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Sri Ramakrishna Kathamrita ·

Sri Ramakrishna Kathamrita 14 July 2023 पूर्व कथा श्री रामकृष्ण के प्रथम प्रेमोन्माद की कहानी 1858

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ओम स्थापकााय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः श्री राम कृष्ण कथा अमृत कल कल दो-तीन दिन से हम देख रहे कि किस तरह से श्री रामकृष्ण अपने उस समय के दिनों की बात कर रहे हैं। जबकि वो उनके पास में यह अंतरंग डिसाइपल आना शुरू नहीं हुए थे। उनके पास में समय भी था और समय रहते रहते यह कृष्ण किशोर बोलकर के एक है साधक तो उसके घर चले जाते थे और यदि उसको देखते थे कृष्ण किशोर को कि बेचारा बड़ा निराश होकर के बैठा है तो पूछ लेते थे कि भाई क्या हुआ? तो कृष्ण किशोर बोलता था कि वो टैक्स वाले आए थे। बोला कि आपके टैक्स देना होगा। वरना तो आपके घर के जो बर्तन वगैरह है हम लोग बेच के पैसा ले लेंगे और आपको भी साथ में ले जाकर के जेल में डाल देंगे। पैसा नहीं दिया है बोल के टैक्स नहीं दिया है गवर्नमेंट का तो। तो ये बात सुनकर के ठाकुर हंसते-हंसते बोलते थे तुम तो ख हो। ख है अर्थात कि ये अध्यात्म रामायण में ख अर्थात कि आकाशवत। मैं आकाशवत हूं। मैं यह शरीर नहीं, यह मन नहीं, बुद्धि नहीं, इंद्रिय नहीं। मैं यह जगत के साथ में मेरा कोई नाता नहीं। मैं तो इन सबके परे एक आत्मन हूं। ऐसा तो तुम सोचते हो। तुम ख हो तो फिर तुमको तो पकड़ कर के आकाश को तो पकड़ करके जेल में नहीं डाल सकते हैं। तुम्हारे शरीर को डाल देंगे। ऐसा करके ठाकुर हंसी मजाक करते थे। तो यह उस दिनों की बात है। फिर साथ में यह भी देखा कि ठाकुर कहते हैं मेरी जब यह अवस्था हुई तब सबको मैं ठीक-ठीक बात करता था। यह अवस्था अर्थात कि ईश्वर का आवेश इस तरह से उनके शरीर पे उनके मन पर होता कि वो जैसे कि वो अपने एक छोटे से एक गरीब ब्राह्मण है। एक छोटा सा शरीर है उनका। वो कालीवाड़ी में नौकरी करते हैं और यह बड़े लोग जो कि राजा वगैरह कोलकाता के वो उन लोगों का यदि उन लोगों को सत्य सत्य कथा बोल दे तो वे लोग तो हमारा नुकसान कर सकते हैं। ऐसा कोई ख्याल उनके मन में नहीं आता था। जब मां काली का उनके मन के ऊपर में आवेश होता था तो मां है और वो संतान है। यही एक उनके मन में रहता था और यह राजा टाजा जो लोग भी है उनको एकदम मुंह पर जाकर के बोल देते थे जो कि उनको कहना चाहिए। तो इस तरह से ठाकुर इस तरह से उस दिनों की बात कह रहे हैं। तो हम आगे पढ़ते हैं। शई उन्माद अवस्थाएं आर एक दिन बोरान नगर घाटे देखलाम वो उस उन्माद अवस्था की बात है। देखा कि एक दिन वराह नगर के घाट पे जहां पे गंगा बह रही है। गंगा के घाट पर देखा जय मुखजे जो और छे किंतु अन्न मनोष्क जय मुखजे नाम का एक साधक एक एक व्यक्ति वहां पर बैठकर के जप कर रहा है किंतु जप करने में उसका मन नहीं है। अन्य मनसक अर्थात कि उसका मन कहीं दूसरी जगह पे है। तो खोन काछेगी दुई चाबड़ दिलाम। तब सामने उसके सामने जाकर के चेहरे पर दो तमाचे झाड़ दिए। अभी यह सुनकर के भी हमको आश्चर्य होगा कि यदि कोई गंगा के घाट पर बेचारा बैठकर के सुबह-सुबह जप कर रहा है और वो कहीं पर उसकी उसका मन और किसी दिशा में चला गया होगा। पैसों का कुछ प्रॉब्लम है ना कि घर में कुछ प्रॉब्लम है। ना कि ऐसी ही कोई बात वो सोच रहा होगा। सडनली देखा ठाकुर सामने आ गए हैं और दो वो चड मार दी है उसके मुंह पे तो हम लोग यदि हमारे साथ में ऐसा होता तो हम कैसे चौंक जाते तो वैसे ही हम अनुमान करके समझ सकते हैं कि जय मुख के साथ में ये जय मुखर्जी नाम का जो व्यक्ति है उसके साथ में कैसा हुआ होगा और देखिए हमको यह पढ़कर के आश्चर्य भी होता है शायद हंसी भी आएगी किंतु हमको यह ख्याल में रखना है कि अवतार जब आते है तो जैसे उत्तम वैद्य की तरह अवतार है। हमने यह बात पहले भी डिस्कस की थी। एक सामान्य वैद्य है तो वह सिर्फ आपको दवाई देकर चला जाएगा। एक उससे अच्छा तरीके का वैद्य है मध्यम वैद्य तो वो