जप ध्यान है इस तरह का फिर पाठ है कथामृत में से इसका प्रवाह बगता रहता है तो साधुओं को भी और भक्तों को भी इससे बड़ा ही सुकून मिलता है बड़ा ही आनंद आता है तो मेरा पाठ था कथामृत का तो मैं गया था देखा कि सब जितने भी बैठे हैं मंदिर में भक्त एकदम शांत होकर के चुपचाप एक पहले तो पाठ का श्रवण किया और पाठ के बाद में जब जप प्रारंभ हुआ सबने जो जपमाला में जप करता है तो जपमाला उन्होंने निकाली और फिर जो वैसे उंगली पर जप करता है या मन में जप करता है तो इस तरह से सबने बैठ कर के जप करना शुरू कर दिया तो मुझे देख कर के बड़ा अच्छा लगा मैंने कहा कि देखिए कि यदि आप लोग यदि घर में रहते इस समय तो संडे का दिन है रविवार का दिन है पता नहीं कैसे यह दिन बीत जाता कोई मेहमान आया है ना कि हम न्यूज़पेपर पढ़ रहे हैं ना कि टीवी देख रहे हैं कि क्या से क्या हो रहा है किंतु यदि मंदिर में आए हैं जप यजन करने के लिए तो सभी लोग इस समय बैठ कर के एक साथ शांत चित्त से जप कर रहे हैं तो ये जितनी भी सत की शक्तियां है जितनी भी आध्यात्मिक शक्तियां है वोह सब मिलकर के जितनी भी दुराचारी शक्तियां है जितनी भी राक्षसी शक्तियां है उसके ऊपर में विजय प्राप्त करें यह स्वामी विवेकानंद ने कहा था यह उनका सपना था और दोनों तरह से यदि सामाजिक दृष्टि से देखा जाए तो यह विदेशी आक्रमणों के सामने सामना भारत के जितने भी अच्छे लोग साथ में आकर के और फिर यदि आध्यात्मिक राज्य में देखा जाए तो संशय रूपी जो राक्षस हमारे सर पर सवार हो गया है इसका सामना और एक समय था कि लोग संशय करते थे आजकल तो मैं बहुत सारे लोगों को देखता हूं संशय नहीं करते हां भगवान है मान लिया कोई बहुत बड़ी बात नहीं है मानना किंतु फिर भगवान है तो इस बारे में कोई इसके ऊपर में कोई आचरण भी तो इस तरह का नहीं है कि वो भगवान पर विश्वास करते हैं जो जिस तरह से एक एक तमस जैसे कि सर के ऊपर में सवार हो गया है यह सब सांसारिक चीजों के पीछे की दौड़ इस तरह से इन चीजों का प्रलोभन इतना तो उनके ऊपर में सवार हो गया है कि यहां पे भगवान को लीप सर्विस देते रहेंगे हां भगवान है ऐसा बोलते रहेंगे ऐसा मानते रहेंगे किंतु भगवान है तो भगवान को प्राप्त करने के लिए कुछ करना है वह बात ही भूल जानी है मंदिर में जाना है कभी-कभी जो फंक्शन वगैरह होते हैं जो भी फेस्टिवल वगैरह होते हैं पूजा वगैरह होती है उसमें थोड़ा सा पार्टिसिपेशन कर लेना है सन्यासी जो साधु मिल जाते हैं नजर के सामने आ जाते हैं तो प्रणाम करके हो सकता है कुछ दक्षिणा वगैरह दे दी तो बस वहीं पर अपना धार्मिक जीवन प्रारंभ हुआ और वहीं पर अपना धार्मिक जीवन का अंत आ गया किंतु मेरे जीवन में कुछ परिवर्तन करना है यह आलस और यह जो जड़ता है उसको दूर करके बैठ करके स्थिर बैठ कर के धर्म ग्रंथों का नियमित अ पाठ करना है या तो फिर नियमित जप ध्यान साधन भजन करना है यह बात बहुत ही कम लोग करते हैं यहां तक कि मैं मैंने देखा है बहुत सारे डिवटी हों को कि उनके साथ में मेरी बात होती है भक्तों के साथ में तो इतना नियमित मंदिर में आते हैं इतना नियमित साधु संग करते हैं इतना नियमित शति एक्टिविटीज है उसमें पार्टिसिपेट करते हैं तो मुझे लगता है कि जब भी उनको समय मिलता होगा घर या मंदिर में तो नियमित बैठ कर के जब ध्यान भी तो करते होंगे स्वाध्याय वगैरह भी तो करते होंगे जोक आंतरिक साधनाए है बाह्य साधना है जैसे कि कर्म योग करना जैसे कि आश्रम की जितनी प्रवृत्ति है उसमें पार्टिसिपेट करना या तो साधुओं के साथ में बैठ के बातें करना यह बाह्य साधना है किंतु एक आंतरिक साधना भी तो है जबक