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Sri Ramakrishna Kathamrita ·

श्रीरामकृष्ण कथामृत || 16 Dec 1883 - श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ दक्षिणेश्वर में || 9 Dec 2025

प्रार्थना

ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिणे अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः

Infographics: ब्रह्म और शक्ति अभेद

यह जो हम कल बात कर रहे थे एआई जनरेटेड ग्राफिक्स की तो और एक मैंने एक जनरेट किया है मैं आपके साथ में यहां पर शेयर करता हूं यहां पे आप देखिए जैसे कि ब्रह्मा और शक्ति ठाकुर कहते हैं ना कि ब्रह्मा और शक्ति एक और अभेद तो इसके रिलेटेड यह कितना सुंदर ग्राफिक्स मैंने उसमें एआई में ये पैसेज डाल दिया नोटबुक एलएम में और और कहा कि इसके ऊपर में बनाओ तो देखिए कि इसने बनाया है इट इज वेरी ब्यूटीफुली मेड एक्चुअली टाइटल क्या दिया है ब्रह्मा एंड शक्ति टू साइड्स ऑफ वन रियलिटी अभी भी हमको पता है कि ठाकुर कहते हैं कि ब्रह्मा और शक्ति एक है और अभेद है। अद्वैत वेदांत से यह कैसे डिफर होता है? अद्वैत वेदांत भी तो यही कहता है कि एक ही ब्राह्मण है। इसके ऊपर में जो आप माया का देख रहे हैं माया जिसको आप देख रहे हैं वो म उसके अलावा जो कुछ भी देख रहे हैं इस जगत में वो चाहे पशु पक्षी हो, पेड़-पौधे हो जो कुछ भी हो तारे ये सितारे ये चांद ये ग्रह नक्षत्र जो कुछ भी है सब माया के माध्यम से यह सब दिखाई देता है और अद्वैत वेदांत में जो उपमा दी जाती है जैसे कि आप मरुभूमि में जा रहे हैं और प्यास लगी है तो आपको मरुभूमि डेजर्ट के भीतर में मिराज दिखाई देता है। एक तरह का एक इल्यूजन दिखाई देता है। क्या आप वहां पर तालाब है, तालाब के चारों ओर खजूर के पेड़ है और वहां पर बड़ा शांति और छांव है। तो जितना आप उसकी ओर आगे जाते जाएंगे, देखेंगे कि यह जो मिराज है, उतना ही दूर जाता जाएगा और आखिर में पता चलेगा कि यह हमारे मन के भ्रम अलावा और कुछ नहीं था। तो यह है अद्वैत वेदांत। किंतु देखिए कि ठाकुर का जो कांसेप्ट है ब्रह्म और शक्ति का वह उससे कैसे डिफर होता है। ठाकुर भी वही कहते हैं कि ब्रह्मन ही है। किंतु ठाकुर यह नहीं कहते कि शक्ति नहीं है। ठाकुर कहते हैं कि ब्राह्मण जब स्थिर होता है तब वो माने एक ही रियलिटी है। अल्टीमेट रियलिटी जब वह स्थिर रहती है तब हम उनको ब्राह्मण कहते हैं। और जब वह कार्य करती है तब हम उसको शक्ति कहते हैं। ब्रह्मन और शक्ति एक ही एक ही सिक्के के दो पहलू है। दोनों क्वांटम लैंग्वेज क्वांटम डायनेमिक्स की लैंग्वेज में कहेंगे सुपरपजीशन। अ दिस इज अ वेरी स्ट्रेंज कांसेप्ट। पहले तो हम लोग मानते थे कि कोई भी एक इलेक्ट्रॉन है तो यदि उसका अपस्पिन होगा या डाउन स्पिन होगा दोनों एक साथ में नहीं हो सकते। वो कोई भी एक ही स्टेट वो ऑक्यूुपाई करता है। किंतु फिर क्वांटम डायनामिक्स हमको कहता है कि जब तक हम उसको ऑब्जर्व ना कर दें तब तक वो अपस्पिन और डाउन स्पिन दोनों में रह सकता है। इसको कहते हैं सुपरपजीशन। अभी इसका पॉपुलर एक उदाहरण एक एक किस तरह से देते हैं? मान लीजिए एक बक्सा है, एक बॉक्स है। अभी यह बॉक्स चारों ओर से बंद है। इस बॉक्स के भीतर में हमने एक बिल्ली को रखा है। तो अभी यह बिल्ली जो है अभी बॉक्स के भीतर में है और साथ में ही बॉक्स के भीतर में एक जहरीले गैस का एक टेबलेट रखा है। एक छोटा सा एक इस तरह का डिवाइस रखा है जहरीले गैस का कि वो डिवाइस कब स्विच ऑन होगा और कब यह गैस रिलीज होगा और कब बिल्ली को मार देगा वह हमको पता नहीं। तो अभी देखिए जब तक बिल्ली बक्स में बंद है और जब तक तब तक हमको यह नहीं पता है कि वह जिंदा है या मरी हुई है। तो श्रोडिंजर्स कैट इस श्रोडिंजर बोल के था साइंटिस्ट उसने यह एक्सपेरिमेंट किया था। हमने एक जनरल पब्लिक को भी पता चले कि क्वांटम डायनेमिक्स कितना विचित्र है। तो अभी देखिए कि जब तक बॉक्स बंद है तब तक आपको पता नहीं है कि बिल्ली जिंदा है या मुर्दा है। किंतु देखिए कि हम लोग कोई भी एक व्यक्ति को आप पूछेंगे कहेंगे कि बताइए तो बिल्ली किस हालत में है अभी तो वह तो आपको वही कहेगा ना। या तो जिंदा है या तो मुर्दा है। माने आइदर और कब यह जो पोइजन गैस रिलीज होगा वो कहना मुश्किल है। किंतु या तो पोइजन गैस रिलीज हो गया है। बिल्ली मर गई है या तो गैस रिलीज नहीं हुआ। बिल्ली अभी भी जिंदा है। तो आइदर और मुर्दा है या जिंदा है। यह हमारा एक नॉर्मल एक्सपीरियंस हमको कहता है। जबकि देखिए क्वांटम डायनामिक्स कहता है कि जब तक आप बिल्ली को ऑब्जर्व नहीं कर लेते हैं, बॉक्स खोल के चेक नहीं कर लेते हैं, तब तक बिल्ली जिंदा भी है, मुर्दा भी है। डेड एंड अलाइव। यह इस तरह का एक काउंटर इंटिव इस तरह का एक विचित्र कंक्लूजन है क्वांटम डायनेमिक्स का कि अभी भी देखिए कि ज्यादातर लोगों को इसके बारे में नहीं पता। ज्यादातर लोगों को इसके इंप्लिकेशंस क्या है समझ में नहीं आते। किंतु यह इतना सॉलिड साइंस है कि आज की जो मॉडर्न इलेक्ट्रॉनिक्स टेक्नोलॉजी है पूरी क्वांटम डायनेमिक्स के ऊपर में ही बनी है। क्वांटम डायनेमिक्स नहीं होता तो ना ही हमारे पास में ये जीपीएस सेटेलाइट होते ना ही यह माइक्रोपर जो कि आजकल सब कुछ चलाते हैं। मोबाइल से लेकर के कार से लेकर के वाशिंग मशीन से लेकर के फ्रिज तक जो कुछ भी है सब भी सबके भीतर में आजकल यह माइक्रोपर्स है। तो यह माइक्रोपर ये जीपीएस सेटेलाइट जो कुछ भी आप इलेक्ट्रॉनिक्स देख रहे हैं सबके पीछे में यह क्वांटम डायनेमिक्स काम करता है। तो ये क्वांटम डायनेमिक्स की प्रैक्टिकल एप्लीकेशनेशंस तो जबरदस्त है किंतु इसके ये जो फिलॉसोफिकल थ्योरेटिकल इंप्लिकेशंस है बहुत ही विचित्र विचित्र है। इवन साइंटिस्ट लोग भी उसको समझाने में बेचारे गड़बड़ कर देते हैं। तो यह जो कॉन्सेप्ट है कि जनरली कोई भी अपना एक कॉमन सेंस वाला आदमी जिसको कि हम क्लासिकल फिजिक्स कहते हैं। क्लासिकल फिजिक्स या तो कॉमन सेंस यही कहेगा कि जब तक बॉक्स नहीं खोला आपने तब तक बिल्ली या तो जिंदा है या तो मुर्दा है। आइदर और दोनों में से एक पोजीशन में होगी। यहां पर क्लासिक यहां पर यह जो क्वांटम डायनामिक्स जो है वह कहेगा कि बिल्ली जिंदा भी है मुर्दा भी है। दोनों पोजीशन में एक साथ में है और जब तक आप उसको ऑब्जर्व नहीं करेंगे तब तक यह बिल्ली का वेव फंक्शनंस कोलैप्स नहीं होगा और यह एक स्टेट को ऑक्यूुपाई नहीं करेगी। यानी कि आइदर जिंदा होगी या मुर्दा होगी। ऑब्जरवेशन करने के टाइम में वह एक ही स्टेट में होगी। जिंदा या मुर्दा। किंतु जब तक ऑब्जर्व नहीं करते हैं तब तक दोनों स्टेट में है। यहां पर देखिए कि ऑब्जर्वर का इतना बड़ा रोल है क्वांटम डायनेमिक्स में। तो एनीवे ऑफ कोर्स ये एक्सपेरिमेंट जो है वो माइक्रोस्कोपिक सब एटॉमिक पार्टिकल्स के ऊपर में ही अप्लाई होता है। बिल्ली जैसे बड़े ऑब्जेक्ट पे नहीं एटम है ना कि यह इलेक्ट्रॉन है, प्रोटॉन है। इसी के ऊपर में यह अप्लाई होगा। किंतु यह अप्लाई होता है। माने सब एटॉमिक पार्टिकल पे अप्लाई होता है। सो वि इज वेरी स्ट्रेंज। तो यहां पे भी मुझे ऐसा लग रहा है ना ठाकुर का यह थ्यरी है सुपरपशन वाला कि यह ब्रह्म भी है, शक्ति भी है। दोनों एक साथ में है। स्थिर है तो ब्रह्म है, कार्य करती है तो शक्ति है। किंतु यहां पे ब्रह्म या तो शक्ति को ऑब्जर्व यदि आप ना कर ले। ऑब्जर्व कब करेंगे आप? जबकि आपको निर्विकल्प समाधि प्राप्त होगी, ब्रह्म साक्षात्कार होगा, तब एग्जैक्टली पता चलेगा कि यह ब्रह्म क्या है और शक्ति क्या है। जब तक हम निर्विकल्प समाधि प्राप्त नहीं करते, क्वांटम डायनेमिक्स में जो ऑब्जर्वर का रोल जो है वो रोल जब तक हमको नहीं मिलता है तब तक यह ब्रह्म और शक्ति दोनों सुपरपजीशन में है। दोनों एक साथ में उसका दोनों का अस्तित्व है। तो यहां पर देखिए कि ठाकुर का जो कांसेप्ट है उसको लेकर के इतना सुंदर यह ग्राफिक्स बनाया है। पहले तो है कि ब्रह्मन यह क्या है? एब्सोल्यूट इनक्टिव स्टेट और फिर व्हेन द अल्टीमेट रियलिटी इज नॉट एंगेज इन एक्ट्स ऑफ क्रिएशन प्रिजर्वेशन ए और डिस्ट्रक्शन स्टिल वाटर इट इज लाइक ए वाश काम ओशन ऑफ एकिस्टेंस नॉलेज ब्लीस एब्सोल्यूट सच्चिदानंद स्पेलिंग गलत है किंतु खैर फॉर्मलेस एंड इंपपर्सनल इन दिस स्टेट द रियलिटी इज कंसीडर्ड एट्रिब्यूटलेस एंड बिय्ड ऑल डिस्क्रिप्शन ्शन तो देखिए यह जो एब्सोल्यूट ब्रह्म सचित आनंद का डिस्क्रिप्शन म विजुअल रिप्रेजेंट करना है तो कितना सुंदर किया है स्टिल वाटर और और कलर पैेट भी जो लिया है मैं जब राजकोट में था तो वहां पे मुझे किताबों के टाइटल डिजाइन करने होते थे। मैगजीन के कवर डिजाइन करने होते थे। तो ये कलर थरी वगैरह मैंने सीखा था। तो यह ब्लू कलर जो है वह एकदम पीसफुल और कार्मिंग कलर है। तो देखिए कि उसने ब्लू वाइट लाइट ब्लू वाला जो कॉम्बिनेशन किया है यह एकदम ठीक किया है। और यहां पे देखिए कि शक्ति