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Sri Ramakrishna Kathamrita ·

श्रीरामकृष्ण कथामृत || 14 Dec 1883 - श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ दक्षिणेश्वर में || 23 Jul 2025

प्रार्थना

ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिणे अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः श्री रामकृष्ण कथामृत इसका हम पाठ कर रहे थे 14th दिसंबर 1883 मास्टर महाशय दक्षिणेश्वर में रहने के लिए आए हैं। क्रिसमस की छुट्टी है। ठाकुर ने कहा है मने वने और कोने मन में वन में और कोने में कभी-कभी रिट्रीट करके तपस्या करनी चाहिए जिससे कि क्या होता है अपना मन वै मन में वैराग्य का उद्दीपन होता है और अपना मन ईश्वर की ओर धावित होता है। तो ठाकुर की यह बात सुनकर के मास्टर महाशय आए हैं। ऑलरेडी हमने देखा कि ठाकुर मास्टर वार्तालाप कर रहे हैं। उस समय वार्तालाप में ही दो कहानियां ठाकुर बताते हैं। उसमें से एक कहानी तो थी। तीन कहानी ठाकुर बताते हैं। दो हमने ऑलरेडी देख ली है। सर्वप्रथम कहानी थी एक छोटी बाल विधवा है छोटी उम्र की और उसका पति अभी तो उसके पास में रहता नहीं। विधवा है तो पति तो है नहीं तो वो जब अपनी दूसरी सहेलियों को देखती है जिसका पति है पति के घर जाती है पति उनके घर आते हैं तो कैसा वह नववधू को एक आनंद होता है तो यह बाल विधवा के मन में भी यह एक उत्कंठा जागृत हुई कि मेरे भी क्यों पति नहीं है मैं क्यों उनके घर नहीं जाती वह क्यों मेरे घर नहीं आते तो वह रोते-रोते अपने पिताजी को कहती है तो उनके पिताजी जी कहते हैं कि गोविंद है तुम्हारे पति। तो यह बाल विधवा गोविंद जी को पुकारती है, रोती है, उनको प्रार्थना करती है। तो एक सरल बालिका का हृदय के अंतर मन से जो पुकार प्रगटित होती है, जो आरती जो आकांक्षा जो प्रार्थना प्रकट होती है उसको सुनकर के गोविंद जी स्थिर नहीं रह पाए। उन्होंने आकर के इस बच्ची को इस बालिका को उन्होंने दर्शन दिया। तो वह एक कहानी अर्थात कि जो सरल विश्वास ठाकुर कहते हैं कि ईश्वर दर्शन कैसे हो? यदि हमारे मन में यह प्रश्न होता है कि ईश्वर के बारे में सुना तो बहुत है। ईश्वर दर्शन से आनंद तो बहुत प्राप्त होता है। यह सब बातें तो हमने सुनी है। तो फिर वह ईश्वर का एक्चुअली दर्शन कैसे हो? तो वह दर्शन करने के लिए सरल विश्वास पूर्वक ईश्वर को पुकारना है। तो किस तरह के विश्वास से ईश्वर को पुकारना है? तो उसके बारे में यह प्रथम कहानी। फिर दूसरी कहानी ठाकुर कहते हैं कि जटिल नामक एक बालक था। उसकी जो पाठशाला थी वह दूसरे गांव में थी। पाठशाला जाने के समय रास्ते में एक वन आता है। तो वन में तो अंधेरा होता है। जंगली पशु भी होते हैं और यह बच्चा वो भूत वगैरह की कहानियां सुनता होगा। राक्षसों की कहानी, भूत की कहानी यह जैसे छोटे बच्चों को यह सब सुनना अच्छा लगता है। तो वह भी शायद सुनता होगा। तो उसके मन में यह एक भय भी बैठ गया होगा कि यह राक्षस आ जाएगा रास्ते में तो क्या होगा? तो अपनी मां को कहता है कि मां मुझे यह पाठशाला में जाने से डर लगता है। बीच में जंगल है इतना विराट। तो फिर मां कहती है तुम अपने बड़े भाई मधुसूदन को पुकारना। तो यह बच्चा फिर दूसरे दिन जब जाता है अपनी पाठशाला जब रास्ते में वन फिर से आता है तो वह पुकारता है अपने हृदय के सरल हृदय से विश्वास पूर्वक क्योंकि बच्चे का मां के ऊपर में विश्वास होता है तो मां जो कहती है वही यह बच्चा करता है। अभी जैसे कि ठाकुर कहानी में वो उदाहरण के रूप में कहते हैं जैसे कि बिल्ली का बच्चा तो बिल्ली का बच्चा वो सिर्फ म्याऊं म्याऊ करना जानता है। उसकी मां ठीक करती है कि उसको क्या खिलाना है। उसको कहां पर रखना है। यदि वह बिछाने में उसको पकड़ के रखेगी तो वह बिछाने में लेटा रहेगा। उसको उठाकर के यदि मिट्टी में रखेगी तो वह मिट्टी में लेटा रहेगा। अर्थात कि अपनी मां पर इतना भरोसा है कि जो मां कहता मां कहती है वही यह बच्चा करेगा। तो यहां पे भी यह बच्चा है जटिल। उसको अपनी मां पर विश्वास है। तो मां ने जब कह दिया है कि हां तुम्हारे बड़े भाई है मधुसूदन उनको पुकारना। वो आएंगे तुमको सहाय करेंगे। तो यह बच्चा सही-सही में पुकारने लगा मधुसूदन का नाम लेकर के। और जब मधुसूदन नहीं आते हैं तो फिर रोने लगा। कहता है कि आप मेरी पुकार सुन के क्यों नहीं आते हैं? मेरी मां ने तो कहा कि आप इस वन में रहते हैं तो फिर क्यों नहीं आएंगे? तो जैसे ही यह सरल बच्चे की यह अंतर्मन की आरती प्रार्थना सुनी यह मधुसूदन रह नहीं पाए वह आए बच्चे को दर्शन दिया उसको हाथ पकड़ करके पाठशाला ले गए और उसको घर भी ले आए वापस शाम के समय तो यह सरल अंतर मन की ये पुकार से ईश्वर अवश्य मिलते हैं। देखिए एक कहानी भी है वो जी मास्टर महाशय इसके बाद में ही आएगा कि मास्टर महाशय जब कहां पर रहने को ठीक कर रहे हैं। पहले तो सोच रहे थे कि वो नहबत के पहले मंजिल पर रहेंगे। वहां पर चारों ओर से वो पहली मंजिल पर रहना। फर्स्ट फ्लोर पर रहना। यानी कि आपको सुंदर गंगा का दर्शन होगा। पेड़ पौधों का दर्शन होगा। चांद दिखाई देगा। आकाश में तारे ये दिखाई देंगे। बादल दिखाई देंगे और मास्टर महाशय है कवित्व प्रिय तो फिर वह सोचेंगे कि वहां पर रहा जाए नबत के प्रथम मंजिल पे फर्स्ट फ्लोर पे किंतु ठाकुर ने कहा है कि तुम वहां पर जाकर के पंचवटी में रहना पंचवटी में वो कुटिया है पंचवटी के नीचे में वो जो वट वृक्ष है उसके नीचे में वहां पर बहुत साधना हुई है तो फिर मास्टर महाशय वैसे तो गए हैं नबत में रहने के लिए किंतु फिर आधी रात को उनका मन नहबत में रहा नहीं। उनका मन वही पंचवटी की कुटिया की ओर जैसे कि आकर्षित हो रहा है। ठाकुर ने कहा है तो कि तुम वहां पर रहना। ठाकुर के शब्दों की तो शक्ति है। तो मास्टर महाशय आधी रात को पंचवटी की ओर जा रहे हैं। तो देखा कि वहां पे पंचवटी में तो वह तो बहुत एक जंगल जैसा था ना वहां पे उस समय तो वो चारों ओर से पेड़ वग म पौधे भी थे। तो वहां पर भीतर में कौन बैठा है समझना मुश्किल था। तो मास्टर महाशय को एक आवाज सुनाई दी। ठाकुर का ही एक संतान एक भक्त वहां पर बैठकर के कहां हो दादा मधुसूदन? आओ मुझे दर्शन दो। ऐसा करके पुकार रहा है। देखिए ठाकुर ने यह कहानी बताई। देखिए हम लोगों में और ठाकुर के भक्तों में ठाकुर के असली शिष्यों में फर्क क्या है? हम ये सब कहानियां सुन लेते हैं। सुनकर के हमको शायद आनंद भी होगा। किंतु वहीं पर हमारी दौड़ है। वहीं तक हमारी दौड़ है। जबकि यह ठाकुर के यह त्यागी संतान थे। यह इवन जो गृहस्थ संतान थे। ठाकुर की बातों को लिटरली लेते थे। जब ठाकुर यह कहते हैं कि आप सरलता पूर्वक ईश्वर को पुकारिए। देखिए ईश्वर का दर्शन क्यों नहीं होता है? तो उन्होंने सही-सही यह करके दिखाया। वहीं वह पंचवटी में बैठकर के ठाकुर का एक भक्त रात को पुकार रहा है। कहां हो दादा मधुसूदन? तो मास्टर महाशय यह सुन पाए थे। अभी प्रश्न होगा कि वह कौन था जो कि पंचवटी में बैठकर के पुकार रहा था। मास्टर महाशय ने नाम तो नहीं दिया किंतु शिवानंद वाणी महापुरुष महाराज की वह एक किताब है। उनकी वाणी का संग्रह है। उसमें एक बार महापुरुष महाराज कहते हैं कि मैं जब दक्षिणेश्वर में था तो मैं वही पंचवटी के नीचे बैठकर के कहां हो दादा मधुसूदन? ऐसा करके मैं पुकारता