मङ्गलाचरण
ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिणे अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः श्री श्री रामकृष्ण कथामृत 16th दिसंबर मास्टर महाशय आए हैं दक्षिणेश्वर में ठाकुर के साथ में कुछ दिन रहने के एक
ईश्वर-प्राप्ति का मार्ग: ज्ञान, भक्ति, और योग साधना का समन्वय
जनाई के एक मुख बाबू आए हैं। उनके साथ में ठाकुर वार्तालाप कर रहे हैं। और इस वार्तालाप का एक जो पोर्शन है उसको अभी हम देख रहे हैं। ठाकुर कहते हैं कि हमारे भीतर में जो जीवात्मा है वह है जैसे कि सुई और ईश्वर है। आत्मा या परमात्मा है। जैसे कि मैग्नेट और सुई मेटल और मैग्नेट सुई और यह चुंबक पत्थर इन दोनों का योग तो सहज ही है। बस वही बात है कि सुई के ऊपर में जब थोड़ा सा कादव कीचड़ जम जाता है तब वह मैग्नेट उसको अट्रैक्ट नहीं कर पाता। तो फिर यह मुख ठाकुर को पूछता है कि किस तरह से इस कीचड़ को धोया जाए। उसके उत्तर में ठाकुर कहते हैं कि रो-रो करके ईश्वर को पुकारने से जो अश्रुवारी झरती है जो आंसुओं की धार बहती है उससे यह सुई धुल जाएगी और जैसे ही एक महिला जो है उसका धुल गया साथ में ही सुई उड़कर के मैगनेट को जाकर के चिपक जाएगी। तो वह एक रास्ता है। दूसरा है कि ध्यान सहस्त्रार में शिव विशेष रूप से विराजमान है सहस्त्रार चक्र पे तो उनका ध्यान करना चाहिए। तो वह एक उपाय बताया और फिर कहते हैं ठाकुर कि संसारी लोगों को और साधकों को सभी को हमेशा साधु संग की जरूरत होती है। तो यह साधु संघ का महात्म अर्थात कि देखिए कि तीन उपाय हो चुके हैं अभी तक। सर्वप्रथम है रो-रो करके ईश्वर को पुकारना। दूसरा उपाय है ध्यान करना। तीसरा उपाय है साधु संग और चौथा उपाय है ठाकुर कहते हैं कि भगवान को पावर ऑफ एटर्नी देना। यह पावर ऑफ एटर्नी क्या है? यदि आप विदेश में रहते हैं और आपका बैंक अकाउंट या तो फिर आपके लिए जो कोई भी लीगल प्रोसेस है वह आपको करवानी है तो आप वह जो लोकल कोई एक पर्सन होगा उसको आप पावर ऑफ एटर्नी देंगे। वो ऑन योर बिहाफ आपके बदले वो कोई लीगल प्रोसेस है, बैंकिंग प्रोसेस है, वह कर पाएगा। तो इसको पावर ऑफ एटर्नी कहते हैं। मुझे पता नहीं कि अभी आजकल यह चलता है कि नहीं। एटलीस्ट ठाकुर के समय तो यह था। तो इसको कहते हैं पावर ऑफ एटर्नी यानी कि ये संपूर्ण रूप से उनके ऊपर में ईश्वर के ऊपर में शरणागत हो जाओ। जो ईश्वर करे हमारे लिए वही सही है। तो इसके बारे में जब हम डिस्कस कर रहे थे तो कल हमने यह देखा था कि किस तरह से यह मुख ठाकुर कहते हैं कि ईश्वर को पावर ऑफ एटर्नी दो। और यह जो गिरीश घोष है उसको ठाकुर ने कहा था कि मुझे पावर ऑफ एटर्नी दो। तो इन दोनों के बीच में देखिए कि यह तो एक डिफरेंस है कि ठाकुर की अंत्य लीला प्रारंभ हो चुकी थी बोलकर के उस समय ठाकुर ने यह कहा कि मुझे पावर ऑफ एटर्नी दो और दूसरा है कि गिरीश का यह जो श्रद्धा था ठाकुर के ऊपर में इतना प्रचंड था। देखिए यह जो मुख है जनाई के जिनके साथ में ठाकुर यह सब बात कर रहे हैं। इनके बारे में तो फिर और कुछ हमको जानने को मिलता ही नहीं है। उन्होंने ठाकुर की यह बात सुनी होगी। सुनकर के धन्य अवश्य हुए होंगे। किंतु यह जो मन प्राण समर्पण करके संपूर्ण रूप से ईश्वर के शरणागत हुए थे कि नहीं उसके बारे में तो हमको नहीं पता है एटलीस्ट मुझे नहीं पता है ना ही हमारे साहित्य में यह जनाई के मुखजे के बारे में बाद में कोई बात आती है तो उन्होंने सिर्फ सुन लिया होगा अभी जबकि गिरीश घोष है उसने यह अक्षरशः करके दिखाया लिटरली अपनी लाइफ में इसको प्रैक्टिकल करके करके दिखाया है पावर ऑफ एटर्नी देना। यानी कि देखिए कल भी जैसे हम डिस्कस कर रहे थे बात सिर्फ यह नहीं है कि ठाकुर अह अब जैसे यह ध्यान के बारे में तो ध्यान का उपदेश सिर्फ नरेंद्र को ही देते हैं। फिर यह जो ठाकुर कहते हैं कि यह जो बिल्ली है बिल्ली का बच्चा म्याऊं म्याऊं करके रोता है। फिर यह पावर ऑफ़ एटरर्निकेत देने के समय में तो वह जहां पे उसकी मां उसको रखती है वहां पे वह रहता है। तो जो बाकी डायरेक्ट डिसाइपल है शशि महाराज, शरद महाराज, लाटू महाराज उनको इस तरह से शरणागति का ही उपदेश दिया। गिरीश घोष को सिर्फ गिरीश घोष को ही पावर ऑफ एटर्नी की बात कही। ऐसा नहीं है। देखिए कि इस पैसेज से स्पष्ट दिखता है कि आध्यात्मिक परंपरा में हिंदू आध्यात्मिक परंपरा में जो भी भाव है सब भावों की बात ठाकुर एक साथ में कर देते हैं और फिर भक्तों पर छोड़ते हैं कि वे लोग इसमें से कौन सा भाव लेकर के आगे बढ़ेंगे। हालांकि देखिए कि अभेदानंद जी का जो किस्सा है उससे तो हमको स्पष्ट समझ में आता है कि अभेदानंद जी को द्वैत भाव से आगे बढ़ने की बात थी। एकाएक कहां वो नरेंद्र ने निराकार भाव उनके भीतर में संक्रमित कर दिया। तो फिर जैसे कि उनके व्यवहार में कुछ ना कुछ इनकंसिस्टेंसी दिखना शुरू हो गया था। अभी देखिए कि ठाकुर को जब हम इस तरह से डिटेल में स्टडी करते हैं तो एक बात जो मुझे समझ में आती है कि बात यह नहीं है कि ठाकुर ने अभेदानंद जी को सिर्फ भक्ति मार्ग के बारे में कहा होगा। हो सकता है कि उनको ज्ञान के बारे में भी कहा हो। किंतु फिर उन्होंने देखा होगा कि कौन सी बात इनको अच्छे से जज हो रही है। कौन सी प्रैक्टिस को वह अच्छे से कर पा रहे हैं और फिर इसके अनुसार ठाकुर ने अपने टीचिंग्स को मॉडिफाई किया होगा। तो यदि हम इस तरह से बात करते हैं तो जैसे एक ट्रेडिशनल पिक्चर हमारे मन में बैठा हुआ है कि ठाकुर आने वाले के मन के भाव समझ लेते थे और भाव समझ करके उसी के अनुसार बात करेंगे। यदि कोई वैष्णव ठाकुर को मिलने को आता है तो ठाकुर वैष्णव भाव के बारे में बात करेंगे। कोई शाक्त आता है ठाकुर के पास में तो शक्ति साधना के बारे में बात करेंगे। यदि कोई त्यागी इस तरह से कोई आता है जिसका मनोबल बड़ा दृढ़ हो जिसका विल पावर बड़ा स्ट्रांग हो