क्या है? शक्ति इज लाइक ए प्राइमल एनर्जी द एक्टिव स्टेट। द सेम रियलिटी एंगेज्ड इन द कॉस्मिक फंक्शनंस ऑफ क्रिएटिंग प्रिजर्विंग एंड डिस्ट्रइंग द यूनिवर्स। यह सृष्टि स्थिति प्रलय जब ब्रह्म कार्य करता है तो सृष्टि स्थिति प्रलय करता है। तो यह सृष्टि स्थिति प्रलय का यह जो चित्र भी उसने बनाया है रेड कलर। रेड कलर है रजस का चिन्ह। यह जो लाइट ब्लू कलर है सत्व का वो माने वो रिप्रेजेंटेटिव। तो ये रेड कलर है वो रजस रिप्रेजेंट करता है। तो देखिए कि उसने परफेक्ट कलर कॉम्बिनेशन यहां पे लिया है एक्टिव स्टेट। और यह फिर क्या है कि वेव्स इन द वाटर। जब पानी स्थिर होता है तो वह ब्रह्मन है। और जब यह तरंगायित होता है तो शक्ति है। तो वेव्स इन द वाटर द डायनेमिक क्रिएटिव पावर दैट मेक्स द स्टिल ओशन ऑफ ब्रह्मन अपीयर एस द यूनिवर्स। इसने ये और यह शब्द सब उसी के हैं। मैंने तो पूरा कथामृत में से ही बोला था कि पूरे कथामृत को पढ़कर के उसमें से बनाना। तो यह स्ट्रक्चर ये कॉनसेप्चुअल आर्ट कांसेप्ट फिर ये जो कैप्शनंस वगैरह सब उसने अपने से बनाया। फिर क्या कहता है विद फॉर्म एंड पर्सनालिटी जो शक्ति है शक्ति तो मां काली मां काली का खुद का तो अपना एक नेचर था एक स्वभाव था। द दिस एस्पेक्ट इज नोन एस शक्ति और काली। यहां पे स्पेलिंग मिस्टेक है किंतु एनीवे शक्ति और काली। द डिवाइन मदर हु कैन बी वशिप्ड विद फॉर्म। देखिए कि वही काली जो ठाकुर मंदिर में जब जाते हैं और मां काली के साथ में वार्तालाप करते हैं। ठाकुर कहते हैं कि जब मां काली को शयन करवाने के लिए ले जाते हैं तो काली मां आकर के ठाकुर को कहती है तुम मेरे साथ में ही यह मेरे बेड के ऊपर में शयन करो। जैसे कि बच्चा मां के गोद में सोता है, मां के पास में सोता है। तो अभी देखिए जो लोग देख रहे थे उनको तो मां नहीं दिखती है। उनको तो यही दिखता है कि ठाकुर पता नहीं अपने आप क्या पागल की तरह बातें करते रहते हैं। तो ठाकुर कहते हैं कि अच्छा तुम कहती हो कि मैं तुम्हारे साथ में सोऊं। अच्छा ठीक है मैं सोता हूं। ऐसा बोल के मां के बिस्तर पर उठकर के मां के ही साथ में सो जाते हैं। अभी नेचुरली यह तो लोगों को पता चलेगा तो हल्लागुल्ला हो जाएगा। काली मंदिर में तो बहुत हल्ला हो गया था। मथुर बाबू को पत्र लिखा था वहां के लोगों ने कि छोट भट्टाचार्य जो महाशय ये माय लुची ये बेडाल के खेत दी माने मां काली के भोग की जो पूरी है वो ठाकुर जो है छोट भट्टाचार्य बड़ो भट्टाचार्य अर्थात कि ठाकुर के बड़े भाई छोट भट्टाचार्य अर्थात ठाकुर तो वो क्या कर रहे हैं तो मां के भोग की पूरी जो है वह बिल्ली को खाने को देते हैं। ऐसा बोलकर के मथुरा बाबू के पास में कंप्लेन लेटर भेजा था। तो देखिए कि ऑब्वियसली कोई भी अभी इवन आप इतना सब कुछ देखने के बाद में सुनने के बाद में पढ़ने के बाद में आज रामकृष्ण मिशन के कोई भी मंदिर में कोई भी पुजारी इस तरह की हरकत करेगा तो उसको इमीडिएटली हम लोग छुट्टी पर भेज देंगे कि जाओ थोड़ा सा दिमाग ठीक करके आओ। क्यों? क्योंकि यह ठाकुर ने जो देखा वह इतना अद्भुत था न भूतो न भविष्यति भूतो न भविष्यति अर्थात कि ना ही भूतकाल में इसको देखने को मिला है ना ही हम लोगों को ऐसा लगता है कि भविष्य में ऐसा कभी देखने को मिलेगा। इवन रामकृष्ण वही ठाकुर के नाम से यह संघ प्रारंभ हुआ है। इमेजिन कीजिए कि बेलूर मठ के पुजारी ऐसा कुछ करते हैं तो फिर क्या हालत होगी। तो देखिए कि यह जो ठाकुर का विजन था वैसे तो सत्य घटनाओं पर ही आधारित था। माने कि ठाकुर को सही-सही मां का दर्शन होता था। तो यह जो मां का जो डायनेमिक एस्पेक्ट है देखिए कि इसने कितना ब्यूटीफुली ड्रॉ किया है कि यह यह है ब्रह्म और फॉर्मलेस एंड इंपपर्सनल और यह है शक्ति कि वि फॉर्म एंड पर्सनालिटी। फॉर्म एंड पर्सनालिटी देखिए पर्सनालिटी भी है तो आकार तो है ही है मां का और फिर उनकी एक पर्सनालिटी भी है। एंथ्रोपोमॉर्फिक इसको कहते हैं फिलॉसोफी की लैंग्वेज में। एंथ्रोपोमॉर्फिक का क्या अर्थ है? आप यदि भगवान की कल्पना करेंगे तो अभी मान लीजिए मार्स का मार्स ग्रह है। अभी उसके ऊपर में तो कुछ-कुछ बोलते हैं यह लोग कि लाइफ के कुछ चिन्ह मिले हैं। अभी रिसेंटली पढ़ा मैंने कि आकाश में कहीं पर ऑक्सीजन प्राप्त हुआ है। ऑक्सीजन ना कि ऐसा ही कुछ जो कि दिखाता है कि इट इज पॉसिबल कि स्पेस में और कहीं पर जीवन हो। तो अभी मान लीजिए कि ऐसा कोई ग्रह है वहां पूरा समुंदर से घिरा हुआ है और वहां पर जो हायर लाइफ डेवलप हुई है वो मछली के रूप में हुई है। तो अभी ये मछली रूपी ये जो स्पीशीज है वो यदि अपने भगवान की कल्पना करेंगे तो वह तो मछली के रूप में ही करेंगे ना कि मीन अवतार कि बहुत बड़ी मछली है जो कि भगवान के रूप में है। हम लोग जिस तरह से भगवान विष्णु की कल्पना एक मनुष्य के रूप में करते हैं। एक पुरुष के रूप में करते हैं। तो वे लोग जो है वे लोग एक मछली के रूप में करेंगे। अभी आपने यह साइंस फिक्शन मूवीज वगैरह तो देखा ही होगा। वो चित्र विचित्र एलियन सब होते हैं। तो वह इस तरह के विचित्र एलियन अपने भगवान की कल्पना करेंगे तो वही एलियन के रूप में ही करेंगे। एलियंट गॉड तो देखिए कि हम जब ईश्वर की कल्पना करते हैं तो मनुष्य के रूप में करते हैं। तो यह मनुष्य के रूप में जो माने जो किसी भी चीज को आप मनुष्य की पर्सनालिटी देते हैं इसको कहा जाता है एंथ्रोपोमॉर्फिक। तो देखिए कि अपने जो भगवान है वह भी एंथ्रोपोमॉर्फिक ही भगवान है। वह चाहे विष्णु हो राम वैसे वराह अवतार है वैसे मीन अवतार है। वे तो किंतु क्या है कि वह तो भूतकाल में हो गए सो हो गए और उनका पर्सनालिटी भी यदि आप देखेंगे देह है वराह का देह है शायद मछली का किंतु उनका जो पर्सनालिटी है वह मनुष्य का ही माने मनुष्य की तरह ही पूरा बिहेव करते हैं। तो इसको एंथ्रोपोमॉर्फिज्म कहते हैं कि मनुष्य जो किसी भी चीज की कल्पना करता है उसके ऊपर में वह अपना पर्सनालिटी बिठा देगा। तो यह देखिए कि नॉट ओनली कि यह शक्ति जो है वो उस उसका आकार है नाम और रूप है। उस साथ में ही हम उसको एक एंथ्रोपोमॉर्फिक शक्ति के रूप में देखते हैं। सो पर्सनालिटी भी है विद फॉर्म एंड पर्सनालिटी। तो अभी देखिए कि यह इनसेपरेबल यूनिटी यह जो है ब्रह्म और शक्ति दोनों इनसेपरेबल है। जिसको कि आप ब्रह्म कहते हैं उसी को मैं शक्ति कहता हूं। ठाकुर बार-बार कहते हैं ब्रह्म एंड शक्ति आर आइडेंटिकल। ब्रह्म शक्ति अभेद यह जो हमने पहले भी डिस्कस किया कि यदि उपनिषद का महावाक्य है अहम ब्रह्मासी प्रज्ञानम ब्रह्म तत्वमसी वगैरह तो फिर यहां पे देखिए कि ठाकुर का कथामृत का जो महावाक्य है वो है ब्रह्म शक्ति अभेद तो देखिए कि ब्रह्म एंड शक्ति आर आइडेंटिकल यू कैन नेवर थिंक ऑफ दी वन विदाउट दी अदर बिना एक के आप दूसरे को सोच ही नहीं पाएंगे। तो यह जो आइडेंटिकल नेचर है और यह जो ठाकुर कहते हैं कि यू कैन नेवर थिंक ऑफ दी वन विदाउट अदर इसके उदाहरण ठाकुर देते हैं दे देखिए कि जैसे कि अग्नि और दाहिका शक्ति वो जो फेमस यथाग और दाहिका शक्ति मां का जो श्लोक है तो यदि बिना अग्नि के आप अग्नि की दाहिका शक्ति यानी कि यह जो बर्निंग पावर जो है जो एनर्जी हीट और एनर्जी है उसकी कल्पना नहीं कर पाए। आएंगे और बिना हीट और एनर्जी के आप अग्नि की कल्पना नहीं कर पाएंगे। दोनों अभेद रूप से एक दूसरे के साथ में जुड़े हैं। तो ब्रह्म है अग्नि और उसकी दाहिका शक्ति है वह है शक्ति। और फिर यह जैेम एंड इट्स ब्रिलियंस हीरा आप यदि देखेंगे तो हीरे के साथ में हीरा का यह जो शाइन है जो हीरा की ये जो चमकता है जो हीरा यह जो उसका जो ब्रिलियंस है बिना ब्रिलियंस के आप हीरे को नहीं कल्पना कर पाएंगे और बिना ब्रिलियंस के हीरा नहीं है। बिना हीरा के ब्रिलियंस नहीं है। तो यह दोनों एक दूसरे के साथ में अभेद रूप से जुड़े हैं। वाटर पानी है। और साथ में ही है यह पानी की यह जो वेटनेस अर्थात कि क्या कहेंगे कि उसका गीला करने की शक्ति यानी उसका उसकी वेटनेस यानी कि पानी में जैसे ही आप हाथ डालेंगे देखेंगे हाथ भीग ही जाएगा। अभी आप बोलेंगे कि हवाहवा में मेरा हाथ बिकता है। यह भी संभव नहीं है। और पानी में हाथ डाले और हाथ गीला ना हो। यह भी संभव नहीं है। तो यह पानी और यह उसका यह जो गीलापन और सांप और उसकी तिर्यक गति स्नेक एंड इट्स रिगिंग मोशन। तो सांप जब भी चलता है तो ऐसे ही चलेगा। तिर्यक गति से ही चलेगा। तो ये दोनों को आप अभेद ही देखते हैं। बिना एक के आप दूसरे को कल्पना नहीं कर सकते। सो देखिए कि यह पूरा ठाकुर का ये जो है उसे इसको कहते हैं इनफोग्राफिक्स। कल हमने जो देखा था वो स्लाइड था। स्लाइड में क्या होता है? वह 15 के आसपास स्लाइड वह बनाता है। उसमें काफी डिटेल रहता है। किंतु यह इंफोग्राफिक्स जो है वो सिंगल ग्राफिक्स के भीतर में एक पूरा कांसेप्ट समझाने को ट्राई करता है। तो अच्छा इसने ट्राई किया है। सो एनीवे मैंने सोचा जस्ट आपके साथ में शेयर करूं।

