प्रार्थना
ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिणे अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः श्री श्री रामकृष्ण कथामृत श्रीम द्वारा लिपिबद्ध श्री म आए हैं दक्षिणेश्वर में रिट्रीट के लिए 16th दिसंबर 1883 दोपहर दोपहर के 4:00 बजे हैं। जनाई के मुखजे एक आए हैं। उनके साथ में ठाकुर वार्तालाप कर रहे हैं। कल हमने देखा कि ठाकुर कहते हैं कि काम कांचन का एक अंश मात्र भी रहने से भी अपने जीवन में हम बिय्ड वन पॉइंट आगे नहीं बढ़ पाएंगे। तो उसकी कुछ कहानियां भी रामकृष्ण विवेकानंद साहित्य में से हमने देखी कि किस तरह से ठाकुर और स्वामी जी इन दोनों के भीतर में वैराग्य की अग्नि वैराग्य का होमाग्नि इतना प्रचंड रूप से प्रगटित हुआ था। तो वह सब हमने कल देख लिया है। अभी थोड़ा सा आगे देखते हैं कि ठाकुर क्या कहते हैं।
योगभ्रष्ट साधक की कथा: मृत्यु के बाद भक्त बनकर धनी के घर नया जन्म ग्रहण करते हैं
श्री रामकृष्ण आभार मुख के संबोधन करे बोल छेन श्री रामकृष्ण मुखजे को फिर से संबोधन करके कह रहे हैं तो देर धन ऐश्वर जो आच ईश्वर के डाकु एक खूब भालो तुम्हारा धन और ऐश्वर्य है फिर भी तुम ईश्वर को पुकारते हो यह बहुत अच्छा है गीता आ गीता में है योग भ्रष्ट ताराई भक्त होए धनीर घरे जन्माए जो लोग योग भ्रष्ट होते हैं वही धनी होकर के वही भक्त होकर के धनी के घर में जन्म लेते हैं। मुखज बंधुर प्रतिहास्य अभी जब ठाकुर ने ऐसा कहा कि तुम लोग तो बड़े भाग्यवान हो कि धनी के घर में जन्म लिया है और फिर भक्त भी हो तो तुम लोग बड़े धन्य हो और जो योग भ्रष्ट होता है वही इस तरह से जन्म ग्रहण करता है तो फिर मुख ने अपने बंधु के प्रति साहास्य कहा सुचिनाम श्रीमताम गेह योग भ्रष्टो भिजायते अर्थात कि वही गीता का श्लोक जो कि ठाकुर ने सिंपल लैंग्वेज में बंगाली में कहा वही श्लोक यह मुखजे अपने बंधु को संस्कृत में कहते हैं। अच्छा देखिए यह जो गीता का श्लोक और उसके ऊपर में गीता की जो कुछ भी व्याख्या होगी वह सब तो शायद आपने पढ़ा ही होगा। हमको पता ही होगा। किंतु यहां पर ठाकुर जो एक क्रिटिकल डिस्टिंशन क्रिएट करते हैं। उसके बारे में थोड़ा सा देखते हैं। देखिए और अगेन इसकी मीमांसा हम ठाकुर के ही शब्दों के माध्यम से कर रहे हैं। नहीं कि गीता में जो लिखा है। तो ठाकुर ने क्या कहा? जो योग भ्रष्ट है वही भक्त होकर के धनी के घर में जन्म ग्रहण करते हैं। अर्थात कि योग भ्रष्ट होना और योग भ्रष्ट होकर के धनी के घर में जन्म ग्रहण करना ऐसा नहीं भक्त होकर के धनी के घर में जन्म ग्रहण करना यह भक्त होकर के यह एक क्रिटिकल डिस्टिंशन ठाकुर यहां पर क्रिएट करते हैं। क्यों करते हैं? देखिए कि वह हिंदी मूवी का जो डायलॉग है बड़े बाप की बिगड़ी औलाद अर्थात कि पिताजी के पास में धन है, ऐश्वर्य है, पॉलिटिकल पावर है, इज्जत है, समाज में सोशल कैपिटल है, सोशल प्रेस्टीज है, सब कुछ है। किंतु उसका लड़का जो है इस तरह का बदमाश प्रकट होता है कि जो स्कूल में जाएगा वहां पे भी वह सबको हैरेस करेगा। जिस कॉलेज में जाएगा वहां पे भी लोगों को परेशान करेगा। अपने जो दूसरे स्टूडेंट है उनको रेगिंग फेगिंग करेगा और फिर जब बड़ा होगा और अपने पिताजी जिस लाइन में होंगे बिजनेस ना कि जो कुछ भी है वहां पर जाकर के अपने जो कलीग्स और कोवर्कर है उनको परेशान करेगा। अर्थात कि बिकॉज़ कि बचपन से ही धनी के घर में जन्म ग्रहण किया है। उसको किसी ने डिसिप्लिन नहीं किया और उसकी वजह से वह एक अनडिसिप्लिंड वे में जब बड़ा होता है तो उसके संस्कार बड़े ही विकृत हो जाते हैं। उसके भीतर में एमैथी जैसा कुछ रहता ही नहीं है। सामने वाले का क्या दुख है, दर्द है, कष्ट है, यह बात वह समझ ही नहीं पाता। और इसकी वजह से एक सेल्फिश हो जाता है। दूसरों को कष्ट देता है। आनंद प्राप्त करने के लिए मैंने बीच में एक डॉक्यूमेंट्री देखा था कि सद्दाम हुसैन के दो लड़के हैं। दो ना कि तीन जितने भी हो वो अभी सद्दाम हुसैन तो क्या है? एक एब्सोल्यूट डिक्टेटर था। तो इराक में तो यह लड़कों के पास में सुपर पावर था। पुलिस उनके साथ में है। स्पाई एजेंसीज उनके हाथ में है। आर्मी उनके हाथ में है। अर्थात कि इसके लड़कों ने इस तरह का कहर मचा के रखा था बगदाद सिटी में और पूरे इराक में। इसकी कितनी कहानियां थोड़ा सा भी आप सर्च करेंगे आपको मिल जाएगी। और जब सद्दाम हुसैन का वध हुआ इससे कहीं ज्यादा आनंद लोगों को तब आया जबकि सद्दाम के पुत्रों को मार दिया। यह यूएस आर्मी ने तो देखिए कि धनी के घर में वैभवशाली के घर में जन्म ग्रहण करना यह कोई वो योग भ्रष्ट की डेफिनेशन नहीं है कि वह पिछले जन्म में योग भ्रष्ट था और इस जन्म में वह धनी के घर जन्म धनी के घर उसने पैदा हुआ है। यह ऐसा कुछ नहीं है। ठाकुर वो क्रिटिकल डिस्टिंशन खड़ी करते हैं। कहते हैं भक्त होकर के धनी के घर में आता है। देखिए इस तरह के लोग आपको मिलेंगे। जैसे यह बड़े बाप की बिगड़ी औलाद यह जितना कॉमन ट्रॉप इसको कहते हैं ट्रॉप। अर्थात कि जो एक रिपीटेड पैटर्न हमको सोसाइटी में देखने को मिलती है और यह डायलॉग बोलने से ही सामने वाला समझ जाएगा कि यह क्या कहना चाहते हैं। इसको कहते हैं