Transcript
तो आज श्री रामकृष्ण कथामृत हमने ऑलरेडी एक चैप्टर का हम पाठ कर रहे थे की किस तरह से दक्षिणी स्वर में नरेंद्र आए हैं और ठाकुर के साथ में एक दिन रहे हैं और किस तरह से ठाकुर उनको अपने पूर्व पूर्वक कथा बता रहे हैं पूर्व कथा अर्थात की ये भक्तों के आने के पहले की बातें की किस तरह से वो विभिन्न लोगों को मिलते थे जैसे की यह था कृष्णा किशोर था हलधारी था वैष्णव चरण था वगैरह सब के बड़े में हमने बात की अभी उसे दिन रात को तो सब लोग वहां पर ठाकुर के घर में रुक थे दूसरे दिन सुबह की बात है वह उसे दिन क्या हुआ की सब लोग ठाकुर ने कहा की तुम लोग सब एक सुबह को स्नान वगैरा करने के बाद में सब लोग ठाकुर के घर में इकट्ठा हुए और ठाकुर ने कहा की तुम सब लोग मेरे सामने एक साथ बैठो मैं तुमको देखना चाहता हूं तो वो वो प्रसंग भी हमने डिस्कस किया की ठाकुर किस तरह से अपने भविष्य के सॉन्ग जो है उसका गठन जो कर रहे थे उसे समय हमको पता नहीं चल रहा था शायद इन बच्चों को भक्तों को शायद पता ना चला हो की ठाकुर किस तरह से इन सबको प्रेम और भालू भाषा के एक सूत्रों में बंद रहे हैं जिससे की ठाकुर के जान के बाद में भी किसी के साथ में कुछ भी होता है तो सभी लोग इकट्ठा हो जाएंगे हमने देखा था की किस तरह से नरेंद्र उसे समय वाराणसी में था परमधास के साथ में वो संस्कृत वगैरा और अभ्यास कर रहा था डिस्कशन कर रहा था अचानक पता चला की बलराम बाबू का देहांत हो गया है तो नरेंद्र स्वामी जी कहते हैं की मैं जाऊंगा मुझे कोलकाता वापस जाना पड़ेगा मेरे गुरु भाई का देहांत हो गया है तो यह बात सुन करके अभी यह ट्रेडिशनल सन्यासियों का जी तरह से एक कॉन्सेप्ट होता है की जिन्होंने घर वगैरा सब कुछ त्याग किया तो बंधु बंधु उनकी माया तो कहां उनके पास में रहने वाली है तो जब ये कहते हैं प्रमाण दास बाबू की आप तो सन्यासी हैं आपको तो इस तरह की सब जो अटैचमेंट है माया जो है वो सत्य कर देनी चाहिए गुरु भाई है तो क्या हुआ ये तो सब माया का ही तो भाग है तब स्वामी जी उसका क्या उत्तर देंगे कुछ उत्तर नहीं दे पे किंतु वहां से छोड़कर के फिर वो कोलकाता चले आए थे तो इस तरह से भालोबासा प्रेम के बंधन में बैंड करके ठाकुर सबको गए थे और फिर वही प्रेम का जो बंधन है देखिए की किस तरह से ये सब कम करता है की स्वामी जी उसे समय अमेरिका में थे तो इस तरह की अफवाह उड़ रही थी की वह अभी दुराचार कर रहे हैं स्त्रियों के साथ में र रहे हैं जो खाद्य कहा जाता है मां हिंदू धर्म में उसे तरह का खाना का रहे हैं तो यह सब देख करके सुनकर के बाबू राम महाराज ने क्या किया था की वह नगर मठ के वो बाजार में खड़े रहकर के वो एक पंपलेट मारना शुरू किया था की नरेंद्र जो है वो अभी हमारे रामकृष्ण संगम में वो उसका हिस्सा नहीं है वो अमेरिका जाकर के कुछ किस तरह का वो दुराचार कर रहा है हमको पता नहीं हम लोग उसको छोड़ दे रहे हैं इस तरह से वो पंपलेट मत ना उन्होंने शुरू किया था किंतु देखिए की ये सामयिक आपस में मतभेद होने के बाद में भी जब स्वामी जी खुद वापस ए गए उसे समय जब वो एक मीटिंग हुई थी बलराम भवन में और स्वामी जी ने कहा की हम लोग रामकृष्ण मिशन संगठन की स्थापना करते हैं फाइव में पांच में 1897 के दिन ये मीटिंग हुई थी तो हम लोग रामकृष्ण मिशन संगठन की स्थापना करता है ऐसा करके वो जब ऐसा ठीक हुआ उसे दिन फिर बाबूराम महाराज स्वामी जी को क्या खाने लगे की अरे नरेंद्र तुम्हारा तो यह सब विदेशी विचार है ठाकुर की भाव धारा के साथ में तो यह