प्रार्थना
ओम स्थापकायच धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः श्री श्री रामकृष्ण कथामृत 16th दिसंबर 1883 मास्टर महाशय दक्षिणेश्वर आए हैं ठाकुर के साथ में रिट्रीट के और यह जो प्रसंग चल रहा है जनाई से एक मुख आए हैं। उनके साथ में ठाकुर का वार्तालाप हो रहा है। और जो हमने लास्ट क्लास में डिस्कस किया ठाकुर कहते हैं एक आ ध्यान और
काम-कांचन से दूषित मन की गंदगी कैसे धुले? -- ईश्वर के सामने रोओ और ध्यान करो
एक है ध्यान। किस तरह से मन का मेला है। किस तरह से हमारे ऊपर में यह काम कांचन का आवेश हुआ है। उससे मुक्ति पाई जाए। तो उसके उत्तर में ठाकुर कहते हैं कि आकुल होकर के व्याकुल होकर के रोने से क्रंदन करने से प्रार्थना करने से जो अश्रुवारी प्रकट होती है, वह अश्रुवारी इस काम कांचन रूपी कीचड़ को धो देगी। तो यह एक बात कही ठाकुर ने और फिर उसके बाद में कहते हैं और एक है ध्यान सहस्त्रार यानी कि यहां पे शिव विशेष रूप से विराजमान है उनका ध्यान शरीर जैसे कि एक पात्र है और मन और बुद्धि जैसे कि पानी इस पात्र के भीतर में और इस पानी में जैसे कि सच्चिदानंद रूपी सूर्य का प्रतिबिंब पड़ रहा है। इस प्रतिबिंबित सूर्य का ध्यान करते-करते सत्य सूर्य की उनकी कृपा से दर्शन होता है। तो यह ध्यान के बारे में जो ठाकुर कहते हैं उसके बारे में हमने लास्ट टाइम कुछ डिस्कशन किया था।
स्वामी विवेकानन्द की दृष्टि से: ध्यान में प्रवेश का साधन है कल्पना (imagination)
इस बार मैं स्वामी जी का स्वामी विवेकानंद का कुछ जो इस दो छोटे-छोटे कोटेशन है यह खास करके यह ध्यान के बारे में और खास करके यह कुंडलिनी ध्यान जो है उसके बारे में तो मैं थोड़ा पढ़ लेता हूं। यह फर्स्ट कोट है जिसको कि मैंने न्यू डिस्कवरी वॉल्यूम सिक्स में से लिया है। ऑफ कोर्स यह कोट आता है कंप्लीट वर्क्स में से किंतु मैंने जब पढ़ रहा था तो मुझे यह न्यू डिस्कवरी में मिला था बोल के वहां से ले रहा हूं। क्या कहते हैं स्वामी जी? यू मस्ट लर्न टू सीट करेक्टली। ठीक से बैठना सीखना होगा। ऐसा झुक करके ऐसा नहीं चलेगा। सीधा बैठना है जिससे कि अपनी स्पाइनल कॉर्ड है वह एक लाइन में स्ट्रेट बनी रहे। क्यों? क्योंकि इसी स्पाइनल कॉर्ड के बेस पर तो कुंडलिनी है। यह शक्ति जो बेस हमारी स्पाइनल कॉर्ड का जो एंड पॉइंट है वहां से जो शक्ति जागृत होगी वो धीरे-धीरे करके यह मणिपुर फिर यह स्वाधिष्ठान यह जो सब चक्र मूलाधार मणिपुर स्वाधिष्ठान फिर यह अनाहत विशुद्ध आज्ञा यह छह चक्रों को पार करती हुई सहस्त्रार जो है यहां पे मस्तिष्क के ऊपर में वहां पे जाएगी। और ठाकुर कहते हैं कि सहस्त्रार में भगवान शिव विराज रहे हैं। यानी कि देखिए कि स्पाइनल कॉर्ड के एंड में है शक्ति। शक्ति धीरे-धीरे करके उर्ध्वगति करेगी। जो छह चक्र है उसको भेद करती हुई उनको पार करती हुई आखिर में सहस्त्रार में आकर के शिव के साथ में उनका संगम होगा। तो यह शिव और शक्ति का संगम सहस्त्रार पर होता है। तब कहीं जाकर के यह जो आध्यात्मिक चक्षु है खुल जाते हैं। अपना यह जो काम कांचन से परे जो वास्तविक सत्ता है वही जो प्रतिबिंबित सूर्य का जो अब तक ध्यान कर रहे थे। अभी जब यह शिव और शक्ति का संगम होगा। तब यह असली सूर्य का उदय अपने हृदय में होगा। तब तक हमारा जो देह और यह मन एक छोटा सा पात्र और छोटे से पात्र में भरा हुआ जल बस इतना ही हमारा अस्तित्व था जब तक यह शक्ति रूपी कुंडलिनी उर्ध्वगति कर रही थी। किंतु जिस क्षण सहस्त्रार में शक्ति और शिव का संगम होता है उस समय देखेंगे कि यह छोटा सा मिट्टी का पात्र टूट जाएगा और फिर यह जल जो है वह भी बिखर जाएगा और यह प्रतिबिंबित सूर्य की माया में जो हम पड़े हैं माने वह भी तो एक तरह का मोह ही है। ठाकुर कहते हैं ना कि चांद की रोशनी जो है जो पानी में गिरती है और फिर मछलियां जो है आनंद से इस रोशनी के साथ में खेलती है। उनको पता नहीं कि असली चांद तो कहां अवकाश में वह छुपा हुआ है। छुपा नहीं है। वह बहुत दूर अवस्थित है। बस उसकी रोशनी को लेकर के ही हम आनंदित होते हैं। तो वैसे ही जब तक यह शक्ति उर्ध्व गति कर रही थी तो वही प्रतिबिंब को लेकर के ही जल में फंसी हुई मछलियों की तरह हम उसके साथ में खेल करके आनंदित हो रहे थे। किंतु जिस क्षण शिव और शक्ति का संगम होगा उसी क्षण देखेंगे कि यह पात्र भी टूट जाएगा, जल भी बिखर जाएगा, बह जाएगा और प्रतिबिंब सूर्य भी अदृश्य हो जाएगा। और हम असली सूर्य जो है उसमें स्थित हो जाएंगे। कोई नया पात्र नहीं बनने वाला है नया सूर्य को धारण करने के लिए। हम ही सूर्य है। वह साक्षात्कार हमको उस क्षण हो जाएगा। तो स्वामी जी कहते हैं कि पहले तो हमको सीधे बैठना सीखना होगा। देन टू ब्रीथ करेक्टली और फिर ठीक से श्वास लेने का यह जो ब्रीथिंग जो है वह ठीक-ठीक से सीखना होगा। जो व्यक्ति नर्वस होता है, एशियस होता है, स्ट्रेसफुल होता है, उसकी सांस जो है वो रेपिडली वो ब्रीथ इन और ब्रीथ आउट करता है। जो पूरक रेचक कुंभक कुंभक अर्थात कि स्टॉप करना ब्रेथ को। किंतु पूरक और रेचक यह सांस लेना और सांस निकालना। यह जो है बड़ा ही शॉर्ट होता है उसका जब वह उसको स्ट्रेस में होता है और जैसे व्यक्ति सोता है वही व्यक्ति को सोने के समय देखेंगे कि उसकी सांस जो है गहरी जाती है और स्लो हो जाती है। वही व्यक्ति है सोने के समय गहरी सांस लेता है। स्लोली सांस लेता है और जग जाता है। स्टूडेंट है। परीक्षा का टेंशन सामने खड़ा है तो ब्रीथिंग जो है वह रैपिड हो जाता है। स्ट्रेसफुल हो जाता है। तो स्वामी जी कहते हैं कि पहले तो ठीक से बैठना सीखना होगा सीधे होकर के फिर यह गहरी और धीरी सांस लेना सीखना होगा। दिस डेवलप्स कंसंट्रेशन ये करने से अपनी एकाग्रता डेवलप होती है। देन कम्स मेडिटेशन। देखिए यहां पे स्वामी जी कंसंट्रेशन और मेडिटेशन में एक तरह का दो स्टेप में बांट देते हैं। आइडेंटिकल कंसंट्रेशन और मेडिटेशन को नहीं ट्रीट करते। कहते हैं कि यह कंसंट्रेशन है। यह मेडिटेशन है। अभी जैसे कि योग सूत्र है। उसकी भाषा में कहे तो सर्वप्रथम आता है धारणा कि देश बंध चित्तस्य धारणा। अर्थात कि कोई भी एक ऑब्जेक्ट के ऊपर में मन को एकाग्र करना वह है धारणा। उसके बाद में आता है तत प्रत्यय एक तानता ध्यानम। उस ऑब्जेक्ट के प्रति हमारा एक तान मन हो जाए। हार्मोनियसली अपना मन उसी ऑब्जेक्ट के ऊपर में फ्लो करता रहे। तब होता है ध्यान। धारणा में क्या होता है? मैं मन को एकाग्र करने का प्रयास तो करता हूं। किंतु बीच-बीच में ना इस तरह से हमने जो लास्ट टाइम देखा था जो ये है ये अपना जो ब्रेन है वह है पाकिस्तान और यह अपना हार्ट जो है वह इंडिया। तो यह ब्रेन जो है बीच-बीच में यह टेररिस्ट को भेजता है इंडिया में। यह इनफिल्ट्रेशन करवाता है और जितनी भी बार यह इनफिल्ट्रेशन होगा हमारे यहां पर कुछ ना कुछ गड़बड़ होगी अशांति होगी तो वैसे ही भले ही चाहे हम अपने हृदय में मन को एकाग्र करने का प्रयास करते हो अपना ब्रेन सतत कुछ ना कुछ विचार भेजता रहता है स्ट्रेसफुल विचार जो कि हमको छोटा बनाने का प्रयास करता है जो कि हमको भयभीत करने का प्रयास करता है जो कि हमको एक तरह तरह से हम हम कुछ नहीं है। हम यूज़लेस हैं। हम जीवन के इस युद्ध में हार गए हैं। इस तरह से एक डिफिटिश मेंटालिटी डेवलप करवाने का प्रयास करता है। तो वह हो गया धारणा। किंतु जब जैसे-जैसे हमारा एकाग्रता है दृढ़ से दृढ़तर होता जाएगा तब क्या होगा? तत प्रत्यय एकतानता ध्यानम। यह उसके प्रति एक जो ऑब्जेक्ट है उसके प्रति एक तान से हार्मोनियसली जब अपने मन का प्रवाह बहेगा तब वह ध्यान में परिणत होगा। व्हेन प्रैक्टिसिंग ब्रीथिंग थिंक ऑफ योर बॉडी इज लुमिनस। जब ये प्राणायाम का प्रयास हम ये प्रैक्टिस करते हैं प्राणायाम का अभ्यास करते हैं तब आप अनुमान कल्पना कीजिए कि हमारा जो पूरा देह है जैसे कि प्रकाश की किरणों से भरपूर है। हमारा देह जैसे कि प्रकाशित हो रहा है। तो देखिए यह इमेजिनेशन किस तरह से कार्य करती है। बहुत लोग बोलते हैं कि आजकल जो यह अ इमेजिनेशन जो है इमेजिनेशन का ध्यान में कोई काम नहीं है। बस एक ऑब्जेक्ट के ऊपर में मन कंसंट्रेट करो तो उसी से ध्यान हो जाएगा। या तो फिर जो जप के लिए मंत्र देते हैं मंत्र पे यदि कंसंट्रेट करो मेरा मंत्र है ओम नमः शिवाय। फॉर एग्जांपल तो मैं ओम नमः शिवाय ओम नमः शिवाय ओम नमः शिवाय। यह जो जप करता रहूंगा तो जप पे ही कंसंट्रेट करने से होगा। इससे ज्यादा अनुमान कल्पना इमेजिनेशन वह सब करने की जरूरत नहीं। कोई ऐसा शायद कहेगा। किंतु देखिए स्वामी जी यहां पर स्पष्ट रूप से यह हमको कल्पना करने को कह रहे हैं। थिंक ऑफ योर बॉडी एज लुमिनस। देखिए अब जैसे ठाकुर का है ठाकुर जैसे कि अपनी चारों ओर यह जो अग्नि का एक बैरियर बनाना यह जो पूजा के समय में जो आता है यह मंत्र यह विधि तो ठाकुर जब वो जल प्रक्षालन करते थे तो साथ-साथ में ही देखते थे कि वह अग्नि का बैरियर वो सही में खड़ा हो जाता है। ठाकुर जब यह न्यास वगैरह करते थे तो अपने अंग प्रत्यंग में वह बीज मंत्र साक्षात देख पाते थे। तो वो कोई कहेगा कि वह साक्षात्कार जब होता है बीज मंत्रों का जब ईश्वर आपको सही में दर्शन दिलवा देते हैं तो वह ठीक है। किंतु इमेजिनेशन करना कि मेरे मैं जब न्यास कर रहा हूं कोई पुजारी महाराज है तो बीज मंत्रों को विजुअलाइज करने का कोई लाभ नहीं है या तो कोई उसका प्रयोजन नहीं है। तो मेरी दृष्टि से और यहां पर स्वामी जी की दृष्टि से भी इस तरह का थिंकिंग कोई काम का नहीं। देखिए इमेजिनेशन दर्शन हो तो बहुत अच्छा है। जब मैं न्यास करता हूं, मंत्र पाठ करता हूं, मंत्र जप करता हूं अपने हृदय में ईश्वर का मेरे इष्ट जो है उनका दर्शन हो जाता है तो उससे तो अच्छा और कुछ है ही नहीं। किंतु जब तक दर्शन नहीं होता है तब तक हम कल्पना की सहाय ले ही सकते हैं। और इसीलिए स्वामी जी कहते हैं थिंक ऑफ योर बॉडी एस लुमिनस। अपने देह को प्रकाशित सोचो कि आपका इमेजिन करो विचारो कि आपका देह प्रकाशित है। ट्राई टू लुक डाउन द स्पाइनल कॉर्ड फ्रॉम द बेस ऑफ द ब्रेन। यह जो ब्रेन है और ब्रेन का जो बेस है ब्रेन का बेस अर्थात कि जहां पे स्पाइनल कॉर्ड ब्रेन के साथ में कांटेक्ट में आता है ब्रेन के साथ में फ्यूज होता है उसको कहते हैं ब्रेन का बेस या तो फिर कहेंगे कि स्पाइनल कॉर्ड का टॉप पार्ट। तो यह स्पाइनल कॉर्ड का जो टॉप पार्ट है वहां से लुक डाउन। ऐसा करो। इमेजिन करो कि आप स्पाइनल कॉर्ड के नीचे में देख रहे हैं। यानी कि स्पाइनल कॉर्ड एक पाइप की तरह है। तो ऊपर से हम नीचे देख रहे हैं पाइप में इस तरह से इमेजिन करो। टू द बेस ऑफ द स्पाइन। ऊपर से देख रहे हैं नीचे की ओर। उसके जो उसका जो फाउंडेशन है वहां की ओर। इमेजिन दैट यू आर लुकिंग थ्रू द होलो सुषुम्ना टू द कुंडलिनी राइजिंग अपवर्ड्स टू द ब्रेन। इस तरह से सोचो कि यह जो सुषमना नाड़ी है वो भीतर में से खुली है। होलो है और वहां से हम ऊपर से नीचे देख रहे हैं। हमको कुंडलिनी ऊपर उर्ध्वगति करती हुई दिखाई देती है। हैव पेशेंस थोड़ा सा पेशेंस रखो। थोड़ा सा शांति रखो। उतावले ज्यादा मत हो। धीरे-धीरे करके शनैई ही शनह शनैई शनै ही ऊपर धीरे-धीरे करके यह सब कुछ होने वाला है। ग्रेट पेशेंस इज नेसेसरी। बहुत ही पेशेंस चाहिए। बहुत ही ज्यादा हमको अपने मन के ऊपर में संतोष और संयम चाहिए। तो, यह एक हो गया स्वामी जी का कोटेशन। दूसरा कोटेशन है। कंप्लीट वक्स फर्स्ट वॉल्यूम राजयोग में से लिया है।
स्वामी विवेकानन्द की दृष्टि से: मन को एकाग्र करने के लिए कल्पना का खेल (play of imagination) अनिवार्य है
दिस धारणा इज ऑफ वेरियस सॉर्ट। यह जो धारणा है वह डिफरेंट-डिफरेंट प्रकार के है। धारणा का डेफिनेशन हमने ऑलरेडी देख लिया। देश बंध चित्तस्य धारणा अर्थात कि एक ऑब्जेक्ट के ऊपर में मन को एकाग्र करना वह धारणा है। एंड अलोंग विद इट। और साथ में ही इट इज बेटर टू हैव अ लिटिल प्ले ऑफ द इमेजिनेशन। हम धारणा जो है पहले तो स्वामी जी ने समझाया कि एक के बाद एक विभिन्न ऑब्जेक्ट के ऊपर में मन को एकाग्र करना वो है धारणा अब किंतु साथ-साथ में ही यदि हम थोड़ा सा इमेजिनेशन प्ले ऑफ इमेजिनेशन देखिए कल्पना की रमत स्वामी जी शब्द भी कैसा सुंदर यूज़ करते हैं। प्ले ऑफ़ इमेजिनेशन कल्पना की रमत साथ-साथ में थोड़ी सी कल्पना की रमत करना भी कल्पना की लीला करना भी अच्छा है। फॉर इंस्टेंस जैसे कि द माइंड शुड बी मेड टू थिंक ऑफ वन पॉइंट इन द हार्ट। अपने मन को कहो कि अपने हृदय में एक बिंदु के ऊपर में अपने को केंद्रित करें। दैट इज वेरी डिफिकल्ट एंड अ इज़ियर वे इज टू इमेजिन ए लोटस थे। किंतु यदि हम अपने मन को यह कहते हैं कि हार्ट पर केंद्रित करो तो थोड़ा सा शायद हमको डिफिकल्ट लगेगा। तो स्वामी जी कहते हैं इज़ियर इट इज टू इमेजिन अ लोटस देयर। यहां पे अपने हृदय में लोटस की कल्पना करना इजी है। कल जैसे कि हमने वह कैरोट और स्टिक का उदाहरण दिया था। गधे को आप यह कहेंगे उसके ऊपर में बोझा डाल दिया है और फिर कहेंगे कि चलो मुझे यहां पर वह उस दुकान में जाना है यह माल को सेल करने के लिए बिक्री करने के लिए तो गधा तो वहां से निकलने वाला नहीं है आलसी गधा है वह क्यों काम करेगा क्यों अपने पीठ के ऊपर में बोझा लेकर के कहीं गांव में किसी दुकान में जाएगा तो फिर आप क्या करेंगे पहले तो उसको एक प्रलोभन देंगे यह प्रलोभन क्या है तो यह प्रलोभन है केरल कैरट गधे को यह जो कैरट है, गाजर है, खाना अच्छा लगता है। बोल के आपने उसको कैरट रूपी प्रलोभन दिया। जैसे ही यह प्रलोभन दिया, वैसे ही यह गधा सोचता है कि अभी मैं थोड़ा सा आगे बढूंगा तो अभी मुझे कैरट खाने को मिलेगा और थोड़ा सा आगे बढूंगा तो अभी मुझे किंतु आपको क्या करना है? कैरट को और आगे-आगे लेकर जाना है। लकड़ी के ऊपर में एक रस्सी से बांधा हुआ कैरट उसको और आगेआगे लेकर के जाना है। देखेंगे कि उसको खाने के लोभ में गधा भी पीछे-पीछे जाता है। तो स्वामी जी यहां पर कहते हैं कि गधे को सिर्फ अब जैसे देखिए स्टिक यानी कि डंडा मारना वह बाद में आएगा। दैट इज अ सेपरेट थिंग। किंतु सिर्फ गधे को आप कन्विंस ही करेंगे कि अरे भाई तुम चलो थोड़ा सा मुझे काम है यह काम निपटाना है यह बोझा लेकर के वहां पर जाना है चलो वो एक्सप्लेन करने से विनती करने से वह सुनने वाला नहीं है तो उसको एक प्रलोभन दे दिया तो स्वामी जी यहां पर कहते हैं कि अपने मन को हृदय के एक बिंदु के ऊपर में केंद्रित करना थोड़ा सा मुश्किल है क्योंकि हृदय अपने अपने पास में ना अपने ब्रेन के पास में या माइंड के पास में ऐसा कोई इंसेंटिव ही नहीं है कि वह अपने हृदय पर कंसंट्रेट करें। तो फिर उसको एक इंसेंटिव देना है। उसको एक प्रलोभन देना है। प्रलोभन क्या है? तो यह कैरेट दिखा दिया उसको। हृदय में एक लुमिनस लोटस है। उसको हमने इमेजिन किया। और देखिए