था। तो अभी देखिए हमको यह नहीं पता है कि यह मास्टर महाशय ने जिस दिन की यह घटना लिपिबद्ध की है 14th दिसंबर 1883 महापुरुष महाराज क्या उसी दिन यहां पर बैठकर पुकार रहे थे उस समय का त्या तारक ठाकुर का त्यागी संतान तो तारकदा ही वहां पर बैठे थे स्वामी जी की लैंग्वेज में स्वामी जी पहले तो महापुरुष महाराज को तारकदा करके पुकारते थे फिर सन्यास हुआ तो फिर उनको महापुरुष महाराज कहना शुरू किया। तो यह तारकदा ही वहां पर बैठकर के वह मधुसूदन को पुकारते थे। उसी दिन पता नहीं किंतु महापुरुष महाराज ने कहा अवश्य है कि हां मैं वहां पर बैठकर के इस तरह से ठाकुर की कहानी को अनुसरण करके कहां हो दादा मधुसूदन मुझे दर्शन दो। ऐसा करके पुकार रहा था और रो रहा था और रोते-रोते देखिए आंसू अपने जितने भी बहते हैं उतना ही अपना हृदय धुलता जाता है। कल जैसे हमने डिस्कस किया था कि मनुष्य जीवन का सर्वोच्च प्राप्ति क्या है? यह अपना ब्रेन जो बाइनरी लैंग्वेज में काम करता है। एक है पेन और दूसरा है प्लेजर। एक तो है कष्ट, दूसरा है आनंद। आनंद के पीछे ही हमेशा हमारा मन दौड़ता है। यदि हम आध्यात्मिकता को वरण करते हैं, आध्यात्मिक जीवन में आगे बढ़ने का प्रयास करते हैं, मोमेंटरीली ऐसा लगता है कि अरे जगत जो हमको आनंद दे रहा है, उससे तो हम अपने को रिट्रीट नहीं कर रहे हैं। उससे तो क्या हम दूर नहीं चले जा रहे हैं। अर्थात कि सन्यास जीवन क्या उन लोगों के लिए है जिन लोगों का एक फेटलिस्टिक माइंडसेट होता है। या तो फिर एक फैटिशि होता है। इंग्लिश वर्ड है फैटिश अर्थात कि एक तरह का एक तरह का आकर्षण या तो फिर एक इस तरह का आकर्षण जो कि नॉर्मल नहीं है। थोड़ा सा एबनॉर्मल है। तो इसको फैटिश कहते हैं। तो ये दुख प्राप्ति दुख मुझे चाहिए। यह फैटिशि है क्या हमारा? यह फेटलिज्म है क्या हमारा? बहुत बार जब भारत गुलाम था। ब्रिटिश लोग भारत आते थे तो उन लोगों का कहना था कि भारत में गरीबाई को ना जैसे कि एक वरशिप किया जाता है। हम लोग चाहते हैं कि हम गरीब रहे। हम लोगों को गरीबाई अच्छा लगता है। पॉवर्टी है, सफरिंग है, पेन है। यह सब हमको अच्छा लगता है। जनरली एक कोई भी एक आम आदमी होगा उसको तो सुख और आनंद ही तो अच्छा लगेगा। किंतु यह भारतीय लोग हैं। विकृत मस्तिष्क है। एबनॉर्मल है। वे लोग दुख के पीछे दौड़ते हैं। तो यह जब सन्यासियों को जब देखते थे और उस समय में उटपटांग साधनाएं भी बहुत होती थी। यह जैसे स्वामी जी ने देखा था कि एक साधक एक हाथ ऊपर रखकर के पूरा जीवन रहता है। तो उसका हाथ आप पूरा एक हाथ ऊपर रखेंगे तो उसका पूरा हाथ तो गल जाएगा ना। उसमें से हड्डियां हड्डियां दिखेगी। सिर्फ जो अपना मसल है वह तो पूरा एट्रोफाई हो जाएगा। आप इंटरनेट पर सर्च करेंगे तो ऐसे पिक्चर मिल भी जाएंगे। मैंने देखे थे स्वामी जी का पढ़ने के बाद में मैंने ऐसे जो तपस्या वाले जो साधु हैं वो खास करके आज से 100 साल पहले 200 साल पहले ये ब्रिटिश लोगों ने जो पिक्चर लिए थे ये ब्लैक एंड वाइट कि वो जो खिल्ली जो होती है ना जो ये होता है नेल उसके नेल का एक बेड है। खिल्ले का एक बेड है। उसके ऊपर में यह एक साधु लेटा हुआ है। अर्थात कि वह प्रूव करना चाहता है। अभी यह आप आप कोई भी एक नेल उसका तो म दीवाल में मारने के लिए तो होता है। वह तो बड़ा ही धारदार होता है। अपनी स्किन के साथ में एक बार उसमें चुभो दीजिए तो कितना खून बहेगा। तो ये लोगों का कहना है कि हम लोग ये ये जो पेन है जो सफरिंग है हम इसको वेलकम करते हैं। बोलकर के यह जो खिलों का यह जो बेड है उसके ऊपर में लेट जाएंगे। फिर यह अपने पियरसिंग जिसको कहते हैं अपना जो कान है फिर इवन गाल है उसमें यह कोई धातु का कुछ यह जो कड़ा है वगैरह डाल देंगे ऐसा कितना ही यह जो फिजिकल मोरबिडिटी जिसको कहते हैं फिजिकल यह सब मॉडिफिकेशंस ये टैटू है टैटू भी यदि आप अप्लाई करेंगे तो बड़ा कष्ट होगा तो क्या है कि एक पूरा एक मोरबिड टाइप का एक क्यूरियोसिटी मोरबिड रिलीजन एक होता है जहां पे कि हम सामने चलकर करके दुख को निमंत्रण देते हैं। दुख को जैसे कि हम वेलकम करते हैं। किंतु यह एक्चुअल आध्यात्मिकता वह कोई संसार के सुख से दूर चले जाते हैं। इसका अर्थ यह नहीं है कि हम दुख को वरण करते हैं। देखिए यह जो सामयिक थोड़ा सा मोमेंटरीली दुख जो हमको मिलता है वह सिर्फ वैराग्य के उद्दीपन के लिए है। नहीं कि यह दुख ही जीवन का लक्ष्य है। जैसे कि भयंकरा काली की आप उपासना करेंगे। शशान काली की उपासना करेंगे। वहां पर रुधिर की धारा बह रही है। गले में नर मुंड है। हाथ में खुला अस है यानी खड़ग है। जैसे कि इस तरह की काली की उपासना स्मशान काली भयंकरा काली। तो यह सब मोमेंटरीली हमको वैराग्य का उद्दीपन हो। इसके लिए यह जो गुरु भाई जो थे सब वे लोग क्यों श्मशान में जाकर साधना करते थे? तंत्र साधना में क्यों श्मशान का इतना महत्व है? शब साधना वगैरह क्यों है? यह सब कुछ है वैराग्य को आपको उद्दीपन देने के लिए वैराग्य को सिमुलेट करने के लिए। एक बार वैराग्य भीतर में प्रवेश होगा तो फिर यह सांसारिक सुख जो है विषय आनंद है उससे अपना मन उठकर के भगवत आनंद में अपना मन लग जाएगा। साधन के आनंद में मन लग जाएगा। ब्रह्मंद में मन लग जाएगा और फिर वह जो आनंद प्रवाहित होगा अपने हृदय में वह इस तरह का स्वच्छ शुभ्र निर्मल आनंद होगा कि जिसमें ना ही कोई इंटरप्शन होगा या तो ना ही यह भरती ओठ होगी जिस तरह से समुंदर में भरती ओठ होती है चंद्र यदि खिलता है पूर्ण कला से तो समुंदर में भरती आती है क्योंकि चंद्र का ग्रेविटी पानी को खींचता है और जब चंद्र का ह्रास होता है तो यह भर यह जो समुंदर में ओठ आ जाती है अर्थात कि पानी पीछे चला जाता है तो यह चंद्र में भी यह जो कलाएं हैं चांद पूर्ण कला से खिलता है चांद का ह्रास होता है फिर इवन चंद्र ग्रहण भी होता है सूर्य ग्रहण भी होता है जैसे वैसे चंद्र ग्रहण होता है तो यह इसमें जिस तरह से कलाएं म कलाएं प्रस्फुटित होती है और कलाएं फिर जैसे कि संकुचित हो जाती है। तो इसी तरह से भीतर का जो आनंद है उसमें ऐसा कुछ नहीं होने वाला है। वही एक धारा वो बहता रहेगा। तदैव अर्थ मात्र निर्भासम स्वरूप शून्य मीव समाधि। यह जो समाधि की जो डेफिनेशन है जिस चीज के ऊपर में हम अपने मन को एकाग्र किया है वही ऑब्जेक्ट ही रहेगा। फिर मेरा जो छोटा सा अहंकार है वह अदृश्य हो जाएगा। ईश्वर अभी तक जो ऑब्जेक्ट थे या तो फिर अपना आत्मन जो ऑब्जेक्ट था वह अपना सही सब्जेक्ट हो जाएगा। तो यह आध्यात्मिक जर्नी है। महापुरुष महाराज है, स्वामी जी है। यह लोग सब ठाकुर की बातों को सुनते थे। तो सिर्फ सुनकर के आनंद नहीं प्राप्त करते थे। उसके ऊपर में एक्चुअली प्रैक्टिकल करके दिखाते थे। तो इसलिए देखिए कि इतनी सुंदर कहानियां ठाकुर हमको कहते हैं। इसके बाद में आज एक तीसरी कहानी पढ़ते हैं। वही सरल विश्वास की कहानी सरल विश्वास से ईश्वर दर्शन होते हैं। क्या कहते हैं ठाकुर? एक्ट ब्राह्मण बाड़ी ते ठाकुर सेवा छिलो। एक ब्राह्मण के घर में भगवान की सेवा थी। अर्थात कि भगवान की नित्य पूजा होती थी। एक दिन कोनो काज उपलक्ष तार अन्नस्थाने जेते होए छिलो एक दिन उस ब्राह्मण को किसी काम की वजह से कहीं पे बाहर जाना हुआ था छोट छले के बोले गो तू ही आज ठाकुर भोग दी ठाकुर के खावा भी अपना वह छोटा बच्चा है उसको