समझाने का प्रयत्न करेगा। अरे बेटा खा लो दवाई भले चाहे तुमको यह कड़वा लगे भले ही चाहे उसका टेस्ट बीटर हो किंतु दवाई खाने से तुम्हारा उपकार होगा। और उत्तम वैद्य क्या करता है? और यदि पेशेंट जो है दर्दी दवाई नहीं खाता तो उसको धक्का मार के जमीन पर गिरा देते हैं। जबरदस्ती मुंह खोल करके जबरदस्ती दवाई उसके मुंह में डाल देते हैं। तो यह उत्तम वैद्य का लक्षण है। क्योंकि वैद्य को पता है कि जो यह भवर रोग जो हुआ है दर्दी को उसको यह दवाई खाने से भले ही चाहे उसके मन में वो दवाई का टेस्ट भले ही चाहे कितना ही बीटर हो कितना ही कड़वा हो किंतु यह दवाई खाने से ही उसका कल्याण होने वाला है। वरना उसका रोग जो है उसको मार उसका जी उसका प्राण हर लेगा। उसका जीवन ले लेगा। इस तरह का भयावह रोग उसको हुआ है और यदि प्राण चले भी जाए उसमें कोई दिक्कत नहीं है। चलो ये शरीर को रख के क्या करना है ऐसा सोचने वाले लोग होते हैं। किंतु जब शरीर रह जाता है और फिर हमको यह दर्द होने लगता है। जैसे कि कैंसर हो जाता है ना कि यह फिर यह जो आजकल की क्या-क्या सब हार्ट डिसीज है, डायबिटीज है वो सब कुछ एक बार यदि हो जाता है वो कुछ-कुछ दिनों पे हमको डायलिसिस करना पड़ता है। तब पता चलता है इतना कष्ट हो रहा है शरीर में। ये लाइफस्टाइल डिसीज जब घुस जाते हैं तो शरीर जाता भी नहीं है और हम ठीक से जी भी नहीं पाते। मन सब समय उद्विग्न रहता है। शरीर में सब समय वह पेन वगैरह रहता है। इससे बेटर है शरीर चला जाए। तो यह डॉक्टर भी सोच कर के वो उत्तम वैद्य कहता है कि यह भले ही चाहे इसका कड़वा टेस्ट हो, बिटर टेस्ट हो यह दवाई ले लो तुम। तो ठाकुर भी इस तरह से उत्तम वैद्य थे। उत्तम आचार्य, उत्तम गुरु थे। जय मुख वहां पर बैठ के जप कर रहा है। वो ठाकुर के पास गया भी नहीं है। ठाकुर को कुछ पूछा भी नहीं है उसने कि हां मुझे किस तरह से साधना करनी चाहिए। ऑफ कोर्स उसका ठाकुर के साथ में कुछ तो संबंध होगा। दक्षिणेश्वर में गया होगा। अध्यात्म साधना के बारे में बात हुई होगी। वरना तो क्यों ठाकुर जाकर के उसको माने शिक्षा देने को जाते तो बात उस समय जब हुई होगी तब हुई होगी। अब ये बेचारा बढ़िया मजे से गंगा के किनारे बैठकर के वो गंगा की वो जो दृश्य जो है सुहाना दृश्य गंगा नदी ऊपर आकाश में बादल ये पंखियों की कलर ये फिर ये सब वो सोचता होगा इस तरह से सुहाने वो वातावरण में बैठकर के वो जप करते-करते कहीं पे मन चला गया देखा वो सटाक करके चेहरे पे दो चापड़ पड़ गई उसको तो अभी जिसके साथ में इस तरह का एक्सपीरियंस हुआ होगा वो 10 बार सोचेगा जप करते-करते कहीं पे मन को और किसी जगह पर ले जाने को। उसका मन सब समय भयभीत रहेगा कि अरे जप में ध्यान लगाओ वरना फिर ठाकुर आ जाएंगे फिर दो छापड़ मार देंगे। वो जैसे वो हम पिक्चर में देखते हैं ना वो मां अपने बच्चे को कहती है कि देखो वो चिल्लाना मत रोना मत वरना गब्बर आ जाएगा। तो डाकू का नाम देकर के बच्चे को डराती है। तो वैसे ही ठाकुर ने जिसको भी यह चांटा मारा होगा उसका मन सब समय ठाकुर के डर में रहता होगा। यह सात्विक डर है। वो तामसिक डर है। यह सात्विक डर है। साधना में हमको आगे ले जाता है। इस तरह का डर है। वह वाला डर हमको जीवन में और भी निष्प्राण निष्क्रिय बनाता है। भीतु बना देता है। तो वो जो तामसिक डर को हमको छोड़ देना है और सात्विक डर को अपनाना है। वो डाकू का डर छोड़कर के ठाकुर का डर अपनाना है। जिससे कि हम जब जप करें तो हमको भी मन में यह रहना चाहिए कि ठाकुर आकर के दो चापड़ मार देंगे तो क्या होगा? यदि मेरा मन जप छोड़ के और 10 दिशा में दौड़ने लगता है। यदि सोचने लगता है कि मुझे आज ऑफिस में जाकर क्या करना है? आज मुझे वो जहां पे वो उसके साथ में मेरा झगड़ा हो गया था तो मैं उसको जाकर के और जोरों से कुछ बोल दूंगा और जाकर के उसके मुंह पर कुछ सुना दूंगा या तो फिर पैसे का कुछ मामला है। ये सब जप करने के समय यह सब नहीं रहना चाहिए। फिर दिन भर जो चाहे सो करो। ऐसा एक सात्विक डर ठाकुर का अपने मन में