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Sri Ramakrishna Kathamrita ·

श्रीरामकृष्ण कथामृत || 27 Oct 1882 - केशव सेन के साथ ठाकुर का नौका विहार || 4 Dec 2024

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ओम स्थापक य च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपने अवतार वरिष्ठ राम कृष्णाय ते नमः लाटू महाराज की मां के ऊपर में ऐसी भक्ति थी कि वह जब काशी में रहते थे तो काशी में ही किसी एक डिवोटा की वाइफ ने ऐसा ठीक किया कि वहां पर काशी अद्वेता आश्रम में दुर्गा पूजा करेगी और उनके गुरु थे राजा महाराज स्वामी ब्रह्मानंद तो उनको बुलाएगी और उनको बुला कर के राजा महाराज तो जहां पर जब आएंगे जहां पर भी जाएंगे तो कितना आनंद और उत्सव का वातावरण हो जाता है तो इस लेडी डिवोटा ने भी ऐसा सोचा कि राजा महाराज आएंगे बड़ा आनंद आएगा तो लाटू महाराज नाराज हो गया लाटू महाराज वहीं पर उस समय काशी में ही रह रहे थे तो वह कहे उन्होंने कहा मैंने उन डिवटी को डायरेक्ट तो नहीं अपने किसी शिष्य को कि देखो मां को नहीं बुला कर के दुर्गा पूजा करती है तो बिना मां के क्या दुर्गा पूजा हो सकती है मां तो जीवंत दुर्गा स्वयं है तो ऐसा करके लाटू महाराज जो उसके ऊपर नाराज हो गए अभी हुआ ऐसा कालक्रम जैसा विधि का का विधान है राजा महाराज आने को सम्मत तो हो गए थे किंतु आखिरी घड़ी में बीमार हो गए और दुर्गा पूजा में नहीं आ पाए काशी में अद्वैत आश्रम में तो अभी वो लेडी डिव जितने भी डिवोटा होंगे जो कि राजा महाराज की अपेक्षा करके बैठे होंगे वोह तो बेचारे दुखित तो हो ही जाएंगे अभी कुछ दिनों के बाद में यह लेडी डिवोटा जो थी वो खोखा महाराज को लेकर के लाटू महाराज के दर्शन करने के लिए आई लाटू महाराज तो वहीं पे रहते हैं वहीं पे एक कमरे में रहते थे तो लाटू महाराज को जैसे ही पता चला वह खोखा महाराज के साथ में आ रही है तो उसके साथ में बात करने की भी उनको इच्छा नहीं थी नाराज हो गए थे बिना मां को बुलाए दुर्गा पूजा की है तो लाटू महाराज ने क्या किया वह सो सो गए पूरा अपना शरीर जो है एक वस्त्र से आवृत कर दिया जैसे कि उनका चेहरा भी यह लोग ना देख पाए पता ना चले कि वह सोए हुए हैं ना कि जगे हुए हैं तो ऐसा करके लेट गए और यहां पर खोखा महाराज और यह डी डिवटी दोनों आकर के अपेक्षा कर रहे हैं कि लाटू महाराज अभी उठेंगे तो उनके साथ बात करेंगे उनका दर्शन करेंगे प्रणाम करेंगे किंतु लाटू महाराज तो लेटे ही रहे अभी यह लोग भी छोड़ने वाले नहीं थे जो लेडी डिवोटा थी दो से तीन घंटा तक उसने रह देखी और यहां पर लाटू महाराज भी दो से तीन घंटा तक जब तक वह नहीं गई तब तक वह लेटे ही रहे आखिर में वह डिवोटा जब निराश होकर के चली गई तब लाटू महाराज फिर से बैठ के खड़े हुए और फिर अपने जो शिष्य थे वहां पर जिन्होंने यह स्मृति कथा लिपिबद्ध की है उनको कहा कि देखो मां को नहीं बुला करके दुर्गा पूजा करने का जो प्रयास किया तो यह इवन जगदंबा को पसंद नहीं आया राजा महाराज को बुलाने वाले थे देखो राजा महाराज भी तो आए नहीं तुम लोग फिर कहते हैं कि यह जो डिवोटा है उसके पास में पैसा बहुत बढ़ गया है तो वह सोचती है कि व पैसों से सब कुछ खरीद लेगी किंतु गुरु को पैसों से नहीं खरीदा जा सकता गुरु के टाका दिए केना जावे ना गुरु को पैसों से नहीं खरीद सकते ऐसा करके लाटू महाराज ने कहा तो देखिए कि दो चीजें है एक तो कि श्रद्धा भक्ति राजा महाराज के ऊपर में श्रद्धा होना वह भी तो एक बहुत अच्छी बात है उसमें बुरा कुछ भी नहीं है किंतु जब तक मां शारदा स्वयं जीवित थी वो स्वयं वहां पर थी उस समय हो सकता है जयराम बाटी में हो ना कि कलकत्ता हो कहीं पर भी हो व बिना उनको निमंत्रण दिए प्रॉपर इन्विटेशन दिए यदि आप दुर्गा पूजा करेंगे तो वह नहीं चलेगा दूसरा कि लाटू महाराज का मां के ऊपर में भक्ति देखिए कितना है बहुत बार ऐसा होता था कि लाटू महाराज है बलराम मंदिर

balaram mandir

में और मां है वहां पर बाग बाजार में उद्बोधन में मायरवार्ड्स मां के जो सब संगी थे मां के जो शिष्य थे

mayer bari

वह कभी-कभी मां को कहते थे कंप्लेन करते थे कि मां देखिए लाटू महाराज तो यहीं प है बलराम भवन में और फिर भी आपके दर्शन करने के लिए नहीं आते हैं किंतु मां सिर्फ हंस कर के वो छोड़ देती थी बात को इस बात का कोई उत्तर नहीं देती थी क्यों क्योंकि लाटू महाराज के मन में मां के प्रति जो गभीर श्रद्धा है वो मां को पता है कि वह कितनी श्रद्धा है इसलिए मां ये सब बातों पे ज्यादा ध्यान नहीं देती थी तो अपने ऑर्डर में देखिए कि यह मां के प्रति या ठाकुर के प्रति अपने यह त्यागी या गृहस्थ यह संतानों की मां या ठाकुर पर जो भक्ति

ma

है यह अपने ऑर्डर का जैसे कि एक फाउंडेशन स्टोन है जिसके ऊपर में अपना संघ गठित हुआ है रचित हुआ है अच्छा अभी हम श्री रामकृष्ण कथामृत का पाठ कर रहे थे डेट है 1822 7 अक्टूबर केशव सेन नौका लेकर के ठाकुर के यहां पर आए हैं दक्षिणेश्वर काली मंदिर और ठाकुर को कहते हैं कि चलिए थोड़ा सा नौका