आप न व्रत अवलंबन करके अपने को एक ठाकुर क्या कहते हैं मने फने और कोण मन के मन में या तो वन में जंगल में किसी रिट्रीट में जाकर के या तो कोने में अपने घर के अपने अपने रूम के किसी एक कोने में जाकर के अकेले बैठ कर के ईश्वर चिंतन करें तो यह भी तो करते होंगे तो बहुत सारे लोगों ने कहा कि नहीं महाराज वो सब तो हमसे होता नहीं इसीलिए हम प्रवृति में ही ज्यादा ध्यान देते हैं तो देखिए कि ये अकेले बैठना साइलस एक जो है अभी परसों दिन यहां पे कन्वेंशन हुआ था तो इसमें एक प्रश्न हुआ किसी ने पूछा कि हमने एक ऐसा एक्टिविटी डिजाइन किया था लड़कों को कहा कि आपके जो गोल्स है आपके जो एम्स एंड ऑब्जेक्टिव्स है तो वो आप थोड़ा सा हमको बताइए हम जदी हो सकता है आपको गाइड कर पाए इसके ऊपर में तो काफी लोगों ने कहा कि यह कम्युनिकेशन स्किड इंप्रूव करना चाहते हैं तो देखिए कि मैंने सामने उत्तर दिया यदि मुझे पूछा गया इसके बारे में में लेबोरेटरी आपको अपना कम्युनिकेशन स्किप यदि इंप्रूव करना है ना यू विल आल्सो हैव टू डेवलप द पावर ऑफ साइलेंस ये पावर ऑफ कम्युनिकेशन कैन ओनली बी इंप्रूव्ड इफ यू साइमल नियस डेवलप द पावर ऑफ साइलेंस लोगों के साथ में बातचीत लोगों के साथ में इंटरेक्शन कम्युनिकेशन यदि आप बहुत अच्छा करना चाहते हैं तो आपको मौन व्रत का भी पालन करना होगा क्यों क्योंकि जब तक आप अपने हृदय में करके आपके अंतर मन में क्या चल रहा है आपके अंतरमन में जो दिव्यता का प्रवाह बह रहा है उसके स सीधे संपर्क में नहीं आएंगे उसके साथ में एक योगायोग आप यदि एस्टेब्लिश नहीं करेंगे तो वहां से शक्ति प्राप्त करके वहां से बैटरी को रिचार्ज करके आप बाहर के जगत में आकर के किस तरह से लोगों के साथ में इफेक्टिव कम्युनिकेशन कर पाएंगे आप शायद हो सकता है कि बहुत बातें करें किंतु बहुत सारी बातों में कुछ सार भी तो होना चाहिए मैं जद कुछ कहता हूं लोगों के साथ में कम्युनिकेशन करता हूं किसी को मुझे सिंप किसी के ऊपर में मुझे सिंपति प्रदर्शित करनी है सहानुभूति प्रदर्शित करनी है किसी को मुझे कुछ मार्गदर्शन देना है या तो फिर सिर्फ मित्रों के साथ में बैठ कर के गप लगाने हैं जो कुछ भी करना है तो मेरी बातों में कुछ तो सार होना चाहिए तो जिससे कि लोगों के ऊपर में उसका कुछ असर पड़े तो एक कोई कोई कोई बोते है नी अच्छी बातें करता है बहुत सारे लोग उनको सुनने के लिए इकट्ठा हो जाते हैं और कोई कोई लोग होते हैं जिनकी बातें सुनकर के ही लोग बड़े ही बोर हो जाते हैं बड़े ही त्रस्त हो जाते हैं वो सोचते हैं कि कब ये अपना मुंह बंद करें तो हम शांति से थोड़ा सा विश्राम ले तो देखिए कि हम यदि कम्युनिकेट भी करना चाहते हैं तो सबसे पहले तो हमारे अंतर मन में जो सुपर बैटरी जो आजकल जो इलेक्ट्रिकल व्हीकल आते हैं उसको चार्ज करने के लिए जो बैटरी स्टेशंस होते हैं आजकल हमारे मन शरीर और आ शरीर और मन को चार्ज करने के लिए जो बैटरी है हमारे हृदय में है उसके भीतर में झाक कर के थोड़ा सा अकेले में एकांत में मौन व्रत का पालन करके बैठ कर के बैटरी को चार्ज करेंगे तभी तो कहीं जाकर के हम बाकी जगत के साथ में अपना इंटरेक्शन है इसको इंप्रूव कर तो देखिए कि दोनों तरह से स्वामी जी चाहते थे कि पावर ऑल द पावर्स ऑफ गड अगेंस्ट ऑल द पावर्स ऑफ इवल सत्य की तमाम शक्तियां असत्य की तमाम शक्तियों के साथ में सामने में एक साथ डट कर के खड़ी रहे और इसका मुकाबला करें तो इसके लिए रामकृष्ण मिशन की स्था हमारे यहां पे देखिए कि समाज को मजबूत बनाने के लिए समाज में यह जो बुराइयां है समाज के भीतर में जो दरार पड़ी हुई