मङ्गलाचरण
ओम [गाना गाने की आवाज़] स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूप अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णााय नमः श्री श्री रामकृष्ण कथामृत का पाठ कर रहे हैं। 16th दिसंबर 1883 मास्टर महाशय आए हैं दक्षिणेश्वर रिट्रीट के लिए। एक मुख आए हैं जनाई के। उनके साथ में ठाकुर का वार्तालाप हो रहा है। और ठाकुर कहते हैं कि किस तरह से ईश्वर और मनुष्य का संगम हो। ईश्वर और मन मनुष्य का हृदय मन ईश्वर के भीतर में किस तरह से समाहित हो तो इसके लिए जो चार मेथड ठाकुर ने बताई है कि एक तो रो-रो करके अश्रुवारी जब हम ईश्वर के लिए व्याकुल होकर रोएंगे तो जो अश्रुवारी गिरेगी उससे हमारा मन का मेल जो है वो धुल जाएगा। वह एक है। दूसरा है कि सहस्त्रार में शिव है उसके ऊपर में ध्यान करना है। तीसरा है ठाकुर ने कहा है कि हमेशा साधु संग की जरूरत है। और चौथा पावर ऑफ एटर्नी ईश्वर को देना है। इतना बात हमारा वार्तालाप ऑलरेडी हो चुका है। इसके बाद में मुख कहते हैं गीता वगैरह शास्त्र पढ़ना बहुत अच्छा है। तो जब ठाकुर यह बात सुनते हैं तो वह क्या कहते हैं कि सिर्फ पढ़ने से क्या होगा? किसी ने दूध के बारे में सुना है, किसी ने दूध देखा है। किंतु वे लोग हैं कुछ लोग अल्प लोग हैं जिन्होंने कि दूध खाया है। जब तक आप दूध खाएंगे नहीं तब तक आप हृष्ट पुष्ट कैसे होंगे? मुझे स्कूल के दिन याद है कि वह जो पिक्टोरियल बुक्स आती है ना फर्स्ट स्टैंडर्ड सेकंड स्टैंडर्ड में तो उसमें सब विभिन्न तरह की फूड आइटम के फोटोग्राफ्स रखे होते हैं। और फिर उसमें से कौन-कौन सा पोषक तत्व मिलता है। तो अब जैसे एप्पल का फोटो है। फिर उसमें से कौन से विटामिन मिलते हैं वो लिखा है। फिर यह बनाना का फोटो है। फिर उसमें से कैल्शियम मिलता है। तो दूध का फोटो है। दूध की बोतल का फोटो और उसमें लिखा है कि वह इसमें से कैल्शियम मिलेगा वगैरह वगैरह मिलेगा। तो इतने सुंदर वो फर्स्ट स्टैंडर्ड सेकंड स्टैंडर्ड की ये जो किताबें होती है स्कूल की तो उसमें इस तरह से इतना सुंदर फोटो देकर के वो लिखा हुआ है कि कौन से पोषक तत्व कौन से फूड में से मिलेंगे। तो अभी मान लीजिए इस तरह की आप हजार किताबें पढ़ ले स्कूल में जाकर के जब तक वो मध्यान भोजन में वो जो कुछ नहीं मिलने वाला है खाना तब तक आपको वो पोषक तत्व थोड़ी ना मिलने वाले हैं। जब तक आप एक्चुअली दूध नहीं पिएंगे तब तक वो किताब में जो लिखा है स्कूल की उसको पढ़कर के थोड़ी ना वो पोषक तत्व हमको मिलने वाले हैं। तो वैसे ही यहां पे भी ठाकुर कहते हैं दूध के बारे में पढ़कर के उसका फोटोग्राफ देख के ना कि या फिर उसमें जो लिखा है चार्ट दिया है इतने विटामिन और इतने मिनरल्स इतने ये जो नरिशिंग एलिमेंट्स हमको मिलते हैं पढ़कर के तो कुछ होने वाला नहीं दूध को पीना होगा तब कहीं जाकर के हमको पोषण मिलेगा। इसके बाद में जो ठाकुर स्टेटमेंट देते हैं उसके बारे में कल हम बात कर रहे थे। ठाकुर
ईश्वर के दर्शन किए जा सकते हैं और उनसे वार्तालाप भी कर सकते है
ने क्या कहा था? ईश्वर का दर्शन कर सकते हैं और उनके साथ में वार्तालाप भी कर सकते हैं। देखिए यह जो कांसेप्ट है कि ईश्वर हमको दर्शन भी देते हैं, वार्तालाप भी करते हैं, मनोवांछा भी पूर्ण करते हैं। जैसे कल ही हमने वह मां के जीवन में से रेफरेंस लेकर के कहा था कि अनाथनाथ यह ईश्वर जब हमारे पे क्राइसिस भीड़ आन पड़ती है। हमारे जीवन में जब समस्याएं आन पड़ती है तो क्या हम ईश्वर की आराधना करके ईश्वर के आशीर्वाद नहीं प्राप्त कर सकते हैं? क्या अवश्य कर सकते हैं? तो देखिए कि ईश्वर के यह जो स्वरूप है इसको कहते हैं एंथ्रोपोमॉर्फिज्म। यदि एक फिलॉसोफिकल टर्म यूज की जाए तो एंथ्रोपोमॉर्फिज्म का क्या अर्थ है? या किसी एक अब जैसे कि एक तो उदाहरण है हमारे माइथोलॉजी में ही आता है। ये जो नेचुरल फोर्सेस जो होती है उसको हम एंथ्रोपोमॉर्फिक क्वालिटी प्रदान करते हैं। जैसे कि बारिश है। तो अभी क्या है? बारिश तो अपने नियम के अनुसार आएगी जाएगी। बारिश को कौन कंट्रोल कर सकता है? तो यह जो क्लाइमेट साइंस है बारिश का वो कब यह जो प्रेशर बढ़ता है लो प्रेशर हो जाता है यह अर्लीनो इफेक्ट है ये ग्लोबल वार्मिंग है वगैरह-वगैरह बहुत सारे फैक्टर है जो कि बारिश को कंट्रोल करते हैं के और यह क्लाइमेट का साइंस तो कोई 100% पक्का साइंस नहीं है। आज हमारे पास में यह सुपर कंप्यूटर है जो कि क्लाइमेट को मॉडेलिंग करने के लिए हम यूज़ करते हैं। इसके बावजूद आप 100% प्रेडिक्ट नहीं कर पाएंगे कि इस समय इतना बारिश होगा। इस समय अर्थक्वेक आएगा। इस समय सुनामी आएगा। इस समय ये जो ज्वालामुखी का विस्फोट होगा। ये जो है नेचुरल फोर्सेस है। आज हम इतना एडवांस होने के बाद में भी इतने एडवांस कंप्यूटेशनल मॉडल्स होने के बावजूद हम लोग कोई 100% प्रेडिक्ट नहीं कर सकते हैं। आज देखिए दुनिया का सबसे एडवांस कंट्री अमेरिका। उसका सबसे एडवांस स्टेट कैलिफोर्निया। अभी कुछ महीनों पहले हमने देखा कि इस तरह से आग लगी है वहां पर कि कितने सारे घरों को जला दिया है। आए दिन अमेरिका में पढ़ते रहते हैं। यह हरीिकन आया वो हरिकन आया और इतना नुकसान पहुंचाया। तो दुनिया का सबसे एडवांस देश अमेरिका का यह हालत है। तो यह भारत है, बांग्लादेश है, ये अफगानिस्तान है। ये जो थर्ड वर्ल्ड कंट्री इनकी क्या हालत है? आपको समझ ही सकते हैं। अर्थक्वेक हुआ था बीच में अफगानिस्तान में। देखा कितने सारे लोग मर गए हैं। यह आए दिन ये जो साइक्लोन है ये अपने ईस्टर्न सी कोस्ट पे आता ही रहता है। बंगाल में वेस्ट बंगाल में तो आता ही रहता है। बांग्लादेश वेस्ट बंगाल। तो देखिए कि नेचुरल फोर्सेस कब कहां पर स्ट्राइक करेगी बताना बड़ा मुश्किल है। क्लाइमेट साइंस है किंतु क्लाइमेट साइंस को प्रेडिक्ट करना बड़ा मुश्किल है। तो हमारे पुरखों ने क्या किया था? इस नेचुरल फोर्सेस को एंथ्रोपोमॉर्फिक मास्क पहना दिया था। जैसे यह है बारिश। तो बारिश के देवता है इंद्र। अभी इंद्र अपनी भीम के ऊपर में चलता है। मनुष्य जैसे कि कोई आदमी होता है वह गुस्सा हो जाएगा तो किसी को मार बैठेगा। खुश हो जाएगा तो उसके पॉकेट में जो मिठाई वगैरह है वो सामने वाले को दे देगा। मनुष्य के किस तरह के एक एक विमसिकल मनुष्य होता है। एक अह स्ट्रेंज जिसका नेचर होता है वो कैसे बिहेव करता है। इस तरह के मनुष्य के गुणधर्म बारिश के ऊपर में बिठा करके ये इंद्र का एक के एक इंद्र का नाम दे दिया। और सिर्फ यह भारत में ही नहीं यह ग्रीक माइथोलॉजी में भी देखिए गॉड ऑफ़ थंडर ना कि यह सब गॉड है। गॉड्स एंड गॉडेसेस जो कि प्रकृति के जो कुछ ना कुछ फर्सेस उसके ऊपर में यह लोग मनुष्य का