daksineswar

में घूम के आते हैं आशय यह है कि ठाकुर भी के साथ में गान भजन नृत्य वगैरह होगा और ठाकुर के उपदेशों का श्रवण करेंगे तो अभी यह वार्तालाप चल रहा है एक ब्रह्म भक्त ने प्रश्न किया कि क्या सर्वस्व त्याग करके ही ईश्वर प्राप्ति होगी गृहस्थ आश्रम में या संसार में ईश्वर प्राप्ति नहीं होगी तो फिर इसके उत्तर में ठाकुर एक के बाद एक पॉइंट बताते जाते हैं उसमें जो सबसे बड़ा एक ठाकुर का जो अभय वाक्य है सतो बोलची तोमरा संसार कर छो ते दोष नाए सत्य कहता हूं तुम लोग संसार कर रहे हो उसमें दोष नहीं है तब ईश्वर दख मन रखते होवे त किंतु क्या है संसार में रके किंतु मन रखना हो होगा ईश्वर की ओर अच्छा यह तो हुआ उसके बाद में कल हमने यह भी देखा कि स्वामी जी का वह जो ट्रेडमार्क वाला जो मैसेज है कि आत्म श्रद्धा सेल्फ कॉन्फिडेंस करेज तो यह यही बात ठाकुर ने अपने से भी यही बात कही है कि आमी मुक्तो पुरु संसारी थाकी बा अरणी थाकी आमार बंधन की मैं मुक्त हूं संसार में रहू ना कि अरण्य में मुझे बंधन क्या है आमी संतान राजाधिराज छले मैं ईश्वर का संतान हूं राजाधिराज का पुत्र हूं अमाए आबार बांधे के मुझको बंधन में डालने वाला है कौन ज्यद शप कामड़ बीश नाई जोर कोरे बोले बीश छेड़े जाए यदि सांप आपको काटेगा तो फिर यदि आप ऐसा कहेंगे कि नहीं मुझे विष नहीं वो मेरे शरीर में प्रवेश किया तो विष से भी आप मुक्ति पा लेंगे तमनी आमी बधोन आमी मुक्तो एक कथा रोक करे बोलते बोलते ताई होई जाए वैसे ही मैं बद्ध नहीं हूं मैं मुक्त हूं इस बात को जोर से जोर देकर के संकल्प शक्ति सहित बोलने से यह हम लोग मुक्त ही हो जाएंगे आगे में ठाकुर क्या कहते हैं क्रिस्टा देर एक खाना बोई एक चन दले क्रिश्चन लोगों की एक किताब अर्थात की बाइबल बाइबल ही होगा मैं अनुमान करता हूं लोगों की और भी बहुत सारी छोटी मोटी किताबें रहती है तो जो भी है एक किताब किसी ने लाकर के दिया आमी पढ़े सुनाते बोलू मैंने कहा कि बोल पढ़ कर के मुझे सुनाओ ताते केवल पाप आर पाप उस किताब में सिर्फ पाप और पाप के शब प्रति तुम्हा ब्रह्म समाज है वो केवल पाप तुम्हारे ब्रह्म समाज में भी सिर्फ यही पाप की बात है जे व्यक्ति आमी बध हो आमी बथ बार-बार बोले से शाला बथ ही होए चाहे जो व्यक्ति बार-बार यह कहेगा कि मैं बद्ध हूं मैं बद्ध हूं वह साला बद्ध ही हो जाएगा यहां पर बद्ध का क्या अर्थ है बंधन में हूं संसार रूपी बंधन में कर्म के चक्रों में मैं फंसा हुआ हूं इसलिए मैं क्या करूंगा अभी ऐसे लोग जो कि यसा मानना शुरू कर देते हैं कि जन्म जन्मांतर के पाप अपने सर पर बैठे हुए हैं अभी मैं मायूस हो गया हूं यह कर्म के बंधन में फंसा हुआ हूं क्या करूं तपस्या त्याग ब्रह्मचर्य यह चोच संतोष यह सब करने का तो मेरे में सामर्थ्य नहीं है उपासना करने का सामर्थ्य नहीं है योग का अभ्यास करने का सामर्थ्य नहीं है विधान समझ में नहीं आता है तो क्या करूं तो फिर कोई तांत्रिक है ना कि ऐसा कोई जो ढोंगी लोग जो होते हैं रुपयों लोगों के रुपए उठा कर के लोगों को मूर्ख बनाते हैं ऐसे किसी के चक्कर में पड़ जाएगा फिर यह तांत्रिक कहेगा तांत्रिक शब्द नहीं यूज करके ऐसा कहेंगे ढोंगी आदमी कहेगा कि अच्छा ठीक है आप इतना रुपया दे दीजिए मैं आपके लिए यह विधि कर दूंगा आप मुक्त हो जाएंगे फिर यह अंगूठी है वो पहन लीजिए यह ताबीज है यह पहन लीजिए यह माल गले में यह माला पहन लीजिए फिर यह जो वास्तुशास्त्र है आपके घर में इस तरह से सब अरेंज कीजिए चीजों को जिससे कि आपका भविष्य सुधर जाएगा मुझे समझ में नहीं आता कि अभी देखिए ऐसा नहीं है कि ये सब चीजों में कोई यह नहीं है सार नहीं है तो प्रॉब्लम यही है कि यह सब चीजों को ठीक-ठीक समझ करके उसकी प्रैक्टिस करने वाले लोगों का इस समय बहुत बड़ा अभाव है अभी मां का ही उदाहरण देखिए मां का तो बालिका भाव था जब आखिर आखिर में जब ठाकुर के साथ में थी मां देखिए मां का भाव भी किस तरह से परिवर्तन होता है ठाकुर के साथ में थी तब ठाकुर का बालक भाव था मां बिल्कुल एक मां की तरह मां कैसे बच्चे को समझा बुझा करके उसको पटा करके उसके साथ में किसी ना किसी तरह का व ट्रिक करके उसको खाना खिलाएगी उसका सेहत का ध्यान रखेगी वह पढ़ाई लिखाई कर रहा है कि नहीं उस परे ध्यान रखेगी यहां पर ठाकुर भी ठाकुर को खाने का एक टेंशन रहता है ठाकुर को दूध पीने का एक डर रहता है ठाकुर को भात देख कर के डर लगता है बहुत ज्यादा भात उनको यदि चावल दे दे थाली में तो वह डर जाएंगे अरे इतना चावल कौन खाएगा तो मां क्या करेगी चावल जब थाली में तो उसको दबा दबा करके उसका साइज जो छोटा हो जाए ऐसा कर देगी चावल को आप ऐसे खुला छोड़ देंगे वो विस्तृत हो जाएंगे थाली में किंतु उसको दबा देंगे थोड़ा सा प्रेस करके तो उसका साइज जो है कम हो जाएगा तो मां इस तरह से ठाकुर को चावल खिलाती थी तो उस समय मां का एक मातृ भाव था किंतु जैसे-जैसे समय बीतता गया ठाकुर की महासमाधि हुई भक्त गण मां के पास में आना शुरू हो गए और मां खुद अभी जब जैसे कि क्या है कि उनका जीवन भी अस्ताचल की ओर बढ़ने लगा मां का जीवन भी महासमाधि की ओर बढ़ने लगा तो महासमाधि के जितने दिन पास में आते जाते हैं मां के भीतर में भी वही बालिका भाव प्रस्फुटित हुआ जैसे कि ठाकुर के जीवन में बालक भाव वैसे ही मां के जीवन में बालिका भाव तो अभी राधू बीमार हुई है तो अभी क्या करेंगे वैद्य कविराज ये सब को बुलाने से तो काम चल नहीं रहा है एक्सपर्ट मेडिकल अभी कहां पे वह उस समय इतना सब कुछ था फैसिलिटी आज की तरह कि अच्छे से अच्छे डॉक्टर को बुलाए ट्रीटमेंट करें पैसों का भी एक तो अभाव चल रहा था तो फिर मां ने क्या अभी वहां पर क्वाल पाड़ा में बैठे हैं और कोई भी आकर

koalpara

के मां को जो भी सलाह देता था मां उसका पालन कर लेती थी किसी ने आकर के कहा कि राधू के सर पर बर्फ लगाओ तो अभी उसका पता वो राधू तो उस समय प्रेग्नेंट थी तो प्रेग्नेंट है और पता नहीं उसके शरीर में किस-किस तरह के अभी रोग और विकारों ने प्रवेश किया है अफिन खाने की आदत उसने बना ली है पेन रिलीफ के लिए आजकल की तरह पेन किलर तो नहीं मिलते थे तो लोग अफीम खाते थे तो अभी गांजा चरस अफीम यह सब ड्रग्स जो है मोमेंट ली आपको हो सकता है कि पेन रिलीफ करें किंतु उसके बाद में इन सब चीजों की हैबिट पड़ जाती है इवन यह सब उस उस तरह की मेडिकेशन ही नहीं आज की मॉडर्न पेन की र मेडिकेशन भी है मेडिसिन भी है वह सब हैबिट फॉर्मिंग ड्रग होती है एक बार आपने चालू किया लेना फिर उसको छोड़ना मुश्किल है फिर विथड्रावल सिमटम्स आपके शरीर में दिखाई देंगे लोग सर पटक यदि आप उसको उसकी दवाई टाइम पर नहीं देंगे अफीम है या पेन किलर वगैरह तो लोग दीवाल पर सर पटक के चिल्लाए गाला गाली करेंगे क्या सब पागलपन करेंगे तो यहां पर भी राधु का बस इस तरह का एक विचित्र अवस्था हो गया था

ma and radhu

किसी ने कहा इसके सर पर भूत उठाए किसी ने कहा कि इसके सर पर किसी तरह का ये ये जो चं है ये ऐसा कुछ उसके सर पर उठाए तो जितने लोग आते हैं मां के पास में उतनी ही बातें करते हैं किसी ने कहा राधू के सर पर बर्फ लगाइए तो मां एक बालती बर्फ लेकर के किसी से जुगाड़ किया और उसके सर पर बर्फ लगा रही है तो काली मामा वहां आ गए बोले कि क्या कर रही हो वैसे ही वो प्रेग्नेंट है उसके सर पर बर्फ लगा रही हो बुखार आ जाएगा इसको वो मां काली की मिन्नत मनाओ वो जो एक तांत्रिक रहता था में वहां जाकर के कुछ मिन्नत मानेंगे तो वह ठीक कर देगा अभी वह तांत्रिक को बुलाया तांत्रिक ने नाटक फाटक करके कुछ ना कुछ उसको पता चल गया यह मां बेचारी भोली भाली है वह तांत्रिक आता है तो मां दोनों हाथ जोड़ कर के जैसे कि कितनी विपद में पड़ी है उस तरह से तांत्रिक को बोल रही है कि अभी आप रक्षा करेंगे तभी कुछ होगा तो उसको तो मजा आ गया कि अच्छा चलो एक अच्छा मूर्ख मिला है कस्टमर पैसा भी उठा लिया मां के पास में से और उसा उल्टा-पुल्टा एक विधान देकर के गया कि हां अप्राप्य जो चीजें होती है उस सब चीजों का तेल बनाना है अभी ये अप्राप्य चीजें कहां से आप जुगाड़ करेंगे कहां से तेल बनेगा अभी वो ट्रीटमेंट नहीं भी ठीक से होता है तो तांत्रिक तो कह देगा कि मैंने वह जो सब बड़ी मुश्किल से इकट्ठे करने वाली चीजें कही थी वो तो आपने किया नहीं तो अभी कैसे ट्रीटमेंट होगा माने वो भी ठीक है और यह लोग भी बेचारे वोह कलेक्ट करते करते थक जाएंगे कुछ ही दिनों में वह महावीर हनुमान की तरह ई लक्ष्मण को लक्ष्मण को इंजरी हुई है तो वो कहां से औषध लेकर आओ तो हनुमान जी गए औषध तो पहाड़ पर खोज रहे हैं नहीं मिला तो सीधा पहाड़ उठा के ले आए ऐसा तो अभी ऐसा कोई था नहीं पहाड़ उठा के ले आने वाला मां के पास में तो अभी देखिए कि हां हालांकि देखिए स्वामी जी ने एगजैक्टली वही उपमा दी है महावीर हनुमान की मां के साथ में कि जब वोह

swamiji

अमेरिका गए थे तो मां का मां की परमिशन लेने के लिए उन्होंने पत्र लिखा था और मां ने आशीर्वाद भी दिया था तो स्वामी जी कहते हैं है कि मां के संतान जैसे महावीर हनुमान ने एक छलांग में समुंदर पार कर लिया तो मैं भी मां के आशीर्वाद पा कर के महावीर की तरह ही मैं सीधा अमेरिका चला आया तब कि किंतु यही आज के मॉडर्न युग में यही यह विदेशी लोगों ने बनाए हुए जहाज पर मुसाफ की है समुंदर को लांघ के लिए मुझे जंप लगा कर के नहीं आना पड़ा तो स्वामी जी भी यह बात करते हैं किंतु देखिए कि उन लोगों का जीवन का संग्राम एक अलग था यहां पे मां के जीवन का एक अलग संग्राम है एक मधुमय एक मां का बालिका भाव धीरे-धीरे करके प्रकट हो रहा है और सभी लोग इसका दर्शन भी कर रहे हैं सभी लोगों का चित्त भी निर्मल हो रहा है तो अभी वह एक चीज है कि यदि आपके भीतर में अब मां का उदाहरण तो वैसे ही दिया यहां पर ठाकुर जिस तरह से कहते हैं वह एक अलग दृष्टिकोण से कहते हैं कि जब इतने पाप करते हैं या तो फिर ऐसा समझते हैं कि मैंने पाप किया है और सर के ऊपर में यह बोझा बन जाता है और एक गिल्ट फीलिंग खड़ी हो जाती है तब हम लोग यह जितने भी धुता रे हैं जितने भी ठग है जितने भी ढोंगी है उनके पल्ले में पड़ेंगे और यह लोग भी हमको अच्छे से लूट लेंगे स्वामी जी ने क्या कहा अमेरिका में एक खास तरह का एक धनी वर्ग है जिन्होंने अपनी धन संपत्ति जो है वो जितने भी दो नंबर के कार्य हैं ऐसा करके इकट्ठा की है अभी यह जितने भी पादरी लोग होते हैं ना मिशनरी उनको पता है कि इसने यह दो नंबर का सब कुछ किया है फिर यह लोगों को मौका मिल जाता है फिर वह इस तरह की जो अभी जो हस्बैंड जो होता है वोह तो इन लोगों को पत्ता नहीं देगा जो दो नंबरी काम करता है उसका जिगर भी बड़ा स्ट्रांग होता है किंतु उनकी जो वाइफ होती है वो बड़ी सी घबराई होती है कि अरे यह पाप का पैसा है क्या होगा तो अभी यह डर जो है ना अब ये मिशनरी लोग जाकर के उनको पकड़ेंगे उनको एक्सप्लोइट करेंगे कहेंगे अच्छा दो नंबरी पैसा है नर्क में जाएंगे तो नर्क यंत्रणा भोग करनी पड़ेगी तो ऐसा कीजिए आप हमको डोनेट कीजिए हम लोग अफ्रीका है एशिया है वहां प ये जितने जंगली लोग रहते हैं भारत में उन लोगों को क्रिश्चियनिटी में हायर रिलीजन में कन्वर्ट करते हैं वी आर ब्रिंगिंग देम टू गॉड तो गिव अस मनी और यह महिलाएं भी इस तरह से इनके चंगुल में फंस जाती है और डोनेशन देना शुरू करती है तो स्वामी जी उनके ऊपर में कटाक्ष करके कहते हैं दज आर दी चर्च वमस माने कि यह पादरियों के चंगुल में फंसी हुई महिलाएं और यही महिलाओं का जोर बड़ा रहता था देखने की बात है देखिए स्वामी जी ने भले ही चाहे उनके बारे में इस तरह की बात कही किंतु क्या है पता है समाज में उनका एक जो स्टेटस था वह बहुत बड़ा था इस तरह की स्त्रियों का जो कि रिलीजियस थी और उन्होंने एट द एंड ऑफ द डे स्वामी जी को खुले खुले हाथों से अपनाया उन्होंने ही स्वामी जी को आखिर में अमेरिका में वेलकम किया स्वामी जी कहते हैं पुरुष लोगों का कोई सोशल य इच्छ इा भी नहीं होती सोशल स्टेटस प्राप्त करने की ना ही उनका कोई सोशल स्टेटस होता है यह जो स्त्रियां जो है यह चर्च वीमेन उन्हीं के हाथ में यह सब सोशल स्टेटस है कौन सक्सेस होगा सोसाइटी में मने एक प्रेस्टीज वाइज कौन फेल होगा यह सब ये लोग ठीक करती है किसी के पास में चाहे कितना ही रुपया हो किंतु ये लोग ठीक करेगी कि इसको यदि सोशल रिस्पेक्ट मिलना चाहिए या नहीं जैसे अपना होता है ना कि नात में कौन रहेगा किसको नाथ बहार कर देना है वगैरह कास्टि जम जो भारत में लोग कहते हैं हमारे पर आक्षेप रखते हैं कि हम भारतीय बहुत ही ज्यादा कास्ट में डूबे हुए हैं अमेरिका में कुछ कम नहीं है स्वामी जी ने कहा अपने यहां पे ये सोशल कास्ट है वहां पे ये डॉलर रूपी कास्ट है जिसके पास में ज्यादा डॉलर वो हायर कास्ट लोअर डॉलर लोअर कास्ट तो यहां पे ठाकुर कहते हैं कि यदि आप एक तरह से अपने मन में एक बार शोभ खड़ा हो जाए एक संताप और एक प्र एक पश्चाताप का भाव आ जाए कि नहीं मैं गलत कर रहा हूं और फिर यदि आप एक ऐसे किसी ढोंगी के हाथ में फंस गए और जिसने आपके ऊपर में एक बैठा दिया डर कि हां पापी है तो पूरा पूरा जीवन जो है उनका इस तरह से जाएगा और यह पाप रूपी एक एक शस्त्र को इस्तेमाल करके यह सब धार्मिक संस्थाएं पनप रही थी ब्राह्मण समाज भी यह लोग भी बड़े चालाक है अमेरिकन या ब्रिटिश लोगों से क्या सीखेंगे धनी लोगों को कैसे ठगा जाए उनको यह पाप का डर दिखा दिखा करके फिर उनके पास में से पैसा निकालो तो यह जो सिस्टम जो अमेरिका यूरोप में बनी थी यही सिस्टम यह ब्राह्मण समाज भी सोने यहां पर डाल दिया कि हां आप लोग पापी है यहां पर आके डोनेशन दीजिए अदर वाइज आप ऐसे गड्ढे में गिरेंगे नरक की ऐसी यंत्रणा भोग करेंगे कि जिसका कोई अंत नहीं है तो ठाकुर कहते हैं कि यदि भीतर में से एक सही सही विश्वास हो कि मैं पापी नहीं हूं मैं तो ईश्वर का संतान हूं तो अभी दो क्षण में यह जो अपने सर पर यह जो बोझा बना हुआ है वह चला जाएगा किंतु इसका अर्थ यह नहीं है कि आप पाप करते जाइए और फिर कहते जाइए कि मैं पापी नहीं हूं ऐसा नहीं चलेगा आपको एक बार प्रायश्चित कर लेना होगा यह जो जिस जगत में हम लोग फंसे हुए हैं यह जो कर्म जन्म जन्मांतर के जो कर्म का फेरा अपने सर पर बैठा हुआ है उसको एक बार तपस्या करके आपको निकाल देना पड़ेगा जैसे कि वोह ब्राह्मण समाजी लोग ही कहते थे ब्राह्मण भक्त ही ठाकुर को कहते हैं कि हम लोगों का राजा जनक वाला मत है राजा जनक राजा भी थे और तपस ऋषि भी थे हम लोग भी गृहस्थ है साथ में ऋषि है तो ठाकुर ने क्या कहा कि राजा जनक ने एक बार तो सर नीचे करके पैर ऊपर करके तपस्या कर ली है अर्थात कि ये शीर्षासन करके तपस्या कर ली है माथा काटा तपस्या सर काट के दे देने वाली अर्थात कि प्रचंड तपस्या कर ली है फिर वो गृहस्थ आश्रम में रहते हैं यदि आप दूध में पानी को मिला दे दूध को पानी में मिला दे तो यह मिक्स हो जाएगा किंतु एक बार उसमें से मक्खन निकाल दे वो प्रोसेस करके तभी कहीं जाकर के उसको आप दूध में रखेंगे तो दूध के ऊपर में तैरे तो वैसे ही तपस्या करके एक बार अपने मन को एक लेवल पर ले आना है इसका अर्थ यह नहीं है कि निर्विकल्प समाधि प्राप्त करने के बाद में संसार में वापस आना है वो जो नेती नेती करके निर्विकल्प समाधि फिर इति इति करके जगत में आए वो तो एकदम हाईएस्ट स्टेज है वो तो कोई मुट्ठी मतलब मुट्ठी भर लोग पूरे जगत संसार में पूरे मनुष्य समाज के इतिहास में कर पाए होंगे ये सुखदेव शिव भगवान राम कृष्ण उन लोगों की बात छोड़ दीजिए एक जनरली जैसे कि मास्टर महाशय स्वयं मास्टर महाशय क्रिसमस की छुट्टी थी तो ठाकुर ने

master mahasay

कहा कि तुम यहां पे आकर के रहो तो मास्टर महाशय गए हैं वहां पर काली मंदिर में रह रहे हैं साथ में एक ब्राह्मण को भी लेकर गए हैं उनके लिए खाना बनाएंगे फिर वोह जैसे वोह दूध की व्यवस्था करनी है उनके लिए मास्टर महाशय के लिए तो ठाकुर वो भी व्यवस्था कर देते हैं तो वोह 2022 दिन ना कि ऐसा कुछ वहां पर रहते हैं फिर यह बीच में एक दिन क्या हुआ कि वो कहते हैं ठाकुर को ठाकुर उस दिन कलकाता जा रहे थे तो मास्टर महाशय ने पूछा मैं आऊं क्या साथ में कोलकात्ता तो ठाकुर थोड़े चिंतित हो गए बोला कि क्यों तुम क्यों आना चाहते हो कोलकाता यहां पे तो बढ़िया मजे से हो तो मास्टर महाशय ने कहा मैं थोड़ा सा घर जाके आऊंगा छोटा-मोटा दो तीन काम है तो समाप्त कर दूंगा तो ठाकुर कहते हैं नहीं अभी तुम मत जाओ वहां पे अच्छा फिर एक दिन ऐसा हुआ कि यही इसी तरह से मास्टर महाशय को कुछ कह रहे थे तो मास्टर महाशय थोड़े चिंतित हो गए थे तो फिर ठाकुर ने कहा कि जाओ वहां प जाकर ध्यान करो पंचवटी में फिर मास्टर महाशय गए फिर ठाकुर देखने के लिए आ रहे है कि वो क्या कर रहा है देखा कि मास्टर महाशय आ रहे हैं वापिस तो ठाकुर ने कहा कि देखो उस समय तुम्हारा जो चेहरा देखा था ना मुझे लगा कि ये नारायण शास्त्री की तरह दीवाल उठा दीवाल को छलांग लगाकर करके वो कालीवाली में काली वाड़ी में से भाग गया है ऐसा मुझे लगा पहली बार तो एक बार तो ऐसा लगा किंतु फिर मैंने सोचा कि नहीं नहीं ये यह जो है बड़ा सोच समझ कर के कार्य करता है अर्थात मा श्रम व से तो ऐसा वो दीवाल को ठेक कर के वो भाग नहीं जाएंगे और फिर जब यह कुछ दिन समाप्त हो गए तब ठाकुर ने कहा कि अच्छा भाव में थे ठाकुर भाव में जाकर के मास्टर महाशय को कहते हैं कि अभी जाओ तुम घर वापस जाओ और घर में जाकर के संसार करना किंतु यह बात याद रखना कि तुम्हारे जो परिवार जन है वो कोई तुम्हारे सच्चे आत्मीय नहीं है ईश्वर ही तुम्हारा सही सही आत्मीय है परिवार जनों के प्रति तुम्हारा जो कर्तव्य है उसका पालन करना है धर्मपत्नी है बच्चे हैं तो उनका लालन पालन है उनके लिए उनकी जो स्वास्थ्य की जो खाने की जो व्यवस्था करनी है सब करना किंतु यह बात याद रखना कि तुम्हारा इनके साथ में किसी भी तरह का लौकिक संबंध नहीं है तो यह मास्टर महाशय ने भी ठाकुर की इस बात को जीवन में कितना सुंदर रूप से आचरण किया है व अपने घर जा रहे हैं तो कहेंगे मैं एक भक्त के घर जा रहा हूं जैसे कि अपने को इस शरीर शरीर के साथ से डिसोसिएट कर दिया है यह शरीर है वह एक भक्त का शरीर है वह भक्त का शरीर लेकर के वो भक्त के शरीर जिस घर में रहता है वहां पर जा रहे है जैसे वो कथामृत लिखते हैं तो स्वामी जी ने कितना सुंदर रूप से उनका सराहना किया है कि श सोक्रेट डायलॉग्स आर प्लेटो ऑल ओवर बट यू हैव केप्ट योरसेल्फ कंपलीटली हिडन अर्थात कि

kathamrita book

यह जो प्लेटो ने सोक्रेट के डायलॉग्स जो लिखे जो कि वेस्टर्न साहित्य की एक बड़ी ही महत्त्वपूर्ण किताब समझी जाती है उसमें किंतु देखेंगे कि प्लेटो के अपने विचारों की ही सबसे ज्यादा झलक प्राप्त होती है क्योंकि अभी सोक्रेट ने एगजैक्टली क्या कहा वह तो पता नहीं है बहुत बार ऐसा होता है प्लेटो लिख रहा है तो सोक्रेट के विचारों को अपने विचारों से रंग करके कलर करके के वो लिखेगा किंतु स्वामी जी स्वयं जिन्होंने ठाकुर का इतना संग किया है ठाकुर को सबसे ज्यादा समझने वाले कौन है तो वह है स्वामी विवेकानंद तो स्वामी जी क्या कहते हैं कि यह कथामृत जो आपने लिखा है आपने अपने को संपूर्ण रूप से अदृश्य रखा है ठाकुर की ज जो बात जैसी उनके मुंह से आती थी वैसी ही आपने लिखी है तो व्हिच इज अ ग्रेटेस्ट अचीवमेंट अदर वाइज आप किसी के भी बारे में हमारे ट्रेनिंग सेंटर में एक आचार्य महाराज थे उनका नाम था जुष्टजनवी खड़े होकर के नृत्य गीत चालू कर देंगे ऐसा जम जाता था एक बार वोह राजकोट आए थे आंख की ट्रीटमेंट के लिए वहां पर अच्छा डिस्पेंसरी है आख का तो हम लोग सबने कहा महाराज जी वही शंकरी चरण है तो उसका वीडियो भी है आप ना जुस्तानोथर्म्यूज होगा संस्कृत ग्रामर सीखना तो बड़ा मुश्किल है किंतु महाराज का ऐसा था कि वो किताब खोल कर के बैठेंगे ट्रेनिंग सेंटर में क्लास में में फिर थोड़ा बहुत सीरियसली पढ़ाएंगे इतना सीरियसली जैसे कि वो पता है ना वो वो ठाकुर एक बार उपमा देते हैं किसी मंदिर में जाएंगे ना तो व वहां प बंदर लोग एकदम आंख बंद करके शांति से बैठे हैं तो आपको ऐसा लगेगा ध्यान कर रहे हैं किंतु नहीं वो प्लान चल रहा है अभी क्या उपद्रव करेंगे थोड़ी देर में के बाद में आंख खोल कर के कुछ ना कुछ ऐसा वो हल्लागुल्ला मचाएंगे तो इनका भी ऐसा था कि आंख एकदम सीरियस होकर के पढ़ाएंगे फिर हमको पता है महाराज का नेचर क्या है फ थोड़ी देर के बाद हम बोलना शुरू संस्कृत ग्रामर किसको पढ़ना है तो थोड़ी देर के बाद में सभी ब्रह्मचारी बोलेंगे महाराज महाराज स्मृति कथा स्मृति कथा महाराज तो बहुत पुराने है बेलूरमठ के साधुओं का कितना संग किया है निर्वाणा नंद जी की उन्होंने सेवा की है व कितना सब कुछ उन्होंने किया है तो थोड़ी देर के बाद में फिर महाराज किताब बंद करके फिर इतना आनंद से सब स्मृति कथाए कहेंगे मलब मजा आ जाता था इतनी स्मृति कथाओं का भंडार था उनके पास में बेलूरमठ की सब पुरानी पुरानी बात सीनियर साधुओं का उन्होंने संग किया है तो वह सब बताते थे तो किंतु महाराज एक बार कहते थे कि देखो स्मृति कथा है ना कि आत्मकथा है बहुत बार किसी साधु को आप कहेंगे किसी को भी कहेंगे साधु क्या किसी को भी कहेंगे कि हां वह पुराने दिनों की बात कीजिए किसी साधु का आपने संग किया है शुद्ध जी का विरजानंद जी का भूतेशानंद जी का कुछ बताइए तो फिर यह लोग क्या करेंगे मने हमारे ष्ठ जी कहते थे पहले तो अपनी अपनी खुद की लंबी आत्मा कथा कह देंगे कि हां मैंने ऐसा किया मैंने वैसा किया फिर मैं यहां से यहां गया फिर वो आखिर में कहेंगे कि मैंने जब महाराज को प्रश्न किया कि महाराज मैं ठीक कर रहा हूं कि नहीं तो महाराज ने कहा बिल्कुल ठीक कर रहे हो अपनी जो लाइफ है अपने जो कर्म है उसके ऊपर में एक अप्रूवल का स्टेंप चाहिए उनको यह सब स्मृति कथा कह के तो इसे ह्यूमन साइकोलॉजी हम हमेशा अपने को एक प्रोजेक्ट करने का प्रयास करते हैं कोई कोई लोग कॉन्शियसली करते हैं कोई कोई लोग सबकॉन्शियसली करते हैं किंतु ज्यादातर लोग यह सब करते हैं किंतु मास्टर महाशय स्वामी जी का खुद का सर्टिफिकेट है कि मास्टर महाशय ने कथामृत लिखा अपने को संपूर्ण रूप से अदृश्य रखा अपने बारे में कहेंगे तो मोहिनी मोहन करके नाम यूज करेंगे एक भक्त बोल कर के कहेंगे मणि करके अपने को पुकारेंगे कभी बहुत कम जगह प उन्होंने मास्टर करके लिखा है अपना खुद का तो यह देखिए कि बात जो चल रही थी अपनी कि मन के भीतर में एक तरह से एक बार एक गिल्ट फीलिंग आ जाए कि मैं कुछ गलत कर रहा हूं तो इस तरह के ढोंगी लोग आकर के अपना शोषण करना शुरू कर देंगे किंतु जिस क्षण में यह ठीक करता हूं कि नहीं भले ही चाहे जन्म जन्मांतर के कर्म का फेरा कर्म का फल मेरे सर पर हो भले ही चाहे मैं पता नहीं पिछले जन्मों में हमने क्या किया है इसी जन्म का कुछ ठिकाना नहीं बता नहीं सकते कि एक साल पहले क्या कि किया था पिछले जन्मों की बातों तो किसको पता किंतु एक बार जद यह ठीक करें कि नहीं मैं राजाधिराज स्वयं श्री राम कृष्ण देव का संतान हूं ईश्वर का संतान हूं तो यह गिल्ट फीलिंग चले जाएगी भीतर में से एक आत्म श्रद्धा प्राप्त होगी और इस आत्म श्रद्धा को लेकर के हम ठीक-ठीक साधन भजन कर पाएंगे और साधन भजन करते करते धीरे-धीरे करके मुक्ति प्राप्त होंगी यह तो इसका एक इंटरप्रिटेशन है दूसरा है कि एक अजात बात बोलकर के अपने वेदांत में है अद्वैत वेदांत का भी वो मने ग्रैंड डेडी है मतलब वो उसका पिताजी है उसकी मतलब वो इतना रेडिकल आइडिया है अद्वैत वेदांत को आप कहेंगे रेडिकल आईडिया है जैसे कि यह आपको पता है क्वांटम डायनेमिक्स में आज तक तो हम ऐसा ही मानते थे कि ये जो जिस तरह से एक बोल होता है एक मनुष्य है मनुष्य एक ही जगह पर रहेगा तो एक साथ में वो ऐसा तो नहीं हो सकता अभी मैं विशाखापट्टनम में बैठा हूं तो मेरा एक दूसरा एक कॉपी कहीं अम में बैठा है तीसरा कोपी कोलकाता में बैठा है संभव ही नहीं है देर इज ओनली वन मी मैं एक ही हूं मैं मैं एक ही जगह पर रह सकता हूं तो जगत की जितनी भी चीजें हैं एक ही है एक ही जगह पर रह सकती है यह कन्वेंशनल विजडम है किंतु जैसे वो क्वांटम डायनेमिक्स का आविष्कार हुआ पता चला कि सब एटॉमिक पार्टिकल है वह एक से ज्यादा जगहों पर रह सकते हैं इसको कहते हैं वेव फंक्शन और जैसे ही उस पार्टिकल को आप ऑब्जर्व करेंगे तब यह 10 जगह पे जो पार्टिकल है एक पार्ट ये जैसे इलेक्ट्रॉन है एक ही इलेक्ट्रॉन है उसका एक कॉपी यहां पे है विशाखापट्टनम में दूसरा होगा चांद के ऊपर में तीसरा होगा मार्स के ऊपर में चौथा होगा कहीं दिल्ली में पांचवा होगा कहीं चेन्नई में तो दिस इज एंटायस एक ही इलेक्ट्रॉन इतनी जगह पर रह सकता है किंतु जैसे ही आपने उसको ऑब्जर्व किया तो वेव फंक्शन कोलप्पन एक ही जगह पर लोकेट हो जाएगा वेरी रेडिकल आइडिया तो अद्वित वेदांत इट सेल्फ इज अ वेरी रेडिकल आडिया कि ये क्या कहते हैं कि जन्म जन्मांतर के पाप है ना नहीं है ना यह सब कर्म का जो एक यह है ना अपना इसका क्या कहेंगे बंधन इतना भयानक है यदि आपके एक करोड़ जन्म हुए हैं आज तक आने के लिए तो एक करोड़ जन्म के जितने पाप है सबको एक के बाद एक आप काटते जाइए तभी कहीं जाकर के आपको मुक्ति मिलेगी ऐसा एक भयानक डर अपने सर पर है और इसी डर की वजह से बहुत सारे लोग ना आध्यात्मिक जगत में प्रवेश ही नहीं करना चाहते अच्छा इतने पाप किए कब धुले छोड़ो अभी पाप करते ही गए तो करते जाओ करते जाओ फिर आखिर में जो होगा सो देखा जाएगा किंतु ठाकुर क्या कहते हैं कि यदि ईश्वर की इच्छा हुई तो यह जो कर्मों का जो नियम है व सब कहां रह जाएंगे मथुर बाबू के साथ में बात होती है मथुर बाबू कहते हैं ईश्वर को भी नियम का पालन करना होगा ठाकुर ने कहा ईश्वर स्वयं नियम के परे हैं वह चाहे तो कितने बड़े पापी को भी एक क्षण भर में मुक्ति दे दे और फिर वो मथुर माना नहीं तो वो जो फेमस कहानी है वो जास्वंद का एक पेड़ के ऊपर में ठाकुर ने देखा कि लाल और सफेद दो रंग के जास्वंद फूल जवा फूल एक ही डाल के ऊपर में है तो ठाकुर ने वो डाल तोड़ करके मथुर बाबू को दिखाया कि यदि एक ही कलर का पेड़ होता है तो दो कलर के फूल कैसे आए ईश्वर के लिए कुछ भी संभव है आज हम इस बात को म्यूटेशन कहेंगे म्यूटेशन एक मतलब एक्सेप्टेबल मने एक वाइडल रिकॉग्नाइज्ड फिनोमिना है उसमें हम कोई ईश्वर का हाथ नहीं देखते हैं किंतु बात यह नहीं है कि हम इसको टेक्निकल हेयर स्प्लिटिंग करें इस आर्गुमेंट को लेकर के बात ऐसी है कि ठाकुर उसको एक एग्जांपल देक के बताना चाहते थे कल हमने देखा ना कि ठाकुर एक बार उपदेश देते हैं फिर सिद्धांत देकर के फिर उपमा देकर के उसको प्रूव करते हैं एक बार ठाकुर वो बात करते हैं कि देखो कि आप जिसका संग करेंगे ना उसके जैसे हो जाएंगे फिर ठाकुर उपमा देते हैं कि एशियाटिक म्यूजियम में जाकर के देखा तो वो जो हड्डी पसली वगैरह है ना उसको एक्सक वेट करते हैं ना वो पुराने पुराने इस तरह के जीव जो कि बहुत साल पहले जमीन के भीतर में वो गड़ गड़ दिए गए हैं जमीन के भीतर में डटे गए हैं अभी उसको निकाला तो उनकी हड्डियां पत्थर जैसी हो जाएगी तो ठाकुर कहते हैं कि जिसका संग करेंगे वैसा ही आप हो जाएंगे फिर वो उदाहरण देकर के कहते हैं मैं सोसाइटी में गया था म्यूजियम में वहां पर देखा कि हड्डियां भी पत्थर बन जाती है तो पत्थर के संग में हड्डी आई तो हड्डी भी पत्थर हो गई वो जीव भी पत्थर हो गया तो ऐसा करके ठाकुर ने उपमा दी तो सामने जो डिवटी बैठा था उसने कहा कि महाशय आप यदि इस तरह से वो म्यूजियम म्यूजियम की मुलाकात लेंगे आपके पास में 10 साल के लिए बात करने का मटेरियल इकट्ठा हो जाएगा तो ठाकुर अस्ते अस्ते कहते