उसके साथ में हो सकता है ठाकुर वेदांत की ही बात करते हो। यह एक ट्रेडिशनल पिक्चर है हमारे माइंड में और यह है ही सही ही है। उसमें गलत कुछ नहीं है। किंतु यह एक पैसेज देखिए हमारे सबके साथ में जब हम यह आध्यात्मिक जगत में गहराई से प्रवेश करने का प्रयास करते हैं। प्रश्न यह है कि ये जो पर्सनल इंस्ट्रक्शन है गुरु से जो शिष्य को प्राप्त होती है वो हमेशा सीक्रेट रखी जाती है। बहुत कम ये जो ठाकुर ने मुझे ऐसा कहा ऐसा करके कोई डायरेक्ट डिसाइपल है कम ही बातें करते हैं। कुछ-कुछ अनुभवों की बातें करते हैं। कुछ-कुछ घटनाओं की बात करते हैं। रेमिनेशंस स्मृति कथाएं कहते हैं। किंतु आध्यात्मिक प्रगति के लिए क्या इंस्ट्रक्शन मिला इसको तो सभी लोग गोपनीय ही रखते हैं। सीक्रेट ही रखते हैं। जिससे कि इस तरह की सीक्रेसी है। एक यह प्रॉब्लम हमारे माइंड में होता है कि हम जब दो तरह से है आध्यात्मिक जीवन में मुझे जो चाहिए मुझे मेरे गुरु से मिल गया है तो फिर उसके अनुसार मुझे साधना करनी है और इतना ही मेरा कंसर्न है। तो यदि मैं इतना ही चाहता हूं तो तो फिर कोई प्रश्न नहीं। किंतु यदि मेरा एक फिलॉसोफिकल मेंट ऑफ माइंड है, यदि मैं एक तरह स्वाध्याय करने के लिए एक ओवरऑल सोचने का प्रयास करता हूं कि हां यह गुरु शिष्य का संबंध कैसा है? किस तरह की प्रकृति को किस तरह से कौन से गुरु ने किस तरह से गाइड किया है यह एक ओवरऑल सोचने का प्रयास करते हैं। तो यह जो सीक्रेसी है एक आध्यात्मिक जगत में गुरु और शिष्य का जो संबंध है यह सीक्रेसी की वजह से बहुत कुछ हमारी नजर से अन अदृश्य होकर रहता है। हमारी नजर के सामने नहीं आता और फिर हम बहुत सारी जगहों पर अनुमान के महल बना करके अनुमान करके करके काम चलाते हैं। तो देखिए कि इस तरह से अनुमान करते-करते हम रहते तो हैं किंतु फिर इस तरह का एक पैसेज जो कि हमारी नजर के सामने आ जाए कि ठाकुर स्पष्ट रूप से किसी एक भक्त को आध्यात्मिक जगत में आगे बढ़ने के लिए इंस्ट्रक्शन देते हैं और इस इंस्ट्रक्शन में आप देखेंगे कि वैष्णव भाव यह शक्ति साधना देखिए शक्ति साधना का अर्थ क्या है अल्टीमेटली कि आप ईश्वर को मातृ रूप में देखते हैं। तो यहां पे यह शक्ति साधना की भी बात ठाकुर ने कह दी है। सहस्त्रार में शिव वेदांत भाव हो गया। फिर यह जो आम मुक्तारी देना रोते-रोते अश्रुवारी बहाना पावर ऑफ एटर्नी देना यह वैष्णव भाव शरणागति वाला हो गया। और यह जो तृतीय भाव है बिल्ली का बच्चा अपनी मां के ऊपर में संपूर्ण रूप से निर्भर होकर के रहता है। तो यह मातृभाव की आराधना जो आ गई ईश्वर को मां के रूप में देखना यह शक्ति साधना की बात आ गई। तो देखिए कि एक ही पैसेज के भीतर में हमको वैष्णव भाव, वेदांत भाव और शक्ति भाव ये तीनों दिखते हैं। एक ही पैसेज में हमको शरणागति वाला भक्ति योग। दूसरा कि यह संकल्प शक्ति वाला ज्ञान योग या तो फिर ध्यान योग और फिर मन को एकाग्र करने वाला यह ध्यान योग तो है और यह भक्ति साधना और यह जो राजयोग है कुंडलिनी ये माने शक्ति साधना वाला ये ये सभी योग जो है भक्ति ज्ञान और ये राजयोग ये तीनों हमको इसमें दिखते हैं। यानी कि ऐसा कहना जो कि हम लोग समझते थे में भी जैसे अह ऐसा ही हम लोग समझते हैं कि यह भक्त इस साधना के लिए लायक है। एलिजिबल है तो उसको वही साधना करवाओ। किंतु इस पैसेज से ऐसा लगता है कि ठाकुर एक बार सब कुछ कह देते हैं और फिर देखेंगे कि यह सिर्फ सुनने के लिए आया है ना कि फिर प्रैक्टिस में आगे बढ़ेगा कि भी नहीं। देखिए बहुत सारे लोग तो ठाकुर के पास आते ही थे। हम लोग देखते हैं कि ब्राह्म समाज के अधिवेशन में या तो ऐसी कोई जगह पे कोलकाता में यह बलराम बसु है या रामदत्त है सुरेश मित्र है वे लोग जब उत्सव करते थे तो बहुत सारे पड़ोसियों को अपने रिलेटिव्स को फ्रेंड्स को इनवाइट करते थे उसमें ज्यादातर लोग ब्राह्म समाज वाले आते थे ज्यादातर लोग ठाकुर को सुनकर के आनंदित होकर के चले जाते थे। अभी जैसे कि वह मैं कल ही पढ़ रहा था कि केशव सेन दक्षिणेश्वर आया है जहाज लेकर के। तो बहुत सारे ब्राह्मण फॉलोअर्स है उस जहाज में। तो ठाकुर को एक नौका के माध्यम से जहाज में ले आया गया। ठाकुर को एक केबिन में बिठाया गया। और फिर केबिन में तो ज्यादा जगह है नहीं। तो फिर बहुत सारे जो ब्राह्म फॉलोअर्स है वे लोग केबिन के बाहर खड़े रह के खिड़की के माध्यम से भीतर में देखते हैं कि ठाकुर क्या कर रहे हैं क्या कह रहे हैं तो देखिए कि बहुत सारे लोगों ने ठाकुर को सुना तो था उनके जीवन दरमियान किंतु वे लोगों ने सुनकर के ही एक कान से गया दूसरे कान से निकल गया भीतर में हो सकता है जो संस्कार शुद्धि हुई होगी नो डाउट आप अवतार के संपर्क में आते हैं तो संस्कार शुद्धि तो होने ही वाली है। तो इतना जो हुआ होगा सो हुआ होगा। किंतु फिर यह मुट्ठी भर लोग हैं जिन्होंने साधना करके अपने जीवन को धन्य बना दिया। तो जिन लोगों ने साधना करके जीवन को धन्य किया है उन लोगों की संख्या अल्प ही है और फिर वो उसी अल्पसंख्यक लोगों को फिर ठाकुर प्रकृति देखकर के साधना के उच्च से उच्चतर आयाम तक शिखर तक ले जाते थे। तो एक बार आप साधना प्रारंभ करते हैं तो फिर ठाकुर देखेंगे कि जो भी साधन पद्धति है आपकी उसको आप निष्ठा पूर्वक पकड़ के रहिए और उसमें सिद्धि प्राप्त कीजिए। यदि साकार है तो साकार निराकार है तो निराकार भक्ति योग है तो भक्ति ज्ञान है तो ज्ञान तो वो हो गया कि जो लोग साधना करते थे किंतु यह जो क्यूरियोसिटी को लेकर के आने वाले मुमुक्षुत्व को लेकर के आने वाले जो एक बहुत बड़ा दल था ठाकुर के पास आने वालों का इस पैसेज को पढ़कर के ऐसा लगता है कि ठाकुर जी छोड़िए दी माने सब कुछ म डिस्ट्रीब्यूट कर रहे सब कुछ जैसे कि इनके बीच में जैसे किसान होता है ना वो आप देखेंगे वो पहले बहुत पहले यह टीवी पर इस तरह के सीन दिखते थे कि वो किसान खेत में बीज बो रहा है तो बड़ा ही म वो हार्मोनिकली उसका हाथ चलता है ऐसा ऐसा ऐसा करके वो बीज फेंकता है तो देखिए कि वो ठाकुर इसी तरह से यह बीज फेंकते हैं वो खेत में जाकर के उनके माइंड में जो गया जो गिरा उनके भीतर में और फिर जिसने भी जड़ जमाई जो भी पौधे के रूप में पनपा तो इस तरह से देखिए कि एक पैसेज के भीतर में सब कुछ देखने को मिलता है। इसके बाद देखिए
