मङ्गलाचरण
एक दिन लाटू महाराज को रात को भूख लगा तो रात को खड़े हुए और वह जो तवा था तवा में थोड़ा सा चना जो होता है वो बना करके वो तवे को वहीं पर रख दिया। तो अभी होता क्या है? होना क्या चाहिए? उसी प्रॉब्लम क्या है कि उसी तवे में शशि महाराज सुबह को ठाकुर का बाल भोग तैयार करते थे। तो शशि महाराज तो अपने समय के अनुसार उठ गए। ठाकुर का बाल भोग तैयार करने को जाकर देखा तो तवा था झूठा था लाटू महाराज ने बना करके रख दिया था उसमें वो धोया नहीं था शायद लाटू महाराज ने सोचा होगा सुबह को धोएंगे जो भी है वो पूरा निराकारवादी थे उनका मन कहां से कहां जाता है कहना मुश्किल है तो किंतु शशि महाराज ने जैसे ही देखा कि तवा अभी इस तरह से खाना बनाकर के पड़ा हुआ है। इसको धोया नहीं गया है। तो शशि महाराज इतने नाराज [गला साफ़ करने की आवाज़] हो गए ठाकुर की सेवा में विघ्न पड़ा है। ठाकुर को मैं समय के अनुसार बाल भोग प्रस्तुत करके नहीं दे पाऊंगा क्योंकि पहले तो इसको धोना पड़ेगा। फिर तो बाल भोग प्रस्तुत करना है वगैरह-वगैरह शशि महाराज का टेंपर साकारवादी है ना टेंपर बहुत ज्यादा होता है ऐसा कभी-कभी। निराकारवादियों का भी होता है। तो शशि महाराज का टेमपर एकदम टॉप गियर पे चला गया और जो तो बोल करके लाटू महाराज को गाली देने लगे। तो लाटू महाराज भी सामने कहते हैं कि मैं मां को चिट्ठी लिखूंगा। तुम इस तरह से मुझे डांटोगे तो ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः श्री श्री रामकृष्ण कथामृत का पाठ कर रहे हैं श्रीम कथित जो पीरियड हम देख रहे हैं कि मास्टर महाशय ठाकुर ने जब कहा मन में वन में और कोने में जाकर के एकांत में ईश्वर की साधना करनी चाहिए। ईश्वर प्राप्ति की साधना ईश्वर प्राप्ति के लिए तपस्या बीच-बीच में करनी चाहिए। स्पिरिचुअल रिट्रीट आजकल जिसको हम कहते हैं तो ठाकुर की यह बात सुनकर के प्रेरित होकर के मास्टर महाशय ठाकुर के पास में ही आए हैं दक्षिणेश्वर में और 14th दिसंबर को 1884 मास्टर महाशय यहां पर आए हैं। 1883 14th दिसंबर 1883 मास्टर महाशय आए। अग्रहायण पूर्णिमा थी। संक्रांति शुक्रवार था। सुबह को 9:00 बजे थे। ठाकुर अपने कमरे में उनके जो घर का दरवाजा है वहां पे दक्षिण पूर्व के वरांडा में खड़े थे। रामलाल भी पास में खड़े थे। राखाल लाटो वगैरह थे इधर-उधर। मणि ने आकर के भूमिष्ट होकर के ठाकुर को प्रणाम किया और ठाकुर ने कहा आए हो तो बहुत अच्छा हुआ। आज एक शुभ दिन है अग्रहायण पूर्णिमा का। तो ठाकुर के पास में आज के शुभ दिन को मास्टर महाशय आए हैं। और यह 14th दिसंबर से स्टार्ट करके ऑलमोस्ट फिफ्थ फिफ्थ जनवरी तक मास्टर महाशय ठाकुर के पास में रहे हैं। 23 दिन अभी रिटर्न कब हुए वह तो हमको नहीं पता। एग्जैक्ट डेट मास्टर महाशय ने हमको नहीं दी है। किंतु फिफ्थ जनवरी 1884 को कथामृत में ठाकुर ने मास्टर महाशय को कहा था अभी तुम घर में जाकर के रहो। तुम्हारे घर वाले जितने भी हैं, तुम्हारे बीवी है, बच्चे हैं, जानो कि वह तुम्हारे अपने नहीं है। भले ही चाहे तुम उनके अपने हो, किंतु फिर भी देखना कि उनके भीतर में ईश्वर है। और ईश्वर समझकर के उनके साथ में संबंध रखना है। नहीं कि यह माया का संबंध रखना। तो यह फिफ्थ जनवरी को यह वार्तालाप हुआ था। इसके कुछ दिन तक मास्टर महाशय ने कोई नोट नहीं की है। तो यह फिफ्थ जनवरी इवनिंग को यदि यह बात हुई हो तो हो सकता है कि सिक्स्थ को मॉर्निंग को या इवनिंग को मास्टर महाशय घर लौटे होंगे। तो जो भी है 14th दिसंबर से फिफ्थ जनवरी का यह 23 दिन का पीरियड हम मास्टर महाशय के रिट्रीट के रूप में ले सकते हैं। इसमें भी हम जो पहुंचे थे तो हमने 14th दिसंबर तो देख ही लिया है 15th और अभी 16th दिसंबर को 4:00 बजे दोपहर का जो ठाकुर का एक मुख बोलकर के एक थे भद्र लोग उनके साथ में ठाकुर का वार्तालाप चल रहा था जनाई से आए थे जनाई एक गांव या सिटी का नाम होगा वहां से यह मुखजे बाबू आए थे तो उनके साथ में ठाकुर का वार्तालाप चल रहा है। यह हम यहां तक पहुंचे थे। वार्तालाप में ऑलरेडी क्या-क्या हो चुका है? ठाकुर कहते हैं कि कामिनी कांचन ही
क्रंदन योग, ध्यान योग, सत्संग योग, शरणागति योग
माया है। मन में से कामिनी कांचन के चले जाने से ही योग होता है। ईश्वर के साथ में मिलन होता है। संगम होता है। आत्मा या तो परमात्मा है। जैसे कि एक मैग्नेट और हमारा मन जो है जैसे कि एक सुई। इस सुई के ऊपर में धुला वगैरह धूल मिट्टी वगैरह जम गया है। तो नेचुरली है कि आप मैग्नेट लेकर के इसके सामने आएंगे तो सुई जो है वो उसके पास में मैग्नेट से अट्रैक्ट नहीं होगी। मैग्नेट से वह जाकर के मिलेगी नहीं। किंतु जैसे ही सुई के ऊपर में से यह धूल है, मिट्टी है, आपने धो दिया तो वैसे ही सुई उड़कर के सीधी मैगनेट के साथ में मैगनेट की गोद में जाकर बैठेगी। हमारा जो मन है एक पवित्र बालक होकर के मां जगदंबा की गोद में जाकर के बैठेगा। तो यह तो हो गया। फिर यदि मुखजे बाबू प्रश्न करते हैं कि यह धूल और मिट्टी है यह सुई के ऊपर में से उसको किस तरह से परिष्कार कर सकते हैं? किस तरह से स्वच्छ कर सकते हैं? तो ठाकुर उसके उत्तर में चार उपाय हमको बताते हैं। सबसे पहले तो कहते हैं ईश्वर के लिए व्याकुल होकर के रो। जैसे ही यह अश्रुवारी बहेगी यह अश्रुवारी इस सुई के ऊपर में से धूल मिट्टी है धो देगी। अभी अश्रुवारी अर्थात कि हमारी तपस्या यह धूल और मिट्टी क्या है? तो वही है वह काम कांचन या तो फिर कहेंगे डरिपो या तो कहेंगे अष्टपाश या तो कहेंगे पंचक्लेश। जो भी हमारे शास्त्र में जो