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Sri Ramakrishna Kathamrita ·

श्रीरामकृष्ण कथामृत 27 Oct 1882 केशव सेन के साथ ठाकुर का नौका विहार 26 july 2024

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ओम स्थापक य च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिणी अवतार वरिष्ठ राम कृष्णा यते नमः तो कल हमने देखा कि किस तरह से ठाकुर केशव सेन के साथ में गंगा पर भ्रमण करने के लिए जहाज में विराजित होकर के वह कलकाता की ओर जा रहे हैं पहले तो आखिर में कलकत्ता की ओर गए थे पहले तो एक पूरा चक्र लगाया सर्कल लगाया गंगा पर बाद में वह कलकाता की ओर जा रहे हैं तो यह सबसे पहले तो मास्टर महाशय ने बड़ा ही सुन तो पहले हमने देखा कि किस तरह से मास्टर महाशय सबको हमारे सामने गंगा का फिर काली मंदिर का प्राकृतिक दृश्य का शरद के नील आकाश का कितना सुंदर वर्णन करते हैं फिर इसी वर्णन के साथ में आखिर में वह वार्तालाप ठाकुर के साथ में प्रारंभ होता है ठाकुर को कहा जाता है ब्रह्म समाजी जो थे इन्होंने ठाकुर को कहा कि हम लोग पहारी बाबा के वहां पर गए थे वहां पे हमने आपका एक फोटोग्राफ देखा तो ठाकुर ने भाव समाधि में उस समय तो फिर भी समाधि में थे उस समय फिर भी भाव में थे तो उसी भाव में ठाकुर ने कहा कि खोलता अर्थात कि फोटो तो आवरण का है इसके भीतर में जो आवरण के भीतर में जो असली स्वरूप है अपना स्व स्वरूप आत्मन उसका फोटो या तो फिर असली बात तो उसके साथ में वार्तालाप उसको जानना यह सब है बाह्य आवरण का फोटो लेकर क्या करेंगे किंतु साथ-साथ में ही हमने देखा कि ठाकुर जितने ब्रह्म भाव में रहते थे उतने प्रैक्टिकल भी है उन्होंने एक समय मां को कहा था कि यह जो फोटोग्राफ है अपने खुद के फोटो की ओर उन्होंने इशारा करके कहा था इसकी पूजा घर-घर होंगी अपने रामकृष्ण संघ के जितने भी आश्रम है जितने भी मंदिर है यह सभी आश्रमों में और मंदिर में तो इसकी पूजा होती ही है किंतु साथ में ही देखिए कि बहुत सारे भक्त हैं हमारे जिनके घर पर इसी फोटो की पूजा होती है तो ठाकुर को पहले तो ठाकुर को पहले से ही पता था कि जदी में इस तरह से बातें करना शुरू करूंगा बहुत ज्यादा कुछ ब्रह्मज्ञान की बातें तो फिर लोग शायद डर जाएंगे और जब उनके फोटो करने की की पूजा करने की बारी आएगी तो लोग यह सोचना शुरू ना कर दे कि बाह्य आवरण का फोटो लेकर बाह्य आवरण का जो फोटो है उसकी पूजा करने से क्या होगा इससे बेटर है कि दिन भर बैठ कर के कथामृत पढ़े और कथामृत में ठाकुर की जो वाणी है उसका चिंतन मनन और निदिद्यासन करें तो ऐसा ना हो इसलिए साथ में साथ-साथ में ही ठाकुर ने इसका एक प्रैक्टिकल सोल्यूशन भी हमको दिखा दिया कि किस तरह से एक जमींदार अपनी जमींदारी उसकी विराट जमींदारी है बहुत बड़ी जमीन है जिसका कि वह मालिक है उस जमीन में वह कहां पर भी उपस्थित हो सकता है किंतु उसका यदि आपको मिलने के लिए जाना है जमींदार को आपको जमींदार के साथ में मुलाकात करनी है यदि आपको जमींदार को मिलना है तो आप कहीं किसी पेड़ के नीचे ना कि किसी तालाब के किनारे ना कि किसी गेट के पास में वहां तक आप नहीं जाएंगे जमींदारी के भीतर में उसकी जमीन के ऊपर में उसने जो एक अपना मकान बनाया है उसके भीतर में आप जाकर के उसके साथ में आप बात करेंगे क्योंकि आपको पता है कि जमींदार उस अपने खुद के घर में रहने की संभावना उसके बैठक खाने में रहने की संभावना सबसे ज्यादा है तो यहां पर ठाकुर कहते हैं भक्त का हृदय है वह है भगवान का बैठक खाना भगवान का घर भगवान इस पूरे जगत में बहुत सारी जगह पर हो सकते हैं अभी इस किताब के भीतर में भी हो सकते हैं इस टेबल के भीतर में भी हो सकते हैं इस वस्त्र के भीतर में भी हो सकते हैं किंतु मैं अर्थात कि एक मनुष्य है या तो फिर कोई भी एक भक्त है उसके हृदय में भगवान को देखने की प्राप्त करने की संभावना उनका दर्शन करने की संभावना सबसे ज्यादा है रदर देन की यह किसी निर्जीव चीज वस्तु के तो यहां पर ठाकुर ने अपना फोटो पूजा हो साथ-साथ में ही इसका भी प्रावधान पहले से ही कर दिया है तो अभी थोड़ा सा आगे पढ़ते हैं मास्टर महाशय लिखते हैं ज्ञानी रा जाके ब्रह्म बोले जोगीरा ता केही आत्मा बोले ज्ञानी लोग जिसको ब्रह्म कहते हैं योगी लोग उसी को आत्मा कहते हैं आर भ तेरा ता केही भगवान बोले और भक्त उन्हीं को भगवान कहते हैं देखिए कि हिंदू परंपरा में भारतीय परंपरा में जो विभिन्न तरह की स्कूल्स ऑफ थॉट्स है डिफरेंट डिफरेंट जो फिलोसोफी है जो सड़ दर्शन है या तो फिर कहेंगे विभिन्न दर्शन शास्त्र है इसी दर्शन शास्त्र में पहले तो पहले तो एक समय था कि ऐसा होता था जदिया ईश्वर को भगवा भगवान को एक व्यक्ति मान कर के पूजा करते एक अवतार के रूप में जैसे कि मैं भगवान कृष्ण का भक्त हूं मैं भगवान कृष्ण की आराधना करता हूं पूजा करता हूं कोई शैव है तो भगवान शिव की पूजा करता है तो कोई रामाय है भगवान राम की पूजा करता है तो कोई वेदांती है वह फिर ब्रह्म साक्षात कार्य आत्म संस्था आत्म संस्था होने का प्रयास करता है तो यह सब विभिन्न स्कूलों में एक समय था बहुत पुराने समय में जबकि डिफरेंस ऑफ ओपिनियन हुआ करता था इनके भीतर में बीच-बीच में झगड़ा भी होता था किंतु यहां पर एक बात याद रखने की आवश्यकता है कि हमारे हिंदू धर्म के भीतर में या तो फिर भारतीय परंपरा में