बिठा देना है। इसके लिए ठाकुर इसलिए इस इसीलिए तो ठाकुर जमीन पर पृथ्वी पर अवतरित हुए हैं। वरना तो ये सब रामायण, भागवत, महाभारत, उपनिषद ये सब जगह पे तो ये जितने भी स्पिरिचुअल टीचिंग्स है वो तो ऑलरेडी लिखे गए हैं। कथामृत में नया तो कुछ नहीं है। नया जो है वो ठाकुर का आशीर्वाद ठाकुर का प्रेजेंस जो कि इस पुराने तत्वज्ञान को पुराना नहीं कह सकते हैं कहेंगे सनातन तत्वज्ञान को हमारी नजर के सामने हमारे चेहरे के सामने पुनर्जीवित पुनः प्रज्वलित करके हमारे सामने प्रस्तुत करते हैं। तो ठाकुर का आगमन ही इसलिए लिए हुआ है। आप बोलेंगे कि लीला प्रसंग है तीन खंड में शरद महाराज ने स्वामी शारदानंद जी ने ठाकुर की जीवनी लिखी। लीला प्रसंग तीन बड़े-बड़े विभाग में खंड में वॉल्यूम में तो इतना तीन वॉल्यूम पढ़ते-पढ़ते तो मेरा कितना टाइम चला जाएगा समझ में भी नहीं आ रहा ठाकुर का फिलॉसोफी शरद महाराज ने बहुत ही डिफिकल्ट लैंग्वेज यूज़ की है। किस तरह से हम ठाकुर को समझेंगे। तो ठाकुर को यदि समझना है एक ही सेंटेंस में सहज एकदम सहज सरल रूप से तो ये जो एक सेंटेंस है। ठाकुर ने कहा है कि वराह नगर घाट पर जा रहा था। देखा जय मुख जप कर रहा है किंतु उसका मन कहीं दूसरी दिशा में भटक रहा है। जाकर के मैंने उसके चेहरे पर दो तमाचे झाड़ दिए। यह जो ठाकुर अपने बारे में दो तीन सेंटेंस कहते हैं, इसमें ठाकुर का पूरा लाइफ आ जाता है कि उत्तम वैद्य के रूप में पृथ्वी पर आकर के हमारा मन जो 10 दिशा में दौड़ता है तो पहले तो प्रेम भक्ति और साधना का वो पूरा आलेखन करके प्रेम से एक तो हमको आकर्षित करते हैं। और यदि हमारा मन एक बार प्रेम से जैसे कि कैरोट एंड स्टिक दो चीजें होती है। एक तो जब हम स्कूल में जाते हैं, अच्छा टीचर क्या करता है? जब बच्चा पढ़ाई करने में उसका मन लग जाता है, अच्छे मार्क्स आते हैं या तो फिर किसी प्रश्न का वो उत्तर दे देता है वो तो उसका उसको प्रज़ करते हैं। उसकी प्रशंसा करते हैं। और यही लड़का जब उसका मन यदि अभी जैसे मैं है मैं ब्रह्मचारियों के क्लास ले रहा हूं। कभी-कभी क्या होगा कि मैं कोई प्रश्न करूंगा कोई ब्रह्मचारी उसका फट करके उत्तर दे देगा तो मैं कहूंगा अरे वाह बहुत अच्छा बहुत सुंदर बहुत अच्छा तुम पढ़ाई कर रहे हो और जो अपने माताजी पिताजी को छोड़कर के यहां पर आए हो तो तुम्हारा जीवन सार्थक हो जाएगा इस तरह से पढ़ाई करने में और यदि देखता हूं कि उसका मन फिर और किसी दिशा में भटक रहा है वो किताब उसके सामने खुली है मैं सामने में बैठकर के बोल रहा हूं किंतु उसकी नजर खिड़की से बाहर में कहीं और किसी जगह पर जा रही है तो फिर उसको मुझे डांटना भी पड़ेगा। तो ध्यान दो यहां पे वरना तो फिर क्या करोगे? साधु होने को आए हो। यह जीवन तो कोई इतना सरल नहीं है। और ऐसी बात नहीं है कि मैं जो कहता हूं इसका कोईेंस है। किंतु जो कुछ भी करते हैं जीवन में उसको मन लगा के करना चाहिए। ये एक जनरल प्रिंसिपल होना चाहिए। बात यह नहीं है कि कोई टीचर अच्छा है, कोई टीचर बुरा है तो बुरे टीचर को हम इग्नोर करें। अच्छे टीचर की बात सुने। कि यह एटीट्यूड जो है वह पूरा फंडामेंटली गलत है। स्पिरिचुअल लाइफ में। स्पिरिचुअल लाइफ का एटीट्यूड है। छोटी सी छोटी भी जो काम करें हम छोटा सा छोटा भी जो हम कार्य करें उसमें भी हमको संपूर्ण रूप से मन को लगाना है। स्वामी जी कहते हैं ना कि बड़े-बड़े काम जो होता है वो तो कोई भी कर देता है सक्सेसफुली क्योंकि लोगों की नजर में रहते हैं। लोगों की प्रशंसा प्राप्त होती है और बहुत सारा समय तो हम प्रशंसा प्राप्त करने के लिए बड़ा-बड़ा काम कर देते हैं। किंतु लोगों की नजर के अंतराल में जहां पे लोग उपस्थित नहीं है हमारी प्रशंसा करने के लिए हमारी वाहवाह करने के लिए कि वह बहुत अच्छा काम कर रहे हो ऐसा कहने के लिए जब लोग उपस्थित नहीं होते हैं तब छुप के जो काम होता है सीक्रेटली जो काम होता है सॉलिटरी सॉलिट्यूड में जो काम होता है एकांत में जो कार्य होता है वो यदि हम ठीक-ठीक मन को लगा