सच्ची आस्था सुख में नहीं, संकट में जन्म लेती है
अभी यह मुख का जाने का समय हो चुका है और यह मुख अभी बोल रहा है गीता प्रवृत्ति शास्त्र पढ़ा बालो यह गीता वगैरह शास्त्र पढ़ना अच्छा है। श्री रामकृष्ण शुद्ध पढ़ ले सुन ले की हो गए। श्री रामकृष्ण कहते हैं सिर्फ पढ़ने और सुनने से क्या होगा? देखिए यही बात ठाकुर जैसे गीता को पढ़ना अच्छा है वैसे ठाकुर को भी सुनना अच्छा है। संस्कार शुद्धि होगी। उसमें कोई प्रश्न ही नहीं है। किंतु सिर्फ पढ़कर के सिर्फ सुनकर के क्या होगा? ठाकुर कहते हैं केऊ दूध सुने छे के दूध देखे छे के खे किसी ने दूध के बारे में सुना है। किसी ने दूध को देखा है किंतु किसी ने खाया है। ईश्वर के दर्शन करा जाए। आतार शंगे आलाप करा जाए। ईश्वर का दर्शन हो सकता है और ईश्वर के साथ में वार्तालाप भी हो सकता है। प्रथमे प्रवर्तक सर्व अच्छा अभी देखिए यह जो एक कांसेप्ट है। ईश्वर का दर्शन कर सकते हैं। उनके साथ में वार्तालाप भी कर सकते हैं। यह ये बात कैसी है? पता है ये ये प्रारंभ का पॉइंट है। हम सबके जो कि इस क्लास में जो लोग बैठे हैं आध्यात्मिक जो लोग होना चाहते हैं उन सबके लिए यह तो प्रारंभिक पॉइंट ही है। ईश्वर के ऊपर में विश्वास नहीं होता तो क्यों हम आध्यात्मिक बातें सुनते हैं? क्यों इस सब चीजों में सत्संग में आश्रम में जाकर के उत्सवों में पार्टिसिपेट करके हम लोग अपना टाइम गवाते हैं। ईश्वर है ऐसा एक पक्का तो है ही है हमारे सबके मन में। किंतु देखिए यह जो एक युग है ना वह एक हिडन नास्तिकता का हिडन स्केप्टिसिज्म का युग है। मुंह से तो सभी लोग स्वीकार कर लेते हैं कि हां ईश्वर है। किंतु ईश्वर है बोलकर के भीतर में से जो एक कन्विक्शन होना चाहिए वो हमारे भीतर में नहीं है। इसका एक रीजन क्या है पता है? एक रीजन मैंने पहले भी एक दो बार डिस्कस किया है। वो है सेफ्टी एंड सिक्योरिटी। देखिए एटलीस्ट आज से 100 साल पहले का जो युग था क्या कोई सेफ्टी नहीं था? कोई सिक्योरिटी नहीं था। आप हिस्टोरिकल ड्रामा वगैरह देखेंगे। मूवीज या टीवी सीरीज देखेंगे। देखिए कि एक के बाद एक राजा आते हैं। एक के बाद एक आक्रमणकारी आते हैं और जिस तरह से चाहे प्रजा पर अत्याचार करके चल जाते हैं। आपके जीवन का कोई गारंटी नहीं है कि हां आज मैं शांति से मेरे खेत में रह रहा हूं। मेरे यह बीवी बच्चे हैं तो जिस तरह से मैंने जीवन बिताया है, इसी तरह से यह लोग भी जीवन बिताएंगे। ऐसा कोई गारंटी नहीं। कब कहीं जाकर के यह नेचुरल डिजास्टर लग जाए, आग लग गई या तो फिर यह अकाल पड़ गया या तो फ्लड हो गया। यह तो एक है। दूसरा कि यह जो मनुष्य रूपी कुछ-कुछ राक्षस होते हैं, उनका भी कब आक्रमण होगा? कब आकर के मेरा घर, मेरा खेत, मेरा दुकान वगैरह तहस-नहस कर देंगे। कब कहीं जाकर के परिवारजनों की हत्या करेंगे, जुल्म गुजारेंगे। यह सब चीजों का कोई ठीक नहीं है। बहुत सारे लोगों को पकड़-पकड़ करके गुलाम बना के उनको बेचा जाता था। तो एक जो अनसर्टेनिटी होती थी उस समय जीवन की आज हम उसकी कल्पना भी नहीं कर सकते। आज का यह जो नेशन स्टेट का युग है खास करके यह सेकंड वर्ल्ड वॉर के बाद में 1945 के बाद में हमने देखा पूरे विश्व में एक तरह से स्टेबिलिटी है। यह जो नेशनल गवर्नमेंट जितनी भी है मिनिमम कुछ ना कुछ सर्विसेस प्रोवाइड करते हैं। और भारत या तो फिर यूरोप या तो अमेरिका जहां पे ये डेमोक्रेसी ने काफी जड़ बिठाई है गहरी वहां पे सिटीजंस जो होते हैं, नागरिक जो होते हैं, उनके जो अधिकार होते हैं, उनकी काफी रक्षा होती है। बोल के आज हम एक तरह के स्टेबल युग में जी रहे हैं। एक तरह से स्थिरता वाले युग में जी रहे हैं। आज हम यह कल्पना भी नहीं कर पाएंगे कि कंटिन्यूस अनसर्टेनिटी होने से क्या होता है। आज देखिए हम लोग यह स्टेबिलिटी है। यह मेंटल एक पीसफुलनेस है। उसके ऐसे आदि हो गए हैं कि छोटी सी भी घटना हमारे साथ में होती है। तो हमारा पीस ऑफ माइंड कंप्लीटली डिस्ट्रॉय हो जाता है। हमारी स्टेबिलिटी जो है मेंटल स्टेबिलिटी पूरी गड़बड़ा जाती है। तो देखिए अब जैसे मैं बेलूर मठ जा रहा था तो यहां से ट्रेन जाना रेलवे स्टेशन जाना है। तो मैं उसी के टेंशन में अरे रेलवे स्टेशन जाना है। ट्रेन में बैठना है। अकेले जाना है तो मैं सब कुछ मुझे ही करना है। ट्रेन में क्या करूंगा? वहां पे पहुंचने के बाद क्या करूंगा? वो सब टेंशन लेकर के मैं घूमता था। अभी ट्रेन में जर्नी करने का क्या बड़ा टेंशन है? रिजर्वेशन किया हुआ है। टिकट मेरे पास में है। गाड़ी लेने को रखने को जा रही है। लेने को आ रही है। बस मेरा जो कुछ बहुत अकेले जो मुझे रहना है या थोड़ा बहुत अनसर्टेनिटी का समय है। वो 5 10 मिनट का है कि मैं गाड़ी में से उतरा और कार में से और ट्रेन में जाकर के बैठ रहा हूं। वही 510 मिनट एक अनसर्टेनिटी जैसा है और ट्रेन में से निकला और कार में बैठा आश्रम की कार में वह एक 510 मिनट का अनसर्टेनिटी है। इतना ही तो इससे ज्यादा तो कुछ नहीं। किंतु यह इतना भी अनसर्टेनिटी जैसे कि मेरे सर पर सवार होकर के मुझे डिस्टर्ब कर रहा है। जबकि पहले के युग में देखिए और पहले के युग में ही कहां आजकल भी आप देखिए कि जिस देश में सिविल वॉर चल रहा है या युद्ध ना कि ऐसा कुछ चल रहा है। वहां पे लोग अपने घर बार छोड़ के जो पहने हुए कपड़े हैं उसको लेकर के अपने बीवी बच्चों को लेकर के माइग्रेट करते हैं। इमीग्रेशन करते हैं। एक देश से दूसरे देश तक जाएंगे। यह