Skip to transcript
ClassesSaradakosh

Sri Ramakrishna Kathamrita ·

श्रीरामकृष्ण कथामृत || 9 Dec 1883 - श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ दक्षिणेश्वर में || 3 Apr 2025

प्रार्थना

ओम स्थापकायच धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः श्री रामकृष्ण कथामृत श्रीमद् द्वारा लिखित जिस चैप्टर का हम पाठ कर रहे हैं उसका टाइटल है दक्षिणेश्वर में श्री रामकृष्ण भक्तों के साथ में और ठन ठन में सिद्धेश्वर री मंदिर में गमन 1883 9th दिसंबर 1883 9th दिसंबर तृतीय परिच्छेद आज से प्रारंभ होगा। प्रथम और द्वितीय परिच्छेद हमारे हो गए हैं समाप्त।

ठाकुर अपने फ्री टाइम में धार्मिक पुस्तक का पाठ करते है

अभी इस परिच्छेद में एक बड़ा इंटरेस्टिंग देखिए कि मेरा खुद का ऐसा है कि हमेशा से कि देखिए कि जप ध्यान करना तो इतना आसान नहीं है। यदि हम जप करने को बैठते हैं। मान लीजिए कि हमको कहा जाता है कि धीरे-धीरे करके जप का समय बढ़ाइए। जितना समय आप जप कर सकते हैं मिनिमम 1 घंटा 2 घंटा 3 घंटा हम तो साधु हैं तो हमारे लिए तो ज्यादा होना चाहिए यह सब कभी-कभी जैसे ट्रेनिंग सेंटर में हम थे तो पूरी रात भर बैठकर के जप करते थे सैटरडे को उस रात को हम जप यज्ञ का नाम देते थे। अपने सेंटर में भी देखिए कि यह जप यज्ञ कोई-कोई सेंटर में चलते रहते हैं। हमारे यहां पे भी विशाखापट्टनम में ये एव्री सेकंड संडे ना कि ऐसा कुछ एक जप यज्ञ का आयोजन होता है और उसमें सभी भक्त आते हैं और सुबह से लेकर के दोपहर तक जप करते हैं। किंतु क्या है कि ह्यूमन माइंड ऐसा है कि थोड़ा सा समय ज्यादा बीतने से आधा घंटा एक घंटा यदि हम सतत जप करने करते रहेंगे और हमारा विल पावर इतना नहीं होगा तो हमारा मन चारों ओर भटकना शुरू कर देगा तो फिर अपने मन को ऐसी कोई सात्विक आध्यात्मिक चीज में बांध करके रखें कि वह जप भी चलता रहे और कोई इंटरेस्ट की कोई चीज है उसमें भी अपना मन बना रहे तो मेरा खुद का ऐसा है कि मैं कभी कथामृत लेकर के बैठता हूं। जप करते-करते यदि डिस्टरबेंस होता है माइंड में मन इधर-उधर भटकने लगता है तो कभी मैं कथामृत पढ़ लेता हूं। कथामृत है या तो फिर इतनी सारी किताबें हैं रामकृष्ण संघ की मां की बातें हैं महापुरुष महाराज राजा महाराज बहुत सारी किताबें हैं स्वामी जी की है स्वामी जी का मैं अवॉइड करता हूं जप करने के समय किंतु बाकी तो और भी बहुत सारी है खास करके ठाकुर और मां कि जिसको कि आप पढ़ सकते हैं आधा घंटा किया जप फिर मन यदि भटकने लगा तो थोड़ी किताब पढ़ ली और फिर से आधा घंटा किया ऐसा करके कर सकते हैं और फिर ऐसा भी होता है बहुत बार जप करने की ध्यान करने की इच्छा नहीं होती तो हम सोचते हैं कि चलो आज बेटर है कि और कहीं पर मन भटके क्योंकि आज का युग है एडिक्शन का युग। यह ईजीली पहले तो लोग चरस, गांजा, सिगरेट, धूम्रपान, फिर यह शराब यह सब चीजों का एडिक्शन हो जाता था। आजकल लोगों को मोबाइल का एडिक्शन हो जाता है। वह थोड़ा सा बैठे टाइम मिला। मैंने रास्ते से जाते हैं हम लोग तो मैं देखता हूं यहां पे हमारे विशाखापट्टनम में लाइब्रेरी है तो लाइब्रेरी बिल्डिंग जो है वो मेन कैंपस जो है वहां से थोड़ा सा दूर है तो मैं क्या करता हूं वैसे तो आश्रम के भीतर में से भी लाइब्रेरी की ओर जाने का रास्ता है किंतु मैं क्या करता हूं आश्रम के बाहर निकल कर के जो मेन रास्ता है उसके दोनों साइड में फुटपाथ है उसके ऊपर मैं चल के जाता हूं बड़ा अच्छा लगता है क्योंकि सामने ही समुंदर है। तो समुंदर देखतेदेखते मैं जाता हूं। तो अभी वह रास्ता इतना सुंदर है। वहां पे बेंच है दो-तीन। फिर वहां पे अपना मंदिर भी है। तो लोग बैठे रहते हैं। लोग इधर-उधर होते हैं कुछ। तो इन वेरिएबली जिसको भी मैं देखूंगा वहां पे वह सब अपने मोबाइल बाहर निकाल करके मोबाइल की ओर देखते रहेंगे। यहां पर मैं कभी बीच पर जाऊंगा तो देखिए कि आपके सामने अनंत विशाल समुंदर है। मॉर्निंग वॉक के लिए जाता हूं तो वहां पे वहां समुंदर के ऊपर में से सूरज निकल रहा है। कितना सुंदर लगता है। किंतु इसके बावजूद यहां पे आए हुए लोग भी समुंदर के सामने बैठकर के मोबाइल देखते हैं। इतना भयानक उनको एडिक्शन है। तो क्या है यह एडिक्शन का युग है। तो यदि हमारे लिए जो सर्वश्रेष्ठ कर्तव्य है जप करना या ध्यान करना यदि यह नहीं होता है तो सेकंड बेस्ट है रामकृष्ण विवेकानंद साहित्य का या तो फिर कोई भी आध्यात्मिक साहित्य का पाठ करना तो पाठ करते-करते आपके यदि एक आध घंटा दो घंटा निकल जाता है तो वह जप या ध्यान करने के समान ही है। ऐसा मैं लंबे समय से मानता था। अभी यदि हम ठाकुर के बारे में सोचे तो हमको लगेगा कि यह जो आम आदमियों के लिए यह सब वीकनेस है कि जप करने का मन नहीं होता तो चलो किताब पढ़े तो हम सोचेंगे कि ठाकुर के लिए तो यह सब कहां ठाकुर का मन उनकी जो संकल्प शक्ति है विल पावर है इतना भयानक है कि जब जो चाहे वह करें जप में मन बिठाना चाहे जप में मन बिठाए ध्यान में बिठाना चाहे मन तो ध्यान में बिठाए है किंतु क्या है पता है कि ठाकुर खुद एक बार कहते थे एक बार कहा है उन्होंने कि वह ध्यान कर रहा था ध्यान किंतु आलू नहीं लागो माने ध्यान मुझे नीरस लगने लगा बोलचे कि एटा एकटा कल्पना व तो नहीं माने यह एक कल्पना के अलावा और तो कुछ नहीं है ध्यान जब करते हैं तो एक एक कल्पना खड़ी करते हैं कि हां मैं ईश्वर का दर्शन कर रहा हूं ईश्वर मेरे सामने खड़े हैं कल जो हमने बात की थी एक कंस्ट्रक्ट क्रिएट करना होता है। वह कंस्ट्रक्ट माने वह जो तामसिक जगत है उसके सामने हम एक सात्विक जगत खड़ा करते हैं। मैं ईश्वर का कोई एक देह उनकी कोई मूर्ति ना कि कोई एक सिचुएशन उसके बारे में मैं एक कल्पना करके कंस्ट्रक्ट क्रिएट करता हूं। उस पर अपने मन को बिठाता हूं। तो ठाकुर खुद कहते हैं कि यह ध्यान कर रहा था किंतु नीरस लगा। यह ध्यान एक कल्पना के अलावा और तो कुछ नहीं है। यह अपने आप हो जाए तो ठीक है। मेहनत करके यह सब क्या करना? तो ठाकुर को यह सब ध्यान जप करने की जरूरत हमारी तरह नहीं थी। बात बातबात में उनका मन तो उद्दीपित हो उठता था। वह जो सूखी लकड़ियों की तरह एक चिंगारी पड़ी तो फट करके उसमें दावानल प्रगटित हो जाएगा। तो ठाकुर अपना समय कैसे बिताएंगे? हमारी तरह उनको भी क्या इस तरह से कोई समय बिताने के लिए किसी चीज का आश्रय लेना पड़ेगा धार्मिक साहित्य का ना कि वह जब अकेले बैठते होंगे तो संपूर्ण ध्यान में ही मग्न रहते होंगे। यह प्रश्न जब आता है तब उसका उत्तर हमको यहां पर मिलता है कि देखिए यह जो भक्तमाल ग्रंथ है उसका पाठ ठाकुर के घर में चल रहा है। तो मास्टर को ठाकुर कहते हैं कि भक्तमाल में से पढ़कर के सुनाओ। वह संध्या का समय है। संध्या के बाद में बैठकर के मास्टर महाशय ठाकुर को भक्तमाल में से ग्रंथ में से पढ़ के सुनाते हैं। अब यह जो भक्तमाल ग्रंथ है वह वैष्णव लोगों का ग्रंथ है और बड़ी सुंदर-सुंदर कहानियां है उसमें। तो मास्टर महाशय सुनाते हैं और ठाकुर बैठकर के सुनते हैं। तो यह एक ऐसा एक नया दृश्य हमारे सामने खड़ा होता है कि ठाकुर भी इस तरह से देखिए कि धार्मिक साहित्य का आश्रय लेते हैं। वो चाहे हमको सिखाने के लिए हो कि फिर वो क्योंकि ठाकुर के लिए क्या है कि हमारी तरह मेहनत करके तो कुछ करना नहीं। उनके लिए तो सब कुछ सहज है। तो सहज रूप से ही वह ध्यान भी कर सकते हैं। या तो फिर ध्यान करना वह भी तो उनके लिए जरूरत नहीं है। सहज रूप से ही वह ईश्वर के साथ में एकाकार हो सकते हैं या तो फिर सहज रूप से वह सामान्य तरह भी एक समय बिता सकते हैं। तो आम आदमी की तरह वह समय बिताते हैं तो वह क्या करते हैं? तो यहां पर हमको वह देखने को मिलता है। जनरली हम ठाकुर को किस तरह से देखते हैं? कि जब भी कथामृत या तो फिर लीला प्रसंग के जितने भी वर्णन है या तो फिर ठाकुर कोई साधना कर रहे हैं साधक भाव में होते हैं या तो फिर जो बाद का जो आनंद पर्व है तो भक्तों से घिरे हुए बैठे हैं और भक्तों के साथ में वार्तालाप कर रहे हैं। यही तो दो दृश्य हमने ठाकुर के देखे हैं। बाद में जब कैंसर हो गया था तो फिर वहां का पूरा एक सिचुएशन खड़ा होता है। तो ठाकुर के जो तीन पर्व चार पर्व बाल्य पर्व उसके बाद में साधन पर्व उसके बाद में आनंद पर्व और आखिर में कैंसर यानी कि जगतगुरु तो वो जो चार पर्व में हमने रेयरली ही ऐसा कोई डिस्क्रिप्शन पढ़ा है जो कि ठाकुर वैसे ही अकेले बैठे हैं अपने कमरे में और क्या कर रहे हैं ना ही कोई ऐसे भक्तगण है ना ही ठाकुर किसी के साथ ऐसा कोई वार्तालाप कर रहे हैं ना ही ठाकुर कोई साधना कर रहे हैं। उनका फ्री टाइम जैसे आजकल बोलते हैं ना कि फ्री टाइम में हम लोग क्या करते हैं? फ्री टाइम में लोग ज्यादातर आजकल तो टीवी ही देखते हैं या तो मोबाइल देखते हैं। तो यह फ्री टाइम में क्या करना है? अपने मन को किस तरह से एक उच्च विचारधारा में बांध करके रखना है। तो वह एक यहां पर हमको मिलता है और ऑफ कोर्स ठाकुर के साथ में बात सिर्फ यह नहीं है कि वह अपने लिए क्या करते हैं। उनको तो जगत के लिए आदर्श दिखाना है। ठाकुर की साधना थी वह भी आदर्श को स्थापित करने के लिए थी। वह भी शास्त्र वचन को सम्मान देने के लिए थी। और यह जो ठाकुर अपने फ्री टाइम में क्या करते हैं? वह भी हमारे लिए आदर्श स्थापित करने के लिए है। तो देखिए कि यह जो तृतीय परिच्छेद है उसमें किस तरह से यह उसका टाइटल है हरि कथा प्रसंग हरि कथा प्रसंग में हरि कथा के प्रसंग में मास्टर महाशय लिखते हैं शौंधा होइलो संध्या हुई ठाकुर श्री रामकृष्ण घरे छोटो खाट टीते बोशिया मार चिंता को करते छ श्री रामकृष्ण घर के छोटे खाट में बैठकर के मां चिंता मां जगदंबा का चिंता चिंतन मनन कर रहे हैं। क्रम ठाकुर बाड़ी ते ठाकुर दे आरती आरंभ हो क्रमशः धीरे कुछ समय के बाद में ठाकुर वाड़ी में अर्थात कि मंदिर में मां काली की और फिर यह राधाकांत की और फिर यह जो द्वादश शिव मंदिर थे वहां पे आरती प्रारंभ हुई। शंख घंटा बाजीते लागी लो शंख और घंटों के निनाद से उस संध्या का वातावरण पूरा पवित्रता से भर गया शंख घंटा बजने लगे मास्टर आज रात्रि थाकी बन मास्टर महाशय आज रात को रहेंगे रुकेंगे कालीवाड़ी में किियत खन परे ठाकुर