के एकदम संपूर्ण रूप से करते हैं तो वह असली कर्म योग की पहचान है। हमारे कर्म में सक्सेस कर्म योग में सक्सेस की पहचान वो है। तो इसीलिए बात यह नहीं है कि मैं जब क्लास ले रहा हूं तो ब्रह्मचारियों को कहता हूं कि तुमको मेरे पे मैं जो कहता हूं उसको ध्यान से सुनो। ऐसा नहीं है कि मैं जो कह रहा हूं उसका कोईेंस है। किंतु एज ए ब्रह्मचारी तुम लोग जो करते हो सभी चीजों में तुमको मन लगा के कार्य करना चाहिए। तभी तुम लोगों का कर्म योग सक्सेसफुल होगा। तो वैसे ही यह ठाकुर जो यहां पे एक सेंटेंस में ठाकुर की पूरी बायोग्राफी हमारे सामने आ गई। एक प्रज़ एंड पनिशमेंट एक तो प्रशंसा और डांट दोनों जरूरी है आध्यात्मिक जीवन में आगे बढ़ने के लिए। आप सिर्फ प्रशंसा देते रहेंगे। डांटेंगे नहीं तो मन इस तरह का बंदर जैसा है। स्वामी जी कहते हैं ना कि मनुष्य का मन कैसा है? पहले ही बंदर है। फिर उसने नशा कर लिया। फिर उसको वो जो बीच ही काट लिया। फिर उसके सर पर भूत चढ़ गया। अभी बंदर के वो वो बिछी भी काटेगा उसके सर पर भूत भी चढ़ेगा और फिर नशा भी करेगा तो किस तरह की पागलामी वो किस तरह का बंदरपन बंदर वो ऐसा बंदर की तरह कार्य करेगा उछल कूद करेगा वो हम सोच सकते हैं तो हमारा मन भी ऐसा है तो सिर्फ प्रशंसा से काम नहीं होगा सिर्फ डांटने से काम नहीं होगा सिर्फ डांटते रहेंगे तो फिर वो हमारे से विमुख हो जाएगा हमारे ऊपर में एक उसका एक अश्रद्धा का तत्ल्य का भाव आ जाएगा इसके लिए प्रशंसा और डांट दोनों की जरूरत है। ठाकुर जब देखिए कि मास्टर महाशय पहली बार गए थे तो ठाकुर का नृत्य ठाकुर का भजन ठाकुर का गान ठाकुर की यह जो आध्यात्मिक चर्चा बातें समाधि ये सब देखकर के कितने मुग्ध हो गए थे और फिर क्या कहते हैं कि जैसे कि सुखदेव स्वयं बैठकर के भागवत सुना रहे हो और फिर कहते हैं दूसरी तीसरी बार आए थे तब ठाकुर ने क्या कहा था कि जैसे एक मोर को एक पिकॉक को 4:00 बजे अफी अफीम खिला दिया तो दूसरे दिन एग्जजेक्टली 4:00 बजे वो अफीम खाने के लिए आ गया। क्यों? कि अफीम का हैबिट हो चुका है उसको। तो ठाकुर की बातें, ठाकुर का भजन, ठाकुर का कीर्तन, ठाकुर का व्यक्तित्व, उनकी समाधि यह सबसे मन मोहित हो गया है। और बार-बार उनके पास आने की इच्छा होती है। किंतु यही मास्टर महाशय को ठाकुर डांट भी देते थे। वो छाता दक्षिण वो पंचवटी में छोड़ के आए थे। पंचवटी गए थे। छाता वहां पर छोड़ दिया। फिर सब लोग उनके ठाकुर के कमरे में वापस आ गए। तो ठाकुर ने पूछा मास्टर महाशय को छाता कहां गया? तो मास्टर महाशय बेचारे लज्जित होकर के बोलते हैं कि छाता तो मैंने पंचवटी में छोड़ के आया हूं। तो ठाकुर कहते हैं मेरे शरीर पर वस्त्र तक नहीं रहते। मैं जब भाव समाधि में चला जाता हूं। ईश्वर का नाम लेता हूं। अपनी धोती को नहीं संभाल सकता। दिगंबर हो जाता हूं। फिर भी मैं छाता कभी नहीं भूलता। और तुम जो हो संसारी लोग तुम्हारा तो मन ये सब विषय युग की चीजों के ऊपर में होना चाहिए। पैसा वगैरह कपड़े वगैरह लज्जा घृणा भय ये सब पाशों से तो तुम बंधे हो तो तुम तुम ये सब तुम चिंता कर रहे हो छाता भूल जाओगे कैसा चलेगा तो ऐसा ठाकुर डांटते भी थे वो प्रेमानंद महाराज को बाबूराम महाराज को भेजा बाजार में कुछ लाने के लिए कुछ बर्तन वगैरह याद नहीं है कौन सी चीज थी किंतु कुछ लाने के लिए भेजा देखा कि उसमें कुछ गड़बड़ था उस जो या तो बर्तन था तो उसमें कुछ होल था ना कि कुछ जो भी है तो ठाकुर पूछते पूछते हैं कि अरे तुमने यह ठीक उसकी जांच करके यह चीज नहीं खरीदी। तो बाबूराम महाराज कहते हैं मैंने वो दुकान वाले को पूछा तो दुकान वाले ने बड़ी प्रशंसा करके यह चीज मुझे दे दी। तो ठाकुर बोलते हैं अरे मूर्ख दुकान वाले तो उसको बेचने के लिए बैठा है अपनी चीजों को। वो थोड़ी ना सामने से बोलेगा यह चीज खराब है। यह अच्छी है। ऐसा बोलेगा तो उसका तो काम बंद हो जाएगा। तुम्हारा ही काम है कि उसको ठीक-ठीक जांच पड़ताल करके कोई भी चीज खरीदो तो ठीक-ठीक से जांच पड़ताल करो। उसके बाद में