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ओम स्थापा का यॉट धर्मशाला सर्व धर्म स्वरूप अवतार वरिष्ठ आओ रामकृष्णायते नमः श्री राम कृष्णा कथा पिछली बार हमने देखा था की किस तरह से वह पदमालोचन नाम का लड़का उसने मंदिर का क्लीनिंग तो किया ही नहीं भीतर में जाकर के शंकर बजाने लगा और गांव वालों को इकट्ठा कर दिया सब दौड़े आए देखा मंदिर में नहीं भगवान की प्रतिष्ठा हुई नहीं और कुछ और सब खाने लगे की मंदिर तोर नाहक माधव शंकर उनके कोई करली गोल दी चमची के 11 जाना दीवानी सी दीक्षित था ना अर्थात मंदिर में तो तुम्हारे माता नहीं है तुमने शंकर मजा करके यह क्या गोलमाल रचा दी है तुम्हारे मंदिर में 11 चमगाद रहते हैं जो की दिन रात विष्ठा देते रहते हैं ऐसा करके फिर ठाकुर ने हमको समझाया की 11 चमगादड़ इसका अर्थ है 11 इंद्रिय और इंद्रियों के विषय जब तक हमारे हृदय में रहेंगे तब तक हम अपने मंदिर अपने हृदय मंदिर में ठाकुर की प्रतिष्ठा नहीं कर पाएंगे जैसे ही अपने रति मंदिर को क्लीन किया यह सब विश्वास से चमगादड़ से इंद्रियों के विषय से वैसे ही भगवान आकर के स्वयं प्रतिष्ठित हो जाएंगे तो ये सब हमने देखा साथ में ही देखा की मनी अर्थात की मास्टर महाशय सोच रहे हैं की ठाकुर तो बार-बार संसार वासनाओं का त्याग करने को बोल रहे हैं अभी उनकी बीबी जो है वो उनको कहती है की यदि आप मेरा ध्यान नहीं रखेंगे तो मैं आत्महत्या करूंगी तो वो जाकर के ठाकुर को कहते हैं की यदि पत्नी ऐसा कहे की आप मेरा ख्याल नहीं रखेंगे तो मैं आत्महत्या करूंगी तो मुझे क्या करना चाहिए तो ठाकुर ने क्या कहा अमन स्त्री त्याग कर बी इमोशंस 3 विद्या स्त्री ऐसी स्त्री का त्याग करना चाहिए क्योंकि ऐसी स्थिति है और साथ में हमने देखा विश्वेश्वरी का उदाहरण राजा महाराज के साथ में विवाह हुआ तथा एक संतान भी हुआ था राजा महाराजा तपस्या के लिए चले गए मतलब विद्यास्त्री का उदाहरण यह तो हो गई अविद्यास्त्री का उदाहरण विद्याश्री अर्थात की पति को अपने आध्यात्मिक उसकी जर्नी जो है आध्यात्मिक यात्रा जो है उसमें वो किस तरह से सहाय रूप होती है तो विश्वेश्वरी का उदाहरण फिर पता वो उसने अच्छा खाना बैंड कर दिया जमीन पे सोई थी बिस्तर पे भी नहीं सोई थी और फिर एक दिन वो तप एक रात को उसको सपना आया की राजा महाराज का देहांत हो गया है अभी यह तो एक सिंबॉलिक घटना है देहांत का क्या अर्थ है की राजा महाराज का यदि इस संसार के प्रति थोड़ा सा भी एक परसेंट भी लगाव था तो वह उसे दिन रात को मिट्टी गया होगा यह मेरा इंटरप्रिटेशन है अदर वाइस विश्वेश्वरी को इस तरह का सपना क्यों आता तो वन परसेंट भी जो लगाव होगा वह पूर्ण रूप से मिट्टी गया संपूर्ण रूप से ब्रह्म ज्ञान में वह स्थित हो गए होंगे संपूर्ण रूप से वह सन्यासी हो गए होंगे उसे रात को तो विश्वेश्वरी को सपना आया होगा की राजा महाराज का मृत्यु हो गया है तो फिर उसने क्या किया इस दिन दूसरे दिन उसने आत्महत्या कर ली अभी ये उन्हें दिस इसे एन ये सबको बताने की ये अपेक्षा की देखो की यह तो उसे समय की बात है की पत्नी पति को इस हद तक फॉलो करती थी आ आज के लिए यदि कहा जाए तो जैसे मैंने कहा था मेरी बहन भी अमेरिका है तो यदि मैं उसको यह सब चीज कैसे बताऊं की वो अमेरिका देश तो पता है किस तरह से वो भागवत का देश है लोग वहां जाते ही है पैसा कमाने के लिए और अच्छा संसार करने के लिए उन लोगों को हम किस तरह से यह सब अध्यात्म त्याग वैराग्य की शिक्षा दें किंतु हमको याद रखना है की स्वामी जी खुद वहां पर जाकर के वर्ल्ड पार्लियामेंट ऑफ रिलिजन में यही ठाकुर और उसे मां का वो सर्वोच्च आदर्श जो है वेदांत त्याग तपस्या वो शिखा करके आए थे मैन उसे संपूर्ण रूप से एक एलियन कलर जो है वहां पे भी ये सब बातें की जा शक्ति है किंतु हमको ये ख्याल रखना है की किस तरह से इस सब कहानियां को इस साबुदा