मास्क पहना देते हैं। एंथ्रोपोमोफाइज कर देते हैं इसको। तो इसी तरह से क्योंकि क्या है कि अब कब यह साइक्लोन स्ट्राइक होगा? हमारी तो अकल ही काम नहीं करती है। तो फिर क्या है कि आप एक साइक्लोन के एक देवता है। इस साइक्लोन के इस देवता को आप यह फल, मिठाई, श्रीफल वगैरह ऑफर कीजिए। बलिदान दीजिए उसको। उसको खुश रखिए तो फिर साइक्लोन स्ट्राइक नहीं होगा। और यदि आपकी सेवा में कुछ कमती रह गई, गड़बड़ हो गई तो साइक्लोन आकर के सब तहस-नहस कर देगा। तो क्या है? नेचुरल फोर्सेस को समझने के लिए नेचुरल फोर्सेस के ऊपर में थोड़ा बहुत कंट्रोल प्राप्त करने के लिए हमने उसको मनुष्य का एक गुणधर्म उसके ऊपर में पहना दिए हैं। मनुष्य का मास्क पहना दिया है। एंथ्रोपोमोफाइस उसको कर दिया है। जिससे कि हम थोड़ा बहुत समझ पाए। अभी ऑब्वियस है कि आप जिस तरह से इंद्र की कल्पना करते हैं उसके साथ में यह क्लाइमेट साइंस का कोई लेना देना नहीं। क्लाइमेट साइंस पूरा अपने से चलता है। इंद्र के बारे में हम जो कुछ भी सोचते हैं, वह पूरा एक माइथोलॉजिकल ही है। किंतु देखिए कि मनुष्य का मन जो है जो समझ में नहीं आता है उसको समझने का प्रयास करता है बोल के नेचुरल फोर्सेस को वो मनुष्य के गुणधर्मों के साथ में देखना चाहता है। तो अभी ईश्वर के साथ में एक एक अल्ट अभी देखिए क्लाइमेट साइंस एक है। पृथ्वी के ऊपर में यह क्लाइ बिकॉज़ कि पृथ्वी का ऊपर में एटमॉस्फियर है बोल के एटमॉस्फियर के रिलेटेड क्लाइमेट है। किंतु जोकि अब जैसे मंगल ग्रह है। वहां पे ना ही वोल्केनिक एक्टिविटी है। वहां पे ना ही प्लेट टेक्टोनिक एक्टिविटी है। अर्थात कि वहां वोल्केनो नहीं होंगे। वहां पे अर्थक्वेक नहीं होगा। वहां पे एटमॉस्फियर नहीं है। बोल के बारिश नहीं होगा, कुछ नहीं होगा। इट इज़ सॉर्ट ऑफ़ अ डेड प्लेनेट। जबकि वीनस है। वीनस पे बड़ा स्ट्रांग एटमॉस्फियर है। तो वीनस के ऊपर में क्लाउड्स है, बारिश है, अमोनिया के, समुंदर है शायद। तो प्रत्येक प्लेनेट का अपना-अपना एक क्लाइमेट है। तो अभी देखिए कि जिस तरह से ये एक साइंस है। साइंस को हमारी छोटी बुद्धि से समझने के लिए हम उसको एक माइथोलॉजिकल एक कपड़े जिस तरह से पहनाते हैं। तो ये जो अल्टीमेट रियलिटी है इस विश्व की उसको समझने के लिए हमने क्या उसको एक ईश्वर का मास्क पहना दिया है। उसको एंथ्रोपोमोफाइज कर दिया है कि हां अल्टीमेट रियलिटी यह एक है। इस विश्व में पूरे विश्व को चालित करती है। किंतु उसको समझने के लिए जिस तरह से एक बड़ा ही अच्छा मनुष्य बिहेव करेगा कि एक बहुत अच्छे मनुष्य का गुणधर्म क्या है? कैरेक्टरिस्टिक क्या है? तो उसके भीतर में दया भाव रहेगा। उसके भीतर में करुणा रहेगी। वो जो दुष्ट लोग हैं उसको दंड देगा। जो साधु लोग हैं उनको वह पुरस्कार देगा यही सब तो एक अच्छा आदमी करेगा। तो एक अच्छे आदमी का मास्क जैसे कि यह अल्टीमेट रियलिटी के ऊपर में पहना दिया है। मनुष्य की बुद्धि ये क्लाइमेट साइंस को ही ठीक से नहीं समझ पाई या नहीं मॉडेलिंग कर पाई नहीं प्रिडिक्ट कर पाई। तो यह जो पूरे विश्व का जो अल्टीमेट रियलिटी है उसको तो अभी तक समझना हमारी बुद्धि से कितना दूर है। तो बोल के उसके ऊपर में एक तरह का लिवरेज प्राप्त करने के लिए एक छोटी बुद्धि से उसको ग्रेस्प करने के लिए मनुष्य के गुणधर्म इस अल्टीमेट रियलिटी पे हमने पहना दिए। बोल के ईश्वर का उद्भव हुआ। ईश्वर के बारे में हमारी जो अवधारणाएं हैं, ईश्वर के बारे में जो हमारा चिंतन है, वह जैसे जैसे हमारा आध्यात्मिक प्रगति होता गया, ईश्वर के बारे में भी हमारी धारणाएं परिवर्तित होती गई। एक समय था हम सोचते थे यह बारिश के देवता है वही अल्टीमेटली ईश्वर है किंतु पता चला नहीं बारिश के ऊपर में भी कोई एक रियलिटी है फिर एक समय था हम लोग सोचते थे कि ये जो पृथ्वी है पृथ्वी पे ये जो ट्राइब है तो ट्राइब के जो लीडर होते हैं बड़े क्रोधी होते हैं बड़े ही घमंडी होते हैं बड़े ही अहंकारी होते हैं तो उनको खुश रखने के लिए सतत आपको कुछ ना कुछ ऑफरिंग देते रहना पड़ेगा तो ये जो ट्राइबल लीडर थे। उनकी कैरेक्टरिस्टिक ईश्वर पे पहना दी कि ईश्वर जो है बड़े ही विमसिकल है। बड़े ही शॉर्ट टेंपर्ड है। बड़े ही स्ट्रेंज उनका नेचर है। सतत उनको ऑफरिंग देते रहो। बकरे की बलि देते रहो। मनुष्य की बलि ये जो नर बलि देने की प्रथा कहां-कहां पे है? वो तेलो भेलो माट था जहां पे मां को यह डाकात बाबा का साक्षात्कार हुआ था। वहां पे है वो डाकात काली। वहां पे ऐसी बात थी कि कभी-कभी नर बलि भी देते थे डकैत लोग। तो क्या है कि इस तरह के देवता जिसका कि नेचर हमको समझ में ही नहीं आता। जिसका बड़ा ही शॉर्ट टेंपर है उसको नर बलि देते रहो। तो वो शायद हमारे पे खुश हो के हमको यह हमारे परिवार में मृत्यु ना हो जाए। कहीं मेरे हाथ पैर कट ना जाए। कहीं जंगली पशु मुझे खा ना ले। कहीं और बड़ी कोई दुर्घटना ना आ पड़े। इसके लिए इस तरह से देवताओं को रिझाते रहिए। देवताओं को खुश करते रहिए। फिर जैसे-जैसे हमारी ये जो आध्यात्मिक साधना है, आध्यात्मिक अंडरस्टैंडिंग इनसाइट है वो बढ़ना शुरू हुआ तो फिर हमको लगा कि नहीं ईश्वर तो प्रेम स्वरूप होने चाहिए। क्योंकि इस तरह के आध्यात्मिक महापुरुष को हमने देखा है जिनका हृदय प्रेम से, सहानुभूति से, करुणा से भरपूर है। आप उनके साथ में अन्याय करेंगे तो उसका उत्तर वो रिवेंज लेकर के नहीं किंतु आपको क्षमा करके ही करेंगे। तो इस तरह अब जैसे वो जगाई मगाई है वो नित्यानंद महाप्रभु को उनके ऊपर में आघात भी करते हैं तो भी नित्यानंद महाप्रभु जो है चैतन्य महाप्रभु के वो जो डिसाइपल वो उनको कर्स नहीं करते उनको श्राप नहीं देते हैं तो उनकी करुणा देखकर के ये जगाई मघाई जिस तरह का पत्थर दिल इंसान थे उनका भी हृदय पिघल जाता है और उनके चरणों में वो साक्षात वो साष्टांग प्रणाम कर देते हैं शरणागत हो जाते हैं। तो कोई राक्षसी जिसका हृदय है उसको भी करुणा से आप उसका हृदय को विगलित कर सकते हैं। तो यह जब हमने देखा तो हमने सोचा कि ये जो अल्टीमेट रियलिटी है उसको भी इस तरह से करुणामय एक फॉरगिविंग नेचर का मास्क पहनाया जाए। एक तरह का एंथ्रोपोमोफाइज इस तरह से किया जाए कि पृथ्वी के जो श्रेष्ठ साधु महात्मा है उनके जैसे वो दिखे। तो ऐसा करके करके ईश्वर के बारे में हमारी जो धारणाएं हैं, कांसेप्ट्स है वह इवॉल्व होते गए। अभी क्या है पता है? यह जो अद्वैत वेदांत है जहां पे कि हम सोचते हैं कि अल्टीमेट रियलिटी जो है वो एंथ्रोपोमोफाइज नहीं है। इस अर्थ में कि मनुष्य की तरह उनके डिजायर होते हैं। मनुष्य की तरह उनके भीतर में करुणा होती है। मनुष्य की तरह देखिए मनुष्य के व्हाट डिफाइन इज अ मेल। अब जैसे ये