ठाकुर "भक्तमाल" ग्रन्थ में से राजा जयमल की कहानी का पाठ सुन रहे है.

मास्टर के भक्त माल पाठ कोते सुनाईते बोली लेन पाठ कोरिया सुनते बोलीलेन कुछ क्षण के बाद में जब यह आरती समाप्त हो गई होगी मैं अनुमान करके कहता हूं उसके बाद में ठाकुर मास्टर को भक्तमाल में से पाठ करके सुनाने को कहते हैं। मास्टर पढ़ते सेन मास्टर पढ़ रहे हैं। चरित्र श्री महाराज श्री जयमल यह श्री महाराज श्री जयमल बोलकर के जो राजा थे उनका चरित्र है। अभी मैं इसको पूरा पाठ नहीं करूंगा क्योंकि बहुत लंबी कहानी है और उसको फिर प्रत्येक सेंटेंस को ट्रांसलेट करके हिंदी में बोलना बहुत ज्यादा हो जाएगा। मैं सिर्फ तीनचार उसकी जो कड़ियां है वह बोल देता हूं। उसके बाद में फिर हम इसका जो यह जो कहानी है वह सीधी मैं आपको हिंदी में बता दूंगा। क्या है कहानी में? तो यह पहले तो मैं यह इसके कुछ लाइन पढ़ लेता हूं। पद्य में लिखा है वर्ज में लिखा है जयमल नामे एक राजा शुद्ध मती अनिर वचनीय तार श्री कृष्ण पीत भक्ति अंग याजने से शुदृढ़ नियम पाषाण रेखा जेनो नाही बेशिक कोम श्यामल सुंदर नाम श्री विग्रह सेवा ताहात ते प्रपन्नो नाही जाने देवी देवा दशदंड बेला बदी ताहार सेवाय निजुक्त तो थाक सदा दृढ़ नियम होए। इस तरह से पूरा यह है। एक्चुअली यह क्या है? कहानी में जयमल नाम के एक राजा थे जिनका कि एक बड़ा ही दृढ़ नियम था, दृढ़ व्रत था कि श्री कृष्ण की प्रीति उनकी जो श्री कृष्ण के ऊपर में श्रद्धा थी, जो भक्ति थी, जो प्रीति थी, वह इतनी दृढ़ थी कि उनको नियम के अनुसार श्री कृष्ण की सेवा पूजा करनी ही है। प्रतिदिन पाषाण के पत्थर के ऊपर में आकी हुई रेखा की तरह मिट्टी में यदि आप लाइन दौड़ेंगे अपने हाथ से तो देखेंगे थोड़ी देर में वह मिट जाएगी। पत्थर के ऊपर में यदि आप लाइन खींचेंगे तो वह ईजीली जाने वाली नहीं है। तो यह पत्थर के ऊपर में दौड़ी हुई रेखा की तरह उनका यह नियम अटूट नियम था कि 10:00 बजे तक ना ऐसा कुछ उनकी सेवा श्री कृष्ण की श्री कृष्ण विग्रह की मूर्ति की सेवा मंदिर में जाकर के करनी ही करनी है। अभी हुआ ऐसा कि वहां पर पड़ोस का एक दुश्मन राजा था। उसका इच्छा था कि जयमल राजा जयमल के राज्य पर आक्रमण करके उसके राज्य को वह हथिया ले। तो फिर उसने वह जासूस को भेज के गुप्तचरों को भेज के उसने कुछ खबर निकाला कि उसका कोई वीक पॉइंट है तो मुझे बताओ खबर लेके आओ। यह जो स्पाईक्राफ्ट आजकल जो होता है वह जो इंडिया का रो है। फिर वह अमेरिका का सीआईए है तो उस समय भी इनके गुप्तचर नेटवर्क पूरा रहता था। तो वह गुप्तचरों ने आकर के जो दुश्मन राजा है उसको खबर दिया कि हमको इसका एक वीकनेस समझ में आया है। पता चला है कि वह अपनी जो सेवा पूजा है उसका जो समय निर्धारित है किसी भी कीमत पर वह अपनी सेवा उस निर्धारित समय के दौरान छोड़कर के और कोई कार्य करेगा नहीं। यह इतना पक्का नियम है कि शायद यदि आप उसके ऊपर में आक्रमण भी कर दें तो आपसे युद्ध करने के लिए भी वह सेवा पूजा श्यामल विग्रह की छोड़ेगा नहीं। तो शत्रु राजा बड़ा खुश हो गया। उसने सोचा कि इतना बड़ा वीकनेस है। मैं यदि आक्रमण करूंगा फिर भी मेरे साथ युद्ध करने को नहीं आएगा तो तो बहुत अच्छी बात है। क्योंकि जनरली क्या होता है? राजा का सैन्य तो होता है किंतु राजा जो होता है वह होते हैं सैन्य के प्रेरणादायक। वह जब फ्रंट में रहकर के राज युद्ध करते हैं तो बाकी सब जो सिपाही होते हैं उनको उत्साह भी मिलता है। दूसरा है कि राजा स्ट्रेटजी भी बनाता है किस जो ये जो सैनिकों की टुकड़ी होती है बैटेलियंस आज की लैंग्वेज में तो किस तरह से कौन सी बैटेलियन कहां से अटैक करेगी वगैरह-वगैरह राजा की एब्सेंस में यानी युद्ध करना यानी कि जनरल की एब्सेंस में सोल्जर जाएगा फाइट करने के लिए। ऐसा है और सोल्जर्स को क्या करना है कुछ पता नहीं है जब जब तक यह जो जनरल कुछ बताएगा नहीं तो यहां पे भी वह दुश्मन राजा बड़ा खुश हो गया और जिस समय जयमल राजा पूजा कर रहा था सेवा कर रहा था श्यामल विग्रह की उस समय उसने आक्रमण किया और जैसे ही आक्रमण किया तो उसको माने उसकी जो जयमल राजा की सेना है पता नहीं वह तो कुछ प्रतिकार कर ही नहीं पाई वो सीधा यह जो राजा का जो गढ़ था फोर्ट था जयमल राजा का उसके सामने आकर के खड़ा हो गया दुश्मन राजा तो यह जो राजा जयमल की जो पत्नी है या उनकी मां है वह जाकर के राजा के पास में जाकर के रोने लगी कि अरे दुश्मन आ गया है गढ़ के सामने खड़ा है तुम जाओ उनका प्रतिकार करो वरना तो वह आकर के हम सबकी हत्या कर देंगे तो राजा जयमल कहते हैं कि नहीं श्यामल सुंदर विग्रह की सेवा करने का जो व्रत है। उसमें किसी भी तरह से किसी भी तरह का फेरफार नहीं होगा। यह पूजा का समय है। मैं पूजा ही करता रहूंगा। तो पत्नी है, मां है दोनों रो रही है कि अभी शत्रु आ जाएगा। इसकी मूर्खामी की वजह से अभी हमको मार देगा। किंतु देखिए यदि आपकी भगवान के ऊपर में इतनी दृढ़ निष्ठा है, इतना परफेक्ट आपका डिवोशन है तो भगवान खुद भक्त की भीड़ भांगने के लिए भक्त का जो मुसीबत है उसमें से उसको निकालने के लिए भगवान स्वयं अवतीर्ण होते हैं पृथ्वी पे। तो यह श्यामल सरदार स्वयं भगवान श्यामल स्वयं वो एक राजा एक सिपाही का वेश धारण करके राजा के घोड़े पर बैठे और घोड़ा लेकर के पूरे जोर से मैदान में गए युद्ध मैदान में। अभी देखिए कि थे तो यह श्यामल सुंदर अकेले सिपाही किंतु वह तो त्रिभुवन के नारायण स्वयं है। उसके सामने यह शत्रु राजा और उसकी सेना की क्या विसात है। कुछ ही क्षणों में उसने सबका वध कर दिया और यह जो दुश्मन राजा था उसको पकड़ कर के वहां पर मंदिर के सामने लाकर के पटक दिया और जो राजा का घोड़ा जयमल राजा का घोड़ा जिसके ऊपर में जाकर के उसने युद्ध किया था श्यामल सुंदर जी ने उस घोड़े को फिर से अस्तबल में बांध दिया। अभी यहां पे राजा जयमल उसको तो पता नहीं बाहर में यह सब कांड हो चुका है। उसने तो अपने नियम के अनुसार सेवा पूजा समाप्त की। फिर उसने सोचा कि अभी मैं युद्ध के मैदान में जाता हूं। तो अस्तबल में गया तो देखा कि उसका घोड़ा पूरा उसको वह पसीनापसीना निकला हुआ है। धूल मिट्टी से भरा हुआ है। तो उसने सोचा कि मेरा राजा का घोड़ा को तो बड़े ही यह लोग केयर पूर्वक बड़ा ही माने संभाल करके रखते हैं। तो इसकी ऐसी अवस्था कैसे हुई? तब तक तो दुश्मन राजा आकर के खुद इनके राजा जयमल के पैरों में गिरा और कहा कि अच्छा देखिए कि आप तो पूजा कर रहे थे किंतु आपकी जगह पे आपके घोड़े पर सवार होकर के एक ऐसा सिपाही आया युद्ध के क्षेत्र में कि जिसने कि मेरी पूरी सेना की हत्या कर दी। मेरी पूरी सेना का वध कर दिया। इतना शौर्य, इतना विक्रम, इतना पराक्रम, इतना शक्ति मैंने जीवन में कभी नहीं देखा। मनुष्य के भीतर में यह हो ही नहीं सकता है। तब कहीं जाकर के राजा जयमल को समझ में आया कि जिस श्यामल सुंदर की वह सेवा कर रहे थे वही श्यामल सुंदर घोड़े पर बैठ के युद्ध क्षेत्र में गए और शत्रु राजा का उसको पराजित करके उनके सामने लाकर खड़े किए। अभी यह शत्रु राजा भी समझ गया। गुप्तचर के जो रिपोर्ट थे वह जो जासूसों के वह तो एकदम क्लियर थे। श्यामल सुंदर पर इनकी जो भक्ति है वह इतनी भयानक है कि वह युद्ध क्षेत्र में भी सेवा पूजा के समय वह सेवा छोड़कर के पूजा छोड़कर के युद्ध क्षेत्र में भी नहीं जाएंगे। तो शत्रु राजा इतना तो मूर्ख नहीं था। वह भी समझता था कि इस तरह की भक्ति होने से भगवान स्वयं आपके ऑब्लिगेशन में आ जाते हैं। भगवान स्वयं जैसे कि आपको सहाय करने के लिए मजबूर हो जाते हैं। तो उसने फिर राजा जयमल के दो चरण पकड़े और रोना शुरू कर दिया कि आपकी कीर्ति की वजह से ही मुझे श्यामल सुंदर का दर्शन प्राप्त करने का मौका मिला। आप मेरा पूरा राज्य हर लीजिए। मेरा सब कुछ ले लीजिए। किंतु यह श्यामल सुंदर पर मेरी भी भक्ति बने ऐसा मुझे आशीर्वाद दीजिए। ऐसा करके यह पूरी कहानी होती है समाप्त। अभी इसके बाद में इसकी जो दो-तीन लाइन आखिरी है जयमल बुझिलो ए श्यामल जी कर्मो। राजा जयमल को समझ में आया। यह श्यामल जी का काम है। प्रतिजोगी राजा जे बुझिलो इहा मर्म। यह प्रतियोगी राजा दुश्मन राजा है। उसको भी समझ में आया कि इसका क्या अर्थ है। जयमोलेर चरण धरिया स्तबो को रे राजा जयमल के चरण पकड़ करके वो दुश्मन राजा स्तव कर रहा है। जाहार प्रसादे कृष्ण कृपा हलो तारे जिनकी कृपा से जिनके आशीर्वाद से भगवान कृष्ण की कृपा मुझे मिली। यानी कि राजा जयमल के वजह से ही तो ताहार शबार श्री चरण शरण आमार जिनकी कृपा से मुझे श्री कृष्ण का दर्शन मिला उनके श्री चरणों में मैं श्रवण शरण ग्रहण करता हूं श्यामल सेपाई जेनो कोरे अंगीकार वही श्यामल सिपाही जैसे कि मेरी शरणागति को स्वीकार करें पाठते ठाकुर मास्टर्य सहित कथा कहते छ पाठ के अंत अंत में ठाकुर मास्टर महाशय के साथ में वार्तालाप कर रहे हैं। अच्छा यह जो लेंथ है इसका यह पूरे पैसेज का मुझे ऐसा लगता है कि इसको पढ़ते-पढ़ते और इसको यदि ठीक तरह से पढ़ेंगे वो स्टाइल में वो जो पाठक की स्टाइल होती है मुझे लगता है आधे घंटे से ज्यादा का समय तो आराम से बीत गया होगा। तो देखिए कि ठाकुर भी अपने घर में जब अकेले बैठते हैं तो यह सब वो जो धार्मिक साहित्य को लेकर के वो रहते हैं।