वह कह के गया कि आज तुम भगवान को भोग देना भगवान को खिलाना छेलेटी ठाकुर के भोग दिलो बच्चे ने ठाकुर को भोग दिया। यह ठाकुर अर्थात कि भगवान ठाकुर किंतु चुप करे बोश आ ठाकुर किंतु चुप करके बैठे हैं। कथाओं को ना खा खानो ना बात भी नहीं कर रहे हैं खा भी नहीं रहे हैं। छलेटी अनेक खण बोसे बोसे देख ले जे ठाकुर उठ ना बच्चे ने बहुत देर तक बैठकर के किंतु आखिर में तो यही देखा कि ठाकुर अपने आसन से उठते ही नहीं है। उष्ट ही नहीं होते हैं। खाने के लिए आकर के बैठते नहीं है। शे ठीक जाने जे ठाकुर ऐसे आसने बोशे खाबेन। किंतु बच्चे को तो पता है कि यह ठाकुर प्रतिदिन आसन में आकर के बैठते हैं और खाते हैं। क्यों पता है उसको? क्योंकि पिताजी प्रतिदिन ठाकुर को भोग चढ़ाते हैं और जब यह ठाकुर अपना आहार समाप्त कर देते हैं तो यही भोग फिर प्रसाद बन जाता है और फिर यही बच्चे की मां अपने बच्चे को बड़े प्रेम से वही प्रसाद खिलाती है तो यह बच्चा प्रतिदिन ठाकुर का प्रसाद खाता है। उसको तो पता है कि प्रसाद कैसे होता है। भोग में से या तो नैवेद्य में से प्रसाद कन्वर्ट कैसे होता है। ठाकुर जब अग्र भाग उसका ग्रहण करेंगे तभी तो वह प्रसाद होगा। तो अपने पूरा जीवन यह बच्चा प्रसाद खाता आ रहा है। तो आज ठाकुर आकर के क्यों नहीं खाना खाएंगे? क्यों नहीं उसका धराया हुआ भोग ग्रहण करेंगे? क्या उसने कोई पाप किया है? क्या बच्चे से ठाकुर नाराज है? क्या बच्चे को विधि नहीं आती है भोग चढ़ाने की? किंतु यह ब्राह्मण जो पिता थे उसने तो अपने बच्चे को सब सिखा के गए हैं कि इस इस तरह से ठाकुर को भोग या तो फिर नैवेद्य ऑफर किया जाता है। तो विधि का भी वह पूरा पालन कर रहा है। उसके हृदय में भक्ति भी है, सरलता भी है, प्रतिदिन वह देखता है कि पिताजी जब ऑफर करते हैं तो ठाकुर आकर के वो ग्रहण करते हैं तो आज क्यों नहीं करेंगे। बोलकर के उसके हृदय में बड़ा ही दुख हुआ। छलेटी कान आरंभ कर ले बच्चे ने रोना शुरू कर दिया। बोलते ला लो ठाकुर बाबा तो मा के खावाते बोले गए छ तुम केनो आशबे ना केनो अमर का खावेबे ना कहने लगा ठाकुर पिताजी तो कह के गए हैं कि आपको खिलाना है तो आप आकर के आप क्यों आते नहीं है क्यों आप मेरे पास में बैठकर के खाते नहीं है केनो अमार काछे आवेना आप मेरे पास में बैठकर के क्यों नहीं खाते हैं व्याकुल होए जाई कौन कहदे छे ठाकुर हंसते हंसते ऐसे आशो ने बोशे खेते लाले जैसे ही उसने व्याकुल होकर के थोड़ी देर तक क्रंदन किया रोदन किया वैसे ही ठाकुर आकर के सामने बैठकर के हंसते-हंसते आकर के आसन पे बैठकर के खाना खाने लगे ठाकुर के खाइए जोख ठाकुर घर थेके से गैलो बा लोकेरा बोलले भोग होए गए छे शेष नाम आो अब ठाकुर को खिला करके जब यह बच्चा ठाकुर घर में से बाहर निकला तो फिर घर में बाकी लोगों ने कहा मां ने ही कहा होगा कि भोग लग गया है तो भोग लेकर के चले आओ छलेटी बोले हां होए गए छे ठाकुर सब खेग हो गया है ठाकुर ने सब खा लिया है तारा बोलले शेकी रे छलेटी शरल बुद्धि ते बोल लो केनो ठाकुर तो खे गए छ तो मां ने पूछा कि क्या बात कर रहे हो रहे सब खा लिया ठाकुर ने ऐसा कैसे हो सकता है तो बच्चा कहता है हां मां सब कुछ ठाकुर खा के गए हैं कुछ भी बचाए नहीं है तब ठाकुर घर गए देखे शोकोले अबाक जब उसकी मां ने ठाकुर घर में जाकर देखा तो अवाक होकर के रह गई कि सही सही में ठाकुर ने आकर के पूरा नैवेद्य भोग ग्रहण कर लिया है। देखिए यह कितना सुंदर कहानी और पढ़कर के कितना आनंद आता है कि थोड़ी कुछ समय तक थोड़ी देर तक बच्चा रोया उसी में ठाकुर आ गए आकर के सब खा लिए बच्चा शायद कहता भी होगा बीच-बीच में हम यह सब इमेजिन कर सकते हैं कि बच्चा कहता भी होगा थोड़ा सा प्रसाद रख लीजिए किंतु अभी ठाकुर इस मूड में है कि बच्चा सब ऑफर कर ही रहा है तो अभी मुझे भूख भी बहुत लगी है। चलो मैं बैठकर के सब खा लेता हूं। बोलकर के ठाकुर ने सब खा भी लिया। प्रसाद भी नहीं बचाया उस दिन बच्चे के लिए। तो फिर बच्चा बाहर आकर के मां को जब कहेगा कि ठाकुर तो सब खा गए। हमारे लिए कुछ बचा करके नहीं रखा। तो मां बोलती होगी कि क्या बेटा तुम कैसी बात कर रहे हो? ऐसा तो कभी होता नहीं है। फिर भीतर में जाकर देखा ठाकुर घर में तो सही सही में ठाकुर ने सब कुछ ग्रहण कर लिया था। तो इतना सुंदर कहानी। अभी देखिए प्रश्न अवश्य हमारे मन में हो सकता है कि क्या हम इस तरह से रोएंगे और सरल विश्वास से पुकारेंगे तो क्या हमको ठाकुर का दर्शन होगा कि नहीं। मुझे ऐसा नहीं लगता कि होगा। प्रॉब्लम कहां पर हमारा आता है? देखिए पहले से ही हमको पता है कि नहीं होने वाला है। क्योंकि यह जो संसार बुद्धि जो है ना इतनी दृढ़ रूप से हमारे मन के भीतर में यह घर कर गई है कि यह सब सरल विश्वास की कहानियां पढ़कर के भी हमको आनंद तो आता है। वैसे चलो कि इतनी सुंदर कहानी है। किंतु हम कभी भी इस कहानी की जो कहानी में जो कहा गया है इस तरह का आचरण हम कभी नहीं करेंगे। मेरे कमरे में एक ठाकुर का फोटो लगा के ठाकुर के सामने भोग नैवेद्य अर्पण करूंगा और रोते-रोते कहूंगा ठाकुर आकर खा लो तो ठाकुर नहीं आने वाले हैं। क्यों? क्योंकि मुझे पता है और यही सबसे बड़ा प्रॉब्लम है कि मुझे पता है कि ठाकुर नहीं आने वाले हैं। बोलकर के ठाकुर सही में नहीं आएंगे। ऐसा नहीं है कि और कोई यहां पर प्रॉब्लम है। मेरे संस्कारों का प्रॉब्लम है कि यह कलयुग में भगवान के जो शक्ति है वह कम हो गई है। या तो फिर मैंने ऐसी कोई गलती कर दी है कि भगवान मेरे से नाराज हो गए हैं। ऐसा कुछ नहीं है। यह जो मेरी दृढ़ मान्यता है कि ऐसा तो हो ही नहीं सकता है। ऐसा तो होगा ही नहीं। तो फिर यह दृढ़ मान्यता ही मेरे सामने सबसे बड़ा अंतराय होकर के रह रही है। यह जैसे ही हम बचपन से बड़े होते हैं, हम लोगों को पता है कि क्या संभव है और क्या असंभव है। कई बार हम लोग देखते हैं कि इस तरह के मूर्ख लोग होते हैं जो कि सरल विश्वास में आकर के बहुत सारी बातें मान लेते हैं। हम लोग इन लोगों को भोले कहते हैं। भोला आदमी है और फिर बहुत ज्यादा भोलपन बढ़ जाएगा तो हम कहेंगे यह मूर्ख आदमी है। कोई भी इसको मूर्ख बना सकता है। कोई भी इसके पास में से रुपया उठा सकता है। कोई भी इसको मूर्ख बना करके इसको लूट सकता है। इस तरह की मान्यता हमारे मन में बैठ जाती है कि हमको इस तरह से मूर्ख नहीं होना। हमको मैच्योर होना है। यह जगत में हम बहुत बार कह बड़ा मैच्योर आदमी है। मैच्योर आदमी का अर्थ क्या है? मैंने ऐसे बहुत सारे मैच्योर लोगों को देखा है। उसका अर्थ है कि बड़ा सोच समझ कर के बातें करेंगे। जब आपके साथ में बात करेंगे तो आपको क्या अच्छा लगता है सुनने में वही आपको सुनाएंगे। और जो सीक्रेट बहुत सारे दूसरे लोगों के होते हैं ऐसे लोगों के पास में मैच्योर लोगों के पास में वह सब सीक्रेट को माने बड़ा ही अच्छे से प्रोटेक्ट करके रखेंगे। बहुत सारे लोग कहेंगे कि वह बड़ा मैच्योर है। उसके पास जाकर के कोई सीक्रेट बताओगे तो 10 लोगों को बताता नहीं घूमेगा। क्यों? क्योंकि उसमें वह उपस्थित बुद्धि है। कॉमन सेंस है। यह मैच्योरिटी होना, यह कॉमन सेंस होना, सीक्रेट को मेंटेन करने की कैपेसिटी होना, किस तरह के आदमी के साथ में किस तरह का बात किया जाए। वो एक प्रैक्टिकल सेंस होना। यह सब चीजें वैसे हमको लगती बहुत अच्छी है। किंतु यही सब