जदिया सिर्फ यह बात नहीं है कि सिर्फ हिंदू हिंदू में जद इवन भारत में जितने भी धर्म प्रकट हुए हैं वह हिंदू हो ना कि जैन हो ना कि बौद्ध हो इन सभी के भीतर में कभी भी झगड़ा मारामारी नहीं हुआ है इस बात को लेकर के कि मैं इस तरह के इस प्रकार के भगवान की पूजा करता हूं तुम भिन्न प्रकार के भगवान की पूजा करते हो तो चलो हम दोनों आपस में युद्ध करते हैं देखते हैं कि किसका भगवान ज्यादा शक्तिशाली है किसका भगवान ज्यादा बलवान है जिसका भगवान ज्यादा बलवान होगा वह जीतेगा और जो हार जाएगा उसका भगवान कमजोर है अर्थात कि उसकी पूजा बंद कर दो और जीते हुए लोगों की भगवान की पूजा प्रारंभ कर दो ऐसा भारत में बड़ा रेर हुआ है नहीं हुआ होगा ऐसा नहीं है किंतु बड़ा ही रेर ऐसा सब हुआ होगा तो यह हो गई भारत की बात किंतु आप विदेश में देखिए कि विदेश में अ खास करके क्रिश्चियनिटी के जो विभिन्न विभिन्न पंथ थे इन लोगों के भीतर में कितनी मारकाट हुई कितना खूना मर्की हुआ और विजेता जो है हमेशा अपना मत जो हरी हारे हुए लोगों के ऊपर में उपस्प्रिंग के भीतर के सब विभिन्न स्कूल्स ऑफ थॉट्स की बात नहीं है वहां पर जितने भी धर्म थे उन सभी धर्मों में बार-बार युद्ध हुआ है इस तरह से झगड़ा हुआ है अपने ने खुद के देवता की महत्ता स्थापित करने के लिए तो यहां पर भारत में यह उदार दृष्टि जो है स्वामी जी ने एक बार एक बहुत सुंदर बात कही है कि धर्म में जो उदारता है वह भारत में देखने को मिलती है और सामाजिक उदारता जो है वह विदेश में देखने को मिलती है अर्थात कि देखिए कि धर्म में आपका मत जितना भी हो कोई भी हो कोई आपको ये आपके साथ में झगड़ा करने के लिए कि या तो फिर आपके साथ में आपका तिरस्कार करने के लिए नहीं आएगा ऐसा बहुत घरों में होता है कि पति जद भगवान शिव का उपासक है तो पत्नी हो सकती है कि वैष्णव है भगवान कृष्ण की उपासक है या तो फिर पति जद जैन भी है तो पत्नी हिंदू हो सकती है तो इस तरह से विभिन्न धर्मों में एक ही परिवार में शांति से रहने की हमारी भारतीय उदार परंपरा चली आई है किंतु साथ-साथ में ही इसी बात का कंट्रास्ट आप सामाजिक परंपरा के साथ में कीजिए खास करके यह विदेशी आक्रमण प्रारंभ हुए तब से लेकर के हमारे समाज की बचाव के लिए हमने समाज को एक बहुत ही अ कहेंगे कि अंध प्रकार के बहुत ही रिस्ट्रिक्टेड ऑर्थोडॉक्स प्रकार के नियमों में हमने बांध दिया यह जो जाति और ज्ञाती प्रथा थी वह पहले वंशानुगत नहीं थी वह पहले कर्मानुसार का काम अच्छा लगता है तो मैं सुथार हूं यदि मुझे पूजा पाठ अच्छा लगता है तो मैं ब्राह्मण हूं बात यह नहीं है कि मैं ब्राह्मण के घर में जन्म लिया मतलब कि मैं ब्राह्मण हूं मेरा इंक्लिनेशन क्या है मैं क्या करने की इच्छा रखता हूं इसके ऊपर में मेरा सब कुछ निर्भर करता है मेरा वंश मेरा यह जो जात है या तो मेरा ज्ञात ज्ञाती वगैरह वगैरह किंतु बाद बाद में ऐसा हुआ कि यह सब वंशानुगत हो गया जो किसान है उसका लड़का किसान ही होगा जो सेना जो सैनिक है उसका लड़का सैनिक ही होगा जो वैद्य है उसका लड़का वैद्य ही होगा एक बार माने राधु को एक वैद्य को वैद्य राज को प्रणाम करने को कहा मां की ट्रीटमेंट के लिए मां की मां जब बीमार थी उस समय आया करते थे मां की चिकित्सा करने के लिए तो वो जब आए तो मां ने कहा कि राधु तुम जाकर के इसको को प्रणाम करो तो जैसे ही राधु ने प्रणाम किया तो व सब ब्राह्मण मातो सब अपने परिवार जनों से घिरी हुई थी तो तो उसी में से किसी ने प्रश्न किया कि क्या यह ब्राह्मण है जिनको कि यह राधू प्रणाम कर रही है क्योंकि सभी को पता चल जाता है कौन ब्राह्मण है कौन नहीं है सबको पता है कि ये तो ब्राह्मण नहीं है तो मां ने उत्तर दिया कि नहीं नहीं वोह तो वैद्य है तो इमीडिएट मां को प्रश्न किया गया तो ब्राह्मण तो राधु तो ब्राह्मण की लड़की है वह तो ब्राह्मण है वो ब्रा मन होकर के अब ब्राह्मण को पैर क्यों छुए गी उनको प्रणाम क्यों करेगी यह तो अपनी जो ब्राह्मण जात जो है वो तो सर्वश्रेष्ठ है बाकी सब तो इनके नीचे में आते हैं तो इमीडिएट मां ने उत्तर दिया कि अरे किंतु इनकी विद्या देखो इतकी विद्या के आधार पर ही मां ने कहा राधु को कि उनको प्रणाम करो यानी कि मां की दृष्टि से ठाकुर की दृष्टि से देखिए कि इन्होंने नाथ जात के परे जाकर के अपना उपदेश दिया है किंतु उस समय की भारतीय परंपरा कुछ ऐसी हो गई थी यह मिडल एजेस में जिसको डार्क एजेस कहते हैं विदेशी आक्रमणों के समय में कि हमारा समाज बहुत ही ज्यादा रिस्ट्रिक्टेड हो गया था वो ठाकुर म स्वामी जी भले अपने आपस में एक लिबरल एटमॉस्फियर खड़ा करें किंतु समस्त भारत देश घूम कर के स्वामी जी ने देखा तो दो चीज देखी एक तो तमस में डूब गया है यानी कि हम आत्म श्रद्धा खो बैठे हैं दूसरा कि हम सामाजिक अदह पतन की की ओर जा रहे हैं अर्थात कि समाज को इस तरह से हमने विभागों में बांट दिया है कि यह जो डिवाइड एंड रूल यह जो ब्रिटिश लोगों का जो मूल मंत्र था कि जहां पर भी आप डिवीजन देखिए वहां पे आप दोनों लोगों का झगड़ा करवा दीजिए भाई भाई का और उसके व फिर वो जो एक बंदर और दो बिल्ली की कहानी है ना दो बिल्लियों के हाथ में एक रोटी का टुकड़ा आ गया तो अभी वह आपस में कैसे बांटेगी तो एक बंदर के पास गई तो भी बंदर का बड़ा चालाक था उसने क्या किया कि रोटी के दो टुकड़े किए किंतु इस तरह से किए कि एक टुकड़ा बड़ा है एक टुकड़ा छोटा है तो दोनों एक एक पल्ला लिया एक तराजू तराजू में दोनों टुकड़े रखे तो जिसको छोटा टुकड़ा मिला था रोटी का वो बिल्ली चिल्ला उठी कि अरे इस बिल्ली को आपने बड़ा टुकड़ा क्यों दिया मुझे छोटा क्यों दिया तो बंदर कहता है अच्छा ठीक है बड़ा टुकड़ा जिस रोटी का है उसमें से थोड़ा सा काट के मैं खा जाता हूं अभी वो काट के खा गया तो वो रोटी का टुकड़ा छोटा हो गया और जिसका छोटा था वह भी बड़ा हो गया तो अभी प दूसरे वाली बिल्ली चिल्ला उठी क्या रे आपने तो खाके मेरा टुकड़ा छोटा कर दिया सामने वाली का अभी भी बड़ा है तो बंदर ने फिर क्या किया अच्छा उसमें से भी मैं थोड़ा सा काट के खा जाता हूं ऐसा दोनों के बीच में दोनों झगड़ते रही और बंदर पूरी रोटी खा गया तो ऐसा यह ब्रिटिश लोगों का था कि जहां पे भी वह डिवीजन देखेंगे जहां पे भी वह देखेंगे कि भाई भाई में आपस में अमत है आपस में नहीं बन रहा है वहां पर पहले भाई को जाकर बोलेंगे कि मैं तुमको मदद करता हूं सहाय करता हूं तुम जाकर दूसरे के साथ में झगड़ा करो फिर दूसरे को भी जाकर के बोलेंगे कि तुम पहले वाले के साथ में झगड़ो मैं तुमको भी सहाई करता हूं दोनों को झगड़ा देंगे दोनों जब आप थक जाएंगे लड़ते-लड़ते बहुत ज्यादा लोगों की मृत्यु हो जाएगी तब कहीं जाकर के दोनों के ऊपर में कब्जा करके बैठ जाएंगे यह कह के कि मैं तुम दोनों को न्याय देता हूं अ मेरा हिस्सा दे दो पहले फिर बाकी का जितना बचा आपस में बांट लो ऐसा करके ब्रिटिश लोग राज करते थे तो स्वामी जी ने कहा कि धर्म में हमारी उदारता सनातन काल से जैसी है वैसी ही चली आई है किंतु सामाजिक परिस्थिति भारत में देखिए कि बहुत ही ज्यादा रिस्ट्रिक्टेड हो गई है बहुत ही ज्यादा फेनेटिक हो गई है ऑर्थोडॉक्स हो गई है इसके कंपेयर में आप विदेश में जाकर देखिए स्वामी जी खुद जब वहां पर गए थे तो स्वामी जी ने देखा कि वहां पर सामाजिक उदारता कितनी है स्वामी जी ने लिखा है एक पत्र में अमेरिका इज द हेवन ऑफ वीमेन एंड द मासस अर्थात कि अमेरिका स्त्रियों के लिए और जनसाधारण के लिए स्वर्ग है इतना कि जहां पर वह स्वामी जी एक सुंदर वर्णन करते हैं ना कि आयरलैंड से एक एक व्यक्ति एक आदमी अमेरिका आया अभी आयरलैंड एक ऐसी जगह है जहां पर कि ब्रिटिश लोगों का वहां पे भी राज था निवेदिता जैसे कि आयरिश थी तो निवेदिता का ब्रिटिश लोगों के ऊपर में एक मने गुस्सा का कारण यह भी था कि वो आयरलैंड के ऊपर में भी ये आयरलैंड है स्कॉटलैंड है वगैरह वगैरह जो लंडन ने इनके ऊपर में भी ब्रिटेन ने हमला किया था और उनकी प्रजा का शमन किया था और वैसे भी वहां पर बहुत सारे जमींदार थे फिर राजा थे तो वैसे ही जनसाधारण का शोषण किया करते थे यूरोप की हालत थोड़ी बहुत भारत से मिलती आती थी तो किंतु स्वामी जी कहते हैं आयरलैंड से एक आदमी अमेरिका में पैर रखता है जहाज में से उतर करके पैर रखता है अमेरिका की भूमि पर अभी यहां अभी जब वह सर्वप्रथम पैर रखता है तो उसकी कमर झुकी हुई है आंखें निस्तेज है सबसे डर के डर के रहता है किंतु अमेरिका की हवा में जो फ्रीडम है जो मुक्त मुक्त होने का जो संगीत सब समय मुक्ति का संगीत जो सब समय गूंज रहा है उसको उनके वहां की हवा लेकर के उसका कमर सीधी हो जाती है सीधा होकर के चलना शुरू करता है आंखों में चमक आ जाती है आवाज में तेज आ जाता है कार्य में शक्ति आ जाती है तो स्वामी जी कहते हैं कि जो भी जनसाधारण हो वह वहां पर अमेरिका में अपने जो राइट्स है अपने जो हक है उसके लिए वह बड़ा ही जागृत है और स्त्रियों को देखिए स्वामी जी कहते हैं कि जैसा सफेद बर्फ गिरता है उतनी ही धवल और उ उज्जवल यहां की स्त्रियां है इनका चरित्र भी इतना उज्जवल है और किसी भी जो कि समस्या में आए हुए व्यक्ति को मदद करने के लिए कितनी तत्पर रहती है जैसे कि स्वामी जी को ही मिसेस हेल ने अपने घर में बुला कर के पनाह दी वरना कभी आप सोच सकते हैं भारत में कि कोई फकीर रास्ते से जा रहा है उसको अपने घर में लाकर के बिठाया उनको खाने को दिया रहने को दिया खास करके जब उनके घर में चार जवान लड़कियां रह रही थी ऐसी परिथि स्थिति में तो देखिए कि और स्वामी जी यह भी कहते हैं जितने भी सामाजिक फंक्शन है जितने भी सामाजिक सोशल एक्टिविटीज है सभी चीजों में स्त्रियां ही सबसे आगे कदम कर रखती है क्योंकि पुरुष लोग तो पैसा कमाने में उसी चीजों में सब समय वह पूरे मग्न रहते हैं उसके बाहर आकर के उनके पास में समय ही नहीं रहता जो भी सामाजिक कार्य है जो भी सोशल एक्टिविटी है धर्म जो है उसमें सब स्त्रियां ही सबसे ज्यादा हिस्सा लेती है तो वह जो भारत और यह जो अमेरिका इन दोनों के किंतु धर्म के बारे में देखिए धर्म में क्रिश्चियनिटी ने पहले से ही एक ठीक करके रख दिया है यूरोप में जो पोप था उसका बड़ा वर्चस्व था और फिर यहां पे अमेरिका वगैरह में देखिए कि मिशनरी लोगों का बड़ा वर्चस्व है वह यह सब भोली महिलाओं को यह समझा पटा करके उनकी सहानुभूति का फायदा लेकर के कि य अफ्रीका में जाइए लोग किस तरह से जंगल में रहते हैं जंगली होकर के उनको सिविलाइज करना है उनको सभ्य बनाना है यह हमारा मिशन है बोलकर के महिलाओं से पैसा पढ़ाएंगे तो यह मिशनरी लोग हैं महिलाओं को पूरा समाज को पूरा रिस्ट्रिक्टेड करके रखा है तो स्वामी जी कहते हैं कि भारत की और अमेरिका की परिस्थिति में कंपेयर कीजिए कंट्रास्ट कीजिए हम लोग धर्म मत में उदार है किंतु सामाजिक बंधन में बंधे हुए हैं जबकि उनका है कि सामाजिक दृष्टि से बहुत ही उदार है कि तो उनका जो धर्म है वह बहुत ज्यादा रिस्ट्रिक्शन के भीतर में चर्च ने लाकर के रख दिया है तो यहां पर देखिए अच्छा भारत में यह जो धर्म समन्वय का जो सर्वप्रथम कार्य हुआ वह गीता में हुआ है गीता में देखिए कि सब तरह से द्वैत अद्वैत साकार निराकार सभी तरह की पूजा उपासना दर्शन शास्त्रों को स्थान दिया गया है योग सांख्य वेदांत सभी को तो यहां पर वही जो हमारी दार परंपरा है सर्व धर्म के मत जो है उसका समन्वय करने की किसी के प्रति तुच्छ नहीं रखने की हालांकि ठाकुर यह नहीं कहते कि सभी मार्ग समान है सभी मार्ग समान नहीं हो सकते जैसे वेदांत है उसका एक स्टैंडर्ड ही अलग है तो ठाकुर क्या कहते हैं पता है जद एक घर में मान लीजिए कि आप मुख्य दरवाजे से प्रवेश करते हैं और ऐसा मान लीजिए कि एक दरवाजा है जो कि एक रास्ता है जो कि मुख्य दरवाजे से आप आपको घर के भीतर में ले जाएगा और दूसरा दरवाजा है जहां पर लेटन होगा टॉयलेट होगा उस जगह से आपको घर के भीतर में ले आएगा यानी कि मुख्य दरवाजे से आप घर के भीतर में प्रवेश करेंगे तो आपको बड़ा अच्छा लगेगा क्योंकि उस दरवाजे को बड़ा सुंदर सजा के रखा हुआ होता है वगैरह व होता है और जो पीछे से आने वाला दरवाजा है घर के भीतर में प्रवेश करने का वो इतना सुंदर स्वच्छ शायद नहीं होगा तो दरवाजे किंतु दोनों आपको घर के भीतर में ले जाएंगे बस वही बात है कि कोई दरवाजा जो है हमारे मन को ज्यादा अनुकूल होता है और कोई दरवाजा से जाने का रास्ता हमारे लिए शायद प्रतिकूल हो सकता है तो यह अनुकूलता और प्रतिकूलता के अनुसार हमको अपना अपना रास्ता खोजना है किंतु ये जो समन्वय है वो समन्वय ठाकुर ने देखिए कि एक ही सेंटेंस में कितने सुंदर रूप से किया है ज्ञानी जिन लोगों को ज्ञानी जिनको ब्रह्म कहते हैं योगी जिनको आत्मा कहते हैं और भक्त जिनको भगवान कहते हैं यह एक ही है हालांकि यह एक शब्द ठाकुर ने नहीं यूज किया है यह मैं कह रहा हूं इसकी पहले वाली जो बात थी कि भक्त का हृदय जो भगवान का बैठक खाना है तो भगवान की डेफिनेशन भगवान का डिस्क्रिप्शन ठाकुर इस तरह से दे रहे हैं भगवान कौन तो वही भगवान जिनको कि ज्ञानी ब्रह्म कहते हैं योगी जिनको की आत्मा कहते हैं और भक्त जिनको भगवान या ईश्वर कहते हैं वही भक्त के हृदय में विराजमान है एक ही ब्राह्मण ठाकुर आगे कहते हैं एक ही ब्राह्मण है जोखन पूजा करे तार नाम पुजारी वह ब्राह्मण एक ही है किंतु जब वह पूजा करता है तो उनको हम पुजारी कहते हैं उसके रोल के अनुसार उसके कार्य के अनुसार जखन राधे तख राधुनि बामुन जब वह खाना बनाता है तब उसको राधुनि बामुन बामुन अर्थात कि ब्राह्मण राधुनि अर्थात की जो राता है जो खाना बनाता है यह बंगाली शब्द है जो ब्राह्मण जब खाना बनाता है उसको हम इंग्लिश में कहेंगे कुक जे ज्ञानी ज्ञान योग धर अच्छा तो ठाकुर ने किस कितना सुंदर एकदम एक ही लाइन के उदाहरण में स्पष्ट रूप से बताया ब्राह्मण एक ही है जब वह पूजा करता है तो पुजारी कहते हैं खाना बनाता है तब वह खाना बनाने वाला ब्राह्मण कहते हैं रांद दुनी ब्राह्मण अर्थात खाना बनाने वाला ब्राह्मण या तो फिर कहेंगे कुक तो एक ही सेंटेंस में इतना सुंदर वर्णन जे ज्ञानी ज्ञान योग धर छ से नेती नेती ए विचार कोरे जो ज्ञानी है जो ज्ञान योग से ईश्वर को प्राप्त करना चाहता है वह नेति नेति विचार करता है ब्र नोए ओ नोए जीव नोए जगत नय ब्रह्मा यह नहीं है वो नहीं है जीव नहीं है जगत नहीं है इन सबके परे स्पेस और टाइम के भी परे इस विश्व ब्रह्मांड से कॉस्मस इससे भी परे जो है उसी को हम ब्रह्मण कहते हैं ब्रह्म कहते हैं विचार करते करते जखन मन स्थिर होए मनेर लय होय समाध होए तखन ब्रह्म ज्ञान मैं जब विचार करता हूं आंख बंद करके बैठता हूं तो सब तरह की कल्पनाएं सब तरह के विचार सब तरह की इच्छाएं मेरे मन में उद्भव होती रहती है किसी ने मुझे अब मेरा अपमान कर दिया किसी के साथ में मेरा झगड़ा हो गया मुझे कोई पार्टिकुलर चीज खाने की कोई खास एक वानगी खाने की बहुत इच्छा हो गई है कोई किताब पढ़ने की बड़ी इच्छा हो गई है किसी को मूवी देखने की इच्छा होती है मुझे वह घूमने के लिए जाना है किसी के साथ बात करना है ये दुनिया भर के विचार मेरे मन में चलते ही रहेंगे चलते ही रहेंगे मैं विचार मार्ग का आश्रय लेकर के ज्ञान योग का आश्रय लेकर के एक के बाद एक सभी विचारों को काटता रहूंगा कहूंगा कि यह रसगुल्ला खाने की इच्छा जो मेरे मन में प्रकट हुई है यह इच्छा भी मैं नहीं हूं यह इच्छा के साथ में मेरा कोई संपर्क नहीं है यह जगह पे जाने की मेरी प्रवास करने की मैं जब राजकोट से आ रहा था तो बहुत सारे साधु लोग मिलकर के अमरनाथ जा रहे थे तो जदी मेरे मन में इच्छा हो गई कि बस अभी बैठ कर के जब ध्यान करने की बजाय मुझे भी अमरनाथ जाना है हालांकि तीर्थ दर्शन करना बड़ा अच्छा है मैं तो सिर्फ एक उदाहरण के रूप में कह रहा हूं अभी रिसेंट उदाहरण है तो याद आ गया कि अमरनाथ जाने की इच्छा जिसके मन में उद्भव हुई है वह मैं नहीं हूं वह सिर्फ एक माया से बना हुआ जीव मात्र है जिसका जन्म है मृत्यु है जरा है व्याधि है जिसको कि एंटरटेनमेंट चाहिए जिसको कि सुख उपभोग चाहिए किंतु मैं वो नहीं हूं जरा मृत्यु जन्म मृत्यु जन्म मृत्यु जरा व्याधि एंटरटेनमेंट ना कि झगड़ा न कि यह सबसे परे जो आत्म है वह मेरा सही स्वभाव है यदि मेरे मन में वह बात उत्पन्न होती है कि अरे उसके साथ में मेरा झगड़ा हो गया उसको तो मैं यह कर दूंगा वह कर दूंगा ऐसा एक जो रिवेंज लेने का भाव आता है वह भी मेरे मन में नहीं आ रहा जिसके मन में आ रहा है वह तो सिर्फ एक माया से बनी हुई पुतली का मात्र है मैं ही तो उसका संचार करता हूं वह कहीं मुझे नहीं चलाती वो गुजरात में दारू बंधी के वो जो पोस्टर लगे होते हैं बड़े-बड़े तो उसमें बड़ा एक सुंदर एक स्लोगन लिखा होता है पहले तो आप बोतल को पीते हैं बोतल अर्थात की दारू का बोतल और शराब का बोतल तो पहले तो आप बोतल को पीते हैं बाद में बोतल आपको पीती है अर्थात कि पहले तो आप बोतल में से शराब को पिएंगे बाद में यह शराब आप आपको खा जाएगा आपका तहस नहस कर देगा आपको तो बड़ा सुंदर स्लोगन है तो ये माया भी ऐसा है उनको यह माया हमको कैसे कंट्रोल करेगी मैं तो माया पति हूं माया का अधिपति हूं मैं तो माया के ऊपर में मेरा राजत्व होना चाहिए नहीं कि मैं माया के वश में होना चाहूं तो यह चिंतन करना कि जो माया से बनी हुई मूर्ति है उसको तो यह सब सुख उपभोग झगड़ा यह सब करना है मुझे नहीं करना उसके साथ में मेरा कोई भी संपर्क नहीं है वो सिर्फ एक और एक मात्र आभास मात्र है मरीच जिसको कि कहते हैं मिराज रण प्रदेश में जाएंगे तो आपको ऐसा लगेगा कि बस प्यास से आपकी छाती फट रही है ऐसा लगेगा कि बस अभी मैं मर जाऊंगा धूप में और प्यास में तभी आपको एकाएक दिखेगा कि सुंदर वो नारी केल के वृक्ष है वो कोकोनट ट्रीज है पाम ट्रीज है बड़े सुंदर और उसके नीचे में सुंदर सा एक तालाब है तो आप दौड़े-दौड़े जाएंगे तालाब में डुबकी मारेंगे और यह जो कोकोनट ट्री है है उसके ऊपर में से कोकोनट निकाल के खाएंगे उसको क्यों तो जितना दौड़ेंगे जितना दौड़ेंगे उतना आप थकते जाएंगे और इतनी ही प्यास बढ़ती जाएगी देखिए कि ये कैसा एक विचित्र माया है माया एक ऐसी चीज है कि आपको सच्ची मने लिटरली आपको मृत्यु के मुख में डालेगी जो लोग यह जो शराब की जिसको हैबिट हो गई है पीने की स्मोकिंग की हैबिट हो गई है इसको हैबिट को आप छुड़ाने का प्रयास करें ना वे लोग बड़े वायलेंट हो जाते हैं बहुत पहले मैंने एक दो वीडियो ऐसे देखे थे जिनको अमेरिका के थे कि ड्रग्स की जिसको हैबिट हो गई है उसको कि रिहैबिलिटेशन सेंटर में लेकर जाते हैं और वहां पे पेडे एक जेल का कमरा जैसा होता है पेडे अर्थात कि दीवाल है जमीन है छत है उसके ऊपर में बड़े-बड़े गद्दे बिछा देते हैं उसके बाद में उस कमरे में जो ड्रग्स का वो जो यह है उसको उसको वो पुर देते हैं उसको उसके भीतर में बंद कर देते हैं बंदी बना देते हैं अभी जैसे ही ड्रग्स लेने की वासना उसके सर पर सवार होती है तो वह अपने को रोक नहीं पाता फिर वह क्या करेगा जोर-जोर से जमीन के ऊपर में दीवाल के ऊपर में अपना सर पटके क्योंकि वो जो ये है उसकी जो एडिक्शन की जो लत है इतनी पावरफुल हो गई है कि यदि वो ड्रग्स उसको मिलेगी नहीं तो पागल हो जाएगा तो ऐसा कितने दिनों तक चलेगा दीवाल के ऊपर में सर पटके का जमीन के ऊपर में सर पटके का क्योंकि सहन नहीं कर पा रहा है इसीलिए वो उसके ऊपर में गद्दा बिछा देते हैं जिसके कि उसको ज्यादा हानि ना हो कुछ महीने ऐसे जाएंगे तो धीरे-धीरे करके ये एडिक्शन का जोर जो है यह लत का जो प्रभाव है वह कम होगा और फिर उसको यह लोग कमरे में से बाहर निकालेंगे और सामान्य उसको कार्य करने देंगे तो यह माया ऐसी है कि ऐसा आप एडिक्शन आपको लगा देती है कि एडिक्शन फिर यह चक्रवृद्धि ब्याज की तरह बढ़ता रहेगा बढ़ता रहेगा आपको पूरा आपका गला दबा करके आपका पूरा रस निकाल लेगा पूरा जो जीवन है उसको यह खत्म कर देगा तो जैसे कि मरुभूमि में डेजर्ट में आप जैसा जितना दौड़ेंगे उतना थक जाएंगे यदि मान लीजिए कि यदि आपको ये मिराज या तो ये माया जाल नहीं दिखी होती कि हां ये तालाब है उसके ऊपर में ये कोकोनट के वृक्ष है ये यदि आपको नहीं दिखे होते तो आप थक गए हैं प्यास के मारे परेशान हो गए किंतु धीरे-धीरे अपने गंतव्य स्थान की ओर अपने जहां पर आपको जाना है आपका डेस्टिनेशन जो है धीरे-धीरे आप चलते जाएंगे और हो सकता है आप पहुंच भी जाए किंतु माया जो है वह माया आपको भ्रमित करके बिल्कुल उल्टे रास्ते पर ले जाएगी आपका यह रास्ता है आपको मरुभूमि में से डेजर्ट में से जाना है आपको जो गाइड होगा आपका उसने बता दिया होगा कि इस रास्ते से धीरे-धीरे चलते जाइए आप आराम से दूसरे शहर तक पहुंच जाएंगे किंतु प्यास से जो भीतर में जो तृष्णा उत्पन्न होती है बुद्धिज्म में बौद्ध धर्म में वासना को कहते हैं तृष्णा तृष्णा अर्थात कि एक भोग का भोग पिपासा भोग का पान करने की इच्छा इसको कहते हैं तृष्णा तो यहां पर लिटरली आपकी जो तृष्णा है पानी पीने की वह इतनी स्ट्रांग हो जाती है कि आप दूसरी ही डायरेक्शन में आपको तालाब दिखा तो वहां पर आप दौड़ेंगे दौड़ेंगे पहले तो आपने अपना असली रास्ता भूल गए दूसरा कि आप उतना दौड़ेंगे उतना थक उतना ही प्यास बढ़ती जाएगी आखिर में आप थक कर के एक जगह पर लेट जाएंगे और फिर यह जो दिन के दौरान भयानक गर्म और डेजर्ट में रात के दौरान भयानक ठंडी पड़ती है तो यह भयानक गर्म और भयानक ठंड मिलकर के कुछ ही दिनों में आपका मृत्यु लेकर के आएंगे तो कहां आप सही रास्ते से जा रहे थे भले ही प्यास लगी है थोड़ा सा सहन कर लेते तो अपने गंतव्य स्थान तक पहुंच जाते हैं तो यह संसार यह जो भवसागर जो है इसमें यदि हमको भगवान एक बार कह देते हैं सदगुरु आपको एक बार रास्ता दिखा देते हैं एक छोटी सी नौका में बैठो व जो सामने की ओर किनारा है जाओ वहां पर धीरे-धीरे करके चलते जाना आखिर में पहुंच जाओगे तो हम जा रहे हैं नौका में से धीरे-धीरे एकाएक हमने देखा कि समुंदर में एक बड़ा ही सुंदर दृश्य वहां पे सब खाने पीने की चीजें मेला लगा है लोग हंसी खुश सी आनंद मना रहे हैं उसको देख कर के ही मुझे लगा कि अरे नहीं देखो तो इसका भी थोड़ा सा आनंद लिया जाए दूसरा हमने किनारे की ओर तो बाद में भी जाना जाए जाया जाएगा तो जैसे ही वह सुंदर दृश्य की ओर मैं आगे जाऊंगा पता चलेगा कि वह दृश्य जो था वो तो सिर्फ एक माया जाल थी वहां पर एक राक्षस रहता है एक बड़ा ही बड़ा उसने वमन तैयार किया है वण अर्थात कि जमीन पानी में जो वल पूल खड़ा होता है पानी जोर जोर से घूमता है जि सिंक में आपने बहुत सारा पानी भर के वो सिंक का वो जो छोटा सा जो पानी जाने का रास्ता बंद कर दिया होगा और फिर वो खोल दिया होगा तो कैसा वो पानी गोल गोल गोल घूमते घूमते वो भीतर में से चला जाता है ड्रेन हो जाता है तो वैसे ही समंदर में इस तरह के लपल होते हैं ये लपल रूपी एक राक्षस आपकी राह देख कर के बैठा है अपने ऊपर में इस तरह से एक माया जाल खड़ी करके उस माया के मोह में आप जैसे ही उसके पास में आ गए वैसे ही इस चक्रवात के भीतर में फंस गए और राक्षस जो है आपको खा जाएगा तो यह है माया का स्वरूप तो ठाकुर कहते हैं कि विचार करके करके यह सब कुछ यह वासना और वासना को प्राप्त करने की इच्छा करने वाला यह मेरा जो छोटा सा अहम है यह दोनों मैं नहीं हूं मैं जो हूं इन सबसे परे अनंत अमर अजर आत्मन हूं यह चिंत करते करते जब यह सब वासना एं ये जो मैंने मरुभूमि में एक बार हमने ठीक कर लिया कि भले ही चाहे मुझे वह तालाब दिखता हो भले ही चाहे वो मुझे कोकोनट के ट्री दिखते हो ये जो इस भव समुंदर में हम जा रहे हैं तो भले ही बड़ा ही सुंदर दृश्य दिखता हो मुझे पता है कि वहां पर जाकर के मृत्यु छोड़ कर के और कुछ मिलने वाला नहीं अभी कुछ दिनों पहले मैंने पढ़ा था कहां पढ़ा मैं भूल गया कि रसगुल्ला खाते हैं तो रसगुल्ले का टेस्ट या तो स्वाद कहां तक जब तक आपकी जिब पर है वहीं तक तो व जिब के ऊपर में रसगुल्ला कितनी देर रहेगा ज्यादा से ज्यादा दो मिनट रहेगा ज्यादा से ज्यादा एक या दो या तीन मिनट रहेंगे जब वह गले के नीचे चला जाएगा तो रसगुल्ले का टेस्ट वगैरह तो कुछ होना नहीं है भीतर में जाकर के तो वह सब जो डाइजेस्टिव एंजाइम है उसके साथ में मिक्स हो जाने वाला है तो वो जो दो-तीन मिनट का जो आनंद है उसके लिए जो हम खा अभी जिसको डायबिटीज है उसकी बात कर र हूं सभी के लिए नहीं तो जिसको कि डायबिटीज है वो प्रलोभन से रसगुल्ला तो खा लिया किंतु भीतर में जाकर के शुगर बढ़ा देगा तब उसको और परेशानी दो-तीन मिनट के आनंद के लिए तो यह सब जो है सब मिथ्या है मैं सबका त्याग करता हूं नेति नेती नेती न इति न इति न इति यह भी नहीं यह भी नहीं यह भी नहीं करके जब समग्र त्याग करता हूं तो फिर जो रह जाएगा वह है मेरा असली स्वरूप मैं मुझे जो खंडहर है पुरानी जगह है वह सब देखने को मुझे बड़ा अच्छा लगता है क्योंकि क्या है पता है वहां पर कुछ भी तरह की एक्टिविटी नहीं हो रही मैं जब सन्यास के पहले 2015 में मेरा सन्यास हुआ तो इससे पहले मैं ओमकारेश्वर गया था और ओमकारेश्वर तकरीबन तीन महीना रुका था मैं बहुत काम करके करके थोड़ा सा यह हो गया था बड़ा रजस बढ़ गया था तो मैंने सोचा कि संन्यास के लिए जाने से पहले थोड़ा सा बिल्कुल काम किए बिना एकदम एकांत में मन को शांत रख के थोड़ा सा पढ़ाई करके ऐसा बिताते हैं जब ध्यान करने की कैपेसिटी किसमें इतनी होती है किंतु क्या कथामृत वगैरह कुछ किताबें लेकर गया था तो किताबें पढ़ूंगा थोड़ा सा अकेले-अकेले थोड़ा सा भ्रमण करूंगा ऐसा सोच के मैं ओमकारेश्वर गया था तो ओमकारेश्वर में वहां पे एक महाराज जी थे और वो महाराज वहीं पे रहते थे अभी भी रहते हैं तो वह क्या करते हैं करते थे कि जो भी हमारे मेरे जैसे जितने भी गेस्ट साधु वहां पर आए हैं उन सबको लेकर के एक के बाद एक ओमकारेश्वर तो अपना सनातन धर्म का एक बहुत बड़ा तीर्थ स्थान है एक के बाद एक मंदिर एक के बाद एक आश्रम एक के बाद एक साधु महात्मा वहां पर जो तपस्या कर रहे हैं उनकी मुलाकात के लिए दर्शन के लिए लेकर जाते थे सुबह को हम सब लोग ब्रेकफास्ट करके निकल जाते थे उस समय मैं मेरे जैसे चार पांच और भी गेस्ट स्वामी जी वहां पर रह रहे थे साधु रह रहे थे और यह वहां के जो लोकल महाराज है सब लोग दोपर सुबह को ब्रेकफास्ट करके निकलते थे और एक के बाद पैदल चलते चलते बड़ी सुंदर जगह है पैदल चलते चलते एक आश्रम गए फिर वहां पर दो नमो नारायण बोलकर के बैठ जाना है आपके लिए भोजन की व्यवस्था हो जाएगी सनातन भूमि पर पुण्य भूमि पर भारत की इस भूमि पे साधु को खाने पीने और रहने की चिंता कभी नहीं करनी ये ठाकुर ने ईश्वर ने सभी साधुओं को आशीर्वाद दे कर के रखा है तो जो भी आश्रम आया वो चलो नमो नारायण बोल कर के बैठ जाते थे आहार की भी व्यवस्था हो जाती थी दोपहर के विश्राम की भी व्यवस्था हो जाती थी उसके बाद में यह लोग बढ़िया सा गाय के दूध की चाय पिलाते थे फिर हमको छोड़ते थे तो हमको भी इस तरह की मेहमान गति लेने में कोई आपत्ति नहीं थी ऐसे ही एक के बाद एक इतने तीन महीने में रहा तो पहले तो कुछ समय में सभी के साथ में घूमता था फिर मैंने ठीक किया कि नहीं अभी थोड़ा सा सब जगह बहुत अच्छे से देख ली है एक दो एक महीना सबके साथ में भ्रमण करके अभी मैं अपने अकेले जाऊंगा थोड़ा सा भ्रमण करूंगा तो जहां पे भी कोई नहीं है खंडहर है ऐसे पुराने मंदिर है जो कि भग्न प्राय है टूटे हुए हैं जिसका कोई जतन नहीं रखता वहां पे यह जो सब वृक्ष लताए बढ़ गई है धूल मिट्टी पड़ी हुई है ऐसी सब जगहों प जाकर के बैठना मुझे बड़ा अच्छा लगता था क्योंकि जहां पर लोग रहते हैं वहां पर कुछ ना कुछ प्रवृत्ति हमेशा चलती ही रहेगी किंतु खंडहर है भना वशेयर हुई जगाएं हैं मंदिर है या आश्रम है या नदी का एकांत किनारा है जहां पर कोई नहीं होता वहां पर किसी तरह की प्रवृत्ति नहीं होती और प्रवृत्ति नहीं होती वहां पर होती है निवृत्ति तो ये निवृत्ति मार्ग का आनंद लेने के लिए निवृत्ति का आनंद लेने के लिए मैंने कुछ खंडहर है ऐसे खोज के रखे थे तो मैं जाकर के वहां पर बैठ जाता था टूटे हुए पगति ये थे स्टेप्स थे वहां पर टूटा हुआ यह जो दालान जैसा था जिसको कि हम यह वरांडा कहते हैं वगैरह और फिर मंदिर के भीतर में मूर्ति नहीं है किंतु यह सब लताए वगैरह चारों ओर वो फैली हुई है तो वहां पर जाकर बैठ जाता था सामने पवित्र नर्मदा नदी का नदी बहती रहती थी तो ऐसी कुछ कुछ जगह खोज करके रख ली थी मैंने तो इतना वहां पर शांत और सुकून मिलता था तो यह जो निवृत्ति मार्ग है यह नेति नेति नेति न इति न इति न इति यह है निवृत्ति मार्ग तो यह निवृत्ति मार्ग का आश्रय लेकर के हम जो बाकी सभी विचार शांत हो जाएंगे तब जो रहेगा वह रहेगा ब्रह्म भाव तो इसी को को ठाकुर ज्ञान योग के बारे में ज्ञान योग की व्याख्या ठाकुर इस तरह से करते हैं कि मैं कौन हूं यह नहीं हूं वो नहीं हूं जीव नहीं हूं जगत नहीं हूं विचार करते-करते जब मन स्थिर हो जाता है मन का लय हो जाता है समाधि हो जाती है तब ब्रह्म ज्ञान होता है ब्रह्मज्ञानी ठीक धारणा ब्रह्म सतो जगत मिथ्या ब्रह्मज्ञानी की ठीक धारणा है ब्रह्मज्ञानी को ठीक-ठीक पता है कि ब्रह्म सत्य है जगत मिथ्या है यदि आप मरुभूमि में से जा रहे हैं तो जो तालाब दिख रहा है जो नारियल के जो वृक्ष दिख रहे हैं वह मिथ्या है यदि भवसागर पार कर रहे हैं तो वह जो सुंदर दृश्य दिखाई देगा वह दृश्य नहीं है वहां पर तो लपल है वहां पर वमन है और वहां पर एक राक्षस मेरी राह देख रहा है मुझे खा जाने के लिए तो ये जब ठीक ठीक हमको धारणा होती है तब हमको ब्रह्म ज्ञान होता है नाम रूप ए सबब स्वप्नवउम जितने भी दर्शन शास्त्र है जितनी भी पोएट्री है जितने भी पुराण है जितने भी जितना भी साहित्य है विज्ञान है जो कुछ भी है मुह से बोला गया है तो झूठा हो गया है ब्रह्म ज्ञान झूठा नहीं हुआ क्योंकि ब्रह्म क्या है उसका स्वरूप का वर्णन आप अपने मुह से नहीं कर सकते तीनी जे व्यक्ति ताओ बोलबार जोनाई वह कृष्ण है ना कि राम है यह भी नहीं कह सकते ब्रह्म को व्यक्ति विशेष है ऐसा भी नहीं कह सकते हैं ब्रह्म क्या है तो जो सब कुछ नहीं है वह आखिर में ब्रह्मण है जो कुछ भी दिख रहा है जो कुछ भी हम सुन रहे हैं जिस चीज को हम स्पर्श कर रहे हैं जिस चीज का हम आस्वादन कर रहे हैं यह जो पंच कर्मेंद्रिय और पंच ज्ञानेंद्रिय से जिस चीज की हम धारणा करते हैं वह नहीं है इससे परे जो है वह है ब्राह्मण तो आज यही तक कल फिर से मु ओम शांति शांति शांति हरि ओम श राम कृष् वो जो वर्ल्ड फेमस एग्जांपल है ना स्वामी जी का रास्ते से जा रहा है एक आदमी बैठ कर के वो हुक्का पी रहा है तो स्वामी जी को बड़ी इच्छा हो गई चिलम लम चिलम जिसको कहते हैं तो चिलम फूक रहा है तो स्वामी जी उसके साथ में बैठ गया अरे भाई मुझे भी थोड़ा दो तो बड़ा संकुचित हो गया बोला कि आप साधु है मैं नीची जात का हूं तो स्वामी जी बोलते अच्छा ठीक है ठीक है फिर आगे चलने लगे थोड़ा आगे जाकर बोलते अरे मेरे में ही जद इतना यह जो संस्कार है ऊंच जात नीच जात मेरे में ही जद इतना गहनता से इतने डीप डूबा हुआ है तो आम लोगों की क्या बात फिर जाकर के उसके साथ में बैठ गए जोर जबरदस्ती वो चिलम ख छींच करके उसको फूंका व जो तुर आनंद जी बार-बार कहते थे कि मरबे उड़वे छाई तबे साधुर गुण गाई माने साधु जब मरेगा और उसकी ता चीता जला कर के उसकी राख जब उड़ेगी तब साधु के गुणगान करेंगे उससे पहले नहीं और दूसरा कि ये जो आप कहते हैं ना कि फॉल फ्रॉम द ग्रास ग्रेस कि इतने सुंदर प्रवचन देते हैं किंतु उनके खुद के कार्यकलाप देखो तो हमको फिर ऐसा लगेगा कि ऐसा आदमी ऐसी बातें करता है तो क्या है ना ये भी सनातन परंपरा है भगवान कृष्ण भी कहते थे कि जो मैं कहता हूं व करो जो मैं करता हूं ऐसा मत करो वरना फस जाओगे एक्चुअली क्या है देखिए इसके मने हम लोग इसको थोड़ा सा यदि सीरियसली स्टडी करें किसी की निंदा नहीं करके यह एक सीरियस मामला है क्या है कि कर्म का जो प्रवाह है ना हमको कब किस रास्ते से ले जाएगा हमको समझ में नहीं आ रहा है कि आखिरी समय आ गया है मान लीजिए कि इस तरह से सुंदर चिंतन करके मनन करके प्रवचन चचन दे कर के तो जो आखिरी आखिरी कामना वासना हैं ना वह भी भगवान हमसे वह वर्कआउट करवा लेते हैं जिससे कि फिर से ना आना पड़े इसका सबसे बड़ा उदाहरण है हमारे खुद के राजा महाराज स्वामी ब्रह्मानंद तो ठाकुर के पास आते थे हालांकि विवाहित थे किंतु ठाकुर के पास आकर के सन्यासी की तरह ही रहते थे किंतु ठाकुर को ही पता था कि इसके मन में ना थोड़ा सा एक बाकी रह गया है कामना का बीच इसको यदि वर्कआउट नहीं करेंगे ना तो जद यहां पर आएगा तो शायद भविष्य में कुछ प्रॉब्लम हो सकता है तो ठाकुर ने ही उनको उनकी पत्नी के पास में भेज दिया उनको एक संतान भी हुआ संतान संतान का नाम था फिर राहुल और फिर वो संतान हुआ फिर वह ठाकुर के पास में वापस आए और राहुल का भी बड़ा ट्रैजिक स्टोरी है राजा महाराज उनकी पत्नी की और लड़के की दोनों की बड़ी ट्रैजिक स्टोरी है राजा महाराज जब वृंदावन में कुसुम सरोवर के किनारे बैठ कर के तपस्या कर रहे थे उस समय उस समय ना कि उसी कुछ समय में जबकि राजा महाराज इसी तरह से भ्रमण कर रहे थे प्रव्रज्या कर रहे थे ठाकुर की महासमाधि के बाद में और स्वामी जी के अमेरिका से लौटने के पहले वो जो पूरा तपस्या का जो पीरियड था तो उस समय राजा महाराज की पत्नी का नाम था विश्वेश्वरी तो विश्वेश्वरी को एकाएक एक दिन रात को सपना आया कि राजा महाराज की मृत्यु हो गई है अभी उसने भी बड़ा तपस्या मय जीवन जिया था जिस दिन राजा महाराज ने सन्यास ग्रहण किया और कह दिया कि तुम्हारे साथ में अभी मेरा कोई भी संपर्क नहीं है विश्वेश्वरी भी बिल्कुल साध्वी तपस्वी की तरह बिस्तर पर सोना बंद करके जमीन पर सोती थी और खाने पीने में आहार व्यवहार सभी में बड़ा ही संयम का पालन करती थी बड़ी तपस्या करती थी वह भी और जिस दिन उस रात को सपना आया कि राजा महाराज का देहांत हो गया है दूसरे ही दिन उसने आत्महत्या कर ली अभी यह तो उसके साथ में हुआ राहुल जो था राहुल जो बड़ा हुआ थोड़ा सा व सो लड़के जैसा ही था सात आ साल का शायद होगा वरा नगर मठ में जाता था और सभी लोग उसको बड़ा ही प्रेम करते थे राजा महाराज तो चले गए थे किंतु निरंजन महाराज है वगैरा है तो उसको बड़ा प्रेम करते थे एक दिन किंतु क्या है ना कि बिना पिता और बिना मां का बच्चा है अनाथ बच्चा है अभी दूसरों के घर में ब बड़ा हो रहा है तो लोगों तो उसको नेगलेक्ट करेंगे तो जब वरा नगर मठ में आता था तो गुरु भाइयों को बड़ी दया आती थी कि ये तो राजा का लड़का है मैंने हमारे खुद के राजा महाराज का किंतु बेचारे को देखो सभी लोग नेगलेक्ट करते हैं उसको मने अवहेलना करते हैं तो जो भी है यह लोग उसको थोड़ा अच्छे से जतन करते थे एक दिन यह खेल रहा था एकाएक गिर गया और जमीन के ऊपर में पत्थर था तो पत्थर उसको छाती में लगा तो उससे जो चेस्ट में जो कॉम्प्लिकेशन स्टार्ट हुआ हृदय में जो आघात हुआ तो अभी ट्रीटमेंट भी चल रही है नहीं चल रही ऐसा ही छोटा सा लड़का है बिल्कुल बेचारा सा आठ पाछ साल का ही होगा तो खुद तो कुछ कर नहीं पाएगा दूसरे लोग भी कुछ नहीं करेंगे उसके लिए तो ऐसा ही निगले निगले में ही उसका भी मृत्यु हो गया तो राजा महाराज शायद उस समय वापस आ गए थे जब उसका मृत्यु हुआ था कॉम्प्लिकेशंस चले थे काफी समय चले थे और बाद में उसका मृत्यु हुआ तो राजा महाराज उसके मृत्यु के समय घर भी गए थे बड़ा दुख भी हुआ था किंतु चलिए कि आखिरी आखिरी माया कट गई तो यह जो साधक है मां का एक सेवक था बड़ा ही निष्ठा से मां की सेवा करता था बाद बाद में उसका भी इसी तरह अध पतन हुआ और बाकी सब साधु लोग हैं मां के पास जाकर के उसकी कटाक्ष कर रहे हैं उसकी निंदा कर रहे हैं तो मां पहले तो सुन लिया कि देखिए मां आपका सेवक था फिर भी कैसा वो गड्ढे में जाकर के गिरा कैसा ऐसा कैसे हो सकता है जगदंबा की स्वयं सेवा की आखिर में यह परिस्थिति तो शुरू शुरू में तो मां कुछ नहीं बोलती थी बाद में एक बार वो मां नाराज हो गई कहा कि जब मैं अकेली थी मने शुरू शुरू में ठाकुर की महासमाधि के बाद की बात जब मां जयरा कमार पुकुर में रहती थी या तो फिर बाद में जयराम बाटी रहती थी यह सब भक्तों का आगमन शरू नहीं हुआ था तब वही था जो कि मेरे साथ में रह कर के पूरे शरीर में यह राख लगा कर के यह जो बड़ी-बड़ी डिया जो भात की हांडी रखी है मां शारदा छोटी थी हमने मां की बायोग्राफी में पढ़ा ना कि जब छोटी थी और भात की हांडी रखी हुई है चूहे के ऊपर में तो उतार नहीं होती थी अपने पिताजी को बुलाती थी तो अभी भी मां भी वो हांडी तो बड़ी भारी होती है ना तो हांडी उतारने के लिए यह सब समय मेरे साथ में रहकर मुझे सब प्रत्येक कार्य में इसने सहाय कि है तब तुम लोग कहां थे तब तो इसी ने मेरी सेवा की है जगदंबा किसको किस रास्ते से आखिरी मुक्ति का मार्ग दिखाएगी हमको समझ में आना कठिन है इसलिए नो डाउट जिसके भीतर में बहुत स्ट्रांग वासना होती है यह लोग निंदा के पात्र तो है ही है कि लोगों को भ्रमित करके आखिर में पीछे छुपके छुपके अपनी सासना का यह पोषण करते हैं वह तो गलत ही है किंतु जो जेनन साधक है उसके साथ में भी यह भय रहता है कि कभी वो फिसल जाएगा किंतु आखिर में देखिए कि ईश्वर उसका जो आखिरी कर्म होगा आखिरी जन्म होगा वोह वर्कआउट करा करके फिर उसको ईश्वरीय मार्ग पर आगे ले जाएंगे माने गहना कर्मण गति ही जैसे गीता में कहा है समझना मुश्किल है कि किस रास्ते से हम ईश्वर के पास जाएंगे