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ओम स्थापक यज धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिणी अवतार वरिष्ठा राम कृष्णा यते नम जय मां श्री राम कृष्ण कथामृत कल हमने देखा कि किस तरह से ठाकुर सबको कहते हैं कि जो मेरे अंतरंग है वह सिर्फ यहीं पर आएंगे और और जैसे ठाकुर खुद कहते हैं कि आप जिस तरह की साधना करो जिस तरह के अवतार को फॉलो करो जिस तरह के ईश्वर को या किसी भी ईश्वर को जिस किसी ईश्वर को अपनी श्र भक्ति प्रदान करो जिस किसी भी अवतार के शरणं में जाओ वह आपको एक ही विश्व नियंता सर्वव्यापी भगवान की ओर ले जाएगी या तो फिर आत्म साक्षात्कार करवाएगी यानी कि जितनी भी साधन पद्धतियां है उन सबका एक ही लक्ष्य है एक ही ईश्वर की ओर ले जाना ऑन वन हैंड ठाकुर ऐसा कहते हैं ऑन द अदर हैंड ठाकुर हमने देखा कि किस तरह से स्वामी जी को भी मास्टर महाशय को भी रयान जी को भी जितने भी लोग हैं सबको उनके अंतरंग है कहा कि सिर्फ मेरे पास आना है और किसी के पास नहीं जाना तो हमको प्रश्न अवश्य होगा कि क्यों ठाकुर अपनी ही बात का खंडन यहां पर कर रहे हैं यदि ठाकुर की उपदेश सुन कर के इवेंचर होता है तो केशव सेन के उपदेश सुनकर के भी तो आज नहीं ना कल कल नहीं ना परसों अपनी साधना में तो वही ईश्वर की ओर पहुंचने वाले हैं गिरीश घोष ने एक बार कहा था बंगाल में उस समय कर्ता बजा नाम का एक संप्रदाय था तो वहां पर कर्ता अर्थात की गुरु भजानेगलू अभी जीवंत गुरु की पूजा करना इतना काम कांचन और घमंड और अहंकार यह सबसे परे ऐसा तो कौन हो गया है कि आपकी कोई पूजा करे और आपके मन में अहंकार न प्रकट हो या तो फिर जो भी दुश चिंताएं हैं वोह अपने मन में ना आए इतना तो ऊपर में कौन उठ गया है अभी जीवंत आदमी की पूजा करने से तो वो व्यभिचार तो होने ही वाला है तो यह सब देख कर के गिरीश घोष एक बार ठाकुर को कहते हैं कि मैं कर्ता बजा वालों के ऊपर में एक नाटक लिखने वाला हूं एक कटाक्ष मय नाटक जिसमें कि उनके व्यभिचार को मैं खुला कर दूंगा सबके सामने रख दूंगा तो ठाकुर ने सीरियस होकर के बड़े ही गंभीर होकर के कहा था कि वो भी एक पथ है वो भी एक रास्ता है जिसको यदि आप सीरियसली फॉलो करते हैं एक निष्ठा से फॉलो करते हैं तो वही ईश्वर की ओर जाएंगे अचलानंद के बारे में ठाकुर ने कहा था कि जितने भी ये तंत्र साधना करते हैं शक्ति साधना करते हैं कारण पान करते हैं कारण अर्थात कि अल्कोहल ये शराब तो शराब पी कर के फिर ये लोग क्या सब उल्टा पुल्टा व्यभिचार करने की शुरुआत कर देते हैं किंतु एक अचलानंद को मैंने देखा ठाकुर खुद कहते हैं कि वो शराब पीने के बाद में या तो फिर कारण पान करने के बाद में स्थिर होकर के बैठ कर के जप करता है तो इस तरह के जिस जिसको हम एक निम्न तरह का एक रास्ता मानेंगे इस तरह की साधना मानेंगे कि जहां पर पैर फिसलने की बहुत सारी संभावनाएं हैं उस रास्ते से चलकर के भी यदि किसी किसी ने सिद्धि प्राप्त की है तो वह साधना हों में गलत क्या है वो तो एक हमारी निष्ठा ही एकमात्र क्राइटेरिया है एकमात्र फैक्टर है जो कि हमको ईश्वर दर्शन करवाती है तो ऑन वन हैंड ठाकुर करता इन सबको जद एज ए लेजिटीमेट वे ऑफ अटेनिंग गॉड इस तरह से जद वह स्वीकृत करते हैं तो फिर केशव सेन के वहां पर जाना