नेगेटिव एटीट्यूड, नेगेटिव इमोशंस, नेगेटिव बिहेवियर इस इसका जो हमको बताया गया है, वह सब अपने मन में से जाना चाहिए। त्याग वैराग्य इसका हमारे मन में उदय होना चाहिए। तो उसके लिए एक उपाय है क्रंदन योग। ठाकुर को ईश्वर को रो-रो करके पुकारो। एक सरल बच्चे की तरह ईश्वर को जाकर के प्रार्थना करो कि हे ईश्वर मैं आपका एक अबोध एक नादान संतान हूं। मुझे पता नहीं है कि मेरे मन के भीतर में कितने जन्म जन्मांतर के संस्कार पड़े हुए हैं। यदि आप मेरे संस्कारों को नहीं धोएंगे तो फिर इस संस्कारों को धोने की कोई कैपेसिटी मेरे में तो नहीं है। देखिए मैं कल की ही बात बताता हूं। अ मैं कभी-कभी मेरे मन में थोड़ा सा गर्व हो जाता है कि जो नेगेटिव टेंडेंसीज होती है उसमें से जो एक बहुत ही सीरियस टाइप की टेंडेंसी है क्रोध उसके ऊपर में मैंने कंट्रोल कर दिया है। मैं कभी भी क्रोधित नहीं होता। कोई भी आकर के कैसे भी बात करें कैसा भी बिहेव करें मैं हमेशा एक इ एक्वनिमिटी के उसमें रहता हूं। हमेशा मैं एक ट्रंकविल अवस्था में रहता हूं। इक्वनिटी में रहता हूं। तो ऐसा एक मेरा गर्व है। तो कल हुआ क्या? मैं यहां पर कुक है। उसके साथ में बात कर रहा था। एकाएक वो किसी बात से नाराज हो गया। उसका फ्रस्ट्रेशन था और किसी वजह से उसके दूसरे प्रॉब्लम है तो उस प्रॉब्लम का सॉल्यूशन तो इजी नहीं है। तो मेरे साथ बात करते-करते एकाएक वो गुस्सा हो गया और थोड़ा सा क्रोधित होकर बोलने लगा। अब देखिए कि मेरे में इतना तो कैपेसिटी है कि मैं इमीडिएटली सामने क्रोध नहीं करूंगा। किंतु यह जो मेरा एक गर्व था कि मेरे मन में क्रोध का उदय ही नहीं होगा। वह उसी क्षण खंडित हो गया। साथ-साथ में ही मैं देख रहा हूं। लाइव देख रहा हूं कि एक तो मैं अपने चेहरे पर या तो अपने वार्तालाप में मैं क्रोध नहीं प्रकट कर रहा। वह तो मैं एकदम शांति से उसके साथ बात कर रहा हूं। जैसे कि मेरा मेरे जो सीनियोरिटी जो है अभी आज 20 साल साधु जीवन मैंने जिया है तो उसके अनुसार जो एक डिग्निटी मेंटेन करनी चाहिए उसी के अनुसार मैं उसके साथ बात कर रहा हूं। किंतु मन के भीतर में क्रोध अवश्य प्रकट हो गया है। तो यह तो यह भी तो नहीं होना चाहिए। वह एक अबोध आदमी है। बेचारा उसके प्रॉब्लम है तो वह ऐसा तो मेरे जैसा ट्रेन थी ट्रेनिंग तो उसने लिया नहीं है अपने माइंड या अपनी इमोशंस को सुसंस्कृत करने का। वो क्रोध करता है तो वह उसके लिए ठीक है। यदि मैं क्रोध करता हूं तो मेरे लिए बिल्कुल ठीक नहीं है। तो मैं दोनों पूरा मैं लाइव ऑब्जर्व कर रहा हूं कि मेरे चेहरे पर तो इतना ही शांति है। बातों में तो इतना ही डिग्निटी है। किंतु भीतर में से अवश्य क्रोध प्रकट हो गया है। एक्चुअली यह भी नहीं होना चाहिए। यदि तपस्या ठीक-ठीक करते हैं तो कोई भी सिचुएशन क्यों ना आ जाए हमारे सामने मन की जो इक्वेनिमिनिटी है मन की जो ट्रकलिटी है मन का जो एक प्रशांत भाव है वह वैसे का वैसा ही बने रहना चाहिए तो खैर म और भी लंबी साधना करनी होगी किंतु यह जो हम लोग सोचते हैं ना कभी-कभी कि बहुत कठिन साधना करना का क्या अर्थ है जैसे कि यहां पे सेकंड नंबर पे ही ठाकुर ने कहा है सहस्त्रार में शिव विशेष रूप से विराजमान है। उनके ऊपर में ध्यान करना है। यहां पर हमेशा ख्याल रखना है कि सहस्त्रार पर कभी ध्यान ना करें। भले ही चाहे ठाकुर ने कहा हमको हमेशा अनाहत चक्र जो है हमारा हृदय जो है वहां पे ही ध्यान करना है। तो एनीवे एक ध्यान जो है ठाकुर ने कहा ध्यान योग। ओके चलो किंतु यह ध्यान योग तो बहुत ही कठिन है। ऐसा तो है नहीं। मैं यहां पर सैटरडे को हमारा मेड गाइडेड मेडिटेशन का क्लास होता है। तो मैं क्या करता हूं? गीता चेंटिंग करवाया और फिर इसके बाद में कहूंगा कि अभी अपने हृदय में ध्यान कीजिए। मैं गाइड करूंगा किस तरह से करना। मैं जब मैं ध्यान करवाता हूं। सब लोग ग्रुप में ध्यान करते हैं। मैं स्पष्ट फील कर सकता हूं कि एक या 2 मिनट से ज्यादा मैंने यदि उनको करवाया इस तरह से ध्यान तो वे लोग रेस्टलेस हो जाते हैं। स्थिर बैठ नहीं पाते हैं। पैर हिलाएंगे, शरीर को हिलाएंगे और फिर क्या है कि सबको डिस्टर्ब होगा। एक आदमी यदि स्थिर नहीं बैठ पाता है सबको डिस्टर्ब होता है तो फिर मैं मुश्किल से डेढ़ दो मिनट मेडिटेशन करवा के फिर और कुछ चालू कर देता हूं। सेकंड फेज चालू कर देता हूं। तो क्या है कि यह ध्यान करना कोई सहज बात नहीं है। आपको लंबी प्रैक्टिस चाहिए। तो यह ध्यान योग ठाकुर ने कहा है। फिर ठाकुर कहते हैं हमेशा साधु संग की जरूरत है। तो यह तीसरा है सत्संग योग कहा है। पहला है क्रंदन योग। दूसरा है ध्यान योग। तीसरा है सत्संग योग। कि हमेशा साधु संग करना है। साधु संग की जरूरत सन्यासी को भी है और संसारी को भी है। किंतु यहां पर देखिए जैसे ध्यान मुश्किल है। साधु संग भी तो वैसे आसान नहीं है। हमेशा साधु संग हो ही हमको ऐसा कोई गारंटी नहीं। आप जब तक आश्रम में जाते हैं तब नॉट नेसेसरी कि हमेशा आपको कोई ना कोई महाराज के साथ में बैठकर लंबी बात करने का मौका मिलेगा। लेक्चर वगैरह तो रेगुलर होते नहीं है। ऑनलाइन क्लासेस होते हैं। किंतु हमने अभी देखा कि किस तरह से दो दिन हमको छुट्टी लगानी पड़ी। क्योंकि वह बेलूर मठ से महाराज जी आए हैं। तो तो क्या है कि साधु संग हमको हमेशा नियमित वो हो उसका भी कोई गारंटी नहीं। सत्संग योग है वह अपने हाथ में नहीं है। यदि सत्संग होता है तो ईश्वर की हमारे पर कृपा है। किंतु हम लोग ऐसा कुछ करें जिससे कि मुझे सत्संग प्राप्त हो ऐसा कोई गारंटी नहीं। और फिर आखिर में चतुर्थ योग जो है ठाकुर कहते हैं आम मोक्तारी दाव उनको बकलमा दो उनको पावर ऑफ एटर्नी दो। अर्थात कि यह शरणागति योग। तो शरणागति योग भी हमने देखा कि यह गिरीश घोष के केस में वो कहता तो है कि पहली पहली बार सुनकर के बड़ा अच्छा लगता है कि हमारी सब रिस्पांसिबिलिटी हमारी आध्यात्मिक साधना का पूरा जिम्मा ठाकुर ने उठा लिया है। किंतु यह शरणागति योग कोई सहज नहीं है। मुंह से बोला कि मैं शरणागत हो गया और फिर उसके बाद में अपने इष्ट जिस तरह से इंगित करते हैं उस तरह से 100% उनको फॉलो करना यह कोई सहज बात नहीं