चमत्कार और तर्कसंगतता - miracles and rationality - मास्टर महाशय की उलझन

अच्छा अभी यह मास्टर महाशय और ठाकुर का क्या वार्तालाप हो रहा है? श्री रामकृष्ण तुम्हारे यही सब विश्वास होए तीन शवार होए सेवा विनाश करे छिले ए सब विश्वास होए ठाकुर कहते हैं तुमको यह सब विश्वास होता है वह ठाकुर यानी जो श्यामल सुंदर स्वयं घोड़े सवार होकर के शत्रु की सेना सेना का विनाश किया यह सब तुमको विश्वास होता है तीन सवार हुए सेना विनाश कोरे छिलेन उन्होंने सवार होकर के सेना का विनाश किया था ठाकुर जो शॉर्ट फॉर्म में जो सब कुछ कहते हैं तो यह सब क्या तुमको विश्वास होता है मास्टर भक्तों व्याकुल होए डेके छिलो ए अवस्था विश्वास होए अभी देखिए मास्टर महाशय का भाई डिप्लोमेटिक उत्तर है वो अभी रैशन है तो अभी ठाकुर के साथ में रहते रहते ईश्वर है ईश्वर के दर्शन प्राप्त कर सकते हैं यह सब चीजों में तो धीरे-धीरे विश्वास आ गया है साथ-साथ में ही मास्टर महाशय ने खुद ने लिखा है यह जो शोपेनोवर वगैरह जो विदेशी पंडित जिनके भीतर में कि अश्रद्धा और यह जो इस तरह से उनके मन में घर कर गई थी। यह जो जिसको स्केप्टिसिज्म या अथेज्म कहते हैं वह इतना गहरी उसकी जड़ बैठ गई थी कि इन लोगों ने जीवन से निराश होकर के आखिर में आत्महत्या कर ली थी। यह मेरे ख्याल से शोपेन ओवर के बारे में ही मास्टर महाशय कहते हैं। देखना पड़ेगा एग्जैक्ट कौन से जर्मन पंडित के बारे में कहते हैं। किंतु जो भी है एक फेमस फिलॉसोफर वो अविश्वास की वजह से उसने आत्महत्या की। तो मास्टर महाशय कहते हैं कि क्या मुझे मुझे भी इस तरह से अविश्वास के मारे आत्महत्या करना होगा। जीवन तो निराशा से भरपूर है। दुख से भरपूर है। यह खुशी खुशी की क्षण अभी आती है। अभी चली जाती है। तो क्या मैं भी डिप्रेस होकर के आखिर में आत्महत्या कर दूं? नहीं। मुझे यह सब जर्मन पंडितों की तरह नहीं होना है। ठाकुर जिस तरह से कहते हैं कि ईश्वर पर विश्वास ईश्वर दर्शन ही जीवन का सर्वोच्च आदर्श है। मैं इसी पर विश्वास करके अपना जीवन बिताऊंगा। तो यह जो आध्यात्मिकता का जो सबसे इंपॉर्टेंट जो स्टेप है, सबसे इंपॉर्टेंट कंडीशन है, मास्टर महाशय ने, उसको तो स्वीकार कर लिया है कि ईश्वर है एक, दूसरा कि ईश्वर दर्शन हो सकता है। तीसरा कि ईश्वर दर्शन प्राप्त करना ही जीवन का सर्वोच्च उद्देश्य है। इतना तो मास्टर महाशय स्वीकार कर लेते हैं। किंतु फिर यह सब कहानियां जैसे ठाकुर बाद में ऐड करते हैं कि यदि आप श्यामल सुंदर की सेवा करेंगे निष्ठा पूर्वक तो वह खुद आकर के राजा शत्रुओं के सामने लड़ के आपको विजय प्राप्त करवाएंगे। तो यह तो थोड़ा सा स्ट्रेच ऑफ इमेजिनेशन हो गया ना। यदि रैशन माइंडसेट है वह फिर भी ईश्वर को स्वीकार कर सकता है। किंतु यह जो ईश्वर के चमत्कार को स्वीकार करना जो कि सृष्टि के नियम के बाहर में है। और दूसरा कि इस तरह से यह देखिए कि यह 19th सेंचुरी एनलाइटनमेंट था कि इसका एनलाइटनमेंट यानी कि ये पढ़ाई लिखाई का प्रकाश का युग। इस तरह का युग के जहां पे यह पुरानी-पुरानी यह जो लेजेंड्स है यह मिथ्स है या तो फिर यह जादू चमत्कार रूपी कहानियां है। वो सबको एक के बाद एक यूरोपियन लोग एक्सप्लोर करके उसके ऊपर में प्रश्न चिन्ह खड़ा करते थे। उसको रिजेक्ट कर देते थे। इसका एक सुंदर उदाहरण क्या है? पता है? यह जो मिडीवल मैप मिडीवल एज यानी कि यह जो मध्य युग था यह एक फ्रॉम द एडी 100 टू 1000 यह जो माने यह वेस्टर्न यूरोपियन कैलेंडर के अनुसार एडी100 टू एडी1000 जीसस के जन्म के बाद से 1000 साल अभी देखिए कि 2025 का साल चल रहा है। यानी कि जीसस के जन्म के 2000 साल समाप्त हुए हैं। तो यह मिडिवल एज यानी कि मध्य युग यह लगभग जीसस के जन्म के 500 साल के आसपास से चालू होकर के 100 साल के चालू होकर के अप टू 1200 ऐसा कुछ चलता है। तो वो जो मिडीवल एज था वो अंधेरे का युग यह लोग गिनते हैं। क्यों? क्योंकि चर्च का जो कंट्रोल है वह सोसाइटी के ऊपर में इतना बढ़ गया था कि फिर उसकी वजह से जो लर्निंग है, साइंस है, रैशन थिंकिंग है, वह सब जैसे कि चर्च ने कैथोलिक चर्च ने उसको अपनी पकड़ में रख के उसका गला दबा करके यह सब साइंटिफिक डेवलपमेंट उन्होंने रोक दिया था। बाद में फिर यह जैसे रेनेसा स्टार्ट हुआ, रिफेशन स्टार्ट हुआ, यह एनलाइटनमेंट, इंडस्ट्रियल रिवोल्यूशन, यह गैलीलियो, कॉपरनिकस, न्यूटन यह सबका आना प्रारंभ हुआ। और फिर से रिब्थ ऑफ लर्निंग स्टार्ट हुआ। तो यह रिब्थ ऑफ लर्निंग वाला जो युग है उसमें भी खास करके यह जो एज ऑफ एनलाइटनमेंट यह 19th सेंचुरी कि यह साइंस के रिलेटेड जितना भी अंधश्रद्धा थी कि हां यह पवन क्यों बह रहा है? क्योंकि पवन के एक देवता है। यह सूरज ये पूरी पृथ्वी की चारों ओर क्यों घूम रहा है? क्योंकि सूरज के एक देवता है। यह कोई यह बीमारी क्यों आ गई? प्लेग क्यों आ गया? या तो प्लेग के एक देवता है या तो फिर शैतान इसके पीछे है या तो फिर यह दायन यानी कि विच इसके पीछे है तो ऐसा सब जो अंधकार भय जो कि इररेशनल थिंकिंग था माइथोलॉजी जो थी उसको काट काट करके प्लेग है तो प्लेग के पीछे में उसका वायरस है फिर यह जो सूरज पृथ्वी के आसपास नहीं घूमता पृथ्वी सूरज के आसपास घूमती है एस्ट्रोनॉमी बायोलॉजी फिजिक्स केमिस्ट्री नेविगेशन जितने भी क्षेत्र है। सभी क्षेत्रों में यह रैशन साइंटिफिक थिंकिंग फैलने लगा था। और इसका बड़ा सुंदर उदाहरण क्या है? तो मैप यानी कि नक्शा। यह मिडीवल एजेस के नक्शे देखिए। तो यूरोप का थोड़ा बहुत ठीक-ठीक आपको देखने को मिल जाएगा। किंतु यूरोप से जैसे थोड़ा सा दूर जाएंगे। अमेरिका नॉर्थ अमेरिका साउथ अमेरिका था ये तो उनको पता ही नहीं था। यानी कि दुनिया के एक कोने में देखेंगे तो यूरोप है। फिर यूरोप के नीचे में अफ्रीका दिखाई देगा। किंतु अफ्रीका का नक्शा भी यह इजिप्ट वगैरह उन्होंने एक्सप्लोर किया है। किंतु इजिप्ट के नीचे क्या है ज्यादा कुछ पता नहीं है। यानी कि अफ्रीका का नॉर्थ अफ्रीका आपको ठीक-ठीक दिखाई देगा। साउथ अफ्रीका, सेंट्रल अफ्रीका बिल्कुल गड़बड़ दिखाई देगा। कभी होंगे ही नहीं और है तो विचित्र ढंग से दौरे हुए हैं। फिर यहां पर थोड़ा सा आएंगे ईस्ट में तो इंडिया तो ठीक-ठाक दिखाई देगा किंतु फिर उसके थोड़ा सा आगे जाएंगे चाइना वगैरह माने है कि