उसमें कौन सी ग गलत बात हो गई किंतु व फिर पहारी बाबा से हठ योग सीखना उसमें भी कौन सा गलत हो गया किंतु फिर भी ठाकुर ने नरेंद्र को मास्टर महाशय को कहा कि मेरे ही पास आना है इधर उधर कहीं नहीं जाना और ऐसा कहा इसके पीछे का कारण भी हमने देखा कि अवतार के साथ में अवतार के संगी अवतार के पार्षद युग युग में जन्म नरदह धारण करके पृथ्वी पर अवतरित होते हैं और जीवों के कल्याण के लिए अपना जीवन अपना लाइफ उत्सर्ग करते हैं उनका पृथ्वी पर आना जैसे ठाकुर कहते हैं कि जो बहादुरी काठ एक कोई कोई ऋषि रा भय तोरा से ठाकुर कहते हैं कि ऋषि मुनि जो थे वो डर डरपोक थे वो अभी किसी किसी भी तरह से अपना खुद का कल्याण हो जाए मैं साधना करूंगा मेरी मुक्ति हो जाए तो बस मुझे और कुछ नहीं चाहिए जबकि यह नारद वगैरह बहादुरी काट अर्थात कि वह इस तरह की लकड़ी है जिसमें से नौका बनाएंगे तो वह खुद भी भवसागर तैर जाएंगे और उसमें कितने ही लोग सवार होकर के खुद भवसागर को पार कर पाएंगे नरेण को कहा कि तुम एक वटवृक्ष की तरह तुम्हारी शीतल छाया में कितने पापी तापी विश्राम ग्रहण करेंगे शांति प्राप्त करेंगे तो इन लोगों का आगमन सिर्फ अपनी मुक्ति के लिए नहीं है अपनी ही मुक्ति चाहिए तो कोई भी मार्ग निष्ठा पूर्वक आप फॉलो कीजिए आपको मुक्ति अवश्य प्राप्त होगी किंतु इनका आगमन लोक कल्याण के लिए हुआ है आत्मन मोक्षार्थम जगत हिताय च आत्मनों मोक्षार्थम तो गारंटी है ठाकुर के साथ में आए हैं अवतार के साथ में आए हैं अभी देखना है कि जगत कल्याण किस तरह से होना है इसलिए ठाकुर इनको कहीं ना जाकर के अपने पास आने के लिए कहते थे तो यह प्रसंग हमने देखा फिर यह भी देखा कि नरन के बारे में ठाकुर क्या कहते हैं नरेंद कहते हैं नरेंद के बारे में कहते हैं कि वो गाने व कितना अच्छा गायक है कितना सुंदर वह पखावज बजाता है फिर कितना वह जितेंद्रिय है तो जितेंद्रिय होने का क्या अर्थ उसका क्या प्रभाव है वह भी हमने विस्तार से देखा अभी थोड़ा सा आगे में पढ़ते नरेंद्र के बारे में ही ठाकुर कहते हैं देखो नरेंद्र कतो गुण देखो नरेंद्र के कितने गुण है नरेंद्र अर्थात स्वामी विवेकानंद गायते बाजा विद्यायतन द्र गाने में बजाने में और विद्या बुद्धि में फिर जितेंद्रिय भी है बोले छे बीए कर बेना कहता है कि मैं शादी नहीं करूंगा छले बेला थे के ईश्वर ते मोन बचपन से ही ईश्वर में उसका मन है यहां पर नरेंद्र का प्रसंग समाप्त होता है इसके नर के बारे में हमने कल बड़ा ही विस्तृत चर्चा किया था कि किस तरह से जितेंद्रीय होने से स्वामी जी का यह जो ओजस शक्ति उनका जो आध्यात्मिक प्रभाव एक बहुत ही सुंदर कहानी मैंने पहले भी बताई थी एक शायद कि अमेरिका में स्वामी जी गए तो अभी वहां पर तो क्या है कि व्हाट वाज द पार्लिमेंट ऑफ रिलीजन इट वाज अ हिडन शो अर्थात कि जैसे सर्कस करते हैं ना सर्कस में क्या है वो एक आदमी बहुत लंबा है एक आदमी बहुत छोटा है तो इस तरह से विचित्र लोगों को ले आ कर के लोगों के मनोरंजन के लिए सबके सामने खड़ा कर देते हैं तो ऐसा वो अमेरिका की ये क्रिश्चियन प्रजा के मनोरंजन के लिए देखो कि क्रिश्चियन धर्म कितना सर्वश्रेष्ठ है हमारी सामने यह यह जो जंगली प्रदेश से जो आए हैं यह बर्बे लोग है उनका धर्म देखो और हमको देखो उसके साथ में कंपेयर करके पता चलेगा कि क्रिश्चियनिटी सर्वश्रेष्ठ है जिस तरह से हमने इलेक्ट्रिसिटी खोज ली है जिस तरह से हमने यह पूरा विश्व को य नेविगेशन के ये टीम बोट के माध्यम से पूरे विश्व को हम लोग ने पूरे अपने कंट्रोल में कर लिया है तो वैसे ही यह साइंस और टेक्नोलॉजी के जगत में मिलिट्री के क्षेत्र में हमारा जो विजय है वह धर्म के क्षेत्र में क्रिश्चियनिटी का विजय है तो ऐसा करके एक क्रिश्चियनिटी के सामने क्रिश्चियन धर्म गुरुओं के सामने बाकी सब धर्म के उनके प्रचारक कितने छोटे दिखाई देते हैं कितने मूर्ख जैसे दिखाई देते हैं यह दिखाने के लिए वर्ल्ड पार्लियामेंट ऑफ रिलीजन का आयोजन किया गया किंतु जब स्वामी विवेकानंद बोलने के लिए खड़े हुए तब पता चला कि यह लाखों लाखों रुपया लेकर के ये सब जिसको भी भारत में ये अफ्रीका में ये अफ्रीका तो ठीक है किंतु भारत में जो मिशनरीज को भेजते हैं हमको कन्वर्ट करने के लिए हमको सही रास्ता दिखाने के लिए तो एक्चुअली यही भारत से आपको सही रास्ता दिखने की जरूरत है सीखने की जरूरत है यह स्वामी जी ने उनको दिखाया तो स्वामी जी एक बार एक क्रिश्चियन कॉलेज में गए थे लड़कियों का कॉलेज था गर्ल्स कॉलेज तो वहां पर अभी बोलने के लिए उनको शायद बुलाया होगा तो आसपास के वो क्रिश्चियन पादरियों को पता चला कि वो यहां पर आए हैं स्वामी जी तो चलो जाकर के उनके साथ में डिबेट करते हैं उनको हराते हैं वरना तो ये लड़कियां क्या सब उल्टा पुल्टा सीख लेगी उनके पास से तो उस कॉलेज में पढ़ती हुई एक लड़की कॉर्नेलिया कॉर्नेलिया नाम था उसका उसने बहुत सालों के बाद में यह स्मृति कथा लिखी है वो कहती है कि हम सब लड़कियां एक कोने में चुपचाप बैठ गई और देख रही है कि स्वामी जी यह हमारे धर्म के जो बहुत ही जानेमाने बौद्धिक जो ये लोग थे आचार्य उनके साथ में वाद विवाद कर रहे हैं उनके साथ में आर्गुमेंट कर रहे हैं और यह क्रिश्चियन लोग अपने धर्म ग्रंथ बाइबल में से जो एक के बाद एक व कोटेशन देते हैं या रेफरेंस देते हैं या उदाहरण देते हैं उसी को स्वामी जी उसी बाइबल में से उसी उनकी किताब में से आरो बेटर कोटेशन देकर के काउंटर करते हैं तो वोह लिखती है कि ट डे आई फेल्ड रियल टेस्ट ऑफ फ्रीडम एक मुक्ति क्या होती है क्योंकि यह क्रिश्चियनिटी ने सोसाइटी को इस तरह से दबा करके रखा था तो वेदांत इज अ सोंग ऑफ फ्रीडम वेदांत इज द वॉइस ऑफ फ्रीडम आत्मन की मुक्ति व्यभिचार नहीं इंद्रियों के जो भोग है उसको मुक्त होकर के भोग करो वो नहीं किंतु आपकी आत्मन जो है आपका अंतःकरण जो है उसको किस तरह से वो सामाजिक रूढ़ी प्रथा में बांध करके अपने उसका विकास नहीं होने दिया उसको इवोल्व नहीं होने दिया उस बंधन से मुक्ति तो ट डे शी सेज को लिखती है कि मेरी सिंपैथी भले ही चाहे मैं क्रिश्चियन थी या क्रिश्चियन हूं मेरी सिंपैथी स्वामी जी की ओर थी और स्वामी जी जीत रहे थे देख कर के मुझे सही सही वो आनंद हो रहा था तो देखिए कि जितेंद्रीय होने से स्वामी जी ने अमेरिका में क्रिश्चियनिटी के गढ़ में जाकर के उनके किले में जाकर के उनके ऊपर में विजय प्राप्त की फिलोसॉफिकल विजय इसीलिए स्वामी जी बाद में कहते हैं कि भारत का पुनरुत्थान हो भारत का नव अभ्युदय हो यह तो छोटा सा सपना है मेरा सपना मेरी इमेजिनेशन तो और