क्रंदन योग है सहज योग
है। तो यानी कि यह जो चार योग यहां पर ठाकुर ने बताए हैं कि ध्यान योग, क्रंदन योग, ध्यान योग, सत्संग योग और शरणागति योग इसमें से जो ध्यान मुश्किल है, सत्संग योग हमारे हाथ में नहीं है। शरणागति लातेलाते बहुत लंबा समय बीत जाएगा। किंतु सबसे सहज है यह क्रंदन योग। ठाकुर कहते हैं व्याकुल होकर के रो। जैसे ही यह अश्रुबारी बहेगी वह अश्रुवारी यह जो सुई है उसके ऊपर का मेला धो देगी। यह क्रंदन योग अपने हाथ में है जो कि सत्संग योग अपने हाथ में नहीं है। क्रंदन योग सहज है जो कि ध्यान योग या शरणागति योग सहज नहीं है। क्रंदन योग हम जब चाहे कर सकते हैं। ध्यान योग जब चाहे नहीं कर सकते हैं। यानी कि जो चार योग यहां पर ठाकुर ने बताए हैं कि सुई के ऊपर में से मेला धोने के लिए सुई के ऊपर में से कादव की चड़ धोने के लिए हमारे मन में से यह सांसारिक चीजों के प्रति आकर्षण है। हमारे पूर्व पूर्व जन्म के जो संस्कार हैं उसको काटने के लिए उसमें सबसे सहज सबसे सहज साध्य क्रंदन योग ही है। ध्यान योग सीखते-सीखते समय लगेगा। सत्संग योग अपने बस की बात अपने हाथ की बात नहीं है। हुआ तो हुआ। नहीं हुआ तो नहीं हुआ। हम कुछ कर नहीं सकते हैं। शरणागति योग भी ध्यान योग की तरह ही मुश्किल है। यह ध्यान योग करो कि शरणागति योग करो। कभी-कभी लगता है एक स्थिर होकर के बैठना और मन को है एकाग्र करना इससे बेटर है शरणागति कर लेते हैं। किंतु शरणागति करने से पता चलेगा कि वह भी इतना ही डिफिकल्ट है। यानी वह सिक्के की दो बाजुएं हैं। ध्यान योग और शरणागति योग। दोनों ही इक्वली मुश्किल है। क्रंदन योग ही एक ऐसा योग है जो कि सहज साध्य है जो कि हमारे बस की बात है। हमारे हाथ में है। जब चाहे हम उसको प्रैक्टिस कर सकते हैं। किंतु हमने उस समय भी यह डिस्कस किया था कि क्रंदन योग में सबसे बड़ा विघ्न क्या आता है? वह आता है यह लज्जा, घृणा, भय। लज्जा इस बात की कि मैं यदि ईश्वर के लिए रोऊंगा तो लोग क्या कहेंगे? घृणा इस बात की कि जब से आजकल के जगत में हमको बचपन से ही जिम्मा लेने को सिखाया जाता है। एक समय था स्वामी जी कहते थे कि मां मुझे मर्द बना दो। यह जो अपना जो प्रार्थना है स्वामी जी की किंतु आज क्या है कि यह जो मददानगी है या रिस्पांसिबिलिटी लेना है या तो फिर एक क्या कहेंगे कि अपनी जो वीकनेस है अपनी व्नरेबिलिटी है उसको कभी भी किसी के सामने एक्सपोज नहीं होने देना है। हमेशा लोगों के सामने एक ऐसा फसा खड़ा करके दिखाना है। एक ऐसा चेहरा प्रोजेक्ट एक इस तरह का मास्क प्रोजेक्ट करना है कि मैं सुप्रीमली कॉन्फिडेंट हूं। मैं पूरा एोगेंट हूं। मेरे में पूरी क्षमता है। मैं जो चाहे वह कर सकता हूं। ऐसा एक स्ट्रांग मैन का इमेज हमको खड़ा करके दिखाना है। मूवीज में भी देखिए हमारे हीरो कौन है? तो वह होते हैं एंग्री यंग मैन। कभी-कभी मूवीज में कंट्रास्ट करके दिखाते हैं कि दो हीरो है। उसमें एक हीरो है एंग्री यंग मैन कि दूसरा है सॉफ्ट सेंसिटिव इमोशनल टाइप का। अभी वह दुश्मन का हमला होता है तो वह सॉफ्ट और सेंसिटिव और इमोशनल टाइप का जो हीरो है वो वो थोड़ा सा आपको क्षमा करने को बोलेगा। वह थोड़ा सा आपको प्रिकॉशन लेने को बोलेगा। जबकि यह एंग्री यंग मैन है वह अपना दुश्मनों के साथ में जाकर फाइट करेगा। और ऑडियंस को क्या अच्छा लगता है? यह एंग्री यंग मैन ही अच्छे लगते हैं। एक स्ट्रांग हीरो उनको चाहिए। अभी ये स्ट्रेंथ का जो युग है, एक मर्दानगी प्रोजेक्ट करने का जो युग है, आज देखिए कि अमेरिका में दो बार ऐसा हुआ है। एक बार डोनाल्ड ट्रंप और हिलेरी क्लिंटन इन दोनों का फाइट हुआ तो उसमें डोनाल्ड ट्रंप जीत गया। क्यों? क्योंकि ये जो इ ये जो नागरिक जो है सिटीजंस जो है उनको यह सॉफ्ट फेमिनिटी भले ही चाहे खुद के भीतर में हो वो एक ठीक है किंतु इंटरनेशनल स्टेज पे ये फेमिनिटी जो है उसको प्रोजेक्ट करना उनको अच्छा नहीं लगता। इंटरनेशनल स्टेट स्टेज पे तो यह 56 इंच का सीना जो है वही उनको प्रोजेक्ट करना है। तो उस समय भी वह डोनाल्ड ट्रंप जीत गया। सेकंड टाइम भी आप देखिए वो कमला हरिस और डोनाल्ड ट्रंप उसमें भी यह डोनाल्ड ट्रंप जीत गया। यह मुझे समझ में नहीं आता कि ये डेमोक्रेट पार्टी वाले वो लड़की म लेडीज को ही क्यों उसके सामने खड़ा करते हैं। वो कभी उनके उसके सामने नहीं जीत पाएगी। क्योंकि अमेरिका ही नहीं आज भारत में भी देखिए राहुल गांधी का जो एक सॉफ्ट इमेज है और अपने प्राइम मिनिस्टर का जो एक स्ट्रांग इमेज है वी ऑलवेज प्रेफर ए स्ट्रांग मैन इन अ कंट्रोल पोजीशन तो क्या है यह युग जो है वो मददानगी प्रोजेक्ट करने का युग है। इस युग में मैं यदि रोते-रोते ईश्वर को पुकारूंगा तो मैं खुद उस बात को ना ले नहीं पाऊंगा। घृणा होगी मुझे लज्जा तो होगी ही होगी तीन चीजें लज्जा घृणा भय तीन थकते नहीं ठाकुर ने कहा है लज्जा घृणा भय तीन रहतेर रहते नहीं होगा लज्जा तो हमको लोगों से होगी कि मैं यदि