कुछ मिलता ही नहीं है तो यह सुनकर के स्वामी जी इतने दुखी हो गए थे की वह छठ के ऊपर चले गए थे फिर सबको डर लगा की वो बेचारे क्या दुख के मारे क्या नहीं कर देंगे क्या हो कुछ ठीक नहीं तो फिर जब राजा महाराजा वगैरा जाकर के उनको माना करके ले आए बाबूराम महाराज के मां का यह संदेश बहुत दोनों तक रहा था फिर 1911 में 12 में उसको काशी में थे उसे समय स्वामी जी के कंप्लीट वर्ष को उन्होंने बड़ी डिटेल में पढ़ा था तब कहानी जाकर के उनका यह संदेश दूर हुआ तो यह तो किंतु देखिए की संदेह यदि हैवी सही बाबूराम महाराज एक बार बेलूर मठ में नाराज हो गए थे राजा महाराजा के साथ में है ना की किसी कम को लेकर के बोला मैं जा रहा हूं ऐसा करके वो बाहर निकालना शुरू कर दिए मटके बाहर एकदम ठाकुर प्रगति हुए और उनका वो गमछा पकड़ करके खींच और बोला अटरिया पकड़ करके चाबी को था ये चंद अब बेटा तुम कहां जाओगे तो ये इन लोगों के भीतर में मतभेद फिलोसॉफिकल डिफरेंस ऑफ ओपिनियन रहने से भी ये जो प्रेम और स्नेहा का जो बंधन है ठाकुर इन सबको इसमें बंदे थे तो वो कभी टूटने वाला नहीं था तो वो प्रसंग ठाकुर यहां पर कहते हैं की तुम सब लोग एक साथ में बैठो चटाई के ऊपर में मैं देखा हूं और फिर सब बैठे तो ठाकुर देख कर के बड़े ही आनंद करने लगे तो इस संघ की स्थापना ठाकुर इस समय कर रहे थे किसी को समझ में नहीं ए रहा था क्योंकि ऊपर ठाकुर किस तरह की ठाकुर के भीतर में जो डेथ है अभी अवतार बोले तो ठीक है चलो अवतार है तो क्या है हम लोग तो अवतार की पूजा पाठ करेंगे और फिर हम खुश होकर के अपने अपने कम में ग जाएंगे फिर ठाकुर को प्रार्थना करेंगे अवतार को की हमारा यह कम कर दो वो कम कर दो तो एक हम इंडिविजुअल लेवल पे अवतार को समझते हैं की हमको आशीर्वाद देंगे हम जैसे किसी कष्ट में या तो किसी समस्या में पद जाएंगे तो हमारा उधर करेंगे हमारा हाथ पकड़ करके इस भवसागर को पर करवाएंगे इस तरह की हमारी ये गाना अवतार के बड़े में रहती है किंतु अवतार सिर्फ व्यक्तिगत उधर के लिए नहीं आते अवतार आते हैं समाज के संपूर्ण कल्याण संपूर्ण समाज के कल्याण के लिए इसीलिए स्वामी जी ने कहा है की ठाकुर के आने से इस बार ब्रह्मा कुंडली ने जागृत हो गई है हमारी इंडिविजुअल कुंडली तीनों लोक की ब्रह्मा कुंडलिनी जो होती है वह स्वयं जागृत हो गई है और इसीलिए पूरे विश्व का उत्थान होना है यहां पर राष्ट्र का समाज का सिविलाइजेशन का पूरे धर्म का उत्थान ये वर्ल्ड अवतार जिसको कहते हैं उनके आने से होता है तो ये ठाकुर सिर्फ उनको इंडिविजुअल लेवल पे व्यक्तिगत लेवल पे साधना के लिए ही तैयार नहीं कर रहे थे वो सभी एक एक स्तंभ बन के एक बड़े ही संघ की रचना करें संघ के आधारभूत स्तंभ बने यह सभी उनके शिष्य इस तरह से इनको तैयार कर रहे थे इनके सर पर उन्होंने एक विश्वव्यापी संघ का निर्माण करना था इनके कंधे पर वो विश्वविद्यालय पूछा ऐसा क्यों किया तो ठाकुर बोलते हैं की मैं देख रहा हूं की वो कितना भर सहन करने के लिए सक्षम है तो यही शरद महाराज ने बाद में पूरे रामकृष्ण संघ का कार्य वह संभाल था और साथ में ही श्री मां शारदा देवी के वो हरि थे जो कुछ भी कम होगा मां का वो सब शरद महाराज करते थे यदि मां कोलकाता में है और शरद महाराज को कहानी बाहर जान की जरूर पद गई एक बार काशी में झगड़ा हो रहा था तो वहां पे काशी में जाकर के वहां पे वो झगड़ा मिटाने की जैसे ही वो वहां से जान लगे तो मैन क्या कहा की पहले मुझे यहां से जान दो फिर तुम जहां पे जाना हो तो जाना तो