ट्रॉप। तो यह जो बड़े बाप के बिगड़े हुए लड़के हैं, इसके बारे में लिखा भी बहुत गया है। इसके बारे में शायद आपने खुद ने ऐसे एग्जांपल देखे भी होंगे। किंतु इस तरह का बहुत ही रेयरली देखने को मिलेगा कि पिताजी धनी है, मानी है, पावरफुल है, प्रेस्टीजियस है। किंतु लड़का या लड़की जो है विनम्रता का अवतार है। ईश्वर के प्रति ही उनका मन जाता है। ईश्वर के प्रति उनकी शरणागति बचपन से ही दिखती है। तो इस तरह का आपको देखने को रेयरली मिलेगा और इसीलिए यह ट्रॉप नहीं है। ट्रॉप कब होता है? यानी कि एक स्टीरियोटाइप कब क्रिएट किया जाता है? जबकि वो पैटर्न रिपीटेडली दिखाई देता है। तो यह बड़े बाप की बिगड़ी औलाद वाली पैटर्न हमको रिपीटेडली दिखाई देती है। बोल के वह एक स्टीरियोटाइप क्रिएट हो गया है। किंतु यह बड़े बाप की यह एक आध्यात्मिक संतान यह रिपीटेडली देखने को नहीं मिलता बोलकर के यह स्टीरियोटाइप खड़ा नहीं हुआ है। देखिए इतिहास में इस तरह के इनफ उदाहरण है। अब जैसे कि यह ध्रुव है या तो फिर यह मीराबाई है। देखिए कि राजा के घर में या इस तरह से किसी बड़े के घर में जन्म ग्रहण किया है। किंतु बचपन से ही मीराबाई का ही उदाहरण देख लीजिए। बचपन से ही वह मां को कहती थी। पूछती थी कि मां मेरा विवाह किसके साथ में होना है? तो मां ने कह दिया यह कृष्ण के साथ में। तो तभी से मीराबाई का कृष्ण के प्रति जो एक प्रेम था, एक संबंध था, वो इस तरह से फैलने लगा कि उन्होंने जो पदावलियों की रचना की है, वह आज भी अमर हो चुकी है। तो यह जो है आजकल के युग में भी शायद इस तरह के एग्जांपल आपको देखने को मिले। किंतु वह रेयर होते हैं। बहुत ईजीली देखने को नहीं मिलते। देखिए मैंने रामकृष्ण मिशन में जो आने वाले डिवोटीज हैं उन लोगों का जो एक स्टडी किया है मैंने देखा है बहुत सारे डिवोटीज के घर के जो लड़के या लड़कियां होते हैं वे लोग भी छोटी उम्र से ही डिवोटी ही होते हैं। मैं एक डिवोटी का उदाहरण देता हूं। वह एक प्राइवेट सेंटर चलाते थे। चलाते थे माने ग्रुप था। उसमें वो सेक्रेटरी थे प्राइवेट सेंटर के और बिकॉज़ कि वहां पर ऑफिशियल सेंटर नहीं था ऑर्डर का तो जो भी गेस्ट साधु जो भी जो अभी प्रेसिडेंट महाराज ना कि वाइस प्रेसिडेंट महाराज ना कि ऐसे कोई सीनियर साधु आएंगे तो उन्हीं के घर रहते थे। अब यह बहुत दिनों पहले की बात है। उस समय इतना फॉर्मेलिटीज नहीं था। तो उस दिनों की बात है। तो अभी इस डिवोटी के जो लड़के हैं उनको मैं पहचानता हूं। बड़े डिवोटी है वह भी। किंतु देखिए कि यह जो डिवोटी स्वयं जो है ऐसा कोई धनपति या ऐसा नहीं है। सेक्रेटरी थे प्राइवेट सेंटर के किंतु सिर्फ एक नॉर्मल एक गवर्नमेंट जॉब है। वही करते थे। जॉब का सिक्योरिटी था। किंतु ऐसा बैंक बैलेंस जैसा कुछ नहीं था। तो देखिए कि दिस इज भक्त के घर भक्त लड़के प्रकट होते हैं, जन्म लेते हैं। या तो फिर उनके लड़कों में भक्ति के चिन्ह छोटी उम्र से ही देखने में आता है। यह भी एक कॉमन स्टीरियोटाइप है। और बड़े बाप के यह जो लड़के हैं जो कि संपूर्ण रूप से असंस्कारी हो गए हैं। यह भी एक कॉमन स्टीरियोटाइप है। किंतु कोई किसी का किसी के पास में बहुत ज्यादा धन और वैभव है और फिर उसके लड़कों में इस तरह से श्रद्धा भक्ति देखने को मिले वह बड़ा रे रहे। इसीलिए देखिए कि यह मथुर बाबू जो है उसके लड़के जो थे त्रैलोक्यनाथ उसके साथ में ठाकुर का ऐसा कुछ पटता नहीं था। और ठाकुर ने उसको कहा भी था मथुर बाबू को कि तुम जब जाओगे तो तुम्हारे जाने के बाद में मैं यहां पर रुकूंगा नहीं अर्थात कि तुम्हारे देहांत के बाद में मैं दक्षिणेश्वर से चला जाऊंगा क्योंकि तुम्हारे बाद में जो लड़के हैं तुम्हारे वो मुझे इतना मान मुझे इतना सम्मान नहीं देंगे तो फिर यह मथुर बाबू बड़ा ही दुखित हो गया और ठाकुर को विनती करने लगा तो फिर ठाकुर ने कहा अच्छा ठीक तुम्हारा बड़ा लड़का जो है उसमें फिर भी भक्ति है और तुम्हारी बीवी जो है तुम्हारी पत्नी है उसमें भी भक्ति है। तो जब तक यह दोनों रहेंगे तब तक मैं रहूंगा किंतु उसके बाद में जब तुम्हारे छोटे लड़के के हाथ में यह काली मंदिर जाएगा तो फिर मैं यहां से चला जाऊंगा। तो हुआ भी ऐसा कि हमको पता है कि जब से यह त्रैलोक्य नाथ के हाथ में आया है मंदिर की व्यवस्था उसके बाद में ठाकुर बहुत ज्यादा वहां पर रुके नहीं है। अभी मैं टाइमलाइन भूल जा रहा हूं किंतु मुझे ऐसा लग रहा है अनुमान करके कह रहा हूं कि दो-ती साल ही उसके बाद में ठाकुर वहां पे रुके थे। उसके बाद में ऑफ कोर्स उनको कैंसर हो गया और ट्रीटमेंट के लिए उनको कोलकाता लाना पड़ा। यानी कि यह जो सुयोग होना कि यह धनी के घर में जन्म लेकर के भक्त का एक मेंटालिटी उसको भक्ति के लिए साधना के लिए देखिए कितनी सारी सुव्यवस्था हो जाती है। ना ही उसको पैसे की चिंता करने की जरूरत पड़ती है। ना ही उसको यह टेंशन है कि मेरी करियर कैसे बनेगी। ना ही उसको यदि शादीशुदा है तो उसको बीवी बच्चों की चिंता है। राजा महाराज एक उदाहरण अपने साहित्य में दिखते हैं कि जमींदार के लड़के हैं। इसके बावजूद देखिए कि ठाकुर के प्रति श्रद्धा भक्ति और खुद के जो चरित्र की महिमा है उससे वह कितने ऊपर आध्यात्मिक जीवन में आ गए थे। और हमको पता है कि उनके पिताजी थे जमींदार। तो अभी पिताजी हालांकि पिताजी को पसंद नहीं था कि राखाल ठाकुर के पास में जाए किंतु फिर पिताजी को यह भी टेंशन नहीं था कि मेरा लड़का यदि चला जाएगा तो मेरे भविष्य का क्या होगा? मुझे खिलाने पिलाने वाला कौन रहेगा। वह सब चिंता भी उनको नहीं थी। तो देखिए कि यहां पर है राजा महाराज का एक उदाहरण है और यह एक जनाई के मुख का उदाहरण ठाकुर कहते हैं कि यदि आप योग भ्रष्ट आत्मा है तभी आप भक्त होकर के धनी के घर में जन्म लेते हैं। तो दिस इज वन कि वैसे तो हमने गीता का यह श्लोक पढ़ा है कि ठाकुर जो एक क्रिटिकल डिस्टिंशन खड़ी करते हैं उसको हमने देखा। इसके बाद में ठाकुर क्या कहते