ईश्वर के लिए व्याकुल होकर रोऊंगा तो फिर लोग क्या कहेंगे वो तो लज्जा हो गई किंतु मैं खुद मेरे भीतर में से यह मैं प्रोजेक्ट नहीं कर पाता हूं अपने को कि ऐसा मैं देख नहीं पाता हूं कि हां मैं ईश्वर के लिए रोऊंगा क्योंकि मुझे अपने को एक स्ट्रांग मैन का इमेज प्रोजेक्ट करना है। तो भीतर में से ही रोने के प्रति घृणा होती है। इस तरह का कोई भी हम व्यक्ति देखें खास करके लीडरशिप पोजीशन में स्त्रियों को क्यों लीडरशिप पोजीशन में इजीली प्रवेश नहीं मिलता है। क्योंकि सभी लोग उस पोजीशन में एक स्ट्रांग मैन को देखना चाहते हैं। एक फेमिनिटिव हो या तो फिर एक सॉफ्ट इमोशनल सेंसिटिव नेचर हो। इस तरह के लोग इजीली जो है वो लीडरशिप पोजीशन में नहीं जाते। दूसरों की क्या बात करते हैं। रामकृष्ण संघ स्वयं आप स्वामी जी का व्यक्तित्व देखिए। किस तरह का मददानगी से भरा था। देखिए स्त्री सुलभ सेंसिटिविटी उनमें थी। किंतु आप ज्यादातर लोगों को बोलिए स्वामी विवेकानंद तो अराइज अवेक वही वाला एक आपको मैसेज सुनने को मिलेगा या एटलीस्ट वही एक इंप्रेशन लोगों के मन में रहेगी तो क्या है घृणा होती है मैं क्या ईश्वर के लिए रोऊंगा और कुछ करना है तो बता दो शरणागति ठीक है मंदिर में जाकर प्रार्थना करेंगे पूजा पाठ कर लेंगे सत्संग कर लेंगे तीर्थ यात्रा कर लेंगे ठीक है रोते-रोते ईश्वर को पुकारना यह मेरे से नहीं होगा। तो घृणा होती है। भय भी होता है। भय हमेशा इसीलिए कि यदि मैंने यह रोना धोना शुरू कर दिया तो फिर होगा क्या कि एक जो मेरा सेल्फ कॉन्फिडेंस है ना वह टूट जाएगा। यहां पर स्वामी जी चिल्ला चिल्ला करके कहते हैं भारत की 1000 साल की गुलामी उसका इसी कारण यही था कि हमारे में आत्मश्रद्धा नहीं थी। हम लोग वो बहुत ही ज्यादा यह रोना धोना ये मधुर भाव वगैरह में चले गए थे। इसका परिणाम यह आया कि विदेशी आक्रमकों के सामने हम लोग उसको लड़ नहीं पाए। तो भीतर में से भय होता है कि यदि मैं रोना धोना स्टार्ट कर दूंगा। अपना यह जो आत्मश्रद्धा है वो मैं खो बैठूंगा। जगत की यह जो चैलेंजेस है उसका मैं सामना नहीं कर पाऊंगा। तो क्या है कि लज्जा, घृणा, भय यह तीनों आकर के खड़े रह जाते हैं। जब भी हम यह बात करते हैं कि उसके लिए ईश्वर के लिए व्याकुल होकर रो। देखिए मैंने मुझे खुद को यह मैंने किसी भी साधु को ईश्वर के लिए रोते नहीं देखा। अभी ठाकुर ने तो जो भी कहा है कि साधना करनी है मन में, वन में और कोने में। इस अर्थ में कि रिट्रीट में जाना है वह भी एक बात है। दूसरा है कि साधना का दिखावा कभी नहीं करना। तो क्या है कि कोई भी साधु पब्लिक में तो इस तरह का ईश्वर के लिए रोना ऐसा कभी नहीं करेगा। वह तो एकदम स्पष्ट बात है। किंतु इवन प्राइवेट में भी अपने कमरे में रहकर के भी वे लोग ऐसा करते हो। मुझे आई एम हाईली डाउटफुल। बहुत कम होंगे। क्योंकि क्या है कि यह एक स्वामी जी ने भी कहा है आत्मश्रद्धा और एक अपना आज का जो पूरा युग है स्ट्रांग मैन का युग है तो क्या है भीतर में से यह बात ही नहीं आती कि मैं ईश्वर के लिए रोऊं किंतु देखिए भगवान शिव का जो स्वरूप है अर्ध नारीश्वर पुरुष सुलभ आत्मश्रद्धा भी होनी चाहिए और यह नारी सुलभ यह जो शरणागति या तो फिर ईश्वर के प्रति देखिए शरणागति एक चीज है। शरणागति योग जो है वह एक चीज है। किंतु यह जो ईश्वर के लिए रोना क्रंदन योग है वह दूसरा ही चीज है। हम क्रंदन तभी करेंगे हम देखिए यूजुअली मनुष्य रोता कब है? जबकि उसकी सब आशाएं समाप्त हो जाती है। सब आशाएं टूट जाती है। भविष्य पूरा अंधकारमय छोटा बच्चा रोता है वह तो अलग बात है। वो छोटा बच्चा का रोना क्या है? छोटी-छोटी बातों में वो रोएगा। कभी-कभी तो छोटा बच्चा दिखावा भी करता है क्योंकि उसने सीख लिया है कि मैं जब रोता हूं तो मेरी मां दौड़ करके आती है मुझे सांत्वना देने के लिए। मैं यदि रोते-रोते कुछ डिमांड करता हूं तो मेरी मां इमीडिएटली उसको फुलफिल कर देती है। तो छोटे बच्चे का रोना जो है वो वैसे ही तो बचपना के हिसाब से है और दूसरा है कि वह सीख भी जाता है कुछ समय के बाद में कि रोने का पावर क्या है? तो वह तो एक हो गया। किंतु एक जो बड़ा आदमी जब रोता है कब रोता है? कहां तो बहुत ही फिजिकल कष्ट हो रहा है तो वह तो एक चीज हो गया। चलो किंतु अदरवाइज वह तभी रोता है जब कि सब आशाएं जो है वह टूट करके चकनाचूर हो जाती है। भविष्य पूरा अंधकारमय हो जाता है। तब वो रोता है। तो देखिए कि यह जो संपूर्ण रूप से हमारे भीतर का जो ईगो का सुपर कंस्ट्रक्ट ये सुपरस्ट्रक्चर हमने खड़ा करके रखा है वो सुपरस्ट्रक्चर को तोड़ देना है। तभी भीतर में से रुलाई आएगी। तभी भीतर में से अश्रु आएंगे। अदरवाइज यह ईगो का सुपरस्ट्रक्चर हमने जब तक बना करके रखा है तब तक भीतर में से क्रंदन आएगा ही नहीं। शरणागति शायद आ सकती है। क्रंदन नहीं आएगा। तो माने शरणागति जिस लेवल पर जाती है ठाकुर ने ज्ञान और भक्ति के बारे में कहा है। ज्ञान जो है पुरुष है और कोई भी घर होता है वहां पर बाहर वाला जो बैठक खाना है वहीं तक जा सकता है। जबकि भक्ति स्त्री है और अंदर महल तक जा सकती है। और अब यह उस दिनों की बात है। जबकि स्त्रियां पर्दा प्रथा ऑब्जर्व करती थी। घर के भीतर में स्त्रियों के लिए अलग स्थान था और वहां अंदर महल जिसको कहते थे वहां सिर्फ स्त्रियां जा सकती थी। तो क्या है कि पुरुष है भक्ति सिर्फ बैठक खाने तक ही जा पाएगा। पुरुष है ज्ञान जो कि सिर्फ बैठक खाने तक जा पाएगा और भक्ति है स्त्री तो वो भीतर तक अंदर महल तक जा सकती है। अर्थात कि ज्ञान से आप कुछ हद तक ही ईश्वर के पास जा सकते हैं। भक्ति से आप ईश्वर के संपूर्ण समीप जा सकते हैं। अभी ऑफ कोर्स ठाकुर ने जब यह उपमा दी है तो ज्ञान वाले तो यही कहेंगे कि ज्ञान के माध्यम से ईश्वर के पास जाने की कोई जरूरत नहीं बात ही नहीं। ईश्वर खुद तो माया की प्रोडक्ट है। ज्ञान तो आपको ईश्वर के साथ में एकाकार करवा सकता है। या तो फिर ईश्वर स्वयं माया है। इस माया के पर्दे को चीर करके जो ब्राह्मण है उसके साथ में एकाकार करवा सकता है। ज्ञान वो इंस्ट्रूमेंट ही नहीं है आपको ईश्वर तक ले जाने का। तो जो भी है वो फिलॉसोफिकल आर्गुमेंट हो गया। किंतु जिस तरह से ठाकुर ने यह उपमा दी है, उसी उपमा को हम यहां पर कह सकते हैं यह आम मुक्तारी या बकलमा देने की बात है। पावर ऑफ एटर्नी देने की बात है। वह भी पुरुष की तरह ही है। आपको एक लेवल तक लेकर जाएगा। गिरीश घोष का स्वयं का उदाहरण देखिए। शरणागति संपूर्ण आ गई थी। किंतु यह जो ईगो का सुपरस्ट्रक्चर है वह टूटा था कि नहीं टूटा था आखिरी घड़ी में टूटा होगा वो आप एनालिसिस करके सोच सकते हैं। किंतु ठाकुर जो कि व्याकुल होकर के रोते थे उनके भीतर का सब खत्म हो गया था। जितना भी यह ईगो का सुपरस्ट्रक्चर है, जाति, कुल, शील, मान, अभिमान जो कुछ भी है, लज्जा, घृणा, भय सब टूट करके संपूर्ण रूप से भीतर में से निर्मल हो गया था। तो यह जो है क्रंदन योग स्त्री की तरह है। आपको अंदर महल तक ले जाएगा। आम मुक्तारी जो है फिर भी आपको बाहर तक ही ले जाएगी। बैठक खाने तक जबकि क्रंदन योग सीधा अंदर महल तक मां की गोद में जाकर के बिठा देगा आपको। तो यह देखिए कि क्रंदन करना कब संभव है? भीतर में से हमारी सब आशाएं सब भविष्य के सपने हमारा जो व्यक्तित्व है हमारा जो संस्कार है, हमारा यह जो कुछ भी है जो कि मुझे मैं बनाता है, वह टूट जाता है। टूट के चकनाचूर हो जाता है। तब आंखों में से आंसू आते हैं। और वह जैसे ही आंसू की धारा बहती जाएगी वैसे ही देखेंगे कि अपना यह जो अशुद्ध संस्कार है फट फट करके धुलना शुरू हो जाएंगे। क्रंदन योग सबसे आसान है। क्रंदन योग हमारे हाथ में है। क्रंदन योग करने के लिए कोई स्पेशल क्वालिफिकेशन की आवश्यकता नहीं। बस रास्ते में खड़े हैं लज्जा, घृणा, भय। मैं यदि ईश्वर के लिए रोऊंगा तो लोग मुझे क्या कहेंगे? तो ठाकुर ने कहा ना विजय कृष्ण को कहा ना कि किसको कहा कि तुम रो ईश्वर के लिए। लोगों को पता चलने दो कि ईश्वर प्रेम में पागल हो गया है, रो रहा है। तो यह सब फेंक दो अपना और ईश्वर के संपूर्ण शरणागत होने के लिए भीतर का जो ईगो का सुपरस्ट्रक्चर है, उसको डिमोलिश कर दो। तो यह था क्रंदन योग। राइट? चार रास्ते ठाकुर ने यहां पर कहे हैं। क्रंदन योग है, ध्यान योग है, सत्संग योग है और शरणागति योग है। तो यह हमने ऑलरेडी डिस्कस कर ही लिया था। इसके बाद में फिर मुख फिर से कहते हैं कि गीता वगैरह शास्त्र पढ़ना अच्छा है। तो ठाकुर ने क्या कहा? सिर्फ पढ़ने सिर्फ पढ़कर के या सुनकर के क्या होगा? किसी ने दूध के बारे में सुना है। कोई ने दूध देखा है और किसी ने खाया है और खा के हृष्ट पुष्ट हुए हैं। तो ईश्वर के बारे में धार्मिक पुस्तकों में पढ़िए। गलत कुछ नहीं है। किंतु पढ़कर के सुनकर के आप बैठे मत रहिए। ईश्वर साक्षात्कार के लिए प्रयास कीजिए। साधना उपासना कीजिए। और फिर ठाकुर का जो महामंत्र था ईश्वर के दर्शन करा जाए। ईश्वर का दर्शन कर सकते हैं। आत तार शंगे आलाप कोरा जाए और उनके साथ में आलाप भी कर सकते हैं। ईश्वर का दर्शन भी कर सकते हैं। ईश्वर के साथ में वार्तालाप भी कर सकते हैं। यह पुराणों की कहानियों में जो पढ़ा है या तो फिर यह जो मिडीवल सेंट्स जो थे हमारे मध्ययुगीन भारत के ये तुकाराम है ना कि ये फिर ये अलवार्स है साउथ इंडिया के इन लोगों के जीवन में आपने जो पढ़ा है कि हां ईश्वर का दर्शन हुआ है तो यह पढ़कर के बैठे रहने से कोई लाभ नहीं है। उनको यदि ईश्वर का दर्शन हुआ है तो हमको भी हो सकता है। दिव्य शुरू शुरू में ठाकुर जब दक्षिणेश्वर आए थे तो मां को क्या करके प्रार्थना करते थे कि तुमने राम प्रसाद को देखा दर्शन दिया तो मुझे दर्शन क्यों नहीं देगी तो देखिए कि ठाकुर यदि राम प्रसाद के गीत तो बहुत सुंदर रूप से गाते थे तो यदि यह सुनकर के बैठे रहे होते कि राम प्रसाद को तो दर्शन दे दिया तो ठीक है चलो ईश्वर सही है बस अभी मुझे राम प्रसाद के भजन ही गाने हैं और ज्यादा कोई टेंशन नहीं लेना तो फिर तो यह बाकी का यह जो पूरा रामायण महाभारत हुआ वह तो होता ही नहीं। तो देखिए कि राम प्रसाद को यदि दर्शन दिया तो मुझे क्यों नहीं दोगी? हम भी रोते-रोते ईश्वर को कह सकते हैं कि यदि ठाकुर को दर्शन दिया तो मुझे क्यों नहीं दोगी? क्या ऐसा है कि 19th सेंचुरी स्टार्ट हो गई है तो अभी ईश्वर के दर्शन बंद हो गए हैं। ऐसा तो नहीं है। वो उसकी एक्सपायरी डेट आ गई है। क्या ऐसा है? नहीं है। ईश्वर आज भी दर्शन दे सकते हैं। बस वही बात है कि हमको रोते-रोते प्रार्थना करनी है। सत्संग योग कर सके साथ में तो बहुत अच्छा है। ध्यान योग कर सके तो सोने पे सुहागा यदि ये आम मुक्तारी दे सके। पावर ऑफ एटर्नी शरणागति योग तो मां जैसे कहती है ना कि हाथीर दांत सोनादिए बांधा। [हंसी] अर्थात कि हाथी का दांत जो है वो सोने से मढा हुआ है। इसका अर्थ क्या है? मां विद्वान साधु के बारे में यह बात कहती है। विद्वान साधु देखिए साधु है तो ऑलरेडी उसका जो संस्कार उसका यह जो पवित्रता उसकी जो मर्यादा ऑलरेडी हाईएस्ट लेवल पर बैठा है। ऊपर में से किंतु विद्वान भी है। यानी कि उसने