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Sri Ramakrishna Kathamrita ·

श्रीरामकृष्ण कथामृत : दक्षिणेश्वर में भक्तों के साथ श्रीरामकृष्ण Sri Ramakrishna Hindi 5 June 2023

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श्री रामकृष्ण कथामृत अच्छा ठाकुर क्या कहते हैं पिछली बार हमने देखा की किस तरह से मां अंतर्मुख होकर के जगत संसार के कार्य करने से वह पंछी जैसी अवस्था होती है की अपने अंडे पे बैठा है अंडे को से रहा है और आंखें खली है लगता है की आकाश बादल ये सब देख रहा है किंतु उसका जो मां है वो पूरा अंडे पे बैठा है मां जो है पूरा अंतर्मुखी है तो वो अवस्था हमने अच्छी और ठाकुर ने कहा भी सही मास्टर को की उनके लिए इस तरह का एक चित्र है तो मास्टर मा से कहां से जुगाड़ करके ले आए और ठाकुर को दे और एक बात है की देखिए हम लोग जहां पर रहते हैं जी कमरे में रहते हैं जी जगह पर रहते हैं उसमें इस तरह के देवताओं के हमारे इस्ट देवताओं के विभिन्न अवतारों इस तरह के यदि चित्र रहते हैं तो उसको देखकर के क्या होता है हमारे मां को उद्दीपन मिलता है जैसे मैंने कहा था की मैंने एक बार बेलूर मठ में एक बड़े ही सीनरी महाराजा है उनको प्रणाम करने के लिए गया था तो देखा की वो पुराने जमाने के वो जो चित्रकार होते हैं ना अभी आजकल जो चित्र दौड़ते हैं तो क्या है की वो मतलब मस्कुलर वो देवी देवता जो होते हैं हनुमान जी दूर दिए तो उनके मसाला कैसे हैं वो दिखने को मिल जाता है वो बहुत ही अच्छे से उनको कपड़े पहने देते हैं बहुत ही सुंदर वो डेकोरेट कर देते हैं चित्र को किंतु चेहरे का भाव आंखों का भाव भूख नहीं ला पाते तो पहले के जो चित्रकार थे ऐसा वो चित्र शायद इतना सुंदर ना दिखे जितना की आजकल के चित्रकार वह दूर रहे हैं उसको किंतु चेहरे का भाव जो है आंखों का भाव जो है वो भगवान राम का वह जो चित्र देखेंगे महावीर का देखेंगे कितना सुंदर तरीके से वो दिखता है तो यह एक ऐसे चित्रकार ने एक ऐसा चित्र डोरा था की जो जंगल है पहाड़ है नदी है जमीन पर खास चुका हुआ पेड़ की छाया में घास के ऊपर में एक संज्ञा सी बैठा है सिर्फ एक कोपेन मंत्र पहनना है और जाता है सर के ऊपर में और एक चिलम फूंक रहा है अपने दोनों हाथों से तो किंतु इस साधु को देखकर के और पीछे में जो वनराज जी का जो दृश्य था वो इतना सुंदर रूप से अंकित किया गया था की वो देखकर की हमको लगे की हम भी वहां पर उसे जंगल में उसे वनराज में उसे एकदम सुंदर जगह पे पहुंच गए हैं हमारे इस जगत संसार के जितने भी यह जो दिन प्रतिदिन का ये मैंने रिस्पांसिबिलिटी से ये दिन प्रतिदिन का ये जो झंझट है यह सब अपनी ये टेंशन और यह जो डेड लाइन हम हमारे सामने होती है इतने समय में इतना कम करना ही है सब भूल करके वो नदी के किनारे पीछे में पहाड़ है वो चिड़िया पेड़ के ऊपर में बैठी हुई हमको पूरा ऐसा अनुभव होगा की हम भी वहां पर चले गए हैं और साधु के साथ में बैठे हैं तो पहले के चित्रकारों का ये एक क्षमता थी मुझे याद है की मैं बिल्कुल पहले बार मैं बेलूर मठ में प्रेसिडेंट महाराज के कमरे में प्रणाम करने के लिए गया था तो अभी तो बैलून जाते होंगे तो अपने देखा होगा की एक बड़ा प्रेसीडेंशियल वो जो रेजिडेंस है रेजिडेंट महाराज का जो नया रेजिडेंस है वह बन गया है किंतु वह जो पहले वाला जो रेजिडेंस है जिसको की गिरीश भवन कहते थे अभी जहां पर सुनीता नंद जी रहते हैं वहां पर पहले प्रेसिडेंट महाराज रहा करते थे तो वहां पर जो लोग वैसे यदि आपको दर्शन रूम में जाएंगे जहां पर सभी लोग प्रणाम करते हैं तो वह तो एक जगह हो गई किंतु यदि उनके कमरे में जाएंगे और फिर पीछे से जान का और आने का रास्ता होता है