हरण को आज के जमाने के अनुसार करके हमको इसको ग्रहण करना है आज की लड़कियों को आप यह नहीं का सकते की मां की तरह एक छोटे से नौबत में रहे और वहीं पे अपना पूरा जीवन निर्वाह करें आज तो उनको घर से बाहर जाना है घर का घर की जिम्मेवारी लेना है जो भी करनी है नौकरी भी करनी है यह चंद्रयान की ये जो फोटो वगैरा आते हैं आप देखिए की यह जो इसरो इसरो में कितनी वह साइंटिस्ट महिलाएं लोग सोचिए की जो साइंस और टेक्नोलॉजी का मां है कटिंग आगे जो इंस्टीट्यूशन कहा जाएगा इसरो वहां पर भी महिलाएं अपना योगदान दे रही है आकाश में स्पेसशिप भेज रही है चंद्रयान पे वो मल्लेंडर भेज रही है तो आज की महिलाएं इतनी फॉरवर्ड और मतलब पढ़ी-लिखी और इतनी मतलब समझदार है तो उनके लिए आज के जो आदर्श है वो कहानी भले चाहे पुरानी हो किंतु आदर्श कभी पुराने नहीं होते आदर्श हमेशा वो नए ही रहते हैं आदर्श हमेशा रिलेवेंट ही रहते हैं वही बात है की इस समय इस मॉडर्न युग के अनुसार हम इस आदर्श को किस तरह से ग्रहण करते हैं अभी जल्दी देखिए की उसे समय था की यह डायवोर्स का तो वह वहां पर मामला नहीं था वरना तो आप का सकते हैं की पति को यदि धर्म का रास्ता अपनाना है और पत्नी को अपना और कोई रास्ता तो वह देवर परफेक्टली फ्री तू डू सो मैन पत्नी को पति पर 100% भरोसा करके 100% रिले होकर के नहीं रहना है वो आज तो देखिए की आ व्हीकल में बैठकर के स्कूटी है कर है महिलाएं वो स्कूटी चलती है कर में बैठकर के बैंक में जाति है वह मार्केट में जाति है कोई भी चीज परचेज करनी है पूरा घर चलती है उसे समय ऐसा था की महिलाएं अपने पति के ऊपर में इस तरह से इस तरह से निर्भारशीला थी की जो पति संसार के ध्यान नहीं देगा तो पत्नी का तो बेचारी का क्या बड़ा हाल होगा वो हम सोच ही सकते हैं आज के और उसे जमाने के कलर में इतना बड़ा डिफरेंस है वह हमको समझना है इसलिए पत्नी ऐसा कहती है की आप मेरे पर स्थान नहीं देंगे तो मैं आत्महत्या करूंगी क्योंकि पति उसकी देखभाल नहीं करेगा तो बेचारी के पास में और कोई उपाय ही नहीं है इस तरह से ये पर्दा प्रथम वगैरा जो है समाज इतना निष्ठुर है की एक अकेली महिला को रहने के लिए कोई जगह ही नहीं है वो परिवार भी उसके उसके माता-पिता स्वयं उसको छोड़ देंगे इस तरह तार छोड़ देंगे इस तरह से वो बेचारी की हालात होती थी इसलिए उसको ऐसा कहना पड़ा मास्टर महाशय की पत्नी को की आप मेरा ध्यान नहीं रखेंगे तो मैं आत्महत्या करूंगी अर्थात देखिए की ठाकुर ने भले कहा अभिज्ञ स्त्री किंतु हमको एक आज की दृष्टि से मॉडर्न युग में हम जी रहे हैं आज की जो वालुज है आज के जो हमारी एक अंडरस्टैंडिंग है महिलाओं के जो अधिकार है वो जो हमने देखें हैं बड़े हैं और प्रैक्टिकल जो देख रहा है हमारे खुद के परिवारों की महिलाओं के जीवन में तो आज की दृष्टि से हमको एक सिंपति नजर से मास्टर महाशय की पत्नी को देखना होगा हमको सिर्फ उसको विलीफाई नहीं करना है की हां मास्टर महाशय ठाकुर के पास आना चाहते थे और उसमें वो रुकावट डालते थी हमको एक सिंपैथी की दृष्टि से उसको देखना है की क्यों वो ऐसा कर रही थी हां एक एक मां में एक वासना तो होती है की वो अपने पति को संसार में बंद के रखना चाहती है चलो वो तो एक है किंतु उसके अलावा एक सोशल फैक्टर भी है वो तो हो गया है पर्सनल फैक्टर किंतु एक हो गया सोशल फैक्टर सोशल फैक्टर यह है की पति की एप्सन में पत्नी का समाज में कोई स्थान नहीं था ना ही वो घर के बाहर जा शक्ति थी ना ही कुछ परचेज कर शक्ति थी ना ही वो अपने हाथ से अपने अकेले घर चला शक्ति थी तो वह जो स्थिति थी इसकी वजह से भी वह मजबूर होकर के निप हो करके उसको ऐसा करना पड़ा था तो वह एक सिंपैथी की दृष्टि हमारी हनी चाहिए की मशरूम उसे समय ऐसा होता की हां अभी आज के जमाने में ऐसा है मैंने तो देखा है हमारे कुछ कुछ वॉलिंटियर्स के फैमिली में की पति जो