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Sri Ramakrishna Kathamrita ·

Sri Ramakrishna Kathamrita 24 July 2023 नरेंद्र आदि के साथ कीर्तनानंद - नरेंद्र से प्रेमालिंगन

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ओम स्थापकााय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः श्री राम कृष्ण कथामृत पिछली बार हमने देखा कि किस तरह से ठाकुर नरन आए हैं दक्षिण दक्षिणेश्वर में नरेंद्र के साथ में अन्य और भी कुछ भक्त है और ठाकुर भी है। ठाकुर बहुत ही आनंद में है और आनंद में ही फिर कीर्तन वगैरह हुआ। फिर वो बातें भी बहुत सारी हुई। अभी और एक छोटा सा प्रसंग उसी दिन का दक्षिणेश्वर में नरेंद्र के साथ में कीर्तनते ठाकुर उत्तर पूर्व बारंडाय बेड़ाई छ कीर्तन के बाद में ठाकुर उत्तर पूर्व वाला जो वरांडा है वहां पे टहल रहे हैं। हाजरा महाशय वरांडा उत्तराश बोशिया छ हाजरा महाशय जो वरांडा है उसके उत्तर भाग में बैठे हुए हैं ठाकुर शेखा ने गिया बोशिले ठाकुर वहां पर जाके बैठे मास्टर शेखा ने बोिया छ और हाजरा शंगे कथा कहते छ मास्टर वहां पर बैठे हैं और हाजरा के साथ में बात कर रहे हैं ठाकुर एकटी भक्तों के जिज्ञासा कर तुम ही स्वप्न टपन देखो। ठाकुर ने एक भक्त को पूछा क्या तुम स्वप्न वगैरह देखते हो? अभी देखिए कि मास्टर महाशय यहां तक तो अपना नाम लिया कि ठाकुर टहल रहे हैं और वरांडा में हाजरा महाशय और मास्टर महाशय दोनों बैठे हैं। किंतु जब ठाकुर पूछने लगे किसको पूछने लगे? एक भक्त को पूछने लगे। तब उसका नाम नहीं दिया है। किंतु हम अनुमान करके कह सकते हैं कि वरांडा में तो दो ही लोगों का नाम दिया है मास्टर महाशय ने। एक तो है हाजरा महाशय दूसरे मास्टर महाशय स्वयं और ठाकुर ने जब पूछा तो एक भक्त को पूछा। उसका अर्थ है कि हाजरा महाशय को पूछा होता तो उसका नाम मास्टर महाशय लिखते। किंतु खुद को पूछा है इसलिए अपना नाम नहीं लिख के एक भक्त ऐसा कर दिया। यानी के वो छुपे भी रहना चाहते हैं और फिर भी ठाकुर के साथ में जो बात हो रही है उसका एक इंगित भी अपने को हमको देना चाहते हैं। इसलिए मैं अनुमान करके कह रहा हूं कि यह जो भक्त है वह मास्टर महाशय स्वयं होंगे क्योंकि और कोई भक्त वहां पर है नहीं मास्टर महाशय के अलावा भक्त एकटी आश्चर्य स्वप्न देखे छ भक्त ने कहा एक ठाकुर कहते हैं क्या तुमने कोई स्वप्न वगैरह तुमने क्या कोई तुम क्या कोई स्वप्न वगैरह देखते हो तो भक्त कहता है मैंने एक आश्चर्य स्वप्न देखा है ए जगत झोले झोल अनंत जल राशि यह जगत जो है पूरा पानी से भर गया है चारों ओर न जहां तक नजर जाए वहां पानी ही पानी है अनंत जल राशि अनंत जल कोए खाना नौका भाषेते छिलो कुछ कुछ नौकाएं इस अनंत महासमुद्र में तैर रही थी हठा जलोश डूबे गो एकाएक एक इस तरह का एक वेव आया पानी का कि उसमें यह नौकाएं डूब गई आमी आर कोटी लोग जहाज उठे छ मैं और और कुछ लोग एक बड़े जहाज में तैर रहे थे एमोन शोमो शेई अकुल समुद्र ऊपर दिए एक ब्राह्मण चोलेजा छे उस समय उन्होंने देखा कि वह अनंत महासागर के ऊपर में से एक ब्राह्मण चलते हुए जा रहा है। आ जिज्ञासा कोलाम आपनी केमन को जा मैंने पूछा प्रश्न किया आप किस तरह से जा रहे हैं? ब्राह्मण टी एक हसे बोल ब्राह्मण ने थोड़ा सा हंस के बताया एक खाने कोनो कष्ट नहीं जले नीचे बराबर शाको आ छे यहां पे कोई चलने के लिए कोई भी कष्ट नहीं है पानी के नीचे एक लंबा पुल है रास्ता है चलने के लिए जिज्ञासा कोरलाम आपनी कोथाई जा मैंने पूछा आप कहां जा रहे हैं तीनी बोलले भवानीपुर जाची उन्होंने कहा भवानीपुर जा रहा हूं अभी भवानीपुर क्या है तो वो वर्ल्ड फेमस कालीघाट मां काली का मंदिर और जहां पे काली घाट है वो काली की मूर्ति है जिसके नाम पे कलकाता का नाम हुआ है कोलकाता वो काली मूर्ति काली मंदिर वहां भवानीपुर में है आमी बोललाम मैंने कहा एकू दाणान आियो अपनार संग जाओ मैंने कहा थोड़ा थोड़ा सा रुक जाइए। मैं भी आपके साथ में चलता हूं। श्री रामकृष्ण अब जब यह पूरा भक्त ने