ठाकुर की कहानी: आध्यात्मिक आनंद का फव्वारा

चीजें देखिए कि साधन मार्ग में हमारे सामने अंतराय होकर के बैठती है। इस तरह से मैच्योर लोग जो होते हैं जो कि अपने को प्रैक्टिकल समझते हैं। अपने पास में कॉमन सेंस से ऐसा समझते हैं। उनको यह बात एकदम दृढ़ रूप से विश्वास हो गई है कि इस जन्म में कुछ होने वाला नहीं है। आध्यात्मिक यात्रा है। जन्म जन्मांतर की यात्रा है तो इस जन्म में जो थोड़ा सा मिनिमम होगा वह करके हम बैठ जाए बोलकर के इन लोगों का पूरा माइंडसेट रहता है और ऐसे लोगों को देखकर के हम लोग प्रभावित भी बड़े हो जाते हैं। मेरे एक दो रिलेटिव्स थे पूर्वाश्रम में यहां पर आने के बाद में भी मैंने किसी किसी को देखा। काफी उन लोगों में कॉमन सेंस है। बात करने की बड़ी धीर धीरता से बड़ी समझदारी पूर्वक बात करने की उन लोगों में कैपेसिटी है। इन लोगों को आप एबनॉर्मल बिहेवियर करता हुआ कभी नहीं देखेंगे। इन लोगों को आप जो कि एक स्टैंडर्ड वे में बात करने की जो मेथड है उससे डिविएट होकर के और किसी तरह से बात करते हुए कभी नहीं देखेंगे। इन लोगों को जिसके पास में जिस तरह से बात करना चाहिए उचित है उसी तरह से बात करते हुए देखेंगे। इसमें कभी भी कोई गलती होगा नहीं। तो हम लोग भी सोचते हैं कि भगवान मुझे इस तरह से मैच्योरिटी दे तो बहुत अच्छा होगा। देखिए और यहां पर अपने ऑर्डर में खास करके यह जो रामकृष्ण संघ है वहां पर इस तरह की यह जो प्रैक्टिकल सेंस है उपस्थित बुद्धि जिसको कहते हैं एक मैच्योरिटी है उसकी वैल्यू भी बहुत है। क्योंकि इतना सारा काम करना है। इतनी सारी एक्टिविटी है। इतने डिफरेंट टाइप के लोगों के साथ में हमको डीएल करना है कि किसके साथ में किस तरह से बात की जाए। यह यदि समझ में ना आए तो फिर हमारा काम चलेगा नहीं। तो किंतु देखिए कि इस तरह से थिंकिंग से प्रॉब्लम क्या होता है कि इस तरह के मैच्योर लोग जो होते हैं, प्रैक्टिकल लोग जो होते हैं जिसमें कॉमन सेंस है वे लोग ठीक करके बैठे हैं। इस जन्म में कुछ होने वाला नहीं है। जो थोड़ा बहुत होगा वह कर लेंगे। बाकी का रखेंगे अगले जन्म में। तो जैसे ही यह उन्होंने सोचा वैसे ही एक दृढ़ ग्रंथि उनके मन में बैठ गई। देखिए यदि सही-सही ईश्वर को प्राप्त करना है तो इंप्रैक्टिकल होना होगा। अपने भीतर में बचपना होना चाहिए। अपने भीतर में सरलता होनी चाहिए। यह प्रैक्टिकल सेंस वगैरह जो है उसको थोड़ी देर के लिए आपको साइड पर रख देनी पड़ेगी। बिल्कुल सहज सरल बालक की तरह आपको रहना पड़ेगा। यह जो ठाकुर का एक मित्र था तो दक्षिणेश्वर में ठाकुर को मिलने के लिए आया था एक बार कामार पुकुर से तो बहुत सालों के बाद में दोनों में बात हो रही है वार्तालाप हो रहा है तो यह मित्र जैसा ही ठाकुर का दर्शन करता है वैसे ही वह आश्चर्यचकित होकर बोलता है अरे मैंने तुमको बचपन में कामार पुकुर में जैसा देखा था वैसे ही तुम अभी भी हो अर्थात कि वो कामार पुकुर में जो बच्चे थे बच्चों का जो बचपना था सहज बचपना पना वह भी ठाकुर में अभी भी है। जबकि यह आज था जो ठाकुर का मित्र ठाकुर कहते हैं कि मेरा बहुत अच्छा मित्र था। मैं उसके साथ में बहुत वार्तालाप करता था। और फिर किंतु हुआ ऐसा कि जैसे उस समय दक्षिणेश्वर में मिलने को आया। देखा कि वह संसार में पड़ गया है। उसकी बीवी है। बीवी का एक लड़का हुआ उसका। फिर वह मर गया। अभी बीवी जो है उसकी वह शोक से ग्रस्त हो गई है। तो वह अभी उसका शौक है इसके सर पर बैठ गया है। अभी दुनियादारी जैसे ही सर के ऊपर में आकर के बैठ गई सब बचपना है। सरलता है। सब कहां पे अदृश्य हो गया। ठाकुर खुद देखिए कि यह सीक्रेट्स वगैरह मेंटेन नहीं कर पाते थे। ये जैसे ही वो ये थे अपने मथुर बाबू की पत्नी तो उनका एक बागान था तो वहां पर बागान में दूसरी एक जो तीन बहनें थी तो रानी रासमणि की तीन लड़कियां थी तो उसमें से एक लड़की का एक गार्डन था तो गार्डन में से सब्जी जिसको लेनी है तो वह तो वह ठीक करेगी ना जिसकी मालिकी का यह गार्डन है तो दूसरी एक बहन ने आकर के तीन में से दूसरी बहन ने आकर के गार्डन में से वह सब्जी ले ली ना कि ऐसा कुछ किया। तो ठाकुर ने सीधा जाकर के वह जो पहली वाली बहन थी जिसका यह गार्डन जिसकी मालिकी का था ठाकुर ने जाकर उसको बता दिया कि देखो वो आकर के तुम्हारी बहन ने तुम्हारे गार्डन में से सब्जियां वगैरह ले गई है। तो दूसरी बहन हंसने लगी। उनको पता था कि यह छोटे भट्टाचार्य महाशय ठाकुर को वो ऐसा कहते थे कि उनका सरल बचपना है इनके भीतर में तो यह सब देखेंगे कि यह असत्य जैसा कुछ कहीं पर भी हो रहा है तो सीधे आकर के बोलेंगे तो उनकी बहन वो जो दूसरी बहन थी वह भी हंसने लगी मथुर बाबू की पत्नी उनको मथुर बाबू पर संदेह रहता है कि वह दिन में कहां पर जाते हैं। कहीं इस तरह की महिलाओं का संग तो नहीं करते जिनका चरित्र अच्छा नहीं है। तो फिर उन्होंने मथुर बाबू को कहा कि आप जहां पर भी जाएंगे छोटे भट्टाचार्य महाशय को साथ में लेकर जाइए। अभी वह मथुर बाबू अकेले-अकेले कहीं भी जाएंगे। इस तरह की महिलाओं का संग करेंगे तो इसका न्यूज़ तो उसकी बीवी के पास में आने वाला नहीं। किंतु ठाकुर यदि जाते हैं और ठाकुर तो सत्य वचन उसका पालन करते हैं तो वह आकर के उनकी पत्नी को ठीक-ठीक बता देंगे कि मथुर आपका हस्बैंड मथुर बाबू कहां-कहां गया है। अभी देखिए ठाकुर में यदि थोड़ी सी भी कॉमन सेंस है तो उनको यह समझना चाहिए कि दक्षिणेश्वर का जो मालिक मालिक तो थी वैसे रासमणि फिर उसको तो देवोत्तर कर दिया था किंतु फॉर ऑल प्रैक्टिकल इंटेंट एंड पर्पस मथुर बाबू वहां के वो मालिक है मथुर बाबू के अंडर में ही पूरा काम चलता है तो यदि उनको सुख पूर्वक रहना है तो मथुर बाबू जिस तरह का झूठ बुलवाएंगे इस तरह का झूठ बोलेंगे यदि ऐसी किसी स्त्री के पास में भी जाते हैं और मथुर बाबू कहेंगे कि अच्छा भट्टाचार्य महाशय आप जाकर के मेरी पत्नी को झूठ बोलिएगा तो और कोई होता तो आराम से झूठ बोल देता। क्यों? क्योंकि उसको तो अपने रोजगार की फिक्र है। मथुर बाबू को खुश रखेंगे तो बीच-बीच में वह बखशीश दे देंगे। यह वो कर देंगे, प्रमोशन दे देंगे वगैरह-वगैरह। तो किंतु ठाकुर देखिए कि वह एकदम सत्य वचन किस तरह का है। मथुर बाबू एक जगह पर गए। ठाकुर को कहा कि आप यहां पर नीचे में बैठिए। ग्राउंड फ्लोर पे मैं आता हूं। ऐसा बोलकर के फर्स्ट फ्लोर पर गए। आधा घंटा ठाकुर को बिठा के रखा और फिर आकर के फिर आधे घंटे के बाद में फर्स्ट फ्लोर से आकर के कहते हैं ठाकुर को चलिए चलिए मां अब जाते हैं देरी हो गया बोल के वे लोग घर चले आए जब उसकी पत्नी ने पूछा कि कहां गए थे वो मथुर बाबू तो ठाकुर ने ठीक ठीक कह दिया कि एक जगह पर मुझे ले गए थे मुझे ग्राउंड फ्लोर पर बिठाया आधा घंटा खुद ऊपर में गए और फिर आकर के मुझे ले आए ऊपर में जाकर क्या किया वह तो आप जानो और वह जानो वो मुझे नहीं पता है ऐसा बोल कर के ठाकुर ने हृदय की जो बात थी सीधे सहज रूप से अपने मुंह पर कह दी थी। रानी रासमणि को चांटा मार दिया था और कौन एंप्लई होगा इस तरह की मूर्खामी करेगा अपने एंप्लयर के चेहरे पर चांटा मारेगा। किंतु ठाकुर का ऐसा था कि भीतर में से जो भाव प्रकट होता है इसको वह कभी भी छुपा करके नहीं रखते थे। यह मुंह में एक और हृदय में दूसरा मुख में राम बगल में छुरी। इस तरह की बात ठाकुर के हृदय में ठाकुर के वर्तन में कभी आप देखने को नहीं मिलेंगे। सहज सरल बच्चे की सरलता उनके भीतर में है। ठाकुर की मां ठाकुर खुद कहते हैं अमरार मां के शव हावड़ो बोल तो अर्थात मेरी मां को सब मूर्ख कहता कहते हैं या तो फिर इस तरह से कि अपने मुंह पर इस तरह का कोई कंट्रोल नहीं है। जो सीक्रेट होते हैं घर के वो सबके सामने जाकर के बोल देती है। घर का सीक्रेट घर में ही रहना चाहिए। ऐसा कुछ नहीं है। सरल हृदय सरल प्राण वो महिला थी। तो यह सरलता जो है ठाकुर ने इन बारे में कहा था। देखो यह कितना सरल है। है ना? तो ये सरल है बोलकर के ठाकुर के मुंह पर ऐसी खुशी छलकने लगी कि मास्टर महाशय लिखते हैं सरल बोलते बोलते उनका मन जो है जैसे कि भाव राज्य में चला गया। तो यह हृदय की सरलता जो है वो चाहिए आध्यात्मिक जीवन में सर्वप्रथम। हम लोग जैसे ही मैच्योरिटी की ओर, यह वर्ल्डली विडम की ओर, यह प्रैक्टिकल सेंस की ओर जितना आगे बढ़ते हैं, उतना ही यह सरलता हमारे भीतर में से चली जाएगी। और इतनी ही कपटता आकर के सीक्रेटली मैं मुझे लगता है मैं ऑनेस्ट हूं। मुझे लगता है मैं प्रैक्टिकल हूं। ऑनेस्ट और प्रैक्टिकल नहीं हो के मेरे भीतर में कपटता ही हजार पड़ी है। तो वह हमको एनालाइज करके ऑटोप्सी करना पड़ेगा अपनी कॉन्शियसनेस का, अपने ब्रेन का, अपनी थॉट पैटर्न का समझना पड़ेगा कि मैं कहीं पे यह प्रैक्टिकल की प्रैक्टिकल होने के नाम पे कपटी तो नहीं बन गया हूं क्या? यह बात हमको समझना होगा। तो यह बात जैसे ही हम करते हैं साथ-साथ में हमको यह भी पता है कि ठाकुर सरल थे तो प्रैक्टिकल भी इतने थे। किंतु देखिए कि इसको कहते हैं वनरेबिलिटी। हमको जीवन में एक बार व्नरेबल होना होगा। देखिए कोई भी वनरेबल होना पसंद नहीं करता है। कोई भी अपने को कमजोर महसूस करना पसंद नहीं करता है। हम सबको शक्तिशाली होना है। हम सबको ढाल