है उसको हील करने के लिए उसको उसका ट्रीट करने के लिए हम जितनी भी ये सेवा कार्य की प्रवृत्तियां है हम लोग करते हैं और साथ में ही कि आध्यात्मिक जगत में हमारे सामने यह जितनी भी प्रलोभन की शक्तियां अविद्या अस्मिता राग द्वेष अभिनिवेश काम क्रोध मध लोभ मोह मत्सर यह डर को कहो न कि पंच क्लेश कहो जितनी भी शक्तियां एक साथ में मिलकर के हमको डिफीट करने के लिए हमको पराजय दे के लिए इकट्ठी हुई है इन सबके सामने पहले तो सभी साधकों को मिलकर के इकट्ठा खड़े रहना है तो भीतर में भी और बाहर में भी सामाजिक विश्व जगत में भी और आध्यात्मिक जगत में भी हम लोग फिजन प्राप्त करें अच्छा तो अभी थोड़ा सा कथामृत का पाठ किया जाए उसके ऊपर में थोड़ी चर्चा की जाए हम देख रहे थे कि किस तरह से केशव सेन ने एक जहाज लेकर के सभी प्राम भक्तों को उसमें सवार करवा करके ठाकुर के पास में आए ठाकुर को विनंती की कि चलो जहाज में थोड़ा सा लगदा भ्रमण करते हैं और इतना सुंदर जो वातावरण खड़ा होगा उसमें हम आपकी अमृतम वाणी का श्रवण करेंगे तो ठाकुर भी जहाज में आरोपित हुए जहाज में अवतरित हुए अवतरण किया उन्होंने और फिर जहाज चलने लगा और अभी जो टॉपिक हमारा चल रहा है कि किस तरह से ठाकुर कहते हैं कि जितने भी पंथ है हिंदू धर्म में जिसको कि आप भक्ति मार्ग कहो ना कि आप ज्ञान मार्ग कहो सभी पं आखिर में एक ही ईश्वर की ओर ले जाते हैं ज्ञानी लोग जिनको आत्मन कहते हैं ब्राह्मण कहते हैं भक्त लोग इनको ईश्वर कहते हैं एक ही ब्राह्मण है जब वह पूजा करता है अब उनको पुजारी कहते हैं जब खाना बनाता है तब हम उसको रसोइया कहते हैं या तो फिर खाना बनाने वाला ब्राह्मी ऐसा कहते हैं जो ज्ञानी है वो नेती नेती करके यह इंद्रियों के सुख भोग यह मेरे मन के विचार यह पंच महावत का बना हुआ यह शरीर यह जगत के प्रलोभन के विषय यह सब कुछ के साथ में मेरा कोई नाता नहीं है ऐसा नेति नेति करते करते सब चीजों का त्याग करेगा और आखिर में जिस अंतिम सत्ता को वो उपलब्ध होगा जो अंतिम जो सत्य है उसकी उपलब्धि होगी तब कहीं जाकर के उसको ब्रह्म ज्ञान की प्राप्ति हो ये ज्ञानी का रास्ता है और जग भक्त का रास्ता है इ इती ये जगत में जो कुछ भी दिख रहा है वह सब ईश्वर के ही विभिन्न स्वरूप है ठाकुर एक बार कहते हैं यह काम कांचन तो अबके अपने मन में से जाने वाले नहीं है क्रोध मद लो मक मत सर यह तो जाने वाले नहीं है इनका इनकी जो डायरेक्शन है इसको ईश्वर की ओर कर दे मोड़ रय देना ठकुर कहता है इसकी जो डायरेक्शन है ईश्वर की ओर कर दो यदि घमंड करना है तो ऐसा घमंड करो कि मैं ही हूं ईश्वर का सबसे बड़ा भक्त यदि दुख करना है तो ऐसा दुख करो कि यह जो मेरा साधक मित्र है वो मेरे से ज्यादा बैठ कर के जब ध्यान कर रहा है मेरे से इतना जब ध्यान क्यों नहीं होता यदि ईर्षा ही करनी है तो जो साधन राज्य में मेरे से आगे जा रहा है उसकी ईर्षा करो और उसका सोल्यूशन यह दाओ वो जितनी तपस्या करता है उतनी तपस्या मैं भी करू तो ये जितने भी अपनी नेगेटिव इमोशन है शड रीप है उनको ईश्वर की ओर घुमा दो तो यह इती इी का रास्ता है वो है नेति नेति का रास्ता जितने भी ड़ रिप है काम क्रोध मध लोभ मोभ इनका त्याग करो और यहां पर इ इ जो भी यह डरी पूब है ईश्वर की ओर घुमा दो घमन करो तो यह जो ठाकुर कहते हैं ना कि व शांत भाव है एक तो सात्विक साधना है फिर यह राजसिक साधना है और एक तामसिक साधना है सात्विक साधना में साधक अपने घर में अपने बिस्तर के ऊपर में यह जो मॉस्किटो नेट है वो डाल कर के बिल्कुल अकेले में चुपचाप जब ध्यान करता है बाहर में लाइट भी बंद है लोग सोच