भी नहीं है पता नहीं और उसका जो आकार है शेप है बड़ा बेढंगा आकार से वो दौड़े हुए दिखेंगे और जहां पे समुंदर है वहां पे एक राक्षस दिखाई देगा कि इस समुंदर में यहां पे यह राक्षस है इस समुंदर में यह राक्षस है देयर बी मॉन्सर्स वहां पे राक्षस है ऐसा नक्शे में ही लिखा है दिखाई देगा किंतु तो फिर जैसे-जैसे यह एज ऑफ एक्सप्लोरेशन स्टार्ट हुआ एक के बाद एक यह जो ग्रेट सेलर्स थे उसमें से यह अमेरगो जिसके नाम से यह अमेरिका का नाम आया है। फिर यह अपना यह गैलीलियो फिर यह वास्कोडि गामा फिर यह मेजेलान यह ग्रेट सेलर्स ग्रेट नेविगेटर्स पूरी पृथ्वी का भ्रमण करके उन्होंने खोज निकाला कि यह जो कहते हैं कि यहां पे राक्षस है, वहां पे राक्षस है। अफ्रीका इज़ ए डार्क कॉन्टिनेंट। वहां पर पता नहीं किस तरह का सब अद्भुत अद्भुत होता है। इष्ट में पता नहीं जादू चमत्कार होते होंगे। यह जो ग्रेट खान ग्रेट मुगल ये भारत में जो राज्य करता है। फिर वहां का वो जो ग्रेट चाइनीस एपरर इन लोगों के पास जादुई शक्ति होगी। पता नहीं क्या होगा। किंतु वो ग्रेट खान को भी मिल लिया। उसको भी युद्ध में हरा दिया। यह जो चाइना का एपरर है उसका भी पिटाई कर दिया और पूरे जगत पर राज कर लिया। पूरा जगत के जितने भी कॉन्टिनेंट है एवरेस्ट चढ़कर के देख लिया। कहां पे भी जादू चमत्कार राक्षस ऐसा कहीं पे कुछ नहीं है। भूत पिशाच पलीत जिसकी कहानियां इतने सालों से सुनते आ रहे हैं। ना ही कहीं पे हमको नहीं मिला है। सात समुंदर खोज करके देख लिए। नॉर्थ ये जो नॉर्थ पोल है साउथ पोल है। आर्कटिक अंटार्कटिक यह नॉर्थ अमेरिका साउथ अमेरिका जो कि नक्शे में ही नहीं था। किसी को पता ही नहीं था कि यह है। वह सब एक्सप्लोर करके देख लिया। कहीं पर भी भूत, पिशाच, जादू, चमत्कार देखने को नहीं मिले हैं। और साथ-साथ में ही यह जो साइंटिफिक रैशनलिज्म उसने इतना प्रोग्रेस किया है कि अभी कहीं पे भी आपको इस तरह की मिथ्स है, लेजेंड्स है, यह सब कहीं पे देखने को नहीं मिलेगा। ना ही कोई इसको स्वीकार करेगा। यह जो नरेंद्र कहता है ना कि चातक पक्षी सिर्फ स्वाति नक्षत्र का पानी ही क्यों पिएगा? इस तरह का तो कोई पक्षी है ही नहीं। वह सब तरह का पानी पीता है। तो ठाकुर कैसे बेचारे टेंशन में आ गए थे? किंतु नरेंद्र की बात भी देखिए कि आज का जितना साइंटिफिक लिटरेचर है उसको खोल करके देख लीजिए। ठाकुर ने जिस तरह के पक्षी का वर्णन किया है कहीं देखने को नहीं मिलेगा। वो होमा पक्षी कि जो कि बहुत ऊपर में आकाश में उड़ता है। फिर उसका अंडा गिरता है। फिर अंडा आकाश में से ही टूटता है और उसका बच्चा प्रकट होता है और बच्चा उड़कर के अपनी मां के पास में चला जाता है। आज की दृष्टि से देखेंगे तो कंप्लीटली इररेशनल लगेगा। क्यों? क्योंकि आज उस समय पता नहीं उतना ऊपर आप उड़ेंगे तो ऊपर में से नीचे आते-आते अंडे को गिरते पता नहीं कितना टाइम लगेगा। आज तो लोग कहां से जंप लगाते हैं? एरोप्लेन में से लोग पैराशूट पहन के जंप लगाते हैं। हमको आज प्रिसाइज कैलकुलेशन पता है कि यदि कोई भी पंखी जो उसका हाईएस्ट उड़ान जो है वो कहां तक उड़ सकता है। जहां तक एटमॉस्फियर घना है वहां तक ही हमको पता है कि जैसे-जैसे आप ऊपर में जाएंगे आकाश में एटमॉस्फयर पतला होता जाएगा। जैसे कि आप एवरेस्ट वगैरह बड़े पहाड़ पर क्लाइंबिंग करते हैं तो आपको यह ऑक्सीजन मास्क लेकर जाना पड़ता है। क्यों? क्योंकि हवा पतली हो जाती है। सांस लेने के लिए हवा नहीं है। तो वहां पर पक्षी उड़ ही नहीं सकता। उड़ने के लिए जो उसको जो हवा का यह जो यह चाहिए बफर वो मिलता ही नहीं है। तो पंखी हाईएस्ट कहां तक उड़ सकता है वो भी आप कैलकुलेशन कर सकते हैं। वहां से अंडा गिरेगा तो पृथ्वी पे ज्यादा से ज्यादा कितनी देर में गिरेगा। वो आधे घंटे से ज्यादा टाइम नहीं लगेगा। तो और ऐसा एक भी पक्षी नहीं है जिसके बारे में साइंस कहता हो कि आधे घंटे में ही आधे घंटे से कम समय में ही वह अंडा में से बच्चा तैयार हो के बाहर आ जाएगा। जनरली अंडे में से बच्चे निकलने को कितना टाइम लगता है? मुझे एग्जैक्ट पता नहीं। अनुमान करके मैं कहता हूं। एक सप्ताह दो सप्ताह लगेंगे तो यह तो बहुत लंबा समय है। ऐसा कोई भी ऊंच ऐसी एक भी ऊंचाई नहीं है जहां से अंडे को गिरते एकद सप्ताह लगे। ज्यादा से ज्यादा आधे से एक घंटा लगेगा। तो देखिए कि यह सब कहानियां है। हम ठाकुर पे तो पक्का विश्वास करते हैं। यह जो ब्राह्मण है, आत्मन है उसके ऊपर में अविद्या का आंचल फैल करके फिर यह ईश्वर होते हैं। जीव जगत होता है। यह जो सुपरकॉन्शियस, सबकॉन्शियस, कॉन्शियस यह सब जो है जो कि प्योरली स्पिरिचुअल फिनोमिना है। इस पर विश्वास करने में हमको कोई दिक्कत नहीं है। किंतु फिर यह सब जो बाकी का एक्स्ट्रा एक्स्ट्रा सब ऐड करते हैं, तब वहां पर डाउट खड़ा होना शुरू होता है कि यह सब कहानियों की वजह से ही तो भारत में एक ऐसी अंधश्रद्धा फैल गई थी कि जहां पर यूरोप में यह वैक्सीन खोज रहे थे, हम लोग वह शीतला माता को दिखा रहे थे। तो बोलकर के 1000 साल की गुलामी हमारे नसीब में पड़ी। यह जो वहां से वह 1000 यूरोपियन ना कि आधे हजार यूरोपियन आकर के यह 30 करोड़ लोगों के ऊपर में राज करके चले गए और हम भी बिल्कुल वह भेड़ बकरी की तरह उनके सामने असहाय होकर के बैठे रहे। यानी कि यह जो इतिहास है पिछले कुछ सालों का पिछली कुछ सेंचुरीज का वो हमको बड़ा ही अलर्ट कर देता है कि देखिए कि स्पिरिचुअलिटी तो एक चीज है किंतु यह जादू चमत्कार है भैया इससे दूर ही रहो प्योर साइंस रैशनलिटी के बेस पर बात करो तो यहां पे जब ठाकुर इस तरह का प्रश्न करेंगे देखिए कि वह अपना केशवसेन भी बड़ा चालाक था तो एक बार वो केशवसेन वहां पे आया दक्षिणेश्वर में और फिर ठाकुर का ऐसा है कि वो चलो उसने ठाकुर ने कहा कि तुम चांदनी में खड़े रहकर के वक्त वक्रता दो मैं सुनूंगा। तो वह चांदनी यानी कि गंगा के ऊपर का जो घाट है वहां पर खड़े रहकर केशव ने एक स्पीच दिया। उसके बाद में ठाकुर सबको क्या कहते हैं? तुम लोग तो यह सब जो फनेटिसिज्म जो है ना तुम लोगों में कि यही सही, यही गलत ऐसा नहीं। सबको स्वीकार करो। सभी एक-एक रास्ते हैं। और उसके बाद में ठाकुर क्या कहते हैं कि अच्छा तुम लोग सब एक साथ में बोलो भागवत भक्त भगवान यानी कि जो भक्त है जो भगवान है और जो भगवान का ग्रंथ है भागवत वो तीनों एक ही है। तो यह लोग भी चलो कि ठीक है जो रामकृष्ण देव का जो महत उदार भाव है कि कोई भी धर्म ऐसा कहना ठीक नहीं है कि हम ही श्रेष्ठ है बाकी सब निम्न है जो सभी को इक्वल रिस्पेक्ट देना चाहिए सभी तो ईश्वर प्राप्ति के लिए एक-एक रस्ते हैं तो सबने बोला अच्छा ठीक है चलो सभी ब्राह्म भक्त एक समस्वर है एक साथ में उच्चारण करते हैं भागवत भक्त भगवान ठीक है उसके बाद में किंतु ठाकुर कहते हैं कि गुरु कृष्ण वैष्णव यानी कि गुरु यानी कि आपके जो टीचर है वह कृष्ण यानी कि जो आपके इष्ट है वह और वैष्णव यानी कि जो भक्त है ये तीनों एक है ऐसा बोल के बोलो अभी तुम लोग सब नारा लगाओ गुरु कृष्ण वैष्णव तब वो केशवसेन हंसते-हंसते कहता है कि नहीं महाशय इतना दूर हम नहीं जाएंगे लोकेरा आमादेर गोंडा बोलवे है यानी कि गोंडा अर्थात कि एक खास प्रकार का वैष्णव फनेटिक माइंडसेट उन उन लोगों का है कि हम ही लोग सही बाकी लोग सब गलत ये इन लोगों का फिर यह शाक्त के ऊपर में बड़ा क्रोध रहता है तो यदि ठाकुर यदि कहेंगे अच्छा ठाकुर का तो इंटेंशन ऐसा कोई फनेटिसिज्म वाला नहीं था वो ऐसा नहीं कहना चाहते थे कि माने वैष्णव धर्म ही सही बाकी सब गलत वो तो कहना चाहते थे कि गुरु कृष्ण और जो भक्त है वैष्णव इन तीनों में भी यूनिटी है किंतु उसका जो वाइडर इंप्लिकेशन है इस शब्द का कि समाज में यदि जाएगा तो लोग कहेंगे कि यह लोग भी वैष्णव हो गए हैं। तो इसलिए केशव ने हंसते-हंसते कह दिया कि महाशय अभी हम इतना दूर तक नहीं जाएंगे। गुरु कृष्ण वैष्णव कहने की दूर तरह क्यों? क्योंकि लोग हमको गोंडा कहेंगे। वह एक खास तरह का फनेटिक वैष्णव करके पुकारेंगे। तो यहां पे क्या है कि ठाकुर ठाकुर का ऐसा कोई इंटेंशन नहीं है कि लोगों के भीतर में अंधश्रद्धा को बिठाना। किंतु ठाकुर कभी-कभी ना ऐसा लगता है कि टेस्ट कर रहे हैं कि वो जैसे शायद हो सकता है कि केशव का टेस्ट कर रहे हैं। यहां पे हो सकता है कि मास्टर महाशय का टेस्ट कर रहे हैं। तो इसलिए यहां पे ठाकुर पूछते हैं मास्टर महाशय को कि तुम्हारे यही सब विश्वास होए। तुमको क्या यह सब विश्वास होता है? वह सवार होकर के सेना का विनाश किए थे। यह विश्वास होता है? तो मास्टर महाशय डिप्लोमेटिक उत्तर देते हैं। कहते हैं भक्तों व्याकुल होए डेके छिलो ए अवस्था विश्वास होए। भक्त ने व्याकुल होकर के ईश्वर को पुकारा था। इस अवस्था पे विश्वास होता है। ठाकुर के शोबार ठीक देखे छिलो कि ना ये सब बुझते पारी ना। यह जो भगवान स्वयं सवार घोड़े सवार होकर के शत्रु का विनाश करने के लिए रण मैदान में आ पहुंचे। वो ठीक-ठीक उसने देखा कि नहीं यह सब मुझे समझ में नहीं आता। ठाकुर के सवार देखे छिलो कि ना सब बुझते पारी ना ठाकुर को सवार ठाकुर यानी कि यह ठाकुर नहीं वह भगवान कृष्ण रूपी ठाकुर उनको सवार ठीक ठीक देखा था कि नहीं यह सब समझ समझ नहीं सकता हूं तीन सवार होए आस्ते पारे तभी ओरा आंखें ठीक ठीक देखे छो की ना जानी ना बोले वो सवार होकर के आ सकते हैं किंतु फिर यह जो शत्रु राजा है उस उसने उनको ठीक ठीक देखा था कि नहीं यह मुझे नहीं पता है यानी कि देखिए कि मास्टर महाशय ने कैसा डिप्लोमेटिक उत्तर दे दिया। उन्होंने यह नहीं कहा बिकॉज़ कि यह पूरा जो मॉडर्न रैशन माइंडसेट है यूरोपियन एनलाइटनमेंट का थिंकिंग वह मास्टर महाशय के पीछे में है और इसी की वजह से और फिर क्या है देखिए इन लोगों का इंटीग्रिटी होता है ना जैसे हमने नरेंद्र के बारे में भी बात की थी वो ब्राह्मो समाज के प्रतिज्ञा पत्र पर साइन किया है उसमें ऐसा है कि निराकार ईश्वर को मानना है और मूर्ति पूजा नहीं करनी है। तो अभी जब वह मूर्ति पूजा यानी कि यह मां काली को जब नरेंद्र ने स्वीकार किया तो उसके पीछे बात सिर्फ यह नहीं है कि वह ठाकुर से प्रभावित होकर के स्वीकार कर लिया है। या तो फिर ऐसा भी नहीं है कि इसके ऊपर में विश्वास हो गया तो ब्राह्म समाज का प्रतिक्रिया पत्र उसको उठा के माने लिटरली नहीं मेटाफोरिकली अपने माइंड में उसको फाड़ करके फेंक दिया। यह जो कमिटमेंट होता है इन लोगों का मास्टर महाशय है, नरन है तो इतने इंटीग्रेटेड इनका ऑनेस्ट पर्सनालिटी होता है कि यह जो कमिटमेंट है वो फटाक करके ये लोग तोड़ेंगे नहीं। फिर तो आपको बहुत सारा कुछ टेस्ट में से गुजरना होगा। सभी चीजों को टेस्ट करके करके उसको प्रूफ करके करके फिर यह जो अगेन रैशनलिस्टिक यूरोपियन साइंटिफिक थिंकिंग कि एक्सपेरिमेंट करो। एक्सपेरिमेंट में प्रूव होता है तब कहीं जाकर के उसको स्वीकार करो। तो यह पूरी प्रोसेस से गुजरे थे स्वामी जी तब उन्होंने मां काली को स्वीकार किया था। यहां पे भी मास्टर महाशय को देखिए कि ठाकुर की सभी बातों को स्वीकार तो कर लेते हैं किंतु उनमें भी एक एक क्वेश्चनिंग एटीट्यूड है। उन्होंने पहले ही दूसरी ही मुलाकात में जो ठाकुर के साथ में वाद विवाद हुआ था। वह कहते हैं काला दूध सफेद हो सकता है कि नहीं। फिर वह कहते हैं कि वो कोलकाता के लोगों को जाकर के समझा देना होगा कि यह वो लोग मूर्ति की प्रतिमा की पूजा नहीं वह चिन्मय मूर्ति की प्रतिमा पूजा करते हैं वगैरह-वगैरह जो वाद-विवाद हुआ था वहां पे ही मास्टर महाशय ने किंतु लिख दिया है कि यह ठाकुर के साथ में तर्क करने का दरवाजा हमेशा के लिए यहां पे बंद हो गया। तो यहां पर देखिए कि मास्टर महाशय किस तरह से उत्तर देते हैं। ठाकुर के साथ में तर्क नहीं करते हैं। तर्क करने का दरवाजा तो हमेशा के लिए बंद हो गया है। सेम टाइम उनकी जो इंटीग्रिटी है वो इंटीग्रिटी उनको ठाकुर की बात को आंख बंद करके स्वीकार भी नहीं करने देती है। तो इन लोगों का जो यह देखकर के हमको लगता है ना कि यह लोग जब यह यह लोगों ने जब ठाकुर को स्वीकार किया मास्टर महाशय नरेंद्र राजा महाराज तो फिर इन्होंने सच में सही में कुछ ना कुछ गंभीर रूप से देखा होगा तभी तो उन्होंने इनको स्वीकार किया है। तो इसलिए मास्टर महाशय वहां पर डिप्लोमेटिक उत्तर देते हैं कि भक्त व्याकुल होकर के भगवान को पुकारता है यह तो मैं स्वीकार करता हूं। किंतु फिर यह जो भगवान स्वयं घोड़ेसवार होकर के आकर के सेना का विनाश करते हैं, यह मुझे समझ में नहीं आता। फिर जिन्होंने इस तरह के घोड़ेसवार को देखा है, उन्होंने