कामिनी-कांचन ही माया है — बस ये दो मन से हटाइए, योग अपने-आप होगा

अभी इसकी ओर चले जाते हैं अपना कथामृत। तो देखिए कि कल हमने देखा था कि मुखजे ठाकुर को पूछते हैं कि योग भ्रष्ट क्यों होते हैं? तो साथ में ही ठाकुर ने कहा कि कामिनी कांचन ही माया है। जैसे ही मन में से यह कामिनी और कांचन के प्रति स्प्रूहा चली गई। साथ में ही अपना मन जो है वह शुद्ध जो मन परमात्मा की ओर ही धावित होगा। यह अभी जैसे हमने देखा ही कि ब्रह्मा और शक्ति अभेद है। हम यदि अपने को शक्ति के इलाके के भीतर में मानते हैं। हम यदि ऐसा मानते हैं कि हां मैं शक्ति की वजह से ही मेरा जन्म है। मैं शक्ति की वजह से ही मेरा अस्तित्व है। तो आप ऐसा मत सोचिए कि अभी शक्ति में से ब्रह्म में जाना होगा तो फिर कितना टाइम लगेगा। जैसे कि सांप और इसकी तिर्यक गति जैसे कि हीरा और उसका यह जो चमकार जो है उसका ब्रिलियंस जो है जैसे कि पानी और उसका गीलापन जो है तो यह अग्नि है और उसकी दाहिका शक्ति है। यह दोनों जिस तरह से अभेद रूप से अविछेद्य रूप से जुड़े हैं। वैसे ही मैं और परमात्मा मैं और ईश्वर अभिन्न रूप से अभेद रूप से जुड़े ही है। मुझे यह क्यों नहीं समझ में आ रहा है कि मैं दाहिका शक्ति हूं। किस अग्नि की? ब्रह्म रूपी अग्नि की मैं दाहिका शक्ति हूं। मुझे यह क्यों नहीं समझ आ रहा कि यह ब्रह्म रूपी हीरे का यह ब्रिलियंस मैं हूं। मुझे यह क्यों नहीं समझ आ रहा। ब्रह्म रूपी समुंदर का जो गीलापन है वो मैं हूं। मुझे यह क्यों नहीं समझ आ रहा कि सर्प रूपी ब्रह्म की यह तिर्यक गति है। वह मैं हूं। अभेद अभिन्न रूप से मैं ईश्वर के साथ में परमात्मा के साथ में जुड़ा हूं। यह क्यों नहीं समझ में आ रहा? क्योंकि मेरे मन के ऊपर में यह कामिनी और कांचन के प्रति स्पूहा का एक आवरण एक अज्ञान रूपी बंधन बैठा हुआ है। जिस क्षण में इस बंधन को दूर करूंगा साथ में ही यह अभेद रूप से मैं परमात्मा के साथ में मेरा आइडेंटिफिकेशन हो जाएगा। मेरा जो सही स्वभाव है, मेरा जो सही नेचर है, रियल नेचर, वह साथ-साथ में ही मुझे यह ज्ञात हो जाएगा। तो इसीलिए ठाकुर ने कहा कि आत्मा या तो परमात्मा है वह मैग्नेट की तरह है और जीवात्मा है जैसे कि एक सुई की तरह ईश्वर रूपी मैग्नेट सुई को कहीं मेहनत करके मैग्नेट के पास जाने की जरूरत नहीं है। मैग्नेट वैसे ही सुई को अपने पास में खींच लेता है। किंतु वही बात है कि मिट्टी लगी हुई है सुई के ऊपर में। तो जैसे ही इस मिट्टी को हटा दिया वैसे ही सुई उड़कर के मैगनेट की गोद में जाकर बैठ जाएगी। हम लोगों को पता चल जाएगा कि हम वही शुद्ध मति सरल पवित्र बालक शिशु संतान है और मां है हमारी जननी और मां की गोद में जीवन बीटता ना यह जितने दिन देखिए विदेह मुक्ति जब तक मृत्यु नहीं होता है या तो फिर आखिर में महासमाधि नहीं होती है जब तक देह धारण है तब तक तो यह मां और बच्चे का संबंध हमको रखना पड़ेगा। ठाकुर कहते हैं कभी-कभी मैं सोचता हूं आमी आमी और तुम ही तुम तुम्ही तुम किंतु कभी-कभी होता है कि तुम ही तुम तुम्ही तुम ही होए जाए आमी कोथाऊ खूंजे पना माने मैं कभी-कभी सोचता हूं मैं मैं हूं तुम हो किंतु कभी-कभी हो जाता है तुम ही तुम हो जाता है फिर मैं कहां हूं मैं कौन हूं यह खोज करके भी मुझे मिलता नहीं तो कभी-कभी हम मां की गोद में बैठेंगे शिशु होकर के मां का जो स्नेह है उसको प्राप्त करेंगे और कभी-कभी पता चलेगा कि मैं वही मां हूं वही जगत जगत जननी जगत धात्री यह जो आद्या शक्ति मैं वही हूं और फिर मां और यह जो ब्राह्मण है शक्ति एक ही है तो फिर यदि मैं शक्ति के साथ में अपने को आइडेंटिफाई करता हूं तो मैं ब्राह्मण के साथ में भी आइडेंटिफाई कर लूंगा। शब्दों की रमत थोड़ी विचित्र है। हायर कांसेप्ट जितने ही अद्वैत वेदांत में जाएंगे उतना ही चित्र विचित्र शब्द आते जाएंगे। ये सुपरपजीशन नील्स बोर्न कि जो उस समय का फेमस क्वांटम डायनेमिक्स का साइंटिस्ट था तो वो कहता है कि यदि कोई ऐसा दावा करता है कि मुझे क्वांटम डायनेमिक्स समझ में आ गया है तो बिल्कुल पक्का समझिए कि उसको कुछ समझ में नहीं आया क्योंकि जिसको समझ में आया है वे लोग हमेशा यही कहेंगे कि मुझे कुछ समझ में नहीं आया। मैंने क्वांटम डायनामिक्स इज सो स्ट्रेंज सो वियर्ड। सो अद्वैत वेदांत भी देखेंगे कि ये सुपरपजीशन वगैरह यहां पे ब्रह्म और शक्ति एक और अभेद यह उसी तरह का है। जो ऐसा दावा करेगा मुझे समझ में आया है वह कभी समझ में नहीं आएगा। ठाकुर ने खुद ने कहा है। ठाकुर की लैंग्वेज में कहे तो सब कुछ झूठा हो गया है। ब्रह्म झूठा नहीं हुआ। ब्रह्म का क्या स्वरूप है? शब्दों से कभी वर्णन उसकी वर्णना नहीं की गई है। उसको सिर्फ आपको साक्षात्कार करके ही उसकी अनुभूति ही करनी है। इसके बाद में इतना तो हमने कल देखा था।

कामिनी-कांचन रूपी मन के मैल से कैसे मुक्त हो? 1) ईश्वर-दर्शन के लिए व्याकुल होकर क्रंदन करो—अश्रुधारा मन का मैल धो देगी