है दिन रात आश्रम में ही पड़े आ जैसे की आ एक प्राइवेट सेंटर का उदाहरण डन प्राइवेट सेंटर का अर्थ शायद आपको पता होगा की वहां पर रामकृष्ण मिशन का में सेंटर आश्रम तो नहीं होता जहां पर सन्यासी साधु लोग तो नहीं रहते किंतु जो गृहस्थ भक्ति लोग हैं वो बेलूर मठ की परमिशन से वहां पे एक एफिलिएटिड सेंटर बनाते हैं उसको उसका रजिस्ट्रेशन बेलूर मठ में होता है और साधु सन्यासी सीनरी स्वामी जी जब भी यात्रा करते हैं तो उसे सेंटर में जाते हैं रुकते हैं दीक्षा वगैरा भी होता है इसको प्राइवेट सेंटर कहते हैं रामकृष्ण मिशन में तो इस तरह के एक प्राइवेट सेंटर के एक भक्ति वो जब करते थे फिर शाम को जब वापस आएंगे तो सीधे वह सेंटर में चले आएंगे घर जाएंगे ही नहीं और 6:00 बजे ना की 5:00 बजे जैसे वापस आए तो सीधे सेंट अभी वो भी एक जमाना था की 925 का जब होता था आजकल का जमाना ही इस तरह का हो गया है आज से 25-30 साल पहले की बात की 6:00 बजे छूना है वो या 5:00 बजे छुट्टी हनी है तो छुट्टी हो गई अब घर भी ए गए शांति से अपने खाना पीना का करके आप किसी पड़ोसी के यहां या तो किसी संबंधी के यहां पे बैठने के लिए मिलने के लिए जा सकते थे आजकल तो मैं देखा हूं लोग 8 9:00 बजे तो घर आते हैं पता नहीं ये वर्किंग ओवर किस तरह के हो गए हैं वो 10:00 बजे जाएंगे तो सीधे रात को साथ आठ नो बजे लौटेंगे उसे समय खाना खाएंगे फिर वो टीवी मूवीज देखेंगे और फिर वो वहीं पे सो जाएंगे इस सोशल लाइफ भी चौपट हो गई है पर्सनल लाइफ भी चौपट हो गई है इस तरह से मतलब वर्किंग ओवर बाढ़ गए हैं किंतु उसे समय की बात है आज से 25 30 साल पहले की 728 दे जो होता था वर्किंग ओवर वह इतने फिक्स रहते थे 5:30 6:00 बजे तो घर ए गए और फिर सीधे घर नहीं जा कर के सीधे उसे प्राइवेट सेंटर में जाते थे जी देवोते के बड़े में मैं बता रहा हूं और वहीं तक और वहीं पर रहेंगे पूरा सेंटर संभालेंगे रात को 9:00 बजे घर जाएंगे और वो मुझे कहते थे की घर का जो भी कम है जो भी व्यवहार करना है संबंधियों के साथ में वो मेरी पत्नी ही करती है उसमें मुझे कोई वो ना ही मुझे वो इंवॉल्व करती क्योंकि पता है की वो बोलने से भी मैं काटने वत नहीं हूं तो ना ही मुझे इनवोल्ट करते हैं ना ही मुझे वो सब चीजों से परेशान करती हैं तो देखिए आज का समाज आज का युग इस तरह से इंडिपेंडेंस महिलाओं को सपोर्ट करता है और सिर्फ सपोर्ट ही नहीं इनकरेज करता है जैसे की अमेरिका में जाएंगे हमारे कितने सारे इंडियन वहां पर र रहे हैं मेरे कितने सारे रिलेटिव्स वहां पर हमें देख रहा हूं की जो एक दो महिला है वह पूरा समझ जब भी करती है घर भी चलती है उन बच्चों की भी संभल रखती है सब कुछ उसको करना है उसका हसबैंड भी वो अपनी जब करता है या अपना बिजनेस करता है तो आज का युग इस तरह से इंडिपेंडेंस को इनकरेज करता है इंडिपेंडेंस को फीवर करता है बोल करके यदि किसी का पति इस तरह से आध्यात्मिक रास्ते पे जाना चाहे वो चाहता है की मैं दिन रात आश्रम में ही पड़ा रहूंगा आश्रम का ही कम करूंगा वही आश्रम में ही आकर के मैं मंगल आरती संध्या आरती अटेंड करूंगा तो उसकी बीबी जो है उसको इस तरह से नहीं हो जाता की चारों और अंधेरा दिखने लगता है घर कौन चलाएगा घर का समाज कौन खरीद करेगा उसके वो जो रिलेटिव से उसको क्या कहेंगे वो मतलब इस तरह से आज स्थिति नहीं बन जाति जो की उसे समय थी तो मास्टर महाशय की पत्नी जब यह कहती है की आप मेरा ख्याल नहीं रखते हैं तो आप में आत्महत्या करूंगी तो उसकी एक संसार यह प्रति लालसा तो होगी एडरवाइज ठाकुर उनको अविद्या स्त्री नहीं कहते किंतु साथ में ही आज की दृष्टि से हमको मशरूम आशिक की बीबी को देखना है और एक सिंपति रखती है बाद के जीवन में वो नियमित रूप से मां के पास आया करते थे और मां जहां पे भी जाति थी वो भी साथ में रहती थी और वह वर्णन भी वो एक मैन थोड़ा सा हास्य जनक