माइक है और मैं मानव हूं। राइट? मैं इंसान हूं। यह माइक है। हम दोनों में डिफरेंस क्या है? मेरे भीतर में डिजायर है। अब ये डिजायर को फुलफिल करने के लिए मैं कर्म करूंगा। यह माइक के भीतर में कोई डिजायर नहीं। यह डिजायर को फुलफिल करने के लिए उसको कुछ करने की जरूरत नहीं। अभी मेरे डिजायर जो है मनुष्य के डिजायर पॉजिटिव भी हो सकते हैं, नेगेटिव भी हो सकते हैं। मैं उनको फुलफिल करने के लिए जो कर्म करूंगा कर्म भी अच्छा कर्म भी हो सकता है, कुकर्म भी हो सकता है। दूसरों का शोषण भी कर सकता हूं, दूसरों को सहाय भी कर सकता हूं। किंतु यह माइक और मैं इन दोनों के बीच में फंडामेंटल डिफरेंस तो यह रहेगा कि मेरे डिजायर है और डिजायर को फुलफिल करने के लिए मैं कोई ना कोई एक्शन लेता हूं। तो यदि हम अद्वैत वेदांत या तो निराकार की दृष्टि से निर्गुण ब्रह्मण उसकी यदि कल्पना करते हैं तो वो है तो चेतन किंतु इस माइक की तरह है कि किस अर्थ में इसके ना ही कोई डिजायर है ना ही डिजायर को फुलफिल करने के लिए वो कोई कर्म करता है। यह हो गया निर्गुण ईश्वर। किंतु फिर एक सगुण ब्राह्मण कहो कि सगुण ईश्वर कहो यह जो कि हमने अल्टीमेट रियलिटी को एंथ्रोपोमोफाइज किया है। वह मेरे जैसा है। इस अर्थ में कि उसके डिजायर है और डिजायर को फुलफिल करने के लिए वो कर्म करता है। तो अभी प्रश्न तो वही रह गया ना कि ईश्वर के क्या डिजायर हो सकते हैं और वो डिजायर को फुलफिल करने के लिए किस तरह के कर्म वो कर सकते हैं। तो अह शुरू-शुर में तो ऐसा था कि ईश्वर के डिजायर जो थे बड़े सेल्फ़िश थे और सेल्फ़िश डिज़ायर को फुलफिल करने के लिए वो लोगों पे अत्याचार कर सकते थे। बारिश ले आएंगे, फ्लड ले आएंगे, पेंडेमिक ले आएंगे, वाइल्ड फायर ले आएंगे, अर्थक्वेक ले आएंगे, यह जो वोल्केनिक एक्सप्लोजन ले आएंगे, सुनामी ले आएंगे। तो इस तरह से यह जो क्रॉप है, क्रॉप फेल कर देंगे। अकाल, अनावृष्टि, अतिवृष्टि यह सब लेके आएंगे। तो उनके जो डिजायर है, डिजायर को फुलफिल करने के लिए ईश्वर इस तरह के कर्म करते हैं। नेगेटिव डिजायर है फुलफिल करने के लिए नेगेटिव कर्म करेंगे। आपको उनको सब समय खुश रखना होगा। उनको सैक्रिफाइस करते-करते। तो वह एक कासेप्ट इसके बाद में हायर कासेप्ट ईश्वर के बारे में कि ईश्वर के डिजायर जो है पॉजिटिव है। किस अर्थ में कि अपने भक्तों पे वो करुणा बहाना चाहते हैं। अपने भक्तों को आशीर्वाद देना चाहते हैं। तो यह उनका डिजायर है। यह उनकी इच्छा है और इच्छा पूर्ण करने के लिए वो जो कर्म करेंगे वो सब पॉजिटिव कर्म करेंगे। इस अर्थ में कि जो भक्त है उनको आशीर्वाद देंगे और जो भक्त को कष्ट देता है उसको वह पनिश करेंगे। तो देखिए कि एक निर्गुण और सगुण ये दो डिफरेंस हो जाते हैं। ईश्वर अल्टीमेट रियलिटी के बारे में। निर्गुण रियलिटी है। वह इस माइक की तरह है। माइक जड़ है। निर्गुण रियलिटी चेतन है। किंतु इस माइक की तरह ना ही उनके कोई डिजायर है। ना ही डिजायर को फुलफिल करने के लिए कोई एक्शन लेता है। जबकि सगुण ईश्वर है। वो मेरी तरह है। मनुष्य की तरह है। इंसान की तरह है। इस अर्थ में कि उनके डिजायर है। डिजायर को फुलफिल करने के लिए एक्शन लेते हैं। तो देखिए कि दो अल्टीमेट अल्टीमेट रियलिटी के बारे में दो पथ हमारी नजर के सामने ओपन होते हैं। एक है निर्गुण ईश्वर या तो निर्गुण ब्रह्मण और है सगुण ब्रह्मण या तो फिर सगुण ईश्वर। यहां पर जो ठाकुर बात करते हैं सगुण ब्रह्म या तो फिर सगुण ईश्वर के बारे में बात करते हैं। अभी अद्वैत वेदांत की दृष्टि से देखें तो यह सगुण ब्रह्म क्या है? तो वही है कि ब्राह्मण के ऊपर में अविद्या का अध्यारोप होता है। माया का अध्यारोप होता है। उसमें से यह व्यष्टि चैतन्य और समष्टि चैतन्य इस तरह के दो ब्रांचेस ओपन होती है। व्यष्टि चैतन्य है कि ब्रह्मण रूपी चेतना मेरे हृदय में जो रिफ्लेक्ट होती है वो हो गया व्यष्टि चैतन्य यानी कि इंडिविजुअल लेवल पे। अभी जो ठाकुर ने जो कहा कि एक घड़ा है। घड़े के भीतर में पानी है। पानी में सूरज का रिफ्लेक्शन गिर रहा है। तो इस तरह से तो लाखों घड़े हो सकते हैं। लाखों घड़ों में लाखों सूरज के रिफ्लेक्शन हो सकते हैं। तो ये हो गया व्यष्टि चैतन्य। ईश्वर क्या है? समष्टि चैतन्य। इस अर्थ में कि देखिए कि एक सूरज है और इस सूर्य का जो प्रकाश है मान लीजिए एक पूरा ब्रह्मांड है। पूरे ब्रह्मांड के भीतर में एक कॉस्मिक ओशन है और इस कॉस्मिक ओशन के भीतर में सूरज का एक कॉस्मिक रिफ्लेक्शन गिरता है। तो वो जो रिफ्लेक्शन होगा वो होगा समष्टि चैतन्य या तो फिर ईश्वर। तो यह अद्वैत वेदांत कहता है। अब जब हम अद्वैत वेदांत को पढ़ते हैं तब हमारे मन में यही बात आती है कि कैसे भी करके माया के इस राज्य से परे जाया जाए। अपवाद रूपी प्रक्रिया से जैसे अध्यारोप एक प्रक्रिया है कि ब्रह निर्गुण ब्राह्मण के ऊपर में माया का आवरण लगता है तो अध्यारोप तो माया का आवरण को हटाना जो है वो हो गया अपवाद तो ये अपवाद रूपी प्रक्रिया से किस तरह से ब्राह्मण के ऊपर का माया का आवरण हटा के ब्राह्मण साक्षात्कार किया जाए यह अद्वैत वेदांत की दृष्टि से हो सगुण ईश्वर है। प्रार्थना पूर्ण करते हैं। वह सब कुछ अच्छा है। किंतु हमको उस रास्ते पर जाना ही नहीं है। हमको मेरी इंद्रियों के जो अटैचमेंट है, इंद्रियों के जो विषय है उससे मुक्ति प्राप्त करनी है। क्योंकि यह इंद्रियों के विषयों की मायाजाल में फंसना ठाकुर की लैंग्वेज में काम कांचन में फंसना यही है कि जो कि हमको माया के इस पिंजरे में बद्ध करके रखता है। जिस क्षण में काम कांचन से मुक्त हो जाऊंगा। सत्य और ब्रह्मचर्य का अखंड अनुष्ठान मेरे जीवन में होगा। वैसे ही मैं इस माया के राज्य से परे जाकर के ब्रह्म साक्षात्कार ब्रह्म भाव में आरूढ़ हो जाऊंगा। यह हो गया एक अद्वैत वेदांत का सिद्धांत। किंतु हमको तो पता है कि यह द्वैत वेदांत जो है पुष्टि मार्ग है। फिर ये श्रीनाथ जी संप्रदाय है। फिर ये श्री वैष्णविज्म है। ये गौड़ीय वैष्णविज्म है। चैतन्य महाप्रभु का। वो सब वैष्णव भाव देखिए कि सगुण ईश्वर की ही कल्पना की गई है। निर्गुण ईश्वर की नहीं ईश्वर एंथ्रोपोमॉर्फिक ही है। उनके डिजायर है और डिजायर को फुलफिल करने के लिए वो कर्म करते हैं। यह भाव उनके भीतर में बड़ा ही दृढ़ है। तो अभी देखिए मैं अपनी खुद की बात करता हूं। मैंने पहले तो मैं बचपन की मेरे बात करूं तो मैं बहुत ही ज्यादा यह हिस्ट्री है, फिलॉसोफी है, ये सब पढ़ता रहता था और मेरे मन में यही था कि दुनिया में इतना खास करके मैं जो प्रैक्टिकल लेवल पर देखता था इतनी पॉवर्टी है, इतने लोगों को कष्ट हो रहा है। तो कैसे इनको सहाय पहुंचाई जाए? तो