जो एजेंट होते हैं उनको पैसा देंगे बॉर्डर क्रॉस करवाने का। यूरोप अमेरिका यदि मिल जाए जगह कोई अच्छे देश में अपने खुद के देश में देखिए इतने सारे घुसपैठिए घुस के आते हैं। अभी हम लोग तो उनको घुसपैठियों के रूप में देखते हैं। किंतु उनकी खुद की दृष्टि से देखिए। कौन अपने पुरखों का घर, अपने पुरखों का गांव, अपने पुरखों का खेत या बिजनेस छोड़ कर के एक संपूर्ण रूप से एक अंधकार भरे भविष्य में जंप लगाना कौन चाहेगा? छोटे बच्चों को लेकर के बीच-बीच में तो पता है ना सीरिया में से यह जो रेफ्यूजीस यूरोप जा रहे हैं तो बोट उलट गई पानी में और वो मर गए और बच्चों का लाश जो है डेड बॉडी है वो किनारे पे आकर लगा है। ऐसे डेड बॉडी छोटे-छोटे बच्चों की कितने वो पिक्चर आते थे। ये अफगानिस्तान में से कितने सारे ये जो रेफ्यूजीस है दूसरे देशों में गए हैं। तो देखिए कि उन लोगों का जो लेवल ऑफ अनसर्टेनिटी है उन लोगों का जो फियर है भविष्य के बारे में वो तो इन कंप्लीटली डिफरेंट लेवल और आज के युग में तो फिर भी चलो लॉ एंड ऑर्डर इंटरनेशनल लेवल पे है। आज से 50 यह जो सेकंड वर्ल्ड वॉर के पहले की जो बात है उस समय तो पूरा जंगल राज था विश्व के लेवल पे वहां पे जो जिसके पास में पावर है वो कमजोर लोगों पे अत्याचार करेंगे बेरहमाई करेंगे गुलाम बना के बेचेंगे इस तरह से उनका अब्यूज करेंगे इस तरह से उनको टोरमेंट करेंगे कि जो कि हम सोच भी नहीं सकते तो इस तरह की संपूर्ण रूप से भयानक परिस्थिति में रहना। इस तरह से संपूर्ण अनिश्चित वातावरण में रहना। आज यदि मुझे ऐसा कुछ हो जाए तो मैं पागल ही हो जाऊंगा। क्यों? क्योंकि मैं एक स्टेबिलिटी से एक सिक्योर लाइफ से हैबचुएटेड हूं। आश्रम में मेरा एक रूटीन है। यह रूटीन थोड़ा सा भी डिस्टर्ब होने से मैं बड़ा अपसेट हो जाता हूं। तो यह आश्रम में ही रहकर के आश्रम के ही फंक्शन के लिए थोड़ा बहुत यदि मेरा रूटीन अपसेट होता है तो मैं डिस्टर्ब होता हूं। तो मान लीजिए कि इस तरह से एज ए एज ए रेफ्यूजी मुझे अपना घर बार सब छोड़ कर के मुझे जाना पड़े। एक अंधेरे भविष्य में मुझे झंपलाना पड़े तो मेरे माइंड के साथ में क्या होगा? मैं तो पागल ही हो जाऊंगा। तो देखिए कि अभी वह हमारे पुरखे पागल नहीं हुए थे। उनको पता है उनका चरित्र यह सब स्ट्रगल को फेस करके स्ट्रांग हुआ था। तो वह क्यों हुआ था कि यह अनिश्चितता के समय में ही ईश्वर आपके सहाय होते हैं। वो मां की यही बात जो हम मां की जीवनी में पढ़ रहे हैं कि ठाकुर को कैंसर हुआ है और मां तारकेश्वर जाकर के हत्या देती है। तो यह पल जो है यह घड़ी जो है मां के जीवन की सबसे भयावह घड़ी है। मां का प्रेम मां की जो संपूर्ण रूप से एकात्मता थी तो किसके साथ थी ठाकुर के साथ वही ठाकुर देह त्याग करने के लिए अभी आगे बढ़ रहे हैं तो फिर मां के जीवन का तो यह जो उद्देश्य है जीने का मां के जीवन का जो एक आधार है वही तो चला जा रहा है वही तो जैसे कि यह पूर्व में ये भषजा जात बांग्लादेश जैनो भले ये फ्लड में जैसे कि यह तैर के चला जा रहा है। तो फिर मां क्या करती है? तारकेश्वर में जाकर के हत्या देती है। हत्या देना अर्थात बिना खाए पिए ईश्वर के सामने पड़े रहना। यदि ईश्वर कृपा करके हमारी मनोवांछा हमारी प्रार्थना पूर्ण करेंगे तो हम आहार ग्रहण करेंगे और यदि नहीं करते हैं तो वहीं पर हम प्राण त्याग देंगे बिना खाए पिए। तो मैंने निर्जला उपवास करके मां वहां पर पड़ी थी तारकेश्वर में। उस समय गंभीरानंद जी क्या लिखते हैं कि जिस अनाथनाथ ने यह शब्द गंभीरानंद जी यूज़ करते हैं अनाथनाथ अर्थात कि जिसका कोई सहारा नहीं है उसका सहारा है यह ईश्वर। तो मां गंभीरानंद जी लिखते हैं कि मां के जीवन में ऐसी बहुत सारी घटनाएं हुई है कि मां को यह अनाथनाथ की कृपा का एहसास हुआ है। मां ने देखा है कि बहुत बीमार थी जब तब वह सिंह वाहिनी के सामने हत्या दी थी और मां को मेडिसिन मिल गई थी। औषध मिल गया था। तो यह अनाथनाथ की कृपा का परिचय मां ने अपने जीवन में पाया तो है। तो फिर यह उनके जीवन की जो सबसे संकट की घड़ी है उस समय क्या यह अनाथना मां के सामने कृपा दृष्टि से नहीं देखेंगे क्या? क्या यही अनाथनाथ मां के ऊपर में कृपा नहीं करेंगे? क्या यह आशा लेकर के मां तारकेश्वर गई है हत्या देने के लिए भगवान शिव के सामने। हुआ क्या? वो तो हमको पता है कि मां के हृदय में वैराग्य का उदय हुआ। बहुत सारी हांडी मिट्टी की मिट्टी के घड़े एक के ऊपर एक सजा करके रखे हो। राजस्थान वगैरह में देखेंगे आप वो पानी लाना है कुएं में से तो स्त्रियां अपने सर के ऊपर में घड़ा ले जाती है। अभी एक घड़े का पानी से तो होगा नहीं। तो घड़े के ऊपर में दूसरा घड़ा तीसरा घड़ा ऐसा सजा करके वो पानी ले आती है। तो ये बहुत सारे घड़े एक के ऊपर में एक रखे हैं और एक लाठी मार के उनको तोड़े तो कैसा धड़ाम करके आवाज होता है। यह आवाज मां को सुनाई दिया और साथ में ही भीतर में से यह वैराग्य प्रद वाणी सुनाई दी कि इस संसार में कौन किसका स्वामी है? कौन किसका क्या है? यह मैं किसके लिए हत्या देने को बैठी हूं। तो फिर यह त्याग और वैराग्य प्रलय का यह जो एक रणसिंघा भगवान शिव का वो जब सुनाई दिया मां वापस आ गई किंतु देखिए ये अनाथनाथ ईश्वर इस ईश्वर के ऊपर में उनकी कृपा के आधारित होकर के रहना आज के युग में हमारे साथ में क्या है वो डजेंडरी जैसे सबसे पहली बार मां मां ने हत्या दी थी वो डजेंटरी हो गई थी ब्लड डजेंटरी हो गई थी तो इसके लिए मां ने हत्या दी थी सिंह वाहिनी के सामने आज मुझे डजेंटरी है ना कि कोलेरा है ना कि ऐसा कुछ जो कि ट्रेडिशनल उस समय के रोग है वो हो जाएंगे तो मैं वो तारककेश्वर में या सिंह वाहिनी में हत्या देने को नहीं जाने वाला हूं। मुझे उस तरह के फेद उस तरह की श्रद्धा उसकी कोई जरूरत नहीं है ईश्वर के ऊपर में मैं जाऊंगा डॉक्टर के पास में