वर्णन उनके बड़े में मिलने पढ़ने को मिलता है की किसी ने स्मृति कथा लिखी मां की तो मां के साथ में आस-पास में जो महिलाएं रहती है उनका भी वर्णन किया तो उसमें वो लिखने हैं की वह मास्टर महाशय की स्त्री भी साथ में थी वो थोड़ी सी धूल गई थी अर्थात थी वो थोड़ी सी ओवरवेट थी तो ज्यादा कम नहीं कर पाती थी किंतु हमेशा साथ में बैठकर के मां के उपदेश सुनती थी और मां के साथ रहती थी तो ऐसा भी तो नहीं है की वह पुरी मतलब पुरी थी एडरवाइज तो मां के साथ में रहना मां का सॉन्ग करना और सिर्फ उसकी इच्छा से तो होने वाला नहीं है मां खुद जब उसको अपने साथ में रखेगी तभी तो वो र पाएगी तो मां तो सभी को तो जिसका मां मालिन है चरित्र खराब है ऐसे लोगों को तो मां अपने साथ में नहीं रहने देगी तो मां अपने साथ में रहने को अलाउ कर रही है तो उसका अर्थ ही यही है की उनके मां में भी वो एक साथ इच्छा धर्म के प्रति एक सहानुभूति साधन भजन चाहे नबी करती हो तो भी एक धार्मिक एक आ अनु आ क्या कहेंगे की डिसिप्लिन तो अवश्य उनके जीवन में होगा ही तभी तो मां उनको अपने साथ में रहने देती होगी तो ये आज की दृष्टि से यदि देखें तो हमको मास्टर महाशय की पत्नी को विलीफाई नहीं करना है एक सिंपैथी की दृष्टि से देखना है तो जो भी है यह किंतु हम उसे समय की बात पढ़ रहे हैं और उसे समय जैसे ही रामकृष्ण ठाकुर ने कहा की अमन श्री त्याग कर बी ऐश्वर्या पोते बड़ा दे आत्महत्या करू रजाई करो इस स्त्री का त्याग करो जो की ईश्वर के रास्ते में वो बड़ा कड़ी करती है वो चाहे आत्महत्या करें एन की चाहे जो कुछ भी करें अभी हां अभी आज की दृष्टि से हमको और भी एक चीज ख्याल रखती है की यदि पत्नी आत्महत्या करती है तो पति को अवश्य जय में जाना है क्योंकि ये जो महिलाओं की सुरक्षा के लिए जो कानून बनाए गए हैं उसमें इस तरह से है की ऑटोमेटिक महिला को फीवर करते हैं ये सब कानून और यदि कोई कंप्लेन करता है तो पुरुष की बात सुन बिना ही पहले तो उसको जय में बिठा देते हैं तो ये सब आज का युग अलग है वो युग अलग था और उसे युग की दृष्टि से हमको यह सब चीज देखनी है ठाकुर कहते हैं विद्याश्री जो ईश्वर के रास्ते में बड़ा देती है वह अविद्या स्त्री है गंभीर चिंता नमक एन हुई लेने बहुत ही गंभीर चिंता में मैड ना हो करके मनी अर्थात मास्टर महाशय दीवाल पे वो थोड़ा सा सपोर्ट लेकर के एक कोनी में जाकर के खड़े र गए नरेंद्र आदि भक्तगणों क्षण कल बक हो या रही लेने नरेंद्र और वह जो सब बाकी भक्ति लोग यह बात सुन रहे थे वो भी क्षण के लिए कुछ समय के लिए बक हो गए वो थोड़े से वो मतलब वो गंभीर हो गए क्या अरे ठाकुर ने इतनी बड़ी बात का दी और अच्छी रहे की मशरूम से किस तरह से वो मतलब चिंता निमग्न हो गए हैं तो बाकी सब भक्ति भी मुंह बैंड कर दे वरना नरेन का था की वो कुछ ना कुछ बोलना ही रहेगा तो नरेंद्र भी बेचारा थोड़ी क्षण के लिए मुंह बैंड हो गया नारायण का भी देखिए स्वामी जी जब अमेरिका जाकर के जो कुछ भी कहते हैं ना तो सिर्फ उनका थियोरेटिकल अंडरस्टैंडिंग नहीं है वो सिर्फ शास्त्र पढ़कर के हिस्ट्री की किताब पढ़ करके वो सिर्फ इस से स्वामी जी का नॉलेज नहीं आया स्वामी जी ने पूरा जगत संसार देखा है अभी वह हम कोई का सकता है स्वामी जी ने संसार किया नहीं स्वामी जी को क्या पता ये संसार में कितना कष्ट है वो तो मां खुद कहती है की किसी ने मां को कहा था की मां वह कलकत्ता जान के लिए कोई मां को बता रहा था जयरामबाती से तो मां की इच्छा नहीं थी कोई साधु ही बता रहा था शायद ऐसा तो मां की जान की इच्छा नहीं थी तो अभी उसको तो कुछ नहीं बोला अभी वह शायद बड़ा मां लगा किंतु मां किसी और किसी को बोलती है की और वो रहस्यासी उठ बोलने उठ लो बस बोलने बस लो मैन उठ खाने से उठ गया बेस्ट बैठो करने से बैठ गया वो कंधे पे अपने कंधे पे वो एक गमछा डाला और निकाल पड़ा और मेरा ऐसा