ठीक-ठीक देखा है कि नहीं, वह भी पता नहीं। हो सकता है कि वह राजा का ही सेनापति हो, जयमल राजा का ही सेनापति हो जो कि इतना वीर हो और अपने राजा के प्रति उसकी निष्ठा भी इतनी हो कि उसने जाकर के शत्रुओं की सेना का संहार किया हो। हु नोज़ किसको पता? इसलिए यहां पे ठाकुर मास्टर महाशय इस तरह का उत्तर देते हैं। तो ठाकुर क्या कहते हैं? श्री रामकृष्ण साहस्य श्री रामकृष्ण साहस्य कहते हैं बोई खानी ते बेश भक्तो देर कोथा आज इस किताब में भक्तों की बड़ी सुंदर-सुंदर बातें हैं। यह जो भक्तमाल ग्रंथ है उसमें तब एक घे है किंतु एक ही तरह की है और उनका जो पॉइंट ऑफ व्यू है वो बड़ा रिस्ट्रिक्टेड है। जादेर अन्नोमोत तादेर निंदा आज है। जिनका अन्य मत है उनकी निंदा है। देखिए यह जो केशव सेन कहता था ना कि वह गुरु कृष्णव बोलने से लोग हमको गोंडा कहेंगे, फेनेटिक कहेंगे। तो इसके पीछे में देखिए कि यह बात ठाकुर भी स्वीकार करते हैं कि भक्तमाल जो कि वैष्णव का ग्रंथ है। भक्तों की बात तो बड़ी सुंदर-सुंदर है। किंतु फिर एक ही तरह की है। एक ही रिस्ट्रिक्टेड व्यू पॉइंट की है कि जो हमारा धर्म कहता है वही सही और बाकी सब गलत। अच्छा। किंतु यहां पे एक इंपॉर्टेंट चीज क्या है? पता है ठाकुर ने प्रश्न तो किया कि तुमको यह सब विश्वास होता है कि नहीं और मास्टर महाशय का उत्तर उन्होंने सुन भी लिया किंतु ऊपर में अपना कोई कमेंट नहीं किया यानी कि अभी हमको प्रश्न होगा कि ठाकुर खुद इस सब चीजों को स्वीकार करते हैं कि नहीं क्योंकि अभी देखिए ठाकुर का जो जनरल माइंडसेट है वह तो हमको पता है। ठाकुर कहते हैं कि ईश्वर क्या कर सकते हैं, क्या नहीं कर सकते हैं? उसके बारे में किसी भी तरह का तर्कवतर्क करना किसी काम का नहीं है। यह जो जिसको हम स्पेस टाइम एंड कोजालिटी कहते हैं जनरल फिजिक्स की लैंग्वेज में कि विदिन दिस फ्रेमवर्क विद इन दिस लॉज़ ऑफ ग्रेविटी, लॉज़ ऑफ एक्सीलरेशन, लॉज़ ऑफ डायनेमिक्स, लॉज़ ऑफ क्वांटम फिजिक्स इसी के भीतर में यह जगत चलता है। यह अनु यह हम ईश्वर के बारे में नहीं कह पाएंगे। और वह जो फेमस कहानी है वर्ल्ड फेमस कहानी कि वह मथुर बाबू के साथ में ठाकुर का इसी तरह से आर्गुमेंट हुआ था। मथुर बाबू कहते हैं कि ईश्वर को भी अपने नियम के अनुसार चलना होगा। यानी ईश्वर भी ऐसा कोई चमत्कार नहीं कर सकता है। ऐसा कौन सा लॉ ऑफ़ फिजिक्स है कह सकता है कि एक ही व्यक्ति जा करके पूरी सैन्या का खात्मा कर दे। वो इस तरह का बहादुरी तो कभी इतिहास में सुना नहीं है और फिर दूसरा है कि उसके लिए जो स्टेमिना चाहिए स्ट्रेंथ चाहिए कभी किसी व्यक्ति में देखा नहीं है और फिर ईश्वर स्वयं आकर के देह धारण करें जो सूक्ष्म है स्पिरिचुअल फॉर्म में है मटेरियल फॉर्म कैसे धारण करेंगे यानी कि फिजिक्स की दृष्टि से यह असंभव है और ईश्वर को भी अपने हाल आप बोल सकते हैं कि फिजिक्स केमिस्ट्री बायोलॉजी क्वांटम डायनेमिक्स रिलेटिविटी मैथमेटिक्स इसकी रचना ईश्वर ने की है। किंतु फिर इसकी रचना करने के बाद में ईश्वर स्वयं इसको भांग नहीं सकते। वो जो मथुर बाबू का जो आर्गुममेंट था तो ठाकुर कहते हैं कि देखो जिसने सृष्टि की रचना की है वह सृष्टि के परे जाकर के सृष्टि के नियम को तोड़कर के भी कार्य कर सकते हैं। और फिर वो जो बात हुई कि क्या एक ही पेड़ के ऊपर में सफेद फूल और लाल फूल कैसे हो सकता है? तो उसके माने योगानु योग देखिए कि उसके दूसरे तीसरे दिन ही ठाकुर को वह पेड़ भी मिल गया डाल भी मिल गई वो जवा के फूल जासवंत के एक ही पेड़ के ऊपर में दो रंग के जासवंत थे लाल और सफेद व्हाटएवर कलर में भूल गया दो कलर के फूल जासवंत के एक ही पे डाल पे उनको देखने को मिले तो वह डाल तोड़ के मथुर बाबू के पास में आए कहा कि देखो ईश्वर यह देखो तुम कह रहे थे ना कि एक ही डाल पे दो तरह के फूल रंग के फूल नहीं हो सकते देखो देखो इस पे दो रंग के फूल है तो वह मथुर बाबू ने भी स्वीकार कर लिया। हां ईश्वर अपना नियम तोड़ सकते हैं। हालांकि आज हमको पता है कि वह तो म्यूटेशन की वजह से हुआ है। यानी कि ईश्वर को नियम तोड़ने की जरूरत नहीं है। एक डाल पे दो तरह के दो रंग के फूल प्रकट करने में खिलाने में। वो वो है कि इट्स अ पार्ट ऑफ म्यूटेशन। वो जेनेटिक म्यूटेशन होता है तो यह सब होता है। किंतु खैर एयर स्प्लिटिंग नहीं करके बहुत ज्यादा इसके भीतर में डीप में नहीं जा के ठाकुर का जो बेसिक जनरल आउटलुक है वह हमको पता है कि ईश्वर चाहे तो सब कर सकते हैं। किंतु वही बात है कि ईश्वर सब कर सकते हैं। सोच करके ईश्वर पे आंख बंद करके भरोसा रख के बैठे रहने से कोई काम नहीं होने वाला है। तपस्या करनी है। यह जो सबसे बड़ी बात अह जो ठाकुर के भक्तगण उनमें जो दोष स्प्लिट हो गया यह सन्यासी भक्त और गृहस्थ भक्तों में हालांकि थे सभी अंतरंग ही किंतु यह जो रामचंद्र दत्त वगैरह ने कहना शुरू कर दिया था कि हमारे जन्म जन्मांतर के जितने भी कर्म है ठाकुर ने काट दिए हैं। ईश्वर की कृपा होने से जन्म जन्मांतर के कर्मों का क्या उसका तुच्छ है वह तो जब भी चाहे काट सकते हैं। जबकि नरेंद्र कहता है कि नहीं ठाकुर ने ही हमको तपस्या करने के लिए कहा है। हो सकता है अपने लिए नहीं बोल के करके किंतु जगत के लिए करें किंतु तपस्या करनी है। तो देखिए कि वैसे तो ठाकुर अस्वीकार नहीं करते थे यह सब चीजों को आंख स्वीकार भी करते थे जादू चमत्कार को कि ईश्वर स्वयं घोड़े सवार होकर के आ सकते हैं। किंतु इसका अर्थ यह नहीं है कि हम अपना लाइफ स्ट्रेटजी इस तरह के चमत्कार के ऊपर में बनाएं। वी हैव टू मेक अ स्मार्ट चॉइस। साधन भजन तपस्या करनी है और फिर वह ईश्वर प्राप्ति के लिए जो करना लिखा गया है शास्त्र में सब करना है। फिर ईश्वर आकर के चमत्कार करके हमको कहीं-कहीं पे मुसीबत से निकाल ले दैट इज फाऊ यानी कि यह जो एक्स्ट्रा कुछ मिलता है ना वो ठाकुर कहते हैं फाऊ यानी कि जो एक्स्ट्रा कुछ मिलना वो एक्स्ट्रा बेनिफिट यदि मिल जाता है तो कोई दिक्कत नहीं। बट डू नॉट मेक योर लाइफ चॉइससेस बेस्ड ऑन सम मिरेकुलस एजम्पशनंस। सो यह ठाकुर का एक जनरल थिंकिंग हमको पता है। अच्छा इसके बाद का अभी हम कल देखेंगे। यह टॉपिक यहां पर समाप्त होता है। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु। नरेंद्र के लिए था