डॉक्टर मुझे मेडिसिन देंगे उससे मैं ठीक हो जाऊंगा तो देखिए कि आज मेरा जो जीवन है और मां का जो जीवन था उस युग का जो जीवन था क्या डिफरेंस है उस समय जो अनसर्टेनिटीज थी जीवन की यह जो समस्याएं थी जीवन के जो चैलेंजेस थे उस लेवल के थे कि आज मुझे टाइम मशीन में जाकर के वहां पर जाकर बिठा दिया जाए और वह जो चैलेंज मुझे फेस करने होंगे मैं एक सप्ताह में पागल हो जाऊंगा या सुसाइड कर दूंगा। ऐसी मेरी अवस्था हो जाएगी। आज मैं इतना हैबचुएटेड हूं। एक तरह से एक कंफर्ट ज़ोन में रहने के लिए। यह मेरा रूटीन है। यह मेरा कार्य है। इतना ही कार्य मुझे करना है। इसी रूटीन को मुझे फॉलो करना है। अब 100 साल पहले की बात तो छोड़ ही दीजिए। आज मुझे टाइम मशीन में बिठा के रांची भेज दिया जाए। मैं जो रांची में जिस तरह से काम करता था वो भी आज मुझसे नहीं होंगे। इतना मैं अभी क्रिएचर ऑफ हैबिट हो गया हूं। इतना भी हैबिटचुएटेड हो गया हूं रूटीन को लेकर के। तो देखिए कि जैसे-जैसे हम लोग एक कंफर्ट ज़ोन में प्रवेश करते हैं, हम लोगों का उद्देश्य या तो हम लोगों की मेंटल स्टेबिलिटी यह रूटीन को लेकर के रहती है। यह जो फमिलियरिटी जिसको हम कहते हैं कि हां यह मेरा यदि मैं घर में रहता तो यह मेरे परिवारजन है। यह मेरा घर है। यह मेरे बचपन की सब चीजें हैं। खिलौने हैं। यह मेरे म थिंग्स विद व्हिच आई एम फमिलियर विद। यह कोई मटेरियल चीजें होगी या कोई पर्सन होगा या रूटीन होगा या हैबिट होगा। यह फ़मिलियरिटी को लेकर के हम जैसे-जैसे हमारी उम्र बढ़ती है, यह सब चीजों को ले हम रहते हैं। इसीलिए आप देखेंगे कि जैसे-जैसे आप बड़े होते हैं ना, बचपन की चीजों को देखकर के आप बड़े ही सेंटीमेंटल हो जाते हैं। जब छोटे थे, हम बड़े रूथलेस थे। एक नया खिलौना आया तो पुराना खिलौना फेंक दिया। आज मैं 60 साल का 70 साल का हुआ हूं। मैं 10 साल के समय में जो खिलौने से खेल रहा था नजर के सामने आएगा तो मैं एकदम सेंटीमेंटल हो जाऊंगा। उसको प्रिजर्व करके रखने का प्रयास करूंगा। क्यों? क्योंकि 10 साल का था उस समय उत्साह था। एक स्ट्रेंथ था। अभी 70 साल की उम्र में एकदम मैं सॉफ्ट हो गया हूं। भीतर से वलनेरेबल हो गया हूं। आई नीड सम सपोर्ट टू हैव मेंटल स्टेबिलिटी। तो यह जो फमिलियरिटी जो है उसमें मैं सपोर्ट को खोजता हूं। बहुत सारे लोगों को देखता हूं कि बच्चे विदेश में चले जाते हैं तो बूढ़े मां-बाप उनके साथ में विदेश में रहने को तैयार नहीं होते। क्यों? क्योंकि एक कंप्लीटली अनसर्टेन अननोन जगह पर रहना जहां पर कोई फमिलियरिटी नहीं है। तो माइंड जो है ना जो एक चाहता है फमिलियरिटी चाहता है एक स्टेबिलिटी कुछ पकड़ नहीं पाता है। तो बोलकर के वे लोग बड़े स्ट्रेस में रहते हैं। बेटर है कि अपने गांव या अपने शहर चले जाए बचपन से या तो ज्यादातर समय हमने जहां पे बिताया है वह फमिलियरिटी विल ब्रिंग मी पीस ऑफ माइंड। दैट फमिलियरिटी विल ब्रिंग मी अ मेंटल स्टेबिलिटी। तो देखिए जब तक हम ये फमिलियर कंफर्ट जोन में रहते हैं यह हमको मेंटल स्टेबिलिटी प्रदान करता है और ईश्वर के ऊपर में से हमारा भरोसा आवश्यक नहीं रहता। हम वर्बल तो कहते हैं कि हां भगवान है। भगवान के लिए सब कुछ कर रहा हूं। किंतु यह जो ठाकुर की बात है ना कि किसी ने दूध देखा है, किसी ने दूध के बारे में सुना है, किसी ने दूध को खाया है। ईश्वर को दर्शन कर सकते हैं। ईश्वर के साथ में वार्तालाप कर सकते हैं। वह जो एक कंप्लीट अब्सॉर्प्शन इन गॉड ईश्वर के ऊपर में संपूर्ण रूप से श्रद्धा प्रकट होना वो इस फैमिलियरिटी में रहकर के एक स्टेबल लाइफ में रहकर के रूटीन को फॉलो करके नहीं होने वाला है। यदि ईश्वर पर श्रद्धा आनी है या ईश्वर के ऊपर में भरोसा आना है तो ग्रेट चैलेंज जब आएगा तब यह श्रद्धा आएगी। जब ग्रेट अनसर्टेनिटी आएगी, जीवन मृत्यु का प्रश्न जब खड़ा हो जाएगा, तब कहीं जाकर के हृदय के यह जो दरवाजे हैं, वह खुलेंगे और भीतर में से ईश्वर के लिए आर्तनाद खड़ी होगी। गंभीरानंद जी जैसे लिखते हैं कि क्या वो अनाथ नाथ हमारे ऊपर में कृपा दृष्टि नहीं बहाएंगे क्या? तो वही अनाथनाथ को हम तभी पुकारेंगे जब हम अनाथ हैं। जब तक हम सनाथ हैं। जब तक यह सपोर्ट को लेकर के फमिलियरिटी रूटीन ये रिलेटिव रिलेटिव्स ये सब को लेकर के जब तक रहते हैं तब तक हम सनाथ हैं। अनाथ नहीं और अनाथनाथ के ऊपर में इतना भरोसा भी नहीं आता। तो देखिए कि आज के युग के जो बेनिफिट्स हैं पेंशन है। वृद्धावस्था में हमारी केयर करने के लिए यह स्टेट मशीन है। यह जो आज की स्टेबल गवर्नमेंट है। यह आज का यह जो लॉ एंड ऑर्डर है, एक आज की सोशल सिस्टम है, बैंकिंग सिस्टम है जो कि हमको प्रोटेक्ट करके रखती है। तो यही प्रोटेक्शन एक तरह से आध्यात्मिक रास्ते में ब्लॉकेज होकर के रह गया है। अभी मैं वृद्ध होऊंगा तो मेरा भरोसा यह नहीं है कि भगवान ही भरोसा है। ऐसा नहीं। मैंने जो सेविंग्स करके रखा है वो मेरा एक भरोसा है। जब तक सेविंग है मेरा तब तक मैं मेंटली स्टेबल हूं। पीसफुल हूं। सेविंग्स के साथ में कुछ हो गया तो मैं पागल हो जाऊंगा। कुछ ना कुछ गड़बड़ हो जाएगी। बहुत सारे लोग सुसाइड भी कर लेते हैं। किंतु देखिए कि यह ईश्वर पर भरोसा रख के रहना कि सेविंग वगैरह कुछ है नहीं। बस भगवान है भगवान के भरोसे रहेंगे। जहां भगवान ले जाएंगे तो हवा में जो यह पत्ता जो होता है हवा में कैसे उड़ता है तो जैसे भगवान जहां पर ले जाएंगे वहां पर जाएंगे। तो ऐसा यदि एटीट्यूड होगा तभी तो कहीं जाकर के भगवान पर सही सही भरोसा आएगा। तो देखिए कि यह जो बात है कि ईश्वर पर भरोसा, ईश्वर को दर्शन करना, ईश्वर के साथ में वार्तालाप करना, ईश्वर के अस्तित्व के ऊपर में विश्वास होना, यह सब चीजें जितना ही यह सिविलाइजेशन स्टेबल होता जाता है, सिविलाइजेशन प्रोस्पेरस होता जाता है, उतना ही ईश्वर से हमारी दूरी बढ़ती जाती है। और