Transcript
ओम स्थापा का यॉट धर्मस्य हम लोग जो कुछ दिन से पढ़ रहे हैं मास्टर महाशय का ठाकुर के साथ में एक बार आर्गुमेंट ऑलरेडी हो चुका है की ईश्वर सरकार है एन की निराकार है तो इसमें जब ठाकुर ने ऐसा कहा था प्रथम द्वितीय तृतीय दर्शन में जो भी आर्गुमेंट बाद में मास्टर महाशय गए थे की ठाकुर के साथ में यही उनका आखिरी तारक है किंतु फिर भी जो ह्यूमन नेचर है वो क्वेश्चन तो हमेशा करता ही है तो वही सरकार और निराकार को लेकर के फिर से एक बार ठाकुर के साथ में बात हो रही है तो ठाकुर ने पहले मास्टर महाशय को पूछा की आजकल तुम्हारी ईश्वर चिंता कैसे हो रही है तुमको क्या अच्छा लगता है सरकार ना की निराकार तो मास्टर महाशय ने कहा जो की हम सब की दुविधा है हम सब लोग जो की पढ़े लिखे लोग हैं आजकल के मॉडर्न आइस यंग मां कहे एन की जिन लोगों ने आज का वेस्टर्न एजुकेशन प्राप्त किया है हमको लगता है की अरे ये की चिंता करना यह तो भी उसको शरणागत होना या मूर्ति के या तो किसी भी एक भगवान के यह क्या मेरे लिए उचित है मेरे में इतनी विद्या शक्ति टैलेंट है मैंने यह परीक्षा पास की है मेरे ये सबसे से बिजनेस या तो फिर जब ने वगैरा वगैरा इतना दान वैभव जो भी है मेरे पास में जो भी मेरा 18 मिनट है तो फिर मेरे लिए क्या इस तरह से मेरी अपनी बुद्धि को मेरी अपनी एक इंडिपेंडेंस को छोड़ देना क्योंकि किसी ईश्वर के शरण में जाते हैं तो फिर हमको ऐसा लगता है की हमारा अपना एक इंडिपेंडेंस जो है वो हम शायद को देते हैं ऐसे बहुत सारे विचारों में से आज का आधुनिक युवान प्रसाद होता है और इसीलिए मास्टर महाशय देखते हैं कहते हैं सरकार में अभी मां नहीं लगता और निराकार में सरकार में मां जाता नहीं है मेरा कर में मां स्थिर नहीं होता सरकार तुम्हें एक्सेप्ट नहीं कर पता मेरा कर में मां स्थिर नहीं कर पता तो यह एक दुविधा सबकी है तो उसके उत्तर में श्री रामकृष्ण कहते हैं देख लेने देखा निराकारे एक के बड़े मौन स्थिर हो ना निराकार में सीधा जाकर के पहले से ही नदी में निराकार में मां स्थिर करने का पर्यटन करूंगा तो निराकार में मां स्थिर होगा नहीं प्रथम प्रथम शंकर तो बेस प्रथम प्रथम सरकार में मां स्थिर करेंगे तो बहुत अच्छा होगा देखिए जितने भी लोग ठाकुर के पास उसे समय आते थे उन लोगों के मां में यह सब था की यह मूर्ति पूजा क्यों करना क्योंकि यह क्रिश्चियनिटी और इस्लाम का इन्फ्लुएंस जी तरह भारत में था और वे लोग कहते हैं की मूर्ति पूजा गलत है आज की दृष्टि से यदि देखें तो आज हमको थोड़ा सा डिफरेंट टाइप की एक दुविधा देखने को मिलती है सरकार मेरा कर नहीं संगठन में आजकल क्या है है की यह ऑर्गेनाइजेशन का जमाना है स्वामी जी ने खुद कहा था की आई एम इन लव विथ ऑर्गेनाइजेशन तो आज जैसे की रामकृष्ण मिशन है जैसे की और भी नाम नहीं देना चाहता किंतु और भी दूसरे जो धार्मिक संप्रदाय संप्रदाय नहीं ऑर्गेनाइजेशन एक फॉर्मल ऑर्गेनाइजेशन जो आजकल है तो वहां पे जाकर के आप मंदिर में तो जाते ही हैं किंतु फिर वहां के जो साधु कहो ना की जो की फूल टाइम वहां पे