ठाकुर क्या बोलते हैं? भक्त हो भी बोका हो भी के भक्त होना है मूर्ख नहीं होना है तो ये ठाकुर डांटते भी थे और साथसा में प्रेम भी करते थे तो ये डांटने का एक्सट्रीम माने ये जो एक एक्सट्रीम उदाहरण मुंह पे दो तमाचे मार देना स्वामी जी के साथ में ऐसा हुआ है स्वामी जी बीच एक स्वामी जी जब भी जाते हैं हम लोग देखते हैं यहां पे इसी चैप्टर में हमने आगे देखा कि वो मास्टर महाशय लिखते हैं कि वो जमीन पर बिछाना लगा दिया है नरेंद्र भक्त लोग विश्राम करेंगे। विशेषतः नरेंद्र विश्राम करेगा। यानी वो बार-बार जो भी करेंगे वो विशेषतः नरेंद्र करेगा। फिर साथ-साथ में बाकी भक्त लोग भी करेंगे। तो नरेंद्र को ठाकुर इतना प्रेम करते हैं। इतना स्नेह करते हैं। जब भी नरेंद्र आएगा तो साथ में 10 लोग बैठे हैं किंतु नरेंद्र के सामने ही देखकर के बातें करते रहेंगे। एक दिन तो यहां तक हो गया कि नरेंद्र को बोलना पड़ा महाशय आप इन लोगों के सामने देखकर के भी बात किया कीजिए। वो खुद बेचारा थोड़ा सा लज्जित हो गया कि ठाकुर उसी को उसी के ऊपर में पूरा अटेंशन दे रहा है। तो यही नरेंद्र एक बार ठाकुर ने क्या मतलब उसको टेस्ट करने के लिए किया कि जब नरेंद्र आता है तो उसके सामने देखते नहीं थे। उसके साथ बात करने तो दूर की बात है। देखते भी नहीं थे उसके सामने। वो नरेंद्र आएगा बैठेगा और ठाकुर की बातें सुनेगा। देखता है कि ठाकुर उसके साथ में बात ही नहीं कर रहा है। वो है ऐसा कोई मतलब उसका कोई इंडिकेशन ही नहीं दे रहा है। तो क्या करेगा? खड़ा होकर के बाहर में वह वरांडा में हाजरा महाशय बैठते थे। उसके साथ में बैठकर के गप लगाएगा। थोड़ी देर के बाद में प्रणाम करके फिर विदाई ले लेगा। प्रणाम भी करेगा तो ठाकुर उसके सामने नहीं देखेंगे। दूसरे दिन फिर से आएगा। फिर से प्रणाम करेगा। बैठेगा कमरे में देखा ठाकुर फिर भी उसको इग्नोर कर रहा है। तो थोड़ी देर के बाद में खड़ा होकर हाजरा के साथ में गप लगाया। कालीवाड़ी में इधर-उधर घुमा फिर घर चला गया। तो ऐसा कुछ दिनों के बाद होने कुछ दिनों तक हुआ। उसके बाद जब नरेंद्र एक दिन आया ठाकुर ने उसको पूछा कि अरे मैं तो तुमको कंप्लीटली इग्नोर कर रहा हूं। किंतु फिर भी तुम बार-बार क्यों आते हो? तो नरेंद्र क्या कहता है कि आपकी बातें सुनने के लिए आता हूं। और मतलब ये डजंट मैटर कि आप यदि मेरे साथ बात करें ना करें। आप आप तो उपस्थित है। आप तो बातें तो करते हैं। मैं आपकी बात सुनूंगा। कालीवाड़ी इतना सुंदर जगह है। मुझे अच्छा लगता है यहां पे आने के लिए। इसलिए मैं आता हूं। तब ठाकुर ने उसको आलिंगन कर लिया और कहा कि देखो असली भक्त ऐसा होना चाहिए कि यदि ईश्वर उसको इग्नोर भी करते हैं। लगता है कि भव समुद्र में भवसागर में तैरते तैरते बहुत बड़ा तूफान आ गया है। मेरी नौका जो है वह डगमग कर रही है। कब डूब जाएगी कुछ ठीक नहीं है। जीवन में इतना बड़ा कष्ट आ गया है। वो अभी हमारे साथ में क्या होगा? चारों ओर अंधेरा दिख रहा है। मेरा कोई तारणहार नहीं है। ऐसी अवस्था हो जाएगी। किंतु सोचना है कि उस समय ईश्वर हमारी परीक्षा कर रहे हैं। वैसे सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा है। हम ठाकुर ठाकुर करते हैं। इतना बड़ा कष्ट आ गया तब भी ठाकुर का नाम लेते रहेंगे तब ठाकुर को पता चलेगा कि हम उनके असली भक्त हैं। अभी ऐसा नहीं है कि यदि हम परीक्षा में पास होंगे तभी ही ठाकुर हमारा कल्याण करेंगे। ठाकुर तो निस्वार्थ अहेतुक कृपा सिंधु स्वामी जी ने क्या कहा है? जिसको कोई स्वार्थ नहीं है। इस तरह के निस्वार्थ कृपा सिंधु कृपा के महासागर है। तो हम परीक्षा में पास हो ना हो। हमारा तो कल्याण होने ही वाला है। किंतु हमारी ओर से हमको तो सध्या रहा हो कि हां भाई मैं मैं अपने सामने किस तरह से देखूंगा। मुझे तो एक अपने मन में मेरे ऊपर में एक सेल्फ रिस्पेक्ट एक होना चाहिए कि जब मुझे कुछ मिलता था तो मैं उनके साथ में बात करता था। नहीं मिलता है तो मैंने उनको छोड़ दिया है। तो फिर मेरे मन में एक ऐसा हो जाएगा कि मैं किस तरह का लोभी, स्वार्थी और लालची हूं। तो मेरे मन में भी तो मेरे खुद के प्रति एक सेल्फ रिस्पेक्ट चाहिए कि हां ठाकुर के साथ में मेरा जप ध्यान करते-करते अच्छा अनुभव होता था तो मैं जप ध्यान करता था। आज मैं जप ध्यान करते-करते बिल्कुल रुखा सूखा लग रहा है। मन नहीं बैठ रहा है। फिर भी जब नियम के है तो करना ही है। तो यदि ईश्वर ठाकुर की कृपा नहीं भी होती है तब भी मैं जप ध्यान कर रहा हूं। तो वो मेरे मन में मेरे खुद के प्रति एक सेल्फ रिस्पेक्ट जगाएगा कि हां मैंने जो नियम लिया है मैंने जो प्रण लिया है उसको मैं वफादार हूं। फिर चाहे ठाकुर मेरे पे कृपा करे ना करे मैंने अपनी ओर से मेरा कर्म जो है मेरी ड्यूटी जो है मेरी फर्ज जो है वह मैंने निभाई है। तो इसके लिए तो ये ठाकुर पनिश किस तरह से करते हैं उसका यह एक एक्सट्रीम उदाहरण है। दूसरा भी उदाहरण सेम है। ठाकुर कहते हैं एक दिन रासमणि ठाकुर वाड़ी ते एसएच है। एक दिन रासमणि ठाकुरवाड़ी में आई। रानी रासमणि यानी कि यह दक्षिणेश्वर काली मंदिर की जिसने निर्माण किया है वही रानी रासमणि काली घरे एलो काली घर में आई पूजा समय आस्तो आर दुई एकटा गान गायते बोलतो जब ठाकुर उस समय जिस समय ठाकुर पूजा करते थे उस समय वह आती थी और ठाकुर को एक दो भजन करने के लिए गान करने के लिए मां काली का कहती थी गान गाछी देखीजे अन्न मनुष्य को होए फूल बाय ठाकुर कहते हैं मैं गान गा रहा हूं भजन गा रहा हूं मां के गुणगान गा रहा हूं उस समय देखा कि रास मणि उसका मन दूसरी जगह पे है वो अन्य मनस दूसरी जगह पर उसका मन है मन उसका है नहीं और वो फूल जहां पे वो मंदिर में तो क्या होता है पूजा करने के लिए पूजा का पात्र होता है उसमें फूल रहते हैं तो फूल इधर से उधर कर रही थी बिना उसकी अटेंशन दिए अमनी दुई चापड़ जैसा ठाकुर ने ऐसा देखा वैसे ही दो चापड़ मार दी मैंने उसके मुंह पे तखन व्यस्त समस्त होए हाथ जोड़ करे रहो तब वो बड़ी व्यस्त होकर के एकदम वो एकदम वो प्रायश्चित्त भाव से दो हाथ जोड़कर के ठाकुर के सामने बैठी रही अभी सोच के देखिए कि जो कालीवाड़ी की निर्माता स्वयं रानी रासमणि जिसके इतने सारे चौकीदार इतने सारे उसके वो नौकर चाकर वो वो चाहती तो ठाकुर के साथ में क्या नहीं कर सकती थी यदि उसको गुस्सा आ जाता तो किंतु उसको भी समझ में आया था भीतर से दो चीज जब ठाकुर के ऊपर में यह भावावेश होता था तब मां काली का स्वयं उनके ऊपर में आवेश होता था तो किसी का साहस नहीं था कि ठाकुर के साथ में झगड़ा कर सके या तो ठाकुर को कोई कटु वचन कह सके मां काली स्वयं जी के पीछे में खड़ी है उनको आप क्या कह लेंगे ये एक चीज है दूसरा कि अभी तो रासमणि को तो मां ने स्वयं आकर के दर्शन देकर कहा है ना कि तुम काशी मत जाना। काशी जाने के लिए तुमने काशी यात्रा के लिए जो धन इकट्ठा किया है उस धन में से तुम यहीं पर मेरा मंदिर बनाओ। और फिर वो भीतर में श्रद्धा होगी तभी तो मां ने दर्शन दिया है। तभी तो मंदिर बनाया है। तो श्रद्धा है तो पता चला कि हां अभी ये ठाकुर ने जो मुझे चांटा मारा वो मेरे ही कल्याण के लिए किया है। किंतु जब हम ठाकुर की दृष्टि से आज इतने सालों के बाद देखते हैं। हम हमारे जो सुपीरियर है हमारे से सीनियर है जो हमारे बॉस है उनको दो चीज कहना हमको उनको यदि कुछ कहना है तो हम लोग 10 बार सोचते हैं। और सिर्फ आप लोग नहीं हम साधु लोग भी हमारे सीनियर साधु को कुछ कहने लगता है। हमको यदि लगता है कि हमको उनका कोई आचरण हमको पसंद नहीं आया तो महाराज को कुछ कहे कि महाराज आप इस तरह से जो बिहेव कर रहे हैं उसमें थोड़ा सा परिवर्तन लाइए तो ऐसा कहने में हम लोग 100 बार सोचते हैं कि वो बुरा मान लेंगे तो फिर क्या होगा? तो हमारा जो यह अहम है, हमारा जो यह मैं पना है, यदि वो नाराज हो जाएंगे, तो मेरा कुछ अहित करेंगे। तो मैं अपने शरीर के साथ में अपने को आईडेंटिफाई करता हूं। एक चीज दूसरा कि मैं अहंकार के वशतः अहंकार से प्रेरित होकर के यह कह रहा हूं कि महाराज जो आप कर रहे हैं ठीक नहीं