उसके बाद में मुख फिर प्रश्न करते की रूप परिष्कार होए। मैं ऊपर में ठाकुर ने कहा ना कि कामिनी कांचन रूपी ये जो कीचड़ है सुई के ऊपर में लगा है जब तक वो उसको आप शुद्ध नहीं करेंगे तब जब तक आप उसको साफ नहीं करेंगे परिष्कार नहीं करेंगे तब तक सुई जो है चुंबक के साथ में उसका मिलन संगम होने वाला नहीं है तो मुख प्रश्न करता है किस तरह से यह कीचड़ जो है सुई के ऊपर में से परिष्कार कर सकते हैं श्री रामकृष्ण ठाकुर क्या कहते हैं तार जनो बैकुल होए काो तार अर्थात कि ईश्वर के लिए व्याकुल होकर के रो से जो माटी ते लागले धुएधए जावे वही जल जो है मिट्टी से लगेगा तो मिट्टी जो है वह क्लीन हो जाएगी देखिए इतना सुंदर ठाकुर का यह जो विजुअल एक एक सीन खड़ा करते हैं आप ईश्वर के लिए रोइए जैसे ही आंख आंखों के यह जो अश्रू है यह अश्रू विगलित होकर के आपके हृदय तक जाएंगे तो हृदय में यह जो कचरा जो सब जमा है सब क्लीन हो जाएगा इस अश्रुवारी से आंखों के जल से यह हृदय का कचरा जो है जो सब ठीक हो जाएगा क्लीन हो जाएगा जोखन खूब परिष्कार होवे तो चुंबके टेनेल जब खूब परिष्कार होगा तब यह सुई जो है तब यह मैग्नेट जो है सुई को खींच लेगा जोग तभी होबे योग तभी होगा। देखिए मुख्ज कहते हैं आहा की को था। मुख कहते हैं आहा कितनी सुंदर बात म ठाकुर का ये जो विजुअल एक्सप्रेशन जो है देखिए कि मुख जैसे लोग कि जिन लोगों को बेचारे को थोड़ा बहुत वेदांत में प्रवेश तो किया है किंतु ज्यादा कुछ समझ नहीं पाते हैं वैसे थोड़ा बहुत तो पता है इसलिए तो ऊपर में कह दिया कि यह जो सुचि नाम श्रीमतामंग है ठाकुर ने जैसे ही कहा कि अब धनी है योग भ्रष्ट है तो धनी होके अब जन्मे है तो साथ में ही उसने कह दिया कि गीता का यह श्लोक यानी कि उसको थोड़ा बहुत तो पता है। धर्म के रास्ते पर उसने थोड़ा बहुत तो मेहनत किया है। आगे बढ़ने का, शास्त्रस्त्र समझने का थोड़ा तो प्रयास किया है। किंतु यह थोड़ा सा ही प्रयास उस मंद वैराग्य ज्यादा आगे नहीं जा सकता। तो फिर ऐसे लोगों को आजकल हम सभी का मंद वैराग्य ही है। उन्हें तीव्र वैराग्य वाले रेयर किसी को देखने को मिलेगा। तो इंक्लूडिंग मायसेल्फ तो देखिए कि हम लोग जो कि मंद वैराग्य वाले हैं शास्त्र में इतना अकल नहीं जाता है और यदि हम पढ़ने का प्रयास भी करते हैं तो हमारे लिए वो सब वाक्य की रमत से ज्यादा और कुछ नहीं दिखता तो हम लोगों के लिए एक विजुअल ये इंफोग्राफिक्स ये ठाकुर का इंफोग्राफिक्स है। देखिए ठाकुर के कथामृत पे आप इनफोग्राफीस बनाने तो जाएंगे तो इतना सुंदर बनेंगे क्योंकि ये तो विजुअल सब ठाकुर जो ये उपमाएं देते हैं ना इतना ब्यूटीफुली आप उसको विजुअलाइज कर सकते हैं कि रो ईश्वर के लिए जितना रोएंगे जितना यह अश्रुवारी बहेगा उतना ही यह अश्रुवारी जो है देह के ऊपर में मन के ऊपर में कीचड़ लगा है उसको धो करके उसको साफ कर देगा तो वरह नगर का एक सुंदर उदाहरण है स्वामी जी के छोटे भाई महेंद्रनाथ तो मोहिन बाबू तो मोहिन बाबू वहां पर गए हैं मठ में देखा कि शरद महाराज बड़े ही उदासीन होकर के बैठे हैं तो शरद महाराज और महापुरुष महाराज तो महापुरुष महाराज को माने दिव्य उदासीनता देखिए यह जो एक जनरल डिप्रेशन जो होता है वह एक सांसारिक चीजों को लेकर के वह एक डिप्रेशन होता है और यह जो दिव्य उदासीनता होती है वह एक बिल्कुल अलग चीज है कि ईश्वर प्राप्ति क्यों नहीं हो रही है? उसके लिए जो व्याकुलता है उसके लिए जो तीव्र आकांक्षा है वह जब फुलफिल नहीं होती है तो कभी-कभी यह दिव्य उदासीनता आकर के मन पर सवार हो जाती है। तो शरद महाराज का भी ऐसा एक भाव था कि इतना मेहनत करने के बाद में भी क्यों कुछ नहीं मिल रहा? तो फिर यह महापुरुष महाराज शरद महाराज को कहते हैं कि शरद तुम यह बाया धरो तो अर्थात कि तबला जो है वो तबला तबले पर ताल दो मैं और जैसे ही शरद महाराज ने तबले पर ताल देना शुरू किया वो जो तबला बजाना तो महापुरुष महाराज गीत गाते हैं। तो ये मोहिन बाबू लिखते हैं कि देखिए कि वराह नगर मठ वैसे ही भूतिया मकान है। आसपास में ऐसा कोई जन शून्य वातावरण है। लोग भी कोई नहीं है। और इतना सुंदर वह जो एटमॉस्फियर उसमें यह अपने हृदय के आवेग से महापुरुष महाराज गा रहे हैं। और यह शरद महाराज साथ में ही यह तबला बजा रहे हैं। इट्स अ वन ऑफ द बेस्ट सीन डिवाइन सीन जो कि मैंने देखा। तो देखिए कि यह आंखों में से जब अश्रू गिरते हैं। ठाकुर कहते हैं ना मैं रोते-रोते मिट्टी में अपना मुंह घिसने लगता था। मां के लिए मैं इतना रोता था। तो फिर सब लोग इकट्ठा हो जाते थे और बोलते थे यह इतना रो क्यों रहा है वो सांसारिक बुद्धि वाले लोग तो तो आपस में बातें करते हैं ठाकुर खुद कहते हैं ठाकुर को ये सुनाई देता था वैसे तो ठाकुर खुद कहते हैं कि ये लोग इकट्ठा हो जाते फिर पूछते आपस में कि ये क्यों इतना रो रहा है तो दूसरा बोल रहा है कि पेट में शूल वेदना हुई है इसलिए लग रहा है रो रहा है शूल वेदना अर्थात कि तीव्र वेदना पेट में जब तीव्र दर्द होता है तो आदमी जैसे रोता है तो दूसरा वो बोलता है कि पेट में बहुत जोरों का दर्द हो रहा है इसलिए लग रहा है कि रो रहा है और मिट्टी पे अपना मुंह घिस रहा है। तो देखिए कि वह लोगों का रोना है। सांसारिक पेट में जब तीव्र वेदना होगी तब वे लोग रोएंगे। और यहां पर रोना क्यों है कि ईश्वर प्राप्ति के लिए देखिए ठाकुर को ईश्वर दर्शन हो चुका था। किंतु अभी उनके मन की जो वासनाएं हैं ना वह समाप्त नहीं हो रही है। जैसे यह सांसारिक आदमी है। 1000 मिलेगा तो बोलेगा 1 लाख चाहिए। 