मन को सौंदर्य प्रिय है—इसीलिए ध्यान हेतु सुंदर दृश्यों की आंतरिक लाइब्रेरी बनाइए
मनुष्य का जो मन है सहजता से सौंदर्य की ओर धावित होता है। वह यदि चाहे प्रकृति का सौंदर्य हो ना किसी मनुष्य का सौंदर्य हो जैसे ही हमने सुंदरता देखी वैसे ही हमारी नजर ऑटोमेटिकली वहां पर आकर्षित होगी। यह जो ठाकुर कहते हैं ना कि मागुर माछेर झोल जुबती मेयर कोल बोल हरि बोल ऐसा माने यह माुर रूपी मछली का यह जो जूस है पहले तो उसका प्रलोभन दो फिर यदि यह युवती स्त्री है उसके आंचल का प्रलोभन दो और फिर यह दो प्रलोभन से यदि कोई आदमी आता है तो बोल हरि बोल उससे बुलवा लेना है तो देखिए कि यह एक बार एक प्रलोभन देकर करके मन को आगे खींचना है। तो यह तो एक बात है। किंतु स सामने देखिए कि यह ऐसा जब हम कहते हैं कि एक प्रलोभन देकर के एक ऐसा एक सीन खड़ा करके जैसे कि ल्यूमिनस लोटस है या तो फिर अब जैसे मैं यहां पे सी शोर है तो कभी-कभी मॉर्निंग वॉक के लिए जाता हूं तो रेती के ऊपर में बैठकर के जो होराइजोन के उस पार जो सूर्योदय होता है उसको मैं दर्शन करता हूं। फॉर्चूनेटली यह ईस्टर्न सी शोर है। मैं यदि वेस्टर्न सी शोर पे होता तो मुझे सूर्यास्त का दर्शन होता। सूर्योदय का नहीं होता। किंतु यह ईस्टर्न पार्ट ऑफ इंडिया में है तो सूर्योदय सूर्य सूर्योदय का दर्शन होता है। तो यह सूर्योदय का दर्शन जब होता है तो फिर इतना सुंदर नजारा खड़ा होता है कि इतना बादल कलर कलरिंग ये बादल है। यह पूरा जगत जो है वह शांत है। समुंदर की लहरें जैसे कि यह जो लहरों की भी तो एक आवाज होती है ना तर्जन गर्जन होता है। वो भी जैसे कि ना मन को शांत करता है। तो यह सीन को जैसे कि अपने हृदय में विजुअलाइज करना है। तो देखिए कि जब हम यह विजुअलाइजेशन का प्रैक्टिस करते हैं तो नेचुरली है कि सभी का अपना-अपना एक कस्टम मॉडल होगा कि मुझे इस चीज पर विजुअलाइज करने से ज्यादा मेरा मन एकाग्र हो जाएगा। किसी का यह सीशोर पर विजुलाइज करने से मन एकाग्र हो जाएगा। और इवन हमारे खुद के जीवन में सुबह को एक चीज पर विजुअलाइज किया तो मन एकाग्र हो गया तो शाम को उसी पे उसी सीन के ऊपर में विजुअलाइज करने को जाएंगे एकाग्र करने को जाएंगे तो नहीं होगा। तो फिर दूसरा सीन बना दिया। मैंने ऐसे बहुत सारे सीन बनाए हैं विजुअलाइज करने के लिए। अब जैसे कि ठाकुर दक्षिणेश्वर में बैठे हैं अपने कमरे में तो वहां वह एक सीन है। फिर जैसे चांदनी दक्षिणेश्वर में ही गंगा का जो घाट है दक्षिणेश्वर में ही पंचवटी है। ऐसे बहुत सारे सीन हम विजुअलाइज करके रख सकते हैं। रेडीमेड जैसे कि हम लोग लाइब्रेरी में जाते हैं तो लाइब्रेरी में आपको सब तरह की किताब मिल जाएगी। यहां पे यह साइंस की किताब है। यहां पे हिस्ट्री की किताब है। यहां पे बाल वार्ताएं हैं। यहां पे कॉमिक्स है। यहां पे यह साइंस फिक्शन है। यहां पे यह नोवेल वगैरह है। यहां पे यह गुजराती किताब है। यहां पे इंग्लिश किताब है। यहां पे यह धार्मिक किताब है। तो हम जिस समय जिस मूड में होते हैं, उस तरह की किताब हम उस लाइब्रेरी में से लेते हैं। लाइब्रेरी में हजारों हजारों किताबें हमारे ही हमको ही सर्व करने के लिए हमारी ही इच्छा को पूर्ण करने के लिए अच्छे से सजा करके रखी गई है। तो वैसे ही यह जो सीन है जो सब कल्पनाएं हैं इमेजिनेशन है उस सबकी एक लाइब्रेरी बनाइए और इस लाइब्रेरी में बड़े ही फुल्ली डेवलप करके माने फुल्ली फ्लश माने अच्छे से डेवलप करके सीन सब रख दीजिए किताबों की तरह और जब हम ध्यान करने को बैठते हैं तो कभी-कभी यह जो है प्ले ऑफ इमेजिनेशन अपने हृदय में हमको क्या इमेजिन करना है कि कभी-कभी मैंने यह सी शोर वाला किताब यह सीन लाइब्रेरी में से निकाल करके उसको मैं प्ले कर रहा हूं। यह कभी-कभी यह है कि मैं दक्षिणेश्वर वाला सीन जो है वह प्ले कर रहा हूं। एक्सपेरिमेंट करके देखना है। यह सीन प्ले करने से क्या मेरा मन एकाग्र होता है? तो नहीं होता। तो चलो दूसरे सीन को पकड़ो। दूसरे सीन से क्या एकाग्र होता है? नहीं होता तो तीसरे को पकड़ो। ऐसा एक वेल डेवलप लाइब्रेरी हमको डेवलप करना है। यह ध्यान इस जिसका यह रिच लाइब्रेरी है कल्पना का, इमेजिनेशन का, प्ले ऑफ इमेजिनेशन का उसको देखेंगे कि वो ध्यान सहज रूप से कर सकता है। उसको समझ में आता है। हमको यह समझना होगा। सुबह मेरा इस तरह का मूड है। शाम को इस तरह का है। आज मेरे साथ में ऐसा हुआ तो मुझे इस तरह का सीन डेवलप देखिए बहुत सारे लोगों के ना म्यूजिक होते हैं। सॉन्ग्स होते हैं। डिप्रेशन में है तो यह सॉन्ग प्ले करना है। चियरफुल मूड में है तो यह सॉन्ग प्ले करना है। एक्सरसाइज कर रहे हैं तो फिर यह सॉन्ग प्ले करना है। और ज्यादा अपबिट एक्सरसाइज के लिए सॉन्ग चाहिए। डिप्रेस है तो थोड़ा स्लो वाला सॉन्ग चाहिए। स्टडी कर रहे हैं तो स्टडी में कंसंट्रेशन करने के लिए जो म्यूजिक प्ले किया जाता है क्लासिकल म्यूजिक स्लो उसकी ट्यून हो रिदमम हो वो वाला चाहिए तो बहुत सारे लोगों की ना ऐसा सॉन्ग्स लाइब्रेरी होती है जिस समय जो एक्टिविटी कर रहे हैं जिस समय जो मूड में है उस अनुसार उन लोगों का यह सॉन्ग्स लाइब्रेरी रेडी रहता है तो हमारा भी हम किस समय में किस तरह के मूड में है किस तरह का हमको ये भीतर में से एक सोलेस्ट चाहिए एक तरह का एक प्राप्ति हमको संतुष्टि चाहिए। उसके अनुसार यह सीनंस का इमेजिनेशन का लाइब्रेरी हमको बना करके रखना है। और इस लाइब्रेरी में से एस पर नीड एक के बाद एक सीन को हमको प्ले करना है। तो वह हो गया ध्यान का मेथड। और ध्यान
ध्यान में मन पाकिस्तान है, हृदय भारत। मन नकारात्मक विचार भेजकर हृदय में घुसपैठ करता है — इसलिए ध्यान से पहले मन और हृदय के बिच की बॉर्डर सील करो
हमेशा हृदय में ही करना है। हमेशा ख्याल में रखिए यह ब्रेन जो है, माइंड जो है वह है पाकिस्तान और यह हार्ट जो है वो है इंडिया। यह पाकिस्तान में से जितने भी नेगेटिव आइडियाज हैं, जितने भी स्ट्रेसफुल विचार है, जितनी भी यह नेगेटिविटी है, सब यह टेररिस्ट की तरह ब्रेन में से हार्ट की ओर इनफिल्ट्रेशन करने का प्रयास करती है और उसको हमको कैसे भी करके रोकना है। इनफिल्ट्रेशन बढ़ गया तो हृदय में अशांति और फिर ध्यान होगा नहीं। और यदि अपना सैन्य, अपनी आर्मी स्ट्रांग है तो इनफिल्ट्रेशन को रोकेगा। टेररिस्ट आ नहीं पाएंगे ब्रेन से हार्ट की ओर और फिर अपना हार्ट जो है पीसफुल रहेगा। उसके बाद में यह इमेजिनेशन करना है। उससे पहले सीधा इमेजिनेशन करने का प्रयास किया। अपने ब्रेन को स्विच ऑफ किए बिना सीधा हार्ट पे मेडिटेशन करने का प्रयास किया। देखेंगे कि उसमें ज्यादा कुछ आपको आनंद नहीं आएगा। सतत एक तरह का ए्जायटी सत सतत एक तरह का एक कहेंगे कि स्ट्रेस वो बना रहेगा। तो पहले तो यह जो कनेक्शन है उसको कट करने का प्रयास करना है। उसके बाद में हृदय में ध्यान करेंगे तो अच्छा से आनंद आएगा। देखिए 100% कनेक्शन कभी कट नहीं होने वाला है। जब तक समाधि नहीं होगी दग्ध बीज नहीं हो जाएंगे अपने पंचलेश अविद्या अस्मिता राग द्वेष अभिनिवेश तब तक यह कनेक्शन कट नहीं होने वाला है। बट डज नॉट मैटर। शुरू में एक बार मेहनत करके कनेक्शन को थोड़ा बहुत कम कर देना है। इनफिल्ट्रेशन जो पूरा खुला बॉर्डर था ओपन बॉर्डर तो एटलीस्ट फेंसिंग तो कर दिया। अभी जिसको आना है वो आने वाले कम हो गए हैं। तो तो इस तरह से इनफिल्ट्रेशन को कम करने का प्रयास अवश्य करना है। तो यह एक बात है कि हृदय में ध्यान करने से पहले यह ब्रेन और हार्ट इन दोनों के बीच की बॉर्डर को सील करना है। दैट इज लेसन नंबर वन। लेसन नंबर टू है कि एक पूरा लाइब्रेरी ऑफ सीन कल्पना का प्ले ऑफ इमेजिनेशन यह जो मॉडर्न लैंग्वेज में एकदम फिट बैठ जाता है अपने पीसी में कंप्यूटर में या अपने मोबाइल में बहुत सारे सॉन्ग्स है अभी मुझे अभी मैं ये पता है ना आजकल जिम में जाएंगे तो सॉन्ग्स प्ले करेंगे तो आप जोगिंग कर रहे हैं कि योगा कर रहे हैं उसके अनुसार वो सॉन्ग ना कि म्यूजिक प्ले करेंगे तो वैसे ही कि जिस तरह जिस समय मैं जिस मूड में है जिस उसमें पोजीशन में है हमको किस तरह का सोलेस चाहिए किस तरह का भरोसा शांति चाहिए उसके अनुसार वह सीन को प्ले करना है। सो दैट इज लेसन नंबर टू और लेसन नंबर थ्री है इक्वली
ध्यान के लिए मन को सात्त्विक कल्पना पर एकाग्र करना है, राजसिक या तामसिक पर नहीं।
इंपोर्ट। देखिए यह जब हम सीन डेवलप कर रहे हैं तो उस समय एक बहुत बड़ी बात को ख्याल में रखना है। क्या है वो कि कैरोट प्रलोभन किस चीज का देना है? कैरोट का देते हैं। यह गाजर का देते हैं। एक कैरोट जो है आप एक खाएंगे, दो खाएंगे, तीन खाएंगे, चार खाएंगे। कोई दिक्कत होने वाला नहीं है। किंतु यहां पे जैसे साउथ इंडिया में यह जो मैसूर पाक मिलता है। बंगाल में जाएंगे तो रसगुल्ला है, गुलाब जामुन है। वह सब मिलता है। यह जो बाकी नॉर्थ इंडिया में मोहन थाल वगैरह मिलेगा, शीरा मिलेगा। यह मिठाई जो है उसका जो आकर्षण है ना वह कैरोट से कहीं ज्यादा है। आप दो पात्र में हमारे सामने एक दो डिश रख दो प्लेट रख दीजिए। खाने को बैठे हैं नजर के सामने दो प्लेट रख दीजिए। एक प्लेट में रखिए सलाड। सलाड में यह कैरट है। यह फिर यह कुकुंबर है वगैरह-वगैरह जो सलाड जो टमाटर है काट करके अच्छे से सजा करके के सलाड का प्लेट रखा है। दूसरी ही प्लेट में आप रख दीजिए। यह जितनी भी सुंदर-सुंदर मिठाइयां है, सुंदर-सुंदर पकवान है, समोसा है, कचोरी है, पूरी है, फिर यह मोहन थाल है, फिर यह गुलाब जामुन है, वगैरह-वगैरह मैसूर पाक है। उसको रख दीजिए। देखिए कि आपका मन कहां जाता है। मन आपका हमेशा यह पकवान की प्लेट है। वहीं पे जाएगा। मिठाई खाने का, समोसा खाने का, कचौड़ी खाने का, डोसा खाने का। वही आपका मन होगा। नहीं कि यह सलाड खाने का, ना ही कैरोट और यह कैबेज और यह क्ुंब उसको खाने का। क्यों? क्योंकि इसका जो पकवान का प्रलोभन है वह सलाड के प्रलोभन से कहीं ज्यादा है। मिठाई का प्रलोभन सलाड के प्रलोभन से कहीं ज्यादा है। तो यह बात वैसे इंस्टिंक्टिवली हम सबको पता है। तो मैं सोचूंगा कि मुझे सीन ही क्रिएट करना है ना। मुझे तो अपने मन को प्रलोभित ही करना है ना कि हां चलो एक बड़ा सुंदर सीन है जिसको कि मैं कल्पना करूंगा तो मेरा मन वहां पर एकाग्र रहेगा तो अभी मैं सी ईश्वर की कल्पना करने से मेरा मन एकाग्र नहीं होता मेरे मन में बहुत रजस पड़ा हुआ है। मैं ठाकुर की कल्पना करता हूं। दक्षिणेश्वर में अपने कमरे में बैठे हुए हैं। फिर भी मेरा मन एकाग्र नहीं होता। रजस बहुत ज्यादा है। मैं कल्पना करता हूं कि जय राम बाटी में मां के कमरे में मैं भी बैठा हुआ हूं। मां ध्यानस्थ है बैठी हुई और सामने मैं भी बैठा हुआ हूं। जय राम भाटी का सुंदर वातावरण गांव का यह जो इकोसिस्टम है पूरा गांव का यह जो एंबियंस है वो जो क्रिकेट्स है वो ये कर रहा है क्रिकेट्स की आवाज आ रही है यह पवन की आवाज आ रही है तो इतना सुंदर वातावरण यह भी मेरे मन को जैसे कि यह बांध करके नहीं रख पा रहा है तो चलो मैं मूवी में से कोई एक सीन है उसको विजुअलाइज करता हूं चलो मैं वीडियो गेम खेल रहा था उसको विजुअलाइज करता हूं। यह पॉलिटिकल जो सब न्यूज़ वगैरह जो चल रहे हैं उसके ऊपर मैं मन को एकाग्र करता हूं। फिर यह जो मन के जो विकार जो सब है मन के जो दैहिक आकर्षण है सामने वाले व्यक्ति के ऊपर में ऐसा कुछ मैं विजुअलाइज करने का प्रयास करता हूं। वैसा देखेंगे फट करके मन एकाग्र हो जाएगा। क्योंकि अपना मन देखेंगे कि स्टडी का यहां पे स्टडी रूम है हमारा स्टडी सेंटर है तो लाइब्रेरी में तो स्टूडेंट्स को देखता हूं। जो स्टूडेंट किताब खोल के पढ़ रहा है सिंसियरली पढ़ रहा है। किंतु जब किताब पे मन नहीं जाता तो मोबाइल खोल के सब कुछ देखता रहेगा। फिर माने क्या है कि उसका मन जो है मोबाइल की ओर सहजता से आकर्षित होता है। मोबाइल में जितना भी कचरा है यह 10 सेकंड का रील है। यह वीडियोस है। यह पॉप सॉन्ग है। जो कुछ भी यह लोग देखते हो उसके ऊपर में से ना एक बार अपने स्टडी में थोड़ा सा बोर हो रहा हूं। चलो मोबाइल खोल के रील देख लिया। जैसे ही मोबाइल खोला, जैसे ही रील खोल देखने का प्रयास किया, सोचा कि 5 मिनट के लिए रिलैक्स हो जाते हैं। फिर नेक्स्ट टाइम घड़ी के सामने देखा, पता चला 50 मिनट चले गए हैं। देखिए, आप कहेंगे मन को एकाग्र ही करना है ना। स्टडी पे क्यों करें? रील पे क्यों ना करें? मतलब फर्क क्या पड़ता है? किंतु देखिए कि आप सलाड खाएंगे और यह पकवान और मिठाई खाएंगे। सलाड आप खाएंगे। आपके हेल्थ पे कोई भी नेगेटिव इंपैक्ट नहीं होगा। किंतु यह मिठाई है, पकवान है, खाएंगे तो यह डायबिटीज है, शुगर है, ये कोलेस्ट्रॉल है वो सब बढ़ जाएगा। क्यों बढ़ जाएगा? क्योंकि पकवान जो है खाने में अच्छा तो बहुत लगता है। प्रलोभित तो बहुत करता है किंतु उसकी बहुत सारी साइड इफेक्ट है। जबकि सलाड है। आप जब वो भोजन समारोह में जाएंगे ना शादी ब्याह में वो वगैरह जो होता है वो जो जाहिर भोजन वगैरह देखेंगे कि सलाड खाने के लिए कम लोग जाते हैं। और यह मिठाई जहां पे रखी है, यह पकवान जहां पे रखे हैं, वहां पे ज्यादा लोग जाते हैं। पेस्ट्री है, केक है, कैंडीज़ है, कैडबरी है। यह अच्छी-अच्छी जितनी भी चीजें हैं, डोसा है वगैरह सब में ऑयल होता है, सॉल्ट होता है, शुगर होती है। तो वो खाने को अच्छा तो बहुत लगता है। देखिए वो जो फूड साइंटिस्ट होते हैं ना वे लोग कहते हैं तीन चीजें हमको खाने में बहुत अच्छा लगता है। एक तो फैट है, दूसरा है यह शुगर है, तीसरा है साल्ट। ये जिसमें यह तीन चीज होती है ना फैट, शुगर एंड साल्ट वो चीज हमको इजीली प्रलोभित कर देती है खाने के लिए। सलाड है उसमें ना ही फैट है ना ही शुगर है ना ही साल्ट है। फ्रूट है। फ्रूट खाना बहुत कम लोगों को अच्छा लगता है। जो लोग बचपन से खाते आ रहे हैं। उन लोगों के लिए है। चलो कि फ्रूट का प्रलोभन है। ज्यादातर लोगों को फ्रूट देंगे और सामने सब्जी और वगैरह ऐसा कुछ देंगे। पहले सब्जी खा लेंगे बाद में फ्रूट खाएंगे। थोड़ा बहुत ज्यादा नहीं खाएंगे। अपने यहां पे जो डिवोटी आते हैं ना मैं राजकोट में तो फल प्रसाद वो मैं अपने वहां पर रखता था। फिर जो भी आएंगे कोई बात करने के लिए पूरा कटोरी भर के फल प्रसाद देता था और साथ में एक मिठाई रहती थी तो पेड़ा जैसा तो जब भी देता हूं ना तो वे लोग देखा कि महाराज जी इतना सारा फल नहीं खाएंगे थोड़ा सा फल खा लिया एक एक ले लिया एक से ज्यादा नहीं लेना है किंतु जैसे मिठाई देखी तो मिठाई पहले खा लेंगे देखिए कि ये ऑलरेडी अपना ये डीएनए के भीतर में यह सी जब चीजें हैं जो हमको नुकसान पहुंचाती है उसके प्रति प्रलोभन यह जैसे कि अपने डीएनए में ही है। काम कांचन के प्रति जो अपना आकर्षण है पता है कि हमको नुकसान करता है। फिर भी जैसे ठाकुर कहते हैं ना कि जो कैमल है ऊंट है वो जो कांटे वाला यह पौधा खा रहा है। उसको इतना अच्छा लगता है खाना कि कांटा उस कांटे जो है थों्स जो है उसके मुंह में लग के मुंह में से खून बह रहा है। इसके बावजूद यह कैमल जो है वह कांटे वाला पौधा खाता ही जाएगा। खाता ही जाएगा। तो मुंह में से रक्त बह रहा है फिर भी खा रहा है। यह उसका प्रलोभन है। तो यहां पे भी जब सीन क्रिएट करते हैं तो देखेंगे कि सीन में यह सलाड ही हो। यह स्वीट है ना कि पकवान है। वह सब उस सीन में ना हो। दैट इज लेसन नंबर थ्री। तो यह तीन लेसन जो है मेडिटेशन के लिए वेरी इंपॉर्टेंट। तो यहां पे स्वामी जी क्या कहते हैं कि धारणा इज ऑफ वेरियस सॉर्ट। यह जो मन को एकाग्र करना है डिफरेंट-डिफरेंट तरीकों से एकाग्र कर सकते हैं। एंड अलोंग विद इट और साथ-साथ में ही इट इज बेटर टू हैव अ लिटिल प्ले ऑफ द इमेजिनेशन। कल्पना की थोड़ी सी रमत इसके साथ में जोड़ देना वह भी अच्छा है। फॉर इंस्टेंस जैसे कि उदाहरण के रूप में द माइंड शुड बी मेड टू थिंक ऑफ वन पॉइंट इन द हार्ट। आदर्श यह है कि मन को हृदय में एक बिंदु पर एकाग्र करें। बट दैट इज वेरी डिफिकल्ट। किंतु यह बड़ा मुश्किल है। एन इज़ियर वे इज टू इमेजिन ए लोटस देयर। इजी रास्ता है कि हृदय में एक लोटस की कमल के फूल की कल्पना करें। दैट लोटस इज फुल ऑफ लाइट। और फिर देखिए कल्पना में रंग भरते जाइए। यह लोटस जो है पूरा प्रकाशित हो रहा है। प्रकाश से भरपूर है। एफजेंट लाइट। इस तरह का प्रकाश जो कि आंखों को शीतलता देता है। यह सूरज का प्रकाश जैसे कि आंखों को जुलसा देगा। किंतु यह जो चांदनी का प्रकाश है आंखों को शीतलता देगा। एफजेंट लाइट पुट द माइंड देयर। मन को वहां पर जोड़ो और थिंक ऑफ द लोटस इन द ब्रेन एस फुल ऑफ लाइट। या तो फिर अपने ब्रेन में सोचो कि लोटस है वह भी फुल ऑफ लाइट है। किंतु यह हमको नहीं करना है। ब्रेन में लोटस की कल्पना कभी नहीं करनी है। बड़ा ही डेंजरस। स्वामी जी बोलते हैं स्वामी जी के लिए ठीक है। हम ऐसा सब करने को जाएंगे तो ब्रेन फीवर हो जाएगा। और ऑफ द डिफरेंट सेंटर्स इन द सुषुम्ना मेंशंड बिफोर। या तो फिर यह सुषुम्ना नाड़ी है। स्पाइनल कॉर्ड है। उसमें यह जो डिफरेंट चक्र है टच चक्र मूलाधार मणिपुर स्वाधिष्ठान अनाहत आज्ञा विशुद्ध ये जो छह च मूलाधार विशुद्ध स्वाधिष्ठान विशुद्ध आज्ञा ये जो छह चक्र है और फिर ये सातवां है सहस्त्रार पद्म। तो यह विभिन्न केंद्रों के ऊपर में हम मन को एकाग्र कर सकते हैं। तो यह छह प्लस वन सात सात में से एकाग्र करना है। सिर्फ अनाहत के ऊपर में सिर्फ हृदय के ऊपर में और किसी भी जगह पे कहीं पे एकाग्र करने की कोई जरूरत नहीं है। स्वामी जी सिखा रहे हैं पीएचडी स्टूडेंट को और हम लोग बैठे हैं अभी प्राइमरी में। तो यह याद रखना है तो और थिंक ऑफ द लोटस इन द ब्रेन एस फुल ऑफ लाइट और ऑफ द डिफरेंट सेंटर्स इन सुषुमना एज मेंशंड बिफोर। तो यह स्वामी जी का कुंडलिनी और यह मेडिटेशन के बारे में दो छोटे से पैसेज देखिए यह जो हम इस
मैं ही साधक हूँ, मैं ही साध्य हूँ। कल्पना की सहाय अज्ञान की अवस्था में ही होती है। ज्ञान तो ‘अहं ब्रह्मास्मि’ के श्रवण मात्र से भी प्रकट हो सकता है।
तरह से कल्पना करते हैं। अब जैसे कि एक सीन हमने आज सिलेलेक्ट किया। फॉर एग्जांपल मैं आज सुबह की ही बात बताता हूं। मैं सुबह को बैठा था और एक इमेजिनेशन मैं प्ले कर रहा था अपने हार्ट में। जैसे कि मैं एक बहुत ही शांत रमणीय जगह पे मेरा एक जो बहुत ही फेवरेट सीन है ना क्या है पता है? मैं छोटा था अपने गांव में जाया करता था। मेरे पिताजी का मेरी मां के पिताजी का जो घर है वो छोटा सा गांव है। तो वहां पर मेरी बहुत पॉजिटिव यादें उस गांव के साथ में जुड़ी हुई। तो मैंने उस गांव का एक सीन एक कंस्ट्रक्ट किया है। जैसे कि एक बहुत ही सुंदर एक बागान है और बागान के परे जो है खेत ही खेत है। हरियाले खेत जो है वो लहरा रहे हैं। और एक छोटा सा मकान है। उसके वरांडा में मैं कुर्सी डाल के बैठा हूं। सूर्यास्त का समय है। सूर्य ऑलमोस्ट अस्त हो चुका है। आकाश में थोड़ी सी लालिमा अभी भी बची है। सुंदर वातावरण है। और फिर मैं वही एक बच्चा होकर के 101 साल का बच्चा होकर के वहां पर वो वरांडे में बैठा हूं। और बच्चे के मन में क्या है? ना ही टेंशन होता है ना ही यह रिग्रेट होती है ना ही ग्रीफ होती है ना ही एंग्जायटी होती है ना ही एंगस्ट होता है तो वही बच्चा होकर के फिर से जिसके सामने यह होपफुल फ्यूचर एक भविष्य उज्जवल भविष्य अभी भी उसके सामने जैसे कि प्रकट हो रहा है ज्वलजल कर रहा है ठाकुर की लैंग्वेज में है वह प्रकाशित हो रहा है तो इस तरह के फ्यूचर की एक मेरे भीतर में अभी भी होप आशा है और फिर मैं वरांडे में बैठकर के एक आनंद कर रहा हूं एक सीन का और बस एंजॉय कर रहा हूं और कुछ नहीं। सो दैट इज वन ऑफ़ माय फेवरेट सीन। तो इस तरह से मैं इमेजिन कर रहा था। आज सुबह की ही बात बताता हूं। सतत मैं देख रहा हूं कि कुछ ना कुछ विचार आते ही जाते हैं। यह बॉर्डर को सील करना इंडिया पाकिस्तान की बड़ा ही मुश्किल है। रियल लाइफ में जितना मुश्किल है वो अपने इनर बाह्य जीवन में जितना मुश्किल है इनर लाइफ में भी इतना ही मुश्किल है। तो अभी देखिए कुछ दिनों पहले की बात है। मैं इसी तरह से इमेजिनेशन या तो कोई एक ऑब्जेक्ट के ऊपर मैं मन को एकाग्र करने का प्रयास कर रहा हूं और स्ट्रगल कर रहा हूं। स्ट्रगल कर रहा हूं। कंटीन्यूअस स्ट्रगल चल रही है। जैसे ही मैंने मन को थोड़ा शांत किया फिर से कोई एक नेगेटिव विचार आ गया। जैसे ही शांत किया फिर से एक नेगेटिव विचार आ गया। फिर से जैसे प्रयास किया फिर से आ गया। तो मुझे लगा कि यह तो जन्म जन्मांतर की यात्रा है। मैं जैसे कि हवा ऊपर में आकाश में देख रहा हूं और आकाश में उड़ने का प्रयास कर रहा हूं। बीच में किंतु सूरज और मुझ मे मेरे बीच में घने काले बादल छाए हुए हैं। तो ऐसा मुझे फील हो रहा है कि मैं चाहे जितना भी उड़ने का प्रयास करूं जितना ही सूरज को छूने का प्रयास करूं वो जो एफजेंट सोर्स जो है लाइट का उसकी ओर जाने का प्रयास करूं। ग्रेविटी ना जैसे कि मुझे पकड़ करके फिर से वह जमीन पर बार-बार लाकर के पटक दे रही है। और यह जो निराशा के घने काले बादल है ना जैसे कि वह हमेशा सूरज के सामने छाए ही रहेंगे। मुझे कभी सूरज के पास जाने ही नहीं देंगे। कितने जन्म जन्मांतर की ये यात्रा है मनुष्य की कि पृथ्वी पर से उड़कर के ग्रेविटी से मुक्त होकर के सूरज की ओर यात्रा करें। यह जो निराशा के बादल है उनको तोड़फोड़ करके उनको काट करके चीर करके उसमें से रास्ता निकाले। ग्रेविटी का जो इतना प्रचंड आकर्षण है उससे अपने को मुक्त करें। पता नहीं कितने जन्म जन्मांतर लग जाएंगे। ऐसा मैं सोच रहा था। पता है एकाएक लाइक इन अ फ्लेश मुझे ऐसा एक विचार आया कि एज इफ कि यह जो घने काले बादल है ना जिसमें से सूरज का थोड़ा-थोड़ा प्रकाश दिख रहा है जैसे कि उसको चीर करके ना मैं ही मेरी ओर देख रहा हूं। बादल के उस साइड भी मैं हूं और वह मैं जिसने कि ऑलरेडी यह जो सूर्य जो है मेरा सही अस्तित्व है वह जिसने कि समझ लिया है अपने प्राण में अनुभव कर लिया है। यह जो प्रकाश जो ठाकुर कहते हैं ना कि मानो कि देह जो एक पात्र है उसके ऊपर में मन और बुद्धि जैसे कि पानी है और उसमें यह सूरज का प्रतिबिंब पड़ रहा है। तो मैं अभी तक यह जो प्रतिबिंब सूर्य के साथ में ही मैं कुश्ती कर रहा हूं। ना ही उससे मतलब पात्र से मुक्त हो पा रहा हूं। ना ही यह पानी में से बाहर निकल पा रहा हूं। किंतु बादल के परे एक दूसरा मैं हूं जो कि ऑलरेडी जिसका यह पात्र भी टूट चुका है। पानी भी बह गया है। चारों ओर नष्ट हो गया है। और असली सूर्य में वह स्थापित हो गया है। वो मैं मेरी ओर देख रहा हूं। बादल को चीर करके। हम दोनों एक दूसरे की ओर देख रहे हैं। वह जो जिसने कि सूर्य को प्राप्त कर लिया है और मैं जो कि सूर्य को प्राप्त करने के लिए संघर्ष कर रहा हूं। ये जो इन अ फ्लेश मुझे एक लगा जैसे कि दैट इज सच अ प्रोफाउंड रिवोलेशन। देखिए आप जितना ही प्रयास कर ले मेहनत करने का प्रयास करने का साधना करने का हमेशा याद रखिए कि हमारा जो सही स्वभाव है नित्य मुक्त बुद्ध शुद्ध स्वभाव ही है। यह जो स्ट्रगल कर रहे हैं हमको हिप्नोटाइज कर दिया गया है बचपन से कि हां स्ट्रगल करनी है आध्यात्मिक जीवन में। हां यह सब कल्पनाएं यह सीन है। यह जो एक के बाद एक जो मेडिटेशन की मेथड है काम कांचन से मुक्ति पानी है वगैरह आपको करना है। जन्म जन्मांतर की ये यात्रा है। पता नहीं कौन से कितने जन्मों के बाद में थोड़ा बहुत अनुभूति होगा। यह जो एक द्वैतिक विचार जो है यह अपने मन में इस तरह से हमको बिठा दिया गया है। हमको इस तरह से हिप्नोटाइज कर दिया गया है कि हम लोग बचपन से ही नहीं प्रलोभन जो है ना प्रलोभन की ओर ही दौड़ते हैं। देखिए ज्यादातर लोगों का रिलीजियस एजुकेशन होता ही नहीं। वे लोग सीधा-सीधी दैहिक प्रलोभन की ओर दौड़े उनका तो एक बात हो गया। किंतु जिन लोगों का थोड़ा बहुत रिलीजियस एजुकेशन होता भी है उन लोगों को क्या लग जाता है कि अरे यह तो जन्म जन्मांतर की फाइट है। कितना ही मन बुद्धि के साथ में कुश्ती करना पड़ेगा तब कहीं जाकर के थोड़ा बहुत प्राप्त होगा। तो इवन वे लोग जो लोगों को आध्यात्मिक थोड़ा बहुत टीचिंग प्राप्त है वे लोग इस भ्रम में पड़ जाते हैं कि यह तो इतनी लंबी सफर है कि इस जन्म में ज्यादा कुछ होना नहीं। तो हताशा आ जाती है और यही हताशा उनको ना जैसे कि भीतर में से छोटा बना देती है और फिर यह जो एक बार इनफोरिटी कॉम्प्लेक्स प्रवेश करता है वह राइज करता है अपने भीतर में साथ में ही यह जो दैहिक कामना वासनाओं के प्रति प्रलोभन है वह आकर के हमको पकड़ लेता है तो जैसे कि ना प्रकृति हमको छोटा बनाने का प्रयास करती है। हमको सब समय जैसे कि स्ट्रगल करके अपना जो सही स्वरूप है उसको प्राप्त करना है। किंतु स्ट्रगल इज अ वे ऑफ लाइफ। आध्यात्मिक जीवन का अर्थ ही है कि यह आध्यात्मिक स्ट्रगल। तो दो तरह के लोग इस जगत में जिनका कि आध्यात्मिक रिलीजियस एजुकेशन कोई सीरियस होता ही नहीं। वे लोग बाय डिफॉल्ट जैसे कि काम कांचन के मोह में पड़ जाएंगे और जिनका इस तरह का एजुकेशन थोड़ा बहुत होता भी है थोड़ी बहुत उनकी समझ जागृत होती है उनको उनके भीतर में यही एक बैठ जाता है कि जिन जन्म जन्मांतर का संघर्ष है वह हमारी नजर के सामने है। तो दोनों ओर से देखेंगे कि काम कांचन के प्रति प्रलोभन इतना सहज दिखाई देता है। चलो इसको पहले प्राप्त कर लेते हैं। बाद में बाकी सब खाएंगे। पहले यह डोसा है, यह मिठाई मोहनताल है, यह मैसूर पाक है। पहले उसको खा लो। बाद में यदि पेट में जगह होगी तो सलाड खाएंगे। तो इस तरह का एक मेंटालिटी अपना बन जाता है। किंतु याद रखिए कि थोड़ा सा आप आध्यात्मिक जीवन में आगे बढ़ेंगे। द्वैत अद्वैत में है तो प्रश्न ही नहीं है। अद्वैत कहता है माया को कोई अस्तित्व ही नहीं है। माया तो अपने ऊपर में भ्रम ये जो फेमस उदाहरण कि सांप देखा उसके ऊपर में प्रकाश डाला तो पता चला सांप नहीं है। रस्सी ही है। सांप किसी समय नहीं था। तीनों काल में सांप नहीं था। साफ होने का सिर्फ भ्रम हुआ है। यह डेजर्ट में जा रहे हैं। रेगिस्तान में जा रहे हैं। देखा कि मिराज दिख रहा है। डेजर्ट के ऊपर में ओआसिस है। पानी का जलाशय है। और यह जो खजूर के पेड़ है, ये जो कोकोनट के पेड़ है, पाम ट्रीज वो चारों ओर से घिरा हुआ एक जलाशय है। इस तरह का ओवासिस का हमको एक भ्रम होता है। तो मैं दौड़ा दौड़ा जाता हूं। जितना दूर जाता हूं उतना ही वो ओवासिस है मेरे से दूर होता जाता है। तो आखिर में किंतु जब यह पता चलेगा कि ये मेरी नजरों का ही भ्रम है और फिर उस जगह पे यदि पहुंच भी गए जहां पर हमको ये ओवासिस दिख रहा था। मैं हम मैं रेती में उंगली भी डालूंगा ना थोड़ा सा भी रेती को भिजा हुआ नहीं देखूंगा। थोड़ा सा भी वेटनेस नहीं होगा। क्यों? क्योंकि वह जो जलाशय था ऐसा नहीं है कि जलाशय था और सूख गया है। जलाशय था ही नहीं। मिट्टी रेती जो है पूरे डेजर्ट में जितना गर्म जितना हॉट और जितना ड्राई है उतना ही ड्राई और उतना ही हॉट इस जलाशय के तथाकथित मिराज रूपी जलाशय के नीचे में थी। एक थोड़ा सा भी रेती का एक कण भीगा हुआ आपको नहीं मिलेगा। यदि जिस क्षण मिराज अपनी नज़रों से अदृश्य नहीं हो जाता। उस समय रेती का एक कण भीगा हुआ नहीं मिलेगा। जिस क्षण पता चला कि यह रस्सी है, सांप नहीं है, उस क्षण देखेंगे कि सांप का एक भी चिन्ह एक भी निशान इस रस्सी पे नहीं है। ना ही सांप की पूछ रस्सी के साथ जुड़ी है। ना ही सांप की यह जो तीक्ष्ण दांत जो है वो फेंग्स जिसको कहते हैं इंग्लिश में वह रस्सी के साथ में जुड़े हुए हैं। ना ही सांप का विष रस्सी के भीतर में पड़ा हुआ है। सांप संपूर्ण रूप से अदृश्य हो गया है। सिर्फ रस्सी बची है। तो यदि आप अद्वैत वेदांत को फॉलो करते हैं तो आपको तो प्रश्न ही नहीं है। जैसे ही आपने तह वेदांत केसरी जब गर्जन करके कहता है कि मैं यह मन बुद्धि चित्त अहंकार पंचमहाभूत पंच ज्ञानेंद्रिय पंचकर्मेंद्रिय पंच पंच प्राण रूपी देह नहीं इनसे परे सबसे परे आत्मन हूं ब्रह्मन हूं जैसे ही महावाक्य श्रवण करता है गुरु के मुंह से अहम ब्रह्मास्मि तत्व मसी प्रज्ञानम ब्रह्मा उसी क्षण उसको ब्रह्म साक्षात्कार हो जाएगा। तो अद्वैत मार्ग में तो प्रश्न ही नहीं। किंतु इवन यदि द्वैत मार्ग को फॉलो करते हैं देखिए कि ठाकुर की यह जो उर्जिता भक्ति है भाबे हासे कादे नाचे गाए भाव में वह हंसता है नाचता है रोता है और गाता है तो यह जो उर्जिता माने एक उल्लासमय एक उत्साहमय भक्ति उसको भी यदि फॉलो करेंगे तो उसी के लिए भी यह जो आध्यात्मिक साधना में सिद्धि प्राप्त करना सहज है। भले ही चाहे बचपन में हिप्नोटाइज हो गए हो, भले ही चाहे गलती करके काम कांचन में मन थोड़ा बहुत फंसा हो, किंतु जिस क्षण यह अद्वैतिक जीव ब्रह्म ऐक्य वाला महावाक्य हमने श्रवण किया, जिस क्षण ठाकुर की शरणागत हुए, ठाकुर की यह जो उर्जिता भक्ति है, उसका एक अंश भी अपने हृदय में प्रवेश किया। साथ-साथ में ही देखेंगे भीतर में जैसे वह सुशुप्त वेदांत केसरी है भीतर में यह जो सुशुप्त महावीर जो है वह तर्जन गर्जन करके जागृत हो जाएंगे और यह काम कांचन रूपी यह जो काला मेघ जो अपने ऊपर में छाया हुआ है मुझे संघर्ष करके पता नहीं कितना मेहनत करके हवा में उड़ना है तब कहीं जाकर के पृथ्वी की ग्रेविटी से मुक्त हो पाऊंगा तब कहीं जाकर मैं सूरज की ओर जा पाऊंगा वह सब जैसे कि क्षण भर में काट देगा और वैसे ही ततक्षणात मां काली का दर्शन होगा या तो फिर ब्रह्म साक्षात्कार हो जाएगा। सो दैट इज वेरीेंट दैट इज लेसन नंबर फोर कि भले ही चाहे हम यह संघर्ष रूपी इमेजिनेशन कर रहे हैं। किंतु साथ-साथ में हमेशा ख्याल रखिए कि मैं सहज रूप से दिव्यत्व मेरे भीतर में विराजमान है। मुझे कोई संघर्ष करके दिव्यत्व कहीं बाहर से प्राप्त नहीं करना। वि इज वेरी इंपॉर्टेंट लेसन। नंबर फोर। तो मैं समरी ऑफ मैंने जो प्रैक्टिस किया है अभी तक मेडिटेशन उसका इसके बाद में अभी हमारा नेक्स्ट क्लास होगा मंडे को तब मिलेंगे। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु
प्रश्न: ध्यान में मन को बाँधने के लिए—क्या कल्पनाओं का विशाल भंडार चाहिए, या कुछ चुनी हुई, स्थिर कल्पनाएँ ही पर्याप्त हैं?
यू कैन हैव अ वास्ट एंड डवर्स लाइब्रेरी उस ऑफ़ दिस इमेजिनेशंस। उसमें कोई दिक्कत नहीं है। जैसे देखिए यह हेल्थ फ़ूड वाली कैटेगरी में हम चाहे वो कुकुंबर खाते हो, टमाटर खाते हो ना कि कैरोट खाते हो ना कि फ्रूट खाते हो। दैट इज ऑल वेरी वेल। कोई दिक्कत नहीं है। बस वो वहां से आपने वो डोसा और ये उसमें जंप लगाया मोहन थाल पे। वो दिक्कत वाली बात है। [हंसी]
प्रश्न: क्या मन को शत्रु मानकर उससे लड़ना चाहिए, या मित्र मानकर उससे संवाद करना चाहिए?
गीता में कहता है ना कि आत्मव ही आत्मनो
उद्धरेदात्मनाऽऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्।
बंधु रिपुहु आत्मव ही आत्मनः माने आत्म ही आत्म का बंधु है और आत्मन ही आत्मन का शत्रु है। सो इट डिपेंड्स अपॉन अस कि फिर उसके साथ में मित्रता करनी है कि दुश्मनी रखनी है। एडवर्सियल रिलेशनशिप ऐसे अद्वैत भाव हो जाएगा नेति नेति और यह जो फ्रेंडली रिलेशनशिप है द्वैत हो जाएगा कि हां ईश्वर ही है ईश्वर को शरणागत होना है सो बोथ आर अपने आप में सही है गलत नहीं है और जैसे रामकृष्ण मिशन का है कि सर्वभावों का समन्वय राइट तो वो ज्ञान और भक्ति दोनों मार्ग जब मन अब जैसे बच्चा है देखिए मां अपने बच्चे को जिस तरह तरह से ट्रीट करती है ना ऐसा टीचर ना वो बच्चे को इस तरह से ट्रीट नहीं कर पाएंगे। क्यों? क्योंकि बच्चा जब अब स्टूडेंट है और टीचर और स्टूडेंट का रिलेशन कैसा है कि पहले के जमाने में तो स्टूडेंट थोड़ा बहुत इधर-उधर करता है टीचर उसको सीधा मार देते था। गुजराती में वो कहते हैं ना सोटी वागे चमचम विद्यावे धमधम तो वो एक था कि कॉरपोरल पनिशमेंट वो फटाक करके दे देते आजकल अभी एक है कि टीचर को बच्चे को मारना नहीं है। किंतु मां का रिलेशन देखिए बच्चे के साथ में। मां बच्चे को फटाक करके मार भी देती है। तो मां को अलाउ है मारना। टीचर को अलाउ नहीं है। क्यों? क्योंकि मां बच्चे को स्नेह करती है। वो मारेगी तो बच्चे के भविष्य देखकर के सुधारने के लिए मारेगी। जबकि टीचर क्या है? इरिटेटेड हो के, क्रोध करके, नाराज हो के मारता है। तो इसका बड़ा ही नेगेटिव इफेक्ट बच्चे पे होता है। सो बच्चे को मार खाना ही है किंतु बेटर है कि मां मारे रेदर देन के टीचर मारे। उस समय के पहले के जैसे टीचर भी अभी नहीं है तो बेटर है कि कॉरपोरल पनिशमेंट बंद कर दे। राइट? सो शत्रु और मित्र दोनों है मन और जब ये गड़बड़ करता है तो उसकी पिटाई ये यही जो स्टिक एंड कैरोड स्टिक एंड केयरड प्रलोभन भी देना है डंडा भी तैयार रखना है देखिए वो वो नेति नेति करके करके ठाकुर के गुरु होने की क्वालिफिकेशन प्राप्त करनी ठाकुर का गुरु होना यानी कोई जैसी वैसी बात पड़ी ना है उस लेवल पर पहुंच गए नेति नेति करके
प्रश्न: ठाकुर को भाव होता था. अब, भाव भी तो एक तरह की इमेजिनेशन ही है न. अर्थात ध्यान में इमेजिनेशन का इस्तेमाल करना ठाकुर की शिक्षा के खिलाफ नहीं है.
देखिए कि इमेजिनेशन है ना कभी दर्शन में परिणत हो जाएगी। अब अब जैसे देखिए एक बात है मैं यदि क्रिश्चियन हूं और मुझे दर्शन होता है तो मुझे जीसस का दर्शन होगा। मैं यदि हिंदू हूं मुझे दर्शन होगा तो भगवान राम का होगा। ठाकुर को सब तरह के दर्शन हुए किंतु टिपिकली मैं भगवान राम की कल्पना करता हूं तो मुझे भगवान राम का दर्शन होगा। अब जैसे किंतु देखिए कि दूसरे ग्रह पर जीवन है और वहां पर वो चित्रविचित्र एलियन जो मूवी में जैसे देखते हैं ना उस तरह के एलियन वहां पर रहते हैं। तो वो यदि दर्शन करेंगे तो अपने एलियन गॉड का दर्शन करेंगे। अभी ऐसा कभी हुआ कि हमने किसी एलियन गॉड का दर्शन किया या तो फिर वे लोग भगवान राम का दर्शन करने वाले हैं। कल्पना में से दर्शन प्रकट हुआ। दर्शन क्या है? कल्पना को दिव्यता प्रदान करता है। उस तरह का स्वरूप धारण करता है दिव्य भाव जो कि हमारे हृदय के नजदीक हो। जो भगवान कृष्ण का उपासक है भगवान कृष्ण का दर्शन होगा। यहां पे यह जो साउथ इंडिया में जिस तरह की जो उपासनाएं चलती है उनको उस तरह का दर्शन होगा। अब जिन भगवान का मैंने कभी नाम ही नहीं सुना है उनका दर्शन मुझे कहां से होने वाला है? सो जो मैं कल्पना के माध्यम से मैं जो भगवान की कल्पना कर रहा था कि जटावलधारी धनुष हाथ में लिए हुए यह भगवान राम है तो प्रथम तो कल्पना ही है। बाद में कल्पना में दिव्यता का रंग भरता है। कल्पना जागृत हो जाती है। और फिर आखिर में जैसे ठाकुर का अद्वैत जब भूमि में प्रवेश करने से पहले मां काली को तलवार से काट दिया तो आखिर में यह दर्शन को भी काट करके उससे परे जाना है। यानी पहले कल्पना है फिर यह दिव्य दर्शन है और फिर उससे परे अद्वैत भूमि है। किंतु देखिए कि कल्पना के भीतर में यदि दिव्यता प्रवेश करेगी ना ये ये ध्यान के लिए हम जो यह सीन खड़े कर रहे हैं तो क्या होगा? पहले तो एक ड्राई इमेजिनेशन ही रहेगा। किंतु धीरे-धीरे करके ना उसके भाव का रस जो है उसमें प्रवेशना शुरू होगा। अब जैसे स्वामी जी ने खुद ने कहा कि हृदय में एक लोटस है। पहले तो कहा कि हृदय में एक बिंदु पे बिंदु है। उस पे ध्यान करो। फिर कहते हैं मुश्किल है। इमेजिन करो कि वहां पे लोटस है। किंतु सिर्फ लोटस होने से नहीं होगा। लोटस में धीरे-धीरे करके भाव प्रकट होना चाहिए। इसलिए स्वामी जी कहते हैं ना कि इमेजिन इट फुल ऑफ एफजेंट लाइट। ये भाव धीरे-धीरे प्रकट होगा। तो क्या है कि उसका आकर्षण धीरे-धीरे करके बढ़ता जाएगा। फिर जब एक्चुअल लोटस दर्शन होगा कि मेरे हृदय में लोटस है दैट इज उससे भी हायर चीज है। किंतु दर्शन की ओर हम कल्पना का सेतु पकड़ के ही गए हैं। यह स्वामी जी बार-बार ठाकुर को क्यों कर कह रहे हैं कि आपको जो दर्शन होता है सब आपके मन की कल्पनाएं हैं। सो हेलुसिनेशन है सब आपके मन का। हेलुसिनेशन के अलावा कुछ नहीं। क्योंकि स्वामी जी को पता है कि कल्पना पहले प्रारंभ होती है। इसके बाद में ही कल्पना में दिव्यता का रंग भरा जाता है। अभी कौन विश्वास करेगा कि आपकी सिर्फ कल्पना है कि उसमें दिव्यता का रंग भरा हुआ है। कौन माने वो तो जो जिसका आपके ऊपर विश्वास होगा वो विश्वास करेगा। ज्यादातर लोग तो वही सोचेंगे कि कल्पना के लेवल तक ही आप पहुंचे हैं अभी तक।
प्रश्न: एक अमेरिकी study के अनुसार नववर्ष संकल्प औसतन केवल 19 दिन ही टिकते हैं। तो फिर कल्पना-साधना में हमारी रुचि को निरंतर कैसे बनाए रखें?
कि इसके बाद में ही ठाकुर उत्तर देंगे। न्यू ईयर रेजोल्यूशन 19 दिन चलते हैं। बट व्हाट इफ देयर इज एवरीडे इज न्यू ईयर डे। प्रतिदिन न्यू ईयर डे है। तो क्या? तो ठाकुर इसके बाद में ही कहते हैं कि आपको सत्संग नित्य सत्संग आवश्यक है। और नित्य सत्संग ही है। ठाकुर कहते हैं देखिए मैं अभी वैसे तो नेक्स्ट टाइम में रखा है। किंतु इसके एग्जजेक्टली बात का सेंटेंस है। किंतु संसारी लोक सर्वदाई साधु संगो दरकार। संसारी लोगों को हमेशा साधु संघ की जरूरत है। शकलेरी दरकार फिर कहते हैं सबको जरूरत है। सन्यासी रो दरकार सन्यासी को भी जरूरत है। तबे किंतु संसारी देर विशेषतः सभी को जरूरत है। सन्यासी को भी साधु संघ की जरूरत है। किंतु संसारी को विशेष रूप से जरूरत है। रोग ले गए या अच्छे रोग लगा ही है। कामिनी कांचनेर मध्य सर्वदा थकते हुए। यह सब समय तो आपको यह संसार को लेकर के ही रहना है ना। तो प्रतिदिन सत्संग आवश्यक है। तो प्रतिदिन न्यू ईयर है। प्रतिदिन आप उसको रेजोल्यूशन लेते रहिए तो 19 दिन चलेगा दिक्कत नहीं है। क्योंकि आप रोज नया रेजोल्यूशन लेते हैं। मेरा भी हो रहा है। ये सन्यासी को भी जरूरत है। [हंसी] देखिए नित्य सत्संग और लॉन्ग पेशेंस ये दो यदि रहता है तो कैसे भी करके पार कर लेंगे।
प्रश्न: कभी-कभी हमारे मन में अध्यात्म को लेकर संदेह उत्पन्न हो जाता है, तब साधना डगमगाने लगती है। दीर्घकालीन साधना के लिए श्रद्धा आवश्यक है, जो हमें यह आश्वासन देती है कि हम सही मार्ग पर हैं। तो इस “संशय-राक्षस” से स्वयं की रक्षा कैसे करें?
देखिए मैं तो कहता हूं कि एक तो है कि एक स्मूथली जर्नी चल रहा है। नित्य सत्संग चल रहा है। नित्य थोड़ा पेशेंस बना करके नित्य थोड़ा बहुत साधना हम कर रहे हैं। व्हिच इज वेरी गुड व्हिच इज व्हाट वी विल ऑल एक्सपेक्ट अस एस अ हेल्दी स्पिरिचुअल लाइफ। किंतु बीच में रास्ते में गड्ढा आ गया, गाड़ी गिर गया और अभी सब तरह के डाउट मन के ऊपर सवार हो गए। उस समय क्या करना है? देखिए दीज़ आर द अपॉर्चुनिटीज। अब जैसे साइंस में है कि कोई भी पदार्थ है प्रकाश की स्पीड से ज्यादा स्पीड से वह ट्रैवल नहीं कर पाएगा। प्रकाश की स्पीड क्या है? 3 लाख कि.मी. पर सेकंड। तो ये आइंस्टाइन का कांसेप्ट है। फिर यह क्वांटम डायनेमिक्स खोजा गया। क्वांटम डायनेमिक्स कहता है कि देयर आर क्वांटम लिप्स। देयर आर वार्म होल्स इन स्पेस टाइप। यहां पर यह इलेक्ट्रॉन या स्पेसशिपिप आपने भेजा है। एक जगह से जंप लगा के इंस्टेंटेनियसली पृथ्वी से एंड्रोमेडा गैलेक्सी जितना 15 मिलियन लाइट ईयर ना कि 30 मिलियन लाइट ईयर जितना डिस्टेंस है एक सेकंड में यहां से वहां जंप लगा सकता है। दिस इज़ क्वांटम टनल टनलिंग या तो क्वांटम लिप या तो वार्म होल ये जो भी आप नाम देना चाहे मल्टीपल नेम्स है। दिस इज पॉसिबल। तो आइंस्टाइन इस तरह से चकरा गया और कहता है कि गॉड डज नॉट प्ले डाइस। माने गॉड जो है वह जुआ नहीं खेलता है कि यहां पे आपका स्पेसशिपिप है वहां पे चला गया इंस्टेंटेनियसली। दिस इज़ नॉट पॉसिबल। बट देखिए कि दिस चैलेंजेस इट गिव्स अस एपॉर्चुनिटी फॉर क्वांटमली। दिस चैलेंजेस इट गिव्स अस एन ओपॉर्चुनिटी फॉर क्वांटम टनलिंग। अभी मैंने जैसे मेरा उदाहरण बताया। एक दिन मेरे मन में भी इस अभी कुछ दिनों पहले ही संदेह संशय कि मैं स्ट्रगल कर ही रहा हूं। कुछ प्राप्त नहीं होता। चल ही रहा है। चल ही रहा है। किंतु एकाएक मुझे ऐसा एक लगा कि बादल के परे भी मैं ही हूं। जो कि नित्य शुद्ध बुद्ध मुक्त है। मेरे लिए कहां संघर्ष मेरे लिए कहां यह जर्नी जर्नी के परे जो जर्नी का गंतव्य स्थान है वह मैं ही हूं। वहां पे मैं ऑलरेडी बैठा हूं। सो दिस चैलेंज इट गिव्स मी एन अपॉर्चुनिटी टू मेक अ क्वांटम लीप टू गो डायरेक्टली विल टेक अदरवाइज जन्म जन्मांतर की यात्रा है एक सेकंड में मैंने क्वांटम लिप लगा करके यहां से वहां पहुंच गया। सो दिस चैलेंजेस आर गुड इन अ वे इट गिव्स यू जब एक्सट्रीम प्रेशर खड़ा होता है ना तब एक्सट्रीम साहस खड़ा होता है। अर्जुन यदि महाभारत का युद्ध नहीं लड़ता तो अर्जुन का नाम इस इतिहास में अमर होता ही नहीं। वो अर्जुन ने युद्ध किया एक्सट्रीम डेंजर में एक्सट्रीम साहस दिखाया बोलकर के आज अर्जुन अमर है। ये महावीर हनुमान है। भगवान राम है। इतने बड़े-बड़े दैत्यों का संहार किया बोलकर के आज उनका नाम है। अभी वे लोग जब बैटल में जाते होंगे क्या उनको हृदय धकधक नहीं करता होगा? उनको मतलब डर जैसा नहीं लगता होगा। आखिर में तो मनुष्य का देह धारण किया है। मनुष्य का तो एक अंश है उनके भीतर में। यह जितने अपने सोल्जर्स हैं आज जो भी यह परमवीर चक्र ना कि जो जिनको दिया जाता है वे लोग बैटल में जाते होंगे उनको डर नहीं लगता होगा भय नहीं लगता होगा बट दे मे दे ककरर्ड देर फियर एंड फिर वो माने हाईएस्ट ओनर जो है मिलिट्री का उनको मिला सो दिस एक्सट्रीम चैलेंजेस आर एक्सट्रीम ओपोरर्चुनिटी फॉर अस जीता वो सिकंदर यदि जीत गए तो फिर हमने वीरभोग्यम वसुंधरा यदि जीत गए तो वसुंधरा का भोग करेंगे यदि हार गए तो फिर क्या है कि हत्वा प्राप्तस स्वर्गम जित्वावा भोक्षस से महिम मर गए तो स्वर्ग प्राप्त होगा जीत गए तो धरती का उपभोग करेंगे [हंसी] ओम