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Sri Ramakrishna Kathamrita ·

श्रीरामकृष्ण कथामृत || 27 Oct 1882 - केशव सेन के साथ ठाकुर का नौका विहार || 4 Feb 2025

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ओम स्थापक यज धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपने अवतार वरिष्ठ राम कृष्णाय ते नमः श्री राम कृष्ण कथामृत केशव सेन के साथ में नौका विहार और आनंद और कप कथन इस चैप्टर में नवम परिच्छेद हम पढ़ रहे हैं डेट है 27 अक्टूबर तो टगा जगत क्या इतना सा है आर तुम के और तुम कौन होते हो जे जगते उपकार करबे तुम होते कौन हो जो कि तुम जगत का उपकार करोगे ताके साधने द्वारा साक्षात्कार करो ताके लाभ करो सबसे पहले साधन भजन के द्वारा ईश्वर का साक्षात्कार कीजिए ईश्वर को लाभ कीजिए ईश्वर प्राप्ति कीजिए तिनी शक्ति दिले तबे सकले हित करते पारो नचे चेत नय यदि ईश्वर शक्ति देते हैं तभी आप जगत का हित कर पाएंगे अदर वाइज नहीं कर पाएंगे एक जन भक्तो एक भक्त ने पूछा ज तो दिन ना लाभ होए ततो दिन शब कर्म त्याग करबो एक भक्त ने पूछा कि जितने दिन तक हमको ईश्वर प्राप्त नहीं होते हैं उतने दिन तक क्या हम लोग सब कर्म त्याग करेंगे श्री राम कृष्ण ना कर्म त्याग करब केनो ना कर्म आप क्यों करेंगे ईश्वर चिंता तार नाम गुणगान नित्य कर्म ई शब करते होवे ईश्वर की चिंता उनका नाम गुणगान नित्य कर्म यह सब करना होगा ब्रह्म भक्तो संसारे कर्म विषय कर्म तो वही ब्राह्मण भक्त पूछता है कि क्या संसार का कर्म करेंगे विषय कर्म करेंगे श्री राम कृष्ण हां ताओ करब संसार जात्रा जन्नो जे टक दरकार हां वह भी करो संसार निभाने के लिए संसार यात्रा के लिए जितना आवश्यक है वह सब करो किंतु कैदे निर्जन तार काछ प्रार्थना करते होवे जाते ई कर्म गुली निष्काम भावे कोरा जाए किंतु रोते रोते निर्जन में ईश्वर के पास प्रार्थना करनी होगी कि जो कुछ भी कर्म हम करते हैं वह सब निष्काम रूप से हो आर बोलवेली हे ईश्वर अर विषय कर्म कमय दाओ केनो ना ठाकुर देखी ज बेश कर्म जुट तो माई भूले जाए और रोते-रोते प्रार्थना करते करते कहना है कि निष्काम कर्म करना है उस मेरा कर्म निष्काम हो वह आशीर्वाद कीजिए और साथ-साथ में विषय कर्म जितने भी है वह सब कम हो जाए इस तरह की प्रार्थना कीजिए क्यों प्रभु मैं देखता हूं कि ज्यादा कर्मों में ज्यादा कर्म की जंजाल में फस जाने से मैं तुमको भूल जाऊंगा मने कोछी निष्काम कर्मो कोछी किंतु सकाम हुए पड़े मन में ही मन में मैं सोच रहा हूं कि मैं निष्काम कर्म कर रहा हूं किंतु वह कर्म फिर बीच में से ही कहीं पर वह सकाम हो जाता है होए तो दान सदा ब्रतो बेश कोते गए लोको मान होते इच्छा होए पड़े यदि दान और सदाव्रत बहुत ज्यादा करने को गए तो उस में ही कहीं लोकमान्य होने की इच्छा आन पड़ी शंभू मल्लिक हस्पताल डॉक्टर खाना स्कूल रास्ता पुष्कर कथा बोले छलो शंभू मल्लिक ठाकुर का एक डिवटी था और धनवान भी था तो उसने ठाकुर को कहा था कि मेरे पास में जो संपत्ति है उसमें से मैं स्कूल रास्ते पुष्कर्णी अर्थात कि तालाब यह सब बना दूंगा जिससे कि लोगों का कल्याण हो आमी बोलला सम्मुख है जेटा पडलो ना कोरले नोए सेटाई निष्काम होए करते होए मैंने कहा नजर के सामने जो आन पड़ता है जो नहीं किए बिना नहीं रह सकते जिसको करना ही पड़ेगा इस तरह के कर्मों को ही करना है और वह भी निष्काम होकर के करना है इच्छा कोरे बेश का जड़ा नो भालो नोए ईश्वर के भूले जेते होए जानबूझ कर के बहुत ज्यादा कर्मा बढ़ाने की आवश्यकता नहीं है इससे हम ईश्वर को भूल जाएंगे काली घाटे दानी कोते लाग लो काली दर्शन आर होलो ना काली घाट में गए तो दान ही करते रहे काली दर्शन हुआ नहीं हसो सभी लोग हंसने लगे आगे जोशो करे धक्का धुकी खे हो काली दर्शन करते होए तार पर दान ज तोतो करो और ना करो सबसे पहले धक्का मुक्की करके कैसे भी करके दान काली दर्शन कर लेना होता है कर लेना चाहिए उसके बाद में जितनी इच्छा दान करना है वह करो और नहीं करना है तो नहीं भी करो इच्छा होई खूब करो और यदि इच्छा होती है तो बहुत ज्यादा न दान करो ईश्वर लाभे जन्नई कर्मो ईश्वर लाभ के लिए ही तो कर्म है शंभू के ताई बोलू जद ईश्वर साक्षात्कार होन ताके की बोलवेली करे जाओ इसीलिए तो मैंने शंभू को कहा था कि जद ईश्वर का साक्षात्कार होगा तो तुम तु क्या कहोगे ईश्वर को कि मुझे कुछ अस्पताल डिस्पेंसरी बनाकर दे दो जिससे कि लोगों का कल्याण होगा क्या इसको यह सब तुम मांगोगे क्या भक्तो कखन ता बोले ना बरम बोलबे ठाकुर आमाई पादो पद्य स्थान दाओ निजर संगे सर्वदा राखो पादो पदे शुद्ध भक्ति दाओ भक्त इस तरह की बात कभी नहीं करेगा ईश्वर दर्शन होने से कि स्कूल अस्पताल बना दीजिए भक्त कहेगा कि हे प्रभु मुझे आपके चरणों में आपके पाद पद्म में शरण दीजिए मुझे हमेशा आपके साथ में रखिए आपके पाद पद्म में शुद्ध भक्ति दीजिए देखिए यह पैसेज पढ़ कर के हमको लगता है कि स्वामी विवेकानंद ने हमको जो कहा शिव ज्ञाने जीव सेवा इससे बिल्कुल ही विपरीत बात कर रहे हैं ठाकुर और हमने इस दोनों पोजीशन को एक तरह से सिस्टम करने का प्रयास भी किया है हमने देखा कि किस तरह से ठाकुर मैंने एक उसका उत्तर है कि इस तरह का भेद क्यों दिख रहा है इस तरह का डिफरेंस क्यों दिख रहा है तो एक उसका उत्तर है कि अधिकारी भेद जो सात्विक अधिकारी होते हैं जिनका मन ऑलरेडी ईश्वर के प्रति धावित हो रहा है उनके लिए सब कुछ त्याग करके सर्वप्रथम ईश्वर प्राप्त कर कर लेने की बात है और फिर ठाकुर कहते हैं जैसे कि यहां पर कि पहले तो कैसे भी करके काली दर्शन कर लीजिए उसके बाद में यदि इच्छा है तो दान कीजिए इच्छा है तो ना कीजिए इच्छा है तो बहुत सारा दान कीजिए कोई फर्क नहीं पड़ता है क्यों क्योंकि एक बार जदिया ईश्वर प्राप्ति कर लेंगे जदिया तो फिर किसी भी तरह की आध्यात्मिक