प्रश्न: अच्छा हुआ कि ठाकुर ने नरेन को भक्तमाल पढ़ने को नहीं दिया

अष्टावक्र संगीिता। ठाकुर को अविश्वास करवा देता। फिर ठाकुर कहते हैं ना वह मास्टर महाशय को कहते हैं ना पहले ही परिच्छेद में कि तुम्हारा घर क्या है? वह तो मैंने तुमको बता दिया है। तो यह जो ये जो भक्तमाल है वह उनका घर है और वह नरेंद्र का घर है वह अष्टावक्र

प्रश्न: faith और rationality - यह दोनों में से किसे स्वीकार करे?

संगीिता इसमें वो जो एक फेमस कहानी है ना म इतना सेंटीमेंटल यह प्रसंग है भाव से भरा हुआ कि वो गोपाल की मां अघोरमणि देवी वो वहां पर एक बार ठाकुर और नरेंद्र सब बैठे थे। वहां पर वह अपनी अवस्था का वर्णन कर रही है कि किस तरह से यह बाल गोपाल नटखट अदा ये सब करता है। वह कुछ ना कुछ नटखटपन करता रहेगा। वो कुछ ना कुछ मिसचिफ करता रहेगा। फिर यह वो गोपाल की मां उन पर नाराज हो जाएगी। उनको डांटेगी। फिर यह गोपाल रोता उनकी गोद में आकर के बैठेगा। तो वो एकदम रो जैसे आंखों में से अश्रुधारा बह रही है और यह पूरी घटनाओं का वर्णन कर रही है। वो सामने नरेंद्र बैठा है। अभी यह गोपाल की मां को पता है कि नरेंद्र एक ऐसा डिवोटी है ठाकुर के जितने भी जो पार्षद हैं उनमें कि वो इतना रैशनल है कि सभी चीजों में उसको डाउट है। तो फिर यह गोपाल की मां है। वह कहती है वह प्रसंग है पूरा कि वह रोते-रोते वह नरेंद्र को बार-बार पूछती है कि बेटा मुझे यह सब जो दिख रहा है क्या मेरे मन का भ्रम है? मैं तो गरीब ही नहीं हूं। मैं तो मेरे पास में कुछ भी पैसा नहीं है। कुछ भी नहीं है। मैं तो एक छोटी सी कुटिया में रहती हूं। साधन भजन करती हूं। यदि मुझे भी इस तरह का भ्रम होने लगे या तो भगवान मुझे इस तरह के भ्रम में पतित करें तो मैं कहां जाऊंगी? तो माने इतनी दुखनी की तरह रोती रोती बार-बार नरेंद्र को पूछती है और नरेंद्र की आंखों में से आंसू निकल रहे हैं और नरेंद्र सामने से कह रहा है कि ना मां आपने जो देखा है सब सही है बिल्कुल सही है बिल्कुल ठीक है तो दोनों रो रहे हैं अभी देखिए कि दोनों में कंट्रास्ट वहां पे यह गोपाल की मां अनपढ़ विधवा ना ही आधुनिक युग का कुछ भी समझ में नहीं आता और ऐसा नहीं है कि कोई दीक्षा-विक्षा लेकर के शास्त्रीय तरीके से साधना की है कुछ नहीं बस वो वो बाल गोपाल के नाम का जप करती है और बाल गोपाल आकर के उनके साथ में यह सब मिसचीफ करते हैं और यहां पे ये नरन माने मॉडर्न एनलाइटनमेंट माने पर्सोनिफाइड वो रोता कहता है कि नाम आप जो कह रही है ये सब सही है। सो जहां तक ये भाव राज्य का सवाल है उसमें कुछ भी हो सकता है। उसमें कोई प्रश्न ही नहीं है। किंतु यह जब भाव राज्य जो एक्सटर्नल मटेरियल वर्ल्ड में मैनिफेस्ट होना शुरू हो तब हम कैसे इसको रिकंसाइल करेंगे। देखिए ठाकुर का वो जो कहानी यह भाव और ये जो मटेरियल वर्ल्ड यह किस तरह से क्रॉस होता है। जनरली हम ठाकुर के भाव को दर्शन को देखेंगे। हमको पता है वह भाव राज्य में चल रहे हैं। दैट मींस के वो कॉन्शियसनेस के लेवल पर चल रहे हैं। अभी यह दोनों जगत को हम बिल्कुल सेपरेट कर दें। दिस इज द वर्ल्ड ऑफ कॉन्शियसनेस। है ना दिस इज द वर्ल्ड ऑफ स्पेस टाइम मैटर एनर्जी जो भौतिक जगत है। अभी ठाकुर का जो कुछ-कुछ दर्शन है ना ज्यादातर दर्शन वैसे तो भावराज्य का है किंतु कुछ-कुछ दर्शन इस तरह की कॉन्शियसनेस से मटेरियल वर्ल्ड में क्रॉसओवर होते हैं। दो-तीन मुझे बातें याद आ रही है यहां पे। ठाकुर का एक है कि वो रामलल्ला की जो धातु की मूर्ति है वो रामलला की धातु की मूर्ति को ठाकुर ने नदी में तैरते हुए देखा। नाउ अभी राम लल्ला दिखता है भाव दृष्टि से भाव नजरों से वह तो समझ सकते हैं वो धातु की मूर्ति पानी में कैसे तैर सकती है वि इज क्रॉसिंग दिस बाउंड्री ऑफ कॉन्शियसनेस एंड मटेरियल वर्ल्ड मां का है मां जब बीमार थी उस समय हमने हमने यह मां का जीवन में इसकी चर्चा भी की थी कि ये दिस इज वेरी म सिग्निफिकेंट यह घटना है वो जब मां बीमार थी आंखों में कुछ दिख नहीं रहा था और वहां पे वो और उनको तो डायरिया हो गया था तो बार-बार शौच के लिए जाना पड़ता था। तो तालाब की धार पे किनारे पर पड़ी हुई थी। तो उस समय देखिए कि मां ने आकर के कहा मां काली जगत धात्री ने आकर के कहा सिंह वाहिनी ने आकर के कहा कि देखो कि तुम यह फूल है उसका रस अपनी आंख में डालना तो आंख तुम्हारी ठीक हो जाएगी। तो यह तो भाव का प्रश्न है और जो इंफॉर्मेशन दी वह भी पूरे भाव राज्य में है। किंतु उसके बाद में मां ऐसा कुछ कहती है वि इज क्रॉसिंग दिस बाउंड्री ऑफ कॉन्शियसनेस एंड मटेरियल वर्ल्ड। मां कहती है कि सिंह वाहिनी देवी ने श्यामा सुंदरी यानी कि मां की मां के पास जाकर के औषध दिया और कहा कि यह अपनी बिटिया को खिलाना वह ठीक हो जाएगी। नाउ औषध इज समथिंग मटेरियल। और मां जगदंबा का दर्शन या किसी भी तरह की देवी देवता का दर्शन होता है भाव नजरों से। तो यह भाव को किस तरह से वह एक मटेरियल दवाई हाथ में दे सकता है व्हिच इज क्रॉसिंग दिस बाउंड्री ऑफ़ कॉन्शियसनेस इन मटेरियल वर्ल्ड। सो ऐसे दो उदाहरण तो एटलीस्ट मुझे इमीडिएटली याद आ रहे हैं कि यह क्रॉस होता है। क्रॉसओवर होता है। बट दिस इज़ दीज़ आर वेरी रेयर इवेंट्स। नहीं होता है। ऐसा नहीं है। इसका तो परफेक्ट प्रूफ ठाकुर माने यह जो अपनी सबसे इंपॉर्टेंट किताबें हैं गंभीरानंद जी का मां का जीवन और यह लीला प्रसंग शारदानंद जी का। तो यह दो चीजें तो दो घटनाएं तो हमने पढ़ी कि देयर इज अ क्रॉसओवर बिटवीन कॉन्शियस वर्ल्ड एंड मटेरियल वर्ल्ड। इसके पीछे का साइंस क्या है? वी डू नॉट नो। हालांकि साइंस भी तो स्वामी जी डिस्कस करते ही है। राजयोग में देखिए कि आकाश और प्राण इन दोनों के ऊपर में ये पूरा जगत बना हुआ है और यदि आप प्राण को कंट्रोल कर सकते हैं तो मैटर एनर्जी स्पेस टाइम सब कुछ आप कंट्रोल कर सकते हैं। तो थ्यरी भी हमारे पास में है। वही बात है कि हमको जो अलर्ट रहना है इस सब थ्यरी का नाम लेकर के हजार साल तक जितनी भी अंधश्रद्धा हमारे सामने आई सब हमने आंख बंद करके स्वीकार कर ली। और उसकी वजह से जो गहरे गड्ढे में हम गिरे हैं वह उससे उठने में हमको इतना टाइम लग गया। सो इफ इट इज अ साइंस देन उसको साइंटिफिकली प्रूव करके अप्लाई करके करने वाले यह ठाकुर और मां के अलावा और किसी को देखा नहीं है। इवन स्वामी जी के जीवन में मुझे ऐसी कोई घटना याद नहीं आती कि इस तरह से कॉन्शियस से कॉन्शियस लेवल से यह मटेरियल लेवल तक का क्रॉसओवर हुआ हो। सिर्फ यह ठाकुर और मां के जीवन में ही दो घटनाएं मुझे याद आ रही है।

प्रश्न: कृपा प्राप्त करने के लिए कर्तापन जाना चाहिए।

किसने किया ये? इंद्र ने किया। वो ब्राह्मण की कहानी है। वो बागान में उसने वो गाय को मार दिया। तो गौ हत्या का पाप लगेगा तो वह जब यमदूत लेने को आए तो बोला तो फिर वो चालाकी करना है ना कुछ तो हाथ से मारा है। हाथ के देवता इंद्र है। यानी इंद्र ने मारा है। जाओ इंद्र को जाकर पकड़ो। फिर इंद्र आकर के ब्राह्मण का रूप लेकर आकर के बागान की प्रशंसा करते हैं। तो ब्राह्मण बड़ा खुश होकर बोलता है कि यह सब बागान मैंने ही बनाया है। तब इंद्रदेव अपना सही स्वरूप धारण करके बोलते हैं कि जब गाय की हत्या की तो तुम्हारे हाथ ने की यानी कि मैंने की और यह बागान तुमने बनाया। कैसी बात हो गई? आजीवन ब्रह्मचर्य पालन करना पड़ेगा। तभी तो यह सब होगा।

प्रश्न: कभी कभी चमत्कार होने के बाद, हम भूल जाते है की हम पर कृपा हुई है, और हम ही क्रेडिट ले लेते है.

वह जो आपने कुछ दिनों पहले पूछा था ना कि वह दाना काली की पत्नी 12 साल तक उसने विश्वास कैसे बनाए रखा? तो क्या है ना कि भगवान सबको एक बार तो कुछ दे देते हैं फ्री में। अभी वह फ्री का मिला हुआ उसका हम किस तरह से इस्तेमाल करेंगे? आप इसको बैंक में रख के उसको ब्याज इंटरेस्ट आएगा। उसको मल्टीप्लाई करते जाएंगे। उसको कहीं वह सीड कैपिटल के रूप में बिजनेस में लगाएंगे। वो एक है कि इवेंचुअली वो मल्टीप्लाई होगा। दूसरा है कि उसको खा के खत्म कर देंगे। तो एक बार कृपा कर देते हैं भगवान फ्री में। किंतु फिर वह फ्री की कृपा जो है उसको फिर हम किस तरह से देखेंगे? उसके ऊपर में बिल्ड अप करेंगे कि इसको वेस्ट कर देंगे। दैट इज आवर चॉइस। जबकि यह दाना काली की पत्नी है जो एक बार कृपा मिली तो फिर यह उसने 12 साल तक विश्वास टिका के रखा तो अल्टीमेटली उसको उसका फिर थाउजेंड टाइम्स मल्टीपल होकर के उसका रिजल्ट देखने को मिला। यह भगवान बुद्ध की भी ऐसी कहानी है कि वह बचपन में एक पेड़ के नीचे में बैठे थे युवावस्था में कहीं पर तो फिर एकाएक उनको एक इस तरह का एक अनुभव हुआ कि फिर किंतु उस अनुभव को वो भूल ही गए किंतु फिर वह जो वर्ल्ड फेमस घटना है कि वह रास्ते से जा रहे हैं। एक बीमार आदमी को देखा, एक वृद्ध को देखा, मृत देह को देखा और एक श्रमण को देखा। तो फिर से उनके मन में यह प्रश्न जागृत हुआ कि भौतिक जगत के परे भी कुछ है। इंद्रिय के जगत के परे भी कुछ है। तब उनको वह घटना याद आई कि हां वो पेड़ के नीचे में मुझे एक ऐसा एक्सपीरियंस हुआ था। अभी वह एक्सपीरियंस को दोहराने के लिए मैं फिर से घर छोडूंगा फिर से तपस्या करूंगा। तो वो एक्सपीरियंस आया और गया। यदि उसके ऊपर में उन्होंने कोई काम नहीं किया होता तो वैसे ही रह जाता। स्वामी जी के जीवन में भी देखिए ना वो स्टूडेंट थे। कमरे में बैठे थे। भगवान बुद्ध का दर्शन हुआ। अभी ऐसा तो कहीं नहीं लिखा है। इवन स्वामी जी भी नहीं कहते कि हां मैं ऐसा कोई ईश्वर चिंतन कर रहा था। बुद्ध का चिंतन कर रहा था। बोल के दर्शन हुआ। वो हो सकता है एक फ्री में दर्शन मिल गया हो। किंतु फिर उसके ऊपर में स्वामी जी ने मल्टीप्लाई तो किया। अभी ऐसा हो सकता है हमारे साथ में भी ऐसा हुआ हो। हम उस बात को भूल ही गए हैं। मल्टीप्लाई करना छोड़ के उस फ्री में जो गिफ्ट मिली है उसको वेस्ट कर दी

प्रश्न: स्वामीजी को भी फ्री दर्शन मिले थे.

है। हां हां उनको कोई अनुभूति हुई थी। यस यस यस यस किंतु अभी आपको यह पता है कि कौन सा पहले हुआ रायपुर वाला पहले हुआ कि यह वाला पहले हुआ ध्यान नहीं कर रहे थे यही तो बात है कि वो उसमें ऐसा कुछ नहीं लिखा है कि ध्यान कर रहे वो बोले मैं कमरे में बैठा था कुछ पढ़ रहा था और एकाएक भगवान बुद्ध का दर्शन हुआ इसलिए मैं कह रहा हूं बट व्हाटएवर जो भी पहले आया हो उनका नसीब अच्छा है दो फ्री में मिल गया क्या ना

प्रश्न: ठाकुर को भी प्रथम दर्शन फ्री में ही मिला था, जब उन्होंने आकाश में उड़ते हुए पंखीओ को देखा था.

किंतु ठाकुर का क्या है पता है वो जो गिरीश घोष कहता है ना ठाकुर को आपार सबु बेआईनी आपका सब कुछ नियम के ऊपर है आइन अर्थात कि नियम बेआईनीत कि उसको कैसे ट्रांसलेट करेंगे नियम के परे तो बड़ा ये हो जाता है बेआईनी कैसे उसको हिंदी करेंगे आपका सब अनियम अनियमित नहीं है वो वो वो अलग मीनिंग हो गया बेआईनी अपना सब कुछ बेआईनी आज गिरीश कहता है ठाकुर को इॉजिकल किंतु हिंदी में एक्सैक्ट परफेक्ट वर्ड बेआईनी का क्या होगा वो देखना पड़ेगा वो फॉर्मल हो जाता है। देखिए बेआईनी शब्द इतना सुंदर है कि वो फट करके बैठ जाता है। बेआईनी तो ठाकुर को वह दर्शन होते हैं वह तो कोई उनका सब कुछ बेई है। क्या फर्क पड़ता है? वो मुझे डाउट है कि आपको Google ट्रांसलेट में मिलेगा। वही क्या कहता है? गैर कानूनी गैरान ये कह सकते हैं। ये गैरकानूनी कह सकते हैं। ये बेटर है एक्चुअली। ठाकुर का सब कुछ गैरकानूनी है। गैरकानूनी बिल्कुल ठीक है। उनका सब सहज अवस्था होती थी ना। उनको प्लान करके तो कुछ करना नहीं है। वो बैठे हैं तो चिंतन ऑटोमेटिक चालू हो

प्रश्न: हमें अपने फ्री टाइम में क्या करना चाहिए, जब हम साधना करने के लिए बहुत थके हुए हों? ज्यादातर लोग मोबाइल में डूब जाते है.

गया। देखिए यह हम सभी लोग फेस करते हैं। मैं कभी-कभी सोचता हूं जब फ्री होऊंगा तो मैं उपनिषद पढूंगा। अभी उपनिषद पढ़ने के लिए आपको ऐसा नहीं है कि माने कभी भी जब भी इच्छा हो खोल करके पढ़ सकते हैं। उसके लिए फ्रेश माइंड चाहिए। थोड़ा सा भीतर से एक रेडीनेस चाहिए। कंसंट्रेटेड माइंड चाहिए। किंतु अब जब अभी हम लोग ऑफिस से आते हैं तो हमारा भी ऐसा ही है। ऑफिस में काम करना है। अभी यहां पे तो इतना नहीं है। खासकर राजकोट की या बेलूर मठ की बात करूं कि वो ऑफिस से वापस आता था। वो किताब माने धार्मिक किताब पढ़ना जिसमें कि थोड़ा सब्सटेंशियल फोकस करना पड़ता है व्हिच वास आउट ऑफ क्वेश्चन। कोई प्रश्न ही नहीं है कि हम उसको कर पाएंगे और जब करना भी चलो बियों्ड वन पॉइंट हम कितना करेंगे। सो हाउ टू स्पेंड फ्री टाइम व्हेन वी आर टायर्ड स्पेसिफिकली बेसिकली मेंटली एग्जॉस्टेड कि हम ऐसा कुछ सब्सटेंशियल कुछ नहीं करना चाहते हैं कि चलो कोई सीरियस किताब उठा के पढ़ी। सो वी आर टायर्ड एंड वी वांट टू पास सम टाइम। तो ठाकुर ने ही जैसे यहां पे जो अभी सभी अवस्था में ठाकुर का यह जो एक रहता है ना पॉइंट ऑफ व्यू तो उन्होंने जो किया कि वो भक्तमाल का पाठ तो मैं भी क्या है कि देखिए कि खास करके अभी ये ऑडियो बुक्स बड़ी फेमस हो रही है। तो अपने ऑर्डर की है ऑडियो बुक्स वो कथामृत पे भी है। लीला प्रसंग में भी है। वह मायर कथा अनफॉर्चूनेटली यह सब ऑडियो बुक्स बेंगली में ज्यादा अवेलेबल है। तो वह मैं पढ़ता रहता हूं। किंतु एक आज एक सबसे बड़ा एक बेनिफिट हमको मिला है स्पीच टू टेक्स्ट सॉरी टेक्स्ट टू स्पीच। तो बहुत सारी किताबें आजकल यूनिकोड फॉर्मेट में अवेलेबल है। तो फिर उसको आप टेक्स्ट टू स्पीच करके सुन सकते हैं। वि इज माय फेवरेट मोड ऑफ स्पेंडिंग टाइम लाइक दिस कि मैं या तो लेटा रहूंगा या तो थोड़ा सा वॉकिंग करूंगा छत के ऊपर में जाकर के और यह किताब वो चलती रहेगी स्पीच फॉर्म में। तो दैट इज व्हाट आई डू। और फिर देखिए कि YouTube में भी यदि आप जाते हैं देयर आर मेनी लेक्चर्स वगैरह तो होते ही है। बहुत ज्यादा इंटेलेक्चुअल लेक्चर्स को आप नहीं भी सुनते हैं तो लाइट टाइप के खास करके ठाकुर मां स्वामी जी के लेक्चर भी होते हैं व्हिच यू कैन लिसन टू। सो दोज़ आर द ऑप्शंस। स्पेसिफिकली रामकृष्ण विवेकानंद लिटरेचर। दैट इज़ व्हाट अ कि यह लिटरेचर देखिए कथामृत है, मां की बातें हैं या डायरेक्ट डिसाइपल की बातें हैं। देखिए कि इंटेलेक्चुअली इतना सब्सटेंशियल नहीं होता है कि आप एकदम उपनिषद को जिस तरह से आप पढ़ते हैं फोकस करके ऐसा पढ़ना पड़े। ऐसा कुछ नहीं होता। मां की बातें खास करके इतनी लाइट होती है छोटे-छोटे प्रसंग इतना इजीली गरम-गरम वो जो हलवा खाते हैं तो कैसा सीधा पेट में चला जाता है। कोई टेंशन नहीं रहता। तो वैसे ही मां की बातें ये गर्म हलवे की तरह है। शिरा की तरह वो आराम से आप खाते जाइए। कोई टेंशन नहीं है उसमें। दैट इज माय सॉल्यूशन। आज मुझे वेटिकन का एंबेसडर आया है यहां पे सिटी में विशाखापटनम में। तो उसको मिलने के लिए जाना है अभी। उसने वह सब वो रिलीजियस लीडर्स का मीटिंग किया है। तो पब्लिक मीटिंग नहीं है। वो प्राइवेट मीटिंग ही है। तो आए थे हमारे बड़े महाराज को बुलाने के लिए। तो बड़े महाराज नहीं जा रहे। मुझे बोला तुम जाओगे? मैंने कहा जाके देख के आते हैं। वेटिकन का एंबेसडर कैसा होता है। देख के आते हैं। देखते हैं कि मीटिंग में क्या होता है। तो मैं इतनी आशा तो रखता हूं नाश्ता-वास्ता अच्छा ही होगा। इसके बाद में पता [हंसी] है नहीं एंबेसडर तो एक बड़ा आदमी है ना इन लोगों का और फिर मैंने पूछा ओकेजन क्या है? तो बोला एक बिशप को आर्च बिशप बनाना है। तो मैंने कहा अच्छा यह तो प्रमोशन हो रहा है किसी का। तो चलिए हां वो जो सेरेमनी उसका होता है उसके पार्टिसिपेट करने के लिए