1 लाख मिलेगा तो कहेगा एक करोड़ चाहिए। एक करोड़ मिलेगा तो कहेगा 100 करोड़ चाहिए। तो देखिए कि उसके मन की वासना का जैसे अंत नहीं है। यहां पर यह जो दिव्य वासना है दिव्य आकांक्षा या तो फिर कहेंगे मुमुक्षुत्व उसका भी ठाकुर में अंत नहीं है। एक बार दर्शन हुआ तो नहीं हुआ। इससे नहीं चलेगा। जैसे रोते-रोते मां काली के सामने बार-बार विनती कर रहे हैं। कह रहे हैं कि मां दर्शन दो और यदि नहीं दोगी तो आखिरी जो उपाय है मां का ही खड़ग उठा के अपना गला काटने को चले थे। तब तो वह एक दर्शन दे दिया। किंतु उसके बाद में भी यह दिव्य क्रंदन है वह थमता नहीं है। दिन प्रतिदिन ठाकुर व्याकुल होकर के रोते ही रहते हैं। सतत दर्शन चाहिए। एक बार दर्शन से नहीं चलेगा। सतत दर्शन चाहिए। तो यह सतत सब समय दिव्य भाव में रहने की ठाकुर की वासना थी। तो यह मुमुक्षत्व यह तीव्र आकांक्षा पूर्ण करने के लिए ठाकुर स्वयं क्रंदन का सहारा लिए। तो देखिए कि बाकी जो साधनाएं तो ठाकुर ने बाद में की। यह तोतापुरी आए तो वेदांत साधनाएं करवाई। भैरवी ब्राह्मणी आई तो तंत्र साधना करवाई। वो गोविंद राय आया तो फिर इसके साथ में इस्लाम साधना की वगैरह सब साधनाएं तो ठाकुर ने बाद में की। प्रथम जो साधना थी ठाकुर की वो थी दिव्य क्रंदन साधना। वो बस रोते-रोते ही तीव्र आकुलता से मां को प्रार्थना करके ही ठाकुर ने सर्वप्रथम मां काली का दर्शन प्राप्त किया था। यह सर्वप्रथम हमको पता है कि केनाराम भट्टाचार्य ठाकुर के प्रथम गुरु जिनके पास में ऐसे ठाकुर ने शक्ति मंत्र लिया था और अपने पिता बड़े भाई रामकुमार रामकुमार ने जब कहा कि अभी मेरा देह तो इतना काम नहीं कर रहा। बेटर है कि यह मेरा छोटा भाई ही पूजा का भार ग्रहण करें तो मथुर बाबू भी खुश हो गए। ठाकुर ने भी कहा कि यदि यह मां के यह वस्त्र और आभूषण इसकी जवाबदारी आप मुझे ना दें। यदि हृदय को दें। ठाकुर का भांजा और ठाकुर का सेवक और वो एकदम वो मस्कुलर और पहलवान जैसा था और अग्रेसिव भी इतना था तो यह हृदय भी रेडी हो गया कि ठीक है चलो ये मां काली के गहनों की जिम्मा जिम्मेदारी है वह सब मैं लूंगा तो फिर ठाकुर मुक्त मन से वह पूजा कर पाएंगे तो उस समय जो ठाकुर ने प्रथम पूजा करने का प्रारंभ किया केनाराम भट्टाचार्य से शक्ति मंत्र ग्रहण किया और फिर धीरे-धीरे करके पूजा में ऐसा डूब गए गए। रोते-रोते मां काली को कहते थे कि मां राम प्रसाद को दर्शन दिया है। कमलाकांत को दर्शन दिया है। मुझे क्यों नहीं दोगी दर्शन? बोलकर के गाना गा रहे हैं। वो मां काली की आराधना का शाक्त पदावली और आंखों में से सतत अश्रुधाराएं बह रही है। सतत अश्रुधाराएं बह रही है। ऑफ कोर्स ठाकुर के मन में ऐसा नहीं था कि काम कांचन के प्रति कोई आकर्षण था। वो तो ठाकुर ने पहले ही मना कर दिया कि चाल कोला बांधा विद्या शिकवना अर्थात कि इस तरह की विद्या जिसको सीख करके चाल अर्थात कि राइस कोला अर्थात कि बनाना राइस और बनाना मिले ये जो पुरोहित लोग होते हैं लोगों के घर जाकर पूजा करेंगे तो जो उनको दक्षिणा मिलती है उसमें ये चावल मिलता है और यह केला मिलता है तो ये चावल और केला मिलने वाली विद्या मुझे किसी काम की नहीं है। वह तो ठाकुर ने पहले ही कह दिया था। तो फिर क्या है कि यह जो अश्रु जो है अभी देखिए यह डिस्कशन हमारा लीला प्रसंग में भी काफी हो चुका है कि अवतार यदि शुद्ध पवित्र है तो अश्रुधारा बहा करके उनको कौन सा कीचड़ साफ करना है कौन सा मेला साफ करना है किंतु फिर शरद महाराज भी कहते हैं कि देखिए कि तमस और रजस का एक अंश यह लोग यदि न धारण करें तो फिर क्या है कि उनको देखकर के उन्होंने जो साधना की है वह साधना करके ईश्वर प्राप्ति की। यह सबक ही हम लोग नहीं सीखेंगे। हम लोग कहेंगे कि साधना वे लोग करें जो कि ऑलरेडी शुद्ध पवित्र है। जिन लोगों के पास में ब्रह्मचर्य पालन करने की क्षमता है। मैं तो संसारी हूं। यह काम कांचन में डूबा हूं। मेरे से ब्रह्मचर्य का पालन कभी होने वाला नहीं। तो मेरे लिए साधना भी की किसी काम की नहीं। तो इस तरह से एक नेगेटिव एक उल्टा ना सीख करके आए। उल्टो समझली राम बांग्ला ते बोले अरे राम ये उल्टा समझ लिया उसने ये उल्टा ना समझ ले ठाकुर के जीवन से इसलिए शरद महाराज स्पष्ट लिखते हैं कि अवतार के जीवन में भी कहीं-कहीं कुछ ना कुछ अपूर्णताएं होती है जिसको कि पार करके जिसको कि साधना के माध्यम से पूर्णता में कन्वर्ट करना है। तो यह शरद महाराज स्वयं लीला प्रसंग में यह बात कहते हैं। तो यहां पे भी यह जो फर्स्ट फेज ऑफ साधना है कामार पुकुर जाने से पहले फिर यह जो बार-बार रो रहे हैं दिगंबर होकर के घूमते हैं मां काली का जो भोग का प्रसाद बिल्ली को खिला देते हैं। मां काली के बिस्तर पर ही शयन कर लेते हैं। तो यह जो सब कहानियां गई कामरार पुकुर में और फिर चंद्रामणि को लगा वह 10 लोग होते हैं ना उपदेश देने वाले उन्होंने चंद्रामणि देवी को कहा बच्चे की शादी करवा दीजिए तो अकल ठिकाने आ जाएगी तो फिर चंद्रामणि ने वो गदाधर को वहां कामार पुकुर बुलाया फिर वो मां का संधान प्रारंभ हुआ और फिर मां के साथ में विवाह हुआ तो यह जो कामार पुकुर वाला जो दो साल का जो फेज है 1858 से लेकर के 1860 यही जो ऑलमोस्ट एग्जैक्ट ईयर भूल गया किंतु यही दो साल है। तो यह दो साल के बाद का साधना और पहले की साधना बाद में जो वापस आए जब ठाकुर तो सब साधनाएं विधिवत होने लगी। भैरवी ब्राह्मणी आई, जटाधारी आया, तोतापुरी आए वगैरह तो एक के बाद एक विधिवत साधनाएं होने लगी। किंतु यह जो फर्स्ट फेज ऑफ साधना है कामारपुर जाने से पहले और मां काली की पूजा का जिम्मा स्वीकार करने के बाद की। यह जो ऑलमोस्ट चार साल है ऑलमोस्ट आई थिंक कि 1854 से 1858 का जो टाइम है यह चार साल ठाकुर ने क्रंदन साधना ही की है। दिव्य क्रंदन आंखों से सतत अश्रु की धारा बह रही है। मां से एक पल का भी विच्छेद सहन नहीं होता है। एक पल भी यदि मां का दर्शन बंद हो जाए तो रो-रो करके पूरे जगत को इकट्ठा करते थे। तो वो थे कि ठाकुर की साधना का विवरण। तो यहां पर ठाकुर जो कहते हैं वो बिल्कुल अपने अनुभव से कहते हैं कि तार जन व्याकुल होए काो। उनके लिए व्याकुल होकर के रोई जो माटी ते लागले धोए जावे। वही जल मिट्टी से लगेगा तो धुल जाएगा। क्या धुल जाएगा? मिट्टी धुल जाएगी जोन खूब परिष्कार होवे तो चुंबके टेनेल होबे जब बहुत परिष्कार हो जाएगा तब चुंबक उसको खींच लेगा क्या परिष्कार हो जाएगा तो सुई जोग तभी ही होबे योग तभी होगा तो मुखज्ज कहता है आहा की कथा आहा कितनी सुंदर बात देखिए हम या आप इस तरह की बातें करेंगे तो मुखज्ज मुझे नहीं लगता कि आहा करके वह प्रशंसा करें हम लोगों के लिए सब तोते की तरह है रट के पढ़ के बोला है। जबकि ठाकुर जब बोलते हैं तो क्या है कि अपने अनुभव से कहते हैं। वही जो पहले की फर्स्ट फोर इयर्स फेज वन साधना का उसमें जो उन्होंने क्रंदन साधना की उसका डिस्टिल्ड एसेंस ठाकुर यहां पर बता देते हैं। और इसीलिए मुख इतना इंप्रेस हो जाता है। अनुभव से यह बात आती है। कहीं सुनाई बात नहीं है। यह उपनिषद में पढ़ लिया या महानिरवाण तंत्र में पढ़ लिया या तो फिर यह सूरदास की पदावली में पढ़ लिया ऐसा नहीं है। ठाकुर ने यह प्रैक्टिकल करके यह बात बोल रहा है। श्री रामकृष्ण फिर से