कहा तब ठाकुर कहते हैं आर ए कथा सुने रोमांच हो यह बात सुनकर के मुझे रोमांच हो रहा है। अच्छा अभी देखिए कि कैसा हम लोग भी एक स्वप्न वगैरह देखते हैं। किंतु हमको पता है ना कि यह सृष्टि, स्थिति, प्रलय यह तीन की साइकिल चलती रहती है इस संसार में। इस विश्व ब्रह्मांड में जब सृष्टि होती है तो जैसे ठाकुर कहते हैं ना कि जब प्रलय होता है तो जैसे वो गृहिणी वो अपने घर में छोटी-छोटी ये वो वस्त्र के भीतर में कुछ चीजें बांध करके रख देती है। तो वैसे ही जब प्रलय होता है तो जगत के जो बीज है वह मां जगदंबा अपने पास में रखी हुई छोटी-छोटी पुटलियों में रख देते हैं। फिर उसी बीज में से लेकर के नए बार सृष्टि करती है और उसका पालन करती है। फिर उसका संहार करती है। तो यह ब्रह्मा विष्णु महेश रूपी ये जो त्रिदेव जो है या तो फिर हम कहें कि मां जगदंबा स्वयं यह सृष्टि स्थिति प्रलय का यह चक्र चलाएगी। तो जब प्रलय होता है इसका दो अर्थ हमको समझना है। पहले तो है कि यह जीव जगत समग्र पशु प्राणियों का प्रलय और दूसरा है कि हमारी वासनाएं हमारी ये जो माया के प्रति ये लोभ है स्प्रीहा है उसका प्रलय उसका संहार। जैसे कि हमने भगवान बुद्ध के बारे में देखा है कि जब समाधि हुई तो उनके पिछले जन्म के जितने भी कर्म और कर्म के फल उनकी नजर के सामने से गुजर गए। एक के बाद एक कट गए और आखिर में निर्वाण प्राप्त हुआ। ठाकुर के अभी ठाकुर तो अवतार थे इसलिए ठाकुर की तो कोई बात ही नहीं है। किंतु फिर भी थोड़े समय के लिए हम उनके ऊपर में मनुष्य भाव आरोपित करके देखें तो हम अनुमान करके हम हमको पता है कि हम कह सकते हैं कि तोतापुरी ने जब ठाकुर को निर्विकल्प समाधि दिलवाने का सिखाने का या तो निर्विकल्प समाधि में स्थित कराने का प्रयत्न कर रहे थे। उस समय ठाकुर तीन दिन तक निर्विकल्प समाधि में रहे थे और उसके बाद में जब तोतापुरी चले गए वो ठाकुर ने फिर से ठान लिया कि मैं जो मनुष्य जीवन का सर्वोच्च धेय है ईश्वर प्राप्ति जिसको कहते हैं वो ईश्वर प्राप्ति की चरम अवस्था जो है उस पर मैं उसी में जाकर के सब समय रहूंगा। तो ठाकुर छ महीने तक सतत समाधि में रहे थे और फिर एक साधु आए थे कहीं से भगवान तो मां जगदंबा तो कहीं से यह सब जुगाड़ कर लेती है क्योंकि ठाकुर के पास से उन्होंने धर्म चक्र प्रवर्तन का वेदांत के सनातन धर्म का प्रचार करने का कार्य करवाना था तो कहीं से एक साधु आ गया और ठाकुर के शरीर की रक्षा की उस ठाकुर बच गए उस समय छ महीने तक कैसे भी करके ठाकुर को होश में लाता था। मुंह के भीतर में थोड़ा बहुत अन्न डाल देता था। ठाकुर उसको ग्रहण करते थे। फिर से समाधि में चले जाते थे। तो उस समाधि में जो निर्विकल्प समाधि कहो कि कुछ भी कहो उनके यदि उनके ऊपर में हम मनुष्य भाव थोड़ी देर के लिए आरोपित करें तो हमको लगता है कि उनके पूर्व जन्म के जितने भी संस्कार होंगे वह कट गए होंगे। हालांकि वह तो अवतार थे और अवतार का तो संस्कार वगैरह होता ही नहीं है। लोक कल्याण के लिए वह संस्कार है ऐसा कुछ वो दिखाते हैं। किंतु जैसे ही लोक कल्याण समाप्त हो गया उनके संस्कार भी वो चले गए। जैसे कि वो भगवान विष्णु वराह अवतार धारण करके रह रहे हैं। वो दानव का संहार तो हो गया। किंतु फिर भी अपने वो कच्चे बच्चे के साथ में वो परिवार के साथ में इतने खुश हैं कि वो स्वर्ग में जाने का नाम ही नहीं ले रहे तो स्वर्ग में सब देवताओं बड़े टेंशन में आ गए। अरे भगवान यदि स्वर्ग में वापस नहीं आएंगे तो स्वर्ग तो नष्ट हो जाएगा। भगवान है बोलकर के स्वर्ग है। भगवान नहीं है तो स्वर्ग कहां से होने वाला है? तो फिर भगवान शिव जाकर के गए वहां से त्रिशूल देकर के वराह शरीर था वह तोड़ दिया। तो जैसे ही वराह शरीर तोड़ दिया वैसे ही भगवान विष्णु हंसते-हंसते अपने स्वधाम चले गए। जैसे ठाकुर खुद कहते हैं कि पंचभूते फांदे ब्रह्म पड़े कांधे अर्थात कि भगवान राम विष्णु के अवतार स्वयं विष्णु स्वयं मनुष्य शरीर धारण करके पृथ्वी पर आए हैं। मां सीता का अपहरण हो गया है। अभी उनको वैसे तो पता है कि सब कुछ लीला है। यह रावण भी उन्हीं की सर्जित लीला का ही एक अंश है। मां सीता का अपहरण होना वो भी उसी लीला का एक अंश है। वहां श्रील लंका में जाकर के रावण वध करना वो भी वही एक लीला का अंश है जैसे कि मनुष्य सीखे मनुष्य एक शिक्षा प्राप्त करें कि एक पुरुषोत्तम का जीवन कैसे होता है? एक सती का जीवन कैसे होता है? किस आदर्श पे हमको अपना जीवन गठन करना चाहिए। तो यह आदर्श दिखाने के लिए तो पूरी लीला थी। किंतु यह पता होने के बावजूद भी पता होने के बाद में भी भगवान राम मां सीता के लिए रोए थे। तो जब मनुष्य शरीर धारण होता है तो मनुष्य कर्म जो है मनुष्य के जो धर्म है रजस और तमस भी थोड़ा बहुत आकर के शरीर के साथ में मिलते हैं। वरना तो फिर लीला ही नहीं होंगी। मां मां ने पंचतपा किया था। तो मैंने जब पहली बार पढ़ा तो मुझे लगा कि अरे ठाकुर का देहांत हो गया है। मां का मन सब समय ठाकुर के लिए वो जो विरह वेदना जो है उसमें वो डूबा रहता है। तो अभी मां ने उससे उससे मुक्ति पाने के लिए अब वो तो जाने वाला नहीं है किंतु मन में थोड़ा सा शांति प्राप्त करने के लिए भीतर की जो ज्वाला है उसको बाहर की ज्वाला से समाप्त कर देने के लिए ठाकुर ने कहा है ना कि एक छोटे कांटे से बड़े कांटे को निकाल देते हैं। फिर दोनों कांटों को फेंक देते हैं। तो मां ने इस तरह से पंचतपा व्रत का अनुष्ठान किया और यदि आपने बेलूर मठ गए होंगे जिस छत के ऊपर में बैठकर के मां ने पंचतपा किया है एक तो चारों ओर चार अग्नि तो जल ही रहे हैं फिर ऊपर में से सूरज है तो अभी उस समय सिर्फ सूरज ही जल रहा था वो अग्नि तो थे ही नहीं वो सूरज में वो मैं वो 5 मिनट खड़ा रहा उसमें तो मैं परेशान हो गया रूम के भीतर में चले आना पड़ा वहां पे मां माने चार अग्नि जो प्रज्वलित करके फिर ऊपर में सूरज है। ऐसे दिन भर कितने दिनों के लिए इस तरह के पंच तपा व्रत का अनुष्ठान किया था। तो हमको लगता है कि इनको इतना कष्ट करने की क्या जरूरत है? किंतु जरूरत है इसलिए क्योंकि शरीर धारण हुआ है तो शरीर धारण के सब धर्म भी जो है वो उनको निभाने पड़ते हैं। तो जो भी है हम प्रलय के बारे में बता रहे थे। तो प्रलय एक तरह से देखें तो विश्व ब्रह्मांड का भी होता है और एक तरह से देखें तो हमारी माया के प्रति स्प्रूहा है। हमारी ये तृष्णा जो है हमारी भोग वासना जो है उसका भी प्रलय होता है। हमारे अहंकार का भी प्रलय होता है। और जब प्रलय होगा और हमारे भीतर का विश्व जो है वो जल के दग्ध बीज हो जाएगा। एक्चुअली यह शब्द वेद योग सूत्र में व्यवहार हुआ है। दग्ध बीज कहते हैं ऋषि पतंजलि कि हमारे जो पंचक्लेश है अविद्या अस्मिता राग द्वेष और अभिनिवेश ये कब जाएंगे ऐसा नहीं है जैसे कि वो कहते हैं कि एक बहुत बड़ा पेड़ है। पेड़ को आपने काट दिया तो जहां से काटा है उसके बाद में वहीं से थोड़े दिनों के बाद में देखेंगे कि नए अंकुर आना शुरू हो जाते हैं। छोटी-छोटी डालियां फिर से जन्म लेना शुरू हो जाती है। किंतु यदि उसके जड़ मूल से उसको खत्म कर दिया जाए तो वो पेड़ जो है वो फिर से जन्म नहीं लेगा। जैसे कि बीज है छोटा सा जैसे वटवृक्ष का मां ने कहा किसी ने मां को कहा कि मां वटवृक्ष का बीज इतना छोटा होता है उसमें से इतना बड़ा वृक्ष बनता है तो मां ने कहा कि देखो वैसे ही बीज मंत्र भी इतना छोटा होता है और इतने ही छोटे से बीज मंत्र में से समग्र विश्व ब्रह्मांड को धारण की हुई मां जगदंबा का दर्शन होता है। तो यह मां की हर छोटी-छोटी चीजों में मां अपने उदाहरण देकर के ईश्वर प्राप्ति या तो साधना या तो अध्यात्म यह सब ले आती थी। मां ने एक बार बहुत सुंदर बात कही है। घड़ी का कांटा जैसे टक टक टक करता है वैसे ही टक टक टक करके अपने मन में जप चलते रहना चाहिए। तो वैसे घड़ी के कांटे की तरह जब चलेगा तब हमको ईश्वर प्राप्ति होगी। तो यह माने इस तरह से वह बीज के बारे में समझाया। हम लोग कहेंगे कि वेद में योग सूत्र में कहा है कि वासना रूपी बीज जो है जब