तो वहां से गया था मैं एक बार जान का मौका मिला था वापस आकर देखा वह बहुत पहले की बात है यह 2012 की 13 की बात है आत्मा स्थान जी मोस्ट प्रोबेबली उसे समय प्रेसिडेंट है आत्मा स्थान जी हिट है तो वापस ए के देखा तो वहां पे वो जो केदारनाथ और बद्रीनाथ का चित्र लगा हुआ है फोटोग्राफी है किंतु फोटोग्राफ इतना वो मतलब सुंदर फोटो था की अभी उसे समय गर्मी का समय था और मैं वह प्रणाम करके बाहर ए रहा था और देखा वो केदारनाथ और बद्रीनाथ का ये फोटो वो देख कर के ही वो मां में इतना मतलब शांत एकदम भाव ए गया की हां चलो हम लोग भी वहां पे जाकर के शिवा के सामने बैठे हैं तो जहां पे हम रहते हैं वहां पर इस तरह के चित्र है इस तरह के फोटोग्राफ है वो रखना से क्या होता है एक उद्दीपन होता है उद्दीपन शब्द ठाकुर का है ठाकुर बार-बार इसको उसे करते हैं की किसी भी चीज को देखकर के उनको ईश्वर उद्दीपन हो गया और वह भाव में चले गए तो इस तरह से उद्दीपन होता है एक स्टिम्युलेंट हमको मिलता है एक प्रेरणा मिलती है की हां हम भी चलो इस तरह से साधना करते हैं चलो हम भी इस तरह से कुछ रानो के लिए भी सही चाहे ये हमारे जितनी भी ये जवाबदारी है रिस्पांसिबिलिटी है यह सबको विस्मृति हो करके ये सबको भूल जा करके चलो ये साधन समुद्र में डुबकी लगाते हैं और यहां पे एक सुंदर कहानी भी है एक बार ठाकुर ब्राह्मी समाज में गए थे तो देखा की ये अभी ठाकुर जाते हैं तो क्या लोगों को एकदम यह उत्साह जाता है की यहां ठाकुर तो त्याग के राजा थे त्याग की प्रतिमूर्ति थे तो उनको देखकर के हम लोग भी चलो त्याग करना शुरू कर देते हैं तो ब्राह्मी समाज में गए केशव सेन था वहां पे वो वहां पर बैठकर के वो खड़े रहकर के वो कुछ इस तरह से वो मंत्र पाठ वगैरा कर रहा था भाई प्रार्थना कर रहा था तो उसने कहा की है भगवान प्रार्थना करते-करते ठाकुर बैठ गए तो एकदम वो उसके भीतर में भी त्याग और वैराग्य का उद्दीपन ए गया तो अभी जैसे पहले जमाने में होता था की पुरुष जो है सबके सामने बैठने थे और स्त्रियों को जो है वो अलग से वो बैठने की वो व्यवस्था होती थी स्त्रियां जो है पुरुषों के सामने नहीं बैठी थी तो यहां पे भी ब्राह्मी समाज में एक हाल था अभी होल के पीछे में एक जगह में वो जो है पर्दा जो है पर्दा दाल दिया गया था और पर्दे के पीछे में उसे स्त्रियां बैठी हुई थी तो अभी होल में तो सब पुरुष है पुरुषों के सबसे पहले रोमांटिक जो है वो प्रार्थना कर रहा है और जैसे ही ठाकुर को देखा अभी त्याग और वैराग्य का ऐसा उद्दीपन आया की उसने वो बोला की है भगवान हमारे साथ ऐसा करो की हम जो है भक्ति नदी में जो है डुबकी लगा दे और फिर इस में हम भक्ति में ही मगन हो जाए कभी बाहर ना आए भक्ति समुद्र में ही हम दुबे है तो यह बात सुनकर के ठाकुर हंसने लगे पता है की अभी इस तरह का त्याग तो उनसे संभव नहीं है तो ये तो क्या है की क्षणिक भर त्याग होता है जितने क्षण आप साधना भजन साधन वजन करते हैं तब तक त्याग राहत है बाद में तो आपको संसार का रिस्पांसिबिलिटी है आपको संभालना है तो ये तो क्या है की ठाकुर को समझ गए की मुझे देखकर के उनको देखकर के ये त्याग उनके मां में आया है तो ठाकुर हंसते-हंसते बोलने लगे केशव तुम लोग जब भक्ति नदी में डब लगा डॉग तो ये पर्दे के पीछे जो लोग बैठे हुए हैं उनका क्या होगा अभी नेचुरल स्त्रियों की संभल तो जो है वो तो पुरुष लोग ही करेंगे एक चीज फिर उनके प्रति जो आकर्षण पुरुष के मां में वो तो वैसे ही तो जान वाला नहीं है वो तो रहेगा ही रहेगा भले ही चाहे मुंह से त्याग और वैराग्य की कितनी ही बातें कर ले तो जैसे ही ठाकुर ने ऐसा कहा की तुम लोग भक्ति नदी में डब लगा डॉग और कभी बाहर नहीं