जो फिलॉसोफी आजकल इतनी गरीब लोगों के बारे में बात करती है, श्रमिक लोगों के बारे में बात करती है, पददलित लोगों के बारे में बात करती है, वो है कम्युनिज्म। या तो फिर सॉफ्ट कम्युनिज्म कहेंगे सोशलिज्म। तो सोशलिज्म या कम्युनिज्म क्या कहता है कि जो धनी लोग होते हैं वो अपना धन गरीबों में बांटें। और इसका एक हायर एक यदि एक्सप्रेशन है महात्मा गांधी के जीवन में और वाणी में मुझे देखने को मिला कि पढ़े लिखे लड़कों को गांव में जाकर के सेवा करनी चाहिए। तो उस आदर्श से प्रेरित होकर के मैं गांव में गया। गांव में सेवा करना प्रारंभ किया। अभी यह जो पूरा चल रहा है मामला उसमें ईश्वर के ऊपर में विश्वास ईश्वर यह सब कोई कांसेप्ट ही नहीं है। मैं कोई फिलॉसोफिकल सॉल्यूशन खोज रहा हूं। दो चीजों का एक तो गरीब लोग हैं उनको किस तरह से सहाय की जाए यह एक स्यूशन खोज रहा हूं। दूसरा कि मेरा जो माइंड है वो किस तरह से एक लेवल पोजीशन में रहे। डिप्रेशन है, यूफोरिया है, कभी कुछ खुशी, कभी गम ये साइकिल में ना चलता रहे। वो एक लेवल पे हैप्पीनेस के लेवल पे जॉयफुलनेस के लेवल पे रहे। तो एक साइकोलॉजिकल क्वेस्ट है, एक सोशियोलॉजिकल क्वेस्ट है। तो इसका उत्तर भी मैंने ठाकुर मास्वा को पढ़कर के फिलॉसोफी में से खोजने का प्रयास किया। किंतु धीरे-धीरे करके जैसे मैं अद्वैत वेदांत को समझता गया वो मेरे यह जो फिलॉसोफिकल एस्पेक्ट को ही उसने दृढ़ किया। इस अर्थ में कि ईश्वर को प्रार्थना करना और ईश्वर प्रार्थना पूर्ण करते हैं। यह कांसेप्ट मैंने अपने जीवन में अपने थिंकिंग में कभी बिठाया ही नहीं। ईश्वर को प्रार्थना करनी है। ठाकुर मां स्वामी जी को प्रार्थना करनी है। ईश्वर कौन है पता नहीं। ठाकुर मां स्वामी जी कौन है पता है। तो उनको प्रार्थना करनी है। और किस चीज के लिए प्रार्थना करनी है। आत्मान मोक्षार्थम जगत हिताय च राइट। जगत के हित के लिए कार्य कर सकूं वह क्षमता दो और आत्मन का मोक्ष को वो मेरी एक वासना फुलफिल करो इसी के लिए तो प्रार्थना करनी है इससे आगे मेरे जीवन के कुछ डिजायर है मेरी कुछ कामनाएं हैं उसको पूर्ण करने के लिए मैं प्रार्थना करूं वो भी ईश्वर को ऐसा मैं क्यों करूं तो ईश्वर को प्रार्थना करना किसी भी कोई ऑब्जेक्ट के लिए मैंने कभी नहीं किंतु देखिए जैसेजैसे से बिकॉज़ कि मेरा हिस्ट्री और साइकोलॉजी दोनों का जो स्टडी है वो इतना तो है कि मैं समझ पाता हूं कि मनुष्य को एक सहारा चाहिए अपने जीवन में। ठाकुर मां स्वामी जी का लाइफ एंड टीचिंग्स जो है बहुत ही ज्यादा फिलॉसोफिकल है। बहुत ही ज्यादा इंटेलेक्चुअली सोफिस्टिकेटेड है। किंतु जो क्रूड लेवल पे चाहिए। एकदम क्रूड लेवल पर कहे अब जैसे वो मां की एक कहानी कि एक गरीब बाई वहां पे मां के घर वो सब चीजों को लेकर के आती थी। मां के घर जय राम भाटी में मां का घर है। आसपास में बहुत सारे गांव है, शहर है। वहां से भक्त लोग मां के लिए सब्जी है, तरकारी है। फिर ये जो तेल वगैरह है, मसाले है, वो भेजते थे। फल वगैरह बेचते थे मां को। तो एक मजदूरन बाई है अपने सर के ऊपर में बोझा लेकर के मां के घर आती है तो वह तो वैसे तो नियमित आती थी किंतु कुछ समय हुआ कि मां ने देखा कि वो बाई जो है वो आई नहीं है। उसकी जगह और कोई इस तरह से वो बोझा लेकर के आते हैं। तो मां सोच रही है एकाएक कुछ दिनों के बाद में देखा वही मजदूरन जो कुछ समय से नहीं आई थी एक आध महीने से वह आई तो मां ने स्वाभाविक पूछा कि अच्छा उसका नाम लेकर के प्रेम से बिठा के मूढ़ी वगैरह खाने को देके मां ने प्रेम से पूछा अच्छा इतने दिनों से आई नहीं क्या बात है तो अब जैसे मां की सहानुभूति से यह वृद्धा मजदूरन है वो बेचारी कहने लगी मां मेरा एक जुवान लड़का था जो कि मुझे मेहनत करके खिलाता था। मुझे मेरी वृद्धावस्था का वही एक आसरा था। अभी कुछ दिन हुआ उसको बीमारी हो गई। वो मर गया है। अभी मैं वृद्धा हूं। अकेली हूं। विधवा हूं। मेरे भविष्य का कोई सहारा नहीं। तो मैं क्या करूं? ऐसा बोल के मैं बिल्कुल निराश होकर बैठी थी। तो अब यह जो वृद्धा मजदूरन है उसकी यह कहानी सुनकर के मां तो इतनी करुणा से मां का हृदय भीग गया कि मां चित्कार करके रोने लगी जैसे वो गांव की स्त्रियां होती है ना डाक डाक छेड़े कादा बांग्ला ते बोले डाक छेड़े कादा म चित्कार करके रोना तो ऐसा जैसे गांव की स्त्रियां रोती है इस तरह से मां ने रोना शुरू कर दिया कि अरे कि तुम्हारा जवान लड़का मर गया तो ये तो कितना बड़ा कष्ट तो मां को रोते देखकर के वो वृद्धा मजदूरन भी रोने लगी। दोनों रो रही है। रो रही है। चारों ओर से मां के सब जितने त्यागी संतान है परिवारजन है। ये पागली मामी राधु नलिनी माकू काली मामा जो भी थे सब दौड़े दौड़े आए। क्या हुआ? क्या हुआ? देखा दोनों वृद्धाएं बैठकर रो रही है। तो समझ में कुछ नहीं आ रहा है। किंतु कोई कुछ बोल भी नहीं रहा है। तो दोनों का रोना थोड़ा शांत हुआ। फिर मां ने किसी को कहा कि एक वृद्धा मजदूरन को सर में डालने के लिए तेल दो। उसको पहनने के लिए नया साड़ी दो और थोड़ा सा आंचल में मुड़ी वगैरह बांध करके उसको दो। तो ऐसा करके उसको विदाई किया। अभी यह एक नया साड़ी बालों में डालने के लिए तेल और मुट्ठी भर मुड़ी जो है पफ राइस उसको कहते हैं। तो वह तो उससे तो कोई जवान लड़के का वह जो विरह है ना ही वह शांत होने वाला है ना ही उसका जो इकोनॉमिक कंट्रीब्यूशन था वह फुलफिल होने वाला है। किंतु बात वह नहीं साड़ी या ऐसा कुछ मां के जो सहानुभूति जो मां ने जो रोया चित्कार करके तो उससे इस वृद्धा का हृदय इतना हील हो गया इतना सुस्त सबबल हो गया कि उसका जो गम था शोक था वो बहुत ज्यादा हद तक कट गया तो देखिए कि ये जो एकदम क्रूड लेवल पे आप ईश्वर के पास में क्या मांगते हैं? ह्रदय में जो गड्डा हुआ है यह जो इस तरह का निदारुण शोक इस तरह का निदारुण आघात ये जो स्ट्रेस है जीवन के जीवन की जो समस्याएं हैं जिसका कि कोई सॉल्यूशन हमको नहीं दिखता है। उसी का तो फुलफिल करने के लिए ही तो हम ईश्वर के पास में प्रार्थना करेंगे। इसके अलावा और क्या करना है ईश्वर के साथ? तो देखिए कि मायसेल्फ यंग एक लड़का होता है और वह भी जब साधु होता है तो उसके जीवन में ऐसा कोई गड्ढा उसके हृदय में नहीं होता कि उसको फुलफिल करने के लिए एकदम घातक हो के पुकारना पड़े। वृद्धावस्था में यदि शरीर बिगड़ता है तो फिर शायद पुकारना पड़ेगा। किंतु साधु के जीवन में ऐसा कोई बहुत बड़ा नहीं होता कि इसको फुलफिल करने के लिए अभी और कोई उपाय नहीं। बस कातक हो के ईश्वर को पुकारो। ऐसा हमारे साधुओं के जीवन में जनरली नहीं होता। साधु का लाइफ जो होता है इतना तो रेगुलेटेड होता है कि फिलोसोफी को लेकर के साधना को लेकर के स्टडी को लेकर वह रह सकता है। किंतु जो एक आम आदमी है उनके जीवन की यह जो अभाव है उनके जीवन की यह जो समस्याएं हैं वो इतनी गहरी है कि साधना करके इंद्रिय संयम करके कुछ प्राप्त करें और उसका समाधान ले वह संभव ही नहीं होता है। उनके लिए बस एक ही बात है। कि कैसे भी करके कातर होकर के ईश्वर के पास में प्रार्थना करें और यह अपेक्षा रखे कि ईश्वर उस प्रार्थना को पूर्ण करेंगे तो उसके लिए यह जो ईश्वर उस तरह के ईश्वर चाहिए जिसके डिजायर है और डिजायर को फुलफिल करने के लिए एक्शन लेते हैं। तो ये तो एक बात दूसरा एक बात क्या है पता है? हम लोग जब इस तरह के ईश्वर की कल्पना करते हैं। खास करके फ्रॉम द पॉइंट ऑफ व्यू ऑफ अद्वैत हमको ऐसा ही लगता है कि यह माया के भीतर के ही यह ईश्वर है और माया के भीतर में है बोल के इनका ज्यादाेंस नहीं कंपेयर टू ब्रह्मा। किंतु देखिए कि ठाकुर का जो कांसेप्ट है वो ब्रह्म और माया का कांसेप्ट नहीं। ठाकुर का कांसेप्ट है ब्रह्म और शक्ति का। यह शक्ति का जो कांसेप्ट है देखिए दिस इज वेरी इंपॉर्टेंट कि द्वैत और अद्वैत इन दोनों का आप रिकंसिलिएशन कैसे करेंगे? अद्वैत में है ब्रह्म है माया है। माया में से समष्टि जो चैतन्य है समष्टि रिफ्लेक्शन उसमें से ईश्वर प्रकट होते हैं। व्यष्टि रिफ्लेक्शन है उसमें से जीवात्मा प्रकट होता है। ये हो गया अद्वैत वेदांत। द्वैत वेदांत कहता है कि सगुण ब्राह्मण है। निर्गुण ब्रह्मण को भूल ही जाओ। माया को भी भूल जाओ। एक ही रियलिटी है वह है सगुण ब्रह्म। अभी सगुण ब्रह्म का कांसेप्ट में प्रॉब्लम वही है कि आप निर्विकल्प समाधि नहीं प्राप्त कर पाएंगे। एटलीस्ट फिलॉसोफिकली वो अलाउ नहीं होता है। ईश्वर के साथ में एकाकार हो जाएंगे। अह वह जो गिरीश घोष और स्वामी जी का जो डिबेट चल रहा था गिरीश कहता है कि मनुष्य कभी भी कृष्ण के लेवल तक नहीं पहुंच सकता। तो स्वामी जी कहते हैं यदि साधना करके चरित्र की शुद्धि करके उस लेवल पर यदि पहुंचे तो गिरीश कहता है कि तब वो कृष्ण ही हो जाएगा। ऐसा नहीं है कि मनुष्य कृष्ण के लेवल पर जाएगा। आप साधना में सिद्धि प्राप्त करेंगे तो आप कृष्ण ही हो जाएंगे। तो फिर कृष्ण से अलग कुछ नहीं है। जो भी है वह अल्टीमेट रियलिटी भगवान कृष्ण ही है। सो दिस इज़ वेरी इंटरेस्टिंग डिबेट। वह कहता है कि सगुण ईश्वर है। यदि आप भक्त और भगवान का रिलेशन हमेशा बना रहेगा और बहुत ज्यादा आप यदि ले उस लेवल पे जाएंगे हायर लेवल पे तो आपका इंडिविजुअलिटी जो है वो भगवान में विलीन हो जाएगा। जिसको कि सविकल्प समाधि कहते हैं। किंतु यदि निर्विकल्प समाधि वि इज द हाईएस्ट जो स्टेट है भारतीय आध्यात्मिकता में हिंदूइज़्म में उसको यदि प्राप्त करना है तो आपको निराकार या अद्वैत वेदांत को समझना होगा। एक लेवल पे ज्ञान मार्ग क्या है उसकी अंडरस्टैंडिंग होनी चाहिए। तो अभी यह जो इरिकंसाइलेबल जो फैक्ट्स है दो दो इरिकंसाइलेबल फिलॉसफी हमको दिखती है। एक सगुण ब्रह्म है एक निर्गुण ब्रह्म है। निर्गुण ब्रह्म में माया का अध्यारोप हो के अध्यास हो के वो समष्टि चैतन्य है जिसको कि हम ईश्वर कहेंगे तो वो ईश्वर यहां पे ये सगुण ब्रह्मा हाउ विल यू रिकंसाइल दिस टू थिंग आप ऐसा कहेंगे कि जो ईश्वर है समष्टि चैतन्य वही ये निर्गुण ब्रह्म है ये दो इक्विवेलेंट है ऐसा आप कहेंगे तो इस कहने में बहुत सारे लोगों को एतराज होगा खास करके के जो द्वैत को फॉलो कर रहे हैं वह ऐसा कहेंगे ही क्योंकि भाई हमारे जो सगुण ब्रह्मा है उनका जन्म माया में से हुआ है। माया का अध्यास हुआ है। बोल अज्ञान का अध्यास हुआ है। अविद्या का आवरण हुआ है। उसमें से हमारे सगुण ब्रह्म आए हैं। ऐसा हम स्वीकार ही क्यों करेंगे? व्हिच इज इरिकंसिलिएबल फ्रॉम द पॉइंट ऑफ व्यू ऑफ द। अभी ठाकुर का जो सॉल्यूशन है, ठाकुर क्या कहते हैं? एक तो है ब्रह्म और दूसरा है शक्ति। ब्रह्म और शक्ति अभेद है। स्थिर होते हैं तो निर्गुण ब्रह्म है। और जब कार्य करते हैं तो सगुण ब्रह्म या तो शक्ति है। ये स्थिर होना निर्गुण होना निराकार होना और ये सगुण होना कार्य करना इसी के दो मोड है। इसी के दो एस्पेक्ट है। कार है। जैसे कि कार को आप न्यूट्रल गियर में रखेंगे तो वहीं पे खड़ी रहेगी। रिवर्स गियर में करेंगे तो पीछे में जाएगी और फर्स्ट गियर सेकंड गियर में करेंगे तो फॉरवर्ड जाएगी। अभी ऐसा थोड़ी ना है कि खड़ी रखने के लिए एक सेपरेट कार रिवर्स में चलाने के लिए एक सेपरेट कार और फॉरवर्ड चलाने के लिए आगे बढ़ने के लिए तीसरी सेपरेट कार। ऐसा नहीं गियर चेंज करना है। तो यहां पे भी ठाकुर का यह गियर चेंज करने वाला फिलॉसफी है। एक तो निर्गुण ब्रह्म, एक सगुण ब्रह्म। ब्रह्म और शक्ति जब स्थिर है तो ब्रह्मन है। कार्य करते हैं तो वह शक्ति यदि वह कोई डिजायर नहीं रखते यदि कोई एक्शन नहीं लेते तो वह इस माइक की तरह है और यदि उनके कोई डिजायर है डिजायर को फुलफिल करने के लिए एक्शन लेते हैं। जैसे कि भक्त पे आशीर्वाद करना तो वह मेरी तरह जाते हैं। तो यह नॉन एंथ्रोपोमोफिज्म टू एंथ्रोपोमोफिज्म निर्गुण और सगुण एक ही रियलिटी के दो एस्पेक्ट है। यह है ठाकुर का सॉल्यूशन। और इस सॉल्यूशन को पढ़ के मेरे जैसे लोगों को खास करके जिनके भीतर में स्केप्टिसिज्म बड़ा ही स्ट्रांग है। नास्तिकता जिनके भीतर में बड़ी ही स्ट्रांग है। फिलॉसोफिकल ओरिएंटेशन बड़ा ही स्ट्रांग है। उन लोगों के लिए भक्ति का एक रास्ता खुल जाता है। क्योंकि देखिए सगुण ब्रह्म को स्वीकार हम क्यों करेंगे? जबकि यह निर्गुण ब्रह्मन का कांसेप्ट है। हम द्वैत विशिष्ट अद्वैत में जाएंगे ही क्यों? जबकि हाईएस्ट अद्वैत वेदांत हमारे सामने है तो एक फिलॉसोफिकल एक आ जाता है क्वेश्चन। फिर अद्वैत वेदांत में जाएंगे ईश्वर को प्रार्थना क्यों करेंगे? वो तो अज्ञान में से माया में से प्रकट हुए हैं। जो अज्ञान माया से पर है वैसे ब्रह्म साक्षात्कार ही करना है। यानी कि प्रार्थना करने के लिए जो एक कन्विक्शन शरणागति श्रद्धा चाहिए वो आ ही नहीं रही है। जैसे हम स्कूल में जाते हैं ना मैं अपने स्कूल के दिनों की बात करता हूं। कुछ कुछ टीचरों के ऊपर में हमारा बड़ा ही कटाक्ष भाव था। भले ही बेचारा टीचर चाहे कितना ही अच्छा हो किंतु हम लोगों को लगता था हम लोग उनको कभी रिस्पेक्ट नहीं देते थे। वो पढ़ाने को भी आएंगे तो हम लोग उनको ने उनको ध्यान सीरियसली लेने की वजह आपस में बातें करते रहेंगे। और एक टीचर ऐसे थे मुझे याद है मैथमेटिक्स के टीचर थे हमारे और वो रिटायर होने वाले थे। मोस्ट प्रोबेबबली हमारी बैच जो थी वो उनकी आखिरी बैच थी। बड़े ही सीनियर थे और बड़े ही रिस्पेक्टेड थे। अभी वह जब मैथमेटिक्स सिखाते थे मुझे याद है कि पूरा क्लास एकदम पिन ड्रॉप साइलेंट वहां पे होता था। साइलेंस होता था। हम लोग उनको सुनते थे। भले ही चाहे वो एडवांस मैथमेटिक्स हाई स्कूल का समझ में आए ना आए। मुझे याद है हमको चार्ट बनाना सिखाते थे। ग्राफ ग्राफ कैसे बनाना वो सिखा रहे थे। इतना मुझे याद है। सो विद पिन ड्रॉप साइलेंस हम उनको सुनते थे। क्यों? बात ऐसा नहीं है कि जो सब्जेक्ट सिखाते हैं हाई स्कूल मैथमेटिक्स वो कोई हमारा बड़ा प्रिय सब्जेक्ट है। बट वी हैव ए ग्रेट रिस्पेक्ट फॉर द टीचर। हमारे बेलुरमठ ट्रेनिंग सेंटर के दिनों की बात याद करूं तो हमारे सर्वप्रियनंद जी हमारे आचार्य थे। वेरी फॉर्चूनेट वी आर भजनानंद जी हमारे आचार्य थे। जुष्टानंद जी हमारे आचार्य थे। भजनानंद जी और सर्वप्रियनंद जी खासकर इन दोनों के ऊपर में इतना रिस्पेक्ट हमारा कि उनका क्लास में पिन ड्रॉप साइलेंस रहेगा। जो हायर वेदांत सिखाएंगे वो हम लोग सुनेंगे। भले चाहे समझ में आए ना आए। सो देखिए कि टीचर पे रिस्पेक्ट होना वो बड़ा ही आवश्यक है उनसे सीखने के लिए। किसी के ऊपर में आपका श्रद्धा भक्ति नहीं होगा तो उनको सीरियसली लेना मुश्किल है। यदि किसी को सीरियसली लेना है, किसी को रिक्वेस्ट करना है, किसी से कुछ सीखना है तो उनके ऊपर में हमारा 100% फेथ होना चाहिए, रिस्पेक्ट होना चाहिए। तो अद्वैत वेदांत की दृष्टि से ईश्वर के बारे में जो हमारा एक प्रॉब्लम खड़ा हो जाता है। खास करके यह जो मेरे जैसे फिलोसोफिकल स्केपिकल माइंड वाले लोगों का पहले तो अद्वैत वेदांत क्या था पता नहीं किंतु एक आत्मबल आत्मश्रद्धा बहुत था। बाद में जब वेदांत क्या है वह समझ में आया तो पता चला ईश्वर तो माया की प्रोडक्ट है तो फिर उनको क्या उनको प्रार्थना करना किंतु देखिए ठाकुर का ये जो कांसेप्ट है ब्रह्म और शक्ति अभेद जब स्थिर है तो ब्रह्म है चलित है कार्य करते हैं तो शक्ति है एक ही बाबू है जो बिना काम के बैठे हैं तो भी वही बाबू है काम कर रहे हैं तो भी वही बाबू है एक ही जल है स्थिर जल है तो भी वही वही जल है जो लहरें उठती है उसके ऊपर में तो भी वही जल है। एक ही सांप है जो कुंडली मार के बैठा है तो भी वही सांप है। और सर्पाकार गति से चलता है तो भी वही सांप है। स्थिर है तो भी वही ब्राह्मण है। कार्य करता है तो भी वही ब्राह्मण है। तो एक ही अल्टीमेट रियलिटी है। उसके कार्य के अनुसार किस गियर में है? न्यूट्रल गियर में है कि फर्स्ट गियर में है? टॉप गियर में है। उसके अनुसार वो हमको उसको देखना है। यदि इस तरह से हम ईश्वर को देखें ईश्वर इज नथिंग बट ब्रह्मण ही किंतु बस वो ब्राह्मण कार्य कर रहा है। जब इस दृष्टि से देखें ईश्वर को तो हमारे सामने एक रास्ता खुल जाता है। खास करके जैसे मैं अपनी ही बात करता हूं कि ईश्वर पे इस तरह से श्रद्धा हो। एक एंथ्रोपोमोफिक एंटिटी है। एक करुणामय एक अल्टीमेट रियलिटी है जो कि इनफरेंट नहीं है। मेरे सफरिंग की ओर मेरी ये जो भवर रोग है जो हमको लगा है ये भवर रोग के जो मेरे कष्ट है उसकी ओर वो इनडिफरेंट नहीं है। देखिए नेगलेक्ट जो है ना बड़ा डेंजरस है। छोटे बच्चों में छोटे बच्चे को सब समय प्रेम चाहिए। प्रेम यदि नहीं मिलता है उसके पेरेंट्स उसको नेगलेक्ट करते हैं और इवन वर्स यदि वह अनाथ होता है तो उसका मेंटल डेवलपमेंट हमेशा के लिए स्टंट हो जाएगा। मेंटल डेवलपमेंट हमेशा के लिए रुक जाएगा। तो यह जो ईश्वर जो है वो ईश्वर कोई नेगलेक्ट करने वाले नहीं है। हम लोग अनाथ नहीं है। हम अनाथ के नाथ है इस जगत में। सो दैट फॉर्म फेथ कि हमारी यह जो कष्ट है, कामना वासनाएं विदिन दैट लिमिटेड माने यदि मैं ऐसा कहूंगा मैं करोड़पति हो जाऊं, मैं लोगों पे राज्य करना शुरू कर दूं। इस तरह की कामना तो कभी पूर्ण नहीं करेंगे। या तो करने के लिए फिर हमको बहुत सारा उल्टा-पुल्टा करना पड़ेगा। किंतु विदिन दैट लेजिटमेट क्लेम कि हां मन को शांति मिले। जो भी मेरा कंट्रीब्यूशन है इस जगत में मैं पॉजिटिवली कर पाऊं। व्हिच आर द लेजिटमेट डिमांड्स। वो लेजिटमेट डिमांड को पूर्ण करने के लिए या तो पूर्ण नहीं करेंगे तो लेजिटमेट डिमांड को सिंपैथेटिकली व्यू करने वाले एक अल्टीमेट रियलिटी है। दिस बिलीफ वो हमारे लिए एक बहुत ही बड़ा एक मेंटल सहारा है। मेंटल सेनिटी के लिए मेंटल हेल्थ के लिए बच्चा हमेशा उसके बैक ऑफ ह माइंड है कि मां है मेरी। वो बाहर में भी खेलता है। घर के बाहर भी जाता है। स्कूल में भी जाता है। सब समय बैक ऑफ ह माइंड कि यह है। भले ही चाहे मां मेरी नजर के सामने नहीं किंतु मैं जैसे ही दौड़ा हुआ उसकी गोद में जाकर बैठूंगा वो मुझे सहानुभूति से स्नेह से प्रेम से मेरे मन को सांत्वना देगी। यह भरोसा बच्चे को सब समय यह भरोसा जो है कि ईश्वर है। ईश्वर के पास में दौड़े हुए जाएंगे। भले ही चाहे हम अभी कुछ भी करते हो, कॉर्पोरेट वर्ल्ड में हो, साइंटिस्ट हो, सोल्जर हो, कोई भी हो, एक बार दौड़े हुए भगवान के पास जाएंगे तो भगवान स्नेह, सहानुभूति, करुणा पूर्वक हमको सांत्वना देंगे। यह भरोसा इट इज अ वेरी पावरफुल बूस्ट फॉर आवर इम्यून सिस्टम फॉर आवर हेल्दी मेंटल लाइफ। आजकल ये थोड़ा सा आप स्टडी पढ़ेंगे ए सेंटेनरियंस। 100 साल जो जीते हैं तो उन लोगों का स्टडी होता है। जो मेंटल हेल्थ जिनका अच्छा होता है ऐसे लोगों का स्टडी होता है। और फिर स्टडी में क्या पाया जाता है कि इन लोगों का कम्युनिटी लाइफ बड़ा हेल्दी है। ये लोग जो है चर्च में रेगुलर जाते हैं। ईश्वर पे काफी विश्वास है। तो यह कम्युनिटी लाइफ है। चर्च में जाना है। भगवान पे विश्वास रखना है। व्हिच आर इक्वलीेंट टू योर मेंटल हेल्थ देन तो माने आपको एक हेल्दी फ़ूड, हेल्दी डाइट, हेल्दी लाइफस्टाइल, रेगुलर एक्सरसाइज इन सबका जोेंस है उतना ही और या तो उससे 10 गुना ज्यादा यह हेल्दी माइंड जो है उसकाेंस है और हेल्दी माइंड, हेल्दी इम्यून सिस्टम के लिए आपको अपने हृदय में एक तरह का भरोसा चाहिए। जिस आदमी के हृदय में यह भरोसा नहीं होता, एक हायर पावर में श्रद्धा नहीं होती, उसका हृदय क्या एक ब्लैक होल जैसा है। उसका हृदय हमेशा अभाव से पूर्ण रहता है। उसका हृदय हमेशा स्ट्रेस है, टेंशन है, उससे भरा रहता है। और यह स्ट्रेस और टेंशन ही उसको सीधा अर्ली ग्रेव पे भेज देते हैं। माने मृत्यु के मुख में उसको पतित कर देते हैं। सो दीज़ आर सम ऑफ़ द थॉट्स। ठाकुर जब यह कहते हैं ईश्वर के दर्शन कर सकते हैं और उनके साथ में वार्तालाप कर सकते हैं। यह भरोसा हमारी मेंटल हेल्थ के लिए बड़ा ही आवश्यक है। तो आज यहीं तक ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपस्तु।
प्रश्न: ईश्वर माया का Product भी हैं और मायाधीश भी; ये दोनों बातें एक साथ कैसे संभव हैं?