भी बड़ी है आई वांट ट इंडियन स्पिरिचुअलिटी इंडियन वेदांता कंकर द वर्ल्ड भारतीय आध्यात्मिकता इस जगत पे विजय प्राप्त करें किंतु किस तरह का विजय जिस तरह से ये रोमन या तो फिर ये ब्रिटिश यह लोग लोग अपने आर्मी को भेज करके नेवी को भेज करके लोगों का मर्डर करके मिलिट्री सत्ता जो प्राप्त करते हैं इस तरह से नहीं दार्शनिक और आध्यात्मिक विजय जो कि स्वामी जी कहते हैं कि एक रोज एक गुलाब है गुलाब के ऊपर में सुबह की ओस गिरती है तो कितना शांति से कितना जेंटल फॉलिंग ऑफ द ड्यू ऑफ द मॉर्निंग ड्यू कितना शांति से गु गुलाब के ऊपर में सुबह की ओज गिरती है और गुलाब को परिपट्स वाज द स्वामी जीस ड्रीम तो यह कब किंतु संभव है तब जिनके उनमें यह बौद्धिक मेधा शक्ति भी थी और वह जितेंद्रिय भी थे इ दोनों का कॉमिनेशन होने से यह संभव हो पाया तो ठाकुर ने किंतु देखिए कि कितने शॉर्ट एक ही लाइन में स्वामी जी का जो परिचय दिया है वह परिचय किंतु स्वामी जी की जो पूरी बायोग्राफी है गंभीरानंद जी महाराज ने लिखी है दो वॉल्यूम में युग नायक विवेकानंद तो एक ही लाइन में पूरे युग नायक का सार किंतु हमको मिल जाता है अभी इस लाइन ये स्वामी जी का ठाकुर का एक सेंटेंस जो है उसको यदि विस्तार से समझना तो फिर हमको युग नायक पढ़ना है किंतु युग नायक का सार क्या है तो ठाकुर की एक इस सेंटेंस में हमको मिल जाता है अभी माश महाशय आगे लिखते हैं ठाकुर मणि शहीद आभार कथा कहीते ठाकुर मणि के साथ में फिर से बात कर रहे हैं श्री राम कृष्ण तोमार आजकाल ईश्वर चिंता की रूप हो ठाकुर मणि को कहते हैं मणि अर्थात की मास्टर महाशय उनको कहते हैं कि आजकल तुम्हारी ईश्वर चिंता किस तरह से हो रही है ईश्वर अनु्या तुम्हारा किस तरह से चल रहा है तुम्हार साकार भलो लागे ना निराकार तुमको साकार अच्छा लगता है ना निराकार देखिए ये साकार निराकार आज हम इस तरह से इतना चिंता नहीं करते कि ईश्वर साकार है या निराकार है हमको पता है कि यदि आप साकार स्वरूप भी मानना चाहे भगवान विष्णु की पूजा करना चाहे ये शिव शिवलिंग की पूजा करना चाहे या तो फिर यह दुर्गा प्रतिमा की पूजा करें तो वह भी ठीक है और आंख बंद करके अपने हृदय में वो अखंड अद्वय सत्ता की चिंतन करें मनन करें श्रवण करें निदिद्यासन करें अपने हृदय में तो वो भी वो भी इतना ही सत्य है उतना ही सही है हम आजकल ईश्वर का क्या स्वरूप है वो लेकर के इतनी चिंता नहीं करते किंतु उस समय क्या था ऑलरेडी भारत गुलाम देश था तो भारतीयो के मन में ऐसा एक बैठ गया कि यह मिलिटरी विजय उन्होंने हमारे पर प्राप्त की है भारत का पॉलिटिकल जदी अधोगति हुई है तो भारत के धर्म की भी अधोगति हुई है अभी एक्चुअली धर्म की अधोगति नहीं हुई समाज की अधोगति हुई है समाज में यह जो कुप्रथा है अंधश्रद्धा है उसने समाज को जकड़ करके रखा है किंतु धर्म के जो मूलभूत सिद्धांत है वह तो वैसे ही बरकरार है जैसे ठाकुर स्वामी जी कहते हैं कि श्रुति और स्मृति हमारा हिंदू धर्म दो भागों में बटा हुआ है श्रुति अर्थात की यह महावाक्य अहम ब्रह्मास्मि प्रज्ञान ब्रह्म तत्व मसी यह जो सब हमको बताते हैं कि मेरे भीतर में जो जीवात्मा है वही इस विश्वव्यापी या तो फिर विश्व के भी परे सृष्टि स्थिति प्रलय के भी परे ये जो अद्वय ब्रह्मा है वो और मेरे भीतर में जो जीवात्मा है या तो फिर मेरे भीतर में जो चेतना है चेतन है वो एक ही है तो ये हो गया हमारे धर्म का मूलभूत सार वेदांत के या तो फिर उपनिषद के महावाक्य दिस महावाक्य आर दी एसेंस ऑफ हिंदुइज्म तो इसलिए ये जो सामाजिक प्रथाएं हैं कि छोटी उम्र में लड़कियों की शादी होनी चाहिए ये वगैरह वगैरह कुप्रथा है उसको तो समाज में से निकाल देना चाहिए एक वो मुस्लिम आक्रमण की वजह से स्त्रियों की रक्षा करने के लिए पर्दा प्रथा वगैरह यह सब सब शुरू हुआ था तो अभी तो इंडिया इज सेफ नाउ तो वो कु प्रथाओं को हटा कर के यह जो मूलभूत मंत्र है हमारे हिंदू धर्म के उसको फिर से हमारे हृदय में स्थापित करना है किंतु यह तो हो गया उस असली हिंदू धर्म का परिचय तो उस समय ऐसा लगता था कि इस्लाम और क्रिश्चियनिटी के आने से कि हम जो ये मां काली की पूजा करते हैं या तो मां दुर्गा की प्रतिमा की पूजा करते हैं यह हमारे लिए अंधश्रद्धा है और प्रतिमा पूजा को छोड़ देना चाहिए तो इसलिए उस समय के जो पढ़े लिखे जो लड़के थे पढ़े लिखे ये जो उस समय के लोग थे खास कर के कलकत्ता के और बंबे वगैरह मेट्रो सिटीज के बड़े शहर के उन लोगों के मन में यह धारणा फिट हो गई थी कि ईश्वर जो है वह निराकार होने चाहिए साकार नहीं तो मास्टर महाशय ने जब ठाकुर के पास पहली बार आना शुरू किया था उसी समय ठाकुर ने कहा था कि तुमको निराकार अच्छा लगता है कि साकार तो मास्टर महाशय ने ने कहा कि वैसे तो मुझे लगता है निराकार ही ठीक है ईश्वर क्या कभी साकार हो सकते हैं मैंने वो निराकार ही मुझे ठीक लग रहे हैं तो ठाकुर ने ठाकुर ने कहा था ईश्वर निराकार भी है साकार भी है उस समय फिर मास्टर महाशय दुविधा में पड़ गए थे फिर उनके साथ में बहुत सारी चर्चा हुई थी और मास्टर महाशय ने थोड़ा धीरे-धीरे करके ठाकुर को स्वीकार करने की शुरुआत भी की थी तो वो थी प्रथम द्वितीय तृतीय दर्शन की सब बातें अभी किंतु इतने दिनों के बाद ठाकुर उनको फिर से पूछते हैं कि तुम्हारी ईश्वर चिंता तुम यहां पर नियमित रूप से आते हो तो अभी तुम्हारी ईश्वर चिंता कैसे चल रही है जो उस समय जो डिस्कस हुआ था कि ईश्वर साकार है या निराकार वो सब चिंता करने की बजाय साधन भजन में अपने मन को डुबा दो ईश्वर का जो सही स्वरूप है अपने से अपनी नजरों के सामने वह प्रकट हो जाएगा इतनी चिंता करने की हमको जरूरत नहीं है फिर वो मास्टर महाशय एक बार वो ओपिनियन दे दिए थे कि यदि ईश्वर निर साकार है तो ठाकुर ने कहा था कि तो मृणमय नहीं चिन्मय अर्थात किय मिट्टी की प्रतिमा नहीं है ईश्वर व चिन्मई प्रतिमा है तो मास्टर महाशय ने बोल दिया कि लोगों को बता देना चाहिए कि आप लोग मिट्टी की प्रतिमा की नहीं चिन्मय प्रतिमा की उपासना कर रहे हो तो ठाकुर ने बड़े नाराज हो कर के बोला था तुम लोगों के कलिकता के लोगों का यही एक हाल है अपने को कौन समझाए वो ठीक नहीं जगत को पूरे गांव को लेक्चर देने के लिए निकले हैं तो व वो सब डिस्कशन हुआ था ठाकुर को पता था कि मास्टर महाशय के मन में यह कशमकश चल रही है यह साकार निराकार किस तरह की साधना की जाए तो इसलिए ठाकुर अभी उनको पूछते हैं कि तुमको ईश्वर तुम्हारा किसमें अभी विश्वास है तुम्हार साकार भालो लागे ना निराकार तुमको साकार अच्छा लगता है ना कि निराकार मणि आगे शका एकन मन जायना मणि कहता है जी साकार में अभी मेरा मन नहीं जा रहा है आबार निराकार किंतु मन स्थिर करते पारी ना किंतु न द अदर हैंड निराकार में मैं अपने मन को स्थिर नहीं कर पा रहा हूं देखिए यह हमारे पढ़े लिखे लोगों की जो दुविधा है उसका कितना शॉर्ट और संक्षिप्त उसको टू द स्पोट उन्होंने बता दिया कि जद ईश्वर ठाकुर जद ईश्वर है या तो फिर ठाकुर के यदि ईश्वर के अवतार है तो ठाकुर का अनु द्या करना बड़ा ही आसान है ठाकुर दक्षिणेश्वर में बैठे हैं भक्तों के साथ गप लगा रहे हैं कभी हंसते हैं कभी नाचते हैं कभी गाते हैं तो यह सब इमेजिन करना बड़ा सहज है सरल है और कथामृत जैसी किताबें भी हमको इसमें सहाय करती हैं सुबह को उठकर के शाम को सोने के पहले तीन चार पन्ने पढ़ लिए कथामृत के लीला प्रसंग के तो हमारा मन सब समय प्रसन्न रहता है यदि साकार ईश्वर या तो फिर अवतार इनके ऊपर भरोसा करके एक सरल भक्ति विश्वास से आध्यात्मिक जीवन का गठन करना बहुत ही अच्छा है सहज है सरल है किंतु यदि मैं इन सभी चीजों पर मुझे विश्वास नहीं है और मैं यह सोचता हूं कि बस यह ईश्वर तो निराकार है मन को संयमित करके मुझे ईश्वर के ऊपर में मन को केंद्रित करना होगा या तो फिर ईश्वर का इस तरह से चिंतन करना होगा कि वह सर्वव्यापी है और कहीं एक जगह पर वह स्थित नहीं है तो इस तर के ईश्वर की चिंता करना या तो फिर इस तरह के ईश्वर से हमको कुछ प्रेरणा प्राप्त करना वो तो बड़ा ही कठिन है जोक आध्यात्मिक साधना में कितने ही आगे बढ़ चुके हैं इस तरह के लोग यह कर पाएंगे सामान्य आदमी का यह थोड़ा सा काम है तो मास्टर महाशय बड़ा ठीक लिखते हैं कि साकार पर विश्वास नहीं हो रहा है और निराकार पर मन स्थिर नहीं हो पा रहा है व नर का भी ऐसा था फिर आखिर में नर ने माहा काली पर विश्वास किया था उस दिन रात में उस दूसरे दिन ठाकुर कितने खुश खुश हो गए थे नरेण काली मैने छ नरेन काली मैने छ जो आए सबको बोल रहे है कि नरेंद्र ने काली को स्वीकार किया है नरेंद्र ने काली को स्वीकार किया है क्यों जबी पिताजी का देहांत हो गया था घर में खाने पीने को कुछ नहीं है उस समय स्वामी जी की जो मानसिक कष्ट और संघर्ष से गुजर रहे थे उस समय उन्होंने ठीक कर लिया था पहले तो वो क्या ईश्वर चंद्र विद्यासागर के स्कूल में टीचर के रूप में थोड़ा सा काम किया शिक्षक के रूप में बाद में कहीं आसाम के किसी टी गार्डन में चाय के बगीचे में मैनेजर का काम मिल गया तो वहां पर जाने को सोच रहा है यहां पर ठाकुर का जो प्रेम है ठाकुर का जो स्नेह है उनको बांध के रखा है दूसरी ओर उनका मन भी इस तरह से उर्ध्व गति कर रहा है कि सांसारिक चीजों पर चाह कर के भी वह मन को नहीं लगा पा रहे भाई और बहन की और मां की ये परिस्थिति खाने को भी नहीं मिल रहा है तो एक भयानक उनको जिस संघर्ष से गुजरना पड़ा इससे उनको स्प्लिट हेडेक होते थे अर्थात कि इतना जोर से सिर दर्द होता था कि वह बेचारे कुछ कर नहीं पाते थे सोते रहना पड़ता था अंधेरे में उस परिस्थिति में कहीं जाकर के ठाकुर के पास आए थे मां काली से प्रार्थना की थी मां काली के पास गए जितनी भी बार गए यह मांगने के लिए कि मां बहन भाई को कुछ खाने पीने की व्यवस्था हो जाए किंतु सब समय उनके मुंह से निकलता रहा ज्ञान दो भक्ति दो वैराग्य दो तो यह नरेंद्र को उस समय पता चला कि उसका सही स्वरूप क्या है उस दिन फिर ठाकुर के पास आकर के उसने शरणागति संपूर्ण रूप से वह ठाकुर के शरणागत हुआ ठाकुर ने मां काली का भजन उनको सिखाया और मां काली का भजन गाते गाते वह सो गए दूसरे दिन ठाकुर बड़े ही खुश होकर के सबको कह र है कि नरेंद्र ने काली को स्वीकार किया है नरेंद्र ने काली को स्वीकार किया है तो यह हम हमारे आधुनिक शिक्षा प्राप्त यह सेकुलरिज्म की विडंबना से पीड़ित यह युवा वर्ग है किसी साकार ईश्वर को तो मान ही नहीं सकते अवतार को तो स्वीकार ही नहीं कर सकते कौन राम और कौन कृष्ण यह सब अंधश्रद्धा के विषय है इन सब चीजों में क्या जाना तो एक एथिकल एक मोरल लाइफ चाहिए ऐसा सब में आईआईटी डेल्ली में एक बार वर्कशॉप था उसके लिए मैं वहां पर गया था तो वहां एक इंस्ट्रक्टर था एक टीचर तो उसके साथ में मेरी बात हुई तो मुझे बोलता हिंदू था वैसे बोलता है मुझे कबीर के दोहे बड़े अच्छे लगते हैं क्योंकि वह निराकार की बातें करता है हिंदू धर्म में यह सब अंधश्रद्धा ये वो मुझे इस सब में बिल्कुल इंटरेस्ट नहीं है अभी उसके मन में कुछ तो होगा तो मेरे साथ बात करने को आए वरना तो नहीं आता वो मेरे जैसे कितने ही साधु लोग आते हैं जाते हैं व क्या है तो किंतु उसको कुछ जिज्ञासा वृत्ति होगी कुछ मुमुक्षा इसलिए मेरे साथ हमने बहुत बातें की तो मैंने तो सिर्फ सुनता रहा देखिए इन लोगों की बुद्धि इतनी जबरदस्त होती है आईआईटी ग्रेजुएट होना आईआईटी में एडमिशन लेना वहां पे इंस्ट्रक्टर बनना तो छोटी मोटी बात नहीं है हम लोग कितना ही समझाएंगे ये लोग समझेंगे नहीं मैं तो उसकी बात सिर्फ इसीलिए सुन रहा था कि ऐसे लोगों की मानसिकता क्या है मेंटालिटी क्या है वो समझ में आए तो ये जो मास्टर महाशय जो लिखते हैं जो नरेंद की जो दुविधा थी एगजैक्टली मैंने देखा कि उसके भीतर में ये रिफ्लेक्ट हो रही है बड़ा ही पढ़ा लिखा है ग्रेजुएट आईआईटी में एडमिशन प्राप्त करना यानी कि हमको पता है कि वोह एग्जामिनेशन क्रैक करना लाखों लोगों में से कुछ चुनिंदा लोगों का उसमें सिलेक्शन होता है तो किस लेवल का डेडिकेशन और कंसंट्रेशन चाहिए स्टडी में तब कहीं जाकर के लोग वहां पर जा सकते हैं तो ऐसे लोगों को ऐसा तो मन में लगता है कि हम लोग बड़े ही बुद्धिमान है पूरे भारत में जो कि क्रीम कहा जाता है बेस्ट ऑफ द बेस्ट वो हम लोग है और ऐसे लोगों को तो मल्टीनेशनल कंपनियां करोड़ों करोड़ों डॉलर देकर के वो ले जाती है अपने हेड क्वार्टर में काम करने के लिए यह देखिए सुंदर पिचाई यह देखिए सत्य नडेला तो सबसे बड़ी-बड़ी कंपनियों के वो शीर्ष पद ऊपर सर्वश्रेष्ठ पद ऊपर यह लोग विराजमान है तो उनको लगता है कि पूरी धरा पूरी पृथ्वी उनके पैरों के नीचे है और अपनी बुद्धि से सब कुछ समझ लेंगे किंतु ये लोग अपनी यह बुद्धि अपने प्रोग्रामिंग कोडिंग यह सब तो बढ़िया सा कर लेते हैं यह मोबाइल वगैरह तो अच्छे से मैन्युफैक्चर कर लेते हैं यह मिसाइल फिसाइल भी बना देते होंगे रॉकेट भी बना देते होंगे किंतु इस बुद्धि से यदि ईश्वर की चिंता करने को जाते हैं तो उनके सामने पूरी एक स्टोन वल खड़ी हो जाती है क्योंकि ईश्वर को बुद्धि से नहीं प्राप्त किया जा सकता ईश्वर को जितेंद्रिय होकर के प्राप्त किया जा सकता