थोड़ी ना है मुझे तो ये पूरा जगत पूरा संसार लेकर के मुझे सोचना है अर्थात की सन्यासी जो है वो मां के साथ में जो रहते थे ना ही पहने को ज्यादा एक दो से ज्यादा वस्त्र है ना ही कोई जवाबदारी है नहीं कोई फैमिली है नहीं कोई रिस्पांसिबिलिटी है उसको बोला की उठो तो वो उठ गया बैठो तो बैठ गया यहां पे जो तो वहां पर चला गया जान में क्या है कंधे पे कपड़ा दाल दिया वो दो-तीन वस्त्र एक झूला दाल दिया झूला दाल के पड़ा तो मां बोलती है वह तो लड़के के लिए ठीक है मैं तो पूरा संसार लेकर बैठी हूं ये राजू मां को यह पगली मानी यह सब कुछ मेरे लेक बैठी हूं मैं थोड़ी ना फैट करके यहां से वहां चला जाऊंगा कोई का सकता है स्वामी जी को की आपने तो संसार देखा नहीं संसार का कष्ट नहीं देखा कैसे आप फटपट करके सबको उपदेश देते हैं किंतु देखिए की जैसे कहा जाता है ना की मूर्ख व्यक्ति जो है वो गलती कर बार-बार गलती करने के बाद में भी कुछ सिक्का नहीं एक जो नॉर्मल परसों है वह एक बार गलती करके उसका जो परिणाम भुगतने के बाद में वो सिख जाता है की इस तरह की गलती फिर से नद और है और जो एक इंटेलिजेंट परसों है एक वॉइस परसों है वो दूसरों की गलती से और दूसरे जो परिणाम भगत रहे हैं वह देख करके वो सिख जाता है तो स्वामी जी का भी ऐसा था दूसरे लोगों की गलती या तो फिर दूसरे लोग जो परिणाम भगत रहे हैं वो देख कर के स्वामी जी सिख लेते थे तो यहां पर देखिए की नरेन भी कुछ क्षण के लिए मुंह बैंड करके वो देख रहा है गंभीर चिंता में वो नरेंद्र भी बेचारा वही गंभीर चिंता में डब गया है तो यह सब किंतु इसलिए नहीं की वो वो भी भीतर में चार्मिंग चल रहा है देख रहे हैं समझ रहे हैं की देखिए की संसार क्या होता है संसार का क्या परिणाम होता है ऑफ कोर्स यह उसे समय की बात है जैसे की कहा की आज का समय ही पूरा अलग है और हमको ये सब जितनी भी स्टोरी है ठाकुरमार स्वामी जी की आज के समय के अनुरूप इसको पढ़ना है आदर्श ले लेना है किंतु उसको ब्लाइंड्ली फॉलो नहीं करना ठाकुर तहादेव शाहिद अक्टूबर अभी जाकर के उन लोगों के साथ में थोड़ा सा धीमे स्वर से बात कर रहे हैं किंतु उनको पता है की मनी बेचारा मास्टर महाशय बेचारे वो बड़े टेंशन में खड़े हैं तो एकाएक वो उनके लोगों उनके पास से निकाल कर के मासूम महाशय के पास में ए गए और धीरे-धीरे खाने लगे किंतु जर ईश्वर अटारी को भक्ति अच्छे तरसाली बोसे ऐसे किंतु जिसकी ईश्वर के ऊपर में संपूर्ण एक निश्चित भक्ति है सब कुछ उसके वाश में ए जाता है क्या वाश में ए जाता है राजा दुष्ट लोग स्त्री यह सब उसके वाश में ए जाता है राजा भी उसके वाश में ए जाता है दुष्ट लोक भी और स्त्री भी देखिए की इस तरह के उदाहरण हमारे शास्त्रों में हमारे कहानियां में कितने सकते हैं जिसकी ईश्वर में निष्ठा है भक्ति है उसको फिर अपने को डिफेंड करने की जरूर नहीं है यदि यह सब कुछ राजा अर्थात की जिसके पास में पावर है दुष्ट लोग तो हम समझ ही सकते हैं जगत में कितने दुष्ट लोग होते थे ठाकुर के पिताजी स्वयं खुदीराम वो जी गांव में रहते थे तेरे गांव में वहां का जमींदार उसने का दिया जमींदार अर्थात राजा भी हो गया एक दृष्टि से दुष्ट भी हो गया खुदीराम को का दिया की आपको अदालत में झूठी जुबानी देनी होगी मेरी फीवर में तो खुदीराम तो सत्य का पालनपुर करते थे प्राण जाए पर वचन ना जाए इस तरह का उनका एक सत्य के प्रति एक निष्ठा उनकी यह थी साधना तो वो कैसे अदालत में जाकर के झूठी जवानी दे दे तो फिर उन्होंने गांव त्याग करके दूसरे गांव में जाना ज्यादा मुनासिब समझा तो यह जो अभी हम का सकते हैं की खुदीराम की तपस्या इतनी क्यों नहीं थी की फिर जमींदार वो तपस्या देखकर के ही मां गया है और फिर उनको गांव त्याग करने की जरूर ना पड़ी तो अभी इसका उत्तर हम इस तरह से दे सकते हैं की चलो जरा जरा कमर कुकर ए गए तो फिर वहीं पर मामला खत्म हो गया