भक्ति मार्ग से -- ईश्वर-दर्शन के लिए -- क्रंदन करने से प्राप्त होते है कुम्भक और समाधी

कहते हैं तार जन काते पारले दर्शन होय समाधि होय उनके लिए रो पाओगे तो दर्शन भी होगा समाधि भी होगी। अगेन फेमस माने ठाकुर को रोते-रोते सबसे पहला जो दर्शन हुआ था मां का ऐसे ही हुआ था। रो रहे हैं रो रहे हैं और किंतु ठाकुर ने यहां पे वो बात नहीं कही कि सुसाइड भी करने के लिए तैयार रहना होगा। वो जो बात है ठाकुर ने यहां पे नहीं की। एटलीस्ट इतना तो कह दिया कि रो सकोगे यदि ईश्वर के लिए तो उनके दर्शन भी होंगे समाधि भी होगी। जोगे सिद्ध होले समाधि योग में सिद्ध होने से ही समाधि काले कुंभक आपनी होए तार पर समाधि रोने से क्रंदन करने से कुंभक अपने आप होगा और फिर उसके बाद में ही समाधि देखिए कि जब ये जो पढ़े लिखे लोग हैं ना गीता फीता पढ़ के आए हैं ये मुखजे तो उनको थोड़ा सा यह आश्चर्य तो होगा ही कहां गीता में सब इतनी बड़ी-बड़ी बातें लिखी है उपनिषद में यह जो सब उपासना एं साधनाओं का वर्णन है। यहां पर ठाकुर कहते हैं सिर्फ रोते-रोते ही आपको ईश्वर के दर्शन हो जाएंगे। यह कैसे पॉसिबल है? तो फिर ठाकुर उनको समझाने के लिए एक सेकंड ट्रैक इस्तेमाल करते हैं। क्या कहते हैं कि आपको तो पता ही होगा कि योग में सिद्ध होकर के समाधि होती है। किंतु इसके पीछे का मैकेनिज्म क्या है? तो यह अष्टांग योग में प्राणायाम का एक बहुत बड़ाेंस है और प्राणायाम में भी कुंभक का एक बहुत बड़ाेंस है। तो आप सोचते होंगे कि पहले तो मैं यह श्वास प्रश्वास को रोक करके कुंभक प्राप्त करूंगा और फिर मुझे ईश्वर दर्शन होंगे। तो यह जो आप लंबी-लंबी बातें जो सोच रहे हैं तो यहां पर देखिए आपके पास में शॉर्टकट है। रो के ईश्वर को पुकारने से कुंभक अपने आप हो जाएगा। सो ठाकुर यहां पे वो मैकेनिज्म भी बता देते हैं। यदि आप योग मार्ग का रास्ता अपनाते हैं और यदि अष्टांग योग के अलावा यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धरणा, ध्यान, समाधि यह सब चीजों के बारे में सोचते हैं तो देखिए कि कुंभक जो है अष्टांग योग का एक बहुत ही इंपॉर्टेंट पार्ट है। और यदि आप क्रंदन करेंगे तो फिर कुंभक अपने आप हो जाएगा। तार पर समाधि और उसके बाद में समाधि होगी। यह अष्टांग योग में है ही है। सर्वप्रथम है यम। उसके बाद में है नियम। उसके बाद में है आसन। उसके बाद में है प्राणायाम। तो प्राणायाम का इंपॉर्टेंट पार्ट है कुंभक। तो प्राणायाम के बाद में ही है प्रत्याहार, धरणा, ध्यान और समाधि। तो यह प्राणायाम तक यदि आप पहुंच गए तो समाधि में अभी ज्यादा देर नहीं है। तो ठाकुर कहते हैं कि ऐसा मत सोचो कि बहुत ज्यादा कुछ कॉम्प्लिकेटेड करना होगा तभी मुझे यह सब प्राप्त होगा। नहीं सरल हृदय से ईश्वर को पुकारने से भी ईश्वर दर्शन होगा। और हमको यह भी पता है लीला प्रसंग में शरद महाराज ने स्पष्ट रूप से डिस्क्रिप्शन दिया है। कहा है कि जब सर्वप्रथम दर्शन ठाकुर को हुआ मां का वही गर्भगृह में मां का खड़ग हाथ में ले गला काटने को गए थे। उस समय जो ठाकुर को दर्शन हुआ था। उस दर्शन का विवरण ठाकुर इस तरह से करते हैं। कहते हैं कि चारों ओर से समुंदर की लहरों की तरह प्रकाश की किरणें प्रकाश की तरंगे आकर के मेरे ऊपर छा गई और फिर मैंने होश गवा दिए। यानी कि मैं समाधि में चला गया। तो फिर शरद महाराज कहते हैं कि क्या प्रथम दर्शन ही मां ने इस तरह से अपने निर्विकार स्वरूप का दिया था। निराकार स्वरूप का दिया था क्या? तो देखिए वि इज अ कंट्राडिक्शन अगेन ठाकुर आराधना करते हैं मां काली की आशा रखते हैं साकार रूप में आकर दर्शन देगी किंतु प्रथम दर्शन ही जैसे कि निराकार हुआ था तो यह यह सब ठाकुर की एग्जजेक्टली अनुभूत की हुई बातें हैं। हवाहवा में कुछ नहीं है। उनके लिए रोना होगा। रो के आप प्रार्थना करेंगे तो दर्शन होगा और दर्शन जैसे ही होगा समाधि होगी। क्योंकि ठाकुर को प्रथम जो दर्शन हुआ था दर्शन की वजह या तो फिर दर्शन के साथ-साथ में ही समाधि प्राप्त हो चुकी थी। तो योग योग में सिद्ध होने से ही समाधि तो समाधि प्राप्त करने का यह अष्टांग मार्ग है। जीवन भर यम नियम का पालन करते जाइए। आसन प्राणायाम करते जाइए। नेति धोती कुंभक वगैरह करते जाइए और फिर बैठकर के लंबे समय तक अपनी नासिका का जो अग्र भाग है यहां पर दृष्टि केंद्रित करके ध्यान करते जाइए वह सब करते जाइए उसके बाद में हो सकता है समाधि मिले और यहां पर सरल सहज रास्ता है ईश्वर को प्रार्थना करके करके रो कहो कि मां दर्शन दे मैं तुम्हारा अबोध असमझ संतान हूं मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा है संपूर्ण रूप से तुम्हारे पे ही भरोसा करके संपूर्ण रूप से तुम्हारे ही शरणागत होकर मैं बैठा हूं। तुम यदि दर्शन नहीं दोगी तो मेरा क्या होने वाला है? संसार में मेरा तुम्हारे अलावा और कोई नहीं है। तुम गाड़ी मैं गाड़ी हूं। तुम गाड़ी चलाने वाली इंजीनियर हो। मैं घर हूं। तुम घरणी हो। देखिए कि ठाकुर इस तरह से जो प्रार्थना करते हैं तो प्रार्थना करके ही फिर आपको होगा योग म कुंभक होगा और कुंभक के बाद में ही होगी समाधि। इसके बाद में ठाकुर ध्यान के बारे में बोलते हैं जिसके लेकर थोड़ा ज्यादा चर्चा करेंगे अभी हम अपने नेक्स्ट क्लास में। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु

प्रश्न: साधना के प्रारम्भ में तो हम ईश्वर के बारे में जानना शुरू करते हैं। फिर ईश्वर-प्राप्ति के लिए रोना और अश्रु बहाना तो साधना के अंतिम मुकाम पर होना चाहिए, न कि प्रारम्भ में। दूसरा, यदि क्रंदन-योग इतना सहज होता, तो उसका सहारा लेकर ईश्वर-प्राप्ति करने वालों में हमने केवल ठाकुर को ही क्यों देखा है—और किसी को क्यों नहीं?