है। जो आदमी संपूर्ण रूप से निस्वार्थ होता है जिसका कि शरीर बोध संपूर्ण रूप से चला गया है वो अपने जो सीनियर भी होते हैं तो उसको सही-सही बात बोलने में डरते नहीं है। क्योंकि उसको पता है कि जो कहता है वह निस्वार्थ रूप से कहता है तो सामने वाले को भी पता चलता है कि मेरे हित के लिए कह रहा है। दूसरा कि शरीर बोध नहीं रहने से वह एक बात है कि यदि सामने वाला जो नाराज हो जाता है तो अहित करेगा तो शरीर का अहित करेगा। मेरा अहित नहीं करेगा। मैं तो ख हूं। मैं तो आकाशवत हूं। जैसे आगे ठाकुर उसको बोलते थे कृष्ण किशोर को वो सिर्फ बोलने से नहीं होगा। उसके लिए वो अनुभूति होने की जरूरत है। तो ठाकुर आध्यात्मिक अनुभूति के किस उच्च सोपान पर बैठे थे। वो सिर्फ बात यह नहीं है कि ठाकुर हमको इस तरह से शिक्षा दे रहे हैं। वह हमको इस चीज से इस दोनों इंसिडेंट से जानने को मिलता है। किंतु साथ में यह भी जानने को मिलता है कि ठाकुर आध्यात्मिक जीवन की किस उच्च सोपान पर खड़े हैं कि यदि कोई उनके शरीर को हानि भी कर दे तो मेरे शरीर को हानि होगी बोलकर के ठाकुर कोई प्लान नहीं करते थे। शरीर का जो सो होना है सो होगा। आदर्श को लेकर के जीवन यापन करना है। आदर्श को लेकर के हमारा जीवन है। आदर्श आदर्श के ऊपर में हम कब अपना जीवन गठन कर पाएंगे? जैसे खुदीराम है। खुदराम को जब जमींदार ने कहा कि तुम मेरे लिए अदालत में जाकर के गलत तुम साक्षी दो। तो खुदीराम ने सोचा मैं तो आदर्श के सत्य के आदर्श पर जी रहा हूं। मैं क्यों कोई गलत जुबानी दूंगा? तो फिर उन्होंने क्या किया कि वो देरे ग्राम छोड़कर के कामार पुुर आ गए। अभी उसको पता है कि जमींदार जो पावरफुल है तो कामार कुकुर में भी आकर के उनको हानि कर सकते हैं। ऐसा हो ही सकता है। किंतु फिर भी उन्होंने यह बहुत बड़ा रिस्क लिया सत्य के पालन के लिए सत्य वचन की रक्षा के लिए। तो हम जब हमको आदर्श के ऊपर में आदर्श की रक्षा करनी है। आदर्श का पालन करना है। आदर्श के ऊपर में जीवन गठित करना है। तब यह भय जो है भय चला जाना चाहिए। जब तक मुझे यह भय रहेगा कि आदर्श का पालन करके मेरा अहित होगा तो आदर्श को छोड़ो जो माने जीवन निर्वाह अच्छे से हो जाए वो कार्य करो तो फिर क्या है कि हम आध्यात्मिक पथ से कितने विमुख हो जाएंगे आजकल बड़े लोगों को देखता हूं कभी-कभी कोई बड़े मंदिर में जाकर के करोड़ों रुपए का दान दे दिया फिर ना कि बहुत बड़े वो उत्सव कर दिया हजारों ब्राह्मण को खिला दिया तो फिर इस तरह से आपके वो जो पाप तो नहीं धुल जाने वाले वाले हैं। बहुत सारे लोग गिल्टी फीलिंग होता है उनके मन में कि गलत रास्ते से मैंने धन एकत्र किया है। तो इस धन की शुद्धि करनी पड़ेगी। चलो मंदिर में जाकर के डोनेशन दे दो। तो ठीक है। मतलब डोनेशन देना तो उसको पुण्य तो कमाना ही है। किंतु यह जो पाप कर्म करके ये जो धन एकत्र किया है सबसे पहली बात तो उसका तो भोग तो करना ही होगा। तो यह इसलिए ठाकुर का आना कि जब हम पाप कर रहे हैं उसी समय यदि मुंह पर कोई दो तमाचे मार दे तो हम उसी समय ठीक हो जाएंगे। बिना मतलब का पाप हो जाने के बाद में फिर उसका वो कर्म का भोग हमको उस समय नहीं करना पड़ेगा। हलधारी के बोलना दादा एक ही स्वभाव हो लो। अभी ऐसा दो-तीन लोगों को झापट देने मार देने के बाद में ठाकुर थोड़े से तो डर गए थे। वो हलधारी को जाकर के बोला कि अरे दादा यह मेरा किस तरह का स्वभाव हो गया है की उपाय को क्या करूं तब तो मां के डाकते डाकते वही स्वभाव गो तब मां को जाकर के बोला कि अच्छा उनको कि मां को पुकारा मां को प्रार्थना किया तब कहीं जाकर के लोगों को झापड़ मारने का यह स्वभाव गया उनका अभी हम सोचेंगे क्या ठाकुर को डर लग गया तो डर की बात नहीं है प्रेम और डांट दोनों से आध्यात्मिक जीवन गठित होता है। किंतु डांट के बाद में यदि मारपीट भी यदि करना शुरू कर दे तो किसी किसी साधक पे उसका कोई नेगेटिव असर हो सकता है। इसीलिए ठाकुर प्रशंसा करके या तो फिर वो उनकी समाधि भजन गान इस तरह से एक प्रेममय एक भलो भाषा