हैं क्या उपमा देने के लिए तो के हां उपमा देने के लिए तो ठाकुर जहां में भी जाते हैं ये सब तो चीजें एकदम ऑब्जर्वेशन उनका ऐसा था कि वो उपमा के लिए ये सब खींच लेते थे वो एक बार उपमा देते हैं ना कि वो कैंसर हो गया है खा भी नहीं पाते हैं शरीर भी बड़ा अस्त है तो मां को कहते हैं कि मां वो म्यूजियम में देखा था हड्डी पसली होते है ना स्केलेटन होता है मनुष्य का उसको तार देकर के बांधा हुआ था जनरली मनुष्य का देहांत हो जाता है तो हड्डियां सब बिखर जाती है किंतु उसको आपको यदि पूरा स्केलेटन बनाना है तार देक के बांधना पड़ेगा तभी वो स्केलेटन जैसा दिखेगा तो ठाकुर कहते हैं वो जो तार दे कर के वो स्केलेटन को बांध करके रखा था ना ऐसा मेरे शरीर में थोड़ा बहुत बांध करके ठीक कर दो तो ठाकुर उसमें भी हमको तो उपमा दे करर के बात करते मां के साथ में भी उपमा देक के बात यहां पे अच्छा अपना टॉपिक क्या था किंतु कि जद मैं कहूंगा कि मैं मुक्त हूं तो यह जो जन्म जन्मांतर के फेरे हैं उससे भी मैं मुक्त हो जाऊंगा अभी अद्वैत वेदांत या तो वेदांत इन जनरल कहेगा कि आपको तपस्या करनी पड़ेगी तपस्या के बाद में मने नोट इतनी तपस्या भी नहीं करनी है कि करोड़ों जन्मों के पाप है तो करोड़ों सालों की तपस्या ऐसा भी नहीं है जस्ट आप जितनी हो सके उतनी कीजिए इमीडिएट आपको फल प्राप्त होना शुरू हो हो जाएगा जैसे गीता में भगवान कहते हैं कि स्वल्प अपस धर्मस्य त्रय दे महत्व भया थोड़ा सा भी धर्म आपने किया तो महत्व भय से बचा लेता है किंतु यहां पर उससे भी एक रेडिकल फिलोसोफी है वो है अजात वाद अजात वाद कहता है जगत है ही नहीं मतलब एक बार आपने कह दिया जगत नहीं है या तो फिर दृढ़ संकल्प के पूर्वक आपने कहा कि जगत का अस्तित्व ही नहीं उसी क्षण जगत खत्म हो जाएगा गायब हो जाएगा ये जो इंस्टेंट इनलाइटनमेंट बोलकर के जैन बुद्धिज्म में एक है तो ये जो जहन बुद्धिज्म का है कि आपको एक गुरु जो है पजल देंगे क्वान के रूप में उसको आप सॉल्व करना है उसके ऊपर में आपको मन को एकाग्र करना है जैसे ही पजल सॉल्व हो जाएगी वैसे ही आपको इंस्टेंट इनलाइटनमेंट मिल जाएगी फिर ऐसा नहीं कि ये कर्म के फेरों को काटते जाइए काटते जाइए वो सब कुछ नहीं है तो यह सब रेडिकल फिलोसोफी है अभी हम की किस एक स्पेक्ट्रम है कि इतने सारे कर्म मैंने किए हैं अभी एक के बाद एक करके मुझे कर्मों को काटना होगा पता नहीं जन्म जन्मांतर की यात्रा कब समाप्त होगी वहां से स्पेक्ट्रम चालू होता है अद्वैत वेदांत तक आता है अद्वैत वेदांत कहता है कि जगत ही मिथ्या है तपस्या करके माने इतनी लंबी तपस्या भी नहीं कि करोड़ों जन्मों को काटने के लिए करोड़ों जन्मों की तपस्या ये प्रोपोर्शनल नहीं है आप तपस्या की इंटेंसिटी बढ़ेगी तो जो टाइम स्पान है व कम हो जाएगा तो वो एक अद्वैत वेदांत है फिर उससे भी रेडिकल एक स्पेक्ट्रम है वो अजात वाद अजात कहता है दृढ संकल्प करके या तो मन को एकदम बांध करके ठीक कर दिया कि जगत नहीं है तो जगत नहीं ही है तो अभी देखिए यहां पर ठाकुर यहां तक कहते हैं कि यदि विष भी अपने शरीर में जाएगा तो हम कहेंगे कि नहीं विष नहीं है तो विष भी चला जाएगा मैंने दिस इज सो रेडिकल ठाकुर को हम जनरली कहते हैं कि भक्ति मार्गी है ना कि फिर विशिष्ट अद्वैत ना कि द्वैत ऐसे सब कहते हैं यहां पे ये जो आइडिया है दिस रेडिकल ऑन द स्केल ऑफ अजात वाद मने मोस्ट रेडिकल वेदांतिका वाली बात यहां पर ठाकुर कर देते हैं यह जो मां की कहानी है ना कि वो वहां पे एक लड़का था मा मां के वहां पे गाय थी जयराम बाटी में तो गाय की सेवा करता था एक दिन आकर के एक सांप ने उस लड़के को द लिया तो फिर वो एक डॉक्टर आया वह कहता है कि वहां पर काटना पड़ेगा काट कर के खून निकालना पड़ेगा खून के साथ में विष बाहर आ जाएगा मां ने कहा नहीं वो सब कुछ नहीं बच्चे को लेकर के जाओ सिंहवाहिनी के मंदिर में सिंहवाहिनी यानी की मिट्टी का पूरे देह के ऊपर में लेपन किया फिर पूरी रात मां उसके साथ में बैठी सुबह को देखा कि पूरा विष खत्म हो गया है उसके शरीर में से अभी देखिए कि इसको आप दो-तीन तरीके से इंटरप्रेट कर सकते हैं सिंहवाहिनी का चमत्कार या तो फिर मां का चमत्कार कह सकते हैं या तो फिर यह जो रेडिकल अजात वाद है विष है ही नहीं मां ने एक बार यह ठीक कर दिया तो वही अजात वाद इसके ऊपर में अप्लाई होकर के उसके देह का विष खत्म हो गया ठाकुर कहते हैं हमको सोचना है कि नहीं मेरे देह में विष नहीं है तो हमारी वजह मां ने हमारे लिए सोच लिया मां में इतना तो पावर था तो इसके शरीर में विष नहीं है यदि एक बार भी मां ने ऐसा दृढ़ संकल्प करके बोला होता सोचा होता तो विष चला जाता सो दिस आर वेरी रेडिकल फिलोसोफी ठाकुर को ना हम किसी भी एक बंधन में नहीं बांध पाएंगे कभी भी ऐसा नहीं कह पाएंगे कि ठाकुर की यह फिलोसोफी है ठाकुर की वह फिलोसोफी है सब तरह का स्पेक्ट्रम ऑफ फिलोसोफी ठाकुर के टीचिंग्स में हमको देखने को मिलती है हमारी बुद्धि कहां तक जाती है उसके ऊपर में डिपेंड करता है कि हम ठाकुर को किस तरह से किसी एक पीजियन होल में बिठाते हैं किसी तरह से क्लासिफाई करते हैं कि नहीं यही ठाकुर कहते हैं वो तो अपनी बुद्धि पे है ठाकुर हिमसेल्फ इज बियोंड ऑल फिलोसोफी तो यह जो एकदम रेडिकल जो रेडिकल मोस्ट फिलोसोफी जो होती है इस जगत की उसकी बात यहां पर ठाकुर करते हैं फिर क्या कहते हैं ईश्वर नाम एमन विश्वास होआ चाहि कि तार नाम करे छी अर एकन पाप थावे ईश्वर के नाम पर ऐसा विश्वास करना होगा कि मैंने उनका नाम लिया है क्या मुझे पाप लगेगा मेरा प पाप रहेगा पाप थाक बे अर्थात कि पाप रहेगा हो सकता है कि एक बार मैंने पाप कर लिया है किंतु ईश्वर का नाम पूरी श्रद्धा भक्ति निष्ठा पूर्वक लिया तो पाप थोड़ी ना रहने वाला है मेरा आश्चर्य चिन्ह यहां पर लगाया है एक्सक्लेमेशन मार्क अमार आभार पाप की मेरा फिर पाप किस चीज का कृष्ण किशोर परम हिंदू सदाचार निष्ठ ब्राह्मण से वृंदावन गी छलो कृष्ण किशोर के बारे में ठाकुर बहुत सारी बात करते हैं उसमें से यह एक बात कि वह परम हिंदू है बड़ा ही सदाचार निष्ठ ब्राह्मण वह एक बार वृंदावन गया था एक दिन भ्रमण करते-करते तार जल तृष्णा पे छलो एक दिन भ्रमण करते-करते उसको प्यास लगी एकटा कुवार काछ गए देख ले एक जन लोग दाढ़े रहे छ एक कुए के पास में जा करके देखा एक आदमी खड़ा था ताके बोलले रे तू एक घटी जल आमा के दते पारिश उस उसको कहा उस व्यक्ति को कृष्ण किशोर ने कि तुम क्या मुझे एक घटी जल निकाल करके दे पाओगे तुई की जात फिर पूछते हैं तुम कौन सी जात हो श बल्ले ठाकुर महाशय आमी हीन जात मची तो उसने उत्तर दिया कि महाशय मैं तो हीन जात हूं निम्न जाति का हूं मैं मोची हूं तो कृष्ण किशोर बोलले तूही बोल शिव नेख जल तुले दे तुम बोल शिव का नाम लो और फिर जल तुल लो देखिए स्वामी जी की सेम कहानी है कि वो रास्ते से जा रहे हैं एक आदमी बैठ कर के चिलम पी रहा है चिर वो स्मोकिंग कर रहा है स्वामी जी की बड़ी इच्छा हो गई स्मोकिंग करने की तो वो बोले उसका साथ में बैठ करके दाओ मुझे यह चिलम दो तुम्हारा मैं भी स्मोक करता हूं तो यह आदमी बड़ा संकुचित होकर बोलता है कि नहीं नहीं मैं तो नीच जात हूं आप साधु है आपको मैं कैसे दूं मैं मेरा चिलम पिया हुआ मेरा मुंह लगाया हुआ तो स्वामी जी बोलते अच्छा ठीक है बोल कर के खड़े होकर जा रहे हैं कुछ देर चलने के बाद में उनको लगा अरे मैं इतना रेडिकल मेरा रेवोल्यूशन आइडियाज है मेरे ही भीतर में यह सब नात जात ऐसा डीप रूट लगा कर के बैठा है कि जैसे ही उसने कहा कि मैं नीची जात का में खड़ा होकर के चलने लगा ऐसा कैसे चलेगा बोल कर के वापस गए स्वामी जी ने जोर करके उसके हाथ में से चिलम छीन ली और फिर धुम्रपान करने लगे अभी वो जो स्वामी जी के जो मित्र थे ये गिरीश घोष वगैरह वे लोगों का अपना मत था कहते हैं स्वामी जी को धुम्रपान की ऐसी वो लत लगी हुई थी कि वो नीची जाति का भी वो हुक्का लेकर पीना शुरू कर दिया तो यहां पर भी हम कह सकते हैं कि कृष्ण किशोर को प्यास इतनी लगी थी कि उसने शिव का नाम देकर के एक मने एक तरह का विधान देकर के उसने करवा दिया तो जो भी है सही सही जो आचार्य कौन होता है कि जद प्यास भी लगे जद एक ये भी हो जीवन जरूरियत किंतु फिर भी व अपने नियम का व्रत का भंग नहीं करेगा वो जो एक पंखी की कहानी है राम नाम ले रहा है और प्यास लगी है अभी वह सरोवर के किनारे बैठा है किंतु प्यास के मारे मरने जैसा हो रहा है तो लक्ष्मण ने पूछा भगवान राम को कि अरे यह पंखी जो है किनारे सरोवर के बेटा है किंतु फिर भी पानी नहीं पी रहा है किस तरह का इसका आचरण है तब भगवान ने कहा वह राम नाम कर रहा है तो पानी पीने से राम नाम के व जो यह प्रवाह चल रहा है उसमें विच्छेद होगा तोव विच्छेद नहीं करना चाहता वो मर जाएगा किंतु वह राम नाम नहीं छोड़ेगा इसके लिए वह पानी नहीं पी रहा जो सही सही आचार्य होते हैं एक बार त्रिगुणा तीता नंद जी ने ऐसा एक बार सोच लिया त्रिगुणा तीता नंद जी मोस्ट प्रोबेबली थे वरा नगर मठ की बात है मैं अनवरत जप करता रहूंगा सतत जप करता रहूंगा बिल्कुल उसमें विच्छेद नहीं होगा तो बैठ कर अभी ये लोगों का तो सब भैरव जैसे थे ना