देखिए ठाकुर किसको बोलते हैं मोस्ट प्रोबेब्ली विजय कृष्ण गोस्वामी को ही बोलते हैं। बोलते हैं कि तुम हरि नाम कर करके म हरि नाम करते-करते ताली देते देते हरि नाम करके तुम नाचो। लोगों को पता चलने दो कि यह विजय जो है हरि नाम करते-करते पागल हो गया है। यह जो तुम्हारा डिग्निटी जो है मैं धार्मिक प्रचारक हूं वो वेदी पे बैठकर वो प्रवचन देता हूं। डिग्निटी को फेंक दो। हरि नाम करते-करते नाचो। रो लोगों को पता चलने दो कि ये हरि नाम करते-करते पागल हो गया है। यह जो लोक लज्जा जो है लज्जा घृणा भय तीन थकते नहीं ठाकुर जो कहते हैं अष्टपाश का जो एक बहुत बड़ा पाश यह लोगों के मन के ऊपर में ऐसा सवार हो गया है कि यहां तक कि आप देखिए कि वराह नगर के समय में ये जो गुरु भाई ये जो एक इंटेंस तपस्या की उसमें भी रोते-रोते प्रार्थना करना यह ज्यादा आपको नहीं दिखाई देगा। शशि महाराज की आपकी पूजा का जो विवरण है बार-बार हम देखेंगे कि जय गुरु महाराज श्री गुरु महाराज ऐसा करते-करते एक ओर से दूसरी ओर नाचते नाचते घूमते थे उन्होंने भी ऐसे रोते-रोते प्रार्थना नहीं की कि दर्शन दो दर्शन दो देकर के क्यों क्योंकि एक तो है लज्जा लोग क्या कहेंगे दूसरा है घृणा कि सही में ऐसा कुछ होगा क्या तीसरा है भय कि ऐसा करके मैं सही में तो पागल नहीं हो जाऊंगा क्या तो ठाकुर पहले ही कह देते हैं लज्जा घृणा भय तीन थकते नहीं ये तीन हमारे मन पे ऐसा सवार हो गया है कि हम इवन देखिए कि ब्रह्मचर्य पालन करने को हम बोलेंगे अच्छा ये कर लेंगे वन ऑफ द मोस्ट डिफिकल्ट साधना ये समाधि षटक संपत्ति ये श्रम दम ततीक्षा श्रद्धा उपरति समाधान ये कर लेंगे यम नियम ये सत्य अहिंसा अस्तेय अपरिग्रह ब्रह्मचर्य तप शोच संतोष स्वाध्याय ईश्वर प्राणदान ये कर लेंगे किंतु रोना नहीं है क्यों लोग क्या कहेंगे तो यह यह जो अल्टीमेट जो है कि आप ब्रह्मचर्य जो यह जो है काम, क्रोध, मदद, लोभ, मोह, मत्सर उससे भी शायद बच जाए। यह अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, अभिनिवेश शायद उससे भी बच जाए। किंतु ये लोक लज्जा जो है इतनी स्ट्रांग है कि वो हमको जो सबसे सहज रास्ता है वो इस्तेमाल नहीं करने देती। सो इसीलिए ठाकुर कहते हैं लज्जा, घृणा, भय तीन को छोड़ो। लोगों को पता चलने दो कि हरि नाम लेते लेते पागल हो गया है। नहीं एक्चुअली आपने यही बात पहले प्रश्न में ही कर दी थी। उसका उत्तर मैंने दिया नहीं कि यदि यह बात इतनी आसान है तो बहुत ज्यादा लोगों ने इसको किया क्यों नहीं? देखिए यहां पे एक एक बहुत ही एक अब अब जैसे देखिए रिसेंटली मैं थोड़ा सा ग्रेविटी के ऊपर में चिंतन कर रहा था। तो मेरा थोड़ा साइंस का बैकग्राउंड है बोल के थोड़ा बहुत मैं ये सब करता हूं थिंकिंग। तो अभी देखिए कि हम सभी लोगों ने ग्रेविटी के बारे में स्कूल टेक्स्ट बुक में पढ़ा ही है। वह न्यूटन वहां पर बैठा था पेड़ के नीचे में तो सर के ऊपर में एप्पल आकर के टकराया। तो फिर उसने सोचा कि ये एप्पल जमीन पे ही क्यों गिरता है? आकाश में क्यों नहीं जाता? बोल के ये जो लॉज़ ऑफ डायनेमिक्स उसने खोजा। और उसके बाद में हमने स्कूल की किताबों में यह भी पढ़ा कि चार फंडामेंटल फोर्सेस है। एक तो ग्रेविटी है, इलेक्ट्रोमैग्नेटिज्म है, स्ट्रांग न्यूक्लियर फोर्स और वीक न्यूक्लियर फोर्स। ये चार फोर्सेस है। अब अभी रिसेंटली एक कॉस्मिक कांस्टेंट बोल के एक एक्स एक्सपेंशन ऑफ कॉस्मोस बोल के एक नई ये खोजी गई है। किंतु दैट अपार्ट ग्रेविटी इज़ वन ऑफ द फंडामेंटल फोर्सेस ऑफ द नेचर। यह हम पढ़े हैं सीखे हैं स्कूल नोटबुक में। प्रॉब्लम क्या है? जब से आइंस्टाइन आया, आइंस्टाइन ने क्या कहा? कि ग्रेविटी इज नॉट ए फोर्स इन अदर सेंस। क्लासिकल सेंस। ग्रेविटी इज नथिंग बट कर्वेचर ऑफ स्पेस टाइम। जैसे कि आप मान लीजिए अह अह अभी यह मोबाइल है। ठीक है? यह मोबाइल को मैं सीधा रखूंगा और यहां पे एक मार्बल रखूंगा तो मार्बल तो यहीं पे रहेगा। अभी मैं मोबाइल को ऐसा टेढ़ा कर दूंगा तो मार्बल क्या होगा? सीधा वो ये हो जाएगा। स्लिप हो जाएगा नीचे में। तो ग्रेविटी इज़ लाइक दैट। कि स्पेस जो है ऐसा टेढ़ा है। अब पृथ्वी के आसपास में स्पेस जो है वह गोलगोल घूमता है बोल के चांद पृथ्वी के आसपास में घूमता है। ऐसा नहीं कि पृथ्वी के पास में कोई शक्ति है जो कि चांद को खींचती है। व्हिच इज सच अ पावरफुल रिवोलेशन। और यह थ्यरी 100% सच हुई है। म इतना सारा एक्सपेरिमेंट हुआ है कि थ्यरी और इसलिए तो आइंस्टाइन को कहा जाता है वन ऑफ द ग्रेटेस्ट साइंटिस्ट इन द वर्ल्ड। किंतु देखिए कि इवन मैं आइंस्टाइन को पढ़ा है मैंने और इसके बावजूद यह जो ग्रेविटी एक फोर्स है, यह आईडिया ऐसा घर करके बैठा है कि ग्रेविटी फोर्स नहीं कर्वचर ऑफ स्पेस टाइम है। यह मेरे दिमाग में जाते-जाते बहुत समय लगा। तो देखिए कि हम लोग यह जो सब ट्रेडिशनल लिटरेचर पढ़ लेते हैं ना वेदांत पढ़ते हैं। ये भागवत पढ़ते हैं। सब संत महापुरुषों को पढ़ते हैं। फिर प्रॉब्लम क्या है? हम यह नहीं समझते कि देखिए यहां पे भी तो इवोल्यूशन होता है। एक के बाद एक संत महापुरुष आते हैं। युग अनुसार साधना वो सब प्रिस्राइब करते हैं। तो एक समय था दशमूल पाचन। ठाकुर कहते हैं कि एक दश आज के युग में आपको बुखार होगा और दशमूल पाचन लेने को जाएंगे तो रोगी का ई ओर हो जाएगा। आज तो चाहिए फीवर मिक्सचर। फीवर मिक्सचर चाहिए। दशमूल पाचन से होने वाला नहीं। तो क्या है? क्योंकि कलयुग में अन्नगत प्राण है। तो बोलकर के ठाकुर ने मेहनत करके यह साधन पद्धति डेवलप की है। हमको बताई है। तो हम लोगों का प्रॉब्लम वही है कि अभी हम वो आयुर्वेद वाले दशमूल पाचन वाले युग में जी रहे हैं कि यह 10 यम नियम का पालन करना होगा। तब कहीं जाकर कुछ मेल पड़ेगा। यहां पे ठाकुर ने फीवर मिक्सचर ऑलरेडी बना करके दे दिया है हमको। ये सीधा उसको पान सेवन करने से सब भाग जाएगा। किंतु अपनी बुद्धि जो है ना ये इसको क्या कहते हैं ना कि डिसीज ऑफ इंटेलेक्ट माने बुद्धि का रोग बुद्धि का रोग हम सबको लगा है। हम बहुत पढ़ते हैं। बहुत सोचते हैं और फिर सोचते हैं कि इतना पढ़ के इतना समझ करके हमने इतना जो समझा है ठाकुर कहते हैं तो सब एक एक सेकंड में उसको उड़ा करके सिर्फ रोने से ही सब हो जाएगा। हाउ इज दिस इवन पॉसिबल? देखिए यहां पर मैं एक बात कहूं इतने फेमस है। मैं खुद उनको सुनता हूं। किंतु एक बहुत बड़ा डिसर्विस वो क्या कर रहे हैं? पता है वह ट्रेडिशनल रूप से वेदांत सिखाता है। जबकि ठाकुर का जो टीचिंग है ना वह ट्रेडिशनल वेदांत के आगे निकल चुका है। अब हम जितना ट्रेडिशनल वेदांत को पढ़कर के ठाकुर को पढ़ेंगे ना तो ये क्रंदन योग से क्यों हमको मुक्ति मिलेगी? क्यों लोग इसको नहीं कर रहे? यह सब क्वेश्चन खड़े होंगे ही होंगे। क्योंकि सब लोग जो लोग आध्यात्मिक जीवन में प्रवेश करने का प्रयास करते हैं, एक बार तो बुद्धि आजमा लेते हैं। एक बार बौद्धिक लोगों को पढ़ लेते हैं और फिर बौद्धिक लोगों को पढ़कर के एक प्रजुडाइस डेवलप कर देते हैं कि हां हमको एक सिस्टमेटिक मेथड के थ्रू जाना है। फिर जब ठाकुर के पास आते हैं, फिर जब ठाकुर कहते हैं रोते-रोते ईश्वर को पुकारो रो ये अश्रुवारी है। वही आपके काम कंचन को काट लेगी। तो फिर विश्वास ही नहीं होता है कि ऐसा करने से कैसे होगा? फिर ऐसा करने से होगा तो यह वेद वेदांत शंकराचार्य ये सब गलत है क्या? क्यों इतना सब पंथी लिखने की जरूरत पड़ी? ये सब कंफ्यूजन आ जाता है