जो रहते हैं उनके साथ में बात करना या तो फिर उनके उनके क्या कहेंगे की उनकी अथॉरिटी को स्वीकार करना उनके शरणागत होना या तो फिर उनके प्रति श्रद्धा भक्ति प्रकट करना थोड़ा सा हमको विचित्र लगता है हमको लगता है ये तो हमारे ही जैसे इंसान है हमारे ही जैसे उनकी फीलिंग से हमारे ही जैसी इतनी इनकी भी तो यह लोग यदि ऐसा कहते हैं की यह जैसे की ठाकुर के जो फॉलोअर्स से साधु सन्यासी आश्रम में आकर के चलो मुझे लगता है की मैंने ठाकुर को तो प्रणाम किया किंतु मैं साधु लोगों को क्यों प्रणाम करूंगा इन लोगों से तो दूर ही रहना चाहिए ऐसे कुछ-कुछ लोग सोचते हैं ये तो हमारे ही जैसे हैं हमारे ही जैसे वीकनेस फाइलिंग से उनकी तो भले आप किसी साधु से ना मिले चलो डायरेक्ट ठाकुर से ही मिलने को जाए किंतु पहले जो ये सरकार मेरा करो खाली जो बात होती थी आजकल इस तरह से होती है की कोई भी पर्टिकुलर ऑर्गेनाइजेशन के मंदिर में या तो आश्रम में जाते हैं तो वहां जाकर के मंदिर में प्रणाम करके चले जाते हैं और किसी के साथ किसी तरह का संपर्क नहीं रखते हैं मैं क्यों किसी इंसान के पास अपने को छोटा करो क्यों मैं अपनी श्रद्धा भक्ति किसी व्यक्ति को तो क्यों मैं ठाकुर को स्वयं ना डन तो अभी क्या है की इसके पीछे एक तरह का घमंड तो राहत ही है जैसे मैंने कहा था यहां पर कुछ देवोटी ऐसे है की मुझे आकर के मेरे मुंह पर का देते हैं की आपका जन्म हुआ था उससे पहले से हम यहां पे ए रहा है तो मैंने कहा अच्छी बात है चलो तो मेरे से ज्यादा आपकी तपस्या और साधना हनी चाहिए यदि इतने सालों से आप ए रहे हैं तो जो भी है तो यदि ऐसा लगता है की किसी व्यक्ति को शरणागत होना किसी साधु या सन्यासी को अपनी श्रद्धा देना या तो फिर इनको प्रणाम करना ये सब हमको करने की क्या जरूर है तो देखिए ठाकुर ने प्रणाम अस्त्र से जगत को जय किया था वो गिरीश कोश को मिलने को जाते हैं गिरीश को ऐसे ही सीधा हाथ जोड़कर के नमस्कार करता है तो ठाकुर छुपकर के प्रणाम करते हैं तो यह देख करके गिरीश और ज्यादा झुक करके प्रणाम करता है तो ठाकुर और ज्यादा उससे झुकते हैं तो गिरीश भी उससे ज्यादा झुकता है तो ठाकुर साष्टांग प्रणाम करते हैं नहीं सॉरी ठाकुर नहीं करते किंतु आखिर में गिरीश ठाकुर को संस्थान प्रणाम करता है तो यह अभी हमको लगता है की चलो कपूर को प्रणाम किया वह ठीक है किंतु यह जो दुविधा है आजकल के भक्तों में वह मैंने बहुत सारे लोगों में अच्छी है तो यही जो कशमकश या तो फिर यही एक थिंकिंग जो पहले था की सरकार में मुझे क्यों मैं विश्वास करने लगून मैं क्यों किसी मूर्ति की पूजा करने लागू मेक योर किसी मूर्ति को प्रणाम करूं चलो मुझे जल्दी आध्यात्मिक ही होना है यदि मुझे मां की शांति ही चाहिए मुझे जल्दी फिलॉस्फर ही होना है तो चलो मैं आंख बैंड करके अपने हृदय कमल में शायद किसी एक ज्योति पुंज की कल्पना करूंगा या तो फिर क्रिश्चियनिटी जैसे सीखना है एक एक्सट्रैक्ट फादर इन हैव वन है बादलों पर राहत है मैं उनको प्रार्थना करूंगा ऐसा सब कुछ करता हूं मुझे क्यों किसी भगवान शंकर ना की भगवान गणेश एन की विष्णु ना की फिर कृष्णा की महावीर इनकी पूजा करनी चाहिए तो वही से बैंकिंग आजकल ऑर्गेनाइजर रिलिजन में हमको देखने को मिलता है भक्तों के भीतर की क्यों किसी साधु सन्यासी को प्रणाम करना चाहिए क्यों किसी साधु सन्यासी को श्रद्धा देनी चाहिए उनको रिस्पेक्ट देनी चाहिए हम लोग तो जाकर के मंदिर में जाएंगे प्रणाम करेंगे चले आएंगे तो इसमें गलत कुछ नहीं है किंतु देखिए की यू आर मिसिंग आउट यू आर मिसिंग समथिंग क्रिटिकल यूनिवर्स स्पिरिचुअल जर्नी साधु लोग ने सनी का रहा की सभी साधु बहुत अच्छे होते हैं या तो फिर रामकृष्ण मिशन के भी सभी साधु का बड़ा ही एक्सीलेंट एक यह राहत है अटेनमेंट का होना किसी भी होती है मैं ऐसा नहीं का रहा हूं किंतु फिर भी जो व्यक्ति वो साधु है ना की गृहस्ट है ठाकुर मां स्वामी जी का नाम स्मरण लेकर के उनका साहित्य लेकर के राहत है तो उसके साथ में बात करने से हमारे मां को सुकून मिलता है हमारे मां को शांति मिलती है यह जो ठाकुर कहते हैं की शुरू शुरू में सरकार तो बेस अर्थात की शुरू-शुरू में सरकार बेज्जती मां आता है तो अपना मां आसानी से इकट्ठा होता है शांत होता है तो वैसे ही यदि आप किसी साधु सन्यासी का संघ करते हैं उनके साथ में बात कर देखिए यहां पे ऐसे भी भक्ति है बहुत अच्छे भक्ति होते हैं मैं यदि यहां से मेरा ऑफिस जो है और मेरा रूम जो है बीच में मंदिर आता है तो मंदिर के सामने से मुझे डेली दो तीन बार पास होना पड़ता है तो कोई कोई भक्ति होता है वैसे ही प्रणाम करेगा पूछेगा मारा जाप के शहर कहां से आए हैं मेरा यह नाम है बस ऐसा एक दो मिनट भी बात किया तो मैं देखा हूं की उनको इतना खुशी होता है इसलिए नहीं की मैं कोई पार्टिकुलर मेरे पर कोई रिस्पेक्ट है तो मैंने गेरुआ पहने है आश्रम में राहत हूं तो चलो मेरे साथ बात कर लिया ऐसा एक साधुओं के प्रति एक जनरल उन लोगों की श्रद्धा है निष्ठा है तो वैसे ही यदि कोई भी आश्रम में जाते हैं वहां के जो सड़क है साधु होना की गृहस्ट हो नियमित रूप से वहां पर रहते हैं या जाते हैं उन लोगों के साथ बात करने से भी देखेंगे की बहुत ही आसानी से फिर आप आंख बैंड करके बैठेंगे भी और ये जो उनके साथ जो बात हुआ वो अपने मां में सोचेंगे भी तो वो सत्संग का प्रभाव ऐसा है की इमीडीएटली अपने मां को बाकी सब विषयों से निकाल करके एक विषय पे ले आएगा वरना मैं आंख बैंड करके बैठता हूं तो मेरे मां में क्या-क्या सब चला राहत है कितने दुनिया भर की चिंता मैन आप लोग तो गृहस्ट है आप तो ठीक है जो हम लोग साधु है मैंने मुझे कहा अभी 18 17 18 19 साल हुए रामकृष्ण मिशन में फिर भी इतने सालों से संसार पिया करने के बाद भी मैं आंख बैंड करके रात को बेटा हूं है तो इतनी दुनिया भर के डिफरेंट डिफरेंट विचार आना शुरू हो जाता है की मुझे आश्चर्य होता है की मां में इतना सब छोटा सा मां है उसमें इतना सब कहां से भारत हुआ है कहां से ये सब नए नए विचार आते हैं जो की मुझे ठाकुर के ऊपर में मां को एकाग्र ही नहीं करने देते यह सबके साथ में होता है किंतु मां लीजिए की उसे दिन शाम को किसी गेस्ट महाराज आए थे आए होंगे तो उनके साथ में मैंने कुछ बात की होगी या तो फिर आश्रम के और किसी साधुओं के साथ कुछ बात हुई होगी तो उसके बड़े में यदि मैं सोचता हूं तो इमीडियाटली बाकी सब विचार चले जाते हैं और वो एक विचार र जाता है क्योंकि वो तो एक हम अपने हम जो सोचते हैं वह मां से सोचते हैं और जो हम वाहियात जगत के साथ में इंटरनेट करते हैं और अपनी इंद्रियों के साथ करते हैं अर्थात की आंखों से देखते हैं मुंह से बोलते हैं कानों से सुनते हैं तो ठाकुर कहते हैं ना की इंद्रियों का इंद्रियों के ऊपर जय प्राप्त करना बहुत कठिन है ऐसा किसी जब किसी ने ठाकुर को बोला जो ठाकुर ने क्या कहा की इनका मोड गोरीए डो अर्थात की उनका डायरेक्शन चेंज कर दो जो विषयों की और जाति है इंद्रिय उसको साधु सन में सात ग्रंथ पाठ में सात कथा में लगाओ तो यह साधुओं के साथ में यदि कोई बात हुई होगी या तो फिर कोई देवोते भी आता है तो उनके साथ में कोई बात हुई होगी तो वो बात मेरी इंद्रियों के द्वारा हुई है और इंद्रियों को किसी बाकी विषय में लगाना बड़ा सहज होता है यह आरती है संध्या आरती कहो ना की मंगल आरती कहो या तो फिर ये पूजा उत्सव उनका प्रारंभ क्यों हुआ क्योंकि हमारे ऋषि मुनियों को करता है की इंद्रियों के साथ में इंद्रियों से कोई वास्तु को ग्रहण करना बड़ा ही आसन है मां से किसी चीज को ग्रहण करना बड़ा ही मुश्किल है क्योंकि मां बड़ा चंचल तो इंद्रियां जो है मैं अपनी आंखों से आरती हो रही है यहां पे मैं देखा हूं की कुछ-कुछ देवोटी प्रति दिन आरती में आते हैं प्रतिदिन मतलब जब भी राम नाम होता है एकादशी के दिन वे लोग उपस्थित रहेंगे ठाकुरमार स्वामी जी की तिथि पूजा कोई भी उत्सव रहेगा तो पूरा जो अनुष्ठान होता है मंदिर में पूरा अटेंड करेंगे तो देखिए के आरती चलती हुई देखते हैं बाद में किसी महाराज का सीनरी साधु का प्रवचन होगा जैसे की तिथि पूजा होती है तो अभी जैसे निरंजन महाराज की निरंजनानंद जी की थी पूजा तो उनके ऊपर में प्रवचन रहेगा तो पूजा अटेंड करना फिर प्रवचन सुना फिर बाकी सब भक्तों के साथ में बात करना फिर प्रसाद ग्रहण करना तो अपनी सभी इंद्रियां सत्कार अपने इंगेज रहती है तो इंद्रियों को कार्य में लगाना इंद्रियों को इंगेज करना फॉक्स करना आसन है इसके बाद में स्टेज आता है मां को फॉक्स करने का तो पहले इंद्रियों को सात विषय में सत्संग में फॉक्स करें बाद में मां को सत्संग में फॉक्स करें अभी सीता मां को फॉक्स करने को जाएंगे मां को एकाग्र करने को जाएंगे तो शायद थोड़ा सा डिफिकल्ट होगा शायद नहीं ज्यादातर लोगों के लिए वो डिफिकल्ट होगा तो पहले इंद्रियों से सत्संग ग्रहण करें फिर बाद में मां से सत्संग करें तो यह तेजी से साधना के इसीलिए ठाकुर यहां पर कहते हैं की निराकार में सीधे जाकर के हम मां को निराकार में एकाग्र करने का पर्यटन करेंगे तो होगा नहीं प्रथम प्रथम सरकार तो बी प्रथम प्रथम सरकार बहुत अच्छा है जो आर्गुमेंट थोड़ा सा आर्गुमेंट करती है ठाकुर किनो चिन्मय मूर्ति ठाकुर कहते हैं मिट्टी की मूर्ति क्यों चिन्मय मूर्ति चिन्मय अर्थात की चेतन वह जिसकी बनी हुई मूर्ति अर्थात के ईश्वरीय गन हैं ईश्वर का रिप्रेजेंटेशन स्वयं इस मूर्ति में है इस तरह से उसको इमेजिन करो देखो की रामकृष्ण मिशन में जब भी ये जो वैष्णव भाव उतारा है वैष्णव भावधारा में हम भगवान की पूजा कैसे करते हैं हम लोग इमेजिन करते हैं की भगवान स्वयं विराजमान है ये भगवान कृष्णा की सिर्फ मार्बल की इमेज नहीं है भगवान कृष्णा स्वयं विराजमान है इसलिए जो पहले आरती करते हैं अर्थात की मंगल आरती यानी की जब जब हम सुबह को उठाते हैं तो प्रकाश का दिया दिखाई हैं हम लोग जब छोटा बच्चा उठाता है तो कैसे हम पहले तो अपने आजकल तो वो इलेक्ट्रिक लाइट हो गई है पहले के जमाने में वह प्रदीप जलते थे तो इसे प्रदीप जलाकर के वो बच्चे का मुंह देखते थे तो वैसे ही वो प्रदीप माना करके सबसे पहले भगवान की आरती करते हैं उनको यह अगरबत्ती यह पुष्प चंदन ये सब उनको अर्पित करते हैं निवृत्तियां अर्पण करते हैं ये सब चीजों से हम एक्चुअली भगवान कृष्णा वहां पर स्वयं उपस्थित थे यह हम कल्पना करके उनको हम आधार यातना करते हैं तो ये चिन्मय मूर्ति यानी की जीवंत ईश्वर स्वयं वहां पर विराजमान है ये हमको इमेजिन करके उनकी पूजा आराधना करनी है मनी आजा टहले हो तो हाथ पर भागते हो बी मनी कहते हैं जी किंतु फिर भी तो चिन्मय मूर्ति की प्रतिमा की चिंता करने पर भी तो हाथ पर है ऐसा सोचना पड़ेगा ऐसा इमेजिन करना पड़ेगा अब चिन्मय जो सत्ता है अद्वितीय ब्राह्मण उसके हाथ पर कैसे हो सकते हैं मैन यह अभी भी वो सरकार नीरा करके बीच में कन्फ्यूजन कर रहे हैं तो जब ठाकुर ने कहा की चिन्मय मूर्ति ईश्वर को चिन्मय यानी की जीवंत समझो तो मास्टर महाशय कहते हैं फिर भी तो मुझे हाथ पर की तो चिंता करनी होगी मनुष्य रूप धरण करके जो ईश्वर आए हैं उनके हाथ पर होंगे अभी जो सामग्र विश्व के नियंत्रण है जो की सृष्टि स्थिति प्रलय स्वयं जिनके हाथ में है जिनकी इच्छा के अनुसार चलते हैं उनके हाथ पर कैसे हो सकते हैं तो हम मास्टर महाशय कहते हैं की मैं यदि चिन्मय अर्थात की जीवन ईश्वर की भी कल्पना करूंगा तो फिर मुझे उनके हाथ पर है ऐसा मानना पड़ेगा ठाकुर मासूम से आगे कहते हैं किंतु ईश्वर स्वयं विराजमान है ऐसा मां तो लूं तो फिर मुझे हाथ पर की चिंता करनी पड़ेगी किंतु साथ-साथ में यह भी सोचता हूं की प्रथम अवस्थाएं अर्थात की प्रथम प्रथम साधना करने की शुरुआत करने के समय रूप चिंता नहीं करने से मां स्थिर नहीं होगा अपनी बोले दिए तो कहा है प्रथम अवस्था में रूप चिंता अर्थात मानवीय न देहधारी ईश्वर की चिंता नहीं करेंगे तो मां स्थिर नहीं होगा और सिर्फ यह चिंता मां से नहीं करनी है अपनी इंद्रियों को अपनी आंखों से अपने वाणी से अपने कान से अपने हाथों से उनकी पूजा आराधना करनी है सेवा सत्संग करना है इंद्रियों को उसमें लगाना है क्योंकि मां से सीधा इंगेज करने को जाएंगे मां सीधा ईश्वर पे लगाने को जाएंगे तो नहीं होगा हम लोगों में आज के जमाने में पहले जो ब्रह्मचर्य श्रम गृहस्ती था श्रम वानप्रस्थ श्रम सन्यास आश्रम जैसे वह आश्रम प्रथम थी आज वो प्रथम नहीं रही जो ब्रह्मचर्य श्रम के 25 साल जी तरह से हम लोग मां को एकाग्र करके विद्या चर्चा करते थे साधन भजन तपस्या योग ध्यान वह सब करते थे वो आज के जमाने में नहीं है आजकल के जमाने में बच्चों को या तो फिर रतन सीखने हैं या तो फिर यह आजकल की जो मॉडर्न एजुकेशन सिस्टम है उसमें तो सीधा-सीधे का देते हैं की आपको कुछ भी चिंता करने की जरूर नहीं परीक्षा पास करने की जरूर नहीं आप जितना हो सकता है उतना पढ़ो नहीं हो सकता है तो हम आपको वैसे ही अगले स्टैंडर्ड में भेज देंगे यह जो आजकल का फ्री थिंकिंग का जो योग है यह अमेरिका से जो नई नई सिस्टम ए रही है की बच्चे के ऊपर में अटेंशन नहीं क्रिएट करना है परीक्षा का टेंशन नहीं होना चाहिए वरना वह बच्चा सुसाइड कर लगा वह क्या उसके साथ में हो जाएगा स्ट्रेस में आकर के क्या कर लगा उसको पूरा फ्रीडम देना है अब पूरा फ्रीडम बच्चे के मां को डोंगे तो बच्चे का मां बंदर की तरह दस्त दिशा में दौड़ेगा ना ही उसको बचपन से डिसिप्लिन किया गया है ना ही बचपन से उसको मां को एकाग्र करने की शिक्षा दी गई है उसको ऐसा बताया गया है की जी चीज में तुम्हारा मां केंद्रित जो चीज अच्छी लगे वो करो बच्चे को क्या अच्छा लगे वाला है बोल करके आज की जो आजकल का जो थिंकिंग है खासकर के यह जो वेस्टर्न कंट्रीज से ए रहा है दिस इस एन वेरी डेंजरस टाइप ऑफ थिंकिंग की बच्चे को हम लोग बेसिकली नहीं सीखने हैं यह सुनकर के थोड़ा सा अजीब लगता है मैंने खुद मेरे खुद के ये सब वेस्टर्न ओरिएंटेड इतिहास थे यह क्रिएटिविटी है फ्री थिंकिंग है फिर यह क्या बोलेंगे की आर्ट और स्किल यह सब सीखना है बोलकर के मैं भी यह सब कुछ सोचता था किंतु मैं जितना स्वामी जी को पढ़ना हूं उतना ही मुझे समझ आता है की आप बाकी सब थ्योरी कितनी ही रखो कितनी ही एन रखो यदि मां को एकाग्र करने की शिक्षा नहीं दी गई और उसको डिसिप्लिन नहीं किया गया तो बच्चे का भविष्य हजार में से एक बच्चा होगा शायद उसके जेनेटिक्स की प्रभाव से या तो फिर हम हिंदू लोग जी तरह से कहते हैं पूर्वजन्म पूर्व जन्म के कर्मों की वजह से वो सहज रूप से स्वाभाविक रूप से उसका मां एकाग्र होगा हजार में से एक बच्चे का बाकी 999 बच्चे का यदि आप उसको खुला छोड़ डॉग खाओगे की अपनी इच्छा के अनुसार पढ़ाई लिखी करो या तो फिर जीवन यापन करो उसका मां हजार दिशा में बिखर जाएगा अपने जीवन में कभी भी कुछ भी एक सिद्धि नहीं प्राप्त कर सकेगा इसीलिए देखिए की अमेरिका की जितनी मल्टीनेशनल कंपनियां है या तो फिर यह जितने एजुकेशन इंस्टिट्यूट है सब जगह पर हम एशिया सिर्फ इंडियन नहीं यह जो डिसिप्लिन करने का कलर जो है हमारा एशिया कलर है ये साउथ कोरिया जापान चीन इंडिया सब जगह पे जो की आजकल इकोनॉमिकल प्रोग्रेस कर रहे हैं जिनका हजार साल हजारों साल पुराना जिनका सिविलाइजेशन है सब जगह पे हमको पता है की बच्चों को डिसिप्लिन करना चाहिए कभी-कभी उनको मारना भी चाहिए सुनकर के हमको कष्ट होता है शायद किंतु यह करने की जरूर है वरना बच्चा सीखेगा नहीं तो यह जी तरह का कलर इस देश में है चाइनीस कोरिया चाहे एन जैपनीज या इंडियन हम लोग अमेरिका के एजुकेशन सिस्टम में सर्वश्रेष्ठ उनका परफॉर्मेंस राहत है तो यह मां को एकाग्र करने की शिक्षा जो बचपन में नहीं दी गई तो बड़े होकर के गृहस्ती आश्रम में प्रवेश करने के बाद में या तो एवं हम लोग जो है यहां पर साधु बने के लिए आए हैं हम लोगों के में किस तरह से यह संभव है की अब जैसे ही ठाकुर का मंत्र प्राप्त किया गुरु महाराज के पास से वैसे ही मंत्र जाप करना शुरू कर दिया और अपना मां उसमें एकाग्र भी हो गया नहीं होने वाला है इंद्रियों से सत्संग करना होगा इंद्रियों से ठाकुर की पूजा आराधना करनी होगी इस वाणी से ठाकुर की प्रार्थना उनके भजन गाने होंगे तब कहानी जाकर के धीरे-धीरे करके इंद्रियों की एकाग्रता का प्रभाव इंद्रियों की सात्विकता का प्रभाव मां के ऊपर पड़ेगा और मां सात्विक होगा और मां एकाग्र होगा सीधा मां को एकाग्र करने को जाएंगे तो यह पॉसिबल हम लोगों के लिए ठाकुर कहते हैं ना काली में अंगत प्राण हम लोगों के जो नगद प्राण है गली में यह हमारा मां सीधा एकाग्र नहीं होने वाला है तो इसलिए मास्टर महाशय कहते हैं की आपने तो कहा है की प्रथम अवस्था में रूप चिंता करने से मां रूप चिंता नहीं करने से मां स्थिर नहीं होगा ऑन वन हैंड में सोचता हूं की जीवन ईश्वर कल्पना करने से उनके हाथ पर के बड़े में सोचना होगा ईश्वर के हाथ पर कैसे हो सकते हैं की आपने कहा है की नर्मदे हर की कल्पना नहीं करके अवतार के ईश्वर के मां स्थिर भी तो नहीं होने वाला है यह कशमकश के मां में चल रही है अच्छा अभी देखिए मास्टर महाशय बहुत ही इंपॉर्टेंट प्रश्न करते हैं और ठाकुर के उत्तर देते हैं मास्टर महाशय कहते हैं अच्छा तीन ही तो नाना रूप धरते पारें ईश्वर तो विभिन्न रूप विविध रूप धरण कर सकते पराजय अपनी मां का रूप क्या मैं उसके ऊपर में ध्यान कर सकता हूं क्या मैं यह सोचता हूं की ईश्वर मेरी मां बनकर के आए हैं और मैं मां के ऊपर में ध्यान कर रहा हूं और मां के भीतर में ईश्वर ही विराजमान है यह सोच करके मां का ध्यान करने से ईश्वर का ध्यान करने समाज हुआ देखिए कितना बड़ा प्रश्न कर दिया है मां का ध्यान करना सहज है मां के साथ में अपने पूरा जीवन खास करके हम भारत के लड़कों ने बिताया हुआ होता है बड़े होने के तत्व एटलिस्ट होते ही है मां प्रेम भी करती है वह मैंने प्यार भी करती है कभी कभी डांटती भी है कभी कभी आरसीबी है किंतु मां का जो प्रेम है सबसे हमारे हमारे हृदय में सबसे गहरी उसने जड़ बिताई हुई है तो मां के ऊपर में चिंतन करना मां का ध्यान करना ये तो हमारे लिए बड़ा हज है तो मैं क्या मां को ईश्वर के यदि ईश्वर नारा देहात धरण करके आते ही है तो यदि मैं और किसी ईश्वर की नर्मदे हर की चिंता करो जैसे की कृष्णा जैसे की राम जिनको मैं कभी देखा ही नहीं है तुम्हें क्या अपनी मां को ईश्वर के रूप में कल्पना करके या तो मां को ईश्वर के रूप में सोच के मां के ऊपर ध्यान कर सकता हूं क्या ये मास्टर महाशय पूछते हैं ठाकुर कहते हैं हां देखिए यहां पर बंगाली कथामृत में इस सेंटेंस को बोल्ड करके लिखा है ठाकुर कहते हैं हां तीन ही अर्थात मां गुरु मां गुरु है और मुंबई का स्वरूप है देखिए ठाकुर ने एक ही सेंटेंस में हमको बता दिया मनी का जो अभी देखिए मुझे पता नहीं की मास्टर महाशय के मां में यह विचार कहां से आया होगा ठाकुर बार-बार मां काली की बात कर रहे हैं किंतु उनकी गर्भधारण मां उनकी जननी मां चंद्रमणि देवी के बड़े में ठाकुर इस तरह से बात करते हैं यह तो यहां पर इतना नहीं लिखा है हां ठाकुर मां के चिंतामणि देवी उनकी खुद की मां के बड़े में बात बहुत करते हैं की वो बहुत ही सरल स्वभाव की भक्ति परायण थी और उन्होंने कभी-कभी तो ठाकुर बेचारे उनसे परेशान हो जाते थे वो एक प्रसंग है मैंने शायद कहा था की वो मां की मां वहां पर मोहब्बत में र रही थी ठाकुर जब साधना कर रहे थे उसे समय तो पास में एक मिल थी तो मिल में वो जो विसल लगती है वो जो सिटी बजती है तो मिल्क आ वो सिटी बजाने से वो चंद्रमणि देवी ठाकुर की मां सोच लेती थी की ये तो वैकुंड की सिटी है तो जब तक वो वैकून फिर सिटी नहीं बजेगी वो वो भगवान विष्णु को भोग धारा रहे भगवान विष्णु को नए व्यक्तियों पर कर रहा है इसलिए सिटी बजती है तो मां वो चंद्रमणि देवी ने ठीक किया था जब तक ये बैकुंठ की ट नहीं बचेगी मैं खाना नहीं खाओगी तो अभी वो तो मिल है उसका तो कुछ ठिकाना नहीं है की कब सिटी बजेगी तो जब तक सिटी नहीं बजेगी चंद्रमणि देवी बेचारी बुक ही रहेगी तो अभी ठाकुर परेशान हो जाते हैं मां को मनाने के लिए अरे मां का लो वो तो मिल्क की वो सिटी है तो मत थोड़ी ना उनकी माने वाली है इतना सरल ईश्वर के ऊपर में विश्वास है तो एक दिन हृदय ने क्या किया कहानी से एक शंकर ले आया है और चंद्रमणि देवी नखत में रहती थी तो नौबत ने पीछे जाकर शंकर बजाने लगा फिर आकर के बोला की मां अभी आप खाना का लीजिए बैकुंठ के सिटी बैक गई है तो चंद्रमणि देवी हंसते हंसते खाने लगी अरे नहीं मुझे पता है की तुमने शंकर बजाया है ये वही कुंड की ट नहीं है तो ठाकुर भी बेचारे कभी-कभी उनसे परेशान हो जाते थे किंतु जो दिखे कितना सरल सहज स्वभाव है तो किंतु ठाकुर ने ऐसा नहीं कहा की वो मां को मां के भीतर में मां काली का दर्शन करके मां की चिंता करते हैं या तो मां के ऊपर में ध्यान करते हैं मुझे ये सी याद नहीं ए रहा है की मैंने ऐसा पढ़ा हो कभी की ठाकुर ने ऐसा कहा है तो मनी के मां में यह आइडिया सडनली कहां से ए गया ये एक सोने वाली बात है क्या तो फिर उन्होंने एक इमेजिनेशन करके कहा होगा की हां ठाकुर बार-बार ये जो मां काली के बड़े में सोच रहे हैं तो मुझे मां काली के ऊपर में इतनी श्रद्धा नहीं ए रही है तुम्हें क्यों नहीं अपने मां के बड़े में सोचो यह उन्होंने खुद ने उनके खुद के मां में यह विचार आया है ना की ठाकुर ने कभी ऐसा कुछ कहा होगा और मनी ने उसको रिपोर्ट नहीं किया है आगे ऑफ टुडे मुझे यह नहीं पता है किंतु यह बड़ा ही सोने वाली बात है की ठाकुर ने जो उत्तर दिया की मां गुरु है और माही स्वरूप है तो आज यही पर कल फिर से मिलता है