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संकल्प किया तो किया अभी जो भी हो जाए बोल कर के बैठ कर के जप करना शुरू कर दिया अभी खाने का समय है शशि महाराज उस समय मठ के

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वो करता हर्ता थे तो उन्होंने पुकारा चलो सब लोग खाना खाने के लिए अभी ये महाराज आ नहीं रहे तो उनके कमरे में जाकर देखा क्या कर रहे हो तो अभी वो उन्होंने इशारों से बता दिया कि जप कर रहा हूं खाना नहीं खाऊंगा तो अभी यह तो बड़ा मुश्किल है जब तक जप नहीं भंग समाप्त होगा तब तक खाना नहीं खाएंगे वो बेचारे बीमार पड़ जाएंगे और व गुरु भाई तो छोड़ने वाले नहीं थे वो लोग भी तो सब ऐसे थे तो फिर अभी सब लोगों ने मिलकर के परामर्श किया कितनी देर तक जब चलता है वो बहुत देर तक चला जदी ऐसा ठीक कर लिया ये लोग गुरु भाई तो स ना वो एक बार ठीक कर लिया कि या तो ईश्वर का दर्शन होगा वरना जप करते करते शरीर त्याग कर दूंगा तो हो सकता है कविद टेंशन में सब लोग आ गए फिर उसका एक निराकरण किया गया कि महापुरुष महाराज बड़े ही मने पवित्र बड़े

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ही सम्माननीय थे सभी गुरु भाइयों में तो महापुरुष महाराज उनके साथ में बैठेंगे और ये त्रिगुणा तिता अंद जी महाराज उनको स्पर्श करके रहेंगे अभी महापुरुष महाराज को स्पर्श करना यानी कि सतत जप का वो चालू ही रहना जैसे गंगाजल में हाथ डालते हैं तो कैसा हम लोग पवित्र हो जाते हैं तो वैसे ही महापुरुष महाराज को एक हाथ से स्पर्श करेंगे दूसरे हाथ से फिर वो जप को भंग करके आहार करेंगे और आहार जैसे ही समाप्त हो गया फिर से जप करना शुरू कर देंगे तो ये देखिए जो लोग निष्ठावान होते हैं किंतु वे लोग जद प्यास से मर जाए भूख से मर जाए अपना व्रत का भंग नहीं करेंगे ठाकुर को यह बात पता थी इसीलिए कोई इस तरह का ऑब्जेक्शन ले कि नहीं कृष्ण किशोर तो उसको प्यास लगी थी इसलिए उसने इस तरह से एक ट्रिक करके कह दिया कि तुम शिव का नाम लो फिर वह सब ठीक हो जाएगा इसीलिए ठाकुर ने पहले ही वह भूमिका बांध दी पूर्व भूमिका कि परम हिंदू सदाचार निष्ठ ब्राह्मण जैसे कि ठाकुर के पिताजी स्वयं थे वो ठाकुर के उस समय का जो एक था कि किसके पास में से भिक्षा ग्रहण करनी किसके पास में से नहीं