अनुभूति हो जाती है तो इससे होगा क्या कि आपका पूरा जीवन ही जैसे कि समाज कल्याण के लिए हो जाएगा आप जहां पर भी रहते हैं जो कोई भी कार्य करते हैं वह सब जैसे कि उस समाज को शुद्ध पवित्र करता जाएगा जैसे कि वह व्याध की कहानी है वैसे तो कसाई खाने में वह मृत देह को काटता है किंतु फिर भी उसके पास में वह साधु ज्ञान लेने के लिए आता है तो ज्ञान प्राप्ति करके ईश्वर प्राप्ति करके में कसाई खाने में मांस भी काटता हूं मैं यदि सती सध वा स्त्री होकर के पति की भी सेवा करती हूं यदि तो मैं शिक्षक हूं बच्चों को पढ़ाता हूं जगत में मैं जो कुछ भी करता हूं वह सब कुछ पवित्र हो जाएगा अलग से कुछ सेवा करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी इसका जीवन ही जैसे कि लोगों के लिए आशीर्वाद समान है और इसका सबसे बड़ा उदाहरण हमने पहले भी डिस्कस किया था था कि स्वामी तुर्या जी महाराज जब स्वामी विवेकानंद उनको कहते हैं कि तुमको विदेश में जाकर के वेदांत का प्रचार करना होगा तो तुर आनंद जी क्या कहते हैं वह प्लेटफार्म पर खड़े रह कर के प्रवचन देना मेरे से नहीं होगा तो स्वामी जी कहते हैं जस्ट लीड अ होली लाइफ दैट इट सेल्फ इज इनफ एक पवित्र जीवन जीते जाओ वह पवित्र जीवन ही जैसे कि उस मिट्टी में से मिलकर के उस मिट्टी की सुवास को बढ़ा देगी इस तरह से हमारा पवित्र जीवन का महात्म है तो यहां पर जो ठाकुर कहते हैं वह अपनी ट्रेडिशनल स्पिरिचुअलिटी के बिल्कुल ठीक-ठाक मैच हो जाता है उसके साथ में बिल्कुल परफेक्ट इस तरह से व एक ही संबंध में वह चला आता है जबकि स्वामी जी जब यह कहते हैं कि शिव ज्ञान से जीव सेवा तो हमको लगता है कि क्या यह बिल्कुल ही डिफ तरीके की बात कही है स्वामी जी ने और यदि यह बात सही होती तो ठाकुर यह बात इसको क्यों नहीं कहते केशव सेन को देखिए यह केशव सेन और स्वामी विवेकानंद इन दोनों के बीच में कंपेयर और कंट्रास्ट कीजिए यह स्वामी जी की भी इच्छा थी कि भारत का कल्याण हो यह केशव की भी इच्छा थी भारत का कल्याण हो दोनों ठाकुर के पास में जाते थे और दोनों ने ठाकुर के पास में से उपदेश ग्रहण किए और देखने वाली बात यह है कि ठाकुर ने दोनों को वही एक ही बात बताई है सबसे पहले तो त्याग और उसके बाद में ईश्वर प्राप्ति और उसके बाद में जो करना है सो कीजिए तो केशव को भी वही बात बताई स्वामी जी को भी वही बात बताई वही है कि स्वामी जी के केस में क्योंकि स्वामी जी त्यागी थे उनके लिए त्याग का जो उपदेश था वो उसका महत्व ज्यादा था और केशव को ज्यादातर भक्ति की बात बताई है तो स्वामी जी को ज्ञान की बात बताई है द्वैत और अद्वैत द्वैत अर्थात की ईश्वर के प्रति भक्ति और अद्वैत अर्थात की आत्मन के साथ में एकाकार इव एकत्व तो इतना जो डिफरेंस है ध्व और अद्वैत का यह दो छोड़ कर के और त्याग स्वामी जी के केस में और केशव तो गृहस्थ था तो बात तो एक ही कही है स्वामी जी को इस तरह से डायरेक्ट तो कहा नहीं है कि तुम लोगों की भारत के उत्थान के लिए सब चिंता करो देखिए स्वामी जी को यह सब चिंतन करने के लिए कितना घूमना पड़ा था एक बार तो वह हिमालय चले गए हिमालय में सोच रहे हैं गुफा में बैठ करर के निर्विकल्प समाधि में चले जाएंगे किंतु वहीं बैठे हैं समाधि के लिए चेष्टा कर रहे हैं समाधि में जाते भी होंगे किंतु उनकी बहन का जो दसंवाचिनफो डिमाइज ऑफ हिज सिस्टर तो फिर हिमालय से नीचे आकर के भारत का भ्रमण करना पड़ा भारत की अव दशा देखी नजरों से देखी तब कहीं जाकर के उनको लगा कि भारत के और भारतवासियों के उत्थान के लिए कार्य करना होगा यह सोच करके कि अमेरिका से मदद मिलेगी अमेरिका गए तो वहां पर पता चला कि मटेरियल जम रूपी जो राक्षस है वोह इन लोगों को खा जा रहा है और इनके भीतर में भी कोई कोई लोग ऐसे हैं किध हु आर यर्म फॉर ए हायर लाइफ एक उच्च जीवन के लिए उनका मुमुक्षु तोव जागृत हो गया है तो तब कहीं जाकर के स्वामी जी ने उनको भी योग और वेदांत सिखाने का प्रारंभ किया अभी यह बात तो ठाकुर उनको वैसे भी तो डायरेक्ट कह सकते थे कि हां ठाकुर को तो सब तरह के दर्शन होते थे तो स्वामी जी को इतना घूमने फिरने की क्यों उनको आवश्यकता आन पड़ी क्यों उनको घुमा दिया इतना जीवन भर वो डायरेक्ट शॉर्टकट में ही बता देते कि जाओ अमेरिका जाओ और फिर वहां पर से वहां पर भी योग विदान का प्रचार करना वहां से भारत में आकर के भी यह सब करना तो यह सब नहीं करके किंतु उन्होंने स्वामी जी को यह सब अपने से एक्सप्लोर करने दिया तो ठाकुर का ऐसा था जिस तरह से ठाकुर ने अपनी खुद की डिविली अपने भक्तों के ऊपर में छोड़ा कि वे लोग एक्सप्लोर करें वे लोग सोचे समझे और वे लोग अपने से स्वीकार करें बात ऐसी नहीं है कि ठाकुर यह सब अपने मुंह से बोलते नहीं है जैसे कि वह महिमा चरण के साथ में कुछ वार्तालाप है ठाकुर को जब कैंसर हुआ श्याम पुकुर गए उसके पहले वाला जो चैप्टर है दक्षिणेश्वर का आखिरी चैप्टर उसमें ठाकुर जैसे कि आत्मप्रकाश करते-करते सब कुछ महिमा चरण को कहते हैं उस समय वहां पर मास्टर महाशय भी थे और राखल भी था तो ठाकुर ने कहा कि देखो यह कामी कांचन त्याग जो मैंने किया है यह क्या मेरी खुद की सिद्धि है इसके भीतर में और एक है उसकी यह सिद्धि है ये तीन दिन में समाधि ये तीन दिन में समाधि किसकी सिद्धि है नांग अर्थात की तोतापुरी यह देख कर के आश्चर्य चकित हो गया कहता है यह क्या देवी माया और फिर जब उसको पता चला ठाकुर यह सब उस दिन कहते हैं दक्षिणेश्वर के आखिरी दिन में कि जब नेंटा को अर्थात कि तोतापुरी को पता चला कि इसके भीतर में अर्थात कि उनके ठाकुर के भीतर में कौन है तब वह नेंटा दो हाथ जोड़ कर के कहता है कि आप मुझे यहां से जाने दीजिए तब ठाकुर कहते हैं कहते हैं कि इसके भीतर में जो है उसने कहा कि जब तक तुम वेदांत नहीं समझोगे तब तक तुम्हारा यहां से जाने का कोई उपाय नहीं है