है जो कि यह लोग समझते नहीं एक चीज दूसरा कि जितेंद्रिय चलो भी मुझे मुझे जितेंद्रिय होना है नरेंद्र की तरह मैंने स्वीकार कर लिया तो बोलने से तो थोड़ी ना होने वाला है वो कितने सालों सालों की जन्म जन्मांतर की तपस्या चाहिए और जब मैं तपस्या कर रहा हूं उस समय यदि मन में निराशा आती है दुविधा आती है संकट आता है संशय आता है तो मेरा हाथ पकड़ कर के मुझे कौन मार्गदर्शन देगा तो वह अवतार ही देंगे तो अवतार पर विश्वास होना और यह साथ में सेल्फ कॉन्फिडेंस होना ये दोनों चीज जिसमें एक होती है वे लोग सर्वश्रेष्ठ साधक है अदर वाइज चलो मुझे परीक्षा में पास होना है तो मैंने मंदिर में जाकर के ये लड्डू है नारियल है वो ऑफर कर दिया इससे भगवान खुश होंगे मुझे परीक्षा में पास कर देंगे घर में कुछ बीमारी है तो उसका कुछ समाधान कर लेंगे पैसों की कोई संकट है समस्या है तो उसमें कुछ कर लेंगे भगवान के पास जाओ राम के मंदिर में जाओ भगवान कृष्ण के मंदिर में जाओ शिवलिंग के पास गणेश है हमारे सिद्धि सिद्धि दाता सिद्धि जिनका गुण है वो है गणेश तो ये विघ्न करता गणेश तो इन सबके पास में जाकर के कुछ वो हमने मिन्नत मान ली तो हमारा सब ठीक हो जाएगा तो कुछ चीज मांगने के लिए एक दुकानदारी कि इतना दुकान में जाते हैं तना 00 दिया एक किलो ये कुछ लेकर के वो केला वगैरह लेकर के आ गए तो इस तरह से वो मंदिर में जाना है कुछ ऑफर कर दिया कुछ प्रणाम कर दिया कुछ दिखावा कर दिया और सामने अपेक्षा रखते हैं कि भगवान हमारे लिए कुछ करें तो ये तो एक तरह का हो गया है कि जिसके भीतर में कोई आत्म श्रद्धा जैसी चीज ही नहीं है ऑन दी अदर हैंड ये आईआईटी के ग्रेजुएट ये मल्टीनेशनल कंपनी के सीईओ जिन लोगों में प्रचंड मेधा शक्ति होती है प्रचंड डिसिप्लिन होता है जो कि घंटों के बाद घंटे भर घंटे बैठ कर के एक ही काम में अपने मन को कितना ही चाहे बोरिंग काम क्यों नाना हो कितना ही चाहे जटिल समस्या क्यों ना हो अभी पृथ्वी से लेकर के चंद्र पर एक स्पेसशिप भेजना मैथमेटिक्स को सॉल्व करना यह नेविगेशन सिस्टम को डेवलप करना ये फ्यूज ये जो उसके फ्यूल है फिर ये इंजन है स्पेसक्राफ्ट है उसका मेटालर्जी है यह पूरा डायनेमिक्स जो है उसको कंट्रोल करके उसको डेवलप करना किस तरह की बुद्धि शक्ति चाहिए तो इन लोगों में भीतर में प्रचंड आत्म श्रद्धा होती है किंतु फिर आत्म श्रद्धा होने के बाद किसी अवतार को स्वीकार करना अपने पूजनीय गुरु के रूप में पूजनीय इष्ट के रूप में यह उन लोगों के लिए बड़ा ही कठिन होता है जो साधक या तो फिर जो व्यक्ति यह दोनों चीज कर पाए कि उसके भीतर में प्रचंड आत्म श्रद्धा भी है प्रचंड सेल्फ कॉन्फिडेंस भी है और साथ में यह कि किसी इष्ट के प्रति किसी अवतार के प्रति किसी ईश्वर के प्रति संपूर्ण रूप से शरणागति भी है धैन ही विल बिकम द ग्रेटेस्ट पर्सन एवर जैसे हमने कुछ दिन पहले कहा था आइंस्टाइन और श्री रामकृष्ण दोनों के गुण एक व्यक्ति के भीतर में वह उस समय उपस्थित हो सकते हैं उस एक ही व्यक्ति के भीतर में प्रकट हो सकते हैं देन ही विल बिकम द ग्रेटेस्ट पर्सन ऑन प्लेनेट अर्थ अच्छा तो मास्टर महाशय का इस प्रश्न के ऊपर में आज हम समाप्त करते हैं कल देखते हैं कि ठाकुर इसका क्या उत्तर देते हैं ओम शा श शांति हरि ओम श राम