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Sri Ramakrishna Kathamrita ·

श्रीरामकृष्ण कथामृत || 15 Dec 1883 - श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ दक्षिणेश्वर में || 29 Aug 2025

प्रार्थना

ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्वधर्म स्वरूपिणे अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः श्री श्री रामकृष्ण कथामृत 16th दिसंबर 1886 ऑलरेडी सुबह का जो डिस्कशन था वह हमने देख ही लिया है।

श्रीरामकृष्ण और स्वामी विवेकानन्द : असंस्कृत आचरण, परन्तु अद्वितीय आध्यात्मिकता

सुबह को 10:00 बजे ठाकुर वो गीत गाते हैं। तारी ते होबे मां तारा होए छ शरणागतो होइया रोए छ जेनो पिंजरे पाखीर मतो मां तारा तुमको तारना ही होगा मैं तुम्हारा शरणागत होकर रहा हूं जैसे कि पिंजरे में बद्ध पंखी की तरह फिर यह जो पूरा गीत गा के ठाकुर क्या कहते हैं केनो पिंजरे पाखिर में तो होते जाो केनो हैक थू अर्थात कि क्यों पिंजरे में बद्ध पंखी की तरह होते क्यों जाऊंगा ऐसा करके थूकते हैं और एक जगह पे मास्टर महाशय ये ठाकुर का एक कंटेंप्ट प्रदर्शित करने का एक बड़ा ही गामठी तरीका था अब आजकल हम लोग जिसको हम भद्र लोग या तो एक जेंटलमैनलीनेस एक कहते हैं ना हम लोगों को यदि अपना कंटेंप्ट प्रदर्शित करना है किसी बात के प्रति अपनी घृणा या नाराजगी प्रदर्शित करनी है तो हम इस तरह से थूकेंगे कभी नहीं। आज का यह भद्र समाज का आज का एक एक क्या कहेंगे एटीकेटी एक है कि इस तरह से आपको थूकना नहीं है। स्वामी जी की एक कहानी है।

कहानी: जब स्वामी विवेकानंद की उंगलियों पर अचार गिरता है, तो वे उन्हें चाट लेते हैं

स्वामी जी अमेरिका थे तो एक दिन उनकी एक लेडी डिवोटी एडथ एलन उसके साथ में वो आचार खरीदने के लिए गए। तो वहां पर भी आचार मिलता है। वहां से आचार लिया तो आचार वाले दुकान वाले ने क्या किया कि यह आचार जो होता है वह तो हमको पता है कि वह पीस होते हैं वेजिटेबल या फ्रूट्स के और फिर बहुत सारा तेल होता है। तो ऐसा एक पात्र लेकर के उसमें यह पूरा डाला पूरा एकदम छलका दिया। तो स्वामी जी यह पात्र लेकर के आ रहे हैं। अभी पात्र खुला है। उसमें से तेल जो है वो स्प्लश हो रहा है। स्वामी जी के हाथों के ऊपर में गिर जा रहा है। तो अभी यह रास्ते में आते थे तो स्वामी जी को तो आचार वगैरह प्रिय है ना। तो रास्ते में ही एक वो जो पात्र है दूसरे हाथ में लेकर के जिस हाथ में यह तेल पड़ा था उस हाथ को चाटने लगे। तेल चाटने लगे। तो एडथ एलन इतनी शॉक हो गई माने आश्चर्यचकित हो गई कि स्वामी जी यह आप क्या कर रहे हैं? आप अपनी उंगलियों को चाट रहे हैं। तो स्वामी जी कहते हैं देखो आपका यह जो वेस्टर्न सिविलाइजेशन है ना यह पूरा दिखावे वाला सिविलाइजेशन है। मनुष्य का चरित्र कैसा हो, कैसा नहीं हो। उसके अंतर का कौन सा भाव है वह सब चिंता आप नहीं करते हैं किंतु कोई अपनी उंगली चाटता है कि नहीं यह सब चिंता आप बहुत करते रहते हैं तो हमारा इंडियन सिविलाइजेशन है एसेंशियल के ऊपर में वह भार देता है एसेंशियल को वह ग्रहण करता है नहीं कि यह लोग देखते हैं कि यह उंगली चाट रहा है कि नहीं चाट रहा है पब्लिक में तो देखिए कि यहां पे भी यह ठाकुर का कि हाथ थू करके थूकते हैं। एक कंटेंप्ट प्रदर्शित करने के लिए नाराजगी बा घृणा प्रदर्शित करने के लिए। यह जो एक ग्राफिकल उनका यह था एक एक्सप्रेशन इसका रीजन क्या है? जैसे कि अपने मन में एकदम फिट बैठ जाए। यह कोई सामान्य उपदेश नहीं है कि हां आपको यह करना है, यह नहीं करना है। ऐसा नहीं ही करना है। एकदम भार देकर के एफेसिस देकर के जो कहते हैं, तो यह एफेसिस दे देने के लिए हमारे माइंड में यह बात एक ग्राफिकल एक्सप्रेशन की मदद से यह जो बताई गई बात अपने माइंड में फिट हो जाए। इसके लिए यह सब करना है। स्वामी जी का यह सब बहुत था कि यह जो सोशल कन्वेंशन है उसको तोड़ने का अमेरिका में वह डिनर टेबल पे यह सब यह रहता है। एटीकेटी रहती है। सोशल एटीिकेटी तो वहां पर आपको स्मोकिंग नहीं करना है लेडीज के सामने। डिनर टेबल पर आपको वह जो यह होता है नाइफ और यह जो फर्क उसी से खाना खाना है तो सब स्वामी जी को यह सब एटीिकेटीज जब तक मानते थे तब तक मानते थे नहीं मानते थे तो लेडीज के सामने ही स्मोक करेंगे और वही सब करेंगे जो कि उनकी इच्छा है। एक बार स्टीमर में जा रहे थे तो स्टीमर में एक जगह पर साइन लगाया हुआ है। नो स्मोकिंग तो स्वामी जी उसी के नीचे बैठकर के स्मोक कर रहे हैं। तो उनके साथ में जो थे वो तो एकदम आश्चर्यचकित हो गए। उन्हें शॉक हो गए कि अरे स्वामी जी अब ये क्या कर रहे हैं? यहां पे लिखा है नो स्मोकिंग। तो स्वामी जी कहते हैं तो अच्छा ठीक है ना लिखा है तो क्या है? फिर देखा कि वो जो स्टीमर में एक स्टुवर्ड होता है तो स्टुवर्ड का क्या काम होता है? वो डिसिप्लिन वगैरह मेंटेन करना वगैरह। तो उसने देखा कि एक आदमी है काला आदमी उसी साइन के नीचे बैठकर के स्मोक कर रहा है। तो वह दौड़ा दौड़ा आया उनको पकड़ने के लिए। तो स्वामी जी समझ गए कि वो आ रहा है पकड़ने के लिए। उनके डिवोटी भी बोल रहे अरे स्वामी जी देखिए वो पकड़ लेगा तो आपको दंड करेगा बिना मतलब यह सब झमेला होगा वगैरह-वगैरह तो वो स्वामी जी किंतु एकदम ठंडे दिमाग से स्मोक करते रहे। स्टूवर्ड जैसे एकदम सामने तक आ गया। तब उन्होंने वो सिगार जो थी वो उस समुंदर में फेंक दी। तो फिर अभी वह स्मोक नहीं कर रहे हैं। तो वो स्टीवर्ड भी उनको क्या कहेगा? यही कहने को तो आया था कि स्मोक मत कीजिए। तो स्वामी जी ने तो स्मोकिंग बंद कर दिया। तो अभी क्या कहेगा वो वो चुपचाप वापस चला गया। तो देखिए यह जो एक सोशल कन्वेंशन तोड़ के यह लोगों का जो बिहेवियर है यह क्या है कि हमारे मन में एक बिठा देना चाहते हैं। यहां पर ऐसा नहीं है कि ठाकुर थूकते हैं तो एटीिकेटी या एक जेंटलमैनलीनेस या एक सोशल कन्वेंशन का भंग होता है। वो एफेसाइज करना चाहते हैं कि पिंजरे में बद्ध पंखी की तरह मैं क्यों होने को जाऊं। यह दीन हीन अधम इंफिरियरिटी कॉम्प्लेक्स मैं अपने में क्यों आने दूं? मैं तो हूं मां काली का संतान। मेरे में तो अधम्य उत्साह है। मां को मुझे दर्शन देना ही पड़ेगा। वरना तो मैं मां के सामने मुकदमा स्टार्ट कर दूंगा। कोर्ट केस चालू कर दूंगा। यह भरोसा यह हमको भक्ति शास्त्र सिखाता है। भक्ति करके यदि हमारे में हीन भाव आ जाए तो वह भक्ति हमको ठीक में समझ में ही नहीं आई है। तो यह एक बात है। वहां पर स्वामी जी देखते थे कि यह जो वेदांत का जो इटरनल मैसेज है इन लोगों के माइंड में जाना होगा। तो यह लज्जा, घृणा, भय यह जो ठाकुर कहते थे ना यह तीनों को तोड़ना पड़ेगा। वरना ये सोशल कन्वेंशन ऐसा है। सोशल कन्वेंशन ऐसा है। एक काले आदमी के साथ में आप बात नहीं कर सकते। वहां पर तो स्वामी जी को लेडीज लोगों के साथ में ही ज्यादा उनका डीएलिंग रहता था। यही सब लेडीज ही उनको यह बाजार में यह कोई भी शॉपिंग वगैरह करना है तो ले जाती थी। यह टूर वगैरह में जाते थे। तो यही लोग उनके साथ में आते थे। तो उनके मन में थोड़ा सा भी यह संकोच रहे काले आदमी के साथ में एक फॉरेनर के साथ में हम वाइट लेडीज जा रही है तो लोग क्या कहेंगे ये आखिरी एक संकोच जो उनके मन में था यह टूट जाए बोलकर के स्वामी जी हो सकता है यह तो मेरी डेफिनेशन है पता नहीं स्वामी जी किस भाव से यह सब करते होंगे यह सब महापुरुष लोगों का भी मन इतना तन्मय होकर के रहता है ना हायर थिंकिंग में वो बहुत सारा कार्य सहज रूप से करते हैं बिना बिना सोचे कि हां इसका मुझे यह जो व्यवधान है इसको कैसे पार करना है सोचते नहीं है मां जैसे कि उनको एक तरह से चालित करती है वो लोग चलते जाते हैं और यह व्यवधान अपने से दूर होते जाते हैं तो तो अपना एक डेफिनेशन है अपनी अपना एक इंटरप्रिटेशन है कि स्वामी जी हो सकता है कि उनके मन में यह संकोच वगैरह जो भी होगा उनको तोड़ने के लिए इस तरह का आचरण करते होंगे तो जो भी है यह