वो कमरपुकुर आकर के वो जमींदार उनको परेशान करने के लिए नहीं आया वरना ये जमींदार लोग तो कुछ भी कर सकते हैं अपने गांव छोड़कर के दूसरे गांव में चले गए तो क्या हुआ आप जा सकते तो वो नहीं ए सकता आपके पीछे ओ गड़बड़ करने के लिए आपको कष्ट देने के लिए तो वो गांव चेंज करके मामला खत्म हो गया इस तरह से भी हम इस बात को का सकते हैं तो जो भी है स्त्री स्त्री देखिए की ठाकुर ने कहा की ईश्वर के ऊपर में निष्ठा होगी तो स्त्री भी वाश में ए जाएगी तो वही हुआ अभी चाहे वो मास्टर महाशय की निष्ठा से वो उन्होंने भी मास्टर मास्टर स्त्री ने धर्म का रास्ता अपनाया या तो फिर उसके हृदय में खुद ने कुछ सुकृति होगी हमको पता नहीं किंतु जैसे हम विविध वर्णन में पाते हैं मां के साथ में रहती थी और मां के मां साथ में रहने देती थी इस बात का अर्थ है की उसके हृदय में कुछ ना कुछ निष्ठा भक्ति श्रद्धा अवश्य होंगे नीचे आंतरिक भक्ति थकले स्त्रियों कम में आपकी जोड़ी सही-सही ईश्वर के ऊपर में भक्ति है तो आपकी पत्नी भी ईश्वर के रास्ते पे जा शक्ति है नीचे भालू होने पर यदि आपका हृदय स्वच्छ निर्मल है तो ईश्वर की इच्छा से उसका हृदय भी स्वच्छ और निर्मल हो जाएगा मनीर चिंताग्नाइट झोल पड़ी लो मास्टर महाशय जो चिंता कर रहे थे मनी जो चिंता कर रहे थे उसमें आखिर में शीतल वो जल गिरा अर्थात अग्नि चिंता का अग्नि बुझ गया थे की आत्महत्या करते यदि वह करेगी तो करें मैं क्या कर सकता हूं हालांकि वह उसे समय की बात है यदि आज पत्नी आत्मा हत्या करती है तो पुलिस वाले आकर के सीधे उनको जय में दाल देते हैं फिर वह ठाकुर से भूल जाना पड़ता है मनी श्री राम कृष्णपति शिरमानी कहते हैं संसार ए बढ़ो भाई संसार में बड़ा भाई है श्री रामकृष्ण मनी और नरेंद्र के प्रति ताई चैतन्य देव बोले केले इसीलिए चैतन्य देव कहते थे सुन सुन नित्यानंद भाई संसारी जी बर कभु गति ना आए सुनो सुनो नित्यानंद भाई संसारी जीव की कभी गति नहीं है हालांकि यही चैतन्य देव उन्हें नित्यानंद को शादी करने को बोले थे तो अभी वो एक पूरा दूसरा एक प्रसंग है की किस तरह से वैष्णव धर्म जो है वह सन्यास को है नहीं करके ग्रह स्थाई श्रम में ही भक्ति का रास्ता अपना करके ईश्वर प्रताप करने के लिए इन करेज करता है हालांकि उनका यह जो संसारी जीव शब्द जो उसे किया है वह गृहस्त्व व्यक्ति के लिए नहीं जिसके मां में संसार के प्रति लालसा स्पृहा है उसको संसारी जीव कहते हैं है साधु ऐसे बहुत सारे ऐसे कोई होते साधु भी होते हैं की भले चाहे बाहर से गिर हुआ वस्त्र पहन लिया किंतु भीतर में उनके भीतर में व्यभिचार अभी भी र रहा है ठाकुर की एक कहानी है ना ठाकुर एक उदाहरण देते हैं की तीन साधु तीन लोग एक पेड़ के नीचे में बैठ करके ध्यान कर रहे थे तीन साधु थे और पास में से कुछ औरत है वहां से कुछ स्त्रियां वहां से निकली तो उनमें से एक साधु जो था उसने एक आंख खुला करके उनकी और देख लिया तो ठाकुर क्या कहते हैं की वह साधु पहले संसारी था संसार में डूबा हुआ था फिर आज साधु हुआ है तो उसके मां में से वो लालच लाल सा नहीं गई है वो अभी भीतर में है शायद साधना करके चली जाएगी किंतु आज तक तो है तो संसारी जीव यानी की सिर्फ गृहस्ट नहीं जो सन्यास का भी रास्ता अपनाते हैं किंतु हृदय के भीतर में एक कम वासना का एक बी राहत है भीतर में एक लालच रहती है एक्स्पृह रहती है भोग करने की उनको संसारी जीव कहते हैं नहीं की सन्यास और नहीं की व्यवस्था ठाकुर मनी को मनी प्रति एकांटे एक दिन बोलियां ठाकुर ने मनी को एक दिन कहा था ईश्वर से शुद्ध भक्ति जड़ी ना हो टहले कोनोगतिनाएं ईश्वर के प्रति शुद्ध भक्ति नहीं है तो कोई उपाय नहीं है कोई गति नहीं है क्यों यदि ईश्वर लाभ करें सेंसर ठेकेदार कोनो भायने कोई यदि ईश्वर लाभ करके संसार में राहत है तो उसको कोई भाई नहीं है देखिए की आज हमको लगता है की ठाकुर ऐसा क्यों का रहे हैं यदि ईश्वर लाभ करने के बाद में संसार करने की बड़ी तो तो हम बूढ़े हो जाएंगे बाद में तो संसार कैसे करेंगे किंतु देखिए की पहले के जमाने में तो पूरा वैदिक समाज ही इस तरह से घटित था की पहले 25 साल ब्रह्मचर्य आश्रम अर्थात की अब गुरु गुरु में रहकर के वेद वेदांत साधन भजन करेंगे साथ में ही विद्या भी अर्जन करेंगे जैसे की सुथार कम है या कोई भी कम है वो इस तरह बाद में फिर 25 साल की उम्र में संसार करेंगे तो अर्थात की ब्रह्मचर्य श्रम जो पहले 25 साल थे उसमें अनायास आपका वह संयम होता है अनायास ही ब्रह्मचर्य का पालनपुर होता है और आजकल के लड़के जैसे ये मैथमेटिक्स वगैरा सीखने हैं तो साथ-साथ में ही योग साध पर क्लिक करेंगे अनायासी ईश्वर प्रताप हो जाएगी बाद में फिर वह लोग संसार करेंगे 25 साल के बाद में तो वह तो पूरा वैदिक समाज का गठन ही इस तरह हुआ था आज का समाज में हम लोगों को यह धर्म है ये ईश्वर है इसकी भी एक जीवन में आवश्यकता है यह समझना के लिए 20-25 साल चले जाते हैं जैसा मेरे साथ में हुआ था फिर तो अभी कुछ जग करके कुछ नींद में से जागकर के हम सोचते हैं की अरे अभी क्या किया जाए तब कहानी ठाकुर की किताब हाथ में आई है तब कहानी जाकर की यह सब पढ़ना शुरू करते हैं तो हमारे लिए क्या है की 20-25 साल के बाद में ही तो हम धर्म अध्यात्म साधन भजन मंदिर में जाना यह सब शुरू करते हैं किंतु यदि सही सही रूप से समाज का गठन इस तरह से किया जाए की हमारी स्कूल में ही यह सब शिक्षा दी गई होती तो हम संसार शुरू करने से पहले ही हमारा एक स्ट्रांग स्पिरिचुअल फाउंडेशन वो तैयार हो चुका होता तभी यह सेकुलर सेकुलराइजेसन इस तरह से एक इस तरह का एक विचित्र शब्द एक विचित्र कॉन्सेप्ट हमारे भारत में प्रवेश कर गया है की स्कूलों में धर्म के बड़े में कुछ पटना नहीं है वरना ये हम लोग सेकुलर नहीं रहेंगे अरे भाई सेक्युलरिज्म तो हिंदू धर्म की ही दें है यदि हिंदू धर्म भारत में नहीं होता तो भारत सेकुलर होता ही नहीं कितने वो सब छोटे-छोटे सेट्स में छोटे-छोटे धर्म में वो विभाजित हो जाता हम लोगों का हृदय ही मैन हिंदू धर्म का फाउंडेशन ही उदा रहे वासुदेव कुटुंबकम जो हम अपने नेताओं से बार-बार सुनते हैं वो सिर्फ एक इलेक्शन का स्लोगन मंत्र नहीं है प्रत्येक भारतीय के प्रत्येक खून की प्रत्येक बिंदु की राग राग में वो बा रहा है की ये लिबरल होना सभी को अपने भाई बहन की तरह स्वीकार करना पूरे संसार के प्रति एक कल्याण की कामना रखना यह हम हिंदुओं के डीएनए में ही है है तो यह सेक्युलरिज्म एक हटा करके यदि यह हमारे गीता है उपनिषद है यदि मां लो की ठाकुर को नवी पर की चलो भाई एक सेट हो जाता है किंतु यह गीता और उपनिषद जैसे जो हमारे सनातन ग्रंथ है इनको यदि स्कूल में पढ़ते हैं तो बच्चों का भविष्य कितना उज्जवल हो जाता हो सकता है हम कल्पना करके सोच सकते हैं समझ सकते हैं यहां तक हमारी स्कूलों में भी हमको बड़ा डर करके ये सब सीखना पड़ता है की कहानी कोई नाराज ना हो जाए की भाई क्यों हिंदू धर्म के शिक्षा देते हो जैसे की हम लोग हम रामकृष्ण मिशन भी सेकुलर है इस तरह से हमको बिहेव करना पड़ता है इस तरह से इस हद तक हमारा समाज व्यवस्था इस तरह से हमारी पॉलीटिकल सिस्टम का यह क्या बोलेंगे की एक उन्नति हुई है के उजड़ी ईश्वर लाभ करें सांसारिक था के तार कोनो भाई नए कोई यदि ईश्वर लाभ करके संसार में राहत है तो उसको कोई भाई नहीं है निर्जाने माझे माझे साधन करें संसार थकले तार कोनो भाई नए निर्जन में बीच-बीच में साधन भजन करके कोई यदि शुद्ध भक्ति लाभ कर सकता है और बाद में संसार में र सकता है तो उसको कोई भाई नहीं है सोच लीजिए की यह ब्रह्मचर्य आश्रम जो पहले 25 साल अपने जीवन के हैं उसमें से तो मां लीजिए की पहले 8-10 साल तो हमको घर में ही रहना होगा मां और पिताजी के साथ में किंतु एक