रहे हैं कि सो गया है किंतु वो उसको पता है कि वह जग रहा है और वह ध्यान कर रहा है या तो जप कर रहा है बिल्कुल किसी को कुछ पता नहीं चलेगा ये हो गई सात्विक साधना राजसिक साधना जो कि पीतांबरी पहन कर के सर के ऊपर में तिलक करके गले में माला पहन कर के और हाथ में वो जो जप माला लेकर के सबके सामने दिखावा करता है वो हो गई राजसिक साधना और तामसिक साधना क्या है मारो काटो डाकुओं जैसा भाव जैसे डाकू आ गए हैं डाकू लोग यदि ये गुंडे लोग लोग जद ये डकेट लोग जो है कहीं पर डके करने के लिए जाते हैं तो कैसा जोर-जोर से चिल्लाते हैं मारो काटो ऐसा करके जैसे कि लोग भयभीत हो जाए ये साइकोलॉजी है इसके पीछे भी कि आप तलवार लेकर के किसी के साथ में युद्ध करना लड़ाई करना चाहते हैं तो पहले तो ऐसा चिल्लाओ ऐसा एक भाई खड़ा करो कि सामने वाला भाई के मारे ही वो चुपचाप वो उसके वश में आ जाए आपको तलवार चलाने की जरूरत ही ना पड़े तो यह भई दिखा कर के ला करके डके लोग किस तरह से डाका डालते हैं ऐसा मां के सामने जाकर के डाका डालना है डके करनी मां के सामने जाके कि मां तुम मुझे दर्शन दो वरना मैं अपने गले में ये चाकू मार दूंगा मैं आत्महत्या कर लूंगा मैं तुम्हारा संतान हूं मेरा हक है तुम्हारा दर्शन प्राप्त करने का ऐसे टके लोग कैसे छीन करके धन ले लेते हैं वैसे ही मां के पास में से ब्रह्म ज्ञान छीन कर के ले लेना है यह है थामस साधना तो यह सब दो तरह की साधना हुई एक है ज्ञानी की सब कुछ त्याग करके करने वाली साधना और एक भक्त की सब कुछ को स्वीकार करके करने वाली सा तो यहां पर ठाकुर ने कहा कि सब कुछ अभी अभी थोड़ा सा आगे पढ़ते हैं मास्टर महाशय क्या कहते भक्त भाव की रूप जानो भक्त का भाव क्या है जानते हो हे भगवान ही प्रभु आमी तोमर दाश हे भगवान तुम प्रभु हो और मैं तुम्हारा दास ह तुम मा आनी तुम्हार संतान तुम मा हो और मैं तुम्हारा संतान अबार तुम अार पिता बा माता फिर कहता है कि तुम ही मेरे पिता हो या तो फिर तुम ही मेरी माता हो तुम ही पूण अभ तुमर अनिश तुम पू हो मैं रा अंश भक्तो मन कोथा बोलते इच्छा करे ना ब्रह अक्त ऐसा कभी नहीं कहेगा कि मैं ब्रह्मण मेरे भीतर में ही सर्वशक्तिमान आत्मन विराजित है और मेरा सही स्वरूप सच्चित आनंदमय है भक्त ऐसा कभी कहना नहीं चाहेगा तो यह भी देखिए कि प्रश्न होगा कि सही क्या है अच्छा रास्ता क्या है या सही रास्ता क्या है मास्टर महाशय जिस तरह से संशय में पड़ गए थे कि भगवान साकार भी है निराकार भी है और भी कितना कुछ है तो मास्टर महाशय सोचते हैं कि एक ही भगवान अलग-अलग इस तरह से हो सकते हैं जो जो दूध सफेद है वह काला कैसे हो सकता है ू तो सफेद ही दिखेगा काला दूध तो बिगड़ गया होगा तो हो सकता है कि हम काला दिखे वरना तो जो अच्छा दूध है वो तो सफेद ही दिखेगा तो भगवान का तो एक ही स्वरूप होना चाहिए ना विभिन्न स्वरूप विभिन्न रूप से दूसरों के अलग-अलग लोगों को कैसे दिखाई दे सकते हैं तो किंतु यहां पे यह देखना है कि ईश्वर का जो सही स्वरूप है उसको तो हम अपने न से या अपने मन में सोच करके वर्णन नहीं करने वाले ए नहीं कर पाएंगे उसका तो जब तक साक्षात्कार नहीं होगा तब तक उसका सही स्वरूप क्या है वह हमको समझ में नहीं आएगा किंतु हमारी जो अधिकारी भेद जिसको कि अधिकारी भेद कहते हैं हमारी जो एलिजिबिलिटी है हमारी जो क्षमता है हमारी साधन करने की जो शक्ति है उसके अनुसार हम यह सब विभिन्न रास्ते पसंद करते अभी यदि मेरे पास में त्याग करने की प्रचंड शक्ति है मैं विषयों के जितने भी जो जो प्रलोभन है उसको एक बार मन में से निकाल दो कि नहीं कोई भी