मां वहां पर थी वहां से वह जय रामबाती चली है फिर शरद महाराज को आजा मिली की वह काशी जाए तो इस तरह से पूरे संघ में किसका क्या कर्तव्य है को कौन क्या वो हिस्सा उसका है कौन क्या रोल निभाएगा ये सब ठाकुर उसे समय नक्की करके गए थे तो देखिए मास्टर वहां से भी किस तरह की घटनाओं को छोटे-छोटे रूप में हमारे सामने रखते हैं और उसमें कोई कंट्री नहीं देते वो भी एक बहुत बड़ी बातें मास्टर महाशय चाहते हैं तो प्रत्येक घटनाओं के पीछे में लंबी लंबी कंट्री दे सकते थे क्योंकि उन्होंने तो अपनी नजरों से रामकृष्ण संगति स्थापना उसका शुभ विस्तृत पूरे विश्व में उसका विस्तृतिकरण देखा था अपनी ही नजरों से उन्होंने स्वामी जी को अमेरिका में सफल होते हुए देखा था तो ये सब कुछ उनको पता था फिर भी जब कथामृत लिख रहे थे तब उन्होंने ऐसा नहीं कहा की ये वही नरेंद्र है जो की वर्ल्ड पार्लियामेंट ऑफ रिलिजन में जाकर के बोलने वाला है ब्रदर्स और सिस्टर ऑफ अमेरिका ऐसा सब वो कुछ नहीं कहते हैं हमारे सामने बहुत ही सहज सरल रूप से के बाद एक घटनावली प्रस्तुत किया जाते हैं और हमको समझना है की प्रत्येक घटना के भीतर में कितना गहन अर्थ छुपा हुआ है दो तरह के अर्थशास्त्र की घटना परंपरा में और ठाकुर के उपदेश में छुपा है सर्वप्रथम तो एक सर्व मान्य एक आध्यात्मिक अर्थ होता है ठाकुर जब कहते हैं की नित्यम जीव मुक्त जीव नित्य जीव फिर वो बुद्ध जीव इस तरह से वह जो नित्य मुक्त जो है सो जो बात करते हैं ठाकुर तो हमको समझना है की वो हमारे किस तरह से साधना के क्षेत्र में हमने कितना प्रगति की है उसके अनुसार वह बता रहे हैं कौन से जीव का क्या स्थान है किंतु यह व्यक्तिगत साधना के लेवल पे हो गया किंतु साथ-साथ में बहुत सारे उपदेश ठाकुर के ऐसे हैं जो की संघ के लिए कम करते हैं इंडिविजुअल के क्षेत्र में तो कम करते ही हैं संघ के क्षेत्र में भी कम करते हैं और इस के उपदेश जैसे-जैसे हम पढ़ने जाएंगे उपदेश घटनावली जैसे-जैसे पढ़ने जाएंगे वैसे-वैसे हमको यह स्पष्ट होता है ये कहता है ना की लाटू महाराज की अपने यहां पे तो सिर्फ इतने ठाकुर कहते हैं की लाटू ने कहा की अरे यहां पे तो सिर्फ इतनी ही घोड़ा गाड़ी है वहां ब्रह्म समाज में कितनी साड़ी घोड़ा गाड़ी होती है हम भी यहां पे ऐसा करते हैं कभी-कभी की जो उत्सव होता है तो हम कर वगैरा हम काउंट करते हैं उसके हिसाब से पता चला है कितने देवोटी आए होंगे या आए हैं वैसे तो वो प्रसाद का वो जो कितना तैयार किया होता है वो कितना गया उसके हिसाब से भी तो पता चला है किंतु तो ये लाती महाराज उसे समय जब कहते हैं तब ठाकुर वो हंसते कहते हैं की उन लोगों का सेंस ऑफ फैकेल्टी ऑफ ऑर्गेनाइजेशन नहीं है आज ब्रह्म समाज वाले ऐसा उनकी बात सुनकर के हमको हंसी आई है ब्राह्मी समाज खत्म हो गया उनका कितना ही चाहे वीडियो ऑर्गेनाइजेशन हो रामकृष्ण मिशन सिर्फ टीका नहीं रहा है फल फूल रहा है यहां उत्तर और उत्तर प्रगति हो रही है तो ये संघ और व्यक्ति इस संघ के ऑर्गेनाइजेशन लेवल पे वर्ल्ड लेवल पे और व्यक्तिगत लेवल इस साधना और विकास किस तरह से होता है सब कुछ एक साथ में ठाकुर की बटन में ये भुना हुआ है वो एक जैसे की वो सूत्र मनी गाना देवी जैसे गीता में भगवान श्री कृष्णा कहते हैं की सूत्र एक ही सूत्र है उसमें बहुत सारे मनी जो पर्व हुए हैं तो वैसे ही मनी रूपी विभिन्न प्रसंग एक ही रामकृष्ण सॉन्ग के सूत्र के रूप में सब पर्व हुए हैं अभी इस में ठाकुर वो दूसरे दिन सुबह को उठकर के नरेंद्र वगैरा के