व्याकुलता है आध्यात्मिक साधना का ईंधन

पूरा हमने कल देखा था। फिर कहते यह सब बात करतेकरते ठाकुर भावाविष्ट हो गए। शरीर मन यह जो सब कहां पे ईश्वर में मग्न हो गया। फिर क्या कहते हैं? मां सीता की तरह कर दो। एक ही बार में सब भूल हो जाए। अपना देह जो इतना प्रिय है वह भी भूल हो जाए। सिर्फ राममय होकर के सीता रह रही थी। तो यहां पर व्याकुलता कहते हैं ठाकुर कि व्याकुलता है मुमुक्षुत्व है वही है अपने आध्यात्मिक जीवन का एकमात्र ड्राइवर एकमात्र आप कहेंगे मोटिव पावर एकमात्र वो बैटरी जिसके ऊपर में अपनी स्पिरिचुअल कार चलती है तो ये ऑन वन हैंड जैसे हमने देखा कि बहुत ज्यादा ज्ञान चर्चा करने से एक तरह की रुक्षता ता आ जाती है और इंटेलेक्चुअल लेवल पर ही रह जाता है। प्रैक्टिस में ज्यादा कुछ होता नहीं है। ज्ञान भक्ति में आप बहुत ज्यादा एक दूसरी डायरेक्शन में चले जाएंगे। बिना सोचे समझे तो वह सब आ जाएगा। हीन भावना आ जाएगी। तो ज्ञान और भक्ति का सार ले लेना है। ज्ञान का सार है त्याग। भक्ति का सार है ईश्वर के प्रति प्रेम। और इन दोनों को मिलाकर के यह गाड़ी तो तैयार हो गई किंतु गाड़ी चलती है कैसे? तो व्याकुलता रूपी इंजन से यह ज्ञान और भक्ति की गाड़ी चलती है। यदि व्याकुलता नहीं है तो गाड़ी वहीं पर पड़ी रहेगी। थ्योरेटिकली हमने एक्सेप्ट कर लिया है कि हां ज्ञान मार्ग का सार है त्याग। हां, भक्ति मार्ग का सार है प्रेम। किंतु त्याग और प्रेम बोलने से ही तो त्याग और प्रेम आने वाला नहीं है। मैं रोटी खा रहा हूं। ऐसा बोलने से तो मेरा पेट भर जाएगा नहीं। वो आटा बना के रोटी को सेकना होगा। उसके ऊपर में घी लगाना होगा। तब तो कहीं जाकर के उसको मैं खा पाऊंगा सब्जी के साथ में। तभी तो मेरा पेट भरेगा। तो यह आटा बनाने से लेकर के यह रोटी खाने तक की यह जो पूरी प्रक्रिया है वह करने के लिए शक्ति जो प्रदान करता है वह है यह अपना व्याकुलता। रोटी बनाने की क्रिया मुझे पता चल गई। यह मुझे ज्ञान हो गया। तो यह ज्ञान मुझे कब हुआ? यह ऐसा है कि यहां से मुझे विशाखापट्टनम से कोलकाता जाना है। बेलूर मठ अपनी कार में बैठकर के ड्राइव करके मुझे जाना है। तो मेरे पास में दो चीज होनी चाहिए। नॉलेज होना चाहिए। व्हीकल होना चाहिए और फिर व्हीकल में ईंधन होना चाहिए। तो नॉलेज है और व्हीकल है। जैसे यह ज्ञान और भक्ति का सार क्या है? वह एक सिस्टम मेरे पास में रेडी हो गया है। मेरे माइंड में नॉलेज भी फिट हो गया कि ऐसेसे करके जाना है। प्रेम रूपी व्हीकल भी फिट हो गया। किंतु जब तक ईंधन नहीं पड़ेगा तब तक यह गाड़ी एक स्टेप भी आगे नहीं जाएगी। तो आखिर में ठाकुर व्याकुलता के बारे में कहते हैं। तो इसके बाद का जो पूरा पैसेज है वह 4 बजे दोपहर को यह पूरा एक वेदांतिक डिस्कशन स्टार्ट होता है। काफी माने ठाकुर का कथामृत का जो हार्ट है माने ठाकुर की फिलॉसोफी का जो हार्ट है वो पूरा यहां पर आ जाता है। देखिए मास्टर महाशय क्या लिखते हैं। बेला चारटा बाजिया छे यह 18 16th दिसंबर 1883 को ही दोपहर को 4 बजे हैं। ठाकुर श्री रामकृष्ण भक्तों शंगे श घरे बोश छे ठाकुर श्री रामकृष्ण भक्तों के साथ में उसी कमरे में उसी घर में बैठे हुए हैं। चीर परिचित कमरा जैसे मास्टर महाशय और एक जगह पर लिखते हैं जोनाइयर मुखज बाबू एक जन आशिया छन जनाई बोलकर के एक जगह है वहां से एक मुख बाबू मुखर्जी बाबू वहां पे आए तीन श्रीजुक्त तो प्राण कृष्ण ज्ञात श्रीजुक्तो प्राण कृष्ण मुखजे वो एक ठाकुर के एक भक्त थे उनके वह रिलेटिव थे ताहार शंगे एक्ट शास्त्र को ब्राह्मण बंधु उनके साथ में आए हैं एक शास्त्रज्ञ ब्राह्मण बंधु मणि राखा लाटू हरीश जोगिन प्रवृति भक्तराओ आ छेन मणि राखा लाटू हरीश योगिन वगैरह भक्त लोग भी उपस्थित है जोगिन

योगेन महाराज (स्वामी योगानन्द) की कहानी

दक्षिणेश्वर सावर्ण चौधरी देर छेले जोगिन हे दक्षिणेश्वर के सावर्ण चौधियों की नाती का एक लड़का तीन आजकल प्राय प्रत्य ठाकुर के दर्शन करते आशेन और रात्रि चोलिया जाए आजकल वह अर्थात कि योगिन ऑलमोस्ट एवरीडे प्राय प्रत्य ऑलमोस्ट एवरीडे शाम को ठाकुर को दर्शन करने के लिए आते हैं और रात को चले जाते हैं। जोगिन एकनो विवाह को रेनाई योगिन ने अभी तक विवाह नहीं किया है। वह विवाह की कहानी तो हमको पता ही है। कैसे उनकी मां ने वह मां और पिताजी ने उनको जबरदस्ती विवाह करवा दिया था। योगिन महाराज शर्म के मारे ठाकुर के पास में आते नहीं थे। तो ठाकुर ने सोचा कि देखो सब तरह के उपाय आजमा लिए उसको बुलाने के। आखिर में यह लोगों का जो एक गर्व होता है ना क्या लिखा है? सावर्ण चौधरी का लड़का है। सावर्ण चौधरी की नाथ जो है उस नाथ का वह लड़का है। तो क्या उन लोगों का एक गर्व रहता है। तो ठाकुर ने उस गर्व पर आघात करके कहा कि यहां से वह दो पैसा जो ले गया था रुपया वो वापस तो दिया नहीं उसने। उसको कहो रुपया वापस दे जाए। तो जैसे ही यह मैसेज योगिन महाराज को मिला तो योगिन महाराज तो बड़े ही दुखित हो गए। सोचा कि मैं क्या इतना अधम हो गया हूं कि मैं ठाकुर के रुपए लेकर के बैठा रहूंगा। ठाकुर ने आखिर में मेरे बारे में यही सोचा कि मैं चोर हूं। ऐसा वो दुखित होकर के थोड़ा सा यह क्रोधित होकर के ठाकुर के पास में आए। कहा कि ठाकुर यह लीजिए आपके रुपए। तो ठाकुर का आशय तो दूसरा था। ठाकुर का आशय तो इस बहाने बुलाकर के ब्रेन वाश करने का था। तो फिर ठाकुर ने कहा कि रुपयाबिया रखो और मेरे साथ बात करो। यह तुमने शादी की है तो कौन सी बड़ी आपत्ति आ गई है? तुम चाहो तो मैं तुम्हारे मन में से काम भाव को संपूर्ण रूप से उसको विच्छेद कर सकता हूं। तुम चाहो तो तुम्हारी पत्नी को यहां पर ले आओ। मैं उसके मन में से भी उसके मन को भी मैं ईश्वर की ओर अभिमुख कर दूंगा। इस तरह का अभय वचन जब ठाकुर ने दिया तब फिर से योगिन ठाकुर के पास में फिर से नियमित रूप से आने लगे। उनकी पत्नी के बारे में आखिर आखिर में योगिन महाराज जब बीमार थे उद्बोधन में थे तो उस समय मां ने क्या किया कि उनकी पत्नी को बुलाया उनकी सेवा करने के लिए योगिन महाराज की तो योगिन महाराज तो आजीवन उन्होंने तो कठोरता का पालन किया है। सन्यास धर्म का पालन किया है। अभी आखिर में अभी इस तरह से पत्नी की सेवा किस तरह से ले तो मां को बड़ी नाराजगी जताते हुए कहा कि मां आपने यह क्या किया? मेरी धर्मपत्नी को आपने यहां पर बुलाया। मैं साधु हूं मेरी सेवा करने के लिए। तो मां ने कहा अरे उसमें क्या है? मैं कहती हूं वह सेवा करें। तो तुमको क्या कोई आपत्ति है जब मैं तुमको यह वचन देती हूं कि उससे कोई तकलीफ नहीं होगी तुमको आध्यात्मिक जीवन में। तो यह वही बात है। मां कहती है ठाकुर कहते हैं ना बच्चों को इतनी ही रोटी खिलाना। मां कहती है जितनी भी रोटी खाना चाहे मैं उतनी खिलाऊंगी। वह उनकी चिंता मैं करूंगी। तुम मत करना। तो यहां पर भी यह आध्यात्मिक जीवन में जो एक कन्वेंशन होते हैं कि रात को अल्पाहार करना है। यदि विवाह हुआ है तो स्त्री से दूर रहना है। एस सच स्त्रियों से दूर रहना है। किंतु जब मां खुद यह गारंटी देती है। मां खुद जब अपना आध्यात्मिक जिम्मा अपने हाथ में लेती है तो फिर हमको कोई चिंता नहीं है। हालांकि ऑफकोर्स मां ने योगिन महाराज को कहा बोल कर के बाकी सबको इस तरह से स्वेच्छाचार करना वह भी उचित नहीं है। मां ने गारंटी तो सबको दी है किंतु व्हाई टू टेम द फैट जैसे इंग्लिश में कहते हैं ना कि अननेसेसरी यह मुसीबत को आ बेल मुझे मार। हिंदी में कहावत है कि वह सामने से वह बेल जा रहा है दौड़ा दौड़ा उसको सामने से निमंत्रण क्यों देना कि आकर के मुझे सिंह मारो कह के तो हमको जितना हो सके तपस्या करना है मुखजे प्रणामंत मुखज जो कि

श्री रामकृष्ण की ईश्वरनिष्ठा: सर्व भूत में ईश्वर दर्शन

आए थे ठाकुर का दर्शन करने के लिए प्रणाम करने के बाद में कहते हैं आपना के दर्शन कोरे बो आनंद होलो आपका दर्शन करके बड़ा आनंद हुआ श्री रामकृष्ण कृष्णा ठाकुर क्या कहते हैं तीन शकले भीतर यान तीन अर्थात कि ईश्वर सबके भीतर में ही है। शकले भीतर से सोना सबके भीतर में वही सोना अर्थात कि गोल्ड है। कोनो खाने बेशी प्रकाश संसारे अनेक माटी चापा कहां-कहां पर प्रकाश ज्यादा है। संसार में वह इस सोने के ऊपर में मिट्टी ज्यादा लग गई है। देखिए ठाकुर का यह स्मॉल टॉक वगैरह का कांसेप्ट ही नहीं है कि अपनी भवा आन की ना के अच्छे म आप अच्छे हैं कि नहीं है आपके परिवारजन कैसे हैं वो कैसा है यह कैसा है आप क्या कर रहे हैं वो कुछ नहीं सीधा आध्यात्मिक बात चालू कर देते हैं जैसे ही उसने कहा कि आपका दर्शन करके बड़ा आनंद हुआ ठाकुर क्या कहते हैं कि पहले तो यह कि इसको झूठमठ की प्रशंसा उसको मतलब ठाकुर को लग ना जाए इसलिए इसलिए कहते हैं कि ईश्वर तो सबके भीतर में है। यदि आप दीवार का भी दर्शन करेंगे, गाय का भी दर्शन करेंगे, पेड़ का भी दर्शन करेंगे तो भी आपको उतना ही आनंद आना चाहिए जितना आनंद ठाकुर के दर्शन से आता है। क्योंकि ईश्वर तो सभी के भीतर में वर्तमान है। बृहदारिणी उपनिषद में जैसे कि है पतिप को प्रेम इसलिए करता है क्योंकि पत्नी के भीतर में वह ब्राह्मण का दर्शन करता है। पत्नी भी पति को इसीलिए प्रेम करती है क्योंकि पति के भीतर में वो ब्राह्मण का दर्शन करती है। कोई भी व्यक्ति को कोई भी चीज को हम प्रेम इसीलिए करते हैं। उसके प्रति आकर्षण इसीलिए है क्योंकि उसके भीतर में यह ब्रह्म शक्ति या तो फिर ईश्वरीय शक्ति का प्रकाश हमको दिखता है। बस वही बात है। ठाकुर कहते हैं कि किसी किसी के भीतर में और यह तो पहले कहते हैं कि सबके भीतर में वह है। सबके भीतर में वही गोल्ड है, सोना है। बस वही बात है कि शक्ति का तारतम्य है। शक्ति का जो मैनिफेस्टेशन है वो डिफरेंट है। तो देखिए वो वहां पे भी ब्रह्म भक्तों ने कहा था ना कि वो पारी बाबा का दर्शन किया देखा कि उनके वहां पर दीवार पर आपका फोटो टंगा है। तो साथ-साथ में ही ठाकुर यह प्रशंसा प्रशंसा वो ग्रहण नहीं करते थे। इसलिए साथ-साथ में उन्होंने कह दिया खोलटा अर्थात कि यह जो बाह्य आवरण है बालिश अर्थात कि यह जो तकिया होता है तकिए पर हम लोग एक कवर चढ़ा करके रखते हैं वो कपड़े का जिससे कि तकिया है या तो पिलो जो है वह खराब ना हो जाए। बीच-बीच में हम कवर निकाल करके उसको धो देंगे। फिर से वह तकिए के ऊपर में लगा देंगे। पिलो के ऊपर में लगा देंगे। तो तकिया है असली चीज। यह पिलो जो है वह असली है। इसका कवर तो आप कभी भी चेंज कर सकते हैं। कभी भी उसको पुराना फेंक करके नया ला सकते हैं। बीच-बीच में उसको धोना भी पड़ता है। तो यहां पे ठाकुर कहते हैं खोलटा अर्थात कि यह जो बाकी आवरण है, यह पिलो के ऊपर का यह जो कवर है, आत्मन रूपी पिलो के ऊपर का यह कवर है, उसका फोटो रखा है। तो माने इस तरह से ठाकुर क्या है? प्रशंसा से अपने को डिसोसिएट कर देते हैं। तो वह एक बात है दूसरा कि ठाकुर जैसे विद्यासागर को कहते हैं तुमको देखने के लिए क्यों आए हैं? तुम तुम्हारे सर पर क्या दो सिंह निकल आए हैं क्या? तो क्या है कि शक्ति का तारतम्य होता है। ठाकुर स्वयं इस तरह से लोगों को देखने के लिए जाते थे। वही फेमस कहानी हमने एक दो बार कही थी। देखी थी कि वह दीन मुखज बोलकर के एक भक्त था। ठाकुर ने कहीं से सुन लिया उसका नाम। तो ठाकुर तो उस समय सबको सामने से मिलने के लिए जाते थे। तो ये मथुर बाबू को कह दिया तो मथुरु बाबू थोड़ा सा घमंडी कहां वो छोटे आदमी के घर जाएगा। किंतु ठाकुर जिद करके बैठे हैं तो जाना पड़ा। अभी दीन मुखर्जी के वहां पर गए देखा कि उसके घर में प्रसंग चल रहा है। उसके लड़के की जनेऊ ना कि ऐसा कुछ चल रहा था। उपनयन का प्रसंग था। छोटा घर वैसे ही सब निमंत्रित लोग आए हुए हैं। उसमें से मस्त बड़ी गाड़ी करके सुंदर गाड़ी करके एक बड़ा आदमी आया है मेहमान हो के। तो उसको कहां पर बिठाए क्या करें? वह तो बेचारा वो साधक आदमी है। समझ ही नहीं पा रहा है। फिर यह लोग ठाकुर और मथुर बाबू एक कमरे में जा रहे हैं। वो सोचा कि वहां पर जाकर के बैठते हैं। थोड़ा वेट करते हैं। तो वो चिल्ला उठा। अरे उस कमरे में मत जाइए। वहां पर लेडीज लोग बैठे हैं। मधुर बाबू बड़े ही रिटर्न टाइम वो ठाकुर को कहते हैं बाबा एकार तुम्हार कथा सुनो ना बाबा अभी मैं तुम्हारी बात सुनूंगा नहीं और कहीं जाऊंगा नहीं इस तरह से आप जिद करने से तो ठाकुर हंसने लगे थे तो क्या है कि ये ठाकुर जिसके भीतर में शक्ति होती है ठाकुर सामने से उनको देखने के लिए जाते थे तो यहां पे भी सर्वप्रथम तो एक ही सेंटेंस में देखिए पहले तो वह प्रशंसा ग्रहण नहीं करते हैं उससे अपने को डिसोसिएट कर देते कहते हैं सबके भीतर में ही ईश्वर है। सबके भीतर में सोना है। किंतु वही बात है कि आप मेरा दर्शन करने के लिए आए हैं तो वह लॉजिकल भी है। प्रशंसा भी नहीं ले रहे हैं और दूसरा कि वह आए हैं दर्शन करने के लिए तो उसको वो सराहना भी कर रहे हैं। उसकी यह जो इच्छा थी उसकी पर उसकी पुष्टि भी कर रहे हैं कि हां दर्शन करने के लिए आए तो गलत नहीं है। क्योंकि शक्ति का तारतम्य है। किसी में ज्यादा मैनिफेस्टेशन है। किसी में कम मैनिफेस्टेशन है कोनो खाने बे प्रकाश कहां पे ज्यादा प्रकाश है इस सोने का तो संसारे अनेक माटी चापा संसार में क्या होता है सोने के ऊपर में मिट्टी जम जाती है बोलकर के जो सांसारिक आदमी है यानी सिर्फ ऐसा नहीं कि जो गृहस्थ है इवन कोई साधक भी यदि सांसारिक वासनाएं उसके मन में प्रकट हो जाती है तो आइदर गृहस्थ या तो साधक उसके सोने के ऊपर में गोल्ड के ऊपर में मिट्टी पड़ी हुई है तो वह प्रकाश नहीं हो रही। फिर वह चाहे गृहस्थ हो या साधक हो यदि वह सांसारिकता से वह दूर चला जाता है सिंसियर है अपनी साधना में तो प्रकाश बढ़ जाएगा। मुखजे सोहास महाशय ओह पारत्रिक की तोफात अभी यह मुखजे भी समझ गया कि ठाकुर के पास में यह स्मॉल टॉक वगैरह चलने वाला नहीं है। कौन कहां पे क्या कर रहा है यह सब चलने वाला नहीं। इसलिए सीधा उसने यह प्रश्न कर दिया कि महाशय ऐहिक और पारत्रिक में क्या तफावत है? ये आई थिंक एक कोटेशन है। मोस्ट प्रोबेबबली एलेन और रुजवेल्ट वो एक लेडी है अमेरिका में उसका कि ग्रेट माइंड्स डिस्कस आइडियाज मिडकर माइंड डिस्कस इवेंट्स एंड स्मॉल माइंड्स डिस्कस पीपल अर्थात कि जो ग्रेट माइंड होते हैं जो ग्रेट लोग वे लोग आइडियाज डिस्कस करते हैं। जो जिन लोगों की बुद्धि मीडियम तरह की होती है। चरित्र मीडियम टाइप मीडियम टाइप का होता है। वे लोग घटनावली इवेंट्स अर्थात कि घटनावली डिस्कस करते हैं। आइडियाज डिस्कस करना यानी यू नो हायर फिलॉसोफी इवन करंट अफेयर्स के बारे में डिस्कस करेंगे तो हायर आइडियाज डिस्कस करेंगे। मीडियम टाइप के जो माइंड होते हैं इवेंट्स डिस्कस करेंगे। कहां पर क्या हो रहा है और जो स्मॉल माइंड है जिनका चरित्र अधम है दे डिस्कस पीपल अर्थात कि कौन आदमी क्या कर रहा है तो यहां पे भी यह मुखजे को समझ में आ गया कि यहां पर इवेंट और पीपल डिस्कस करने से कोई लाभ नहीं है। सीधा आइडियाज डिस्कस करने हैं। तो सीधा उसने प्रश्न किया कि ऐहिक और पारत्रिक में डिफरेंस क्या है? तफावत क्या है? श्री

पहले नेति-नेति बाद में इति-इति: ईश्वर ही सब हुए है 1

रामकृष्ण साधने समय नेति नेति करे त्याग करते हो ताके लाभे पर बुझा जाए तब होए छे साधन के समय नेति नेति करके त्याग करना होता है ताके अर्थात कि ईश्वर या तो आत्मन या तो ब्राह्मण व्हिच एवर आवर बिलीफ गोज़ व्हिच एवर वे आवर बिलीफ गोज़ कि उनको लाभ करने के बाद में समझ में आता है कि वही सब कुछ हुए है ईश्वर आत्मन या ब्रह्मन ही सब कुछ हुए हैं। देखिए यहां पे मुखजे का प्रश्न क्या है? ऐहिक और पारत्रिक अर्थात कि संसार और संसार से परे जो उच्च आध्यात्मिक जगत है उसमें फर्क क्या है? तो ठाकुर इस तरह से उत्तर नहीं देते कि इन दोनों के बीच में फर्क क्या है? ठाकुर कहते हैं फर्क कुछ नहीं है। वही सब कुछ हुए हैं। यदि आप साधन के समय में है तो आपको नेति नेति करके संसार त्याग करना होगा। इस अर्थ में कि सांसारिक वासनाएं हैं उसका त्याग करना होगा। देखिए इस बात में कहीं कंफ्यूजन ना हो जाए। बहुत बार लोग कहते हैं सोचते भी हैं सीरियसली कि आध्यात्मिक जीवन में आगे बढ़ना है तो सन्यास का ही तो मार्ग अपनाना होगा क्योंकि नेति करके तो पहले त्याग करना ही करना है तो यहां पर बात यह नहीं है कि आप संसार का त्याग करेंगे संसार तो आप जहां पर भी जाए इवन आप आश्रम में भी जाएंगे तो आपको दो वेला की रोटी आपको खानी है उसके लिए आपको प्रयास करना है यदि ट्रेडिशनल सन्यासी है तो भिक्षा करनी है और आज के इंस्टीट्यूशनल मोनेस्टिक सेटअप में रह रहे हैं तो आपको जो ड्यूटी दी जाएगी जो कर्म योग दिया जाएगा वह कर्म आपको योग के भाव में उसको करना है यानी कि कर्म तो करना ही है आश्रम में इंस्टीट्यूशनल सेटअप में आपको वही पैसा वही इन्वेस्टमेंट वही लीगल वो एस्पेक्ट जो है वही सब कुछ डिस्कस करना है। कल ही हमारा डिस्कशन चल रहा था। अब हमारे आश्रम की ओर से एक एमओयू हुआ है किसी के साथ में तो उसी का वह सब लीगल और अकाउंटिंग के रिलेटेड क्या है डिस्कशन कल चल रहा था तो हम लोग यदि यह सोचेंगे कि कहां सांसारिकता छोड़कर के साधु होने को आए हैं अभी यह लीगल अकाउंटिंग यह सब क्या है यह एमओयू क्या है उस सब से हमारा क्या लेना देना है किंतु नहीं संसार के भीतर जब तक पंचमहाभूत का देह है तब तक संसार के भीतर में ही है। जब तक दो बेला की रोटी, कपड़ा और मकान की जरूरत है तब तक संसार के भीतर में ही है। त्याग क्या करना है? संसार के प्रति जो आकर्षण है उसका त्याग करना है। यह जो कमल के पत्र के ऊपर में पानी तो गिरता है। पानी में ही रहता है किंतु पानी उसको स्टिक नहीं होता है। उसको चिपक नहीं जाता है। वह जैसे ही वो जैसे ही लगता है वैसे ही वह वहां से वह निकल भी जाता है। तो ये नॉन स्टिक मटेरियल इसको आजकल कहते हैं। साइंटिस्ट लोगों ने उसके यह जो पूरा माइक्रोस्कोप से स्टडी करके इस तरह का मटेरियल डेवलप किया है। और इस तरह के मटेरियल के कपड़े भी बनाए हैं। मैंने एक वीडियो देखा था कि एक कंस्ट्रक्शन में एक आदमी काम कर रहा है और इस तरह से नॉन स्टिक मटेरियल का कपड़ा पहना है। उसके ऊपर में वह जो सीमेंट रेती का मिक्सचर डाला है ना सीधा उसके कपड़ों पर डाला तो इस तरह से निकल गया। जैसे कि उसको छुआ ही नहीं हो। उसके कपड़े जितने क्लीन थे उतने ही क्लीन दिख रहे हैं। अदरवाइज आप कंस्ट्रक्शन में काम करेंगे वो गीला वो जब होता है रेती, मिट्टी, सीमेंट तो कितने गंदे कपड़े हो जाएंगे। किंतु यह नॉन स्टिक मटेरियल से बनाया हुआ इसके कपड़े वो तो जितना ही आप डालते रहिए इंस्टेंटली वह वाश आउट हो जाएगा उसके ऊपर में चिपकेगा ही नहीं और जो कपड़े हैं वो पेंट था उसका वो इतना क्लीन जैसे कि पहले ही दिन वो परचेस करके लाया है तो यहां पे भी यह नॉन स्टिक हमको होना है संसार में रहना है सांसारिकता स्पर्श नहीं होनी चाहिए तो जब नेति नेति करते हैं तब कहना है कि ऐहिक जगत है उसके उसके प्रति जो मेरा आकर्षण है, उसके प्रति यह जो मेरा अट्रैक्शन है, उसको मैं त्याग कर रहा हूं। किंतु एक बार जो ईश्वर या तो आत्मन या ब्राह्मण उसका साक्षात्कार होता है तो यही संसार फिर है मजार कुटी आमी खाई दाई मजा लुटी यही संसार बन जाता है मौज की कुटिया मा हार्ट मार्ट ऑफ जॉय तो यही मार्ट ऑफ जॉय में रहकर के यही मजा की कुटिया में रहकर के खाऊंगा पऊंगा आनंद करूंगा मन को उसके बाद में कुछ भी लगने वाला नहीं। मन के भीतर में करुणा है। वह जैसे कि सर्च लाइट ऑन करते हैं तो कैसा चारों ओर प्रकाशित हो जाता है। तो वैसे ही यह प्रेम और करुणा रूपी सर्च लाइट हमारे हृदय में एकदम फ्लैश फट करके वो टर्न ऑन स्विच ऑन हो जाएगी और चारों ओर प्रकाश बिखर जाएगा। फिर जैसे ठाकुर कहते हैं कि फूल जब फूटता है प्रस्फुटित होता है ब्लोसोम होता है तब किस तरह से उसकी सौरभ से उसकी फ्रेगरेंस से मधुमक्खियां आकर के अपने से आकर के मधुपान करने के लिए आन पड़ती है आन जुटती है तो यहां पे भी पहले नेति नेति करके एक बार संसार या तो फिर संसार के प्रति अपनी वासनाएं हैं उसका त्याग करना है किंतु ताके लाभेर पर बुझा जाए तीन शोभ होए छ ईश्वर को लाभ करने के बाद में समझ में आएगा कि ईश्वर ही सब कुछ हुए हैं जखन रामचंद्र वैराग्य हो दशरथ बो भाभी तो होए वशिष्ठ देव शरणागत होले जब रामचंद्र को वैराग्य हुआ तब दशरथ उनके पिताजी बड़े ही चिंतित हो गए और वशिष्ठ देव के शरणागत हुए जाते राम संसार त्याग ना कोन वशिष्ठ देव को जाकर के प्रार्थना की कि कैसे भी करके मेरे बच्चे को बचा लीजिए जिससे कि वह संसार त्याग ना करें वशिष्ठ रामचंद्र काछग देखन त बिमोना होए बोश आन अंतर तीव्र वैराग्यो वशिष्ठ ने रामचंद्र के पास में जाकर देखा कि वह मायूस होकर के बैठे हैं। भीतर में है तीव्र वैराग्य। मायूस या तो फिर अनमना होकर के यानी कि उदासीन होकर के सांसारिक चीजों के प्रति उदासीन होकर के बैठे हैं। भीतर में है तीव्र वैराग्य। वशिष्ठ बोल वशिष्ठ ने कहा राम तुम ही संसार त्याग करबे कैनो राम तुम संसार त्याग करोगे क्यों? संसार की तीन ही छाड़ा संसार क्या उनको छोड़कर के है? उनके अलावा क्या संसार है? ईश्वर आत्मन या ब्राह्मण के अलावा संसार है क्या आशंगे विचार करो मेरे साथ में विचार करो यह विचार अर्थात कि यह अपना एक जनरल सेंस में विचार नहीं वेदांत विचार तो मेरे साथ में विचार करो राम देख ले तो साथ सचमुच में भगवान राम ने देखा संसार से परबह्म थेके ही होए छे ताई चुप को रे रोइलेन संसार वही परबह्म के भीतर में से ही प्रकट हुआ है और इसीलिए चुप करके रहे। देखिए ठाकुर एक बड़ा सुंदर उदाहरण बात करते हैं। ठाकुर क्या कहते हैं कि तीन तरह के भक्त हैं। उत्तम, मध्यम और अधम। यह अधम भक्त है। वह कहता है कि ईश्वर जो है वहां कहां दूर में बादलों में स्वर्ग में बैठे हुए हैं। अर्थात कि जिनके साथ में हमारा ऐसा कोई संपर्क ही नहीं है उनको रिझाना होगा। उनको संतुष्ट करना होगा तो सैक्रिफाइस देना होगा। यह विधि विधान पूजा होम यज्ञ जाप जप यह सब करना होगा। तब कहीं यदि ईश्वर हमारे पर प्रसन्न होंगे तो थोड़ा बहुत आशीर्वाद रूपी भिक्षा हमारे रास्ते में फेंक देंगे। तो वह है अधम भक्त की निशानी। मध्यम भक्त है। वह सोचता है कि ईश्वर कहीं दूर में स्वर्ग में बादलों के ऊपर में नहीं रह रहे हैं। किंतु यह संसार में जो कुछ भी है उन सबके भीतर में प्राण शक्ति के रूप में विराजमान है। अर्थात कि यह जो चैतन्य शक्ति है सबके भीतर में वह चैतन्य रूपी अंश होकर के वो ईश्वर वहां पर रह रहे हैं। ये क्लासिक पुरुष प्रकृति वाला कांसेप्ट कि पुरुष भी है, प्रकृति भी है। ये दो मिलकर के संसार बनाते हैं। तो जड़ जो कुछ भी है प्रकृति और चेतन जो कुछ भी है पुरुष इन दोनों के समन्वय से बनता है संसार। तो किंतु ठाकुर कहते हैं यह मध्यम भक्त की बात। उत्तम भक्त क्या देखता है? उत्तम भक्त देखता है तीन सब कुछ खोए रहे छे। जीव जगत पशु पक्षी जीव जंतु स्टार्स गैलेक्सी प्लेनेट मून जो कुछ भी आप देख रहे हो ये पर्वत पहाड़ समुंदर नदी जो कुछ भी देख रहे हो ये मनुष्य नर नारी जो कुछ भी है सब कुछ ईश्वर ही है। ईश्वर के अलावा और कुछ है ही नहीं। उसकी सुंदर उपमा कि ईश्वर के ऊपर में यह नाम रूप का आवरण मात्र है। जैसे कि समुंदर और समुंदर की लहर। समुंदर की लहर ऐसा नहीं है। जैसे यह पुरुष और प्रकृति का कॉम्बिनेशन ये मध्यम भक्त की जो ठाकुर ने बात कही कि जड़ और चेतन का कॉम्बिनेशन करके यदि होता है यह जगत तो चेतन के रूप में चैतन्य के अंश के रूप में ईश्वर है। तो यह उपमा यदि देनी है तो समुंदर एक चीज से बना है और उसकी यह जो वेव्स है वह कोई अलग चीज से बनी है। समुंदर यदि बना है H2O से तो हो सकता है कि उसकी वेव्स बनी है सल्फर ना कि इसी तरह के किसी दूसरे केमिकल की यानी कि दोनों के बीच में काफी डिस्टेंस है भले ही चाहे साथ-साथ में वे लोग रहते हो किंतु यहां पर जो उत्तम भक्त की बात है H2O अर्थात कि पानी का ही यह समुंदर बना है और पानी का ही यह लहर बनी है। पानी से ही सब कुछ बना है। वही पानी ही है। बस वही है कि नाम रूप का नेम एंड फॉर्म का एक आवरण एक स जो वेव्स है, लहरें हैं, तरंगे हैं, उसके ऊपर में बस एक नाम रूप का आवरण लगा हुआ है। जैसे ही नाम रूप रूपी आवरण चला जाएगा, वैसे ही भीतर में वही ब्रह्म तत्व है। हमको स्पष्ट रूप से दिखाई देगा। इसीलिए यहां पर देखिए कि वशिष्ठ देव ने जब रामचंद्र को कहा कि यह ईश्वर के अलावा है क्या वह तुम मुझे बता दो। यदि आप यह मानते हैं कि यह संसार अलग है, ईश्वर अलग है। भले ही चाहे संसार के भीतर में चैतन्य का एक अंश होगा। ऐसा आप भले ही चाहे मान लीजिए किंतु फिर भी मटेरियली वह ईश्वर से अलग है। ऐसा यदि आप मानते हैं तो आप मेरे साथ में विचार करके देखिए। तो भगवान राम ने विचार करके देखा सही-सही में संसार और ईश्वर इन दोनों के बीच में कोई प्रभेद नहीं है। किंतु देखिए कि इस तरह का

अवतार को भी क्यों करनी पड़ती है साधना

थिंकिंग करने से पहले यह प्रारंभिक अवस्था में यह थिंकिंग नहीं होता है। यहां पे एक बड़ा क्रूशियल पॉइंट ठाकुर जो कहते हैं कि नेति नेति करके त्याग करना होगा। इस अर्थ में कि कामना वासनाओं को प्रथम त्याग करना होगा। यह नेम एंड फॉर्म नाम रूप के प्रति अपना आकर्षण है। उसका त्याग करना होगा। यह त्याग करने के बाद में ही हमको यह ज्ञान होगा कि सब कुछ एक होकर के रहा है। अभी भगवान राम की बात अलग है। ज्ञान लेकर के ही जन्मे हैं। उन्होंने तपस्या भी यदि की होगी तो तपस्या भी जैसे कि मन की तुष्टि के लिए की है। मन के आनंद के लिए की है। जिस तरह से ठाकुर ने तपस्या की है। ठाकुर का मन संसार की ओर था ही नहीं। पहले से ही ईश्वर की ओर था। बोल के पहले से ही तपस्या करके उन्होंने ईश्वर प्राप्ति कर ली थी। और देखिए इसको हमने काफी डिबेट किया है इस पॉइंट को कि अवतार कहां पर आते हैं? एक और तो है ईश्वर जो कि नित्य मुक्त है। दूसरा है मनुष्य वो ज्यादातर तो बंधन में ही रहता है। अवतार इस स्पेक्ट्रम में कहां पर आते हैं? अवतार यदि नित्य मुक्त होते तो अवतार की लीला जो है अवतार की साधना है। उससे हमको सीखने को कुछ नहीं मिलता। शरद महाराज लीला प्रसंग में यह विस्तार से डिस्कस किए थे और हमने देखा भी था अवतार के भीतर में सांसारिक आकर्षण रूपी तमस रजस रूपी एक अंश होना चाहिए। तभी तो उनकी साधना का कोई तात्पर्य है। यदि लोगों को दिखाने के लिए सिर्फ साधना करते तो यह भी हमने देखा कि सिर्फ लोक देखानो बांग्ला ते जैमन बोले लोगों को दिखाना माने इसीलिए यह लोग सब कुछ नहीं करते हैं। उनको यह सिंसियरली बिलीव करना होगा। जैसे वह भगवान दास बाबा जी को ठाकुर ने कहा यदि ये बाबा जी कहते हैं कि मैं अभी वृद्ध होने के बावजूद मैं यह माला जप कर रहा हूं जिससे कि लोग सीखे तो इमीडिएटली ठाकुर ने कह दिया कि यह क्या है कि तुम कौन होते हो सिखाने वाले बार-बार यह कहते रहता हूं कि मैं यह करता हूं। मैं उस साधु को दंड विधान करता हूं। मैं यह माला जप कर रहा हूं। मैं लोग शिक्षा दे रहा हूं। यह मैं क्या लगा के रखा है? इतना सीनियर इतना स्पिरिचुअल होने के बावजूद। तो देखिए कि इन लोगों का सिर्फ लोग दिखाने के लिए नहीं करते थे। सिंसियरली जेनुइनली करते थे। अदर वाइज हम इन लोगों के ऊपर में विश्वास नहीं करेंगे। मनुष्य के मन में ना यह कपट समझने का एक मीटर होता है। एक डिटक्टर होता है। ये चालाकी डिटेक्ट करने का। आप कोई भी मनुष्य हो सिर्फ कोई एक माने आध्यात्मिक जरूरत नहीं है। किसी भी मनुष्य के भीतर में चालाकी या कपट डिटेक्ट करने की क्षमता होती है। वे लोग जैसे ही देखेंगे आप चालाकी करके यह सब बातें कर रहे हैं। कपटता पूर्वक यह सब बातें कर रहे हैं। गोल घुमा करके यह सब बातें कर रहे हैं। तो यह लोग फटाक करके समझ लेते हैं कि हां मेरे साथ में कुछ ना कुछ यह लोग चतुराई कर रहे हैं। और फिर एक बार इनसिंसियरिटी उनको दिखेगी। फिर वे लोग आपको स्वीकार करेंगे ही नहीं। भले ही चाहे लिप सर्विस देते रहे, मुंह से कहते रहे कि आप बहुत अच्छे हैं, बहुत अच्छा। आपके ऊपर बड़ी श्रद्धा है मेरी। किंतु जेनुइनली वे लोग इन लोगों की त्याग, तपस्या, साधना से प्रेरित होकर के अपना लाइफ ट्रांसफॉर्म नहीं करेंगे। किसी भी लीडर का यह एक मेजरमेंट है। लोग उनको सिर्फ मुंह से स्वीकार करते हैं। बातोंब बातों में स्वीकार करते हैं कि उनके कहे अनुसार अपने लाइफ को ट्रांसफॉर्म करते हैं। तो यह ठाकुर को तो लाइफ ट्रांसफॉर्म करनी है। बोल के उनको तो साधना इसीलिए करनी थी क्योंकि साधना की आवश्यकता थी। आवश्यकता नहीं हो के सिर्फ लोग दिखाने के लिए साधना करते। तो हम लोग आज अपना जीवन इतना परिवर्तित उनके कहे करने उनके कहनी पे कथनी पे और उनके जीवन पे हम लोग अपना लाइफ ट्रांसफॉर्म नहीं करते। तो यहां पर भगवान राम उस समय की बात है जबकि जो कुछ साधनाएं वगैरह है वह समाप्त होकर के एक ज्ञान हो ही चुका था। या तो फिर कहेंगे और लीला प्रसंग में है तो शरद महाराज स्पष्ट कहते हैं कि पूर्व पूर्व अवतारों की साधनाओं का विवरण क्यों नहीं पाया जाता क्योंकि भक्त अपने ईश्वर को या तो अपने इष्ट को अपूर्ण कभी नहीं देखना चाहता बोल के उनकी साधना का वर्णन शायद लिटरेचर में से ओमिट किया गया है। जो भी है भगवान राम को इतना तो ज्ञान हो ही गया था कि जब गुरु उनको कहते हैं तत्व मसी श्वेतके तो इमीडिएटली उनको यह ज्ञान हो जाए श्वेत केतु को संस्कार शुद्ध हो चुके हैं तपस्या करके जैसे ही गुरु का यह महावाक्य श्रवण होता है साथ में ही महावाक्य का साक्षात्कार भी हो जाता है तो यहां पर भगवान राम को भी महावाक्य साक्षात्कार सिर्फ गुरु के कथनी मात्र से महावाक्य का श्रवण मात्र से सिद्ध गुरु के मुंह से उनको यह साक्षात्कार हो जाए। उस लेवल पर संस्कार के शुद्धिकरण के उस लेवल पर भगवान राम पहुंच चुके थे। इसलिए जैसे ही वशिष्ठ देव ने कहा कि तुम संसार त्याग क्यों करोगे? संसार क्या ईश्वर या ब्राह्मण को छोड़कर के है क्या? मेरे साथ में विचार करो। तो जैसे ही उन्होंने यह महावाक्य सुनाया त्वमसी श्वेत के तो अहम ब्रह्मासी प्रज्ञानम ब्रह्मा तो साथ-साथ में ही भगवान राम को वो ब्रह्म साक्षात्कार हो गया और देखा कि संसार से परबह्म थेके ही होए छे संसार उसी परबह्म से ही हुआ है। उत्पन्न हुआ है। परबह्म ही संसार के रूप में हमको दिखाई दे रहे हैं। परबह्म ने ही यह संसार रूपी मास्क नाम रूप नेम एंड फॉर्म अपने मुंह पे पहन करके रखा है। ताई चुप करे रोहिलेन इसीलिए वह चुप करके रहे।

पहले नेति-नेति बाद में इति-इति: ईश्वर ही सब हुए है 2

देखिए ठाकुर का एक दर्शन है। ठाकुर ने कहा कि मैंने एक बार दर्शन किया कि सब कुछ जैसे कि पड़ा है मेरे सामने। जैसे खाने की बहुत अच्छी चीजें भी है और गु और विष्टा और मूत्र भी है। तो अभी आप देखिए कि आप जब आहार ग्रहण करते हैं तो आप तो अच्छा आहार ही तो ग्रहण करेंगे। पकवान ग्रहण करेंगे। मिठाई खाएंगे। रोटी, दाल वगैरह खाएंगे। यह विष्ठा और मूत्र थोड़ी ना हम लोग खाने वाले हैं। यानी कि यह खाद्य है। यह अखाद्य है। यह स्पष्ट हमारे मन में डिवीजन है। हम लोग इस डिवीजन का भंग कभी भी नहीं करने वाले। अखाद्य चीजों को कभी भी हम खाने नहीं वाले। किंतु ईश्वर को तो ठाकुर के यह जितने भी यह डिवीजन है कि यह ऐहिक पारत्रिक संसार और सन्यास ईश्वर और यह जगत जीव जगत यह सब डिवीजन तुड़वा देने थे। तो इसीलिए उन्होंने इस विज़न में देखा। ठाकुर ने देखा मेरे भीतर में से यह जो चेतन तत्व है वह बाहर निकल के आया और जिकवा से लेकर के जिकवा के माध्यम से जितने भी खाद्य पदार्थ थे यह मिठाई वगैरह उसका भी अंश ग्रहण किया और यह जो अखाद्य पदार्थ थे विष्ठा मूत्र उसको भी ग्रहण किया। यानी कि देखिए कि इस दर्शन के माध्यम से ईश्वर ने मां काली ने ठाकुर को दिखा दिया कि ऐहिक पारिक सन्यास संसार ईश्वर और जीव जगत इस तरह के डिवीजन सिर्फ जा एक जब तक हम साधना के फेज में है तब तक ही है। एक बार चित्त निर्मल हो जाता है। संस्कार शुद्धि हो जाती है। तब यह पूरा विश्व जैसे कि एक ही परबह्मन का ही बना है। परबह्मन ही ईश्वर परबह्मन ही यह जगत हुए हैं। यह स्पष्ट धारणा हो जाती है। जैमन जेनिश थे के घोल से जिनिश थे के माखम जिस चीज में से यह घोल अर्थात कि बटर मिल्क बनता है उसी चीज में से यह बटर बनता है। तो किस चीज में से यह बटर बटर मिल्क और बटर बनता है तो वह दूध में से बनता है। जिस दूध में से बटर मिल्क बनता है उसी दूध में से बटर बनता है तो खोन घोले माखम माखमे रही घोल तखन अर्थात यह ज्ञान जब हो जाएगा तब पता चलेगा कि बटर मिल्क का ही बटर है बटर का ही बटर मिल्क है अनेक कष्टे माखम तुले अर्थात ब्रह्म ज्ञान होलो तो देखो जे माखम थाकली घोलो आ शेखाने माखम शेखानी घोल बहुत कष्ट करके कि यह बटर निकाला आपने अर्थात कि ब्रह्मज्ञान हुआ। जैसे ही ब्रह्म ज्ञान हुआ तब पता चला कि बटर निकालने के बाद में जो घोल अर्थात कि बटर मिल्क है वह भी उसी पदार्थ का बना है जिस जिस पदार्थ से यह बटर बना है। यह जो ठाकुर कहते हैं ना कि जब वो सीढ़ी चढ़ते-चढ़ते मकान की छत के ऊपर में जाते हैं तो चढ़ने के समय नेति नेति करके जाते हैं। जब छत के ऊपर में पहुंच जाते हैं तो पता चलता है कि जिस चीज की यह सीढ़ी बनी है अर्थात कि ईंट, पत्थर और रेती की, सीमेंट की, कंक्रीट की उसी चीज का यह छत भी बना है। उसी चीज का यह घर भी बना है। और उसी यह एलिमेंट से पूरा जीव जगत सब कुछ बना है। तो यहां पर भी जब हम लोग मक्खन निकालते हैं वो जो प्रोसेस करते हैं चर्निंग का तो मेहनत तो होता है और उस समय जब निकालने के समय हम यह नहीं कहते कि दूध में तो मक्खन है ही है तो दूध पीने से या बटर मिल्क पीने से मुझे मक्खन खाने को मिल जाएगा। ऐसा हम नहीं कहते हैं। उस समय तो मेहनत करके मक्खन को या बटर को तो सेपरेट कर ही देते हैं। किंतु एक बार सेपरेट हो गया तब फिर यह हमको यह कांसेप्ट भी क्लियर होता है कि यह वही दूध उसी का यह बटर मिल्क और उसी का यह बटर कांसेप्ट बड़ा क्लियर है। बस मेहनत करके बटर को सेपरेट करते हैं अवश्य। क्योंकि उसका टेस्ट अच्छा लगता है। इसलिए हम सिर्फ दूध या तो सिर्फ बटर मिल्क नहीं पीते। वह बटर का टेस्ट अच्छा लगता है। उसको कुकिंग में अच्छे-अच्छे उसके यूज़ है। तो बोल के मेहनत करके निकाल तो लेते हैं। किंतु एलिमेंट जो है मिल्क वो सभी में एक ही है। ब्रह्म आन बोध थाकले जीव जगत चतुर्विंशति तत्व ओ आे ब्रह्म है। यह बोध रहने से यह ज्ञान रहने से जीव जगत चतुर्विंशति तत्व भी है। यह हमको पता रहता है।

ब्रह्म का वर्णन वाणी या शब्दों से नहीं किया जा सकता

ब्रह्म ज्ञानेर एकमात्र उपाय। ये मास्टर महाशय वो जो बीच-बीच में हेडिंग देते रहते हैं ना छोटे-मोटे वो दिया है। एक हेडिंग ब्रह्म जे की वस्तु मुख्य बोला जाए ना। ब्रह्म क्या चीज है? हम मुंह से बोल नहीं सकते हैं। सब जिनिष्ट उच्छिष्ट होए छे। सब कुछ झूठा हो गया है। अर्थात मुंह से बोला गया है। किंतु ब्रह्म की के मुखे बोलते पारे नहीं। किंतु ब्रह्म क्या है? कोई मुंह से बोल नहीं पाया है। ताई उष्ट हो ना इसीलिए वह झूठा नहीं हुआ है। ए कथाटी विद्यासागर के बोले छिलाम विद्यासागर सुने भारी खुशी। यह बात मैंने विद्यासागर को कही थी। विद्यासागर सुनकर के बड़े खुश हो गए थे। और बात भी सही है। जो चीज मन वचन और वाणी के परे है। मन बुद्धि चित्त अहंकार के परे है। उस चीज को उस कांसेप्ट उस आईडिया को आप मन बुद्धि चित्त अहंकार के द्वारा वाणी के द्वारा वचन के द्वारा किस तरह से एक्सप्रेस कर सकते हैं वह तो संभव ही नहीं है। जैसे कि ठाकुर कहते हैं ना एक छोटा बच्चा है वह खिलौने लेकर के रहता है। खिलौने से खेलता है। उसको यह रमण सुख क्या है? उसका कांसेप्ट ही नहीं है। जब बड़ा होगा तब उसके यह सब कांसेप्ट उसके माइंड में आएंगे। तो यहां पर भी यह ठाकुर कहते हैं छोटी बच्ची है वह गुड़िया से खेलती है। यानी यह जो डोल है उस वो लेकर के खेलती है। किंतु जब उसकी शादी होती है पति जब आता है तब यह गुड़िया वगैरह कहां पे वह भूल जाती है। तो यहां पे भी ये जैसे हमारा स्पिरिचुअल मैच्योरिटी की ओर जाते हैं। यह जो कांसेप्ट जो है हमारे सूक्ष्म से सूक्ष्मतर होते तो जाते हैं। किंतु जो अल्टीमेट जो ब्राह्मण है उसको तो प्राप्त करने के लिए या तो साक्षात्कार करने प्राप्त नहीं देखिए ये वाणी का भी तो यह सब लिमिटेशन है ना मैं ही तो ब्राह्मण हूं मुझे साक्षात्कार करना है नहीं कि बाहर से लेकर के वो अधम भक्त की तरह कि भगवान कहां वो बादल में ना स्वर्ग में विराज कर रहे हैं तो निमंत्रण देकर के घर में बुलाना है ऐसा नहीं भीतर में ही है सिर्फ साक्षात्कार ही करना है तो किंतु यह जो है कि स्पिरिचुअल मैच्योरिटी की एक सीमा तक जब हम आ जाएंगे फिर वह लिप ऑफ फेथ लेना होगा अंधेरे में। वह ठाकुर कहते हैं ना साधु कौन हो सकता है? अर्थात कि यह साधन रूपी जगत में प्रवेश करने का अधिकारित्व किसका है? तो खजूर के पेड़ से खजूर का जो पेड़ होता है बड़ा डेट। खिजूर अर्थात डेट उसका जो पेड़ होता है बड़ा लंबा होता है। तो उसके ऊपर में से दोनों हाथ पैर छोड़कर के जो जंप लगा सकता है वही साधु हो सकता है। अर्थात कि ईश्वर पर संपूर्ण भरोसा करके किसी भी तरह का यह सिक्योरिटी यदि मुझे साधन भजन करना है तो पहले तो मुझे इतना इन्वेस्टमेंट कर लेने दो। मेरा इतना बैंक बैलेंस बन जाने दो। मेरा यह सब घर की चिंता यह हो जाए। यह सब ठीक हो जाए। बाद में मैं आध्यात्मिक जगत में प्रवेश करूंगा। इस तरह के विचार वाला आदमी कभी साधु हो ही नहीं सकता। साधु या साधक। वो जो ठाकुर की फेमस कहानी है, एक आदमी उसकी बीवी उसको कहती है कि देखो उसमें कितना त्याग है। किसी एक दूसरे व्यक्ति के बारे में कहती है। वो एक-एक करके उसकी जितनी भी पत्नियां है, उसका त्याग कर रहा है। तो यह आदमी कहता है, अरे पगली इस तरह से थोड़ी ना त्याग होता है। एक-एक करके देखो मैं त्याग कर रहा हूं। बोल के वह जो एक कंधे पर गमछा डाला जो पहने हुए कपड़े में ही घर छोड़कर के चला गया। अभी घर का क्या होगा? बीवी बच्चों का क्या होगा? कुछ चिंता नहीं है। इतना भरोसा जब होता है तब कहीं जाकर के आप साधक जीवन साधन जीवन में प्रवेश कर सकते हैं। तो यहां पर भी वो एक लीप ऑफ फेथ लेना होगा। अल्टीमेटली तब कहीं जाकर के ब्रह्म ज्ञान होगा। किंतु वह ब्रह्म ज्ञान है। उसको कभी भी हम इस मन, वचन, बुद्धि और चित्त और अहंकार से कभी भी व्यक्त नहीं कर पाएंगे। तो ठाकुर कहते हैं मैंने विद्यासागर को यह बात कही थी तो विद्यासागर बड़ा खुश हो गया। अच्छा इस पॉइंट में और भी बहुत कुछ है। अभी हम इसको देखेंगे कथामृत के नेक्स्ट क्लास में। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु।

प्रश्न: दीन-हीन भाव के प्रति ठाकुर की घृणा दिखाती है कि उनकी शिक्षा कितनी क्रांतिकारी है

किंतु एक बात है कि जैसे स्वामी जी स्वयं कहते हैं ना कि उपनिषद का जो एक जो कोर कांसेप्ट कि अभी ही अभय आत्मश्रद्धा ये नचिकेता की वर्ल्ड फेमस कहानी कि आत्मश्रद्धा नहीं होने से वह बच्चा कहां यम के पास जाकर के वो वाद विवाद प्रारंभ कर देगा। सो दैट वाज़ देयर ठाकुर के मैसेज का अभिनवत्व है। नो डाउट कि वह जो पूरी आध्यात्मिक 10,000 साल में जो इवोल्यूशन हुआ है वो बिखरा पड़ा था। पूरा म शाखा प्रशाखाओं में, संप्रदायों में, स्कूल्स में, डिबेट में वो सब बिखरा पड़ा था। यह इनके यह फॉलोअ है, यह मानते हैं। इनके फॉलोअ यह मानते हैं। तो ठाकुर ने जितने भी हजारों हजारों संप्रदाय थे उन सभी में से यह सार निकाल करके एक हमको एक फाइनल एक डेफिनेशन दे दी कि आज का आधुनिक मनुष्य में वह शक्ति नहीं है। कभी-कभी मैं जो कुछ-कुछ पंडित होते हैं ना उनके द्वारा लिखी हुई कुछ किताबें पढ़ने का प्रयास करता हूं। तो वे लोग सब तरह के संप्रदायों में से हमको निकाल कर के बात करेंगे कि यह इस संप्रदाय में ऐसा है। उस संप्रदाय में ऐसा है। यह यहां पर इस तरह से उन्होंने ऐसा कहा, उस आचार्य ने ऐसा कहा। अभी हम लोगों के साथ में प्रॉब्लम क्या है कि हमारा एजुकेशन बिल्कुल डिफरेंट टाइप का है। यह वेस्टर्न सब्जेक्ट में अपना एजुकेशन हुआ है। मैथमेटिक्स, साइंस ये सब लेकर के एकाउंटिंग लेकर के हम लोग पढ़ के यहां पे आए। तो अभी इतना सब कुछ समझना सीखना संभव ही नहीं। हमको एक डाइजेस्ट चाहिए। वो आजकल वो गाइड आता है ना कि बच्चे लोगों को वो एग्जाम प्रिपरेशन करने के लिए वो इंपॉर्टेंट क्वेश्चन का एक समरी बना करके दे देते हैं। तो वो पढ़ लो तो इसमें सब आ गया। फिर आपको पूरी टेक्स्ट बुक पढ़ने की जरूरत नहीं। तो ऐसा वो अपेक्षित या गाइड या नवनीत इस तरह का यह ठाकुर किए हैं कि सब में से यह सार ग्रहण करके हमको एक डाइजेस्ट दे दिया है और उसमें उनका अभिनवत्व है अवश्य। किंतु यह बात है कि यह मैसेज बहुत सारे ऊपर में आ ही गए हैं। तो दैट इज दैट उपनिषद में तो था ही