ईश्वर इच्छा करने से ज्ञानी को संसार में भी रख सकते हैं
हैं? श्री राम कृष्णम तनी मने कोले ज्ञानी के संसारो राखते पारेन यदि वह चाहे वह अर्थात कि मां जगत दात्री या तो फिर जगत जननी जगदंबा मां यदि चाहे तो ज्ञानी को संसार में भी रख सकती है तार इच्छा ते जीव जगत होए छे तीन इच्छामय इनकी इच्छा से अर्थात कि मां की इच्छा से जीव जगत हुआ है वह है इच्छामई। अच्छा देखिए कि ज्ञानी को संसार में रखना। अब जैसे कि प्रश्न होगा ही होगा कि यदि ज्ञान प्राप्त करना है या तो फिर ज्ञान प्राप्त कर लिया है तो फिर क्या हम संसार में रह सकते हैं? संसार हो सकता है क्या? तो इस बात का सबसे बड़ा उदाहरण तो ठाकुर स्वयं है। जब निर्विकल्प समाधि प्राप्त उन्होंने कर दी थी तो निश्चय उन्होंने आध्यात्मिक जगत की सर्वोच्च सिद्धि प्राप्त कर दी थी। तो उसी दिनों की घटनाएं हैं कि ठाकुर तोतापुरी के साथ में अपने गुरु के साथ में वार्तालाप कर रहे हैं। उस समय तोतापुरी को तो पता ही था कि ठाकुर विवाहित है। ऑलरेडी 1859 के आसपास में ही कामार पुकुर में उनका विवाह मां शारदा के साथ में हो गया है। और यह तोतापुरी का आगमन निर्विकल्प समाधि वगैरह 19 1800 1800 1858 1859 के आसपास में विवाह हुआ है और 18645 के आसपास में तोतापुरी का आगमन हुआ। तो जो भी है तो तोतापुरी को ऑलरेडी पता था कि ठाकुर विवाहित है। तो तोतापुरी ने ठाकुर को कहा था लीला प्रसंग में यह बात शरद महाराज हमको कहते हैं कि देखो विवाह किया है और यदि पत्नी के साथ में रहते हो तो यह तुम्हारा टेस्ट ही होगा। यह तुम्हारी साधना की सिद्धि में और एक अलंकार और एक मोर पिच्छ ही ऐड करेगा। उसमें पत्नी से भागने की जरूरत नहीं है। जो सही-सही ज्ञानी है, वह यदि संसार में भी रहता है, तो उसको किसी भी तरह का दोष स्पर्शन नहीं करता। तो गंभीरानंद जी महाराज जब मां दक्षिणेश्वर में आती है 1872 उसके आसपास वो उस समय की जो घटनावली का वर्णन करते हैं तो गंभीरानंद जी महाराज भी यह तोतापुरी के साथ में हुई ठाकुर के वार्तालाप को हमको बताते हैं। कहते हैं कि अपनी पत्नी के साथ में रहना ठाकुर के लिए अधार्मिक नहीं था। उनको अपने गुरु का ही आदेश मिला था। गुरु के साथ में उन्होंने वार्तालाप करके ही यह साहसिक कदम जो है वह उठाने का प्रयास किया था। वो जो फेमस घटना है एक दिन रात को ठाकुर और मां दोनों एक साथ में सोए हुए हैं। ठाकुर के ही कमरे में और मध्य रात्रि को ठाकुर की नींद उड़ गई। या तो फिर ठाकुर पहले से ही समाधि में थे। व्हाटएवर ठाकुर को तो पता है कि रात को ज्यादा नींद नहीं आती थी। तो आधी रात को भाव में होंगे या नींद से उठे होंगे। उसमें से भाव में से नीचे आकर या नींद से उठकर के जैसे ही देखा कि मां शारदा पास में ही लेटी हुई है। तब उन्होंने क्या कहा अपने मन को कि देखो मन इसी को कहते हैं स्त्री शरीर और इसी के भोग के लिए लोग लालायित होकर के घूमते रहते हैं। यह स्त्री शरीर तुम्हारे सामने है। यदि इसका भोग करना चाहो तो कर लो। मन में और मन मुख एक करो अर्थात कि मन में एक बात है मुंह पे दूसरी बात मन में भोग की इच्छा है मुंह पर त्याग की बात कर रहे हो ऐसा मत करो तो ऐसा करके जैसे ही ठाकुर ने अपना हाथ मां के श्री अंग की ओर बढ़ाना शुरू किया वैसे ही वह समाधि में मग्न हो गए थे तो यहां पर देखिए कि यदि सही सही ज्ञानी है वह यदि संसार भी करता है तो उसको इस तरह तरह का कोई प्रॉब्लम आध्यात्मिक जीवन में नहीं होता। तो इसीलिए किंतु वो नेति नेति करके ज्ञान प्राप्त कर लेने के बाद की बात है। यदि हम साधना के समय में संसार में रहते हैं तो फिर बड़ा ही मुश्किल है। अब जैसे कल ही हमने देखा कि ठाकुर किस तरह से भगवान राम और वशिष्ठ देव का उदाहरण देते हैं। भगवान राम को वन में जाना है। सन्यास ग्रहण करना है। वशिष्ठ देव कहते हैं कि सोच के देखो कि ब्रह्म के अलावा और कुछ है क्या? यह संसार, तुम्हारा परिवार, पत्नी, मां-पिताजी, यह राजमहल, दरबारी क्या यह लोग ब्रह्म को छोड़कर के है क्या? यह सब भी तो ब्राह्मण है। तो भगवान राम चुप हो गए। किंतु वो क्यों चुप हो गए? क्योंकि ऑलरेडी उनको ब्रह्म ज्ञान प्राप्त हो चुका था। बोलकर के जब गुरुदेव यह कहते हैं कि सब कुछ ब्राह्मण है तो वह साक्षात उपलब्धि कर पाते थे। अभी जब ठाकुर मास्टर महाशय को कहते हैं कि सन्यास त्या काम कांचन त्याग के बिना कुछ नहीं होगा संसार में रहने से या संसार में संसारी होकर के डूबे रहने से आपका प्रगति नहीं होगा। तो फिर मास्टर महाशय वही वो वशिष्ठ देव और राम वाला उदाहरण काउंटर आर्गुमेंट के रूप में देते हैं कि भगवान राम को तो वशिष्ठ ने कहा था कि तुम संसार में ही रहो। तो एक्चुअली ठाकुर को बताना चाहिए इस तरह से कि वह तो इति इति वाले फेस की बात है ना। भगवान राम ने तो ऑलरेडी निर्विकल्प समाधि कहो ना जो कुछ भी कहो आध्यात्मिक जीवन की सर्वोच्च सिद्धि प्राप्त कर ली है। बोल के वो ब्रह्म साक्षात्कार नजरों से देख पाते हैं। तुम्हारे लिए अर्थात कि मास्टर महाशय के लिए तो अभी नेति नेति फेज में हो। यह सर्वभूत में ब्रह्मन है। सर्वम खलवम इदम ब्रह्मन यह तो सब कथार कथा यह तो सब मुंह की बातें हैं। तोता जैसे रटता है उस तरह से है। तुमको थोड़ी ना ब्रह्म साक्षात्कार हुआ है कि तुम यह संसार में रहकर के साधना कर पाओगे। तो ठाकुर ऐसा कह सकते थे। किंतु हमने देखा कि ठाकुर ने थोड़ा सा हास्य करके स्मित करके यह कहा कि वह रावण वध के लिए भगवान राम को रावण वध करना था। बोलकर के उनको संसार करना आवश्यक था। मां सीता से विवाह करना आवश्यक था। रावण मां सीता का अपहरण करेगा। भगवान राम उनको मुक्त करने को जाएंगे। युद्ध होगा। रावण वध होगा। तो यह पूरा रामायण की रचना करने के लिए भगवान राम को घर में रहना, राजमहल में रहना आवश्यक था। संसार करना आवश्यक था। तो ठाकुर उसको पूरा एक नया ट्विस्ट देते हैं। किंतु यदि वेदांत की दृष्टि से देखें तो हमारा पहला जो एक्सप्लेनेशन है वह भी इतना ही सही है।
श्रीरामकृष्ण महावाक्य : ब्रह्म और शक्ति अभेद
तो यहां पे ठाकुर कहते हैं कि मने कर ले ज्ञानी के संसारे वो राखते पारे। यदि मां जगदंबा की इच्छा होगी तो ज्ञानी संसार में भी रहेगा। किंतु संसार ज्ञानी को स्पर्श नहीं करेगा। और यह उस समय की बात है। इति इति वाले फेस की बात है। नहीं कि यह नेति नेति वाले फेस की बात। तो विद दिस क्लेरिटी ठाकुर क्या कहते हैं? उनकी इच्छा से जीव जगत हुआ है। वह मां है इच्छामई। तो मुखजे शहास्य क्या कहते हैं? मुखजे हास्य पूर्वक तारा बार इच्छा की तार की किसु अभाव आ मां की इच्छा यह क्या कोई बात हुई मां को क्या कोई अभाव है देखिए संस्कृत में जैसे कहते हैं तन्हा या तो फिर पाली में जिसको कहते हैं तन्हा जो कि बुद्धिज्म में जिस एक फैक्टर को सब तरह के जो दूषण है उसका रूट बताया गया है। संस्कृत शब्द है तृष्णा। अभी तृष्णा क्या है? उसका सामान्य ट्रांसलेशन करेंगे तो जल पिपासा। तृष्णा हमको कब लगती है? जब हमको पानी पीने की इच्छा होती है, तरस लगती है, तब हम पानी पीते हैं तो उसको तृष्णा कहते हैं। मुझे तरस लगी है, मुझे तृष्णा हुई है। तो मैं पानी की पिपासा कब मेरे मन में प्रकट होगी? जब मैं पानी पीना चाहता हूं। वह मेरे मन में एक अभाव खड़ा हुआ है। मेरा देह जो है पानी की पानी के लिए आतुर है। देह को पानी की आवश्यकता है। बोलकर के तृष्णा प्रकट होती है। तो तृष्णा कब आती है? यह वो इच्छा कब जागृत होती है पानी पीने की? जबकि ये तृष्णा प्रकट होती है। तृष्णा कब कब प्रकट होती है? देह में अभाव खड़ा होता है। उस अभाव को पूर्ण करने के लिए बाहर से कुछ चाहिए। उसको तृष्णा कहते हैं। तो मुखजे हास्य पूर्वक कहते हैं कि उनकी इच्छा कहां? माने मां की इच्छा कैसे हो सकती है। मां तो मां का क्या कोई अभाव है? तो अभी देखिए कि एक्चुअली यह जिसका अभाव नहीं है वह इच्छा जिसकी नहीं है यह सब एक वेदांतिक डेफिनेशन है ब्रह्मन की या तो आत्मन की किंतु यहां पर हमको यह पता है कि ब्रह्मन के भीतर में किसी तरह का अभाव नहीं है। ब्राह्मण की कोई इच्छा नहीं है। ब्राह्मण अव्यवहार्य है। अर्थात कि किसी भी तरह का व्यवहार नहीं करता। जिसकी किसी भी तरह की इच्छा नहीं है, जिस किसी भी तरह के कार्य में वह लिप्त नहीं होता। किंतु ठाकुर तो यहां पर शक्ति के बारे में बात कर रहे हैं। वेदांत की दृष्टि से देखें तो शक्ति को कहते हैं अविद्या या तो माया या तो अज्ञान। तो यह अज्ञान और ब्राह्मण दोनों जब इकट्ठा होते हैं इकट्ठा। अगेन जैसे मैं पहले ही डिस्कस किया था अद्वैत वेदांत में ये शब्दों की ममारी चलती ही रहेगी। एग्जैक्ट वर्ड टेक्निकल वर्ड कि अ ब्राह्मण के ऊपर में माया का आवरण आएगा कि व्हाटएवर इकट्ठा होना आवरण आना कोई भी शब्द जो एक्चुअल रियलिटी है उसको जस्टिफाई नहीं कर पाएगा। तो एनीवे विद अंडरस्टैंडिंग दिस लिमिटेशन ऑफ वर्ड्स यदि ब्राह्मण और माया का यह संयोग होता है तो वहां से यह जगत का प्रारंभ होता है। यदि समष्टि अज्ञान है तो उसमें से प्रकट होते हैं ईश्वर और जो व्यष्टि अज्ञान है उसमें से प्रकट होते हैं हम लोग जीवात्मन इंडिविजुअल सोल। तो फिर देखिए कि ईश्वर जो है वह तो अज्ञान की वजह से प्रकट हुए हैं। बोलकर के ईश्वर के भीतर में अभाव हो सकता है और ईश्वर जो है उनकी कोई इच्छा हो सकती है। तो जब यहां पर ठाकुर कहते हैं कि वह इच्छामई है या इच्छामय है। तो ठाकुर एक्चुअली शक्ति शास्त्र की दृष्टि से कहते हैं। यहां पे माया में जो ईश्वर है उसको एक तरह से वेदांत की दृष्टि से ईश्वर जो है एक तरह से निम्न कोटि पर आता है। क्यों? क्योंकि वह माया के संयोग से बना है। जबकि यह शक्ति