साथ में बात कर रहे हैं इस का आगे एक प्रसंग है अब के काली मंदिर है और राधाकांत तेरे मंदिर है मंगल आरती हुए थे उसे दिन रात को नरेंद्र वगैरा सो गए थे दूसरे दिन सुबह को स्नान वगैरा करके ठाकुर के कमरे में आए देखा की काली मंदिर में और राधाकांत के मंदिर में मंगल आरती हो रही है वो शंकर घंटाबाजी तेज है शंकर घंटा बाज रहा है कालीबाड़ी पुष्पों ध्यानी ठाकुर डर गुजरात पुष्प चौहान आरंभ हुई है भक्तों ने उठकर के देखा की काली मंदिर के पुष्प उद्यान में भगवान की पूजा के लिए पुष्पा चयन आरंभ हुआ है वह प्रभाती राघव की लहरी से मोहब्बत बाज रहा है हमको पता है की ठाकुर के कमरे के पास में ही मोहब्बत बोल करके वो जगह थी एक घर था जहां पर मां शारदा देवी भी रहती थी और वहां पर वहां से ही यह जो शहनाई बजाने वाले इकट्ठा हो करके दोनों साइड में नरेंद्र आदि भक्तगण प्रातः कृत्य समापन करिया ठाकुरर कच्चे आशा उपस्थित हुए लेने नरेंद्र आदि भक्तगण प्रातः कृत्य समाप्त करके ठाकुर के पास में आकर के उपस्थित हो हुए ठाकुर हास्य मुख उत्तर पूर्व बरअंदर पश्चिम क्षेत्र हास्य मुख्य उत्तर पूर्व वरांडा के पश्चिम कोनी में खड़े हैं नरेंद्र कहता है की 55 जो नानपंथी साधु वसीयत से देख लो मैंने देखा की पंचवटी में कुछ नानक पंथी साधु बैठे हैं श्री राम कृष्णा कहते हैं ठाकुर ने कहा हां वो कल आए थे फिर नरेंद्र को कहते हैं तुम लोग सब एक साथ में चटाई पर बैठो मैं देखा हूं भक्ति सब चटाई पर बैठ गए तो उनको देखकर के ठाकुर आनंद करने लगे फिर उनके साथ में वार्तालाप करने लगे तो यहां तक हमने पिछली बार देखा था अभी आगे श्री रामकृष्ण नरेंद्र आदि के प्रति भक्ति इसर टैंक भालोबाशिल विवेक वैराग्यो अपनी आश्रय भक्ति ही सर है भक्ति ही सर्व वास्तु है यदि भगवान के ऊपर में प्रीति प्रेम को तो विवेक वैराग्य अपने से आते हैं नरेन अच्छा स्त्री लोकनीय साधन तंत्र अच्छे नरेंद्र ने कहा अच्छा स्त्री लोग को लेकर के साधन करने की बात तंत्र में है श्री राम कृष्णा वह सब अच्छा रास्ता नहीं है बड़ों कठिन बड़ा कठिन है और पाटन प्राय हमेशा पाटन होता राहत है वीर भावे साधन दासी भाव साधन और मंत्र वीरभाव से साधन होता है दासी भाव से साधन होता है और मंत्र भाव से साधन होता है वीर भाव में स्त्रियों को लेकर के साधन दासी भाव में यह सोचना की मैं जगदंबा की दासी हूं और मंत्र भाव अर्थात की मी यशोदा जैसे बाल कन्हैया को बाल कृष्णा को लेकर के जो उनके पीछे पीछे दौड़ती थी उनको दही खिलौने के लिए व्याकुल रहती थी उनकी बाल सुलभ चेषताओं को देखकर के उनका मां हरसूद फूल हो जाता था वह मंत्र भाव मातृभाव के साथ में संतान भाव यह जैसे की ठाकुर कहते हैं संतान भाव बड़ों शुद्ध भाव संतान भाव जो है मैं छोटा बच्चा हूं और मां जगदंबा स्वयं मेरी मां है इस तरह से मैं मां की गॉड में खेलते हूं मां को कभी-कभी परेशान भी करता हूं मां झूठ का वो मेरे पे नाराज भी होती है तो ये जो भाव है वह है संतान भाव ठाकुर कहते हैं अमर मातृ भाव दासी भाव ओ भालू मेरा मंत्र भाव है दासी भाव भी अच्छा है वीर भावे साधन बड़ों कठिन वीरभाव से साधन बड़ा कठिन है संतान भाव बढ़ो शुद्ध भाव संतान भाव बड़ा ही शुद्ध भाव है अभी यह जो पूरा भाव साधना के बड़े में है की किस तरह से हम भाव को लेकर के साधना करते हैं यह हमको पता है की चैतन्य महाप्रभु के आने के बाद में ये भाव साधना का प्रचलन भारत में हुआ था हालांकि हमारे वेद और उपनिषद में देखेंगे की सभी तरह की साधनाओं का वर्णन सूक्ष्म रूप से