प्रश्न: यह मानना सहज है कि आत्मा मनुष्य, प्राणी और वृक्ष जैसे सजीवों में है; परन्तु यह स्वीकार करना कठिन लगता है कि आत्मा रेत, पत्थर या जल जैसी निर्जीव वस्तुओं में भी विद्यमान है। इसी प्रकार यह मानना सरल है कि प्रत्येक प्राणी में आत्मा है, लेकिन यह मानना कठिन है कि वही एक ही आत्मा सबमें है

जड़ दे वैसे का वैसा है दोनों में यानी कि प्रकृति तो है ही है। पंचमहाभूत पंच ज्ञानेंद्रिय कर्मेंद्रिय और इसलिए जो ऑर्गन डोनेशन डेथ के बाद में भी होता है कि आंखों को आप डोनेट कर सकते हैं। हार्ट को डोनेट कर सकते हैं। तो यह तो एकदम क्लियर है कि यह प्रकृति तो वैसी की वैसी ही है। बस पुरुष चला गया है। हां माने डेथ के बाद में भी आप नेत्र दे सकते हैं। इसका तो अर्थ क्या हुआ फिर? मध्यम भक्त वाला ही हुआ। यहां पे जस्ट एक बात मैं इंसल्ट करना चाहूंगा कि आप जो कहते हैं ना इसके पीछे में ना कुछ कुछ-कुछ एक फेक न्यूज़ भी बड़े कारण भूत है। बहुत पहले मैंने एक एक्सपेरिमेंट के बारे में पढ़ा था। बाद में मुझे समझ में आया कि यह सब एक्सपेरिमेंट फेक है। किंतु उस समय मैंने उसको बड़ा सीरियसली एक ले लिया था कि अच्छा ऐसा भी होता है। कहीं पे मैंने पढ़ा कि एक एक्सपेरिमेंट किया गया कि हमारे भीतर में कोई आत्मन या घोस्ट है कि नहीं यह टेस्ट करने के लिए तो एक मरते हुए आदमी को एक सील चेंबर में रखा। अभी ग्लास के सील चेंबर में जहां वैक्यूम मतलब वैक्यूम वो टाइट हो इस तरह की चेंबर में और इस तरह के सेवन लेयर बनाए ग्लास के कि जिसमें सेवन हवा भी ना जा पाए इतना वैक्यूम टाइट सेवन लेयर बनाए ग्लास के एक के बाद एक यानी कि यह जो आत्मन है मृत्यु के बाद में यदि वह निकलती है तो शायद एक लेयर में से निकलेगी किंतु सेवन ये जो शेल है सेवन सेवन चेंबर है सात चेंबर में से तो कैसे निकल पाएगी ग्लास की एकदम एयर टाइट ग्लास की अभी देखा कि जैसे ही मृत्यु हुआ तो उन्होंने वो वो मशीन रखे थे वो लिसनिंग वो डिटेक्ट करने वाले तो उस मशीन में ना जिस क्षण मृत्यु हुआ उसी क्षण क्रैक एक सुनाई दिया फिर उन्होंने एकदम माइक्रोस्कोपिक डिटेक्शन किया प्रत्येक सेवन लेयर में एक क्रैक पड़ गया था अर्थात कि यदि मृत्यु होता है जिस क्षण मृत्यु हुआ उसी क्षण आत्मन निकल गई और यह सातों ग्लास में क्रैक करके निकल गई। अभी दिस इज कंप्लीटली फेक न्यूज़ क्योंकि वो इस तरह से वो देह आत्मन वो सब एक ही है और आत्मन इज नॉट मटेरियल। उसको यह सात ग्लास पार करने के लिए उसमें क्रैक करने की जरूरत नहीं है। इट्स अ इमटेरियल। इट्स अ बियों्ड स्पेस टाइम मैटर एंड एनर्जी। किंतु इस तरह के एक्सपेरिमेंट लोग पढ़ते भी हैं और सीरियसली लेते भी हैं। पगले म सांख्य तो समझ में आ जाता है लॉजिकली अद्वैत वेदांत नहीं समझ में आता है। म सांख्य बड़ा लॉजिकल है। सभी का पुरुष अलग-अलग है। समझ में आता है। किंतु देखिए ठाकुर ने तो पहले ही यह स्पष्ट करके कहा है कि पहले नेति नेति करके हमको एक बार चित्त शुद्धि करनी होगी। बाद में ही इति करके हम समझ में आएगा कि यह ईश्वर जीव जगत सब कुछ एक ही ब्रह्म का है। सो जब तक हम मन और वाणी के परे नहीं जाएंगे तब तक यह अनुभूति होने वाली नहीं। सो दैट इज वन थिंग कि उसको हमको ऐसे ही लॉजिकली ही एक्सेप्ट करना है। इस जिस लेवल पर अभी हम हैं। दूसरा कि देखिए कि अद्वैत वेदांत से भी यह एक बाद का स्टेज है। जैसे वो अपने वो आयन महाराज वो कहते हैं ना कि विज्ञानवाद है ठाकुर का। तो अद्वैत वेदांत कहता है यह ब्रह्मन सत्य है। ये जो जीव जगत ईश्वर है वह म मिथ्या है। ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या। जबकि ठाकुर कहते हैं ब्रह्मन और जीव जगत यह सब एक ही है। माने ब्रह्मण ही जीव जगत हुआ है। दैट इज वो ज्ञान के बाद विज्ञान। सो दैट इज वन डिफरेंशिएशन दैट वी हैव टू अंडरस्टैंड। शंकराचार्य के सिस्टम में एक बार आपको अद्वैत ज्ञान मिल जाता है। उसके बाद में क्या होता है? इसका ऐसा कोई स्पष्ट विवरण नहीं है। जबकि अपने यहां पे है कि इवन निर्विकल्प समाधि में से भी हम वापस आते हैं और जगत में बिल्कुल परमहंस की तरह रहते हैं। सो उसके बाद का भी स्टेज है वही ठाकुर का फेमस कि स्वामी जी कहते हैं निर्विकल्प समाधि में रहना चाहता हूं। तो ठाकुर कहते यह कौन सी हीन भाव की बातें कर रहा है। तो स्वामी जी का तो बुद्धि ही गड़बड़ हो गई। ये निर्विकल्प समाधि शंकराचार्य की दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ जो अनुभूति है उसको कहते हैं कि ये कौन सी हीन बुद्धि की बात है? सो दैट इज अनदर पॉइंट लाइफ बिगिंस आफ्टर निर्विकल्प समाधि। इसको लॉजिकली हमको स्वीकार कर लेना है। सो फार मतलब वो नहीं भी करते हैं। डज नॉट मैटर। भक्ति के मार्ग में हम चलते हैं तो डज नॉट मैटर। हमको सार ले लेना है। साधना कर लेनी है। फिर बाद में उसका फिलॉसोफी क्या है? वह तो फिर ईश्वर ही समझा देंगे। आपने देखिए ना कि ठाकुर की साधनाओं के दो फेस है। सर्वप्रथम फेज में म विवाह के पहले का और विवाह के बाद का तो पहले जो 1854 से लेकर के जो 1858 तक की जो साधना थी तो हृदय की व्याकुलता से ही तो उन्होंने मां को पुकारा और मां ने दर्शन दिया। उस समय थरी थिरी को लेकर के उन्होंने ज्यादा चिंता नहीं की। वो तो फिर 1860 में कामारपुर से वापस आए मां से विवाह करके और फिर यह जो टीचरों का आना प्रारंभ हुआ उन्होंने तो ठाकुर को सिस्टमेटिकली सब कुछ सिखाया सिस्टमेटिकली साधना करवाई बाकी ठाकुर को ईश्वर दर्शन पहले हो ही चुका था वो सिलेबस कंप्लीट करके आओ मां ने कहा ना किसी ने कहा कि सर्वधर्म समन्वय ठाकुर शिक्षा देने के लिए वही केदार बाबू क्वालपाड़ा के मां कहती है नहीं वो तो त्याग की शिक्षा और साथ-साथ में ही सर्व रास्तों से जितने भी पथ है सभी पथ से ईश्वर का आस्वादन करने के लिए ईश्वर के भाव का आस्वादन करना यह ठाकुर का एक मुख्य एक उनका यह था एक मोटिव पावर था उनकी लाइफ का इवन क्रिश्चियनिटी इस्लाम उस रास्ते से कैसे ईश्वर प्राप्त होते हैं कैसे ईश्वर का दर्शन होता है ठाकुर वैसे प्रैक्टिकल भी बहुत थे वो गिरजा घर वो उसमें ठाकुर ने कहा मां मां को कहते हैं कि मां गिरजा घर में वो किस तरह से ईश्वर को पुकारते हैं वो दिखाना एक बार क्योंकि वो प्रैक्टिकल भी थे ना वो टाका माटी माटी टाका करके फेंक तो दिया किंतु फिर लगा कि ये लक्ष्मी यदि नाराज हो जाएगी तो खेदी बंदो को दे ये जो सैलरी फैलरी है बंद कर देगी तो क्या होगा मां को कहते हैं हृदय में रहो तो यहां पे भी गिरजा घर में जाना फिर ठाकुर साथ-साथ में ही कहते हैं किंतु वहां तो हिंदू समाज में वो जो था ना सब कि नात जात और यह वो सब तो मैं यदि गिरजा घर में जाऊंगा तो फिर काली मंदिर में ये लोग फिर से घुसने नहीं देंगे। तो ऐसा एक काम करना तू मुझे बाहर से ही दर्शन करवा देना। माने मां से भी कितनी अपेक्षा रखनी वो भी पता है। नहीं ये ये अच्छा उदाहरण आपने दिया। ये एक बार ग्रेविटी वेल से निकल गए फिर आप फ्लो फ्री फ्लोटिंग हो गए। ये अच्छा उदाहरण है। अपने आई एन महाराज ने तो किताब लिख दिया है ना यह विज्ञानवाद उनका ना। किंतु यह चेंज ऑफ पर्सपेक्टिव के लिए आपको तो एक हायर स्टेज पर जाना होगा ना। ऊपर से आप नीचे देखेंगे तो सब इक्वल दिखेगा। जब तक आप नीचे हैं तो सबको ऊपर नीचे तो दिखे। छोटा लंबा तो दिखेगा ही। मेरा हाइट यदि 5 1/2 फुट है तो सामने वाले का 6 फुट है मुझसे लंबा दिखेगा और 5 फुट वाला मेरे से छोटा दिखेगा। किंतु आप वो 100 मंजली बिल्डिंग पे जाकर देखें सब कुछ छोटे-छोटे एक ही 5 फुट वाला 5. 5 फुट वाला 6 फुट वाला एक ही दिखेगा। बट इन ऑर्डर टू रियलाइज दैट यू हैव टू गो देयर। सो ठाकुर की उपलब्धि और शंकराचार्य की उपलब्धि दोनों में डिफरेंस है। तभी तो ठाकुर यह देख पाए थे। किंतु उन्हें त्याग करने के लिए मेहनत चाहिए। आई मीन सिर्फ एक कि हां लॉजिकली तो चलो कि मैं सीढ़ी चढ़ के ऊपर जाऊंगा। इट विल बी वेरी गुड फॉर मी फॉर माय अंडरस्टैंडिंग। किंतु जैसे ठाकुर ने कहा ना कि मक्खन जब निकालते हैं तो चर्निंग करना पड़ता है। कष्ट करना पड़ता है। तभी तो वो मक्खन निकलेगा। वो मक्खन निकलेगा तभी फिर बाद में हम समझेंगे कि वही दूध का मक्खन और यह जो छास है एक ही चीज का है। किंतु इनिशियली मेहनत कर लेनी पड़ेगी। यानी कि सिर्फ यह अंडरस्टैंडिंग होने से कि सीढ़ी चढ़ के ऊपर जाना इट विल बी मच बेटर। दैट अंडरस्टैंडिंग इटसेल्फ इज नॉट इनफ। वो चढ़ने के लिए लिफ्ट नहीं है और चढ़ेंगे सोम मंजिल बिल्डिंग तब पता चलेगा कि कैसे होता है। तोतापुरी इज अ बिगेस्ट एग्जांपल ना। तोतापुरी ने सब कुछ रियलाइज कर दिया। किंतु पेट में जब जो दर्द बढ़ने लगा तो खुद आत्महत्या करने के लिए गए थे। उस समय कि यह पेट का दर्द मैं नहीं हूं। बोलने से नहीं चलेगा। तोतापुरी से बड़ा अद्वैत ज्ञानी कोई हो नहीं सकता है। माने निर्विकल्प समाधि में खत्म हो जाएगा। किंतु जैसे ही हम इति इति करके वापस आए तो माया का राज्य फिर से चालू हो गया। माया कहां पर नहीं है तो निर्विकल्प समाधि में और अगेन फिर अभी जैसे वह ठाकुर को महामाया ने या जगदंबा ने आकर के निर्विकल्प समाधि में आदेश दिया कि तू ही भाव मुख्य था तो फिर ब्रह्म और माया एक ही है। इवन निर्विकल्प समाधि में भी वो ब्रह्म स्थिर है तो ब्रह्म है। आदेश देता है तो माया का रूप देखकर के वो आदेश निर्विकल्प समाधि में भी दे सकता है। माने एज लॉन्ग एस पंचमहाभूत का देह है। हम माया के राज्य से बाहर नहीं है। अभी अब जैसे आजकल जैसे होता है आपकी कॉन्शियसनेस को डिजिटल आप कन्वर्ट करके किसी कंप्यूटर में अपलोड कर दीजिए। यू कैन लिव विद इन कंप्यूटर तो पता नहीं क्या होगा। बट एस लॉन्ग एज आवर कॉन्शियसनेस इज एनकेस्ट विद इन दिस बॉडी वी आर विद इन द रियल ऑफ माया ओनली। वो साइंस फिक्शन पढ़ते हैं ना कॉन्शियसनेस को डिजिटाइज करके अपलोड कर दिया है। फिर वह अभी वो वही रोबोट के भीतर में भी रह सकता है। कंप्यूटर में भी रह सकता है।

प्रश्न: अगर AI हर सवाल का जवाब दे सकता है, फिर गुरु की क्या जरूरत है?

वो जो अपना वो शारदा कोश वाला डिस्कशन हमने किया था ना नोटबुक एलएम में हमने सब कुछ डाल दिया है। तो एनी क्वेश्चन अभी आप अपने लिटरेचर को पूछिए विद रेफरेंस आपको उत्तर देगा। तो एक्चुअली में वो वीडियो कल ही एडिट कर रहा था। उसमें यही क्वेश्चन आंसर चल रहा था। जो आपने कहा ना कि अभी इस युग में टीचर की क्या जरूरत है? तो पता है उसके रिप्लाई में मैंने क्या कहा? मुझे कल कुछ ये बात होती तो मुझे याद नहीं रहता। जैसा आपने कहा नॉट पॉसिबल टू रिमेंबर। किंतु बिकॉज़ कि मैंने कल ही एडिट किया है इसलिए मुझे याद है। मैंने कहा कि देखिए आप यदि कहते हैं यही शारदा कोष माने नोटबुक एलएम को पूछेंगे। पूरा अपना लिटरेचर है। ठाकुर मा स्वामी जी कंप्लीट वर्ष लीला प्रसंग कथामृत सब कुछ है। बाकी सभी किताबें राजा महाराज की तो आप कहेंगे कि जब ध्यान क्यों नहीं हो रहा है? क्या सॉल्यूशन है? आपको बहुत बढ़िया विद रेफरेंस उत्तर देगा। किंतु वो जो पूरा एक आपको आर्टिकल बना करके दिया है। आपको पढ़ना पड़ेगा, समझना पड़ेगा। आपको क्या अप्लाई हो रहा है वह एक थोड़ा सा देखना पड़ेगा। जबकि आप अपने प्रेसिडेंट महाराज को रिवर्ड प्रेसिडेंट महाराज को जाकर प्रश्न करेंगे तो यह आपको एक ही सेंटेंस में उत्तर दे देंगे। बट वो उत्तर सीधा अपने को एप्लीकेबल होगा। सो दिस इज द डिफरेंस कि एक इंसाइट होता है मनुष्य के भीतर में। एक लीप ऑफ फेथ ये जो उसी दिन हम डिस्कस कर रहे थे अपने जो न्यूरॉन होते हैं ना न्यूरॉन के बीच में गैप होता है कनेक्शन का। तो ये क्रिएटिविटी क्या है? इट जंप्स बियन्ड दिस कॉन्शियस लेवल। स्वामी जी क्या कहते हैं कि जो अपने कॉन्शियस लेवल है उसमें वही रहता है जो कि हमने स्टडी किया है। बट देयर इज़ अ सुपरकॉन्शियस लेवल। वहां से वो आता है कि जो कि कभी स्टडी नहीं किया है। थ्यरी ऑफ़ रिलेटिविटी, थ्यरी ऑफ़ ग्रेविटी या क्वांटम डायनेमिक्स इवन ये ये जो न्यूरल नेटवर्क है व्हिच इज़ अंडरपिनिंग आर्किटेक्चर ऑफ़ एआई एंड एलएलएम। तो दीज़ आर दैट क्रिएटिविटी लिप्स जो कि अभी भी एआई नहीं ले पा रहा है। अभी यह लोग कहते तो हैं कि ऐसा एक दिन आएगा कि जबकि एआई विल इन्वेंट थिरीज़ बट डिस्कवर थरीज़ रेदर बट वो दिन अभी आया नहीं है। सो जब तक वो नहीं आता है वी आर सेफ।

प्रश्न: हमारी consciousness के लिए AI पहली चुनौती है

ना कॉन्शियसनेस को चैलेंज ऑलरेडी था। सुपरकॉन्शियस लेवल पे जो जाता है वो ऑलरेडी कॉन्शियसनेस को चैलेंज कर ही सकता है। दैट चैलेंज वाज़ ऑलरेडी देयर। किंतु बात क्या है ना कि उस ये जो अपना जो ग्रेट साइंस है राजयोग का राजयोग है वेदांत है उसको स्कूल में सिखाने की वजह हम लोग जो झूठ-मुठका ये सेकुलरिज्म में जो फंसे हैं ना पिछले 70 साल से अभी ये ट्रंप हमको लात मार रहा है तब हमारी नींद खुली है कि ये क्या कर रहा है 70 साल हमने गवा दी है आफ्टर इंडिपेंडेंस तो वी आर स्टिल अभी वो फिर से गोल घुमा करके वो वो हम फिर से ए बी सी डी पे आ गए हैं फर्स्ट स्क्वायर पे आ गए है एटलीस्ट इस बार हमको अकल आएगी अपने योग वेदांत सीखेंगे यह सब स्पिरिचुअलिटी सीखेंगे लेट अस सी इफ इट हेल्प्स अगेन और नॉट ये ये यही योग वेदांत का लाभ उन्होंने ले लिया उन्होंने यह सब डेवलप कर दिया अमेरिका वालों ने और जिन्होंने जिन्होंने ये डिस्कवर किया था हमको यह लाभ नहीं मिल रहा है एक्चुअली वही उसकी प्राइमरी एजुकेशन होना चाहिए स्वामी जी ने क्या कहा स्पष्ट कहा कि हेड माय एजुकेशन इन माय ओन हैंड यदि मेरा शिक्षण मेरे खुद के हाथ में होता तो फर्स्ट आई वुड हैव लर्न द पावर ऑफ कंसंट्रेशन देन आफ्टरवर्ड दिस पावर ऑफ कंसंट्रेशन व्हाटएवर आई वांट टू लर्न आई विल फोकस अपॉन इट एंड आई विल मास्टर इट विद इन अ वेरी शॉर्ट पीरियड ऑफ़ टाइम तो बिल्कुल रिवर्स करते हैं रटना चालू करते हैं ये सोशियोलॉजी रटेंगे ये हिस्ट्री रटेंगे ज्योग्राफी रटेंगे तो जो कि किसी काम का नहीं है आप बड़े होंगे क्या आपको हिस्ट्री काम में लगा क्या ज्योग्राफी और क्या यह सब काम में लगा कंसंट्रेशन जो कि सब फील्ड में काम नहीं लगने वाला था। वह तो हम लोग जो ये कैंप वगैरह होता है ना ये वहां पर जाके सीखते हैं। एक्स्ट्रा वगैरह में आश्रम में आकर सीखते हैं। अभी देखिए कि नो डाउट अभी पिछले जब से मोदी आए हैं तब से कुछ आशा की किरणें दिख रही है। किंतु क्या है ना कि मतलब कि एक फंडामेंटल चेंज आना। माने टू रिबिल्ड द एंटायर सिस्टम फ्रॉम स्क्रैच यूजिंग योग एंड वेदांता। आई डोंट नो कि वो होगा कि नहीं। म अभी अभी है कि लिप सर्विस सभी लोग दे रहे हैं। इंटरनेशनल योगा डे पे सभी स्कूल में आपको यह योगा करके पिक्चर अपलोड करने हैं। यहां तक तो आ गए। किंतु एक्चुअली योगा हैज़ टू बिकम ए लाइफ स्टाइल ना। नहीं कि एक 26 कौन सा 26 जून जो योगा डे है उसी एक दिन कर लिया पिक्चर अपलोड कर दिया। दैट इज नॉट इनफ। सो एक म एक दिखावा ना रह जाए। दैट वी हैव टू अंडरस्टैंड। मतलब रियलाइज माने पूरा साल भर कोई हमको याद नहीं करता है। उसी दिन 10 क्वेरी आ जाती है। आप लोग यहां पे आकर योगा सिखाएंगे तो साधु वो बाबा जी है। फोटो में अच्छे दिखेंगे। ओम