वो दग्ध हो जाएगा तब हमारी जो पंचक्लेश जो है हमारी वासनाएं जो है भोग सुख की जो स्प है वो समाप्त हो जाएगी। तो वो दग्ध बीज ये शब्द भी योग सूत्र में दग्ध हो जाना किया है। तो यदि हम कहेंगे कि ये जो आध्यात्मिक प्रलय यानी कि हमारे अहंकार का प्रलय हुआ तब कहीं जाकर के ये संसार की जगह पे ईश्वर अवतीर्ण होंगे। तो यहां पे ये जो वर्णन जो है ये प्रलय का वर्णन है। हमारे शास्त्र में है कि जब प्रलय आया तो चारों ओर पानी छा गया। फिर मनु ने क्या किया? सभी प्राणियों को मनु ने एक मछली ने आकर के मनु भगवान मनु को कहा कि प्रलय आने वाला है। तुम एक नौका की व्यवस्था करो। मैं नौका को बचा के किनारे ले जाऊंगी। फिर उस वहां पर जाकर के फिर से सृष्टि का आरंभ होगा। तो ये जो एलेगोरी कहो ना कि ये एक इमेजिनेशन कहो ना कि ये एक कहो कि दंत कथा जो भी हम अपनी श्रद्धा के अनुसार कहें या कि हम कहेंगे कि यह सही-सही वास्तव सत्य है कि प्रलय होता है। प्रलय के समय में बीज जो है सृष्टि के उसकी रक्षा होती है। फिर उसी बीज में से नई सृष्टि की एक जब भोग वासनाएं बहुत बढ़ जाती है। पाप बहुत बढ़ जाता है। कर्म का भार पाप का भार जगत पे बहुत बढ़ जाता है। तब प्रलय होता है। नया विश्व की शुरुआत होती है और एक पवित्र और पुण्य जिसमें कि पाप ना हो इस तरह से विश्व की शुरुआत होती है। फिर पता नहीं धीरे-धीरे करके पाप बढ़ेंगे या कम होंगे पता नहीं। किंतु इस तरह से ये प्रलय जब होगा तब यह देखिए पूरा प्रलय का वर्णन है। मास्टर महाशय या जो भी एक भक्त जो भी हो उन्होंने कहा कि यह प्रलय आया प्रलय शब्द यहां पर यूज नहीं किया किंतु मुझे लगता है कि जैसे प्रलय का जिस तरह का वर्णन है तो उसी के तरह का यह वर्णन मुझे लग रहा है। चारों ओर पानी ही पानी है। पूरा जगत संसार जैसे पानी में छा गया है। कुछ नौकाएं इस पानी में तैर रही है और पानी में इतना पावर है मतलब पानी इतना तूफानी जैसा पानी है एक बहुत बड़ा पानी का एक वेव आया और इस लहर लहर आई और इस लहर ने सभी नौकाओं को डूबा दिया। अभी यह भक्त और और कुछ लोग एक बड़े जहाज में जा रहे थे। देखा कि एक ब्राह्मण एक ब्राह्मण पानी पर चलकर के आ रहा है। तो नेचुरली हमको तो आश्चर्य होगा कि पानी पर कौन चल सकता है। इतनी बड़ी-बड़ी लहर आ रही है कि नौकाओं को डूबा देती है। यह लोग बड़े जहाज में बैठे हैं तो शायद बचे हुए हैं। तो पानी पर चलने वाला यह कौन महापुरुष है? उन्होंने पूछा एक भक्त ने पूछा ब्राह्मण को कि अब पानी पे कैसे चले जा रहे हैं? तो ब्राह्मण ने कहा कि इसके पानी के नीचे ही एक रास्ता है। किंतु देखिए कि यह रास्ता किन लोगों के लिए है। अभी देखिए कि छोटी-छोटी नौकाएं अर्थात कि अच्छा अभी ये जो पूरी एलेगोरी जो है यह पूरा एक उपमा के माध्यम से हमको समझाना चाहते हैं कि प्रलय तो एक बार आएगा ही और जब प्रलय आएगा तब जो लोग संसार में डूबे हुए हैं वो लोगों का क्या होगा? इस प्रलय में डूब जाएंगे। जैसे कि वह ठाकुर के ठाकुर ने एक दूसरी जगह पर हमको उदाहरण देकर के बताया है ना बद्ध जीव मुमुक्षु जीव और मुक्त जीव अर्थात कि बद्ध जैसे मछुआरा पानी में अपनी जाल डालता है जाल फेंकता है मछली को पकड़ने के लिए। तो मछली क्या करेगी? वो सोचेगी कि मैं अपना मुंह जो है वो नदी के भीतर में जो मिट्टी होती है उसमें छुपा देती हूं। जैसे जैसे कि मुझे ना जाल दिखे ना मछुआरा दिखे तो मुझे दिखेगा नहीं तो फिर उसका कोई असर नहीं होगा। इस तरह से एक मूर्ख जैसी कल्पना करके मछली अपना मुंह छुपा देती है। किंतु हमको तो पता है कि जैसे ही मछुआरा अपनी जाल को ऊपर में लेगा यह जो मुंह में मुंह छिपाई हुई मछली वो भी जाल के साथ में आ जाएगी किनारे पे और अपनी जान गवाएगी। फिर दूसरे होते हैं मुमुक्षु जीव। मुमुक्षु कैसे कि मछुआरा अपनी जाल फेंकता है और यह जो जीव है उनको पता है कि जाल में फंसे हुए हैं और जाल में से निकलने का कुछ उपाय भी करना है तो ऐसे वो छटपटाते हैं उछलेंगे कूद उछलेंगे कूदेंगे कैसे भी करके जाल में से निकलने