या तो बिजारूप से तो है ही है शायद किसी किसी साधना का विस्तृत वर्णन होगा किसी साधना का बड़ा ही संक्षिप्त वर्णन होगा किंतु सभी साधनाओं का वर्णन तो है ही किंतु जी तरह से यह श्रीमद् भागवत और फिर बाद में चैतन्य महाप्रभु के जीवन में यह भाव साधना का प्रधनाया स्थापित हुआ इस तरह से कभी-कभी हमको लगता है की ये भक्ति और भाव बाद में भारत में प्रवेश हुआ है क्रिश्चियनिटी के प्रवेश होने के बाद में या तो फिर क्रिश्चियनिटी के आविष्कार के बाद में भगवान जी तरह ईश्वर के प्रति भक्ति भाव की जी तरह से वह प्रार्थना स्थापित करते हैं भक्ति भाव का प्रचार करते हैं तो इस में से आखिर में डेवलप हो करके यह विभिन्न भाव बाद में भारत में प्रसारित हुए इस तरह की एक मान्यता है किंतु यह मान्यता मान्यता ही है और उन्हें लोगों के लिए है जो की भारत को सभी दृष्टि से हैं दिखाने का पर्यटन करते हैं हमको पता है की आध्यात्मिकता भारत का ही सर्वश्रेष्ठ इस जगत को अवदान है हमने विश्व को विज्ञान का अवदान दिया मैथमेटिक्स विज्ञान गणित विज्ञान का उद्यान दिया एस्ट्रोनॉमी ज्योतिष शास्त्र का अवदान दिया हमारा जो भारतीय जिसको कहेंगे की समाज व्यवस्था उसे समय मोहनजोदड़ो हड़प्पा कई अवशेष को देखेंगे तो उसे समय इतना एडवांस था तो वह सभ्यता ने हमारे भारत देश ने विश्व को दिया है किंतु सर्वश्रेष्ठ हमारा अवदान है आध्यात्मिकता स्पिरिचुअलिटी साइंस ऑफ स्पिरिचुअलिटी स्पिरिचुअलिटी इस तरह से आपको किसी चीज में विश्वास नहीं कर लेना है जैसे की आ ठाकुर जैसे की स्वामी जी कहते हैं की दो तरह के आध्यात्मिक भावनाएं हैं दो तरह के आध्यात्मिक जगत है दो तरह की आध्यात्मिक सरिता से इस जगत में एक तो है की व्यक्ति के ऊपर में आधारित जैसे की जीसस के ऊपर में आधारित क्रिश्चियनिटी जैसे की मोहम्मद के ऊपर में आधारित इस्लाम यदि आप ये कहे की जीसस बोल के कोई व्यक्ति था ही नहीं तो पुरी क्रिश्चियनिटी का अस्तित्व प्रश्नार्थ उसके ऊपर में प्रसनर ग जाएगा स्वामी जी यह बात कहते हैं की उनका क्रिश्चियनिटी का अस्तित्व या तो फिर जुड़ाइएसएम जिसको हम यहूदी धर्म कर लेते हैं उसका यह तो इस्लाम धर्म उसका अस्तित्व एक प्रॉफिट के अस्तित्व की ऐतिहासिक उसकी धरना के ऊपर में अवस्थित है यदि वो परफेक्ट था तो उनका धर्म है यदि आप कहेंगे की वो प्रॉफिट थे ही नहीं तो पूरे धर्म के फाउंडेशन में अप्रश्नत चिन्ह ग जाते हैं किंतु स्वामी जी क्या कहते हैं की राम और कृष्णा की महानता ये नहीं थी अपने हिंदू धर्म के बड़े में की वो अवतार थे स्वामी जी कहते हैं की राम और कृष्णा की महानता वो थी की उन्होंने वेदांत धर्म की स्थापना वेदांत धर्म का प्रचार किया वेदांत धर्म के यह जो बेसिक उपदेश प्रिंसिपल से टीचिंग से उसको उन्होंने जनसाधारण में फैलाएं तो इसीलिए यदि आप यह कहते हैं की अपने यहां पर हिंदू धर्म में जो भाव साधना वगैरा और कहानी से ली गई है तो वो बात बिल्कुल गलत होगी क्योंकि यह आ भाव साधना कहो ना की यह निराकार साधना को अद्वैत साधना की सरकार साधना भारत में यह दो तरह से दोष ड्रीम या तो दो शाखाएं दिखने को मिलती है निराकार साधना और सरकार साधना तो यह दोनों ही वही उपनिषद में दोनों के बीच है इस को बाद में वेद में दोनों के बीच है और इस को बाद में उपनिषद के रूप में निराकार साधना उपनिषद के द्वारा और विस्तृत और ज्यादा उसका प्रचार हुआ ज्यादा डेवलपमेंट हुआ और भक्ति शास्त्र में सरकार साधना का डेवलपमेंट हुआ तो यह दोनों सरिता जो है सरकार और निराकार दोनों