प्रश्न: क्रंदन-योग के विषय में अभी भी संदेह बना हुआ है। एक बार एक युवक ठाकुर के पास आया—कीर्तन सुनकर उसे भाव हो गया था। किंतु ठाकुर ने कहा कि उसका यह भाव टिकेगा नहीं; जैसे ही स्त्री-संपर्क होगा, भाव भंग हो जाएगा। इसी कारण तो अपने संघ में वैराग्य को इतनी महत्ता दी गई है—पहले वैराग्य, उसके बाद भाव। तो फिर प्रश्न यह है कि ठाकुर साधना के प्रारम्भ में ही रोने और क्रंदन का आग्रह क्यों करते हैं?

ना इट्स अ वेरी गुड एग्जांपल। और वो फिर वो नृत्य गोपाल जो है फेमस ठाकुर उसको कहते हैं साधु सावधान ये कथामृत में फेमस है यह घटना कि बार-बार उसको कहते हैं। ठाकुर उसको पूछते हैं कि क्या तुम उस त्रिभक्त के घर जाते हो? तो बोलता है हां वो मुझे ले जाती है। अब देखिए कि मास्टर महाशय लिखते हैं। अब जैसे ही ठाकुर ने ऐसा सुना साथ में ही कहा साधु सावधान वहां पे ज्यादा जाना मत। वो वात्सल्य भाव में से कब तातल्य भाव में परिणत हो जाएगा कुछ ठीक नहीं। तो मास्टर महाशय लिखते हैं कि इसकी इतनी परमहंस अवस्था ठाकुर खुद कहते हैं नृत्य गोपाल की परमहंस अवस्था है। और इसको भी ठाकुर इस तरह से सावधानी करते हैं। सावधान करते हैं कि वहां पे ज्यादा मत जाना। तो क्या है कि दिस इज और म सिर्फ अपने भावधारा में यह चैतन्य देवो हरिदास वगैरह की कहानी कि नृत्य कीर्तन करते-करते रोते-रोते किसी के चक्कर में पड़ गए और फिर वो पूरा सब कुछ नष्ट हो गया। ये कहानियां बड़ी प्रसिद्ध है। उस बात में कोई प्रश्न ही नहीं है। अपने संग में स्वामी जी स्वयं कहते हैं कि यह जो मधुर भाव रोना धोना सब दूर कर दो और शिव के भाव से अपने को भर दो। सो ठाकुर की पूरी लाइफ अपनी नजरों से देखने के बाद में स्वामी जी यह बात करते हैं। सो दिस इज उस इस बारे में कोई प्रश्न ही नहीं है। किंतु देखिए कि अगेन मैं यह कहूंगा कि स्वामी जी ने यह जो बात कही थी कि शिव के भाव से अपने को भर दो वो उस समय कही थी जबकि भारत तमस में डूबा हुआ था। तो तमस से रजस में आने की जरूरत थी। एक बार आप रजस में आ जाते हैं तो मुझे लगता है कि यहां से सत्व का जो रास्ता है वह क्रंदन योग जो है काफी यूज़फुल है। क्यों? क्योंकि ठाकुर स्पष्ट कहते हैं कि आंखों के आंसुओं से काम कांचन धुलते हैं। राइट? तो दिस इज अ प्रॉपर एप्लीकेशन ऑफ क्रंदन योग। अभी बिना सोचे समझे आप रोना धोना शुरू करें। देखिए रोना धोना माने क्रंदन करना है ईश्वर प्राप्ति के लिए। नहीं कि लोगों के सामने दिखावा करने के लिए। जब आप दिखावा करने के लिए यह सब कुछ करते हैं तो नेचुरली है कि काम कांचन आएगा। तो यह बात है कि यह इतना तो क्लियर क्लेरिटी होनी चाहिए कि भाई मैं जो रो रहा हूं ईश्वर के लिए रो रहा हूं। और ईश्वर के लिए यदि रोऊंगा तो अश्रुवारी कामकांचन को भगा देंगे। सो दैट मच इज क्लियर। प्रॉब्लम कहां आएगा कि अभी दिखावा करने का शुरुआत करेंगे। वो सब डिवोटी देख रहे हैं तो उनके सामने मैं नृत्य कर रहा हूं तो डिवोटी लोग वाहवाह करेंगे। यह जो भाव एक बार आ जाएगा तो फिर तो काम कांचन में और ज्यादा जड़ित हो जाएंगे। सो दैट पर्पस क्लेरिटी ऑफ़ पर्पस इज वेरी नेसेसरी। स्वामी जी ने जब यह कहा कि शिव के भाव से अपने को भर दो। वो उस समय की बात थी कि जबकि भारत इस तरह के तमस में डूबा हुआ था कि कितना हजार रोल कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। किंतु देखिए ठाकुर जैसे कहते हैं ना अगेन विजय गोस्वामी कोहिम मोस्ट प्रोबेबबली कि लोगों को पता चलने दो कि ईश्वर के लिए पागल हो गया है। तो अभी मान लीजिए कि हम एक्सक्लूसिव क्रंदन योग पर डिपेंड करें ना करें। लेट अस गिव इट अ चांस कि लोगों को लगने दो कि हम लोग ईश्वर के लिए रो रहे हैं। लज्जा, घृणा, भय यह जो जब तक है तब तक हम इवन यह सब साधनाओं में भी ज्यादा आगे नहीं बढ़ पाएंगे। सो देखिए मैंने शुरू में जब पहली बार पढ़ा था ना ठाकुर ने अपने बालों से यह जो रसिक मेहतर का टॉयलेट क्लीन किया मैंने सोचा इतना सब करने की जरूरत क्या है? व्हाट इज द नीड फॉर डूइंग दैट? तो अब अब चलो ठाकुर अवतार है उनको सब कुछ एक्सट्रीम में जाकर करना है। हमको करने की क्या जरूरत है? और मुझे नहीं लगता कि अपने संघ के कोई साधु है कि जिन्होंने ऐसा कभी कुछ किया हो। तो इंक्लुडिंग स्वामी जी। राइट इंक्लूडिंग स्वामी जी तो किंतु देखिए कि ठाकुर ने हमको बताया है दिस इज वन पाथ अब यदि हम सिंसियर हैं यदि हम सही में चाहते हैं ईश्वर प्राप्ति करने के लिए तो क्यों नहीं यह भी एक बार आजमाल पूरा जीवन देखिए ना जन्म जन्मांतर के ये बंधन में पड़े हुए हैं बार-बार पुनरपि जननम पुनरपिन मरणम पुनरपि जननी जठरे शयनम वो तो करना ही करना है तो फिर एक बार इसको भी आजमा लें यदि काम लग गया तो यह भी लग गया। ये वही हाजरा और ठाकुर कहते हैं ना हाजरा नेचे छिलो शंगेशंगे और भंडी वो नेचे छिलो हाजरा भी नाचा था और उसकी जो भुंडी अर्थात कि बड़ा पेट जो है वो भी नाच रहा था। यानी वो लोगों को दिखावा करने के लिए जो नाचते नहीं इसीलिए तो शिवनाथ शास्त्री ठाकुर के पास नहीं आते थे। ठाकुर ने कहा ना कि शिवनाथ उसके मन में एक अहंकार बैठ गया था। दूसरा क्या था कि उसने ऑलरेडी देखा था कि ठाकुर के संस्पर्श में आकर केशव करप्ट हो गया है। सो कॉल्ड करप्ट तो मैं भी कहीं करप्ट ना हो जाऊं। ये बुद्धि का रास्ता छोड़ के मैं भी रोना धोना ना शुरू कर दूं। केशव आखिर आखिर में मृदंग लेकर के मां का नाम लेते लेते कीर्तन करता था। तो ब्राह्म समाज वाले सोचते हैं कि कहां हम एक रैशन रिलीजन चालू कर रहे हैं भारत में से सुपरस्टिशन हटाने के लिए। यही मां काली का नाम लेकर नाच रहा है। यह क्या बात हो गई? हम ओम