बार हमने गुरुकुल में जान की या तो फिर एक बार स्कूल में जान की शुरुआत की तो हमको तो पता है की आज के बच्चे स्कूल में कितना समय बिताते हैं दिन के मिनिमम 425 मिनिमम तो स्कूल होता है फिर यह कोचिंग क्लासेस वगैरा रहते हैं वगैरा अब नीचे की 78 वर्ष मिनिमम हम लोग किसी तरह की एजुकेशन इंस्टिट्यूट में आज के लड़के बिताते हैं तो ऐसा नहीं है की जो ठाकुर का रहा है वो कोई एकदम ही कोई डिफरेंट जगत की बात है या उसके लिए कोई दूसरी तरह का समाज का गठन करना पड़ेगा आज का जो समाज का गठन है इस में ही यदि हमारी स्कूलों में ये धर्म ग की शिक्षा दी जाए तो ठाकुर जो कुछ कहते हैं वो एकदम इंसटैंटली एक क्षण में वो सब ये सिद्ध हो जाएगा एक क्षण में वो प्रैक्टिकल हो जाएगा ये शक्ति अपने पास में है किंतु पता नहीं हमारी आंखों के ऊपर में हमारे मां के ऊपर में किस तरह का ये पर्दा गिरा हुआ है की धर्म और आध्यात्मिकता बोलने से ही हमको डर ग जाता है हमको व्यभिचार अनाचार देखने लगता है इस तरह से हमारा मां को ये बका दिया गया है न्यूज़पेपर में भी देखेंगे कोई साधु ये कोई गलत कम कर रहा है वो कोई धार्मिक करती है उसने यह कोई घोटाला कर दिया ऐसा दिन रात हमारे न्यूज़पेपर में चला आता है अभी वह लोग करते भी होंगे नहीं ये नहीं का रहा है की सभी लोग जो भी गेरुआ पहना हैं साधु है या तो धार्मिक व्यक्ति है सभी शुद्ध पवित्र निर्मल है ऐसा तो नहीं है इसमें भी आधे से ज्यादा तो ऐसे ही गड़बड़ वाले ही होंगे किंतु यदि किसी व्यक्ति के दुराचार के वजह से पूरे धर्म को एक दुराचार की एक निम्न दृष्टि से देखना या ये तो गलत बात हो गई धर्म के सिद्धांत वैसे ही पूरे है तो इस तरह से हो गया की किसी साइंटिस्ट ने एटम बम बना दिया तो हमने ये जो न्यूक्लियर फिजिक्स है इस को गली देना शुरू कर दिया न्यूक्लियर फिजिक्स न्यूक्लियर फिजिक्स है वो अपने आप में न्यूट्रल है उसका सदुपयोग करो जैसे की मरी है कैट स्कैन है वह सब ने उसको उसे करो ना की आप एटम बम बना ये तो मनुष्य के स्वभाव पर डिपेंडेंट है टोटल उसको आप उसका अनुष्ठान जीवन में करके अपना जीवन गठन करते हैं वह समाज के लिए आशीर्वाद रूप बनते हो यह भी आपके हाथ में है और यह सब का नाम लेकर के लोगों को थकते हो यह भी तो मनुष्य के ऊपर में है अभी ऐसे ठग को देखकर के योग विज्ञान को ही गली देना शुरू कर देना ये कौन सी बात हुई ये आजकल ऐसा ही हो रहा है इसीलिए स्कूल में जाकर के यह सब बोलने से पढ़ना से टीचर लोग बड़े नाराज हो जाते हैं बोलेंगे अरे भाई ये तो गवर्नमेंट स्कूल है यहां पे ये दो हिंदू धर्म वगैरा नहीं चला ये सब यहां पे मत बोलो हम लोगों का अनुभव के इसलिए का रहा है स्कूल में जाकर के कुछ बोलना है तो सब सेकुलर बातें करनी है मैंने चरित्र निर्माण की बातें करनी है में मेकिंग की बातें करनी है नेशन बिल्डिंग की बातें करनी है पैट्रियोटिज्म सीखना है वो आइडियलिज्म सीखना है किंतु धर्म योग ध्यान यह सब नहीं सीखना है किंतु शारीरिक स्वास्थ्य के लिए नहीं की ईश्वर प्रताप के लिए यह सब आज के समय में क्या गड़बड़ गड़बड़ चल रहा है समझ नहीं ए रहा चैतन्य देवेन संसारी भक्तों शीलो तारा संसार है तो अनशक्ति हुए तत्व चैतन्य देव के संसारी भक्ति भी थे वह संसार में सिर्फ संसार में है यह सब बताते थे या तो फिर नाम मंत्र से वो संसार में थे संसार में रहते थे अनासक्ति हो करके रहते थे भीतर में संसार के प्रति कोई तूफान नहीं रहे देखिए संसार और ग्रह यह दो अलग शब्द है संसार क्या है मेरे मां में कम वासनाओं के प्रति मेरी लालसा और गृहस्थ आश्रम अलग की आप घर बना करके बीबी बच्चों के साथ में माता जी पिताजी के साथ में रहते हैं अब घर में र सकते हैं आप बृहस्थ हो सकते हैं किंतु आप संसारी नहीं हो सकते ये दो चीजों में हमको डिफरेंस समझना है हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णा