के जो बी हमारे वेद में पे जाते हैं वेद में भी और उपनिषद में भी बाद में शंकराचार्य ने अद्वैत वेदांत वेदांत की फिलासफी का डेवलपमेंट किया माधवाचार्य उन्होंने वही तो वेदांत या तो फिर रामानुजाचार्य ने विशिष्ट अद्वैत वेदांत की उसका डेवलपमेंट किया उसका विस्तृत करण किया और उसको अच्छे से लिपिबद्ध किया किंतु इन सबका सी या तो बी हमको वही वेद में देखने को मिलता है इसीलिए यह भाव साधना के बड़े में आ जो आ अभी भाव साधना इत्सेल्फ हमारे सॉन्ग में इस तरह से बात है की भाव साधना तो है जैसे की आ सखिया भाव है दासिया भाव है मातृ भाव है वीरभाव है संतान भाव है सब तरह के भाव है किंतु अपने सॉन्ग में हमने अपने आ प्रेसिडेंट महाराज वाइस प्रेसिडेंट महाराज वगैरा से सब ने सुना है की हमारे लिए है संतान भाव संतान भाव बड़ा ही शुद्ध भाव है ठाकुर खुद संतान भाव के बड़े में यह कहते हैं की हम हम कहेंगे की ठाकुर ने खुद ने तो सभी भावों के साधना की किंतु जैसे की वीरभाव की साधना करने के लिए जो शुद्ध अपना मां जो एकदम परिसुद्ध होना चाहिए एकदम कठोर होना चाहिए की आप भोग के किनारे पर खड़े हैं किंतु वहां पर पर फिसल करके भोग में डब नहीं जाते हैं वह भयानक पावर अपने में होना चाहिए वीर भाव वगैरा की साधना करने के लिए ठाकुर कहते हैं ना की अचलानंद वगैरा तांत्रिक साधना करते हैं तो पहले तो करंपन करते हैं मदिरा का पान करते हैं तो उसके जितने भी बाकी सब उसके साधन उसके शिष्य कहो ना की उसके संगी कहो उसको देखा तो वो सब करण पान करके वो नसे में धुत्त होकर के अनाचार करने की शुरुआत कर देते हैं किंतु एक अचलानंद को देखा की वो स्थिर होकर के जाप करता है तो ये करण पान करना फिर ये स्त्रियों को लेकर के साधना करना हां आप का सकते हैं की यह सब शास्त्र का भाग है किंतु वह करने की जो क्षमता जो है हमने ठाकुर के बड़े में देखा की भैरवी ब्राह्मणी एक दिन एक युवती को लेकर के आई फिर उसको निर्वस्त्र करके उन्होंने कहा की उसके गॉड में अपडेट किया ठाकुर को कहा तो ठाकुर कहते हैं यह किस तरह से संभव है किंतु फिर जैसे ही वह तुम मत हो उन्होंने वो मां का नाम लेकर के इस तरह से वो भाव प्रकट हुआ की वो जगत माता स्वयं है जगतद्री जगन माता स्वयं है ये सब भाव उनके मां में प्रगति हुआ फिर वो इस तरह से उनके तो वो जो जिसको कहते हैं ना की वो यदि शिशु होता है शिशु के मां में कभी भी किसी भी तरह का कम भाव प्रकट नहीं होता इसलिए आखिर में ठाकुर कहते हैं मेरा संतान भाव संतान भाव बड़ा ही शुद्ध भाव है तो ये संतान भाव धरण करके ठाकुर ने वीरभाव की साधना की थी और इसीलिए उनमें वो सफल हुए थे किंतु हम लोगों में तो वह सब करने की कोई क्षमता ही नहीं है इसलिए शुद्ध संतान भाव जिसमें की हम वीरभाव को पूरा दूर रखें और फिर हमारे हमारे सीनरी से हमने सुना है की एक तो दसीभाव हमारे साधुओं के लिए अपने भक्तों के लिए एक तो दसीभाव एक संतान भाव और तीसरा शांत भाव यह तीन भाव हमारे लिए श्रेष्ठ है इन तीनों भाव की साधना करने से हमारे सामने कोई बहुत बड़ा जो कम खड़ा नहीं होता है महावीर का जी तरह से 10 या भाव है इस तरह से जी तरह से ऋषियों का शांत भाव था वैसे शांत भाव और ठाकुर का सभी स्त्रियों के प्रति मातृभ था इस तरह से उनका खुद का संतान भाव ये तीन भावों के साधना हमको रामकृष्ण सॉन्ग में करनी चाहिए रामकृष्ण सॉन्ग के साधुओं को और भक्तों को है इसलिए जब नरेंद्र यह प्रश्न किया तब ठाकुर ने कहा की भक्ति ही सर है बाकी सब साधना में आप यदि जाएंगे तो आपका पाटन होने की संभावना सबसे ज्यादा है नानपंथी साढ़ौरा ठाकुर के अभिवादन करिया बोली लेने नमो नारायण नानपंथी साधुओं ने ठाकुर को अभिवादन करके कहा नमो नारायण ठाकुर कहां डर आसन ग्रहण करेट बोली लैंड ठाकुर ने उनको आसन ग्रहण करने के लिए बोला ठाकुर बोली असंभव नहीं ठाकुर कहते हैं ईश्वर के लिए कुछ भी असंभव नहीं है तार स्वरूप के मुख्य बोलते परिणाम उनका स्वरूप कोई मुंह से वर्णन नहीं कर सकता है स्कूकोला ही संभव सब कुछ संभव है दुर्जन जोगी छीलो दो योगी थे ईश्वरीय साधना करें ईश्वर की साधना कर रहे थे नारद ऋषि जाति लेने नारद ऋषि जा रहे थे एक जान परिचय पर बोले तुम्ही नारायण कच्चे ठेके ने परिचय प्रकार के पूछा की आप नारायण के पास से ए रहे हैं वह क्या कर रहे हैं नारद नारद ने कहा देखें ऊंट हाथी प्रवेश के भीतर में धागा डालने के लिए जो छोटा सा छेद होता है है उसके भीतर में से हाथी और ऊंट को प्रवेश करवाते हैं और फिर वापस निकलते हैं यह भगवान कर रहे हैं 1 जून बोल लेने तार और आश्चर्यचकित तार पक्षी संभोग एक साधु ने बोला की उसमें क्या आश्चर्य क्या है भगवान के लिए सब कुछ संभव है इतना बड़ा विराट हाथी और सी में धागा पर होने के लिए इतना छोटा सा छेद तो इतने बड़े विराट हाथी को इतने छोटे से छेद में से निकालना फिर से बाहर करना भगवान के लिए सब कुछ संभव है किंतु अपॉर्चुनिटी बोलने किंतु एक दूसरे साधु ने कहा क्या वो हो सकता है तुम्ही को खून से खाने जो ने तुम कभी वहां पर गए नहीं हो तुम गलत बात बता रहे हो देखिए छोटे से प्रश्न में ठाकुर हम इसके बड़े में कहते हैं की सब कुछ किया तो पूर्व निर्धारित है या तो फिर सब कुछ ईश्वर की आजा के ऊपर में आधारित ईश्वर की इच्छा के ऊपर में निर्धारित है तो यह डिस्कशन माथुर बाबू का और ठाकुर का हुआ था माथुर बाबू ने ठाकुर को बोला था की जगतपुरा नियम के अनुसार कुदरत के नियम के अनुसार चल सकता है चला है भगवान भी इस कुदरत के नियम के प्रकृति के नियम के अध्ययन है तो ठाकुर ने क्या कहा था की ईश्वर जो है वो नियम के पैर हैं ईश्वर जो चाहे वो कर सकते हैं ईश्वर जगत के नियंत्रण है सृष्टि स्थिति और सिंगर के वो अधिश्वर है वो चाहे तो विज्ञान ये आपका नियम ये जो कुछ भी है सब उलट-पुलट करके रख सकते हैं तब मथुरा बाबू ने उनकी बात नहीं मनी तो दूसरे दिन क्या हुआ ठाकुर ने देखा की जसवंत जावा के एक पेड़ के ऊपर में दो कलर के सफेद और लाल कलर शायद सफेद और लाल की थे तो यह दो कलर के पुष्प एक ही दाल के ऊपर में निकले हैं तो वह दाल तोड़कर के ठाकुर दौड़े दौड़े उनके पास गए बोला की देखो देखो देखा तुमने एक ही दाल पे दो कलर के पुष्कर ईश्वर के लिए सब कुछ संभव है तो माथुर भी को खुश हो गया और ठाकुर की बात मां भी आज हमको पता है की इसको म्यूटेशन कहते हैं और म्यूटेशन इत्सेल्फ जो की प्रकृति के नियम के अधीन है प्रकृति ही ठीक करती है की कितने परसेंटेज म्यूटेशन होने चाहिए ऐसा कभी नहीं होगा की पॉइंट जीरो वन परसेंट म्यूटेशन होता है तो सफेद कलर का पुष्प उसके साथ में लाल कलर का पुष्प होगा या तो फिर पीले कलर का पुष्प होगा किंतु ऐसा कभी नहीं होगा की पुष्प के आ पौधे के ऊपर में हाथ ही निकाल के आए ना की घोड़ा निकाल करके आए इस तरह का मुटेटिव जंप कभी भी इवोल्यूशन में नहीं हुआ तो अभी हम का सकते हैं की ठाकुर की यह कहानी तो 19 इस दिन तक सीमित है जब तक हमको विज्ञान नहीं समझ में आता था जैसे जैसे विज्ञान की अंडरस्टैंडिंग बढ़नी जाति है वैसे वैसे ईश्वर ने यह जो सूर्य चंद्र तारे जिसने बनाए ठाकुर ने कहा था ना की जिसने ये सूर्य चंद्र तारे बनाए वो सब जगत की फिक्र करेगा तुम ये सब फिक्र करने के लिए क्यों जाते हो जब मास्टर महाशय ने ठाकुर को कहा की हमको तो अज्ञानी लोगों को बता देना चाहिए की ये जो भगवान जो है वो मंदिर में जिसकी पूजा करते हैं वो पत्थर गया तो फिर वो लकड़ी के भगवान नहीं है उसके भीतर में चिन्मय भगवान को देखना है तो ठाकुर कहते हैं जिसने सृष्टि स्थिति जिसने यह चंद तारे सितारे इस सबकी रचना की ग्रह वगैरा की रचना की दिन रात ये सब जो चला है वो जो जगत नियंत्रण प्रभु ईश्वर परमेश्वर जो है वो सबको समझाएगा तुम इसमें जान की क्या उसमें तुमको जरूर है अभी आज किंतु एस्ट्रोनॉमी एस्ट्रोफिजिक्स यह सब का जो डेवलपमेंट इस तरह से हो रहा है की ये पूरे विश्व ब्रह्मांड में कहां पर क्या हो रहा है उसका अनुमान हम मैथमेटिक्स की वजह से मैथमेटिक्स के मध्य रूप से हम कर सकते हैं हम का सकते हैं की कब क्लिप्स होगा कब यह चंद्र ग्रहण होगा कब सूर्य ग्रहण होगा ये कोलंबस पहले बार अमेरिका गया था तो वहां के अमेरिकन निवासी जो थे रेड इंडिया उसे समय जंगली आदिवासी लोग वे लोग कोलंबस को करने के लिए तैयार हो गए थे तो क्या हुआ की कोलंबस उसे समय पता चला उसके पास में तो एस्टॉनोमिकल चार्ट थे तो उसने कैलकुलेशन में पता चला की अभी कुछ ही समय के बाद में सूर्य ग्रहण होने वाला है तो उसने कहा की देखो तुम लोग यदि मुझे मारोगे तो मैं पूरे सूर्य सूरज को का जाऊंगा तो ये तो आदिवासी लोग बोलते हैं अरे क्या ऐसा भी हो सकता है कोई सूरज को का सकता है क्या सूरज को छुपा सकता है क्या तू किंतु थोड़ी क्षण के बाद में सूर्य ग्रहण जब आरंभ हुआ यह बेचारे इतने भयभीत हो गए और उसके पर में गिरकर के बार-बार विनती करने लगे की अरे भाई आप सूरज को फिर से वापस ले आई सूरज चला जाएगा तो हम पूरे जगत का क्या होगा तो कोलंबस बड़ा खुश करके बोलना है अच्छा ठीक है मैंने आपकी बिनती सुन ली है अभी यह सूरज फिर से देखने लगेगा तो वह सूर्य ग्रहण समाप्त हो गया सूरज फिर से दिखने लगा अभी ये अज्ञानी लोगों को आप इस तरह से मूर्ख बना सकते हैं अब आप का सकते हैं ऐसा की ठाकुर को तो ये सब एस्ट्रोनॉमी एस्ट्रोफिजिक्स पता नहीं था ठाकुर को या तो उसे समय के सड़क को तो किस तरह से हम उनकी सभी बटन को सही मैन की जी तरह से उन्होंने कहा है की एक पेड़ के ऊपर में दो कलर के पुष्प आना यानी की ईश्वर की इच्छा विज्ञान के नियमों के पैर है किंतु आज हमको पता है की ईश्वर की इच्छा कहो ये ये म्यूटेशन इत्सेल्फ जो है वो विज्ञान के नियमों के भीतर में आता है और आज हमको जो चमत्कार के रूप में दिखता है वो कल कहानी जाकर के हमारा विज्ञान इतना डेवलप हो जाएगा की वो भी हमको विज्ञान के भीतर में ही दिखने लगेगा तो यह डिबेट जो है ये डिबेट अनंत है इसका कोई सॉल्यूशन नहीं है अपनी भक्ति के अनुसार हमको ठीक करना है किस तरह के विषयों में विश्वास रखना हूं जो की क्लॉकवर्क घड़ी के कांटे की तरह चला रहे विज्ञान के नियमों में बांध हुआ विश्व में क्या उसमें विश्वास रखना हूं की भले चाहे घड़ी के कांटों के साथ में चला रहे ये विश्वास किंतु घड़ी के कांटो को उलट कर देने वाले शक्ति रखना वाले इस ईश्वर इस जगत में विद्यमान है इस तरह के विषयों में विश्वास रखना हूं यह हमको ठीक करना है हमारी खुद की इंक्लिनेशन हमारी खुद की श्रद्धा भक्ति के अनुसार तो आज यही तक कल फिर से मिलते हैं ओम शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णा