प्रलोभन मेरे सामने क्यों ना आ जाए मैं इसको किसी भी तरह से ग्रहण नहीं करूंगा कोई भी चीज मेरे सामने क्यों ना आ जाए मैं मैं अपने मन को इतना विल पावर से संकल्प शक्ति से इतना दृढ़ करूंगा कि आखिर में मैं जो चाहूंगा वैसे ही साधना करूंगा मुझे यदि सुबह को 4:00 बजे उठना है संकल्प किया है तो 4:00 बजे उठ ही जाऊंगा एक घंटा दो घंटा बैठ कर के ज धन करना है तो कर ही लूंगा मत में किसी भी तरह का प्रलोभन प्रवेश नहीं करने दूंगा तो नहीं ही करने दूंगा स्वामी जी जब अमेरिका से वापस आए तो हमको पता है कि कितने बीमार रहते थे तो उस समय स्वामी जी के गुरु भाइयों ने कहा कि स्वामी जी हम लोग कबीरा जीी औषध का प्रयोग करते हैं आप सहमति दीजिए तो स्वामी जी खुद को तो ऐसा कोई पड़ी नहीं है अपने शरीर के ऊपर में प्लस हमको तो पता है कि अमरनाथ गए थे स्वामी जी तो स्वामी जी को इच्छा मृत्यु का वरदान मिला तो स्वामी जी को पता है कि मेरा मृत्यु तो तभी होने वाला है जबकि मैं चाहूंगा किंतु बुलू भाइयों का जो स्नेह है उससे तो वो उसको तो वो ठोकरा नहीं दे सकते तो स्वामी जी ने कहा ठीक है च तुम लोग कहते हो कि किसी कविराज को बुलाओगे यानी कि कोई आयुर्वेद की प्रैक्टिस करने वाला तो ऐसा इसको यदि बुलाओगे तो मैं इस तरह का औषध लेने को या तो एक कविराज को बुलाया गया एक औषध स्वामी जी को दिया किंतु औषध के साथ में बड़ी ही कठिन शरत रखी गई एक बड़ी ही डिफिकल्ट कंडीशन रखी गई जब तक स्वामी जी के ऊपर में यह औषध का प्रयोग चलता है स्वामी जी पानी नहीं पी पाएंगे तो अभी देखिए कि प्यास तो एक ऐसी चीज है कि मनुष्य को वो आगत कर देगी और उस समय स्वामी जी का जो शिष्य था शरद चंद्र चक्रवर्ती स्वामी शिष्य संवाद का प्रणेता वो वहां पर उपस्थ थित था उसने यह बात सुनी कि स्वामी जी इस तरह का औषध ले रहे हैं जिसमें पानी पीने की सब त मनाई है तो वो स्वामी जी के पास में गया और स्वामी जी को कहा कि अरे आप तो एक घंटे में दो-तीन गिलास पानी पी जाते हैं इतनी आपको पानी की प्यास लगती है तो फिर आप बिना पानी पिए औषध कैसे खा पाएंगे तो स्वामी जी ने कहा कि देखो मैंने अपने मन को आदेश दिया कि अभी से एक मोटा भी एक ड्रॉप भी पानी अभी मुंह में नहीं जाना चाहिए ऐसा मन को जो आदेश दिया है तक से लेकर के मेरा मन पानी की प्यास के प्रति बिल्कुल अलग हो गया है उससे उसके बिल्कुल ही उससे विपरीत हो गया है तो यह अपने मन को 100% संयम करने की यदि शक्ति है तो हमारे लिए है ज्ञानवान किंतु मन में इस तरह की वीकनेस है कि जो भी प्रलोभन आ जाता है तो हम उसके सामने झुक जाते हैं देखिए कि मैंने अपने ऑर्डर में ऐसे साधु देखे हैं बड़े ही वृद्ध हो गए हैं और कभी-कभी बीमार भी रहते हैं किंतु कैसी भी कंडीशन हो रात जद अगले दिन बाहर गए होंगे किसी दूसरे शहर में किसी काम की वजह से या सत्संग करने के लिए और रात को बड़ी देरी से आए हैं या तो वृद्ध है या तो बीमार है या तो सब कुछ एक साथ में है किंतु फिर भी दूसरे दिन सुबह को मंगल आरती में जो उपस्थित रहना है वह कभी भी उसमें छुट्टी नहीं लगाए ऐसे साथ को मैंने अपनी नजरों से देख खा है मैं जब बेलू मट में था प्रभानंद जी को देखता था हमारे रेवियर वाइस प्रेसिडेंट महाराज थे उस समय अभी तो उन्होंने महासमाधि ग्रहण कर ली है उस समय वह बेलल मठ में थे भीति था मैं देखता था कि उनका जो शरीर में इतने एक के बाद एक रोग उनके बढ़ते जाते थे शरीर में इतना सफरिंग एंड पेन होता था चल भी नहीं पाते थे सेवक लोग उनको वल चेर में बिठा कर के चलाते थे शरीर बिन कुल जिसमें हड्डी पसली एक हो गई थी पूरे दुबले पतले हो गए थे पूरा शरीर ऐसा करके झूक गया था किंतु ऐसी परिस्थिति में भी बेरर मठ में आपको पता होगा कि सुबह को 4:00 बजे मंगल आती होती है एक दिन भी छुट्टी लगाते मैंने नहीं देखा हालो कि हम लोग यंग है शरीर स्वस्थ है और कभी-कभी ऐसा होता है कि चलो आज सो लेते हैं थोड़ी आलस आ रही है उठने की जद ट्टी के दिन है बहुत बारिश हो रही है तो भी बारिश मन फिर क्या है एक्सक्यूज फेंकता है आपके सा साने एक के बाद एक कि अरे इस बारिश में यदि जाएंगे मंदिर में तो बिना मतलब भीग जाएंगे ऐसी संभावना है सर्दी जुकाम हो जाए दूसरी एक मुसीबत खड़ी हो जाएंगी चलो नहीं जाते है या तो फिर बहुत ठंड है ठंडी में गए फिर से सर्दी जुकाम मने हमेशा मन एक एक्सक्यूज फेंकता है आपके सामने तमस के रास्ते को फॉलो करने के लिए तमस के रास्ते प खींच जाने के लिए उस समय ये प्रचंड संकल्प शक्ति चाए कि शरीर जदी रहे की चाय एक व्रत मैंने जो ग्रहण किया है व्रत जो धारण किया है इसको किसी भी कीमत पर मैं उसका त्याग नहीं करूंगा यह संकल्प शक्ति जिसके भीतर में है वो ज्ञान का रास्ता फॉलो करे और यह संकल्प शक्ति नहीं है बीच-बीच में हम प्रलोभन में फस जाते हैं बीच-बीच में अपना मन कमजोर हो जाता है हम उसके ऊपर में संयम नहीं रख सकते तो उनके लिए है भक्ति का रास्ता ईश्वर ही सब कुछ है मैं ईश्वर को ही शरणागत हो गया अभी ईश्वर की इच्छा कि मेरे मन में प्रलोभन आने दे न कि ना आने दे अभी ईश्वर की इच्छा कि मेरी संकल्प शक्ति को दृढ़ करे ना कि कमजोर करे अभी ईश्वर की इच्छा कि मुझे साधक बनाए रखे ना कि मुझे अतः पतन के रास्ते प ले जाए सब कुछ मैंने ईश्वर पर डाल कर के पावर ऑफ एटर्नी देकर के चुपचाप शांति से अभी बैठा हो यह हो गया भक्ति का शरणागति का रास्ता ये दोनों रास्ते हैं हमारी जो एलिजिबिलिटी है उस एलिजिबिलिटी के अनुसार हमको फॉलो करना है और राम कृष्ण मिशन का आज का जो मत है जो अभिप्राय है कि सभी रास्तों को फॉलो कीजिए ज्ञान योग के रास्ते पर चल के अपनी संकल्प शक्ति को भी दृढ़ कीजिए भक्ति योग के रास्ते पर चल के शरणागति को भी आप धीरे-धीरे अपने हृदय में स्थान दीजिए शरणागति को विकसित कीजिए योग के रास्ते पर चल कर के मन को एकाग्र करने का प्रयास कीजिए कर्म योग के रास्ते पर चल के यथा शक्ति लोगों की सेवा कीजिए ये चारों रास्तों का चारों पथ का चारों योग का यथा शक्ति आप अनुष्ठान कीजिए धीरे-धीरे इस जन्म में नहीं तो अगले जन्म में अगले जन्म में नहीं तो उसके बाद के एक ना एक दिन हम ईश्वर प्राप्ति या आत्म दर्शन अवश्य प्राप्त करेंगे तो तो यहां पर ठाकुर येय विभिन्न रास्ते जो है उसके बारे में बता रहे है कभी-कभी कथामृत पढ़ कर के लगता है कि ठाकुर चाहते हैं कि या तो फिर ठाकुर का ऐसा मानना है कि भक्ति का रास्ता ज्ञान के रास्ते से ज्यादा श्रेयस कर है ज्यादा श्रेष्ठ है ऐसा लगता है ठाकुर ने बार-बार ठाकुर एक बार कहे थे कि मैं चीनी नहीं होना चाहता मैं चीनी खाना चाहता हूं चीनी होना चाह अर्थात की चीनी होना अर्थात की ब्रह्म ज्ञान में स्थित हो जाना ब्रह्मण ही हो जाना और चीनी खाना अर्थात की ईश्वर से एक मने थोड़ा सा डिफरेंस रहता है ईश्वर का जो रूप है उसका आस्वादन करके ईश्वर की जो कृपा है उसका आस्वादन करके ईश्वर के साथ में शांत भाव से दास भाव से वात्सल्य भाव सेर भाव से संतान भाव से ईश्वर के साथ में कोई ना कोई संबंध बनाना तो ये कभी कभी ठाकुर को पढ़ के लगता है कि ठाकुर भक्ति की महिमा ज्ञान की महिमा से ज्यादा श्रेष्ठ गिनते हैं ज्यादा गाते हैं तो मुझे ऐसा नहीं लगता मुझे लगता है कि ठाकुर जब अपने त्यागी संतानों के साथ थे जैसे कि स्वामी जी तो स्वामी जी को अष्टावक्र सहीता पढ़कर सुनाने को बोला तो स्वामी जी बड़े परेशान हो गए कि अरे यह सब क्या लिखा है मैं ईश्वर हूं मैं ईश्वर हूं ऐसा भी कभी हो सकता है क्या मैं कभी ईश्वर हो सकता हूं ऑफकोर्स मैं ईश्वर नहीं हो सकता यह जो मेरा छोटा अहम है जो कि अविद्या अस्मिता सबसे भरा हुआ है वो तो कभी ईश्वर नहीं हो सकता किंतु ये जो छोटे अहम के परे जो बड़ा अहम है ना जो असली स्वरूप है वो अवश्य ईश्वर हो सकता है किंतु स्वामी जी जब डर गए येसा सब पढ़ते पढ़ते तो ठाकुर ने कहा कि तुम मेरे लिए पढ़ो व अपने लिए मत पढ़ना मेरे लिए अष्टावक्र संहिता पढ़ो अष्टावक्र संहिता अर्थात की अद्वैत ज्ञान का बहुत ही सुंदर ग्रंथ तो ठाकुर जिसको जो नायक जो जिसका अधिकारी था उसको वो ज्ञान देते थे यहां पे भक्तों के साथ में बात कर रहे हैं इसलिए भक्ति की बात करते हैं स्वामी जी ज्ञान के अधिकारी थे तो स्वामी जी के साथ में ज्ञान की बात कर तो आज यही त कर फिर से श पर तोतापुरी सबसे बड़ा एग्जांपल ज्ञानियों के राजा यो के त्यागी शवर स्वयं ठाकुर को अ की शिक्षा देने वाले ठाकुर के गुरु एक परिस्थिति ऐसी आ गई कि मामा बोल कर के उनको अभी पुक प्रैक्टिस प्रैक्टिस के अलावा तो और कोई उपाय नहीं है क्योंकि अब जैसे देखिए कि यह कुछ दिनों से ये इंटरनेशनल मैथमेटिक्स ओलंपियाड के न्यूज आ रहे हैं तो उसमें चाइना का एक स्टूडेंट है जिसको कि परफेक्ट स्कोर मिले जोक 100 आउट ऑफ 100 जो स्कोर होते है 100% स्कोर उसको मिले और दो साल से ऐसा हो रहा है ू इयर्स इन रनिंग और कहा जाता है कि ये जो मैथमेटिक्स के इतने टफ प्रॉब्लम होते हैं कि जिनको की मैथमेटिक्स ओलंपियाड में गोल्ड मेडल मिलता है इनको यह ग वगैरह कंपनिया एकदम बड़े बड़े आयर एनुअल पैकेज देकर के उठा लेते अभी google2 से प्रॉब्लम सॉल्व करने का प्रयास करता है एक इंटरनेशनल मैथमेटिक्स ओलंपियाड के जो क्वेश्चन पेपर है उसको सॉल्व करने का तो उसको भी सिल्वर मिडल मिला देखिए कि आज यह इतना डेवलप हो गया है किंतु वह छह क्वेश्चन में से सिर्फ दो क्वेश्चन का आसर दे पाया और उसको सिल्वर मेडल तक के रैंक उसका मिला किंतु यह लड़का जो है चाइनीज लड़का टू इयर्स इन रनिंग सिक्स आउट ऑफ सिक्स क्वेश्चन ये सॉल्व कर देता है और परफेक्ट स्कोर लेके आता है तो देखिए कि इस नेवल की ये जो टैलेंट उसने डेवलप की है तो उसने कैसे डेवलप की है बाई प्रैक्टिसिंग प्रैक्टिसिंग प्रैक्टिसिंग मतलब आंख बंद करके खाना पना छोड़ कर के यह जो इसके पीछे लग गया होगा और आखिर में उसने उस लेवल तक पहुंच गया होगा कि जो चार घंटा आपको मिलता है ये जो सबसे टफेस्ट क्वेश्चन इन मैथमेटिक्स सॉल्व करने का वो चार घंटे में आपने उसको 100% सोल्ट कर दिया तो ये मैंने एक उठ ठाकुर कहते हैं ना कि जब वो झड़ बने एक तूफान आता है तो ये जो ये होता है नौका चलाने वाला वो क्या करता है पहले तो बड़ी ही मेहनत करके उसको वो नौका को कैसे भी करके तूफान से पार करवा लेता है फिर बड़ा बैठ करके शांति से वो वो सिगरेट वो चिलम पीता है तो यह जो शुरुआत का जो समय है साधक का वो बड़ा ही तूफान के भीतर में से हमको गुजरना है सतत प्रलोभन की यह बारिश प्रलोभन का यह आक्रमण होता रहेगा युद्ध करते रहना है करते रहना है आखिर में एक समय आएगा कि हम भी शांति से जाएंगे तो इसका और कोई सोल्यूशन नहीं है कि हां आप सद ग्रंथ पाठ कर सकते हैं जैसे कि मुझे राम कृष्णा विवेकानंद लिटरेचर प इतना मेरा एक विश्वास है मैं हमेशा फर इसके अलावा और कोई किताबें पढ़ता ही नहीं आजकल जो भी है ये ठाकुर महा स्वामी जी की मेरी पूरी लाइब्रेरी है और ठाकुर की गुपा सभी आ गई है राजकोट से तो ये सब ये मतलब 200 300 किताबें है उसमें तो एक के बाद एक किताब खोल कर के मैं इसको पढ़ता रहता यह मेरी साधना है सब सब लोग अपनी एक एक साधना डेवलप कर लेते हैं तो यह रा कृष्ण विवेन लिटरेचर इज माय साथ तो यसा कोई भी एक साधना पकड़ करके आपको चलना है मने नॉट नेसेसरी कि आप बैठ कर के जतिन ही करें नॉट नेसेसरी कि आप बैठ कर के यही करे चार रास्ते जो दिखाए गए हैं वो इसलिए है कि ज आप सकर्म भी करते हैं तो सत्कर्म भी एक शक्ति है बहुत सारे लोग सोचते रहे कि मैंने इतना सब कुछ किया वहां पर जाकर के आखिर में इन लोगों ने मुझे वहां से बिल्कुल बिना किसी रिकॉग्निशन के वहां से निकाल दिया य तो जद सत कार्य किया होगा तो रिकॉग्निशन मिला होगा या नहीं मिला होगा आपको भीतर में से शाति अवश्य तो इवचन को वो काट जैसे वह कहते है ना कि क्षीण पुण्य मृत्य लो के मिशन जद हम पुण्य करते हैं तो देवलोक में जाएंगे देवता का पद प्राप्त करेंगे किंतु जब पुण्य क्षय हो जाएगा वही पृथ्वी पर आ जाएंगे क्योंकि मनुष्य जीव देवता कौन है अल्टीमेटली वही मनुष्य है जिसने बहुत सारे पुण्य किए और पुण्य का भोग करने के लिए उसको देव को स्वर्ग में भेजा गया है किंतु पुण्य जद क्षय हो जाएगा इसी मृत्य लोक में आना और आखिर में तो साधन भजन करके मुक्ति प्राप्त करनी है इसके अलावा और कोई उपाय नहीं मुक्ति ही हमारा आखिरी दे और मुक्ति सिर्फ मनुष्य जन्म में ही प्रात डर तो लगेगा ही कि आखिर में तो वही मनुष्य की इनसिक्योरिटी ले तो आ ग देवता है किंतु वो तो एक्चुअली मनुष्य में से ही व देवता कोई अलग प्रजाति नहीं है मनुष्य पुण्य करता है तो देवता का पद प्राप्त करता है पुण्य शय करके फिर से मृत्यु लोकते आना और कोई देवता कोई परमानेंट पोजीशन नहीं अ मुक्ति सिर्फ निश योनि में ही प्राप्त और किसी योनि में नहीं इवन देव योनि में भी नहीं इसी लिए पुण्य का भोग करके पुण्य क्षय हो कर के इसी पृथ्वी लोक पर आना है और जन्म मृत्यु जरा व्याधि के चक्र में चलते रहना है जब तक मुक्ति ना हो जाए और बिकॉज की मनुष्य ही व देवता हुआ है तो मनुष्य की जितनी भी वो इनसिक्योरिटीज है जितने भी घमंड है व जो कुछ भी है सब वहां पर जाता है उसको मुक्ति तो में नहीं मिल गई है कि यह सब चीजों से मुक्त हो जाए और देवताओं में भी वही गुण होते हैं जो कि मनुष्य में होते हैं अष्टावक्र गीता जो अ उसको ठाकुर ने सिर्फ स्वामी जी को ही पढ़ने को बोला था और किसी को नहीं क्योंकि स्वामी जी ही ज्ञान के सही सही अधिकारी थे ठाकुर के पास में जितने भी खाते थे इवन त्यागी संतानों में भी यह काली महाराज का उदाहरण सबके सामने है स्वामी जी जब काशीपुर में जब पहली बार अद्वैत ज्ञान का प्रस्फुटन उनके पितर में हुआ काली महाराज को कहा कि मुझे स्पर्श करके देखो काली महाराज ने जैसे ही उनको स्पर्श किया वो जो भक्ति का मार्ग लेकर चल रहे थे उससे वह विचित होकर के ज्ञान के मार्ग के ऊपर में आ गए अभी वो एक्चुअली ज्ञान के अधिकारी थे थे नहीं तो जबरदस्ती ज्ञान के रास्ते में उनको लाया गया है बाद बाद में उनके साथ में जो घटना हुई इससे यह बड़ी स्पष्ट हो जाती है ठाकुर ने स्वामी जी को डांटा भी कि तुम्हारे पास में अभी शक्ति इकट्ठी नहीं हुई तो इसे अभी से इतना वितरण करना शुरू कर दिया काली को तो इस रास्ते पर नहीं चलना था उसका तो रास्ता अलग है किंतु ठीक है चलो जो भी हुआ है तो अधिकारी जो नहीं होता उसको जोर जबरदस्ती वह रास्ता पकड़ा दिया जाएगा तो क्या होगा सबसे बड़ा उदाहरण स्वामी अता जी महाराज