का प्रयत्न करेंगे फिर है मुक्त जीव मुक्त अर्थात कि वो जो मुमुक्षु जीव जाल में से बचने का प्रयत्न कर रहे थे उसमें से एक मछली वह जाल में से बचकर के निकल गई। वह हो गई मुक्त। फिर एक तरह के जीव है नित्य सिद्ध। उन में इतनी अकल है कि जहां पर मछुआरा जाल फेंकता है नियमित रूप से वो सब जगह है। उनको पता है वहां पर जाना ही नहीं है। तो मछुआरे की जाल में कभी फंसने का उसका प्रश्न ही नहीं आता। तो यह जो उपमा एलेगोरी है कि प्रलय आ गया है वो छोटी-छोटी नौकाएं कैसे लोग हैं कि वो बद्ध जीव कि प्रलय आया अपनी संसार से अपने मन को नहीं अलग कर पा रहे हैं कि नहीं ईश्वर की ओर अपने मन की गति कर पा रहे हैं। तो जब ये लहरी आती है तब वे लोग डूब जाते हैं। साथ-साथ में बड़े जहाज पे जो बैठे हुए हैं वो कौन से जीव है? मुमुक्षु जीव है। अकल तो है कि भाई बड़ी-बड़ी लहरों से बचना चाहिए और ईश्वर प्राप्ति के लिए कुछ ना कुछ तो साधना की होगी बोलकर के छोटी नौका की बजाय बड़े जहाज पर बैठने का मौका मिला है। किंतु साथ में देखा कि एक ब्राह्मण एक ब्राह्मण नदी पे जा रहा है। वो महासमुद्र जिसका कोई ना ही अंत है ना ही उसका शुरुआत है। पूरे ब्रह्मांड में छाया हुआ यह समुद्र उस पर वह चलकर के जा रहा है। तो भक्त पूछता है अरे महाशय यह आप किस तरह से इसके ऊपर जा रहा है? तो ब्राह्मण ने कहा कि ये पानी के नीचे में पुल है। ये वो रास्ता है और रास्ते पर चल के मैं जा रहा हूं। तो ये ब्राह्मण कौन है? वो है नित्य सिद्ध। कभी यह संसार की मायाजाल में फंसता ही नहीं है। वो ये जो संसार की लकड़ियां है उसको कोई असर नहीं करती। और यह जो रास्ता है वह जैसे मां ने कहा ना कि घड़ी का कांटा टक टक टक जैसे करता है वैसे ही टक टक टक करके हमको जप करते जाना है। सांस के साथ में जप चलनी चाहिए। तो जिसको अजपाजप कहते हैं। तो ये जो अजपाप करते हैं सतत घड़ी के कांटे की तरह जप करते रहते हैं। यह जप का रास्ता बन जाता है इन लोगों के लिए। और यह नित्य सिद्ध उस जप रूपी रास्ते से वो चलकर के भवानीपुर जाते हैं। और भवानीपुर क्या है? ये भक्त ने पूछा कि आप कहां जा रहे हैं? तो भक्त ये ब्राह्मण को पूछा तो ब्राह्मण ने कहा मैं भवानीपुर जा रहा हूं। अच्छा तो भवानीपुर क्या है? हमको पता है कि मां काली की प्रसिद्ध मूर्ति मां काली का प्रसिद्ध मंदिर वहां पे है। अर्थात कि यह जप का रास्ते जप के रास्ते से चलकर के ये प्रलय के भीतर में भी जप के रास्ते से चलकर के नित्य सिद्ध जगन माता को प्राप्त होता है। यह पूरी एलेगोरी या तो फिर एक पूरी उपमा देकर के स्वप्न की ये मेरी व्याख्या है। मैंने और कहीं पढ़ी नहीं है किंतु मुझे लग रहा है कि शायद इस तरह की व्याख्या करना एक उचित है। एटलीस्ट मुझे तो बड़ा अच्छा लगा। फिर उसका सही गलत क्या है मुझे नहीं पता। मुझे तो इस तरह की व्याख्याएं करना ठाकुर की बातों में से बड़ा अच्छा लगता है। तो जो भी है ठाकुर ने खुद कहा कि अमार ई कथा सुने रोमांच हो यह बात सुनकर के मुझे रोमांच हो रहा है। मेरे रोंगटे खड़े हो जा रहे हैं। तब भक्त ने कहा कि ब्राह्मण ने कहा भक्त ने कहा कि मैं भी आपके साथ में आता हूं। तो ब्राह्मण ने क्या कहा? आमार एक ताड़ातड़ी तोमार नाम ते देरी अभी मैं जल्दबाजी में हूं और तुमको वो जहाज में से यह रास्ता है इसके ऊपर में आने में समय लगेगा। जहाज अर्थात कि मुमुक्षुत्व है। हम थोड़ी बहुत साधना कर रहे हैं। किंतु यह जो पानी के नीचे वाला रास्ता है वह तो अजबाजब है। घड़ी के कांटे के साथ में चलने वाला जप है। तो दिन में सुबह में थोड़ी बहुत साधना कर दी। वो एक चीज है और जीवन के प्रत्येक क्षण में जीवन की प्रत्येक सांस के साथ में जप चलना चाहिए। ईश्वर को समर्पण चलना चाहिए। प्रत्येक सांस के कार्य के साथ में प्रत्येक घड़ी के साथ में ध्यान चलना चाहिए। वो करना तो कितना मतलब दूर की बात है। तो ब्राह्मण ने कहा कि देखो तुम अभी जहाज पे हो। जहाज पे से यह जो राजमार्ग जो है माने सतत चलने वाला जप इस पर आने से अभी