देखिए माया को आप एक एब्स्ट्रैक्ट कांसेप्ट के रूप में देख सकते हैं। इस अर्थ में जो अध्यारोप करता है वो माया जिसको हम अविद्या या अज्ञान भी कहते हैं। तो वो एक हो गया व्हिच इज हाइली एब्स्ट्रैक्ट टेक्निकल कांसेप्ट। दूसरा माया है कि हमारे जो बेस्ट डिजायर है उसके वशवर्ती होके रहना। मुझे गुस्सा आ गया तो मैंने गुस्सा कर दिया। मुझे काम कांचन पे मोह हो गया तो मैंने उसको भोग कर लिया। ईश्वर मायाधीश है इस अर्थ में कि उसके जो बेस्ट डिजायर है वो उनको कंट्रोल नहीं करती। किंतु ये जो एब्स्ट्रैक्ट माया जो है जो कि ब्रह्मण के ऊपर में अध्यारोप हो के ईश्वर का क्रिएशन करती है उसके ऊपर में तो ईश्वर का कोई कंट्रोल नहीं। अदरवाइज ईश्वर क्यों सगुण रूप में रहना चाहेंगे? जिस तरह से हम लोगों को निर्विकल्प समाधि में स्थित होकर रहना है। वो भी क्यों नहीं यह चाहेंगे? किंतु वो भी तो इसको नहीं तोड़ पाते हैं। सो इस अर्थ में वो मायाधीश किस अर्थ में है? सो म बेस डिजायर जो है वो उनको कंट्रोल नहीं करते। माने देखिए कि निर्विकल्प समाधि की जो स्थिति है वही एकमात्र स्थिति है कि जो आप निर्गुण ब्राह्मण के साथ में आइडेंटिकल है। वरना नेति नेति के समय हमारे भीतर में तमस और रजस सत्व तीनों रहते हैं। और जब इति करके वापस भी आते हैं निर्विकल्प समाधि के बाद में तो भी तो सत्व का एक आवरण एक बेड़ी रहता है। माने रजस का 1% तमस का 1% रहता है। सिर्फ निर्विकल्प समाधि है। संपूर्ण रूप से आप निर्गुण निराकार हो जाते हैं। दैट इज द ओनली टाइम यू आर आइडेंटिकल विद निर्गुण ब्रह्म। वो वो नेति नेति और इति इति पक्का अहं देखिए निर्विकल्प समाधि में तो अहंकार का कोई नामोनिशान ही नहीं है। कच्चा अहंकार है नेति नेति के टाइम में और इति इति के टाइम में है पक्का अहम। देखिए मैं जब पहली पहली बार यह अद्वैत वेदांत को स्टडी कर रहा था ना मुझे यह एक प्रश्न होता था ठाकुर जब वापस आए उनको ये याद कैसे है कि वो ठाकुर है ठाकुर की जो मतलब एक कांसेप्ट है कि एक नमक की गुड़िया को आपने समुंदर में डूबाया तो नमक तो पिघल गया अभी समुंदर में से फिर से एक नई गुड़िया खड़ी होती किंतु याद रखिए कि जो नमक के साल्ट के जो कण थे वह तो कहां बिखर गए है साल्ट के नए कणों से नई गुड़िया खड़ी होती है। उसका शेप सेम है। किंतु उसके जो क्स्टिटुएंट एलिमेंट्स है वि आर कंप्लीटली डिफरेंट। तो वही मन बुद्धि चित्त अहंकार कैसे खड़ा हुआ वापस? ठाकुर को अपना पास्ट पूरा पता है। किसके साथ में क्या रिलेशन था सब पता है। मैं निर्विकल्प समाधि से पहले मां के साथ में विवाह हुआ था। निर्विकल्प समाधि के बाद में सब याद है कि हां वही मां के साथ में विवाह हुआ। वही रामकुमार बड़े भाई है। वही चंद्रामणि देवी उनकी माता है। एवरीथिंग रिटर्न्स मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार एज इट इज रिटर्न्स। वही है कि वो उनको बांधते नहीं है। सो हाउ इज दैट पॉसिबल? राइट? ये ये मुझे प्रश्न उस समय हुआ था। आइडियली स्पीकिंग आप जब वापस आते हैं तो आपका भीतर का कंप्लीट रिसेट हो जाता है। आप जैसे कंप्यूटर को रिसेट करते हैं, जो सॉफ्टवेयर डाले थे, जो फाइल थी, जो डॉक्यूमेंट है सब उड़ गए। सबसे फिर से इंस्टॉल करो, फिर से वो कॉपी पेस्ट करो। तो ऐसा तो नहीं होता है। [हंसी] आपके डिजायर खत्म हो जाते हैं। मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार वैसे ही रहते हैं। यू आर कंप्लीटली न्यू पर्स। अब जैसे पुनर्जन्म होता है। तो पुनर्जन्म में आपके संस्कार साथ में आते हैं। मेमोरी साथ में नहीं आती। तो इस अर्थ में निर्विकल्प समाधि में तो पुनर्जन्म ही है। अल्टीमेटली द्विज का क्या कांसेप्ट है? जिसका दूसरा जन्म हुआ है। तो आइडियली स्पीकिंग द्विज कौन है? जो कि एक अल्टीमेट रियलिटी को स्पर्श करके जिसका पुनर्जन्म हुआ है वो द्विज है। तो आपके संस्कार का प्रवाह रह सकता है इस अर्थ में कि कुछ संस्कार सब कट गए। सुसंस्कार भी कट गए। किंतु वो जो लेखाजोखा था वह शायद चलो उसका बैक ऑफ योर माइंड वो जो आपका डीप मेमोरी है कहां पर वो पड़ा है बट एक्चुअल डॉक्यूमेंट्स एक्चुअल घटनावली पुनर्जन्म में तो हमको कुछ याद नहीं रहता ना संस्कार का लेखाजोखा ही समवेयर सबकॉन्शियस में पड़ा है इतना ही तो बाकी बच्चा जब जन्म लेता है उसका तो पूरा रिसेट हो चुका है सो शुडंट ईट सेम थिंग है पंडित निर्विकल्प समाधि में से वापस आने के बाद
प्रश्न: विशिष्ट अद्वैत के सगुण ब्रह्म और ठाकुर के ब्रह्म-शक्ति अभेद -- क्या यह दोनों एक ही है न अलग?
नॉट एग्जैक्ट पैरेलल इस अर्थ में कि सगुण ब्रह्म तो द्वैत का कांसेप्ट है। राइट? तो वे लोग तो कभी ये स्वीकार करेंगे ही नहीं कि इसके परे कोई रियलिटी है। तो या तो इसके अलावा और कुछ है। तो वो तो वहीं पे डेड एंड आ जाता है। अद्वैत वेदांत में भी सेम थिंग कि ईश्वर इज अ प्रोडक्ट ऑफ माया। इस अर्थ में कि अल्टीमेट निर्विकार निर्विक अह जो निर्विकार निर्गुण ब्रह्म तो वो नहीं है। इसके वन स्टेप बिलो है। सो दैट इज़ इट सीम्स एन इरिकंसिलिएबल डिफरेंस कि इसका कहीं पे कोई यही नहीं है। सो दैट थर्ड टाइप ऑफ अंडरस्टैंडिंग इज ब्रह्म और श जो कि इन दोनों के साथ में कनेक्शन नहीं है क्योंकि दोनों इसको स्वीकार नहीं करेंगे। अल्टीमेट इसके अलावा और कुछ नहीं हो सकता। राइट? अद्वैत वेदांत जो है अद्वैत वेदांत में ईश्वर की जो कल्पना है वो ईश्वर को हमेशा वन स्टेप बिलो रखेंगे निर्गुण ब्रह्मण के साथ में कभी नहीं खड़ा करेंगे तो दी आर इरिकंसिलेबल डिफरेंस द्वैतवादी कहेंगे कि सगुण ब्रह्मण के अलावा और कुछ हो ही नहीं सकता अद्वैतवादी कहेंगे भले सगुण ब्रह्म है बट दैट इज वन स्टेप बिलो निर्गुण ब्रह्म तो हाउ कैन देयर बी अ रिकंसिलिएशन राइट सो दिस ब्रह्म शक्ति कासेप्ट इज अ थर्ड कैटेगरी की थर्ड यू कैन से बॉक्स जिसमें सगुण और निर्गुण को इक्विवेलेंट माना गया है।
प्रश्न: ठाकुर का यह जो concept है -- ब्रह्म-शक्ति अभेद -- यहाँ अवतार का क्या स्थान है?
इस अवतार वो अवतार है। राइट? अवतार इज अ थर्ड कांसेप्ट। ब्रह्म और शक्ति के अलावा अर्थ अवतार इज अ थर्ड कासेप्ट। क्योंकि अवतार जो है व्यष्टि लेवल पे है। जबकि ब्रह्म और शक्ति समष्टि लेवल पे है।
पारंपरिक द्वैत या अद्वैत की दृष्टि से ठाकुर की भावधारा को नहीं समझा जा सकता। 'ब्रह्म और शक्ति का अभेद'—इसी अवधारणा से ठाकुर की वाणी को समझा जा सकता है।
देखिए रामकृष्ण विवेकानंद भावधारा को आप ट्रेडिशनल अद्वैत ट्रेडिशनल ध्वत दोनों दृष्टि से आप नहीं पहचान पाएंगे। देखिए अपने ऑर्डर में अद्वैत का तो एक प्राधान्य है। उसमें कोई प्रश्न ही नहीं। अपने जितने भी बड़े-बड़े साधु हैं सब लोग कहते हैं अद्वैत इज अ बेटर वे ऑफ़ अंडरस्टैंडिंग रामकृष्ण विवेकानंद लिटरेचर। किंतु अद्वैत भी एक लेवल पे जाके आपका कम पड़ जाता है। इसी पैसेज में आप देखिए ना मुखय को क्या कहते हैं? रोते-रोते ईश्वर को पुकारिए। फिर कहते हैं सहस्त्रार में ईश्वर है। फिर कहते हैं ये घट है। घट के भीतर में पानी है। पानी में ईश्वर सूर्य का प्रतिबिंब है। व्हिच इज क्लासिकल अद्वैत कांसेप्ट। और रो-रो करके पुकारना क्लासिकल द्वैतिक कांसेप्ट विद इन वन पैसेज वििन वन मिनट ऑफ वो ठाकुर इसको दोनों बातों को एक साथ में कहते हैं। व्हिच यू कैन नेवर रिकंसाइल विद आइदर ट्रेडिशनल द्वैत और ट्रेडिशनल अद्वत। फॉर दैट यू नीड दिस कासेप्ट ऑफ ब्रह्म शक्ति भेद। तो पूरा लिटरेचर को रिअंडरस्टैंड करना, रिफाइन करना, रीप्रेट करना बेस्ड ऑन दिस फंडामेंटल आईडिया कि ब्रह्म शक्ति अभेद दैट इज वन प्रोजेक्ट जो करेगा वो धन्य हो जाएगा। [हंसी]
प्रश्न: आप के समझाने से पहले पता नहीं था की traditional द्वैत या अद्वैत से भी परे ठाकुर का यह ब्रह्म-शक्ति अभेद concept है
सी इन अ वे इट इज गुड? इन अ वे व्हाई शुड वी एट ऑल गो इनू डिपर अंडर करंट्स? अल्टीमेटली तो ठाकुर यही कहते हैं ना कि यह बागान है, इतने पेड़ है, इतने पत्ते हैं, इतनी ब्रांचेस है। इतना आर्कियोलॉजिकल सर्वे करके क्या लाभ है? पत्थर मार के आम को तोड़ो उसको खाओ। सो फ्रॉम वन पॉइंट ऑफ व्यू वी आर हैप्पी। इग्नोरेंस इज हैप्पीनेस इन दैट वे। [हंसी]
प्रश्न: एक बार ठाकुर को समझ लेने के बाद हमारी बुद्धि और हृदय, दोनों का विस्तार हो जाता है। इसके बाद पारंपरिक द्वैत या अद्वैत—दोनों ही मतों के आचार्यों को सुनना अच्छा लगने लगता है।
आप द्वैत में देखिए ना चैतन्य महाप्रभु का जीवन है। ये हितरवंश महाप्रभु का जीवन है। दोज़ आर ब्रिलियंट लाइफ्स जो कि हम लोग ना अपने ये जो अपना हेरिटेज है उसको भूलने को ही बैठे हैं। मुगल जितने राजा है सबके नाम पता है। किंतु ये जो अपने संत महाप्रभु हो गए उनका तो नाम ही नहीं पता। यह कौन सा अपना सेकुलरिज्म दो नंबर का ठाकुर कहते हैं ना कि के शहनाई पजाए सब राग रागणी बाजाए शहनाई का सिर्फ एक ही राग बजाते मैं सब राग रागणिया बजाता हूं ना आवर अंडरस्टैंडिंग इज रिचर ना दैट वे आवर अंडरस्टैंडिंग आवर टेस्ट्स आर मोर कल्चरर्ड ना आपोगे क्रूड ऑडियंस होगा उनको ये स्लेपस्टिक कॉमेडी अच्छी लगेगी मैं एक बात बताता हूं। साधु का मृत्यु होता है वो एक उत्सव है। बिलूर मठ में समाधि घाट है। आपने शायद देखा होगा प्रेसिडेंट महाराज को वहां पर समाधि देते हैं। म अग्नि में जलाते हैं। तो पास में ही आम साधु जो है उनको चिता दाह देने की व्यवस्था है। तो सब साधु लोग बैठेंगे। रात को 9:00 बजे के बाद में चिता जलाई जाएगी। सब साधु लोग बैठेंगे। वही जे देखा जाए आनंद धाम। वो एक गीत मैंने कहा था उसका कोई रिकॉर्ड नहीं करना चाहता। तो वो गीत गाया जाएगा। इट्स अ बेस्ट टाइम साधु के जीवन में। तो एक दिन की बात याद है मैं ट्रेनिंग सेंटर में था और आशीष महाराज जो प्रभानंद जी के सेक्रेटरी थे और अभी वो कल्याणी सेंटर के हेड है वो उस समय बेलूर मठ के ऑफिशियल सिंगर थे। तो वो भजन गा रहे थे। तो शिवमयानंद जी पास में बैठे थे। वो बोले कि जब तक तुम ध्रुपद चलाते हो तब तक मैं बैठा हूं। तुम ध्रुपद छोड़ के बाकी को कीर्तन चालू करोगे तो मैं खड़ा होकर चला जाऊंगा। तो जस्ट बिकॉज़ और उस समय शिवमयानंद जी असिस्टेंट जनरल सेक्रेटरी थे। तो जस्ट बिकॉज़ कि शिवमयानंद जी बैठे रहे और आशीष महाराज ध्रुपद में ध्रुपद गा रहे थे और हम ब्रह्मचारी पीछे में बैठकर के गाली दे रहे हैं। अबे कब कीर्तन चालू होगा तब मजा आएगा। सो सी द क्लियर डिफरेंस बिटवीन द टेस्ट [हंसी] कि हम ब्रह्मचार्यों को चाहिए कीर्तन व्हिच इज फास्ट व्हिच इज मोर फन। जबकि वो बड़े सीनियर साधु है। उनको ध्रुपद चाहिए। स्लो स्टेडी। अभी जैसे मेरी उम्र बढ़ रही है। मुझे भी ध्रुपद ज्यादा अच्छा लगता है कीर्तन से। सो खंडना ध्रुपदरा स्लो एंड लॉन्ग फॉर्म। जबकि कीर्तन वो फटाफट फटाफट ताली बजाते बजाते। स्पीडी जो होता है।
प्रश्न: ईश्वर के दर्शन हो सकते हैं—इस श्रद्धा को और अधिक सुदृढ़ (मजबूत) कैसे किया जाए?
ये कैसा है पता है? फेथ को स्ट्रांग करना। पत्थर पर पानी डाल के यह एक्सपेक्ट भरोसा रखना है कि कभी ना कभी इसमें से पेड़ निकलेगा, पौधा निकलेगा। तो ऑब्वियस है कि पत्थर पर पानी डालने से कोई लाभ नहीं है। लॉजिकली स्पीकिंग। यदि पत्थर में से अंकुरित कुछ होता भी है तो इट्स अ प्रोसेस ऑफ़ लॉन्ग जियोलॉजिकल प्रोसेस कि पत्थर में क्रैक हुआ। टेंपरेचर के प्लस माइनस होने से उसमें मिट्टी गिरी पानी गिरा लॉन्ग टाइम उसमें कुछ फर्टाइल कुछ हुआ बाद में बीज आया वि माने पत्थर पे पानी डालना और पत्थर में से बीज का अंकुरित होना इन दोनों के बीच में कोई सीधा रिलेशन नहीं वो अपना एक लॉन्ग टर्म जियोलॉजिकल प्रोसेस है ये अपना ह्यूमन स्केल पे है। बात ऐसा है कि आप पानी डालना छोड़ देंगे तो बात तो चलेगा नहीं तो कुछ तो करना पड़ेगा सो ईश्वर पे भरोसा कैसे हो इट इज समथिंग कंप्लीटली मिस्टेकल किंतु हमको कुछ तो करना पड़ेगा बोल के हम बाकी सब करते हैं मंदिर में भी जाते हैं साधु संत भी करते हैं स्वाध्याय भी करते हैं ठाकुर मां स्वामी जी को भी सुनते हैं वी आर डूइंग एवरीथिंग नया कुछ करना नहीं है कर्म ज्ञान भक्ति ध्यान जो अपना लोगो है स्टैंडर्ड चार योगों का समन्वय सो दिस इज द ओनली थिंग वि द एक्सपेक्टेशन के इवेंचुअली द स्टोन विल क्रैक राइट बट बट वी वी शुड नो दैट लॉजिकल प्रोसेशन नहीं है कि मैं चार योगों का अनुष्ठान करूंगा और पत्थर टूटेगा देयर इज नो गारंटी टू दैट वो टूटना है वैसे ही टूटेगा नहीं टूटना है नहीं टूटेगा सो दिस इज अ फैक्ट दिस इज अ फैक्ट दिस इज ऑलवेज गोइंग टू बी द फैक्ट जो कोई आपको भरोसा दिलवाते हैं तो बी ऑलवेज डाउटफुल अबाउट देम
प्रश्न: स्वामीजी कहते हैं कि आत्मश्रद्धा (Self-confidence) चाहिए, किंतु प्रश्न यह है कि यह आत्मश्रद्धा आएगी कहाँ से?
ना स्वामी जी इसी बात विद्यासागर के बारे में करते हैं। स्वामी जी क्या कहते हैं? विद्यासागर की किताब में ऑलरेडी लिख दिया है कि चोरी नहीं करना है। झूठ नहीं बोलना है। किंतु चोरी ना करे झूठ ना बोले उसके लिए जो कैपेसिटी चाहिए फ्रॉम वेयर दिस कैपेसिटी विल कम। स्वामी जी खुद कहते हैं स्वामी जी कहते हैं ये योग है उसका अनुष्ठान करो। दिस विल बिल्ड योर कैपेसिटी। सो उत्तर जो है देयर इज़ नथिंग मिस्टिकल अबाउट द आंसर। चार योगों का लोगों में ही बता दिया है। सो नथिंग बियों्ड दैट ओनली थिंग इज बी वेरी क्लियर के ईश्वर की कृपा ईश्वर की करुणा के बिना ये सब चीजें होती नहीं है। ब्रह्मचर्य का पालन करना। साधु जीवन में मैंने देखा है कि मैं ये जो एक ऐसा टॉपिक है जो पत्थर की दीवार पे सर पटकने के बराबर है। आप कुछ भी कर लीजिए उसको होना है तो होगा, नहीं होना है तो नहीं होगा। वो ईश्वर की कृपा के अलावा और कोई ऑप्शन नहीं। किंतु यह बोल के क्या मैं साधना बंद कर दूंगा? नो साधना मेरी पैरेलल चलती रहेगी और यह म एक आशा हमेशा मन में रहेगी कि ईश्वर विल रिकॉग्नाइज माय सिंसियरिटी एंड ईश्वर विल अल्टीमेटली ब्लेस। राइट? सो ये भरोसा रख के साधना करते जाना है। दिस इज द ओनली थिंग दैट वी हैव। और जैसे मां ने वह ब्रह्मवादी महाशय के बारे में कहा था ना वह काशी में रहते हैं बहुत साधन भजन करते हैं तो वह जो मां के एक सेवक मां को मिलने के लिए कोलकाता आ रहे हैं उद्बोधन में तो ब्रह्मवादी महाशय ने पूछा कि मां को पूछिएगा मैं इतना साधन भजन करता हूं तो ईश्वर की कृपा कब होगी तो जब मां को ये प्रश्न किया गया मां बड़ी गंभीर हो गई बोला कि उसको लिख दो कि तुम साधन भजन करते हो बोलकर के कि ईश्वर तुम्हारे लिए आकर के खड़े हैं कृपा करने के लिए ऐसा कुछ नहीं है ईश्वर को कृपा करनी है तब करेंगे तो हमारा कर्तव्य है साधन भजन करते जाना। देखिए इसके अलावा कोई उत्तर यदि हमको मिलता है कि ना इतना करने से इतना हो जाएगा देन बी वेरी स्केप्टिकल ऑफ दैट आंसर। ओम