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करनी तो वो ठाकुर के खुद ही राम का ठाकुर के पिताजी का था कि किसके पास में से भिक्षा लेंगे नहीं लेंगे बड़ा ही उनका र नियम था अभी घर में तो शिव का संसार है खाने का भी सब तकलीफ हो रहा है किंतु खाने की भले तकलीफ हो जिसके पास में से भिक्षा ली जाती है उन्हीं के पास में से लेंगे तो वो उनका ऐसा था हालांकि चंद्रमणि देवी का उदार हृदय था और कोई छुपके छुपके आकर के उनको कुछ दे देता था तो उदार हृदय से ग्रहण कर लेती थी मां को तो संसार चलाना है यह सब व्रत नियम का पालन करने से तो नहीं चलेगा तो किंतु देखिए कि जो ठीक ठीक निष्ठावान है वो शरीर त्याग देगा किंतु निष्ठा का भंग नहीं करेगा तो इस तरह का निष्ठावान आचार्य ब्राह्मण जब यह कहता है कि तुम शिव का नाम लो तुम शुद्ध हो जाओगे तो यही फिर वह शंकराचार्य और उसकी जो बात है चंडाल की शंकराचार्य नदी में से स्नान करके बाहर आ रहे हैं चंडाल ने स्पर्श कर दिया तो फिर शंकराचार्य ने कहा कि क्यों तुमने मुझे स्पर्श कर दिया पता नहीं है कि ब्राह्मण हो फिर से स्नान करना पड़ेगा वगैरह वगैरह तो फिर उसने क्या उत्तर दिया चंडाल ने कि आप भी नहीं ये शरीर नहीं है मन नहीं है आप ब्राह्मण नहीं मैं चंडाल नहीं हम सब तो आत्मा है अब मुंह से आत्म तत्व की बात करते हैं मुंह से अद्वैद वेदांत की बात करते हैं आचार में इतना कैसे चलेगा तो इमीडिएट शंकराचार्य को ज्ञान हुआ फिर पता चला कि भगवान शिव स्वयं वो चंडाल का स्वरूप धारण करके शंकराचार्य की जो एक आखिरी जो एक बेरियर बची थी उसको भंग करने के लिए आए थे देखिए ये होता है ना सेम चीज हमने तोतापुरी के बारे में देखी सेम चीज हमने भैरवी ब्राह्मणी के बारे में देखी कि साधना करते-करते जी साधना के अंत तक पहुंच गए हैं चरम लक्ष्य तक पहुंच गए छोटा सा एक बैरियर बाकी है तो शंकराचार्य के केस में भगवान शिव को आना पड़ा था तोतापुरी और यह भैरवी ब्राह्मणी के केस में ठाकुर के माध्यम से उनकी वो जो आखिरी बैरियर थी कहां पे खट कम पड़ जाता था वो एक समाप्त करके उनको अंतिम लक्ष्य तक उन्होंने पहुंचा दिया तो यहां पर भी ठाकुर कहते हैं कि परम आचारी परम हिंदू सदाचार निष्ठ ब्राह्मण उसने भी कहा जद तुम शिव करके अपने को पुकारोगे तुम शिव ही हो जाओगे भगवान नाम कोरले मानुष देहो मोन सब शुद्ध होए जाए भगवान का नाम करने से मनुष्य का देह मन सब शुद्ध हो जाएगा केवल पाप और नरक य सब कथा केनो सिर्फ पाप और नरक यह सब बातें क्यों एक बार बोलो ज अन्याय कर्मो जा करे छी आर करबो ना एक बार दृढ़ संकल्प करके कह दो कि जो अन्याय काम मैंने अभी तक किए हैं या पहले किए हैं फिर से नहीं करूंगा आर तार ना में विश्वास करो और फिर उनके नाम पर आप विश्वास कीजिए प्रेम उन्मत होया ठाकुर नाम महात्म गाते छन ठाकुर प्रेम उन्मत हो कर के नाम महात्म का गान कर रहे हैं आमी दुर्गा दुर्गा बोले मां जदी मोरी आखिर य दिने ना तारो केमने जाना जावे गो शंकरी मैं यदि दुर्गा दुर्गा नाम लेकर के मरता हूं तो आखिर में इस दन को कैसे नहीं तारो गी इसका भवसागर कैसे नहीं पार करवाओ गी देख लूंगा शंकरी माने मां को सीधा धमकी देकर कहते हैं कि तुम्हारा नाम लेकर के यदि मृत्यु हुआ और तुम यदि भवसागर नहीं पार करवाओ गी तो तुम्ही को मैं देख लूंगा कि कैसे यह नहीं करती हो यह है विश्वास मां तो अपनी खुद की है उसके साथ में आप झगड़ा भी कर सकते हैं उनके ऊपर में अहंकार भी कर सकते हैं उनको आप धमकी भी दे सकते हैं एट द एंड ऑफ द डे जद हमारा मन यह क्लियर रहे कि हां अन्याय काम एक बार हो गया है फिर से नहीं करूंगा तो ऐसा जब मन में एक बार यह ईश्वर के प्रति मन धावित होना शुरू हो फिर यदि इस तरह से शुद्ध भाव हम अपनाए तो वह हमको निश्चय ही भवसागर पार करवा देगा तो आज यही तक अभी कल फिर से मिलते हैं ओम शांति शांति शांति हरि ओम तसत श्री राम कृष्ण प्रणम एक्चुअली देखिए इसका यूटिलिटी जैसे

हम चाहे कितना ही रटते रहे कि हम मुक्त हैं तो भी हम कभी मुक्त नहीं हो पाएंगे। तो फिर क्या यह उपदेश अव्यावहारिक है?

आप कहते हैं ना मॉडर्न एज में इतना नहीं है एक समय था कि हम लोग धर्म को बहुत सीरियसली लेते थे और जब कोई यह कहता था कि हम पापी है तो बिल्कुल ऐसे मतलब मायूस हो जाते थे कि पूरा जीवन अभी जैसे कि बर्बाद हो गया क्या यह ब्राह्मण लोगों का पुरोहित का भारत में हो कि विदेश में हो ऐसा एक पावर था हम लोगों के मन के ऊपर में कि वे लोग जब भी कहेंगे कि तुम नरक में जाने वाले हो जैसे हम लोग तो पूरा डर के मारे अभी यह होना शुरू हो जाते थे किंतु 20th सेंचुरी में देखिए कि यह धर्म है या पुरोहित है उनका प्रभाव जो है ना सोसाइटी में से ऑलमोस्ट नेगलिजिबल हो गया है आज कोई आकर के मुझे कहेगा तुम पापी हो तो मैं कहूंगा मैं ना ही पाप में विश्वास करता हूं ना ही पुण्य में विश्वास करता हूं ना ही तुम्हारे भगवान में विश्वास करता हूं क्या कर लोगे तुम यानी कि अभी इस समय यह कहना कि मैं पाप है मेरे सर पे मैं बहुत ही डर गया हूं और फिर कोई आकर के कहे अरे तुम तो अमृत के संतान है तो मैं बहुत खुश हो गया हूं यह दोनों एक्सट्रीम रिएक्शन आज के युग में हमको देखने को नहीं मिलेंगे क्योंकि ना ही हम एक्सट्रीमली फीयरफुल है ना ही ऐसा कहने से एक्सट्रीमली एलिवेटेड हो जाएंगे एक्सट्रीमली हैप्पी हो जाएंगे जॉय फुल हो जाएंगे सो दैट इज कि आज के युग का एक है कि हमको हमारे मन में एक अविश्वास ऐसा घर कर दिया है कि ईश्वर पे ही पहले विश्वास नहीं है भले ही चाहे लाख लिप सर्विस करते हो लाख मंदिर में जाते हो भीतर से वो बात नहीं है तो बोलकर के तुम शुद्ध हो इस बात का जो एक परिणाम होना चाहिए वह भी इतना नहीं मिलता है यू आर राइट इन अ वे कि यूटिलिटेरियन वैल्यू आज के युग में बहुत कम है सो यू आर राइट इन वन वे अभी दूसरी दूसरी तरीके से देखिए कि मनुष्य जब धर्म सीरियसली प्रारंभ करता है तो यह बात उसके सामने हमेशा आएगी पाप और पुण्य की वह सोचेगा कि अरे मैंने इतना पाप किया है तो भविष्य में मैं कैसे आगे बढ़ पाऊंगा ठाकुर कहते हैं ना वो जो गिलहरी है वो अपने बिल में जाने का प्रयास करती है किसी ने उसकी पूछ पर पत्थर बांध दिया तो जितनी बार ऊपर उठेगी वो पत्थर उसको नीचे गिरा देगा हालांकि ठाकुर ने दूसरे अर्थ में किया है किंतु हम लोग यह सोचना शुरू कर देते हैं पाप क्या मेरा इतना भयानक है इन दैट केस हमको यह देखना है क्योंकि अनफॉर्चूनेटली जब ईश्वर के ऊपर में विश्वास जब शिथिल हो गया है आज के युग में अंधश्रद्धा इतनी ही बढ़ गई है मैंने कितने लोगों को देखा है कि यह सब बातों में विश्वास करते हैं अंगूठियां पहन के रखेंगे देखें देखेंगे वो बड़ी-बड़ी अंगूठी यह ग्रह की इस अंगूठी यह ग्रह की यह अंगूठी माने इस तरह की अंधश्रद्धा में विश्वास करने वालों की जमात बहुत बढ़ गई है सो दैट इज एन अनफॉर्चूनेटली नहीं है तो फिर एक हायर अथॉरिटी हमको चाहिए कि ना मैं आज एक रिस्क ले रहा हूं तो रिस्क मैंने लोन लिया है या तो फिर कर्ज किया है तो यह रिस्क में मेरा सक्सेस हो जाएगा मेरा जो वेंचर है तो अभी मुझे एक हायर अथॉरिटी चाहिए अप्रूवल स्टैंप के रूप में तो ऐसे ही किसी को पकड़ेंगे और ज्योतिषी है ना कि कोई भी है फिर यह लोग आपको अंगूठी पहनाए तो यह क्या है कि इन ट केस यह अप्लाई हो सकता है कि यदि आपकी टेंडेंसी ईश्वर की ओर नहीं है किंतु यदि अंधश्रद्धा की ओर है देन वोह कुछ काम का नहीं है बात यह नहीं कि ग्रहों का विज्ञान विज्ञान नहीं है किंतु डर के मारे आप किसी अंगूठी को पहनेंगे और वो आपको हेल्पफुल होगा वो भी नहीं होने वाला है सो दैट वे यू कैन फाइंड अ यूटिलिटेरियन व वैल्यू और हाईएस्ट जो उसकी वैल्यू है तो आपने ठीक कहा कि मैं पापी नहीं हूं बोलकर के अजात वाद कि बिल्कुल बिना पाप का हो जाऊंगा मुक्ति मिल जाएगी या तो जन बुद्धिज्म इंस्ट इनलाइटनमेंट मिल जाएगा इट्स नॉट गोइंग टू हैपन वी नीड लॉट मोर फेथ एंड निष्ठा देन वी हैव करेंटली राइट नाउ आज के जगत में यह जो एक कर सकता है कि अंधश्रद्धा के मार्ग पर जाते हुए हमको रोकेगा वह एक हो सकता है क्योंकि यह फेनेटिसिजम जो है अनफॉर्चूनेटली अगेन कि ईश्वर पर विश्वास नहीं है किंतु फेनेटिक बहुत ज्यादा लोग हो गए हैं वी आर फार मोर फेनेटिक देन वी वेर इन द टाइम ऑफ ठाकुर ठाकुर के समय एक जो मुक्त एक इंक्वायरी का था कि ठाकुर ने खुद ने क्रिश्चन साधना की ठाकुर ने खुद ने इस्लाम साधना की तो ऐसा नहीं है कि ब्राह्मण होकर के ऐसा क्यों किया ही ही हैड दैट ओपनस टू एक्सप्लोर ऑल द रिलीजन आज है कि आप जिस पंथ में जन्म लिया है उसमें आप फेनेटिकली बिलीव कीजिए थोड़ा सा भी एक्सप्लोरेशन स्टार्ट करेंगे तो आपको बिल्कुल आउटकास्ट बना दिया जाएगा सो ऑल दिस अनफॉर्चूनेटली न्यू स्पिरिचुअल एक्सप्लोरेशन है वह कम हो गया है तो यदि आप कहेंगे कि हां मैं पापी नहीं हूं तो परहे पस कि आप इस सब नेगेटिव रास्ते में जाना रुकेंगे क्योंकि इन लोगों का पावर कब बढ़ता है जैसे वो ठाकुर ने कहा चर्च वमन दो नंबरी पैसा इकट्ठा किया है मन में गिल्ट फीलिंग है तब इन लोगों के चक्कर में फसें फिल्म ना है है और बाबूराम महाराज के