आओगे तो फिर ये पर्दे के पीछे जो लोग बैठी है उनका क्या होगा तो सब लोग जोर-जोर से हंसना शुरू कर दिए केशव सेन भी हंसने लगा की हां ठाकुर ने ठीक-ठीक पकड़ लिया है उनके मां की बात इसलिए फिर ठाकुर कहते हैं देखो बीच-बीच में थोड़ा सा जंप लगा और नदी में डुबकी मारो फिर थोड़ा सा है वो किनारे पे आकर के थोड़ा संसार करो फिर थोड़ा सा डुबकी मारो तो ऐसे ठाकुर की अभी नरेंद्र के साथ में भी ऐसा हुआ था ठाकुर गए थे साधारण ब्राह्मण समाज में नरेंद्र जो है अपने मित्रों के साथ में वो वहां पे उपासना कर रहा था तो ठाकुर गए तो इन लोगों के मां में सदन भी वैराग्य का उद्दीपन हो गया और बोलने लगे की जो है की हम जो है हमारे मां में त्याग और वैराग्य का भाव कितना प्रकट हो की हम जो है संसार से उधवों में उठकर के ईश्वर के पड़ा में श्री चरणों में अपने मां को लगा दें तो अभी ठाकुर भी तो पता है की उनके खुद के जान से ये सुद्दनली ऐसा हुआ है हालांकि केशव सेन और नरेंद्र के बीच में ये सबसे बड़ा तफावत था की केशव के संस्कार थे वह मतलब इतने स्ट्रांग नहीं थे कहो या तो फिर संसार की और इतना ज्यादा अट्रैक्शंस था की वह थोड़ा बहुत भी यदि ईश्वर की और जान का पर्यटन करेगा तो संसार आखिर में उसको खींच करके पृथ्वी पर ले आएगा आपके नरेंद्र का ऐसा नहीं था की नरेंद्र जो है एक बार ठाकुर के पास आएगा तो फिर सही ये जो आध्यात्मिक जगत की सर्वोच्च सिद्धि जो है निर्विकल्प समाधि उसको प्राप्त करके छोड़ेगा किंतु उसे समय तो ये बच्चे थे कॉलेज में पढ़ने स्टूडेंट थे और नरेंद्र जितनी भी बार दक्षिणेश्वर जाता था ठाकुर की मजाक करता राहत था कुछ ना कुछ बात लेकर के ठाकुर को कहता था की यह जो सब दर्शन वगैरा हो रहे हैं आपके मां का ब्रह्म है फिर वो जातक पक्षी वाली बात नरेंद्र ने कहा अरे वो चटक पक्षी नहीं है वो तो इस तरह से कर तक पक्षी होता ही नहीं है तो ठाकुर जाकर के एकदम बेचारे टेंशन में ए गए वह तो शुरू शुरू में सोचते थे नरेंद्र जो कहता है सब कुछ सही है क्योंकि वो शिवा का उतारा सप्तर्षी का अवतार है उसके मुंह से जो भी निकलेगा 100% सत्य होगा किंतु बाद में जब देखा एक दिन एक पक्षी वह उनके कमरे में एकदम उड़ रहा है कहानी से बाहर से वो नरेंद्र बैठा था ठाकुर बैठा थे अपने कमरे में दक्षिणेश्वर में तो कहानी से पक्षी ए गया और चारों और कमरे में उड़ने लगा तो ये नरेंद्र उसको देख करके अरे देखो देखो ये चटक पक्षी है तब आपको बड़े नाराज हो गए अरे साले ये चटक थोड़ी ना है ये तो चमगादड़ है और फिर ऐसा करके फिर इतना गुस्सा हो गए बोले अभी तुम जो खाओगे एक भी बात पे विश्वास नहीं करूंगा तो क्या है की नरेंद्र के वह सब स्टेज थे ऐसा नहीं है की वो सप्तर्षी के अवतार है तो अवतार होने या तो फिर सप्तर्षी के एक ऋषि होने के बावजूद वो सत्य बोलते हैं या तो फिर उनका अंडरस्टैंडिंग थोड़ा कम है क्या है की एक शरीर ग्रहण किया है तो शरीर के सब धर्म थोड़ा बहुत वन परसेंट मिश्रित राहत है उसको वर्कआउट करना पड़ता है तो जैसे नरेन का यह सब थोड़ा बहुत भी जो वर्कआउट करना था वह हो गया माया का पर्दा जो थोड़ा बहुत भी नरेन को बंद के रखा था संसार में क्योंकि यदि थोड़ा सा भी माया जड़ी नहीं रहती तो क्या है की वो जगत में रहकर के जगत के कल्याण के लिए जो कार्य करना है वो नहीं कर पाते हैं तो ये उसे समय था उसे समय में जबकि नरेंद्र ठाकुर की मजाक करते थे और ठाकुर के सभी बटन पर प्रश्न करते थे तो अभी जब ठाकुर आए हैं तो उन्होंने बोल दिया की हमारा मां में तीव्र वैराग्य का उद्यापन हो तो ठाकुर बड़े ही मृदु शब्दों में का है और कोई नहीं था और किसी ने नहीं सुना जो मास्टर महाशय थे वो एकदम पास में बैठे थे