इसीलिए कहते हैं कि हिस्ट्री का आप स्टडी करेंगे तो देखेंगे कि राइज़ एंड फॉल ऑफ़ सिविलाइज़ेशन का यह जो जन्म मृत्यु जरा व्याधि का एक जो चक्र है फिर यह कॉस्मिक लेवल पे ये सृष्टि स्थिति प्रलय का जो चक्र है वैसे ही सिविलाइजेशनल लेवल पे राइज एंड फॉल ऑफ सिविलाइजेशन चलता है। तो यह आर्नोल्ड टोयन भी है। वह स्टडी करके हमको कहता है कि जब भी सिविलाइजेशनल क्राइसिस खड़ी होती है तब यह वर्ल्ड रिलीजंस का जन्म होता है। या तो फिर वर्ल्ड रिलीजन उनका आगमन हो चुका है। फाउंडर्स का उनका प्रचार उस समय होता है। जैसे कि क्रिश्चियनिटी का देखिए जीसस का जब आगमन हुआ था, आविर्भाव हुआ था उस समय रोमन एंपायर काफी स्टेबल था। किंतु कुछ ही समय के बाद में विद इन 100 ईयर 200 ईयर यह जो रोमन एंपायर है उसका डिसइीग्रेशन प्रारंभ हो गया। यह जिसको कि ये लोग उस समय बार्बेरियन कहते थे। आज के ये जर्मन या फ्रेंच पीपल उन लोगों का रोम के ऊपर में आक्रमण प्रारंभ हुआ और भयानक जो अराजकता है, अनसर्टेनिटी है लोगों के जीवन में चालू हो गए। तो इस अनसर्टेनिटी के समय में लोगों को भरोसा चाहिए। तो ऑलरेडी यह क्रिश्चियन रिलीजन जो है वह एक भरोसा दे रहा था। तो क्रिश्चियन लोगों की संख्या एकदम स्काई जंप कर गई और क्रिश्चियनिटी का फैलावा तब से हुआ। यह भारत में भी देखिए बुद्धिज्म के बारे में कि भगवान बुद्ध का जब जन्म हुआ था, आविर्भाव हुआ था, वैदिक सिविलाइजेशन मोर और लेस स्टेबल थी। किंतु भगवान बुद्ध के महा परिनिवाण के कुछ समय के बाद में वैदिक सिविलाइजेशन जैसे डिसइीग्रेट होना शुरू हुई उस समय अनसर्टेनिटी के युग में एज ऑफ केओस इसको कहते हैं हिस्ट्री की लैंग्वेज में तो ये एज ऑफ केओस जो है वो जब फैलता है लोगों को एक भरोसा चाहिए सध्यारा चाहिए तो बुद्धिज्म से उनको मिला इस्लाम में भी वही कि यह जो मिडिल ईस्ट है आज का वहां पे ये जिस तरह का पॉलिटिकल अराजकता केओस फैला था डिसऑर्डर फैला था तो इस्लाम ने जाकर के उनको भरोसा दिलवाया बहुत सारे लोग मुस्लिम हो गए अभी देखिए ठाकुर के आगमन के साथ में भी हिस्ट्री यदि कोई गाइड है तो हमेशा देखिए कि महापुरुष जब आगमन होता है उस समय तो सिविलाइजेशन स्टेबल होती है। आप कथामृत पढ़कर आपको लगेगा ही नहीं कि भारत गुलाम है और या तो फिर भारत में कोई प्रॉब्लम है। बस ठाकुर साधना करते हैं। सब लोग इकट्ठा होते हैं। हंसी मजाक करते हैं। आनंद की धारा बहती है। आनंद की हाट बट बैठ जाती है। किंतु देखिए विद इन अ वेरी शॉर्ट टाइम यह फर्स्ट वर्ल्ड वॉर है। सेकंड वर्ल्ड वॉर है। भारत का मूवमेंट इंडिपेंडेंस मूवमेंट है। ये इतनी बड़ी-बड़ी अपहिवल सोसाइटी में हुई है। भारत में हुई है कि उस समय लोगों को एक चाहिए था भीतर में से भरोसा तो उस समय रामकृष्ण मूवमेंट का प्रचार काफी अच्छे से हुआ था। यदि हिस्ट्री कोई गाइड है तो मुझे लगता है कि इससे भी बड़ी-बड़ी अपहल्स इससे भी बड़े डिसऑर्डर होने वाले हैं जगत में और लोग जब यह खोजेंगे भीतर में से भरोसा तो उनको यह रामकृष्ण विवेकानंद भाव रेडीमेड मिलने वाला है। हम तो प्रार्थना करेंगे कि इस तरह का केओस है। समाज में इस तरह की बहुत बड़ी क्राइसिस है। कभी ना आए। कौन चाहता है क्राइसिस में जीना? वो सेविंग्स उड़ जाएंगे। आपका स्टेबल लाइफ खत्म हो जाएगा। सिविल वॉर स्टार्ट हो जाएगा। पेंडेमिक स्टार्ट हो जाएगा। इसको तो बड़ी-बड़ी क्राइसिस कहते हैं। किंतु इफ हिस्ट्री इज एनी गाइड एट ऑल। इतिहास यदि कोई गवाह है तो जो वर्ल्ड रिलीजन जिसको कहते हैं उनके आगमन के कुछ ही समय के बाद में वर्ल्ड क्राइसिस आकर के खड़ी होती है और ये वर्ल्ड क्राइसिस में लोग जब सध्यारा चाहते हैं तो यह वर्ल्ड रिलीजन उनके सामने खड़े होते हैं। तो यह जो एक स्टडी है सिविलाइजेशन का राइज एंड फॉल ऑफ सिविलाइजेशन। जब ये सिविलाइजेशन उसका पतन होता है बड़े पैमाने पे जब ये क्राइसिस फैलता है सोसाइटी में तब यह वर्ल्ड रिलीजन प्रकट होता है। लोगों को भरोसा देता है। फिर यह वर्ल्ड रिलीजन के फाउंडेशन पे एक नवी सी नई सिविलाइजेशन राइज होती है। फिर जैसे सभी चीजों का एक्सपायरी डेट होता है तो यह नवी सिविलाइजेशन भी धीरे-धीरे करके डिक्लाइन होगी, फॉल होगी। समाज में अराजकता फैलेगी, क्राइसिस फैलेगी। फिर से एक नया वर्ल्ड रिलीजन स्टार्ट होगा। यह वर्ल्ड रिलीजन फैलेगा। लोगों को एक पीस एंड स्टेबिलिटी देगा। और यह वर्ल्ड रिलीजन के फाउंडेशन पे एक नया सिविलाइजेशन खड़ा होगा। तो यह जो साइकिल जो है वर्ल्ड रिलीजन एंड राइज एंड फॉल ऑफ सिविलाइजेशन इसका काफी अच्छे से स्टडी हुआ है। और यदि म इफ हिस्ट्री इज एट ऑल एनी गाइड तो मैं आशा रखता हूं कि ये फर्स्ट वर्ल्ड वॉर और सेकंड वर्ल्ड वॉर जो थे दैट वाज़ क्राइसिस इनफ। और इससे ज्यादा और इंडिया का मूवमेंट फॉर इंडिपेंडेंस। तो दिस इज़ क्राइसिस इनफ। इससे बड़ी कोई क्राइसिस कहीं हमको ना फेस करनी पड़े। सो दिस इज के भगवान है। भगवान पर भरोसा रख सकते हैं। भगवान के अस्तित्व पे पर विश्वास है। यदि ये सब बातों की बातें ही लगती है हमको तो बहुत ज्यादा टेंशन मत लीजिए क्योंकि ये दिस इज नॉट जस्ट ड्यू। यह मेरा खुद का साइकोलॉजी है गड़बड़ वाला ऐसा नहीं है। पूरा सोसाइटी एक डायरेक्शन में जाता है और सोसाइटी की डायरेक्शन के साथ में ज्यादातर लोगों को चलना है। ऑफ कोर्स ये डायरेक्शन को तोड़ के जाने वाले लोगों की संख्या तो कम नहीं है ना। वही वही जो म डायरेक्ट डिसाइपल थे शशि महाराज लाटू महाराज सुबोध महाराज महापुरुष महाराज ये तो स्टेबिलिटी के युग में रहकर के भी उन्होंने इंटरेस्टिंगली स्वामी जी को कब काली स्वीकार स्वामी जी ने काली को कब स्वीकार किया पिताजी का देहांत हुआ बहुत बड़ा क्राइसिस चल रहा है मां और छोटे भाई बहनों के लिए खाने की भी अव व्यवस्था नहीं हो रही है उस समय जो अपहिवल चल रहा था स्वामी जी के माइंड में दैट अपवल ब्रॉट स्वामी जी टू काली स्वामी जी ने अपने लेटर में खुद लिखा है स्वामी जी कहते हैं कि मेरे जीवन में जो उथल-पाथल है अपीवल यह वो एक उथल-पाथल ऐसी हुई थी जो कि मुझे ठाकुर के पास में ले गई थी और यह दूसरी उथल-पाथल दूसरा एक क्राइसिस जो आया था मुझे अमेरिका ले गया था और यह तीसरा क्राइसिस यह स्वामी जी लेटर लिखते हैं आई थिंक 1900 के आसपास में वो अभी धीरे-धीरे करके शांत हुआ है। अदरवाइज उस उथल-पाथल ने मुझे बड़ा ही परेशान किया था। किंतु वो अपीवल अभी शांत हुआ है। नाउ आई एम एट पीस। यह स्वामी जी खुद अपनी लाइफ में लिखते हैं। तो यह जो अपीवल है, क्राइसिस है, चैलेंज है, वो चैलेंज हमको ईश्वर पे भक्ति का रास्ता जो है वो ओपन करता है। अदरवाइज जब तक हम एक स्टेबल एनवायरमेंट में रहते हैं, एक फमिलियर एनवायरमेंट में रहते हैं, तब तक यह साधना है, ईश्वर पे भरोसा है। यह सब बातों की ही बातें रहेगी। सो एक स्टडी ऑफ हिस्ट्री। अच्छा इसके बाद ठाकुर फिर यह प्रवर्तक के बारे में कहते हैं जो कि अभी हम नेक्स्ट क्लास में देखेंगे। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु
प्रश्न: हम सामान्यतः सुरक्षा और स्थिरता की तलाश करते हैं। लेकिन ठाकुर के सन्यासी शिष्यों ने वराहनगर मठ को छोड़कर प्रव्रज्या करते हुए अनिश्चितता और भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण का जीवन अपनाया। इसके पीछे राज़ क्या है?
अच्छा यह जो प्रवरज्या है तो प्रवरज्या के लिए जब भी आप बाहर निकलते हैं तो भाव क्या रहता है औषधम जान औषधो जानवी तोयम वैद्य नारायणो हरि माने बीमार हुए तो औषध है मेडिसिन है गंगा का पानी और वैद्य है नारायण हरि तो यह अनसर्टेनिटी है दिस इज व्हाट गुरु भाइयों ने एंब्रेस किया है टू एम्ब्रेस द केओस, टू एम्ब्रेस द अनसर्टेनिटी। तभी तो यह भरोसा ईश्वर पे आएगा। यदि आप मठ के एक फमिलियर एनवायरमेंट में रहेंगे तो वो जो एक अभी ऐसा नहीं है कि यह लोग कोई बच्चे थे आध्यात्मिक जीवन में वो कुछ ना स्वामी जी तो निर्विकल्प समाधि प्राप्त करके बैठे थे। इन सस्पाइट ऑफ दैट ठाकुर तो कहते हैं ना कि आध्यात्मिक जीवन में तारेबाड़ा तारेबाड़ा इससे भी आगे इससे भी आगे कोई लिमिट नहीं है तो इन लोगों की भूख जो थी मुमुक्षुत्व जो था इतना स्ट्रांग था कि जो प्राप्त किया था उससे भी संतोष नहीं था क्योंकि ठाकुर के जीवन में उन्होंने देखा है कि एक इवन ठाकुर ने देखिए निर्विकल्प समाधि प्राप्त करने के बाद में भी कंटिन्यूस उनके जीवन में ये दर्शन और यह साधना का ये कंटीन्यूअस प्रवाह बहता रहा है आखिरी घड़ी तक तो वह स्टैंडर्ड उन्होंने देखा था। सो दे एंब्रेस दिस केओस दिस एम्ब्रेस दिस अनसर्टेनिटी इन ऑर्डर टू जंप टू द नेक्स्ट लेवल। तो और यह बात बिल्कुल सही है कि अभी आप किसी इंडिविजुअल साधु या इवन ऑर्गेनाइजेशन को दोष नहीं देंगे कि हमने आज एक स्टेबिलिटी प्राप्त की है रामकृष्ण संघ में। सो दिस इज बैड। ऐसा भी तो आप नहीं कहेंगे। राइट? कोई ऐसा नहीं कहेगा। कौन सामने से जाकर के यह सब करने को जाएगा। किंतु बहुत सारे साधु हैं जो कि आज संघ में से एक साल दो साल निकल कर के नर्मदा परिक्रमा करते हैं। मैंने एक महीना किया। किंतु अभी वही प्रॉब्लम है कि नर्मदा किनारे इतने सारे आश्रम हो गए हैं कि अनसर्टेनिटी जैसा लगता ही नहीं है आपको। मेरा जो प्रॉब्लम था मैं नर्मदा एक महीना किया भ्रमण तो मुझे केयरफुल रहना पड़ता था मेरे वेट के बारे में। क्यों? क्योंकि टिककर बनता है वहां पे घी डाला हुआ तो जैसे साधुओं को घी डाला टिककर खिलाता है तो मैं वेट बढ़ा के कहीं ना आ जाऊं ये मुझे प्रॉब्लम इसीलिए ना देखिए ये जो अपने ट्रेडिशनल जो पिल्गिमेच प्लेसेस थे दुर्गम स्थानों पे क्यों थे कैलाश मानसरोवर है अमरनाथ है वगैरह क्यों आप एक माना जाता था कि वहां पे जाना चाहिए बिकॉज़ द जर्नी इस कंप्लीटली अनसर्टेन जिंदा वापस आएंगे नहीं आएंगे कुछ ठीक नहीं है। सो लोग सामने से जाते नर्मदा परिक्रमा क्यों स्टार्ट हुआ? ये म इट्स अ वेरी डेंजरस एक्सरसाइज एक्चुअली आप पूरे ईश्वर पे भरोसा करके चलते हैं। परिक्रमा किया क्यों किया? मेरा ईश्वर पर विश्वास बढ़े इसलिए ठाकुर के द्वारा स्थापित आश्रम में रह के जितना विश्वास मेरा नहीं बढ़ेगा। और ये सिर्फ आजकल के कुछ-कुछ साधुओं का नहीं वराह नगर मठ छोड़ के ये लोग गए हैं ना। तो फिर म वी आर फॉलोइंग दैट सेम ग्लोरियस ट्रेडिशन कि ठाकुर ने कहा स्वामी जी को कि सबको इकट्ठा रखना वही स्वामी जी घर म वो आश्रम छोड़ के निकल पड़े राइट सो दिस टू एंब्रेस अनसर्टेनिटी टू एम्ब्रेस दैट फ्री लाइफ ऑफ टोटल डिपेंडेंस ऑन गॉड ये कॉल ऑफ नेचर सभी साधक के हृदय में रहता ही है
प्रश्न: जब त्रैलोक्यनाथ ने हृदय को जाने के लिए कहा, तब ठाकुर भी दक्षिणेश्वर काली मंदिर छोड़ने के लिए तैयार हो गए। ठाकुर तुरंत अपने कक्ष से बाहर निकल आए। मुझे नहीं लगता कि उन्हें ज़रा भी अंदाज़ा था कि वे कहाँ जाएंगे। लेकिन वे इस अनिश्चित भविष्य को लेकर बिल्कुल भी चिंतित नहीं थे।
ना ठाकुर का वो झमापुकुर का ग्रुप था ना झमापुकुर झमापुकुर जहां पे वो ना किंतु ठाकुर का दूसरा भी एक है वो जब ठाकुर ने सोचा था एक बार ये हृदय का ये बहुत बढ़ गया ठाकुर कहते हैं मैं जाऊंगा छोड़ कर के तो सोचा कि कपड़े तो लेकर जाऊंगा फिर पैसा तो रखना पड़ेगा ठाकुर बोलते हैं पैसा तो रखने का उपाय नहीं है साथ में इसलिए मैंने जाना छोड़ दिया और एक जगह में ठाकुर बोलते हैं ऐसा
प्रश्न: वृंदावन में प्रेमानंदजी कहते हैं कि जब उनकी किडनी ने काम करना बंद कर दिया, तो उन्हें हर आश्रम से बाहर कर दिया गया। क्योंकि उन्हें अपने पास रखने का मतलब था उनका इलाज करवाना—जो बहुत महंगा था। यही वह समय था—जब सारे दरवाज़े बंद हो गए—तभी महान आस्था के द्वार खुल गए। अब हमें किसके लिए प्रार्थना करनी चाहिए—सुरक्षा के लिए या संकट के लिए?
ना ऐसा क्यों हम कह दिस इज अ कंट्राडिक्शन ना दिस इज अ पैराडॉक्स इन स्पिरिचुअल लाइफ कौन ये प्रार्थना करेगा कि युद्ध हो सिविल वॉर हो ना क्र पेंडेमिक हो ऐसी प्रार्थना कौन करेगा किंतु जब तक यह होगा नहीं तब तक ये जो वर्ल्ड रिलीजन है ना वे लोग वो फैलेंगे भी नहीं सो दैट इज अ पैराडॉक्स। देखिए ये जो स्वामी जी कहते हैं ना गॉड एंड मेमन बोथ कैन नॉट गो टूगेदर। है ना ये जगत और ये ईश्वर दोनों साथ में कभी नहीं चल सकते। सो हम लोग देखिए अपनी खुद की आंखों में धूल जा के कहते तो हैं कि एक हाथ में गीता और एक हाथ में यह जो अपना कीबोर्ड कंप्यूटर का उन्हें बिजनेस भी करेंगे और गीता को भी साथ में स्टडी करेंगे। सो इट इज़ अ प्लेज़ेंट फिक्शन एक्चुअली इसे अपने मन को बहलाने वाली बात है। कीजिए करना ही चाहिए। किंतु अल्टीमेटली देखेंगे दैट व्हेन द डाइस इज थ्रोन यू हैव टू सेलेक्ट वन।
प्रश्न: आप सही कह रहे हैं। हमारा समय बहुत सीमित है। ऐसे में हम दुनिया में सफल कैसे हों और साथ ही आध्यात्मिक रूप से भी सफल कैसे बनें?
ना इसीलिए अपने वो वैदिक ट्रेडिशन है ना ब्रह्मचर्य आश्रम, वान गृहस्थ आश्रम, वानप्रस्थ आश्रम और सन्यास आश्रम। तो अब सन्यास आश्रम अह यानी कि आपने वह गृहस्थ का जो था ड्यूटी वह हो गया समाप्त। नाउ लेट अस एम्ब्रेस दिस वाइडर एम इन आवर लाइफ। अभी चलो तीर्थ यात्रा के लिए निकलते हैं। इस तरह से निकलते हैं कि चलते। अब जैसे वो स्वर्गारोहण महाभारत के अंत में सो पांडवों ने चलना शुरू किया। जब तक चले तब तक चले। देह गिरा वहां पे गिरा। सो लाइक दैट कि ईश्वर पे भरोसा रख के कर दो नर्मदा प्रारंभ। जाएगा तो देह जाएगा वरना फिर साक्षात्कार हो जाएगा। सो एट वन पॉइंट इन आवर लाइफ वी हैव टू एम्ब्रेस इट। जैसे आई टेक यह जो स्टीव जॉब्स है स्टीव जॉब्स उसकी लाइफ में इस तरह के दौर से गुजर रहा था तो भारत आया। वो वहां पे ऋषिकेश वगैरह गया। उसको कुछ प्राप्ति हुई। देन ही बिकम वेरी सक्सेसफुल। सो अमेरिका में भी देखिए कि वे लोग इस तरह से माने इन सर्च ऑफ क्या कहेंगे। वो एक किताब है ईट प्रे एंड लव। सो देखेंगे कि उसमें भी उसकी जो ऑथर है एक लेडी इस तरह से उसकी लाइफ में क्राइसिस आती है। देन शी गोज़ ऑन दिस वर्ल्ड पिल्गिरी इमेज वर्ल्ड ट्रैवल तो इंडिया आती है आकर के आश्रम में रहती है। फिर वहां पे उसको मन की शांति मिलती है। फिर वो वापस जाके एक किताब लिखती है एंड शी बिकम्स अ सक्सेसफुल ऑथर। डिस्कवरी ऑफ़ सेल्फ। अपने ऑर्डर में क्या कहा जाता है? नर्मदा परिक्रमा के लिए परमिशन नहीं लेना होता है। उसको इनफॉर्म करना होता है कि अब हेड क्वार्टर में लेटर लिखेंगे मुझे दो साल छुट्टी दीजिए। नर्मदा परिक्रमा करना है तो एकदम डांट के बिठा देंगे कि इतना काम है ठाकुर का आश्रम है। ठाकुर का आश्रम छोड़ के कहां जा रहे हो? कुछ मिलने वाला नहीं। एक जगह पे रहो। ऐसा ऐसा उपदेश दे देंगे। तो जिसको जाना है वो वो इंफॉर्मेशन देंगे कि मैं इस तारीख को निकल रहा हूं। फिर जब ठाकुर वापस ले आएंगे तब आऊंगा। अभी जस्ट मैं बेलूर मठ में था। मेरा एक बैचमेट परिक्रमा करके कंप्लीट करके आया। जिस दिन मैं निकल रहा था उसी दिन वो आया। अच्छा वो परमिशन इंफॉर्मेशन परमिशन का क्वेश्चन ही नहीं है। वो एकदम क्लियर है। ये कांसेप्ट है। जब परमिशन लेने को जाएंगे कभी नहीं मिलेगा। और इनके वो वो कोई इंफॉर्मेशन भी नहीं देता। किंतु अभी आजकल एक करसी जैसा है कि इनफॉर्म कर देते हैं क्योंकि फिर ड्यूटी का भी प्रश्न है कि आज मैं मेरा जो ड्यूटी है तो उसको हैंड ओवर तो करूं मैं एटलीस्ट वो आश्रम में कहीं डिस्टरबेंस ना हो जाए। सो मैं इनफॉर्म करूंगा कि लेट मी हैंड ओवर माय ड्यूटी टू समवन देन आई विल लीव ना वो अच्छा है। नर्मदा बहुत पवित्र जगह है। मैं सन्यास से पहले एक महीना मैंने भ्रमण किया। भ्रमण यानी एक जगह से स्टार्ट करके दूसरी जगह जाना है। परिक्रमा जैसा ही लिमिटेड पीरियड ऑफ़ टाइम। सो मुझे बहुत आनंद आया था। नर्मदा इज वन ऑफ द बेस्ट प्लेस। जो भारत में जो भारत में ऐसा है ना कि धार्मिक स्थानों का कहीं पे अभाव नहीं। अब जहां पे भी जाएंगे बट नर्मदा इज कंसीडर्ड टू बी वेरी होली प्लेस। उसमें कोई प्रश्न ही नहीं है। मेरा एक महीने का अनुभव इतना सुंदर अनुभव बस सुबह को चलना शुरू कर देना है। जहां पर जाता है खाना मिल ही जाएगा। कोई प्रश्न नहीं है आपको खाने पीने का। जहां जगह मिल गई सो जाना है। बिल्कुल भगवान पे और मेरा सन्यास सामने था। सो दैट वाज़ वन ऑफ द बेस्ट एक्सपीरियंस इन माय लाइफ। बाद में मैंने ऐसा सोचा था कि सन्यास के बाद आकर पूरी कर परिक्रमा करूंगा। किंतु मैं सन्यास के लिए गया हूं। मुझे वहां पे बोला तुमको कंप्लीट वर्ष में काम करना है। मैंने कहा इसको छोड़ के कहां जाएंगे अभी? वरना उस समय वो नर्मदा का भाव बड़ा स्ट्रांग था। वो यदि कंप्लीट वर्ष में नहीं होता तो शायद मैंने परिक्रमा कर दिया होता उस समय। ओम