एक वातावरण खड़ा करते थे। उनको लुभाने के लिए और फिर वो उनको डिटर करने के लिए डांटने के लिए सिर्फ मुंह से डांट लगा देते थे। वो झापट बापट नहीं मारते थे बातबाबत में। आजकल के लड़के लोग क्या है ना कि वो डांट भी नहीं सुनना चाहते हैं। पहले पहले हमारे स्मृति कथा वो पहले पहले की स्मृति कथाएं पढ़ेंगे। स्वामी जी किसी को डांटते हैं। राजा महाराज या तो फिर कोई किसी को डांटता है तो सीनियर साधु तो ऐसी भयानक डांट ऐसी गालागाली करेंगे कि कोई कच्चा पोछा होगा तो बेचारा वो तो हार्ट अटैक ही हो जाएगा। किंतु आजकल क्या है हम मिडिल क्लास में से आते हैं ना सब लड़के माता-पिता के बड़े वो लाडले होते हैं कभी वो डांट सुनी नहीं है स्कूल में भी नहीं सुनी घर में भी नहीं सुनी मां ने इतना प्रेम करके हमको रखा है तब यह साधु होने को आए फिर कोई सीनियर साधु एकदम गाली गलौज कर देगा तो ऐसा मन में बुरा लगता है कि अरे मैं संसारी था मैं घर में रहता था गृहस्थ था उस समय मुझे इस तरह से किसी ने डांट नहीं लगाई मुझे इस तरह से किसी ने गाली नहीं दी और साधु होने के बाद में मुझे ये सब सुनना पड़ रहा है। उसको बेचारे को ऐसा आघात लगता है कि फिर वो शायद वो घर छोड़ के ही चला म आश्रम छोड़ के ही चला जाएगा। ऐसा मतलब क्या है कि अब वो पुराना समय नहीं रहा कि लोग डांट सुनने की उनमें क्षमता होती थी। मार खाने की क्षमता तो चली ही गई। हमारे गुजराती में कहते हैं कि सोटी वागे चमचम विद्यावे धम धम अर्थात जो टीचर होता है वो बच्चा नहीं पढ़ता है तो उसको जोर से वो सोटी मारते हैं सोटी माने वो पतली लकड़ी बांबू जिसको कहते हैं बेंगली में वो मारेगा उसको तो विद्यार्थी फटाफट पढ़ना शुरू कर देगा आजकल की किंतु एजुकेशन थरी है कि टीचर को विद्यार्थी शिक्षक को विद्यार्थी को हाथ भी नहीं लगाना मारना बिल्कुल नहीं है यदि उसको मार दिया तो फिर उसके ऊपर में कोर्ट में केस हो जाएगा वो वो वो उसका वो जो पेरेंट्स से आकर के हल्ला मचाएंगे स्कूल में झगड़ा करेंगे क्या-क्या सब हो जाएगा यदि शिक्षक विद्यार्थी को मारेगा तो ये पूरी जो पुरानी प्रथा है कि कॉरपोरल पनिशमेंट जिसको कहते हैं वो धीरे-धीरे करके दूर हो गई है अभी कॉरपोरल पनिशमेंट तो चला ही गया है अब किंतु डांट भी करेंगे डांटेंगे भी सही बच्चे को तो भी वो बच्चा वो नाराज हो जाएगा रोना शुरू कर देगा क्या ना क्या नहीं हो जाएगा इसलिए ठाकुर को उसी समय पता चल गया था कि दो तरह के साधक होते हैं एक तो उत्तम साधक जैसे उत्तम उत्तम वैद्य है ना जोर जबरदस्ती दवाई खिला देता है। वैसे उत्तम साधक भी होते हैं कि जोर जबरदस्ती दवाई खाने के बाद में वो उत्तम वैद्य के पैरों में गिर जाते हैं। कहते हैं कि वैद्य तुमने अच्छा किया कि जो म मेरी अनच्छा के बाद भी मुझे यह दवाई खिलाई क्योंकि मुझे पता है कि इससे मेरा कल्याण होगा। वो आजकल के रोगी ऐसे हैं कि वो वैद्य ने कि डॉक्टर ने कुछ गलत निदान कर दिया या तो ऐसा कुछ हुआ सीधा कोर्ट में जाकर केस करेंगे। तो आजकल का जमाना ही चेंज हो गया है। तो उत्तम दर्दी नहीं होगा, उत्तम विद्यार्थी नहीं होगा, उत्तम साधक नहीं होगा। तो फिर ये उत्तम शिक्षक जो है वो भी बेचारा 10 बार सोचेगा कि इसको डांटेंगे तो कहीं उसका विपरीत परिणाम ना आ जाए। इसको चांटा मारेंगे तो कहीं विपरीत परिणाम ना आ जाए। इस तरह ठाकुर को उसी समय पता चल गया था कि उत्तम साधक धीरे-धीरे कम हो रहे हैं या रासमणि है या तो जय मुख जैसे साधक अभी मिलना मुश्किल है। अभी यदि ठाकुर आकर के हमको दो चांटा मार दे तो हम लोग भी बड़े नाराज हो जाएंगे। ठाकुर ने ऐसा क्यों कहा यदि मुंह से बोलने से तो होता नहीं चांटा मारने की आवश्यकता है। किंतु फिर भी हमारा अहंकार ऐसा बढ़ा हुआ है। अधम साधक है। हम लोग क्या करेंगे? तो ये उत्तम वैद्य जैसे होता है वैसे ही उत्तम दर्दी चाहिए। उत्तम गुरु होता है तो वैसे उत्तम शिष्य उत्तम साधक भी चाहिए। अच्छा तो आज यही तक कल फिर से मिलते हैं। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु