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Sri Ramakrishna Kathamrita ·

श्रीरामकृष्ण कथामृत : कोलकाता में ईश्वरचंद्र विद्यासागर के साथ 3 April 2023

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कल ठाकुर ने कहा था ब्रह्मा विद्या और अविद्या दोनों के पैर है वह मायतित है और फिर इस पर्टिकुलर टीचिंग के बड़े में उन्होंने उपदेश दिए क्या कहा इस जगह भक्ति भी है और साथ ही कामिनी कंचन भी है सात भी है और असत भी भला भी है और बड़ा भी परंतु ब्रह्मांड निर्मित है भला बड़ा जीवन के लिए है सात असत जीवन के लिए वह ब्रह्मा को स्पर्श नहीं करता कैसे जैसे दीप के सामने कोई भागवत पद रहा है और कोई दाल रैक रहा है पर जो दीप है और असिस्टेंट या तो फिर दुष्ट व्यक्ति के ऊपर में भी किंतु सांप में विश्व है औरों को डसने से वे मा जाते हैं पर सांप को उससे कोई हनी नहीं होती है बहुत सारे लोग ऐसा सोचते हैं की विकास की इस जगत में इतना दुख कष्ट है तो ईश्वर जो है वो मा गया है मा लिटरली कोई लोग ऐसा सोचते हैं मैंने सुना भी है ऐसे लोगों से की मैं क्यों भगवान का नाम लूं मैं क्यों भगवान में मानून भगवान तो मा गया है ऐसा खाने वाले हैं क्योंकि वरना देखो ना कितना जो इंडिया में जो 50 करोड़ लोग तो गरीब थे अभी कुछ समय पहले अभी तो चलो की गवर्नमेंट की पॉलिसी इसकी वजह से बहुत सारे लोगों को जो है डेली ये जो फूड ग्रीन मिलते हैं यह जो अपना बहुत बड़ा यह जो है यह अपना चैरिटी वगैरा गवर्नमेंट की और से चला है तो आप कहेंगे की तो ठीक है किंतु चैरिटी मिलती है किंतु फिर भी अभी शायद 12:15 करोड़ लोग होंगे जो की एक्सट्रीम पावर्टी में जीते हैं तो 12 15 करोड़ लोग बस फिगर में तो ठीक है ऐसा लगता है किंतु इतनी बड़ी जनसंख्या है यह और फिर हम जल्दी उनके साथ में जाकर के रहेंगे तो हमको लगेगा की ये लोग किस तरह से मनुष्य जीवन यापन कर रहा है मैं रांची में था वहां पर ट्रैवल डेवलपमेंट का कम होता था है तो मैंने ठीक किया था की वह महीने में एटलिस्ट कुछ दिन तो जो है मैं अवश्य गांव में जाकर के इन लोगों के साथ में रहूंगा जो ट्राईबल लोग हैं तो वहां पर मैं जब पहले बार गया ना तो मतलब हम लोग तो जो है वो अनुमान भी नहीं कर सकते की वो लोग कैसे रहते हैं वो भारत बना करके दिया मैंने कहा की मैं हम लोग तो क्या है की आश्रम से वो खाना लेकर जाते थे तो मैंने कहा की मेरे में आश्रम से खाना नहीं ले जाऊंगा ये लोग जो वहां पे खाना पकाते हैं वही खाऊंगा देखा हूं उनके जैसे होकर के रहने का पर्यटन करता हूं तो वो भारत बना करके दिया भारत में इतने सारे पत्थर से अरे आप रे वो मतलब भारत में से लिटरली पत्थर निकाल कर के खाना पड़ता था इस तरह से वो वे लोग बोलेंगे मैंने कहा की इसमें पत्थर है निकाल क्यों नहीं देते पत्थर निकलेंगे तो बाद में रहेगा क्या आपको इतना तो थोड़ा सा तो देना पड़ेगा भले ही चाहे फिर उसमें पत्थर होगा तो थोड़ा सा क्वांटिटी दिखेगा अभी उन्होंने ऑफ कोर्स ऐसा मुंह पे नहीं कहा किंतु हनुमान करके का रहा हूं की वो लोग क्या वैसा करते होंगे तो देखिए उनका जो पावर्टी है वो सब देखकर के हमको कभी-कभी लगता है की इस जगत में ईश्वर है की भी नहीं तो क्योंकि यह विद्यासागर यह जो सब दया का कार्य इतना कर