सिर्फ कुलम पवित्रम जननी कृतार्थ जिसको कहते हैं ना कुल पवित्र हो गया। जननी कृतार्थ हो गई। साधु यदि होगा तो ऐसा होगा। किंतु जो विद्वान साधु है वह सिर्फ कुल को पवित्र करके जननी को कृतार्थ करके आत्मनो मोक्षार्थ करके नहीं बैठेगा वो जगत का हित भी कर सकता है तो विद्वान साधु साधु है बोलकर के हाथी का दांत जो है आईवरी आईवरी की चीजें जो मिलती है वो आईवरी के छोटे-छोटे स्टैचू मिलते हैं गहने मिलते हैं ज्वेलरीज मिलती है तो पता होगा आपको यदि मार्केट रेट पता होगा तो कि आईवरी बड़ा कॉस्टली होता है और हाथी के दांत में से बनता है। तो आजकल तो हाथी का वध करना भी बहुत जगह पे बैन हो गया है। यानी कि जो आईवरी अभी तक हाथी के दांतों में से निकाल दी गई है। वह एक अभी फिनाइट सप्लाई है। लिमिटेड सप्लाई है। तो ऑलरेडी आईवरी की कीमत ज्यादा है। अभी इसी आईवरी का एक खिलौना या ज्वेलरी बनाइए और उसके ऊपर में सोने से मढ़ दीजिए। तो आईवरी का भी वैल्यू है। उसके ऊपर में सोने का वैल्यू ऐड होगा। तो मां विद्वान साधु के बारे में कहती है विद्वान साधु जनो हाथीर दांत सोना दिए घोड़ा अर्थात कि हाथी का दांत है सोने से मड़ा हुआ है तो यहां पे भी देखिए यदि क्रंदन योग आप कर सके तो ऑलरेडी आईवरी के लेवल तक आप पहुंच गए हैं। क्रंदन योग के बाद में ध्यान योग, शरणागति योग, सत्संग योग यदि हो जाए तो यह हाथी का दांत सोने से गड़ा हुआ मड़ा हुआ हो जाएगा। तो यह चार जो है आप भरोसा रखिए कि ईश्वर के दर्शन हो सकते हैं। भरोसा रखिए कि उनके साथ में वार्तालाप हो सकता है और चारों योग का जो ठाकुर के कहे हुए चार योग का अनुष्ठान करेंगे तो अवश्य वो हमको भी होंगे। ठाकुर को हुए तो मुझे क्यों नहीं होंगे? ऐसा करके ठाकुर जैसे वह मां के सामने रोते-रोते कहते थे राम प्रसाद को देखा राम प्रसाद के देखा मां केो देखा बिना राम प्रसाद को तुमने जाकर के दर्शन दिया तो मुझे क्यों नहीं दर्शन दोगी? तो ऐसा वो अधिकार जता करके ठाकुर कहते हैं ना मां तो अपनी खुद की है। मां के ऊपर में हम अधिकार जता सकते हैं। तुमको मेरे लिए खाना बनाना ही होगा। क्यों नहीं बनाएगी? मां नहीं बनाएगी तो और कौन बनाएगा? मां के ऊपर में तो अपना अधिकार है। हमारा क्या है? हक बनता है मां के साथ में झगड़ा करने का। मां के सामने जाकर डिमांड करने का। तो ठाकुर कहते हैं जगत जननी जगदंबा के सामने जाकर के अधिकार जताते हुए कहिए यदि ठाकुर को देखा दिया तुमने ठाकुर को तुमने दर्शन दिया मुझे क्यों नहीं देगी और यदि नहीं देगी तो फिर रोना शुरू कर देना है सो उसके
साधना के सोपान: प्रवर्तक - साधक - सिद्ध
बाद में इतना हमने पढ़ा था इसके बाद में अभी हम देखते हैं ठाकुर आगे क्या कहते हैं मास्टर महाशय क्या लिखते क्या है ठाकुर के बारे में प्रथम में प्रवर्तक प्रथम पहले तो है प्रवर्तक अर्थात कि यह अभी यह स्टेजेस दिखा रहे हैं साधना के प्रवर्तक है फिर सिद्ध है फिर सिद्धों का सिद्ध है वगैरह तीन स्टेजेस यहां पे ठाकुर बता रहे हैं साधना करतेकरते हमारी कौन-कौन सी अवस्थाएं होगी तो हमारी प्रथम अवस्था है प्रवर्तक अर्थात कि यह लर्निंग लाइसेंस और यह फिर यह पक्का लाइसेंस ऐसा जो होता है ना व्हीकल लेने को जाएंगे तो पहले आपको लर्निंग लाइस लाइसेंस देंगे। बाद में वह पक्का लाइसेंस देंगे। हमारे यहां पर भी यदि साधु होने को आते हैं तो 9 साल तक सफेद कपड़े पहनने हैं। हमको ब्रह्मचारी कहा जाता है। 9 साल के बाद में सन्यास दीक्षा होती है और फिर घेरआ वस्त्र पहनने को मिलता है। सन्यास नाम मिलता है और हमको सन्यासी की पदवी मिलती है। स्वामी नाम मिलता है। तो स्वामी विवेकानंद जैसे कि तो या सब जगह पे आप कुछ भी करने को जाएंगे तो पहले आपको प्रीलिमिनरी स्टेजेस से गुजरना ही होगा। ट्रेनिंग फेज से गुजरना ही होगा। तो इसलिए यहां पर ठाकुर कहते हैं साधना करने को जाएंगे तो हमारा सर्वप्रथम वो लर्निंग लाइसेंस वाला पीरियड चलता है। उसको कहते हैं प्रवर्तक। प्रथम है प्रवर्तक। पहले होता है प्रवर्तक से पढ़े सुने वह पढ़ता है और सुनता है तार पर जो माने वो प्रवर्तक है उसके दो धर्म ठाकुर ने बता दिए उसको पढ़ना है और श्रवण करना है पाठ करना है श्रवण करना है यह जो है वह प्रवर्तक करेगा जैसे हमारा यहां पर ट्रेनिंग सेंटर है बेलूर मठ में तो हम सभी को वहां पर जाना होता है वहां पर क्लासेस चलते हैं वो शास्त्र के क्लासेस ठाकुर मां स्वामी जी के क्लासेस आई वास वेरी लकी टू हैव सम वेरी गुड आचार्यस सर्वप्रियनंद जी हमारे आचार्य थे भजनानंद जी आचार्य थे तो बहुत ही सुंदर रूप से वो ट्रेनिंग सेंटर में आपको सब कुछ सिखाते हैं। सो दैट वास वेरी गुड कि प्रवर्तक है तो म ट्रेनिंग सेंटर का ब्रह्मचारी के रूप में वो पढ़ता है और श्रवण करता है। क्लासेस अटेंड करता है और अच्छे-अच्छे जो सीनियर होते हैं साधु आचार्य उनके पास में से शास्त्र अभ्यास करता है। तारपौर साधक किंतु फिर पढ़कर के श्रवण करके बैठे रहने से नहीं चलेगा। उसके बाद में साधना प्रारंभ करनी होगी। तो कहते हैं उसके बाद में साधक ताके डाक छे ध्यान चिंता को छे नाम गुण कीर्तन को छे अर्थात कि साधक क्या करता है? साधक का धर्म क्या है? ता के डाक छे ईश्वर को पुकारता है। डाक अर्थात कि पुकारता है। वही जो क्रंदन योग पुकारता है। ध्यान चिंता को छे ध्यान और चिंतन करता है। नाम गुण कीर्तन को छे नाम गुण कीर्तन कर रहा है। यहां पे देखिए फिर से ता के डाक अर्थात कि कह सकते हैं प्रार्थना कर रहा है। प्रार्थना योग ध्यान चिंतन कर रहा है। ध्यान योग और अह ज्ञान योग चिंतन