शास्त्र कहता है कि ब्रह्म और शक्ति अभेद है। देखिए ठाकुर बाद में यह सब उदाहरण देंगे। किंतु देखिए कि यह कंट्रास्ट जो है मुखजे जो प्रश्न कर रहे हैं और ठाकुर जो उत्तर दे रहे हैं वह प्रश्न और उत्तर दोनों डिफरेंट-डिफरेंट फिलॉसोफी में से प्रकट हुए हैं। वेदांत के अनुसार ब्राह्मण की कोई इच्छा नहीं होती। ईश्वर की इच्छा हो सकती है किंतु ईश्वर जो है निम्न कोटि के हैं ब्राह्मण से। क्यों? क्योंकि ब्रह्मन और माया के संयोग से वह प्रकट हुए हैं। तो यदि हम अल्टीमेट रियलिटी है इस जगत की वह ब्राह्मण ब्राह्मण के बारे में यदि सोचे तो ब्राह्मण की कोई इच्छा नहीं है। ब्राह्मण अव्यवहार्य है। ब्राह्मण को किसी भी तरह का अभाव नहीं। तो उसके उत्तर में किंतु ठाकुर वेदांत की फिलॉसोफी से परे जाकर के कहो कि वेदांत की फिलॉसोफी से हटकर के कहो शक्ति साधना की दृष्टि से उत्तर देते हैं। ठाकुर क्या कहते हैं? तातेबा दोष की उसमें दोष क्या है? जल स्थिर थाक ले ओ जल तरंग होले ओ जल जल यदि पानी यदि स्थिर रहता है तो भी वह पानी ही है जल ही है और यदि उसमें तरंग प्रकट होती है तो भी वह जल ही है। देखिए यहां पे बाहर से कहीं एक पैरेलल रियलिटी माया उसके ऊपर में आवरण हो इस तरह से नहीं सोच के ब्रह्म समुद्र है तो ब्रह्म यदि स्थिर है तो हम उसको ब्रह्म कहते हैं और यदि ब्रह्म कार्य करता है या तो फिर उसमें तरंग प्रकट होती है तो उसको शक्ति कहते हैं। ऑफ कोर्स अभी प्रश्न वही हो जाएगा कि ब्राह्मण तो उसके भीतर में किसी तरह का अभाव नहीं है। ब्राह्मण के अलावा कोई फैक्टर नहीं है। तो फिर ब्रह्मन के भीतर में तरंग कहां से प्रकट होगी? किंतु जैसे देखिए कि ये जो अल्टीमेट फिलॉसोफीज या तो फिर ये अल्टीमेट टॉपिक्स है आध्यात्मिक जगत के उसके बारे में जितना ही हम बातें करने को जाएंगे उतना ही कंट्राडिक्शन खड़ा होगा ही होगा और इसीलिए ठाकुर ने पहले ही कह दिया है कि सब कुछ झूठा हो गया है। ब्राह्मण क्या है वह झूठा नहीं हुआ। अर्थात कि यह डिबेट कि ब्राह्मण तो अव्यवहार्य है। ब्रह्मन के भीतर में किसी भी तरह का अभाव नहीं है। ब्रह्मन की कोई इच्छा नहीं है। बोलकर के ब्रह्मन तो ब्रह्मन ही रहेगा। किंतु उसके बाद में जब माया का एक आवरण आएगा वि इज समथिंग अपार्ट फ्रॉम ब्रह्मन। तो फिर यह जीव जगत ईश्वर की रचना होगी। वह एक वेदांतिक कांसेप्ट और यह एक शक्ति साधना का कांसेप्ट कि ब्राह्मण और शक्ति यहां पे माया की जगह इसको कहते हैं शक्ति स्थिर है तो ब्रह्मन है। यदि कार्य करता है तो शक्ति है। एक ही रियलिटी है। उसके दो मोड है। अभी जैसे गाड़ी में आप गियर चेंज करते हैं ना कार में स्कूटर में भी आपका वह क्लच आता है। तो फिर आप जैसे ही गियर चेंज किया तो फर्स्ट गियर में रखा तो गाड़ी स्लो जाती है। न्यूट्रल गियर में रखा तो गाड़ी स्टॉप हो जाती है। और रिवर्स गियर में रखा तो गाड़ी रिवर्स जाती है। अब गाड़ी एक ही है। ऐसा नहीं है कि आपको आगे जाने के लिए एक कार का इस्तेमाल करना है। रिवर्स जाने के लिए दूसरी कार का इस्तेमाल करना है। बस गियर चेंज कर देने हैं। तो यहां पे भी ब्रह्मण एक ही है। आपने उसको वह न्यूट्रल गियर में रखा तो वह फिर ब्रह्मण स्थिर होके रहेगा और उसको टॉप गियर में रख दिया तो वह शक्ति बनकर के कार्य करेगा। उसके गियर ही चेंज होते हैं। सिर्फ वो ब्राह्मण इटसेल्फ चेंज नहीं होता। ब्राह्मण के अलावा और कोई एंटिटी को इंट्रोड्यूस करने की आपको जरूरत नहीं है। तो अगेन ये दोनों व्यू पॉइंट को देखकर के प्रश्न बहुत सारे होंगे। किंतु यही बात है कि हमको यह देखना है कि ठाकुर का यह ओपिनियन है और फिर यदि इसके ऊपर में जो नेक्स्ट क्वेश्चन आएगा कि ब्राह्मण कार्य कर ही कैसे सकता है जो कि कुटस्थ अचलम ध्रुवम वो है वह कार्य या तो फिर तरंग उसके ऊपर में उठ ही कैसे सकती है तो इसीलिए फिर ठाकुर ने कहा वह इच्छामय है या इच्छामई है वह जो चाहे वह कर सकते हैं बिना अभाव के वह कार्य करते हैं। ज्यादातर हम लोगों को देखिए कि हमारे मन में एक अभाव प्रकट होता है। अभाव प्रकट होने के बाद में ही हम कोई भी एक्शन को लेंगे। मुझे भूख लगी है। बोल कर के मैं खाऊंगा। प्यास लगी है। बोल कर के मैं पानी पियूंगा। मुझे फिजिकल कंफर्ट चाहिए। बोल करके मैं पैसा कमाने का प्रयास करूंगा। मुझे यह अपनी कामना वासनाओं की पूर्ति करनी है। बोलकर के वह एक एवन्यू खोजने का प्रयास करूंगा। मेरे भीतर में एक अभाव है। एक भूख जागृत हुई है। एक तृष्णा जागृत हुई है। और उसको फुलफिल करने के लिए मैं कार्य कर रहा हूं। किंतु ब्राह्मण जो कार्य करता है अगेन कंट्राडिक्शन इन टर्म कि ब्राह्मण कार्य कैसे कर सकता है किंतु अगेन फॉर वन मोमेंट यदि इस पैराडॉक्स को भूल जाए तो ब्राह्मण यदि स्थिर है तो भी वो बिना किसी अभाव के स्थिर है और ब्राह्मण रूपी समुद्र में यदि तरंग भी उठती है तो बिना किसी अभाव के वह तरंग उठती है। यह कैसा है पता है? ठाकुर कहते हैं मधुमक्खी जो है वह मध की खोज करने के लिए इधर-उधर भटकती है। कोई पुष्प दिखे उसको पुष्प के भीतर में मद प्रकट होता है। तो पुष्प की खोज करती हुई मधुमक्खी इधर-उधर उड़ती है और वह गीत भी गाती है उस समय। किंतु जैसे ही पुष्प पे वह विराजित हो गई और मधुपान करना उसने प्रारंभ कर दिया। उस समय उसका गीत जो है वो स्टॉप हो जाएगा। उसके बाद में किंतु मधुपान करके संतुष्ट चित्त से जब मधुमक्खी बैठती है तो फिर मन के आनंद से फिर गुनगुन करके वह गीत गाए वो अलग चीज है। तो यहां पे भी वो कार्य जो है दो तरह से दो पर्पस से या तो फिर कार्य करने के दो फैक्टर है। एक तो है अभाव दूसरा है संतुष्टि। अभाव की वजह से भी कार्य होता है। संतुष्टि से भी कार्य होता है। वह जैसे कि एक परमहंस की तरह ठाकुर कहते हैं परमहंस बालक की तरह है। वो यदि एक खिलौना भी अपनी गोद में लेकर बैठ जाता है। कहता है मैं किसी को नहीं दूंगा। बोलकर ऐसा नहीं है कि खिलौने के प्रति उसकी कोई आसक्ति है। बस उसका एक चाइल्ड लाइक नेचर है कि वो उसको इसको साथ में खेलना अच्छा लगता है। अभी दूसरे ही क्षण किसी कंप्लीटली एक स्ट्रेंजर कोई एक कंप्लीटली बिना पहचान वाले आदमी को वही खिलौना देकर के चला जाएगा। उसको यह सेंस ऑफ पजेशन ही नहीं है। वो चाहे अभी बड़ा जिद करके खिल खिलौने को लेकर बैठा है। अभी उसी खिलौनों को फेंक करके मां के पास में जाऊंगा बोल के रोता है। तो बच्चे के भीतर में किसी भी तरह की कामना वासना नहीं। जो कुछ भी करता है वो मन की संतुष्टि के लिए करता है या मन की संतुष्टि से इस तरह की लीलाएं प्रकट होती है। तो इसको कहेंगे लीला। वह हो गया कार्य या तो कर्म। यह हो गई लीला। लीला चित्त की संतुष्टि से प्रकट होती है। मन के विनोद के लिए कहेंगे अगेन अगेन कंट्राडिक्शंस इन टर्म्स बहुत सारी खड़ी हो जाएगी। किंतु यह लीला है। यह कर्म है। तो ठाकुर कहते हैं कि ब्राह्मण के भीतर में तरंग जब खड़ी होती है, वह किसी अभाव की वजह से नहीं होती। वह सिर्फ एक लीला मात्र है। तो यहां माया और लीला देखिए किस तरह के कांसेप्ट चलते हैं। तो यहां पर ठाकुर कहते हैं जब मुखजे ने कहा उनकी फिर इच्छा कहां उनके भीतर में क्या कुछ अभाव है? ठाकुर कहते हैं तातिबा दोष की। उसमें दोष क्या है? जल स्थिर थक ले ओ जल तरंग होले ओ जल जल स्थिर रहता है तो भी जल है तरंग होती है तो भी जल है शाप चुप करे कुंडली पाकि ले ओ शाप आ तिर्यक गति कोरे ऐके बैके चले ओ शाप सांप यदि कुंडली बना करके एक पूरा अपने को करके यदि सोता रहता है स्थिर रहता है तभी वह सांप है और सर्पा कृपाकार गति से चलता है तब भी वह स्थाप है बाबू जखन चुप करे छ तोखन जे व्यक्ति और जखन काज को छे तखनो से व्यक्ति बाबू जब बाबू अर्थात कि कोई धनी आदमी या ऐसा कोई जब चुप करके बैठे हैं तब भी वह वही व्यक्ति है और जब काज करते हैं कार्य करते हैं कर्म करते हैं तब भी वही व्यक्ति है। देखिए ये दोनों उदाहरण तीन उदाहरण ठाकुर देते हैं। क्या कहते हैं? जल स्थिर होने से भी जल तरंग होने से भी वही जल। सांप यदि कुंडली बनाकर के बैठा है, सोया है तो भी वही सांप। और सर्पाकार गति से चलता है तो भी वही सांप। बाबू जब बोलते हैं तो भी बाबू चुप बैठे हैं तो भी वही बाबू और बोलते हैं तो भी वही बाबू। किंतु यह तीनों उदाहरण जो है क्लासिकल वेदांत की दृष्टि से हम कहेंगे कि बाबू कार्य तभी करते हैं जब बाबू के भीतर में अभाव होता है। उसको धन चाहिए, शोहरत चाहिए, काम चाहिए, कांचन चाहिए वगैरह जो कुछ भी चाहिए। काम, क्रोध, लभ मद, मोह, मत्सर। तो यह जो षडरिपु जो है यह षडरिपु उसके भीतर में होंगे तो उसके भीतर में अभाव प्रकट होगा। अभाव की वजह से ही वह कर्म करेगा। तो वह एक वेदांतिक डेफिनेशन है कर्म की। किंतु यहां पर ठाकुर कहते हैं संतुष्ट चित्त से लीला के रूप में जो कार्य होता है वह भी बिना कार्य वो वो कार्य कोई संस्कार नहीं छोड़ेगा। वो कार्य जो है वो कहीं आपको कर्म के बंधन में नहीं डालेगा। ऑफ कोर्स यह सब हम इंडिविजुअल के लेवल पर कह रहे हैं। ब्राह्मण के लेवल पर लीला या तो कर्म का बंधन ना होना या तो संस्कार ना छूटना यह सब तो छोटे शब्द पड़ जाएंगे। ब्रह्म क्यों लीला करेंगे? वो वो प्रश्न ही जैसे कि कंट्राडिक्टरी है। ब्रह्म क्या कुछ करेंगे नहीं करेंगे? क्यों लीला करेंगे? वह सब प्रश्न जो है इन सब प्रश्नों का कोई उत्तर नहीं। ब्रह्म झूठा नहीं हुआ है। ब्रह्म की लीला जो है वह मुंह से वर्णन अभी तक नहीं हुई है। ब्रह्म लीला क्यों करते हैं? ब्रह्म की लीला क्या है? वह तो जब हम स्व अनुभूति करेंगे तभी वह हमको समझ में आएगा। और समझ में भी आने का क्या अर्थ है? यह सब्जेक्ट और ऑब्जेक्ट यह जब डिफरेंशिएशन है तब सब्जेक्ट को पता चलता है कि ऑब्जेक्ट का नेचर क्या है? किंतु वह जो सब्जेक्ट ऑब्जेक्ट डलिटी है वह भी तो ब्रह्म ज्ञान में मर्ज हो जाती है। मैं ब्रह्मन ही हो जाऊंगा और फिर मैं क्यों लीला कर रहा हूं पर्पस है कि नहीं है कि सिर्फ संतुष्टि की वजह से ही लीला हो रही है। तो वह सब जो अंडरस्टैंडिंग वह तो ब्रह्म ज्ञान के समय ही प्रकट होगी। एज ऑफ नाउ हम जिस अज्ञान के लेवल पे हैं हमारे लिए लीला ही एक शब्द है जो कि हमको पकड़ के रहना है। कर्म के पीछे में एक पपस होता है। कर्म के पीछे में एक अभाव होता है। अभाव की पूर्ति के लिए पपस की प्राप्ति के लिए कर्म किया जाता है। जबकि लीला जो है इसके पीछे में ना ही कोई अभाव है ना ही इसका कोई पपस है। वह सिर्फ संतुष्टि की वजह से ही वह सब लीलाएं होती है। तो यहां पे यह एक ठाकुर डिस्टिंशन खड़ी करते हैं अपार्ट फ्रॉम क्लासिकल वेदांत। तो यहां पर ठाकुर ने तीन उदाहरण दिए। उसके बाद में क्या कहते हैं? जीव जगत के बाद देवे के मन को रे जीव और जगत को आप सेपरेट कैसे करेंगे? आप माइनस कैसे कर देंगे? ता होले जे ओझने कम पड़े। यदि ऐसा होगा तो वजन में यानी कि वेट में कम पड़ जाएगा। बेलेर बीची खोला बाद दिल समस्त बेलेर ओझन पावा जाएना बेल का फल जो है उसके भीतर का जो कुछ भी है यदि बेल का फल आप खोलेंगे तो फिर उसका जो बाहर का शेल है उसको सेपरेट करके भीतर का वह जो यह होता है पल्प उसका जूस बनता है बेल का बेल फल का किंतु यह बाहर का शेल वगैरह आप बाहर निकाल देंगे उसके बीज वगैरह जो होंगे वो निकाल देंगे सिर्फ पल पे ही रखेंगे। आपको लगेगा यही उसका सार भार सार पदार्थ है बेल का बेल फल का। उसका जो बाहर का शेल है सिर्फ उसके प्रोटेक्शन के लिए ही था। उसको निकाल दीजिए। बीज वगैरह जो होंगे वह तो अखाद्य है। जूस बनाने में काम नहीं लगेंगे। उसको भी निकाल दीजिए। सिर्फ उसका जो पल्प है जिसमें से यह जूस बनता है वही एक रख दीजिए। तो फिर क्या होगा कि एक्चुअल बेल फ्रूट जो है उसका जो वेट है उसमें से सिर्फ आप एक पल्प ही एक्सट्रैक्ट करके उसका वेट लेंगे तो वजन में कम हो जाएगा। जो ओरिजिनल वेट है उससे यह कम हो जाएगा। तो ठाकुर कहते हैं कि ब्राह्मण और जीव और जगत तीनों को एक साथ में ही हमको साथ में ही ग्रहण करना है। यह जीव और जगत अलग से है ब्रह्मन में से और यदि वो सेपरेट करेंगे तो ब्राह्मण ब्राह्मण ही रहेगा। यह अंडरस्टैंडिंग गलत है और इसीलिए देखिए यह क्लासिकल वेदांत किस तरह से यह सब जिम्नेस्टिक्स करता है। क्लासिकल वेदांत भी कहता है कि यह जो जीव और जगत है उसका कोई वेट ही नहीं है। जो ब्राह्मण है वही 100% वेट है। यदि आप विशिष्ट अद्वैत या तो फिर जैसे कि क्लासिकल द्वैत है। क्लासिकल द्वैत क्या कहता है? यह है ईश्वर और यह है जीव जगत। ईश्वर का वेट यदि होगा 50% तो जीव और जगत का वेट होगा 50% तो यानी कि 10 केजी का 10 किलो का यह बेल का फल है। मुझे पता नहीं यूजुअली बेल फल का क्या वेट होता है अनुमान करके कर हम एक्सपेरिमेंट के लिए थॉट एक्सपेरिमेंट गेडांगकेन माने जर्मन वर्ड है। आइंस्टाइन ने इसको फेमस किया है। तो यदि एक थॉट एक्सपेरिमेंट करेंगे तो मान लीजिए कि एक बेल फ्रूट है। उसका 10 केजी वेट है। अभी यह क्लासिकल द्वैत वेदांत क्या कहता है कि यह बेल है उसमें से आपने यह जो शेल है और जो बीज वगैरह है वह सेपरेट कर दिया तो एक ब्राह्मण है और यह जीव जगत है तो ब्राह्मण का वेट होगा 5 किलो और यह जीव जगत का होगा 5 किलो। तो अभी जीव जगत सेपरेट करने से ब्रह्मन तो आधा हो गया उसका वेट। तो यह तो ठीक नहीं हुआ। अभी इसका सॉल्यूशन अद्वैत कैसे देता है? अद्वैत कहता है ब्रह्मन ही है। 10 केजी वेट जो है ब्रह्मन का वही है। यह जीव जगत जो कुछ भी आप देख रहे हैं ईश्वर, जीव और जगत वह तीनों मिथ्या है, माया है। उसका कोई वेट ही नहीं है। अर्थात कि जिस क्षण मुझे यह ज्ञान हो जाएगा कि अहम ब्रह्मास्मि यह जगत जो है मेरे लिए अदृश्य हो जाएगा। यानी कि अद्वैत वेदांत कहता है 50% वेट ब्राह्मण का है और 50% वेट है जीव और जगत और ईश्वर का। तो यहां पे अद्वैत वेदांत कहता है ब्राह्मण ही है 10 केजी वेट का ये जो जीव जगत वगैरह कुछ है ही नहीं। उस जीरो वेट है माने वो वो विदाउट वेट है वो वेटलेस जो स्पेस में जाते हैं ना अपना वेट जीरो हो जाता है तो इस तरह से वेटलेस है जीरो पर ग्रेविटी में वो चलते हैं किंतु यह अद्वैत वेदांत का डेफिनेशन हो गया ठाकुर कहते हैं कि देखिए ब्रह्मण ही है किंतु ब्रह्मण ही फिर ये जीव जगत के रूप में वो परिणत होते हैं। यानी कि यदि ठाकुर को इस उदाहरण में डालने का प्रयास करेंगे तो एक ही ब्राह्मण है। 10 केजी उसका वेट है। वो ब्राह्मण जब अपना स्वरूप चेंज करता है। गियर चेंज करता है तो जीव जगत में परिणत होता है। तो वही 10 केजी ही जीव जगत है। और वही फिर से गियर चेंज करता है तो ब्रह्मन में परिणत हो जाता है। वही 10 केजी वो ब्रह्मन ही है। अर्थात कि यह जो द्वैत वेदांत दोनों को सेपरेट करता है पल्ले के दो साइड पर रखता है और अद्वैत वेदांत एक ही साइड पर रखता है तो यह जो ठाकुर का लीला का जो कांसेप्ट है वो भी अद्वैत वेदांत को ही फॉलो करता है। किंतु वही है कि अद्वैत वेदांत की दृष्टि से यह जीव जगत और ईश्वर वगैरह माया के आवरण की वजह से एक आउटसाइड में कहीं पर प्रोजेक्ट होते हैं। जबकि ठाकुर का कांसेप्ट है कि ब्रह्मन ही स्वरूप चेंज करके कार्य करके जीव और जगत में परिणत होते हैं। सो दिस इज अ वेरी क्रिटिकल डिस्टिंशन। और मेरी दृष्टि से कहें तो ठाकुर का यह जो एक्सप्लेनेशन है इट साउंड्स मच मोर लॉजिकल। क्योंकि आप एक जगत को प्रोजेक्ट करते हैं तो वह तो एक एक्सटर्नल प्रोजेक्शन हो जाता है ना। अपार्ट फ्रॉम ब्रह्मन। हालांकि जो कुछ भी देखेंगे ब्राह्मण ही है किंतु फिर भी फिर भी एक तो एक प्रोजेक्शन है। जबकि यहां पे ब्राह्मण ही वो गियर चेंज करके वो अपना स्वरूप बदल करके अलग-अलग रूप से दिखाई देते हैं। तो यहां पे देखिए कि ठाकुर का एक्सप्लेनेशन किस तरह से अद्वैत वेदांत से एक क्रिटिकल डिस्टिंशन खड़ा करता है। ब्रह्म निर्लिप्त ठाकुर कहते हैं ब्रह्म निर्लिप्त है। वायु ते सुगंध दुर्गंध पावा जाए किंतु वायु निर्लिप्त वायु जो है हवा जो है उसमें सुगंध और दुर्गंध मिलती है किंतु वायु जो है वो निर्लिप्त है। ब्रह्म आर शक्ति अभेद ब्रह्म और शक्ति अभेद है। यह ठाकुर का महावाक्य है। जैसे उपनिषद का महावाक्य है। अहम ब्रह्मासी वगैरह जो चार महावाक्य है। यहां पे यदि आप कथामृत को स्टडी करेंगे तो मुझे लगता है कि वन ऑफ द महावाक्य दूसरे भी होंगे। किंतु एक जो वन ऑफ द मोस्ट फंडामेंटल और क्रिटिकल जो महावाक्य है ब्रह्म और शक्ति अभेद से आध्या शक्ति ते जीव जगत होए छे। उस आध्या शक्ति से ही जीव जगत हुए हैं। देखिए ठाकुर ने कितना सुंदर उदाहरण दिया है। वायु में सुगंध और दुर्गंध होती है किंतु वायु निर्लिप्त है। और एक जगह पर ठाकुर ऐसा ही एक सुंदर उदाहरण देते हैं। मैंने जब पहली बार पढ़ा था तो आई वास सो स्ट्रक कितना पावरफुल उदाहरण है। मतलब जिन्होंने जगत का सही-सही में स्टडी किया होगा वे लोग इस तरह के उदाहरण दे सकते हैं। ठाकुर क्या कहते हैं? जब आप अग्नि जलाते हैं और उसका जो धुआं होता है काले कलर का वह यदि दीवाल को लग जाता है तो दीवाल काली पड़ जाती है। किंतु यही काला धुआं जब आकाश में उठता है तो आकाश काला नहीं पड़ता है। आकाश का जो वही नील रंग है नील रंग ही रहेगा। आप हजार अग्नि जला दीजिए। हजार धुआं डाल दीजिए। मोमेंटली जब तक धुआं फैला है हवा में तब तक आपको वो दिखाई देगा काला। किंतु जैसे ही हवा का एक झपटा आया और यह धुआं चला गया तो आकाश जैसे नील रंग का है वैसे ही नील रंग का ही रहेगा। तो यहां पे भी देखिए कि ब्रह्म अपने से निर्लिप्त है। ब्रह्म की सरफेस के ऊपर में यह सब लीलाएं चल रही है। किंतु भीतर में यदि देखेंगे उसका जो हार्ट है उसका जो कोर है वहां पर किसी भी तरह का अभाव नहीं है। भीतर में अभाव है और बाहर में कर्म चल रहा है। ऐसा नहीं भीतर में संतुष्टि है। आत्माराम है। आत्मा संतुष्ट होकर के बैठे हैं। किंतु फिर भी बाहर में यह लीला चल रही है। यह है ठाकुर का मॉडल और इसीलिए ठाकुर कहते हैं ब्रह्म और शक्ति अभेद वही आध्या शक्ति से ही जीव जगत हुआ है। इंटरेस्टिंगली देखिए कि आजकल ठाकुर के अंडरस्टैंडिंग या तो फिर ठाकुर की यह जो फिलॉसोफी है उसको समझाने के लिए लोग विभिन्न विभिन्न शब्द प्रयोग करते हैं। वो जो आयन महाराज है उन्होंने एक विज्ञान वेदांत विज्ञानवाद एक खड़ा किया है। पहले एक समय था कि ठाकुर के वेदांत को शाद्वैत कहा जाता था। शाक्त प्लस अद्वैत अर्थात कि शाक्तद्वैत अद्वैत का संपूर्ण उसमें है कि अद्वैत नहीं है यह विशिष्ट अद्वैत भी नहीं है। द्वैत अर्थात कि यदि सिंपल सा उदाहरण दें तो मां और बच्चा मां बच्चे को जन्म देती है। फिर मां और बच्चा चाहे जितना भी वह एक दूसरे के क्लोज हो, समीप हो, प्रेम करते हो, किंतु बच्चा हमेशा सेपरेट ही रहेगा मां से। और वो हो गया द्वैत वेदांत। विशिष्ट अद्वैत है कि मेरा देह है, देह के विभिन्न ऑर्गन्स है, आंख है, कान है, हाथ है, पैर है वगैरह-वगैरह। तो यह जैसे कि ब्रह्मन है इस देह और ब्रह्मन के भीतर में यह विभिन्न तरह के ऑर्गन्स है। ब्रह्म के भीतर में ही डिफरेंट-डिफरेंट कंपार्टमेंट्स आपको मिल जाएंगे। यह हो गया विशिष्ट अद्वैत और अद्वैत वेदांत कहता है ब्राह्मण ही है। उसके अलावा और कुछ नहीं है और ब्राह्मण के भीतर में भी कोई कंपार्टमेंट नहीं है। लीला प्रसंग जब स्टडी कर रहे थे तो शरद महाराज का डेफिनेशन हमने देखा था। सजातीय भेद विजातीय भेद और स्वगत भेद। सजातीय भेद विजातीय भेद अर्थात कि यहां पर ब्राह्मण है वहां पर शैतान है ऐसा नहीं तो वह भी नहीं है सजातीय भेद कि पृथ्वी पे एक ब्राह्मण है चंद्र पे दूसरा ब्राह्मण है मार्स पे तीसरा ब्राह्मण है ऐसा भी नहीं है एक ही ब्राह्मण है किंतु स्वगत भेद अर्थात कि ब्राह्मण के भीतर में ही वही एक यूनिफाइड होल ब्राह्मण ही है किंतु उसके ऊपर में समुंदर की लहरों की तरह तरंगे उठती रहती है जिसको को कि हम कहेंगे लीला नहीं कि माया। तो यह जिस तरह से लीला प्रसंग में शरद महाराज ने एक्सप्लेन किया था। यहां पर ठाकुर एक्सप्लेन करते हैं कि वही लीला या माया उसको मैं कहता हूं शक्ति और वही आध्या शक्ति ही जीव जगत हुई है। और आध्या शक्ति प्रकट होती है इसलिए नहीं कि ब्रह्मन के भीतर में विकार प्रकट हुआ है। ब्रह्मन के भीतर में कंपार्टमेंटलाइजेशन हुआ है। ब्रह्मन के भीतर में अभाव या तृष्णा प्रकट हुई है। ब्रह्मन वही तटस्थ निराकार भावमय ही है। बस वही बात है कि जैसे वह मधुमक्खी अपने मन की आनंद से वह कभी-कभी वह गुनगुनाती है। तो यहां पर भी ब्राह्मण अपने आनंद से ही यह लीला प्रकट करते हैं। व्हिच इज अगेन कंट्राडिक्शन इन टर्म्स बट जैसे हमने कहा कि वेदांत इटसेल्फ ऑन द हाईएस्ट लेवल इट इज नथिंग बट कंट्राडिक्शंस। और यह कंट्राडिक्शन तभी समाप्त होगी जब कि हम उस हाईएस्ट लेवल को अनुभव करेंगे। तो आज यहीं तक अभी कल मिलते हैं। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु ओम