क्या हमारे संघ में ऐसे उदाहरण हैं जो कहते रहे कि मैं मुक्त हूँ और फिर सचमुच मुक्त हो गए ?

पास में एक लड़का आता था अनफॉर्चूनेटली उनका नाम अभी आज मुझे नहीं पता है और लिखा भी नहीं गया है क्योंकि इस तरह से थोड़ा सा सीक्रेसी मेंटेन की जाती है कि उनका नाम ना आए किंतु वह जब लड़का जब ठाकुर के पास आता था वो इतना मतलब उसके परिवार जनों ने उसको छोड़ दिया था माने डिक्लेयर कर दिया था कि हम इसको यह कर देते हैं घर से निकाल देते हैं इसका जिम्मा हम नहीं लेते हैं इतना वो मतलब स्त्रियों के संग में ना कु संग में फंसा हुआ था किंतु मन में एक था उसका कि नहीं बाबूराम महाराज का जो प्रेम है ये अद्भुत प्रेम है जब भी मैं मठ में जाता हूं सबको पता है कि यह कितना कु चरित्रवान लड़का है किंतु फिर भी बाबूराम महाराज मुझे वहां पर बिठा कर के खिलाते हैं और मेरी पूछ मेरे बारे में पूछते हैं तो महाराज के प्रेम से ऐसा बंधा हुआ था ना ठाकुर ना बेलूरमठ ना कुछ ना फिलोसोफी कुछ नहीं कुसंग में पढ़ कर के सिर्फ महाराज के प्रेम की वजह से महाराज के पास आता था एक दिन उसने दीक्षा ली और फिर बाद में उसका बड़ा नाम हुआ अपने ऑर्डर में कि बहुत अच्छा साधु है बोलकर के उसकी सुख याति हुई अभी नाम छुपा के रखा है क्योंकि किसी बड़े साधु का इस तरह का पास्ट जद बाहर आ जाएगा तो ठीक नहीं रहेगा किंतु जॉइन करके साधु हुए बड़ा नाम हुआ उनका अच्छा तो इन अ वे कि मैं पापी नहीं हूं तो मने उसका एक डिफरेंट एस्पेक्ट उसी का कि जद बाबूराम महाराज मुझे इतना प्रेम करते हैं मैं बाबूराम महाराज के प्रेम का पात्र हूं जैसे ठाकुर ने कहा ना ईश्वर के संतान हो राजाधिराज के संतान हो डर किस चीज का तो बाबूराम महाराज का प्रेम मिला है तो डर किस चीज का इस तरह के एग्जांपल बहुत है स्वामी जी जब सन्यास दीक्षा दे रहे हैं बेलूरमठ में पहली पहली बार बेलूरमठ होने के बाद पहले तो विरजा होम वो बराह नगर मठ का हो गया बेलूर मठ में जब दीक्षा दे रहे हैं सन्यास दीक्षा व दो-तीन कैंडिडेट को सिलेक्ट किया तो साधु लोगों ने आके कंप्लेन किया कि इस लड़के को क्यों दीक्षा देते हो इसका चरित्र तो सबको पता है अगेन अभी यह सब लोगों का नाम नहीं लिखा जाता क्योंकि फिर व रिफ्लेक्ट बेडली ऑन देयर कैरेक्टर किंतु स्वामी जी ने क्या उत्तर दिया यदि हम इसका जिम्मा नहीं लेंगे तो सोसाइटी में इसका जिम्मा कौन लेगा बताओ तो उसको सन्यास दीक्षा दी गई और बहुत अच्छा साधु बाद में हुआ मां के पास में एक जमींदार का लड़का आता था धनी लड़का कितना वो सब कु चरित्र था उसका जब भी वह जयराम बाटी आएगा सभी लोग कहेंगे मां को मां इसको आप क्यों निम मतलब उसको ये क्यों करती है उसको ट्रीट क्यों करती है उसको यह क्यों करती है आदर क्यों करती है मां ने कहा नहीं लोग कुछ भी कह दे मां बोलकर जद आया है तो मैं उसको लौटा नहीं पाऊंगी वो बूढ़ी वैशा की कहानी ठाकुर के साथ में मां का झगड़ा हो गया मां बोल कर के आएगी और यदि आप कहेंगे कि इसको मेरा खाना ना छूने दो यह नहीं चलेगा तो इस तरह का उदाहरण जद होगा भी ना कि मैं कहता हूं कि मैं पापी नहीं हूं तो मैं मुक्त हो गया ऐसे उदाहरण होंगे भी ना तो कोई ये डिक्लेयर नहीं करेगा कहेगा नहीं कि मैंने ऐसा करके अपने जीवन को ट्रांसफॉर्म किया है किंतु इन लोगों ने विश्वास करके उनका जीवन ट्रांसफॉर्म किया है इस तरह के उदाहरण बहुत मिल जाएंगे ना वो सही में यही बात है ना अदर वाइज देखो प्रेम है ना पत्थर को भी जैसे कि वो सोना बना देता है वह जो परस मणि है ना वो लोहे को सोना बना देता है प्रेम उस तरह का है भालो भाषा उस तरह का है कि वह दुश चरित्रवान व्यक्ति को भी प्रेम से चरित्र शुद्ध सक्ष बना

प्रेम जीवन बदल सकता है

दगा सबसे बड़ा एग्जांपल तो स्वामी जी का है स्वामी जी कहां वो माहाकाली को मानते नहीं थे माहाकाली की मजाक उड़ाया करते थे आखिर में देखिए एक्चुअली क्या है कि जो आत्मविश्वास से अपना लाइफ ट्रांसफॉर्म करेगा ना वह इसके बारे में ज्यादा चर्चा नहीं करेगा दैट इज वन थिंग और इसका अभी मुझे एगजैक्टली याद नहीं आ रहा है कि ऐसा कौन है एग्जांपल सब लोग देख रहे हैं तो और लिपिबद्ध दूसरे ने किया है लिखा या बोला उन्होंने नहीं है दूसरे ने देख कर के लिखा है यह जो स्पिरिचुअलिटी में यह लिमिट हमेशा रहेगी कि जो इंटरनल जर्नी है ना साधक की इट्स अ ग्रांड जर्नी कितना हीरोइज्म है कितना स्ट्रगल इसके सामने यह रामायण महाभारत भी शायद ना फीके पड़ जाए इतनी हम सबके भीतर की जर्नी है किंतु इसको लिखेगा कौन बहुत कम लोग इस तरह से लिखेंगे किंतु जब जो एक्सटर्नल मेनिफेस्टेशन है उसको देख कर के थर्ड पर्सन लिख सकता है सो स्पिरिचुअल पर्सपेक्टिव अपना हमेशा लिमिटेड रहेगा कि एक्सटर्नल मेनिफेस्टेशन क्या है वह बताइए उसके बारे में बता सकते हैं इंटरनल जर्नी तो हम सबकी अपनी अपनी है वो एक बार सुहितानंद जी ने कहा था कि जितने भी है ना अपने ऑर्डर की इवन करंट जो जनरेशन है उन सबकी बायोग्राफी इकट्ठी करनी चाहिए सबका अपना अपना एक जर्नी है सबना अपना एक संघर्ष है हीरोइज्म है अपना एक धर्म युद्ध उन्होंने किया है भीतर में किंतु बहुत कम लोग इसके बारे में बात करेंगे ना व जो ठाकुर वो किल्ले का उपमा

आध्यात्मिक विकास आंतरिक होता है, इसलिए हम कभी-कभी इसको समझ नहीं पाते

दे देते हैं ना रैंप है वहां पर तो रैंप पर जा रहे हैं तो पता नहीं चलेगा कितना उठ गए कितना नीचे आ गए पीछे देखेंगे तो पता चलेगा ना किंतु ज देखिए इसलिए ठाकुर बारब कहते हैं ना मन को ईश्वर की ओर रखना है देखिए आपका जागतिक परिस्थिति कैसी भी हो जाए नरेद्र की ऐसी परिस्थिति आ गई पिताजी के मृत्यु के बाद में कोई उसका एक मित्र एक किसी प्रोस्टिट्यूट के पास उनको लेकर गया अभी नरेद उनके साथ में बात कर रहा है वो इस लड़की के स्त्री के साथ में तो नरन के मन में करुणा का भाव जागृत हुआ बात है कि वह वहां तक गया तो सही मतलब वह परिस्थिति घर की कैसी आ गई कि उसको वहां तक जाना पड़ा वही स्वामी जी कहते हैं एक समय ऐसा था जिस गली के जिस किनारे थिएटर होता था उस साइड को छोड़कर मैं सामने की साइड चला जाता था इतना मेरा यह था मने तपस्या का भाव था वही स्वामी जी एक दिन प्रोस्टिट्यूट के वहां पर बैठे है परिस्थिति क्या करवाती है मनुष्य के पास से सो परिस्थिति हमारे पास में कुछ भी करवाए मन जो है इट शुड बी ऑन गॉड तो इवेंचर कम आउट