अर्थात कि महावाक्य महावाक्य का जो स्मरण मनन निध्यासन महावाक्य विचार तो इसको ज्ञान योग का पार्ट कहेंगे तो उनका चिंतन करता है अर्थात कि वो उनका महावाक्य विचार करता है या तो फिर स्मरण मनन निधि्यासन करता है तो ज्ञान योग करता है नाम गुण कीर्तन को छ अर्थात की भक्ति योग नाम करता है, गुणगान करता है, कीर्तन करता है जो कि ट्रेडिशनल भक्ति योग है। प्रार्थना योग है, ध्यान योग है, ज्ञान योग है, विचार योग कह सकते हैं और फिर नाम गुण कीर्तन योग है। इतना साधक करता है। तार पर सिद्ध इतना करने के बाद में नाम गुण कीर्तन करने के बाद में पुकारने के बाद में प्रार्थना करने के बाद में साधक होता है सिद्ध ता के बोधे बोध को छे दर्शन कोरे छे ताके बोधे बोध करे छे तार दर्शन को छे कि सही सही में अनुभव करता है कि ईश्वर है सु कथार कथा नहीं बांग्ला ते बोले ऐसे बातों की बातें नहीं मुंह पे ही बोल लेता है। ओरली बस वह स्वीकार कर लेता है। ईश्वर है। ज्यादातर लोगों का क्या है? वो ओरली स्वीकार तो कर लेते हैं। बातों की बातों तक भगवान को रखते हैं। हां भगवान है। हम उनके बड़े भक्त हैं। किंतु आपका चरित्र देखिए। आपका बिहेवियर देखिए। आपका वह जो लाइफस्ट देखिए कहां पे भी ईश्वर दिखते नहीं है। सिर्फ बातों की बातें हैं। तो क्या है कि उन लोगों के लिए ईश्वर सिर्फ एक कल्पना मात्र है। जबकि यह जो सिद्ध हो जाता है। सिद्ध सही सही अनुभव करता है कि वह वर्तमान है। सही सत्य है। कोई कोई पुजारी महाराज होंगे मंदिर में पूजा करते होंगे तो ऐसा लगेगा कि ठाकुर वहां पर साक्षात वर्तमान है। वो उनको साक्षात ठाकुर है ऐसा देखकर के ही पूजा करते हैं। हमने वराह नगर के मठों का वराह नगर मठ के दिनों का वर्णन हमने पढ़ा था। शशि महाराज किस तरह से जय गुरुदेव श्री गुरुदेव ऐसा करके करते ताल ताल पे हुंकार देते देते ठाकुर की आरती करते थे जो उस समय का वर्णन हमने पढ़ा जिस तरह से लिखा था भक्तगण भी चि माने इतना उस भाव में मत्त हो जाते थे जय गुरुदेव श्री गुरुदेव कोई कोई नृत्य करता है कोई कीर्तन करता है और फिर जो तबला ये जो पखावज पे जो बजाता है उसका जो हाथ है वह हाथ जैसे कि काम नहीं करता काम करना बंद हो जाता है इतना लंबा समय तक इतने जोर-जोर से वो पखावज बजाता है तो क्या है कि इतना सुंदर माने शशि महाराज तो ठाकुर को साक्षात देखते थे कि हां वो वर्तमान है सदेह जी रहे हैं हमारे बीच में और उनकी सेवा करनी है। फनी इंसिडेंट है कि अह एक लाटू महाराज का तो पता है ना लाटू महाराज ने ठाकुर की सेवा तो बहुत की किंतु फिर क्या है कि ठाकुर की महासमाधि के बाद में ना उनका मन देखिए सही सही में जो एक निराकार भाव में जिसने प्रवेश कर दिया हो ना तो वह लाटू महाराज थे। किसी भी चीज की फ़िक्र नहीं है। मां उद्बोधन में आती है। लाटू महाराज रह रहे हैं बलराम मंदिर में तो किसी ने मां को पूछा कि मां सब तो आकर के प्रणाम करके चले गए। राजा महाराज आ गए। सभी जितने भी साधु हैं बिलूर मठ से आ गए आपको प्रणाम करने के लिए। लाटू महाराज यहां पे पास में ही रहते हैं। वो आपको प्रणाम करने को नहीं आए। तो मां कहती है अरे वो तो लाटू है। लाटू छेले लाटू तो बच्चा है। दक्षिणेश्वर में मां की सबसे ज्यादा सेवा किसने की है? लाटू महाराज ने ही की है। मां के पास में ठाकुर खुद ले आए थे कि यह लड़का है वो तुम्हारे लिए आटा जो है वह बना देगा। वह रोटी बनाने के लिए जो आटा को यह करना पड़ता है। स्क्वीज़ वगैरह करना पड़ता है। जो कि मेहनत का काम है। तो आटा बनाने में मदद करेगा। बोल के ठाकुर ही तो लाटू महाराज को मां के पास में ले आए थे। मां की तो बहुत सेवा की है। किंतु ठाकुर की महासमाधि के बाद में लाटू महाराज इस तरह के निराकार भाव में चले गए हैं। म शशि महाराज और लाटू महाराज बिल्कुल ऑोजिट आपको दिखेंगे। दोनों ठाकुर के सेवक थे। काशीपुर में लाटू महाराज और शशि महाराज दोनों ने ही ठाकुर की पूर्ण रूप से सेवा की है। बाकी सब तो थे किंतु सब सपोर्टिंग में थे। जो फ्रंट लाइन पे थे जो एक्चुअल डायरेक्ट सेवा करने में वो लाटू महाराज और शशि महाराज थे। शशि महाराज का ब्राह्मण शरीर था तो ठाकुर के लिए खाना वगैरह जो बनाना है वह सब वो किया करते थे और लाटू महाराज थे ठाकुर के मेथर अर्थात कि उनका वो जो शौच वगैरह साफ करने वाले विष्ठा वगैरह साफ करने वाले ठाकुर ने कहा ना कि मुझे लगता है कि अभी मैं शौच जाने के लिए बिस्तर पर से खड़ा नहीं हो पाऊंगा कैंसर की वजह से शरीर की जो परिस्थिति हुई थी उनकी आखिरी आखिरी दिनों की बात है कि अभी मैं बिस्तर में से खड़ा नहीं हो पाऊंगा शौच जाने के लिए ठाकुर ने ऐसा कहा साथ-साथ में ही लाटू ने कहा लाटू महाराज ने कहा महाशय आ तो आ अपनार मेथर महाशय मैं तो हूं आपका मेथ यहां पे आपका विष्ठा साफ करने के लिए शौच साफ करने के लिए तो लाटू महाराज और शशि महाराज दोनों ने संपूर्ण रूप से जी जान लगाकर के ठाकुर की सेवा की है उनके कैंसर के आखिरी दिनों में किंतु ठाकुर की महासमाधि के बाद में शशि महाराज महाराज जितने साकारवादी हो गए थे जितना पूजा पाठ वगैरह में गए थे लाटू महाराज उनका एग्जैक्ट डायमेट्रिकली ऑोजिट कोई साकारवाद नहीं कोई पूजा पाठ नहीं मां स्वयं मां जब वहां पर रहती है तो ऐसा नहीं कि चलो मां आई है तो प्रणाम करने को जाए मन में होगा तो एकाएक आ जाएंगे प्रणाम करने को और मन में नहीं आएगा तो जैसे ऐसे ही रहेंगे जैसे मां को पहचानते ही नहीं है सब मन का योग बाहर से कुछ नहीं तो एक संपूर्ण रूप से निराकारवादी हो गए थे। लाटू महाराज और शशि महाराज