तुमको कंपलसरी यहां पर रहना होगा वेदांत का गुढा अथ समझना होगा तब कहीं जाकर के तुम यहां से जाओगे तो यह सब ठाकुर खुद कहते हैं कि क्या मेरी सिद्धि है मेरे भीतर में एक कोई एक रहता है तो देखिए कि यह सब जब ठाकुर कहते हैं तो ठाकुर को समझने वाले भक्तों का दो ग्रुप वहीं पर हो जाता है मास्टर महाशय बिल्कुल समझ गए हैं कि ठाकुर अपने अवतार क्व के बारे में बात कर रहे हैं और राखल भी वहां पर था भविष्य के स्वामी ब्रह्मानंद ठाकुर के मानस पुत्र रामकृष्ण संघ के सर्वप्रथम प्रेसिडेंट तो उन्होंने भी यह बात समझ ली कि ठाकुर कहना क्या चाहते हैं किंतु यह महिमा चरण क्या सोचता है कि वह क्या कहता है अपने मुंह से कि महाशय वो तो आपका प्रारब्ध बड़ा स्ट्रांग है इसलिए ऐसा हुआ तो मास्टर महाशय खुद कहते हैं कि क्या महिमा चरण यह समझ नहीं पा रहा है कि ठाकुर क्या कहते हैं तो देखिए कि ठाकुर इस तरह से डायरेक्ट नहीं कहते कि मैं अवतार हूं तुम लोग मुझे अवतार के रूप में स्वीकार करो किंतु इस तरह से हिंट्स देते हैं अभी ये हिंट्स को जिसने ले लिया मास्टर महाशय ने राखल ने ले लिया वह धन्य हो गए वह महिमा चरण नहीं ले पाया वह अभी ऐसा नहीं है कि उसके साथ में बुरा कुछ हुआ है किंतु जो एक उच्च आयाम एक उच्च शिखर तक पहुंचना था आध्यात्मिकता के वहां तक वह नहीं पहुंच पाएगा एक सामान्य सिद्ध साधक होकर के वह रह जाएगा उसको जन्म जन्मांतर की तपस्या करनी पड़ेगी तो ठाकुर इस तरह की हिंट्स दे देते हैं सभी को और उसके ऊपर में छोड़ते हैं कि हम कितनी हिंट्स ग्रहण करते हैं और ठाकुर के पास में कहां तक हम आते हैं ठाकुर कहते हैं कि मेरे जो भक्त हैं उनको सिर्फ दो चीज जानने की जरूरत है कि पहले तो मैं कौन हूं दूसरे की वह कौन है और फिर उनका मेरे साथ में क्या संबंध है इतना यदि जान लेते हैं उसी से उनका हो जाएगा बहुत ज्यादा साधन भजन करने की आवश्यकता नहीं है हालांकि प्रॉब्लम यही है कि ठाकुर का सही स्वरूप समझने के लिए आप को बहुत ज्यादा साधन भजन करना होगा अदर वाइज यदि साधन शुद्ध बुद्धि नहीं होगी तब हम ठाकुर का सही स्वरूप पकड़ ही नहीं पाएंगे वरना फिर क्या होगा कि मुंह से झुठ मुठ की बात करने जैसा हो गया एक औरत मां के पास में जाकर के कहती है मां उस समय उद्बोधन में थी ठाकुर की महासमाधि के बहुत सालों के बाद की बात कि वो औरत जाकर के मां को कहती है आप जगदंबा है आप ही के पास में सर्व तरह की शक्ति है आप तो ठाकुर की शक्ति है वगैरह वगैरह बहुत कुछ बोल रही है मां की स्तुति करते-करते तो मां बड़ी ही नाराज हो गई क्योंकि उनको पता चल गया मां को मां शारदा देवी को कि यह जो भक्त है महिला वह सिर्फ अपना कुछ काम निकालने के लिए मां की इस तरह की स्तुति कर रही है तो पहली बार मैंने देखा कि मां इस तरह के शब्दों का व्यवहार करते हैं बेरो खां है के आमी हैन आमी तेन य सब की बोल छो उन्नी दया कोरे निजर पादो पदे स्थान दिए छ ताई अमार भागो अर्थात की मां कहती है कि यह क्या पागल की तरह बोल रही हो कि मैं जगदंबा हूं मैं यह हूं मैं वो हूं भागो यहां से बेरो खां ग सीधी मां मां एकदम फट कर के मुंह पर बोल देती है उसके कि भागो यहां से ठाकुर ने अपने पैरों के चरण में पैर के पैरों के पास में मुझे शरण दी है मुझे आश्रय दिया है वही तो मेरा सबसे बड़ा झूट मूट की इस तरह की स्तुति करते हैं वैसे लोग भी ठाकुर और मां को पसंद नहीं है और जो लोग उनको इतनी हिंट देने के बाद में भी नहीं समझ पाते वे लोग फिर बहिरंग होकर के रह जाएंगे वे लोग अंतरंग नहीं हो पाएंगे तो यहां पे ठाकुर बड़ा स्पष्ट रूप से सब तरह की हिंट दे देते हैं कि उनका सही स्वरूप क्या है यानी दो तरह की हिंट देते हैं कि उनका सही स्वरूप क्या है दूसरा कि जगत का स्वरूप क्या है वो भी वह कह देते हैं जब वो शशर पंडित को कहते हैं कि अच्छा बताओ तुम जगत के बारे में शास्त्र पाठ तुमने जो किया है इसके बारे में बताओ कुछ तो वह पंडित कहता है कि मुझे क्या पता है यानी कि क्या है वो एक एक तरह से वो एक झूठ मूठ का एक दयनीय वाला भाव प्रकट करता है हीन भाव झूठ मुठ का कि आपके सामने मैं बोलने वाला कौन हूं तब ठाकुर कहते हैं कि देखो ठाकुर मजाक करके कहते हैं कि एक गुरु ने एक शिष्य को कहा कि मेरे लिए तंबाकू बना कर के सजा करके हुक्के में ले आओ तो तो शिष्य तामसिक था तो शिष्य ने क्या कहा कि आपके लिए तंबाकू सजाने के लिए क्या मैं योग्य हूं ऐसा बोल कर के फिर वह तंबाकू बना कर के हुक्का नहीं लाया तो अभी काम नहीं करना है तो झूठ मुठ की दनता दिखाएंगे कि मैं आपका काम करने के लिए योग्य कहां हूं तो यहां पर भी पंडित को बोलना नहीं है तो झूठ मुठ की दनता दिखा रहा है जब ने यह बात कही सब लोग हंसने लगे इसके बाद में पंडित ने कहना शुरू किया उसको भी थोड़ा सा लगा कि ठाकुर को ऐसा बोलना पड़ा मुझे बुलाने के लिए तो जो भी है उसने बोलना शुरू किया कि वो अर्थात कि ईश्वर या आत्मन या ब्रह्म वह वही जगत के उपादान कारण है वही निमित्त कारण है वगैरा वगैरा जैसे वह वेदांत में आता है कि कौन सा उपादान कारण है क्या निमित्त कारण है ये जैसे कि मकड़ी होता है स्पाइडर वह स्पाइडर अपने में से ही एक जाल निकालता है जाल के माध्यम से वह सृष्टि की रचना करता है तो वह क्या निमित्त कारण हुआ कि फिर वो उपादान कारण हुआ व वगैरह वगैरह व बहुत सारी इस तरह की वह है स्कूल्स ऑफ थॉट वेदांत में कि जगत की रचना कैसे हुई तो वह सब बोल रहा है कि जैसे कि मकड़ी के भीतर में से जो जाल निकलती है इस तरह से ईश्वर ने जगत की रचना की तो साथ साथ में ही ठाकुर ने कहा कि और भी एक है जिनी ब्रह्मो तिनी शक्ति निष्क्रिय थाक ले ब्रह्म बोली कार्ज कर ले सक्रिय थाक ले शक्ति बोली जो ब्रह्म है वही शक्ति है यदि निष्क्रिय रहते हैं तो ब्रह्म कहता हूं यदि कार्य करते हैं तो शक्ति कहता हूं वही समुंदर है उसके ऊपर