रहे हैं लोगों के लिए इतना हेल्प कर रहा है और फिर उन्होंने शास्त्र पढ़कर की ये खोज निकाला ये एक इन्वेंशन कर दिया की ऋषि मनी जो है वो समझने को गए वो समझा नहीं पे की ईश्वर क्या है क्यों है कैसे हैं तो इसलिए उन्होंने एक सिद्धांत कर लिया आजकल भी आज ये जो अब क्या कहेंगे सभ्य समाज में देखेंगे की लोगों का धर्म के प्रति एक कटाक्ष जैसा भाव है क्या है की हां वे लोग धर्म को जैसे बाकी रूप से शायद पालनपुर करेंगे जैसे ये विद्यासागर है वो जानू पहना थे तिलक लगाते थे ओम नमो नारायण बोल कर के पत्र के ऊपर में लिखने थे मंदिर वगैरा में भी शायद जाते होंगे उत्सव वगैरा में भी पार्टिसिपेट करते होंगे जो धर्म के वही अंग है बाकी अंग उसका वे लोग अनुष्ठान करते होंगे क्योंकि सोसाइटी में रहना है समाज में रहना है अपने बीबी छोटे बच्चों अपने बच्चे बछिया की शादी करवानी है तो फिर क्या है की समाज का दबंग होकर के समझ का हिस्सा होकर रहना पड़ता है किंतु मां के भीतर में हृदय के भीतर में जो है वे लोग ऐसा सोचना शुरू कर देते हैं की अरे ये जो सब धर्म जिसको की ये लोग इतना बड़ा चड्ढा करके वो सोसाइटी के लिए ठीक है मैन एक सामाजिक व्यवस्था के रूप में ठीक है किंतु क्या यह सही ईश्वर है या तो फिर जिसको की आत्मा कहा जाता है सही-सही है मैं यदि त्याग तपस्या साधना करूंगा तो क्या सही-सही कोई फल मिलेगा मैं इतने सारे लोगों को देख रहा हूं की धर्म का जो रैक करके धर्म का एक एक सॉन्ग रैक करके धर्म का एक वो जो है एक बाकी है एक कर कर लोगों को थकते हैं ऐसे ठग लोगों को देखकर के समाज में एक ऐसी बुरी अवस्था एक होती है पूरे धर्म के जितने भी धार्मिक लोग हैं सबके प्रति लोगों को संदेह हो जाता है जब एक नित्यानंद के बड़े में एक अक्षय कुत्ता है तो धार्मिक जितने भी लोग हैं साधु सन्यासी सब के ऊपर में एक जो है की एक ऐसा कर रहा है तो सभी लोग ऐसा नहीं करते उसका क्या प्रमाण है फिर ऐसे दो-तीन हर दो-तीन साल पे एक एन कोई एन कोई एक छोटा मोटा कैसे चला रहेगा कभी कभी कोई बड़ा कैसे निकाल जाएगा तो हमको लगता है की एक जगह ऐसा कर रहा है एक दूसरा तीसरा ऐसा कर रहा है तो सब लोग करते नहीं ऐसा क्या पता तो किंतु देखिए ठाकुर यहां पर कहते हैं की यदि हम समाज में अनाचार अत्याचार भ्रष्टाचार वगैरा शायद देखें यदि हम शायद ऐसा देखें की जो लोग साधु हैं वो असु बन रहे हैं साधु साधु जैसा कार्य कर रहे हैं जिन लोगों को प्रजा का रक्षण करना चाहिए वे लोग प्रजा का भाषण कर रहा है प्रजा जो है उनके पास में नहीं इंडिपेंडेंस है ना ही जो सेल्फ गवर्निंग जिसको कहते हैं वो कैपेसिटी है उन लोगों के ऊपर में धनी लोग हैं उनका प्रति दिन जो है शोषण कर रहा है तो यह सब देखने के बाद में धर्म को हम एक वाक्य अंग ही क्यों ना मैन ईश्वर पर हम विश्वास ही क्यों एन करें ईश्वर पता तो यह सब क्यों होने देता है की यदि मैं सही-सही साधना करूंगा तो पहले तो मुझे लॉजिकली ही समझ में नहीं आता है की ईश्वर है तो फिर ऐसा क्यों है तो इनके लिए ठाकुर कहते हैं की सर्व दो चीज कहते हैं एक तो यहां पे उन्होंने ये कहा की ईश्वर स्वयं जो है निर्लिप्त है जैसे की प्रकाश में एक आदमी जो है वो शायद किस किसी का मर्डर कर रहा है दूसरा आदमी जो है शायद वो धर्म ग्रंथ पाठ कर रहा है किंतु दिए का प्रकाश जो है इत्सेल्फ रीमेंस निर्लिप्त आईटी सेल्फ रीमेंस अटैक और फिटनेस तो ऐसा हम ईश्वर के बड़े में यह एक अंडरस्टैंडिंग हमारी पक्की हनी चाहिए दूसरी बात है की ईश्वर स्वयं ही तो सब कुछ हो रहा है जो मर्डर कर रहा है इस के भीतर में भी वही ब्राह्मण का प्रकाश है जिसका मर्डर हो रहा है वही इस में ही तो वही ब्राह्मण का प्रकाश है जो जो की जो शिकारी दाल बन रहा है तो शिकारी के भीतर में भी वही ब्राह्मण का प्रकाश है और जो पशु-पक्षी दाल में पद रहे हैं जिनको दाल में पढ़कर के जिनका मृत्यु होने वाला है उनके भीतर में भी वही ब्राह्मण का प्रकाश है यदि एक ब्राह्मण जो है दूसरों के ऊपर में अत्याचार करके वो उसको सुख मिलता है तो जिनका अत्यधिक जिनके ऊपर में अत्याचार हो रहा है और जिनके लिए मरना मरना पन्ना अवस्था ए गई है वो कष्ट भी तो वही ब्राह्मण ही तो भोग कर रहा है अर्थात सुख और दुख दोनों का सही सही भोग करने वाला सही सही उसको वो समझना वाला तो ब्राह्मण ही है तो यह नहीं है की ब्राह्मण सिर्फ लोगों के भीतर में है जो सुख करते हैं जिनके नसीब में सुख लिखा है और नहीं और उनके पास में नहीं है जिनके नसीब में दुख लिखा है वही जो जी भारत में पत्थर पड़ा हुआ है वह भारत खाने वाला वह वही ब्राह्मण ही है और जैसे हम लोग जो है अच्छा खाना जिन लोगों को मिलता है हमारे मित्र में भी इस ब्राह्मण का प्रकाश है तो ब्राह्मण इत्सेल्फ रीमेंस रीमेंस सिस्टम विटनेस ऑफ डी इवेंट्स गोइंग बिफोर आईटी हमारा कार्य समाज कल्याण के लिए कार्य अवश्य करना है रामकृष्ण मिशन भी करता है किंतु हमको यह बात याद रखती है की समाज कल्याण का जो कार्य है वो अल्टीमेटली अपने चित की शुद्ध के लिए है अपने मां की पवित्रता के लिए है अपने यह जो सब कम क्रोध मैड लाभ मो वगैरा जो ये जो पांच क्लेश है रितु है उससे मुक्ति अपने के लिए जिससे की अपना मां जो है स्थिर और वह जो स्ट्रांग बने उसमें संकल्प शक्ति या तो बिल पावर उसमें उद्धव हो और फिर इस संकल्प शक्ति से इसी बिल पावर से हम लोग अपने मां को ईश्वर साधना के ऊपर में एकाग्र कर सके यह जो सृष्टि स्थिति प्रलय की साइकिल तो सब समय चलती रहेगी स्वामी विवेकानंद कहते हैं की यह जो अच्छा और बर्मन है सुख और दुख यह सब समय के लिए इस जगत में समाज छन रहा है जैसे की वह जो ठाकुर की कहानी है ना मां सीता ने एक बार भगवान राम को कहा किया अरे आपका तो रामराज्य है और रामराज्य में देख रहे हो की ये जो ये जो सब कारीगर है जो सुथार है ये जो मकान बनाता है मिस्त्री है ये जो सब जूते से लाइक करता है वो मोची है फिर वो जो हजम है फिर ये जो धोबी है ये लोग तो ऐसा शारीरिक कार्य करते हैं जिनको की उसे समय शुद्ध या तो शुद्ध कहा जाता था तो आप तो भगवान राम स्वयं है आप इन लोगों के लिए कुछ व्यवस्था कर दीजिए जैसे की उन लोगों को एक छोटा-मोटा कार्य करके अपने जीवन का वो जो है वो अपने जीवन को नष्ट ना करना पड़े तो भगवान राम करते हैं की देखो जिसका जो धर्म है वो उसे धर्म का पालनपुर करेगा मैं दूसरों का धर्म परिवर्तन करने के लिए नहीं आया हूं जो धर्म जो है उसको एस्टेब्लिश करने के लिए आया हूं तो मां सीता तो फिर वो तो क्या है की वो औरत जब ज़िद पकड़ी है तो फिर कोई कुछ नहीं कर सकता उन्होंने ज़िद पकड़ ली कहा की नहीं नहीं मैं देख नहीं शक्ति लोगों का कष्ट बेचारा यह जो मोची है हजम है वह कैसे जीते हैं उनके लिए आप कुछ कर दीजिए तो भगवान राम ने कहा ठीक है ये जो खजाना खोल दो जिसको की जो चाहे वो ले जाए तो मोची ने भी वहां ख़ज़ाने में शुरू किया ले लिया वो जो वो ये है वो मिस्त्री है उसने भी पैसा ले लिया मछुआरा है उसने भी पैसा ले लिया अभी उन्होंने सब कम बैंड कर दिया है वो मोची वो जूता स्लाइड नहीं करता था मछवारा मछली नहीं पकड़ता है वो शिकारी वो पशु पक्षी नहीं पकड़ता है तो अभी हुआ क्या की कुछ दोनों के बाद में जी महल में मां सीता रहती थी वहां पे छठ में वो जो है थोड़ा सा ये छेद हो गया पानी टपकने लगा बारिश का सीजन होगा तो वो बोलती है जो किसी मिस्त्री को पकड़ के ले आओ ये छेद है बैंड कर दे तो उसको जो कुछ लोग गए मिस्त्री को खोजना के लिए तो अभी निश्चित थोड़ी ना उत्तर देने वाला है उसके पास में धन लेकर के बैठा है वो क्यों मिस्त्री कम करने को जाएगा वो आकर के मां सीता को बोले की अरे देखिए रानी की यहां पर देखिए वो तो जो है मिस्त्री उसकी तो इच्छा नहीं है कम करने की अभी हम क्या तो फिर तो मां सीता बड़ी यह हो गई क्या अरे ये तो बड़ा उल्टा हो गया मैंने जो अच्छा करने को गए फिर वो जाकर के भगवान राम को कहती है की अच्छा वो जो पहले जैसा था वैसा कर दो तो देखिए ये जो धर्म जो है धर्म के ऊपर में ये जगत है और हमको धर्मत की जो ठीक एक एक हमको लगेगा की ये जो कष्ट इसको मिल रहा है ये जो सुखी है यह दुखी है तो विद्यासागर जैसे लोग बोलेंगे की यह मां सीता रहेगी की सबको जो है उसके जगत में ठीक-ठीक हो जाए सबके पास में धन वैभव ए जाए किंतु ये धन वैभव दुख और सुख जो भी आप कहें वो जो है इस जगत में वो एक समाज ही रहेंगे राम राज्य में भी उतना ही कष्ट था जितना आज है रामराज्य में भी उतना ही सुख था जितना आज है सुख दुख गुड इविल ये जो हंसी खुशी हंसना रोना यह जो सब है उसका बैलेंस सब समय के लिए इस जगत में राहत है और हमारा कार्य जो है इस जगत जो है उससे पैर जाना हम जगत को अच्छा करने का पर्यटन करेंगे किंतु कर नहीं पाएंगे जैसे कुत्ते की पूछ जो होती है वह जो जैसे टेढ़ी की टेढ़ी वैसी ही रहेगी थोड़ा सा आप सीधा करने को पर्यटन करें फिर से वो टेढ़ी हो जाएगी तो वैसे ही हमारा कार्य है जगत कल्याण के कार्य करना किंतु उसका सही उद्देश्य जो है उसके पीछे का जो रियल एम जो है वो है सब समय याद रखना है की इस कार्यकर्ता करते-करते हमारे मां की शुद्ध हो और इस शुद्ध मां से अपनी बिल पावर बड़े अपनी पवित्रता बड़े अपनी ब्रह्मचर्य की शक्ति बड़े त्याग की शक्ति बड़े सत्य की शक्ति बड़े और उसे शक्ति से हम भगवान के ऊपर में मां को एकाग्र कर पे जो अच्छे कार्य करता है उसका मां ऐसा शांत और पवित्र हो जाता है की वो सुबह शाम जाकर के देखेंगे की दो-दो घंटा बैठ के जब ध्यान कर रहा है मैंने देखा है ऐसे साधुओं को मैंने देखें ऐसे देवोटी को घंटे बैठकर के वो मेडिटेशन कर रहे जब ध्यान कर रहा है और हमको लगेगा की फिर वो कम करेंगे तो कैसा कम करेंगे उनका मां तो तो है की सब समय दूसरे ही जगत में राहत होगा किंतु जब वह कम करने की शुरुआत करते हैं तो ऐसा लगेगा की जैसे उनके जैसा एक्सपर्ट कोई नहीं है मैं बेलूर मठ में कंप्लीट वर्क डिपार्मेंट में था तो वहां पर मेरे इंचार्ज थेमरूपालन जी महाराज तो वो खुद तो अमेरिकन है मानो व्हाइट अमेरिका और वहां तो अमेरिकन लोगों का तो कलर ही पूरा डिफरेंट टाइप का है फिर भी बिल्कुल वो छोटी उम्र में 19 साल की उम्र में वो हमारी वो जो मॉनेस्ट्री है वहां पे गंजन मॉनेस्ट्री बोल करके एक जगह है वहां पे उन्होंने जॉइन किया ऐसे ब्रह्मचारी और आज उनकी उम्र एटलिस्ट 80 इयर्स होगी 80 साल होगी और वो हमारे वो डेली उनका कम था की कंप्लीट को एडिट करना तो हम लोग साम-शाम ऐसा हमारा टेबल था एक दूसरे को शाम सामने तो हम बैठ करके कम करते थे तो मैच भी दो-तीन घंटा वो एडिटिंग करूंगा या ऐसा कुछ करूंगा तो मुझे लगता था अभी चलो जाकर के थोड़ा चाय बाई पिए जाकर के दूसरे ऑफिस में जाकर दूसरे किसी साधु के साथ में गैप लगाया किंतु वो महाराज मेरे से तीन गुना उम्र होगा दोगुनी या तीन गनी वह बैठकर के कर से पांच घंटे तक एडिट किया जा रहा है तो मैंने सोचा ये कैपेसिटी ये एक क्षमता मेंटल फिजिकल तो ठीक है किंतु मेंटल कैपेसिटी कहां से आई है फिर वो जब हम सुबह को 4:00 बजे मंगल आरती होती है तो वहां पर मैं उनके पीछे बट्टा था तो मैं तो 4:00 बजे जाता था 4:00 बजे का आरती है किंतु वो क्या करते थे 3:30 बजे जाकर के वो जो हमारा मंदिर का जो द्वारा है वहां पे खड़े हो जाते थे 3:30 बजे मंदिर का दरवाजा खुलना है तो 3:30 में 5 मिनट पहले वहां पे जाकर खड़े हो जाते थे दरवाजे के सामने जैसा दरवाजा खुला वैसे ही जाकर के ठाकुर के बिल्कुल सामने जो जगह है वहां पर आसन लगाकर बैठ जाते थे और मैं तो 4:00 बजे जाता था 4:00 बजे बैठा था और हो सकता है 4:30 ऐसा कुछ में बैठता होगा किंतु मैं देखा था उनको की वह 5:30 बजे तक सोच 3:30 से 5:30 बजे तक एक आसन पर 80 साल के साथ हुए बैठ करके वो ध्यान करते है तब वह मुझे लगा की हां यह जो सब हमने शिखा है उसका ठीक-ठीक एप्लीकेशन हो तो हमारा जीवन जो है कितना सुंदर पवित्रमय हो जाएगा और उन महाराज के साथ में मेरे मैं तो उनके साथ उनके सामने कितना छोटा उम्र में कितना जूनियर किंतु मेरे साथ इतना हंस-हंस के बात करते थे जैसे की मैं उनका मित्र हूं और बेलूर मठ में सभी साधु ब्रह्मचारियों के साथ में जो कोई भी उनके पास आएगा तो ऐसा लगेगा की हां चलो बहुत अच्छा लगा महाराज के साथ बात करके ऐसा नहीं है की किसी को उपदेश वगैरा देते हैं किंतु हंस के इतना मित्रता पूर्वक व्यवहार करेंगे और मित्रता एक ऐसी चीज है हसी एक ऐसा चीज है जिसको की मिलता है उसका जो है दिन जो है वो सुकून भारत हो जाता है वो क्योंकि हम लोग कभी-कभी ऐसे पागलों को मिल जाते हैं तो हमको लगता है करें दिन पूरा बेकार है किंतु ऐसे समित मुख वाले साधु को देखते हैं उनसे दो अच्छी बातें सुनते हैं तो उनको लगता है अच्छा चलो दिन अच्छा गया तो महाराज के पास में ऐसे कितनी साधु ब्रह्मचारी देवोते लोग आते थे उनको लगता था चलो महाराज के साथ दो-तीन मिनट बात हुआ तो बहुत अच्छा लगा तो ये जो है जब हम साधना करेंगे तपस्या करेंगे तो दोनों जो है कर्म और अध्यात्म ये दोनों जो है हमारा 100% इंप्रूव होने वाला है अच्छा तो आज यही तक कल फिर से मिलते हैं हर ही ओम तत्सत श्री राम कृष्णा प्रणाम