संपूर्ण रूप से साकारवादी हो गए थे। तो का वराह नगर मठ के दिनों की ही बात है। एक दिन लाटू महाराज को रात को भूख लगा। तो रात को खड़े हुए और वह जो तवा था तवा में थोड़ा सा चना जो होता है वो बना करके वो तवे को वहीं पर रख दिया। तो अभी होता क्या है? होना क्या चाहिए? उसी प्रॉब्लम क्या है कि उसी तवे में शशि महाराज सुबह को ठाकुर का बाल भोग तैयार करते थे। तो शशि महाराज तो अपने समय के अनुसार उठ गए। ठाकुर का बाल भोग तैयार करने को जाकर देखा तो तवा था झूठा था। लाटू महाराज ने बना करके रख दिया था। उसमें वो धोया नहीं था। शायद लाटू महाराज ने सोचा होगा सुबह को धोएंगे जो भी है। वह पूरा निराकारवादी उनका मन कहां से कहां जाता है कहना मुश्किल है। तो किंतु शशि महाराज ने जैसे ही देखा कि तवा अभी इस तरह से खाना बनाकर के पड़ा हुआ है। इसको धोया नहीं गया है। तो शशि महाराज इतने नाराज हो गए। ठाकुर की सेवा में विघ्न पड़ा है। ठाकुर को मैं समय के अनुसार बाल भोग प्रस्तुत करके नहीं दे पाऊंगा क्योंकि पहले तो इसको धोना पड़ेगा। फिर तो बाल भोग प्रस्तुत करना है वगैरह वगैरह शशि महाराज का टेंपर साकारवादी है ना टेंपर बहुत ज्यादा होता है ऐसा कभी-कभी निराकारवादियों का भी होता है तो शशि महाराज का टेंपर एकदम टॉप गियर पे चला गया और जो तो बोल के लाटू महाराज को गाली देने लगे तो लाटू महाराज भी सामने कहते हैं कि मैं मां को चिट्ठी लिखूंगा तुम इस तरह से मुझे डांटोगे तो तो देखिए कि एक और है संपूर्ण निराकारवादी किंतु जब जब भी इस तरह से शशि महाराज कुछ भी बोलेंगे तो सीधा उनका मन में पहला ही आएगा कि मां को चिट्ठी लिखूंगा। तो क्या है देखिए ये बोधे बोध कर्ष अर्थात कि मां है मेरी रक्षा करने के लिए कुछ भी प्रॉब्लम होगा तो मैं मां को चिट्ठी लिखूंगा। यही बात मन के भीतर में से आती है। ऐसा नहीं कि मैं यदि शशि महाराज गाली दे सकते हैं तो मैं क्यों नहीं दे सकता। वो ठाकुर के संतान है तो मैं भी ठाकुर का संतान हूं। उन्होंने ठाकुर की सेवा की तो मैंने भी की है तो मैं थोड़ी ना किसी से कमजोर हूं और लाटू महाराज तो थे पहलवान थे गिरीश घोष ठाकुर को गालागाली दे रहा है स्टार थिएटर में तो लाटू महाराज उसकी पिटाई करने के लिए तैयार हो गए थे मनुमोहन कहता है अरे तुम चुपचाप बैठो ठाकुर खुद खुद चुपचाप सुन रहे हैं गिरीश घोष की बातें तुम क्यों नाराज होकर जाते हो ठाकुर को यदि उसकी पिटाई ही करवानी है तुमको आदेश देंगे उसके बाद में तुम पीट देना उसको उसके बाद में तुमको रोकने वाला कोई नहीं किंतु जब तक ठाकुर नहीं कहते हैं तुम चुप बैठो। तो लाटू महाराज वो पहलवान थे। शशि महाराज पहलवान थे तो लाटू महाराज भी पहलवान थे। वो तो कम नहीं थे। किंतु ऐसा नहीं करके सामने झगड़ा नहीं करके मन में पहले ही बात आई। मैं मां को चिट्ठी लिखूंगा जय राम भाटी में। मां जय राम भाटी में थी उस समय मोस्ट प्रोबेबबली। तो देखिए कि बोधे बोध कर छ सिद्ध कौन है? ईश्वर है। यह पक्का उसको विश्वास हो जाता है और फिर दर्शन करे और उसके बाद में ईश्वर के दर्शन भी किए हैं। सिर्फ यह बातों की बातें नहीं है। कहानियां नहीं है। रामायण महाभारत में सुना है। पुराणों में सुना है। यह जो संत वगैरह जो है उनकी जीवनी में पड़ा है। ठाकुर के जीवन पढ़ा लीला प्रसंग में हमने देखा है कि मां सीता का ठाकुर को दर्शन होता है। जगदंबा का ठाकुर को दर्शन होता है। मंदिर में गला काटने को गए तो मां ने आकर के दर्शन दे दिया। मां काली ने आकर के भवतारिणी ने आकर के वह सब बातें की बातें नहीं है। सही-सही में ईश्वर का दर्शन किया है वह है सिद्ध तार पर सिद्धेर सिद्ध उसके बाद में सिद्धों का सिद्ध पहले प्रवर्तक जो कि लर्निंग लाइसेंस में चलता है। उसके बाद में साधक जिसने कि प्रैक्टिस करना शुरू कर दिया है। प्रार्थना करता है, ध्यान करता है, चिंतन करता है, नाम गुण कीर्तन करता है। उसके बाद में सिद्ध उनके बोधे बोध करता है अर्थात कि ईश्वर है पक्का भरोसा हो जाता है दर्शन करता है उसके बाद में आता है सिद्धों का सिद्ध जैमन चैतन्य देव अवस्था जैसे कि चैतन्य देव की अवस्था कखनो वात्सल्य कनो मधुर भाव कभी वात्सल्य भाव कभी मधुर भाव ईश्वर के साथ में एक भाव का संबंध बना करके फिर उस भाव में ईश्वर का सतत दर्शन करना। यह जब लीला प्रसंग का नेक्स्ट क्लास स्टार्ट होगा, उसमें हम यह गोपाल मां की बात थोड़ा सा देखेंगे। गोपाल की मां अर्थात कि अघोरमणि देवी की किस तरह से बाल गोपाल के रूप में ईश्वर की आराधना करती थी और किस तरह से बाल गोपाल का दर्शन होता था। यानी कि ईश्वर के साथ में एक भाव का संबंध बिठा देना है और फिर सतत उस भाव में मग्न होना है। इसको ठाकुर कहते हैं सिद्धों के सिद्ध जैसे कि चैतन्य देव और फिर इसी कथामृत में हमने दूसरी जगह पे भी पढ़ा है कि ठाकुर क्या चैतन्य देव का नाम करके अपनी अवस्थाओं की ओर इशारा कर रहे हैं। मास्टर महाशय ऐसा लिखते हैं। तो यहां पर भी सिद्धों के सिद्ध ठाकुर ने जब जैसे ही कहा कि जैसे चैतन्य देव साथ में ही हमको समझ लेना है कि वैसे ही ठाकुर ठाकुर भी है सिद्धों के सिद्ध कभी मधुर भाव कभी वात्सल्य भाव कभी सख्य भाव कभी दास्य भाव कभी शांत भाव विभिन्न भावों के द्वारा ईश्वर के साथ में सतत उनके साथ में संबंध बनाए रखना चीनी होते चाहिए ना मां चीनी खेते चाहिए मैं चीनी में शुगर शुगर होना नहीं चाहता मां शुगर खाना चाहता हूं। तो वह हो गए सिद्धों के सिद्ध। इसके बाद का जो है अभी नेक्स्ट क्लास में ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु। ओम