में जो वेव्स होते हैं तरंगे तरंगे जैसे कि शक्ति है और समुंदर किंतु है सब कुछ वही सम सुंदर ही जब स्थिर है तो समुंदर है तरंगे आती है तो तरंगे है किंतु है तो वही पानी ही पानी के अलावा तो और कुछ नहीं है पानी शांत रहता है स्थिर रहता है या तो फिर वह तरंगित होता है इतना ही है पानी का स्वरूप स्थिर कभी तरंग में परिणत होता है पानी पानी ही रहेगा तो वैसे ही ठाकुर कहते हैं ब्रह्म शक्ति एक अभेद वही है कि जो कार्य करता है यानी कि जो जगत आप देख रहे हैं वो ब्रह मन का ही एक डायनेमिक फॉर्म है इसके अलावा और कुछ नहीं तो यह हिंट तो ठाकुर ने दे दी है अभी इस हिंट को कौन वर्क आउट करेगा केशव सेन की बुद्धि कहां तक जाती है और यह स्वामी जी की नर की बुद्धि कहां तक जाती है वो डिपेंड करता है कि कौन ब्रह्मज्ञान प्राप्त करता है क्योंकि दोनों को तो ठाकुर ने यही बात कही है कि कैसे भी करके पहले ब्रह्मज्ञान प्राप्त करो बाकी बाद में सब कुछ यहां पर स्वामी जी ने ब्रह्मज्ञान प्राप्त किया केशव नहीं कर पाया था हालांकि अपने को ब्रह्मानंद कहता था अपने समाज को ब्रह्म समाज कहता था और ब्रह्म समाज के जो सदस्य थे ठाकुर भी उनको ब्रह्मज्ञानी कहते थे ठाकुर जब जय पुकारते थे कीर्तन के आखिर में तो शाक्त की जय वैष्णव की जय सबकी जो जय करते थे उसमें ठाकुर यह भी करते कहते थे कि आजकल के जो ब्रह्मज्ञानी है उनकी भी जय अभी आजकल के ब्रह्मज्ञानी कौन तो यह सब ब्रह्म समाजी तो नाम तो ब्रह्म का देते हैं किंतु अकल बिल्कुल माने आध्यात्मिक साधना के नाम पर बिल्कुल जीरो है किसी में यह क्षमता नहीं कि साधन करके सिद्धि प्राप्त करें तो साधना करके सिद्धि प्राप्त स्वामी जी ने की थी और स्वामी जी को वह अंतिम सत्य साक्षात्कार हुआ ब्रह्म और शक्ति दोनों एक है यदि जगत का कल्याण करना है तो जगत के भीतर में में हमको ईश्वर का दर्शन करना होगा गरीब के भीतर में चंडाल के भीतर में रोगी के भीतर में इन सबके भीतर में ईश्वर का दर्शन करना होगा ईश्वर की पूजा कर रहे हैं ऐसे उनकी सेवा करनी होगी यदि आप बिना यह अल्टीमेट ट्रुथ समझे हुए जगत के लिए कुछ अच्छा करने को जाएंगे तो देखिए कि 20th सेंचुरी में हमारे सामने दो बहुत बड़े उदाहरण है एक तो है कम्युनिज्म दूसरा है नाजिम यह दोनों फिलोसोफी स्टार्ट तो हुई थी लोगों का कल्याण करने के लिए यह जो कार्ल मार्क्स है फिर एंजल्स है वगैरह लोगों ने लेनिन है स्टेलिन है माओ है इन लोगों ने क्या देखा कि उनके देश की अवस्था बड़ी ही खराब है तो देश के लिए कुछ किया जाए यह लोग सभी जबर जस्ट पेट्रियोटिक थे हिटलर को कोई यह नहीं कह सकता कि जर्मनी के उसका जो पैट्रियोटिज्म था जर्मनी के प्रति जो राष्ट्र भाव था वह कम था किसी से कम नहीं था ही वाज एक्सट्रीमली पेट्रियोटिक पर्सन किंतु पैट्रियोटिज्म को उसने एक मिस डायरेक्शन में डाल दिया वह सोच रहा है दूसरों का अ कल्याण करके हमारा कल्याण होगा तो यह जो मिसकनसेप्शन है कम्युनिज्म में भी वही हुआ नाजिम में भी वही हुआ कि यदि खुद का कल्याण करना है तो दूसरों का अ कल्याण करना पड़ेगा तो यह जो मिस कंसेप्ट उनके भीतर में गया तो उन्होंने किस तरह की महा बर्बादी इस जगत में लाकर रखी है देखिए लोगों का अपने देश का कल्याण करने को गए थे अपने ही देश को संपूर्ण रूप से बर्बाद कर दिया सेकंड वर्ल्ड वॉर के एंड में जर्मनी की जो दुरावस्था थी अभी हिटलर की पार्टी या हिटलर पावर में आया था यह देख कर के कि 1920 के दशक में जर्मनी की अव अवस्था बहुत ही बुरी हो गई थी उससे उद्धार करने के लिए हिटलर को पावर दिया गया तो वह जो अवस्था थी 1920 के दशक में जर्मनी की और यह जो सेकंड वर्ल्ड वॉर के एंड में इन दोनों के बीच में कोई कंपैरिजन नहीं है जो 19 1945 सेकंड वर्ल्ड वॉर के एंड में जर्मनी की जो दुरावस्था थी उसके कंपेयर में 1920 तो जैसे कि स्वर्ग जैसा लगेगा उतना अच्छा था माने इतना मैंने कंप्लीट डिस्ट्रॉय करके रख दिया जर्मनी को तो यही बात यह रिफॉर्म सोसाइटी के माइंड में जाती और बात तो सिर्फ रिफॉर्म सोसाइटी नहीं है बाद में इसी में से पॉलिटिकल मूवमेंट स्टार्ट होने वाली थी और यह पॉलिटिकल मूवमेंट यदि ऐसा सोचना शुरू कर दे कि बहुत बड़ी आर्मी बनाते हैं और बहुत बड़ी आर्मी बना कर के ब्रिटेन पर हल्ला करते हैं फिर आसपास के जितने भी देश है उन परे हल्ला करेंगे उन परे हमला करेंगे उनके साथ में दुश्मना वट करेंगे तो पूरा भ युद्ध में डूब जाता तो यह बात सबसे बड़ी समझने की है कि ईश्वर ही सब कुछ हुए हैं तो इसकी वजह से यदि आपके देश बांधव का कल्याण करना है तो दूसरों का अ कल्याण करके अपने देश बांधव का कल्याण आप कभी नहीं कर पाएंगे स्वामी जी अमेरिका गए भारत के कल्याण के कुछ साधन जुगाड़ करने के लिए यह सोच कर के कि अमेरी अमेरिका से यदि कुछ पैसा मिलता है आर्थिक सहाय मिलती है तो भारत में स्कूल हॉस्पिटल चलाएंगे किंतु जाकर के देखा कि उनको भी तो वही योग वेदांत की जरूरत है जो कि भारत के पास में देने के लिए है तो भारत को फिलहाल थोड़ा सा साइड पर रख कर के अमेरिका में ही उन्होंने योग और वेदांत का प्रचार करना शुरू कर दिया तो यह देखिए कि स्वामी जी के मन के भीतर में यह मामला बड़ा क्लियर है कि भारत का कल्याण करना है स्वामी जी जैसा पेट्रियट और भारत में दूसरा नहीं मिलेगा किंतु स्वामी जी यह भी नहीं करते कि दूसरों का अ कल्याण करके भारत का कल्याण होगा वही ब्रिटेन जिसने कि भारत को गुलाम बना कर के रखा था वही ब्रिटेन जो कि भारत का आर्थिक सामाजिक राजनीतिक शोषण करता था उसी ब्रिटेन की राजधानी लंडन में जाकर के स्वामी जी ने ठाकुर का मैसेज पहुंचाया है वही मां की वह फेमस घटना कि मां जयराम बाटी में है राधू और माकू ने वहां पे क्वाल पाड़ा के एक ब्रह्मचारी महाराज वहां पे मां की सेवा में जयराम बाटी में रह रहे हैं तो राधू और माकू ने कहा कि आप हमारे लिए कुछ साड़ी वगैरह लेकर के आइए तो यह महाराज जी गए और स्वदेशी कोई साड़ी लेकर के उनको दी अब यह चरखे से काती हुई साड़ी स्वदेशी वो तो मोटी होती है खद्दर का कपड़ा है तो यह दोनों कहने लगी कि अरे दादा आप यह दादा अर्थात कि बंगाली में बड़ा भाई तो दादा आप यह क्या लेकर आए हमको तो वह मिल का कपड़ा चाहिए जो कि बड़ा फाइन होता है तो यह महाराज जी बड़ा नाराज हो कर के कहे कि अरे यह विदेशी कपड़ा पहनती हो तुम लोगों को शर्म नहीं आती है भारत को आजादी दिलवाने है स्वदेशी वस्त्र पहनना चाहिए तो मां हंसते-हंसते कहती है कि अरे बेटा उनकी जद इच्छा है तो वही लाकर के दे दो ना फिर किंतु मां देखिए मां मां का जो प्रैक्टिकल विजडम कितना है मां समझ रही है कि यह जदी इस महाराज को वही ब्रह्मचारी महाराज को आखिर में कहेंगे कि तुम मिल का कपड़ा लेकर आओ तो उनकी भावना को ठेस पहुंचेगी तो मां ने क्या कहा मां ने क्या किया और किसी के माध्यम से राधु और माक के लिए मिल का कपड़ा मंगवा दिया और फिर आखिर में मां क्या कहती है कि ओराव तो हमारी छेल है माने वो विदेशी है ब्रिटिश लोग है वो भी तो मेरे ही तो संतान है तो ये ठाकुर मां स्वामी जी तीनों का है कि जो हमारा अकल्याणेंकीलम उनके प्रति भी कभी भी अकल्याणेंकीलम पत्ति छीन करके भारत का हम उत्थान करेंगे यह कभी नहीं होने वाला यह यह कांसेप्ट कि मैं जैसे ही दूसरों पर आक्रमण करूंगा उसका एक भयानक असर अपने ही देश पर होता है अपना ही समाज जैसे कि राक्षसी समाज में परिवर्तित हो जाता है यह जितनी भी मार्शल रेस है मार्शल रेस अर्थात की युद्ध करने वाली जातियां उन सबके साथ में वही हुआ है हिस्ट्री पढ़ कर के देख लीजिए जो प्रजा बहुत ज्यादा वरफेन में विश्वास करती है जैसे कि मंगोल जैसे कि हू जैसे कि यह जर्मन या इवन आज का यह पाकिस्तान वह अपने को मार्शल रेस समझते हैं हमारा युद्ध में विजय प्राप्त करने के लिए ही जैसे कि जन्म हुआ है काफिरों की हत्या करने के लिए ही जन्म हुआ है ऐसा जो मानते हैं आखिर में उनके समाज की दुरावस्था देखिए पूरा समाज भीतर से जैसे कि खत्म हो जाता है रोट हो जाता है भीतर से राक्षसी पन उनके समाज को खा जाता है तो यदि हम को इवन मेरा जो स्वार्थ साधन है देश का कल्याण उसको भी यदि मुझे करना है तो दूसरों के प्रति हित की ही मुझे अपेक्षा रखनी होगी आकांक्षा रखनी होगी दूसरों का भी हित साधन करना होगा तो यह जो डेप्थ है अंडरस्टैंडिंग वो बिना समझे जदिया लोक कल्याण वगैरह कुछ करने को जाएंगे तो यह जर्मनी जैसा एकद राक्षस हम लोग खड़ा कर देंगे जो कि दूसरों पर आक्रमण करके अपने ही देश को आखिर में गड्ढे में डाल देगा तो यह सब एक डेप्थ है वह स्वामी जी के भीतर में धीरे-धीरे करके साधन भजन ठाकुर के आशीर्वाद और उनकी खुद की बुद्धिमत्ता से प्रकट हुई जो कि उन्होंने हमको दिया भारत के हित कल्याण का एक ही मात्र उपाय है शिव ज्ञाने जीव सेवा और दूसरी बात है पूरा जगत जैसे की वही ईश्वर का बना हुआ है वही ईश्वर की साधना करके ही आप सबका कल्याण कर सकते हैं सिर्फ भारत का ही नहीं पूरे विश्व का तो यह फिलोसॉफिकल डेप्थ स्वामी जी ने हमको दी तब कहीं जाकर के आज हम शिव ज्ञान जीव सेवा या तो फिर सीरियसली कह सकते हैं कि जगत को जगत का कल्याण कैसे करना है तो यह बात आज के लिए ज्यादा योग्य है तो यह डिफरेंस है बिग डिफरेंस बिटवीन केशव चंद्र सेन और स्वामी विवेकानंद अच्छा इसके बाद में थोड़ा आगे पढ़ते हैं ठाकुर क्या कहते हैं कर्मयोग बड़ो कठिन कर्म योग बड़ा कठिन है शास्त्रे जे कर्म करते बोले छ कोली काले करा बड़ो कठिन शास्त्र में जो कर्म करने को कहा गया है वह कली काल में करना बड़ा कठिन है यह शास्त्र में जो जितनी भी विधि है यज्ञ है होम हवन है पूजा पाठ है जिसको कि संहिता पोर्शन करते कहते हैं ये शतपथ ब्राह्मण संहिता पोर्शन उसमें जितनी भी विधियां कही गई है वह सब करनी आज के कलयुग में बड़ी कठिन है अनगतला अनगतला है बेशी कर्म चले ना ज्यादा पूजा पाठ विधि करने को जाएंगे तो चलेगा नहीं यहां पर देखिए एक बात बड़ा क्लियर समझना है ठाकुर यह नहीं कहते कि सब तरह के कर्म छोड़ दो वो कहते हैं कि जो वेद में जिस कर्मों का विधान किया गया है उसको छोड़ देना है ज्वर होले कबीराज जीी चिकित्सा करते गले ईदी के रोगी होए जाए उने बुखार होने से यदि आप कविराज के पास में जाकर के कविराज कविराज चिकित्सा करेंगे तो यहां पर रोगी का मृत्यु हो जाएगा बेसी देरी सोय ना ज्यादा देरी नहीं सहन कर पाएगा रोगी वे पहले की तरह बड़ा ही स्ट्रांग बॉडी नहीं है कि बुखार बुखार हुआ है तो वो व सब सहन कर ले लंबा ट्रीटमेंट चलेगा या ट्रीटमेंट नहीं भी मिलेगा वैद्यो नारायण हरि ही औषध म जानवी तोयं तो यह औषध है गंगा का पानी और वैद्य है नारायण हरि तो यह सब करने से आज के रोगियों को नहीं चलेगा वैसे ही अनगतला है शरीर कमजोर है एकन डी गुप्त अभी चाहिए डी गुप्त अब ये डी गुप्त वहां का कोई डॉक्टर होगा तो इसकी बात ठाकुर कह रहे हैं कोली जु के भक्ति योग भगवाने नाम गुणगान आर प प्रार्थना यहां पे वह दूसरी बात ठाकुर ने नहीं कही और एक जगह पे कहते हैं ठाकुर कहते हैं दशमूल पाचन से नहीं होगा अभी फीवर मिक्सचर चाहिए अर्थात कि दशमूल पाचन आप यदि कविराज के पास में वैद्य के पास में जाएंगे तो आपको एक ट्रेडिशनल दवाई लिख करके देगा जिसको कहते हैं दशमूल पाचन अर्थात कि 10 तरह की जड़ी बूटियां इकट्ठी करके उसका बनाया जाता है है कुछ मिक्सचर अब यह जड़ी बूटियां इकट्ठी करना मिक्सचर बनाना उसका प्रतिदिन विधिवत सेवन करना यह सब करने से नहीं चलेगा अभी वो रेडीमेड आता है फीवर मिक्सचर तो यह रेडीमेड फीवर मिक्सचर खा लेना है ठाकुर इंग्लिश शब्द यूज करते हैं तो यहां पे भी अभी क जिस तरह से सतयुग में अपने पास में साधन भजन करने की क्षमता थी वो विधि विधान करने की क्षमता थी वो