तलवार लेकर के खड़े रहना है। जगत में जो कोई भी है जो कुछ भी होता है ढाल तलवार से उसका सामना करेंगे। हम लोग चाहते हैं कि सब समय अपना शील्ड जो है वह उठा के रहे क्योंकि जगत में हमको बहुत सारे आघात होने वाले हैं। मैं यदि अपना हृदय खोल दूंगा। सबके सामने जो कुछ भी मेरे हृदय में है, मन में है, बोलना शुरू कर दूंगा। तो हो सकता है कि दूसरे लोग मेरे साथ में या तो दुर्व्यवहार करें या तो फिर मेरा बेनिफिट उठाने का प्रयास करें। यह भय हम सबको लगता है। इसलिए छोटी उम्र में बच्चा जो सरल होता है। जैसे ठाकुर उदाहरण देते हैं छोटे बच्चे का कि वो उसकी मां ने नया कप वस्त्र उसको पहनाया है। अभी उसका कोई रिलेटिव बड़ा भाई जाकर बोलेगा यह कप मुझे दे दो धोती तुम्हारा तो यह बच्चा नहीं देगा। किंतु कोई भिखारी आगे मांगेगा। कोई बाहर वाला अनजान आदमी मांगेगा तो उसको दे देगा। क्यों? क्योंकि उसको यह सेंस नहीं है कि यह मेरा है। मैं मेरे परिवार जनों को देना चाहिए। इसको मेरी चीज नहीं कि बाहर वाले को। इस तरह का उसको सेंस नहीं है। हां, उसको यह पता है कि वो किसको प्रेम ज्यादा करता है अपने परिवार जनों पे। किंतु यह चीज मेरी है बोलकर के उसको सेंस नहीं। छोटा बच्चा उसकी नजर के सामने यदि चोरी होती है। उसको यह समझ में नहीं आता कि यह चीज मेरी है। हां, उसका खिलौना छीन लोगे तो बच्चा रोएगा। किंतु वैसे ही घर की कोई और चीज है उसको दूसरा कोई आदमी आकर के उठा के चला जाएगा। उसको यह सेंस नहीं रहेगा कि यह चीज मेरी है और यह आदमी बाहर वाला है। मेरा नहीं है और उठा के जा रहा है तो मुझे चिल्लाना चाहिए। क्यों? क्योंकि उसके लिए यह मेरापन यह पजेसिवनेस वो उसके भीतर में नहीं। खिलौना नेचुरली है कि बच्चे का खुद का खिलौना है। उसके ऊपर में वह पज़ेसिवनेस रहेगा। किंतु वह भी यदि आप कोई अनजान आदमी मांगेगा तो बच्चे के मन में कब क्या आ जाए ठीक नहीं वो जो प्यारा खिलौना वो अपने भाई को भी नहीं देता अपनी मां को भी नहीं देगा पिताजी को भी नहीं देगा बिल्कुल किसी अनजाने को वह दे देगा तो यह बच्चे की जो सरलता है देखिए कि कुछ ही समय में यह बच्चा समझ जाता है या तो उसके जो छोटे-छोटे भाई-बहन होते हैं वह उसके ऊपर में उसका बेनिफिट उठाते हैं उसकी सरलता का या तो फिर इस तरह तरह की रूढ़ बातें करते हैं। कठोर बातें करते हैं कि जिसको सुनकर के बच्चे को कष्ट होता है। इस तरह का आचरण करते हैं कि जिससे कि बच्चा कष्ट प्राप्त करता है। बोल के कुछ ही समय में वह सीख जाता है कि इस तरह की सरल व्नरेबिलिटी जो है वह अपने जीवन के लिए अच्छी नहीं है। मुझे स्ट्रांग होना है। तो यह स्ट्रांग होने के लिए धीरे-धीरे करके अपनी जो सही फीलिंग्स जो होती है, अपने सही विचार जो होते हैं, अपना जो एक सरल आचरण जो होता है, उसको वह छुपाने का प्रयास करेगा और फिर बाहर में क्या चीज चाहिए, उसके अनुसार अपने को मोल्ड करने का शुरू करेगा। यह मेरी बहन है, थोड़ी सी गुस्से वाली है तो उसके साथ में उस तरह से बात की जाए। यह मेरा बड़ा भाई है। थोड़ा सा भोला है। मुझे बहुत प्रेम करता है। तो उसके पास में जाकर के डिमांड की जाए। मां है। मां के सामने जिद करने से मां जो चाहती है दे देती है। तो मां के पास में जाकर जििद करनी है। पिताजी है जाकर जिद करेंगे तो धमक देंगे। मार भी देंगे शायद। तो पिताजी के पास में यह जििद नहीं करनी है। यह प्रैक्टिकल सेंस जैसे-जैसे बच्चे में आती जाती है, जैसे-जैसे यह अपना शील्ड जो है, वह डेवलप करता जाता है, ढाल तलवार उठाना शुरू करता है, वैसे ही भीतर में यह दुनियादारी और कपट प्रवेश करता है। लोगों को मैनपुलेट करना सीखता है कि मां को इस तरह से मां के साथ में डीएल करना है। पिताजी के साथ में इस तरह से डीएल करना है। छोटी बहन के साथ में इस तरह से बड़े भाई के साथ में इस तरह से फिर जब यह स्कूल में जाना शुरू करेगा तो स्कूल में अपने जो मित्र हैं जो ये बाकी सब बच्चे हैं जो उसके क्लासमेट्स जो है उनके साथ में इस तरह से डीएल करना है। टीचर का साइकोलॉजी समझने का प्रयास करेगा। बुद्धि थोड़ी सी ज्यादा है तो टीचर्स को मैनपुलेट करने का प्रयास करेगा कि किस टीचर की क्या साइकोलॉजी है उसके अनुसार वह बात करेगा जिससे कि वह टीचर का प्रिय हो सके तो यह सब दुनियादारी बहुत बचपन से ही उसको सीखना पड़ता है यदि उसको सर्वाइव करना है किंतु यदि एक दिव्य हमारे भीतर में एक यह रहता है दिव्यता का एक अंश या तो फिर मान लीजिए हम बड़े फॉर्चूनेट हैं। ईश्वर की कृपा कहीं से हुई और इस तरह के एक सेफ एनवायरमेंट में हम जन्म लेते हैं कि जहां पे हम अपनी वनरेबिलिटीज को मेंटेन कर सके। लोग हमको इतना प्रेम करते हैं कि इंस्पाइट ऑफ आवर इडओसिंक्रेसिस वो हमको बचा करके चारों ओर से रखे। तो हम क्या है कि इसी व्नरेबिलिटीज को मेंटेन करेंगे पूरे लंबे टाइम तक। और फिर यही वलनेरेबिलिटी हमको सरलता और सहज विश्वास से ईश्वर की ओर ले जाएगी। कामार पुकुर में ठाकुर के बचपन के दिनों की कहानी देखिए। वो पाठशाला में ठाकुर जाते थे। गदाधर जाता था पाठशाला में। कुछ ही समय में समझ में आ गया कि यह जीवन मेरे लिए नहीं है। क्यों? क्योंकि यह जो पढ़ाई लिखाई है, पढ़ाई लिखाई सीखने के बाद में यह चाल कोला बांधा बिधा अर्थात कि अर्थोपाज अर्थोपार्जनकारी विद्या इस तरह की विद्या जो कि मुझे कैरियर बनाने में सहाय करे, पैसा कमाने में सहाय करे, परिवार चलाने में सहाय करें, समाज में प्रेस्टीज लेकर के आए। इस तरह की विद्या मुझे नहीं चाहिए। वह मुझे ईश्वर से विमुख कर देगी। अर्थात कि इस तरह की विद्या प्राप्त करने का आप जितना ही प्रयास करेंगे वह कपटता तो धीरे-धीरे करके एक प्रैक्टिकल सेंस या वर्ल्ड नीलनेस को अपने हृदय में प्रवेश करवाना ही होगा। सहज सरल विश्वास से इस तरह की विद्याएं प्राप्त नहीं होती है। ठाकुर फिर वह माणिक राजा के आम्रकानन में जाकर के वह पौराणिक नाटकों का अभिनय करते थे। अपनी मित्र मंडली के साथ में ठाकुर खुद कहते हैं कि कामरार पुकुर के किसी किसी को ऐसा लगने लगा कि यह बच्चा है किसी नाटक मंडली में जाकर के जुड़ गया है। तो कोई कहते थे म ठाकुर कहते हैं कि कामरार पुकुर में कोई कोई कहता था कि मैं कालीय दमन वो जो नाटक मंडली जो है यात्रा का दल है उसका मेंबर हूं। फिर जब देखिए इवन यात्रा के दल में भी देखिए कष्ट तो दुनिया भर का होता ही है। ठाकुर ने यह यात्रा के जो माने यह नाटक मंडली के जो सब होते हैं उनका स्टडी भी अच्छे से किया था। एक बार इसी तरह से एक नाटक मंडली का एक गायक ना कि ऐसा कोई दक्षिणेश्वर में आया। ठाकुर के पास में बैठकर के गाना गा रहा है। भजन गा रहा है। तो ठाकुर ने उसको कहा था देखो तुम यंग हो ना। तुम्हारा चेहरा बड़ा सुस्थ है, स्वस्थ है, गोलगोल है। तुम्हारे लोग तुम्हारे प्रोफेशन में जो लोग रहते हैं उन लोगों का थोड़ी सी उम्र बढ़ती है ना, चेहरा सूख जाता है। तो तुम्हारा अभी ऐसा नहीं हुआ है। तो यह चेहरा क्यों सूख जाएगा? क्योंकि यह सर के ऊपर में संसार आकर के जब सवार होगा, जिम्मा संसार की जवाबदारी आकर के संसार का जिम्मा आकर के जैसे ही सवार होगी साथ में ही स्ट्रेस प्रकट होगा। और जैसे ही स्ट्रेस प्रकट होगा वह चेहरा सूख जाएगा। बचपन में जैसा गोलगोल फ्रेश चेहरा दिखता है बड़ी उम्र में इस तरह का चेहरा नहीं दिखेगा। तो देखिए कि ठाकुर ने कॉन्शियसली यह सरल सहज जीवन पसंद किया था। अभी नेचुरली जो लोग कथामृत पढ़ेंगे वे लोग सभी लोग कहेंगे कि ठाकुर की जो एक मुख्य शिक्षा थी भक्त हो बोका होवी कैनो भक्त होना है मूर्ख थोड़ी ना होना है तो ठाकुर में प्रैक्टिकल सेंस नहीं थी ऐसा नहीं है बहुत प्रैक्टिकल सेंस थी किंतु देखिए कि वह जो प्रैक्टिकल सेंस थी वह इस तरह की नहीं थी कि जो कि सरलता को छुपा दे इस तरह की प्रैक्टिकल सेंस को उससे हमको दूर रहना है और इसके लिए यदि हम अपने को थोड़ा सा वलनेरेबल बना भी देते हैं तो डज नॉट मैटर। ठाकुर का कोई-कोई आचरण देखकर के हमको आश्चर्य होता है। हाजरा ने कुछ कह दिया तो ठाकुर नर्वस हो गए। स्वामी नरेंद्र ने कुछ कह दिया तो ठाकुर एंगियस हो गए। मां काली के पास में जाकर के रोने लगे। हम लोग को तो ऐसा कोई कुछ कहेगा तो हम लोग कहेंगे भागो यहां से। क्या पागल जैसी बातें कर रहा हो? मुझे मूर्ख समझ रखा है क्या कि तुम्हारी बातों में मैं आ जाऊंगा। ऐसा हम उसको मुंह पे कह देंगे। किंतु देखिए यहां पे मूर्ख कौन है? हम ही लोग मूर्ख हैं। क्योंकि यह जो संसार में अपना बचाव करने में तो हम लोग निपुण है, दक्ष हो गए हैं। एक्सपर्ट हो गए हैं। किंतु यह संसार के परे की ये जो ब्रह्म विद्या है, आत्म तत्व है, उसको प्राप्त करने में हम लोग नाकाम हुए हैं। तो यहां पर मूर्ख कौन निकला? तो हम ही लोग यहां पर मूर्ख निकले। यानी कि यह सहजता, सरलता आध्यात्मिक जीवन में डेवलप करनी होगी। ऑब्वियसली इस तरह की बातों से 1000 प्रश्न खड़े होंगे कि गृहस्थ आश्रम में रहकर के यह सब कैसे हो सकता है? वगैरह-वगैरह प्रश्न हजार खड़े हो सकते हैं। इसका सॉल्यूशन क्या है? तो धीरे-धीरे करके हम ही को यह एक बैलेंस करके निकालना है कि मेरा एंबिशन कितना स्ट्रांग है। ईश्वर प्राप्ति मुझे यहीं पर बैठकर के ठाकुर को भोग लगा रहा हूं।

ठाकुर कहते हैं मैंने आपके लिए भोजन तैयार कर दिया है, आपको बस इसे खाना है। ठाकुर का भाव आत्मसात करना सहज साधना है.

रोते-रोते मैं जैसे ही प्रार्थना करूंगा उसी समय आधा घंटा बीता होगा बच्चे को भोग लगाने में। आधे घंटे में ठाकुर ने आकर उसको दर्शन दे दिया। तो मेरी एंबिशन क्या है? आधे घंटे में ही ईश्वर का दर्शन प्राप्त कर लेना है कि 1000 साल तक तपस्या करनी है। कहां तक मेरी एंबिशन जाती है? तो एंबिशन को सामने रख के फिर हमको यह फिर यह कंप्रोमाइज करना है कि मुझे कितना अपने को वनरेबल बनाना है। मुझे कितना अपने को सरल सहज बनाना है। व्हाट इज माय यह बैलेंस शीट होती है ना प्रॉफिट लॉस ये जो लोग ये करते हैं ये सब एनालिसिस करते हैं। तो प्रॉफिट है मेरा ईश्वर दर्शन। तो सामने लॉस क्या है? तो संसार में बहुत सारी हजार तरह की समस्या आकर खड़ी होगी। तो यदि माने सहज सरल होकर के अपने को वनरेबल बना करके तो व्हाट इज माय प्रॉफिट लॉस एनालिसिस ईश्वर को प्राप्त करना है या तो फिर संसार में कष्ट प्राप्त करना है दो माने ईश्वर को प्राप्त करना है तो संसार में कष्ट मिलेगा ही मिलेगा और संसार में सुख पूर्वक रहना है 10 लोग ये जो ठाकुर कहते हैं ना किसी को कि बहुत तुमने सालीसी मोडेली कर ली अभी ये सब छोड़ो ये सालीसी मोडेली का अर्थ क्या है इस तरह के प्रैक्टिकल लोग जो होते हैं इस तरह के यह जो मैच्योर लोग होते हैं उनके पास में लोग अपना विवाद मिटाने के लिए जाते हैं। अभी दो भाई है। दो भाई में संपत्ति को लेकर झगड़ा हो गया। अभी कोर्ट में जाएंगे तो पता नहीं कोर्ट ये ब्रिटिश लोगों की कोर्ट क्या से क्या ना कर देगी। फिर दूसरा उपाय है दोनों लोग म लाठी उठा के ममारी करना शुरू करें। वह भी तो अच्छा नहीं है। तो इस तरह से जो मैच्योर लोग होते हैं, वर्ल्डली वाइज लोग होते हैं, इसके पास में यह लोग जाएंगे, कहेंगे दोनों भाई कि हमारी संपत्ति है इस तरह से उसको डिवीजन करना है तो आप उसका डिवीजन हमको करवा दीजिए। तो, यह जो मैच्योर आदमी होगा, वह थोड़ा बहुत विचार करके ठीक-ठीक और लोगों को उसके ऊपर में श्रद्धा है कि बड़ा प्रैक्टिकल है, बड़ा मैच्योर है, बड़ा वाइज है। वह उधर-उधर की बातें नहीं करेगा। तो, यह आदमी फिर यह झगड़ा मिटा देगा। कहेगा इतनी संपत्ति तुम्हारी उतनी संपत्ति तुम्हारी ले लो फिर दोनों भाई खुश होकर जाएंगे फिर इस आदमी का नाम फैल जाएगा इसको कहते हैं सालीसी या मोडेली अर्थात कि आप लोगों के बीच में काम करते हैं लोगों का झगड़ा मिटाने का तो ठाकुर उसको कहते हैं कि बहुत तुमने सालीसी मोडेली कर ली अभी यह सब छोड़ो ईश्वर की ओर मन को लगाओ इंटरेस्टिंगली शरद महाराज को मां बुलाती है जयराम बाटी में इसी तरह से करने के लिए मां के भाइयों के बीच में संपत्ति को लेकर झगड़ा चल रहा था मां ने शरद महाराज को पत्र लिखा। शरद महाराज एकदम मैच्योर गणेश की तरह प्रैक्टिकल। तो उन्होंने कहा ठीक है मैं आता हूं। तो आए जय राम भाटी। फिर भाइयों के बीच में वो जो संपत्ति को ले जो कुछ भी था तो उन्होंने सब मिटा दिया। अभी देखिए शरद महाराज का पर्सनालिटी ऐसा था, विडम ऐसा था कि वैसे तो मां के भाई दुनिया भर की झगड़ा करते थे। आपस में मां के साथ में झगड़ा करने से नहीं भूलते थे। किंतु शरद महाराज जो कुछ कहते हैं सब कुछ सुन लेते हैं। तो यहां पर देखिए कि शरद महाराज को खुद यह सब करना पड़ा था। शरद महाराज उद्बोधन में बैठते थे। पूरा मठ मिशन का जो भार है उनके कंधे के ऊपर में है। किंतु शांत स्थिर होकर के गणेश की तरह पूरा ऑर्डर चलाया है। तो वह भी एक है। देखिए कैसा यह कंट्राडिक्शन यहां पर खड़ा होता है। यदि आप शरद महाराज की तरह मैच्योर होना चाहते हैं तो फिर आप कहेंगे कि ठाकुर की तरह सरलता यहां पर कहां रह गई तो वो जो मैच्योरिटी है वो सरलता उन्होंने ईश्वर प्राप्ति करके बाद में वो जो एक डिवाइन मैच्योरिटी आती है। वो एक वर्ल्डली मैच्योरिटी होती है। मुझे ईश्वर प्राप्ति हुई ही नहीं है। बचपन से ही मैं समझ गया हूं कि मुझे इस एक तरह का शील्ड खड़ा करके रहना है। एक तरह की एक कपटता मुझे डेवलप करनी होगी। कि लोगों को मैनपुलेट करके मुझे रहना होगा। यदि मुझे जगत में आगे बढ़ना है तो अपने भाई बहनों को मैनपुलेट करना होगा। मां-पिताजी के साथ में डीएल करना सीखना होगा। टीचर्स के साथ में क्लासमेट्स के साथ में डीएल करना सीखना होगा। बड़े होकर के जब इंटरव्यू देने को जाएंगे तो इंटरव्यूअर्स के साथ में डीएल करना है। बिजनेस कर रहे हैं तो जो वेंचर कैपिटलिस्ट है, शेयर मार्केट वाले जो है उन लोगों के साथ में डीएल करना है। बिजनेस पार्टनर के साथ में तो पहले से ही वह कपटता की ओर ही जाता है। वर्ल्डनीनेस की ओर ही जाता है। वह एक मैच्योरिटी हो गया। और यहां पे है कि पहले तो सरलता पूर्वक ईश्वर को पुकार करके ईश्वर दर्शन प्राप्त कर लिया या तो फिर हृदय में कोई भी एक आध्यात्मिक अनुभूति का सीड जो है वो हमने जैसे कि बिठा दिया। उसके बाद में अब ये रामकृष्ण मिशन की स्थापना हुई तो वही वराह नगर के वो जो बेचारे सरल लड़के थे वो कोई प्रेसिडेंट हो गया। कोई ये वाइस प्रेसिडेंट हो गया। कोई जनरल सेक्रेटरी हो गया। किसी के सर पर आ गया पूरे साउथ इंडिया का जिम्मा, किसी के सर पर आ गया पूरा अमेरिका का जिम्मा। तो यह पूरा जो वर्ल्ड वाइड जो रिस्पांसिबिलिटी जो गुरु

प्रश्न: रामकृष्ण-विवेकानंद साहित्य का स्मरण-मनन-निदिध्यासन अध्ययन कैसे करें?

भाइयों ने ग्रहण किया और उन्होंने जो मैच्योरिटी और प्रैक्टिकिटी दिखाई है, दैट इज बेस्ड ऑन द फाउंडेशन ऑफ डिविनिटी। सरलता से कोई भी एक उन्होंने आध्यात्मिक उपलब्धि प्राप्त कर ली। उसके बाद में उन्होंने यह सब कार्य करके दिखाया है। यानी कि अपने माइंड के भीतर में किसी भी तरह का कॉनसेप्चुअल कंफ्यूजन नहीं होना चाहिए कि हम जब यह कहते हैं कि सरल होना है, वलनेरेबल होना है, इंप्रैक्टिकल होना है, तो फिर यह गुरु भाई लोग किस तरह से रामकृष्ण संग चलाएं? क्या ठाकुर हमको सही-सही में मूर्ख होने का उपदेश देते हैं? तो नहीं देते हैं। ठाकुर कहते हैं कि पहले सरलता पूर्वक ईश्वर को पुकार करके ईश्वर प्राप्ति कर लीजिए। कोई ना कोई आध्यात्मिक उपलब्धि प्राप्त कर लीजिए। इसके बाद में अपॉन दिस डिवाइन एक्सपीरियंस आप एक विज़डम का एक फाउंडेशन खड़ा कीजिए। इट विल बी अ डिवाइन विज़डम। यह जो राजा महाराज की कहानी इनको किस तरह की सालसी मॉडली करनी होती थी। वो काशी में वो झगड़ा चल रहा है। स्वामी जी के कुछ डिसाइपल्स ने काशी सेवाश्रम प्रारंभ किया था। अभी समय ऐसा आ गया है कि उन्हीं के बीच में यह डिफरेंस ऑफ ओपिनियन स्टार्ट हो गया। यही शरद महाराज को बुलाया गया। शरद महाराज वो मां के भाइयों के बीच में तो सुलह करवा दी है। काशी के साधुओं में सुलह नहीं करवा पा रहे हैं। आखिर में राजा महाराज को बुलाया गया। तो राजा महाराज वहां जाकर के इस तरह की कोई बात करते ही नहीं है कि भाई तुम्हारा क्या ओपिनियन है? तुम्हारा क्या कहना है? तुम लोगों को इस तरह से कंप्रोमाइज करना वह कोई बात ही नहीं। वहां पर बैठकर के सीधासीधी साधन भजन का जो एक दिव्य प्रवाह उन्होंने बहाया कि उस प्रवाह में बहते-बहते सभी के मन की यह जो कपटता या तो फिर यह मन दुख या तो फिर यह जो एक सन्मान को आघात पहुंचा यह जो सब भावनाएं थी वो कहां दिव्य आनंद में बह गई और सब झगड़ा मिट गया। वही जो सालीसी मॉडेली ठाकुर ने मना किया कि राजा महाराज भी कर लिए हैं। शरद महाराज भी कर लिए हैं। तभी तो यह मठ मिशन चला है अपना। इतना आज के भी देखिए अपने वो जो हेड क्वार्टर में बैठे हैं सीनियर साधु हैं वो डे बाय डे प्रतिदिन उनको यही सब करना है। बट क्या है कि देखिए यह सब डिवाइन फाउंडेशन के ऊपर में बना है। यानी कि हम यदि कांसेप्ट को ठीक-ठीक समझ करके अपने जीवन में सरलता है, सहजता है, वलनेरेबिलिटीज है, उसको प्रवेश करवाएं तो मुझे ऐसा नहीं लगता कि सांसारिक जगत में कोई बहुत बड़ा नुकसान हो। नुकसान होने वाला है। उसमें कोई प्रश्न ही नहीं है। किंतु इतना ज्यादा नुकसान नहीं होगा कि फिर हमारे पास में से सब कुछ चला जाए। ऐसा भी नहीं होगा। सरलता सहजता पूर्वक एक बार ईश्वर को पुकार लीजिए। कुछ ना कुछ अनुभूति प्राप्त कर लीजिए। फिर उसके बेस पे डिवाइन विज़डम का फाउंडेशन डालिए। तो आज यहीं तक अभी कल फिर से ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु यह जो फोटो खरीदने की बात की ना उसे एक कहानी याद आ गई। मां रामेश्वर से फिरत आई है और दो फोटो ले आई है वहीं पे रामेश्वर के और फिर यह केदार बाबू वो जो क्वालपाड़ा आश्रम के अध्यक्ष मां का दर्शन करने के

मानव जीवन में आनंद के सोपान

लिए आए हैं उद्बोधन तो मां ने उनको यह फोटो दो देकर के कहा देखो यह फोटो मैं वहां रामेश्वर से लाई हूं उसको फ्रेम में से अच्छे से मढ़ करके वहां ठाकुर घर में रखना और प्रतिदिन पूजा करना तो ये केदार बाबू कहते हैं मां आपने ही तो वो ठाकुर का और आपका फोटो रख दिया और मैं कितने ठाकुर रखूंगा और कितनी पूजा करूंगा तो फिर मां

प्रश्न: क्या "सर्व भूत में ब्रह्म दर्शन" एक सहज अवस्था है -- यह हमारी साधना जारी रखने पर स्वतः ही आ जाएगी, या जैसा कि स्वामीजी सिखाते हैं कि हमें "शिव ज्ञाने जीव सेवा" का अभ्यास करना होगा? जब हम "शिव ज्ञाने जीव सेवा" का अभ्यास कर रहे होते हैं, उस समय हम वास्तव में "सर्व भुत में ब्रह्म दर्शन" की स्थिति तक नहीं पहुँचे होते हैं।

कहती है अच्छा ठीक है उसको तुम दीवार पर टांग करके रखना भले ही चाहे पूजा मत करना तो फिर वो बहुत सालों तक कोलपाड़ा आश्रम में वो दीवार पर टांग करके रखे हुए थे ये फोटो तो एनीवे जो आप कहते हैं इट्स अ वेरी नेचुरल क्वेश्चन कि किस तरह से सरलता बढ़ाई जाए देखिए मैं अपना खुद का एग्जांपल बताता हूं और और बहुत सारे हजार होंगे उपाय मेरा खुद का जो की की फैक्टर इज़ हियर इज़ वलनेरेबिलिटी मेरा ऐसा है कि मैं बहुत ही ज्यादा ज्यादा इंट्रोवर्ट हूं और रेयरली रेयरली अपने मन का भाव जो है दूसरों के सामने व्यक्त करूंगा। यह अपना जो फीलिंग्स है, इमोशंस है आई डोंट रिमेंबर कि मैंने ऐसा कोई किसी के साथ में शेयर किया हो या वगैरह किया हो। अभी मुझे यदि वनरेबल होना है। यदि मुझे विश्वास डेवलप करना है तो मुझे वनरेबल होना होगा। मुझे अपना माइंड जो है अपना जो फीलिंग्स जो है वो शेयर करना होगा। व्हिच इज नॉट इजी फॉर मी। फिर मुझे लगता है कि शेयर करने की भी क्या जरूरत है? किसको पड़ी है यह सब सुनने की? वह भी तो एक फैक्टर है ना। तो फिर मैंने एक जो वर्क अराउंड किया है कि किसी के पास जाकर के बड़े ही हम्लता पूर्वक बड़े ही विनम्रता पूर्वक कहेंगे कि अच्छा महाराज या जो भी है आपकी मैं क्या सेवा कर सकता हूं थोड़ा सा आपकी सेवा करने का मुझे मौका दीजिए। तो यह जो ह्यूमिलिटी जो है ह्यूमिलिटी मेरा नेचर का पार्ट नहीं है। ऐसा नहीं है कि मैं एोगेंट हूं। किंतु एट द सेम टाइम रेयरली हम लोग इस तरह का ह्यूमिलिटी सीखते हैं। तो यह जो ह्यूमिलिटी पूर्वक विनम्रता पूर्वक किसी के सामने नतमस्तक होकर के पूछना कि मुझे सेवा का मौका दीजिए तो ऐसा नहीं है कि वह कोई सेवा का मौका हमको देंगे। यह तो एक बात है। दूसरा है कि ऐसा कुछ कहेंगे करने को कि जो कि हमसे संभव नहीं है। तो डज़ नॉट मैटर जो हमारे से नहीं संभव है मना कर देना है। किंतु अपने मुंह से जो एक विनम्रता पूर्वक ये जो बात निकली कि आपकी सेवा का मुझे एक चांस दीजिए। मुझे भी कुछ करने दीजिए। व्हाटएवर फिजिकल सेवा है। घर की सफाई करनी है। कपड़े धो देने हैं उनको। वो तो ये विनम्रता जैसे ही हम अपने भीतर में लाएंगे ना तो यह सरलता होना शुरू हो जाएगा। प्रैक्टिस माने यदि आपको प्योर सरलता लानी है तो आपके अपने मन का सभी भाव जैसे ठाकुर का मन का चंद्रामणि का खास करके चंद्रामणि का ठाकुर ने कहा मेरी मां को सब मूर्ख कहते थे वो अपने मन में कुछ छुपा के नहीं रख पाती थी अपने मन का सब बोल देती थी तो वो हमारे से शायद संभव नहीं होगा और इट विल मेक टू मच माने उस सरलता के लेवल पर यदि ना भी जाए तो यह जो

प्रश्न: कष्ट कोई नहीं चाहता. हर कोई आनंद ही चाहता है - कोई भौतिक सम्पत्ति में, कोई आध्यात्मिकता में।

एक है सरलता का जो लोअर लेवल है वो विनम्रता यदि हम इंकलकेट करेंगे तो हम बहुत आगे तक जाएंगे। माने हायर लेवल तक जाना है सरलता के तो अपने मन को खोल देना। हृदय को खोल देना होगा। शॉर्ट ऑफ दैट यह एक रास्ता है कि विनम्र होने का। कौन मूर्ख आए हाथ में?

प्रश्न: विवेकानंद मृत्यु की प्रशंसा करते हुए कहते हैं, "संन्यासी को मृत्यु से प्रेम करना चाहिए" या "मृत्यु जीवन के स्वप्न को तोड़ देती है। मृत्यु से प्रेम करो।" क्या यह आपके इस सिद्धांत के विरुद्ध नहीं है कि हर कोई आनंद चाहता है? स्वामीजी की माँ काली की कविता भी ईश्वर के ख़ौफ़नाक पहलू का महिमामंडन करती है।

किंतु देखिए यही तो प्रॉफिट लॉस है ना। प्रॉफिट लॉस आप किसको कहते हैं? आप अपने को संसार में बचा करके रखना चाहते हैं तो फिर वहां पे आपका मिस हो जाएगा। दैट इज द आपको प्रॉफिट लॉस करना है। यहां एक जगह पे तो लॉस लेना होगा हमको। वो लॉस लेने का छाती होना चाहिए। तभी यह मामला आगे बढ़ेगा ना। इवन जो शेयर मार्केट में प्रॉफिट करते हैं बड़ा लॉस लेने का साहस रखते हैं। क्योंकि यह रिस्की क्योंकि आपको देखिए रिस्की वेंचर पे ही प्रॉफिट होगा। आपका वह 5% 4% तो आपको पोस्ट ऑफिस में बैंक में मिल जाएगा। 40 50% चाहिए तो रिस्क लेना होगा तो रिस्क डूबेगा भी सही वह छाती चाहिए तभी आना है। म यह पूरा स्पेक्ट्रम यदि एनालाइज करना है चंद्रामणि देवी वहां दक्षिणेश्वर में रह रही थी नबत में तो मथुर बाबू जाकर उनको कहते हैं कि मां थोड़ा सा सेवा करने का मौका दो। आपको क्या चाहिए? बोलिए मैं सब दे देने को तैयार हूं। तो चंद्रामणि देवी सोच करके भी नहीं सोच पा रही है। ऐसा मुझे क्या चाहिए? वो कहती है तुम्हारी कृपा से खाना मिल जा रहा है, रहने को जगह मिल जा रही है, पहनने को कपड़े मिल जा रहे हैं। और चाहिए क्या जीवन में? तो मथुर बाबू कितना ही रिक्वेस्ट कर समझ में नहीं आ रहा है कि क्या मांगू मैं उनसे। तो फिर आखिर में इतना रिक्वेस्ट किया तो कहा कि भाई तंबाकू खाने के लिए तंबाकू के पत्ते खत्म हो गए। वह देना चाहता है तो दे दो। तो मथुर बाबू की आंखों से आंसू आ गए। इतना बड़ा जमींदार पता है धन की वैल्यू क्या है? और इस तरह के व्यक्ति को देखता है धन की वैल्यू ही नहीं समझ में आ रही है। तो कहता है कि आपके जैसी जननी के कोख में से ही ये श्री रामकृष्ण जैसा बच्चा प्रकट हो सकता है। तो यह है मां चंद्रामणि देवी और यहां पे देखिए स्वामी जी का स्केप्टिसिज्म है। किंतु स्वामी जी का जो लाइफ है ना उस दो पार्ट में बट गया है। पहले तो था कि ठाकुर पे जेनुइनली एक उनका उन्हें टेस्ट करते हैं। वो बेड के नीचे में बिस्तर के नीचे में सिक्का रख देते हैं। बोलते हैं कि सिक्का स्पर्श नहीं कर सकते। टेस्ट करके देख लेते हैं। वो एक था। दूसरा था कि एक बार जब ठाकुर को मन प्राण दे दिया तो फिर पूरे जैसे कि उनके गुलाम होकर के रह गए। ये आखिरी आखिरी दिनों की कहानी है। स्वामी जी में क्या 180 डिग्री चेंज कैसा आया है। देखिए उस समय स्वामी बेलूर मठ की बात है। एक साधु बीमार था। तो स्वामी जी ने दूसरे एक साधु को कहा जाओ ठाकुर का चरणामृत उस साधु को खिला के आओ। अभी यह जो साधु था अभी ये जैसे तो भैरवी तो इकट्ठा हुए थे ना बेलूर मठ में उस समय स्वामी जी को देख के तो उसने कटाक्ष में हंस दिया कि ये विश्वविजय स्वामी वेदांत के लॉजिकल रैशनलिटी के प्रचारक ठाकुर का चरणामृत खिलाने की बात करते हैं वो बीमार साधु को तो उसने ऐसा कटाक्ष पूर्ण हंस दिया। बोला तो कुछ नहीं किंतु वो स्वामी जी इमीडिएटली समझ गए। वो कहते हैं तुमको खिलाने की जरूरत नहीं है। तुम चरणामृत खिलाओगे कोई लाभ नहीं होगा। मैं ही जाकर के चरणामृत लाकर के खिलाता हूं। तो देखिए कि चरणामृत पे इतना विश्वास आ गया ठाकुर के। इतना जगत जय करने के बाद में भी ये माने अमेरिका जाकर के अमेरिकन प्रोफेसर को वो लॉजिक में हरा देने के बाद में स्वामी जी की ये परिस्थिति है। ठाकुर के ऊपर ऐसा विश्वास कि चरणामृत खाएगा तो दूसरा उनका जो साधु है वो ठीक हो जाएगा। सो स्वामी जी के जीवन में दो फेज है। एक तो था कि स्केप्टिसिज्म था, हेल्दी था। किंतु जब एक बार उस स्केप्टिसिज्म रूपी चाकू से प्रॉपर ऑटोप्सी करके प्रॉपर एनालिसिस करके जब समझ गए क्या सही है क्या गलत है तो फिर पूरा मनप्राण दे दिया। फिर अपने को बाकी नहीं रखा है। बचा के नहीं रखा है। कुछ भी व्नरेबिलिटी जो भी थी सब खोल दी है। फिर ऐसा नहीं किया कि इतना मैं अपने अपने के लिए बचा के रखता हूं। इतना ठाकुर को देता हूं। 100% दे दिया। हम लोगों का प्रॉब्लम क्या है? ना ही स्वामी जी जैसा इंसाइजिव स्केप्टिसिज्म है कि हम 100% एनालिसिस करके समझ ले कि यह सही है या गलत है। वहां पर अपना माइल्ड विश्वास आता है और फिर होता है कि एक माइल्ड अविश्वास पूरा जीवन भर चलता है। हम लोगों का वो सांप की तरह है। वाटर स्नेक की तरह मेंढक को गीला है। अभी ना ही उसको फेंक पाता है ना ही खा पाता है। हमारा जो माइल्ड विश्वास है ना ही हमारे पास में वो माइल्ड विश्वास एक शार्प नाइफ हमको देता है। जिसकी मदद से हम ऑटोप्सी कर पाए, ये डिसेक्शन कर पाए, सही गलत समझ पाए वो भी नहीं करने देता। और ये जो माइल्ड अविश्वास है वो पूरा विश्वास भी नहीं होने देता। ना ही हम अद्वैत में जा सकते हैं, ना ही द्वैत में जा सकते हैं। ना ही 100% लॉजिकल हो सकते हैं ना ही 100% सरल हो सकते हैं। वि इज आवर प्रॉब्लम। उसको जो जिसको कहते हैं ना कि लॉजिकल कंक्लूजन तक ले जाने की क्षमता थी। बिलीफ और कमिटमेंट दोनों साथ में नहीं चलते। नास्तिक होना है तो मैं पूरा कमिटमेंट नहीं कर पाऊंगा नास्तिकता का क्योंकि यह मन के भीतर में डर रहता है। नास्तिक हो जाऊंगा फिर बीमार होऊंगा भगवान नाराज हो जाएंगे। क्या होगा? फिर बीवी बच्चों का विवाह भी तो है। ये ये सब एक भय भी रहता है। माने एक माने एक डिवाइन पावर का। तो मैं कमिटमेंट इसमें भी नहीं कर पाता हूं। कमिटमेंट मैं उस लेवल पर भी नहीं कर पाता हूं कि हां सब कुछ दे दो ईश्वर को। फिर ईश्वर जो चाहे वह करें। आइदर और किसी भी तरह का कमिटमेंट नहीं कर पाएंगे। बातों की बातें हैं। हैेजिंग द बेड। इंग्लिश में कहते हैं ना देखिए शरद महाराज का रामकृष्ण मिशन के जनरल सेक्रेटरी होने से भी बड़ा क्वालिफिकेशन था। माय भारी मां क्या कहती है हम झकी पोहानो शोजा नोए सहज ना शरतीत ही करते पार झकी पोहानो अर्थात कि मेरा यह झमेला उठाना यह सहज नहीं है माने लिटरली मां यह शब्द व्यवहार करती है शरत ही कर पाएगा क्योंकि सब तरह के पागल मां के पास में रहते थे और सबका मन समझ के एक दिन की बड़ी सुंदर घटनाएं छोटी सी घटनाएं महाराज के मन का परिचय देती है एक साधु ने लेटर लिखा एक साधु उद्बोधन में आया महाराज का दर्शन मानक मां का दर्शन करने के लिए दूसरे किसी ब्रांच सेंटर से तो अभी क्या है एक तो सिस्टम को फॉलो करना है ना पहले से लेटर लिख के तुम परमिशन लो फिर आओ वैसे ही उठा के झोला उठा के थोड़ी ना चल देगा साधु तुम्हारे सेंटर में क्या रिस्पांसिबिलिटी है आपकी आपके बड़े महाराज जो है उनका परमिशन लिया कि नहीं आपका जो ड्यूटी था उस सेंटर में उसका व्यवस्था करके आए कि नहीं वह सब देखकर के फिर ट्रैवल करना है तो यह साधु आकर के उपस्थित हुआ महाराज के सामने कहता है आपका दर्शन मां का दर्शन करने के लिए आया हूं। तो शरद महाराज कहते हैं भाई तुमको तो लेटर लिखना चाहिए। पहले तुम बड़े महाराज का आपके वहां के जो हेड स्वामी जी है इंचार्ज स्वामी जी उनका परमिशन लेना चाहिए। ये जो फॉर्मेलिटी है तुमने किया है। तो ये साधु कहता है हां महाराज मैंने किया है। तो शरद महाराज कहते हैं मेरे पास में कुछ आया नहीं है। तुम जाओ वापस अभी का अभी वापस चले जाओ। जिस सेंटर से आए हो फॉर्मेलिटी करो बाद में ही सब कुछ करना। ऐसा जिसका इच्छा हो झोला उठा के चल लो तो थोड़ी ना मिशन चलेगा। ऐसा बोल के उसको डांटा। तो साधु कुछ बोला नहीं वापस चला गया। उस दिन के बाद में शाम को जब शरद महाराज अपने पेपर टिक कर रहे थे उसमें उस साधु का लेटर मिला। वो खो गया होगा। इतने सारे पेपर पड़े हैं वो तो उसमें कहीं भी खो गया होगा। तो उन्होंने देखा नहीं। तो सीधे शरद महाराज गए राजा महाराज के पास में। राजा महाराज के पास में जाकर कहते हैं राजा मैं रेिग्नेशन दे रहा हूं अपने जनरल सेक्रेटरी के पोस्ट से। तो राजा महाराज कहते हैं क्या भाई क्या बात हुई? क्यों सडनली एकाएक रेिग्नेशन देने की बात कर रहे हो? तो शरद महाराज कहते हैं देखिए इस तरह से मैंने साधु को झूठमठ का डांट दिया। उसने तो बेचारे ने लेटर लिखा था। अभी मैं मैं खुद बूढ़ा हो गया हूं कि अभी इतनी संभाल नहीं ले पा रहा हूं इसलिए मुझे आप छोड़ दीजिए। इस काम में से मुझे मुझे रिलीज़ कर दीजिए। ये जिम्मा और किसी के सर पे दे दीजिए। तो राजा महाराज कहते हैं अरे भाई ऐसा सब तो छोटा-मोटा होता रहता है। इसमें थोड़ी ना इतना टेंशन लेना है। जाओ जाओ जाके अपना काम करो। तो देखिए राजा महाराज के लेवल पे वो ठीक था। वो इतने डिवाइन लेवल पे थे। छोटी-मोटी गलतियां ये माया के राज्य में चल जाएगी। किंतु जो शरद महाराज जिस लेवल पर थे एग्जीक्यूटिव रिस्पांसिबिलिटी लेना है तो उसके लॉजिकल कंक्लूजन तक पहुंचना है। यदि आप नहीं उसको कर पा रहे हैं प्रॉपर्ली उसका निवाह तो छोड़ दीजिए। दैट लॉजिकल कंक्लूजन ही हैज़ स्ट्रेंथ टू रीच। नहीं इवन इवन सिंसियरली साधन भजन भी करेंगे ना तो यह स्केप्टिसिज्म ऐसे बैरियर बन के बैठा रहेगा। देखिए जो बच्चे का सरलता और इमेजिनेशन होता है ना एक कार्टून स्ट्रिप्स है केल्विन एंड होब्स तो मैं उसको पढ़ता रहता हूं मेरे पास में उसका ई बुक भी है वो उसमें क्या है वो फिलॉसोफिकल अच्छा वो एक है छोटा बच्चा ही छ साल का वो केल्विन जो है किंतु डिस्कशन काफी वो एक फिलॉसोफिकल करता है तो मुझे बड़ा अच्छा लगता है उसका यह जो है उसका ये क्रिएटर वो भी बड़ा इंटीग्रिटी है उसमें काफी उसका यह है क्या कहेंगे कि फिलो फिलोसोफिकल अंडरस्टैंडिंग है। वो कमर्शियलाइज नहीं करेगा एक काल अपनी कॉमिक स्ट्रिप को वगैरह-वगैरह माने एक साधु जैसा ही उसका एक माइंडसेट है। तो जो भी है अभी ये आप पूरा पढ़ लेंगे ना तो उसने क्या है कि उस लास्ट जो था उसका अभी एक केल्विन का एक स्टफ टाइगर है। वो छोटा खिलौना जैसा होता है ना वो स्टफ वो खिलौना तो एक शेर माने टाइगर। तो अभी वो टाइगर वैसे तो उसकी मां जब रहती है तो वह स्टफ टॉय की तरह ही दिखता है। किंतु मां चली जाती है अकेले-अकेले खेलता है तो टाइगर जैसे जिंदा हो जाता है और टाइगर के साथ में बातें करता है खेलता है वार्तालाप करता है। उसकी इमेजिनेशन इतनी है सरलता इमेजिनेशन वगैरह तो लास्ट जो स्ट्रिप है माने लास्ट बिल्कुल लास्ट वो जो खत्म होने वाला तो और यह जो इसका जो ये क्रिएटर है ना तो वो ड्राइंग भी बड़ा अच्छा सुंदर करता है। तो ड्राइंग इतना सुंदर करता है कि देखने में भी अच्छा लगे। फिलॉसोफिकल कंटेंट भी है। एवरीथिंग इज देयर। बच्चे का इमेजिनेशन किस तरह से वो लेके आना उसको समझ में आता है। तो लास्ट स्ट्रिप में बड़ा ही सुंदर दृश्य है। स्नोस्केप है। ये होता है ना स्नोफॉल होता है। तो चारों ओर स्नो लगाया हुआ है और उसमें वो स्लेड होती है जो कि स्नो में स्लाइड करने वाली। उस लेड में बैठकर के केल्विन और होप्स जा रहे हैं और स्लोप से नीचे उतर रहे हैं। इतना सुंदर प्रकृति का नजारा और वो केल्विन कहता है इट्स अ होल न्यू वर्ल्ड इज अ मैजिकल वर्ल्ड एनीथिंग कैन हैपन हियर। तो दैट लास्ट स्ट्रिप और उसका जो एक मैजिकल बैकग्राउंड जो है पूरा स्नोस्केप है। मुझे इतना अच्छा लगा। दिस इज़ ये बच्चे का जो विश्वास जो साइकोलॉजी है ना उसके क्रिएटर ने एकदम परफेक्टली यहां पे वो निकाल करके ले आए। बच्चे के लिए इट्स लाइक अ ब्लैंक कैनवस। हमारे लिए कैनवास पूरा भरा हुआ है। यह ये यही हो सकता है। यही है। ये ये यही मतलब सब कुछ फिक्स है। यहां पे कुछ चेंज करने के लिए कुछ नहीं। बच्चे के लिए इज अ ब्लैंक कैनवास। वो कुछ भी ड्रॉ कर सकता है उसके ऊपर में। इट्स लाइक अ मैजिकल वर्ल्ड। वो जो चाहे वो क्रिएट कर सकता है। तो वो जो सरलता वो विश्वास बिलीफ इन मैजिक कि आज आज के हमको पता है मेरा आज का दिन कैसा जाएगा। मुझे 100% पता है। मैं ऑफिस में जाऊंगा बैठूंगा फिर कॉफी खाऊंगा। उसके बाद में खाना खाएंगे, फिर रेस्ट करेंगे। फिर उठ के वो फिर से ऑफिस में जाएंगे। आई एम 100% श्योर कि मेरा दिन ऐसा ही जाएगा। क्योंकि आज तक मेरे दिन सभी ऐसे ही गए। बच्चे का ऐसा नहीं है। सुबह को उठकर वो सोचता है क्या से क्या नहीं हो जाएगा? क्योंकि मैं एक मैजिकल लैंड में चला जाऊंगा क्या? कोई एक भूत आकर के कोई एक देवता आकर के मेरे साथ में बात करेंगे क्या? दैट पॉसिबिलिटी इज ओपन इन हिज माइंड। सो इट मे इवन कम माने इट इज इवन पॉसिबल टू कम के वो हो सकता है।