तुमको देरी है और मैं जल्दबाजी में हूं। तुम रास्ता देख के रखो। आगे कहता है ब्राह्मण एकोन आशी मैं आता हूं ए पथ देखे राखो तुम तार पर एशो यह रास्ता देख के रखो फिर इस रास्ते पर तुम आना अर्थात तुम यह देख के रखो जान करके रखो कि यह सतत चलने वाला जप सतत चलने वाला आत्मसमर्पण सतत चलने वाली प्रार्थना सतत चलने वाली साधना या तो फिर योग यह एक आदर्श दर्श रास्ता है। उत्तम रास्ता है। राजमार्ग है भवानीपुर जाने का। इसको देख के रखो। और फिर जब तुम्हारा समय आए तुम भी इस रास्ते से चलकर के मां काली के पास में मां जगद जगदंबा के पास में आ जाना। ठाकुर कहते हैं आमा रोमांच हो छे तुम शीघ्र मंत्र लो। मैं मुझे रोमांच हो रहा है। तुम जल्दी जल्दी मंत्र ले लो। यहां पर तो यह प्रसंग समाप्त हो जाता है। किंतु मुझे लगता है कि यदि ये भक्त जिनका नाम मास्टर महाशय ने नहीं लिया और यदि यह मास्टर महाशय है तो उन्होंने मंत्र बाद में लिया होगा। अभी हालांकि मुझे यह याद नहीं है कि कथामृत में या तो और किसी किताबों में ऐसा हो कि मास्टर महाशय ने जो मंत्र ठाकुर ने मास्टर महाशय को मंत्र दिया उस घटना का वर्णन मैंने कहीं पर पढ़ा नहीं है या तो फिर पढ़ा होगा तो याद नहीं आ रहा है। तो जो भी है हम अनुमान करके यह तो कह सकते हैं कि इतने दिनों तक जब तक यह घटना हुई है जिस दिन उस दिन तक तो शायद उन्होंने मंत्र नहीं लिया होगा। बाद में मंत्र लिया होगा और लिया भी तो क्या ठाकुर मंत्र देते हैं कृपा करके हम लोगों में क्या वह फिर वह यह थोड़ी ना है कि ठाकुर के पास जाकर के मंत्र मांगेंगे ठाकुर देंगे ठाकुर ही तो कृपा करके मंत्र देंगे और देखिए कि इस भक्त के ऊपर में जो भी भक्त हो मास्टर महाशय हो ना कि कोई भी हो उसका मतलब ग्रेट गुड फॉर्च्यून कहो ना कि उसका माने उसका क्या कहेंगे कि कितना लकी है है। कितना वो भाग्यवान है कि ठाकुर ने सामने से जाकर के उसको कहा है कि तुम मंत्र धारण करो। तुम मंत्र लो। मंत्र अभी ठाकुर तो ऐसा नहीं कहेंगे कि मैं तुमको मंत्र देना चाहता हूं क्योंकि तुम्हारा समय आ गया है। मुमुक्षु में से नित्य मुक्त और नित्य मुक्त वो पूरी एक यात्रा हमारी है। जैसे बद्ध जीव मुमुक्षु जीव मुक्त जीव और नित्य मुक्त ना कि नित्य सिद्ध। यह जो पूरी यात्रा है उसमें से यह भक्त मुमुक्षुत्व तक तो पहुंच गया है। वो उछल कूद तो कर रहा है संसार में से निकलने के लिए किंतु वो माया जाल का प्रभाव इतना है उसके ऊपर में कि अभी भी वो माया जाल को काट नहीं पा रहा है। किंतु उसकी बॉर्डर लाइन पर चला गया है। ठाकुर के पास आ गया है। तो ठाकुर खुद दया करके कृपा परवशः होकर के उसको कहते हैं कि तुम्हारा मंत्र लेने का समय आ गया है। तुम शीघ्र शीघ्र मंत्र ले लो रात 11 होया छे रात के 11 बजे हैं नरेंद्र आदि भक्तगण ठाकुर घरे मेजते बिछाना कोरिया शयन कोरि लेन नरेंद्र वगरा भक्तगण ठाकुर के घर में फर्श के ऊपर में बिछाना डालकर के शयन कर रहे हैं अभी यहां पर तो सीधा सुबह का ही वर्णन है। किंतु हमको पता है कि रात रात का वर्णन नहीं है। यह आश्चर्य की बात है। रात का वर्णन होता तो हमको पढ़कर के बहुत ही आनंद आता। क्योंकि हमारे पास में ऐसे कुछ-कुछ वर्णन है कि जब यह लोग दक्षिणेश्वर में रहते हैं तो क्या होता है? दक्षिण जब आपको रात को सोना है तो दक्षिणेश्वर में नहीं जाना है। बाबूराम महाराज योगेन महाराज का है वर्णन कि योगेन महाराज गए थे और रात को रुके थे वहां पे और किसी भक्त के साथ में देखा कि रात को ये लोग सो गए हैं। ऐसा ही 11 का समय होगा। सडनली ठाकुर आकर के उनको उठा रहे हैं नींद में से और ठाकुर बिल्कुल बालक भाव में है। दिगंबर धोती जो है वो भी निकल गई है। बिल्कुल बच्चे जैसे वो हो गए हो जैसे भाव का आवेश होता है ना बच्चे जैसे हो जाते थे। बिल्कुल बच्चे की तरह वो भाव में आ गए हैं और इनको नींद में से उठाते हैं और बोलते हैं अरे नरेंद्र कितने दिनों से आया नहीं है और उसको देखने के लिए मेरे मन में तीव्र ये आकांक्षा तीव्र इच्छा हो रही