ध्रुव ने एक पैर पर खड़े रह कर के इतने हजारों सालों तक तपस्या की ऋषि मुनि हजारों हजारों साल तक तपस्या करते थे यह सांदीपनी मुनि के आश्रम में जाकर के भगवान कृष्ण जो तपस्या करके आए यह सब बातें वोह एकलव्य माने सिर्फ आध्यात्मिकता के क्षेत्र में ही नहीं वो एकलव्य को जब द्रोण ने कह दिया कि तुमको मैं नहीं सिखाऊंगा तो उसने जाकर के अपने से उनकी मूर्ति बना कर के मूर्ति के सामने इस तरह से उसने धनुर्वेद का अभ्यास किया कि वोह उनको गुरुदेव को यह डर लग गया कि वह अर्जुन से भी ज्यादा बेटर हो जाएगा तब कहीं जाकर के उन्होंने क्या किया क्या चालाकी की इसके पास में से हाथ का अंगूठा मांग लिया तुमको तो गुरु दक्षिणा देनी होगी मेरी मूर्ति बना कर के तुमने धनुर्वेद का अभ्यास किया है तो गुरु दक्षिणा दो तो एक लव्य बेचारा पूछता है कि क्या गुरु दक्षिणा चाहिए तो अपना अंगूठा काट करके दे दो तो उसने बिना किसी संकोच के बिना किसी द्विधा के अंगूठा काट कर के दे दिया और इतना ही नहीं वो कटे हुए हुए अंगूठे से फिर से उसने फिर से वो धनुर्विद्या का अभ्यास किया सिर्फ उंगलियों से तीर चलाना सीखा उसमें भी उसने महारत प्राप्त कर दी आज कहीं जाकर के यदि आज के स्टूडेंट को कहा जाए कि आपको स्कूल में पढ़ना है और फिर आपको यदि यह सब विद्याभ्यासम है आजकल के लैपटॉप और टैबलेट बिना उसके पढ़ो तो वो लड़का बोलेगा कि मैं स्कूल में ही क्यों जाऊं यदि मेरे पास में लैपटॉप या टैबलेट नहीं है मोबाइल नहीं है आज हमारे पास में बौद्धिक शारीरिक क्षमताएं इतनी कम हो गई है कि फुल फैसिलिटी नहीं मिलेगी तो पढ़ना ही जैसे कोई नहीं चाहता है तो इसलिए ठाकुर कहते हैं कि शारीरिक बौद्धिक क्षमता का ह्रास होने की वजह से इस कलयुग में आपको इंस्टेंट सोल्यूशन चाहिए वह अश्वमेध यज्ञ राजसूय यज्ञ व फिर यह सब करने से नहीं होगा भक्ति ही एकमात्र सार है इस युग में कलयुग भक्तियोग योग भगवान नाम गुणगान और प्रार्थना कलयुग में भक्ति योग भगवान का नाम गुणगान और प्रार्थना भक्ति योगी युग धर्म भक्ति योग ही युग धर्म है ब्रह्म भक्त देर प्रति ब्राह्मण भक्तों को कहते हैं तुमा देरो भक्ति योग तुमरा हरि नाम करो मायर नाम गुणगान करो तुमरा धनन तुम लोग भक्ति योग तुम्हारा भी भक्ति योग है तुम लोग क्योंकि हरि नाम करते हो मां के नाम गुणगान करते हो तुम लोग धन्य हो एक्चुअली देखिए कि यह लोग हरि नाम मां के नाम गुणगान ऐसा कुछ नहीं करते थे यह तो सब ठाकुर ने करवाया है ठाकुर ने कहा मां को मां जगदंबा से प्रार्थना की कि मां इन लोगों का कल्याण करो तब तो कहीं ठाकुर खुद यह बात कहते हैं कि मैंने मां को प्रार्थना की तभी कहीं जाकर के यह ब्राह्मण समाज वाले यहां से मां का नाम लेकर गए अर्थात की खोल करतार लेकर के नृत्य करते करते मां का नाम गाना यह सब तो ठाकुर ने उनको सिखाया है कि ठाकुर साथ-साथ में यह भी कहते हैं कि मां किंतु आदि समाज गेलेना अर्थात कि ये जो आदि ब्राह्मण समाज था वहां पर मां नहीं गई क्यों नहीं गई उसका भी कल हमने डिस्कशन किया था कि वही देवेंद्रनाथ टैगोर उसके पास में ठाकुर गए थे तो ठाकुर को उन्होंने मना कर दिया कि आप जद शर्ट है या उत्तरीय है वो पह पहने बिना आएंगे ब्राह्मण समाज में तो असभ्य होगी इसके लिए आप हमारे ब्रह्म समाज में मत आइए तो ठाकुर वैसे जो यह केशव सेन का ब्राह्मण समाज था वहां पर भी ठाकुर सामने से चलके गए थे व देवेंद्रनाथ टैगोर का जो आदि ब्रह्म समाज था वहां पर भी ठाकुर सामने से चल के गए थे वही है कि केशव ने ठाकुर का स्वीकार किया जबकि वह देवेंद्रनाथ ने ठाकुर को आने से मना कर दिया उसने अपने खुद के नसीब का ताला बंद कर दिया महामूर्ख आदमी जो भी है तो ठाकुर स्पष्ट कहते हैं कि यह जो लोग नाम कीर्तन करते हैं वह नाम कीर्तन मां का नाम यहीं से वे लोग लेकर गए हैं और आदि समाज किंतु मां गेलेना अर्थात कि मां जगदंबा मां का नाम गुणगान कीर्तन आदि समाज में नहीं गया क्योंकि उन लोगों में वह समझने की क्षमता नहीं थी ठाकुर की महानता को इसलिए वह ठाकुर के सामने दरवाजा बंद कर दिया मूर्ख लोग तो मादर भापी बेश तुम लोगों का भाव बहुत अच्छा है पहले तो कहते हैं ठाकुर तु मादर भक्ति योग तुमरा हरि नाम करो मायर नाम गुणगान करो तुमरा धन्य तुम लोगों तुम्हारा भी भक्ति योग है तुम लोग हरि नाम करते हो मां का नाम गुणगान करते हो तुम लोग धन्य हो तु मादर भाटी बेश तुम्हारा भाव बहुत अच्छा है वेदांत बादी देर मतो तुमरा जगत के स्वप्नवउम ज्ञानी तोमरा नो तुमरा भक्तो य ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या बोलकर के रूखे सुखे ब्रह्म ज्ञानी तुम नहीं हो तुम तो रस से भरपूर भक्त हो तुमरा ईश्वर के व्यक्ति बोलो एओ बेश तो अभी क्या है कि साकार निराकार दोनों वाद है अभी ईश्वर साकार है किंतु उनके भीतर में मतलब उनका कोई रूप नहीं मूर्ति पूजा नहीं करनी चाहिए यह इन लोगों का मानना था और यह मानना ज्यादातर तो क्रिश्चियनिटी से ही उन्होंने सीखा था क्रिश्चियनिटी का भी कांसेप्ट देखेंगे कि ईश्वर को तो वैसे व्यक्ति के रूप में ही डिपिक्ट करते हैं वह सिस्टाइन चैपल वगैरह जगह पर जाकर के वह राफा वगैरह उनका जो पेंटिंग्स आप देख लीजिए भगवान को दिखाया गया है कि जैसे वह बड़ी लंबी दाढ़ी है एक वृद्ध आदमी है वह बादलों के ऊपर में बैठा हुआ है तो ईश्वर को तो व्यक्ति के रूप में वह मानते हैं किंतु यह लोग कहते मूर्ति पूजा मत करो मूर्ति पूजा इन लोगों को नहीं अच्छी लगती तो ठाकुर कहते हैं कि अभी यह ब्राह्मण समाज जीयों ने यही सब कुछ सीखा था आंख बंद करके उठा लिया था तो ईश्वर को व्यक्ति तो मानते हैं किंतु वोह मां काली की मूर्ति की पूजा करना उनको अच्छा नहीं लगता है इसलिए ठाकुर यहां पर करते कहते हैं कि ईश्वर को तो तुम लोग ईश्वर को व्यक्ति कहते हो यह भी बहुत अच्छी बात है तोमरा भक्तो व्याकुल होए डाकले ताके अवश्य पावे तुम लोग भक्त हो व्याकुल होकर के पुकारोगे तो ईश्वर प्राप्ति अवश्य होगी अवश्य तुम लोग ईश्वर को प्राप्त करोगे तो देखिए कि ठाकुर और स्वामी जी और मां इन तीनों को हमको साथ में स्टडी करना चाहिए और साथ में ही इन सभी के कांसेप्ट को डिस्कस करने चाहिए कभी-कभी यह आश्चर्य होगा ऊपर ऊपर से देखने से कि स्वामी जी जो कहते हैं मां जो कहती है इन सबसे बिल्कुल विरोध में ठाकुर क्यों बोलते हैं या तो फिर ठाकुर की जो बातें हैं उससे विरोध आचरण मां और स्वामी जी का क्यों दिखाई देता है मां का तो हमने काफी डिटेल में डिस्कस किया था ठाकुर कहते हैं सत्य और ब्रह्मचर्य ठाकुर ने कहा मैंने मां जगदंबा को सब कुछ दे दिया मैं सत्य नहीं दे पाया तो यही मां शारदा देवी है कि जो कि ऐसा लगता है कि असत्य बोल कर के झूठ बो करके ठाकुर को ज्यादा दूध पिलाती है तो ठाकुर के जो आइडियाज है उसका इंप्लीमेंटेशन या तो फिर उसका एक्सपेंशन या तो फिर इसका फाइन ट्यूनिंग व्हाट एवर द नेम यू गिव जो भी नाम इसको देना चाहिए चाहते हैं हम लोग मां और स्वामी जी ने कैसे किया तो यह तीनों को एक साथ में जब हम स्टडी करेंगे कंपेयर कंट्रास्ट करेंगे इसके पीछे के विभिन्न तरह के उपदेशों के पीछे में कौन से विभिन्न फैक्टर्स काम कर रहे हैं वह देखने का प्रयास करेंगे तो हमारा जो अंडरस्टैंडिंग है अबाउट राम कृष्ण विवेकानंद लिटरेचर इट विल एक्सपें अ लॉट बहुत ही गहनता से हम इसके भीतर में जा पाएंगे इसके बाद में और एक फैक्टर है वह है शास्त्र शास्त्र को हम लोग लेंगे इवेंचर और वेदांत की जो कोर फिलोसोफी है द्वैत अद्वैत विशिष्ट अद्वैत इन तीनों का कंपैरेटिव स्टडी और साथ में ही ठाकुर का जो एक फाइनल अंडरस्टैंडिंग है कि ब्रह्म सत्य इन चारों को एक साथ में कंपेयर कंट्रास्ट करके एक और वेदांतिका स्टडी करें दूसरी ही और ठाकुर मां स्वामी जी के जीवन और उपदेश के आलोक में जीवन और उपदेश के प्रकाश में गीता और उपनिषद का भी अभ्यास करें ट पोर्शन हम लोग स्टार्ट करेंगे वो थोड़ा सा मुझे उसके लिए साहस जुगाड़ करना पड़ेगा किंतु वह भी हम करेंगे स्टार्ट तो आज यहीं तक कल फिर से मिलते हैं ओम शांति शांति शांति हरि ओम तसत श्री राम कृष्णर्पण मस्तु कल यहां पर सरस्वती पूजा थी जय मां अने देखले फोटो तो यहां पे वो हां हाथ खोड़ी एक उसमें क्या करना होता है वो जो राइस होता है ना एक प्लेट में राइस रखते हैं फिर उसमें आपको ओम लिखना है बच्चे के हाथ से लिखवाना है मना पहला अक्षर जो लिखेगा बच्चा तो वह ओम लिखेगा तो मैं उनका हाथ पकड़ करके उसमें ओम लिखवा रहा हूं पहले तो किंतु यह डिफरेंस डिसन करने की कैपेसिटी होनी चाहिए यदि आप डीप स्टडी करते तभी आपको डिफरेंस दिखाई देगा ऊपर ऊपर से स्टडी करने से डिफरेंस भी नहीं दिखाई देगा सो फर्स्ट ऑफ ल लेट अस कंट्रास्ट देन लेटर लेट अस कंपेयर सो कंट्रास्ट कंपेयर ये बोथ ट एनालिटिकल कैपेसिटी व शुड हैव एक्चुअली क्या है कि धर्म जो होता है वह अधिकारी भेद के अनुसार होता ही है जो उच्च अधिकारी होता है उनके लिए उच्च तरह का उपनिषद धर्म होता है मध्यम और निम्न अधिकारी के लिए उस तरह का तो वैदिक युग में इस तरह का ऑलरेडी था जो उच्च अधिकारी थे उनके लिए त्याग वैराग्य ज्ञान का रास्ता था और मध्यम निम्न अधिकारियों के लिए जिसको हम धर्म कहते हैं ना कि यह ब्राह्मण धर्म है क्षत्रिय धर्म है शुद्र धर्म है पति धर्म है पत्नी धर्म है प्रत्येक का जीवन एकदम हाईली कहेंगे कि आपका कि सिस्टेमेटाइज्ड किस तरह से रहना है विद्यार्थी को किस तरह से रहना है निम्न विद्यार्थी भी है और यदि वह विद्यार्थी धर्म का पालन करता है तो ही विल माने वोह बहुत हद तक पहुंच जाएगा इस जन्म में तो जिसको कि हम यह सामाजिक धर्म कहते हैं वह उस समय बड़े वेल थॉट आउट थे जो बीच में एक जो एक डार्क एजेस जैसा आया ना बुद्धिज्म के दौरान उस समय यह दोनों तरह के धर्मों का पतन हुआ बुद्धिज्म में ऐसा हुआ कि यह जो सामाजिक धर्म है ् समष्टि धर्म उसको हटाओ सबको यह संन्यास धर्म झूठ मूट का बिठा दो सबके सर पे व्हिच वाज द बिगेस्ट यू कैन से के डिस्टॉर्शन इन इंडियन हिस्ट्री बाद में जो कुछ भी हुआ है कि शंकराचार्य ने वेदांतिका धर्म को मने संन्यास धर्म का ज्यादा मतलब उसको प्यूरिफाई किया रिसरेक्ट किया और फिर यहां पर भक्ति मूवमेंट चला जो कि वो जो धर्मत है ना उसका एक मैंने आधुनिक स्वरूप आप कह पाएंगे आप जो कहते हैं कि भक्ति धर्म जिस तरह से वैष्ण विजम जो है करके इट इज रिलेटिवली रिसेंट फिनोमिना व्हिच इज ट्रू बट दिस इज नॉट अ न्यू फिनोमिना दिस इज द मॉडिफिकेशन ऑफ ओल्ड धर्म जो सामाजिक धर्म ज थे उसका एक मने रिफाइंड प्यूरीफाइड स्वरूप है यह वैष्ण विजम तो यह जो शंकराचार्य का ज्ञान मूवमेंट मने वेदांत मूवमेंट और यह भक्ति मूवमेंट यह दोनों ने उसी जो वैदिक एज को पुनर्जीवित करने का यह प्रयास है जिसका कि अभी यह भक्ति मूवमेंट जो है उसका भी यदि एक मने बहुत ही मॉडर्न रिफाइन स्वरूप यदि कहा जाए तो यह स्वामी जी का शिव ज्ञान है जीव सेवा तो यह शिव ज्ञान जीव सेवा यह भक्ति मूवमेंट और वह धर्म सामाजिक धर्म इन तीनों का मैंने एकदम क्लियर आपको ट्रेस कर पाएंगे हिस्ट्री और जो वह है कि सब छोड़ कर के ईश्वर प्राप्ति करना वह जो संन्यास धर्म है उसका क्लियर ट्रेस कर पाएंगे सो ट वे ल बोथ ऑफ दिस कि उच्च अधिकारी के लिए सन्यास त्याग वैराग्य ईश्वर प्राप्ति और निम्न मध्यम अधिकारी के लिए यह सामाजिक धर्म क्योंकि बिना कर्म किए यह लोग रहे नहीं पाएंगे अलते कलिते अनगतला अनगतला का अर्थ है कि बिना कर्म किए यह व्यक्ति रह ही नहीं पाएगा जबकि यदि आपको आध्यात्मिक जीवन में आगे बढ़ना है तो आपको कर्म छोड़ कर के ज्ञान की ओर जाना है तो यह ज्ञान कर्म डाकोटार के उसमें एकदम क्लियर है राइटिंग्स में बहुत बार हम लोग सोचते हैं कि शंकराचार्य कहते हैं कि कर्म के विरुद्ध ज्ञान है या तो कर्म को छोड़ कर के ज्ञान में जाना है तो क्यों स्वामी जी ऊपर से कर्म का उपदेश देते हैं तो हियर इज द सॉल्यूशन उसका कि दैट इज फॉर उच्चाधिकारी की जो कि प्योर ज्ञान में जाएंगे अनगतला अर्थात कि यह आदमी जैसे वो ठाकुर का उदाहरण है वो उनके जैसा आपने कहा ना वो ताश खेल रहा था कालीघाट पे तो वो वही सेम चीज उन्होंने देखा कि केशव सैन के वहां पर गए एक बूढ़े आदमी को देखा ताश खेल रहा है तो ठाकुर कहते हैं इस उम्र में कहीं ना भगवान का नाम लेना है कि ताश खेल रहा है तो आदमी कहता है मैं बिना काम किए रह नहीं पाता हूं व्हिच इज ट्रू फॉर मोस्ट ऑफ अस आजकल जो रेस्टस है एंजाइटी है नर्वसनेस है एक आदमी को आप 10 मिनट के लिए छोड़ दीजिए व वो फट करके मोबाइल में से वो निकाल वो पॉकेट में से मोबाइल निकाल कर के वो रिल्स देखना शुरू कर देगा माने हमारा ब्रेन पूरा करप्ट हो गया है कंटीन्यूअस आपको एक तरह का एक क्या चाहिए सेंसरी इनपुट चाहिए अदर वाइज तो आदमी पागल हो जाएगा सो दैट इज व्हाई जो कर्म के लिए अधिकारी है बेटर है कि प्यूरिफाई है कर्मा इसको इस तरह से देख सकते हैं कि एक तो है ऋषि मुनियों का धर्म जो कि त्याग वैराग्य पर आधारित है दूसरा है जनसाधारण का धर्म तो यह दोनों धर्म हमेशा से एटलीस्ट वैदिक युग में तो थे ही थे वही है कि इन दोनों धर्म अपने आप से इवोल्व हुए हैं ऋषि मुनियों का धर्म विच वास कन्वर्टेड लेटर ऑन बुद्धिज्म क्योंकि प्योर बुद्धिज्म इज अबाउट निर्वाण प्राप्ति और बाद में यह जो ठाकुर का अवैत वेदांत ठाकुर खुद अद्वैत वेदांत की प्रैक्टिस किए हैं तोतापुरी वगैरह तो वो एक इवोल्यूशन हुआ है ऋषि मुनियों के धर्म का और जनसाधारण के धर्म का भी इवोल्यूशन हुआ है वो एक युग था सतयुग था तो सब लोग अपना अपना धर्म करते थे ड्यूटी बजाते थे तो उससे उनका हो जाता था बाद में फिर यह भक्ति मूवमेंट स्टार्ट हुआ जनसाधारण के लिए और उसका अल्टीमेट यदि आज का लेटेस्ट इंकार्नेट देखा जाए तो शिव याने जीव सेवा है सो दिस इज के ये जनसाधारण का इवोल्यूशन हो हुआ नहीं इसको इस तरह से देखिए कि योग में इसको इस तरह से वाटर टाइट देने की वजह कंपार्टमेंट करने की वजह यह सोचिए कि जनसाधारण को तो एक चाहिए माध्यम चाहिए अपने विकास का तो वैदिक युग में था कि आप अपना अपना ड्यूटी कीजिए फिर यह भक्ति युग आया तो उसमें जनसाधारण को कहा गया कि यह जो ड्यूटी वगैरह है धर्म वगैरह है कहां तक आप करते रहेंगे कितने दिन करेंगे भक्ति इज अ बेटर मीडियम फास्टर पाथ अभी ऐसा नहीं है कि ऐसा कहा कि सती अपना धर्म छोड़ दे विद्यार्थी अपना धर्म छोड़ दे एड ऑन मने आपको इसको एक्सपें करना है भक्ति का कंपोनेंट ऐड करके अभी स्वामी जी का शिव ज्ञान जीव सेवा है उसमें ऐसा नहीं कहा कि भक्ति भी कितने दिन करेंगे लेट अस हैव समथिंग मोर फास्ट ट्रैक ऐसा कहा है कि अलोंग विथ भक्ति अलोंग विथ योर अदर धर्मा डू दिस आल्सो शिव ज्ञान सेवा से एड ऑन कंपोनेंट और रदर से मोर ग्रेटर रिफाइन मेंट ऑन जनसाधारण धर्मा इसीलिए इसीलिए तो दो डिवीजन है ना कि ऋषि मुनियों का धर्म है जो ऋषि मुनि में कैपेसिटी है राजयो ज्ञानयोग की साधना 24 घंटे करने की बाकी जिनका अनगतला है वे लोग तो आधा एक घंटा दो घंटा जद करे तो तो धन्य धन्य है बाकी का टाइम क्या करेंगे तो बाकी का टाइम तो आपको कर्म करना ही पड़ेगा बेटर है कि कर्म को सुसंस्कृत कर कर दे कर्म को प्यूरिफाई कर दे सो दैट इज जन साधारण धर्म तो वह है ऋषि मुनियों के लिए और ऐसा नहीं है कि ऐसा करने वालों की कमी है वही है कि वो जो दिन भर जब ध्यान कर सकते वह अपना प्रचार नहीं करते हैं तो कहां कोने में बैठे हैं क्या कर रहे हैं सुदामा जैसे बेचारे तो नरसिंह मेहता जैसे है ना उन लोगों का नाम हो गया वरना तो स्वामी जी खुद कहते हैं ना कि एक बुद्ध को सब पहचानते हैं किंतु ऐसे तो कितने हजारों बुद्ध आए और गए तो वह है कि हम को पहचानते नहीं है वो अपना आत्म प्रचार नहीं करते सो दैट इज वन पाथ और दिस इज वन पाथ हमको यह देखना है कि हम किस में आते हैं ज खाने हमारा इच्छा करते पारी जैसे कि लोगों को क्यूट करना होता है जॉब पे जाने के लिए आजकल तो लंबा-लंबा आपको ट्रेवल करना पड़ता है जॉब जाने के लिए आपको एक घंटा ट्रेवल करना पड़ेगा तो वो वहां पर भी आप बस में जा रहे हैं ट्रेन में जा रहे हैं तो आप मन में मन में जप कर सकते हैं सब जगह पर जप कर सकते हैं जप के लिए इस तरह का कोई नियम बंधन नहीं है अच्छा एक बुद्धिज्म में तो बहुत सारी मेथड्स है एक वकिंग मेडिटेशन कहते हैं जद बैठे बैठे आपको जद यह हो जाता है मतलब स्टिफैन कीजिए तो ऑल थिंग्स आर पॉसिबल बहुत बार ऐसा होता है ना मेरा एक डिवोटा के साथ बात हो रहा था तो मैंने उसको पूछा कि तुम मंदिर में जाते हो कि नहीं तो बोला कि मैं बिना स्नान किए कैसे मंदिर में जाऊ मैंने कहा अरे भाई तुम स्नान करने के बहाने मंदिर में नहीं जाओगे यार तुम मैंने तुम देखना दिखाना यह चाहते हो कि मैं बड़ा धार्मिक हूं बिना स्नान किए मंदिर में नहीं जाता किंतु तुम्हारा मंदिर में जाना इस तरह के नियम से बंद हो गया है छोड़ो इस तरह के नियम को पहले मंदिर में जाओ स्नान होता है नहीं होता है उसकी चिंता मत करो तो मैंने धर्म के नाम पे ही हम धर्म से दूर हो जाए ऐसा नहीं करना है वह एक थोड़ा सा देखना है हमको कैसे भी करके मंदिर में जाओ स्नान हुआ नहीं हुआ व सबको छोड़ो वह सब बाद में देखा जाएगा हो तो अच्छा है नहीं हो तो कोई इतना टेंशन नहीं लेना है जप करना शुरू कर दो फिर वह हमने पहले गंगाजल अपने सर पर छींटा कि नहीं ठाकुर को साष्टांग प्रणाम किया कि नहीं गायत्री मंत्र किया कि नहीं वो सब बाद में होगा होगा तो अच्छा है नहीं होगा तो भी कोई टेंशन नहीं है जब करना शुरू कर दो बस धर्म के नाम पर हम धर्म से दूर ना हो जाए यह थोड़ा देखना है