सिर्फ उन्होंने सुना ठाकुर बोलते हैं तले तो हो छे बांग्ला तो बोले से बांग्ला में कहते हैं की ठाकुर ने कहा तो तो फिर हो गया मैंने सब नरेंद्र कहता है सबके सामने नरेंद्र बैठ करके कहता है की मेरे मां में तीव्र वही राज्य का उद्दीपन हो तो ठाकुर बड़े ही मृदुल स्वर्षक कहते हैं तो फिर तो फिर हो गया मैन यदि लड़कों के मां में वैराग्य ए गया तो ये जगत संसार जो है पूरा स्वर्ग बन जाएगा फिर आपको वो साधना करके रामकृष्ण लोक में जान की जरूर नहीं है त्याग और वैराग्य ए गया तो पृथ्वी ही जो है वो रामकृष्ण लोक में प्रणीत हो शक्ति है किंतु वह त्याग होना फिर वो साधना करना वो सब बड़ी कठिन चीज हैं तो ये हो गया की इस तरह से इस तरह कोई छवि रखना कोई मूर्ति रखना कोई ये फोटोग्राफ रखना ये सब नजर के सामने रहने से बड़ा है तो यह हमने इतना पिछली बार देखा अभी ठाकुर आश्रम शाम हो गई काली मंदिर राधाकांत जी के मंदिर और अन्य करों में बत्तियां जल दी गई श्री राम कृष्णा अपनी छोटी खाट पर बैठे हुए जगन्माता का स्मरण कर वे ईश्वर का नाम जपने लगे घर में धोनी दी गैवत पर दिया जल रहा है कुछ डर बाद शंकर घंटा आदि बजाने लगे काली मंदिर में आरती होने लगी तिथि है उसके बाद में ध्यान करने की शुरुआत करेंगे तो यह जो वर्णन है की संध्या हो गई दक्षिणेश्वर में एकदम जो अंधेरा और उजाले का वह जो टॉयलेट जैसी स्थिति होती है की वह अंधेरा भी हो रहा है चंद भी ए गया है ता पुरी टीम टीम ए रहे हैं जो है शंकर घंटा कैंसर यह सब बजाने लगे हैं जैसे की पूरा यह जो पशु पक्षी ये पेड़ पौधे सब मिलकर के जैसे मार्ग जगदंबा की आरती की तैयारी कर रहा है और इसके बीच में ये ठाकुर के कमरे में वो दिया जलाया है इस दिए के प्रकाश के भीतर में बैठ करके ठाकुर जो है मां का नाम ले रहे हैं जब कर रहे हैं ये कितना मतलब पवित्र सुबह क्षण वो होगा और मास्टर महाशय ने कितने जन्म अंतर का पुण्य किया होगा तो उसे क्षण उनको उपस्थित रहने का मौका मिला ओम का मतलब कितना ग्रेट गुड फॉर्चून हम लोग यदि वहां पर रहते हैं तो हम लोग तो घर कभी वापस जाते ही नहीं वहीं के वहीं पड़े रहते हैं तो फिर ठाकुर को कहते हैं अपने सेवक बनाकर के रख लो आपको जो भी खाना खाना है हम लोग आपके लिए ले आएंगे बर्तन दो देंगे कपड़े दो देंगे तो हमको यहां पर आपके ही पास में रखो यदि जब ध्यान नहीं होता है तब भी इस तरह के पवित्र जगह पे र करके पवित्र परिसर में र कर के हमारा मां स्वत ही शुद्ध वो पवित्र हो जाएगा तो इसीलिए बात-बात में ये सब जो झगड़ा चालू हुआ ना रामचंद्र डेट का और स्वामी जी का और रामचंद्र कहते हैं की हमने इतना सब कुछ ने ठाकुर के पास में पाया है की अभी साधना करने की जरूर ही नहीं है यह स्वामी जी राजा महाराज ये काली महाराज यह सब क्या एक नया नाटक कर रहे हैं वो सर्व धर्म समन्वय और ये सब साधना भजन साधन भजन करना त्याग वगैरा करना ये सब मिथ्या है ये सब नाटक है वो एक्चुअली हमने जब ठाकुर का आशीर्वाद प्राप्त किया है तो फिर उसको लेकर के हम अपना जीवन जो है इस तरह से जिए की वो ठाकुर का नाम स्मरण शक चला रहा है तो ऐसा उनका कहना था यहां पे स्वामी जी को पता था ठाकुर ने उनको जो स्वामी जी को कहा था हमने यदि की वह बायोग्राफी पढ़ेंगे एकदम स्पष्ट रूप से लिखा है की ठाकुर क्या करते थे की पहले तो सबको अपने कमरे में से निकाल देते थे देखते थे की आसपास में भी कोई ना हो फिर जब ये तब की बात है ठाकुर को जब कैंसर हो गया था और काशीपुर उद्यान में उनको चिकित्सा के लिए सरसवर के लिए लाया गया था उसे समय की यह बात है ठाकुर सबको हमने अपने कमरे में से निकाल देते थे सिर्फ नरेंद्र को सामने में बिठाते थे और नरेंद्र के साथ में कितनी बातें करते थे तो नरेंद्र को उन्होंने क्या कहा इस बात का तो अभी कोई रिकॉर्ड नहीं है ना ही मास्टर महाशय से रिकॉर्ड करने के लिए नहीं ठाकुर ने बाद में कुछ कहा है प्रकाश में जहर में और ना ही स्वामी जी ने कुछ कहा है की ठाकुर के साथ उनकी क्या बातें होती थी किंतु हमको यह बात पता है की स्वामी जी ने जो किया बाद में वो सब ठाकुर की परमिशन से ही ठाकुर के आदेश के ऊपर में ही सब कुछ किया होगा यह बात तो हमको एकदम पक्का पता है तो यह बाद यह जो साधना करना बाद में जो तपस्या तपस्या करना बाद में उर्त्तीेटिक करना सन्यास ग्रहण करना वो अपने लिए नहीं ये लोग तो मतलब उनका जो जीवन का वो जो हेतु है वो तो यह सिद्ध हो ही गया है ये हमारे कल्याण के लिए दूसरों के कल्याण के लिए बाकी सब लोगों के कल्याण के लिए उन्होंने सन्यास ग्रहण किया तो सन्यास व्रत जो है हमेशा निस्वार्थ रूप से ग्रहण किया जाता है मुझे मुक्ति मिले सिर्फ यह बात नहीं रहती एक्चुअली वेद वेदांत की दृष्टि से आप देखेंगे तो मैं बोलकर देखो कुछ है ही नहीं ये मैं छोटा सा शरीर मेरा दो हाथ दो पर एक सर ऐसा तो कुछ ही नहीं ये तो जो कुछ है मैं जो हूं मेरा असली स्वरूप ये तो पूरा पृथ्वी पूरा ब्रह्मांड में ब्रह्मांड के भीतर में जितने भी तारे ग्रह जितनी भी गैलेक्सी जितने भी पेड़ पौधे जितने भी मनुष्य सब कुछ मिलकर के मेरा सही स्वरूप है तो सन्यास ग्रहण किया जाता है पूरे विश्व ब्रह्मांड की मुक्ति के लिए पूरे विश्व ब्रह्मांड के कल्याण के लिए नहीं किया छोटे शरीर की मुक्ति के लिए ये एकदम क्लियर होना चाहिए यदि मुक्ति ही चाहिए तो संसार का जो रास्ता है वो सफिशिएंट है हां अभी हम जो है हमारी बात अलग है सन्यास दो तरह से होता है विद्वत संज्ञा और विविध शासन तो विधवाह संज्ञा कब ग्रहण किया जाता है जब आपको मुक्ति मिल गई है और आप लोग कल्याण के लिए यदि शरीर धरण करना चाहते हैं तो वो विद्युत संज्ञा स्वभाव और विविधता संज्ञा क्या है पहले में मुक्ति के लिए पर्यटन करूं सदन भजन करो उसके बाद में मुक्ति मिल जाए फिर मैं दूसरों के लिए कल्याण के लिए कम करूं वो विविध संज्ञा से इसलिए हम लोगों का जो संज्ञा से विविधता सन्यास है हालांकि हम लोग ये सब कल्याण के लिए कार्य करते हैं किंतु लोगों का क्या कल्याण होता है क्या उपकार होता है क्या उनको बेनिफिट होता है वो तो पता नहीं किंतु हमको सबसे ज्यादा से ज्यादा बेनिफिट होता है यह बात एकदम पक्की बात है अच्छा यदि पता हो तो स्वामी जी ने जब पहले बार सन्यास ग्रहण किया था वह नगर मठ में तो पता है उन्होंने क्या नाम रखा था उन्होंने अपना नाम रखा था स्वामी विवेकानंद सबसे पहले जो नाम ग्रहण किया था और यह विविधिशानंद नाम लेकर के वो भारत में भ्रमण कर रहे थे तो जब वो खेतड़ी में गए तो खेतड़ी के राजा ने कहा की स्वामी जी आप तो यह कोई विविधता अर्थात की विविधता संज्ञा स्वर्ण ग्रहण करता है जिसको की मुक्ति की अपेक्षा हो जो मुक्ति के लिए साधन भजन कर रहा हो जो आध्यात्मिक जगत में अभी भी विद्यार्थी हो अभी भी स्टूडेंट हो अभी भी सड़क हो तो ये खेतड़ी के राजा कहते हैं स्वामी जी आप तो कोई विद्यार्थी या सड़क नहीं रहे आप तो सिद्धू के सिद्ध हो चुके हैं आपके लिए ये विविध आनंद नाम जो है वो योग्य नहीं है उपयुक्त नहीं है आपके लिए आपके लिए प्रॉपर नाम है स्वामी विवेकानंद तो अभी इस तरह की स्टोरी तो हम लोग सुनते ए रहे हैं और इसके लिए इसको लेकर के भी फिर थोड़ा सा है की चिंतन होता है की सही सही में खिचड़ी के राजा ने ही स्वामी जी को स्वामी विवेकानंद नाम दिया था ना की और किसी ने दिया था यह सब को लेकर के चिंतन है किंतु यह जो एक्स जो एक क्रोनोलॉजी है जो एक्सेप्टेड बायोग्राफी है उसमें इस तरह का संवाद होता है राजा और स्वामी जी के बीच में और विविधिशानंद नाम जो है स्वामी जी को उपयुक्त नहीं है नाम उपयुक्त है उनके लिए स्वामी विवेकानंद अच्छा अभी स्वामी जी ने जो विविधता नाम भी जो ग्रहण किया था उससे पहले उन्होंने और एक नाम ग्रहण करना चाहते थे स्वामी राम कृष्णानंद क्योंकि उनको लगता था की वो ठाकुर के प्रधान शिष्य है इस हिसाब से राम कृष्णा नंद नाम उनके लिए ज्यादा उपयुक्त होगा किंतु फिर उन्होंने देखा की शशि महाराज ने जी तरह से जी जान से प्रतिक्षण एक क्षण भी गवई बिना दिन रात ठाकुर की अपने तन मां प्राण से जो सेवा की है उसका कोई मतलब और कोई आपको यह नहीं मिलेगा दूसरा कोई उदाहरण नहीं मिलेगा 30 कोई किसी ने अपने गुरु की ऐसी सेवा की हो तो उसकी सेवा धर्म को याद रख करके स्वामी जी ने ठीक किया की नहीं राम कृष्णा नंद नाम का सही सही अधिकारी शशि महाराज है वह खुद नहीं तो देखिए स्वामी जी ने कितने नाम सोच थे दो नाम तो हमको पता है विविधिशानंद नाम सोचा था राम कृष्णानंद नाम सोचा था और बाद में जब विवेकानंद नाम ग्रहण करने के बाद में भी जब वह गुजरात में जब भ्रमण कर रहे थे तब लोगों को पता ना चल जाए की सब जगह पे विवेकानंद विवेक आनंद कहेंगे तो यह अखंडानंद जी काली महाराज वगैरा तो उनका पीछा कर ही रहे थे वो पकड़ लेंगे एक अच्छा ये विवेकानंद थे वो यहां पे आए उसके बाद वहां गए उसके बाद वहां गए तो स्वामी जी बीच-बीच में नाम चेंज करते थे तो एक तीसरा नाम उन्होंने चौथ नाम लिया था स्वामी सच्चिदानंद तो अभी पोरबंदर वगैरा जब गए थे यहां पे गुजरात में तो सच्चिदानंद नाम लेकर के गए थे सबको बोलते थे मैं सच्चिदानंद किंतु फिर जब वो साउथ इंडिया में जब गए तब से उनका जो नाम है विवेकानंद उन्होंने पक्का कर दिया और फिर उन्होंने इस नाम को चेंज नहीं किया था आरती हो जान पर कुछ क्षणबाद श्री राम कृष्णा मनी के साथ अकेले अनेक विषयों पर बातें करने लगे यह गीता का श्लोक है अभी श्री राम कृष्णा कहते हैं ईश्वर चंद्र विद्यासागर जो कर्म करता है वह अच्छे हैं वह निष्काम कर्म करने की चेष्टा करता है मनी जी हां अच्छा अभी मनी यानी की मास्टर वहां से मैंने कहा था ना की एक जैसे स्वामी जी अपना नाम बदलते थे जिससे की कोई उनको पहचान ना ले कोई उनको पड़ा ना ले वैसे ही यह मास्टर महाशय अपना नाम बदलते हैं वह कभी-कभी बोलेंगे मास्टर कभी-कभी बोलेंगे मनी कभी कहेंगे मोहिनी मोहन और कभी लिखेंगे एक भक्ति तो यहां पे अपने को मनी करके संबोधन कर रहा है मनी करके अपने को आईडेंटिफाई कर रहा है तो मनी ने कहा जी हां अच्छा जहां कर्म है वहां क्या ईश्वर मिलते हैं राम और कम क्या एक ही साथ र सकते हैं हिंदी में मैंने पढ़ा है की जहां राम जहां कम कहां राम नहीं जहां राम नहीं था दोनों जो एक साथ में हो सकते हैं क्या कर्म करके क्या ईश्वर को प्राप्त कर सकते हैं यानी की जो बेसिकली पूछना चाहते हैं की जैसे ठाकुर जी तरह से त्याग की बात कर रहा है और सूर्य से प्रकाश रूप से सन्यासी नहीं थे किंतु उनका आचरण तो पूरा सन्यासी था तो इसलिए मनी पूछ रहे हैं मास्टर महाशय पूछ रहा है की क्या ईश्वर प्रताप के लिए सन्यास ग्रहण करना चाहिए मैन वो जरूरी है कंपलसरी है की वो संसार में रहकर के भी ईश्वर प्रताप हो शक्ति है तो ठाकुर कहते हैं कर्म करना चाहिए कर्म निष्काम करना चाहिए अच्छा ठाकुर कहते हैं कर्म सभी करते हैं उनका नाम लेना भी कर्म है ईश्वर का नाम लेना भी कर्म सांस लेना और छोड़ना वो भी कर्म है ये जो हमारा ब्रीडिंग भी जो हो रहा है वह भी कर्म है क्या मजाल है की कोई कर्म छोड़ दे इसलिए कर्म करते रहना चाहिए किंतु फल ईश्वर को समर्पित कर देना चाहिए जो कर्म किया बिना हम तनिक भर नहीं र सकते जो हम सांस लेते हैं वह भी कर्म है हम यदि सोचते हैं की मैं जाप कर रहा हूं मैं मैंने मैं त्याग कर दिया है मैं सन्यास लिख ग्रहण कर लिया है मैं जब कर रहा हूं मैं ध्यान कर रहा हूं या तो फिर मैं वेदांत पाठ कर रहा हूं वेदांत स्वाध्याय कर रहा हूं वेदांत का तो मैंने कर्म त्याग कर दिया है हम भजन ग्रहण करते हैं शरीर की जितनी भी क्रियाएं हैं हृदय जो धक धक करता है यह जो डाइजेशन प्रोसेस जो होती है अपने ब्रेन के भीतर में यह जो थिंकिंग प्रोसेस पता चलती रहती है यहां तक की सांस भी जो लेते हैं सब कुछ कर्म है यदि समाधि में चले जाएंगे तो कर्म रुक जाएगा किंतु समाधि में फिर तो फिर ठाकुर खुद कहते हैं ना की सारे गम का ध की नीति का कहां तक रहेंगे जो संगीत अभ्यास करते हैं उनको पता होगा की का जो राज है की जो ये है अब ज्यादातर तो ग नहीं सकते उसे लेवल के ऊपर में आपको तो नीचे ए जाना पड़ेगा तो समाधि के नीचे में जो कुछ भी होता है सब कर्म ही है किंतु फिर स्वार्थ के लिए कर्म नहीं करके निष्काम कर्म करना चाहिए सॉल्व कर देना चाहिए ईश्वर को समर्पित मनी कहता है तो क्या ऐसी चेष्टा की जा शक्ति है की जिससे अधिक धन मिले देखिए बड़े चालक है सब कुछ पूरा ठाकुर के पास क्लियर कर देना चाहते हैं की अच्छा चलो मैं कर्म कर रहा हूं तो कर्म करके वह क्या र सकते हैं ठाकुर कहते हैं की फल जो है ईश्वर को समर्पित कर दो तो अभी क्या पूछते हैं की ज्यादा थान अर्चन हो सके इस तरह का पर्यटन करना चाहिए की नहीं तो ठाकुर कहते हैं हां इस तरह की चेष्टा की जा शक्ति है जिससे की ज्यादा धन मिले किंतु यह विद्या का परिवार हो तो अधिक धन कमाने का पर्यटन करो परंतु सदुपाई से उद्देश्य उपार्जन नहीं ईश्वर की सेवा है धन से यदि ईश्वर की सेवा होती है तो उसे धन में दोष नहीं जैसे की माथुर बाबू का धन जैसे की ये जो है बलराम बाबू का धन जैसे की सुरेश मित्र का धन ठाकुर कहते हैं ये सब मेरे रसदार थे तो रसद्दार जो होते हैं वो कौन थे ठाकुर की साधना के लिए ठाकुर का यह जो मिशन है उसके लिए वे लोग धन प्रधान करते थे किंतु क्या आपके पूरे निष्काम रूप से करना चाहिए ठाकुर मां के भीतर में थोड़ा सा भी घमंड ए गया की चलो मैं ठाकुर की सेवा कर रहा हूं मेरे पैसों से ठाकुर को जो है यह सब सेवा चल रही मेरे पैसों से ठाकुर की सेवा चल रही है एक तनिक भर भी यह मां में हम घमंड आया ठाकुर फैट करके उसको झाड़ देते थे एक बार क्या हुआ था की सुरेश मित्रों ठाकुर को रुपया देते थे मतलब ठाकुर के पास में पैसा देते थे किस की यह जो सब लड़के वगैरा जो है वो ठाकुर के पास आएंगे तो फिर उनको जो भजन प्रसाद है या फिर वो रात को सोते थे वो थोड़ा बहुत जो सुविधा हो उसके लिए वे लोग उनके साथ में रहते थे थोड़ा रुपया उनको देते थे जैसे की जितने भगत है भक्तों की सेवा ठीक ठीक होती रहेगा तो अभी किसी ने जाकर के बोल दिया ठाकुर को उसे समय क्या था राजा महाराज ठाकुर के पास में नियमित रूप से रहते थे और बाकी सब लोग तो जैसे जितने भी गृहस्ती भक्ति थे या एवं लड़के भी जितने भी थे त्यागी लड़के वे लोग तो आते थे नरेन की तरह या तो फिर वो लेटो की तरह या तो फिर जो है काली महाराज की तरह शशि महाराज की तरह आते थे ठाकुर के साथ बात करते थे खानदान जी वगैरा बात करके फिर चले जा घर चले जाते थे हो पता है की एक दिन रात को रुक या दो-तीन दिन रुक ज्यादा से ज्यादा किंतु ऐसी बात हुई की राजा महाराजा ने फिर वो घर छोड़कर के वो वहीं पर आकर के रहना शुरू कर दिया ठाकुर के साथ फिर वो घर नहीं जाते थे तो ये देखकर के किसी एक भक्ति ने जाकर के ठाकुर को कहा की ये जो रखी यहां पे दिन भर राहत है नियमित यहां पर राहत है प्रतिदिन तो सुरेश बाबू को यह बात पसंद नहीं आई अभी खाने का ये आश्रय है की सुरेश मित्र ने तो जो पैसा दिया है वो तो सभी के लिए दिया है अभी जो वहां पे जो नियमित रहेगा तो इस की वो सुविधा के लिए सब पैसा खर्च हो जाएगा तो जैसे ठाकुर ने बात यह सनी उनका वो जो है टेंपर एकदम उड़ गया एकदम उनका वो एकदम गुस्सा हो गए मतलब बिगड़ गए और ऐसा उन्होंने जोर से वो गुस्सा करके कहा कौन है ये सुरेश जिसका जिसकी बालेश्वर जिसका तकिया यहां पर राहत है वही तो इसको फेक दो अभी क्या होता तथा सुरेश का ऐसा था की वह नौकरी करता था तो नौकरी से तक जाता था शाम को जब वो आता था वो नौकरी करके तो वो दक्षिणेश्वर में ठाकुर के कमरे में आसपास में उसने वह बाली शेख तकिया है वो उसने वहां पे रखा था जिससे की वो जाकर के वहां पे थोड़ा सा विश्राम करें वो फ्रेश हो जाए फिर वो घर जाए तो ठाकुर एकदम गुस्सा हो करके कहते हैं कौन है वो सुरेश जिसका मैं ये मालिश तकिया यहां पे रखा है वो फेक दो इसको कुछ नहीं चाहिए सुरेश का सब कुछ फेक दो ऐसा गुस्सा हो गए ठाकुर और सुरेश भी एकदम डर गया जब सुरेश को पता चला तो एकदम आकर के ठाकुर के पर में गिरकर के रोटी रोटी कहता है ठाकुर मैंने तो ऐसी कुछ बात कहीं ही नहीं है ये लोग तो वैसे ही बिना मतलब आपको मेरे विरोध में भड़का रहा है एक्चुअली बात ऐसी थी की राखल जो वहां पर रहते थे तो राखल की तो शादी हो गई थी और वो मनमोहन उनके वो ससुर थे तो किसी किसी को लगता था की वह लड़की की करके अपनी बीबी को छोड़कर के ठाकुर के पास राहत है तो दूसरे लड़कों के ऊपर में ये एक गलत एक इन्फ्लुएंस जाएगा जैसे बाद में ये सब बहुत हुआ था डिस्कस की आपने सुनेयस ले लिया तो आपको देख कर के दूसरे लड़के भी सन्यास करने को जाते हैं साधु होने को जाते हैं और अपने माता-पिता की सेवा को भूल जाता है तो ये झगड़ा बाद में भी हुआ था और ये भक्तों के बीच में आपस में इसको लेकर के तकरार बाद में भी हुई थी ये पहले इंस्टेंस की राजा महाराजा वहां पे र रहा है राखल र रहा है और लोगों ने बातें करना शुरू कर दी की ठाकुर के पास र रहा है वो तो ठाकुर ने वो जब सुरेश मित्र ठाकुर के पर में गिरकर के इस तरह से रोटी रोटी कहता है तो ऑफ कोर्स ठाकुर ने उसको क्षमा कर दिया बाद में भी एक बार ऐसा हुआ था ठाकुर सुरेश मिश्रा के घर पे गए थे तो सुरेश को सुरेश ने बहुत ही सुंदर बहुत ही महंगी बहुत ही अच्छे फूलों वाली माला जो है ठाकुर को पहने को वो आया आगे आया की वो ठाकुर को पहनाएंगे माला तो अभी उसे सामयिक रूप से क्षणिक रूप से उसके मां में सदन भी एक घमंड ए गया की देखो मैं ठाकुर को इतनी सुंदर माला पहने रहा हो तो जैसे ही ये हम भाव आया ठाकुर तो अंतर्यामी फैट करके वो समझ गए उन्होंने क्या किया वो सुरेश मित्रम माला पहने को ए रहा है तो माला को पकड़ करके फेक दिया अब सोचिए की सुरेश को कितना आघात पहुंचे हैं वो होगा वो सबके सामने ऐसा हुआ तो बेचारा सूरज तो एकदम आघात और वो मतलब शुद्ध हो गया और एक कोनी में बैठकर के रो रहा है यहां पे ठाकुर ने कीर्तन आरंभ किया और कीर्तन करते-करते नृत्य करते करते उनके मां में यह बात अंतर यामी है सुरेश रो रहा है उसके मां में पश्चाताप हुआ है क्षणिक घमंड और अहंकार था वह चला गया ठाकुर को पता चल गया और इमीडियाटली उन्होंने क्या किया की नृत्य करते-करते जो माला उन्होंने फेक दी थी माला को फिर से उठाया अपने गले में धरण कर लिया और फिर से नृत्य करने लगे यह बात देख कर के सुरेश के मां को एकदम सत्य मां को शांति पहुंची की हां ठाकुर ने मेरी माला ग्रहण की है वो इस बात से पता चला है ओम शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णा जय