है वो देखो ना वो क्यों नहीं मुझे मिलने के लिए आ रहा मेरा हृदय जैसे कि गीले कपड़े को निचोने के लिए पानी निचोने के लिए जिस तरह से हम उसको ट्विस्ट करते हैं वैसे ही मेरा ह्रदय भी इस तरह से दर्द कर रहा है। मेरे हृदय में भी इस तरह से दर्द हो रहा है। नरेंद्र क्यों नहीं मुझे मिलने के लिए आ रहा? तो जब बाबूराम योगेंद्र महाराज ये सुनते हैं मोस्ट प्रोबेबबली योगेन महाराज ही थे। तो योगेंद्र महाराज ये सुनते हैं तब वो सोचते हैं कि अरे ये नरेंद्र किस तरह का निष्ठुर आदमी होगा कि इतने सरल सुमधुर स्वभाव वाले ठाकुर वो उनको देखने के लिए इतने व्याकुल हो रहे हैं फिर भी उनको देखने के लिए नहीं आता। ये किस तरह का ये लड़का है नरेंद्र? ऐसा ये योगेंद्र महाराज सोच रहे हैं। फिर ठाकुर देख रहे हैं कि अरे उनको नींद में व्याघात हो रहा है। उनकी नींद नहीं आ रही। मैं उनके साथ बात कर रहा हूं। तो ठाकुर बोलते हैं अच्छा अच्छा ठीक है। तुम लोग सो जाओ। मैं तो अभी फिर ऐसा करके ठाकुर चले जाते हैं। फिर ये लोग फिर से सो जाते हैं। थोड़ी देर होती है। ठाकुर फिर से आ जाते हैं व्याकुल होकर के बालक जैसे भाव में और फिर से उठाते हैं और फिर से नरेंद्र के बारे में बात करना शुरू कर देते हैं। अरे देखो मैं तो नरेंद्र को इतना बुलाता हूं। फिर भी वो इतने दिनों से मुझे मिलने के लिए नहीं आ रहा। उसको ऐसा तो क्या हो गया? ऐसे मेरे से क्या नाराज हो गया? क्या इतना बिजी हो गया? इतना व्यस्त हो गया कि मुझे मिलने के लिए दक्षिणेश्वर नहीं आता। ऐसा करके वो बेचारे बिल्कुल दुखी होकर के सुना रहे हैं। तो ये लोग भी बेचारे अभी नींद तो आवश्यक है। वरना दूसरा दिन कितना बुरा जाएगा। रात को ठीक-ठीक नींद नहीं होगी। तो ये लोग नींद नहीं हो रही इसलिए भी थोड़ा सा परेशान है और यह भी सोच रहे हैं कि नरेंद्र इतना निष्ठुर आदमी जो कि ठाकुर को मिलने के लिए नहीं आ रहा बार-बार विनती करने के बाद में और साथ में यह देखकर के मुग्ध हो रहे हैं कि ठाकुर का यह बालक भाव ये चैतन्य महाप्रभु के बारे में हमने पढ़ा है कि उनके मधुर भाव वगैरह जो भाव होते थे महाभाव होता था तो ठाकुर के शरीर में यह बालक भाव किस तरह से उत्पन्न हो रहा है। तो जो कहानियों में जो पढ़ा था यह सब प्रत्यक्ष देखने को मिल रहा है। तो वह भी उनके मन में एक आलाद एक रोमांच की अनुभूति होगी और साथ-साथ में थोड़ा सा गुस्सा भी होगा कि किस तरह का यह आदमी नरेंद्र है और थोड़ा सा परेशान भी होंगे कि नींद नहीं आ रही। ठाकुर भी इस तरह से थोड़ी देर बात करने के बाद में वो बेचारे समझ जाते थे कि अरे उनको नींद नहीं हो रहा। दूसरे दिन क्या होगा बेचारों के साथ में? तो बड़े ही वो पश्चाताप से कहेंगे कि कि अरे अरे देखो तुमको नींद नहीं आई। सो जाओ सो जाओ। मेरी वजह से तुमको डिस्टरबेंस हो रहा है। ऐसा करके ठाकुर चले जाएंगे। फिर किंतु ईश्वरीय भाव का आवेश ऐसा होगा कि बात यह नहीं है कि नरेंद्र नहीं आने से वो व्याकुल है। ये योगेंद्र महाराज और उनके साथ में जो भक्त था उनको उनको बताना है कि जीवन जो है वो सोने के लिए मात्र नहीं है। भले चाहे हम अपने घर में सोए किंतु दक्षिणेश्वर में आए हैं तो पूरा समय ईश्वर के नाम गुणगान करने में ही निकलना है। तो फिर से थोड़ी देर के बाद आकर के उठा के वह नरेंद्र के बारे में नरेंद्र के गुण के बारे में नरेंद्र कितना अच्छा लड़का है नरेंद्र का त्याग कितना है नरेंद्र का संयम कितना है विल पावर कितना है मेधा शक्ति कितनी है ऐसी सब गुणगान गाने की शुरुआत कर दी तो योगेंद्र महाराज लिखते हैं कि हमारी पूरी रात ऐसे ही गई तो यहां पे मास्टर महाशय लिखते हैं कि उनके कमरे में नरेंद्र वगैरह भक्तगण बिछ फर्श पे बिस्तर लगा के वो चटाई बिछा करके के शायद सोए होंगे। फिर दूसरा वर्णन है सीधा सुबह का। तो रात को क्या हुआ उसका वर्णन नहीं। तो पता नहीं क्यों उन्होंने ऐसा किया। रात में क्या मास्टर महाशय ने इनको मंत्र दिया था। रात को क्या हुआ था। उनको कोई अनुभूति हुई थी। कुछ बता नहीं रहे हैं। किंतु हमको दक्षिणेश्वर के दूसरे जितने भी स्मृति कथाएं हमारे पास में है वो सब पढ़कर के हम अनुमान करके कह सकते हैं कि ठाकुर किसी को रात में सोने नहीं देंगे। ये लाटू महाराज का एक जगह पर वर्णन है। ठाकुर रात को उठा देते थे। कहते थे कि अरे खाने की शोजन घुमार्जन ऐसे चीज यहां पर क्या तुम सोने के लिए आए हो? जाओ जाओ उठो उठो और फिर बता देते थे कि किसको किसी को पंचवटी में भेजते थे किसी को बेलतला में भेजते थे किसी को चांदनी के घाट पर भेजते थे और बता देते थे कि इस तरह से जप करो इस तरह से ध्यान करो ऐसा करके सबको वो ऐसा स्प्रेड करते थे पूरे काली मंदिर में और काली मंदिर का उस समय का वातावरण भी कैसा होगा शहर से इतना दूर शहर अभी आजकल की तरह जो एयर पोल्यूशन भी नहीं वो लाइट पोल्यूशन भी नहीं वो नॉइज़ पोल पोल्यूशन भी नहीं वो पूरा प्राकृतिक वातावरण प्राकृतिक सौंदर्य कहीं पर थोड़ा सा जंगल होगा कहीं पे थोड़ा सा ग्राम्य परिवेश होगा वो छोटा सा गांव है दक्षिणेश्वर तो पीछे में सब कुटिया वगैरह होगा छोटे-छोटी कुटिया और यहां पे सुविस्तुत सुमधुर भागीरथी का वो कल कल निनाद करता हुआ पानी बह रहा है। आकाश में बादल है, तारे हैं, चांद है, ठंडा पवन बह रहा है। उसमें यह काली मंदिर में चारों ओर भक्तगण बैठे हुए हैं। मां काली का भगवान का ईश्वर का नाम जप, स्मरण, मनन, ध्यान वगैरह कर रहे हैं। और ठाकुर है कि अपने कमरे में बैठकर के सबके ऊपर नजर रखे हुए हैं कि कौन कहां पे क्या कर रहा है। लाटू महाराज का एक वर्णन है। ठाकुर ने सबको बोला था कि बेलतला पे जाकर के ध्यान मत करना। अभी कभी-कभी ठाकुर कुछ देते थे किसी को और फिर कभी-कभी कहते थे कि वहां पे मत जाना। वहां पे भैरव है। तो अभी लाटू महाराज वगैरह खुद तो एक भैरव है ना। ठाकुर की बात कौन सुनेगा? जाकर के बेलतला के नीचे बैठ गए। ध्यान कर रहे हैं। सडनली भैरव आकर के लाटू महाराज को विभीषिकाएं दिखा रहा है। हमने इसके बारे में बात किया था कि शक्ति स्थान जो होता है वहां पर जप करने से शीघ्र सिद्धि प्राप्त होती है। किंतु फिर कोई दुश्चरित्र आदमी वहां पर बैठकर के सिद्धि प्राप्त कर दे तो फिर जगत को हानि होगी। वो लोगों को हानि पहुंचाएगा। इसलिए वहां पर भैरव की उपस्थिति होती है। जो दुष्टचरित्र पहले तो आकर के वो भय दिखाता है। फिर भय से जो डर जाएगा उसका तो मृत्यु ही हो जाएगा। ठाकुर ने किसी के बारे में कहा था कि भैरव ने उसके मुंह पर चड मार दी। झापट मार दी इसलिए वो मर गया था। उसका मृत्यु हो गया था जप करते करते। तो और जो भय से नहीं डरेगा तो उसका अर्थ है कि उसमें सही सही त्याग संयम तपस्या है और मां काली के प्रति सही श्रद्धा है तो फिर उसको डरने की बात नहीं फिर भैरव भी शांत हो जाएगा। तो इस तरह से लाटू महाराज को वो विभीषिकाएं दिखा रहा है। उसी समय ठाकुर अपने कमरे में बैठे थे। सबके ऊपर नजर रख रहे हैं। पता चल गया कि ऐसा हो रहा है लाटू के साथ में एकदम दौड़े आए बेलतला के नीचे में बिल पत्र के वो बिल्व वृक्ष के नीचे में और लाटू को चिल्ला-चिल्ला करके बोलने लगे। अरे लाटू अरे लाटू क्या ध्यान में से वो बाहर आ जाओ तुमको तो इस तरह से विभीषिकाएं दिख रही है ऐसा करके ऐसा चिल्लाए कि लाटू महाराज भी ऐसा वो वरना क्या होता है ना भैरव पकड़ लेता है ध्यान में और फिर वो ध्यान में ही फिर यदि हम हम उसकी माया जाल में फंस जाएंगे उसकी विभीषिका में डर जाएंगे वहीं पर हमारा शरीर त्याग हो जाएगा तो कैसे भी करके लाटू महाराज को ठाकुर ने जागृत करवाया तो ऐसी हमको कितनी ही सारी कहानियां पता है दक्षिणेश्वर में जब ध्यान के बारे में रात के बारे में और ठाकुर किस तरह से सबको ट्रेन करते हैं इसके बारे में तो रात का वर्णन यदि हमारे पास होता तो पढ़ने में बहुत अच्छा लगता तो जो भी है मास्टर महाशय ने नहीं किया तो वो भी अब ठाकुर की इच्छा और तो क्या कहेंगे तो आज यही तक कल फिर से मिलते हैं ओम शांति शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु